सूरह यूसुफ़ سورة يوسف
मक्की 111 आयतें
नाम का मतलब
यूसुफ अलैहिस्सलाम (याक़ूब अलैहिस्सलाम के बेटे, जिनका पूरा वाकिया इस सूरह में है)
पृष्ठभूमि
सूरह यूसुफ में एक ही नबी (यूसुफ अलैहिस्सलाम) का मुकम्मल किस्सा तर्तीब से बयान किया गया है, जिसे कुरआन ने खुद अहसनुल-कसस (सबसे बेहतरीन किस्सा) कहा है। यह सूरह नबी ﷺ को उस दौर में नाज़िल हुई जब आपको सख्त तकलीफें झेलनी पड़ रही थीं, ताकि सब्र और उम्मीद की तालीम मिले। इसमें हसद, सब्र, मुसीबत और आखिरकार कामयाबी का मुकम्मल सफर है।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह सब्र, माफी और अल्लाह की तदबीर पर भरोसे की सबसे बेहतरीन मिसाल मानी जाती है, जिसे खुद कुरआन ने बेहतरीन किस्सा करार दिया है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ الٓر ۚ تِلْكَ ءَايَـٰتُ ٱلْكِتَـٰبِ ٱلْمُبِينِ
الٓر ۚ
अलीफ़ लाम रा
تِلْكَ
ये
ءَايَـٰتُ
आयात हैं
ٱلْكِتَـٰبِ
(of) the Book
ٱلْمُبِينِ
वाज़ेह किताब की
अलिफ़॰ लाम॰ रा॰। ये स्पष्ट किताब की आयतें हैं
तफ़्सीर:
{अलिफ़, लाम, रा।} यह और इस प्रकार के अक्षरों के संबंध में सूरतुल बक़रा के प्रारंभ में बात गुज़र चुकी है। इस सूरत में जो आयतें उतारी गई हैं, वे उस क़ुरआन की आयतें हैं जो अपने विषयों (सामग्रियों) में स्पष्ट है।
आयत 2
إِنَّآ أَنزَلْنَـٰهُ قُرْءَٰنًا عَرَبِيًّۭا لَّعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
إِنَّآ
बेशक हम
أَنزَلْنَـٰهُ
नाज़िल किया हमने उसे
قُرْءَٰنًا
क़ुरआन
عَرَبِيًّۭا
अरबी
لَّعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَعْقِلُونَ
तुम समझ सको
हमने इसे अरबी क़ुरआन के रूप में उतारा है, ताकि तुम समझो
तफ़्सीर:
हमने कुरआन को अरबी भाषा में उतारा है, ताकि (ऐ अरब वासियो!) तुम उसका अर्थ समझ सको।
आयत 3
نَحْنُ نَقُصُّ عَلَيْكَ أَحْسَنَ ٱلْقَصَصِ بِمَآ أَوْحَيْنَآ إِلَيْكَ هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانَ وَإِن كُنتَ مِن قَبْلِهِۦ لَمِنَ ٱلْغَـٰفِلِينَ
نَحْنُ
हम
نَقُصُّ
हम बयान करते हैं
عَلَيْكَ
आप पर
أَحْسَنَ
बेहतरीन
ٱلْقَصَصِ
क़िस्सों में से
بِمَآ
इस वजह से कि
أَوْحَيْنَآ
वही किया हमने
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
هَـٰذَا
ये
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरआन
وَإِن
और बेशक
كُنتَ
थे आप
مِن
before it
قَبْلِهِۦ
इससे पहले
لَمِنَ
surely among
ٱلْغَـٰفِلِينَ
अलबत्ता बेख़बरों में से
इस क़ुरआन की तुम्हारी ओर प्रकाशना करके इसके द्वारा हम तुम्हें एक बहुत ही अच्छा बयान सुनाते है, यद्यपि इससे पहले तुम बेख़बर थे
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) हम आप पर यह क़ुरआन उतारकर, आपको सच्चाई, शब्दों की शुद्धता और उसकी बलाग़त से भरी सबसे अच्छी कहानी सुना रहे हैं। जबकि इसके उतारे जाने से पहले आप इस कहानी से अनजान थे, आपको इसका कोई ज्ञान नहीं था।
आयत 4
إِذْ قَالَ يُوسُفُ لِأَبِيهِ يَـٰٓأَبَتِ إِنِّى رَأَيْتُ أَحَدَ عَشَرَ كَوْكَبًۭا وَٱلشَّمْسَ وَٱلْقَمَرَ رَأَيْتُهُمْ لِى سَـٰجِدِينَ
إِذْ
जब
قَالَ
कहा
يُوسُفُ
यूसुफ़ ने
لِأَبِيهِ
अपने वालिद से
يَـٰٓأَبَتِ
ऐ मेरे अब्बा जान
إِنِّى
बेशक मैं
رَأَيْتُ
देखा मैंने (ख़्वाब में)
أَحَدَ
eleven
عَشَرَ
ग्यारह
كَوْكَبًۭا
सितारों को
وَٱلشَّمْسَ
और सूरज
وَٱلْقَمَرَ
और चाँद को
رَأَيْتُهُمْ
देखा मैंने उन्हें
لِى
मुझे
سَـٰجِدِينَ
सजदा करते हुए
जब यूसुफ़ ने अपने बाप से कहा, "ऐ मेरे बाप! मैंने स्वप्न में ग्यारह सितारे देखे और सूर्य और चाँद। मैंने उन्हें देखा कि वे मुझे सजदा कर रहे है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) हम आपको सूचना दे रहे हैं कि जब यूसुफ़ ने अपने पिता याक़ूब से कहा : ऐ मेरे पिता! मैंने सपने में ग्यारह सितारे देखे, तथा मैंने सूर्य और चंद्रमा को देखा, मैंने उन सभी को मुझे सजदा करते हुए देखा है। यह दृष्टि (स्वप्न) यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के लिए एक अग्रिम शुभसूचना थी।
आयत 5
قَالَ يَـٰبُنَىَّ لَا تَقْصُصْ رُءْيَاكَ عَلَىٰٓ إِخْوَتِكَ فَيَكِيدُوا۟ لَكَ كَيْدًا ۖ إِنَّ ٱلشَّيْطَـٰنَ لِلْإِنسَـٰنِ عَدُوٌّۭ مُّبِينٌۭ
قَالَ
उसने कहा
يَـٰبُنَىَّ
ऐ मेरे बेटे
لَا
(Do) not
تَقْصُصْ
ना तुम बयान करना
رُءْيَاكَ
ख़्वाब अपना
عَلَىٰٓ
to
إِخْوَتِكَ
अपने भाईयों पर
فَيَكِيدُوا۟
पस वो चाल चलेंगे
لَكَ
तेरे लिए
كَيْدًا ۖ
एक चाल
إِنَّ
बेशक
ٱلشَّيْطَـٰنَ
शैतान
لِلْإِنسَـٰنِ
इन्सान के लिए
عَدُوٌّۭ
दुश्मन है
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
उसने कहा, "ऐ मेरे बेटे! अपना स्वप्न अपने भाइयों को मत बताना, अन्यथा वे तेरे विरुद्ध कोई चाल चलेंगे। शैतान तो मनुष्य का खुला हुआ शत्रु है
तफ़्सीर:
याक़ूब ने अपने पुत्र यूसुफ़ से कहा : ऐ मेरे पुत्र! अपना सपना अपने भाइयों को न बताना। अन्यथा वे उसे समझ जाएँगे और तुमसे ईर्ष्या करेंगे। तथा वे ईर्ष्या करते हुए तुम्हारे लिए षडयंत्र रचेंगे। निःसंदेह शैतान मनुष्य का खुला श्मन है।
आयत 6
وَكَذَٰلِكَ يَجْتَبِيكَ رَبُّكَ وَيُعَلِّمُكَ مِن تَأْوِيلِ ٱلْأَحَادِيثِ وَيُتِمُّ نِعْمَتَهُۥ عَلَيْكَ وَعَلَىٰٓ ءَالِ يَعْقُوبَ كَمَآ أَتَمَّهَا عَلَىٰٓ أَبَوَيْكَ مِن قَبْلُ إِبْرَٰهِيمَ وَإِسْحَـٰقَ ۚ إِنَّ رَبَّكَ عَلِيمٌ حَكِيمٌۭ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
يَجْتَبِيكَ
चुन लेगा तुझे
رَبُّكَ
रब तेरा
وَيُعَلِّمُكَ
और वो सिखाएगा तुझे
مِن
of
تَأْوِيلِ
हक़ीक़त में से
ٱلْأَحَادِيثِ
बातों की
وَيُتِمُّ
और वो पूरा कर देगा
نِعْمَتَهُۥ
अपनी नेअमत को
عَلَيْكَ
तुझ पर
وَعَلَىٰٓ
and on
ءَالِ
(the) family
يَعْقُوبَ
और आले याक़ूब पर
كَمَآ
जैसा कि
أَتَمَّهَا
उसने पूरा किया उसे
عَلَىٰٓ
on
أَبَوَيْكَ
तेरे दो बापों पर
مِن
before
قَبْلُ
इससे पहले
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम
وَإِسْحَـٰقَ ۚ
और इसहाक़ पर
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब तेरा
عَلِيمٌ
बहुत इल्म वाला है
حَكِيمٌۭ
ख़ूब हिकमत वाला है
और ऐसा ही होगा, तेरा रब तुझे चुन लेगा और तुझे बातों की तथ्य तक पहुँचना सिखाएगा और अपना अनुग्रह तुझपर और याकूब के घरवालों पर उसी प्रकार पूरा करेगा, जिस प्रकार इससे पहले वह तेरे पूर्वज इबराहीम और इसहाक़ पर पूरा कर चुका है। निस्संदेह तेरा रब सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है।"
तफ़्सीर:
और जिस तरह तूने वह स्वप्न देखा है, वैसे ही (ऐ यूसुफ़!) तेरा पालनहार तुझे चुन लेगा और तुझे सपनों की व्याख्या का ज्ञान प्रदान करेगा। तथा तुझपर नुबुव्वत के द्वारा अपनी नेमत पूरी करेगा। जैसे कि तुझसे पूर्व उसने अपनी नेमत तेरे बाप-दादा : इबराहीम और इसहाक़ पर पूरी की थी। निःसंदेह तेरा पालनहार अपनी सृष्टि का ज्ञान रखने वाला और अपने प्रबंधन में हिकमत वाला है।
आयत 7
۞ لَّقَدْ كَانَ فِى يُوسُفَ وَإِخْوَتِهِۦٓ ءَايَـٰتٌۭ لِّلسَّآئِلِينَ
۞ لَّقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
كَانَ
हैं
فِى
in
يُوسُفَ
यूसुफ़ में
وَإِخْوَتِهِۦٓ
और उसके भाईयों में
ءَايَـٰتٌۭ
निशानियाँ
لِّلسَّآئِلِينَ
सवाल करने वालों के लिए
निश्चय ही यूसुफ़ और उनके भाइयों में सवाल करनेवालों के लिए निशानियाँ है
तफ़्सीर:
निश्चित रूप से यूसुफ़ अलैहिस्सलाम और उनके भाइयों की कहानी में उन लोगों के लिए सीख और उपदेश हैं, जो उनके समाचार के बारे में पूछने वाले हैं।
आयत 8
إِذْ قَالُوا۟ لَيُوسُفُ وَأَخُوهُ أَحَبُّ إِلَىٰٓ أَبِينَا مِنَّا وَنَحْنُ عُصْبَةٌ إِنَّ أَبَانَا لَفِى ضَلَـٰلٍۢ مُّبِينٍ
إِذْ
जब
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لَيُوسُفُ
बिला शुबाह यूसुफ़
وَأَخُوهُ
और उसका भाई
أَحَبُّ
ज़्यादा प्यारे हैं
إِلَىٰٓ
to
أَبِينَا
हमारे वालिद को
مِنَّا
हम से
وَنَحْنُ
हालाँकि हम
عُصْبَةٌ
एक जत्था हैं
إِنَّ
बेशक
أَبَانَا
वालिद हमारे
لَفِى
(is) surely in
ضَلَـٰلٍۢ
अलबत्ता भूल में हैं
مُّبِينٍ
वाज़ेह
जबकि उन्होंने कहा, "यूसुफ़ और उसका भाई हमारे बाप को हमसे अधिक प्रिय है, हालाँकि हम एक पूरा जत्था है। वासत्व में हमारे बाप स्पष्ट तः बहक गए है
तफ़्सीर:
जब उनके भाइयों ने आपस में कहा : यूसुफ़ और उसका सगा भाई हमारे पिता के निकट हमसे अधिक प्रिय हैं। हालाँकि हम एक अच्छी संख्या वाले गिरोह हैं, तो आख़िर कैसे हमारे पिता ने उन दोनों को हमपर श्रेष्ठता दे रखी है? हम समझते हैं कि बिना किसी स्पष्ट कारण के उन दोनों को हमपर श्रेष्ठता देकर वे स्पष्ट भूल कर रहे हैं।
आयत 9
ٱقْتُلُوا۟ يُوسُفَ أَوِ ٱطْرَحُوهُ أَرْضًۭا يَخْلُ لَكُمْ وَجْهُ أَبِيكُمْ وَتَكُونُوا۟ مِنۢ بَعْدِهِۦ قَوْمًۭا صَـٰلِحِينَ
ٱقْتُلُوا۟
क़त्ल कर दो
يُوسُفَ
यूसुफ़ को
أَوِ
या
ٱطْرَحُوهُ
फेंक दो इसे
أَرْضًۭا
किसी ज़मीन में
يَخْلُ
ख़ाली हो जाएगा
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
وَجْهُ
चेहरा
أَبِيكُمْ
तुम्हारे वालिद का
وَتَكُونُوا۟
और तुम हो जाना
مِنۢ
after that
بَعْدِهِۦ
बाद इसके
قَوْمًۭا
लोग
صَـٰلِحِينَ
नेक
यूसुफ़ को मार डालो या उसे किसी भूभाग में फेंक आओ, ताकि तुम्हारे बाप का ध्यान केवल तुम्हारी ही ओर हो जाए। इसके पश्चात तुम फिर नेक बन जाना।"
तफ़्सीर:
यूसुफ़ की हत्या कर दो अथवा दूर किसी धरती में फ़ेंक आओ, तुम्हारे पिता का ध्यान पूर्ण रूप से तुम्हारी ओर हो जाएगा और वह तुमसे पूरी तरह से प्यार करने लगेंगे। फिर उसकी हत्या करने अथवा उसे ग़ायब करने के बाद, अपने गुनाहों से तौबा करके, तुम अच्छे लोग बन जाओ।
आयत 10
قَالَ قَآئِلٌۭ مِّنْهُمْ لَا تَقْتُلُوا۟ يُوسُفَ وَأَلْقُوهُ فِى غَيَـٰبَتِ ٱلْجُبِّ يَلْتَقِطْهُ بَعْضُ ٱلسَّيَّارَةِ إِن كُنتُمْ فَـٰعِلِينَ
قَالَ
कहा
قَآئِلٌۭ
एक कहने वाले ने
مِّنْهُمْ
उन्हीं में से
لَا
(Do) not
تَقْتُلُوا۟
ना तुम क़त्ल करो
يُوسُفَ
यूसुफ़ को
وَأَلْقُوهُ
और डाल दो उसे
فِى
in
غَيَـٰبَتِ
गहराई में
ٱلْجُبِّ
कुएँ की
يَلْتَقِطْهُ
उठा लेगा उसे
بَعْضُ
कोई
ٱلسَّيَّارَةِ
क़ाफ़िला
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
فَـٰعِلِينَ
करने वाले
उनमें से एक बोलनेवाला बोल पड़ा, "यूसुफ़ की हत्या न करो, यदि तुम्हें कुछ करना ही है तो उसे किसी कुएँ की तह में डाल दो। कोई राहगीर उसे उठा लेगा।"
तफ़्सीर:
एक भाई ने कहा : यूसुफ़ को मत मारो। बल्कि यदि उसके साथ वही कुछ करना चाहते हो जो तुमने कहा है, तो उसे किसी गहरे कुएँ में फ़ेंक दो कि वहाँ से गुज़रने वाले कुछ यात्री उसे उठा ले जाएँ। यह उसकी हत्या करने की तुलना में कम हानिकारक है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
यूसुफ अलैहिस्सलाम के ख्वाब और भाइयों के हसद का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि भाई-बहनों के दरमियान हसद रिश्तों को तबाह कर सकता है, इससे बचना चाहिए।
आयत 11
قَالُوا۟ يَـٰٓأَبَانَا مَا لَكَ لَا تَأْمَ۫نَّا عَلَىٰ يُوسُفَ وَإِنَّا لَهُۥ لَنَـٰصِحُونَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
يَـٰٓأَبَانَا
ऐ हमारे अब्बा जान
مَا
क्या है
لَكَ
आपको
لَا
not
تَأْمَ۫نَّا
नहीं आप भरोसा करते हम पर
عَلَىٰ
with
يُوسُفَ
यूसुफ़ के मामले में
وَإِنَّا
हालाँकि बेशक हम
لَهُۥ
उसके लिए
لَنَـٰصِحُونَ
यक़ीनन ख़ैरख़्वाह हैं
उन्होंने कहा, "ऐ हमारे बाप! आपको क्या हो गया है कि यूसुफ़ के मामले में आप हमपर भरोसा नहीं करते, हालाँकि हम तो उसके हितैषी है?
तफ़्सीर:
और जब वे लोग यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को दूर करने (हटाने) पर सहमत हो गए, तो उन्होंने अपने पिता याकूब से कहा : ऐ हमारे पिता! आप यूसुफ़ के संबंध में हमपर विश्वास क्यों नहीं करते? जबकि उसके प्रति हमारा रवैया स्नेहपूर्ण रहता है, हम हर कष्ट से उसे बचाते हैं। और जब तक वह आपके पास सुरक्षित रूप से वापस नहीं आ जाता है, तब तक हम उसकी रक्षा करने और उसकी देखभाल करने में उसके प्रति शुभचिंतक हैं। फिर आपको उसे हमारे साथ भेजने से कौन-सी चीज़ रोक रही है?
आयत 12
أَرْسِلْهُ مَعَنَا غَدًۭا يَرْتَعْ وَيَلْعَبْ وَإِنَّا لَهُۥ لَحَـٰفِظُونَ
أَرْسِلْهُ
भेज दीजिए उसे
مَعَنَا
साथ हमारे
غَدًۭا
कल
يَرْتَعْ
ख़ूब खाए पिए
وَيَلْعَبْ
और खेले
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَهُۥ
उसकी
لَحَـٰفِظُونَ
अलबत्ता हिफ़ाज़त करने वाले हैं
हमारे साथ कल उसे भेज दीजिए कि वह कुछ चर-चुग और खेल ले। उसकी रक्षा के लिए तो हम हैं ही।"
तफ़्सीर:
आप हमें अनुमति दें कि कल हम उसे अपने साथ ले जाएँ, वह खाए-पिएगा और आनंद लेगा और हम उसे हर पहुँचने वाले हर कष्ट से उसे सुरक्षित रखेंगे।
आयत 13
قَالَ إِنِّى لَيَحْزُنُنِىٓ أَن تَذْهَبُوا۟ بِهِۦ وَأَخَافُ أَن يَأْكُلَهُ ٱلذِّئْبُ وَأَنتُمْ عَنْهُ غَـٰفِلُونَ
قَالَ
उसने कहा
إِنِّى
बेशक मैं
لَيَحْزُنُنِىٓ
अलबत्ता ग़मगीन करता है मुझे
أَن
कि
تَذْهَبُوا۟
तुम ले जाओ
بِهِۦ
उसे
وَأَخَافُ
और मैं डरता हूँ
أَن
कि
يَأْكُلَهُ
खा जाए उसे
ٱلذِّئْبُ
भेड़िया
وَأَنتُمْ
जबकि तुम
عَنْهُ
उससे
غَـٰفِلُونَ
ग़ाफ़िल हो
उसने कहा, यह बात कि तुम उसे ले जाओ, मुझे दुखी कर देती है। कहीं ऐसा न हो कि तुम उसका ध्यान न रख सको और भेड़िया उसे खा जाए।"
तफ़्सीर:
याक़ूब ने अपने बेटों से कहा : तुम्हारा उसे अपने साथ ले जाना मेरे लिए दुख का कारण है, क्योंकि मैं उसके अलगाव को बर्दाश्त नहीं कर सकता। साथ ही यह भी डर है कि उसे भेड़िया खा जाए और तुम लोग खाने और खेलने में व्यस्त होकर उससे असावधान हो जाओ।
आयत 14
قَالُوا۟ لَئِنْ أَكَلَهُ ٱلذِّئْبُ وَنَحْنُ عُصْبَةٌ إِنَّآ إِذًۭا لَّخَـٰسِرُونَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لَئِنْ
अलबत्ता अगर
أَكَلَهُ
खा जाए उसे
ٱلذِّئْبُ
भेड़िया
وَنَحْنُ
जब कि हम
عُصْبَةٌ
एक जत्था हैं
إِنَّآ
बेशक हम
إِذًۭا
तब
لَّخَـٰسِرُونَ
अलबत्ता ख़सारा पाने वाले है
वे बोले, "हमारे एक जत्थे के होते हुए भी यदि उसे भेड़िए ने खा लिया, तब तो निश्चय ही हम सब कुछ गँवा बैठे।"
तफ़्सीर:
उन्होंने अपने पिता से कहा : यदि भेड़िये ने यूसुफ़ को खा लिया, जबकि हम एक गिरोह हैं, तो इस स्थिति में हममें कोई भलाई नहीं है। अतः हम बड़े घाटे वाले हैं क्योंकि हम भेड़िये से उसकी रक्षा नहीं कर सके।
आयत 15
فَلَمَّا ذَهَبُوا۟ بِهِۦ وَأَجْمَعُوٓا۟ أَن يَجْعَلُوهُ فِى غَيَـٰبَتِ ٱلْجُبِّ ۚ وَأَوْحَيْنَآ إِلَيْهِ لَتُنَبِّئَنَّهُم بِأَمْرِهِمْ هَـٰذَا وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
فَلَمَّا
तो जब
ذَهَبُوا۟
वो ले गए
بِهِۦ
उसे
وَأَجْمَعُوٓا۟
और उन्होंने तय कर लिया
أَن
कि
يَجْعَلُوهُ
वो डालेंगे उसे
فِى
in
غَيَـٰبَتِ
गहराई में
ٱلْجُبِّ ۚ
कुएँ की
وَأَوْحَيْنَآ
और वही की हमने
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
لَتُنَبِّئَنَّهُم
अलबत्ता तू ज़रूर आगाह करेगा उन्हें
بِأَمْرِهِمْ
उनके काम के बारे में
هَـٰذَا
इस
وَهُمْ
जब कि वो
لَا
(do) not
يَشْعُرُونَ
वो शऊर ना रखते होंगे
फिर जब वे उसे ले गए और सभी इस बात पर सहमत हो गए कि उसे एक कुएँ की गहराई में डाल दें (तो उन्होंने वह किया जो करना चाहते थे), और हमने उसकी ओर प्रकाशना का, "तू उन्हें उनके इस कर्म से अवगत कराएगा और वे जानते न होंगे।"
तफ़्सीर:
फिर याक़ूब ने उसे उनके साथ भेज दिया। जब वे उसे लेकर दूर चले गए और उसे कुएँ के तल में फेंकने का निश्चय कर लिया, तो उस वक़्त हमने यूसुफ़ की ओर वह़्य की : तुम अवश्य उन्हें उनके इस करतूत के बारे में बताओगे और उस समय वे तुम्हें पहचान भी नहीं पाएँगे।
आयत 16
وَجَآءُوٓ أَبَاهُمْ عِشَآءًۭ يَبْكُونَ
وَجَآءُوٓ
और वो आ गए
أَبَاهُمْ
अपने वालिद के पास
عِشَآءًۭ
इशा के वक़्त
يَبْكُونَ
रोते हुए
कुछ रात बीते वे रोते हुए अपने बाप के पास आए
तफ़्सीर:
और यूसुफ़ के भाई अपने फ़रेब को चलाने के लिए रोने का ढोंग करते हुए इशा के समय अपने पिता के पास आए।
आयत 17
قَالُوا۟ يَـٰٓأَبَانَآ إِنَّا ذَهَبْنَا نَسْتَبِقُ وَتَرَكْنَا يُوسُفَ عِندَ مَتَـٰعِنَا فَأَكَلَهُ ٱلذِّئْبُ ۖ وَمَآ أَنتَ بِمُؤْمِنٍۢ لَّنَا وَلَوْ كُنَّا صَـٰدِقِينَ
قَالُوا۟
कहने लगे
يَـٰٓأَبَانَآ
ऐ हमारे अब्बा जान
إِنَّا
बेशक हम
ذَهَبْنَا
चले गए हम
نَسْتَبِقُ
दौड़ का मुक़ाबला करते हुए
وَتَرَكْنَا
और छोड़ गए हम
يُوسُفَ
यूसुफ़ को
عِندَ
पास
مَتَـٰعِنَا
अपने सामान के
فَأَكَلَهُ
फिर खा गया उसे
ٱلذِّئْبُ ۖ
भेड़िया
وَمَآ
और नहीं
أَنتَ
आप
بِمُؤْمِنٍۢ
यक़ीन करने वाले
لَّنَا
हम पर
وَلَوْ
और अगरचे
كُنَّا
हों हम
صَـٰدِقِينَ
सच बोलने वाले
कहने लगे, "ऐ मेरे बाप! हम परस्पर दौड़ में मुक़ाबला करते हुए दूर चले गए और यूसफ़ को हमने अपने सामान के साथ छोड़ दिया था कि इतने में भेड़िया उसे खा गया। आप तो हमपर विश्वास करेंगे नहीं, यद्यपि हम सच्चे है।"
तफ़्सीर:
उन्होंने कहा : ऐ हमारे पिता! हम दौड़ने और तीर फेंकने में प्रतिस्पर्धा करने लगे और यूसुफ़ को अपने कपड़ों और सामानों के पास उनकी हिफ़ाज़त के लिए छोड़ गए। फिर उसे भेड़िए ने खा लिया। और आप तो हमारा विश्वास करने वाले नहीं हैं, भले ही हम वास्तव में अपनी बात में सच्चे ही क्यों न हों।
आयत 18
وَجَآءُو عَلَىٰ قَمِيصِهِۦ بِدَمٍۢ كَذِبٍۢ ۚ قَالَ بَلْ سَوَّلَتْ لَكُمْ أَنفُسُكُمْ أَمْرًۭا ۖ فَصَبْرٌۭ جَمِيلٌۭ ۖ وَٱللَّهُ ٱلْمُسْتَعَانُ عَلَىٰ مَا تَصِفُونَ
وَجَآءُو
और वो लाए
عَلَىٰ
upon
قَمِيصِهِۦ
उसकी क़मीज़ पर
بِدَمٍۢ
ख़ून
كَذِبٍۢ ۚ
झूठा
قَالَ
कहा
بَلْ
बल्कि
سَوَّلَتْ
अच्छा कर के दिखाया
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
أَنفُسُكُمْ
तुम्हारे नफ़्सों ने
أَمْرًۭا ۖ
एक काम को
فَصَبْرٌۭ
तो सब्र ही
جَمِيلٌۭ ۖ
अच्छा है
وَٱللَّهُ
और अल्लाह ही है
ٱلْمُسْتَعَانُ
जिस से मदद तलब की जाती है
عَلَىٰ
against
مَا
उस पर जो
تَصِفُونَ
तुम बयान कर रहे हो
वे उसके कुर्ते पर झूठमूठ का ख़ून लगा लाए थे। उसने कहा, "नहीं, बल्कि तुम्हारे जी ने बहकाकर तुम्हारे लिए एक बात बना दी है। अब धैर्य से काम लेना ही उत्तम है! जो बात तुम बता रहे हो उसमें अल्लाह ही सहायक हो सकता है।"
तफ़्सीर:
उन्होंने अपनी ख़बर की पुष्टि एक चाल के द्वारा की। वे यूसुफ़ के कुर्ते पर किसी और चीज़ का खून लगाकर लाए, यह भ्रम पैदा करने के लिए कि यह भेड़िए के उनको खाने का निशान है। लेकिन याक़ूब अलैहिस्सलाम - इस तथ्य के साथ कि क़मीज़ फटी नहीं थी - उनका झूठ समझ गए। चुनाँचे उनसे कहा : मामला वैसा नहीं है, जैसा तुम बताया है। बल्कि तुम्हारे मन ने एक बुरे काम को सुंदर बनाकर पेश किया है, जिसे तुमने बना लिया है। अब मेरा काम बेहतर सब्र करना है, जिसमें कोई घबराहट नहीं। और यूसुफ़ का जो मामला तुम बता रहे हो, उसपर अल्लाह ही से सहायता अपेक्षित है।
आयत 19
وَجَآءَتْ سَيَّارَةٌۭ فَأَرْسَلُوا۟ وَارِدَهُمْ فَأَدْلَىٰ دَلْوَهُۥ ۖ قَالَ يَـٰبُشْرَىٰ هَـٰذَا غُلَـٰمٌۭ ۚ وَأَسَرُّوهُ بِضَـٰعَةًۭ ۚ وَٱللَّهُ عَلِيمٌۢ بِمَا يَعْمَلُونَ
وَجَآءَتْ
और आया
سَيَّارَةٌۭ
एक क़ाफ़िला
فَأَرْسَلُوا۟
तो उन्होंने भेजा
وَارِدَهُمْ
अपना पानी लाने वाला
فَأَدْلَىٰ
तो उसने डाला
دَلْوَهُۥ ۖ
डोल अपना
قَالَ
बोला
يَـٰبُشْرَىٰ
वाह ख़ुश ख़बरी
هَـٰذَا
ये तो
غُلَـٰمٌۭ ۚ
एक लड़का है
وَأَسَرُّوهُ
और उन्होंने छुपा लिया उसे
بِضَـٰعَةًۭ ۚ
सरमाया (समझकर)
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِمَا
उसे जो
يَعْمَلُونَ
वो अमल कर रहे थे
एक क़ाफ़िला आया। फिर उसने पनिहारा को भेजा। उसने अपना डोल ज्यों ही डाला तो पुकार उठा, "अरे! कितनी ख़ुशी की बात है। यह तो एक लड़का है।" उन्होंने उसे व्यापार का माल समझकर छुपा लिया। किन्तु जो कुछ वे कर रहे थे, अल्लाह तो उसे जानता ही था
तफ़्सीर:
उधर से गुज़रने वाला एक क़ाफ़िला आया और उन्होंने एक व्यक्ति को पानी लाने के लिए भेजा। उसने जैसे ही कुएँ में अपना डोल डाला, यूसुफ़ रस्सी पकड़कर लटक गए। जब डोल डालने वाले व्यक्ति ने उन्हें देखा, तो प्रसन्न होकर पुकार उठा : अरे, कितनी खुशी की बात है! यह तो एक लड़का है। फिर उसने और उसके कुछ साथियों ने मिलकर, उसे व्यापारिक माल समझकर क़ाफ़िले के दूसरे लोगों से छिपा लिया। और वे यूसुफ़ के साथ अपमान तथा ख़रीद-फ़रोख़्त का जो मामला कर रहे थे, अल्लाह उसे खूब जानने वाला है। उनके करतूतों में से कुछ भी उससे छिपा नहीं है।
आयत 20
وَشَرَوْهُ بِثَمَنٍۭ بَخْسٍۢ دَرَٰهِمَ مَعْدُودَةٍۢ وَكَانُوا۟ فِيهِ مِنَ ٱلزَّٰهِدِينَ
وَشَرَوْهُ
और उन्होंने बेच डाला उसे
بِثَمَنٍۭ
क़ीमत पर
بَخْسٍۢ
कम
دَرَٰهِمَ
दरहमों में
مَعْدُودَةٍۢ
गिने चुने
وَكَانُوا۟
और थे वो
فِيهِ
उसमें
مِنَ
of
ٱلزَّٰهِدِينَ
बेरग़बत लोगों में से
उन्होंने उसे सस्ते दाम, गिनती के कुछ दिरहमों में बेच दिया, क्योंकि वे उसके मामलें में बेपरवाह थे
तफ़्सीर:
पानी लाने वाले व्यक्ति तथा उसके साथियों ने उन्हें मिस्र के बाज़ार में सस्ते दाम में बेच दिय। वे मात्र कुछ दिरहम थे, जो कम होने के कारण आसानी से गिने जा सकते थे। और वे उन्हें महँगे दाम में बेचने के इच्छुक भी नहीं थे, क्योंकि वे उनसे जल्दी से छुटकारा पाने के लिए उत्सुक थे। उन्हें उनकी स्थिति से पता चल गया था कि वह कोई गुलाम नहीं हैं और वे उनके परिवार वालों की तरफ़ से अपने ऊपर डर महसूस करते थे। यह यूसुफ़ पर अल्लाह की अनंत कृपा थी, ताकि वह उनके साथ लंबे समय तक न रहें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
यूसुफ अलैहिस्सलाम को कुएं में डाले जाने और गुलामी में बेचे जाने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि मुश्किल हालात में भी अल्लाह पर भरोसा रखने वाले को आखिरकार राह मिल जाती है।
आयत 21
وَقَالَ ٱلَّذِى ٱشْتَرَىٰهُ مِن مِّصْرَ لِٱمْرَأَتِهِۦٓ أَكْرِمِى مَثْوَىٰهُ عَسَىٰٓ أَن يَنفَعَنَآ أَوْ نَتَّخِذَهُۥ وَلَدًۭا ۚ وَكَذَٰلِكَ مَكَّنَّا لِيُوسُفَ فِى ٱلْأَرْضِ وَلِنُعَلِّمَهُۥ مِن تَأْوِيلِ ٱلْأَحَادِيثِ ۚ وَٱللَّهُ غَالِبٌ عَلَىٰٓ أَمْرِهِۦ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
وَقَالَ
और कहा उस शख़्स ने
ٱلَّذِى
जिसने
ٱشْتَرَىٰهُ
ख़रीदा था उसे
مِن
of
مِّصْرَ
मिस्र से
لِٱمْرَأَتِهِۦٓ
अपनी बीवी को
أَكْرِمِى
बाइज़्ज़त कर
مَثْوَىٰهُ
ठिकाना इसका
عَسَىٰٓ
उम्मीद है
أَن
कि
يَنفَعَنَآ
वो नफ़ा देगा हमें
أَوْ
या
نَتَّخِذَهُۥ
हम बना लेंगे उसे
وَلَدًۭا ۚ
बेटा
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
مَكَّنَّا
जगह दी हमने
لِيُوسُفَ
यूसुफ को
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَلِنُعَلِّمَهُۥ
और ताकि हम सिखाऐं उसे
مِن
(the) interpretation of
تَأْوِيلِ
हक़ीक़त में से
ٱلْأَحَادِيثِ ۚ
बातों की
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
غَالِبٌ
ग़ालिब है
عَلَىٰٓ
over
أَمْرِهِۦ
अपने काम पर
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَ
अक्सर
ٱلنَّاسِ
लोग
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
मिस्र के जिस व्यक्ति ने उसे ख़रीदा, उसने अपनी स्त्री से कहा, "इसको अच्छी तरह रखना। बहुत सम्भव है कि यह हमारे काम आए या हम इसे बेटा बना लें।" इस प्रकार हमने उस भूभाग में यूसुफ़ के क़दम जमाने की राह निकाली (ताकि उसे प्रतिष्ठा प्रदान करें) और ताकि मामलों और बातों के परिणाम से हम उसे अवगत कराएँ। अल्लाह तो अपना काम करके रहता है, किन्तु अधिकतर लोग जानते नहीं
तफ़्सीर:
और मिस्र के जिस व्यक्ति ने उन्हें ख़रीदा था, उसने अपनी पत्नी से कहा : इसके साथ अच्छा व्यवहार करो, और हमारे साथ इसके ठहरने का अच्छा प्रबंध करो। हो सकता है यह हमारी कुछ आवश्यकताओं को पूरा करने में मददगार साबित हो अथवा हम इसे मुँह बोला बेटा बना लें। और जिस तरह हमने यूसुफ़ को हत्या से बचाया, कुएँ से निकाला और अज़ीज़ के दिल को उसके प्रति दयालु कर दिया; उसी तरह हमने उसे मिस्र में स्थापित किया और ताकि हम उसे स्वप्न की व्याख्या सिखाएँ। और अल्लाह अपने मामले पर हावी है। उसका आदेश लागू होकर रहता है। उसे कोई मजबूर करने वाला नहीं। परन्तु अधिकतर लोग - और वे काफ़िर लोग हैं - इस बात को नहीं जानते।
आयत 22
وَلَمَّا بَلَغَ أَشُدَّهُۥٓ ءَاتَيْنَـٰهُ حُكْمًۭا وَعِلْمًۭا ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ
وَلَمَّا
और जब
بَلَغَ
वो पहुँचा
أَشُدَّهُۥٓ
अपनी जवानी को
ءَاتَيْنَـٰهُ
दिया हमने उसे
حُكْمًۭا
क़ुव्वते फ़ैसला
وَعِلْمًۭا ۚ
और इल्म
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
نَجْزِى
हम बदला देते हैं
ٱلْمُحْسِنِينَ
एहसान करने वालों को
और जब वह अपनी जवानी को पहुँचा तो हमने उसे निर्णय-शक्ति और ज्ञान प्रदान किया। उत्तमकार लोगों को हम इसी प्रकार बदला देते है
तफ़्सीर:
और जब यूसुफ़ शरीर की मज़बूती की आयु को पहुँच गए, तो हमने उन्हें समझ और ज्ञान प्रदान किया। और इसी प्रकार का प्रतिफल जो हमने उन्हें दिया, हम उन सदाचारियों को देते हैं, जो भली-भाँति अल्लाह की इबादत करते हैं।
आयत 23
وَرَٰوَدَتْهُ ٱلَّتِى هُوَ فِى بَيْتِهَا عَن نَّفْسِهِۦ وَغَلَّقَتِ ٱلْأَبْوَٰبَ وَقَالَتْ هَيْتَ لَكَ ۚ قَالَ مَعَاذَ ٱللَّهِ ۖ إِنَّهُۥ رَبِّىٓ أَحْسَنَ مَثْوَاىَ ۖ إِنَّهُۥ لَا يُفْلِحُ ٱلظَّـٰلِمُونَ
وَرَٰوَدَتْهُ
और फुसलाना चाहा उसे
ٱلَّتِى
उस औरत ने जो
هُوَ
वो (था)
فِى
in
بَيْتِهَا
घर में जिसके
عَن
from
نَّفْسِهِۦ
उसके नफ़्स से
وَغَلَّقَتِ
और उसने अच्छी तरह बन्द कर लिए
ٱلْأَبْوَٰبَ
दरवाज़े
وَقَالَتْ
और वो कहने लगी
هَيْتَ
Come on
لَكَ ۚ
आ जाओ तुम
قَالَ
उसने कहा
مَعَاذَ
पनाह
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह की
إِنَّهُۥ
बेशक वो
رَبِّىٓ
मेरा रब है
أَحْسَنَ
उसने अच्छा बनाया
مَثْوَاىَ ۖ
ठिकाना मेरा
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَا
not
يُفْلِحُ
नहीं वो फ़लाह पाते
ٱلظَّـٰلِمُونَ
जो ज़ालिम हैं
जिस स्त्री के घर में वह रहता था, वह उस पर डोरे डालने लगी। उसने दरवाज़े बन्द कर दिए और कहने लगी, "लो, आ जाओ!" उसने कहा, "अल्लाह की पनाह! मेरे रब ने मुझे अच्छा स्थान दिया है। अत्याचारी कभी सफल नहीं होते।"
तफ़्सीर:
अज़ीज़ की पत्नी ने नम्रता से और छल का सहारा लेकर यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को कुकर्म पर आमादा करना चाहा और उन्हें बिलकुल एकांत में लेने के लिए द्वार बंद कर लिए और उनसे कहा: "आ जाओ, मेरे पास आओ।" तो यूसुफ़ ने उससे कहा : तू मुझे जिस चीज़ के लिए बुला रही है, मैं उससे अल्लाह की शरण में आता हूँ। मेरे स्वामी ने मुझे अपने पास बेहतर ढंग से ठहराया है। अतः मैं कभी उसके साथ विश्वासघात नहीं करूँगा। यदि मैंने उसके साथ विश्वासघात किया, तो मैं अत्याचारी हो जाऊँगा। निःसंदेह अत्याचारी लोग कभी सफल नहीं होते।
आयत 24
وَلَقَدْ هَمَّتْ بِهِۦ ۖ وَهَمَّ بِهَا لَوْلَآ أَن رَّءَا بُرْهَـٰنَ رَبِّهِۦ ۚ كَذَٰلِكَ لِنَصْرِفَ عَنْهُ ٱلسُّوٓءَ وَٱلْفَحْشَآءَ ۚ إِنَّهُۥ مِنْ عِبَادِنَا ٱلْمُخْلَصِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
هَمَّتْ
उस औरत ने इरादा किया
بِهِۦ ۖ
उसका
وَهَمَّ
और वो इरादा कर लेता
بِهَا
उसका
لَوْلَآ
अगर ना होता
أَن
कि
رَّءَا
वो देखता
بُرْهَـٰنَ
बुरहान/रोशन दलील
رَبِّهِۦ ۚ
अपने रब की
كَذَٰلِكَ
इसी तरह (हुआ)
لِنَصْرِفَ
ताकि हम फेर दें
عَنْهُ
उससे
ٱلسُّوٓءَ
बुराई को
وَٱلْفَحْشَآءَ ۚ
और बेहयाई को
إِنَّهُۥ
बेशक वो
مِنْ
(was) of
عِبَادِنَا
हमारे बन्दों में से था
ٱلْمُخْلَصِينَ
जो ख़ालिस किए हुए हैं
उसने उसका इरादा कर लिया था। यदि वह अपने रब का स्पष्ट॥ प्रमाण न देख लेता तो वह भी उसका इरादा कर लेता। ऐसा इसलिए हुआ ताकि हम बुराई और अश्लीलता को उससे दूर रखें। निस्संदेह वह हमारे चुने हुए बन्दों में से था
तफ़्सीर:
उस महिला का मन कुकर्म के लिए इच्छुक था। और यूसुफ़ के मन में भी ऐसी ही इच्छा उत्पन्न हो गई होती, यदि वह अल्लाह की उन निशानियों को न देख लेते, जो उन्हें बुराई से रोकने तथा दूर रखने का कारण बनीं। और हमने उन्हें यह सब इसलिए दिखाया, ताकि हम उनसे बुराई को दूर कर दें और उन्हें व्यभिचार तथा विश्वासघात से दूर रखें। यूसुफ़ हमारे उन बंदों में से हैं, जिन्हें हमने नुबुव्वत और रिसालत के लिए चुन लिया है।
आयत 25
وَٱسْتَبَقَا ٱلْبَابَ وَقَدَّتْ قَمِيصَهُۥ مِن دُبُرٍۢ وَأَلْفَيَا سَيِّدَهَا لَدَا ٱلْبَابِ ۚ قَالَتْ مَا جَزَآءُ مَنْ أَرَادَ بِأَهْلِكَ سُوٓءًا إِلَّآ أَن يُسْجَنَ أَوْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
وَٱسْتَبَقَا
और वो दोनों दौड़े
ٱلْبَابَ
दरवाज़े की तरफ़
وَقَدَّتْ
और उस औरत ने फाड़ दी
قَمِيصَهُۥ
क़मीज़ उसकी
مِن
from
دُبُرٍۢ
पीछे से
وَأَلْفَيَا
और उन दोनों ने पाया
سَيِّدَهَا
उसके आक़ा को
لَدَا
पास
ٱلْبَابِ ۚ
दरवाज़े के
قَالَتْ
वो कहने लगी
مَا
क्या
جَزَآءُ
बदला हो
مَنْ
उसका जो
أَرَادَ
इरादा करे
بِأَهْلِكَ
तेरी घर वाली के साथ
سُوٓءًا
बुराई का
إِلَّآ
मगर
أَن
कि
يُسْجَنَ
वो क़ैद किया जाए
أَوْ
या
عَذَابٌ
सज़ा (दिया जाए)
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
वे दोनों दरवाज़े की ओर झपटे और उस स्त्री ने उसका कुर्ता पीछे से फाड़ डाला। दरवाज़े पर दोनों ने उस स्त्री के पति को उपस्थित पाया। वह बोली, "जो कोई तुम्हारी घरवाली के साथ बुरा इरादा करे, उसका बदला इसके सिवा और क्या होगा कि उसे बन्दी बनाया जाए या फिर कोई दुखद यातना दी जाए?"
तफ़्सीर:
वे दोनों दरवाज़े की ओर भागे : यूसुफ़ खुद को बचाने के लिए और वह औरत उन्हें बाहर जाने से रोकने के लिए। इसलिए उसने उन्हें बाहर जाने से रोकने के लिए उनका कुर्ता पकड़ लिया और उसे उसके पीछे से फाड़ दिया। और दोनों ने उस (महिला) के पति को दरवाज़े पर पाया। अज़ीज़ की पत्नी ने चाल चलते हुए अज़ीज़ से कहा : (ऐ अज़ीज़!) जिस व्यक्ति ने तेरी पत्नी के साथ कुकर्म का इरादा किया, उसकी सज़ा इसके सिवा और कुछ नहीं हो सकती कि उसे क़ैद कर दिया जाए, या उसे दर्दनाक सज़ा दी जाए।
आयत 26
قَالَ هِىَ رَٰوَدَتْنِى عَن نَّفْسِى ۚ وَشَهِدَ شَاهِدٌۭ مِّنْ أَهْلِهَآ إِن كَانَ قَمِيصُهُۥ قُدَّ مِن قُبُلٍۢ فَصَدَقَتْ وَهُوَ مِنَ ٱلْكَـٰذِبِينَ
قَالَ
कहा
هِىَ
इसी ने
رَٰوَدَتْنِى
फुसलाना चाहा मुझे
عَن
about
نَّفْسِى ۚ
मेरे नफ़्स से
وَشَهِدَ
और गवाही दी
شَاهِدٌۭ
एक गवाह ने
مِّنْ
of
أَهْلِهَآ
उस (औरत) के घर वालों में से
إِن
अगर
كَانَ
है
قَمِيصُهُۥ
क़मीज़ उसकी
قُدَّ
फाड़ी गई
مِن
from
قُبُلٍۢ
सामने से
فَصَدَقَتْ
तो वो सच्ची है
وَهُوَ
और वो
مِنَ
(is) of
ٱلْكَـٰذِبِينَ
झूठों में से है
उसने कहा, "यही मुझपर डोरे डाल रही थी।" उस स्त्री के लोगों में से एक गवाह ने गवाही दी, "यदि इसका कुर्ता आगे से फटा है तो यह सच्ची है और यह झूठा है,
तफ़्सीर:
यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने कहा : इसी ने मुझे कुकर्म करने को कहा था। मैंने उससे ऐसा नहीं चाहा था। ऐसे में उसके परिवार में से एक साक्षी उठ खड़ा हुआ और उसने यह कहकर गवाही दी : यदि यूसुफ़ का कुर्ता आगे से फटा है, तो यह उस स्त्री के सच्ची होने का संकेत है, क्योंकि वह उसे खुद से रोक रही थी, अतः वह (यूसुफ़) झूठा है।
आयत 27
وَإِن كَانَ قَمِيصُهُۥ قُدَّ مِن دُبُرٍۢ فَكَذَبَتْ وَهُوَ مِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ
وَإِن
और अगर
كَانَ
है
قَمِيصُهُۥ
क़मीज़ उसकी
قُدَّ
फाड़ी गई
مِن
from
دُبُرٍۢ
पीछे से
فَكَذَبَتْ
तो वो झूठी है
وَهُوَ
और वो
مِنَ
(is) of
ٱلصَّـٰدِقِينَ
सच्चों में से है
और यदि उसका कुर्ता पीछे से फटा है तो यह झूठी है और यह सच्चा है।"
तफ़्सीर:
और यदि यूसुफ़ का कुर्ता उसके पीछे से फाड़ा गया है, तो यह उनके सच्चे होने का सबूत है; क्योंकि वह उन्हें फुसला रही थी और वह उससे भाग रहे थे। इसलिए वह झूठी है।
आयत 28
فَلَمَّا رَءَا قَمِيصَهُۥ قُدَّ مِن دُبُرٍۢ قَالَ إِنَّهُۥ مِن كَيْدِكُنَّ ۖ إِنَّ كَيْدَكُنَّ عَظِيمٌۭ
فَلَمَّا
तो जब
رَءَا
उसने देखा
قَمِيصَهُۥ
उसकी क़मीज़ को
قُدَّ
फाड़ी गई है
مِن
from
دُبُرٍۢ
पीछे से
قَالَ
उसने कहा
إِنَّهُۥ
बेशक ये
مِن
(is) of
كَيْدِكُنَّ ۖ
तुम्हारी चाल में से है
إِنَّ
बेशक
كَيْدَكُنَّ
चाल तुम औरतों की
عَظِيمٌۭ
बहुत बड़ी है
फिर जब देखा कि उसका कुर्ता पीछे से फटा है तो उसने कहा, "यह तुम स्त्रियों की चाल है। निश्चय ही तुम्हारी चाल बड़े ग़ज़ब की होती है
तफ़्सीर:
चुनाँचे जब अज़ीज़ ने देखा कि यूसुफ़ अलैहिस्साम का कुर्ता पीछे की ओर से फटा हुआ है, तो उसके सामने यूसुफ़ की सच्चाई स्पष्ट हो गई। उसने कहा : तुम्हारा यूसुफ़ पर लगाया गया यह आरोप तुम औरतों के छल और फ़रेब का हिस्सा है। यक़ीनन तुम्हारा छल और फ़रेब बड़ा शक्तिशाली होता है।
आयत 29
يُوسُفُ أَعْرِضْ عَنْ هَـٰذَا ۚ وَٱسْتَغْفِرِى لِذَنۢبِكِ ۖ إِنَّكِ كُنتِ مِنَ ٱلْخَاطِـِٔينَ
يُوسُفُ
ऐ यूसुफ़
أَعْرِضْ
दरगुज़र करो
عَنْ
from
هَـٰذَا ۚ
इससे
وَٱسْتَغْفِرِى
और तू बख़्शिश माँग
لِذَنۢبِكِ ۖ
अपने गुनाह की
إِنَّكِ
बेशक तू
كُنتِ
है तू
مِنَ
of
ٱلْخَاطِـِٔينَ
ख़ताकारों में से
यूसुफ़! इस मामले को जाने दे और स्त्री तू अपने गुनाह की माफ़ी माँग। निस्संदेह ख़ता तेरी ही है।"
तफ़्सीर:
और उसने यूसुफ़ से कहा : ऐ यूसुफ़! इस मामले को जाने दो और इसकी चर्चा किसी से न करना। और तू अपने पाप के लिए क्षमा माँग। क्योंकि यूसुफ़ को फुसलाने के कारण निश्चित रूप से तू ही पापियों में से है।
आयत 30
۞ وَقَالَ نِسْوَةٌۭ فِى ٱلْمَدِينَةِ ٱمْرَأَتُ ٱلْعَزِيزِ تُرَٰوِدُ فَتَىٰهَا عَن نَّفْسِهِۦ ۖ قَدْ شَغَفَهَا حُبًّا ۖ إِنَّا لَنَرَىٰهَا فِى ضَلَـٰلٍۢ مُّبِينٍۢ
۞ وَقَالَ
और कहा
نِسْوَةٌۭ
औरतों ने
فِى
in
ٱلْمَدِينَةِ
शहर में
ٱمْرَأَتُ
औरत
ٱلْعَزِيزِ
अज़ीज़ की
تُرَٰوِدُ
वो फुसलाती है
فَتَىٰهَا
अपने ग़ुलाम को
عَن
about
نَّفْسِهِۦ ۖ
उसके नफ़्स से
قَدْ
तहक़ीक़
شَغَفَهَا
वो उसके दिल में दाख़िल हो गया है
حُبًّا ۖ
मोहब्बत की रू से
إِنَّا
बेशक हम
لَنَرَىٰهَا
अलबत्ता हम देखती हैं उसे
فِى
in
ضَلَـٰلٍۢ
गुमराही में
مُّبِينٍۢ
खुली-खुली
नगर की स्त्रियाँ कहने लगी, "अज़ीज़ की पत्नी अपने नवयुवक ग़ुलाम पर डोरे डालना चाहती है। वह प्रेम-प्रेरणा से उसके मन में घर कर गया है। हम तो उसे देख रहे हैं कि वह खुली ग़लती में पड़ गई है।"
तफ़्सीर:
और उस (अज़ीज़ की पत्नी) की खबर शहर में फैल गई और महिलाओं के एक समूह ने निंदा के तौर पर कहा : अजीज की पत्नी अपने नौकर को रिझा रही है और उसका प्यार उसके दिल के अंदर तक पहुंच गया है। हम तो समझते हैं कि वह उसको रिझाने और उसके प्रति स्नेह और प्यार के कारण - जबकि वह उसका नौकर है - स्पष्ट गुमराही में पड़ चुकी है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
फितने से बचाव और इल्ज़ाम से बरी होने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि बुराई के मौके पर भी अपने ईमान और किरदार पर कायम रहना असली ताकत है।
आयत 31
فَلَمَّا سَمِعَتْ بِمَكْرِهِنَّ أَرْسَلَتْ إِلَيْهِنَّ وَأَعْتَدَتْ لَهُنَّ مُتَّكَـًۭٔا وَءَاتَتْ كُلَّ وَٰحِدَةٍۢ مِّنْهُنَّ سِكِّينًۭا وَقَالَتِ ٱخْرُجْ عَلَيْهِنَّ ۖ فَلَمَّا رَأَيْنَهُۥٓ أَكْبَرْنَهُۥ وَقَطَّعْنَ أَيْدِيَهُنَّ وَقُلْنَ حَـٰشَ لِلَّهِ مَا هَـٰذَا بَشَرًا إِنْ هَـٰذَآ إِلَّا مَلَكٌۭ كَرِيمٌۭ
فَلَمَّا
तो जब
سَمِعَتْ
उसने सुना
بِمَكْرِهِنَّ
मकर उन औरतों का
أَرْسَلَتْ
उसने भेजा
إِلَيْهِنَّ
उनकी तरफ़ (दावत नामा)
وَأَعْتَدَتْ
और तैयार कीं
لَهُنَّ
उनके लिए
مُتَّكَـًۭٔا
मसनदें
وَءَاتَتْ
और दी
كُلَّ
हर
وَٰحِدَةٍۢ
एक औरत को
مِّنْهُنَّ
उनमें से
سِكِّينًۭا
एक छुरी
وَقَالَتِ
और कहने लगी
ٱخْرُجْ
निकल आ
عَلَيْهِنَّ ۖ
इन पर
فَلَمَّا
तो जब
رَأَيْنَهُۥٓ
उन औरतों ने देखा उसे
أَكْبَرْنَهُۥ
मरऊब हो गईं उससे
وَقَطَّعْنَ
और काट लिए
أَيْدِيَهُنَّ
हाथ अपने
وَقُلْنَ
और वो कहने लगीं
حَـٰشَ
Forbid
لِلَّهِ
हाशा लिल्लाह
مَا
नहीं है
هَـٰذَا
ये
بَشَرًا
कोई इन्सान
إِنْ
नहीं है
هَـٰذَآ
ये
إِلَّا
मगर
مَلَكٌۭ
फ़रिश्ता
كَرِيمٌۭ
मुअज़्ज़िज़
उसने जब उनकी मक्करी की बातें सुनी तो उन्हें बुला भेजा और उनमें से हरेक के लिए आसन सुसज्जित किया और उनमें से हरेक को एक छुरी दी। उसने (यूसुफ़ से) कहा, "इनके सामने आ जाओ।" फिर जब स्त्रियों ने देखा तो वे उसकी बड़ाई से दंग रह गई। उन्होंने अपने हाथ घायल कर लिए और कहने लगी, "अल्लाह की पनाह! यह कोई मनुष्य नहीं। यह तो कोई प्रतिष्ठित फ़रिश्ता है।‍"
तफ़्सीर:
जब अज़ीज़ की पत्नी को उन स्त्रियों की उसकी निंदा करने और उसकी अनुपस्थिति में उसकी बुराई करने की बात पहुँची, तो उसने उन स्त्रियों को बुलवा भेजा, ताकि वे यूसुफ़ को देखें, फिर वे उसे मा'ज़ूर (क्षम्य) समझें। उसने उनके लिए बैठने की जगह तैयार की, जहाँ बिस्तर और गाव-तकिए लगवा दिए। फिर उसने आमंत्रित औरतों में से हर एक को खाना काटने के लिए एक-एक चाक़ू दिया और यूसुफ़ अलैहिस्सलाम से कहा : इनके सामने आ जाओ। चुनाँचे जब उन स्त्रियों ने उनकी ओर देखा, तो उन्हें बहुत बड़ा समझा और उनकी सुंदरता पर चकित रह गईं और उनकी ख़ूबसूरती को देखकर उनके होश उड़ गए और - उनके साथ आकर्षण की तीव्रता से - उन्होंने खाना काटने के लिए तैयार चाक़ू से अपने हाथों को घायल कर दिया और बोल उठीं : अल्लाह पवित्र है, यह लड़का मनुष्य नहीं है, क्योंकि इसमें जो सुंदरता है वह किसी इनसान में देखी नहीं गई। वह और कुछ नहीं बल्कि सम्माननीय फ़रिश्तों में से एक सम्मानित फ़रिश्ता है।
आयत 32
قَالَتْ فَذَٰلِكُنَّ ٱلَّذِى لُمْتُنَّنِى فِيهِ ۖ وَلَقَدْ رَٰوَدتُّهُۥ عَن نَّفْسِهِۦ فَٱسْتَعْصَمَ ۖ وَلَئِن لَّمْ يَفْعَلْ مَآ ءَامُرُهُۥ لَيُسْجَنَنَّ وَلَيَكُونًۭا مِّنَ ٱلصَّـٰغِرِينَ
قَالَتْ
वो कहने लगी
فَذَٰلِكُنَّ
तो ये है
ٱلَّذِى
वो शख़्स जो
لُمْتُنَّنِى
तुम मलामत करती हो मुझे
فِيهِ ۖ
जिस (के बारे) में
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
رَٰوَدتُّهُۥ
मैंने फुसलाना चाहा उसे
عَن
[from]
نَّفْسِهِۦ
उसके नफ़्स के बारे में
فَٱسْتَعْصَمَ ۖ
पस वो बच निकला
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
لَّمْ
ना
يَفْعَلْ
उसने किया
مَآ
जो
ءَامُرُهُۥ
मैं हुक्म देती हूँ उसे
لَيُسْجَنَنَّ
अलबत्ता वो ज़रूर क़ैद किया जाएगा
وَلَيَكُونًۭا
और अलबत्ता वो हो जाएगा
مِّنَ
of
ٱلصَّـٰغِرِينَ
ज़लील होने वालों में से
वह बोली, "यह वही है जिसके विषय में तुम मुझे मलामत कर रही थीं। हाँ, मैंने इसे रिझाना चाहा था, किन्तु यह बचा रहा। और यदि इसने न किया जो मैं इससे कहती तो यह अवश्य क़ैद किया जाएगा और अपमानित होगा।"
तफ़्सीर:
अज़ीज़ की पत्नी ने उन महिलाओं से कहा कि जब उसने देखा कि उनके साथ क्या हुआ है : यह वही नौजवान है, जिसके प्रेम के कारण तुमने मुझे ताना मारा था। मैंने ही उसे चाहा था और उसे प्रलोभित करने के लिए चाल चली थी, पर वह बच निकला। लेकिन अब यदि उसने वह नहीं किया जो मैं उसे करने के लिए कहूँगी, तो वह अवश्य जेल में प्रवेश करेगा और निश्चय ही वह ज़रूर अपमानित होगा।
आयत 33
قَالَ رَبِّ ٱلسِّجْنُ أَحَبُّ إِلَىَّ مِمَّا يَدْعُونَنِىٓ إِلَيْهِ ۖ وَإِلَّا تَصْرِفْ عَنِّى كَيْدَهُنَّ أَصْبُ إِلَيْهِنَّ وَأَكُن مِّنَ ٱلْجَـٰهِلِينَ
قَالَ
उसने कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
ٱلسِّجْنُ
क़ैद ख़ाना
أَحَبُّ
ज़्यादा महबूब है
إِلَىَّ
मुझे
مِمَّا
उससे जो
يَدْعُونَنِىٓ
वो बुलाती हैं मुझे
إِلَيْهِ ۖ
तरफ़ जिसके
وَإِلَّا
और अगर नहीं
تَصْرِفْ
तू फेरेगा
عَنِّى
मुझसे
كَيْدَهُنَّ
चाल उनकी
أَصْبُ
मैं माइल हो जाऊँगा
إِلَيْهِنَّ
तरफ़ उनके
وَأَكُن
और मैं हो जाऊँगा
مِّنَ
of
ٱلْجَـٰهِلِينَ
जाहिलों में से
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! जिसकी ओर ये सब मुझे बुला रही हैं, उससे अधिक तो मुझे क़ैद ही पसन्द है यदि तूने उनके दाँव-घात को मुझसे न टाला तो मैं उनकी और झुक जाऊँगा और निरे आवेग के वशीभूत हो जाऊँगा।"
तफ़्सीर:
यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने अपने पालनहार से प्रार्थना करते हुए कहा : ऐ मेरे पालनहार! जिस जेल की इसने मुझे धमकी दी है, वह मेरे निकट उस कुकर्म को करने से अधिक प्रिय है, जिसकी ओर ये स्त्रियाँ मुझे बुला रही हैं। यदि तूने इनके छल को मुझसे दूर नहीं किया, तो मैं इनकी ओर झुक जाऊँगा, और यदि मैं इनकी ओर झुक गया और उस चीज़ में उनका पालन किया जो वे मुझसे चाहती हैं, तो मैं अज्ञानियों में से हो जाऊँगा।
आयत 34
فَٱسْتَجَابَ لَهُۥ رَبُّهُۥ فَصَرَفَ عَنْهُ كَيْدَهُنَّ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ
فَٱسْتَجَابَ
पस (दुआ) क़ुबूल कर ली
لَهُۥ
उसकी
رَبُّهُۥ
उसके रब ने
فَصَرَفَ
तो उसने फेर दी
عَنْهُ
उससे
كَيْدَهُنَّ ۚ
चाल उन औरतों की
إِنَّهُۥ
बेशक वो
هُوَ
वो ही है
ٱلسَّمِيعُ
ख़ूब सुनने वाला
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब जानने वाला
अतः उसने रब ने उसकी सुन ली और उसकी ओर से उन स्त्रियों के दाँव-घात को टाल दिया। निस्संदेह वह सब कुछ सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
चुनाँचे अल्लाह ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और अज़ीज़ की पत्नी के छल और नगर की स्त्रियों के छल को उनसे दूर कर दिया। निःसंदेह वह महिमावान व गौरवशाली अल्लाह यूसुफ़ की दुआ को तथा हर दुआ करने वाले की दुआ को सुनने वाला, तथा अनकी स्थिति और उनके सिवा अन्य की स्थिति को जानने वाला है।
आयत 35
ثُمَّ بَدَا لَهُم مِّنۢ بَعْدِ مَا رَأَوُا۟ ٱلْـَٔايَـٰتِ لَيَسْجُنُنَّهُۥ حَتَّىٰ حِينٍۢ
ثُمَّ
फिर
بَدَا
ज़ाहिर हो गया
لَهُم
उनके लिए
مِّنۢ
after
بَعْدِ
बाद उसके
مَا
जो
رَأَوُا۟
उन्होंने देखी
ٱلْـَٔايَـٰتِ
निशानियाँ
لَيَسْجُنُنَّهُۥ
अलबत्ता वो ज़रूर क़ैद कर दें उसे
حَتَّىٰ
until
حِينٍۢ
एक वक़्त तक
फिर उन्हें, इसके पश्चात कि वे निशानियाँ देख चुके थे, यह सूझा कि उसे एक अवधि के लिए क़ैद कर दें
तफ़्सीर:
फिर जब अज़ीज़ और उसके समुदाय के लोगों ने उनकी बेगुनाही का सबूत देखा, तो उनकी यह राय बनी कि उन्हें एक अज्ञात अवधि के लिए जेल में डाल दें। (ताकि वह मामला खुल न जाए)।
आयत 36
وَدَخَلَ مَعَهُ ٱلسِّجْنَ فَتَيَانِ ۖ قَالَ أَحَدُهُمَآ إِنِّىٓ أَرَىٰنِىٓ أَعْصِرُ خَمْرًۭا ۖ وَقَالَ ٱلْـَٔاخَرُ إِنِّىٓ أَرَىٰنِىٓ أَحْمِلُ فَوْقَ رَأْسِى خُبْزًۭا تَأْكُلُ ٱلطَّيْرُ مِنْهُ ۖ نَبِّئْنَا بِتَأْوِيلِهِۦٓ ۖ إِنَّا نَرَىٰكَ مِنَ ٱلْمُحْسِنِينَ
وَدَخَلَ
और दाख़िल हुए
مَعَهُ
साथ उसके
ٱلسِّجْنَ
क़ैद ख़ाने में
فَتَيَانِ ۖ
दो जवान
قَالَ
कहा
أَحَدُهُمَآ
उन दोनों में से एक ने
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَرَىٰنِىٓ
मैं देखता हूँ ख़ुद को
أَعْصِرُ
मैं निचोड़ रहा हूँ
خَمْرًۭا ۖ
शराब
وَقَالَ
और कहा
ٱلْـَٔاخَرُ
दूसरे ने
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَرَىٰنِىٓ
मैं देखता हूँ ख़ुद को
أَحْمِلُ
मैं उठाए हुए हूँ
فَوْقَ
over
رَأْسِى
अपने सर के ऊपर
خُبْزًۭا
रोटी
تَأْكُلُ
खाते हैं
ٱلطَّيْرُ
परिन्दे
مِنْهُ ۖ
उससे
نَبِّئْنَا
बताओ हमें
بِتَأْوِيلِهِۦٓ ۖ
ताबीर उसकी
إِنَّا
बेशक हम
نَرَىٰكَ
हम देखते हैं तुझे
مِنَ
of
ٱلْمُحْسِنِينَ
मोहसिनीन में से
कारागार में दो नव युवकों ने भी उसके साथ प्रवेश किया। उनमें से एक ने कहा, "मैंने स्वप्न देखा है कि मैं शराब निचोड़ रहा हूँ।" दूसरे ने कहा, "मैंने देखा कि मैं अपने सिर पर रोटियाँ उठाए हुए हूँ, जिनको पक्षी खा रहे है। हमें इसका अर्थ बता दीजिए। हमें तो आप बहुत ही नेक नज़र आते है।"
तफ़्सीर:
चुनाँचे उन्हें जेल में डाल दिया गया। उनके साथ जेल में दो युवक भी दाख़िल हुए थे। दोनों युवकों में से एक ने यूसुफ़ से कहा : मैंने सपने में देखा है कि मैं अंगूर निचोड़कर शराब बना रहा हूँ और दूसरे ने कहा : मैंने देखा कि मैं अपने सिर के ऊपर रोटी उठाए हुए हूँ जिससे पक्षी खा रहे हैं। ऐ यूसुफ़! हमें हमारे स्वप्न का अर्थ बताएं। हम देखते हैं कि आप बड़े नेक इनसान हैं।
आयत 37
قَالَ لَا يَأْتِيكُمَا طَعَامٌۭ تُرْزَقَانِهِۦٓ إِلَّا نَبَّأْتُكُمَا بِتَأْوِيلِهِۦ قَبْلَ أَن يَأْتِيَكُمَا ۚ ذَٰلِكُمَا مِمَّا عَلَّمَنِى رَبِّىٓ ۚ إِنِّى تَرَكْتُ مِلَّةَ قَوْمٍۢ لَّا يُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَهُم بِٱلْـَٔاخِرَةِ هُمْ كَـٰفِرُونَ
قَالَ
उसने कहा
لَا
Not
يَأْتِيكُمَا
नहीं आएगा तुम दोनों के पास
طَعَامٌۭ
खाना
تُرْزَقَانِهِۦٓ
तुम दोनों दिए जाते हो उसे
إِلَّا
मगर
نَبَّأْتُكُمَا
मैं बता दूँगा तुम दोनों को
بِتَأْوِيلِهِۦ
ताबीर
قَبْلَ
इससे पहले
أَن
कि
يَأْتِيَكُمَا ۚ
वो आए तुम दोनों के पास
ذَٰلِكُمَا
ये
مِمَّا
उसमें से है जो
عَلَّمَنِى
सिखाया मुझे
رَبِّىٓ ۚ
मेरे रब ने
إِنِّى
बेशक मैं
تَرَكْتُ
छोड़ दिया मैंने
مِلَّةَ
दीन
قَوْمٍۢ
उन लोगों का
لَّا
not
يُؤْمِنُونَ
जो नहीं ईमान रखते
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَهُم
और वो
بِٱلْـَٔاخِرَةِ
साथ आख़िरत के
هُمْ
वो ही
كَـٰفِرُونَ
कुफ़्र करने वाले हैं
उसने कहा, "जो भोजन तुम्हें मिला करता है वह तुम्हारे पास नहीं आ पाएगा, उसके तुम्हारे पास आने से पहले ही मैं तुम्हें इसका अर्थ बता दूँगा। यह उन बातों में से है, जो मेरे रब ने मुझे सिखाई है। मैं तो उन लोगों का तरीक़ा छोड़कर, जो अल्लाह को नहीं मानते और जो आख़िरत (परलोक) का इनकार करते हैं,
तफ़्सीर:
यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने कहा : तुम्हारे लिए राजा या किसी अन्य की ओर से जो खाना आता है, उसके तुम्हारे पास आने से पहले ही मैं तुम्हें बता दूँगा कि उसकी सच्चाई क्या है और कैसे है। यह व्याख्या जो मैं जानता हूँ, उन बातों में से है, जो अल्लाह ने मुझे सिखाई है। यह अटकल भविष्यवाणी से या ज्योतिष से नहीं है। निःसंदेह मैंने ऐसे लोगों का धर्म छोड़ दिया, जो अल्लाह पर ईमान नहीं रखते और वे आख़िरत का इनकार करते हैं।
आयत 38
وَٱتَّبَعْتُ مِلَّةَ ءَابَآءِىٓ إِبْرَٰهِيمَ وَإِسْحَـٰقَ وَيَعْقُوبَ ۚ مَا كَانَ لَنَآ أَن نُّشْرِكَ بِٱللَّهِ مِن شَىْءٍۢ ۚ ذَٰلِكَ مِن فَضْلِ ٱللَّهِ عَلَيْنَا وَعَلَى ٱلنَّاسِ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ
وَٱتَّبَعْتُ
और मैंने पैरवी की
مِلَّةَ
दीन की
ءَابَآءِىٓ
अपने आबा ओ अजदाद के
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम
وَإِسْحَـٰقَ
और इसहाक़
وَيَعْقُوبَ ۚ
और याक़ूब के
مَا
नहीं
كَانَ
है
لَنَآ
हमारे लिए
أَن
कि
نُّشْرِكَ
हम शरीक ठहराऐं
بِٱللَّهِ
साथ अल्लाह के
مِن
any
شَىْءٍۢ ۚ
किसी चीज़ को
ذَٰلِكَ
ये
مِن
(is) from
فَضْلِ
फ़ज़ल में से है
ٱللَّهِ
अल्लाह के
عَلَيْنَا
हम पर
وَعَلَى
and upon
ٱلنَّاسِ
और लोगों पर
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَ
अक्सर
ٱلنَّاسِ
लोग
لَا
(are) not
يَشْكُرُونَ
वो शुक्र अदा नहीं करते
अपने पूर्वज इबराहीम, इसहाक़ और याक़ूब का तरीक़ा अपनाया है। इमसे यह नहीं हो सकता कि हम अल्लाह के साथ किसी चीज़ को साझी ठहराएँ। यह हमपर और लोगों पर अल्लाह का अनुग्रह है। किन्तु अधिकतर लोग आभार नहीं प्रकट करते
तफ़्सीर:
मैंने अपने बाप-दादाओं : इबराहीम, इसह़ाक़ और याक़ूब के धर्म का पालन किया है। और वह अल्लाह के प्रति एकेश्वरवाद (अर्थात अल्लाह को एकमात्र पूज्य मानने) का धर्म है। हमारे लिए सही नहीं है कि हम अल्लाह के साथ किसी को साझी ठहराएँ, जबकि वह एकेश्वरवाद में अकेला है। यह 'तौह़ीद' और ईमान जिसपर मैं और मेरे बाप-दादा क़ायम हैं, वह हमपर अल्लाह की कृपा है कि उसने हमें उसका सामर्थ्य प्रदान किया। तथा सभी लोगों पर उसकी कृपा है कि उसने उनके पास उस (तौह़ीद) के साथ नबियों को भेजा। लेकिन ज्यादातर लोग अल्लाह का उसकी नेमतों पर शुक्रिया अदा नहीं करते, बल्कि उसकी नाशुक्री करते हैं।
आयत 39
يَـٰصَـٰحِبَىِ ٱلسِّجْنِ ءَأَرْبَابٌۭ مُّتَفَرِّقُونَ خَيْرٌ أَمِ ٱللَّهُ ٱلْوَٰحِدُ ٱلْقَهَّارُ
يَـٰصَـٰحِبَىِ
ऐ मेरे दो साथियो
ٱلسِّجْنِ
क़ैद ख़ाने के
ءَأَرْبَابٌۭ
क्या बहुत से रब
مُّتَفَرِّقُونَ
मुतफ़र्रिक़/जुदा-जुदा
خَيْرٌ
बेहतर हैं
أَمِ
या
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْوَٰحِدُ
जो एक है
ٱلْقَهَّارُ
बहुत ज़बरदस्त है
ऐ कारागर के मेरे साथियों! क्या अलग-अलग बहुत-से रह अच्छे है या अकेला अल्लाह जिसका प्रभुत्व सबपर है?
तफ़्सीर:
फिर यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने जेल के अंदर दोनों युवकों को संबोधित करते हुए कहा : क्या कई देवी-देवताओं की पूजा अच्छा है या एक अल्लाह की इबादत करना, जिसका कोई साझी नहीं, जो सब पर प्रभुत्वशाली है, जिसे पराजित नही किया जा सकता।
आयत 40
مَا تَعْبُدُونَ مِن دُونِهِۦٓ إِلَّآ أَسْمَآءًۭ سَمَّيْتُمُوهَآ أَنتُمْ وَءَابَآؤُكُم مَّآ أَنزَلَ ٱللَّهُ بِهَا مِن سُلْطَـٰنٍ ۚ إِنِ ٱلْحُكْمُ إِلَّا لِلَّهِ ۚ أَمَرَ أَلَّا تَعْبُدُوٓا۟ إِلَّآ إِيَّاهُ ۚ ذَٰلِكَ ٱلدِّينُ ٱلْقَيِّمُ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
مَا
नहीं
تَعْبُدُونَ
तुम इबादत करते
مِن
besides Him
دُونِهِۦٓ
उसके सिवा
إِلَّآ
मगर
أَسْمَآءًۭ
चन्द नामों की
سَمَّيْتُمُوهَآ
नाम रख लिए तुमने उनके
أَنتُمْ
तुमने
وَءَابَآؤُكُم
और तुम्हारे आबा ओ अजदाद ने
مَّآ
नहीं
أَنزَلَ
उतारी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
بِهَا
उनकी
مِن
any
سُلْطَـٰنٍ ۚ
कोई दलील
إِنِ
नहीं
ٱلْحُكْمُ
हुक्म
إِلَّا
मगर
لِلَّهِ ۚ
अल्लाह ही के लिए
أَمَرَ
उसने हुक्म दिया है
أَلَّا
कि ना
تَعْبُدُوٓا۟
तुम इबादत करो
إِلَّآ
मगर
إِيَّاهُ ۚ
सिर्फ़ उसी की
ذَٰلِكَ
ये है
ٱلدِّينُ
दीन
ٱلْقَيِّمُ
दुरुस्त
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَ
अक्सर
ٱلنَّاسِ
लोग
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो जानते
तुम उसके सिवा जिनकी भी बन्दगी करते हो वे तो बस निरे नाम हैं जो तुमने रख छोड़े है और तुम्हारे बाप-दादा ने। उनके लिए अल्लाह ने कोई प्रमाण नहीं उतारा। सत्ता और अधिकार तो बस अल्लाह का है। उसने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की बन्दगी न करो। यही सीधा, सच्चा दीन (धर्म) हैं, किन्तु अधिकतर लोग नहीं जानते
तफ़्सीर:
तुम अल्लाह के सिवा जिनकी इबादत करते हो, वे केवल नाम हैं, उनकी कोई वास्तविकता नहीं है। तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने उन्हें पूज्यों का नाम दे दिया है। उनका उलूहियत (देवत्व) में कोई हिस्सा नहीं है। अल्लाह ने तुम्हारे उन्हें पूज्यों का नाम देने का कोई प्रमाण नहीं उतारा है, जो उसकी वैधता को इंगित करता हो। सभी प्राणियों में केवल अल्लाह का आदेश चलता है, इन नामों का नहीं जो तुमने और तुम्हारे पूर्वजों ने रख लिए हैं। अल्लाह सर्वशक्तिमान ने आदेश दिया है कि तुम केवल उसी की इबादत करो और इस बात से मना किया है कि उसके साथ किसी को साझी बनाओ। यह तौहीद (एकेश्वरवाद) ही वह सीधा धर्म है, जिसमें कोई टेढ़ापन नहीं है। लेकिन अधिकतर लोग इस बात को नहीं जानते। इसलिए वे अल्लाह के साथ शिर्क करते हैं और उसके कुछ प्राणियों की पूजा करते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कैद में यूसुफ अलैहिस्सलाम की तौहीद की दावत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि मुश्किल हालात (जैसे कैद) को भी दूसरों तक भलाई पहुंचाने का ज़रिया बनाया जा सकता है।
आयत 41
يَـٰصَـٰحِبَىِ ٱلسِّجْنِ أَمَّآ أَحَدُكُمَا فَيَسْقِى رَبَّهُۥ خَمْرًۭا ۖ وَأَمَّا ٱلْـَٔاخَرُ فَيُصْلَبُ فَتَأْكُلُ ٱلطَّيْرُ مِن رَّأْسِهِۦ ۚ قُضِىَ ٱلْأَمْرُ ٱلَّذِى فِيهِ تَسْتَفْتِيَانِ
يَـٰصَـٰحِبَىِ
ऐ मेरे दो साथियो
ٱلسِّجْنِ
क़ैद ख़ाने के
أَمَّآ
रहा
أَحَدُكُمَا
तुम दोनों में से एक
فَيَسْقِى
पस वो पिलाएगा
رَبَّهُۥ
अपने आक़ा को
خَمْرًۭا ۖ
शराब
وَأَمَّا
और रहा
ٱلْـَٔاخَرُ
दूसरा
فَيُصْلَبُ
पस वो सूली चढ़ाया जाएगा
فَتَأْكُلُ
तो खाऐंगे
ٱلطَّيْرُ
परिन्दे
مِن
from
رَّأْسِهِۦ ۚ
उसके सर से
قُضِىَ
फ़ैसला कर दिया गया
ٱلْأَمْرُ
मामले का
ٱلَّذِى
वो जो
فِيهِ
जिस (के बारे) में
تَسْتَفْتِيَانِ
तुम दोनों पूछते हो
ऐ कारागार के मेरे दोनों साथियों! तुममें से एक तो अपने स्वामी को मद्यपान कराएगा; रहा दूसरा तो उसे सूली पर चढ़ाया जाएगा और पक्षी उसका सिर खाएँगे। फ़ैसला हो चुका उस बात का जिसके विषय में तुम मुझसे पूछ रहे हो।"
तफ़्सीर:
ऐ मेरे जेल के दोनों साथियो! जहाँ तक उसकी बात है, जिसने यह देखा कि वह शराब बनाने के लिए अंगूर निचोड़ रहा है, वह जेल से बाहर निकल जाएगा और अपने काम पर लौट आएगा और राजा को शराब पिलाएगा। और जहाँ तक उसकी बात है, जिसने यह देखा कि उसके सिर के ऊपर रोटी है, जिसे पक्षी खा रहे हैं, तो उसे क़त्ल कर दिया जाएगा और सूली पर चढ़ा दिया जाएगा। फिर पक्षी उसके सिर का मांस खाएँगे। तुमने जिस मामले के बारे में पूछा था, उसका फैसला हो चुका है। इसलिए वह अनिवार्य रूप से होकर रहेगा।
आयत 42
وَقَالَ لِلَّذِى ظَنَّ أَنَّهُۥ نَاجٍۢ مِّنْهُمَا ٱذْكُرْنِى عِندَ رَبِّكَ فَأَنسَىٰهُ ٱلشَّيْطَـٰنُ ذِكْرَ رَبِّهِۦ فَلَبِثَ فِى ٱلسِّجْنِ بِضْعَ سِنِينَ
وَقَالَ
और कहा
لِلَّذِى
उसे जिसका
ظَنَّ
उसे यक़ीन था
أَنَّهُۥ
कि बेशक वो
نَاجٍۢ
निजात पाने वाला है
مِّنْهُمَا
उन दोनों में से
ٱذْكُرْنِى
ज़िक्र करना मेरा
عِندَ
पास
رَبِّكَ
अपने आक़ा के
فَأَنسَىٰهُ
तो भुला दिया उसे
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान ने
ذِكْرَ
ज़िक्र करना
رَبِّهِۦ
अपने आक़ा से
فَلَبِثَ
तो वो ठहरा रहा
فِى
in
ٱلسِّجْنِ
क़ैद ख़ाने में
بِضْعَ
चन्द
سِنِينَ
साल
उन दोनों में से जिसके विषय में उसने समझा था कि वह रिहा हो जाएगा, उससे कहा, "अपने स्वामी से मेरी चर्चा करना।" किन्तु शैतान ने अपने स्वामी से उसकी चर्चा करना भुलवा दिया। अतः वह (यूसुफ़) कई वर्ष तक कारागार ही में रहा
तफ़्सीर:
यूसुफ़ ने उन दोनों युवकों में से जिसके बारे में समझा था कि वह रिहा हो जाएगा (और वह राजा को शराब पिलाने वाला था) उससे कहा : राजा के पास मेरी कहानी और मेरे मामले का ज़िक्र करना; शायद वह मुझे जेल से निकाल दे। किन्तु शैतान ने शराब पिलाने वाले को राजा के पास यूसुफ़ का उल्लेख करना भुला दिया। इसलिए उसके बाद यूसुफ़ को कई वर्षों तक जेल में रहना पड़ा।
आयत 43
وَقَالَ ٱلْمَلِكُ إِنِّىٓ أَرَىٰ سَبْعَ بَقَرَٰتٍۢ سِمَانٍۢ يَأْكُلُهُنَّ سَبْعٌ عِجَافٌۭ وَسَبْعَ سُنۢبُلَـٰتٍ خُضْرٍۢ وَأُخَرَ يَابِسَـٰتٍۢ ۖ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْمَلَأُ أَفْتُونِى فِى رُءْيَـٰىَ إِن كُنتُمْ لِلرُّءْيَا تَعْبُرُونَ
وَقَالَ
और कहा
ٱلْمَلِكُ
बादशाह ने
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَرَىٰ
मैं देखता हूँ
سَبْعَ
सात
بَقَرَٰتٍۢ
गायें
سِمَانٍۢ
मोटी
يَأْكُلُهُنَّ
खा रही हैं उन्हें
سَبْعٌ
सात
عِجَافٌۭ
दुबली
وَسَبْعَ
और सात
سُنۢبُلَـٰتٍ
बालियाँ
خُضْرٍۢ
सरसब्ज़
وَأُخَرَ
और दूसरी
يَابِسَـٰتٍۢ ۖ
ख़ुश्क
يَـٰٓأَيُّهَا
O
ٱلْمَلَأُ
ऐ सरदारो
أَفْتُونِى
जवाब दो मुझे
فِى
about
رُءْيَـٰىَ
मेरे ख़्वाब के बारे में
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
لِلرُّءْيَا
ख़्वाब की
تَعْبُرُونَ
तुम ताबीर करते
फिर ऐसा हुआ कि सम्राट ने कहा, "मैं एक स्वप्न देखा कि सात मोटी गायों को सात दुबली गायें खा रही है और सात बालें हरी है और दूसरी (सात सूखी) । ऐ सरदारों! यदि तुम स्वप्न का अर्थ बताते हो, तो मुझे मेरे इस स्वप्न के सम्बन्ध में बताओ।"
तफ़्सीर:
राजा ने कहा : मैंने सपने में देखा है कि सात मोटी गाएँ हैं, जिन्हें सात कमज़ोर गाएँ खा रही हैं। इसी तरह मैंने सात हरी बालियाँ और सात सूखी बालियाँ देखी हैं। ऐ प्रमुखो और गणमान्य लोगो! मुझे मेरे इस सपने का अर्थ बताओ, यदि तुम सपने का अर्थ जानने वाले हो।
आयत 44
قَالُوٓا۟ أَضْغَـٰثُ أَحْلَـٰمٍۢ ۖ وَمَا نَحْنُ بِتَأْوِيلِ ٱلْأَحْلَـٰمِ بِعَـٰلِمِينَ
قَالُوٓا۟
उन्हों कहा
أَضْغَـٰثُ
परेशान
أَحْلَـٰمٍۢ ۖ
ख़्वाब हैं
وَمَا
और नहीं
نَحْنُ
हम
بِتَأْوِيلِ
ताबीर को
ٱلْأَحْلَـٰمِ
ख़्वाबों की
بِعَـٰلِمِينَ
जानने वाले
उन्होंने कहा, "ये तो सम्भ्रमित स्वप्न है। हम ऐसे स्वप्न का अर्थ नहीं जानते।"
तफ़्सीर:
उन लोगों ने कहा : आपका सपना, उलझे हुए सपनों का मिश्रण है। और जो ऐसा हो उसकी कोई व्याख्या नहीं है और हम मिश्रित सपनों की व्याख्या से अवगत नहीं हैं।
आयत 45
وَقَالَ ٱلَّذِى نَجَا مِنْهُمَا وَٱدَّكَرَ بَعْدَ أُمَّةٍ أَنَا۠ أُنَبِّئُكُم بِتَأْوِيلِهِۦ فَأَرْسِلُونِ
وَقَالَ
और कहा
ٱلَّذِى
उस शख़्स ने जो
نَجَا
निजात पा गया था
مِنْهُمَا
उन दोनों में से
وَٱدَّكَرَ
और उसे याद आ गया
بَعْدَ
बाद
أُمَّةٍ
एक मुद्दत के
أَنَا۠
मैं
أُنَبِّئُكُم
मैं बताता हूँ तुम्हें
بِتَأْوِيلِهِۦ
ताबीर इसकी
فَأَرْسِلُونِ
पस भेजो मुझे
इतने में दोनों में सो जो रिहा हो गया था और एक अर्से के बाद उसे याद आया तो वह बोला, "मैं इसका अर्थ तुम्हें बताता हूँ। ज़रा मुझे (यूसुफ़ के पास) भेज दीजिए।"
तफ़्सीर:
और दोनों क़ैदी युवकों में से रिहाई पाने वाले साक़ी (शराब पिलानेवाले व्यक्ति) ने, जिसे एक अवधि के बाद यूसुफ़ अलैहिस्सलाम और उनके सपने के अर्थ का ज्ञान रखने के बारे में याद आया, तो कहा : मैं आप लोगों को राजा के सपने का अर्थ एक ऐसे व्यक्ति से पूछने के बाद बता सकता हूँ, जिसके पास सपनों के अर्थ का ज्ञान है। इसलिए - ऐ राजा - मुझे यूसुफ़ के पास भेजें, ताकि वह आपके सपने का अर्थ बताएँ।
आयत 46
يُوسُفُ أَيُّهَا ٱلصِّدِّيقُ أَفْتِنَا فِى سَبْعِ بَقَرَٰتٍۢ سِمَانٍۢ يَأْكُلُهُنَّ سَبْعٌ عِجَافٌۭ وَسَبْعِ سُنۢبُلَـٰتٍ خُضْرٍۢ وَأُخَرَ يَابِسَـٰتٍۢ لَّعَلِّىٓ أَرْجِعُ إِلَى ٱلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَعْلَمُونَ
يُوسُفُ
यूसुफ़
أَيُّهَا
O
ٱلصِّدِّيقُ
ऐ बहुत सच्चे
أَفْتِنَا
बताओ हमें
فِى
about
سَبْعِ
(the) seven
بَقَرَٰتٍۢ
सात गायों के बारे में
سِمَانٍۢ
मोटी
يَأْكُلُهُنَّ
खा रही हैं उन्हें
سَبْعٌ
सात
عِجَافٌۭ
दुबली
وَسَبْعِ
और सात
سُنۢبُلَـٰتٍ
बालियाँ
خُضْرٍۢ
सरसब्ज़
وَأُخَرَ
और दूसरी
يَابِسَـٰتٍۢ
ख़ुश्क
لَّعَلِّىٓ
ताकि मैं
أَرْجِعُ
मैं लौटूँ
إِلَى
to
ٱلنَّاسِ
तरफ़ लोगों के
لَعَلَّهُمْ
शायद कि वो
يَعْلَمُونَ
वो जान लें
"यूसुफ़, ऐ सत्यवान! हमें इसका अर्थ बता कि सात मोटी गायें है, जिन्हें सात दुबली गायें खा रही है और सात हरी बालें है और दूसरी (सात) सूखी, ताकि मैं लोगों के पास लौटकर जाऊँ कि वे जान लें।"
तफ़्सीर:
चुनाँचे जब रिहाई पाने वाला व्यक्ति यूसुफ़ के पास पहुँचा, तो उनसे कहा : ऐ यूसुफ़! ऐ सच्चे इनसान! हमें ऐसे व्यक्ति के सपने का अर्थ बताइँ, जिसने देखा कि सात मोटी गायों को सात दुबली गाएँ खा रही हैं, तथा उसने सात हरी बालियों और सात सूखी बालियों को देखा है। ताकि मैं राजा और उसके साथियों के पास वापस जाऊँ और वे राजा के सपने का अर्थ जान सकें। तथा वे आपकी प्रतिष्ठा और आपकी स्थिति जान सकें।
आयत 47
قَالَ تَزْرَعُونَ سَبْعَ سِنِينَ دَأَبًۭا فَمَا حَصَدتُّمْ فَذَرُوهُ فِى سُنۢبُلِهِۦٓ إِلَّا قَلِيلًۭا مِّمَّا تَأْكُلُونَ
قَالَ
उसने कहा
تَزْرَعُونَ
तुम खेती-बाड़ी करोगे
سَبْعَ
सात
سِنِينَ
साल
دَأَبًۭا
मुतावातिर
فَمَا
पस जो
حَصَدتُّمْ
काट लो तुम
فَذَرُوهُ
तो छोड़ देना उसे
فِى
in
سُنۢبُلِهِۦٓ
उसकी बाली में
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا
थोड़ा
مِّمَّا
उसमें से जो
تَأْكُلُونَ
तुम खाओ
उसने कहा, "सात वर्ष तक तुम व्यवहारतः खेती करते रहोगे। फिर तुम जो फ़सल काटो तो थोड़े हिस्से के सिवा जो तुम्हारे खाने के काम आए शेष को उसकी बाली में रहने देना
तफ़्सीर:
यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने इस सपने की व्याख्या करते हुए कहा : तुम लगातार सात सालों तक पूरी मेहनत के साथ खेती करोगे। अतः सात सालों में से हर साल जो भी फ़सल काटो, उसे कीड़ा लगने से बचाने के लिए उसकी बालियों में रहने दो। सिवाय थोड़े से अनाज के जिसे तुम्हें खाने के लिए ज़रूरत पड़े।
आयत 48
ثُمَّ يَأْتِى مِنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ سَبْعٌۭ شِدَادٌۭ يَأْكُلْنَ مَا قَدَّمْتُمْ لَهُنَّ إِلَّا قَلِيلًۭا مِّمَّا تُحْصِنُونَ
ثُمَّ
फिर
يَأْتِى
आऐंगे
مِنۢ
after
بَعْدِ
after
ذَٰلِكَ
बाद इसके
سَبْعٌۭ
सात (साल)
شِدَادٌۭ
सख़्त
يَأْكُلْنَ
खा जाऐंगे
مَا
जो
قَدَّمْتُمْ
पहले रखा तुमने
لَهُنَّ
उनके लिए
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا
थोड़ा
مِّمَّا
उसमें से जो
تُحْصِنُونَ
तुम महफ़ूज़ रखोगे
फिर उसके पश्चात सात कठिन वर्ष आएँगे जो वे सब खा जाएँगे जो तुमने उनके लिए पहले से इकट्ठा कर रखा होगा, सिवाय उस थोड़े-से हिस्से के जो तुम सुरक्षित कर लोगे
तफ़्सीर:
फिर उन सात उपजाऊ वर्षों के बाद, जिनमें तुम खूब खेती करोगे, सात अकाल वाले वर्ष आएँगे, जिनमें लोग उपजाऊ सालों में काटी हुए सारी फ़सलों को खा जाएँगे। सिवाय थोड़े से हिस्से के जिसे तुम बीज के तौर पर सुरक्षित कर लोगे।
आयत 49
ثُمَّ يَأْتِى مِنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ عَامٌۭ فِيهِ يُغَاثُ ٱلنَّاسُ وَفِيهِ يَعْصِرُونَ
ثُمَّ
फिर
يَأْتِى
आएगा
مِنۢ
after
بَعْدِ
after
ذَٰلِكَ
बाद इसके
عَامٌۭ
एक साल
فِيهِ
जिसमें
يُغَاثُ
बारिश दिए जाऐंगे
ٱلنَّاسُ
लोग
وَفِيهِ
और इसमें
يَعْصِرُونَ
वो रस निचोड़ेंगे
फिर उसके पश्चात एक वर्ष ऐसा आएगा, जिसमें वर्षा द्वारा लोगों की फ़रियाद सुन ली जाएगी और उसमें वे रस निचोड़ेगे।"
तफ़्सीर:
फिर उन अकाल वाले सालों के बाद एक ऐसा साल आएगा जिसमें ख़ूब बारिश होगी और खेतियाँ उगेंगी, और लोग उन चीज़ों का रस निचोड़ेंगे, जिनका रस निचोड़ने की आवश्यकता होती है, जैसे कि अंगूर, ज़ैतून और ईख आदि।
आयत 50
وَقَالَ ٱلْمَلِكُ ٱئْتُونِى بِهِۦ ۖ فَلَمَّا جَآءَهُ ٱلرَّسُولُ قَالَ ٱرْجِعْ إِلَىٰ رَبِّكَ فَسْـَٔلْهُ مَا بَالُ ٱلنِّسْوَةِ ٱلَّـٰتِى قَطَّعْنَ أَيْدِيَهُنَّ ۚ إِنَّ رَبِّى بِكَيْدِهِنَّ عَلِيمٌۭ
وَقَالَ
और कहा
ٱلْمَلِكُ
बादशाह ने
ٱئْتُونِى
लाओ मेरे पास
بِهِۦ ۖ
उसे
فَلَمَّا
तो जब
جَآءَهُ
आया उसके पास
ٱلرَّسُولُ
पैग़ाम लाने वाला
قَالَ
कहा (यूसुफ़ ने)
ٱرْجِعْ
वापस जाओ
إِلَىٰ
to
رَبِّكَ
तरफ़ अपने आक़ा के
فَسْـَٔلْهُ
फिर उससे पूछो
مَا
क्या
بَالُ
हाल है
ٱلنِّسْوَةِ
उन औरतों का
ٱلَّـٰتِى
जिन्होंने
قَطَّعْنَ
काट लिए थे
أَيْدِيَهُنَّ ۚ
हाथ अपने
إِنَّ
बेशक
رَبِّى
रब मेरा
بِكَيْدِهِنَّ
उनकी चाल से
عَلِيمٌۭ
ख़ूब वाक़िफ़ है
सम्राट ने कहा, "उसे मेरे पास ले आओ।" किन्तु जब दूत उसके पास पहुँचा तो उसने कहा, "अपने स्वामी के पास वापस जाओ और उससे पूछो कि उन स्त्रियों का क्या मामला है, जिन्होंने अपने हाथ घायल कर लिए थे। निस्संदेह मेरा रब उनकी मक्कारी को भली-भाँति जानता है।"
तफ़्सीर:
जब राजा को पता चला कि यूसुफ़ ने उसके सपने का अर्थ बताया है, तो उसने अपने सहयोगियों से कहा : उसे जेल से बाहर निकालो और मेरे पास लाओ। लेकिन जब राजा का दूत यूसुफ़ के पास आया, तो उन्होंने उससे कहा : तुम अपने स्वामी राजा के पास वापस जाओ और उससे उन महिलाओं की कहानी के बारे में पूछो, जिन्होंने अपने हाथ घायल कर लिए थे, ताकि जेल से निकलने से पहले उनकी बेगुनाही स्पष्ट हो जाए। निःसंदेह, उन्होंने मुझे रिझाने का जो प्रयास किया था, उसे मेरा पालनहार जानता है। वह उससे छिपा नहीं है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
बादशाह के ख्वाब और यूसुफ अलैहिस्सलाम की समझ का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि इल्म और सलाहियत को सही मौके पर पेश करना कामयाबी का ज़रिया बनता है।
आयत 51
قَالَ مَا خَطْبُكُنَّ إِذْ رَٰوَدتُّنَّ يُوسُفَ عَن نَّفْسِهِۦ ۚ قُلْنَ حَـٰشَ لِلَّهِ مَا عَلِمْنَا عَلَيْهِ مِن سُوٓءٍۢ ۚ قَالَتِ ٱمْرَأَتُ ٱلْعَزِيزِ ٱلْـَٔـٰنَ حَصْحَصَ ٱلْحَقُّ أَنَا۠ رَٰوَدتُّهُۥ عَن نَّفْسِهِۦ وَإِنَّهُۥ لَمِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ
قَالَ
कहा (बादशाह ने)
مَا
क्या
خَطْبُكُنَّ
मामला है तुम्हारा
إِذْ
जब
رَٰوَدتُّنَّ
तुमने फुसलाना चाहा था
يُوسُفَ
यूसुफ़ को
عَن
from
نَّفْسِهِۦ ۚ
उसके नफ़्स से
قُلْنَ
कहने लगीं
حَـٰشَ
Allah forbid
لِلَّهِ
हाशा लिल्लाह
مَا
नहीं
عَلِمْنَا
जाना हमने
عَلَيْهِ
उस पर
مِن
any
سُوٓءٍۢ ۚ
किसी बुराई को
قَالَتِ
कहने लगी
ٱمْرَأَتُ
औरत
ٱلْعَزِيزِ
अज़ीज़ की
ٱلْـَٔـٰنَ
अब
حَصْحَصَ
ज़ाहिर हो गया
ٱلْحَقُّ
हक़
أَنَا۠
मैंने
رَٰوَدتُّهُۥ
फुसलाया था मैंने उसे
عَن
from
نَّفْسِهِۦ
उसके नफ़्स से
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
لَمِنَ
(is) surely of
ٱلصَّـٰدِقِينَ
अलबत्ता सच्चों में से है
उसने कहा, "तुम स्त्रियों का क्या हाल था, जब तुमने यूसुफ़ को रिझाने की चेष्टा की थी?" उन्होंने कहा, "पाक है अल्लाह! हम उसमें कोई बुराई नहीं जानते है।" अज़ीज़ की स्त्री बोल उठी, "अब तो सत्य प्रकट हो गया है। मैंने ही उसे रिझाना चाहा था। वह तो बिलकुल सच्चा है।"
तफ़्सीर:
राजा ने स्त्रियों को संबोधित करते हुए कहा : उस समय तुम्हारा क्या मामला था, जब तुमने छल के द्वारा यूसुफ़ को अपने साथ कुकर्म करने के लिए प्रेरित करने की कोशिश की थी? स्त्रियों ने राजा के जवाब में कहा : अल्लाह न करे कि यूसुफ़ पर आरोप लगाया जाए, अल्लाह की क़सम! हमने उसमें कोई बुराई नहीं देखी। इसपर अज़ीज़ की पत्नी ने जो कुछ किया था, उसको स्वीकारते हुए कहा : अब सच्चाई सामने आ गई है, मैंने ही उसे बहकाने की कोशिश की थी, उसने मुझे फुसलाने की कोशिश नहीं की। निःसंदेह उसने मेरे लगाए हुए आरोप से निर्दोष होने का जो दावा किया है, उसमें वह बिल्कुल सच्चा है।
आयत 52
ذَٰلِكَ لِيَعْلَمَ أَنِّى لَمْ أَخُنْهُ بِٱلْغَيْبِ وَأَنَّ ٱللَّهَ لَا يَهْدِى كَيْدَ ٱلْخَآئِنِينَ
ذَٰلِكَ
ये
لِيَعْلَمَ
ताकि वो जान ले
أَنِّى
बेशक मैं
لَمْ
not
أَخُنْهُ
नहीं ख़यानत की मैंने उसकी
بِٱلْغَيْبِ
ग़ायबाना
وَأَنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يَهْدِى
नहीं वो राह दिखाता
كَيْدَ
मकर को
ٱلْخَآئِنِينَ
ख़यानत करने वालों की
"यह इसलिए कि वह जान ले कि मैंने गुप्त॥ रूप से उसके साथ विश्वासघात नहीं किया और यह कि अल्लाह विश्वासघातियों का चाल को चलने नहीं देता
तफ़्सीर:
अज़ीज़ की स्त्री ने कहा : मैंने इस बात का इक़रार कि मैंने ही उसे रिझाया था और वह सच्चा है, इस उद्देश्य से किया है कि यूसुफ़ जान ले कि मैंने उसकी अनुपस्थिति में उसपर आरोप नहीं मढ़ा है। क्योंकि जो कुछ अब तक हुआ, उससे मेरे लिए यह स्पष्ट हो गया कि कि अल्लाह झूठ बोलने वाले और फ़रेब करने वाले को सफल नहीं करता।
आयत 53
۞ وَمَآ أُبَرِّئُ نَفْسِىٓ ۚ إِنَّ ٱلنَّفْسَ لَأَمَّارَةٌۢ بِٱلسُّوٓءِ إِلَّا مَا رَحِمَ رَبِّىٓ ۚ إِنَّ رَبِّى غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
۞ وَمَآ
और नहीं
أُبَرِّئُ
मैं बरी करता/करती
نَفْسِىٓ ۚ
अपने नफ़्स को
إِنَّ
बेशक
ٱلنَّفْسَ
नफ़्स
لَأَمَّارَةٌۢ
अलबत्ता बहुत हुक्म देने वाला है
بِٱلسُّوٓءِ
बुराई का
إِلَّا
मगर
مَا
जिस पर
رَحِمَ
रहम करे
رَبِّىٓ ۚ
मेरा रब
إِنَّ
बेशक
رَبِّى
मेरा रब
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
मैं यह नहीं कहता कि मैं बुरी हूँ - जी तो बुराई पर उभारता ही है - यदि मेरा रब ही दया करे तो बात और है। निश्चय ही मेरा रब बहुत क्षमाशील, दयावान है।"
तफ़्सीर:
और अज़ीज़ की स्त्री ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा : मैं खुद को बुराई की इच्छा से पाक नहीं ठहराती और न इससे मेरा उद्देश्य अपनी पवित्रता साबित करना था। क्योंकि इनसान के मन का मामला यह है कि वह इच्छाओं की ओर झुकाव रखने और उनसे बचना कठिन होने के कारण, बुराई का बहुत ज़्यादा आदेश देने वाला है। सिवाय उसके जिसपर अल्लाह दया करे और उसे बुराई का आदेश देने से सुरक्षित रखे। निश्चय मेरा पालनहार अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला और उनपर दया करने वाला है।
आयत 54
وَقَالَ ٱلْمَلِكُ ٱئْتُونِى بِهِۦٓ أَسْتَخْلِصْهُ لِنَفْسِى ۖ فَلَمَّا كَلَّمَهُۥ قَالَ إِنَّكَ ٱلْيَوْمَ لَدَيْنَا مَكِينٌ أَمِينٌۭ
وَقَالَ
और कहा
ٱلْمَلِكُ
बादशाह ने
ٱئْتُونِى
लाओ मेरे पास
بِهِۦٓ
उसे
أَسْتَخْلِصْهُ
मैं उसे ख़ास कर लूँ
لِنَفْسِى ۖ
अपनी ज़ात के लिए
فَلَمَّا
फिर जब
كَلَّمَهُۥ
उसने बात-चीत की उससे
قَالَ
कहा
إِنَّكَ
बेशक तू
ٱلْيَوْمَ
आज से
لَدَيْنَا
हमारे यहाँ
مَكِينٌ
मर्तबे वाला
أَمِينٌۭ
अमानतदार है
सम्राट ने कहा, "उसे मेरे पास ले आओ! मैं उसे अपने लिए ख़ास कर लूँगा।" जब उसने उससे बात-चीक करी तो उसने कहा, "निस्संदेह आज तुम हमारे यहाँ विश्व सनीय अधिकार प्राप्त व्यक्ति हो।"
तफ़्सीर:
जब यूसुफ़ की बेगुनाही स्पष्ट हो गई और राजा को उसका ज्ञान हो गया, तो उसने अपने सहयोगियों से कहा : उन्हें मेरे पास लाओ। मैं उन्हें अपने लिए ख़ास कर लूँगा। चुनाँचे उन्हें राजा के पास लाया गया। फिर जब राजा ने उनसे बात की और उनका ज्ञान और बुद्धि उसके लिए स्पष्ट हो गई, तो उसने उनसे कहा : निश्चय (ऐ यूसुफ़!) आप आज हमारे यहाँ एक पद-प्रतिष्ठा वाले और विश्वसनीय व्यक्ति बन गए हैं।
आयत 55
قَالَ ٱجْعَلْنِى عَلَىٰ خَزَآئِنِ ٱلْأَرْضِ ۖ إِنِّى حَفِيظٌ عَلِيمٌۭ
قَالَ
उसने कहा
ٱجْعَلْنِى
मुक़र्रर कर दीजिए मुझे
عَلَىٰ
over
خَزَآئِنِ
ख़ज़ानों पर
ٱلْأَرْضِ ۖ
ज़मीन के
إِنِّى
बेशक मैं हूँ
حَفِيظٌ
बहुत हिफ़ाज़त करने वाला
عَلِيمٌۭ
ख़ूब इल्म रखने वाला
उसने कहा, "इस भू-भाग के ख़जानों पर मुझे नियुक्त कर दीजिए। निश्चय ही मैं रक्षक और ज्ञानवान हूँ।"
तफ़्सीर:
यूसुफ़ ने राजा से कहा : मुझे मिस्र के देश में धन एवं अनाज के ख़ज़ानों के संरक्षण पर नियुक्त कर दीजिए, क्योंकि मैं एक विश्वसनीय कोषाध्यक्ष हूँ और जो ज़िम्मेदारी ले रहा हूँ उसका जानकार और समझ रखने वाला हूँ।
आयत 56
وَكَذَٰلِكَ مَكَّنَّا لِيُوسُفَ فِى ٱلْأَرْضِ يَتَبَوَّأُ مِنْهَا حَيْثُ يَشَآءُ ۚ نُصِيبُ بِرَحْمَتِنَا مَن نَّشَآءُ ۖ وَلَا نُضِيعُ أَجْرَ ٱلْمُحْسِنِينَ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
مَكَّنَّا
इक़्तिदार दिया हमने
لِيُوسُفَ
यूसुफ़ को
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
يَتَبَوَّأُ
वो रहता
مِنْهَا
उसमें
حَيْثُ
जहाँ
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता
نُصِيبُ
हम पहुँचाते हैं
بِرَحْمَتِنَا
अपनी रहमत को
مَن
जिसे
نَّشَآءُ ۖ
हम चाहते हैं
وَلَا
और नहीं
نُضِيعُ
हम ज़ाया करते
أَجْرَ
अजर
ٱلْمُحْسِنِينَ
एहसान करने वालों का
इस प्रकार हमने यूसुफ़ को उस भू-भाग में अधिकार प्रदान किया कि वह उसमें जहाँ चाहे अपनी जगह बनाए। हम जिसे चाहते हैं उसे अपनी दया का पात्र बनाते है। उत्तमकारों का बदला हम अकारथ नहीं जाने देते
तफ़्सीर:
जिस तरह हमने यूसुफ़ पर निर्दोषता और जेल से मुक्ति के द्वारा उपकार किया, उसी तरह हमने उन्हें मिस्र की धरती में सशक्त बनाकर उनपर उपकार किया। वह जहाँ चाहें जाएँ और जहाँ चाहें रहें। हम इस दुनिया में अपने बंदों में से जिसे चाहते हैं, अपनी दया प्रदान करते हैं, और हम अच्छे कर्म करने वालों का सवाब बर्बाद नहीं करते, बल्कि उन्हें उसे बिना कमी के पूरा देते हैं।
आयत 57
وَلَأَجْرُ ٱلْـَٔاخِرَةِ خَيْرٌۭ لِّلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَكَانُوا۟ يَتَّقُونَ
وَلَأَجْرُ
और यक़ीनन अजर
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत का
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لِّلَّذِينَ
उनके लिए जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَكَانُوا۟
और हैं वो
يَتَّقُونَ
वो तक़वा करते/डरते
और ईमान लानेवालों और डर रखनेवालों के लिए आख़िरत का बदला इससे कहीं उत्तम है
तफ़्सीर:
निश्चय अल्लाह का बदला, जो उसने आख़िरत में तैयार किया है, उन लोगों के लिए दुनिया के बदले से बेहतर है, जो अल्लाह पर ईमान लाए और उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, उससे डरते रहे।
आयत 58
وَجَآءَ إِخْوَةُ يُوسُفَ فَدَخَلُوا۟ عَلَيْهِ فَعَرَفَهُمْ وَهُمْ لَهُۥ مُنكِرُونَ
وَجَآءَ
और आए
إِخْوَةُ
भाई
يُوسُفَ
यूसुफ़ के
فَدَخَلُوا۟
फिर वो दाख़िल हुए
عَلَيْهِ
उस पर
فَعَرَفَهُمْ
पस उसने पहचान लिया उन्हें
وَهُمْ
जबकि वो
لَهُۥ
उससे
مُنكِرُونَ
नावाक़िफ़ थे
फिर ऐसा हुआ कि यूसुफ़ के भाई आए और उसके सामने उपस्थित हुए, उसने तो उन्हें पहचान लिया, किन्तु वे उससे अपरिचित रहे
तफ़्सीर:
और यूसुफ़ के भाई अपने सामान लेकर मिस्र आए। जब वे उनके पास गए तो वह पहचान गए कि वे उनके भाई हैं, जबकि वे पहचान नहीं सके कि वह उनका भाई (यूसुफ़) है, क्योंकि काफ़ी समय बीत चुका था और उनकी शक्ल-सूरत भी बदल चुकी थी। क्योंकि जब उन्होंने यूसुफ़ को कुएँ में डाला था, तो वह बच्चे थे।
आयत 59
وَلَمَّا جَهَّزَهُم بِجَهَازِهِمْ قَالَ ٱئْتُونِى بِأَخٍۢ لَّكُم مِّنْ أَبِيكُمْ ۚ أَلَا تَرَوْنَ أَنِّىٓ أُوفِى ٱلْكَيْلَ وَأَنَا۠ خَيْرُ ٱلْمُنزِلِينَ
وَلَمَّا
और जब
جَهَّزَهُم
उसने तैयार करके दिया उन्हें
بِجَهَازِهِمْ
सामान उनका
قَالَ
कहा
ٱئْتُونِى
लाना मेरे पास
بِأَخٍۢ
भाई को
لَّكُم
अपने
مِّنْ
from
أَبِيكُمْ ۚ
अपने बाप की तरफ़ से
أَلَا
क्या नहीं
تَرَوْنَ
तुम देखते
أَنِّىٓ
बेशक मैं
أُوفِى
मैं पूरा-पूरा देता हूँ
ٱلْكَيْلَ
पैमाना (ग़ल्ला)
وَأَنَا۠
और मैं
خَيْرُ
बेहतर हूँ
ٱلْمُنزِلِينَ
सब मेज़बानी करने वालों से
जब उसने उनके लिए उनका सामान तैयार करा दिया तो कहा, "बाप की ओर सो तुम्हारा भाई है, उसे मेरे पास लाना। क्या देखते नहीं कि मैं पूरी माप से देता हूँ और मैं अच्छा आतिशेय भी हूँ?"
तफ़्सीर:
और जब यूसुफ़ ने उनको वह अनाज और खाद्य-सामग्री दे दी, जो उन्होंने माँगी और जब उन्होंने बताया कि उनका एक बाप-शरीक (सौतेला) भाई है, जिसे वे उसके पिता के पास छोड़ आए हैं, तो कहा : तुम अपने बाप शरीक भाई को मेरे पास ले आना, मैं तुम्हें एक ऊँट के भार का ग़ल्ला अधिक दूँगा। क्या तुम नहीं देखते कि मैं पूरी माप देता हूँ, उसमें कमी नहीं करता और मैं सबसे अच्छा मेहमान नवाज़ हूँ।
आयत 60
فَإِن لَّمْ تَأْتُونِى بِهِۦ فَلَا كَيْلَ لَكُمْ عِندِى وَلَا تَقْرَبُونِ
فَإِن
फिर अगर
لَّمْ
ना
تَأْتُونِى
तुम लाए मेरे पास
بِهِۦ
उसे
فَلَا
तो नहीं
كَيْلَ
कोई पैमाना (ग़ल्ला)
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
عِندِى
मेरे पास
وَلَا
और ना
تَقْرَبُونِ
तुम क़रीब आना मेरे
किन्तु यदि तुम उसे मेरे पास न लाए तो फिर तुम्हारे लिए मेरे यहाँ कोई माप (ग़ल्ला) नहीं और तुम मेरे पास आना भी मत।"
तफ़्सीर:
यदि तुम उसे मेरे पास नहीं लाए, तो तुम्हारा अपने इस दावे में झूठा होना स्पष्ट हो जाएगा कि तुम्हारा एक बाप शरीक भाई है। फिर मैं तुम्हें कभी भोजन नहीं दूँगा और तुम मेरे देश का रुख नहीं करना।
आज की ज़िंदगी में सबक़
यूसुफ अलैहिस्सलाम की बेगुनाही ज़ाहिर होने और ज़िम्मेदारी संभालने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि सब्र आखिरकार सुर्खरूई (कामयाबी) लाता है, चाहे उसमें वक्त लगे।
आयत 61
قَالُوا۟ سَنُرَٰوِدُ عَنْهُ أَبَاهُ وَإِنَّا لَفَـٰعِلُونَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
سَنُرَٰوِدُ
ज़रूर हम आमादा करेंगे
عَنْهُ
उसके बारे में
أَبَاهُ
उसके वालिद को
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَفَـٰعِلُونَ
ज़रूर करने वाले हैं
वे बोले, "हम उसके लिए उसके बाप को राज़ी करने की कोशिश करेंगे और हम यह काम अवश्य करेंगे।"
तफ़्सीर:
तो उनके भाइयों ने उन्हें उत्तर देते हुए कहा : हम उसके पिता से इसके लिए अनुरोध करेंगे और इसके लिए भरपूर प्रयास करेंगे। तथा आपने हमें जो आदेश दिया है, हम निश्चित रूप से उसे किसी लापरवाही के बिना अवश्य करने वाले हैं।
आयत 62
وَقَالَ لِفِتْيَـٰنِهِ ٱجْعَلُوا۟ بِضَـٰعَتَهُمْ فِى رِحَالِهِمْ لَعَلَّهُمْ يَعْرِفُونَهَآ إِذَا ٱنقَلَبُوٓا۟ إِلَىٰٓ أَهْلِهِمْ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
وَقَالَ
और उसने कहा
لِفِتْيَـٰنِهِ
अपने ग़ुलामों को
ٱجْعَلُوا۟
रख दो
بِضَـٰعَتَهُمْ
पूँजी/सरमाया इनका
فِى
in
رِحَالِهِمْ
उनके सामाने सफ़र में
لَعَلَّهُمْ
शायद कि वो
يَعْرِفُونَهَآ
वो उसे पहचान जाऐं
إِذَا
जब
ٱنقَلَبُوٓا۟
वो पलटें
إِلَىٰٓ
to
أَهْلِهِمْ
तरफ़ अपने घर वालों के
لَعَلَّهُمْ
शायद कि वो
يَرْجِعُونَ
वो लौट आऐं
उसने अपने सेवकों से कहा, "इनका दिया हुआ माल इनके सामान में रख दो कि जब ये अपने घरवालों की ओर लौटें तो इसे पहचान लें, ताकि ये फिर लौटकर आएँ।"
तफ़्सीर:
और यूसुफ़ ने अपने कार्यकर्ताओं से कहा : इन लोगों का धन इन्हें लौटा दो, ताकि वे अपनी वापसी पर जान सकें कि हमने उनसे यह नहीं खरीदा है। और यह उन्हें अपने भाई के साथ फिर से लौटने के लिए मजबूर करेगा, ताकि वे यूसुफ़ के सामने अपनी सच्चाई साबित करें और यूसुफ़ उनसे उनका धन स्वीकार कर लें।
आयत 63
فَلَمَّا رَجَعُوٓا۟ إِلَىٰٓ أَبِيهِمْ قَالُوا۟ يَـٰٓأَبَانَا مُنِعَ مِنَّا ٱلْكَيْلُ فَأَرْسِلْ مَعَنَآ أَخَانَا نَكْتَلْ وَإِنَّا لَهُۥ لَحَـٰفِظُونَ
فَلَمَّا
तो जब
رَجَعُوٓا۟
वो लौटे
إِلَىٰٓ
to
أَبِيهِمْ
तरफ़ अपने वालिद के
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
يَـٰٓأَبَانَا
ऐ हमारे अब्बा जान
مُنِعَ
रोक दिया गया
مِنَّا
हमसे
ٱلْكَيْلُ
पैमाना (ग़ल्ला)
فَأَرْسِلْ
तो भेज दें
مَعَنَآ
साथ हमारे
أَخَانَا
हमारे भाई को
نَكْتَلْ
हम नाप भर ग़ल्ला लाऐं
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَهُۥ
उसकी
لَحَـٰفِظُونَ
अलबत्ता हिफ़ाज़त करने वाले हैं
फिर जब वे अपने बाप के पास लौटकर गए तो कहा, "ऐ मेरे बाप! (अनाज की) माप हमसे रोक दी गई है। अतः हमारे भाई को हमारे साथ भेज दीजिए, ताकि हम माप भर लाएँ; और हम उसकी रक्षा के लिए तो मौजूद ही हैं।"
तफ़्सीर:
जब वे अपने पिता के पास लौटे, और उन्हें बताया कि यूसुफ़ ने उनका किस तरह सम्मान किया है, तो उन्होंने कहा : हे हमारे पिता! हमारे अपने भाई को अपने साथ न लाने पर हमसे ग़ल्ले की आपूर्ति रोक दी गई है। इसलिए उसे हमारे साथ भेजें। क्योंकि यदि आप उसे हमारे साथ भेजते हैं, तो हमें ग़ल्ले का माप मिलेगा। और हम आपसे उसकी तब तक रक्षा करने की प्रतिज्ञा करते हैं जब तक कि वह आपके पास सुरक्षित रूप से वापस न आ जाए।
आयत 64
قَالَ هَلْ ءَامَنُكُمْ عَلَيْهِ إِلَّا كَمَآ أَمِنتُكُمْ عَلَىٰٓ أَخِيهِ مِن قَبْلُ ۖ فَٱللَّهُ خَيْرٌ حَـٰفِظًۭا ۖ وَهُوَ أَرْحَمُ ٱلرَّٰحِمِينَ
قَالَ
कहा
هَلْ
नहीं
ءَامَنُكُمْ
मैं ऐतबार कर सकता तुम पर
عَلَيْهِ
इसके मामले में
إِلَّا
मगर
كَمَآ
जैसा कि
أَمِنتُكُمْ
ऐतबार किया था मैंने तुम पर
عَلَىٰٓ
with
أَخِيهِ
उसके भाई के मामले में
مِن
before
قَبْلُ ۖ
इससे क़ब्ल
فَٱللَّهُ
पस अल्लाह
خَيْرٌ
बेहतरीन
حَـٰفِظًۭا ۖ
हिफ़ाज़त करने वाला है
وَهُوَ
और वो ही
أَرْحَمُ
सबसे ज़्यादा रहम करने वाला है
ٱلرَّٰحِمِينَ
रहम करने वालों से
उसने कहा, "क्या मैं उसके मामले में तुमपर वैसा ही भरोसा करूँ जैसा इससे पहले उसके भाई के मामले में तुमपर भरोसा कर चुका हूँ? हाँ, अल्लाह ही सबसे अच्छ रक्षक है और वह सबसे बढ़कर दयावान है।"
तफ़्सीर:
उनके पिता ने उनसे कहा : क्या मैं उसके बारे में तुमपर उसी तरह विश्वास करूँ, जिस तरह इससे पहले उसके सगे भाई यूसुफ़ के बारे में तुमपर विश्वास किया था?! मैंने उसके बारे में तुमपर भरोसा किया था, और तुमने उसकी रक्षा करने की प्रतिज्ञा की थी। लेकिन तुमने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे पूरा नहीं किया। इसलिए मुझे उसकी रक्षा करने की तुम्हारी प्रतिज्ञा का कोई भरोसा नहीं है, बल्कि मेरा भरोसा केवल अल्लाह पर है। क्योंकि वह जिसकी रक्षा करना चाहे, उसका सबसे अच्छा रक्षक है और जिसपर दया करना चाहे, उसपर सबसे अधिक दया करने वाला है।
आयत 65
وَلَمَّا فَتَحُوا۟ مَتَـٰعَهُمْ وَجَدُوا۟ بِضَـٰعَتَهُمْ رُدَّتْ إِلَيْهِمْ ۖ قَالُوا۟ يَـٰٓأَبَانَا مَا نَبْغِى ۖ هَـٰذِهِۦ بِضَـٰعَتُنَا رُدَّتْ إِلَيْنَا ۖ وَنَمِيرُ أَهْلَنَا وَنَحْفَظُ أَخَانَا وَنَزْدَادُ كَيْلَ بَعِيرٍۢ ۖ ذَٰلِكَ كَيْلٌۭ يَسِيرٌۭ
وَلَمَّا
और जब
فَتَحُوا۟
उन्होंने खोला
مَتَـٰعَهُمْ
सामान अपना
وَجَدُوا۟
उन्होंने पाया
بِضَـٰعَتَهُمْ
अपनी पूँजी को
رُدَّتْ
जो लौटा दी गई है
إِلَيْهِمْ ۖ
तरफ़ उनके
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
يَـٰٓأَبَانَا
ऐ हमारे अब्बा जान
مَا
क्या (और)
نَبْغِى ۖ
हम चाहते हैं
هَـٰذِهِۦ
ये है
بِضَـٰعَتُنَا
पूँजी हमारी
رُدَّتْ
जो लौटा दी गई है
إِلَيْنَا ۖ
तरफ़ हमारे
وَنَمِيرُ
और हम ग़ल्ला लाऐंगे
أَهْلَنَا
अपने घर वालों के लिए
وَنَحْفَظُ
और हम हिफ़ाज़त करेंगे
أَخَانَا
अपने भाई की
وَنَزْدَادُ
और हम ज़्यादा लेंगे
كَيْلَ
पैमाना (ग़ल्ला)
بَعِيرٍۢ ۖ
एक ऊँट का
ذَٰلِكَ
ये
كَيْلٌۭ
पैमाना (ग़ल्ला) है
يَسِيرٌۭ
बहुत आसान
जब उन्होंने अपना सामान खोला, तो उन्होंने अपने माल अपनी ओर वापस किया हुआ पाया। वे बोले, "ऐ मेरे बाप, हमें और क्या चाहिए! यह हमारा माल भी तो हमें लौटा दिया गया है। अब हम अपने घरवालों के लिए खाद्य-सामग्री लाएँगे और अपने भाई की रक्षा भी करेंगे। और एक ऊँट के बोझभर और अधिक लेंगे। इतना माप (ग़ल्ला) मिल जाना तो बिलकुल आसान है।"
तफ़्सीर:
जब उन्होंने अपने लाए हुए अनाज की बोरियाँ खोलीं, तो देखा कि उसका दाम वापस कर दिया गया है। यह देखकर उन्होंने अपने पिता से कहा : इस सम्मान के बाद हमें इस अज़ीज़ से और क्या चाहिए? यह हमारे अनाज का दाम है, जिसे अज़ीज़ ने अपने अनुग्रह से हमें वापस कर दिया है। हम अपने घर वालों के लिए अनाज ले आएँगे और अपने भाई की उससे रक्षा करेंगे जिसका आपको भय है, और उसे साथ ले जाने के कारण एक ऊँट के बोझभर ग़ल्ला अधिक लाएँगे। क्योंकि अज़ीज़ के लिए एक ऊँट की माप बढ़ाना बहुत आसान है।
आयत 66
قَالَ لَنْ أُرْسِلَهُۥ مَعَكُمْ حَتَّىٰ تُؤْتُونِ مَوْثِقًۭا مِّنَ ٱللَّهِ لَتَأْتُنَّنِى بِهِۦٓ إِلَّآ أَن يُحَاطَ بِكُمْ ۖ فَلَمَّآ ءَاتَوْهُ مَوْثِقَهُمْ قَالَ ٱللَّهُ عَلَىٰ مَا نَقُولُ وَكِيلٌۭ
قَالَ
कहा
لَنْ
हरगिज़ नहीं
أُرْسِلَهُۥ
मैं भेजूँगा उसे
مَعَكُمْ
साथ तुम्हारे
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
تُؤْتُونِ
तुम दो मुझे
مَوْثِقًۭا
पुख़्ता वादा
مِّنَ
by
ٱللَّهِ
अल्लाह (के नाम) से
لَتَأْتُنَّنِى
अलबत्ता तुम ज़रूर लाओगे मेरे पास
بِهِۦٓ
उसे
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
يُحَاطَ
घेर लिया जाए
بِكُمْ ۖ
तुम्हें
فَلَمَّآ
फिर जब
ءَاتَوْهُ
उन्होंने दिया उसे
مَوْثِقَهُمْ
पुख़्ता वादा अपना
قَالَ
उसने कहा
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَىٰ
उस पर
مَا
जो
نَقُولُ
हम कहते है
وَكِيلٌۭ
निगहबान है
उसने कहा, "मैं उसे तुम्हारे साथ कदापि नहीं भेज सकता। जब तक कि तुम अल्लाह को गवाह बनाकर मुझे पक्का वचन न दो कि तुम उसे मेरे पास अवश्य लाओगे, यह और बात है कि तुम घिर जाओ।" फिर जब उन्होंने उसे अपना वचन दे दिया तो उसने कहा, "हम जो कुछ कर रहे है वह अल्लाह के हवाले है।"
तफ़्सीर:
उनके पिता ने उनसे कहा : मैं उसे तुम्हारे साथ हरगिज़ नहीं भेजूँगा, यहाँ तक कि तुम मुझे अल्लाह का दृढ़ वचन दो कि उसे मेरे पास वापस लाओगे, सिवाय इस स्थिति के कि तुम सब को विनाश घेर ले और तुममें से कोई न बचे, और तुम उसे न रोकने में सक्षम हो और न ही वापस लौटने में। जब उन्होंने याक़ूब अलैहिस्सलाम को अल्लाह का दृढ़ वचन दे दिया, तो उन्होंने कहा : हम जो कुछ कह रहे हैं, उसपर अल्लाह गवाह है। इसलिए उसकी गवाही हमारे लिए पर्याप्त है।
आयत 67
وَقَالَ يَـٰبَنِىَّ لَا تَدْخُلُوا۟ مِنۢ بَابٍۢ وَٰحِدٍۢ وَٱدْخُلُوا۟ مِنْ أَبْوَٰبٍۢ مُّتَفَرِّقَةٍۢ ۖ وَمَآ أُغْنِى عَنكُم مِّنَ ٱللَّهِ مِن شَىْءٍ ۖ إِنِ ٱلْحُكْمُ إِلَّا لِلَّهِ ۖ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ ۖ وَعَلَيْهِ فَلْيَتَوَكَّلِ ٱلْمُتَوَكِّلُونَ
وَقَالَ
और उसने कहा
يَـٰبَنِىَّ
ऐ मेरे बेटो
لَا
(Do) not
تَدْخُلُوا۟
ना तुम दाख़िल होना
مِنۢ
from
بَابٍۢ
दरवाज़े से
وَٰحِدٍۢ
एक ही
وَٱدْخُلُوا۟
और तुम दाख़िल होना
مِنْ
from
أَبْوَٰبٍۢ
दरवाज़ों से
مُّتَفَرِّقَةٍۢ ۖ
मुख़्तलिफ़
وَمَآ
और नहीं
أُغْنِى
मैं बचा सकता
عَنكُم
तुम्हें
مِّنَ
against
ٱللَّهِ
अल्लाह से
مِن
any
شَىْءٍ ۖ
कुछ भी
إِنِ
नहीं
ٱلْحُكْمُ
फ़ैसला
إِلَّا
मगर
لِلَّهِ ۖ
अल्लाह ही के लिए
عَلَيْهِ
उसी पर
تَوَكَّلْتُ ۖ
तवक्कल किया मैंने
وَعَلَيْهِ
और उसी पर
فَلْيَتَوَكَّلِ
पस चाहिए कि तवक्कल करें
ٱلْمُتَوَكِّلُونَ
तवक्कल करने वाले
उसने यह भी कहा, "ऐ मेरे बेटो! एक द्वार से प्रवेश न करना, बल्कि विभिन्न द्वारों से प्रवेश करना यद्यपि मैं अल्लाह के मुक़ाबले में तुम्हारे काम नहीं आ सकता आदेश तो बस अल्लाह ही का चलता है। उसी पर मैंने भरोसा किया और भरोसा करनेवालों को उसी पर भरोसा करना चाहिए।"
तफ़्सीर:
और उनके पिता ने उन्हें वसीयत करते हुए कहा : तुम लोग मिस्र में एक साथ एक ही द्वार से प्रवेश न करना, बल्कि अलग-अलग दरवाज़ों से प्रवेश करना। यह सुरक्षा के दृष्टिकोण से अधिक उत्तम है, कि यदि कोई तुम्हें हानि पहुँचाना चाहे तो सब उसके शिकार न हो। मैं यह बात तुमसे इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि तुमसे कोई ऐसा नुकसान दूर कर दूँ, जिससे अल्लाह तुम्हें पीड़ित करना चाहता है, या तुम्हें कोई ऐसा लाभ पहुँचा दूँ, जो अल्लाह नहीं चाहता है। क्योंकि फ़ैसला तो केवल अल्लाह का है और आदेश तो केवल उसी का चलता है। मैंने अपने सभी मामलों में अकेले उसी पर भरोसा किया है, और भरोसा करने वालों को अकेले उसी पर भरोसा करना चाहिए।
आयत 68
وَلَمَّا دَخَلُوا۟ مِنْ حَيْثُ أَمَرَهُمْ أَبُوهُم مَّا كَانَ يُغْنِى عَنْهُم مِّنَ ٱللَّهِ مِن شَىْءٍ إِلَّا حَاجَةًۭ فِى نَفْسِ يَعْقُوبَ قَضَىٰهَا ۚ وَإِنَّهُۥ لَذُو عِلْمٍۢ لِّمَا عَلَّمْنَـٰهُ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
وَلَمَّا
और जब
دَخَلُوا۟
वो दाख़िल हुए
مِنْ
from
حَيْثُ
जहाँ से
أَمَرَهُمْ
हुक्म दिया था उन्हें
أَبُوهُم
उनके वालिद ने
مَّا
ना
كَانَ
था कि
يُغْنِى
काम आता
عَنْهُم
उन्हें
مِّنَ
against
ٱللَّهِ
अल्लाह से
مِن
any
شَىْءٍ
कुछ भी
إِلَّا
मगर
حَاجَةًۭ
एक हाजत थी
فِى
of
نَفْسِ
दिल में
يَعْقُوبَ
याक़ूब के
قَضَىٰهَا ۚ
उसने पूरा किया जिसे
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
لَذُو
(was) a possessor
عِلْمٍۢ
अल्बत्ता इल्म वाला था
لِّمَا
बवजह उसके जो
عَلَّمْنَـٰهُ
सिखाया था हमने उसे
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَ
अक्सर
ٱلنَّاسِ
लोग
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
और जब उन्होंने प्रवेश किया जिस तरह से उनके बाप ने उन्हें आदेश दिया था - अल्लाह की ओर से होनेवाली किसी चीज़ को वह उनसे हटा नहीं सकता था। बस याक़ूब के जी की एक इच्छा थी, जो उसने पूरी कर ली। और निस्संदेह वह ज्ञानवान था, क्योंकि हमने उसे ज्ञान प्रदान किया था; किन्तु अधिकतर लोग जानते नहीं -
तफ़्सीर:
चुनाँचे वे चल पड़े। उनके साथ यूसुफ़ का सगा भाई भी था। जब वे अपने पिता के आदेशानुसार अलग-अलग दरवाजों से प्रवेश किए, तो उनका अलग-अलग दरवाजों से प्रवेश करना उनसे अल्लाह की उनपर नियत की हुई कोई चीज़ टालने वाला नहीं था। यह तो केवल याक़ूब अलैहिस्सलाम का अपने बेटों के प्रति स्नेह था, जिसे उन्होंने प्रकट कर दिया और उन्हें उसकी वसीयत कर दी। हालाँकि उन्हें खूब पता था कि अल्लाह के फैसले के अलावा कोई फैसला नहीं है। क्योंकि हमने उन्हें तक़दीर (भाग्य) पर ईमान रखने और कारणों को अपनाने की जो शिक्षा दी थे, उसका वह ज्ञान रखते थे। लेकिन अधिकांश लोग यह नहीं जानते हैं।
आयत 69
وَلَمَّا دَخَلُوا۟ عَلَىٰ يُوسُفَ ءَاوَىٰٓ إِلَيْهِ أَخَاهُ ۖ قَالَ إِنِّىٓ أَنَا۠ أَخُوكَ فَلَا تَبْتَئِسْ بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
وَلَمَّا
और जब
دَخَلُوا۟
वो दाख़िल हुए
عَلَىٰ
upon
يُوسُفَ
यूसुफ़ पर
ءَاوَىٰٓ
उसने जगह दी
إِلَيْهِ
अपने पास
أَخَاهُ ۖ
अपने भाई को
قَالَ
उसने कहा
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَنَا۠
मैं ही
أَخُوكَ
तेरा भाई हूँ
فَلَا
पस ना
تَبْتَئِسْ
तू रंज कर
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
और जब उन्होंने यूसुफ़ के यहाँ प्रवेश किया तो उसने अपने भाई को अपने पास जगह दी और कहा, "मैं तेरा भाई हूँ। जो कुछ ये करते रहे हैं, अब तू उसपर दुखी न हो।"
तफ़्सीर:
जब यूसुफ़ के भाई यूसुफ़ के पास आए, और उनके साथ यूसुफ़ का सगा भाई भी था, तो उन्होंने अपने सगे भाई को अपने साथ कर लिया और चुपके से उससे कहा : मैं तुम्हारा सगा भाई : यूसुफ़ हूँ। अतः उन धृष्ट और अविवेकपूर्ण कार्यों से दुःखी न हो, जो तुम्हारे भाई करते आए हैं, जैसे कष्ट देना, हमसे ईर्ष्या करना और मुझे कुएँ में फेंकना।
आयत 70
فَلَمَّا جَهَّزَهُم بِجَهَازِهِمْ جَعَلَ ٱلسِّقَايَةَ فِى رَحْلِ أَخِيهِ ثُمَّ أَذَّنَ مُؤَذِّنٌ أَيَّتُهَا ٱلْعِيرُ إِنَّكُمْ لَسَـٰرِقُونَ
فَلَمَّا
फिर जब
جَهَّزَهُم
उसने तैयार करके दिया उन्हें
بِجَهَازِهِمْ
सामान उनका
جَعَلَ
उसने रख दिया
ٱلسِّقَايَةَ
प्याला
فِى
in
رَحْلِ
सामान में
أَخِيهِ
अपने भाई के
ثُمَّ
फिर
أَذَّنَ
पुकारा
مُؤَذِّنٌ
एक पुकारने वाले ने
أَيَّتُهَا
O you
ٱلْعِيرُ
ऐ क़ाफ़िले वालो
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
لَسَـٰرِقُونَ
अलबत्ता चोर हो
फिर जब उनका सामान तैयार कर दिया तो अपने भाई के सामान में पानी पीने का प्याला रख दिया। फिर एक पुकारनेवाले ने पुकारकर कहा, "ऐ क़ाफ़िलेवालो! निश्चय ही तुम चोर हो।"
तफ़्सीर:
फिर जब यूसुफ़ ने अपने सेवकों को अपने भाइयों के ऊँटों पर ग़ल्ला लादने का आदेश दिया, तो राजा के मापने के बर्तन को जिससे ग़ल्ला लेने वालों को मापकर दिया करते थे, उनके ज्ञान के बिना अपने सगे भाई की बोरी में डाल दिया, ताकि वह उसे अपने पास रख सकें।। फिर जब वे अपने परिवार की ओर वापस लौटने के लिए निकलने पड़े, तो पीछे से एक आवाज़ देने वाले ने आवाज़ दी : ऐ अन्न से लदे हुए ऊँटों वालो! निश्चय तुम चोर हो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
भाइयों के मिस्र आने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि गुज़रे वक्त की तकलीफें याद कर बदला लेने की बजाय हिकमत से मामला संभालना बेहतर है।
आयत 71
قَالُوا۟ وَأَقْبَلُوا۟ عَلَيْهِم مَّاذَا تَفْقِدُونَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
وَأَقْبَلُوا۟
जबकि वो मुतावज्जेह हुए
عَلَيْهِم
उनकी तरफ़
مَّاذَا
क्या चीज़
تَفْقِدُونَ
तुम गुम पाते हो
वे उनकी ओर रुख़ करते हुए बोले, "तुम्हारी क्या चीज़ खो गई है?"
तफ़्सीर:
यूसुफ़ के भाइयों ने पीछे से आवाज़ देने वाले और उसके साथियों की ओर मुतवज्जेह होकर कहा : तुम्हारी क्या चीज़ खो गई है कि हमपर चोरी का आरोप लगा रहे हो?
आयत 72
قَالُوا۟ نَفْقِدُ صُوَاعَ ٱلْمَلِكِ وَلِمَن جَآءَ بِهِۦ حِمْلُ بَعِيرٍۢ وَأَنَا۠ بِهِۦ زَعِيمٌۭ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
نَفْقِدُ
हम गुम पाते हैं
صُوَاعَ
पैमाना
ٱلْمَلِكِ
बादशाह का
وَلِمَن
और उसके लिए जो
جَآءَ
लाए
بِهِۦ
उसे
حِمْلُ
बोझ है
بَعِيرٍۢ
एक ऊँट का
وَأَنَا۠
और मैं
بِهِۦ
उसका
زَعِيمٌۭ
ज़ामिन हूँ
उन्होंने कहा, "शाही पैमाना हमें नहीं मिल रहा है। जो व्यक्ति उसे ला दे उसको एक ऊँट का बोझभर ग़ल्ला इनाम मिलेगा। मैं इसकी ज़िम्मेदारी लेता हूँ।"
तफ़्सीर:
आवाज़ लगाने वाले और उसके साथियों ने यूसुफ़ के भाइयों से कहा : हमसे राजा का मापक खो गया है, जिससे मापकर देते हैं। जो व्यक्ति तलाशी से पहले राजा का मापक ले आएगा, उसे पुरस्कार दिया जाएगा और वह एक ऊँट के बोझभर ग़ल्ला है। और मैं उसके लिए इसकी गारंटी देता हूँ।
आयत 73
قَالُوا۟ تَٱللَّهِ لَقَدْ عَلِمْتُم مَّا جِئْنَا لِنُفْسِدَ فِى ٱلْأَرْضِ وَمَا كُنَّا سَـٰرِقِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
تَٱللَّهِ
क़सम अल्लाह की
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
عَلِمْتُم
जान लिया तुमने
مَّا
नहीं
جِئْنَا
आए थे हम
لِنُفْسِدَ
कि हम फ़साद करें
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَمَا
और नहीं
كُنَّا
हैं हम
سَـٰرِقِينَ
चोरी करने वाले
वे कहने लगे, "अल्लाह की क़सम! तुम लोग जानते ही हो कि हम इस भू-भाग में बिगाड़ पैदा करने नहीं आए है और न हम चोर है।"
तफ़्सीर:
यूसुफ़ के भाइयों ने उनसे कहा : अल्लाह की क़सम! निश्चय तुम हमारी ईमानदारी और बेगुनाही को जान चुके हो, जैसा कि तुमने हमारी स्थितियों से देखा है। यक़ीन मानो हम मिस्र में बिगाड़ पैदा करने के लिए नहीं आए हैं, और हम अपने जीवन में कभी चोर नहीं थे।
आयत 74
قَالُوا۟ فَمَا جَزَٰٓؤُهُۥٓ إِن كُنتُمْ كَـٰذِبِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
فَمَا
तो क्या
جَزَٰٓؤُهُۥٓ
बदला है उसका
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
كَـٰذِبِينَ
झूठे
उन्होंने कहा, "यदि तुम झूठे सिद्ध हुए तो फिर उसका दंड क्या है?"
तफ़्सीर:
आवाज़ देने वाले और उसके साथियों ने कहा : तुम्हारे यहाँ उसकी चोरी करने वाले का क्या दंड है, यदि तुम चोरी से बरी होने के अपने दावे में झूठे निकले?
आयत 75
قَالُوا۟ جَزَٰٓؤُهُۥ مَن وُجِدَ فِى رَحْلِهِۦ فَهُوَ جَزَٰٓؤُهُۥ ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلظَّـٰلِمِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
جَزَٰٓؤُهُۥ
बदला उसका
مَن
वो है जो
وُجِدَ
वो पाया गया
فِى
in
رَحْلِهِۦ
उसके सामान में
فَهُوَ
तो वो ही
جَزَٰٓؤُهُۥ ۚ
बदला है उसका
كَذَٰلِكَ
इस तरह
نَجْزِى
हम बदला देते हैं
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों को
वे बोले, "उसका दंड यह है कि जिसके सामान में वह मिले वही उसका बदला ठहराया जाए। हम अत्याचारियों को ऐसा ही दंड देते है।"
तफ़्सीर:
यूसुफ़ के भाइयों ने उनसे कहा : हमारे यहाँ चोरी का दंड यह है कि जिसके सामान में चोरी का माल मिले, उसकी गरदन उस व्यक्ति के हवाले कर दी जाती है, जिसका माल चोरी हुआ है और वह उसे अपना ग़ुलाम बना लेता है। इस तरह ग़ुलाम बनाने के दंड के साथ हम चोरों को दंडित करते हैं।
आयत 76
فَبَدَأَ بِأَوْعِيَتِهِمْ قَبْلَ وِعَآءِ أَخِيهِ ثُمَّ ٱسْتَخْرَجَهَا مِن وِعَآءِ أَخِيهِ ۚ كَذَٰلِكَ كِدْنَا لِيُوسُفَ ۖ مَا كَانَ لِيَأْخُذَ أَخَاهُ فِى دِينِ ٱلْمَلِكِ إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ ۚ نَرْفَعُ دَرَجَـٰتٍۢ مَّن نَّشَآءُ ۗ وَفَوْقَ كُلِّ ذِى عِلْمٍ عَلِيمٌۭ
فَبَدَأَ
पस उसने शुरू किया
بِأَوْعِيَتِهِمْ
उनके थैलों/ख़ुरजियों से
قَبْلَ
पहले
وِعَآءِ
थैले/ख़ुरजी से
أَخِيهِ
अपने भाई के
ثُمَّ
फिर
ٱسْتَخْرَجَهَا
उसने निकाल लिया उसे
مِن
from
وِعَآءِ
थैले/ख़ुरजी से
أَخِيهِ ۚ
अपने भाई के
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
كِدْنَا
तदबीर की हमने
لِيُوسُفَ ۖ
यूसुफ़ के लिए
مَا
ना
كَانَ
था वो
لِيَأْخُذَ
कि वो पकड़ सके
أَخَاهُ
अपने भाई को
فِى
by
دِينِ
दीन/क़ानून में
ٱلْمَلِكِ
बादशाह के
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
يَشَآءَ
जो चाहे
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह
نَرْفَعُ
हम बुलंद करते हैं
دَرَجَـٰتٍۢ
दरजात
مَّن
जिसके
نَّشَآءُ ۗ
हम चाहते हैं
وَفَوْقَ
और ऊपर
كُلِّ
हर
ذِى
possessor
عِلْمٍ
इल्म वाले के
عَلِيمٌۭ
एक ख़ूब इल्म वाला है
फिर उसके भाई की खुरजी से पहले उनकी ख़ुरजियाँ देखनी शुरू की; फिर उसके भाई की ख़ुरजी से उसे बरामद कर लिया। इस प्रकार हमने यूसुफ़ का उपाय किया। वह शाही क़ानून के अनुसार अपने भाई को प्राप्त नहीं कर सकता था। बल्कि अल्लाह ही की इच्छा लागू है। हम जिसको चाहे उसके दर्जे ऊँचे कर दें। और प्रत्येक ज्ञानवान से ऊपर एक ज्ञानवान मौजूद है
तफ़्सीर:
चुनाँचे वे उनकी बोरियों की तलाशी के लिए उन्हें यूसुफ़ के पास वापस ले आए। यूसुफ़ ने योजना को गुप्त रखने के लिए, अपने सगे भाई की बोरी का निरीक्षण करने से पहले अपने सौतेले भाइयों की बोरियों की तलाशी लेनी शुरू की। फिर अंत में अपने सगे भाई की बोरी की तलाशी ली और उसमें से राजा का मापक निकाला। हमने जिस तरह यूसुफ़ को अपने भाई की बोरी में मापक रखने का उपाय सुझाया, उसी तरह हमने उसके लिए एक और उपाय किया कि उसके भाइयों ने चोर को दास बनाने के अपने देश के दंड संहिता को अपनाया। हालाँकि ऐसा संभव नहीं होता, यदि चोर के लिए राजा के दंड को लागू किया जाता, जो कि पिटाई करना और जुर्माना लगाना था। सिवाय इसके कि अल्लाह कोई और उपाय चाहता, क्योंकि वह उसका सामर्थ्य रखता है। हम अपने बंदों में से जिसके भी चाहते हैं, पद ऊँचे कर देते हैं, जैसे कि हमने यूसुफ़ का पद ऊँचा कर दिया। और हर ज्ञान वाले व्यक्ति के ऊपर, उससे अधिक ज्ञान वाला मौजूद है। और सभी लोगों के ज्ञान के ऊपर अल्लाह का ज्ञान है, जो सब कुछ जानता है।
आयत 77
۞ قَالُوٓا۟ إِن يَسْرِقْ فَقَدْ سَرَقَ أَخٌۭ لَّهُۥ مِن قَبْلُ ۚ فَأَسَرَّهَا يُوسُفُ فِى نَفْسِهِۦ وَلَمْ يُبْدِهَا لَهُمْ ۚ قَالَ أَنتُمْ شَرٌّۭ مَّكَانًۭا ۖ وَٱللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا تَصِفُونَ
۞ قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
إِن
अगर
يَسْرِقْ
इसने चोरी की है
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
سَرَقَ
चोरी की थी
أَخٌۭ
भाई ने
لَّهُۥ
इसके
مِن
before
قَبْلُ ۚ
इससे क़ब्ल
فَأَسَرَّهَا
तो छुपा लिया इस बात को
يُوسُفُ
यूसुफ़ ने
فِى
within
نَفْسِهِۦ
अपने दिल में
وَلَمْ
और नहीं
يُبْدِهَا
उसने ज़ाहिर किया उसे
لَهُمْ ۚ
उनके लिए
قَالَ
कहा
أَنتُمْ
तुम
شَرٌّۭ
बुरे हो
مَّكَانًۭا ۖ
मक़ाम में
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
أَعْلَمُ
ख़ूब जानता है
بِمَا
उसे जो
تَصِفُونَ
तुम बयान कर रहे हो
उन्होंने कहा, "यदि यह चोरी करता है तो चोरी तो इससे पहले इसका एक भाई भी कर चुका है।" किन्तु यूसुफ़ ने इसे अपने जी ही में रखा और उनपर प्रकट नहीं किया। उसने कहा, "मक़ाम की दृष्टि से तुम अत्यन्त बुरे हो। जो कुछ तुम बताते हो, अल्लाह को उसका पूरा ज्ञान है।"
तफ़्सीर:
यूसुफ़ के भाइयों ने कहा : यदि इसने चोरी की है, तो कोई आश्चर्य नहीं है। क्योंकि इसकी इस चोरी से पहले इसके एक सगे भाई ने भी चोरी की थी। उनका अभिप्रेत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम थे। किंतु यूसुफ़ ने उनकी इस बात से अपने आहत होने को गुप्त रखा, और इसे उनके सामने प्रकट नहीं किया। उन्होंने अपने दिल में उनसे कहा : तुम जो ईर्ष्या रखते हो और पहले जो दुर्व्यवहार कर चुके हो, इस स्थान पर स्वयं वही बुराई है। और तुम जो यह मिथ्यारोपण कर रहे हो, अल्लाह उसे सबसे अधिक जानता है।
आयत 78
قَالُوا۟ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْعَزِيزُ إِنَّ لَهُۥٓ أَبًۭا شَيْخًۭا كَبِيرًۭا فَخُذْ أَحَدَنَا مَكَانَهُۥٓ ۖ إِنَّا نَرَىٰكَ مِنَ ٱلْمُحْسِنِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
يَـٰٓأَيُّهَا
O
ٱلْعَزِيزُ
ऐ अज़ीज़
إِنَّ
बेशक
لَهُۥٓ
इसका
أَبًۭا
बाप
شَيْخًۭا
बूढ़ा
كَبِيرًۭا
बड़ी उम्र का है
فَخُذْ
पस तू रख ले
أَحَدَنَا
हम में से किसी एक को
مَكَانَهُۥٓ ۖ
इसकी जगह
إِنَّا
बेशक हम
نَرَىٰكَ
हम देखते हैं तुझे
مِنَ
of
ٱلْمُحْسِنِينَ
मोहसिनीन में से
उन्होंने कहा, "ऐ अज़ीज़! इसका बाप बहुत ही बूढ़ा है। इसलिए इसके स्थान पर हममें से किसी को रख लीजिए। हमारी स्पष्ट में तो आप बड़े ही सुकर्मी है।"
तफ़्सीर:
यूसुफ़ के भाइयों ने यूसुफ़ से कहा : ऐ अज़ीज़! इसका एक बहुत बूढ़ा बाप है, जो इससे बहुत प्रेम करता है। इसलिए हममें से किसी को इसके स्थान पर रख लीजिए। हम देखते हैं कि आप हमारे मामले तथा हमारे सिवा अन्य लोगों के मामले में उपकार करने वाले हैं। इसलिए हमपर यह उपकार कर दीजिए।
आयत 79
قَالَ مَعَاذَ ٱللَّهِ أَن نَّأْخُذَ إِلَّا مَن وَجَدْنَا مَتَـٰعَنَا عِندَهُۥٓ إِنَّآ إِذًۭا لَّظَـٰلِمُونَ
قَالَ
उसने कहा
مَعَاذَ
पनाह
ٱللَّهِ
अल्लाह की
أَن
कि
نَّأْخُذَ
हम पकड़ें
إِلَّا
मगर
مَن
उसको
وَجَدْنَا
पाया हमने
مَتَـٰعَنَا
सामान अपना
عِندَهُۥٓ
पास जिसके
إِنَّآ
बेशक हम
إِذًۭا
तब
لَّظَـٰلِمُونَ
अलबत्ता ज़ालिम होंगे
उसने कहा, "इस बात से अल्लाह पनाह में रखे कि जिसके पास हमने अपना माल पाया है, उसे छोड़कर हम किसी दूसरे को रखें। फिर तो हम अत्याचारी ठहगेंगे।"
तफ़्सीर:
यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने कहा : इस बात से अल्लाह की शरण चाहते हैं कि हम एक अत्याचारी के अपराध के कारण एक निर्दोष पर अत्याचार करें और उसके अलावा किसी अन्य व्यक्ति को पकड़ ले, जिसकी बोरी में हमने राजा का मापक पाया है! यदि हमने ऐसा किया तो निश्चय हम अत्याचारी ठहरेंगे। क्योंकि हमने एक निर्दोष को दंडित किया और अपराधी को छोड़ दिया।
आयत 80
فَلَمَّا ٱسْتَيْـَٔسُوا۟ مِنْهُ خَلَصُوا۟ نَجِيًّۭا ۖ قَالَ كَبِيرُهُمْ أَلَمْ تَعْلَمُوٓا۟ أَنَّ أَبَاكُمْ قَدْ أَخَذَ عَلَيْكُم مَّوْثِقًۭا مِّنَ ٱللَّهِ وَمِن قَبْلُ مَا فَرَّطتُمْ فِى يُوسُفَ ۖ فَلَنْ أَبْرَحَ ٱلْأَرْضَ حَتَّىٰ يَأْذَنَ لِىٓ أَبِىٓ أَوْ يَحْكُمَ ٱللَّهُ لِى ۖ وَهُوَ خَيْرُ ٱلْحَـٰكِمِينَ
فَلَمَّا
फिर जब
ٱسْتَيْـَٔسُوا۟
वो मायूस हो गए
مِنْهُ
उस से
خَلَصُوا۟
वो अलग हुए
نَجِيًّۭا ۖ
सरगोशी के लिए
قَالَ
कहा
كَبِيرُهُمْ
उनके बड़े ने
أَلَمْ
क्या नहीं
تَعْلَمُوٓا۟
तुम जानते
أَنَّ
कि बेशक
أَبَاكُمْ
तुम्हारे वालिद ने
قَدْ
तहक़ीक़
أَخَذَ
लिया था
عَلَيْكُم
तुम से
مَّوْثِقًۭا
पुख़्ता वादा
مِّنَ
by
ٱللَّهِ
अल्लाह (के नाम) से
وَمِن
and before
قَبْلُ
और इससे पहले
مَا
जो
فَرَّطتُمْ
कोताही कर चुके तुम
فِى
concerning
يُوسُفَ ۖ
यूसुफ़ के मामले में
فَلَنْ
तो हरगिज़ ना
أَبْرَحَ
मैं टलूँगा
ٱلْأَرْضَ
(इस) ज़मीन से
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَأْذَنَ
इजाज़त दे
لِىٓ
मुझे
أَبِىٓ
मेरा वालिद
أَوْ
या
يَحْكُمَ
फ़ैसला कर दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِى ۖ
मेरे लिए
وَهُوَ
और वो
خَيْرُ
बेहतर है
ٱلْحَـٰكِمِينَ
सब फ़ैसला करने वालों से
तो जब से वे उससे निराश हो गए तो परामर्श करने के लिए अलग जा बैठे। उनमें जो बड़ा था, वह कहने लगा, "क्या तुम जानते नहीं कि तुम्हारा बाप अल्लाह के नाम पर तुमसे वचन ले चुका है और उसको जो इससे पहले यूसुफ़ के मामले में तुमसे क़सूर हो चुका है? मैं तो इस भू-भाग से कदापि टलने का नहीं जब तक कि मेरे बाप मुझे अनुमति न दें या अल्लाह ही मेरे हक़ में कोई फ़ैसला कर दे। और वही सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है
तफ़्सीर:
जब वे यूसुफ़ के उनके अनुरोध को स्वीकार करने से निराश हो गए, तो परामर्श करने के लिए लोगों से अलग हो गए। उनके बड़े भाई ने कहा : मैं तुम्हें याद दिलाता हूँ कि तुम्हारे पिता ने तुमसे अल्लाह का दृढ़ वचन लिया है कि तुम उनके बेटे को वापस ले आओगे, सिवाय इसके कि तुम्हें कोई ऐसी विपत्ति घेर ले, जिसे रोकने में तुम असमर्थ हो। तथा इससे पहले तुमने यूसुफ़ के बारे में कोताही की और उसके बारे में अपने पिता की प्रतिज्ञा पूरी नहीं की। इसलिए मैं मिस्र की धरती तब तक नहीं छोड़ूँगा, जब तक कि मेरे पिता मुझे अपने पास लौटने की अनुमति न प्रदान कर दें, या अल्लाह मेरे लिए मेरे भाई को लेने का फैसला न कर दे। और अल्लाह सब फैसला करने वालों से बेहतर है। क्योंकि वह सत्य और न्याय के अनुसार फैसला करता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
बिन्यामीन के रुकने और भाइयों की बेचैनी का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि सब्र और तदबीर के साथ मामलों को सुलझाना जल्दबाज़ी से बेहतर नतीजे देता है।
आयत 81
ٱرْجِعُوٓا۟ إِلَىٰٓ أَبِيكُمْ فَقُولُوا۟ يَـٰٓأَبَانَآ إِنَّ ٱبْنَكَ سَرَقَ وَمَا شَهِدْنَآ إِلَّا بِمَا عَلِمْنَا وَمَا كُنَّا لِلْغَيْبِ حَـٰفِظِينَ
ٱرْجِعُوٓا۟
लौट जाओ
إِلَىٰٓ
to
أَبِيكُمْ
तरफ़ अपने वालिद के
فَقُولُوا۟
फिर कहो
يَـٰٓأَبَانَآ
ऐ हमारे अब्बा जान
إِنَّ
बेशक
ٱبْنَكَ
आपके बेटे ने
سَرَقَ
चोरी की थी
وَمَا
और नहीं
شَهِدْنَآ
गवाही दी हमने
إِلَّا
मगर
بِمَا
वो जिस का
عَلِمْنَا
इल्म था हमें
وَمَا
और नहीं
كُنَّا
थे हम
لِلْغَيْبِ
ग़ैब की
حَـٰفِظِينَ
हिफ़ाज़त करने वाले
तुम अपने बाप के पास लौटकर जाओ और कहो, "ऐ हमारे बाप! आपके बेटे ने चोरी की है। हमने तो वही कहा जो हमें मालूम हो सका, परोक्ष तो हमारी दृष्टि में था नहीं
तफ़्सीर:
और बड़े भाई ने कहा : अपने पिता के पास वापस जाओ और उनसे कहो : आपके बेटे ने चोरी की है। इसलिए अज़ीज़ -ए- मिस्र ने चोरी की सज़ा के तौर पर उसे दास बना लिया है। हम तो वही कह रहे हैं, जो हमने जाना है। क्योंकि हमने देखा है कि पैमाना उसी की बोरी से निकाला गया था। हमें क्या पता था कि वह चोरी करेगा। यदि पता होता, तो हम आपको उसे वापस लाने का वचन नहीं देते।
आयत 82
وَسْـَٔلِ ٱلْقَرْيَةَ ٱلَّتِى كُنَّا فِيهَا وَٱلْعِيرَ ٱلَّتِىٓ أَقْبَلْنَا فِيهَا ۖ وَإِنَّا لَصَـٰدِقُونَ
وَسْـَٔلِ
और पूछ लें
ٱلْقَرْيَةَ
बस्ती वालों से
ٱلَّتِى
वो जो
كُنَّا
थे हम
فِيهَا
जिस में
وَٱلْعِيرَ
और क़ाफ़िले वालों से
ٱلَّتِىٓ
वो जो
أَقْبَلْنَا
आए हैं हम
فِيهَا ۖ
जिस में
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَصَـٰدِقُونَ
अलबत्ता सच्चे हैं
आप उस बस्ती से पूछ लीजिए जहाँ हम थे और उस क़ाफ़िलें से भी जिसके साथ होकर हम आए। निस्संदेह हम बिलकुल सच्चे है।"
तफ़्सीर:
और हमारी सत्यता को सत्यापित करने के लिए (ऐ हमारे पिता!) मिस्र वासियों से पूझ लें, जहाँ हम थे और उस क़ाफ़िले वालों से पूछ लें, जिसके साथ हम आए हैं। वे सब आपको वही बताएँगे, जो हमने बताया है। निःसंदेह हमने आपको उसके चोरी करने की जो बात बताई है, उसमें हम बिलकुल सच्चे हैं।
आयत 83
قَالَ بَلْ سَوَّلَتْ لَكُمْ أَنفُسُكُمْ أَمْرًۭا ۖ فَصَبْرٌۭ جَمِيلٌ ۖ عَسَى ٱللَّهُ أَن يَأْتِيَنِى بِهِمْ جَمِيعًا ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْعَلِيمُ ٱلْحَكِيمُ
قَالَ
कहा
بَلْ
बल्कि
سَوَّلَتْ
अच्छा कर दिखाया
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
أَنفُسُكُمْ
तुम्हारे नफ़्सों ने
أَمْرًۭا ۖ
एक काम को
فَصَبْرٌۭ
तो सब्र ही
جَمِيلٌ ۖ
अच्छा है
عَسَى
उम्मीद है
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَن
कि
يَأْتِيَنِى
वो ले आएगा मेरे पास
بِهِمْ
उन को
جَمِيعًا ۚ
सबके सबको
إِنَّهُۥ
क्योंकि वो
هُوَ
वो ही है
ٱلْعَلِيمُ
बहुत इल्म वाला
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिकमत वाला
उसने कहा, "नहीं, बल्कि तुम्हारे जी ही ने तुम्हे पट्टी पढ़ाकर एक बात बना दी है। अब धैर्य से काम लेना ही उत्तम है! बहुत सम्भव है कि अल्लाह उन सबको मेरे पास ले आए। वह तो सर्वज्ञ, अत्यन्त तत्वदर्शी है।"
तफ़्सीर:
उनके पिता ने उनसे कहा : तुमने उसके चोरी करने की जो बात बताई है, वास्तव में मामला वैसा नहीं है। बल्कि तुम्हारे दिलों ने तुम्हारे लिए इस बात को शोभित कर दिया है कि तुम उसके विरुद्ध भी उसी तरह चाल चलो, जिस तरह इससे पहले उसके भाई यूसुफ़ के विरुद्ध चाल चल चुके हो। इसलिए मेरा काम उत्तम सब्र करना है, जिसमें केवल अल्लाह ही से शिकायत है। उम्मीद है कि अल्लाह यूसुफ़, उसके सगे भाई और उनके बड़े भाई, सब को मेरे पास वापस ले आए। निःसंदेह वही पवित्र अल्लाह मेरे हाल से अवगत है और मेरे मामले के प्रबंधन में हिकमत वाला है।
आयत 84
وَتَوَلَّىٰ عَنْهُمْ وَقَالَ يَـٰٓأَسَفَىٰ عَلَىٰ يُوسُفَ وَٱبْيَضَّتْ عَيْنَاهُ مِنَ ٱلْحُزْنِ فَهُوَ كَظِيمٌۭ
وَتَوَلَّىٰ
और उसने मुँह फेर लिया
عَنْهُمْ
उनसे
وَقَالَ
और बोला
يَـٰٓأَسَفَىٰ
हाय अफ़सोस
عَلَىٰ
over
يُوسُفَ
यूसुफ़ पर
وَٱبْيَضَّتْ
और सफ़ेद हो गईं
عَيْنَاهُ
दोनों आँखें उसकी
مِنَ
from
ٱلْحُزْنِ
ग़म की वजह से
فَهُوَ
पस वो
كَظِيمٌۭ
ग़म से भरा हुआ था
उसने उनकी ओर से मुख फेर लिया और कहने लगा, "हाय अफ़सोस, यूसुफ़ की जुदाई पर!" और ग़म के मारे उसकी आँखें सफ़ेद पड़ गई और वह घुटा जा रहा था
तफ़्सीर:
वह उनसे मुँह फेरते हुए दूर हट गए और कहा : हाय मेरे दुःख की तीव्रता यूसुफ़ की जुदाई पर! और यूसुफ़ की जुदाई पर रोते-रोते उनकी आँखों के काले भाग सफ़ेद हो चुके थे। चुनाँचे उनका दिल शोक तथा दुःख से भरा हुआ था, वह अपने दुःख को लोगों से छिपाते थे।
आयत 85
قَالُوا۟ تَٱللَّهِ تَفْتَؤُا۟ تَذْكُرُ يُوسُفَ حَتَّىٰ تَكُونَ حَرَضًا أَوْ تَكُونَ مِنَ ٱلْهَـٰلِكِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
تَٱللَّهِ
क़सम अल्लाह की
تَفْتَؤُا۟
आप हमेशा रहते हैं
تَذْكُرُ
आप याद करते
يُوسُفَ
यूसुफ़ को
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
تَكُونَ
आप हो जाऐं
حَرَضًا
बीमार
أَوْ
या
تَكُونَ
आप हो जाऐं
مِنَ
of
ٱلْهَـٰلِكِينَ
हलाक होने वालों में से
उन्होंने कहा, "अल्लाह की क़सम! आप तो यूसुफ़ ही की याद में लगे रहेंगे, यहाँ तक कि घुलकर रहेंगे या प्राण ही त्याग देंगे।"
तफ़्सीर:
यूसुफ़ के भाइयों ने अपने पिता से कहा : अल्लाह की क़सम! (ऐ हमारे पिता!) आप हमेशा यूसुफ़ को याद करते रहेंगे और उसके लिए शोक मनाते रहेंगे, यहाँ तक कि आप सख़्त बीमार हो जाएँ, या प्राण ही त्याग दें।
आयत 86
قَالَ إِنَّمَآ أَشْكُوا۟ بَثِّى وَحُزْنِىٓ إِلَى ٱللَّهِ وَأَعْلَمُ مِنَ ٱللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
قَالَ
उसने कहा
إِنَّمَآ
बेशक
أَشْكُوا۟
मैं शिकायत करता हूँ
بَثِّى
अपनी बेक़रारी की
وَحُزْنِىٓ
और अपने ग़म की
إِلَى
to
ٱللَّهِ
तरफ़ अल्लाह के
وَأَعْلَمُ
और मैं जानता हूँ
مِنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
مَا
जो
لَا
not
تَعْلَمُونَ
नहीं तुम जानते
उसने कहा, "मैं तो अपनी परेशानी और अपने ग़म की शिकायत अल्लाह ही से करता हूँ और अल्लाह की ओर से जो मैं जानता हूँ, तुम नही जानते
तफ़्सीर:
उनके पिता ने उनसे कहा : मैं जिस शोक और दुःख से पीड़ित हूँ उसकी शिकायत केवल अल्लाह से करता हूँ। और मैं अल्लाह की दया, उसके उपकार, परेशान हाल की दुआ क़बूल करने और पीड़ित को बदला देने के बारे में जो जानता हूँ, वह तुम नहीं जानते।
आयत 87
يَـٰبَنِىَّ ٱذْهَبُوا۟ فَتَحَسَّسُوا۟ مِن يُوسُفَ وَأَخِيهِ وَلَا تَا۟يْـَٔسُوا۟ مِن رَّوْحِ ٱللَّهِ ۖ إِنَّهُۥ لَا يَا۟يْـَٔسُ مِن رَّوْحِ ٱللَّهِ إِلَّا ٱلْقَوْمُ ٱلْكَـٰفِرُونَ
يَـٰبَنِىَّ
ऐ मेरे बेटो
ٱذْهَبُوا۟
जाओ
فَتَحَسَّسُوا۟
पस सुराग़ लगाओ
مِن
about
يُوسُفَ
यूसुफ़ का
وَأَخِيهِ
और उसके भाई का
وَلَا
और ना
تَا۟يْـَٔسُوا۟
तुम मायूस हो
مِن
of
رَّوْحِ
रहमत से
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह की
إِنَّهُۥ
क्योंकि वो
لَا
none
يَا۟يْـَٔسُ
नहीं मायूस होते
مِن
of
رَّوْحِ
रहमत से
ٱللَّهِ
अल्लाह की
إِلَّا
मगर
ٱلْقَوْمُ
वो लोग
ٱلْكَـٰفِرُونَ
जो काफ़िर हैं
ऐ मेरे बेटों! जाओ और यूसुफ़ और उसके भाई की टोह लगाओ और अल्लाह की सदयता से निराश न हो। अल्लाह की सदयता से तो केवल कुफ़्र करनेवाले ही निराश होते है।"
तफ़्सीर:
उनके पिता ने उनसे कहा : ऐ मेरे बेटो! जाओ और यूसुफ़ तथा उसके भाई की खबर के बारे में पता करो। और अल्लाह के अपने बंदों की परेशानी को दूर करने और राहत देने से निराश न हो। वास्तव में, केवल काफ़िर लोग ही अल्लाह के परेशानी को दूर करने और राहत देने से निराश होते हैं। क्योंकि वे अल्लाह की महान शक्ति और उसके अपने बंदों पर गुप्त अनुग्रह से अनभिज्ञ होते हैं।
आयत 88
فَلَمَّا دَخَلُوا۟ عَلَيْهِ قَالُوا۟ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْعَزِيزُ مَسَّنَا وَأَهْلَنَا ٱلضُّرُّ وَجِئْنَا بِبِضَـٰعَةٍۢ مُّزْجَىٰةٍۢ فَأَوْفِ لَنَا ٱلْكَيْلَ وَتَصَدَّقْ عَلَيْنَآ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ يَجْزِى ٱلْمُتَصَدِّقِينَ
فَلَمَّا
फिर जब
دَخَلُوا۟
वो दाख़िल हुए
عَلَيْهِ
उस पर
قَالُوا۟
वो कहने लगे
يَـٰٓأَيُّهَا
O Aziz
ٱلْعَزِيزُ
ऐ अज़ीज़
مَسَّنَا
पहुँची हमें
وَأَهْلَنَا
और हमारे घर वालों को
ٱلضُّرُّ
तकलीफ़
وَجِئْنَا
और लाए हैं हम
بِبِضَـٰعَةٍۢ
पूँजी/सरमाया
مُّزْجَىٰةٍۢ
हक़ीर
فَأَوْفِ
पस पूरा-पूरा दे दीजिए
لَنَا
हमें
ٱلْكَيْلَ
पैमाना/ग़ल्ला
وَتَصَدَّقْ
और सदक़ा कीजिए
عَلَيْنَآ ۖ
हम पर
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَجْزِى
वो बदला देता है
ٱلْمُتَصَدِّقِينَ
सदक़ा करने वालों को
फिर जब वे उसके पास उपस्थित हुए तो कहा, "ऐ अज़ीज़! हमें और हमारे घरवालों को बहुत तकलीफ़ पहुँची हैं और हम कुछ तुच्छ-सी पूँजी लेकर आए है, किन्तु आप हमें पूरी-पूरी माप प्रदान करें। और हमें दान दें। निश्चय ही दान करनेवालों को बदला अल्लाह देता है।"
तफ़्सीर:
उन्होंने अपने पिता के आदेश का पालन किया और यूसुफ़ तथा उनके भाई को ढूँढने के लिए निकल पड़े। चुनांचे जब यूसुफ़ के पास पहुँचे तो कहा : हम कठिनाई और गरीबी से पीड़ित हैं और थोड़ा-सा तुच्छ धन लेकर आए हैं। अतः हमें भरपूर माप दीजिए, जैसे इससे पहले हमें देते आए हैं। और उससे कुछ बढ़ाकर या हमारे तुच्छ धन को नज़र अंदाज़ करके, हमें दान दीजिए। निःसंदेह अल्लाह दान करने वालों को उत्तम बदला प्रदान करता है।
आयत 89
قَالَ هَلْ عَلِمْتُم مَّا فَعَلْتُم بِيُوسُفَ وَأَخِيهِ إِذْ أَنتُمْ جَـٰهِلُونَ
قَالَ
उसने कहा
هَلْ
क्या
عَلِمْتُم
जानते हो तुम
مَّا
जो
فَعَلْتُم
किया था तुमने
بِيُوسُفَ
साथ यूसुफ़ के
وَأَخِيهِ
और उसके भाई के
إِذْ
जब
أَنتُمْ
तुम
جَـٰهِلُونَ
नादान थे
उसने कहा, "क्या तुम्हें यह भी मालूम है कि जब तुम आवेग के वशीभूत थे तो यूसुफ़ और उसके भाई के साथ तुमने क्या किया था?"
तफ़्सीर:
यूसुफ़ ने जब उनकी बात सुनी तो उनपर दया आ गई और दिल पसीज गया और उनसे अपनी पहचान करा दी। उनसे फरमाया : तुम जानते हो कि तुमने यूसुफ़ और उसके सगे भाई के साथ क्या किया था, जब तुम उसके परिणाम से अनभिज्ञ थे जो तुमने उन दोनों के साथ किया था?!
आयत 90
قَالُوٓا۟ أَءِنَّكَ لَأَنتَ يُوسُفُ ۖ قَالَ أَنَا۠ يُوسُفُ وَهَـٰذَآ أَخِى ۖ قَدْ مَنَّ ٱللَّهُ عَلَيْنَآ ۖ إِنَّهُۥ مَن يَتَّقِ وَيَصْبِرْ فَإِنَّ ٱللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجْرَ ٱلْمُحْسِنِينَ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَءِنَّكَ
क्या बेशक तू
لَأَنتَ
अलबत्ता तू है
يُوسُفُ ۖ
यूसुफ़
قَالَ
उसने कहा
أَنَا۠
मैं हूँ
يُوسُفُ
यूसुफ़
وَهَـٰذَآ
और ये है
أَخِى ۖ
मेरा भाई
قَدْ
तहक़ीक़
مَنَّ
एहसान किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَيْنَآ ۖ
हम पर
إِنَّهُۥ
बेशक वो
مَن
जो
يَتَّقِ
तक़वा करे
وَيَصْبِرْ
और वो सब्र करे
فَإِنَّ
तो यक़ीनन
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يُضِيعُ
नहीं वो ज़ाया करता
أَجْرَ
अजर
ٱلْمُحْسِنِينَ
मोहसिनीन का
वे बोल पड़े, "क्या यूसुफ़ आप ही है?" उसने कहा, "मैं ही यूसुफ़ हूँ और यह मेरा भाई है। अल्लाह ने हमपर उपकार किया है। सच तो यह है कि जो कोई डर रखे और धैर्य से काम ले तो अल्लाह भी उत्तमकारों का बदला अकारथ नहीं करता।"
तफ़्सीर:
वे आश्चर्यचकित हो गए और बोले : क्या निश्चय आप ही यूसुफ़ हैं?! तो यूसुफ़ ने उनसे कहा : हाँ, मैं यूसुफ़ हूँ और यह, जिसे तुम मेरे साथ देख रहे हो, मेरा सगा भाई है। अल्लाह ने हमपर अनुग्रह किया है कि हमें उस चीज़ से मुक्ति दिलाई है, जिसमें हम थे और हमारे पद को ऊँचा कर दिया। निःसंदेह जो अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, उससे डरता है और विपत्ति पर धैर्य रखता है, तो उसका यह कार्य सदाचार में से है, और अल्लाह सदाचारियों का बदला नष्ट नहीं करता, बल्कि वह उनके लिए उसे सुरक्षित रखता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
याक़ूब अलैहिस्सलाम के सब्र और यूसुफ अलैहिस्सलाम की पहचान का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि मुसीबत में भी अल्लाह से मायूस नहीं होना चाहिए, उम्मीद बनाए रखनी चाहिए।
आयत 91
قَالُوا۟ تَٱللَّهِ لَقَدْ ءَاثَرَكَ ٱللَّهُ عَلَيْنَا وَإِن كُنَّا لَخَـٰطِـِٔينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
تَٱللَّهِ
क़सम अल्लाह की
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
ءَاثَرَكَ
तरजीह दी तुझे
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَيْنَا
हम पर
وَإِن
और बेशक
كُنَّا
थे हम
لَخَـٰطِـِٔينَ
यक़ीनन ख़ताकार
उन्होंने कहा, "अल्लाह की क़सम! आपको अल्लाह ने हमारे मुक़ाबले में पसन्द किया और निश्चय ही चूक तो हमसे हुई।"
तफ़्सीर:
उनके भाइयों ने उनके साथ जो कुछ किया था उसके लिए क्षमायाचना करते हुए कहा : अल्लाह की क़सम! अल्लाह ने आपको पूर्णता के गुण प्रदान करके हमपर श्रेष्ठता प्रदान किया है। और हमने आपके साथ जो कुछ किया था, उसमें हम दोषी और अत्याचारी थे।
आयत 92
قَالَ لَا تَثْرِيبَ عَلَيْكُمُ ٱلْيَوْمَ ۖ يَغْفِرُ ٱللَّهُ لَكُمْ ۖ وَهُوَ أَرْحَمُ ٱلرَّٰحِمِينَ
قَالَ
उसने कहा
لَا
No
تَثْرِيبَ
नहीं कोई मलामत
عَلَيْكُمُ
तुम पर
ٱلْيَوْمَ ۖ
आज के दिन
يَغْفِرُ
माफ़ कर दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَكُمْ ۖ
तुम्हें
وَهُوَ
और वो
أَرْحَمُ
सब से ज़्यादा रहम करने वाला है
ٱلرَّٰحِمِينَ
सब रहम करने वालों से
उसने कहा, "आज तुमपर कोई आरोप नहीं। अल्लाह तुम्हें क्षमा करे। वह सबसे बढ़कर दयावान है।
तफ़्सीर:
यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने उनकी क्षमायाचना को स्वीकार कर लिया और कहा : आज तुमपर कोई दोष नहीं है जिसके लिए तुम्हें दंडित करने या फटकार लगाने की आवश्यकता हो। मैं अल्लाह से प्रार्थना करता हूँ कि वह तुम्हें क्षमा करे। वह पवित्र अल्लाह दया करने वालों में सबसे अधिक दया करने वाला है।
आयत 93
ٱذْهَبُوا۟ بِقَمِيصِى هَـٰذَا فَأَلْقُوهُ عَلَىٰ وَجْهِ أَبِى يَأْتِ بَصِيرًۭا وَأْتُونِى بِأَهْلِكُمْ أَجْمَعِينَ
ٱذْهَبُوا۟
ले जाओ
بِقَمِيصِى
क़मीज़ मेरी
هَـٰذَا
ये
فَأَلْقُوهُ
फिर डाल दो इसे
عَلَىٰ
over
وَجْهِ
चेहरे पर
أَبِى
मेरे वालिद के
يَأْتِ
वो हो जाएगा
بَصِيرًۭا
देखने वाला
وَأْتُونِى
और ले आओ मेरे पास
بِأَهْلِكُمْ
अपने घर वालों को
أَجْمَعِينَ
सबके सबको
मेरा यह कुर्ता ले जाओ और इसे मेरे बाप के मुख पर डाल दो। उनकी नेत्र-ज्योति लौट आएगी, फिर अपने सब घरवालों को मेरे यहाँ ले आओ।"
तफ़्सीर:
चुनाँचे जब यूसुफ़ के भाइयों ने उन्हें बताया कि उनके पिता की आँखों की रोशनी चली गई है, तो उन्हें अपना कुर्ता दे दिया और कहा : मेरे इस कुर्ते को ले जाओ और इसे मेरे पिता के चेहरे पर डाल दो, उनकी आँखों की रोशनी लौट आएगी। फिर अपने तमाम घर वालों को मेरे पास ले आओ।
आयत 94
وَلَمَّا فَصَلَتِ ٱلْعِيرُ قَالَ أَبُوهُمْ إِنِّى لَأَجِدُ رِيحَ يُوسُفَ ۖ لَوْلَآ أَن تُفَنِّدُونِ
وَلَمَّا
और जब
فَصَلَتِ
जुदा हुआ
ٱلْعِيرُ
क़फ़िला
قَالَ
कहा
أَبُوهُمْ
उनके वालिद ने
إِنِّى
बेशक मैं
لَأَجِدُ
अलबत्ता मैं पाता हूँ
رِيحَ
ख़ुशबू/हवा
يُوسُفَ ۖ
यूसुफ़ की
لَوْلَآ
अगर ना
أَن
ये कि
تُفَنِّدُونِ
तुम बहका हुआ कहो मुझे
इधर जब क़ाफ़िला चला तो उनके बाप ने कहा, "यदि तुम मुझे बहकी बातें करनेवाला न समझो तो मुझे तो यूसुफ़ की महक आ रही है।"
तफ़्सीर:
और जब क़ाफ़िला मिस्र से चल पड़ा और उसकी आबादियों से निकल गया, तो याक़ूब अलैहिस्सलाम ने अपने बेटों और अपने पास मौजूद लोगों से कहा : निश्चय मुझे यूसुफ़ की सुगंध आ रही है, यदि तुम मुझे नासमझ न समझो और यह न कहने लगो कि यह बहका हुआ बूढ़ा है। ऐसी बात करता है, जो खुद नहीं जानता।
आयत 95
قَالُوا۟ تَٱللَّهِ إِنَّكَ لَفِى ضَلَـٰلِكَ ٱلْقَدِيمِ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
تَٱللَّهِ
क़सम अल्लाह की
إِنَّكَ
बेशक आप
لَفِى
surely (are) in
ضَلَـٰلِكَ
अलबत्ता ग़लती में हैं अपनी
ٱلْقَدِيمِ
पुरानी
वे बोले, "अल्लाह की क़सम! आप तो अभी तक अपनी उसी पुरानी भ्रांति में पड़े हुए है।"
तफ़्सीर:
उनके पास मौजूद उनके बेटों ने कहा : अल्लाह की क़सम! आप अभी भी अपने निकट यूसुफ़ की स्थिति और उन्हें फिर से देखने की संभावना के बारे में अपने पिछले भ्रम में हैं।
आयत 96
فَلَمَّآ أَن جَآءَ ٱلْبَشِيرُ أَلْقَىٰهُ عَلَىٰ وَجْهِهِۦ فَٱرْتَدَّ بَصِيرًۭا ۖ قَالَ أَلَمْ أَقُل لَّكُمْ إِنِّىٓ أَعْلَمُ مِنَ ٱللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
فَلَمَّآ
फिर जब
أَن
ये कि
جَآءَ
आ गया
ٱلْبَشِيرُ
ख़ुशख़बरी देने वाला
أَلْقَىٰهُ
उसने डाला उसे
عَلَىٰ
ऊपर
وَجْهِهِۦ
उसके चेहरे के
فَٱرْتَدَّ
तो हो गया वो
بَصِيرًۭا ۖ
देखने वाला
قَالَ
उसने कहा
أَلَمْ
क्या नहीं
أَقُل
मैंने कहा था
لَّكُمْ
तुम्हें
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَعْلَمُ
मैं जानता हूँ
مِنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
مَا
जो
لَا
not
تَعْلَمُونَ
नहीं तुम जानते
फिर जब शुभ सूचना देनेवाला आया तो उसने उस (कुर्ते) को उसके मुँह पर डाल दिया और तत्क्षण उसकी नेत्र-ज्योति लौट आई। उसने कहा, "क्या मैंने तुमसे कहा नहीं था कि अल्लाह की ओर से जो मैं जानता हूँ, तुम नहीं जानते।"
तफ़्सीर:
फिर जब याक़ूब के लिए ख़ुशियों भरी ख़बर लाने वाला व्यक्ति आया, उसने यूसुफ़ का कुर्ता उनके चेहरे पर डाल दिया, तो वह देखने लगे। तब उन्होंने अपने बेटों से कहा : क्या मैंने तुमसे कहा नहीं था कि मुझे अल्लाह की दया और उपकार की जो बातें मालूम हैं, तुम उन्हें नहीं जानते?
आयत 97
قَالُوا۟ يَـٰٓأَبَانَا ٱسْتَغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَآ إِنَّا كُنَّا خَـٰطِـِٔينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
يَـٰٓأَبَانَا
ऐ हमारे अब्बा जान
ٱسْتَغْفِرْ
बख़्शिश माँगिए
لَنَا
हमारे लिए
ذُنُوبَنَآ
हमारे गुनाहों की
إِنَّا
बेशक हम
كُنَّا
थे हम ही
خَـٰطِـِٔينَ
ख़ताकार
वे बोले, "ऐ मेरे बाप! आप हमारे गुनाहों की क्षमा के लिए प्रार्थना करें। वास्तव में चूक हमसे ही हुई।"
तफ़्सीर:
याक़ूब अलैहिस्सलाम के बेटों ने यूसुफ़ और उनके भाई के साथ जो कुछ किया था उसके लिए अपने बाप से माफ़ी माँगते हुए कहा : ऐ हमारे पिता! अल्लाह से हमारे पिछले पापों के लिए क्षमा माँगे। निश्चित रूप से हमने यूसुफ़ और उनके सगे भई के साथ जो कुछ किया था, उसमें हम गुनहगार और दोषी थे।
आयत 98
قَالَ سَوْفَ أَسْتَغْفِرُ لَكُمْ رَبِّىٓ ۖ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْغَفُورُ ٱلرَّحِيمُ
قَالَ
कहा
سَوْفَ
ज़रूर
أَسْتَغْفِرُ
मैं बख़्शिश मागूँगा
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
رَبِّىٓ ۖ
अपने रब से
إِنَّهُۥ
बेशक वो
هُوَ
वो ही है
ٱلْغَفُورُ
बहुत बख़्शने वाला
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला
उसने कहा, "मैं अपने रब से तुम्हारे लिए प्रार्थना करूँगा। वह बहुत क्षमाशील, दयावान है।"
तफ़्सीर:
उनके पिता ने उनसे कहा : मैं अपने पालनहार से तुम्हारे लिए क्षमा माँगूँगा। निःसंदेह वही अपने तौबा करने वाले बंदों के पापों को माफ़ करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 99
فَلَمَّا دَخَلُوا۟ عَلَىٰ يُوسُفَ ءَاوَىٰٓ إِلَيْهِ أَبَوَيْهِ وَقَالَ ٱدْخُلُوا۟ مِصْرَ إِن شَآءَ ٱللَّهُ ءَامِنِينَ
فَلَمَّا
फिर जब
دَخَلُوا۟
वो दाख़िल हुए
عَلَىٰ
ऊपर
يُوسُفَ
यूसुफ़ के
ءَاوَىٰٓ
उसने ठिकाना दिया
إِلَيْهِ
अपनी तरफ़
أَبَوَيْهِ
अपने वालिदैन को
وَقَالَ
और कहा
ٱدْخُلُوا۟
दाख़िल हो जाओ
مِصْرَ
मिस्र में
إِن
अगर
شَآءَ
चाहा
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ءَامِنِينَ
अमन वाले होकर
फिर जब वे यूसुफ़ के पास पहुँचे तो उसने अपने माँ-बाप को ख़ास अपने पास जगह दी औऱ कहा, "तुम सब नगर में प्रवेश करो। अल्लाह ने चाहा तो यह प्रवेश निश्चिन्तता के साथ होगा।"
तफ़्सीर:
याक़ूब अलैहिस्सलाम और उनका परिवार मिस्र में यूसुफ़ के पास जाने के लिए निकल पड़ा। जब वे यूसुफ़ के पास पहुँचे, तो यूसुफ़ ने अपने माता-पिता को अपने से क़रीब कर लिया और अपने भाइयों तथा उनके परिजनों से कहा : अल्लाह की इच्छा से सुरक्षित व निश्चिंत मिस्र में प्रवेश करो, तुम्हें यहाँ कोई कष्ट नहीं होगा।
आयत 100
وَرَفَعَ أَبَوَيْهِ عَلَى ٱلْعَرْشِ وَخَرُّوا۟ لَهُۥ سُجَّدًۭا ۖ وَقَالَ يَـٰٓأَبَتِ هَـٰذَا تَأْوِيلُ رُءْيَـٰىَ مِن قَبْلُ قَدْ جَعَلَهَا رَبِّى حَقًّۭا ۖ وَقَدْ أَحْسَنَ بِىٓ إِذْ أَخْرَجَنِى مِنَ ٱلسِّجْنِ وَجَآءَ بِكُم مِّنَ ٱلْبَدْوِ مِنۢ بَعْدِ أَن نَّزَغَ ٱلشَّيْطَـٰنُ بَيْنِى وَبَيْنَ إِخْوَتِىٓ ۚ إِنَّ رَبِّى لَطِيفٌۭ لِّمَا يَشَآءُ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْعَلِيمُ ٱلْحَكِيمُ
وَرَفَعَ
और ऊपर बिठाया
أَبَوَيْهِ
अपने वालिदैन को
عَلَى
upon
ٱلْعَرْشِ
तख़्त पर
وَخَرُّوا۟
और वो सब गिर पड़े
لَهُۥ
उसके लिए
سُجَّدًۭا ۖ
सजदा करते हुए
وَقَالَ
और कहा
يَـٰٓأَبَتِ
ऐ मेरे अब्बा जान
هَـٰذَا
ये है
تَأْوِيلُ
ताबीर
رُءْيَـٰىَ
मेरे ख़्वाब की
مِن
(of) before
قَبْلُ
पहले के
قَدْ
तहक़ीक़
جَعَلَهَا
कर दिया उसे
رَبِّى
मेरे रब ने
حَقًّۭا ۖ
सच्चा
وَقَدْ
और तहक़ीक़
أَحْسَنَ
उसने एहसान किया
بِىٓ
साथ मेरे
إِذْ
जब
أَخْرَجَنِى
उसने निकाला मुझे
مِنَ
of
ٱلسِّجْنِ
क़ैद ख़ाने से
وَجَآءَ
और वो ले आया
بِكُم
तुम्हें
مِّنَ
from
ٱلْبَدْوِ
सेहरा से
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद इसके
أَن
कि
نَّزَغَ
फ़साद डाला
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान ने
بَيْنِى
दर्मियान मेरे
وَبَيْنَ
और दर्मियान
إِخْوَتِىٓ ۚ
मेरे भाईयों के
إِنَّ
बेशक
رَبِّى
रब मेरा
لَطِيفٌۭ
बेहतरीन तदबीर करने वाला है
لِّمَا
उसकी जो
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता है
إِنَّهُۥ
बेशक वो
هُوَ
वो ही है
ٱلْعَلِيمُ
बहुत इल्म वाला
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिकमत वाला
उसने अपने माँ-बाप को ऊँची जगह सिंहासन पर बिठाया और सब उसके आगे सजदे मे गिर पड़े। इस अवसर पर उसने कहा, "ऐ मेरे बाप! यह मेरे विगत स्वप्न का साकार रूप है। इसे मेरे रब ने सच बना दिया। और उसने मुझपर उपकार किया जब मुझे क़ैदख़ाने से निकाला और आप भाइयों के बीच फ़साद डलवा दिया था। निस्संदेह मेरा रब जो चाहता है उसके लिए सूक्ष्म उपाय करता है। वास्तव में वही सर्वज्ञ, अत्यन्त तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
तथा उन्होंने अपने माता-पिता को उस सिंहासन पर बिठाया, जिस पर वह बैठते थे। और उनको उनके माता-पिता एवं ग्यारह भाइयों ने सजदा करके सलाम पेश किया। ज्ञात हो कि यह सम्मान का सजदा था, इबादत का नहीं। यह अल्लाह के आदेश की पूर्ति के रूप में था जैसा कि स्वप्न में दिखाया गया था। इसीलिए यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने अपने पिता से कहा : आप लोगों का यह मुझे सजदा करके अभिवादन करना, मेरे उस सपने का साकार रूप है, जिसे मैंने पहले देखा था और आपको बताया था। आज मेरे रब ने उसके घटित होने से उसे सच कर दिया। निश्चय मेरे पालनहार ने मुझपर उपकार किया, जब मुझे क़ैदखाने से निकाला और जब आपको देहात से यहाँ ले आया, जबकि शैतान ने मेरे और मेरे भाइयों के बीच बिगाड़ पैदा कर दिया था। निःसंदेह मेरा पालनहार जो चाहे, उसका उपाय करने में अत्यंत सूक्ष्म है। निःसंदेह वह अपने बंदों के हालात से पूरी तरह अवगत, अपने प्रबंधन में पूर्ण हिकमत वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
माफी और खानदान के मिलाप का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि माफ करने और दरगुज़र करने से रिश्ते दोबारा जुड़ सकते हैं, बदला लेने से सिर्फ नुकसान होता है।
आयत 101
۞ رَبِّ قَدْ ءَاتَيْتَنِى مِنَ ٱلْمُلْكِ وَعَلَّمْتَنِى مِن تَأْوِيلِ ٱلْأَحَادِيثِ ۚ فَاطِرَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ أَنتَ وَلِىِّۦ فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ تَوَفَّنِى مُسْلِمًۭا وَأَلْحِقْنِى بِٱلصَّـٰلِحِينَ
۞ رَبِّ
ऐ मेरे रब
قَدْ
तहक़ीक़
ءَاتَيْتَنِى
दिया तूने मुझे
مِنَ
of
ٱلْمُلْكِ
बादशाहत में से
وَعَلَّمْتَنِى
और सिखाया तूने मुझे
مِن
of
تَأْوِيلِ
हक़ीक़त में से
ٱلْأَحَادِيثِ ۚ
बातों की
فَاطِرَ
ऐ पैदा करने वाले
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन के
أَنتَ
तू ही
وَلِىِّۦ
मेरा दोस्त है
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ
और आख़िरत में
تَوَفَّنِى
तू फ़ौत करना मुझे
مُسْلِمًۭا
मुसलमान
وَأَلْحِقْنِى
और मिला देना मुझे
بِٱلصَّـٰلِحِينَ
सालिहीन से
मेरे रब! तुने मुझे राज्य प्रदान किया और मुझे घटनाओं और बातों के निष्कर्ष तक पहुँचना सिखाया। आकाश और धरती के पैदा करनेवाले! दुनिया और आख़िरत में तू ही मेरा संरक्षक मित्र है। तू मुझे इस दशा से उठा कि मैं मुस्लिम (आज्ञाकारी) हूँ और मुझे अच्छे लोगों के साथ मिला।"
तफ़्सीर:
फिर यूसुफ़ ने अपने पालनहार से दुआ की। कहा : ऐ मेरे रब! तूने मुझे मिस्र का राज्य प्रदान किया और मुझे सप्नों का अर्थ सिखाया। ऐ आकाशों और धरती के पैदा करने वाले तथा उन्हें किसी पूर्व नमूने के बिना बनाने वाले! तू ही सांसारिक जीवन में मेरे सभी मामलों का संरक्षक है, तथा आख़िरत में भी मेरे सभी मामलों संरक्षक है। मेरे जीवन के अंत में, मुझे एक मुसलमान के रूप में उठा और मुझे जन्नत के सबसे उच्च स्थान में मेरे बाप-दादाओं तथा अन्य लोगों में से सदाचारी नबियों के साथ मिला दे।
आयत 102
ذَٰلِكَ مِنْ أَنۢبَآءِ ٱلْغَيْبِ نُوحِيهِ إِلَيْكَ ۖ وَمَا كُنتَ لَدَيْهِمْ إِذْ أَجْمَعُوٓا۟ أَمْرَهُمْ وَهُمْ يَمْكُرُونَ
ذَٰلِكَ
ये
مِنْ
(is) from
أَنۢبَآءِ
कुछ ख़बरें हैं
ٱلْغَيْبِ
ग़ैब की
نُوحِيهِ
हम वही करते हैं उसे
إِلَيْكَ ۖ
तरफ़ आपके
وَمَا
और ना
كُنتَ
थे आप
لَدَيْهِمْ
पास उनके
إِذْ
जब
أَجْمَعُوٓا۟
उन्होंने इत्तिफ़ाक़ किया
أَمْرَهُمْ
अपने मामले पर
وَهُمْ
और वो
يَمْكُرُونَ
वो चालें चल रहे थे
ये परोक्ष की ख़बरे हैं जिनकी हम तुम्हारी ओर प्रकाशना कर रहे है। तुम तो उनके पास नहीं थे, जब उन्होंने अपने मामले को पक्का करके षड्यंत्र किया था
तफ़्सीर:
यूसुफ़ और उनके भाइयों की यह उल्लिखित कहानी, हम इसकी (ऐ रसूल) आपकी ओर वह़्य कर रहे हैं। आपको इसकी जानकारी नहीं थी। क्योंकि आप यूसुफ़ के भाइयों के पास मौजूद नहीं थे, जब उन्होंने यूसुफ़ को कुएँ के अंदर डालने का निर्णय किया था और इसके लिए एक बड़ी चाल चली थी। लेकिन हमने आपकी ओर इसकी वह़्य की।
आयत 103
وَمَآ أَكْثَرُ ٱلنَّاسِ وَلَوْ حَرَصْتَ بِمُؤْمِنِينَ
وَمَآ
और नहीं
أَكْثَرُ
अक्सर
ٱلنَّاسِ
लोग
وَلَوْ
और अगरचे
حَرَصْتَ
हिर्स करें आप
بِمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
किन्तु चाहे तुम कितना ही चाहो, अधिकतर लोग तो मानेंगे नहीं
तफ़्सीर:
और अधिकांश लोग हरगिज़ ईमान लाने वाले नहीं हैं, चाहे (ऐ रसूल) आप उनके ईमान के लिए हर संभव प्रयास कर लें। इसलिए आप उनपर अफ़सोस न करें।
आयत 104
وَمَا تَسْـَٔلُهُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۚ إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرٌۭ لِّلْعَـٰلَمِينَ
وَمَا
और नहीं
تَسْـَٔلُهُمْ
आप सवाल करते उनसे
عَلَيْهِ
इस पर
مِنْ
any
أَجْرٍ ۚ
किसी अजर का
إِنْ
नहीं है
هُوَ
वो
إِلَّا
मगर
ذِكْرٌۭ
एक ज़िक्र
لِّلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों के लिए
तुम उनसे इसका कोई बदला भी नहीं माँगते। यह तो सारे संसार के लिए बस एक अनुस्मरण है
तफ़्सीर:
यदि वे समझ-बूझ से काम लेते तो आप पर ईमान ले आते। क्योंकि (ऐ रसूल) आप उनसे क़ुरआन तथा धर्म प्रचार पर कोई पारिश्रमिक नहीं माँगते। क़ुरआन तो केवल सभी लोगों के लिए एक उपदेश (याददेहानी) है।
आयत 105
وَكَأَيِّن مِّنْ ءَايَةٍۢ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ يَمُرُّونَ عَلَيْهَا وَهُمْ عَنْهَا مُعْرِضُونَ
وَكَأَيِّن
और कितनी ही
مِّنْ
of
ءَايَةٍۢ
निशानियाँ हैं
فِى
in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन में
يَمُرُّونَ
वो गुज़रते हैं
عَلَيْهَا
उन पर
وَهُمْ
और वो
عَنْهَا
उनसे
مُعْرِضُونَ
ऐराज़ करने वाले हैं
आकाशों और धरती में कितनी ही निशानियाँ हैं, जिनपर से वे इस तरह गुज़र जाते है कि उनकी ओर वे ध्यान ही नहीं देते
तफ़्सीर:
अल्लाह पाक के एकल पूज्य होने को दर्शाने वाली बहुत-सी निशानियाँ हैं, जो आकाशों तथा धरती में फैली हुई हैं, जिनपर से वे गुज़रते हैं, परंतु वे उन पर विचार करने और उनसे सीख लेने से उपेक्षा करने वाले होते हैं, उनपर कोई ध्यान नहीं देते हैं।
आयत 106
وَمَا يُؤْمِنُ أَكْثَرُهُم بِٱللَّهِ إِلَّا وَهُم مُّشْرِكُونَ
وَمَا
और नहीं
يُؤْمِنُ
ईमान लाते
أَكْثَرُهُم
अक्सर उनके
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
إِلَّا
मगर
وَهُم
इस हाल में कि वो
مُّشْرِكُونَ
मुशरिक हैं
इनमें अधिकतर लोग अल्लाह को मानते भी है तो इस तरह कि वे साझी भी ठहराते है
तफ़्सीर:
अधिकांश लोग अल्लाह पर यह ईमान नहीं रखते कि वह पैदा करने वाला, रोज़ी देने वाला, जीवन एवं मृत्यु देने वाला है, परंतु इस हाल में कि वे उसके साथ अन्य मूर्तियों और बुतों की पूजा करते हैं और यह दावा करते हैं कि अल्लाह का कोई बेटा है, अल्लाह इससे बहुत पवित्र है।
आयत 107
أَفَأَمِنُوٓا۟ أَن تَأْتِيَهُمْ غَـٰشِيَةٌۭ مِّنْ عَذَابِ ٱللَّهِ أَوْ تَأْتِيَهُمُ ٱلسَّاعَةُ بَغْتَةًۭ وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
أَفَأَمِنُوٓا۟
क्या भला वो अमन में आ गए
أَن
कि
تَأْتِيَهُمْ
आ जाए उनके पास
غَـٰشِيَةٌۭ
एक छा जाने वाली (आफ़त)
مِّنْ
[of]
عَذَابِ
अज़ाब से
ٱللَّهِ
अल्लाह के
أَوْ
या
تَأْتِيَهُمُ
आ जाए उनके पास
ٱلسَّاعَةُ
क़यामत
بَغْتَةًۭ
अचानक
وَهُمْ
और वो
لَا
(do) not
يَشْعُرُونَ
ना वो शऊर रखते हों
क्या वे इस बात से निश्चिन्त है कि अल्लाह की कोई यातना उन्हें ढँक ले या सहसा वह घड़ी ही उनपर आ जाए, जबकि वे बिलकुल बेख़बर हों?
तफ़्सीर:
तो क्या ये मुश्रिक लोग इस बात से निश्चिंत हो गए हैं कि उनपर दुनिया में कोई सज़ा आ जाए, जो उन्हें ढाँक ले और वे उसे टाल न सकें, या उनपर अचानक क़ियामत आ जाए, और उन्हें उसके आने की भनक तक न लगे कि उसके लिए तैयारी कर लें। क्या इसी (निर्भय होने के) कारण ये लोग ईमान नहीं लाए?
आयत 108
قُلْ هَـٰذِهِۦ سَبِيلِىٓ أَدْعُوٓا۟ إِلَى ٱللَّهِ ۚ عَلَىٰ بَصِيرَةٍ أَنَا۠ وَمَنِ ٱتَّبَعَنِى ۖ وَسُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ وَمَآ أَنَا۠ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ
قُلْ
कह दीजिए
هَـٰذِهِۦ
ये है
سَبِيلِىٓ
रास्ता मेरा
أَدْعُوٓا۟
मैं बुलाता हूँ
إِلَى
to
ٱللَّهِ ۚ
तरफ़ अल्लाह के
عَلَىٰ
with
بَصِيرَةٍ
बसीरत पर
أَنَا۠
मैं
وَمَنِ
और जो कोई
ٱتَّبَعَنِى ۖ
पैरवी करे मेरी
وَسُبْحَـٰنَ
और पाक है
ٱللَّهِ
अल्लाह
وَمَآ
और नहीं
أَنَا۠
मैं
مِنَ
of
ٱلْمُشْرِكِينَ
शिर्क करने वालों में से
कह दो, "यही मेरा मार्ग है। मैं अल्लाह की ओर बुलाता हूँ। मैं स्वयं भी पूर्ण प्रकाश में हूँ और मेरे अनुयायी भी - महिमावान है अल्लाह! ृृ- और मैं कदापि बहुदेववादी नहीं।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उससे कह दीजिए जिसे आप आमंत्रित करते हैं : यही मेरा मार्ग है जिसकी ओर मैं लोगों को आमंत्रित करता हूँ। मैं इसकी ओर स्पष्ट तर्क के साथ आमंत्रित करता हूँ, तथा मेरा अनुसरण करने वाले, मेरे मार्गदर्शन को ग्रहण करने वाले और मेरी सुन्नत (तरीक़े) का पालन करने वाले (भी) इसी की ओर आमंत्रित करते हैं। तथा अल्लाह पवित्र है उस चीज़ से जिसकी उसकी ओर निस्बत की गई है जो उसकी महिमा के योग्य नहीं है, या उसकी पूर्णता के विपरीत है और मैं अल्लाह का साझी ठहराने वालों में से नहीं हूँ। बल्कि, मैं उसके एकेश्वरवादियों में से हूँ।
आयत 109
وَمَآ أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ إِلَّا رِجَالًۭا نُّوحِىٓ إِلَيْهِم مِّنْ أَهْلِ ٱلْقُرَىٰٓ ۗ أَفَلَمْ يَسِيرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ فَيَنظُرُوا۟ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۗ وَلَدَارُ ٱلْـَٔاخِرَةِ خَيْرٌۭ لِّلَّذِينَ ٱتَّقَوْا۟ ۗ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
وَمَآ
और नहीं
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
مِن
before you
قَبْلِكَ
आपसे पहले
إِلَّا
मगर
رِجَالًۭا
मर्दों को
نُّوحِىٓ
हम वही करते थे
إِلَيْهِم
तरफ़ उनके
مِّنْ
from (among)
أَهْلِ
(the) people
ٱلْقُرَىٰٓ ۗ
बस्ती वालों में से
أَفَلَمْ
क्या फिर नहीं
يَسِيرُوا۟
वो चले-फिरे
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
فَيَنظُرُوا۟
तो वो देखते
كَيْفَ
किस तरह
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अंजाम
ٱلَّذِينَ
उनका जो
مِن
(were) before them
قَبْلِهِمْ ۗ
उनसे पहले थे
وَلَدَارُ
और अलबत्ता घर
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत का
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لِّلَّذِينَ
उनके लिए जो
ٱتَّقَوْا۟ ۗ
तक़वा करें
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल से काम लेते
तुमसे पहले भी हमने जिनको रसूल बनाकर भेजा, वे सब बस्तियों के रहनेवाले पुरुष ही थे। हम उनकी ओर प्रकाशना करते रहे - फिर क्या वे धरती में चले-फिरे नहीं कि देखते कि उनका कैसा परिणाम हुआ, जो उनसे पहले गुज़रे है? निश्चय ही आख़िरत का घर ही डर रखनेवालों के लिए सर्वोत्तम है। तो क्या तुम समझते नहीं? -
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) हमने आपसे पहले मानव जाति में से पुरुषों ही को (नबी बनाकर) भेजे, फरिश्तों को नहीं। हम उनकी ओर वह़्य करते थे, जैसे हमने आपकी ओर वह़्य की है। वे शहरों के लोगों में से थे, देहात वालों में से नहीं। उनके समुदायों ने उन्हें झुठलाया, तो हमने उन्हें नष्ट कर दिया। तो क्या आपको झुठलाने वाले ये लोग धरती में नहीं चले-फिरे कि विचार करते कि इनसे पहले झुठलाने वालों का अंत कैसा रहा और उनसे सीख प्राप्त करते?! और आख़िरत की नेमतें उन लोगों के लिए उत्तम हैं, जो दुनिया में अल्लाह से डरते रहे। तो क्या तुम नहीं समझते कि यह उत्तम है, इसलिए (तुम भी) अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके (जिनमें सबसे महान ईमान है) और उसके निषेधों से बचकर (जिनमें सबसे बड़ा शिर्क है), डरने लगो।
आयत 110
حَتَّىٰٓ إِذَا ٱسْتَيْـَٔسَ ٱلرُّسُلُ وَظَنُّوٓا۟ أَنَّهُمْ قَدْ كُذِبُوا۟ جَآءَهُمْ نَصْرُنَا فَنُجِّىَ مَن نَّشَآءُ ۖ وَلَا يُرَدُّ بَأْسُنَا عَنِ ٱلْقَوْمِ ٱلْمُجْرِمِينَ
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
ٱسْتَيْـَٔسَ
ना उम्मीद हो गए
ٱلرُّسُلُ
रसूल
وَظَنُّوٓا۟
और उन्होंने समझा
أَنَّهُمْ
कि बेशक वो
قَدْ
यक़ीनन
كُذِبُوا۟
वो झूठ बोले गए
جَآءَهُمْ
आ गई उनके पास
نَصْرُنَا
मदद हमारी
فَنُجِّىَ
तो बचा लिया गया
مَن
उसको जिसे
نَّشَآءُ ۖ
हम चाहते थे
وَلَا
और नहीं
يُرَدُّ
फेरा जाता
بَأْسُنَا
अज़ाब हमारा
عَنِ
from
ٱلْقَوْمِ
उन लोगों से
ٱلْمُجْرِمِينَ
जो मुजरिम हैं
यहाँ तक कि जब वे रसूल निराश होने लगे और वे समझने लगे कि उनसे झूठ कहा गया था कि सहसा उन्हें हमारी सहायता पहुँच गई। फिर हमने जिसे चाहा बचा लिया। किन्तु अपराधी लोगों पर से तो हमारी यातना टलती ही नहीं
तफ़्सीर:
हम इन रसूलों के दुश्मनों को मोहलत देते रहते हैं और इसी ढील के कारण उन्हें अज़ाब देने में जल्दी नहीं करते। यहाँ तक कि जब उन्हें विनाश करने में देरी हो गई और रसूल उनके विनाश से निराश हो गए और काफ़िरों को यक़ीन हो गया कि उनके रसूलों ने उनसे झुठलाने वालों के अज़ाब और मोमिनों की मुक्ति का जो वादा किया था, वह झूठा था; तो रसूलों के पास हमारी मदद आ गई और रसूलों तथा मोमिनों को झुठलाने वालों पर आने वाले विनाश से बचा लिया गया। और हमारा अज़ाब जब अपराधियों पर आ जाता है, तो उसे हटाया नहीं जाता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
याक़ूब अलैहिस्सलाम के मिस्र आने और यूसुफ अलैहिस्सलाम के बचपन के ख्वाब की तकमील का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि सब्र का फल आखिरकार मीठा होता है, चाहे उसमें बरसों लग जाएं।
आयत 111
لَقَدْ كَانَ فِى قَصَصِهِمْ عِبْرَةٌۭ لِّأُو۟لِى ٱلْأَلْبَـٰبِ ۗ مَا كَانَ حَدِيثًۭا يُفْتَرَىٰ وَلَـٰكِن تَصْدِيقَ ٱلَّذِى بَيْنَ يَدَيْهِ وَتَفْصِيلَ كُلِّ شَىْءٍۢ وَهُدًۭى وَرَحْمَةًۭ لِّقَوْمٍۢ يُؤْمِنُونَ
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
كَانَ
है
فِى
in
قَصَصِهِمْ
उनके क़िस्सों में
عِبْرَةٌۭ
इबरत
لِّأُو۟لِى
for men
ٱلْأَلْبَـٰبِ ۗ
अक़्ल वालों के लिए
مَا
नहीं
كَانَ
है ये
حَدِيثًۭا
ऐसी बात
يُفْتَرَىٰ
जो गढ़ ली गई
وَلَـٰكِن
और लेकिन
تَصْدِيقَ
तसदीक़
ٱلَّذِى
उस चीज़ की जो
بَيْنَ
(was) before it
يَدَيْهِ
उससे पहले है
وَتَفْصِيلَ
और तफ़सील है
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ की
وَهُدًۭى
और हिदायत
وَرَحْمَةًۭ
और रहमत है
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يُؤْمِنُونَ
जो ईमान लाते हों
निश्चय ही उनकी कथाओं में बुद्धि और समझ रखनेवालों के लिए एक शिक्षाप्रद सामग्री है। यह कोई घड़ी हुई बात नहीं है, बल्कि यह अपने से पूर्व की पुष्टि में है, और हर चीज़ का विस्तार और ईमान लानेवाले लोगों के लिए मार्ग-दर्शन और दयालुता है
तफ़्सीर:
रसूलों की कहानियों और उनके समुदायों की कहानियों में, तथा यूसुफ़ अलैहिस्सलाम और उनके भाइयों की कहानियों में बड़ी सीख और उपदेश है, जिससे सद्बुद्धि वाले उपदेश ग्रहण करते हैं। इन कथाओं पर आधारित क़ुरआन कोई गढ़ा हुआ कलाम नहीं है, जो झूठ-मूठ अल्लाह की ओर मनसूब कर दिया गया हो। बल्कि यह अल्लाह की ओर से उतरने वाली दिव्य पुस्तकों की पुष्टि करने वाला, जिन शरई प्रावधानों और नियमों के विस्तृत होने की आवश्यकता है उनका विस्तृत विवरण, हर भलाई के लिए मार्गदर्शन और उसपर ईमान रखने वालों के लिए दया है। क्योंकि वही उसकी शिक्षाओं से लाभ उठाते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
यूसुफ अलैहिस्सलाम की दुआ और कुरआन की सच्चाई के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि कामयाबी के बाद भी तकब्बुर की बजाय शुक्रगुज़ारी और आजिज़ी अपनानी चाहिए।
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