हाथी की घटना (आमुल फ़ील)
निजी ज़िंदगी
यमन के हब्शी गवर्नर अबरहा ने मक्का के हज को रोकने के लिए सनआ में एक भव्य गिरजाघर बनवाया, पर जब उसकी बेइज़्ज़ती हुई तो वह हाथियों की भारी सेना लेकर काबा ढहाने चल पड़ा। मक्का के नज़दीक अल्लाह ने पक्षियों के एक झुंड से पूरी सेना पर पत्थर बरसाए और सेना तबाह हो गई, यह घटना नबी सल्ल० के जन्म से लगभग पचास दिन पहले हुई, इसीलिए उस साल को आमुल फ़ील (हाथी का साल) कहा जाता है।
पूरी कहानी:
यमन में नजाशी बादशाह की ओर से गवर्नर बने हब्शी सेनापति अबरहा ने देखा कि अरब हज के लिए मक्का जाते हैं, तो उसने सनआ में एक भव्य गिरजाघर बनवाकर अरबों का हज वहां मोड़ने की कोशिश की। इस बेअदबी से नाराज़ बनू किनाना के एक व्यक्ति ने रात में गिरजे को अपवित्र कर दिया, जिससे भड़ककर अबरहा ने काबा को ढहाने की ठान ली और साठ हज़ार सैनिकों तथा नौ-तेरह हाथियों की एक विशाल सेना लेकर मक्का की ओर कूच किया। जब सेना मक्का के निकट मुहस्सिर घाटी में पहुंची, तो सबसे बड़ा हाथी बैठ गया और काबा की तरफ़ बढ़ने से साफ़ इंकार कर दिया, जबकि किसी और दिशा में हांकने पर वह उठकर चल पड़ता था। इसी बीच अल्लाह ने अबाबील नाम की चिड़ियों का एक झुंड भेजा, जिनमें से हर चिड़िया की चोंच व पंजों में कंकड़ जैसे तीन पत्थर थे, जिस सैनिक को ये पत्थर लगते, उसका शरीर गलने लगता और वह वहीं मर जाता। सेना में भगदड़ मच गई और अबरहा ख़ुद भी रास्ते में तड़प-तड़प कर मारा गया। मक्का के निवासी, जो हमले के डर से पहाड़ों में जा छिपे थे, यह चमत्कारी नजात देखकर सुरक्षित लौट आए। अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार यह घटना नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जन्म से क़रीब पचास-पचपन दिन पहले, सन् 571 ईस्वी के आसपास हुई, इसीलिए उस साल को आमुल फ़ील यानी हाथी का साल कहा गया, यह अल्लाह की तरफ़ से काबा और आने वाले नबी की हिफ़ाज़त का एक शुरुआती संकेत माना जाता है, क्योंकि इस घटना के बाद रोम व फ़ारस जैसी बड़ी ताक़तों तक भी बैतुल्लाह की अहमियत की ख़बर फैल गई।

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