सूरह हूद سورة هود
मक्की 123 आयतें
नाम का मतलब
हूद अलैहिस्सलाम (आद कौम की तरफ भेजे गए नबी)
पृष्ठभूमि
सूरह हूद मक्का के दौर में नाज़िल हुई और इसमें कई नबियों (नूह, हूद, सालेह, इब्राहीम, लूत, शुऐब, मूसा) के वाकियात तफ्सील से दोहराए गए हैं। यह सूरह हक की दावत में साबित-कदमी और कौमों के अंजाम पर रोशनी डालती है। नबी मुहम्मद ﷺ ने खुद फरमाया कि इस सूरह ने उन्हें बूढ़ा कर दिया, इसकी संजीदगी की वजह से।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह हक पर साबित-कदम रहने की तालीम के लिए मशहूर है, और नबी ﷺ का इसे भारी सूरह बताना इसकी संजीदगी को ज़ाहिर करता है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ الٓر ۚ كِتَـٰبٌ أُحْكِمَتْ ءَايَـٰتُهُۥ ثُمَّ فُصِّلَتْ مِن لَّدُنْ حَكِيمٍ خَبِيرٍ
الٓر ۚ
अलिफ़ लाम रा
كِتَـٰبٌ
एक किताब है
أُحْكِمَتْ
पुख़्ता की गई हैं
ءَايَـٰتُهُۥ
आयात उसकी
ثُمَّ
फिर
فُصِّلَتْ
खोल कर बयान की गईं
مِن
from (he One Who)
لَّدُنْ
तरफ़ से
حَكِيمٍ
बहुत हिकमत वाले
خَبِيرٍ
ख़ूब बाख़बर के
अलिफ़॰ लाम॰ रा॰। यह एक किताब है जिसकी आयतें पक्की है, फिर सविस्तार बयान हुई हैं; उसकी ओर से जो अत्यन्त तत्वदर्शी, पूरी ख़बर रखनेवाला है
तफ़्सीर:
(अलिफ़, लाम, रा) इस प्रकार के अक्षरों के बारे में सूरतुल-बक़रा के आरंभ में बात गुज़र चुकी है। क़ुरआन एक ऐसी किताब है, जिसकी आयतें संरचना और अर्थ के रूप से सुदृढ़ की गई हैं। अतः आप उनमें किसी प्रकार का विकार (दोष) और कमी नहीं पाएँगे। फिर हलाल व हराम, आदेश व निषेध, वादा व धमकी, कहानियों और अन्य बातों का उल्लेख करके उन्हें स्पष्ट कर दिया गया है। यह क़ुरआन उस अल्लाह की ओर से है, जो अपने प्रबंधन और विधान में हिकमत वाला है, अपने बंदों की स्थितियों और उनका सुधार करने वाली चीज़ों को जानने वाला है।
आयत 2
أَلَّا تَعْبُدُوٓا۟ إِلَّا ٱللَّهَ ۚ إِنَّنِى لَكُم مِّنْهُ نَذِيرٌۭ وَبَشِيرٌۭ
أَلَّا
कि ना
تَعْبُدُوٓا۟
तुम इबादत करो
إِلَّا
मगर
ٱللَّهَ ۚ
अल्लाह की
إِنَّنِى
बेशक मैं
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنْهُ
उसकी तरफ़ से
نَذِيرٌۭ
डराने वाला
وَبَشِيرٌۭ
और ख़ुश ख़बरी देने वाला हूँ
कि "तुम अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करो। मैं तो उसकी ओर से तुम्हें सचेत करनेवाला और शुभ सूचना देनेवाला हूँ।"
तफ़्सीर:
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अवतरित होने वाली इन आयतों का विषयवस्तु : बंदों को अल्लाह के साथ किसी अन्य की इबादत करने से मना करना है। (ऐ लोगो!) निःसंदेह मैं तुम्हें अल्लाह की यातना से डराने वाला हूँ, यदि तुमने उसके साथ कुफ़्र किया और उसकी अवज्ञा की, तथा मैं तुम्हें उसके सवाब की शुभ सूचना देने वाला हूँ, यदि तुम उसपर ईमान लाए और उसकी शरीयत के अनुसार कार्य करते रहे।
आयत 3
وَأَنِ ٱسْتَغْفِرُوا۟ رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُوٓا۟ إِلَيْهِ يُمَتِّعْكُم مَّتَـٰعًا حَسَنًا إِلَىٰٓ أَجَلٍۢ مُّسَمًّۭى وَيُؤْتِ كُلَّ ذِى فَضْلٍۢ فَضْلَهُۥ ۖ وَإِن تَوَلَّوْا۟ فَإِنِّىٓ أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍۢ كَبِيرٍ
وَأَنِ
और ये कि
ٱسْتَغْفِرُوا۟
तुम बख़्शिश माँगो
رَبَّكُمْ
अपने रब से
ثُمَّ
फिर
تُوبُوٓا۟
तुम तौबा करो
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
يُمَتِّعْكُم
वो फ़ायदा देगा तुम्हें
مَّتَـٰعًا
फ़ायदा
حَسَنًا
अच्छा
إِلَىٰٓ
for
أَجَلٍۢ
एक मुद्दत तक
مُّسَمًّۭى
मुक़र्रर
وَيُؤْتِ
और वो देगा
كُلَّ
हर
ذِى
owner
فَضْلٍۢ
साहिबे फ़ज़ल को
فَضْلَهُۥ ۖ
फ़ज़ल उसका
وَإِن
और अगर
تَوَلَّوْا۟
तुम मुँह फेरोगे
فَإِنِّىٓ
तो बेशक मैं
أَخَافُ
मैं डरता हूँ
عَلَيْكُمْ
तुम पर
عَذَابَ
अज़ाब से
يَوْمٍۢ
(of) a Great Day
كَبِيرٍ
बड़े दिन के
और यह कि "अपने रब से क्षमा माँगो, फिर उसकी ओर पलट आओ। वह तुम्हें एक निश्चित अवधि तक सुखोपभोग की उत्तम सामग्री प्रदान करेगा। और बढ़-बढ़कर कर्म करनेवालों पर वह तदधिक अपना अनुग्रह करेगा, किन्तु यदि तुम मुँह फेरते हो तो निश्चय ही मुझे तुम्हारे विषय में एक बड़े दिन की यातना का भय है
तफ़्सीर:
(ऐ लोगो!) अपने पालनहार से अपने पापों की क्षमा माँगो और तुमने उसके हक़ में जो कोताही की है, उसपर पश्चाताप करते हुए उसकी ओर पलट आओ। वह तुम्हें तुम्हारे सांसारिक जीवन में तुम्हारी निश्चित अवधि के समाप्त होने तक उत्तम सामग्री प्रदान करेगा, और हर उस व्यक्ति को जो अतिरिक्त आज्ञाकारिता और सत्कर्म करता है, उसके अतिरिक्त कार्य का संपूर्ण प्रतिकार प्रदान करेगा, उसमें कोई कमी नहीं करेगा। लेकिन यदि तुम उस बात पर ईमान लाने से उपेक्षा करते हो, जो मैं अपने पालनहार की ओर से लेकर आया हूँ, तो मैं तुमपर एक भयानक दिन की यातना से डरता हूँ, और वह क़ियामत का दिन है।
आयत 4
إِلَى ٱللَّهِ مَرْجِعُكُمْ ۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌ
إِلَى
To
ٱللَّهِ
तरफ़ अल्लाह ही के
مَرْجِعُكُمْ ۖ
लौटना है तुम्हारा
وَهُوَ
और वो
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌ
ख़ूब क़ुदरत रखने वाला है
तुम्हें अल्लाह ही की ओर पलटना है, और उसे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है।"
तफ़्सीर:
क़ियामत के दिन (ऐ लोगो!) तुम्हें केवल अल्लाह की ओर पलटना है, और पवित्र अल्लाह हर चीज़ की शक्ति रखता है, कोई चीज़ उसे विवश नहीं कर सकती। अतः तुम्हारी मृत्यु के बाद तुम्हें जीवित करके उठाना और तुम्हारा हिसाब व किताब लेना उसे विवश नहीं कर सकता।
आयत 5
أَلَآ إِنَّهُمْ يَثْنُونَ صُدُورَهُمْ لِيَسْتَخْفُوا۟ مِنْهُ ۚ أَلَا حِينَ يَسْتَغْشُونَ ثِيَابَهُمْ يَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ ۚ إِنَّهُۥ عَلِيمٌۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّهُمْ
बेशक वो
يَثْنُونَ
वो दोहरे करते हैं
صُدُورَهُمْ
सीने अपने
لِيَسْتَخْفُوا۟
ताकि वो छुप सकें
مِنْهُ ۚ
उससे
أَلَا
ख़बरदार
حِينَ
जिस वक़्त
يَسْتَغْشُونَ
वो ढाँपते हैं
ثِيَابَهُمْ
कपड़े अपने
يَعْلَمُ
वो जानता है
مَا
जो
يُسِرُّونَ
वो छुपाते हैं
وَمَا
और जो
يُعْلِنُونَ ۚ
वो ज़ाहिर करते हैं
إِنَّهُۥ
बेशक वो
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِذَاتِ
of what
ٱلصُّدُورِ
सीनों वाले (भेद)
देखो! ये अपने सीनों को मोड़ते है, चाहिए कि उससे छिपें। देखों! जब ये अपने कपड़ों से स्वयं को ढाँकते है, वह जानता है जो कुछ वे छिपाते है और जो कुछ वे प्रकट करते है। निस्संदेह वह सीनों तक की बात को जानता है
तफ़्सीर:
सुन लो! निःसंदेह ये बहुदेववादी अपने सीनों को मोड़ लेते हैं, ताकि वे अपने सीनों में मौजूद संदेह को अल्लाह से छिपा सकें, वे उससे अनभिज्ञ होने के कारण ऐसा करते हैं। सुनो! जब वे अपने सिर को अपने कपड़ों से ढक लेते हैं, तो अल्लाह जानता है जो कुछ वे छिपाते हैं और जो कुछ वे प्रकट करते हैं। निःसंदेह वह सीनों की छिपाई हुई चीज़ों को भी जानता है।
आयत 6
۞ وَمَا مِن دَآبَّةٍۢ فِى ٱلْأَرْضِ إِلَّا عَلَى ٱللَّهِ رِزْقُهَا وَيَعْلَمُ مُسْتَقَرَّهَا وَمُسْتَوْدَعَهَا ۚ كُلٌّۭ فِى كِتَـٰبٍۢ مُّبِينٍۢ
۞ وَمَا
और नहीं
مِن
any
دَآبَّةٍۢ
कोई जानदार
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
إِلَّا
मगर
عَلَى
on
ٱللَّهِ
अल्लाह ही पर है
رِزْقُهَا
रिज़्क़ उसका
وَيَعْلَمُ
और वो जानता है
مُسْتَقَرَّهَا
ठिकाना उसका
وَمُسْتَوْدَعَهَا ۚ
और सौंपे जाने की जगह उसकी
كُلٌّۭ
सब कुछ
فِى
(is) in
كِتَـٰبٍۢ
a Record
مُّبِينٍۢ
एक वाज़ेह किताब में है
धरती में चलने-फिरनेवाला जो प्राणी भी है उसकी रोज़ी अल्लाह के ज़िम्मे है। वह जानता है जहाँ उसे ठहरना है और जहाँ उसे सौपा जाना है। सब कुछ एक स्पष्ट किताब में मौजूद है
तफ़्सीर:
धरती पर चलने वाला जो भी प्राणी है, अल्लाह ने अपनी कृपा से उसकी आजीविका की ज़िम्मेदारी ले रखी है। अल्लाह महिमावान धरती पर उसके बसने के स्थान को जानता है, तथा वह उस स्थान का भी ज्ञान रखता है, जहाँ उसकी मृत्यु आनी है। इस तरह, सभी प्राणी और उनकी आजीविका और उनके ठहरने की जगहें और उनकी मृत्यु के स्थान, एक स्पष्ट पुस्तक अर्थात 'लौह़े मह़फ़ूज़' (संरक्षित पट्टिका) में अंकित हैं।
आयत 7
وَهُوَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ فِى سِتَّةِ أَيَّامٍۢ وَكَانَ عَرْشُهُۥ عَلَى ٱلْمَآءِ لِيَبْلُوَكُمْ أَيُّكُمْ أَحْسَنُ عَمَلًۭا ۗ وَلَئِن قُلْتَ إِنَّكُم مَّبْعُوثُونَ مِنۢ بَعْدِ ٱلْمَوْتِ لَيَقُولَنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ إِنْ هَـٰذَآ إِلَّا سِحْرٌۭ مُّبِينٌۭ
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
خَلَقَ
पैदा किया
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
فِى
in
سِتَّةِ
six
أَيَّامٍۢ
छः दिनों में
وَكَانَ
और था
عَرْشُهُۥ
अर्श उसका
عَلَى
on
ٱلْمَآءِ
पानी पर
لِيَبْلُوَكُمْ
ताकि वो आज़माए तुम्हें
أَيُّكُمْ
कौन तुम में से
أَحْسَنُ
ज़्यादा अच्छा है
عَمَلًۭا ۗ
अमल में
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
قُلْتَ
कहें आप
إِنَّكُم
बेशक तुम
مَّبْعُوثُونَ
उठाए जाने वाले हो
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद
ٱلْمَوْتِ
मौत के
لَيَقُولَنَّ
अलबत्ता ज़रूर कहेंगे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
إِنْ
नहीं
هَـٰذَآ
ये
إِلَّا
मगर
سِحْرٌۭ
जादू
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
वही है जिसने आकाशों और धरती को छः दिनों में पैदा किया - उसका सिंहासन पानी पर था - ताकि वह तुम्हारी परीक्षा ले कि तुममें कर्म की स्पष्ट से कौन सबसे अच्छा है। और यदि तुम कहो कि "मरने के पश्चात तुम अवश्य उठोगे।" तो जिन्हें इनकार है, वे कहने लगेंगे, "यह तो खुला जादू है।"
तफ़्सीर:
वही महिमावान अल्लाह है, जिसने विशाल आकाशों तथा विस्तृत धरती को और उनमें पाई जाने वाली सारी वस्तुओं को छ: दिनों में पैदा किया। और उनकी रचना से पूर्व उसका सिंहासन पानी पर था। ताकि (ऐ लोगो!) वह तुम्हारा परीक्षण करे कि तुम में से कौन अल्लाह को प्रसन्न करने वाला सबसे अच्छा काम करता है, तथा तुम में से कौन उसे क्रोधित करने वाला सबसे बुरा काम करता है। फिर वह हर एक को वह बदला दे, जिसका वह हक़दार है। तथा (ऐ नबी!) यदि आप कहें : (ऐ लोगो!) तुम अपनी मृत्यु के बाद हिसाब-किताब के लिए पुनः जीवित किए जाओगे, तो निश्चय ही अल्लाह के साथ कुफ़्र करने वाले और मरणोपरांत पुनर्जीवन का इनकार करने वाले कहेंगे : आप जिस क़ुरआन को पढ़ते हैं, वह स्पष्ट जादू के अलावा कुछ नहीं है। अतः वह स्पष्ट रूप से असत्य है।
आयत 8
وَلَئِنْ أَخَّرْنَا عَنْهُمُ ٱلْعَذَابَ إِلَىٰٓ أُمَّةٍۢ مَّعْدُودَةٍۢ لَّيَقُولُنَّ مَا يَحْبِسُهُۥٓ ۗ أَلَا يَوْمَ يَأْتِيهِمْ لَيْسَ مَصْرُوفًا عَنْهُمْ وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ
وَلَئِنْ
और अलबत्ता अगर
أَخَّرْنَا
मुअख़्ख़र कर दें हम
عَنْهُمُ
उनसे
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब को
إِلَىٰٓ
for
أُمَّةٍۢ
एक मुद्दत तक
مَّعْدُودَةٍۢ
शुमार की हुई
لَّيَقُولُنَّ
अलबत्ता वो ज़रूर कहेंगे
مَا
किस चीज़ ने
يَحْبِسُهُۥٓ ۗ
रोक रखा है उसे
أَلَا
ख़बरदार
يَوْمَ
जिस दिन
يَأْتِيهِمْ
वो आ जाएगा उनके पास
لَيْسَ
नहीं
مَصْرُوفًا
फेरा जाएगा
عَنْهُمْ
उनसे
وَحَاقَ
और घेर लेगा
بِهِم
उन्हें
مَّا
जो
كَانُوا۟
थे वो
بِهِۦ
जिसका
يَسْتَهْزِءُونَ
वो मज़ाक़ उड़ाते
यदि हम एक निश्चित अवधि तक के लिए उनसे यातना को टाले रखें, तो वे कहने लगेंगे, "आख़िर किस चीज़ ने उसे रोक रखा है?" सुन लो! जिन दिन वह उनपर आ जाएगी तो फिर वह उनपर से टाली नहीं जाएगी। और वही चीज़ उन्हें घेर लेगी जिसका वे उपहास करते है
तफ़्सीर:
यदि हम मुश्रिकों से दुनिया के जीवन में उस यातना को कुछ दिनों के लिए विलंबित कर दें, जिसके वे हक़दार हैं, तो वे मज़ाक उड़ाते हुए, उसके लिए जल्दी मचाते हुए कहेंगे : हमसे किस चीज़ ने यातना को रोक रखा है? सुन लो, जिस सज़ा के वे हक़दार हैं, उसका अल्लाह के पास एक समय निर्धारित है। और जिस दिन वह उनपर आ जाएगी, तो उन्हें कोई उसे उनसे टालने वाला नहीं मिलेगा। बल्कि वह उनपर आकर रहेगी और वे उस यातना से घिर जाएँगे जिसके लिए वे उपहास और मज़ाक़ को तौर पर जल्दी मचा रहे थे।
आयत 9
وَلَئِنْ أَذَقْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ مِنَّا رَحْمَةًۭ ثُمَّ نَزَعْنَـٰهَا مِنْهُ إِنَّهُۥ لَيَـُٔوسٌۭ كَفُورٌۭ
وَلَئِنْ
और अलबत्ता अगर
أَذَقْنَا
चखाऐं हम
ٱلْإِنسَـٰنَ
इन्सान को
مِنَّا
अपनी तरफ़ से
رَحْمَةًۭ
रहमत
ثُمَّ
फिर
نَزَعْنَـٰهَا
छीन लें हम उसको
مِنْهُ
उससे
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَيَـُٔوسٌۭ
अलबत्ता बहुत मायूस होने वाला
كَفُورٌۭ
बहुत नाशुक्रा है
यदि हम मनुष्य को अपनी दयालुता का रसास्वादन कराकर फिर उसको छीन लॆं, तॊ (वह दयालुता कॆ लिए याचना नहीं करता) निश्चय ही वह निराशावादी, कृतघ्न है
तफ़्सीर:
और यदि हम मनुष्य को अपनी तरफ़ से कोई अनुग्रह प्रदान करें, जैसे स्वास्थ्य एवं धन-संपत्ति आदि, फिर उससे उस अनुग्रह को छीन लें, तो वह अल्लाह की दया से बहुत निराश हो जाता है और उसकी नेमतों का बड़ा कृतघ्न बन जाता है। जब अल्लाह उन्हें उससे छीन लेता है, तो वह उन्हें भूल जाता है।
आयत 10
وَلَئِنْ أَذَقْنَـٰهُ نَعْمَآءَ بَعْدَ ضَرَّآءَ مَسَّتْهُ لَيَقُولَنَّ ذَهَبَ ٱلسَّيِّـَٔاتُ عَنِّىٓ ۚ إِنَّهُۥ لَفَرِحٌۭ فَخُورٌ
وَلَئِنْ
और अलबत्ता अगर
أَذَقْنَـٰهُ
चखाऐं हम उसे
نَعْمَآءَ
आसाइश
بَعْدَ
बाद
ضَرَّآءَ
तकलीफ़ के
مَسَّتْهُ
जो पहुँची उसे
لَيَقُولَنَّ
अलबत्ता वो ज़रूर कहेगा
ذَهَبَ
दूर हो गईं
ٱلسَّيِّـَٔاتُ
बुराईयाँ (तकालीफ़)
عَنِّىٓ ۚ
मुझसे
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَفَرِحٌۭ
अलबत्ता बहुत इतराने वाला
فَخُورٌ
बहुत फ़ख़्र करने वाला है
और यदि हम इसके पश्चात कि उसे तकलीफ़ पहुँची हो, उसे नेमत का रसास्वादन कराते है तो वह कहने लगता है, "मेरे तो सारे दुख दूर हो गए।" वह तो फूला नहीं समाता, डींगे मारने लगता है
तफ़्सीर:
और यदि हम उसे गरीबी और बीमारी के पश्चात आजीविका में विस्तार और स्वास्थ्य का मज़ा चखा दें, तो वह अवश्य कहेगा : विपत्ति मुझसे दूर हो गई और तकलीफ़ ख़त्म हो गई। वह इस पर अल्लाह का शुक्रिया अदा नहीं करता। वह ख़ुशी से इतराता फिरता है और अल्लाह की प्रदान की हुई नेमतों पर लोगों के सामने शेखी बघारता और गर्व करता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन की मोहकम आयतों और इंसान की नाशुक्री की फितरत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि नेमत में इतराना और तकलीफ में मायूस होना दोनों नाकिस ईमान की निशानी हैं, संतुलन ज़रूरी है।
आयत 11
إِلَّا ٱلَّذِينَ صَبَرُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ أُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُم مَّغْفِرَةٌۭ وَأَجْرٌۭ كَبِيرٌۭ
إِلَّا
सिवाय
ٱلَّذِينَ
उनके जिन्होंने
صَبَرُوا۟
सब्र किया
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
لَهُم
उनके लिए है
مَّغْفِرَةٌۭ
बख़्शिश
وَأَجْرٌۭ
और अजर
كَبِيرٌۭ
बहुत बड़ा
उनकी बात दूसरी है जिन्होंने धैर्य से काम लिया और सत्कर्म किए। वही है जिनके लिए क्षमा और बड़ा प्रतिदान है
तफ़्सीर:
परन्तु जिन लोगों ने तकलीफों एवं आज्ञाकारिता पर धैर्य से काम लिया तथा गुनाहों से दूर रहे और अच्छे कार्य करते रहे, तो उनका मामला दूसरा है। वे निराशा से पीड़ित नहीं होते, न अल्लाह की नेमतों की नाशुक्री करते और न ही लोगों के सामने शेखी पघारते हैं। इन विशेषताओं से सुसज्जित लोगों के लिए उनके पालनहार कि ओर से उनके गुनाहों की क्षमा है तथा आख़िरत में उनके लिए बड़ा प्रतिफल है।
आयत 12
فَلَعَلَّكَ تَارِكٌۢ بَعْضَ مَا يُوحَىٰٓ إِلَيْكَ وَضَآئِقٌۢ بِهِۦ صَدْرُكَ أَن يَقُولُوا۟ لَوْلَآ أُنزِلَ عَلَيْهِ كَنزٌ أَوْ جَآءَ مَعَهُۥ مَلَكٌ ۚ إِنَّمَآ أَنتَ نَذِيرٌۭ ۚ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ وَكِيلٌ
فَلَعَلَّكَ
तो शायद आप
تَارِكٌۢ
छोड़ने वाले हैं
بَعْضَ
बाज़ हिस्सा
مَا
उसका जो
يُوحَىٰٓ
वही किया गया
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
وَضَآئِقٌۢ
और तंग होने वाला है
بِهِۦ
साथ उसके
صَدْرُكَ
सीना आपका
أَن
कि
يَقُولُوا۟
वो कहेंगे
لَوْلَآ
क्यों नहीं
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
عَلَيْهِ
इस पर
كَنزٌ
कोई ख़ज़ाना
أَوْ
या
جَآءَ
आया
مَعَهُۥ
साथ उसके
مَلَكٌ ۚ
कोई फ़रिश्ता
إِنَّمَآ
बेशक
أَنتَ
आप तो
نَذِيرٌۭ ۚ
डराने वाले हैं
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
وَكِيلٌ
निगरान है
तो शायद तुम उसमें से कुछ छोड़ बैठोगे, जो तुम्हारी ओर प्रकाशना रूप में भेजी जा रही है। और तुम इस बात पर तंगदिल हो रहे हो कि वे कहते है, "उसपर कोई ख़ज़ाना क्यों नहीं उतरा या उसके साथ कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं आया?" तुम तो केवल सचेत करनेवाले हो। हर चीज़ अल्लाह ही के हवाले है
तफ़्सीर:
ऐसा लगता है कि (ऐ रसूल) आप (उनके कुफ़्र, हठधर्मी तथा निशानियों के सुझाव का सामना करने के कारण) कुछ ऐसी चीज़ों को पहुँचाने का काम छोड़ देने वाले हैं, जिन्हें पहुँचाने का अल्लाह ने आपको आदेश दिया है और उनपर अमल करना उनके लिए कठिन है। तथा उन बातों को पहुँचाने से आपका दिल इसलिए तंग हो रहा है कि वे यह न कह दें : उस (मुह़म्मद) पर कोई ख़ज़ाना क्यों नहीं उतारा गया, जिससे वह धनी हो जाता, या उसके साथ कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं आया, जो उसके सच्चे नबी होने की पुष्टि करता। अतः इन बातों की वजह से आप अपनी ओर की जाने वाली वह़्य की कुछ चीज़ों को न छोड़ें। आप तो केवल डराने वाले हैं। आप उसी का प्रचार करते हैं जिसके प्रचार का अल्लाह ने आपको आदेश दिया है। वे लोग जिन निशानियों का प्रस्ताव रख रहे हैं, उन्हें प्रस्तुत करना आपका कर्तव्य नहीं है। और अल्लाह प्रत्येक चीज़ का संरक्षक है।
आयत 13
أَمْ يَقُولُونَ ٱفْتَرَىٰهُ ۖ قُلْ فَأْتُوا۟ بِعَشْرِ سُوَرٍۢ مِّثْلِهِۦ مُفْتَرَيَـٰتٍۢ وَٱدْعُوا۟ مَنِ ٱسْتَطَعْتُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
أَمْ
क्या
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
افْتَرَاهُ ۖ
उसने गढ़ लिया उसे
قُلْ
कह दीजिए
فَأْتُوا۟
पस ले आओ
بِعَشْرِ
दस
سُوَرٍۢ
सूरतें
مِّثْلِهِۦ
मानिन्द इसके
مُفْتَرَيَـٰتٍۢ
गढ़ी हुई
وَٱدْعُوا۟
और बुला लो
مَنِ
उन्हें जिनकी
ٱسْتَطَعْتُم
इस्तिताअत रखते हो तुम
مِّن
besides Allah
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
(उन्हें कोई शंका है) या वे कहते है कि "उसने इसे स्वयं घड़ लिया है?" कह दो, "अच्छा, यदि तुम सच्चे हो तो इस जैसी घड़ी हुई दस सूरतें ले आओ और अल्लाह से हटकर जिस किसी को बुला सकते हो बुला लो।"
तफ़्सीर:
बल्कि क्या मुश्रिक लोग यह कहते हैं कि मुहम्मद ने कुरआन स्वयं गढ़ लिया है और यह अल्लाह की वह़्य नहीं है। (ऐ रसूल) आप उन्हें चुनौती देते हुए कह दीजिए : तुम भी इस कुरआन के समान गढ़ी हुई दस सूरतें ले आओ, जिनमें तुम उस क़ुरआन की तरह सच्चाई का पालन न करो, जिसके बारे में तुम्हारा दावा है कि वह गढ़ा हुआ है। तथा तुम जिसे भी बुला सकते हो, बुला लो; ताकि इस काम पर उसकी मदद ले सको, यदि तुम अपने इस दावा में सच्चे हो कि कुरआन गढ़ा हुआ है।
आयत 14
فَإِلَّمْ يَسْتَجِيبُوا۟ لَكُمْ فَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّمَآ أُنزِلَ بِعِلْمِ ٱللَّهِ وَأَن لَّآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ فَهَلْ أَنتُم مُّسْلِمُونَ
فَإِلَّمْ
फिर अगर ना
يَسْتَجِيبُوا۟
वो जवाब दें
لَكُمْ
तुम्हें
فَٱعْلَمُوٓا۟
तो जान लो
أَنَّمَآ
कि बेशक
أُنزِلَ
ये नाज़िल किया गया है
بِعِلْمِ
with the knowledge of Allah
ٱللَّهِ
अल्लाह के इल्म से
وَأَن
और ये कि
لَّآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ ۖ
वो ही
فَهَلْ
तो क्या
أَنتُم
तुम
مُّسْلِمُونَ
इस्लाम लाने वाले हो
फिर यदि वे तुम्हारी बातें न मानें तो जान लो, यह अल्लाह के ज्ञान ही के साथ अवतरित हुआ है। और यह कि उसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं। तो अब क्या तुम मुस्लिम (आज्ञाकारी) होते हो?
तफ़्सीर:
यदि वे तुम्हारी माँग पूरी न करें क्योंकि वे ऐसा करने में सक्षम नहीं है, तो (ऐ ईमान वालो) निश्चित रूप से जान लो कि अल्लाह ने क़ुरआन को अपने रसूल पर अपने ज्ञान के साथ उतारा है और यह मनगढ़ंत नहीं है। तथा यह भी ज्ञान में रखो कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। अब क्या तुम इन निश्चित तर्कों के बाद उसके आगे झुकने को तैयार हो?
आयत 15
مَن كَانَ يُرِيدُ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا وَزِينَتَهَا نُوَفِّ إِلَيْهِمْ أَعْمَـٰلَهُمْ فِيهَا وَهُمْ فِيهَا لَا يُبْخَسُونَ
مَن
जो कोई
كَانَ
है
يُرِيدُ
चाहता
ٱلْحَيَوٰةَ
ज़िन्दगी
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
وَزِينَتَهَا
और ज़ीनत उसकी
نُوَفِّ
हम पूरा-पूरा देंगे
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
أَعْمَـٰلَهُمْ
उनके आमाल (का अजर)
فِيهَا
उसमें
وَهُمْ
और वो
فِيهَا
उसमें
لَا
will not be lessened
يُبْخَسُونَ
ना वो कमी किए जाऐंगे
जो व्यक्ति सांसारिक जीवन और उसकी शोभा का इच्छुक हो तो ऐसे लोगों को उनके कर्मों का पूरा-पूरा बदला हम यहीं दे देते है और इसमें उनका कोई हक़ नहीं मारा जाता
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति अपने कर्म से सांसारिक जीवन और उसका नश्वर आनंद चाहता है, वह उससे आख़िरत का इरादा नहीं रखता, हम उन्हें उनके कर्मों का बदला इसी दुनिया में स्वास्थ्य, शांति और आजीविका में विस्तार के रूप में दे देते हैं, उनके कार्य के प्रतिफल में कुछ भी कमी नहीं की जाती।
आयत 16
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ لَيْسَ لَهُمْ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ إِلَّا ٱلنَّارُ ۖ وَحَبِطَ مَا صَنَعُوا۟ فِيهَا وَبَـٰطِلٌۭ مَّا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
ٱلَّذِينَ
वो जो
لَيْسَ
नहीं है
لَهُمْ
उनके लिए
فِى
in
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत में
إِلَّا
मगर
ٱلنَّارُ ۖ
आग
وَحَبِطَ
और ज़ाया हो गया
مَا
जो
صَنَعُوا۟
उन्होंने किया
فِيهَا
उसमें
وَبَـٰطِلٌۭ
और बातिल है
مَّا
जो कुछ
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
यही वे लोग है जिनके लिए आख़िरत में आग के सिवा और कुछ भी नहीं। उन्होंने जो कुछ बनाया, वह सब वहाँ उनकी जान को लागू हुआ और उनका सारा किया-धरा मिथ्या होकर रहा
तफ़्सीर:
इस प्रकार का निंदित इरादा रखने वाले लोगों के लिए क़ियामत के दिन आग के सिवा कोई अन्य बदला नहीं है, जिसमें वे प्रवेश करेंगे और उनके कर्मों का प्रतिफल अकारथ हो जाएगा तथा उनके कार्य बरबाद हो जाएँगे। क्योंकि वे दुनिया में ईमान वाले नहीं थे और उनका इरादा सही नहीं था। चुनाँचे अपने कर्मों से उनका उद्देश्य अल्लाह की प्रसन्नता तथा आख़िरत नहीं था।
आयत 17
أَفَمَن كَانَ عَلَىٰ بَيِّنَةٍۢ مِّن رَّبِّهِۦ وَيَتْلُوهُ شَاهِدٌۭ مِّنْهُ وَمِن قَبْلِهِۦ كِتَـٰبُ مُوسَىٰٓ إِمَامًۭا وَرَحْمَةً ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ يُؤْمِنُونَ بِهِۦ ۚ وَمَن يَكْفُرْ بِهِۦ مِنَ ٱلْأَحْزَابِ فَٱلنَّارُ مَوْعِدُهُۥ ۚ فَلَا تَكُ فِى مِرْيَةٍۢ مِّنْهُ ۚ إِنَّهُ ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّكَ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يُؤْمِنُونَ
أَفَمَن
क्या भला वो शख़्स जो
كَانَ
हो
عَلَىٰ
on
بَيِّنَةٍۢ
एक वाज़ेह दलील पर
مِّن
from
رَّبِّهِۦ
अपने रब की तरफ़ से
وَيَتْلُوهُ
और पीछे आता हो उसके
شَاهِدٌۭ
एक गवाह
مِّنْهُ
उसकी तरफ़ से
وَمِن
and before it
قَبْلِهِۦ
और उससे पहले थी
كِتَـٰبُ
किताब
مُوسَىٰٓ
मूसा की
إِمَامًۭا
इमाम/रहनुमा
وَرَحْمَةً ۚ
और रहमत
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
يُؤْمِنُونَ
जो ईमान रखते हैं
بِهِۦ ۚ
उस पर
وَمَن
और जो कोई
يَكْفُرْ
कुफ़्र करेगा
بِهِۦ
उसका
مِنَ
among
ٱلْأَحْزَابِ
गिरोहों में से
فَٱلنَّارُ
तो आग
مَوْعِدُهُۥ ۚ
उसकी वादागाह है
فَلَا
पस ना
تَكُ
हों आप
فِى
in
مِرْيَةٍۢ
किसी शक में
مِّنْهُ ۚ
उससे
إِنَّهُ
बेशक वो
ٱلْحَقُّ
हक़ है
مِن
from
رَّبِّكَ
आपके रब की तरफ़ से
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَ
अक्सर
ٱلنَّاسِ
लोग
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाते
फिर क्या वह व्यक्ति जो अपने रब के एक स्पष्ट प्रमाण पर है और स्वयं उसके रूप में भी एक गवाह उसके साथ-साथ रहता है - और इससे पहले मूसा की किताब भी एक मार्गदर्शक और दयालुता के रूप में उपस्थित रही है- (और वह जो प्रकाश एवं मार्गदर्शन से वंचित है, दोनों बराबर हो सकते है) ऐसे ही लोग उसपर ईमान लाते है, किन्तु इन गिरोहों में से जो उसका इनकार करेगा तो उसके लिए जिस जगह का वादा है, वह तो आग है। अतः तुम्हें इसके विषय में कोई सन्देह न हो। यह तुम्हारे रब की ओर से सत्य है, किन्तु अधिकतर लोग मानते नहीं
तफ़्सीर:
पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, जिनके पास उनके पालनहार की ओर से प्रमाण है और उनके समर्थन हेतु उनके पालनहार की ओर से एक साक्षी जिबरील अलैहिस्सलाम भी मौजूद हैं। तथा इससे पहले उनकी नुबुव्वत की गवाही वह तौरात भी देती है, जो मूसा अलैहिस्सलाम पर लोगों के लिए आदर्श तथा दया के रूप में उतारी गई थी। वह और उनके साथ ईमान लाने वाले लोग, उन काफिरों के समान नहीं हो सकते, जो गुमराही में भटक रहे हैं। वे लोग क़ुरआन पर तथा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर विश्वास रखते हैं, जिनपर क़ुरआन उतरा है। उन समूहों में से जो भी उसका इनकार करेगा, क़ियामत के दिन उसके वादा की जगह (ठिकाना) दोज़ख है। अतः (ऐ रसूल!) आप कुरआन के बारे में और उन लोगों के ठिकाने के संबंध में संदेह न करें। क्योंकि यह ऐसा सत्य है जो संदेह से परे है। लेकिन अधिकतर लोग स्पष्ट सबूतों और खुले प्रमाणों के बाद भी ईमान नहीं लाते।
आयत 18
وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ يُعْرَضُونَ عَلَىٰ رَبِّهِمْ وَيَقُولُ ٱلْأَشْهَـٰدُ هَـٰٓؤُلَآءِ ٱلَّذِينَ كَذَبُوا۟ عَلَىٰ رَبِّهِمْ ۚ أَلَا لَعْنَةُ ٱللَّهِ عَلَى ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَمَنْ
और कौन
أَظْلَمُ
बड़ा ज़ालिम है
مِمَّنِ
उससे जो
ٱفْتَرَىٰ
गढ़ ले
عَلَى
against
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
كَذِبًا ۚ
झूठ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
يُعْرَضُونَ
जो पेश किए जाऐंगे
عَلَىٰ
before
رَبِّهِمْ
अपने रब पर
وَيَقُولُ
और कहेंगे
ٱلْأَشْهَـٰدُ
गवाह
هَـٰٓؤُلَآءِ
ये हैं
ٱلَّذِينَ
वो लोग जिन्होंने
كَذَبُوا۟
झूठ बोला
عَلَىٰ
against
رَبِّهِمْ ۚ
अपने रब पर
أَلَا
ख़बरदार
لَعْنَةُ
लानत है
ٱللَّهِ
अल्लाह की
عَلَى
(is) on
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों पर
उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी कौन होगा जो अल्लाह पर थोपकर झूठ घड़े। ऐसे लोग अपने रब के सामने पेश होंगे और गवाही देनेवाले कहेंगे, "यही लोग है जिन्होंने अपने रब पर झूठ घड़ा।" सुन लो! ऐसे अत्याचारियों पर अल्लाह की लानत है
तफ़्सीर:
उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी कोई नहीं है, जो अल्लाह की ओर साझी अथवा संतान की निस्बत करके उसपर झूठ गढ़े। जो लोग अल्लाह पर झूठ गढते हैं, उन्हें क़ियामत के दिन उनके पालनहार के समक्ष उनके कर्मों के बारे में पूछने के लिए प्रस्तुत किया जाएगा। फरिश्तों तथा रसूलों में से उनके विरद्ध गवाही देने वाले कहेंगे : यही वे लोग हैं, जिन्होंने अल्लाह पर उसकी ओर साझी तथा बेटे की निस्बत करके झूठ गढ़ा था। सुन लो, अल्लाह पर झूठ गढ़कर स्वयं पर अत्याचार करने वालों को अल्लाह ने अपनी दया से निष्कासित कर दिया।
आयत 19
ٱلَّذِينَ يَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ وَيَبْغُونَهَا عِوَجًۭا وَهُم بِٱلْـَٔاخِرَةِ هُمْ كَـٰفِرُونَ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يَصُدُّونَ
रोकते हैं
عَن
from
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते से
وَيَبْغُونَهَا
और तलाश करते हैं उस में
عِوَجًۭا
टेढ़ा पन
وَهُم
और वो
بِٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत के
هُمْ
वो ही
كَـٰفِرُونَ
इन्कारी हैं
जो अल्लाह के मार्ग से रोकते है और उसमें टेढ़ पैदा करना चाहते है; और वही आख़िरत का इनकार करते है
तफ़्सीर:
जो लोगों को अल्लाह के सीधे रास्ते से रोकते हैं और चाहते हैं कि उसका मार्ग सही दिशा से मुड़ जाए, ताकि उसपर कोई न चले। तथा वे मृत्यु के बाद पुनर्जीवित किए जाने का इनकार करते और उसे नहीं मानते हैं।
आयत 20
أُو۟لَـٰٓئِكَ لَمْ يَكُونُوا۟ مُعْجِزِينَ فِى ٱلْأَرْضِ وَمَا كَانَ لَهُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِنْ أَوْلِيَآءَ ۘ يُضَـٰعَفُ لَهُمُ ٱلْعَذَابُ ۚ مَا كَانُوا۟ يَسْتَطِيعُونَ ٱلسَّمْعَ وَمَا كَانُوا۟ يُبْصِرُونَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग
لَمْ
ना
يَكُونُوا۟
वो थे
مُعْجِزِينَ
आजिज़ करने वाले
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَمَا
और नहीं
كَانَ
था
لَهُم
उनके लिए
مِّن
besides
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مِنْ
any
أَوْلِيَآءَ ۘ
कोई मददगार
يُضَـٰعَفُ
दोगुना किया जाएगा
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلْعَذَابُ ۚ
अज़ाब
مَا
ना
كَانُوا۟
थे वो
يَسْتَطِيعُونَ
वो इस्तिताअत रखते
ٱلسَّمْعَ
सुनने की
وَمَا
और ना ही
كَانُوا۟
थे वो
يُبْصِرُونَ
वो देखते
वे धरती में क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते और न अल्लाह से हटकर उनका कोई समर्थक ही है। उन्हें दोहरी यातना दी जाएगी। वे न सुन ही सकते थे और न देख ही सकते थे
तफ़्सीर:
इन विशेषताओं वाले लोग यदि उनपर अल्लाह की यातना आ जाए, तो धरती में उससे भागने में सक्षम नहीं हैं, और न तो उनके पास अल्लाह के सिवा समर्थक और सहायक हैं, जो उनसे अल्लाह के अज़ाब को टाल सकें। उनके स्वयं अपने आपको तथा दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोकने के कारण, क़ियामत के दिन उनकी यातना बढ़ा दी जाएगी। वे दुनिया में, सत्य और मार्गदर्शन की बात स्वीकार करने के तौर पर नहीं सुन सकते थे तथा वे ब्रह्मांड में अल्लाह की निशानियों को ऐसी दृष्टि से नहीं देखते थे जो उन्हें लाभान्वित करे; क्योंकि वे सत्य से अति विमुख थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन के चैलेंज और सिर्फ दुनिया चाहने वालों के अंजाम का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि सिर्फ दुनिया की चाहत रखने वाला आखिरत में खाली हाथ रह जाता है।
आयत 21
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَفْتَرُونَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
خَسِرُوٓا۟
ख़सारे में डाला
أَنفُسَهُمْ
अपनी जानों को
وَضَلَّ
और गुम हो गया
عَنْهُم
उनसे
مَّا
जो कुछ
كَانُوا۟
थे वो
يَفْتَرُونَ
वो गढ़ा करते
ये वही लोग है जिन्होंने अपने आपको घाटे में डाला और जो कुछ वे घड़ा करते थे, वह सब उनमें गुम होकर रह गया
तफ़्सीर:
इन विशेषताओं वाले लोग ही हैं, जिन्होंने अल्लाह के साथ साझेदार बनाने के कारण, अपने आपको विनाश की खाइयों में डालकर, अपना घाटा किया। और उनके गढ़े हुए साझेदार और सिफ़ारिशी उनसे दूर हो गए।
आयत 22
لَا جَرَمَ أَنَّهُمْ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ هُمُ ٱلْأَخْسَرُونَ
لَا
No
جَرَمَ
नहीं कोई शक
أَنَّهُمْ
बेशक वो
فِى
in
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत में
هُمُ
वो ही हैं
ٱلْأَخْسَرُونَ
जो सब से ज़्यादा ख़सारा पाने वाले हैं
निश्चय ही वही आख़िरत में सबसे बढ़कर घाटे में रहेंगे
तफ़्सीर:
वास्तव में, क़ियामत के दिन यही लोग सबसे अधिक घाटे का सौदा करने वाले ठहरेंगे, क्योंकि उन्होंने ईमान के बदले कुफ्र, आख़िरत के बदले दुनिया और दया के बदले यातना को अपना लिया।
आयत 23
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَأَخْبَتُوٓا۟ إِلَىٰ رَبِّهِمْ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلْجَنَّةِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
وَأَخْبَتُوٓا۟
और उन्होंने आजिज़ी की
إِلَىٰ
before
رَبِّهِمْ
तरफ़ अपने रब के
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
أَصْحَـٰبُ
साथी
ٱلْجَنَّةِ ۖ
जन्नत के
هُمْ
वो
فِيهَا
उसमें
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
रहे वे लोग जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए और अपने रब की ओर झूक पड़े वही जन्नतवाले है, उसमें वे सदैव रहेंगे
तफ़्सीर:
निःसंदेह जो लोग अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाए और अच्छे कार्य किए, तथा अल्लाह के प्रति विनम्र और विनीत हो गए, वही लोग जन्नत वाले हैं, जिसमें वे सदैव रहेंगे।
आयत 24
۞ مَثَلُ ٱلْفَرِيقَيْنِ كَٱلْأَعْمَىٰ وَٱلْأَصَمِّ وَٱلْبَصِيرِ وَٱلسَّمِيعِ ۚ هَلْ يَسْتَوِيَانِ مَثَلًا ۚ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ
۞ مَثَلُ
मिसाल
ٱلْفَرِيقَيْنِ
दो गिरोहों की
كَٱلْأَعْمَىٰ
मानिन्द अँधे
وَٱلْأَصَمِّ
और बहरे के है
وَٱلْبَصِيرِ
और देखने वाले
وَٱلسَّمِيعِ ۚ
और सुनने वाले के है
هَلْ
क्या
يَسْتَوِيَانِ
ये दोनों बराबर हो सकते हैं
مَثَلًا ۚ
मिसाल में
أَفَلَا
क्या भला नहीं
تَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ते
दोनों पक्षों की उपमा ऐसी है जैसे एक अन्धा और बहरा हो और एक देखने और सुननेवाला। क्या इन दोनों की दशा समान हो सकती है? तो क्या तुम होश से काम नहीं लेते?
तफ़्सीर:
काफिरों और मोमिनों के पक्षों का उदाहरण अंधे की तरह है, जो देख नहीं सकता, और बहरे की तरह है, जो सुन नहीं सकता। यह उदाहरण काफिरों के पक्ष का है, जो सत्य को स्वीकार करने के इरादे से नहीं सुनता और न ही उसे ऐसी दृष्टि से देखता है जो उन्हें लाभान्वित करे। तथा दूसरे पक्ष का उदाहरण सुनने और देखने वाले की तरह है। यह मोमिनों के पक्ष का उदाहरण है, जो सुनता और देखता है। क्या ये दोनों पक्ष अपनी स्थिति और विशेषता में समान हो सकते हैं?! वे दोनों कभी समान नहीं हो सकते। क्या तुम इन दोनों की असमानता से कोई सीख नहीं लेते?!
आयत 25
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِۦٓ إِنِّى لَكُمْ نَذِيرٌۭ مُّبِينٌ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
نُوحًا
नूह को
إِلَىٰ
तरफ़
قَوْمِهِۦٓ
उसकी क़ौम के
إِنِّى
बेशक मैं
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
نَذِيرٌۭ
डराने वाला हूँ
مُّبِينٌ
खुल्लम-खुल्ला
हमने नूह को उसकी क़ौम की ओर भेजा। (उसने कहा,) "मैं तुम्हें साफ़-साफ़ चेतावनी देता हूँ
तफ़्सीर:
हमने नूह़ अलैहिस्सलाम को उनकी जाति की ओर रसूल बनाकर भेजा। तो उन्होंने उनसे कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! मैं तुम्हें अल्लाह के अज़ाब से डराने वाला हूँ तथा मुझे तुम्हारी ओर जो कुछ देकर भेजा गया है, उसे खोल-खोलकर बताने वाला हूँ।
आयत 26
أَن لَّا تَعْبُدُوٓا۟ إِلَّا ٱللَّهَ ۖ إِنِّىٓ أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ أَلِيمٍۢ
أَن
कि
لَّا
(do) not
تَعْبُدُوٓا۟
ना तुम इबादत करो
إِلَّا
मगर
ٱللَّهَ ۖ
अल्लाह की
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَخَافُ
मैं डरता हूँ
عَلَيْكُمْ
तुम पर
عَذَابَ
अज़ाब से
يَوْمٍ
(of) a Day
أَلِيمٍۢ
दर्दनाक दिन के
यह कि तुम अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करो। मुझे तुम्हारे विषय में एक दुखद दिन की यातना का भय है।"
तफ़्सीर:
और मैं तुम्हें अकेले अल्लाह की इबादत करने की ओर आमंत्रित करता हूँ। अतः तुम केवल उसी की इबादत करो। निःसंदेह मैं तुमपर एक दर्दनाक दिन की यातना से डरता हूँ।
आयत 27
فَقَالَ ٱلْمَلَأُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِن قَوْمِهِۦ مَا نَرَىٰكَ إِلَّا بَشَرًۭا مِّثْلَنَا وَمَا نَرَىٰكَ ٱتَّبَعَكَ إِلَّا ٱلَّذِينَ هُمْ أَرَاذِلُنَا بَادِىَ ٱلرَّأْىِ وَمَا نَرَىٰ لَكُمْ عَلَيْنَا مِن فَضْلٍۭ بَلْ نَظُنُّكُمْ كَـٰذِبِينَ
فَقَالَ
तो कहा
ٱلْمَلَأُ
सरदारों ने
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया था
مِن
from
قَوْمِهِۦ
उसकी क़ौम में से
مَا
नहीं
نَرَىٰكَ
हम देखते तुझे
إِلَّا
मगर
بَشَرًۭا
एक इन्सान
مِّثْلَنَا
अपने जैसा
وَمَا
और नहीं
نَرَىٰكَ
हम देखते तुझे
ٱتَّبَعَكَ
कि पैरवी की तेरी
إِلَّا
मगर
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जो
هُمْ
वो
أَرَاذِلُنَا
कमतर हैं हमसे
بَادِىَ
बज़ाहिर
ٱلرَّأْىِ
देखने में
وَمَا
और नहीं
نَرَىٰ
हम देखते
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
عَلَيْنَا
अपने ऊपर
مِن
any
فَضْلٍۭ
कोई फ़जीलत
بَلْ
बल्कि
نَظُنُّكُمْ
हम समझते हैं तुम्हें
كَـٰذِبِينَ
झूठे
इसपर उसकी क़ौम के सरदार, जिन्होंने इनकार किया था, कहने लगे, "हमारी दृष्टि में तो तुम हमारे ही जैसे आदमी हो और हम देखते है कि बस कुछ ऐसे लोग ही तुम्हारे अनुयायी है जो पहली स्पष्ट में हमारे यहाँ के नीच है। हम अपने मुक़ाबले में तुममें कोई बड़ाई नहीं देखते, बल्कि हम तो तुम्हें झूठा समझते है।"
तफ़्सीर:
उनकी क़ौम के कुफ़्र करने वाले गणमान्य और प्रमुख लोगों ने कहा : हमें तुम्हारा आमंत्रण स्वीकार नहीं है। क्योंकि तुम्हारे अंदर कोई ऐसी विशेषता नहीं है, जो हमारे पास न हो। चुनाँचे तुम भी हमारी तरह ही इनसान हो। तथा इसलिए कि हम देखते हैं कि तुम्हारा अनुसरण हमारे निचले स्तर के लोगों ने किया है, जैसा कि यह हमारी राय से हमें दिखाई दिया है। और इसलिए भी कि तुम्हारे पास कोई अतिरिक्त सम्मान, धन और प्रतिष्ठा नहीं है, जो तुम्हें इस योग्य बनाता हो कि हम तुम्हारा अनुसरण करें। बल्कि हम तो तुम्हें तुम्हारे दावे में झूठा समझते हैं।
आयत 28
قَالَ يَـٰقَوْمِ أَرَءَيْتُمْ إِن كُنتُ عَلَىٰ بَيِّنَةٍۢ مِّن رَّبِّى وَءَاتَىٰنِى رَحْمَةًۭ مِّنْ عِندِهِۦ فَعُمِّيَتْ عَلَيْكُمْ أَنُلْزِمُكُمُوهَا وَأَنتُمْ لَهَا كَـٰرِهُونَ
قَالَ
उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
أَرَءَيْتُمْ
क्या देखा तुमने
إِن
अगरचे
كُنتُ
हूँ मैं
عَلَىٰ
on
بَيِّنَةٍۢ
एक वाज़ेह दलील पर
مِّن
from
رَّبِّى
अपने रब की तरफ़ से
وَءَاتَىٰنِى
और उसने दी हो मुझे
رَحْمَةًۭ
रहमत
مِّنْ
from
عِندِهِۦ
अपने पास से
فَعُمِّيَتْ
फिर वो छुपा दी गई हो
عَلَيْكُمْ
तुम पर
أَنُلْزِمُكُمُوهَا
क्या हम लाज़िम कर दें उसे
وَأَنتُمْ
जबकि तुम
لَهَا
उसे
كَـٰرِهُونَ
नापसंद करने वाले हो
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम्हारा क्या विचार है? यदि मैं अपने रब के एक स्पष्ट प्रमाण पर हूँ और उसने मुझे अपने पास से दयालुता भी प्रदान की है, फिर वह तुम्हें न सूझे तो क्या हम हठात उसे तुमपर चिपका दें, जबकि वह तुम्हें अप्रिय है?
तफ़्सीर:
नूह अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा : ऐ मेरी जाती के लोगो! मुझे बताओ कि यदि मैं अपने पालनहार की ओर से एक प्रमाण पर हूँ, जो मेरे सच्चे नबी होने की गवाही देता हो और तुमपर मुझे सच्चा मानना (मुझ पर विश्वास करना) अनिवार्य करता हो, तथा उसने मुझे अपनी ओर से दया अर्थात नुबुव्वत एवं रिसालत प्रदान की हो, लेकिन उसके बारे में तुम्हारी अज्ञानता के कारण वह तुम्हें दिखाई न दी, तो क्या हम तुम्हें उसपर ईमान लाने के लिए विवश कर सकते हैं और ज़बरदस्ती उसे तुम्हारे ह्रदय में डाल सकते हैं?! हम ऐसा नहीं कर सकते। क्योंकि जो ईमान की तौफीक देता है, वह केवल अल्लाह है।
आयत 29
وَيَـٰقَوْمِ لَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مَالًا ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَى ٱللَّهِ ۚ وَمَآ أَنَا۠ بِطَارِدِ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ ۚ إِنَّهُم مُّلَـٰقُوا۟ رَبِّهِمْ وَلَـٰكِنِّىٓ أَرَىٰكُمْ قَوْمًۭا تَجْهَلُونَ
وَيَـٰقَوْمِ
और ऐ मेरी क़ौम
لَآ
not
أَسْـَٔلُكُمْ
नहीं मैं सवाल करता तुमसे
عَلَيْهِ
इस पर
مَالًا ۖ
किसी माल का
إِنْ
नहीं
أَجْرِىَ
अजर मेरा
إِلَّا
मगर
عَلَى
from
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह पर
وَمَآ
और नहीं
أَنَا۠
मैं
بِطَارِدِ
दूर करने वाला
ٱلَّذِينَ
उन्हें जो
ءَامَنُوٓا۟ ۚ
ईमान लाए
إِنَّهُم
बेशक वो
مُّلَـٰقُوا۟
मुलाक़ात करने वाले हैं
رَبِّهِمْ
अपने रब से
وَلَـٰكِنِّىٓ
और लेकिन मैं
أَرَىٰكُمْ
देखता हूँ तुम्हें
قَوْمًۭا
ऐसे लोग
تَجْهَلُونَ
कि तुम जहालत बरत रहे हो
और ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं इस काम पर कोई धन नहीं माँगता। मेरा पारिश्रमिक तो बस अल्लाह के ज़िम्मे है। मैं ईमान लानेवालो को दूर करनेवाला भी नहीं। उन्हें तो अपने रब से मिलना ही है, किन्तु मैं तुम्हें देख रहा हूँ कि तुम अज्ञानी लोग हो
तफ़्सीर:
ऐ मेरी जाति के लोगो! इस संदेश को पहुँचाने पर मैं तुमसे कोई धन नहीं चाहता, मेरा बदला तो केवल अल्लाह पर है। और मैं अपनी बैठक से ग़रीब मोमिनों को दूर नहीं कर सकता, जिन्हें निष्कासित करने की तुम माँग कर रहे हो। वे क़ियामत के दिन अपने पालनहार से मिलने वाले हैं और वह उन्हें उनके ईमान का बदला देने वाला है। लेकिन मैं देख रहा हूँ कि तुम इस दावत (इसलाम के संदेश) की वास्तविकता से अनभिज्ञ हो, तभी तो कमज़ोर मोमिनों को निष्कासित करने की माँग करते हो।
आयत 30
وَيَـٰقَوْمِ مَن يَنصُرُنِى مِنَ ٱللَّهِ إِن طَرَدتُّهُمْ ۚ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ
وَيَـٰقَوْمِ
और ऐ मेरी क़ौम
مَن
कौन
يَنصُرُنِى
मदद करेगा मेरी
مِنَ
against
ٱللَّهِ
अल्लाह से (बचाने में)
إِن
अगर
طَرَدتُّهُمْ ۚ
दूर कर दिया मैंने उन्हें
أَفَلَا
क्या भला नहीं
تَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ते
और ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यदि मैं उन्हें धुत्कार दूँ तो अल्लाह के मुक़ाबले में कौन मेरी सहायता कर सकता है? फिर क्या तुम होश से काम नहीं लेते?
तफ़्सीर:
ऐ मेरी जाति के लोगो! यदि मैं इन मोमिनों को किसी दोष के बिना नाहक़ निष्कासित कर दूँ, तो मुझसे अल्लाह की सज़ा को कौन हटाएगा? क्या तुम शिक्षा ग्रहण नहीं करते और वह कार्य करने का प्रयास नहीं करते, जो तुम्हारे लिए सबसे अच्छा और सबसे लाभदायक हो?
आज की ज़िंदगी में सबक़
नूह अलैहिस्सलाम की दावत और कौम के इनकार का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कमज़ोर तबके को नज़रअंदाज़ करना गलत है, हक की दावत सबके लिए बराबर है।
आयत 31
وَلَآ أَقُولُ لَكُمْ عِندِى خَزَآئِنُ ٱللَّهِ وَلَآ أَعْلَمُ ٱلْغَيْبَ وَلَآ أَقُولُ إِنِّى مَلَكٌۭ وَلَآ أَقُولُ لِلَّذِينَ تَزْدَرِىٓ أَعْيُنُكُمْ لَن يُؤْتِيَهُمُ ٱللَّهُ خَيْرًا ۖ ٱللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا فِىٓ أَنفُسِهِمْ ۖ إِنِّىٓ إِذًۭا لَّمِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَلَآ
और नहीं
أَقُولُ
मैं कहता
لَكُمْ
तुम्हें
عِندِى
मेरे पास
خَزَآئِنُ
ख़ज़ाने हैं
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَلَآ
और ना
أَعْلَمُ
मैं जानता हूँ
ٱلْغَيْبَ
ग़ैब को
وَلَآ
और ना
أَقُولُ
मैं कहता हूँ
إِنِّى
कि मैं
مَلَكٌۭ
कोई फ़रिश्ता हूँ
وَلَآ
और ना
أَقُولُ
मैं कहता हूँ
لِلَّذِينَ
उनके लिए जिन्हें
تَزْدَرِىٓ
हक़ीर समझती हैं
أَعْيُنُكُمْ
निगाहें तुम्हारी
لَن
कि हरगिज़ ना
يُؤْتِيَهُمُ
देगा उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
خَيْرًا ۖ
कोई भलाई
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَعْلَمُ
ख़ूब जानता है
بِمَا
उसे जो
فِىٓ
(is) in
أَنفُسِهِمْ ۖ
उनके नफ़्सों में है
إِنِّىٓ
बेशक मैं
إِذًۭا
तब
لَّمِنَ
(will be) surely of
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़रूर ज़ालिमों में से हूँगा
और मैं तुमसे यह नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़जाने है और न मुझे परोक्ष का ज्ञान है और न मैं यह कहता हूँ कि मैं कोई फ़रिश्ता हूँ और न उन लोगों के विषय में, जो तुम्हारी दृष्टि में तुच्छ है, मैं यह कहता हूँ कि अल्लाह उन्हें कोई भलाई न देगा। जो कुछ उनके जी में है, अल्लाह उसे भली-भाँति जानता है। (यदि मैं ऐसा कहूँ) तब तो मैं अवश्य ही ज़ालिमों में से हूँगा।"
तफ़्सीर:
ऐ मेरी जाति के लोगो! मैं तुमसे यह नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं, जिनमें उसकी आजीविका है और यदि तुम ईमान ग्रहण कर लिए, तो मैं उसे तुमपर खर्च करूंगा। तथा मैं तुमसे यह नहीं कहता हूँ कि मेरे पास ग़ैब (परोक्ष) का ज्ञान है और न मैं तुमसे यह कहता हूँ कि मैं फ़रिश्तों में से हूँ, बल्कि मैं भी तुम्हारी तरह एक इनसान हूँ। तथा मैं उन ग़रीबों के विषय में, जिन्हें तुम्हारी आँखें तुच्छ और हीन समझती हैं, यह नहीं कहता कि अल्लाह उन्हें हरगिज़ तौफीक और मार्गदर्शन नहीं प्रदान करेगा। अल्लाह उनके इरादों और स्थितियों को अधिक जानता है। यदि मैं ऐसा दावा करूँ, तो मैं उन अत्याचारियों में से हो जाऊँगा, जो अल्लाह की यातना के हक़दार हैं।
आयत 32
قَالُوا۟ يَـٰنُوحُ قَدْ جَـٰدَلْتَنَا فَأَكْثَرْتَ جِدَٰلَنَا فَأْتِنَا بِمَا تَعِدُنَآ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
يَـٰنُوحُ
ऐ नूह
قَدْ
तहक़ीक़
جَـٰدَلْتَنَا
झगड़ा किया तूने हमसे
فَأَكْثَرْتَ
फिर कसरत से किया तूने
جِدَٰلَنَا
झगड़ा हमसे
فَأْتِنَا
पस ले आ हमारे पास
بِمَا
वो जिसका
تَعِدُنَآ
तू वादा देता है हमें
إِن
अगर
كُنتَ
है तू
مِنَ
of
ٱلصَّـٰدِقِينَ
सच्चों में से
उन्होंने कहा, "ऐ नूह! तुम हमसे झगड़ चुके और बहुत झगड़ चुके। यदि तुम सच्चे हो तो जिसकी तुम हमें धमकी देते हो, अब उसे हम पर ले ही आओ।"
तफ़्सीर:
उन लोगों ने हठपूर्वक और घमंड करते हुए कहा : ऐ नूह! तुमने हमसे झगड़ा किया और बहस की और हमारा झगड़ा और बहस बहुत हो चुकी। अब ऐसा करो कि जिस यातना का हमसे वादा करते हो, उसे हम पर ले ही आओ, यदि तुम अपने दावे में सच्चे हो।
आयत 33
قَالَ إِنَّمَا يَأْتِيكُم بِهِ ٱللَّهُ إِن شَآءَ وَمَآ أَنتُم بِمُعْجِزِينَ
قَالَ
उसने कहा
إِنَّمَا
बेशक
يَأْتِيكُم
लाएगा तुम पर
بِهِ
उसको
ٱللَّهُ
अल्लाह
إِن
अगर
شَآءَ
वो चाहे
وَمَآ
और नहीं
أَنتُم
तुम
بِمُعْجِزِينَ
आजिज़ करने वाले
उसने कहा, "वह तो अल्लाह ही यदि चाहेगा तो तुमपर लाएगा और तुम क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते
तफ़्सीर:
नूह अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा : मैं अज़ाब लेकर नहीं आऊँगा। उसे तो तुम्हारे पास अल्लाह ही लाएगा, यदि वह चाहेगा। और यदि अल्लाह तुम्हें सज़ा देना चाहे, तो तुम उसके अज़ाब से बच नहीं सकते।
आयत 34
وَلَا يَنفَعُكُمْ نُصْحِىٓ إِنْ أَرَدتُّ أَنْ أَنصَحَ لَكُمْ إِن كَانَ ٱللَّهُ يُرِيدُ أَن يُغْوِيَكُمْ ۚ هُوَ رَبُّكُمْ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
وَلَا
और नहीं
يَنفَعُكُمْ
फ़ायदा देगी तुम्हें
نُصْحِىٓ
ख़ैरख़्वाही मेरी
إِنْ
अगर
أَرَدتُّ
मैं चाहूँ
أَنْ
कि
أَنصَحَ
मैं ख़ैरख़्वाही करूँ
لَكُمْ
तुम्हारी
إِن
अगर
كَانَ
है
ٱللَّهُ
अल्लाह
يُرِيدُ
चाहता
أَن
कि
يُغْوِيَكُمْ ۚ
वो भटका दे तुम्हें
هُوَ
वो
رَبُّكُمْ
रब है तुम्हारा
وَإِلَيْهِ
और तरफ़ उसी के
تُرْجَعُونَ
तुम लौटाए जाओगे
अब जबकि अल्लाह ही ने तुम्हें विनष्ट करने का निश्चय कर लिया हो, तो यदि मैं तुम्हारा भला भी चाहूँ, तो मेरा भला चाहना तुम्हें कुछ भी लाभ नहीं पहुँचा सकता। वही तुम्हारा रब है और उसी की ओर तुम्हें पलटना भी है।"
तफ़्सीर:
और मेरा तुम्हें नसीहत और उपदेश करना तुम्हें कोई लाभ नहीं देगा, यदि अल्लाह तुम्हें सीधे मार्ग से भटकाना चाहता हो और तुम्हारे हठ के कारण तुम्हें मार्गदर्शन से वंचित कर दे। वह तुम्हारा पालनहार है। अतः वही तुम्हारे मामले का मालिक है और यदि वह चाहे तो तुम्हें कुपथ कर दे। क़ियामत के दिन तुम अकेले उसी की ओर लौटकर जाओगे। फिर वह तुम्हें तुम्हारे कार्यों का बदला देगा।
आयत 35
أَمْ يَقُولُونَ ٱفْتَرَىٰهُ ۖ قُلْ إِنِ ٱفْتَرَيْتُهُۥ فَعَلَىَّ إِجْرَامِى وَأَنَا۠ بَرِىٓءٌۭ مِّمَّا تُجْرِمُونَ
أَمْ
क्या
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
ٱفْتَرَىٰهُ ۖ
उसने गढ़ लिया है उसे
قُلْ
कह दीजिए
إِنِ
अगर
ٱفْتَرَيْتُهُۥ
गढ़ा है मैंने उसे
فَعَلَىَّ
तो मुझ ही पर है
إِجْرَامِى
जुर्म करना मेरा
وَأَنَا۠
और मैं
بَرِىٓءٌۭ
बरी उज़ ज़िम्मा हूँ
مِّمَّا
उससे जो
تُجْرِمُونَ
तुम जुर्म करते हो
(क्या उन्हें कोई खटक है) या वे कहते है, "उसने स्वयं इसे घड़ लिया है?" कह दो, "यदि मैंने इसे घड़ लिया है तो मेरे अपराध का दायित्व मुझपर ही है। और जो अपराध तुम कर रहे हो मैं उसके दायित्व से मुक्त हूँ।"
तफ़्सीर:
नूह की जाति के लोगों के कुफ़्र का कारण यह है कि वे दावा करते हैं कि यह धर्म, जिसे नूह़ अलैहिस्लाम लेकर आए हैं, उसे उन्होंने अल्लाह पर गढ़ लिया है। आप (ऐ रसूल) उनसे कह दीजिए : यदि मैंने इसे गढ़ लिया है, तो मेरे गुनाह की सज़ा केवल मेरे ऊपर होगी। और मैं तुम्हारे झुठलाने के गुनाह में से कुछ भी नहीं उठाऊँगा। क्योंकि मैं उससे निर्दोष हूँ।
आयत 36
وَأُوحِىَ إِلَىٰ نُوحٍ أَنَّهُۥ لَن يُؤْمِنَ مِن قَوْمِكَ إِلَّا مَن قَدْ ءَامَنَ فَلَا تَبْتَئِسْ بِمَا كَانُوا۟ يَفْعَلُونَ
وَأُوحِىَ
और वही की गई
إِلَىٰ
to
نُوحٍ
तरफ़ नूह के
أَنَّهُۥ
कि बेशक वो
لَن
हरगिज़ ना
يُؤْمِنَ
ईमान लाएगा
مِن
from
قَوْمِكَ
तेरी क़ौम में से
إِلَّا
सिवाय
مَن
उसके जो
قَدْ
तहक़ीक़
ءَامَنَ
ईमान ला चुका
فَلَا
तो ना
تَبْتَئِسْ
तू ग़म कर
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
हैं वो
يَفْعَلُونَ
वो करते
नूह की ओर प्रकाशना की गई कि "जो लोग ईमान ला चुके है, उनके सिवा अब तुम्हारी क़ौम में कोई ईमान लानेवाला नहीं। अतः जो कुछ वे कर रहे है उसपर तुम दुखी न हो
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने नूह़ की ओर वह़्य की : (ऐ नूह!) तुम्हारी जाति में से जो लोग पहले ईमान ला चुके हैं, अब उनके सिवा और कोई ईमान नहीं लाएगा। अतः (ऐ नूह) तुम इस लंबी अवधि के दौरान उनके झुठलाने और मज़ाक उड़ाने के कारण दु:खी न हो।
आयत 37
وَٱصْنَعِ ٱلْفُلْكَ بِأَعْيُنِنَا وَوَحْيِنَا وَلَا تُخَـٰطِبْنِى فِى ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓا۟ ۚ إِنَّهُم مُّغْرَقُونَ
وَٱصْنَعِ
और तू बना
ٱلْفُلْكَ
कश्ती
بِأَعْيُنِنَا
हमारी निगाहों के सामने
وَوَحْيِنَا
और हमारी वही के मुताबिक़
وَلَا
और ना
تُخَـٰطِبْنِى
तू मुख़ातिब होना मुझसे
فِى
concerning
ٱلَّذِينَ
उनके बारे में जिन्होंने
ظَلَمُوٓا۟ ۚ
ज़ुल्म किया
إِنَّهُم
बेशक वो
مُّغْرَقُونَ
ग़र्क़ किए जाने वाले हैं
तुम हमारे समक्ष और हमारी प्रकाशना के अनुसार नाव बनाओ और अत्याचारियों के विषय में मुझसे बात न करो। निश्चय ही वे डूबकर रहेंगे।"
तफ़्सीर:
और तुम हमारी आँखों के सामने, हमारे संरक्षण में और नाव बनाने की विधि से संबंधित हमारी वह़्य का पालन करते हुए, एक नाव बनाओ। और तुम मुझसे कुफ्र करके अपने ऊपर अत्याचार करने वालों को मोहलत देने की बात मत करना। वे - अनिवार्य रूप से - बाढ़ के द्वारा डुबाए जाने वाले हैं। यह उनके कुफ्र पर अड़े रहने की सज़ा है।
आयत 38
وَيَصْنَعُ ٱلْفُلْكَ وَكُلَّمَا مَرَّ عَلَيْهِ مَلَأٌۭ مِّن قَوْمِهِۦ سَخِرُوا۟ مِنْهُ ۚ قَالَ إِن تَسْخَرُوا۟ مِنَّا فَإِنَّا نَسْخَرُ مِنكُمْ كَمَا تَسْخَرُونَ
وَيَصْنَعُ
और वो बना रहा था
ٱلْفُلْكَ
कश्ती
وَكُلَّمَا
और जब कभी
مَرَّ
गुज़रते
عَلَيْهِ
उस पर
مَلَأٌۭ
सरदार
مِّن
of
قَوْمِهِۦ
उसकी क़ौम में से
سَخِرُوا۟
वो मज़ाक़ करते
مِنْهُ ۚ
उससे
قَالَ
वो कहता
إِن
अगर
تَسْخَرُوا۟
तुम मज़ाक़ करते हो
مِنَّا
हम से
فَإِنَّا
तो बेशक हम भी
نَسْخَرُ
हम मज़ाक़ करेंगे
مِنكُمْ
तुमसे
كَمَا
जैसा कि
تَسْخَرُونَ
तुम मज़ाक़ करते हो
जब नाव बनाने लगता है। उसकी क़ौम के सरदार जब भी उसके पास से गुज़रते तो उसका उपहास करते। उसने कहा, "यदि तुम हमारा उपहास करते हो तो हम भी तुम्हारा उपहास करेंगे, जैसे तुम हमारा उपहास करते हो
तफ़्सीर:
नूह अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के आदेश का पालन किया और नाव बनाना आरंभ कर दिया। जब भी उनकी जाति के प्रमुख और सरदार लोग उनके पास से गुज़रते, तो वे इस कारण उन्हें नाव बनाते हुए देखकर मज़ाक उड़ाते कि उनकी भूमि में पानी या नदियाँ नहीं हैं। जब वे बार-बार उनका मज़ाक उड़ाने लगे तो नूह़ अलैहिस्सलाम ने कहा : (ऐ मेरी जाति के सरदारो) यदि तुम आज हमारे नाव बनाने का मज़ाक उड़ाते हो, तो हम भी इस बात पर तुम्हारा मज़ाक़ उड़ाते हैं कि तुम अपने अंजाम अर्थात डूबकर मरने से बेख़बर हो।
आयत 39
فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ مَن يَأْتِيهِ عَذَابٌۭ يُخْزِيهِ وَيَحِلُّ عَلَيْهِ عَذَابٌۭ مُّقِيمٌ
فَسَوْفَ
पस अनक़रीब
تَعْلَمُونَ
तुम जान लोगे
مَن
कौन है जो
يَأْتِيهِ
आएगा उसके पास
عَذَابٌۭ
अज़ाब
يُخْزِيهِ
जो रुस्वा कर देगा उसे
وَيَحِلُّ
और उतरेगा
عَلَيْهِ
उस पर
عَذَابٌۭ
अज़ाब
مُّقِيمٌ
दाइमी
अब शीघ्र ही तुम जान लोगे कि कौन है जिसपर ऐसी यातना आती है, जो उसे अपमानित कर देगी और जिसपर ऐसी स्थाई यातना टूट पड़ती है
तफ़्सीर:
तो तुम्हें शीघ्र ही मालूम हो जाएगा कि कौन है जिसपर इस दुनिया में वह यातना आती है जो उसे अपमानित और तिरस्कृत कर देती है तथा क़ियामत के दिन उसपर स्थायी यातना उतरेगी।
आयत 40
حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءَ أَمْرُنَا وَفَارَ ٱلتَّنُّورُ قُلْنَا ٱحْمِلْ فِيهَا مِن كُلٍّۢ زَوْجَيْنِ ٱثْنَيْنِ وَأَهْلَكَ إِلَّا مَن سَبَقَ عَلَيْهِ ٱلْقَوْلُ وَمَنْ ءَامَنَ ۚ وَمَآ ءَامَنَ مَعَهُۥٓ إِلَّا قَلِيلٌۭ
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
جَآءَ
आ गया
أَمْرُنَا
हुक्म हमारा
وَفَارَ
और जोश मारा
ٱلتَّنُّورُ
तन्नूर ने
قُلْنَا
कहा हमने
ٱحْمِلْ
सवार कर ले
فِيهَا
इसमें
مِن
of
كُلٍّۢ
हर (क़िस्म) से
زَوْجَيْنِ
जोड़े
ٱثْنَيْنِ
दो (नर,मादा)
وَأَهْلَكَ
और अपने घर वालों को
إِلَّا
सिवाय
مَن
उसके जो
سَبَقَ
गुज़र चुकी
عَلَيْهِ
उस पर
ٱلْقَوْلُ
बात
وَمَنْ
और उनको जो
ءَامَنَ ۚ
ईमान लाए
وَمَآ
और नहीं
ءَامَنَ
ईमान लाए
مَعَهُۥٓ
साथ उसके
إِلَّا
मगर
قَلِيلٌۭ
बहुत थोड़े
यहाँ तक कि जब हमारा आदेश आ गया और तंदूर उबल पड़ा तो हमने कहा, "हर जाति में से दो-दो के जोड़े चढ़ा लो और अपने घरवालों को भी - सिवाय ऐसे व्यक्ति के जिसके बारे में बात तय पा चुकी है - और जो ईमान लाया हो उसे भी।" किन्तु उसके साथ जो ईमान लाए थे वे थोड़े ही थे
तफ़्सीर:
नूह अलैहिस्सलाम ने उस नाव को बनाने का काम संपन्न कर लिया, जिसे अल्लाह ने उन्हें बनाने का आदेश दिया था, यहाँ तक कि जब उनकी क़ौम को विनष्ट करने का हमारा आदेश आ गया, और तूफ़ान (बाढ़) की शुरुआत की सूचना के तौर पर उस तन्नूर से पानी उबल पड़ा, जिसमें वे रोटियाँ पकाया करते थे, तो हमने नूह अलैहिस्सलाम से कहा : धरती पर पाए जाने वाले हर प्रकार के जीव का एक-एक जोड़ा; नर और मादा नाव में सवार कर लो। और अपने परिवार को भी उसमें चढ़ा लो, सिवाय उसके, जिसेके बारे में यह निर्णय हो चुका है कि वह डुबाया जाने वाला है, क्योंकि वह ईमान नहीं लाया। तथा अपनी जाति के हर उस व्यक्ति को सवार कर लो, जो तुम्हारे साथ ईमान लाया है। और उनकी जाति के बहुत कम ही लोग उनके साथ ईमान लाए थे। हालाँकि वह एक लंबी अवधि तक उनके बीच रहकर ईमान की ओर बुलाते रहे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती और बेटे के इनकार का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि खानदानी रिश्ता ईमान की गारंटी नहीं, हर इंसान अपने अमल का ज़िम्मेदार है।
आयत 41
۞ وَقَالَ ٱرْكَبُوا۟ فِيهَا بِسْمِ ٱللَّهِ مَجْر۪ىٰهَا وَمُرْسَىٰهَآ ۚ إِنَّ رَبِّى لَغَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
۞ وَقَالَ
और उसने कहा
ٱرْكَبُوا۟
सवार हो जाओ
فِيهَا
इसमें
بِسْمِ
साथ नाम
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مَجْر۪ىٰهَا
चलना है उसका
وَمُرْسَىٰهَآ ۚ
और ठहरना है उसका
إِنَّ
बेशक
رَبِّى
मेरा रब
لَغَفُورٌۭ
अलबत्ता बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
उसने कहा, "उसमें सवार हो जाओ। अल्लाह के नाम से इसका चलना भी है और इसका ठहरना भी। निस्संदेह मेरा रब अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है।"
तफ़्सीर:
और नूह ने अपनी जाति तथा अपने परिवार के ईमान लाने वाले लोगों को संबोधित करते हुए कहा : तुम लोग नाव में सवार हो जाओ। अल्लाह ही के नाम से इसका चलना और उसी के नाम से इसका ठहरना है। निःसंदेह मेरा पालनहार अपने तौबा करने वाले बंदों के गुनाहों को क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है। और मोमिनों पर उसकी दया ही का नतीजा है कि उसने उन्हें विनाश से बचा लिया।
आयत 42
وَهِىَ تَجْرِى بِهِمْ فِى مَوْجٍۢ كَٱلْجِبَالِ وَنَادَىٰ نُوحٌ ٱبْنَهُۥ وَكَانَ فِى مَعْزِلٍۢ يَـٰبُنَىَّ ٱرْكَب مَّعَنَا وَلَا تَكُن مَّعَ ٱلْكَـٰفِرِينَ
وَهِىَ
और वो
تَجْرِى
चल रही थी
بِهِمْ
साथ उनके
فِى
on
مَوْجٍۢ
मौज/लहर में
كَٱلْجِبَالِ
पहाड़ों जैसी
وَنَادَىٰ
और पुकारा
نُوحٌ
नूह ने
ٱبْنَهُۥ
अपने बेटे को
وَكَانَ
और था वो
فِى
[in]
مَعْزِلٍۢ
अलग जगह में
يَـٰبُنَىَّ
ऐ मेरे बेटे
ٱرْكَب
सवार हो जाओ
مَّعَنَا
साथ हमारे
وَلَا
और ना
تَكُن
तुम हो
مَّعَ
with
ٱلْكَـٰفِرِينَ
साथ काफ़िरों के
और वह (नाव) उन्हें लिए हुए पहाड़ों जैसी ऊँची लहर के बीच चल रही थी। नूह ने अपने बेटे को, जो उससे अलग था, पुकारा, "ऐ मेरे बेटे! हमारे साथ सवार हो जा। तू इनकार करनेवालों के साथ न रह।"
तफ़्सीर:
और नाव उसपर सवार लोगों तथा अन्य चीज़ों को लेकर पर्वतों जैसी ऊँची-ऊँची लहरों में चलने लगी। नूह अलैहिस्सलाम ने पितृत्व की भावना से अपने काफ़िर पुत्र को पुकारा, जबकि वह अपने पिता तथा अपने समुदाय से अलग-थलग था : ऐ बेटे! हमारे संग नाव में सवार हो जा, ताकि तू डूबने से बच जाए और काफिरों के साथ न रह, कहीं तू भी उनके साथ डूबकर न मर जाए।
आयत 43
قَالَ سَـَٔاوِىٓ إِلَىٰ جَبَلٍۢ يَعْصِمُنِى مِنَ ٱلْمَآءِ ۚ قَالَ لَا عَاصِمَ ٱلْيَوْمَ مِنْ أَمْرِ ٱللَّهِ إِلَّا مَن رَّحِمَ ۚ وَحَالَ بَيْنَهُمَا ٱلْمَوْجُ فَكَانَ مِنَ ٱلْمُغْرَقِينَ
قَالَ
वो बोला
سَـَٔاوِىٓ
अनक़रीब मैं पनाह ले लूँगा
إِلَىٰ
to
جَبَلٍۢ
तरफ़ एक पहाड़ के
يَعْصِمُنِى
वो बचा लेगा मुझे
مِنَ
from
ٱلْمَآءِ ۚ
पानी से
قَالَ
कहा
لَا
(There is) no
عَاصِمَ
नहीं कोई बचाने वाला
ٱلْيَوْمَ
आज के दिन
مِنْ
from
أَمْرِ
हुक्म से
ٱللَّهِ
अल्लाह के
إِلَّا
मगर
مَن
जिस पर
رَّحِمَ ۚ
वो रहम करे
وَحَالَ
और हाइल हो गई
بَيْنَهُمَا
दर्मियान उन दोनों के
ٱلْمَوْجُ
एक मौज
فَكَانَ
तो हो गया वो
مِنَ
among
ٱلْمُغْرَقِينَ
ग़र्क़ होने वालों में से
उसने कहा, "मैं किसी पहाड़ से जा लगूँगा, जो मुझे पानी से बचा लेगा।" कहा, "आज अल्लाह के आदेश (फ़ैसले) से कोई बचानेवाला नहीं है सिवाय उसके जिसपर वह दया करे।" इतने में दोनों के बीच लहर आ पड़ी और डूबनेवालों के साथ वह भी डूब गया
तफ़्सीर:
नूह अलैहिस्सलाम के पुत्र ने उनसे कहा : मैं किसी ऊँचे पर्वत की शरण ले लूँगा, ताकि मुझ तक पानी न पहुँच सके। नूह ने अपने बेटे से कहा : आज तूफ़ान (बाढ़) में डूबकर हलाक होने के अल्लाह के अज़ाब से बचाने वाला कोई नहीं, सिवाय इसके कि परम दयालु अल्लाह जिसे चाहे अपनी दया का पात्र बना ले, तो वह उसे डूबने से बचा लेगा। फिर लहर ने नूह और उनके काफ़िर बेटे को एक-दूसरे से अलग कर दिया। चुनाँचे उनका बेटा अपने कुफ़्र के कारण तूफ़ान (बाढ़) में डुबा दिए गए लोगों में से हो गया।
आयत 44
وَقِيلَ يَـٰٓأَرْضُ ٱبْلَعِى مَآءَكِ وَيَـٰسَمَآءُ أَقْلِعِى وَغِيضَ ٱلْمَآءُ وَقُضِىَ ٱلْأَمْرُ وَٱسْتَوَتْ عَلَى ٱلْجُودِىِّ ۖ وَقِيلَ بُعْدًۭا لِّلْقَوْمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَقِيلَ
और कह दिया गया
يَـٰٓأَرْضُ
ऐ ज़मीन
ٱبْلَعِى
निगल जा
مَآءَكِ
पानी अपना
وَيَـٰسَمَآءُ
और ऐ आसमान
أَقْلِعِى
थम जा
وَغِيضَ
और ख़ुश्क कर दिया गया
ٱلْمَآءُ
पानी
وَقُضِىَ
और फ़ैसला कर दिया गया
ٱلْأَمْرُ
मामले का
وَٱسْتَوَتْ
और जा ठहरी (कश्ती)
عَلَى
on
ٱلْجُودِىِّ ۖ
जूदी पर
وَقِيلَ
और कह दिया गया
بُعْدًۭا
दूरी है
لِّلْقَوْمِ
उन लोगों के लिए
ٱلظَّـٰلِمِينَ
जो ज़ालिम हैं
और कहा गया, "ऐ धरती! अपना पानी निगल जा और ऐ आकाश! तू थम जा।" अतएव पानी तह में बैठ गया और फ़ैसला चुका दिया गया और वह (नाव) जूदी पर्वत पर टिक गई औऱ कह दिया गया, "फिटकार हो अत्याचारी लोगों पर!"
तफ़्सीर:
जब तूफ़ान थम गया, तो अल्लाह ने धरती से कहा : ऐ धरती! तेरे ऊपर जो बाढ़ का पानी है, उसे पी जा। और आकाश से कहा : ऐ आकाश! तू थम जा और पानी मत बरसा। चुनाँचे पानी कम हो गया, यहाँ तक कि धरती सूख गई। अल्लाह ने काफिरों को विनष्ट कर दिया। नाव जूदी पर्वत पर ठहर गई और कहा गया : उन लोगों के लिए दूरी और विनाश है, जो कुफ्र के द्वारा अल्लाह की सीमाओं को लाँघते हैं।
आयत 45
وَنَادَىٰ نُوحٌۭ رَّبَّهُۥ فَقَالَ رَبِّ إِنَّ ٱبْنِى مِنْ أَهْلِى وَإِنَّ وَعْدَكَ ٱلْحَقُّ وَأَنتَ أَحْكَمُ ٱلْحَـٰكِمِينَ
وَنَادَىٰ
और पुकारा
نُوحٌۭ
नूह ने
رَّبَّهُۥ
अपने रब को
فَقَالَ
तो कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
إِنَّ
बेशक
ٱبْنِى
मेरा बेटा
مِنْ
(is) of
أَهْلِى
मेरे घर वालों मे से है
وَإِنَّ
और बेशक
وَعْدَكَ
वादा तेरा
ٱلْحَقُّ
सच्चा है
وَأَنتَ
और तू
أَحْكَمُ
बेहतर हाकिम है
ٱلْحَـٰكِمِينَ
सब हाकिमों से
नूह ने अपने रब को पुकारा और कहा, "मेरे रब! मेरा बेटा मेरे घरवालों में से है और निस्संदेह तेरा वादा सच्चा है और तू सबसे बड़ा हाकिम भी है।"
तफ़्सीर:
नूह अलैहिस्सलाम ने अपने पालनहार को मदद के लिए पुकारते हुए कहा : ऐ मेरे पालनहार! मेरा बेटा मेरे परिवार में से है जिसे बचाने का तूने मुझसे वादा किया है। और निःसंदेह तेरा वादा वह सत्य है, जो कभी भंग नहीं हो सकता। और तू सबसे अधिक न्याय करने वाला और सबसे अधिक जानने वाला शासक है।
आयत 46
قَالَ يَـٰنُوحُ إِنَّهُۥ لَيْسَ مِنْ أَهْلِكَ ۖ إِنَّهُۥ عَمَلٌ غَيْرُ صَـٰلِحٍۢ ۖ فَلَا تَسْـَٔلْنِ مَا لَيْسَ لَكَ بِهِۦ عِلْمٌ ۖ إِنِّىٓ أَعِظُكَ أَن تَكُونَ مِنَ ٱلْجَـٰهِلِينَ
قَالَ
फ़रमाया
يَـٰنُوحُ
ऐ नूह
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَيْسَ
नहीं है
مِنْ
of
أَهْلِكَ ۖ
तेरे घर वालों में से
إِنَّهُۥ
बेशक वो
عَمَلٌ
एक अमल है
غَيْرُ
ग़ैर
صَـٰلِحٍۢ ۖ
सालेह
فَلَا
तो ना
تَسْـَٔلْنِ
तू सवाल कर मुझसे
مَا
उसका जो
لَيْسَ
नहीं
لَكَ
तुझे
بِهِۦ
जिसका
عِلْمٌ ۖ
कोई इल्म
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَعِظُكَ
मैं नसीहत करता हूँ तुझे
أَن
कि
تَكُونَ
(ना) तू हो जा
مِنَ
among
ٱلْجَـٰهِلِينَ
जाहिलों में से
कहा, "ऐ नूह! वह तेरे घरवालों में से नहीं, वह तो सर्वथा एक बिगड़ा काम है। अतः जिसका तुझे ज्ञान नहीं, उसके विषय में मुझसे न पूछ, तेरे नादान हो जाने की आशंका से मैं तुझे नसीहत करता हूँ।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने नूह से कहा : ऐ नूह़! तेरा वह बेटा जिसे बचाने के लिए तूने मुझसे प्रश्न किया है, वह तेरे परिवार में से नहीं है, जिसे मैंने बचाने का वादा किया है। क्योंकि वह एक काफिर है। ऐ नूह! तेरा यह प्रश्न तेरी ओर से एक अनुचित काम है और यह तेरी जैसी स्थिति वाले लोगों के लिए उपयुक्त नहीं है। अतः तू मुझसे ऐसी चीज़ का प्रश्न न कर, जिसका तुझे कोई ज्ञान नहीं है। मैं तुझे चेतावनी देता हूँ कि कहीं तू अज्ञानियों में से न हो जाए और मुझसे ऐसी चीज़ का प्रश्न करे, जो मेरे ज्ञान और मेरी हिकमत के विपरीत है।
आयत 47
قَالَ رَبِّ إِنِّىٓ أَعُوذُ بِكَ أَنْ أَسْـَٔلَكَ مَا لَيْسَ لِى بِهِۦ عِلْمٌۭ ۖ وَإِلَّا تَغْفِرْ لِى وَتَرْحَمْنِىٓ أَكُن مِّنَ ٱلْخَـٰسِرِينَ
قَالَ
उसने कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَعُوذُ
seek refuge
بِكَ
मैं पनाह लेता हूँ तेरी
أَنْ
कि
أَسْـَٔلَكَ
मैं सवाल करूँ तुझसे
مَا
उसका जो
لَيْسَ
नहीं
لِى
मुझे
بِهِۦ
उसका
عِلْمٌۭ ۖ
कोई इल्म
وَإِلَّا
और अगर ना
تَغْفِرْ
You forgive
لِى
तूने बख़्शा मुझे
وَتَرْحَمْنِىٓ
और (ना) तूने रहम किया मुझ पर
أَكُن
मैं हो जाऊँगा
مِّنَ
among
ٱلْخَـٰسِرِينَ
ख़सारा पाने वालों में से
उसने कहा, "मेरे रब! मैं इससे तेरी पनाह माँगता हूँ कि तुझसे उस चीज़ का सवाल करूँ जिसका मुझे कोई ज्ञान न हो। अब यदि तूने मुझे क्षमा न किया और मुझपर दया न की, तो मैं घाटे में पड़कर रहूँगा।"
तफ़्सीर:
नूह अलैहिस्सलाम ने कहा: ऐ मेरे पालनहार! मैं तेरी शरण चाहता हूँ इस बात से कि मैं तुझसे किसी ऐसी चीज़ का प्रश्न कर बैठूँ, जिसका मुझे कोई ज्ञान न हो। यदि तूने मेरा पाप क्षमा नहीं किया और मुझपर दया नहीं की, तो मैं उन क्षतिग्रस्त लोगों में से हो जाऊँगा, जिन्होंने आख़िरत में अपना भाग खो दिया।
आयत 48
قِيلَ يَـٰنُوحُ ٱهْبِطْ بِسَلَـٰمٍۢ مِّنَّا وَبَرَكَـٰتٍ عَلَيْكَ وَعَلَىٰٓ أُمَمٍۢ مِّمَّن مَّعَكَ ۚ وَأُمَمٌۭ سَنُمَتِّعُهُمْ ثُمَّ يَمَسُّهُم مِّنَّا عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
قِيلَ
कहा गया
يَـٰنُوحُ
ऐ नूह
ٱهْبِطْ
उतर जा
بِسَلَـٰمٍۢ
साथ सलामती के
مِّنَّا
हमारी तरफ़ से
وَبَرَكَـٰتٍ
और बरकतों के
عَلَيْكَ
तुझ पर
وَعَلَىٰٓ
and on
أُمَمٍۢ
और जमाअतों पर
مِّمَّن
उनमें से जो
مَّعَكَ ۚ
साथ हैं तेरे
وَأُمَمٌۭ
और कई जमाअतें
سَنُمَتِّعُهُمْ
अनक़रीब हम फ़ायदा देंगे उन्हें
ثُمَّ
फिर
يَمَسُّهُم
पहुँचेगा उन्हें
مِّنَّا
हमारी तरफ़ से
عَذَابٌ
अज़ाब
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
कहा गया, "ऐ नूह! हमारी ओर से सलामती और उन बरकतों के साथ उतर, जो तुझपर और उन गिरोहों पर होगी, जो तेरे साथवालों में से होंगे। कुछ गिरोह ऐसे भी होंगे जिन्हें हम थोड़े दिनों का सुखोपभोग कराएँगे। फिर उन्हें हमारी ओर से दुखद यातना आ पहुँचेगी।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने नूह अलैहिस्सलाम से फ़रमाया : ऐ नूह! अब सुरक्षा और शांति के साथ तथा अल्लाह की ओर से ढेर सारी नेमतों के साथ नाव से धरती पर उतर जाओ, जो कि तुम पर और तुम्हारे साथ नाव में सवार मोमिनों के वंशजों पर हैं, जो तुम्हारे बाद आएँगे। जबकि उनके वंशजों से कुछ अन्य काफ़िर समूह भी होंगे, जिन्हें हम इस सांसारिक जीवन में लाभ देंगे और उन्हें जीवन-यापन की सामग्री प्रदान करेंगे। फिर आख़िरत में उन्हें हमारी ओर से दर्दनाक यातना का सामना होगा।
आयत 49
تِلْكَ مِنْ أَنۢبَآءِ ٱلْغَيْبِ نُوحِيهَآ إِلَيْكَ ۖ مَا كُنتَ تَعْلَمُهَآ أَنتَ وَلَا قَوْمُكَ مِن قَبْلِ هَـٰذَا ۖ فَٱصْبِرْ ۖ إِنَّ ٱلْعَـٰقِبَةَ لِلْمُتَّقِينَ
تِلْكَ
ये
مِنْ
(is) from
أَنۢبَآءِ
ख़बरों में से है
ٱلْغَيْبِ
ग़ैब की
نُوحِيهَآ
हम वही कर रहे हैं उन्हें
إِلَيْكَ ۖ
तरफ़ आपके
مَا
ना
كُنتَ
थे आप
تَعْلَمُهَآ
आप जानते उन्हें
أَنتَ
आप
وَلَا
और ना ही
قَوْمُكَ
क़ौम आपकी
مِن
from
قَبْلِ
before
هَـٰذَا ۖ
इससे पहले
فَٱصْبِرْ ۖ
पस सब्र कीजिए
إِنَّ
बेशक
ٱلْعَـٰقِبَةَ
अन्जाम
لِلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के लिए है
ये परोक्ष की ख़बरें हैं जिनकी हम तुम्हारी ओर प्रकाशना कर रहे है। इससे पहले तो न तुम्हें इनकी ख़बर थी और न तुम्हारी क़ौम को। अतः धैर्य से काम लो। निस्संदेह अन्तिम परिणाम डर रखनेवालो के पक्ष में है
तफ़्सीर:
नूह अलैहिस्सलाम की यह कहानी ग़ैब की सूचनाओं में से है। हमारी इस वह़्य से पहले जो हमने आपकी ओर की है, (ऐ रसूल!) न आप इसे जानते थे और न ही आपकी जाति के लोग इसे जानते थे। अतः आप अपनी क़ौम की ओर से मिलने वाले कष्ट और उनके झुठलाने पर उसी प्रकार सब्र करें, जैसे नूह अलैहिस्लाम ने सब्र किया। निःसंदेह विजय एवं सफलता उन्हीं लोगों के लिए है, जो अल्लाह के आदेशों का पालन करते और उसकी मना की हुई चीज़ों से बचते हैं।
आयत 50
وَإِلَىٰ عَادٍ أَخَاهُمْ هُودًۭا ۚ قَالَ يَـٰقَوْمِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَـٰهٍ غَيْرُهُۥٓ ۖ إِنْ أَنتُمْ إِلَّا مُفْتَرُونَ
وَإِلَىٰ
और तरफ़
عَادٍ
आद के
أَخَاهُمْ
उनके भाई
هُودًۭا ۚ
हूद को (भेजा)
قَالَ
उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
ٱعْبُدُوا۟
इबादत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
مَا
नहीं
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنْ
any
إِلَـٰهٍ
कोई इलाह (बरहक़)
غَيْرُهُۥٓ ۖ
उसके सिवा
إِنْ
नहीं
أَنتُمْ
तुम
إِلَّا
मगर
مُفْتَرُونَ
झूठ गढ़ने वाले
और 'आद' की ओर उनके भाई 'हूद' को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य प्रभु नहीं। तुमने तो बस झूठ घड़ रखा हैं
तफ़्सीर:
और हमने आद की ओर उनके भाई हूद अलैहिस्सलाम को भेजा। उन्होंने उनसे कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! अकेले अल्लाह की इबादत करो और उसके साथ किसी अन्य को साझी मत बनाओ। उसके सिवा तुम्हारा कोई सत्य पूज्य नहीं है। और तुम लोग अपने इस दावे में झूठे हो कि उसका कोई साझी है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
तूफान और कश्ती के ठहराव का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि मुश्किल वक्त में अल्लाह पर भरोसा रखने वाले आखिरकार सलामती पाते हैं।
आयत 51
يَـٰقَوْمِ لَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَى ٱلَّذِى فَطَرَنِىٓ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
لَآ
नहीं
أَسْـَٔلُكُمْ
मैं सवाल करता तुमसे
عَلَيْهِ
इस पर
أَجْرًا ۖ
किसी अजर का
إِنْ
नहीं
أَجْرِىَ
अजर मेरा
إِلَّا
मगर
عَلَى
उस पर
ٱلَّذِى
जिसने
فَطَرَنِىٓ ۚ
पैदा किया मुझे
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल से काम लेते
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मैं इसपर तुमसे कोई पारिश्रमिक नहीं माँगता। मेरा पारिश्रमिक तो बस उसके ज़िम्मे है जिसने मुझे पैदा किया। फिर क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?
तफ़्सीर:
ऐ मेरी जाति के लोगो! मैं अपने पालनहार की ओर से तुम्हें उपदेश देने और उसकी ओर तुम्हें आमंत्रित करने का कोई मुआवज़ा नहीं माँगता। मेरा बदला केवल उस अल्लाह पर है, जिसने मुझे पैदा किया है। तो क्या तुम यह नहीं समझते और मेरे आह्वान को स्वीकार नहीं करते?
आयत 52
وَيَـٰقَوْمِ ٱسْتَغْفِرُوا۟ رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُوٓا۟ إِلَيْهِ يُرْسِلِ ٱلسَّمَآءَ عَلَيْكُم مِّدْرَارًۭا وَيَزِدْكُمْ قُوَّةً إِلَىٰ قُوَّتِكُمْ وَلَا تَتَوَلَّوْا۟ مُجْرِمِينَ
وَيَـٰقَوْمِ
और ऐ मेरी क़ौम
ٱسْتَغْفِرُوا۟
बख़्शिश माँगो
رَبَّكُمْ
अपने रब से
ثُمَّ
फिर
تُوبُوٓا۟
तौबा करो
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
يُرْسِلِ
वो भेजेगा
ٱلسَّمَآءَ
आसमान को
عَلَيْكُم
तुम पर
مِّدْرَارًۭا
बहुत बरसने वाला
وَيَزِدْكُمْ
और वो ज़्यादा देगा तुम्हें
قُوَّةً
क़ुव्वत
إِلَىٰ
तरफ़
قُوَّتِكُمْ
तुम्हारी क़ुव्वत के
وَلَا
और ना
تَتَوَلَّوْا۟
तुम मुँह फेरो
مُجْرِمِينَ
मुजरिम बनकर
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अपने रब से क्षमा याचना करो, फिर उसकी ओर पलट आओ। वह तुमपर आकाश को ख़ूब बरसता छोड़ेगा और तुममें शक्ति पर शक्ति की अभिवृद्धि करेगा। तुम अपराधी बनकर मुँह न फेरो।"
तफ़्सीर:
और ऐ मेरी जाति के लोगो! अल्लाह से क्षमा माँगो, फिर अपने गुनाहों से - जिनमें से सबसे बड़ा शिर्क है - उसके समक्ष तौबा करो। वह उसके फलस्वरूप तुमपर बहुत बारिश बरसाएगा और तुम्हारे संतान और धन में वृद्धि करके तुम्हें अधिक शक्ति एवं सम्मान प्रदान करेगा। और मैं तुम्हें जिसकी ओर आमंत्रित कर रहा हूँ, उससे मुँह मत फेरो। अन्यथा तुम मेरे आह्वान से मुँह फेरने, अल्लाह के साथ कुफ्र करने और मेरी लाई हुई बात को झुठलाने के कारण, अपराधियों में से हो जाओगे।
आयत 53
قَالُوا۟ يَـٰهُودُ مَا جِئْتَنَا بِبَيِّنَةٍۢ وَمَا نَحْنُ بِتَارِكِىٓ ءَالِهَتِنَا عَن قَوْلِكَ وَمَا نَحْنُ لَكَ بِمُؤْمِنِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
يَـٰهُودُ
ऐ हूद
مَا
नहीं
جِئْتَنَا
लाया तू हमारे पास
بِبَيِّنَةٍۢ
कोई वाज़ेह दलील
وَمَا
और नहीं हैं
نَحْنُ
हम
بِتَارِكِىٓ
छोड़ने वाले
ءَالِهَتِنَا
अपने इलाहों को
عَن
on
قَوْلِكَ
तेरी बात से
وَمَا
और नहीं हैं
نَحْنُ
हम
لَكَ
तुझ पर
بِمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
उन्होंने कहा, "ऐ हूद! तू हमारे पास कोई स्पष्ट प्रमाण लेकर नहीं आया है। तेरे कहने से हम अपने इष्ट -पूज्यों को नहीं छोड़ सकते और न हम तुझपर ईमान लानेवाले है
तफ़्सीर:
उनकी जाति के लोगों ने कहा : ऐ हूद! तुम हमारे पास कोई ऐसा स्पष्ट प्रमाण लेकर नहीं आए, जो हमें तुमपर ईमान लाने के लिए आमादा करे। और हम तुम्हारी बिना तर्क की बात पर अपने देवी-देवताओं की पूजा छोड़ने वाले नहीं हैं। तथा तुम जो अपने रसूल होने का दावा करते हो, उसमें हम तुमपर विश्वास नहीं कर रहे हैं।
आयत 54
إِن نَّقُولُ إِلَّا ٱعْتَرَىٰكَ بَعْضُ ءَالِهَتِنَا بِسُوٓءٍۢ ۗ قَالَ إِنِّىٓ أُشْهِدُ ٱللَّهَ وَٱشْهَدُوٓا۟ أَنِّى بَرِىٓءٌۭ مِّمَّا تُشْرِكُونَ
إِن
नहीं
نَّقُولُ
हम कहते
إِلَّا
मगर
ٱعْتَرَىٰكَ
(ये कि) मुब्तिला कर दिया है तुम्हें
بَعْضُ
बाज़
ءَالِهَتِنَا
हमारे इलाहों ने
بِسُوٓءٍۢ ۗ
साथ किसी तकलीफ़ के
قَالَ
उसने कहा
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أُشْهِدُ
मैं गवाह बनाता हूँ
ٱللَّهَ
अल्लाह को
وَٱشْهَدُوٓا۟
और तुम गवाह रहो
أَنِّى
बेशक मैं
بَرِىٓءٌۭ
बरी उज़ ज़िम्मा हूँ
مِّمَّا
उनसे जिन्हें
تُشْرِكُونَ
तुम शरीक करते हो
हम तो केवल यही कहते है कि हमारे इष्ट-पूज्यों में से किसी की तुझपर मार पड़ गई है।" उसने कहा, "मैं तो अल्लाह को गवाह बनाता हूँ और तुम भी गवाह रहो कि उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं,
तफ़्सीर:
हम तो यही कहेंगे कि चूँकि तुम हमें अपने देवी-देवताओं की पूजा से रोकते थे, इसलिए हमारे किसी देवता ने तुम्हें पागल कर दिया है! हूद ने कहा : मैं अल्लाह को गवाह बनाता हूँ और तुम भी गवाह रहो कि मैं तुम्हारे उन देवी-देवताओं की पूजा से बरी हूँ, जिनकी तुम अल्लाह के सिवा पूजा करते हो। अतः तुम और तुम्हारे वे पूज्य जिनके बारे में तुम्हारा दावा है कि उन्होंने मुझे पागल कर दिया है, सब मिलकर मेरे विरुद्ध चाल चलो और मुझे कोई मोहलत न दो।
आयत 55
مِن دُونِهِۦ ۖ فَكِيدُونِى جَمِيعًۭا ثُمَّ لَا تُنظِرُونِ
مِن
Other than Him
دُونِهِۦ ۖ
उसके सिवा
فَكِيدُونِى
पस चाल चलो मेरे ख़िलाफ़
جَمِيعًۭا
सबके सब
ثُمَّ
फिर
لَا
(do) not
تُنظِرُونِ
ना तुम मोहलत दो मुझे
जिनको तुम साझी ठहराकर उसके सिवा पूज्य मानते हो। अतः तुम सब मिलकर मेरे साथ दाँव-घात लगाकर देखो और मुझे मुहलत न दो
तफ़्सीर:
हम तो यही कहेंगे कि चूँकि तुम हमें अपने देवी-देवताओं की पूजा से रोकते थे, इसलिए हमारे किसी देवता ने तुम्हें पागल कर दिया है! हूद ने कहा : मैं अल्लाह को गवाह बनाता हूँ और तुम भी गवाह रहो कि मैं तुम्हारे उन देवी-देवताओं की पूजा से बरी हूँ, जिनकी तुम अल्लाह के सिवा पूजा करते हो। अतः तुम और तुम्हारे वे पूज्य जिनके बारे में तुम्हारा दावा है कि उन्होंने मुझे पागल कर दिया है, सब मिलकर मेरे विरुद्ध चाल चलो और मुझे कोई मोहलत न दो।
आयत 56
إِنِّى تَوَكَّلْتُ عَلَى ٱللَّهِ رَبِّى وَرَبِّكُم ۚ مَّا مِن دَآبَّةٍ إِلَّا هُوَ ءَاخِذٌۢ بِنَاصِيَتِهَآ ۚ إِنَّ رَبِّى عَلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ
إِنِّى
बेशक मैं
تَوَكَّلْتُ
तवक्कल किया मैंने
عَلَى
upon
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
رَبِّى
जो रब है मेरा
وَرَبِّكُم ۚ
और रब है तुम्हारा
مَّا
नहीं
مِن
of a moving creature
دَآبَّةٍ
कोई जानदार
إِلَّا
मगर
هُوَ
वो
ءَاخِذٌۢ
पकड़ने वाला है
بِنَاصِيَتِهَآ ۚ
पेशानी उसकी
إِنَّ
बेशक
رَبِّى
रब मेरा
عَلَىٰ
(is) on
صِرَٰطٍۢ
ऊपर रास्ते
مُّسْتَقِيمٍۢ
सीधे के है
मेरा भरोसा तो अल्लाह, अपने रब और तुम्हारे रब, पर है। चलने-फिरनेवाला जो प्राणी भी है, उसकी चोटी तो उसी के हाथ में है। निस्संदेह मेरा रब सीधे मार्ग पर है
तफ़्सीर:
मैंने अकेले अल्लाह पर भरोसा किया तथा अपने मामले में उसी का सहारा लिया है। क्योंकि वही मेरा और तुम्हारा पालनहार है। धरती पर जो भी जीव चलता है, वह अल्लाह के अधीन उसकी संप्रभुता और अधिकार के मातहत है। वह उसे जैसे चाहता है, फेरता है। निःसंदेह मेरा पालनहार सत्य और न्याय पर है। इसलिए वह कदापि तुम्हें मेरे ऊपर सशक्त नहीं करेगा। क्योंकि मैं सत्य पर हूँ और तुम झूठ पर हो।
आयत 57
فَإِن تَوَلَّوْا۟ فَقَدْ أَبْلَغْتُكُم مَّآ أُرْسِلْتُ بِهِۦٓ إِلَيْكُمْ ۚ وَيَسْتَخْلِفُ رَبِّى قَوْمًا غَيْرَكُمْ وَلَا تَضُرُّونَهُۥ شَيْـًٔا ۚ إِنَّ رَبِّى عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ حَفِيظٌۭ
فَإِن
फिर अगर
تَوَلَّوْا۟
तुम मुँह फेरते हो
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
أَبْلَغْتُكُم
पहुँचा दिया मैंने तुम्हें
مَّآ
वो जो
أُرْسِلْتُ
मैं भेजा गया हूँ
بِهِۦٓ
साथ उसके
إِلَيْكُمْ ۚ
तरफ़ तुम्हारे
وَيَسْتَخْلِفُ
और जानशीन बनाएगा
رَبِّى
रब मेरा
قَوْمًا
एक क़ौम को
غَيْرَكُمْ
तुम्हारे अलावा
وَلَا
और नहीं
تَضُرُّونَهُۥ
तुम नुक़सान दे सकोगे उसे
شَيْـًٔا ۚ
कुछ भी
إِنَّ
बेशक
رَبِّى
रब मेरा
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ के
حَفِيظٌۭ
ख़ूब निगरान है
किन्तु यदि तुम मुँह मोड़ते हो तो जो कुछ देकर मुझे तुम्हारी ओर भेजा गया था, वह तो मैं तुम्हें पहुँचा ही चुका। मेरा रब तुम्हारे स्थान पर दूसरी किसी क़ौम को लाएगा और तुम उसका कुछ न बिगाड़ सकोगे। निस्संदेह मेरा रब हर चीज़ की देख-भाल कर रहा है।"
तफ़्सीर:
यदि तुमने मेरे लाए हुए संदेश से उपेक्षा किया और उससे पीछे हट गए, तो मेरा काम केवल तुम्हें संदेश पहुँचा देना है। और वास्तव में, मैंने वह सब कुछ तुम्हें पहुँचा दिया है, जिसके साथ अल्लाह ने मुझे भेजा था और मुझे उसके पहुँचाने का आदेश दिया था। अब तुमपर तर्क स्थापित हो चुका है। शीघ्र ही मेरा पालनहार तुम्हें विनष्ट कर देगा और तुम्हारे अलावा दूसरी जाति को लाएगा, जो तुम्हारे उत्तराधिकारी होंगे। तुम अपने झुठलाने और मुँह मोड़ने से अल्लाह को कोई छोटा या बड़ा नुक़सान नहीं पहुँचा सकते। क्योंकि वह अपने बंदों से बेनियाज़ है। निःसंदेह, मेरा पालनहार प्रत्येक वस्तु पर संरक्षक है। इसलिए वही तुम्हारी बुरी चाल से मेरी रक्षा करता है।
आयत 58
وَلَمَّا جَآءَ أَمْرُنَا نَجَّيْنَا هُودًۭا وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَعَهُۥ بِرَحْمَةٍۢ مِّنَّا وَنَجَّيْنَـٰهُم مِّنْ عَذَابٍ غَلِيظٍۢ
وَلَمَّا
और जब
جَآءَ
आ गया
أَمْرُنَا
फ़ैसला हमारा
نَجَّيْنَا
निजात दी हमने
هُودًۭا
हूद को
وَٱلَّذِينَ
और उनको जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
مَعَهُۥ
साथ उसके
بِرَحْمَةٍۢ
साथ रहमत के
مِّنَّا
हमारी तरफ़ से
وَنَجَّيْنَـٰهُم
और निजात दी हमने उन्हें
مِّنْ
from
عَذَابٍ
अज़ाब से
غَلِيظٍۢ
सख़्त
और जब हमारा आदेश आ पहुँचा तो हमने हूद और उसके साथ के ईमान लानेवालों को अपनी दयालुता से बचा लिया। और एक कठोर यातना से हमने उन्हें छुटकारा दिया
तफ़्सीर:
और जब उन्हें नष्ट करने का हमारा आदेश आ गया, तो हमने हूद और उनके साथ ईमान लाने वालों को अपनी दया एवं कृपा से बचा लिया। तथा उन्हें उस गंभीर यातना से छुटकारा दिलाया, जिसके द्वारा हमने उनकी जाति के काफ़िर लोगों को दंडित किया था।
आयत 59
وَتِلْكَ عَادٌۭ ۖ جَحَدُوا۟ بِـَٔايَـٰتِ رَبِّهِمْ وَعَصَوْا۟ رُسُلَهُۥ وَٱتَّبَعُوٓا۟ أَمْرَ كُلِّ جَبَّارٍ عَنِيدٍۢ
وَتِلْكَ
और ये थे
عَادٌۭ ۖ
आद
جَحَدُوا۟
उन्होंने इन्कार किया
بِـَٔايَـٰتِ
आयात का
رَبِّهِمْ
अपने रब की
وَعَصَوْا۟
और उन्होंने नाफ़रमानी की
رُسُلَهُۥ
उसके रसूलों की
وَٱتَّبَعُوٓا۟
और उन्होंने पैरवी की
أَمْرَ
हुक्म की
كُلِّ
हर
جَبَّارٍ
सरकश
عَنِيدٍۢ
ज़िद्दी की
ये आद है, जिन्होंने अपने रब की आयतों का इनकार किया; उसके रसूलों की अवज्ञा की और हर सरकश विरोधी के पीछे चलते रहे
तफ़्सीर:
ये वही आद जाति के लोग हैं, जिन्होंने अल्लाह की निशानियों का इनकार किया, अपने रसूल हूद की अवज्ञा की और हर ऐसे व्यक्ति के आदेश का पालन किया, जो सत्य के आगे अभिमान करने वाला, उद्दंड था, न वह सत्य को स्वीकार करता और न ही उसका अनुसरण करता था।
आयत 60
وَأُتْبِعُوا۟ فِى هَـٰذِهِ ٱلدُّنْيَا لَعْنَةًۭ وَيَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ أَلَآ إِنَّ عَادًۭا كَفَرُوا۟ رَبَّهُمْ ۗ أَلَا بُعْدًۭا لِّعَادٍۢ قَوْمِ هُودٍۢ
وَأُتْبِعُوا۟
और उनके पीछे लगा दी गई
فِى
in
هَـٰذِهِ
this
ٱلدُّنْيَا
इस दुनिया में
لَعْنَةًۭ
लानत
وَيَوْمَ
और दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ
क़यामत के (भी)
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّ
बेशक
عَادًۭا
आद ने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
رَبَّهُمْ ۗ
अपने रब का
أَلَا
ख़बरदार
بُعْدًۭا
दूरी है
لِّعَادٍۢ
आद के लिए
قَوْمِ
जो क़ौम थी
هُودٍۢ
हूद की
इस संसार में भी लानत ने उनका पीछा किया और क़ियामत के दिन भी, "सुन लो! निस्संदेह आद ने अपने रब के साथ कुफ़्र किया। सुनो! विनष्ट हो आद, हूद की क़ौम।"
तफ़्सीर:
उनके साथ इस दुनिया के जीवन में अल्लाह की दया से दूरी और अपमान लगा रहा तथा क़ियामत के दिन भी वे अल्लाह की दया से वंचित रहेंगे। और यह उनके कुफ्र के कारण होगा। याद रखो, अल्लाह ने उन्हें हर भलाई से दूर और हर बुराई से क़रीब कर दिया है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
हूद अलैहिस्सलाम और आद कौम के वाकिये का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि ताकत पर घमंड करने की बजाय हमेशा अल्लाह के सामने आजिज़ी रखनी चाहिए।
आयत 61
۞ وَإِلَىٰ ثَمُودَ أَخَاهُمْ صَـٰلِحًۭا ۚ قَالَ يَـٰقَوْمِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَـٰهٍ غَيْرُهُۥ ۖ هُوَ أَنشَأَكُم مِّنَ ٱلْأَرْضِ وَٱسْتَعْمَرَكُمْ فِيهَا فَٱسْتَغْفِرُوهُ ثُمَّ تُوبُوٓا۟ إِلَيْهِ ۚ إِنَّ رَبِّى قَرِيبٌۭ مُّجِيبٌۭ
۞ وَإِلَىٰ
और तरफ़
ثَمُودَ
समूद के
أَخَاهُمْ
उनके भाई
صَـٰلِحًۭا ۚ
सालेह को (भेजा)
قَالَ
उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
ٱعْبُدُوا۟
इबादत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
مَا
नहीं
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنْ
any
إِلَـٰهٍ
कोई इलाह (बरहक़)
غَيْرُهُۥ ۖ
सिवाय इसके
هُوَ
वो ही है
أَنشَأَكُم
जिसने पैदा किया तुम्हें
مِّنَ
from
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन से
وَٱسْتَعْمَرَكُمْ
और जिसने आबाद किया तुम्हें
فِيهَا
उसमें
فَٱسْتَغْفِرُوهُ
पस बख़्शिश माँगो उससे
ثُمَّ
फिर
تُوبُوٓا۟
तौबा करो
إِلَيْهِ ۚ
तरफ़ उसके
إِنَّ
बेशक
رَبِّى
मेरा रब
قَرِيبٌۭ
बहुत क़रीब है
مُّجِيبٌۭ
जवाब देने बाला है
समूद को और उसके भाई सालेह को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़़ौम के लोगों! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई अन्य पूज्य-प्रभु नहीं। उसी ने तुम्हें धरती से पैदा किया और उसमें तुम्हें बसायाय़ अतः उससे क्षमा माँगो; फिर उसकी ओर पलट आओ। निस्संदेह मेरा रब निकट है, प्रार्थनाओं को स्वीकार करनेवाला भी।"
तफ़्सीर:
और हमने समूद की ओर उनके भाई सालेह को भेजा। उन्होंने कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! अकेले अल्लाह की इबादत करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य नहीं, जो इबादत का योग्य हो। उसी ने तुम्हें धरती की मिट्टी से पैदा किया, इस प्रकार कि तुम्हारे पिता आदम को उसी बनाया। और तुम्हें धरती को आबाद करने वाला बनाया। अतः तुम उससे क्षमा माँगो। और फिर अच्छे कार्य करके और गुनाहों को छोड़कर उसकी ओर पलट आओ। निःसंदेह मेरा पालनहार उससे निकट है जो निष्ठा के साथ उसकी इबादत करे, तथा उसकी प्रार्थना स्वीकार करने वाला है जो उसे पुकारे।
आयत 62
قَالُوا۟ يَـٰصَـٰلِحُ قَدْ كُنتَ فِينَا مَرْجُوًّۭا قَبْلَ هَـٰذَآ ۖ أَتَنْهَىٰنَآ أَن نَّعْبُدَ مَا يَعْبُدُ ءَابَآؤُنَا وَإِنَّنَا لَفِى شَكٍّۢ مِّمَّا تَدْعُونَآ إِلَيْهِ مُرِيبٍۢ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
يَـٰصَـٰلِحُ
ऐ सालेह
قَدْ
तहक़ीक़
كُنتَ
था तू
فِينَا
हमारे दर्मियान
مَرْجُوًّۭا
जिससे उम्मीद रखी गई
قَبْلَ
क़ब्ल
هَـٰذَآ ۖ
इसके
أَتَنْهَىٰنَآ
क्या तू रोकता है हमें
أَن
कि
نَّعْبُدَ
हम इबादत करें
مَا
जिसकी
يَعْبُدُ
इबादत करते थे
ءَابَآؤُنَا
आबा ओ अजदाद हमारे
وَإِنَّنَا
और बेशक हम
لَفِى
surely (are) in
شَكٍّۢ
अलबत्ता शक में हैं
مِّمَّا
उससे जो
تَدْعُونَآ
तुम बुलाते हो हमें
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
مُرِيبٍۢ
जो बेचैन कर देने वाला है
उन्होंने कहा, "ऐ सालेह! इससे पहले तू हमारे बीच ऐसा व्यक्ति था जिससे बड़ी आशाएँ थीं। क्या तू हमें उनको पूजने से रोकता है जिनकी पूजा हमारे बाप-दादा करते रहे है? जिनकी ओर तू हमें बुला रहा है उसके विषय में तो हमें संदेह है जो हमें दुविधा में डाले हुए है।"
तफ़्सीर:
उनसे उनकी जाति के लोगों ने कहा : ऐ सालेह! तू अपने इस निमंत्रण से पहले हमारे बीच एक उच्च स्थिति वाला था। हम उम्मीद कर रहे थे कि तू सलाह व मशवरे वाला एक समझदार व्यक्ति होगा। ऐ सालेह! क्या तू हमें उसकी उपासना से रोक रहा है, जिसकी उपासना हमारे बाप दादा करते आए हैं? और तू जो हमें केवल एक अल्लाह की इबादत की ओर बुला रहा है, हमें उसमें संदेह है। यही कारण है कि हम तुझपर अल्लाह के बारे में झूठ बोलने का आरोप लगाते हैं।
आयत 63
قَالَ يَـٰقَوْمِ أَرَءَيْتُمْ إِن كُنتُ عَلَىٰ بَيِّنَةٍۢ مِّن رَّبِّى وَءَاتَىٰنِى مِنْهُ رَحْمَةًۭ فَمَن يَنصُرُنِى مِنَ ٱللَّهِ إِنْ عَصَيْتُهُۥ ۖ فَمَا تَزِيدُونَنِى غَيْرَ تَخْسِيرٍۢ
قَالَ
उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
أَرَءَيْتُمْ
क्या देखा तुमने
إِن
अगर
كُنتُ
हूँ मैं
عَلَىٰ
on
بَيِّنَةٍۢ
एक वाज़ेह दलील पर
مِّن
from
رَّبِّى
अपने रब की तरफ़ से
وَءَاتَىٰنِى
और उसने दी हो मुझे
مِنْهُ
अपनी तरफ़ से
رَحْمَةًۭ
रहमत
فَمَن
तो कौन
يَنصُرُنِى
मदद करेगा मेरी
مِنَ
against
ٱللَّهِ
अल्लाह से (बचाने में)
إِنْ
अगर
عَصَيْتُهُۥ ۖ
नाफ़रमानी की मैंने उसकी
فَمَا
तो नहीं
تَزِيدُونَنِى
तुम ज़्यादा करोगे मुझे
غَيْرَ
सिवाय
تَخْسِيرٍۢ
ख़सारा देने के
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों! क्या तुमने सोचा? यदि मैं अपने रब के एक स्पष्ट प्रमाण पर हूँ और उसने मुझे अपनी ओर से दयालुता प्रदान की है, तो यदि मैं उसकी अवज्ञा करूँ तो अल्लाह के मुक़ाबले में कौन मेरी सहायता करेगा? तुम तो और अधिक घाटे में डाल देने के अतिरिक्त मेरे हक़ में और कोई अभिवृद्धि नहीं करोगे
तफ़्सीर:
सालेह ने अपनी जाति के लोगों को उत्तर देते हुए कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! मुझे बताओ कि यदि मैं अपने पालनहार की ओर से स्पष्ट प्रमाण पर हूँ और उसने मुझे अपनी ओर से दया अर्थात नुबुव्वत प्रदान की हो, फिर यदि मैं उस बात को पहुँचाना छोड़कर जिसे उसने मुझे तुम तक पहुँचाने का आदेश दिया है, उसकी अवज्ञा करूँ, तो ऐसी परिस्थिति में मुझे उसकी सज़ा से कौन बचाएगा? तुम लोग तो मुझे केवल और अधिक गुमराह और अल्लाह की प्रसन्नता से दूर ही करोगे।
आयत 64
وَيَـٰقَوْمِ هَـٰذِهِۦ نَاقَةُ ٱللَّهِ لَكُمْ ءَايَةًۭ فَذَرُوهَا تَأْكُلْ فِىٓ أَرْضِ ٱللَّهِ وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُوٓءٍۢ فَيَأْخُذَكُمْ عَذَابٌۭ قَرِيبٌۭ
وَيَـٰقَوْمِ
और ऐ मेरी क़ौम
هَـٰذِهِۦ
ये
نَاقَةُ
ऊँटनी है
ٱللَّهِ
अल्लाह की
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
ءَايَةًۭ
एक निशानी
فَذَرُوهَا
पस छोड़ दो उसे
تَأْكُلْ
वो खाती फिरे
فِىٓ
in
أَرْضِ
ज़मीन में
ٱللَّهِ
अल्लाह की
وَلَا
और ना
تَمَسُّوهَا
तुम छुओ उसे
بِسُوٓءٍۢ
साथ बुराई के
فَيَأْخُذَكُمْ
पस पकड़ लेगा तुम्हें
عَذَابٌۭ
अज़ाब
قَرِيبٌۭ
क़रीबी
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह अल्लाह की ऊँटनी तुम्हारे लिए एक निशानी है। इसे छोड़ दो कि अल्लाह की धरती में खाए और इसे तकलीफ़ देने के लिए हाथ न लगाना अन्यथा समीपस्थ यातना तुम्हें आ लेगी।"
तफ़्सीर:
और ऐ मेरी जाति के लोगो! यह अल्लाह की ऊँटनी तुम्हारे लिए मेरी सत्यता की निशानी है। अतः तुम इसे अल्लाह की धरती में चरने दो और उसे कोई नुकसान न पहुँचाओ। अन्यथा तुम्हारे उसको मारने के समय के निकट ही तुम्हें यातना आ घेरेगी।
आयत 65
فَعَقَرُوهَا فَقَالَ تَمَتَّعُوا۟ فِى دَارِكُمْ ثَلَـٰثَةَ أَيَّامٍۢ ۖ ذَٰلِكَ وَعْدٌ غَيْرُ مَكْذُوبٍۢ
فَعَقَرُوهَا
तो उन्होंने कूँचें काट डालीं उसकी
فَقَالَ
तो उसने कहा
تَمَتَّعُوا۟
तुम फ़ायदा उठाओ
فِى
in
دَارِكُمْ
अपने घरों में
ثَلَـٰثَةَ
तीन
أَيَّامٍۢ ۖ
दिन
ذَٰلِكَ
ये
وَعْدٌ
वादा है
غَيْرُ
ना
مَكْذُوبٍۢ
झूटा होने वाला
किन्तु उन्होंने उसकी कूंचे काट डाली। इसपर उसने कहा, "अपने घरों में तीन दिन और मज़े ले लो। यह ऐसा वादा है, जो झूठा सिद्ध न होगा।"
तफ़्सीर:
उन लोगों ने झुठलाने में अति करते हुए उसे मार डाला। तब सालेह ने उनसे कहा : तुम इसकी हत्या करने से लेकर तीन दिन तक अपनी भूमि में जीवन के मज़े ले लो। फिर तुमपर अल्लाह की यातना आएगी। क्योंकि इसके बाद उसके अज़ाब का आना एक अपरिहार्य वादा है जो झूठा नहीं है, बल्कि वह एक सच्चा वादा है।
आयत 66
فَلَمَّا جَآءَ أَمْرُنَا نَجَّيْنَا صَـٰلِحًۭا وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَعَهُۥ بِرَحْمَةٍۢ مِّنَّا وَمِنْ خِزْىِ يَوْمِئِذٍ ۗ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ ٱلْقَوِىُّ ٱلْعَزِيزُ
فَلَمَّا
तो जब
جَآءَ
आ गया
أَمْرُنَا
हुक्म हमारा
نَجَّيْنَا
निजात दी हमने
صَـٰلِحًۭا
सालेह को
وَٱلَّذِينَ
और उनको जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
مَعَهُۥ
साथ उसके
بِرَحْمَةٍۢ
साथ रहमत के
مِّنَّا
हमारी तरफ़ से
وَمِنْ
and from
خِزْىِ
और रुस्वाई से (भी)
يَوْمِئِذٍ ۗ
उस दिन की
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
هُوَ
वो ही है
ٱلْقَوِىُّ
बहुत क़ुव्वत वाला
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त
फिर जब हमारा आदेश आ पहुँचा, तो हमने अपनी दयालुता से सालेह को और उसके साथ के ईमान लानेवालों को बचा लिया, और उस दिन के अपमान से उन्हें सुरक्षित रखा। वास्तव में, तुम्हारा रब बड़ा शक्तिवान, प्रभुत्वशाली है
तफ़्सीर:
फिर जब उनको नष्ट करने का हमारा आदेश आ गया, तो हमने सालेह और उनके ईमान वाले साथियों को अपनी दया से बचा लिया तथा उन्हें उस दिन के अपमान और तिरस्कार से सुरक्षित रखा। निःसंदेह (ऐ रसूल!) आपका पालनहार ही शक्तिशाली और प्रभुत्वशाली है, जिसे कोई पराजित नहीं कर सकता। इसीलिए उसने झुठलाने वाले समुदायों को विनष्ट कर दिया।
आयत 67
وَأَخَذَ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ ٱلصَّيْحَةُ فَأَصْبَحُوا۟ فِى دِيَـٰرِهِمْ جَـٰثِمِينَ
وَأَخَذَ
और पकड़ लिया
ٱلَّذِينَ
उन्हें जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया था
ٱلصَّيْحَةُ
चिंघाड़ ने
فَأَصْبَحُوا۟
तो सुबह की उन्होंने
فِى
in
دِيَـٰرِهِمْ
अपने घरों में
جَـٰثِمِينَ
औंधे मुँह गिरने वाले होकर
और अत्याचार करनेवालों को एक भयंकर चिंघार ने आ लिया और वे अपने घरों में औंधे पड़े रह गए,
तफ़्सीर:
और समूद को एक विनाशकारी भयानक ध्वनि ने पकड़ लिया, जिसकी तीव्रता से उनकी मृत्यु हो गई और वे इस तरह औंधे पड़े हुए थे कि उनके चेहरे मिट्टी से चिपक गए थे।
आयत 68
كَأَن لَّمْ يَغْنَوْا۟ فِيهَآ ۗ أَلَآ إِنَّ ثَمُودَا۟ كَفَرُوا۟ رَبَّهُمْ ۗ أَلَا بُعْدًۭا لِّثَمُودَ
كَأَن
गोया कि
لَّمْ
नहीं
يَغْنَوْا۟
वो बसे थे
فِيهَآ ۗ
उसमें
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّ
बेशक
ثَمُودَا۟
समूद ने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
رَبَّهُمْ ۗ
अपने रब से
أَلَا
ख़बरदार
بُعْدًۭا
दूरी है
لِّثَمُودَ
समूद के लिए
मानो वे वहाँ कभी बसे ही न थे। "सुनो! समूद ने अपने रब के साथ कुफ़्र किया। सुन लो! फिटकार हो समूद पर!"
तफ़्सीर:
वे ऐसे हो गए, जैसे कि वे अपने देश में अनुग्रह और समृद्धि में रहे ही नहीं थे। सुन लो, समूद ने अल्लाह के साथ कुफ्र किया। वे सदैव अल्लाह कि दया से दूर रहें।
आयत 69
وَلَقَدْ جَآءَتْ رُسُلُنَآ إِبْرَٰهِيمَ بِٱلْبُشْرَىٰ قَالُوا۟ سَلَـٰمًۭا ۖ قَالَ سَلَـٰمٌۭ ۖ فَمَا لَبِثَ أَن جَآءَ بِعِجْلٍ حَنِيذٍۢ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
جَآءَتْ
आए
رُسُلُنَآ
हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते)
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम के पास
بِٱلْبُشْرَىٰ
साथ ख़ुशख़बरी के
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
سَلَـٰمًۭا ۖ
सलाम हो
قَالَ
उसने कहा
سَلَـٰمٌۭ ۖ
सलाम हो
فَمَا
पस ना
لَبِثَ
वो ठहरा
أَن
मगर
جَآءَ
वो ले आया
بِعِجْلٍ
एक बछड़ा
حَنِيذٍۢ
भुना हुआ
और हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) इबराहीम के पास शुभ सूचना लेकर पहुँचे। उन्होंने कहा, "सलाम हो!" उसने भी कहा, "सलाम हो।" फिर उसने कुछ विलम्भ न किया, एक भुना हुआ बछड़ा ले आया
तफ़्सीर:
फ़रिश्ते इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पास, उन्हें और उनकी पत्नी को इसहाक़ और फिर याक़ूब की शुभ सूचना देने के लिए पुरुषों के रूप में आए। फरिश्तों ने कहा : सलाम हो! तो इबराहीम अलैहिस्सलाम उन्हें यह कहकर उत्तर दिया : सलाम हो। फिर वह जल्दी से गए और उनके पास एक भुना हुआ बछड़ा लेकर आए; ताकि वे उससे खाएँ यह सोचकर कि वे पुरुष हैं।
आयत 70
فَلَمَّا رَءَآ أَيْدِيَهُمْ لَا تَصِلُ إِلَيْهِ نَكِرَهُمْ وَأَوْجَسَ مِنْهُمْ خِيفَةًۭ ۚ قَالُوا۟ لَا تَخَفْ إِنَّآ أُرْسِلْنَآ إِلَىٰ قَوْمِ لُوطٍۢ
فَلَمَّا
फिर जब
رَءَآ
उसने देखा
أَيْدِيَهُمْ
हाथ उनके
لَا
not
تَصِلُ
नही वो पहुँचते
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
نَكِرَهُمْ
उसने अजनबी समझा उन्हें
وَأَوْجَسَ
और उसने महसूस किया
مِنْهُمْ
उनसे
خِيفَةًۭ ۚ
ख़ौफ़
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لَا
(Do) not
تَخَفْ
ना तुम डरो
إِنَّآ
बेशक हम
أُرْسِلْنَآ
भेजे गए हैं हम
إِلَىٰ
to
قَوْمِ
तरफ़ क़ौमे
لُوطٍۢ
लूत के
किन्तु जब देखा कि उनके हाथ उसकी ओर नहीं बढ़ रहे है तो उसने उन्हें अजनबी समझा और दिल में उनसे डरा। वे बोले, "डरो नहीं, हम तो लूत की क़ौम की ओर से भेजे गए है।"
तफ़्सीर:
फिर जब इबराहीम ने देखा कि उनके हाथ बछड़े की ओर नहीं बढ़ रहे हैं और उन्होंने उसे नहीं खाया, तो वह उनके प्रति अचंभे में पड़ गए और अपने दिल में उनसे भय महसूस किया। जब फरिश्तों ने उनका डर देखा तो कहा : हमसे मत डरो, हमें अल्लाह ने लूत की जाति को यातना देने के लिए भेजा है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सालेह अलैहिस्सलाम और समूद कौम के वाकिये का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि दी गई अमानत (जैसे ऊंटनी) की बेहुरमती कौम की तबाही का सबब बनी, अमानत की हिफाज़त ज़रूरी है।
आयत 71
وَٱمْرَأَتُهُۥ قَآئِمَةٌۭ فَضَحِكَتْ فَبَشَّرْنَـٰهَا بِإِسْحَـٰقَ وَمِن وَرَآءِ إِسْحَـٰقَ يَعْقُوبَ
وَٱمْرَأَتُهُۥ
और बीवी उसकी
قَآئِمَةٌۭ
खड़ी थी
فَضَحِكَتْ
तो वो हँस दी
فَبَشَّرْنَـٰهَا
पस ख़ुशख़बरी दी हमने उसे
بِإِسْحَـٰقَ
इसहाक़ की
وَمِن
and after
وَرَآءِ
और पीछे/बाद
إِسْحَـٰقَ
इसहाक़ के
يَعْقُوبَ
याक़ूब की
उसकी स्त्री भी खड़ी थी। वह इसपर हँस पड़ी। फिर हमने उसको इसहाक़ और इसहाक़ के बाद याक़ूब की शुभ सूचना दी
तफ़्सीर:
और इबराहीम की पत्नी 'सारा' खड़ी थी, तो हमने उसे यह प्रसन्न करने वाली सूचना दी कि वह इसहाक को जन्म देगी और इसहाक का एक लड़का होगा, जिसका नाम याक़ूब होगा। यह सुनकर वह हँस पड़ी और खुश हो गई।
आयत 72
قَالَتْ يَـٰوَيْلَتَىٰٓ ءَأَلِدُ وَأَنَا۠ عَجُوزٌۭ وَهَـٰذَا بَعْلِى شَيْخًا ۖ إِنَّ هَـٰذَا لَشَىْءٌ عَجِيبٌۭ
قَالَتْ
वो कहने लगी
يَـٰوَيْلَتَىٰٓ
ऐ ख़राबी मेरी
ءَأَلِدُ
क्या मैं जन्म दूँगी
وَأَنَا۠
जबकि मैं
عَجُوزٌۭ
बुढ़िया हूँ
وَهَـٰذَا
और ये
بَعْلِى
शौहर मेरा
شَيْخًا ۖ
बूढ़ा है
إِنَّ
बेशक
هَـٰذَا
ये तो
لَشَىْءٌ
अलबत्ता चीज़ है
عَجِيبٌۭ
अजीब
वह बोली, "हाय मेरा हतभाग्य! क्या मैं बच्चे को जन्म दूँगी, जबकि मैं वृद्धा और ये मेरे पति है बूढें? यह तो बड़ी ही अद्भुपत बात है!"
तफ़्सीर:
जब फरिश्तों ने यह शुभसूचना दी, तो सारा ने अश्चर्यचकित होकर कहा : मेरी संतान कैसे होगी, जबकि मैं बूढ़ी और संतान से निराश हो चुकी हूँ, और मेरा यह पति भी बुढ़ापे की आयु को पहुँच गया है?! इस स्थिति में बच्चा होना आश्चर्यजनक है, आम तौर पर ऐसा नहीं होता है।
आयत 73
قَالُوٓا۟ أَتَعْجَبِينَ مِنْ أَمْرِ ٱللَّهِ ۖ رَحْمَتُ ٱللَّهِ وَبَرَكَـٰتُهُۥ عَلَيْكُمْ أَهْلَ ٱلْبَيْتِ ۚ إِنَّهُۥ حَمِيدٌۭ مَّجِيدٌۭ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَتَعْجَبِينَ
क्या तू ताज्जुब करती है
مِنْ
at
أَمْرِ
हुक्म से
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के
رَحْمَتُ
रहमत हो
ٱللَّهِ
अल्लाह की
وَبَرَكَـٰتُهُۥ
और बरकतें हों उसकी
عَلَيْكُمْ
तुम पर
أَهْلَ
people
ٱلْبَيْتِ ۚ
ऐ अहले बैत
إِنَّهُۥ
बेशक वो
حَمِيدٌۭ
बहुत तारीफ़ वाला है
مَّجِيدٌۭ
बड़ी शान वाला है
वे बोले, "क्या अल्लाह के आदेश पर तुम आश्चर्य करती हो? घरवालो! तुम लोगों पर तो अल्लाह की दयालुता और उसकी बरकतें है। वह निश्चय ही प्रशंसनीय, गौरववाला है।"
तफ़्सीर:
जब सारा शुभसूचना पर आश्चर्य प्रकट करने लगीं, तो फरिश्तों ने उनसे कहा : क्या तुझे अल्लाह के अनुमान और निर्णय पर आश्चर्य है? तुम जैसे लोगों से यह तथ्य छिपा नहीं है कि अल्लाह ऐसे कार्यों पर सामर्थ्य रखता है। ऐ इबराहीम के घर वालो! तुमपर अल्लाह की दया और उसकी बरकतें (विभूतियाँ) हों। निःसंदेह अल्लाह अपने कार्यों तथा गुणों में प्रशंसित और वैभवशाली एवं उच्च है।
आयत 74
فَلَمَّا ذَهَبَ عَنْ إِبْرَٰهِيمَ ٱلرَّوْعُ وَجَآءَتْهُ ٱلْبُشْرَىٰ يُجَـٰدِلُنَا فِى قَوْمِ لُوطٍ
فَلَمَّا
तो जब
ذَهَبَ
चला गया
عَنْ
from
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम से
ٱلرَّوْعُ
ख़ौफ़
وَجَآءَتْهُ
और आ गई उसके पास
ٱلْبُشْرَىٰ
ख़ुशख़बरी
يُجَـٰدِلُنَا
वो झगड़ने लगा हमसे
فِى
concerning
قَوْمِ
the people
لُوطٍ
क़ौमे लूत के बारे में
फिर जब इबराहीम की घबराहट दूर हो गई और उसे शुभ सूचना भी मिली तो वह लूत की क़ौम के विषय में हम से झगड़ने लगा
तफ़्सीर:
फिर जब इबराहीम अलैहिस्सलाम अपने अतिथियों के बारे में, जिन्हों ने खाना नहीं खाया था, यह जान गए कि वे फ़रिश्ते हैं और भय दूर हो गया, और उन्हें शुभसूचना मिल गई कि उनके यहाँ इसहाक नामक एक पुत्र पैदा होगा और फिर याकूब का जन्म होगा, तो वह हमारे दूतों से लूत की जाति के संबंध में बहस करने लगे, शायद वे उनकी सज़ा पीछे हटा दें और शायद वे लूत और उनके घर वालों को बचा लें।
आयत 75
إِنَّ إِبْرَٰهِيمَ لَحَلِيمٌ أَوَّٰهٌۭ مُّنِيبٌۭ
إِنَّ
बेशक
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम
لَحَلِيمٌ
बिलाशुबा निहायत बुर्दबार
أَوَّٰهٌۭ
बहुत आह व ज़ारी करने वाला
مُّنِيبٌۭ
रुजूअ करने वाला था
निस्संदेह इबराहीम बड़ा ही सहनशील, कोमल हृदय, हमारी ओर रुजू (प्रवृत्त) होनेवाला था
तफ़्सीर:
निःसंदेह इबराहीम अलैहिस्सलाम बहुत सहनशील थे, सज़ा का विलंबित किया जाना पसंद करते थे। अल्लाह के समक्ष बहुत विलाप करने वाले, बहुत दुआ करने वाले और अल्लाह की ओर पलटने वाले थे।
आयत 76
يَـٰٓإِبْرَٰهِيمُ أَعْرِضْ عَنْ هَـٰذَآ ۖ إِنَّهُۥ قَدْ جَآءَ أَمْرُ رَبِّكَ ۖ وَإِنَّهُمْ ءَاتِيهِمْ عَذَابٌ غَيْرُ مَرْدُودٍۢ
يَـٰٓإِبْرَٰهِيمُ
ऐ इब्राहीम
أَعْرِضْ
ऐराज़ करो
عَنْ
from
هَـٰذَآ ۖ
इस (बात ) से
إِنَّهُۥ
बेशक वो
قَدْ
तहक़ीक़
جَآءَ
आ चुका
أَمْرُ
हुक्म
رَبِّكَ ۖ
तेरे रब का
وَإِنَّهُمْ
और बेशक वो
ءَاتِيهِمْ
आने वाला है उन पर
عَذَابٌ
अज़ाब
غَيْرُ
ना
مَرْدُودٍۢ
फेरा जाने वाला
"ऐ ईबराहीम! इसे छोड़ दो। तुम्हारे रब का आदेश आ चुका है और निश्चय ही उनपर न टलनेवाली यातना आनेवाली है।"
तफ़्सीर:
फ़रिश्तों ने कहा : ऐ इबराहीम! लूत की जाति के बारे में बहस करना छोड़ो। निःसंदेह उनपर उस यातना को लाने का अल्लाह का निर्णय आ चुका है, जो उसने उनपर मुक़द्दर किया है। निःसंदेह लूत की जाति पर बड़ा अज़ाब आने वाला है, जिसे न कोई बहस टाल सकती है और न कोई प्रार्थना।
आयत 77
وَلَمَّا جَآءَتْ رُسُلُنَا لُوطًۭا سِىٓءَ بِهِمْ وَضَاقَ بِهِمْ ذَرْعًۭا وَقَالَ هَـٰذَا يَوْمٌ عَصِيبٌۭ
وَلَمَّا
और जब
جَآءَتْ
आए
رُسُلُنَا
हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते)
لُوطًۭا
लूत के पास
سِىٓءَ
वो ग़मगीन हुआ
بِهِمْ
उनके बारे में
وَضَاقَ
और वो तंग हुआ
بِهِمْ
उनके बारे में
ذَرْعًۭا
दिल में
وَقَالَ
और कहा
هَـٰذَا
ये
يَوْمٌ
दिन है
عَصِيبٌۭ
बड़ा सख़्त
और जब हमारे दूत लूत के पास पहुँचे तो वह उनके कारण अप्रसन्न हुआ और उनके मामले में दिल तंग पाया। कहने लगा, "यह तो बड़ा ही कठिन दिन है।"
तफ़्सीर:
और जब फ़रिश्ते लूत के पास पुरुषों की वेशभूषा में आए, तो उनका आना उन्हें बुरा लगा। और उनके संबंध में अपनी जाति के भय से उनका सीना तंग हो गया, जो महिलओं को छोड़कर परुषों से अपनी कामवासना पूरी करते थे। लूत ने कहा : यह बड़ा सख्त दिन है। क्योंकि उन्होंने सोचा कि उनकी जाति के लोग उनके अतिथियों के संबंध में उनपर हावी हो जाएँगे।
आयत 78
وَجَآءَهُۥ قَوْمُهُۥ يُهْرَعُونَ إِلَيْهِ وَمِن قَبْلُ كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ ٱلسَّيِّـَٔاتِ ۚ قَالَ يَـٰقَوْمِ هَـٰٓؤُلَآءِ بَنَاتِى هُنَّ أَطْهَرُ لَكُمْ ۖ فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَلَا تُخْزُونِ فِى ضَيْفِىٓ ۖ أَلَيْسَ مِنكُمْ رَجُلٌۭ رَّشِيدٌۭ
وَجَآءَهُۥ
और आए उसके पास
قَوْمُهُۥ
उसकी क़ौम (के लोग)
يُهْرَعُونَ
तेज़ दौड़ते हुए
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
وَمِن
and before
قَبْلُ
और उससे पहले
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
ٱلسَّيِّـَٔاتِ ۚ
बुरे
قَالَ
उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
هَـٰٓؤُلَآءِ
ये हैं
بَنَاتِى
बेटियाँ मेरी
هُنَّ
ये
أَطْهَرُ
ज़्यादा पाकीज़ा हैं
لَكُمْ ۖ
तुम्हारे लिए
فَٱتَّقُوا۟
पस डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَلَا
और ना
تُخْزُونِ
तुम रुस्वा करो मुझे
فِى
concerning
ضَيْفِىٓ ۖ
मेरे मेहमानों में
أَلَيْسَ
क्या नहीं है
مِنكُمْ
तुम में
رَجُلٌۭ
कोई आदमी
رَّشِيدٌۭ
समझदार
उसकी क़ौम के लोग दौड़ते हुए उसके पास आ पहुँचे। वे पहले से ही दुष्कर्म किया करते थे। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! ये मेरी (क़ौम की) बेटियाँ (विधिवत विवाह के लिए) मौजूड है। ये तुम्हारे लिए अधिक पवित्र है। अतः अल्लाह का डर रखो और मेरे अतिथियों के विषय में मुझे अपमानित न करो। क्या तुममें एक भी अच्छी समझ का आदमी नहीं?"
तफ़्सीर:
और लूत की जाति के लोग उनके अतिथियों के साथ कुकर्म के इरादे से दौड़ते हुए लूत के पास आए। और वे इससे पूर्व महिलाओं को छोड़कर पुरुषों से यौन संबंध बनाते थे। लूत ने अपनी जाति के लोगों को हटाते हुए और अपने अतिथियों के समक्ष अपना उज़्र दर्शाते हुए कहा : ये तुम्हारी महिलाओं में से मेरी बेटियाँ हैं, इसलिए इनसे शादी कर लो। ये तुम्हारे लिए बेह़याई के कार्य से अधिक पवित्र हैं। अतः तुम अल्लाह से डरो और मुझे अपने अतिथियों के संबंध में लज्जित न करो। (ऐ लोगो!) क्या तुम्हारे अंदर कोई अच्छे दिमाग का आदमी नहीं है, जो तुम्हें इस घृणित कार्य से रोक सके?
आयत 79
قَالُوا۟ لَقَدْ عَلِمْتَ مَا لَنَا فِى بَنَاتِكَ مِنْ حَقٍّۢ وَإِنَّكَ لَتَعْلَمُ مَا نُرِيدُ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
عَلِمْتَ
जानता है तू
مَا
नहीं
لَنَا
हमारे लिए
فِى
concerning
بَنَاتِكَ
तेरी बेटियों में
مِنْ
any
حَقٍّۢ
कोई हक़ (दिलचस्पी)
وَإِنَّكَ
और बेशक तू
لَتَعْلَمُ
अलबत्ता तू जानता है
مَا
जो
نُرِيدُ
हम चाहते हैं
उन्होंने कहा, "तुझे तो मालूम है कि तेरी बेटियों से हमें कोई मतलब नहीं। और हम जो चाहते है, उसे तू भली-भाँति जानता है।"
तफ़्सीर:
उनकी जाति के लोगों ने उनसे कहा : (ऐ लूत!) तुम तो जानते ही हो कि हमें तुम्हारी बेटियों की या तुम्हारी जाति की महिाओं की न कोई ज़रूरत है, और न कोई इच्छा (वासना) है। निःसंदेह तुम भली-भाँति जानते हो कि हम क्या चाहते हैं। हम तो केवल पुरुषों को चाहते हैं।
आयत 80
قَالَ لَوْ أَنَّ لِى بِكُمْ قُوَّةً أَوْ ءَاوِىٓ إِلَىٰ رُكْنٍۢ شَدِيدٍۢ
قَالَ
उसने कहा
لَوْ
काश
أَنَّ
कि बेशक
لِى
मेरे लिए (होती)
بِكُمْ
तुम पर
قُوَّةً
कोई क़ुव्वत
أَوْ
या
ءَاوِىٓ
मैं पनाह ले सकता
إِلَىٰ
in
رُكْنٍۢ
तरफ़ सहारे
شَدِيدٍۢ
मज़बूत के
उसने कहा, "क्या ही अच्छा होता मुझमें तुमसे मुक़ाबले की शक्ति होती या मैं किसी सुदृढ़ आश्रय की शरण ही ले सकता।"
तफ़्सीर:
लूत ने कहा : काश, मेरे पास तुम्हें हटाने की शक्ति होती या मेरे पास रक्षा करने के लिए क़बीला होता, फिर मैं तुम्हारे और अपने अतिथियों के बीच दीवार बन जाता।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इब्राहीम अलैहिस्सलाम को बशारत और लूत अलैहिस्सलाम की मेहमाननवाज़ी का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि मेहमाननवाज़ी और भलाई का रवैया अल्लाह को पसंद है।
आयत 81
قَالُوا۟ يَـٰلُوطُ إِنَّا رُسُلُ رَبِّكَ لَن يَصِلُوٓا۟ إِلَيْكَ ۖ فَأَسْرِ بِأَهْلِكَ بِقِطْعٍۢ مِّنَ ٱلَّيْلِ وَلَا يَلْتَفِتْ مِنكُمْ أَحَدٌ إِلَّا ٱمْرَأَتَكَ ۖ إِنَّهُۥ مُصِيبُهَا مَآ أَصَابَهُمْ ۚ إِنَّ مَوْعِدَهُمُ ٱلصُّبْحُ ۚ أَلَيْسَ ٱلصُّبْحُ بِقَرِيبٍۢ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
يَـٰلُوطُ
ऐ लूत
إِنَّا
बेशक हम
رُسُلُ
भेजे हुए हैं
رَبِّكَ
तेरे रब के
لَن
हरगिज़ ना
يَصِلُوٓا۟
वो पहुँच सकेंगे
إِلَيْكَ ۖ
तुझ तक
فَأَسْرِ
पस ले चल
بِأَهْلِكَ
अपने घर वालों को
بِقِطْعٍۢ
एक टुकड़े में
مِّنَ
of
ٱلَّيْلِ
रात के
وَلَا
और ना
يَلْتَفِتْ
पलट कर देखे
مِنكُمْ
तुम में से
أَحَدٌ
कोई एक
إِلَّا
मगर
ٱمْرَأَتَكَ ۖ
बीवी तुम्हारी
إِنَّهُۥ
बेशक वो
مُصِيبُهَا
पहुँचने वाला है उसे (भी)
مَآ
जो
أَصَابَهُمْ ۚ
पहुँचेगा उन्हें
إِنَّ
बेशक
مَوْعِدَهُمُ
उनके वादे का वक़्त
ٱلصُّبْحُ ۚ
सुबह है
أَلَيْسَ
क्या नहीं है
ٱلصُّبْحُ
सुबह
بِقَرِيبٍۢ
क़रीब ही
उन्होंने कहा, "ऐ लूत! हम तुम्हारे रब के भेजे हुए है। वे तुम तक कदापि नहीं पहुँच सकते। अतः तुम रात के किसी हिस्सेमें अपने घरवालों को लेकर निकल जाओ और तुममें से कोई पीछे पलटकर न देखे। हाँ, तुम्हारी स्त्री का मामला और है। उनपर भी वही कुछ बीतनेवाला है, जो उनपर बीतेगा। निर्धारित समय उनके लिए प्रातःकाल का है। तो क्या प्रातःकाल निकट नहीं?"
तफ़्सीर:
फ़रिश्तों ने लूत अलैहिस्सलाम से कहा : ऐ लूत! हम स्वर्गदूत हैं। हमें अल्लाह ने भेजा है। तेरी जाति के लोग कदापि बुराई के साथ तेरे पास नहीं पहुँच सकते। अतः तू अपने परिवार के साथ इस गाँव से रात के अंधेरे में निकल जा। और तुम में से कोई भी व्यक्ति पीछे मुड़कर न देखे। परन्तु तेरी पत्नी उल्लंघन करते हुए पीछे मुड़कर देखेगी। क्योंकि उसे भी वही यातना पहुँचने वाली है, जो तेरी जाति के लोगों को पहुँचेगी। उन्हें विनष्ट करने का समय प्रातः काल है और यह समय निकट ही है।
आयत 82
فَلَمَّا جَآءَ أَمْرُنَا جَعَلْنَا عَـٰلِيَهَا سَافِلَهَا وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهَا حِجَارَةًۭ مِّن سِجِّيلٍۢ مَّنضُودٍۢ
فَلَمَّا
तो जब
جَآءَ
आ गया
أَمْرُنَا
हुक्म हमारा
جَعَلْنَا
कर दिया हमने
عَـٰلِيَهَا
ऊपर वाला उसका
سَافِلَهَا
निचला उसका
وَأَمْطَرْنَا
और बरसाए हमने
عَلَيْهَا
उस पर
حِجَارَةًۭ
पत्थर
مِّن
of
سِجِّيلٍۢ
कंकर में से
مَّنضُودٍۢ
तह -ब-तह
फिर जब हमारा आदेश आ पहुँचा तो हमने उसको तलपट कर दिया और उसपर ककरीले पत्थर ताबड़-तोड़ बरसाए,
तफ़्सीर:
फिर जब लूत की जाति को विनष्ट करने का हमारा आदेश आ गया, तो हमने उनकी बस्तियों को उठाकर पटख दिया और ऊपर-तले कर दिया और हमने उनपर लगातार सख्त मिट्टी के पत्थर बरसाए।
आयत 83
مُّسَوَّمَةً عِندَ رَبِّكَ ۖ وَمَا هِىَ مِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ بِبَعِيدٍۢ
مُّسَوَّمَةً
निशान ज़दा
عِندَ
पास से
رَبِّكَ ۖ
आपके रब के
وَمَا
और नहीं
هِىَ
वो
مِنَ
(is) from
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों से
بِبَعِيدٍۢ
कुछ दूर
जो तुम्हारे रब के यहाँ चिन्हित थे। और वे अत्याचारियों से कुछ दूर भी नहीं
तफ़्सीर:
इन पत्थरों को एक विशेष चिह्न के साथ अल्लाह के यहाँ से चिह्नित किया गया था। और ये पत्थर कुरैश और अन्य अत्याचारियों से कुछ दूर नहीं हैं। बल्कि वे निकट ही हैं, जब भी अल्लाह उन्हें उनपर बरसाने का फ़ैसला करेगा, बरस पड़ेंगे।
आयत 84
۞ وَإِلَىٰ مَدْيَنَ أَخَاهُمْ شُعَيْبًۭا ۚ قَالَ يَـٰقَوْمِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَـٰهٍ غَيْرُهُۥ ۖ وَلَا تَنقُصُوا۟ ٱلْمِكْيَالَ وَٱلْمِيزَانَ ۚ إِنِّىٓ أَرَىٰكُم بِخَيْرٍۢ وَإِنِّىٓ أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍۢ مُّحِيطٍۢ
۞ وَإِلَىٰ
और तरफ़
مَدْيَنَ
मदयन के
أَخَاهُمْ
उनके भाई
شُعَيْبًۭا ۚ
शुऐब को (भेजा)
قَالَ
उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
ٱعْبُدُوا۟
इबादत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
مَا
नहीं
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنْ
any
إِلَـٰهٍ
कोई इलाह (बरहक़)
غَيْرُهُۥ ۖ
सिवाय उसके
وَلَا
और ना
تَنقُصُوا۟
तुम कम करो
ٱلْمِكْيَالَ
नाप
وَٱلْمِيزَانَ ۚ
और तौल
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَرَىٰكُم
मैं देखता हूँ तुम्हें
بِخَيْرٍۢ
अच्छी हालत में
وَإِنِّىٓ
और बेशक मैं
أَخَافُ
मैं डरता हूँ
عَلَيْكُمْ
तुम पर
عَذَابَ
अज़ाब से
يَوْمٍۢ
(of) a Day
مُّحِيطٍۢ
घेर लेने वाले दिन के
मदयन की ओर उनके भाई शुऐब को भेजा। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दही करो, उनके सिवा तुम्हारा कोई पूज्य-प्रभु नहीं। और नाप और तौल में कमी न करो। मैं तो तुम्हें अच्छी दशा में देख रहा हूँ, किन्तु मुझे तुम्हारे विषय में एक घेर लेनेवाले दिन की यातना का भय है
तफ़्सीर:
और हमने मदयन की ओर उनके भाई शुऐब को भेजा। उन्होंने कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! अकेले अल्लाह की इबादत करो। उसके अलावा तुम्हारा कोई पूज्य नहीं जो इबादत का हक़दार हो। तथा जब लोगों को नाप या तौलकर कुछ दो, तो उसमें कमी न करो। मैं तुम्हें विस्तृत आजीविका और नेमत में देख रहा हूँ। इसलिए पाप करके अपने ऊपर अल्लाह की नेमत को मत बदलो। मैं तुमपर उस घेरने वाले दिन की यातना से डरता हूँ, जो तुम में से हर एक को पकड़ लेगी, तुम्हें उससे भागने या शरण लेने का स्थान नहीं मिलेगा।
आयत 85
وَيَـٰقَوْمِ أَوْفُوا۟ ٱلْمِكْيَالَ وَٱلْمِيزَانَ بِٱلْقِسْطِ ۖ وَلَا تَبْخَسُوا۟ ٱلنَّاسَ أَشْيَآءَهُمْ وَلَا تَعْثَوْا۟ فِى ٱلْأَرْضِ مُفْسِدِينَ
وَيَـٰقَوْمِ
और ऐ मेरी क़ौम
أَوْفُوا۟
पूरा करो
ٱلْمِكْيَالَ
नाप
وَٱلْمِيزَانَ
और तौल
بِٱلْقِسْطِ ۖ
साथ इन्साफ़ के
وَلَا
और ना
تَبْخَسُوا۟
तुम कम दो
ٱلنَّاسَ
लोगों को
أَشْيَآءَهُمْ
चीज़ें उनकी
وَلَا
और ना
تَعْثَوْا۟
तुम फ़साद करो
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
مُفْسِدِينَ
मुफ़सिद बनकर
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! इनसाफ़ के साथ नाप और तौल को पूरा रखो। और लोगों को उनकी चीज़ों में घाटा न दो और धरती में बिगाड़ पैदा करनेवाले बनकर अपने मुँह को कुलषित न करो
तफ़्सीर:
और ऐ मेरी जाति के लोगो! जब तुम किसी को नाप-तौलकर कुछ दो, तो न्याय के साथ पूरा-पूरा नापो और तौलो। तथा नाप-तौल में कमी, धोखाधड़ी और चालबाज़ी से लोगों के हुक़ूक़ में कमी न करो। और धरती में हत्या और अन्य गुनाहों से बिगाड़ मत फैलाओ।
आयत 86
بَقِيَّتُ ٱللَّهِ خَيْرٌۭ لَّكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ۚ وَمَآ أَنَا۠ عَلَيْكُم بِحَفِيظٍۢ
بَقِيَّتُ
बाक़ी मान्दा
ٱللَّهِ
अल्लाह का
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
إِن
अगर
كُنتُم
हो तुम
مُّؤْمِنِينَ ۚ
ईमान लाने वाले
وَمَآ
और नहीं
أَنَا۠
मैं
عَلَيْكُم
तुम पर
بِحَفِيظٍۢ
कोई निगहबान
यदि तुम मोमिन हो तो जो अल्लाह के पास शेष रहता है वही तुम्हारे लिए उत्तम है। मैं तुम्हारे ऊपर कोई नियुक्त रखवाला नहीं हूँ।"
तफ़्सीर:
अल्लाह की हलाल बचत, जो वह लोगों को उनके अधिकार न्याय के साथ देने के बाद तुम्हारे लिए बाक़ी रखता है, नाप-तौल में कमी और धरती में बिगाड़ पैदा करने के द्वारा प्राप्त वृद्धि से अधिक लाभदायक और बरकत वाली है। यदि तुम सचमुच मोमिन हो, तो उस बचत से खुश रहो। और मैं तुमपर संरक्षक नहीं हूँँ कि तुम्हारे कार्यों की गिनती रखूँ और उनपर तुम्हारी पकड़ करूँ। उसपर संरक्षक तो वही है, जिसके पास भेदों और कानाफूसियों का ज्ञान है।
आयत 87
قَالُوا۟ يَـٰشُعَيْبُ أَصَلَوٰتُكَ تَأْمُرُكَ أَن نَّتْرُكَ مَا يَعْبُدُ ءَابَآؤُنَآ أَوْ أَن نَّفْعَلَ فِىٓ أَمْوَٰلِنَا مَا نَشَـٰٓؤُا۟ ۖ إِنَّكَ لَأَنتَ ٱلْحَلِيمُ ٱلرَّشِيدُ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
يَـٰشُعَيْبُ
ऐ शुऐब
أَصَلَوٰتُكَ
क्या नमाज़ तेरी
تَأْمُرُكَ
हुक्म देती है तुझे
أَن
कि
نَّتْرُكَ
हम छोड़ दें
مَا
उन्हें जिनकी
يَعْبُدُ
इबादत करते थे
ءَابَآؤُنَآ
आबा ओ अजदाद हमारे
أَوْ
या
أَن
ये कि
نَّفْعَلَ
(ना) हम करें
فِىٓ
concerning
أَمْوَٰلِنَا
अपने मालों में
مَا
जो
نَشَـٰٓؤُا۟ ۖ
हम चाहें
إِنَّكَ
बेशक तू
لَأَنتَ
अलबत्ता तू ही है
ٱلْحَلِيمُ
निहायत बुर्दबार
ٱلرَّشِيدُ
समझदार
वे बोले, "ऐ शुऐब! क्या तेरी नमाज़ तुझे यही सिखाती है कि उन्हें हम छोड़ दें जिन्हें हमारे बाप-दादा पूजते आए है या यह कि हम अपने माल का उपभोग अपनी इच्छानुसार न करें? बस एक तू ही तो बड़ा सहनशील, समझदार रह गया है!"
तफ़्सीर:
शुऐब की जाति के लोगों ने शुऐब से कहा : ऐ शुऐब! क्या तेरी नमाज़ जो तू अल्लाह के लिए पढ़ता है, तुझे यह आदेश देती है कि हम उन मूर्तियों की पूजा छोड़ दें, जिनकी पूजा हमारे बाप-दादा किया करते थे। और तुम्हें यह आदेश देती है कि हम अपने धन का जैसे चाहें उपयोग न करें और जैसे चाहें उसे विकसित न करें?! वास्तव में, तुम बहुत सहनशील और भले आदमी हो। क्योंकि हम तुम्हें इस निमंत्रण से पूर्व समझदार और बुद्धिमान जानते थे, फिर तुम्हें क्या हुआ?!
आयत 88
قَالَ يَـٰقَوْمِ أَرَءَيْتُمْ إِن كُنتُ عَلَىٰ بَيِّنَةٍۢ مِّن رَّبِّى وَرَزَقَنِى مِنْهُ رِزْقًا حَسَنًۭا ۚ وَمَآ أُرِيدُ أَنْ أُخَالِفَكُمْ إِلَىٰ مَآ أَنْهَىٰكُمْ عَنْهُ ۚ إِنْ أُرِيدُ إِلَّا ٱلْإِصْلَـٰحَ مَا ٱسْتَطَعْتُ ۚ وَمَا تَوْفِيقِىٓ إِلَّا بِٱللَّهِ ۚ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإِلَيْهِ أُنِيبُ
قَالَ
उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
أَرَءَيْتُمْ
क्या देखा तुमने
إِن
अगर
كُنتُ
हूँ मैं
عَلَىٰ
on
بَيِّنَةٍۢ
एक वाज़ेह दलील पर
مِّن
from
رَّبِّى
अपने रब की तरफ़ से
وَرَزَقَنِى
और उसने दिया हो मुझे
مِنْهُ
अपने पास से
رِزْقًا
रिज़्क़
حَسَنًۭا ۚ
अच्छा
وَمَآ
और नहीं
أُرِيدُ
मैं चाहता
أَنْ
कि
أُخَالِفَكُمْ
मैं मुख़ालफ़त करुँ तुम्हारी
إِلَىٰ
तरफ़
مَآ
उसके जो
أَنْهَىٰكُمْ
मैं रोकता हूँ तुम्हें
عَنْهُ ۚ
जिस से
إِنْ
नहीं
أُرِيدُ
मैं चाहता
إِلَّا
मगर
ٱلْإِصْلَـٰحَ
इस्लाह
مَا
जितनी
ٱسْتَطَعْتُ ۚ
मैं इस्तिताअत रखता हूँ
وَمَا
और नहीं
تَوْفِيقِىٓ
तौफ़ीक़ मेरी
إِلَّا
मगर
بِٱللَّهِ ۚ
साथ अल्लाह के
عَلَيْهِ
उसी पर
تَوَكَّلْتُ
तवक्कल किया मैंने
وَإِلَيْهِ
और उसी की तरफ़
أُنِيبُ
मैं रुजूअ करता हूँ
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम्हारा क्या विचार है? यदि मैं अपने रब के एक स्पष्ट प्रमाण पर हूँ और उसने मुझे अपनी ओर से अच्छी आजीविका भी प्रदान की (तो झुठलाना मेरे लिए कितना हानिकारक होगा!) और मैं नहीं चाहता कि जिन बातों से मैं तुम्हें रोकता हूँ स्वयं स्वयं तुम्हारे विपरीत उनको करने लगूँ। मैं तो अपने बस भर केवल सुधार चाहता हूँ। मेरा काम बनना तो अल्लाह ही की सहायता से सम्भव है। उसी पर मेरा भरोसा है और उसी की ओर मैं रुजू करता हूँ
तफ़्सीर:
शुऐब ने अपनी जाति के लोगों से कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! तुम मुझे ज़रा यह बताओ, यदि मैं अपने पालनहार की ओर से स्पष्ट प्रमाण तथा दूरदर्शिता पर हूँ और उसने अपनी ओर से मुझे हलाल रोज़ी भी दे रखी है और नुबुव्वत प्रदान की है, तो तुम्हारा हाल क्या होगा। मेरा उद्देश्य यह नहीं है कि मैं तुम्हें किसी चीज़ से रोकूँ और तुम्हारी मुखालफत करते हुए स्वयं वही काम करूँ। मेरा उद्देश्य केवल यह है कि तुम्हें अपने पालनहार की तौहीद की ओर बुलाकर और शक्ति भर उसका आज्ञापालन करके तुम्हारा सुधार करूँ। और मुझे इसका सामर्थ्य प्रदान करने वाला केवल अल्लाह महिमावान है। मैं अपने सभी कामों में अकेले उसी पर भरोसा करता हूँ और उसी की ओर लौटता हूँ।
आयत 89
وَيَـٰقَوْمِ لَا يَجْرِمَنَّكُمْ شِقَاقِىٓ أَن يُصِيبَكُم مِّثْلُ مَآ أَصَابَ قَوْمَ نُوحٍ أَوْ قَوْمَ هُودٍ أَوْ قَوْمَ صَـٰلِحٍۢ ۚ وَمَا قَوْمُ لُوطٍۢ مِّنكُم بِبَعِيدٍۢ
وَيَـٰقَوْمِ
और ऐ मेरी क़ौम
لَا
(Let) not cause you to sin
يَجْرِمَنَّكُمْ
हरगिज़ ना आमादा करे तुम्हें
شِقَاقِىٓ
मुख़ालफ़त /ज़िद मेरी
أَن
कि
يُصِيبَكُم
पहुँचे तुम्हें (भी)
مِّثْلُ
मानिन्द उसके
مَآ
जो
أَصَابَ
पहुँचा
قَوْمَ
क़ौमे
نُوحٍ
नूह को
أَوْ
या
قَوْمَ
क़ौमे
هُودٍ
हूद को
أَوْ
या
قَوْمَ
क़ौमे
صَـٰلِحٍۢ ۚ
सालेह को
وَمَا
और नहीं
قَوْمُ
क़ौमे
لُوطٍۢ
लूत
مِّنكُم
तुम से
بِبَعِيدٍۢ
कुछ दूर
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मेरे प्रति तुम्हारा विरोध कहीं तुम्हें उस अपराध पर न उभारे कि तुमपर वही बीते जो नूह की क़ौम या हूद की क़ौम या सालेह की क़ौम पर बीत चुका है, और लूत की क़ौम तो तुमसे कुछ दूर भी नहीं।
तफ़्सीर:
ऐ मेरी जाति के लोगो! मेरी दुश्मनी तुम्हें मेरी लाई हुई शरीयत को झुठलाने पर न उभारे। मुझे डर है कि तुम्हें उसी प्रकार का अज़ाब न आ घेरे जिस प्रकार का अज़ाब नूह की जाति, या हूद की जाति, या सालेह की जाति पर आया और लूत की जाति तो तुमसे समय एवं स्थान के हिसाब से कुछ दूर नहीं है। और तुम जानते हो कि उनके साथ क्या हुआ था। अतः कुछ सीख लो।
आयत 90
وَٱسْتَغْفِرُوا۟ رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُوٓا۟ إِلَيْهِ ۚ إِنَّ رَبِّى رَحِيمٌۭ وَدُودٌۭ
وَٱسْتَغْفِرُوا۟
और बख़्शिश माँगो
رَبَّكُمْ
अपने रब से
ثُمَّ
फिर
تُوبُوٓا۟
तौबा करो
إِلَيْهِ ۚ
तरफ़ उसके
إِنَّ
बेशक
رَبِّى
मेरा रब
رَحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
وَدُودٌۭ
बहुत मोहब्बत करने वाला है
अपने रब से क्षमा माँगो और फिर उसकी ओर पलट आओ। मेरा रब तो बड़ा दयावन्त, बहुत प्रेम करनेवाला हैं।"
तफ़्सीर:
और अपने पालनहार से क्षमा माँगो, फिर अपने गुनाहों से उससे तौबा करो। मेरा पालनहार तौबा करने वालों पर दयावान् और उनसे बहुत प्रेम करने वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
लूत की कौम पर अज़ाब और शुऐब अलैहिस्सलाम की दावत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि बेहयाई और नाप-तोल में बेईमानी दोनों समाज को तबाह करने वाली बुराइयां हैं।
आयत 91
قَالُوا۟ يَـٰشُعَيْبُ مَا نَفْقَهُ كَثِيرًۭا مِّمَّا تَقُولُ وَإِنَّا لَنَرَىٰكَ فِينَا ضَعِيفًۭا ۖ وَلَوْلَا رَهْطُكَ لَرَجَمْنَـٰكَ ۖ وَمَآ أَنتَ عَلَيْنَا بِعَزِيزٍۢ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
يَـٰشُعَيْبُ
ऐ शुऐब
مَا
नहीं
نَفْقَهُ
हम समझ पाते
كَثِيرًۭا
बहुत सा
مِّمَّا
उसमें से जो
تَقُولُ
तुम कहते को
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَنَرَىٰكَ
अलबत्ता हम देखते हैं तुझे
فِينَا
अपने में
ضَعِيفًۭا ۖ
बहुत कमज़ोर
وَلَوْلَا
और अगर ना होता
رَهْطُكَ
क़बीला तेरा
لَرَجَمْنَـٰكَ ۖ
अलबत्ता संगसार कर देते हम तुझे
وَمَآ
और नहीं
أَنتَ
तू
عَلَيْنَا
हम पर
بِعَزِيزٍۢ
कुछ ग़ालिब
उन्होंने कहा, "ऐ शुऐब! तेरी बहुत-सी बातों को समझने में तो हम असमर्थ है। और हम तो तुझे देखते है कि तू हमारे मध्य अत्यन्त निर्बल है। यदि तेरे भाई-बन्धु न होते तो हम पत्थर मार-मारकर कभी का तुझे समाप्त कर चुके होते। तू इतने बल-बूतेवाला तो नहीं कि हमपर भारी हो।"
तफ़्सीर:
शुऐब अलैहिस्सलाम की जाति के लोगों ने शुऐब से कहा : हम तुम्हारी लाई हुई बहुत-सी बातें नहीं समझते हैं। और चूँकि तुम्हारी आँखों में कमज़ोरी या अंधापन आ गया है, इसलिए हम तुम्हें अपने बीच कमज़ोर समझते हैं। यदि तुम्हारा कुल हमारे धर्म पर न होता, तो हम अवश्य तुम्हें पत्थर फेंककर मार डालते। तथा तुम हमारे निकट प्रिय (प्रतिष्ठित) भी नहीं हो कि हम तुम्हारी हत्या करने से डरें। हम केवल तुम्हारे कुल के सम्मान में तुम्हारी हत्या से रुके हुए हैं।
आयत 92
قَالَ يَـٰقَوْمِ أَرَهْطِىٓ أَعَزُّ عَلَيْكُم مِّنَ ٱللَّهِ وَٱتَّخَذْتُمُوهُ وَرَآءَكُمْ ظِهْرِيًّا ۖ إِنَّ رَبِّى بِمَا تَعْمَلُونَ مُحِيطٌۭ
قَالَ
उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
أَرَهْطِىٓ
क्या क़बीला मेरा
أَعَزُّ
ज़्यादा ज़ोर वाला है
عَلَيْكُم
तुम पर
مِّنَ
than
ٱللَّهِ
अल्लाह से
وَٱتَّخَذْتُمُوهُ
और बना लिया तुमने उसे
وَرَآءَكُمْ
पीछे अपनी
ظِهْرِيًّا ۖ
पुश्त के
إِنَّ
बेशक
رَبِّى
मेरा रब
بِمَا
उसे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
مُحِيطٌۭ
घेरे हुए है
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या मेरे भाई-बन्धु तुमपर अल्लाह से भी ज़्यादा भारी है कि तुमने उसे अपने पीछे डाल दिया? तुम जो कुछ भी करते हो निश्चय ही मेरे रब ने उसे अपने घेरे में ले रखा है
तफ़्सीर:
शुऐब ने अपनी जाति के लगों से कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! क्या मेरा क़बीला तुम्हारे निकट तुम्हारे पालनहार अल्लाह से अधिक सम्मानित एवं प्रभावशाली है?! और तुम लोगों ने अल्लाह को अपने पीछे छोड़ दिया, जब तुम उसके उस नबी पर ईमान नहीं लाए, जिसे उसने तुम्हारी ओर भेजा था। निश्चय ही मेरे पालनहार ने उसे अपने घेरे में ले रखा है जो कुछ तुम कर रहे हो। तुम्हारे कामों मे से कुछ भी उससे छिपा नहीं है। और वह तुम्हें इस दुनिया में विनाश के साथ और आख़िरत में अज़ाब की शक्ल में बदला देगा।
आयत 93
وَيَـٰقَوْمِ ٱعْمَلُوا۟ عَلَىٰ مَكَانَتِكُمْ إِنِّى عَـٰمِلٌۭ ۖ سَوْفَ تَعْلَمُونَ مَن يَأْتِيهِ عَذَابٌۭ يُخْزِيهِ وَمَنْ هُوَ كَـٰذِبٌۭ ۖ وَٱرْتَقِبُوٓا۟ إِنِّى مَعَكُمْ رَقِيبٌۭ
وَيَـٰقَوْمِ
और ऐ मेरी क़ौम
ٱعْمَلُوا۟
अमल करो
عَلَىٰ
(according) to
مَكَانَتِكُمْ
अपनी जगह पर
إِنِّى
बेशक मैं
عَـٰمِلٌۭ ۖ
अमल करने वाला हूँ
سَوْفَ
अनक़रीब
تَعْلَمُونَ
तुम जान लोगे
مَن
कौन है कि
يَأْتِيهِ
आता है उस पर
عَذَابٌۭ
अज़ाब
يُخْزِيهِ
जो रुस्वा कर देगा उसे
وَمَنْ
और कौन है
هُوَ
वो जो
كَـٰذِبٌۭ ۖ
झूठा है
وَٱرْتَقِبُوٓا۟
और इन्तिज़ार करो
إِنِّى
बेशक मैं
مَعَكُمْ
साथ तुम्हारे
رَقِيبٌۭ
इन्तिज़ार करने वाला हूँ
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम अपनी जगह कर्म करते रहो, मैं भी कर रहा हूँ। शीघ्र ही तुमको ज्ञात हो जाएगा कि किसपर वह यातना आती है, जो उसे अपमानित करके रहेगी, और कौन है जो झूठा है! प्रतीक्षा करो, मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा कर रहा हूँ।"
तफ़्सीर:
और ऐ मेरी जाति के लोगो! तुम अपने सामर्थ्य के अनुसार अपने मन पसंद तरीक़े पर काम करो, मैं (भी) अपने पसंद किए हुए तरीक़े पर अपने सामर्थ्य भर कार्य कर रहा हूँ। शीघ्र ही तुम्हें पता चाल जाएगा कि हममें से किसके पास, उसे दंडित करने के लिए, अपमानित करने वाली यातना आती है और हममें से कौन अपने दावे में झूठा है। अतः प्रतीक्षा करो कि अल्लाह क्या निर्णय करता है, मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा कर रहा हूँ।
आयत 94
وَلَمَّا جَآءَ أَمْرُنَا نَجَّيْنَا شُعَيْبًۭا وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَعَهُۥ بِرَحْمَةٍۢ مِّنَّا وَأَخَذَتِ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ ٱلصَّيْحَةُ فَأَصْبَحُوا۟ فِى دِيَـٰرِهِمْ جَـٰثِمِينَ
وَلَمَّا
और जब
جَآءَ
आ गया
أَمْرُنَا
फ़ैसला हमारा
نَجَّيْنَا
निजात दी हमने
شُعَيْبًۭا
शुऐब को
وَٱلَّذِينَ
और उनको जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
مَعَهُۥ
साथ उसके
بِرَحْمَةٍۢ
साथ रहमत के
مِّنَّا
अपनी तरफ़ से
وَأَخَذَتِ
और पकड़ लिया
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया था
ٱلصَّيْحَةُ
चिंघाड़ ने
فَأَصْبَحُوا۟
तो उन्होने सुबह की
فِى
in
دِيَـٰرِهِمْ
अपने घरों में
جَـٰثِمِينَ
औंधे मुँह पड़े हुए
अन्ततः जब हमारा आदेश आ पहुँचा तो हमने अपनी दयालुता से शुऐब और उसके साथ के ईमान लानेवालों को बचा लिया। और अत्याचार करनेवालों को एक प्रचंड चिंघार ने आ लिया और वे अपने घरों में औंधे पड़े रह गए,
तफ़्सीर:
और जब शुऐब की जाति के लोगों को नष्ट करने का हमारा आदेश आ गया, तो हमने अपनी दया से शुऐब और उनके साथ ईमान लाने वालों को बचा लिया। और उसकी जाति के अत्याचारियों को एक विनाशकारी भयानक ध्वनि ने पकड़ लिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई और वे इस तरह औंधे पड़े हुए थे कि उनके चेहरे मिट्टी से चिपक गए थे।
आयत 95
كَأَن لَّمْ يَغْنَوْا۟ فِيهَآ ۗ أَلَا بُعْدًۭا لِّمَدْيَنَ كَمَا بَعِدَتْ ثَمُودُ
كَأَن
गोया कि
لَّمْ
ना
يَغْنَوْا۟
वो बसे थे
فِيهَآ ۗ
उनमें
أَلَا
ख़बरदार
بُعْدًۭا
दूरी है
لِّمَدْيَنَ
मदयन के लिए
كَمَا
जैसा कि
بَعِدَتْ
दूर हुए
ثَمُودُ
समूद
मानो वे वहाँ कभी बसे ही न थे। "सुन लो! फिटकार है मदयनवालों पर, जैसे समूद पर फिटकार हुई!"
तफ़्सीर:
वे ऐसे हो गए, जैसे वे इससे पहले कभी वहाँ बसे ही नहीं थे। सुन रखो, मदयन के लोग अल्लाह के प्रकोप के उतरने के कारण उसकी दया से दूर कर दिए गए, जैसे समूद के लोग अल्लाह का क्रोध उतरने के कारण उसकी दया से दूर कर दिए गए थे।
आयत 96
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مُوسَىٰ بِـَٔايَـٰتِنَا وَسُلْطَـٰنٍۢ مُّبِينٍ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
مُوسَىٰ
मूसा को
بِـَٔايَـٰتِنَا
साथ अपनी आयात के
وَسُلْطَـٰنٍۢ
और दलील
مُّبِينٍ
वाज़ेह के
और हमने मूसा को अपनी निशानियाँ और स्पष्ट प्रमाण के साथ
तफ़्सीर:
और हमने मूसा को अल्लाह की तौह़ीद को दर्शाने वाली अपनी निशानियों तथा जो कुछ वह लेकर आए थे उसकी सत्यता को प्रमाणित करने वाले अपने स्पष्ट तर्कों के साथ भेजा।
आयत 97
إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَإِي۟هِۦ فَٱتَّبَعُوٓا۟ أَمْرَ فِرْعَوْنَ ۖ وَمَآ أَمْرُ فِرْعَوْنَ بِرَشِيدٍۢ
إِلَىٰ
To
فِرْعَوْنَ
तरफ़ फ़िरऔन
وَمَلَإِي۟هِۦ
और उसके सरदारों के
فَٱتَّبَعُوٓا۟
तो उन्होने पैरवी की
أَمْرَ
हुक्म की
فِرْعَوْنَ ۖ
फ़िरऔन के
وَمَآ
और ना (था)
أَمْرُ
हुक्म
فِرْعَوْنَ
फ़िरऔन का
بِرَشِيدٍۢ
भलाई वाला
फ़िरऔन और उसके सरदारों के पास भेजा, किन्तु वे फ़िरऔन ही के कहने पर चले, हालाँकि फ़िरऔन की बात कोई ठीक बात न थी।
तफ़्सीर:
हमने उन्हें फ़िरऔन और उसकी जाति के गणमान्य लोगों की ओर भेजा। तो इन गणमान्य लोगों ने फ़िरऔन के अल्लाह का इनकार करने के आदेश को मान लिया। जबकि फ़िरऔन का आदेश सत्य तक पहुँचाने वाला नहीं था कि उसे माना जाता।
आयत 98
يَقْدُمُ قَوْمَهُۥ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ فَأَوْرَدَهُمُ ٱلنَّارَ ۖ وَبِئْسَ ٱلْوِرْدُ ٱلْمَوْرُودُ
يَقْدُمُ
वो आगे होगा
قَوْمَهُۥ
अपनी क़ौम के
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
فَأَوْرَدَهُمُ
फिर वो ले आएगा उन्हें
ٱلنَّارَ ۖ
आग पर
وَبِئْسَ
और कितनी बुरी है
ٱلْوِرْدُ
घाट
ٱلْمَوْرُودُ
जो वारिद होने की जगह है
क़ियामत के दिन वह अपनी क़ौम के लोगों के आगे होगा - और उसने उन्हें आग में जा उतारा, और बहुत ही बुरा घाट है वह उतरने का!
तफ़्सीर:
क़ियामत के दिन फिरऔन अपनी जाति की आग की ओर अगुवाई करेगा यहाँ तक कि उन्हें उसमें दाखिल कर देगा और वह बहुत ही बुरा उतरने का स्थान है जहाँ वह उन्हें ले जाएगा।
आयत 99
وَأُتْبِعُوا۟ فِى هَـٰذِهِۦ لَعْنَةًۭ وَيَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۚ بِئْسَ ٱلرِّفْدُ ٱلْمَرْفُودُ
وَأُتْبِعُوا۟
और वो पीछे लगाए गए
فِى
in
هَـٰذِهِۦ
इस (दुनिया) में
لَعْنَةًۭ
लानत
وَيَوْمَ
और दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ ۚ
क़यामत के (भी)
بِئْسَ
कितना बुरा है
ٱلرِّفْدُ
इनआम
ٱلْمَرْفُودُ
जो दिया गया
यहाँ भी लानत ने उनका पीछा किया और क़ियामत के दिन भी - बहुत ही बुरा पुरस्कार है यह जो किसी को दिया जाए!
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उन्हें डुबाकर विनष्ट करने के साथ-साथ, दुनिया के जीवन में उनपर धिक्कार, अभिशाप और अपनी दया से दूरी और निष्कासन अंकित कर दिया। तथा क़ियामत के दिन भी उनपर अपनी दया से दूरी और निष्कासन अंकित कर दिया। उनका दुनिया एवं आख़िरत दोनों जगहों में धिक्कार और अज़ाब का भागीदार बनना कितना बुरा है!
आयत 100
ذَٰلِكَ مِنْ أَنۢبَآءِ ٱلْقُرَىٰ نَقُصُّهُۥ عَلَيْكَ ۖ مِنْهَا قَآئِمٌۭ وَحَصِيدٌۭ
ذَٰلِكَ
ये
مِنْ
(is) from
أَنۢبَآءِ
कुछ ख़बरें हैं
ٱلْقُرَىٰ
बस्तियों की
نَقُصُّهُۥ
हम बयान करते हैं उन्हें
عَلَيْكَ ۖ
आप पर
مِنْهَا
उनमें से
قَآئِمٌۭ
कुछ क़ायम हैं
وَحَصِيدٌۭ
और कुछ जड़ से कट चुकी हैं
ये बस्तियों के कुछ वृत्तान्त हैं, जो हम तुम्हें सुना रहे है। इनमें कुछ तो खड़ी है और कुछ की फ़सल कट चुकी है
तफ़्सीर:
इस सूरत में बस्तियों के समाचार में से जो उल्लेख किया गया है, हम (ऐ रसूल) आपको उसके बारे में बता रहे हैं। इनमें से कुछ बस्तियाँ ऐसी हैं, जिनके निशान अभी बाक़ी हैं और कुछ ऐसी हैं, जिनके निशान मिट चुके हैं और उनका कोई चिह्न बाक़ी नहीं है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
शुऐब की कौम के अंजाम का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि नाइंसाफी पर मबनी कारोबार आखिरकार बर्बादी लाता है।
आयत 101
وَمَا ظَلَمْنَـٰهُمْ وَلَـٰكِن ظَلَمُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ ۖ فَمَآ أَغْنَتْ عَنْهُمْ ءَالِهَتُهُمُ ٱلَّتِى يَدْعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مِن شَىْءٍۢ لَّمَّا جَآءَ أَمْرُ رَبِّكَ ۖ وَمَا زَادُوهُمْ غَيْرَ تَتْبِيبٍۢ
وَمَا
और नहीं
ظَلَمْنَـٰهُمْ
ज़ुल्म किया हमने उन पर
وَلَـٰكِن
और लेकिन
ظَلَمُوٓا۟
उन्होंने ज़ुल्म किया
أَنفُسَهُمْ ۖ
अपने नफ़्सों पर
فَمَآ
तो ना
أَغْنَتْ
काम आए
عَنْهُمْ
उन्हें
ءَالِهَتُهُمُ
इलाह उनके
ٱلَّتِى
जिन्हें
يَدْعُونَ
वो पुकारते थे
مِن
other than Allah
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مِن
any
شَىْءٍۢ
कुछ भी
لَّمَّا
जब
جَآءَ
आ गया
أَمْرُ
हुक्म
رَبِّكَ ۖ
आपके रब का
وَمَا
और नहीं
زَادُوهُمْ
उन्होंने ज़्यादा किया उन्हें
غَيْرَ
सिवाय
تَتْبِيبٍۢ
हलाकत के
हमने उनपर अत्याचार नहीं किया, बल्कि उन्होंने स्वयं अपने आप पर अत्याचार किया। फिर जब तेरे रब का आदेश आ गया तो उसके वे पूज्य, जिन्हें वे अल्लाह से हटकर पुकारा करते थे, उनके कुछ भी काम न आ सके। उन्होंने विनाश के अतिरिक्त उनके लिए किसी और चीज़ में अभिवृद्धि नहीं की
तफ़्सीर:
और हमने उन्हें विनष्ट करके उनपर कोई अत्याचार नहीं किया, बल्कि उन्होंने अल्लाह के साथ कुफ़्र करके अपने आपको विनाश का हक़दार बनाकर स्वयं अपने ऊपर अत्याचार किया। ऐ रसूल! जब उन्हें विनष्ट करने का आपके पालनहार का आदेश आ गया, तो वे जिन पूज्यों की पूजा किया करते थे, वे उनसे उनपर आने वाले अज़ाब को न टाल सके तथा नुक़सान एवं विनाश में वृद्धि के सिवा उनके किसी काम न आए।
आयत 102
وَكَذَٰلِكَ أَخْذُ رَبِّكَ إِذَآ أَخَذَ ٱلْقُرَىٰ وَهِىَ ظَـٰلِمَةٌ ۚ إِنَّ أَخْذَهُۥٓ أَلِيمٌۭ شَدِيدٌ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
أَخْذُ
पकड़ है
رَبِّكَ
आपके रब की
إِذَآ
जब
أَخَذَ
वो पकड़ता है
ٱلْقُرَىٰ
बस्तियों को
وَهِىَ
जबकि वो
ظَـٰلِمَةٌ ۚ
ज़ालिम होती हैं
إِنَّ
बेशक
أَخْذَهُۥٓ
पकड़ना उसका
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक है
شَدِيدٌ
शदीद है
तेरे रब की पकड़ ऐसी ही होती है, जब वह किसी ज़ालिम बस्ती को पकड़ता है। निस्संदेह उसकी पकड़ बड़ी दुखद, अत्यन्त कठोर होती है
तफ़्सीर:
जिस तरह अल्लाह ने झुठलाने वाली जातियों की पकड़ की और उन्हें जड़ से उखाड़कर फेंक दिया, वैसे ही उसकी पकड़ हर काल और हर स्थान में होती है। निःसंदेह अत्याचार करने वाली बस्तियों के लिए उसकी पकड़ बहुत मज़बूत और दर्दनाक होती है।
आयत 103
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ لِّمَنْ خَافَ عَذَابَ ٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ ذَٰلِكَ يَوْمٌۭ مَّجْمُوعٌۭ لَّهُ ٱلنَّاسُ وَذَٰلِكَ يَوْمٌۭ مَّشْهُودٌۭ
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
उसमें
لَـَٔايَةًۭ
अलबत्ता एक निशानी है
لِّمَنْ
उसके लिए जो
خَافَ
डरे
عَذَابَ
अज़ाब से
ٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ
आख़िरत के
ذَٰلِكَ
ये है
يَوْمٌۭ
दिन
مَّجْمُوعٌۭ
जमा किए जाऐंगे
لَّهُ
उसके लिए
ٱلنَّاسُ
लोग
وَذَٰلِكَ
और ये है
يَوْمٌۭ
दिन
مَّشْهُودٌۭ
हाज़िरी का
निश्चय ही इसमें उस व्यक्ति के लिए एक निशानी है जो आख़िरत की यातना से डरता हो। वह एक ऐसा दिन होगा, जिसमें सारे ही लोग एकत्र किए जाएँगे और वह एक ऐसा दिन होगा, जिसमें सब कुछ आँखों के सामने होगा,
तफ़्सीर:
निश्चय ही अल्लाह के उन अत्याचारी बस्तियों को पकड़ने में उसके लिए सीख और उपदेश है, जो क़ियामत के दिन के अज़ाब से डरता हो। यह वही दिन है, जिसमें अल्लाह लोगों को उनके हिसाब-किताब के लिए एकत्रित करेगा, और वह उपस्थिति का दिन है, जिसमें सभी मह्शर वाले उपस्थित होंगे।
आयत 104
وَمَا نُؤَخِّرُهُۥٓ إِلَّا لِأَجَلٍۢ مَّعْدُودٍۢ
وَمَا
और नहीं
نُؤَخِّرُهُۥٓ
हम मुअख़्ख़र कर रहे उसे
إِلَّا
मगर
لِأَجَلٍۢ
एक मुद्दत के लिए
مَّعْدُودٍۢ
गिनी चुनी
हम उसे केवल थोड़ी अवधि के लिए ही लग रहे है;
तफ़्सीर:
और हम उस उपस्थिति (क़ियामत) के दिन को केवल एक ऐसी अवधि के लिए विलंबित कर रहे हैं जिसकी संख्या (अल्लाह के यहाँ) ज्ञात है।
आयत 105
يَوْمَ يَأْتِ لَا تَكَلَّمُ نَفْسٌ إِلَّا بِإِذْنِهِۦ ۚ فَمِنْهُمْ شَقِىٌّۭ وَسَعِيدٌۭ
يَوْمَ
जिस दिन
يَأْتِ
वो आ जाएगी
لَا
not
تَكَلَّمُ
ना कलाम करेगा
نَفْسٌ
कोई नफ़्स
إِلَّا
मगर
بِإِذْنِهِۦ ۚ
उसके इज़्न के
فَمِنْهُمْ
तो उनमें से कोई
شَقِىٌّۭ
बदबख़्त होगा
وَسَعِيدٌۭ
और कोई नेकबख़्त होगा
जिस दिन वह आएगा, तो उसकी अनुमति के बिना कोई व्यक्ति बात तक न कर सकेगा। फिर (मानवों में) कोई तो उनमें अभागा होगा और कोई भाग्यशाली
तफ़्सीर:
जिस दिन वह दिन आ जाएगा, तो कोई भी प्राणी किसी तर्क अथवा अनुशंसा की बात उसकी अनुमति के बाद ही कर सकेगा। उस दिन लोग दो प्रकार के होंगे : एक अभागा जो दोज़ख में जाएगा और एक भाग्यशाली जो जन्नत में प्रवेश करेगा।
आयत 106
فَأَمَّا ٱلَّذِينَ شَقُوا۟ فَفِى ٱلنَّارِ لَهُمْ فِيهَا زَفِيرٌۭ وَشَهِيقٌ
فَأَمَّا
तो रहे
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
شَقُوا۟
बदबख़्त हुए
فَفِى
then (they will be) in
ٱلنَّارِ
तो आग में होंगे
لَهُمْ
उनके लिए
فِيهَا
उसमें
زَفِيرٌۭ
चीख़ो पुकार होगी
وَشَهِيقٌ
और दहाड़ना होगा
तो जो अभागे होंगे, वे आग में होंगे; जहाँ उन्हें आर्तनाद करना और फुँकार मारना है
तफ़्सीर:
जहाँ तक अपने कुफ्र और भ्रष्ट कर्मों के कारण अभागा ठहरने वाले लोगों की बात है, तो वे नरक में प्रवेश करेंगे। जिसमें, आग की लपटों से ग्रस्त होने की गंभीरता से, उनकी आवाज़ें और साँसें ऊँची हो जाएँगी।
आयत 107
خَـٰلِدِينَ فِيهَا مَا دَامَتِ ٱلسَّمَـٰوَٰتُ وَٱلْأَرْضُ إِلَّا مَا شَآءَ رَبُّكَ ۚ إِنَّ رَبَّكَ فَعَّالٌۭ لِّمَا يُرِيدُ
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَا
उसमें
مَا
as long as remain
دَامَتِ
जब तक क़ायम हैं
ٱلسَّمَـٰوَٰتُ
आसमान
وَٱلْأَرْضُ
और ज़मीन
إِلَّا
मगर
مَا
जो
شَآءَ
चाहे
رَبُّكَ ۚ
रब आपका
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
فَعَّالٌۭ
कर गुज़रने वाला है
لِّمَا
उसे जो
يُرِيدُ
वो चाहता है
वहाँ वे सदैव रहेंगे, जब तक आकाश और धरती स्थिर रहें, बात यह है कि तुम्हारे रब की इच्छा ही चलेगी। तुम्हारा रब जो चाहे करे
तफ़्सीर:
वे उसमें सदैव रहेंगे, जब तक आकाश और धरती विद्यमान् हैं, वे उससे बाहर नहीं निकलेंगे। परन्तु अल्लाह एकेश्वरवादी अवज्ञाकारियों में से जिसे निकालना चाहे (उसे निकाल सकता है)। निःसंदेह (ऐ रसूल) आपका पालनहार जो चाहे, उसे कर गुज़रने वाला है। उसे कोई विवश नहीं कर सकता।
आयत 108
۞ وَأَمَّا ٱلَّذِينَ سُعِدُوا۟ فَفِى ٱلْجَنَّةِ خَـٰلِدِينَ فِيهَا مَا دَامَتِ ٱلسَّمَـٰوَٰتُ وَٱلْأَرْضُ إِلَّا مَا شَآءَ رَبُّكَ ۖ عَطَآءً غَيْرَ مَجْذُوذٍۢ
۞ وَأَمَّا
और रहे
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
سُعِدُوا۟
नेकबख़्त हुए
فَفِى
then (they will be) in
ٱلْجَنَّةِ
तो जन्नत में होंगे
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَا
उसमें
مَا
as long as remains
دَامَتِ
जब तक क़ायम हैं
ٱلسَّمَـٰوَٰتُ
आसमान
وَٱلْأَرْضُ
और ज़मीन
إِلَّا
मगर
مَا
जो
شَآءَ
चाहे
رَبُّكَ ۖ
रब आपका
عَطَآءً
बख़्शिश है
غَيْرَ
ना
مَجْذُوذٍۢ
ख़त्म होने वाली
रहे वे जो भाग्यशाली होंगे तो वे जन्नत में होंगे, जहाँ वे सदैव रहेंगे जब तक आकाश और धरती स्थिर रहें। बात यह है कि तुम्हारे रब की इच्छा ही चलेगी। यह एक ऐसा उपहार है, जिसका सिलसिला कभी न टूटेगा
तफ़्सीर:
जहाँ तक भाग्यशाली लोगों की बात है, जिनके लिए उनके ईमान और अच्छे कार्यों के कारण पहले ही से अल्लाह की ओर से भाग्यशाली होना लिख दिया गया है, वे सदैव जन्नत में रहेंगे जब तक आकाश और धरती विद्यमान् हैं, सिवाय इसके कि अल्लाह अवज्ञाकारी मोमिनों में से जिसे जन्नत से पूर्व दोज़ख में डालना चाहे। जन्नत वालों को मिलने वाली अल्लाह की नेमतें कभी ख़त्म नहीं होंगी।
आयत 109
فَلَا تَكُ فِى مِرْيَةٍۢ مِّمَّا يَعْبُدُ هَـٰٓؤُلَآءِ ۚ مَا يَعْبُدُونَ إِلَّا كَمَا يَعْبُدُ ءَابَآؤُهُم مِّن قَبْلُ ۚ وَإِنَّا لَمُوَفُّوهُمْ نَصِيبَهُمْ غَيْرَ مَنقُوصٍۢ
فَلَا
पस ना
تَكُ
हों आप
فِى
in
مِرْيَةٍۢ
शक में
مِّمَّا
उस से जिसकी
يَعْبُدُ
इबादत करते हैं
هَـٰٓؤُلَآءِ ۚ
ये लोग
مَا
नहीं
يَعْبُدُونَ
वो इबादत करते
إِلَّا
मगर
كَمَا
जैसा कि
يَعْبُدُ
इबादत करते थे
ءَابَآؤُهُم
आबा ओ अजदाद उनके
مِّن
before
قَبْلُ ۚ
इससे पहले
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَمُوَفُّوهُمْ
अलबत्ता पूरा-पूरा देने वाले हैं उन्हें
نَصِيبَهُمْ
हिस्सा उनका
غَيْرَ
बग़ैर
مَنقُوصٍۢ
कमी किए
अतः जिनको ये पूज रहे है, उनके विषय में तुझे कोई संदेह न हो। ये तो बस उसी तरह पूजा किए जा रहे है, जिस तरह इससे पहले इनके बाप-दादा पूजा करते रहे हैं। हम तो इन्हें इनका हिस्सा बिना किसी कमी के पूरा-पूरा देनेवाले हैं
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) ये मुश्रिक लोग जिन (मूर्तियों) की पूजा कर रहे हैं, उनके भ्रष्ट होने के संबंध में आपको कोई संदेह नहीं होना चाहिए। क्योंकि उनके पास उसके सही होने पर कोई बौद्धिक या शरई प्रमाण नहीं है। बल्कि, उनके अल्लाह के अलावा अन्य को पूजने का कारण, मात्र अपने बाप-दादा का अनुकरण (नकल) है। निःसंदेह हम बिना कमी के उन्हें उनकी यातना का पूरा-पूरा हिस्सा देने वाले हैं।
आयत 110
وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ فَٱخْتُلِفَ فِيهِ ۚ وَلَوْلَا كَلِمَةٌۭ سَبَقَتْ مِن رَّبِّكَ لَقُضِىَ بَيْنَهُمْ ۚ وَإِنَّهُمْ لَفِى شَكٍّۢ مِّنْهُ مُرِيبٍۢ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
ءَاتَيْنَا
दी हमने
مُوسَى
मूसा को
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
فَٱخْتُلِفَ
पस इख़्तिलाफ़ किया गया
فِيهِ ۚ
उसमें
وَلَوْلَا
और अगर ना होती
كَلِمَةٌۭ
एक बात
سَبَقَتْ
जो गुज़र चुकी
مِن
from
رَّبِّكَ
आपके रब की तरफ़ से
لَقُضِىَ
अलबत्ता फ़ैसला कर दिया जाता
بَيْنَهُمْ ۚ
दर्मियान उनके
وَإِنَّهُمْ
और बेशक वो
لَفِى
surely (are) in
شَكٍّۢ
अलबत्ता शक में हैं
مِّنْهُ
उसकी तरफ़ से
مُرِيبٍۢ
बेचैन करने वाले
हम मूसा को भी किताब दे चुके है। फिर उसमें भी विभेद किया गया था। यदि तुम्हारे रब की ओर से एक बात पहले ही निश्चित न कर दी गई होती तो उनके बीच कभी का फ़ैसला कर दिया गया होता। ये उसकी ओर से असमंजस में डाल देनेवाले संदेह में पड़े हुए है
तफ़्सीर:
और हमने मूसा को तौरात दी थी, फिर लोगों ने उसमें विभेद किया। कुछ लोग उसपर ईमान लाए और कुछ लोगों ने उसका इनकार किया। यदि अल्लाह का यह पूर्व निर्धारित निर्णय न होता कि वह शीघ्र ही (दुनिया में) यातना नहीं देगा, बल्कि अपनी हिकमत के तहत उसे क़ियामत तक के लिए विलंबित रखेगा, तो दुनिया ही में वह अज़ाब आ जाता, जिसके वे हक़दार हैं। यहूदियों तथा बहुदेववादियों में से काफ़िर लोग कुरआन के संबंध में संदेह में पड़े हुए हैं, जो असमंजस में डालने वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
पिछली कौमों के वाकियात से इबरत लेने की ताकीद है। यह हमें सिखाता है कि गुज़री कौमों के वाकियात हमें नसीहत के लिए बताए गए हैं, इनसे सबक लेना चाहिए न कि सिर्फ कहानी समझना चाहिए।
आयत 111
وَإِنَّ كُلًّۭا لَّمَّا لَيُوَفِّيَنَّهُمْ رَبُّكَ أَعْمَـٰلَهُمْ ۚ إِنَّهُۥ بِمَا يَعْمَلُونَ خَبِيرٌۭ
وَإِنَّ
और बेशक
كُلًّۭا
हर एक को
لَّمَّا
जब (वक़्त आएगा)
لَيُوَفِّيَنَّهُمْ
अलबत्ता ज़रूर पूरा-पूरा देगा उन्हें
رَبُّكَ
रब आपका
أَعْمَـٰلَهُمْ ۚ
उनके आमाल (का बदला)
إِنَّهُۥ
बेशक वो
بِمَا
उससे जो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते हैं
خَبِيرٌۭ
ख़ूब बाख़बर है
निश्चय ही समय आने पर एक-एक को, जितने भी है उनको तुम्हारा रब उनका किया पूरा-पूरा देकर रहेगा। वे जो कुछ कर रहे हैं, निस्संदेह उसे उसकी पूरी ख़बर है
तफ़्सीर:
जिन मतभेद करने वालों का भी उल्लेख किया गया है, उनमें से प्रत्येक को (ऐ रसूल!) आपका पालनहार उसके कर्मों का अवश्य पूरा बदला देगा। चुनाँचे जिसका कर्म अच्छा था, उसका बदला अच्छा होगा और जिसका कर्म बुरा था, उसका बदला बुरा होगा। निःसंदेह अल्लाह उनके छोटे-छोटे कर्मों से भी सूचित है, उनके कामों में से कुछ भी उससे छिपा नहीं है।
आयत 112
فَٱسْتَقِمْ كَمَآ أُمِرْتَ وَمَن تَابَ مَعَكَ وَلَا تَطْغَوْا۟ ۚ إِنَّهُۥ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌۭ
فَٱسْتَقِمْ
पस क़ायम रहिए
كَمَآ
जैसा कि
أُمِرْتَ
हुक्म दिए गए आप
وَمَن
और वो (भी) जो
تَابَ
तौबा करे
مَعَكَ
आपके साथ
وَلَا
और ना
تَطْغَوْا۟ ۚ
तुम सरकशी करो
إِنَّهُۥ
बेशक वो
بِمَا
उसे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
بَصِيرٌۭ
ख़ूब देखने वाला है
अतः जैसा तुम्हें आदेश हुआ है, जमें रहो और तुम्हारे साथ के तौबा करनेवाले भी जमें रहें, और सीमोल्लंघन न करना। जो कुछ भी तुम करते हो, निश्चय ही वह उसे देख रहा है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) हमेशा सीधे रास्ते पर जमे रहें, जैसा कि अल्लाह ने आपको आदेश दिया है। अतः उसके आदेशों का पालन करें और उसके निषेधों से बचें। इसी तरह आपके साथ तौबा करने वाले मोमिन भी सीधे रास्ते पर जमे रहें। तथा तुम गुनाहों में पड़कर सीमा का उल्लंघन न करो। निश्चय ही वह तुम्हारे कर्मों को देख रहा है। उससे तुम्हारा कोई काम छिपा नहीं है और वह तुम्हें उसका बदला देगा।
आयत 113
وَلَا تَرْكَنُوٓا۟ إِلَى ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ فَتَمَسَّكُمُ ٱلنَّارُ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِنْ أَوْلِيَآءَ ثُمَّ لَا تُنصَرُونَ
وَلَا
और ना
تَرْكَنُوٓا۟
तुम झुको/माइल हो
إِلَى
to
ٱلَّذِينَ
तरफ़ उनके जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
فَتَمَسَّكُمُ
वरना छू लेगी तुम्हें
ٱلنَّارُ
आग
وَمَا
और नहीं (होगा)
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّن
besides Allah
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مِنْ
any
أَوْلِيَآءَ
कोई दोस्त
ثُمَّ
फिर
لَا
not
تُنصَرُونَ
ना तुम मदद दिए जाओगे
उन लोगों की ओर तनिक भी न झुकना, जिन्होंने अत्याचार की नीति अपनाई हैं, अन्यथा आग तुम्हें आ लिपटेगी - और अल्लाह से हटकर तुम्हारा कोई संरक्षक मित्र नहीं - फिर तुम्हें कोई सहायता भी न मिलेगी
तफ़्सीर:
चाटुकारिता या स्नेह के साथ अत्याचारी काफ़िरों की ओर झुकाव न करें, अन्यथा इस झुकाव के कारण तुम्हें (भी) आग पकड़ लेगी। और अल्लाह के सिवा तुम्हारा कोई सहायक न होगा, जो तुम्हें उससे बचा सके। फिर तुम्हें कोई ऐसा नहीं मिलेगा जो तुम्हारी सहायता कर सके।
आयत 114
وَأَقِمِ ٱلصَّلَوٰةَ طَرَفَىِ ٱلنَّهَارِ وَزُلَفًۭا مِّنَ ٱلَّيْلِ ۚ إِنَّ ٱلْحَسَنَـٰتِ يُذْهِبْنَ ٱلسَّيِّـَٔاتِ ۚ ذَٰلِكَ ذِكْرَىٰ لِلذَّٰكِرِينَ
وَأَقِمِ
और क़ायम कीजिए
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
طَرَفَىِ
दोनों किनारों पर
ٱلنَّهَارِ
दिन के
وَزُلَفًۭا
और कुछ हिस्सा
مِّنَ
of
ٱلَّيْلِ ۚ
रात में से
إِنَّ
बेशक
ٱلْحَسَنَـٰتِ
नेकियाँ
يُذْهِبْنَ
ले जाती हैं
ٱلسَّيِّـَٔاتِ ۚ
बुराइयों को
ذَٰلِكَ
ये
ذِكْرَىٰ
याद दिहानी है
لِلذَّٰكِرِينَ
याद रखने वालों के लिए
और नमाज़ क़ायम करो दिन के दोनों सिरों पर और रात के कुछ हिस्से में। निस्संदेह नेकियाँ बुराइयों को दूर कर देती है। यह याद रखनेवालों के लिए एक अनुस्मरण है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप दिन के दोनों सिरों में अर्थात दिन की शुरुआत और उसके अंत में अच्छे ढंग से नमाज़ क़ायम कीजिए। तथा रात के कुछ क्षणों में भी उसकी स्थापना कीजिए। निःसंदेह अच्छे कार्य छोटे गुनाहों को मिटा देते हैं। उपर्युक्त बातें सीख लेने वालों के लिए, एक सीख हैं।
आयत 115
وَٱصْبِرْ فَإِنَّ ٱللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجْرَ ٱلْمُحْسِنِينَ
وَٱصْبِرْ
और सब्र कीजिए
فَإِنَّ
पस बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يُضِيعُ
नहीं वो ज़ाया करता
أَجْرَ
अजर
ٱلْمُحْسِنِينَ
एहसान करने वालों का
और धैर्य से काम लो, इसलिए कि अल्लाह सुकर्मियों को बदला अकारथ नहीं करता;
तफ़्सीर:
तथा आपको सीधे मार्ग पर जमे रहने आदि का जो आदेश दिया गया है, उसे करने और सीमोल्लंघन एवं अत्याचारियों की ओर झुकाव से जो रोका गया है, उसे छोड़ने पर धैर्य से काम लें। निःसंदेह अल्लाह सदाचारियों का प्रतिफल नष्ट नहीं करता, बल्कि उनके अच्छे कर्मों को स्वीकार करता है और उनका बहुत अच्छा बदला देता है।
आयत 116
فَلَوْلَا كَانَ مِنَ ٱلْقُرُونِ مِن قَبْلِكُمْ أُو۟لُوا۟ بَقِيَّةٍۢ يَنْهَوْنَ عَنِ ٱلْفَسَادِ فِى ٱلْأَرْضِ إِلَّا قَلِيلًۭا مِّمَّنْ أَنجَيْنَا مِنْهُمْ ۗ وَٱتَّبَعَ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ مَآ أُتْرِفُوا۟ فِيهِ وَكَانُوا۟ مُجْرِمِينَ
فَلَوْلَا
फिर क्यों ना
كَانَ
हुए
مِنَ
of
ٱلْقُرُونِ
उन उम्मतों में से
مِن
before you
قَبْلِكُمْ
जो तुमसे पहले थीं
أُو۟لُوا۟
those possessing a remnant
بَقِيَّةٍۢ
अन्जाम पर नज़र रखने वाले
يَنْهَوْنَ
जो रोकते
عَنِ
from
ٱلْفَسَادِ
फ़साद से
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا
बहुत थोड़े
مِّمَّنْ
उनमें से
أَنجَيْنَا
निजात दी हमने
مِنْهُمْ ۗ
उनमें से
وَٱتَّبَعَ
और पीछे लगे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
مَآ
उसके जो
أُتْرِفُوا۟
वो ऐश व आराम दिए गए थे
فِيهِ
जिस में
وَكَانُوا۟
और थे वो
مُجْرِمِينَ
मुजरिम
फिर तुमसे पहले जो नस्लें गुज़र चुकी है उनमें ऐसे भले-समझदार क्यों न हुए जो धरती में बिगाड़ से रोकते, उन थोड़े-से लोगों के सिवा जिनको उनमें से हमने बचा लिया। अत्याचारी लोग तो उसी सुख-सामग्री के पीछे पड़े रहे, जिसमें वे रखे गए थे। वे तो थे ही अपराधी
तफ़्सीर:
ऐसा क्यों न हुआ कि पहले के यातना ग्रस्त समुदायों में कुछ सदाचारी होते, जो उन समुदायों को कुफ्र से तथा गुनाहों के द्वारा धरती पर उपद्रव करने से रोकते। उनके अंदर ऐसे लोग नहीं रह गए थे, सिवाय उनमें से कुछ के जो भ्रष्टाचार से मना कर रहे थे। अतः उनकी अत्याचारी जाति को विनष्ट करते समय हमने उनको बचा लिया। जबकि उन जातियों के अत्याचारी लोग सुख और आनंद के पीछे लगे रहे। और ऐसा करके वे अन्याय कर रहे थे।
आयत 117
وَمَا كَانَ رَبُّكَ لِيُهْلِكَ ٱلْقُرَىٰ بِظُلْمٍۢ وَأَهْلُهَا مُصْلِحُونَ
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
رَبُّكَ
रब आपका
لِيُهْلِكَ
कि वो हलाक कर दे
ٱلْقُرَىٰ
बस्तियों को
بِظُلْمٍۢ
ज़ुल्म से
وَأَهْلُهَا
जबकि बाशिन्दे उसके
مُصْلِحُونَ
इस्लाह करने वाले हों
तुम्हारा रब तो ऐसा नहीं है कि बस्तियों को अकारण विनष्ट कर दे, जबकि वहाँ के निवासी बनाव और सुधार में लगे हों
तफ़्सीर:
और आपका पालनहार (ऐ रसूल) ऐसा नहीं है कि वह बस्तियों में से किसी बस्ती को विनष्ट कर दे, जबकि उसके वासी धरती में सुधार का करने वाले हों। बल्कि वह उसे उसी समय विनष्ट करता है, जब उसके वासी कुफ्र, अत्याचार और गुनाहों के द्वारा बिगाड़ पैदा करने वाले हों।
आयत 118
وَلَوْ شَآءَ رَبُّكَ لَجَعَلَ ٱلنَّاسَ أُمَّةًۭ وَٰحِدَةًۭ ۖ وَلَا يَزَالُونَ مُخْتَلِفِينَ
وَلَوْ
और अगर
شَآءَ
चाहता
رَبُّكَ
रब आपका
لَجَعَلَ
अलबत्ता वो बना देता
ٱلنَّاسَ
लोगों को
أُمَّةًۭ
उम्मत
وَٰحِدَةًۭ ۖ
एक ही
وَلَا
but not
يَزَالُونَ
जबकि वो हमेशा रहेंगे
مُخْتَلِفِينَ
इख़्तिलाफ़ करने वाले
और यदि तुम्हारा रब चाहता तो वह सारे मनुष्यों को एक समुदाय बना देता, किन्तु अब तो वे सदैव विभेद करते ही रहेंगे,
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) यदि आपका पालनहार चाहता कि सभी लोगों को सत्य के पथ पर चलने वाला एक समुदाय बना दे, तो ऐसा कर सकता था। परन्तु उसने ऐसा नहीं चाहा। अतः वे इच्छाओं के पीछे चलने और अत्याचार के कारण सत्य के बारे में हमेशा मतभेद करते रहेंगे।
आयत 119
إِلَّا مَن رَّحِمَ رَبُّكَ ۚ وَلِذَٰلِكَ خَلَقَهُمْ ۗ وَتَمَّتْ كَلِمَةُ رَبِّكَ لَأَمْلَأَنَّ جَهَنَّمَ مِنَ ٱلْجِنَّةِ وَٱلنَّاسِ أَجْمَعِينَ
إِلَّا
मगर
مَن
जिस पर
رَّحِمَ
रहम करे
رَبُّكَ ۚ
रब आपका
وَلِذَٰلِكَ
और इसी लिए
خَلَقَهُمْ ۗ
उसने पैदा किया उन्हें
وَتَمَّتْ
और पूरी हो गई
كَلِمَةُ
बात
رَبِّكَ
आपके रब की
لَأَمْلَأَنَّ
अलबत्ता मैं ज़रूर भर दूँगा
جَهَنَّمَ
जहन्नम को
مِنَ
with
ٱلْجِنَّةِ
जिन्नों से
وَٱلنَّاسِ
और इन्सानों से
أَجْمَعِينَ
सबके सब
सिवाय उनके जिनपर तुम्हारा रब दया करे और इसी के लिए उसने उन्हें पैदा किया है, और तुम्हारे रब की यह बात पूरी होकर रही कि "मैं जहन्नम को अपराधी जिन्नों और मनुष्यों सबसे भरकर रहूँगा।"
तफ़्सीर:
परन्तु जिन्हें अल्लाह सीधे मार्ग का सामर्थ्य प्रदानकर उनपर दया करे, तो वे अल्लाह महिमावान के एकेश्वरवाद में विभेद नहीं करेंगे। और इसी विभेद के द्वारा परीक्षण के लिए अल्लाह ने उन्हें पैदा किया है। चुनाँचे उनमें से कुछ अभागे हैं और कुछ भाग्यशाली। और (ऐ रसूल) आपके पालनहार की वह बात पूरी हुई, जिसका निर्णय उसने अनादिकाल में किया था कि वह जहन्नम को जिन्नों और इनसानों में से शैतान के अनुयायियों से भर देगा।
आयत 120
وَكُلًّۭا نَّقُصُّ عَلَيْكَ مِنْ أَنۢبَآءِ ٱلرُّسُلِ مَا نُثَبِّتُ بِهِۦ فُؤَادَكَ ۚ وَجَآءَكَ فِى هَـٰذِهِ ٱلْحَقُّ وَمَوْعِظَةٌۭ وَذِكْرَىٰ لِلْمُؤْمِنِينَ
وَكُلًّۭا
और सब कुछ
نَّقُصُّ
हम बयान करते हैं
عَلَيْكَ
आप पर
مِنْ
of
أَنۢبَآءِ
बाज़ ख़बरें
ٱلرُّسُلِ
रसूलों की
مَا
वो जो
نُثَبِّتُ
हम मज़बूत करते हैं
بِهِۦ
साथ उसके
فُؤَادَكَ ۚ
आपके दिल को
وَجَآءَكَ
और आ गया आपके पास
فِى
in
هَـٰذِهِ
उसमें
ٱلْحَقُّ
हक़
وَمَوْعِظَةٌۭ
और नसीहत
وَذِكْرَىٰ
और याद दिहानी
لِلْمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वालों के लिए
रसूलों के वृत्तान्तों में से हर वह कथा जो हम तुम्हें सुनाते है उसके द्वारा हम तुम्हारे हृदय को सुदृढ़ करते हैं। और इसमें तुम्हारे पास सत्य आ गया है और मोमिनों के लिए उपदेश और अनुस्मरण भी
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आपसे पूर्व नबियों की ख़बरों में से जो भी ख़बर हम आपको सुना रहे हैं, उसका उद्देश्य यह है कि हम उसके द्वारा आपके ह्रदय को सत्य पर सुदृढ़ कर दें और उसे मज़बूत कर दें। तथा इस सूरत में आपके पास वह सत्य आ गया, जिसमें कोई संदेह नहीं है। और इसमें आपके पास काफिरों के लिए उपदेश और उन मोमिनों के लिए स्मरण आया है, जो स्मरण से लाभ उठाते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सब्र और नमाज़ की ताकीद का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि नेकी बुराई को मिटा देती है, इसलिए गलती के बाद फौरन नेक अमल की तरफ लौटना चाहिए।
आयत 121
وَقُل لِّلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ ٱعْمَلُوا۟ عَلَىٰ مَكَانَتِكُمْ إِنَّا عَـٰمِلُونَ
وَقُل
और कह दीजिए
لِّلَّذِينَ
उन लेगों को जो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाते
ٱعْمَلُوا۟
अमल करो
عَلَىٰ
(according) to
مَكَانَتِكُمْ
अपनी जगह पर
إِنَّا
बेशक हम (भी)
عَـٰمِلُونَ
अमल करने वाले हैं
जो लोग ईमान नहीं ला रहे हैं उनसे कह दो, "तुम अपनी जगह कर्म किए जाओ, हम भी कर्म कर रहे है
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आप उन लोगों से, जो न अल्लाह पर ईमान रखते हैं और न उसे एक मानते हैं, कह दीजिए कि : तुम सत्य से मुँह फेरने और उससे रोकने के अपने रास्ते पर काम करो, हम अपने सत्य पर सुदृढ़ रहने, उसकी ओर लोगों को बुलाने और उसपर सब्र करने के रास्ते पर काम कर रहे हैं।
आयत 122
وَٱنتَظِرُوٓا۟ إِنَّا مُنتَظِرُونَ
وَٱنتَظِرُوٓا۟
और इन्तिज़ार करो
إِنَّا
बेशक हम (भी)
مُنتَظِرُونَ
इन्तिज़ार करने वाले हैं
तुम भी प्रतीक्षा करो, हम भी प्रतीक्षा कर रहे है।"
तफ़्सीर:
और तुम हमपर आने वाले अज़ाब की प्रतीक्षा करो, निःसंदेह हम भी प्रतीक्षा करते हैं कि तुमपर क्या कुछ आता है।
आयत 123
وَلِلَّهِ غَيْبُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَإِلَيْهِ يُرْجَعُ ٱلْأَمْرُ كُلُّهُۥ فَٱعْبُدْهُ وَتَوَكَّلْ عَلَيْهِ ۚ وَمَا رَبُّكَ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ
وَلِلَّهِ
और अल्लाह ही के लिए है
غَيْبُ
ग़ैब
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों का
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन का
وَإِلَيْهِ
और तरफ़ उसी के
يُرْجَعُ
लौटाया जाता है
ٱلْأَمْرُ
मामला
كُلُّهُۥ
सारे का सारा
فَٱعْبُدْهُ
पस इबादत कीजिए उसकी
وَتَوَكَّلْ
और तवक्कल कीजिए
عَلَيْهِ ۚ
उस पर
وَمَا
और नहीं
رَبُّكَ
रब आपका
بِغَـٰفِلٍ
ग़ाफ़िल
عَمَّا
उससे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
अल्लाह ही का है जो कुछ आकाशों और धरती में छिपा है, और हर मामला उसी की ओर पलटता है। अतः उसी की बन्दगी करो और उसी पर भरोसा रखो। जो कुछ तुम करते हो, उससे तुम्हारा रब बेख़बर नहीं है
तफ़्सीर:
और केवल अल्लाह ही के पास आकाशों तथा धरती कि छिपी चीज़ों का ज्ञान है। उससे इनमें से कुछ भी छिपा नहीं है। तथा अकेले उसी की ओर क़ियामत के दिन सभी मामले लौटाए जाएँगे। अतः (ऐ रसूल) आप अकेले उसी की इबादत करें और अपने सभी मामलों में उसी पर भरोसा करें। आपका पालनहार उससे अनजान नहीं है जो कुछ तुम करते हो, बल्कि वह उससे अवगत है और हर एक को उसके कर्मों का बदला देगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह पर तवक्कुल की ताकीद के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि नतीजा अल्लाह के हाथ में है, हमें अपनी तरफ से कोशिश और भरोसा दोनों रखने चाहिए।
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