नाम का मतलब
हाथी (अबरहा के हाथियों की फौज के मक्का पर हमले के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-फील उस वाकिये पर है जब यमन का बादशाह अबरहा हाथियों की फौज लेकर काबा को गिराने आया, और अल्लाह ने अबाबील परिंदों के ज़रिए उसकी फौज को तबाह कर दिया। यह वाकिया नबी ﷺ की पैदाइश के साल हुआ था।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह अल्लाह की काबा की हिफाज़त का एक अज़ीम मोजिज़ा बयान करती है, जिसे अरब के लोग खुद अपनी आंखों से गवाह थे।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ أَلَمْ تَرَ كَيْفَ فَعَلَ رَبُّكَ بِأَصْحَـٰبِ ٱلْفِيلِ
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
كَيْفَ
किस तरह
فَعَلَ
किया
رَبُّكَ
आपके रब ने
بِأَصْحَـٰبِ
with (the) Companions
ٱلْفِيلِ
हाथी वालों के साथ
क्या तुमने देखा नहीं कि तुम्हारे रब ने हाथीवालों के साथ कैसा बरताव किया?
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) क्या आप नहीं जानते कि आपके पालनहार ने अबरहा और उसके हाथी वाले साथियों के साथ कैसे किया, जब उन्होंने काबा को गिराने का इरादा किया?!
आयत 2
أَلَمْ يَجْعَلْ كَيْدَهُمْ فِى تَضْلِيلٍۢ
أَلَمْ
क्या नहीं
يَجْعَلْ
उसने कर दिया था
كَيْدَهُمْ
उनकी चाल को
فِى
go
تَضْلِيلٍۢ
बेकार/ अकारत
क्या उसने उनकी चाल को अकारथ नहीं कर दिया?
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उनकी काबा को गिराने की बुरी चाल को अकारथ कर दिया, इसलिए उन्होंने काबा से लोगों को फेरने की जो इच्छा की थी, उसे पूरी नहीं कर सके और न ही वे काबा को कोई नुक़सान पहुँचा सके।
आयत 3
وَأَرْسَلَ عَلَيْهِمْ طَيْرًا أَبَابِيلَ
وَأَرْسَلَ
और उसने भेजे
عَلَيْهِمْ
उन पर
طَيْرًا
परिन्दे
أَبَابِيلَ
झुंड के झुंड
और उनपर नियुक्त होने को झुंड के झुंड पक्षी भेजे,
तफ़्सीर:
और उनपर झुंड के झुंड पक्षियों को भेज दिया।
आयत 4
تَرْمِيهِم بِحِجَارَةٍۢ مِّن سِجِّيلٍۢ
تَرْمِيهِم
जो फेंकते थे उन पर
بِحِجَارَةٍۢ
पत्थर
مِّن
of
سِجِّيلٍۢ
कंकर की (क़िस्म ) के
उनपर कंकरीले पत्थर मार रहे थे
तफ़्सीर:
जो उनरक पकी हुई मिट्टी की कंकड़ियाँ बरसा रहे थे।
आयत 5
فَجَعَلَهُمْ كَعَصْفٍۢ مَّأْكُولٍۭ
فَجَعَلَهُمْ
तो उसने कर दिया उन्हें
كَعَصْفٍۢ
भूसे की तरह
مَّأْكُولٍۭ
खाए हुए
अन्ततः उन्हें ऐसा कर दिया, जैसे खाने का भूसा हो
तफ़्सीर:
चुनाँचे अल्लाह ने उन्हें उन पत्तों की तरह कर दिया, जिन्हें जानवरों ने खाया और रौंदा हो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
हाथियों वाली फौज की तबाही के ज़िक्र के साथ सूरह मुकम्मल होती है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह अपने घर (काबा) और अपने दीन की हिफाज़त खुद करता है, चाहे दुश्मन कितना भी ताकतवर क्यों न हो।
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