सूरह अल-बक़रह
सूरह अल-बक़रह (परिचय)
सूरह अल-बक़रह क़ुरआन की सबसे लंबी और महत्वपूर्ण सूरह है। 'बक़रह' का शाब्दिक अर्थ है "गाय (The Cow)"। इसका यह नाम बनी इस्राईल को गाय ज़बह करने के आदेश वाली ऐतिहासिक घटना (आयत 67–73) के कारण रखा गया। यह सूरह मदीना में नाज़िल हुई (मदनी सूरह) और इसमें कुल 286 आयतें हैं।
सूरह नंबर: 02
नुज़ूल: मदीना
कुल आयतें: 286
यह सूरह इस्लामी जीवन की एक मुकम्मल गाइड है। इसमें ईमान और तक़वा की परिभाषा, बनी इस्राईल का विस्तृत इतिहास, हज़रत आदम (अ.स) की रचना, क़िबला का परिवर्तन, रोज़ा, ज़कात, हज, निकाह, तलाक़, व्यापारिक नैतिकता, सूद (रिबा) का निषेध और कर्ज़ लिखने के नियम जैसी तमाम अहम जानकारियाँ दी गई हैं। आयतुल कुर्सी (2:255) जैसी क़ुरआन की सबसे महान आयत और क़ुरआन की सबसे लंबी आयत (2:282) भी इसी सूरह का हिस्सा हैं। इसका मुख्य संदेश अल्लाह पर सच्चा ईमान, उसकी हिदायत को स्वीकार करना और न्याय व अच्छे चरित्र के साथ दुनिया और आख़िरत में सफलता पाना है।
फ़ज़ीलत: नबी ﷺ ने फ़रमाया, "अपने घरों को कब्रिस्तान मत बनाओ। जिस घर में सूरह अल-बक़रह पढ़ी जाती है, उससे शैतान भाग जाता है।" (सहीह मुस्लिम)। साथ ही, क़यामत के दिन यह सूरह अपने पढ़ने वालों के लिए सिफ़ारिश करेगी।
आयतें 1 से 10
1
المअलिफ़-लाम-मीम
"अलिफ़-लाम-मीम।"
तफ़्सीर:
  • ये हुरूफ़-ए-मुक़त्तआत (अलग-अलग अक्षर) हैं।
  • इनके वास्तविक अर्थ अल्लाह ही बेहतर जानता है। सहाबा और बहुत से मुफस्सिरीन ने यही मत अपनाया कि इनके बारे में बिना प्रमाण के कोई निश्चित अर्थ नहीं बताया जाए।
  • इन पर ईमान रखना और इनकी तिलावत करना ही हमारा काम है।
2
ذَٰلِكَयह
الْكِتَابُवह किताब है
لَاकोई नहीं
رَيْبَसंदेह
فِيهِइसमें
هُدًىमार्गदर्शन है
لِّلْمُتَّقِينَपरहेज़गारों के लिए
"यह वह किताब है जिसमें कोई संदेह नहीं। यह परहेज़गारों के लिए मार्गदर्शन है।"
तफ़्सीर:
  • क़ुरआन अल्लाह की सच्ची किताब है, इसमें कोई शक नहीं।
  • इससे वही लोग सबसे अधिक लाभ उठाते हैं जो अल्लाह से डरते हैं और उसकी आज्ञा मानना चाहते हैं।
  • हिदायत सभी के लिए है, लेकिन उसे स्वीकार करने वाले मुत्तक़ी लोग उससे लाभ उठाते हैं।
3
الَّذِينَजो लोग
يُؤْمِنُونَईमान लाते हैं
بِالْغَيْبِग़ैब पर
وَيُقِيمُونَऔर क़ायम करते हैं
الصَّلَاةَनमाज़
وَمِمَّاऔर उसमें से जो
رَزَقْنَاهُمْहमने उन्हें दिया है
يُنفِقُونَखर्च करते हैं
"जो ग़ैब पर ईमान लाते हैं, नमाज़ क़ायम करते हैं और जो हमने उन्हें दिया है उसमें से खर्च करते हैं।"
तफ़्सीर:
  • ग़ैब में ईमान का अर्थ है अल्लाह, फ़रिश्तों, आख़िरत, जन्नत, जहन्नम आदि पर विश्वास।
  • नमाज़ को नियमित और सही तरीके (सुन्नत) से अदा करना। जो लोग ऐसा नहीं करते, वे मुनाफ़िक़ों के जैसा व्यवहार करते हैं।
  • अल्लाह की दी हुई रोज़ी में से ज़कात, सदक़ा और भलाई के कामों में खर्च करना।
4
وَالَّذِينَऔर जो लोग
يُؤْمِنُونَईमान लाते हैं
بِمَاउस पर जो
أُنزِلَउतारी गई
إِلَيْكَआपकी ओर
وَمَاऔर जो
أُنزِلَउतारी गई
مِن قَبْلِكَआपसे पहले
وَبِالْآخِرَةِऔर आख़िरत पर
هُمْवे
يُوقِنُونَपूरा यक़ीन रखते हैं
"और जो उस (वही) पर ईमान लाते हैं जो आपकी ओर उतारी गई और जो आपसे पहले उतारी गई, तथा आख़िरत पर पूरा यक़ीन रखते हैं।"
तफ़्सीर:
  • सच्चा मोमिन केवल क़ुरआन ही नहीं, बल्कि पहले के असली आसमानी ग्रंथों (तौरात, ज़बूर, इंजील) पर भी उनके मूल रूप में ईमान रखता है। यह मानना ज़रूरी है कि वे अपने समय में सच्ची थीं, लेकिन अब अमल केवल क़ुरआन और नबी ﷺ की हदीस पर ही किया जाएगा।
  • आख़िरत पर पक्का यक़ीन इंसान के कर्मों को सुधारता है।
5
أُولَٰئِكَयही लोग
عَلَىٰपर हैं
هُدًىहिदायत
مِّن رَّبِّهِمْअपने रब की ओर से
وَأُولَٰئِكَऔर यही लोग
هُمُवही हैं
الْمُفْلِحُونَसफल होने वाले
"यही लोग अपने रब की ओर से हिदायत पर हैं और यही सफल होने वाले हैं।"
तफ़्सीर:
  • जिन लोगों में ऊपर बताई गई खूबियाँ हों, वही वास्तविक सफलता पाने वाले हैं।
  • असली कामयाबी केवल दुनिया की नहीं, बल्कि आख़िरत की सफलता है।
6
إِنَّनिश्चय ही
الَّذِينَजिन लोगों ने
كَفَرُواकुफ़्र किया
سَوَاءٌबराबर है
عَلَيْهِمْउनके लिए
أَأَنذَرْتَهُمْकि आप उन्हें चेतावनी दें
أَمْया
لَمْ
تُنذِرْهُمْचेतावनी दें
لَاवे नहीं
يُؤْمِنُونَईमान लाएँगे
"निश्चय ही जिन्होंने कुफ़्र किया, उनके लिए बराबर है कि आप उन्हें चेतावनी दें या न दें, वे ईमान नहीं लाएँगे।"
तफ़्सीर:
  • यह उन लोगों के बारे में है जिन्होंने हक़ को पहचानने के बाद भी ज़िद और अहंकार से उसे ठुकरा दिया और इनकार का रास्ता चुन लिया।
  • यह हर गैर-मुस्लिम के बारे में नहीं, बल्कि उन ज़िद्दी लोगों के बारे में है जो जानबूझकर सत्य का इनकार करते हैं।
7
خَتَمَमुहर लगा दी
اللَّهُअल्लाह ने
عَلَىٰपर
قُلُوبِهِمْउनके दिलों
وَعَلَىٰऔर
سَمْعِهِمْउनके कानों पर
وَعَلَىٰऔर
أَبْصَارِهِمْउनकी आँखों पर
غِشَاوَةٌपर्दा है
وَلَهُمْऔर उनके लिए
عَذَابٌअज़ाब है
عَظِيمٌबड़ा
"अल्लाह ने उनके दिलों और कानों पर मुहर लगा दी है और उनकी आँखों पर पर्दा है, और उनके लिए बड़ा अज़ाब है।"
तफ़्सीर:
  • लगातार कुफ़्र और गुनाह करने के कारण उनके दिलों में अब सच्चाई को कुबूल करने की ताक़त ही खत्म हो चुकी है।
  • यह उनकी अपनी ज़िद का परिणाम है कि वे हिदायत स्वीकार नहीं करते।
8
وَمِنَऔर में से
النَّاسِलोगों
مَنकुछ वो हैं जो
يَقُولُकहते हैं
آمَنَّاहम ईमान लाए
بِاللَّهِअल्लाह पर
وَبِالْيَوْمِऔर दिन पर
الْآخِرِआख़िरी
وَمَاजबकि नहीं
هُمवे
بِمُؤْمِنِينَईमान वाले
"और लोगों में से कुछ कहते हैं, हम अल्लाह और आख़िरी दिन पर ईमान लाए हैं, लेकिन हक़ीकत में वे ईमान वाले नहीं हैं।"
तफ़्सीर:
  • यहाँ से 'मुनाफ़िक़ों' (Hypocrites) का ज़िक्र शुरू होता है।
  • मुनाफ़िक़ का अर्थ: मुनाफ़िक़ वह व्यक्ति है जो ज़ुबान से तो कहता है कि "मैं मुसलमान हूँ", नमाज़ भी पढ़ता है और लोगों के बीच इस्लामी बातें भी करता है, लेकिन अंदर से (दिल में) उसका ईमान नहीं होता। वह जानबूझकर इस्लाम का मज़ाक उड़ाने या मुसलमानों को नुकसान पहुँचाने के लिए यह ढोंग करता है। (ज़ुबान पर कुछ और, दिल में कुछ और)।
9
يُخَادِعُونَवे धोखा देना चाहते हैं
اللَّهَअल्लाह को
وَالَّذِينَऔर उन लोगों को जो
آمَنُواईमान लाए
وَمَاऔर नहीं
يَخْدَعُونَवे धोखा दे रहे
إِلَّاमगर
أَنفُسَهُمْस्वयं को ही
وَمَاऔर नहीं
يَشْعُرُونَउन्हें समझ है
"वे अल्लाह और ईमान वालों को धोखा देना चाहते हैं, जबकि वास्तव में वे स्वयं को ही धोखा दे रहे हैं और उन्हें समझ नहीं है।"
तफ़्सीर:
  • अल्लाह को कोई धोखा नहीं दे सकता।
  • मुनाफ़िक़ अपने झूठ और कपट से सबसे अधिक अपना ही नुकसान करते हैं।
10
فِيमें
قُلُوبِهِمउनके दिलों
مَّرَضٌरोग है
فَزَادَهُمُतो बढ़ा दिया उन्हें
اللَّهُअल्लाह ने
مَرَضًاरोग में
وَلَهُمْऔर उनके लिए
عَذَابٌअज़ाब है
أَلِيمٌदर्दनाक
بِمَاकारण उस
كَانُواजो वे
يَكْذِبُونَझूठ बोलते थे
"उनके दिलों में रोग है, तो अल्लाह ने उनके रोग को और बढ़ा दिया और उनके झूठ बोलने के कारण उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है।"
तफ़्सीर:
  • यहाँ बीमारी से मतलब शंका, कपट और ईमान की कमजोरी है।
  • जब इंसान सत्य से बार-बार मुँह मोड़ता है, तो उसका दिल और अधिक कठोर होता जाता है।
आज की ज़िन्दगी में इसका इस्तेमाल

लॉन्ग-टर्म विज़न (Belief in the Unseen)

आयत 3 में 'ग़ैब पर ईमान' की बात है। आज की जनरेशन इंस्टेंट ग्रैटिफिकेशन (तुरंत मज़ा) चाहती है। लेकिन जो लोग आख़िरत (ग़ैब) पर यक़ीन रखते हैं, वे छोटे और तुरंत मिलने वाले फायदों के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करते। उनका विज़न बहुत लॉन्ग-टर्म होता है।

'फेक लाइफ' का डिप्रेशन (The Hypocrite's Dilemma)

आयत 8 से 10 में 'मुनाफ़िक़ों' का ज़िक्र है, जो दिखाते कुछ और हैं और होते कुछ और हैं। आज सोशल मीडिया पर लोग अपनी 'परफेक्ट लाइफ' का दिखावा करते हैं, जबकि अंदर से वे परेशान होते हैं। यह दोहरा जीवन (Dual Life) ही वह 'दिल की बीमारी' है जो इंसान का सुकून छीन लेती है। इस्लाम हमें अंदर और बाहर से एक (Authentic) होना सिखाता है।

My Action Plan (मेरा संकल्प)

इन 10 आयतों को पढ़ने के बाद, क्या आप अपने अंदर या बाहर के जीवन को एक जैसा बनाने की कोशिश करेंगे? अपना संकल्प लिखें:

आयतें 11 से 20
11
وَإِذَاऔर जब
قِيلَकहा जाता है
لَهُمْउनसे
لَاमत
تُفْسِدُواफ़साद फैलाओ
فِيमें
الْأَرْضِधरती
قَالُواवे कहते हैं
إِنَّمَاहम तो सिर्फ
نَحْنُहम
مُصْلِحُونَसुधार करने वाले
"जब उनसे कहा जाता है कि धरती में फ़साद मत फैलाओ, तो वे कहते हैं: 'हम तो सुधार करने वाले हैं।'"
तफ़्सीर: मुनाफ़िक़ अपने गुनाह और लोगों को गुमराह करने को ही "सुधार" का नाम देते हैं। इंसान का अपना नफ़्स (मन) अक्सर गलत काम को भी सही साबित कर देता है।
12
أَلَاसुन लो
إِنَّهُمْवास्तव में वही
هُمُही
الْمُفْسِدُونَफ़साद फैलाने वाले
وَلَٰكِنलेकिन
لَّاनहीं
يَشْعُرُونَउन्हें एहसास
"सुन लो! वास्तव में वही फ़साद फैलाने वाले हैं, लेकिन उन्हें इसका एहसास नहीं।"
तफ़्सीर: अल्लाह साफ़ कर रहे हैं कि असली नुकसान वही पहुँचा रहे हैं, लेकिन अहंकार की वजह से उन्हें यह समझ ही नहीं आता कि वे कितना बड़ा बुरा काम कर रहे हैं।
13
وَإِذَاऔर जब
قِيلَकहा जाता है
لَهُمْउनसे
آمِنُواईमान लाओ
كَمَاजैसा
آمَنَईमान लाए
النَّاسُलोग
قَالُواवे कहते हैं
أَنُؤْمِنُक्या हम ईमान लाएँ
كَمَاजैसा
آمَنَईमान लाए
السُّفَهَاءُनासमझ लोग
"जब उनसे कहा जाता है कि दूसरे ईमान वालों की तरह ईमान लाओ, तो वे कहते हैं: 'क्या हम भी इन नासमझ लोगों की तरह ईमान लाएँ?'"
तफ़्सीर: 'लोग' (अन-नास) से यहाँ मुराद सहाबा (रज़ि.) हैं। मुनाफ़िक़ उन्हें 'नासमझ' कहते थे क्योंकि वे अपना माल और जान इस्लाम पर कुर्बान कर रहे थे। हक़ीकत में नासमझ वही थे जो शाश्वत जीवन के बदले दुनिया के चंद फ़ायदे देख रहे थे।
14
وَإِذَاऔर जब
لَقُواवे मिलते हैं
الَّذِينَउनसे जो
آمَنُواईमान लाए
قَالُواवे कहते हैं
آمَنَّاहम ईमान लाए
وَإِذَاऔर जब
خَلَوْاवे अकेले होते हैं
إِلَىٰअपने
شَيَاطِينِهِمْसाथियों (शैतानों) के पास
قَالُواवे कहते हैं
إِنَّاहम तो
مَعَكُمْतुम्हारे साथ हैं
"जब वे ईमान वालों से मिलते हैं तो कहते हैं: 'हम ईमान लाए हैं', और जब अपने शैतानों (साथियों) के पास जाते हैं तो कहते हैं: 'हम तो तुम्हारे साथ हैं, हम तो केवल मज़ाक कर रहे थे।'"
तफ़्सीर: यहाँ मुनाफ़िक़ों का दोहरा चरित्र साफ़ दिखता है। वे मुसलमानों के सामने खुद को मुसलमान कहते हैं, और अपने जैसे कपटी साथियों के बीच जाकर कहते हैं कि वे मुसलमानों से बस मज़ाक कर रहे थे।
15
اللَّهُअल्लाह
يَسْتَهْزِئُमज़ाक करता है
بِهِمْउनसे
"अल्लाह उनसे मज़ाक करता है और उन्हें उनकी सरकशी में ढील देता है कि वे भटकते रहें।"
तफ़्सीर: यह अल्लाह का न्याय है। जो व्यक्ति सत्य का मज़ाक उड़ाता है, अल्लाह उसे उसकी गुमराही में ही छोड़ देता है। यहाँ 'मज़ाक' का मतलब सजा के रूप में उन्हें उन्हीं के हाल पर छोड़ देना है।
16
أُولَٰئِكَयही लोग हैं
الَّذِينَजिन्होंने
اشْتَرَوُاखरीद ली
الضَّلَالَةَगुमराही
بِالْهُدَىٰहिदायत के बदले
"यही वे लोग हैं जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही खरीद ली, तो उनका यह सौदा न लाभदायक हुआ और न ही वे हिदायत पाने वाले रहे।"
तफ़्सीर: यह एक बहुत घाटे का सौदा है। उन्होंने सच्चाई को ठुकराकर झूठ को अपना लिया, जिसका अंजाम तबाही है।
17-20
17. उनकी मिसाल उस व्यक्ति जैसी है जिसने आग जलाई... 18. वे बहरे, गूँगे और अंधे हैं। 19. या उनकी मिसाल उस वर्षा जैसी है जो आकाश से बरसे... 20. बिजली उनकी आँखें चौंधिया देती है; जब रोशनी होती है तो चल पड़ते हैं।
तफ़्सीर: अल्लाह ने यहाँ मुनाफ़िक़ों के लिए दो मिसालें दी हैं:
1. एक ऐसे व्यक्ति की तरह जो आग जलाकर रौशनी पाता है, लेकिन जैसे ही आग बुझती है, वह अंधेरे में फंस जाता है। (ज़बानी ईमान का असर)
2. मूसलाधार बारिश में फंसे व्यक्ति की तरह, जिसे बिजली की चमक से रास्ता तो दिखता है, लेकिन कड़क और डर से वह आगे नहीं बढ़ पाता।
आज की ज़िन्दगी में इसका इस्तेमाल

दिखावा vs वास्तविकता (Integrity)

मुनाफ़िक़ का मतलब है 'दोहरापन'। आज की प्रोफेशनल लाइफ में भी हम अक्सर वही करते हैं जो हम नहीं हैं। ये आयतें हमें सिखाती हैं कि हमारा 'पब्लिक फेस' और 'प्राइवेट फेस' एक होना चाहिए, क्योंकि अल्लाह हमारे अंदर के इरादों (intentions) का गवाह है।

इगो और सुधार का दावा (The Ego Trap)

जब हम गलत होते हैं, तो अक्सर खुद को सही साबित करने के लिए नए तर्क देते हैं। इन आयतों से सीखें कि अपनी गलतियों को सुधारने के लिए सबसे पहले यह स्वीकार करना ज़रूरी है कि "हमसे गलती हुई है"।

My Action Plan

क्या आपने आज कोई ऐसा काम किया है जो बाहर से सही पर अंदर से दिखावा था? इसे आज ही सुधारने का संकल्प लें:

आयतें 21 से 30
21
يَا أَيُّهَا
النَّاسُलोगो
اعْبُدُواइबादत करो
رَبَّكُمُअपने रब की
الَّذِيजिसने
خَلَقَكُمْपैदा किया तुम्हें
وَالَّذِينَऔर उन्हें जो
مِنसे
قَبْلِكُمْतुमसे पहले थे
لَعَلَّكُمْताकि तुम
تَتَّقُونَतुम बच जाओ
"हे लोगो! अपने उस पालनहार की इबादत करो जिस ने तुम को और तुम से पहले के लोगों को पैदा किया ताकि तुम परहेज़गार हो जाओ।"
तफ़्सीर:
  • यह क़ुरआन का पहला सीधा आदेश है। जिसने हमें पैदा किया, वही इबादत का सबसे बड़ा हक़दार है।
22
الَّذِيवो जिसने
جَعَلَबनाया
لَكُمُतुम्हारे लिए
الْأَرْضَज़मीन को
فِرَاشًاफ़र्श
وَالسَّمَاءَऔर आसमान को
بِنَاءًछत
وَأَنزَلَऔर उसने उतारा
مِنَसे
السَّمَاءِआसमान
مَاءًपानी
فَأَخْرَجَफिर उसने निकाला
بِهِसाथ उसके
مِنَसे
الثَّمَرَاتِफलों
رِزْقًاरिज़्क़
لَّكُمْतुम्हारे लिए
فَلَاपस ना
تَجْعَلُواतुम बनाओ
لِلَّهِअल्लाह के लिए
أَندَادًاशरीक
وَأَنتُمْहालाँकि तुम
تَعْلَمُونَतुम जानते हो
"जिस ने तुम्हारे लिए धरती को बिछावन और आकाश को छत बनाया, और आकाश से वर्षा की और उस से फल पैदा करके तुम्हें जीविका (रिज़्क़) अता की, अतः यह जानते हुए किसी को अल्लाह का शरीक न बनाओ।"
तफ़्सीर:
  • अल्लाह अपनी नेमतें गिनाकर बताता है कि जब सारी नेमतें उसी की हैं, तो इबादत भी उसी की होनी चाहिए। शिर्क सबसे बड़ा गुनाह है।
23
وَإِنऔर अगर
كُنتُمْहो तुम
فِيमें
رَيْبٍकिसी शक
مِّمَّاउससे जो
نَزَّلْنَاनाज़िल किया हमने
عَلَىٰपर
عَبْدِنَاअपने बन्दे
فَأْتُواपस ले आओ
بِسُورَةٍकोई सूरत
مِّنसे
مِّثْلِهِइस जैसी
وَادْعُواऔर बुला लो
شُهَدَاءَكُمअपने गवाहों को
مِّنसे
دُونِसिवाय
اللَّهِअल्लाह के
إِنअगर
كُنتُمْहो तुम
صَادِقِينَसच्चे
"और अगर तुम्हें उस में शक हो जिसे हम ने अपने बन्दे पर नाज़िल किया है, और तुम सच्चे हो तो इसी जैसी एक सूरः बना लाओ, तुम्हें छूट है कि अल्लाह के सिवाय अपने सहयोगियों को भी बुला लो।"
तफ़्सीर:
  • तौहीद (अल्लाह को एक मानना और उसकी इबादत करना) के बाद अब रिसालत (ईशदूत) के बारे में बताया जा रहा है।
  • हम ने अपने बन्दे पर जो किताब उतारी उसका अल्लाह की ओर से नाज़िल होने में तुम्हें अगर शक है तो तुम अपने सभी मदद करने वालों को मिला कर इस जैसी एक सूरः ही बनाकर दिखाओ।
24
فَإِنफिर अगर
لَّمْना
تَفْعَلُواतुमने किया
وَلَنऔर हरगिज़ नहीं
تَفْعَلُواतुम कर सकोगे
فَاتَّقُواपस डरो
النَّارَउस आग से
الَّتِيवो जो
وَقُودُهَاईंधन हैं उसका
النَّاسُइन्सान
وَالْحِجَارَةُऔर पत्थर
أُعِدَّتْतैयार की गई है
لِلْكَافِرِينَकाफ़िरों के लिए
"फिर अगर तुम ने नहीं किया और तुम कभी भी नहीं कर सकते, तो (उसे सच्चा समझ कर) उस आग से डरो, जिसका ईंधन इंसान और पत्थर हैं, जो काफिरों के लिए तैयार की गई है।"
तफ़्सीर:
  • यह क़ुरआन करीम की सच्चाई का एक वाज़ेह सुबूत है कि अरब व दूसरे इलाके के सभी काफिरों को ललकारा गया, लेकिन वह आज तक इसका जवाब नहीं दे सके और बेशक क़यामत आने तक ऐसा नहीं कर सकेंगे।
25
وَبَشِّرِऔर खुशख़बरी दे दीजिए
الَّذِينَउन्हें जो
آمَنُواईमान लाए
وَعَمِلُواऔर उन्होंने अमल किए
الصَّالِحَاتِनेक
أَنَّबेशक
لَهُمْउनके लिए
جَنَّاتٍबागात हैं
تَجْرِيबहती हैं
مِنसे
تَحْتِهَاउनके नीचे
الْأَنْهَارُनहरें
كُلَّمَاजब कभी
رُزِقُواवो दिए जाएंगे
مِنْهَاउनसे
مِنसे
ثَمَرَةٍकोई फल
رِّزْقًاबतौर रिज़्क़
قَالُواवो कहेंगे
هَٰذَاये
الَّذِيवो ही है जो
رُزِقْنَاदिए गए हम
مِنसे
قَبْلُइससे पहले
وَأُتُواऔर वो दिए जाएंगे
بِهِउससे
مُتَشَابِهًاमिलता-जुलता
وَلَهُمْऔर उनके लिए
فِيهَاउनमें
أَزْوَاجٌबीवियाँ होंगी
مُّطَهَّرَةٌनिहायत पाकीज़ा
وَهُمْऔर वो
فِيهَاउनमें
خَالِدُونَहमेशा रहने वाले हैं
"और ईमानवालों और नेक काम करने वालों को, उन स्वर्गों की खुशखबरी दो जिनके नीचे नहरें बह रही हैं, जब उन्हें उन से फल खाने के लिए दिए जाएंगे तो कहेंगे कि इस से पहले हमें खाने को यही दिया गया, वह समरूपी फल होंगे और उन के लिए उस में पाकीज़ा बीवियां होंगी और वे उस में हमेशा रहेंगे।"
तफ़्सीर:
  • क़ुरआन पाक में हर जगह ईमान के साथ नेक काम का बयान करके इस बात को वाज़ेह कर दिया गया है कि ईमान और नेक काम का चोली-दामन का साथ है।
  • नेक काम के बिना ईमान का कोई फायदा नहीं और ईमान के बिना नेक काम की अल्लाह के पास कोई कीमत नहीं।
  • नेक काम क्या है? जो सुन्नत के अनुसार हो और सही तरीके से अल्लाह की खुशी के लिए किया जाये।
  • दिखावे और रियाकारी के लिए किये गये काम भी बेकार और बेफायदा हैं।
26
إِنَّबेशक
اللَّهَअल्लाह
لَاनहीं
يَسْتَحْيِيहया फ़रमाता/शर्माता
أَنकि
يَضْرِبَवो बयान करे
مَثَلًاकोई मिसाल
مَّاख़्वाह
بَعُوضَةًमादा मच्छर की हो
فَمَاया जो
فَوْقَهَاऊपर है उसके
فَأَمَّاतो रहे
الَّذِينَवो जो
آمَنُواईमान लाए
فَيَعْلَمُونَपस वो इल्म रखते हैं
أَنَّهُकि बेशक वो
الْحَقُّहक़ है
مِنसे
رَّبِّهِمْउनके रब की तरफ़ से
وَأَمَّاऔर रहे
الَّذِينَवो जिन्होंने
كَفَرُواकुफ़्र किया
فَيَقُولُونَतो वो कहते हैं
مَاذَاक्या
أَرَادَइरादा किया
اللَّهُअल्लाह ने
بِهَٰذَاसाथ इस
مَثَلًاमिसाल के
يُضِلُّवो गुमराह करता है
بِهِसाथ इसके
كَثِيرًاकसीर (तादाद) को
وَيَهْدِيऔर वो हिदायत देता है
بِهِसाथ इसके
كَثِيرًاकसीर (तादाद) को
وَمَاऔर नहीं
يُضِلُّवो गुमराह करता है
بِهِसाथ इसके
إِلَّاमगर
الْفَاسِقِينَफ़ासिक़ों को
"हकीकत में अल्लाह तआला किसी मिसाल को बयान करने से लज्जित नहीं होता, चाहे वह मच्छर की हो या उससे भी तुच्छ चीज़ की, ईमानवाले उसे अपने रब की ओर से सच समझते हैं और काफिर कहते हैं कि ऐसी मिसाल देने से अल्लाह का मतलब क्या है? इसी के द्वारा बहुतों को गुमराह करता है और बहुत लोगों को सच्चे रास्ते पर लाता है। और गुमराह वह केवल अवज्ञाकारियों (फ़ासिकों) को ही करता है।"
तफ़्सीर:
  • मोमिन हर उदाहरण से शिक्षा लेता है, जबकि हठी लोग बहाने ढूँढ़ते हैं। सत्य समझाने के लिए किसी भी उदाहरण का प्रयोग किया जा सकता है।
27
الَّذِينَवो जो
يَنقُضُونَतोड़ते हैं
عَهْدَअहद
اللَّهِअल्लाह का
مِنसे
بَعْدِबाद
مِيثَاقِهِउसके मज़बूत करने के
وَيَقْطَعُونَऔर वो काटते हैं
مَاजो
أَمَرَहुक्म दिया
اللَّهُअल्लाह ने
بِهِउसका
أَنकि
يُوصَلَवो जोड़ा जाए
وَيُفْسِدُونَऔर वो फ़साद करते हैं
فِيमें
الْأَرْضِज़मीन में
أُولَٰئِكَयही लोग हैं
هُمُवो
الْخَاسِرُونَजो ख़सारा पाने वाले हैं
"जो लोग अल्लाह तआला के साथ की गयी मजबूत अहद (प्रतिज्ञा) को तोड़ देते हैं, और अल्लाह तआला ने जिन चीज़ों को जोड़ने का हुक्म दिया है, उसे काटते हैं और धरती पर फसाद फैलाते हैं, यही लोग नुकसान उठाने वाले हैं।"
तफ़्सीर:
  • ईमान का तकाज़ा है कि इंसान अल्लाह से किए वादे निभाए। रिश्तेदारी तोड़ना और समाज में फसाद फैलाना बड़े गुनाह हैं।
28
كَيْفَकिस तरह
تَكْفُرُونَतुम इन्कार करते हो
بِاللَّهِअल्लाह का
وَكُنتُمْहालाँकि थे तुम
أَمْوَاتًاमुर्दे
فَأَحْيَاكُمْफिर उसने ज़िन्दा किया तुम्हें
ثُمَّफिर
يُمِيتُكُمْवो मौत देगा तुम्हें
ثُمَّफिर
يُحْيِيكُمْवो ज़िन्दा करेगा तुम्हें
ثُمَّफिर
إِلَيْهِउसी की तरफ़
تُرْجَعُونَतुम लौटाए जाओगे
"तुम अल्लाह को कैसे नहीं मानते, जबकि तुम बेजान थे तो उस ने तुम्हें जीवन दिया, फिर तुम्हें मौत देगा, फिर दोबारा ज़िन्दा करेगा, फिर तुम को उसी के पास जाना है।"
तफ़्सीर:
  • इंसान की पूरी ज़िंदगी और जन्म-मृत्यु अल्लाह के नियंत्रण में है। आख़िरत पर ईमान इंसान के जीवन को सही दिशा देता है।
29
هُوَवो
الَّذِيजिसने
خَلَقَपैदा किया
لَكُمतुम्हारे लिए
مَّاजो कुछ
فِيमें है
الْأَرْضِज़मीन
جَمِيعًاसब
ثُمَّफिर
اسْتَوَىٰउसने क़स्द किया
إِلَىतरफ़
السَّمَاءِआसमान की
فَسَوَّاهُنَّतो ठीक बना दिया उन्हें
سَبْعَसात
سَمَاوَاتٍआसमान
وَهُوَऔर वो
بِكُلِّहर
شَيْءٍचीज़ का
عَلِيمٌजानने वाला है
"उसी ने तुम्हारे लिए जो कुछ धरती में है सब पैदा किया, फिर आकाश का इरादा किया और उस ने सात बराबर आसमान बना दिये और वह हर चीज़ का जानने वाला है।"
तफ़्सीर:
  • संसार की हर नेमत हमें अल्लाह का शुक्रगुज़ार बनाती है। उसकी शक्ति और ज्ञान हर चीज़ को घेरने वाले हैं।
30
وَإِذْऔर जब
قَالَकहा
رَبُّكَतुम्हारे रब ने
لِلْمَلَائِكَةِफ़रिश्तों से
إِنِّيबेशक मैं
جَاعِلٌबनाने वाला हूँ
فِيमें
الْأَرْضِज़मीन
خَلِيفَةًएक ख़लीफ़ा
قَالُواउन्होंने कहा
أَتَجْعَلُक्या तू बनाएगा
فِيهَاउसमें
مَنउसे जो
يُفْسِدُफ़साद करेगा
فِيهَاउसमें
وَيَسْفِكُऔर बहाएगा
الدِّمَاءَख़ून
وَنَحْنُजबकि हम
نُسَبِّحُतस्बीह करते हैं
بِحَمْدِكَतेरी तारीफ़ के साथ
وَنُقَدِّسُऔर पाकीज़गी बयान करते हैं
لَكَतेरी
قَالَउसने कहा
إِنِّيबेशक मैं
أَعْلَمُजानता हूँ
مَاजो
لَاनहीं
تَعْلَمُونَतुम जानते
"और जब तुम्हारे रब ने फरिश्तों से कहा कि, मैं धरती में एक खलीफा (ऐसा गिरोह जो एक-दूसरे के बाद आयेगा) बनाने जा रहा हूँ, तो उन्होंने कहा क्या तू उस में ऐसे लोगों को पैदा करेगा जो उसमें फसाद और खून-खराबा करे, और हम तेरी तारीफ के साथ तेरी तस्बीह करते और तेरी पाकीज़गी बयान करते हैं, उस ने कहा जो मैं जानता हूँ तुम नहीं जानते।"
तफ़्सीर:
  • मलाईका (फरिश्ते) अल्लाह के प्रकाश से पैदा की गई मखलूक है जिनका ठिकाना आसमान पर है, जो अपने रब के हुक्म का पालन करते हैं।
  • खलीफा का मतलब ऐसा प्राणी (मखलूक) है जो एक-दूसरे के बाद आयेगा।
  • फ़रिश्तों ने विरोध नहीं किया, बल्कि हिकमत (Wisdom) समझने के लिए प्रश्न किया। इंसान को ज्ञान, ज़िम्मेदारी और परीक्षा के लिए पैदा किया गया है।
आज की ज़िन्दगी में इसका इस्तेमाल

इंटेंशन और एक्शन (The Power of Execution)

आयत 25 हमें सिखाती है कि सिर्फ 'विश्वास' (Belief/ईमान) काफी नहीं है, 'एक्शन' (नेक काम) भी ज़रूरी है। इमेजेज़ की तफ़सीर बहुत गहराई से बताती है कि "नेक काम के बिना ईमान का कोई फायदा नहीं।" आज के दौर में, सिर्फ गोल सेट करना काफी नहीं, उस पर सही तरीके से अमल (Execution) करना ही कामयाबी है。

लीडरशिप और जिम्मेदारी (The Role of a Khalifah)

आयत 30 में इंसान को 'खलीफा' (प्रतिनिधि/मैनेजर) कहा गया है। आप इस दुनिया में सिर्फ वक्त बिताने नहीं आए हैं, बल्कि आपको एक जिम्मेदारी दी गई है। एक अच्छे खलीफा (लीडर) की तरह हमें धरती पर फसाद (Toxic Environment) नहीं फैलाना चाहिए, बल्कि सिस्टम को बेहतर बनाना चाहिए।

My Action Plan

क्या आपके इरादे (ईमान) और काम (एक्शन) एक-दूसरे से मेल खाते हैं? आज का संकल्प लें कि आप अपनी जिम्मेदारी (खिलाफ़त) कैसे निभाएंगे:

आयतें 31 से 40
31
وَعَلَّمَऔर उसने सिखा दिए
ءَادَمَआदम को
الْأَسْمَاءَनाम (इल्म)
كُلَّهَاसब उनके
ثُمَّफिर
عَرَضَهُمْउसने पेश किया उन्हें
عَلَىपर
الْمَلَائِكَةِफ़रिश्तों
فَقَالَफिर फ़रमाया
أَنبِئُونِيख़बर दो मुझे
بِأَسْمَاءِनामों की
هَٰؤُلَاءِइन सब के
إِنअगर
كُنتُمْहो तुम
صَادِقِينَसच्चे
"और (आदम की हक़ीक़त ज़ाहिर करने की ग़रज़ से) आदम को सब चीज़ों के नाम सिखा दिए फिर उनको फरिश्तों के सामने पेश किया और फ़रमाया कि अगर तुम अपने दावे में (कि हम मुस्तहके ख़िलाफ़त हैं) सच्चे हो तो मुझे इन चीज़ों के नाम बताओ।"
तफ़्सीर:
  • अल्लाह ने हज़रत आदम (अ.स.) को इल्म (ज्ञान) दिया, जो फरिश्तों के पास नहीं था। यह इल्म ही इंसान की फज़ीलत (श्रेष्ठता) का कारण है।
32
قَالُواउन्होंने कहा
سُبْحَانَكَपाक है तू
لَاनहीं
عِلْمَकोई इल्म
لَنَاहमारे लिए
إِلَّاमगर
مَاजो
عَلَّمْتَنَاसिखाया तूने हमें
إِنَّكَबेशक तू
أَنتَतू ही है
الْعَلِيمُबहुत इल्म वाला
الْحَكِيمُबहुत हिकमत वाला
"तब फ़रिश्तों ने (आजिज़ी से) अर्ज़ की तू (हर ऐब से) पाक व पाकीज़ा है हम तो जो कुछ तूने बताया है उसके सिवा कुछ नहीं जानते तू बड़ा जानने वाला, मसलहतों का पहचानने वाला है।"
तफ़्सीर:
  • फ़रिश्तों ने अपनी असमर्थता स्वीकार की। यह उनकी आज्ञाकारिता और आजिज़ी (विनम्रता) को दर्शाता है।
33
قَالَउसने कहा
يَا آدَمُऐ आदम
أَنبِئْهُمख़बर दे दो उन्हें
بِأَسْمَائِهِمْउनके नामों की
فَلَمَّاफिर जब
أَنبَأَهُمख़बर दे दी उसने उन्हें
بِأَسْمَائِهِمْउनके नामों की
قَالَउसने कहा
أَلَمْक्या नहीं
أَقُلकहा था मैंने
لَّكُمْतुमसे
إِنِّيबेशक मैं
أَعْلَمُजानता हूँ
غَيْبَग़ैब (छिपी बातें)
السَّمَاوَاتِआसमानों की
وَالْأَرْضِऔर ज़मीन की
وَأَعْلَمُऔर मैं जानता हूँ
مَاजो
تُبْدُونَतुम ज़ाहिर करते हो
وَمَاऔर जो
كُنتُمْहो तुम
تَكْتُمُونَतुम छुपाते
"(अल्लाह ने) फ़रमाया: ऐ आदम! तुम इन फ़रिश्तों को इन चीज़ों के नाम बता दो। फिर जब आदम ने उन्हें उनके नाम बता दिए, तो (अल्लाह ने) फ़रमाया: क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि मैं आसमानों और ज़मीन की छिपी बातों को खूब जानता हूँ, और जो कुछ तुम ज़ाहिर करते हो और जो कुछ छुपाते हो (वह सब) जानता हूँ?"
तफ़्सीर:
  • आदम (अ.स.) ने इल्म के ज़रिए अपनी क़ाबलियत साबित कर दी। अल्लाह ने बता दिया कि इंसान को ख़लीफ़ा बनाने के पीछे जो हिकमत (Wisdom) है, वह केवल अल्लाह ही जानता है।
34
وَإِذْऔर जब
قُلْنَاकहा हमने
لِلْمَلَائِكَةِफ़रिश्तों से
اسْجُدُواसजदा करो
لِآدَمَआदम को
فَسَجَدُواतो उन्होंने सजदा किया
إِلَّاसिवाय
إِبْلِيسَइब्लीस के
أَبَىٰउसने इन्कार किया
وَاسْتَكْبَرَऔर तकब्बुर किया
وَكَانَऔर वो हो गया
مِنَसे
الْكَافِرِينَकाफ़िरों में
"और (उस वक्त को याद करो) जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सजदा करो तो सब के सब झुक गए मगर शैतान ने इन्कार किया और ग़ुरूर (अहंकार) में आ गया और काफ़िर हो गया।"
तफ़्सीर:
  • यह सजदा इबादत का नहीं, बल्कि सम्मान (तअज़ीम) का था। इब्लीस (शैतान) ने अल्लाह के हुक्म को मानने से इसलिए इन्कार किया क्योंकि उसे अपने 'आग' से बने होने का घमंड था।
35
وَقُلْنَاऔर कहा हमने
يَا آدَمُऐ आदम
اسْكُنْरहो
أَنتَतुम
وَزَوْجُكَऔर बीवी तुम्हारी
الْجَنَّةَजन्नत में
وَكُلَاऔर तुम दोनों खाओ
مِنْهَاइससे
رَغَدًاफ़रागत से
حَيْثُजहाँ से
شِئْتُمَاतुम दोनों चाहो
وَلَاऔर ना
تَقْرَبَاतुम दोनों क़रीब जाना
هَٰذِهِउस
الشَّجَرَةَदरख़्त के
فَتَكُونَاवरना तुम दोनों हो जाओगे
مِنَसे
الظَّالِمِينَज़ालिमों में
"और हमने आदम से कहा ऐ आदम तुम अपनी बीवी समेत बहिश्त (जन्नत) में रहा सहा करो और जहाँ से तुम्हारा जी चाहे उसमें से ब फरागत खाओ (पियो) मगर उस दरख्त के पास भी न जाना (वरना) फिर तुम अपना आप नुकसान करोगे।"
तफ़्सीर:
  • अल्लाह ने आदम और हौव्वा को जन्नत की हर नेमत दी, लेकिन एक दरख़्त (पेड़) को टेस्ट (परीक्षा) के लिए मना किया। (नोट: यह पेड़ किस चीज़ का था, यह कुरआन या हदीस में साफ़ नहीं है, इसलिए इसे गेहूँ या सेब कहना बेबुनियाद है।)
36
فَأَزَلَّهُمَاफिर फुसला दिया उन दोनों को
الشَّيْطَانُशैतान ने
عَنْهَاउससे
فَأَخْرَجَهُمَاफिर उसने निकलवा दिया उन दोनों को
مِمَّاउससे जो
كَانَاवो दोनों थे
فِيهِजिसमें
وَقُلْنَاऔर कहा हमने
اهْبِطُواउतर जाओ
بَعْضُكُمْबाज़ तुम्हारे
لِبَعْضٍबाज़ के
عَدُوٌّदुश्मन हैं
وَلَكُمْऔर तुम्हारे लिए
فِيमें
الْأَرْضِज़मीन
مُسْتَقَرٌّजाए क़रार है
وَمَتَاعٌऔर फ़ायदा उठाना है
إِلَىٰतक
حِينٍएक वक़्त
"लेकिन शैतान ने उन्हें भटका कर वहाँ से निकलवा ही दिया, और हम ने कह दिया कि उतरो, तुम एक-दूसरे के दुश्मन हो, और एक मुक़र्रर वक़्त तक तुम्हें धरती पर ठहरना और फ़ायदा उठाना है।"
तफ़्सीर:
  • शैतान ने उन्हें धोखा देकर गलती करवाई। इसके नतीजे में उन्हें जन्नत से धरती (दुनिया) पर भेज दिया गया, जहाँ इन्सान और शैतान की दुश्मनी कयामत तक चलेगी।
37
فَتَلَقَّىٰपस सीख लिए
آدَمُआदम ने
مِنसे
رَّبِّهِअपने रब
كَلِمَاتٍचंद कलिमात
فَتَابَफिर वो मेहरबान हुआ
عَلَيْهِउस पर
إِنَّهُबेशक वो
هُوَवो ही है
التَّوَّابُबहुत तौबा क़ुबूल करने वाला
الرَّحِيمُनिहायत रहम करने वाला
"फिर आदम ने अपने परवरदिगार से (माज़रत के चन्द अल्फाज़) सीखे, पस खुदा ने उन अल्फाज़ की बरकत से आदम की तौबा कुबूल कर ली। बेशक वह बड़ा माफ़ करने वाला मेहरबान है।"
तफ़्सीर:
  • आदम (अ.स.) ने अपनी गलती मानी और तौबा की। अल्लाह ने उन्हें तौबा के शब्द सिखाए और उन्हें माफ़ कर दिया। यह इंसान की फितरत है कि वह गलती करके माफ़ी मांगता है, जबकि शैतान तकब्बुर करता है।
38
قُلْنَاकहा हमने
اهْبِطُواउतर जाओ
مِنْهَاइससे
جَمِيعًاसब के सब
فَإِمَّاफिर अगर
يَأْتِيَنَّكُمआए तुम्हारे पास
مِّنِّيमेरी तरफ़ से
هُدًىहिदायत
فَمَنِतो जो
تَبِعَपैरवी करेगा
هُدَايَमेरी हिदायत की
فَلَاतो न
خَوْفٌकोई ख़ौफ़ होगा
عَلَيْهِمْउन पर
وَلَاऔर न
هُمْवे
يَحْزَنُونَग़मगीन होंगे
"हम ने कहा तुम सभी यहां से उतरो, फिर अगर तुम्हारे पास मेरी ओर से हिदायत आये तो जो मेरे सही रास्ते को अपनायेगा उन पर कोई डर नही होगा न वे उदास (ग़मगीन) होंगे।"
तफ़्सीर:
  • दुनिया में भेजने के साथ अल्लाह ने हिदायत (किताब और रसूल) भेजने का वादा किया। जो इस हिदायत पर चलेगा, वह आखिरत में सुरक्षित रहेगा।
39
وَالَّذِينَऔर वो जिन्होंने
كَفَرُواकुफ़्र किया
وَكَذَّبُواऔर झुठलाया
بِآيَاتِنَاहमारी आयात को
أُولَٰئِكَयही लोग हैं
أَصْحَابُसाथी
النَّارِआग के
هُمْवो
فِيهَاउसमें
خَالِدُونَहमेशा रहने वाले हैं
"और जो कुफ्र व झूठ के ज़रिये हमारी आयतों को झुठलायें, वे जहन्नम में रहने वाले हैं, और हमेशा उसी में रहेंगे।"
तफ़्सीर:
  • यह उन लोगों का अंजाम है जो हिदायत आने के बाद भी जानबूझकर उसे ठुकरा देते हैं।
40
يَا بَنِيऐ बनी
إِسْرَائِيلَइस्राईल (याक़ूब की औलाद)
اذْكُرُواयाद करो
نِعْمَتِيَमेरी नेअमत को
الَّتِيवो जो
أَنْعَمْتُइनाम की मैंने
عَلَيْكُمْतुम पर
وَأَوْفُواऔर पूरा करो
بِعَهْدِيमेरे अहद को
أُوفِमैं पूरा करूँगा
بِعَهْدِكُمْतुम्हारे अहद को
وَإِيَّايَऔर सिर्फ़ मुझ ही से
فَارْهَبُونِपस डरो मुझ से
"ऐ बनी इसराईल (याक़ूब की औलाद)! मेरे उन एहसानात को याद करो जो तुम पर पहले कर चुके हैं और तुम मेरे अहद व इक़रार (ईमान) को पूरा करो तो मैं तुम्हारे अहद (सवाब) को पूरा करूँगा, और मुझ ही से डरते रहो।"
तफ़्सीर:
  • यहाँ से बनी इस्राईल (यहूदियों) का ज़िक्र शुरू होता है। उन्हें याद दिलाया गया कि अल्लाह ने उन पर कितनी नेमतें की थीं, लेकिन उन्होंने अल्लाह से किया वादा तोड़ दिया।
आज की ज़िन्दगी में इसका इस्तेमाल

इल्म की ताक़त (Knowledge is Power)

आयत 31-33 में अल्लाह ने बताया कि फरिश्ते मासूम और इबादतगुज़ार होने के बावजूद आदम (अ.स.) से पीछे रह गए, क्योंकि आदम के पास 'इल्म' (ज्ञान) था। Iqram ऐप का विज़न भी यही है—सम्मान (Iqram) इल्म से आता है। आज के दौर में जो लगातार नई चीज़ें सीखता है (Continuous Learning), वही आगे बढ़ता है।

अहंकार बनाम माफ़ी (Ego vs. Repentance)

शैतान (इब्लीस) ने भी गलती की और आदम (अ.स.) ने भी। लेकिन शैतान ने अपनी गलती पर 'तकब्बुर' (ईगो) किया और दलीलें दीं, जबकि आदम ने फौरन अपनी गलती मानी और माफ़ी (तौबा) मांगी। एक कामयाब इंसान वह है जो गलती होने पर उसे 'Own' करता है, न कि उसे सही साबित करने की ज़िद करता है।

My Action Plan

क्या ईगो (अहंकार) की वजह से आप कभी अपनी गलती मानने से कतराते हैं? आज आदम (अ.स.) की सुन्नत पर अमल करने का संकल्प लें:

आयतें 41 से 50
41
وَآمِنُواऔर ईमान लाओ
بِمَاउस पर जो
أَنزَلْتُनाज़िल किया मैंने
مُصَدِّقًاतसदीक़ करने वाला
لِّمَاउसके लिए जो
مَعَكُمْतुम्हारे पास है
وَلَاऔर ना
تَكُونُواतुम हो जाओ
أَوَّلَसबसे पहला
كَافِرٍइन्कार करने वाला
بِهِउसका
وَلَاऔर ना
تَشْتَرُواतुम लो
بِآيَاتِيमेरी आयात के बदले
ثَمَنًاक़ीमत
قَلِيلًاथोड़ी
وَإِيَّايَऔर सिर्फ़ मुझ ही से
فَاتَّقُونِपस डरो मुझ से
"और जो (कुरान) मैंने नाज़िल किया वह उस किताब (तौरेत) की (भी) तसदीक करता हूँ जो तुम्हारे पास है और तुम सबसे पहले उसके इन्कार पर मौजूद न हो जाओ और मेरी आयतों के बदले थोड़ी क़ीमत (दुनयावी फायदा) न लो और मुझ ही से डरते रहो।"
तफ़्सीर:
  • "थोड़े मूल्य (क़ीमत) पर मत बेचो" का मतलब यह है कि अल्लाह के हुक्म के मुकाबले में दुनिया के फायदे को अहमियत न दो। दुनिया का सारा सामान अल्लाह के हुक्म के मुकाबले में हक़ीर (तुच्छ) है।
42
وَلَاऔर ना
تَلْبِسُواतुम मिलाओ
الْحَقَّहक़ को
بِالْبَاطِلِसाथ बातिल के
وَتَكْتُمُواऔर तुम छुपाओ
الْحَقَّहक़ को
وَأَنتُمْहालाँकि तुम
تَعْلَمُونَतुम इल्म रखते हो
"और हक़ को बातिल के साथ न मिलाओ और हक़ बात को न छिपाओ हालाँकि तुम जानते हो।"
तफ़्सीर:
  • सत्य (हक़) को असत्य (बातिल) के साथ मिलावट मत करो और न सच को छुपाओ, जबकि तुम्हें खुद इसका इल्म है। सच्चाई को तोड़-मरोड़ कर पेश करना बड़ा गुनाह है।
43
وَأَقِيمُواऔर क़ायम करो
الصَّلَاةَनमाज़
وَآتُواऔर अदा करो
الزَّكَاةَज़कात
وَارْكَعُواऔर रुकू करो
مَعَसाथ
الرَّاكِعِينَरुकू करने वालों के
"और पाबन्दी से नमाज़ अदा करो और ज़कात दिया करो और जो लोग (हमारे सामने) इबादत के लिए झुकते हैं उनके साथ तुम भी झुका करो।"
44
أَتَأْمُرُونَक्या तुम हुक्म देते हो
النَّاسَलोगों को
بِالْبِرِّनेकी का
وَتَنسَوْنَऔर तुम भूल जाते हो
أَنفُسَكُمْअपने नफ़्सों को
وَأَنتُمْहालाँकि तुम
تَتْلُونَतुम तिलावत करते हो
الْكِتَابَकिताब की
أَفَلَاक्या फिर नहीं
تَعْقِلُونَतुम अक़्ल से काम लेते
"और तुम लोगों से नेकी करने को कहते हो और अपनी ख़बर नहीं लेते हालाँकि तुम किताबे खुदा को (बराबर) रटा करते हो तो तुम क्या इतना भी नहीं समझते।"
तफ़्सीर:
  • यह आयत उन लोगों को चेतावनी देती है जो दूसरों को तो अच्छी बातें बताते हैं, लेकिन खुद उन पर अमल नहीं करते।
45
وَاسْتَعِينُواऔर मदद तलब करो
بِالصَّبْرِसाथ सब्र
وَالصَّلَاةِऔर नमाज़ के
وَإِنَّهَاऔर बेशक वो
لَكَبِيرَةٌअलबत्ता बड़ी (भारी) है
إِلَّاमगर
عَلَىऊपर
الْخَاشِعِينَख़ुशू करने वालों के
"और (मुसीबत के वक्त) सब्र और नमाज़ का सहारा पकड़ो और अलबत्ता नमाज़ दूभर तो है मगर उन ख़ाकसारों पर (नहीं) जो बख़ूबी जानते हैं।"
तफ़्सीर:
  • सब्र और नमाज़ दोनों अल्लाह वालों के दो बड़े हथियार हैं।
  • नमाज़ के ज़रिये एक मोमिन को अल्लाह से सम्बन्ध आसानी से होता है, जिससे उसे अल्लाह की मर्जी और मदद हासिल होती है।
  • सब्र के ज़रिये उसके चरित्र (किरदार) में मज़बूती और धर्म में इस्तिकामत पैदा होती है।
46
الَّذِينَवो जो
يَظُنُّونَयक़ीन रखते हैं
أَنَّهُمबेशक वो
مُّلَاقُوमुलाक़ात करने वाले हैं
رَبِّهِمْअपने रब से
وَأَنَّهُمْऔर बेशक वो
إِلَيْهِतरफ़ उसके
رَاجِعُونَलौटने वाले हैं
"कि वह अपने परवरदिगार की बारगाह में हाज़िर होंगे और ज़रूर उसकी तरफ लौट जाएँगे।"
तफ़्सीर:
  • यह आयत 45 से जुड़ी है। सच्चे मोमिन (ख़ाकसार) वह हैं जिन्हें आख़िरत और अल्लाह से मुलाक़ात का पक्का यक़ीन होता है। यही यक़ीन उनके लिए नमाज़ और सब्र को आसान बना देता है।
47
يَا بَنِيऐ बनी
إِسْرَائِيلَइस्राईल
اذْكُرُواयाद करो
نِعْمَتِيَमेरी नेअमत को
الَّتِيवो जो
أَنْعَمْتُइनाम की मैंने
عَلَيْكُمْतुम पर
وَأَنِّيऔर बेशक मैं
فَضَّلْتُكُمْफ़ज़ीलत दी मैंने तुम्हें
عَلَىपर
الْعَالَمِينَतमाम जहानों पर
"ऐ बनी इसराइल मेरी उन नेअमतों को याद करो जो मैंने पहले तुम्हें दी और ये (भी तो सोचो) कि हमने तुमको सारे जहान के लोगों से बढ़ा दिया।"
तफ़्सीर:
  • यहाँ बनी इस्राईल को दी गई फज़ीलत (बड़ाई) से मुराद 'उस ज़माने के लोगों' पर बड़ाई है। अल्लाह ने उन्हें अनगिनत नेमतें दीं और उनमें कई नबी भेजे।
48
وَاتَّقُواऔर डरो
يَوْمًاउस दिन से
لَّا تَجْزِيना काम आएगा
نَفْسٌकोई नफ़्स
عَن نَّفْسٍकिसी नफ़्स के
شَيْئًاकुछ भी
وَلَا يُقْبَلُऔर ना क़ुबूल की जाएगी
مِنْهَاउससे
شَفَاعَةٌकोई सिफ़ारिश
وَلَا يُؤْخَذُऔर ना लिया जाएगा
مِنْهَاउससे
عَدْلٌकोई बदला
وَلَا هُمْऔर ना वो
يُنصَرُونَवो मदद किए जाएँगे
"और उस दिन से डरो (जिस दिन) कोई शख़्स किसी की तरफ से न फिदिया हो सकेगा और न उसकी तरफ से कोई सिफारिश मानी जाएगी और न उसका कोई मुआवजा लिया जाएगा और न वह मदद पहुँचाए जाएँगे।"
तफ़्सीर:
  • यह क़यामत के दिन का नज़ारा है। अल्लाह ने साफ़ कर दिया कि आख़िरत में किसी की सिफारिश, रिश्वत या कोई भी मुआवज़ा काम नहीं आएगा। हर इंसान को अपने आमाल (कर्मों) का हिसाब खुद देना होगा।
49
وَإِذْऔर जब
نَجَّيْنَاكُمनिजात दी हमने तुम्हें
مِّنْसे
آلِ فِرْعَوْنَआले फ़िरऔन
يَسُومُونَكُمْवो चखाते थे तुम्हें
سُوءَबुरे
الْعَذَابِअज़ाब की
يُذَبِّحُونَवो खूब ज़िबाह करते थे
أَبْنَاءَكُمْतुम्हारे बेटों को
وَيَسْتَحْيُونَऔर वो ज़िन्दा छोड़ देते थे
نِسَاءَكُمْतुम्हारी औरतों को
وَفِي ذَٰلِكُمऔर इसमें
بَلَاءٌआज़माइश थी
مِّن رَّبِّكُمْतुम्हारे रब की तरफ़ से
عَظِيمٌबहुत बड़ी
"और (उस वक्त को याद करो) जब हमने तुम्हें (तुम्हारे बुज़ुर्गो को) फिरऔन (के पन्जे) से छुड़ाया जो तुम्हें बड़े-बड़े दुख दे के सताते थे तुम्हारे लड़कों पर छुरी फेरते थे और तुम्हारी औरतों को (अपनी ख़िदमत के लिए) ज़िन्दा रहने देते थे और उसमें तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से (तुम्हारे सब्र की) सख्त आज़माइश थी।"
तफ़्सीर:
  • आले फ़िरऔन से मुराद केवल फ़िरऔन और उसका परिवार ही नहीं, बल्कि फ़िरऔन के सभी साथी हैं।
50
وَإِذْऔर जब
فَرَقْنَاफाड़ दिया हमने
بِكُمُतुम्हारे लिए
الْبَحْرَसमन्दर को
فَأَنجَيْنَاكُمْफिर निजात दी हमने तुम्हें
وَأَغْرَقْنَاऔर ग़र्क़ कर दिया हमने
آلَ فِرْعَوْنَआले फ़िरऔन को
وَأَنتُمْऔर तुम
تَنظُرُونَतुम देख रहे थे
"और जब हम ने तुम्हारे लिए सागर को फाड़ दिया और उस से तुम्हें पार कर दिया और फ़िरऔन के साथियों को तुम्हारी आँखों के सामने डुबो दिया। (से छुटकारा दिलाने में तुम्हारे रब का बड़ा उपकार था।)"
तफ़्सीर:
  • सागर का फाड़ना और उस में रास्ता बना देना, यह एक मोजिज़ा था, जिसका पूरा बयान सूरः 'शोअरा' में किया गया है।
आज की ज़िन्दगी में इसका इस्तेमाल

कथनी और करनी का अंतर (Practice What You Preach)

आयत 44 हमें हमारे दोहरे चरित्र (Hypocrisy) का आईना दिखाती है। अक्सर हम लोगों को बड़ी-बड़ी नसीहतें देते हैं, लेकिन अपनी ज़िंदगी में उन पर अमल नहीं करते। असली लीडरशिप और प्रोडक्टिविटी यह है कि जो उसूल आप दूसरों को बताते हैं, पहले उसे खुद पर लागू करें।

स्ट्रेस मैनेजमेंट के दो हथियार (Patience & Prayer)

आयत 45 में अल्लाह ने दुनिया के हर चैलेंज का हल दिया है: सब्र (Patience) और नमाज़ (Prayer)। जब भी हालात मुश्किल हों, पैनिक करने के बजाय नमाज़ के ज़रिए अल्लाह से कनेक्ट करें (यह मेंटल पीस देता है) और सब्र के ज़रिए अपने कैरेक्टर को मज़बूत करें (यह आपको हार मानने से रोकता है)।

My Action Plan

क्या आप मुश्किल वक्त में घबरा जाते हैं या दूसरों को वो सलाह देते हैं जिस पर आप खुद अमल नहीं करते? आज अपना कैरेक्टर मज़बूत करने का संकल्प लें:

आयतें 51 से 60
51
وَإِذْऔर जब
وَاعَدْنَاवादा लिया हमने
مُوسَىٰमूसा से
أَرْبَعِينَचालीस
لَيْلَةًरातों का
ثُمَّफिर
اتَّخَذْتُمُतुमने बना लिया
الْعِجْلَबछड़े को (माबूद)
مِنसे
بَعْدِهِउसके बाद
وَأَنتُمْऔर तुम
ظَالِمُونَज़ालिम बन गए
"और हम ने मूसा को चालीस रातों का वचन दिया, फिर तुम ने बछड़े को माबूद बना लिया, और ज़ालिम बन गए।"
तफ़्सीर:
  • जब हज़रत मूसा (अ.स.) तूर पर्वत पर अल्लाह से तौरेत (किताब) लेने गए, तो उनके पीछे से बनी इस्राईल ने एक सोने के बछड़े को अपना भगवान (माबूद) मान कर उसकी पूजा शुरू कर दी, जो कि बहुत बड़ा ज़ुल्म (शिर्क) था।
52
ثُمَّफिर
عَفَوْنَاमाफ़ कर दिया हमने
عَنكُمतुम्हें
مِّنसे
بَعْدِबाद
ذَٰلِكَइसके
لَعَلَّكُمْताकि तुम
تَشْكُرُونَशुक्रगुज़ार बनो
"लेकिन हम ने इस के बावजूद भी तुम्हें माफ़ कर दिया, ताकि तुम शुक्रगुज़ार रहो।"
53
وَإِذْऔर जब
آتَيْنَاदी हमने
مُوسَىमूसा को
الْكِتَابَकिताब
وَالْفُرْقَانَऔर हक़ व बातिल में फ़र्क़ करने वाली
لَعَلَّكُمْताकि तुम
تَهْتَدُونَहिदायत पा सको
"और हम ने मूसा को तुम्हारी हिदायत के लिए किताब (तौरेत) और मोज़िज़ा अता किये।"
तफ़्सीर:
  • 'फ़ुरक़ान' का अर्थ है सत्य (हक़) और असत्य (बातिल) के बीच फ़र्क करने वाली कसौटी। तौरेत भी अपने समय की फ़ुरक़ान थी, जैसे आज क़ुरआन है।
54
وَإِذْऔर जब
قَالَकहा
مُوسَىٰमूसा ने
لِقَوْمِهِअपनी क़ौम से
يَا قَوْمِऐ मेरी क़ौम
إِنَّكُمْबेशक तुमने
ظَلَمْتُمْज़ुल्म किया
أَنفُسَكُمअपने नफ़्सों पर
بِاتِّخَاذِكُمُबवजह बनाने के तुम्हारे
الْعِجْلَबछड़े को (माबूद)
فَتُوبُواपस तौबा करो
إِلَىٰतरफ़
بَارِئِكُمْअपने पैदा करने वाले के
فَاقْتُلُواतो क़त्ल करो
أَنفُسَكُمْअपने नफ़्सों को (अपराधियों को)
ذَٰلِكُمْये
خَيْرٌबेहतर है
لَّكُمْतुम्हारे लिए
عِندَनज़दीक
بَارِئِكُمْतुम्हारे पैदा करने वाले के
فَتَابَफिर वो मेहरबान हुआ
عَلَيْكُمْतुम पर
إِنَّهُबेशक वो
هُوَवो ही है
التَّوَّابُबहुत तौबा क़ुबूल करने वाला
الرَّحِيمُनिहायत रहम करने वाला
"और जब मूसा ने अपनी क़ौम वालों से कहा कि 'ऐ मेरी क़ौम वालों! तुम ने बछड़े को (देवता) बनाकर खुद अपने ऊपर ज़ुल्म किया है, अब तुम अपने पैदा करने वाले की तरफ तवज्जोह करो, अपने आप को (अपराधी को) अपने हाथो कत्ल करो, तुम्हारे लिए भलाई अल्लाह तआला के पास इसी में है', तो उस ने तुम्हारी तौबा कुबूल की। बेशक वही तौबा कुबूल करने वाला और रहम करने वाला है!"
तफ़्सीर:
  • शिर्क की सज़ा के तौर पर बनी इस्राईल को हुक्म हुआ कि जिन्होंने बछड़े की पूजा की है, उन्हें वे लोग मौत के घाट उतारें जिन्होंने पूजा नहीं की थी। यह उनकी बहुत बड़ी आज़माइश थी, जिसके बाद उनकी तौबा कुबूल हुई।
55
وَإِذْऔर जब
قُلْتُمْकहा तुमने
يَا مُوسَىٰऐ मूसा
لَنहरगिज़ नहीं
نُّؤْمِنَहम ईमान लाएँगे
لَكَतुझ पर
حَتَّىٰयहाँ तक कि
نَرَىहम देख लें
اللَّهَअल्लाह को
جَهْرَةًसामने
فَأَخَذَتْكُمُफिर पकड़ लिया तुम्हें
الصَّاعِقَةُबिजली की कड़क ने
وَأَنتُمْऔर तुम
تَنظُرُونَतुम देख रहे थे
"और (तुम उसे भी याद करो) जब तुम ने मूसा से कहा था कि - जब तक हम अल्लाह को सामने न देख लेंगे कभी भी ईमान न लाएंगे (जिस नाफरमानी के दण्डस्वरूप) तुम पर तुम्हारे देखते हुए बिजली गिर पड़ी।"
56
ثُمَّफिर
بَعَثْنَاكُمउठा लिया हमने तुम्हें
مِّنसे
بَعْدِबाद
مَوْتِكُمْतुम्हारी मौत के
لَعَلَّكُمْताकि तुम
تَشْكُرُونَतुम शुक्र अदा करो
"(लेकिन) फिर हम ने तुम्हें मौत के बाद ज़िंदगी इसलिए दीया ताकि तुम शुक्रिया अदा करो।"
57
وَظَلَّلْنَاऔर साया किया हमने
عَلَيْكُمُतुम पर
الْغَمَامَबादलों का
وَأَنزَلْنَاऔर उतारा हमने
عَلَيْكُمُतुम पर
الْمَنَّमन्न
وَالسَّلْوَىٰऔर सलवा
كُلُواखाओ
مِنसे
طَيِّبَاتِइन पाकीज़ा चीज़ों से
مَاजो
رَزَقْنَاكُمْरिज़्क़ दिया हमने तुम्हें
وَمَاऔर नहीं
ظَلَمُونَاउन्होंने ज़ुल्म किया हम पर
وَلَٰكِنऔर लेकिन
كَانُواथे वो
أَنفُسَهُمْअपने नफ़्सों ही पर
يَظْلِمُونَवो ज़ुल्म करते
"और हमने तुम्हारे ऊपर बादलों की छाया की और तुम पर मन्न व सलवा उतारा (और कह दिया) हमारी अता की हुई पाक चीजें खाओ, और उन्होंने हम पर ज़ुल्म नहीं किया बल्कि खुद अपने आप पर ज़ुल्म करते थे।"
तफ़्सीर:
  • मन्न: यह ओस (Dew) की तरह पेड़ों या पत्थरों पर गिरती थी और शहद की तरह मीठी होती थी।
  • सलवा: बटेर या एक तरह की चिड़िया थी जो बिना मेहनत के उन्हें खाने को मिलती थी। अल्लाह ने उन्हें बिना मेहनत का रिज़्क दिया, लेकिन फिर भी उन्होंने नाफ़रमानी की।
58
وَإِذْऔर जब
قُلْنَاकहा हमने
ادْخُلُواदाखिल हो जाओ
هَٰذِهِइस
الْقَرْيَةَबस्ती में
فَكُلُواफिर खाओ
مِنْهَاउसमें से
حَيْثُजहाँ से
شِئْتُمْचाहो तुम
رَغَدًاफ़रागत से
وَادْخُلُواऔर दाख़िल हो जाओ
الْبَابَदरवाज़े से
سُجَّدًاसजदा करते हुए
وَقُولُواऔर कहो
حِطَّةٌहित्तातुन (बख़्श दे)
نَّغْفِرْहम बख़्श देंगे
لَكُمْतुम्हारे लिए
خَطَايَاكُمْख़ताएँ तुम्हारी
وَسَنَزِيدُऔर अनक़रीब हम ज़्यादा देंगे
الْمُحْسِنِينَएहसान करने वालों को
"और हम ने तुम से कहा कि इस बस्ती (बैतुल मुक़द्दस) में जाओ और जो कुछ जहाँ से जी चाहे जी भर कर खाओ-पियो और दरवाज़े में से सिर झुकाए हुए दाख़िल हो और मुँह से कहो कि 'हम माफी चाहते हैं' (हित्तातुन), हम तुम्हारी गलतियों को माफ़ कर देंगे और भलाई करने वालों को और ज़्यादा अता करेंगे।"
59
فَبَدَّلَतो बदल डाला
الَّذِينَजिन्होंने
ظَلَمُواज़ुल्म किया
قَوْلًاबात को
غَيْرَसिवाय
الَّذِيउसके जो
قِيلَकही गई थी
لَهُمْउनसे
فَأَنزَلْنَاतो उतारा हमने
عَلَىउन पर जिन्होंने
الَّذِينَउन पर जिन्होंने
ظَلَمُواज़ुल्म किया था
رِجْزًاअज़ाब
مِّنَसे
السَّمَاءِआसमान से
بِمَاबवजह इसके जो
كَانُواथे वो
يَفْسُقُونَवो नाफ़रमानी करते
"फिर उन ज़ालिमों ने यह बात जो उन से कही गई थी, बदल डाली, हम ने भी उन ज़ालिमों पर उनकी नाफरमानी की वजह से आकाश से अज़ाब उतारा।"
तफ़्सीर:
  • उन्हें 'हित्तातुन' (ऐ अल्लाह, हमें माफ़ कर दे) कहने का हुक्म था, लेकिन उन्होंने मज़ाक उड़ाते हुए उसे 'हिन्तातुन' (गेहूँ) कहना शुरू कर दिया। अल्लाह के हुक्म का मज़ाक उड़ाने के कारण उन पर आसमान से प्लेग (Plague) जैसी बीमारी का अज़ाब आया।
60
وَإِذِऔर जब
اسْتَسْقَىٰपानी माँगा
مُوسَىٰमूसा ने
لِقَوْمِهِअपनी क़ौम के लिए
فَقُلْنَاतो कहा हमने
اضْرِبमारो
بِّعَصَاكَअपने असा (लाठी) को
الْحَجَرَइस पत्थर पर
فَانفَجَرَتْतो फूट पड़े
مِنْهُउससे
اثْنَتَاबारह
عَشْرَةَबारह
عَيْنًاचश्मे
قَدْतहक़ीक़
عَلِمَजान लिया
كُلُّसब
أُنَاسٍलोगों ने
مَّشْرَبَهُمْघाट अपना
كُلُواखाओ
وَاشْرَبُواऔर पियो
مِنसे
رِّزْقِरिज़्क़
اللَّهِअल्लाह के
وَلَاऔर ना
تَعْثَوْاतुम फ़साद करो
فِيमें
الْأَرْضِज़मीन
مُفْسِدِينَमुफ़सिद बन कर
"और (वह वक्त भी याद करो) जब मूसा ने अपनी क़ौम के लिए पानी माँगा तो हमने कहा (ऐ मूसा) अपनी लाठी पत्थर पर मारो (लाठी मारते ही) उसमें से बारह चश्में फूट निकले और सब लोगों ने अपना-अपना घाट बख़ूबी जान लिया और हमने आम इजाज़त दे दी कि खुदा की दी हुई रोज़ी से खाओ पियो और मुल्क में फसाद न करते फिरो।"
तफ़्सीर:
  • अल्लाह चाहता तो बिना लाठी मारे भी पानी निकाल सकता था, लेकिन इंसान को 'सबब' (Cause/Action) इख्तियार करने का हुक्म दिया गया है। 12 कबीलों के लिए 12 अलग-अलग पानी के सोते (चश्मे) निकले ताकि उनमें कोई विवाद न हो।
आज की ज़िन्दगी में इसका इस्तेमाल

मेहनत और भरोसा (Action + Faith)

आयत 60 में अल्लाह ने मूसा (अ.स.) से कहा कि "लाठी मारो", तब पानी निकला। अल्लाह खुद पानी दे सकता था, लेकिन इससे यह लाइफ लेसन मिलता है कि इंसान को अपना 'Action' (प्रयास) 100% करना चाहिए, और फिर नतीजों के लिए अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए। खाली हाथ बैठकर सिर्फ दुआ करने से चमत्कार नहीं होते, मेहनत करनी पड़ती है।

नेमतों की कद्र (Gratitude over Complaining)

आयत 57 में बनी इस्राईल को घर बैठे 'मन्न व सलवा' (बेहतरीन खाना) मिल रहा था, लेकिन वे फिर भी नाशुक्र रहे। आज हम भी अपनी लाइफ में मिली हुई बड़ी-बड़ी नेमतों (स्वास्थ्य, परिवार, काम) को इग्नोर करके उन छोटी चीज़ों के लिए शिकायत करते हैं जो हमारे पास नहीं हैं। 'Iqram' का अर्थ सम्मान है, और अपनी नेमतों का सम्मान करना ही शुक्र है।

My Action Plan

क्या आप सिर्फ दुआओं के सहारे बैठे हैं या उस दिशा में मेहनत (Action) भी कर रहे हैं? आज अपना नज़रिया बदलने का संकल्प लें:

आयतें 61 से 70
61
وَإِذْऔर जब
قُلْتُمْकहा तुमने
يَا مُوسَىٰऐ मूसा
لَنहरगिज़ नहीं
نَّصْبِرَहम सब्र करेंगे
عَلَىٰपर
طَعَامٍखाने
وَاحِدٍएक ही
فَادْعُपस दुआ करो
لَنَاहमारे लिए
رَبَّكَअपने रब से
يُخْرِجْवो निकाले
لَنَاहमारे लिए
مِمَّاउसमें से जो
تُنبِتُउगाती है
الْأَرْضُज़मीन
مِنसे
بَقْلِهَاसब्ज़ी अपनी
وَقِثَّائِهَاऔर ककड़ी अपनी
وَفُومِهَاऔर गेहूँ अपनी
وَعَدَسِهَاऔर मसूर अपनी
وَبَصَلِهَاऔर प्याज़ अपनी
قَالَकहा
أَتَسْتَبْدِلُونَक्या तुम बदलना चाहते हो
الَّذِيउसे जो
هُوَवो
أَدْنَىٰकमतर है
بِالَّذِيबदले उसके जो
هُوَवो
خَيْرٌबेहतर है
اهْبِطُواउतर जाओ
مِصْرًاशहर में
فَإِنَّतो बेशक
لَكُمतुम्हारे लिए है
مَّاजो
سَأَلْتُمْमाँगा तुमने
وَضُرِبَتْऔर मार दी गई
عَلَيْهِمُउन पर
الذِّلَّةُज़िल्लत
وَالْمَسْكَنَةُऔर मोहताजी
وَبَاءُواऔर वो पलटे
بِغَضَبٍसाथ ग़ज़ब के
مِّنَसे
اللَّهِअल्लाह की तरफ़ से
"और जब तुम ने कहा कि "हे मूसा! हम से एक ही तरह का खाना खाने पर सब्र नहीं हो सकेगा, इसलिए अपने रब से दुआ कीजिए कि वह हमें धरती पर पैदा साग, ककड़ी, गेहूं, मसूर, और प्याज दे। आप ने कहा कि उम्दा चीज़ के बदले हक़ीर चीज़ क्यों मांगते हो? अच्छा शहर में जाओ..."
तफ़्सीर:
  • अल्लाह ने उन्हें बिना मेहनत का बेहतरीन जन्नती खाना (मन्न व सलवा) दिया था, लेकिन उन्होंने ज़मीन से उगने वाली मामूली सब्ज़ियों की माँग की। यह उनके लालच और अल्लाह के इनाम की नाक़द्री (अनादर) थी।
62
إِنَّबेशक
الَّذِينَवो लोग जो
آمَنُواईमान लाए
وَالَّذِينَऔर वो जो
هَادُواयहूदी बन गए
وَالنَّصَارَىٰऔर नस्रानी (इसाई)
وَالصَّابِئِينَऔर साबी
مَنْजो कोई
آمَنَईमान लाया
بِاللَّهِअल्लाह पर
وَالْيَوْمِऔर दिन पर
الْآخِرِआख़िरी
وَعَمِلَऔर उसने अमल किया
صَالِحًاनेक
فَلَهُمْतो उनके लिए
أَجْرُهُمْअजर है उनका
عِندَपास
رَبِّهِمْउनके रब के
وَلَاऔर ना
خَوْفٌकोई ख़ौफ़ होगा
عَلَيْهِمْउन पर
وَلَاऔर ना
هُمْवो
يَحْزَنُونَग़मगीन होंगे
"बेशक जो मुसलमान हो, यहूदी हो, नसारा (इसाई) हो या साबी हो, जो कोई भी अल्लाह तआला और क़यामत के दिन पर ईमान लाएगा और अच्छे काम करेगा उस का बदला उस के रब के पास है, और उन को न कोई डर है और न कोई गम होगा।"
63
وَإِذْऔर जब
أَخَذْنَاलिया हमने
مِيثَاقَكُمْपुख़्ता अहद तुम से
وَرَفَعْنَاऔर उठाया हमने
فَوْقَكُمُऊपर तुम्हारे
الطُّورَतूर (पहाड़) को
خُذُواपकड़ो
مَاजो
آتَيْنَاكُمदिया हमने तुम्हें
بِقُوَّةٍसाथ क़ुव्वत के
وَاذْكُرُواऔर याद करो
مَاजो
فِيهِउसमें है
لَعَلَّكُمْताकि तुम
تَتَّقُونَतुम बच जाओ (परहेज़गार बनो)
"और जब हम ने तुम से वचन लिया और तुम्हारे ऊपर तूर पहाड़ ला खड़ा कर दिया, और कहा- जो हम ने तुम्हें दिया है, उसे मज़बूती से पकड़े रहो और जो कुछ उस में है उसे याद करो, ताकि तुम बच सको।"
तफ़्सीर:
  • जब तौरेत के हुक्मों का पालन करने से यहूदियों ने मना किया, तो अल्लाह तआला ने तूर पहाड़ को छत की तरह उनके ऊपर उठा दिया, जिससे डर कर उन्होंने पालन करने का वचन दिया।
64
ثُمَّफिर
تَوَلَّيْتُمफिर गए तुम
مِّنसे
بَعْدِबाद
ذَٰلِكَउसके
فَلَوْلَاपस अगर ना होता
فَضْلُफ़ज़ल
اللَّهِअल्लाह का
عَلَيْكُمْतुम पर
وَرَحْمَتُهُऔर रहमत उसकी
لَكُنتُمअलबत्ता होते तुम
مِّنَसे
الْخَاسِرِينَख़सारा पाने वालों में से
"फिर तुम उस के बाद भी फिर गए, फिर अगर अल्लाह तआला का फ़ज़ल और रहमत तुम पर न होती, तो तुम नुकसान उठाने वाले होते।"
65
وَلَقَدْऔर अलबत्ता तहक़ीक़
عَلِمْتُمُजान लिया तुमने
الَّذِينَउनको जो
اعْتَدَوْاहद से निकल गए
مِنكُمْतुम में से
فِيमें
السَّبْتِसब्त (शनिवार) के दिन
فَقُلْنَاतो कहा हमने
لَهُمْउनसे
كُونُواहो जाओ
قِرَدَةًबन्दर
خَاسِئِينَज़लील व ख़्वार
"और अवश्य ही तुम्हें उन लोगों के बारे में इल्म भी है, जो तुम में से शनिवार (Sabbath) के बारे में हद से तजावुज़ कर गए और हम ने (भी) कह दिया कि तुम ज़लील बन्दर बन जाओ।"
तफ़्सीर:
  • शनिवार (सब्त) के दिन यहूदियों को मछली का शिकार बल्कि कोई भी काम करने से रोका गया था। लेकिन उन्होंने एक 'तकनीकी बहाना' निकाल कर अल्लाह के हुक्म की नाफ़रमानी की। इसके नतीजे में उन पर अल्लाह का ग़ज़ब नाज़िल हुआ।
66
فَجَعَلْنَاهَاतो बना दिया हमने उसे
نَكَالًاएक इबरत/सज़ा
لِّمَاवास्ते उसके जो
بَيْنَसामने
يَدَيْهَاउसके थे
وَمَاऔर जो
خَلْفَهَاपीछे उसके
وَمَوْعِظَةًऔर नसीहत
لِّلْمُتَّقِينَपरहेज़गारों के लिए
"इसे हमने अगले-पिछलों के लिए होशियार रहने की वजह बना दिया, और डरने वालों के लिए नसीहत है।"
67
وَإِذْऔर जब
قَالَकहा
مُوسَىٰमूसा ने
لِقَوْمِهِअपनी क़ौम से
إِنَّबेशक
اللَّهَअल्लाह
يَأْمُرُكُمْहुक्म देता है तुम्हें
أَنकि
تَذْبَحُواतुम ज़ब्ह करो
بَقَرَةًएक गाय
قَالُواउन्होंने कहा
أَتَتَّخِذُنَاक्या तुम बनाते हो हमें
هُزُوًاमज़ाक
قَالَकहा
أَعُوذُपनाह मांगता हूँ मैं
بِاللَّهِअल्लाह की
أَنْकि
أَكُونَमैं हो जाऊँ
مِنَसे
الْجَاهِلِينَजाहिलों में
"और मूसा ने जब अपनी जाति से कहा कि अल्लाह तआला तुम्हें एक गाय ज़िब्ह करने का हुक्म देता है, तो उन्होंने कहा कि 'हम से क्यों मज़ाक करते हो?' आप ने जवाब दिया कि मैं ऐसी बेवकूफ़ी से अल्लाह तआला की पनाह लेता हूँ।"
तफ़्सीर:
  • बनी इस्राईल में एक कत्ल हुआ था जिसका कातिल पता नहीं चल रहा था। अल्लाह ने हुक्म दिया कि एक गाय ज़िब्ह करके उसका गोश्त मुर्दे को मारो तो वह ज़िन्दा होकर कातिल का नाम बता देगा। इसी गाय (Al-Baqarah) के नाम पर सूरह का नाम है।
68
قَالُواउन्होंने कहा
ادْعُदुआ करो
لَنَاहमारे लिए
رَبَّكَअपने रब से
يُبَيِّنवो वाज़ेह करे
لَّنَاहमारे लिए
مَاक्या
هِيَहै वो
قَالَकहा
إِنَّهُबेशक वो
يَقُولُकहता है
إِنَّهَاबेशक वो
بَقَرَةٌएक गाय है
لَّاना
فَارِضٌबूढ़ी
وَلَاऔर ना
بِكْرٌबछिया
عَوَانٌदरमियानी उम्र की
بَيْنَदरमियान
ذَٰلِكَउसके
فَافْعَلُواपस कर गुज़रो
مَاजो
تُؤْمَرُونَतुम्हें हुक्म दिया जाता है
"उन्होंने कहा- हे मूसा! अल्लाह से दुआ कीजिए कि हमें उस के बारे में बता दे। आप ने फरमाया, सुनो! वह गाय न तो बूढ़ी हो और न बछिया, बल्कि दरमियानी उम्र की हो, अब तुम्हें जो हुक्म दिया गया है उसका पालन करो।"
69
قَالُواउन्होंने कहा
ادْعُदुआ करो
لَنَاहमारे लिए
رَبَّكَअपने रब से
يُبَيِّنवो वाज़ेह करे
لَّنَاहमारे लिए
مَاक्या
لَوْنُهَاरंग है उसका
قَالَकहा
إِنَّهُबेशक वो
يَقُولُकहता है
إِنَّهَاबेशक वो
بَقَرَةٌगाय है
صَفْرَاءُज़र्द (पीली)
فَاقِعٌगहरा/चमकीला
لَّوْنُهَاरंग है उसका
تَسُرُّवो खुश करती है
النَّاظِرِينَदेखने वालों को
"वे फिर कहने लगे कि अल्लाह से दुआ कीजिए कि वह हमें बता दे कि उसका रंग कैसा हो? फरमाया वह कहता है कि गाय सुनहरे तीखे रंग की हो, और देखने वालों को खुश कर देती हो।"
70
قَالُواउन्होंने कहा
ادْعُदुआ करो
لَنَاहमारे लिए
رَبَّكَअपने रब से
يُبَيِّنवो वाज़ेह करे
لَّنَاहमारे लिए
مَاक्या
هِيَहै वो
إِنَّबेशक
الْبَقَرَगाय
تَشَابَهَसमान (मुश्तबाह) हो गई
عَلَيْنَاहम पर
وَإِنَّاऔर बेशक हम
إِنअगर
شَاءَचाहा
اللَّهُअल्लाह ने
لَمُهْتَدُونَअलबत्ता हिदायत पाने वाले हैं
"वे कहने लगे कि अपने रब से दुआ कीजिए कि वह हमें खोल कर बता दे कि वह कैसी हो? इस तरह की बहुत सी गायें हैं पता नहीं चलता, अगर अल्लाह ने चाहा तो हमें हिदायत हासिल हो जाएगी।"
आज की ज़िन्दगी में इसका इस्तेमाल

ओवरथिंकिंग का नुकसान (Analysis Paralysis)

आयत 67 से 70 में अल्लाह ने सिर्फ एक "गाय" ज़िब्ह करने को कहा था। कोई भी गाय ज़िब्ह कर देते तो काम हो जाता। लेकिन बनी इस्राईल ने बाल की खाल निकालनी शुरू कर दी—"कैसी हो? रंग क्या हो? उम्र क्या हो?" इस 'ज़्यादा सोचने' (Overcomplicating) की आदत ने उनके काम को बेहद मुश्किल बना दिया। जब कोई काम साफ़ हो, तो उस पर तुरंत अमल (Execute) करें, बहाने न तलाशें।

सिस्टम को चीट न करें (Integrity over Loopholes)

आयत 65 में 'सब्त' (शनिवार) का वाक़या है। यहूदियों को शनिवार को मछली पकड़ने से मना किया गया था, तो उन्होंने 'तकनीकी' बहाना निकाला—शुक्रवार को जाल बिछा देते और रविवार को निकाल लेते। अल्लाह हमारी नीयत (Intention) देखता है। काम में शॉर्टकट या लूफोल (Loophole) ढूँढना 'स्मार्टनेस' नहीं, बल्कि 'इंटेग्रिटी' (ईमानदारी) की कमी है।

My Action Plan

क्या आप छोटे-छोटे कामों में ज़रूरत से ज़्यादा सोचते हैं (Overthinking) जिससे काम लटक जाता है? आज ही इस आदत को बदलें:

आयतें 71 से 80
71
قَالَकहा
إِنَّهُबेशक वो
يَقُولُवो फ़रमाता है
إِنَّهَاबेशक वो
بَقَرَةٌऐसी गाय हो
لَّا ذَلُولٌना जोती हुई हो
تُثِيرُकि वो हल चलाती हो
الْأَرْضَज़मीन में
وَلَا تَسْقِيऔर ना सैराब करती हो
الْحَرْثَखेती को
مُسَلَّمَةٌसही सलामत हो
لَّا شِيَةَकोई दाग़ ना हो
فِيهَاउसमें
قَالُواउन्होंने कहा
الْآنَअब
جِئْتَलाया है तू
بِالْحَقِّहक़ (सच्चाई) को
فَذَبَحُوهَاफिर उन्होंने ज़िबाह किया उसे
وَمَا كَادُواऔर वो क़रीब थे कि ना
يَفْعَلُونَवो करते
"मूसा ने कहा खुदा ज़रूर फरमाता है कि वह गाय न तो इतनी सधाई हो कि ज़मीन जोते न खेती सींचें, भली चंगी एक रंग की कि उसमें कोई धब्बा तक न हो, वह बोले अब (जा के) ठीक-ठीक बयान किया, ग़रज़ उन लोगों ने वह गाय हलाल की हालाँकि उनसे उम्मीद न थी कि वह ऐसा करेंगे।"
तफ़्सीर:
  • बनी इस्राईल ने इतने ज़्यादा सवाल किए कि उनके लिए गाय ढूँढना बहुत मुश्किल हो गया। आखिर में उन्हें वैसी ही गाय मिली, जिसे उन्होंने बहुत ऊँची क़ीमत देकर खरीदा और ज़िब्ह किया, जबकि वे टालमटोल कर रहे थे।
72
وَإِذْऔर जब
قَتَلْتُمْक़त्ल किया तुमने
نَفْسًاएक जान को
فَادَّارَأْتُمْफिर एक-दूसरे पर डालने लगे तुम
فِيهَاउसके बारे में
وَاللَّهُऔर अल्लाह
مُخْرِجٌनिकालने वाला था
مَّاजो
كُنتُمْथे तुम
تَكْتُمُونَतुम छुपाते
"और जब तुम ने एक जान को क़त्ल कर दिया, फिर एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगाने लगे, और अल्लाह को तुम्हारी छुपाई बात ज़ाहिर करनी थी।"
तफ़्सीर:
  • यहाँ बनी इस्राईल में हुए एक क़त्ल का ज़िक्र है, जहाँ लोग क़ातिल को छिपा रहे थे और एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगा रहे थे। लेकिन अल्लाह से कुछ छिप नहीं सकता, वह हक़ीक़त को सामने ले ही आता है।
73
فَقُلْنَاपस कहा हमने
اضْرِبُوهُमारो उसे
بِبَعْضِهَاसाथ उसके बाज़ हिस्से के
كَذَٰلِكَइसी तरह
يُحْيِيज़िन्दा करेगा
اللَّهُअल्लाह
الْمَوْتَىٰमुर्दों को
وَيُرِيكُمْऔर वो दिखाता है तुम्हें
آيَاتِهِअपनी निशानियाँ
لَعَلَّكُمْताकि तुम
تَعْقِلُونَतुम अक़्ल से काम लो
"हम ने कहा कि उस गाय का एक टुकड़ा मुर्दा के जिस्म पर मारो (वह ज़िन्दा हो जाएगा) उसी तरह अल्लाह तआला मुर्दा को ज़िन्दा करके तुम्हारी अक़्लमंदी के लिए निशानियाँ दिखाता है।"
तफ़्सीर:
  • अल्लाह के हुक्म से जब ज़िब्ह की गई गाय का टुकड़ा मुर्दे को मारा गया, तो वह कुछ पल के लिए ज़िन्दा हुआ और उसने अपने कातिल का नाम बता दिया। यह क़यामत के दिन मुर्दों के ज़िन्दा होने का एक ज़िंदा सुबूत (प्रमाण) भी था।
74
ثُمَّफिर
قَسَتْसख़्त हो गए
قُلُوبُكُمदिल तुम्हारे
مِّن بَعْدِबाद
ذَٰلِكَइसके
فَهِيَतो वो
كَالْحِجَارَةِपत्थरों की तरह हैं
أَوْया
أَشَدُّज़्यादा शदीद
قَسْوَةًसख़्ती में
وَإِنَّऔर बेशक
مِنَसे
الْحِجَارَةِपत्थरों
لَمَاअलबत्ता वो हैं जो
يَتَفَجَّرُफूट पड़ती हैं
مِنْهُउससे
الْأَنْهَارُनहरें
وَإِنَّ مِنْهَاऔर बेशक उनमें से कुछ
لَمَا يَشَّقَّقُअलबत्ता फट जाते हैं
فَيَخْرُجُफिर निकल आता है
مِنْهُ الْمَاءُउससे पानी
وَإِنَّ مِنْهَاऔर बेशक उनमें से कुछ
لَمَا يَهْبِطُअलबत्ता गिर पड़ते हैं
مِنْ خَشْيَةِख़ौफ़ से
اللَّهِअल्लाह के
وَمَا اللَّهُऔर नहीं अल्लाह
بِغَافِلٍग़ाफ़िल
عَمَّا تَعْمَلُونَउससे जो तुम अमल करते हो
"फिर उस के बाद तुम्हारे दिल पत्थर जैसे बल्कि उस से भी ज़्यादा सख़्त हो गए, कुछ पत्थरों से तो नहरें बह निकलती हैं तथा कुछ फट जाते हैं और उन से पानी निकलता है, और कुछ अल्लाह तआला के डर से गिर पड़ते हैं, और तुम अल्लाह तआला को अपने अमल से अन्जान न जानो।"
तफ़्सीर:
  • इतने सारे मोज़िज़े (Miracles) देखने के बावजूद भी बनी इस्राईल के दिल नर्म नहीं हुए। अल्लाह फरमाता है कि कुछ पत्थर भी ऐसे होते हैं जो अल्लाह के डर से पानी निकाल देते हैं या गिर पड़ते हैं, लेकिन इन लोगों के दिल पत्थरों से भी ज़्यादा सख़्त (कठोर) हो चुके थे।
75
أَفَتَطْمَعُونَक्या पस तुम उम्मीद रखते हो
أَنकि
يُؤْمِنُواवो ईमान लाएँगे
لَكُمْतुम्हारे लिए
وَقَدْ كَانَऔर तहक़ीक़ था
فَرِيقٌएक गिरोह
مِّنْهُمْउनमें से
يَسْمَعُونَवो सुनते हैं
كَلَامَ اللَّهِअल्लाह का कलाम
ثُمَّफिर
يُحَرِّفُونَهُवो बदल डालते हैं उसे
مِن بَعْدِबाद
مَا عَقَلُوهُजो उन्होंने समझ लिया उसे
وَهُمْ يَعْلَمُونَऔर वो जानते हैं
"(हे मुसलमानो!) क्या तुम चाहते हो कि वह (यहूदी) तुम्हारा यक़ीन कर लें - जबकि उन में ऐसे भी हैं जो अल्लाह का कलाम सुनते हैं फिर उसे समझने के बाद उसे फेर-बदल कर देते हैं, और ऐसा वे जानकर करते हैं।"
तफ़्सीर:
  • मुसलमानों को समझाया जा रहा है कि इन से हिदायत पाने की उम्मीद मत रखो। इनके उलेमाओं (धर्मगुरुओं) का तो यह हाल था कि वे अल्लाह का कलाम (तौरेत) समझते थे और फिर जानबूझकर अपने फायदे के लिए उसे बदल (تحريف) देते थे।
76
وَإِذَا لَقُواऔर जब वो मिलते हैं
الَّذِينَ آمَنُواउनसे जो ईमान लाए
قَالُوا آمَنَّاवो कहते हैं हम ईमान लाए
وَإِذَا خَلَاऔर जब अकेले होते हैं
بَعْضُهُمْबाज़ उनके
إِلَىٰ بَعْضٍबाज़ की तरफ़
قَالُواवो कहते हैं
أَتُحَدِّثُونَهُمक्या तुम बयान करते हो उनसे
بِمَا فَتَحَ اللَّهُउसका जो खोल दिया अल्लाह ने
عَلَيْكُمْतुम पर
لِيُحَاجُّوكُم بِهِताकि वो हुज्जत करें तुमसे साथ उसके
عِندَ رَبِّكُمْपास तुम्हारे रब के
أَفَلَا تَعْقِلُونَक्या पस नहीं तुम अक़्ल से काम लेते
"और जब ईमान वालों से मिलते हैं तो अपनी ईमानदारी ज़ाहिर करते हैं, और जब आपस में मिलते हैं तो कहते हैं कि मुसलमानों तक क्यों वह बातें पहुँचाते हो जो अल्लाह ने तुम्हें सिखायी हैं, क्या जानते नहीं कि ये तो अल्लाह के सामने तुम पर उनका सुबूत हो जाएगा।"
तफ़्सीर:
  • यह यहूदियों के मुनाफ़िक़ (कपटपूर्ण) रवैये का ज़िक्र है। जब वे मुसलमानों से मिलते तो कहते कि 'हाँ, मुहम्मद ﷺ सच्चे नबी हैं'। लेकिन जब अकेले होते तो उनके बड़े उन्हें डाँटते कि तुम मुसलमानों को अपनी किताब के राज़ क्यों बताते हो, कल क़यामत में यही बातें वे तुम्हारे खिलाफ सुबूत के तौर पर पेश करेंगे।
77
أَوَلَا يَعْلَمُونَक्या भला नहीं वो जानते
أَنَّ اللَّهَकि बेशक अल्लाह
يَعْلَمُवो इल्म रखता है
مَا يُسِرُّونَजो वो छुपाते हैं
وَمَا يُعْلِنُونَऔर जो वो ज़ाहिर करते हैं
"क्या ये नहीं जानते कि अल्लाह तआला उनकी छुपी और ज़ाहिर सभी बातें जानता है।"
तफ़्सीर:
  • अल्लाह उनकी इस बेवकूफी का पर्दाफाश करता है कि क्या उन्हें लगता है कि वे मुसलमानों से बातें छिपाकर अल्लाह से भी कुछ छिपा लेंगे? अल्लाह तो ज़ाहिर और बातिन सब जानता है।
78
وَمِنْهُمْऔर उनमें से कुछ
أُمِّيُّونَअनपढ़ हैं
لَا يَعْلَمُونَनहीं वो जानते
الْكِتَابَकिताब को
إِلَّا أَمَانِيَّसिवाय आरज़ूओं के
وَإِنْ هُمْऔर नहीं वो
إِلَّا يَظُنُّونَमगर गुमान (अटकल) करते
"और उन में से कुछ अनपढ़ ऐसे भी हैं जो उम्मीदों के सिवाय किताब नहीं जानते और सिर्फ अटकल करते हैं।"
तफ़्सीर:
  • इनमें कुछ आम अनपढ़ लोग भी थे, जिन्हें तौरेत का कोई इल्म नहीं था। वे सिर्फ अपने झूठे ख्यालों और आरज़ूओं (जैसे 'हम तो बख्शे बख्शाए हैं') को ही सच्चाई मानते थे और अटकलें लगाते थे।
79
فَوَيْلٌपस हलाकत है
لِّلَّذِينَउनके लिए जो
يَكْتُبُونَलिखते हैं
الْكِتَابَकिताब
بِأَيْدِيهِمْअपने हाथों से
ثُمَّ يَقُولُونَफिर कहते हैं
هَٰذَاये
مِنْ عِندِ اللَّهِअल्लाह के पास से है
لِيَشْتَرُوا بِهِताकि वो खरीदें इसके बदले
ثَمَنًا قَلِيلًاथोड़ी क़ीमत
فَوَيْلٌ لَّهُمपस हलाकत है उनके लिए
مِّمَّا كَتَبَتْउससे जो लिखा
أَيْدِيهِمْउनके हाथों ने
وَوَيْلٌ لَّهُمऔर हलाकत है उनके लिए
مِّمَّا يَكْسِبُونَउससे जो वो कमाते हैं
"उन लोगों के लिए हलाकत (बर्बादी) है, जो खुद अपने हाथों लिखी किताब को अल्लाह की किताब कहते हैं, और इस तरह दुनिया (धन) कमाते हैं, अपने हाथों लिखी किताब की वजह से उनकी बरबादी है और अपनी इस कमाई की वजह से उनका विनाश है।"
तफ़्सीर:
  • यह आयत उन धर्मगुरुओं के लिए एक सख्त चेतावनी है जो अपने थोड़े से दुनियावी फायदे (पैसे या रुतबे) के लिए अल्लाह के दीन (धर्म) में मिलावट करते हैं और अपनी तरफ से बातें गढ़कर उसे अल्लाह का हुक्म बता देते हैं।
80
وَقَالُواऔर उन्होंने कहा
لَن تَمَسَّنَاहरगिज़ नहीं छुएगी हमें
النَّارُआग
إِلَّا أَيَّامًاमगर चंद दिन
مَّعْدُودَةًगिने-चुने
قُلْकह दो
أَتَّخَذْتُمْक्या ले लिया तुमने
عِندَ اللَّهِअल्लाह के पास
عَهْدًاकोई अहद (वादा)
فَلَن يُخْلِفَ اللَّهُपस हरगिज़ नहीं ख़िलाफ़ करेगा अल्लाह
عَهْدَهُअपना अहद
أَمْ تَقُولُونَया तुम कहते हो
عَلَى اللَّهِअल्लाह पर
مَا لَا تَعْلَمُونَजो नहीं तुम जानते
"और ये लोग कहते हैं कि हम तो कुछ ही दिन जहन्नम में रहेंगे, (उन से) कहो कि क्या तुम ने अल्लाह तआला से कोई वादा लिया है? अगर है तो बेशक अल्लाह तआला अपना वादा ख़िलाफ़ नहीं करेगा, या अल्लाह के बारे में ऐसी बातें कहते हो जिसका तुम्हें इल्म नहीं।"
तफ़्सीर:
  • यहूदी बड़ी ढिठाई से कहते थे कि हम तो जहन्नम में बस गिने-चुने दिन (सिर्फ उतने दिन जितने दिन बछड़े की पूजा की थी) रहेंगे। अल्लाह फरमाता है कि क्या अल्लाह ने तुम्हें इसका कोई ठेका या वादा दिया है? यह सिर्फ तुम्हारी अपनी तरफ से गढ़ी हुई झूठी बात है।
आज की ज़िन्दगी में इसका इस्तेमाल

टालमटोल की आदत (Procrastination & Overthinking)

आयत 71 में बताया गया है कि जब फाइनली उन्हें उनकी मनपसंद गाय मिल गई, तब भी वे उसे ज़िब्ह करते हुए कतरा रहे थे (टालमटोल कर रहे थे)। अक्सर हम किसी काम को शुरू करने से पहले हज़ारों सवाल पूछते हैं (Overthinking) और जब सब कुछ क्लियर हो जाता है, तब भी एक्शन लेने में सुस्ती दिखाते हैं। सफलता के लिए 'Execution' सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।

अपनी 'प्रोफेशनल इंटीग्रिटी' न बेचना (Integrity over Quick Money)

आयत 79 में उन लोगों की बर्बादी का ज़िक्र है जो दुनिया के थोड़े से फायदे (पैसों या रुतबे) के लिए सच्चाई (हक़) को बदल देते हैं। आज की दुनिया में झूठ बोलकर या शॉर्टकट मारकर पैसे कमाना आसान लगता है, लेकिन इसकी बुनियाद खोखली होती है। आपके ब्रांड 'Iqram' और आपके काम में ईमानदारी ही आपकी सबसे बड़ी पूँजी होनी चाहिए।

My Action Plan

क्या आप थोड़े से फायदे के लिए अपने उसूलों (Principles) से समझौता कर लेते हैं? या किसी काम को लगातार टालते रहते हैं? आज ही अपना 'एक्शन प्लान' सेव करें:

आयतें 81 से 90
81
بَلَىٰहाँ क्यों नहीं
مَنजिसने
كَسَبَकमाई
سَيِّئَةًबुराई
وَأَحَاطَتْऔर घेर लिया
بِهِउसे
خَطِيئَتُهُउसकी ख़ता (गुनाह) ने
فَأُولَٰئِكَतो यही लोग हैं
أَصْحَابُसाथी
النَّارِआग के
هُمْवो
فِيهَاउसमें
خَالِدُونَहमेशा रहने वाले हैं
"हाँ, क्यों नहीं! जिसने भी बुराई (गुनाह) की कमाई की और उसके गुनाहों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया, तो ऐसे लोग ही जहन्नम वाले हैं, वे उसमें हमेशा रहेंगे।"
तफ़्सीर:
  • यह आयत यहूदियों के उस झूठे दावे का जवाब है जिसमें वे कहते थे कि वे जहन्नम में सिर्फ चंद दिन ही रहेंगे। अल्लाह तआला साफ़ फरमाता है कि जो लोग लगातार गुनाह करते हैं और उन गुनाहों का शिर्क उन्हें घेर लेता है, उनका ठिकाना हमेशा के लिए जहन्नम है।
82
وَالَّذِينَऔर वो जो
آمَنُواईमान लाए
وَعَمِلُواऔर अमल किए
الصَّالِحَاتِनेक
أُولَٰئِكَयही लोग हैं
أَصْحَابُसाथी
الْجَنَّةِजन्नत के
هُمْवो
فِيهَاउसमें
خَالِدُونَहमेशा रहने वाले हैं
"और जो लोग ईमान लाए और उन्होंने नेक अमल किए, वही लोग जन्नत वाले हैं, वे उसमें हमेशा रहेंगे।"
तफ़्सीर:
  • ईमान और नेक अमल (Good deeds) जन्नत की कुंजी हैं। सिर्फ ज़बान से ईमान का दावा काफी नहीं, बल्कि अल्लाह और उसके रसूल के बताए हुए रास्तों पर चलना (अमल करना) लाज़मी है।
83
وَإِذْऔर जब
أَخَذْنَاलिया हमने
مِيثَاقَपुख़्ता अहद (वादा)
بَنِي إِسْرَائِيلَबनी इस्राईल से
لَا تَعْبُدُونَनहीं तुम इबादत करोगे
إِلَّاसिवाय
اللَّهَअल्लाह के
وَبِالْوَالِدَيْنِऔर माँ-बाप के साथ
إِحْسَانًاभलाई
وَذِي الْقُرْبَىٰऔर रिश्तेदारों
وَالْيَتَامَىٰऔर यतीमों
وَالْمَسَاكِينِऔर मिस्कीनों (ग़रीबों) के
وَقُولُواऔर कहो
لِلنَّاسِलोगों से
حُسْنًاअच्छी बात
وَأَقِيمُواऔर क़ायम करो
الصَّلَاةَनमाज़
وَآتُواऔर अदा करो
الزَّكَاةَज़कात
ثُمَّफिर
تَوَلَّيْتُمْफिर गए तुम
إِلَّا قَلِيلًاसिवाय थोड़े लोगों के
مِّنكُمْतुम में से
وَأَنتُمऔर तुम
مُّعْرِضُونَमुँह मोड़ने वाले हो
"और जब हमने बनी इस्राईल से पक्का वादा लिया कि तुम अल्लाह के सिवा किसी की इबादत नहीं करोगे, और माँ-बाप के साथ भलाई करोगे, और रिश्तेदारों, यतीमों और मिस्कीनों के साथ (भी भलाई करोगे), और लोगों से अच्छी बात कहो, और नमाज़ कायम करो और ज़कात दो। फिर तुम में से थोड़े लोगों के सिवा (सब) मुँह मोड़ कर फिर गए।"
तफ़्सीर:
  • इस आयत में दीन (धर्म) का एक मुकम्मल ढाँचा बताया गया है: 1. अल्लाह की तौहीद (इबादत), 2. माँ-बाप और रिश्तेदारों के हुक़ूक़ (Social Responsibility), 3. लोगों से अच्छा बर्ताव (Emotional Intelligence)। लेकिन बनी इस्राईल ने इन वादों को तोड़ दिया।
84
وَإِذْऔर जब
أَخَذْنَاलिया हमने
مِيثَاقَكُمْतुम्हारा पुख़्ता अहद
لَا تَسْفِكُونَनहीं तुम बहाओगे
دِمَاءَكُمْअपनों का ख़ून
وَلَا تُخْرِجُونَऔर ना तुम निकालोगे
أَنفُسَكُمअपनों को
مِّن دِيَارِكُمْउनके घरों से
ثُمَّफिर
أَقْرَرْتُمْतुमने इक़रार किया
وَأَنتُمْऔर तुम
تَشْهَدُونَतुम गवाह हो
"और जब हमने तुमसे पक्का वादा लिया कि तुम अपनों का खून नहीं बहाओगे और न अपनों को उनके घरों से निकालोगे, फिर तुमने इक़रार किया और तुम खुद इसके गवाह हो।"
तफ़्सीर:
  • बनी इस्राईल ने अल्लाह से पक्का वादा (Covenant) किया था कि वे आपस में एक-दूसरे का खून नहीं बहाएंगे और न अपनों को बेघर करेंगे। अल्लाह यहाँ उनके खुद के इक़रार को उनके खिलाफ गवाह बना रहा है क्योंकि उन्होंने इस वादे को तोड़ा।
85
ثُمَّफिर
أَنتُمْतुम
هَٰؤُلَاءِयही वो लोग हो
تَقْتُلُونَतुम क़त्ल करते हो
أَنفُسَكُمْअपनों को
وَتُخْرِجُونَऔर तुम निकाल देते हो
فَرِيقًاएक गिरोह को
مِّنكُمतुम में से
مِّن دِيَارِهِمْउनके घरों से
أَفَتُؤْمِنُونَक्या पस तुम ईमान लाते हो
بِبَعْضِबाज़ हिस्से पर
الْكِتَابِकिताब के
وَتَكْفُرُونَऔर तुम कुफ़्र करते हो
بِبَعْضٍबाज़ हिस्से का
فَمَا جَزَاءُपस क्या सज़ा है
مَن يَفْعَلُउसकी जो करे
ذَٰلِكَऐसा
مِنكُمْतुम में से
إِلَّا خِزْيٌसिवाय रुसवाई के
فِي الْحَيَاةِज़िंदगी में
الدُّنْيَاदुनिया की
وَيَوْمَ الْقِيَامَةِऔर क़यामत के दिन
يُرَدُّونَवो लौटाए जाएँगे
إِلَىٰ أَشَدِّतरफ़ सख़्त तरीन
الْعَذَابِअज़ाब के
"फिर तुम ही वे लोग हो जो अपनों को क़त्ल करते हो और अपने ही एक गिरोह को उनके घरों से निकाल देते हो... क्या तुम किताब के कुछ हिस्से पर ईमान लाते हो और कुछ का इनकार करते हो? तो तुम में से जो ऐसा करे उसकी सज़ा इसके सिवा क्या है कि दुनिया की ज़िंदगी में रुसवाई हो, और क़यामत के दिन वे सबसे सख़्त अज़ाब की तरफ लौटा दिए जाएँ।"
तफ़्सीर:
  • मदीने के यहूदी कबीले (बनू नज़ीर और बनू कुरैज़ा) अरबों की जंग में एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते और अपनों को कत्ल करते थे (जो तौरेत में हराम था)। लेकिन जब उनके लोग बंदी (Prisoners) बन जाते, तो वे तौरेत का हवाला देकर चंदा जमा करते और उन्हें छुड़ाते। अल्लाह ने उनके इस 'सिलेक्टिव' (अपनी मर्ज़ी से दीन पर चलने वाले) रवैये पर सख्त अज़ाब की चेतावनी दी है।
86
أُولَٰئِكَयही लोग हैं
الَّذِينَजिन्होंने
اشْتَرَوُاख़रीद ली
الْحَيَاةَ الدُّنْيَاदुनिया की ज़िंदगी
بِالْآخِرَةِबदले आख़िरत के
فَلَا يُخَفَّفُपस ना हल्का किया जाएगा
عَنْهُمُउनसे
الْعَذَابُअज़ाब
وَلَا هُمْऔर ना वो
يُنصَرُونَमदद किए जाएँगे
"यही वो लोग हैं जिन्होंने आख़िरत के बदले दुनिया की ज़िंदगी खरीद ली, तो न उनका अज़ाब हल्का किया जाएगा और न उनकी मदद की जाएगी।"
तफ़्सीर:
  • यह आयत उन लोगों की असल बीमारी बताती है—दुनिया की मुहब्बत। जब इंसान आख़िरत के मुकाबले में दुनिया के थोड़े से फायदे को तरजीह (प्राथमिकता) देता है, तो वह अल्लाह के हुक्मों को तोड़ने में ज़रा भी नहीं झिझकता।
87
وَلَقَدْऔर अलबत्ता तहक़ीक़
آتَيْنَاदी हमने
مُوسَىमूसा को
الْكِتَابَकिताब
وَقَفَّيْنَاऔर लगातार भेजे हमने
مِن بَعْدِهِउसके बाद
بِالرُّسُلِरसूल
وَآتَيْنَاऔर दी हमने
عِيسَىईसा
ابْنَ مَرْيَمَमरयम के बेटे को
الْبَيِّنَاتِखुली निशानियाँ
وَأَيَّدْنَاهُऔर मदद की हमने उसकी
بِرُوحِ الْقُدُسِसाथ रूहुल क़ुदुस (जिब्रील) के
أَفَكُلَّمَاक्या पस जब कभी
جَاءَكُمْआया तुम्हारे पास
رَسُولٌकोई रसूल
بِمَا لَا تَهْوَىٰसाथ उसके जो ना पसंद किया
أَنفُسُكُمُतुम्हारे नफ़्सों ने
اسْتَكْبَرْتُمْतकब्बुर किया तुमने
فَفَرِيقًاतो एक गिरोह को
كَذَّبْتُمْझुठला दिया तुमने
وَفَرِيقًاऔर एक गिरोह को
تَقْتُلُونَतुम क़त्ल करते हो
"और बेशक हमने मूसा को किताब दी और उनके बाद लगातार रसूल भेजे, और मरयम के बेटे ईसा को खुली निशानियाँ दीं और रूहुल क़ुदुस (जिब्रील) से उनकी मदद की। तो क्या जब भी कोई रसूल तुम्हारे पास वह चीज़ लेकर आया जो तुम्हारे नफ़्स (मन) को पसंद नहीं थी, तो तुमने तकब्बुर (अहंकार) किया? फिर कुछ को तुमने झुठला दिया और कुछ को कत्ल कर दिया।"
तफ़्सीर:
  • अल्लाह ने हिदायत का पूरा इंतज़ाम किया। मूसा (अ.स.) के बाद लगातार नबी भेजे और ईसा (अ.स.) को मोज़िज़े (चमत्कार) दिए। लेकिन बनी इस्राईल का मिज़ाज यह बन गया था कि जो भी नबी उनकी मनमर्ज़ी के खिलाफ हुक्म लाता, वे तकब्बुर करते, उसे झुठलाते या कत्ल कर देते (जैसे हज़रत ज़करिया और यह्या अलैहिस्सलाम को कत्ल किया)।
88
وَقَالُواऔर उन्होंने कहा
قُلُوبُنَاदिल हमारे
غُلْفٌग़िलाफ़ (पर्दे) में हैं
بَلबल्कि
لَّعَنَهُمُलानत की उन पर
اللَّهُअल्लाह ने
بِكُفْرِهِمْबवजह उनके कुफ़्र के
فَقَلِيلًاतो बहुत थोड़ा
مَّا يُؤْمِنُونَवो ईमान लाते हैं
"और उन्होंने कहा: हमारे दिलों पर गिलाफ़ (पर्दा) है। (नहीं) बल्कि उनके कुफ़्र के कारण अल्लाह ने उन पर लानत की है, तो वे बहुत ही कम ईमान लाते हैं।"
तफ़्सीर:
  • यहूदी गुरूर (Overconfidence) में कहते थे कि हमारे दिल तो इल्म से भरे हुए (या महफूज़) हैं, हमें ऐ मुहम्मद (ﷺ) तुम्हारी बातों की ज़रूरत नहीं। अल्लाह ने फरमाया कि यह कोई इल्म नहीं, बल्कि उनके कुफ़्र की वजह से उन पर अल्लाह की लानत (फटकार) है, जिससे उन्हें हक़ बात समझ नहीं आती।
89
وَلَمَّاऔर जब
جَاءَهُمْआई उनके पास
كِتَابٌएक किताब
مِّنْ عِندِपास से
اللَّهِअल्लाह के
مُصَدِّقٌतसदीक़ करने वाली
لِّمَاउसकी जो
مَعَهُمْउनके पास है
وَكَانُواऔर थे वो
مِن قَبْلُइससे पहले
يَسْتَفْتِحُونَफ़तह (जीत) तलब करते
عَلَى الَّذِينَऊपर उनके जो
كَفَرُواकाफ़िर थे
فَلَمَّاफिर जब
جَاءَهُمआया उनके पास
مَّا عَرَفُواवो जिसे उन्होंने पहचान लिया
كَفَرُوا بِهِतो कुफ़्र किया उसका
فَلَعْنَةُपस लानत है
اللَّهِअल्लाह की
عَلَىऊपर
الْكَافِرِينَकाफ़िरों के
"और जब उनके पास अल्लाह की तरफ से एक किताब (क़ुरआन) आई जो उसकी तस्दीक़ करती है जो उनके पास है, जबकि इससे पहले वे (इसी नबी के ज़रिए) काफ़िरों पर फ़तह (जीत) की दुआएँ मांगते थे। फिर जब उनके पास वह चीज़ आ गई जिसे उन्होंने पहचान भी लिया, तो उन्होंने उसका इनकार कर दिया। तो काफ़िरों पर अल्लाह की लानत है।"
तफ़्सीर:
  • यहूदी मदीना में काफ़िरों से कहते थे कि 'हमारा आखिरी नबी आने वाला है, तब हम तुम्हें हरा देंगे'। लेकिन जब पैगंबर मुहम्मद ﷺ आए (जो अरब में से थे, बनी इस्राईल में से नहीं), तो ईर्ष्या (हसद) के कारण उन्होंने जान-बूझकर उन्हें मानने से इनकार कर दिया।
90
بِئْسَمَاक्या ही बुरी है
اشْتَرَوْا بِهِजिसके बदले उन्होंने बेचा
أَنفُسَهُمْअपनी जानों को
أَن يَكْفُرُواये कि वो कुफ़्र करें
بِمَا أَنزَلَ اللَّهُसाथ उसके जो उतारा अल्लाह ने
بَغْيًاज़िद/हसद के कारण
أَن يُنَزِّلَ اللَّهُकि उतारे अल्लाह
مِن فَضْلِهِअपने फ़ज़ल में से
عَلَىٰ مَن يَشَاءُजिस पर वो चाहे
مِنْ عِبَادِهِअपने बन्दों में से
فَبَاءُواपस वो हक़दार हो गए
بِغَضَبٍग़ज़ब के
عَلَىٰ غَضَبٍऊपर ग़ज़ब के
وَلِلْكَافِرِينَऔर काफ़िरों के लिए
عَذَابٌ مُّهِينٌरुसवा करने वाला अज़ाब है
"बहुत ही बुरी है वह चीज़ जिसके बदले उन्होंने अपनी जानों को बेच डाला, वह यह कि अल्लाह की उतारी हुई किताब का सिर्फ इस ज़िद (हसद) में इनकार करते हैं कि अल्लाह अपना फ़ज़ल (वही) अपने जिस बंदे पर चाहे क्यों उतारता है। सो वे ग़ज़ब पर ग़ज़ब के हक़दार हो गए, और काफ़िरों के लिए रुसवा करने वाला अज़ाब है।"
तफ़्सीर:
  • पैगंबर मुहम्मद ﷺ पर ईमान न लाने की असल वजह उनकी कोई नासमझी नहीं थी, बल्कि सिर्फ यह 'ज़िद और हसद' (ईर्ष्या) थी कि नबूवत बनी इस्राईल को छोड़कर बनी इस्माईल (अरबों) में क्यों आ गई। इसी हसद की वजह से वे अल्लाह के ग़ज़ब के शिकार हुए।
आज की ज़िन्दगी में इसका इस्तेमाल

पिक एंड चूज़ का माइंडसेट (Selective Compliance)

आयत 85 में अल्लाह उन लोगों की निंदा करता है जो अपनी सहूलियत के हिसाब से कुछ नियमों को मानते हैं और जो मुश्किल लगते हैं उन्हें छोड़ देते हैं। आज हम भी अपनी लाइफ में 'सिलेक्टिव' हो गए हैं—हमें नमाज़ पढ़ना आसान लगता है तो पढ़ लेते हैं, लेकिन जब व्यापार में ईमानदारी (Integrity) या हलाल कमाने की बात आती है, तो हम बहाने ढूँढ लेते हैं। इस्लाम एक मुकम्मल (Complete) सिस्टम है, पार्ट-टाइम नहीं।

ईर्ष्या और हसद (The Trap of Jealousy)

आयत 89 और 90 के अनुसार, यहूदियों ने पैगंबर मुहम्मद ﷺ को इसलिए नहीं झुठलाया कि उन्हें सच्चाई पता नहीं थी। उन्हें सब पता था। उन्होंने सिर्फ 'हसद' (ईर्ष्या/Jealousy) के कारण इनकार किया कि "अल्लाह ने यह सम्मान (Iqram) हमारे कबीले को छोड़कर अरबों को क्यों दे दिया?" हसद इंसान के दिमाग पर पर्दा डाल देता है और उसे सच्चाई कबूल करने से रोकता है।

My Action Plan

क्या आप अपनी सुविधानुसार नियम मानते हैं? या दूसरों की कामयाबी देखकर आपके अंदर हसद पैदा होता है? आज अपना एक्शन प्लान फिक्स करें:

आयतें 91 से 100
91
وَإِذَا قِيلَऔर जब कहा जाता है
لَهُمْउन्हें
آمِنُواईमान लाओ
بِمَاउस पर जो
أَنزَلَनाज़िल किया
اللَّهُअल्लाह ने
قَالُواवो कहते हैं
نُؤْمِنُहम ईमान लाएंगे
بِمَاउस पर जो
أُنزِلَनाज़िल किया गया
عَلَيْنَاहम पर
وَيَكْفُرُونَऔर वो कुफ़्र करते हैं
بِمَاउसके साथ जो
وَرَاءَهُअलावा है इसके
وَهُوَहालाँकि वो
الْحَقُّहक़ है
مُصَدِّقًاतसदीक़ करने वाला है
لِّمَاउसकी जो
مَعَهُمْपास है उनके
"और जब उनसे कहा जाता है कि उस पर ईमान लाओ जो अल्लाह ने उतारा है, तो वे कह देते हैं कि जो हम पर (तौरेत) नाज़िल हुई हम सिर्फ उस पर ईमान रखते हैं और उसके सिवा (क़ुरआन) का इनकार करते हैं, जबकि वह सच है, उनके पास वाली (धार्मिक किताब) की तस्दीक़ कर रहा है।"
तफ़्सीर:
  • इन लोगों का रवैया यह था कि वे दीन को 'पार्ट-टाइम' मानते थे। वे कहते थे कि हमें सिर्फ अपनी पुरानी किताब माननी है, नया नबी नहीं मानना। अल्लाह ने फरमाया कि अगर तुम तौरेत को वाकई सच मानते हो तो तुम्हें क़ुरआन को भी मानना चाहिए, क्योंकि क़ुरआन तौरेत की सच्चाई की पुष्टि करता है।
92-93
"और तुम्हारे पास मूसा यही निशानियाँ लेकर आए, लेकिन फिर भी तुम ने बछड़े की पूजा की, तुम हो ही ज़ालिम। और जब हमने तुमसे पक्का वादा लिया और तूर पहाड़ तुम्हारे सर पर लटकाया और कहा कि जो हमने दिया उसे मज़बूती से पकड़ो, तो उन्होंने कहा सुना तो (सही लेकिन) हम मानते नहीं।"
तफ़्सीर:
  • यह आयत बताती है कि बनी इस्राईल का अपने नबियों (अ.स.) के साथ रवैया बहुत ही विद्रोही (Disobedient) था। तूर पहाड़ के नीचे भी उन्होंने जुबानी इकरार किया लेकिन दिल से नहीं माना, और बछड़े की मोहब्बत उनके दिलों में बसी हुई थी।
94-96
"(ऐ रसूल) उनसे कह दीजिए कि अगर अल्लाह के पास आख़िरत का घर ख़ास तुम्हारे लिए है, तो मौत की आरज़ू करो अगर तुम सच्चे हो। लेकिन वे अपने किए (गुनाहों) की वजह से कभी मौत नहीं चाहेंगे। आप उन्हें ज़िंदगी का सबसे ज़्यादा हरीस (लालची) पाएंगे, यहाँ तक कि मुशरिकों से भी ज़्यादा। उनमें से हर एक चाहता है कि हज़ार साल जिए।"
तफ़्सीर:
  • यह उनकी ज़हनियत का पर्दाफाश है। जो लोग दुनिया को ही सब कुछ मानते हैं, वे मरकर अल्लाह के पास जाने से डरते हैं। वे हज़ारों साल की उम्र चाहते हैं ताकि वे दुनिया के मजे और करप्शन जारी रख सकें।
97-98
قُلْ مَنकह दो जो
كَانَ عَدُوًّاदुश्मन है
لِّجِبْرِيلَजिब्रील का
فَإِنَّهُतो बेशक वो
نَزَّلَهُनाज़िल किया उसने उसे
عَلَىٰ قَلْبِكَतुम्हारे दिल पर
بِإِذْنِ اللَّهِअल्लाह के इज़्न से
"कह दो जो जिब्रील का दुश्मन है (उसका अल्लाह भी दुश्मन है) क्योंकि उस फ़रिश्ते ने खुदा के हुक्म से यह क़ुरआन तुम्हारे दिल पर डाला है। जो अल्लाह और उसके फ़रिश्तों, रसूलों और जिब्रील व मीकैल का दुश्मन हो, तो बेशक अल्लाह ऐसे काफ़िरों का दुश्मन है।"
तफ़्सीर:
  • यहूदियों का कहना था कि हम जिब्रील (अ.स.) से इसलिए नफरत करते हैं क्योंकि वे मुसीबत और अज़ाब लेकर आते हैं। अल्लाह ने फ़रमाया कि जिब्रील तो अल्लाह के दूत हैं, जो वही (वही) लाते हैं। उनसे नफरत करना अल्लाह से नफरत करना है।
99-100
"और बेशक हमने आपकी तरफ वाज़ेह निशानियाँ भेजी हैं, जिनको फ़ासिक़ों (नाफ़रमानों) के सिवाय और कोई इनकार नहीं करता। ये लोग जब कभी वादा करते हैं तो उनका एक न एक गुट उसे तोड़ देता है। बल्कि उनमें से ज़्यादातर ईमान से खाली हैं।"
आज की ज़िन्दगी में इसका इस्तेमाल

Selective Obedience (मंशा-मुताबिक दीन)

आयत 85 और 91 हमें बताती है कि कैसे इंसान अपनी मर्ज़ी से हक़ को चुनता और छोड़ता है। बहुत से लोग आज भी कुरान का वही हिस्सा मानते हैं जो उन्हें 'पसंद' आता है, और जो हिस्सा उनकी 'लाइफस्टाइल' के खिलाफ होता है, उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं। इक़राम (सम्मान) का मतलब है अल्लाह के हर हुक्म का सम्मान करना, न कि केवल अपने मनपसंद हुक्मों का।

हसद (Jealousy) की आग

आयत 90 में 'हसद' (ईर्ष्या) को वह मुख्य कारण बताया गया है जिसने यहूदियों को हक़ देखने के बावजूद इनकार करने पर मजबूर किया। हसद वह ज़हर है जो इंसान की अक्ल और अंतर्दृष्टि (Insight) को खत्म कर देता है। अगर आप दूसरों की कामयाबी देखकर बेचैन होते हैं, तो यह आपकी 'ग्रोथ' के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

My Action Plan

क्या आपकी लाइफ में भी 'पिक एंड चूज़' वाला रवैया है? आज अपने इरादों को मुकम्मल (Complete) करने का संकल्प लें:

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