सूरह अल-अस्र سورة العصر
मक्की 3 आयतें
नाम का मतलब
ज़माना / वक्त (कसम खाए गए ज़माने के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-अस्र बहुत छोटी मगर जामे सूरह है, जिसमें कामयाबी की चार शर्तें (ईमान, नेक अमल, हक की नसीहत, सब्र की नसीहत) बयान की गई हैं।
फ़ज़ीलत / सार
इमाम शाफई रहमतुल्लाह अलैहि ने फरमाया कि अगर लोग सिर्फ इसी सूरह पर गौर करें तो यह उनके लिए काफी है — यह इसकी जामेइयत की बड़ी गवाही है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلْعَصْرِ
وَٱلْعَصْرِ
क़सम है ज़माने की
गवाह है गुज़रता समय,
तफ़्सीर:
अल्लाह ने अस्र के समय की क़सम खाई है।
आयत 2
إِنَّ ٱلْإِنسَـٰنَ لَفِى خُسْرٍ
إِنَّ
बेशक
ٱلْإِنسَـٰنَ
इन्सान
لَفِى
(is) surely, in
خُسْرٍ
यक़ीनन ख़सारे में है
कि वास्तव में मनुष्य घाटे में है,
तफ़्सीर:
निश्चय इनसान हानि और तबाही में है।
आयत 3
إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلْحَقِّ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلصَّبْرِ
إِلَّا
सिवाए
ٱلَّذِينَ
उन लोगों के जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
وَتَوَاصَوْا۟
और एक दूसरे तो तलक़ीन की
بِٱلْحَقِّ
हक़ की
وَتَوَاصَوْا۟
और एक दूसरे को तलक़ीन की
بِٱلصَّبْرِ
सब्र की
सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए और अच्छे कर्म किए और एक-दूसरे को हक़ की ताकीद की, और एक-दूसरे को धैर्य की ताकीद की
तफ़्सीर:
परंतु जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाए और अच्छे कार्य किए, तथा एक-दूसरे को सत्य की और सत्य पर धैर्य रखने की ताकीद की; तो इन विशेषताओं से सुसज्जित लोग अपने दुनिया एवं आखिरत के जीवन में सफल होने वाले हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कामयाबी की चार शर्तों (ईमान, नेक अमल, हक की नसीहत, सब्र की नसीहत) के ज़िक्र के साथ सूरह मुकम्मल होती है। यह हमें सिखाता है कि सिर्फ ईमान लाना काफी नहीं, नेक अमल करना, दूसरों को हक और सब्र की नसीहत करना भी असली कामयाबी की शर्त है।
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