नाम का मतलब
काफिर लोग (जो हक को मानने से इनकार करते हैं)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-काफिरून उस वक्त नाज़िल हुई जब मक्का के मुशरिकों ने नबी ﷺ को समझौते की पेशकश की कि एक साल वह उनके माबूदों की और एक साल वह अल्लाह की इबादत करें। इस सूरह ने साफ इनकार कर दिया।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह दीन में समझौता न करने और तौहीद पर मज़बूती से कायम रहने का सबसे साफ ऐलान है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ قُلْ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْكَـٰفِرُونَ
قُلْ
कह दीजिए
يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلْكَـٰفِرُونَ
काफ़िरो
कह दो, "ऐ इनकार करनेवालो!"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप कह दें : ऐ अल्लाह का इनकार करने वालो!
आयत 2
لَآ أَعْبُدُ مَا تَعْبُدُونَ
لَآ
Not
أَعْبُدُ
नहीं मैं इबादत करता
مَا
जिसकी
تَعْبُدُونَ
तुम इबादत करते हो
मैं वैसी बन्दगी नहीं करूँगा जैसी बन्दगी तुम करते हो,
तफ़्सीर:
मैं उन मूर्तियों की न वर्तमान में इबादत करता हूँ और न भविष्य में इबादत करूँगा, जिन्हें तुम पूजते हो।
आयत 3
وَلَآ أَنتُمْ عَـٰبِدُونَ مَآ أَعْبُدُ
وَلَآ
और ना
أَنتُمْ
तुम
عَـٰبِدُونَ
इबादत करने वाले हो
مَآ
जिसकी
أَعْبُدُ
मैं इबादत करता हूँ
और न तुम वैसी बन्दगी करनेवाले हो जैसी बन्दगी में करता हूँ
तफ़्सीर:
और न तुम उसकी इबादत करने वाले हो, जिसकी मैं इबादत करता हूँ; और वह अकेला अल्लाह है।
आयत 4
وَلَآ أَنَا۠ عَابِدٌۭ مَّا عَبَدتُّمْ
وَلَآ
और ना
أَنَا۠
मैं
عَابِدٌۭ
इबादत करने वाला हूँ
مَّا
जिसकी
عَبَدتُّمْ
इबादत की तुमने
और न मैं वैसी बन्दगी करनेवाला हूँ जैसी बन्दगी तुमने की है
तफ़्सीर:
और न मैं उन मूर्तियों की इबादत करने वाला हूँ, जिनकी तुमने पूजा की है।
आयत 5
وَلَآ أَنتُمْ عَـٰبِدُونَ مَآ أَعْبُدُ
وَلَآ
और ना
أَنتُمْ
तुम
عَـٰبِدُونَ
इबादत करने वाले हो
مَآ
जिसकी
أَعْبُدُ
मैं इबादत करता हूँ
और न तुम वैसी बन्दगी करनेवाला हुए जैसी बन्दगी मैं करता हूँ
तफ़्सीर:
और न तुम उसकी इबादत करने वाले हो, जिसकी मैं इबादत करता हूँ; और वह अकेला अल्लाह है।
आयत 6
لَكُمْ دِينُكُمْ وَلِىَ دِينِ
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
دِينُكُمْ
तुम्हारा दीन
وَلِىَ
और मेरे लिए
دِينِ
मेरा दीन
तुम्हारे लिए तूम्हारा धर्म है और मेरे लिए मेरा धर्म!"
तफ़्सीर:
तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म है, जिसे तुमने खुद के लिए ईजाद किया है और मेरे लिए मेरा धर्म है, जिसे अल्लाह ने मेरे ऊपर उतारा है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दीन में समझौता न करने और तुम्हारा दीन तुम्हारे लिए, मेरा दीन मेरे लिए, के ऐलान के साथ सूरह मुकम्मल होती है। यह हमें सिखाता है कि अपने अकीदे में समझौता किए बगैर दूसरों के साथ इज़्ज़त और बर्दाश्त का रवैया रखा जा सकता है।
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