नाम का मतलब
हिज्र (समूद कौम की बस्ती का नाम, पत्थर तराश कर घर बनाने की वजह से मशहूर)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-हिज्र में कुरआन की हिफाज़त का वादा, इबलीस-आदम का वाकिया और कई कौमों (लूत, समूद) के अंजाम का ज़िक्र है। इसका नाम समूद कौम की बस्ती हिज्र के नाम पर है।
फ़ज़ीलत / सार
इसी सूरह में अल्लाह का यह मशहूर वादा है कि कुरआन की हिफाज़त खुद अल्लाह करेगा, जो कुरआन की सलामती का सबसे बड़ा सुबूत माना जाता है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ الٓر ۚ تِلْكَ ءَايَـٰتُ ٱلْكِتَـٰبِ وَقُرْءَانٍۢ مُّبِينٍۢ
الٓر ۚ
अलिफ़ लाम रा
تِلْكَ
ये
ءَايَـٰتُ
आयात हैं
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब की
وَقُرْءَانٍۢ
and Quran
مُّبِينٍۢ
और क़ुरआन वाज़ेह की
अलिफ़॰ लाम॰ रा॰। यह किताब अर्थात स्पष्ट क़ुरआन की आयतें हैं
तफ़्सीर:
{अलिफ़, लाम, रा।} इन जैसे अक्षरों के संबंध में सूरतुल बक़रा के आरंभ में बात हो चुकी है। ये उच्चस्तरीय आयतें जो इस बात को दर्शाती हैं कि वे अल्लाह की ओर से अवतरित हैं, ये उस क़ुरआन की आयतें हैं, जो तौह़ीद (एकेश्वरवाद) और धर्म के विधानों को स्पष्ट करता है।
आयत 2
رُّبَمَا يَوَدُّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لَوْ كَانُوا۟ مُسْلِمِينَ
رُّبَمَا
कभी
يَوَدُّ
चाहेंगे
ٱلَّذِينَ
वो लोग जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لَوْ
काश
كَانُوا۟
वो होते
مُسْلِمِينَ
मुसलमान
ऐसे समय आएँगे जब इनकार करनेवाले कामना करेंगे कि क्या ही अच्छा होता कि हम मुस्लिम (आज्ञाकारी) होते!
तफ़्सीर:
क़ियामत के दिन जब काफ़िरों के लिए मामला स्पष्ट हो जाएगा और वे दुनिया में जिस अविश्वास के रास्ते पर चल रहे थे, उसकी अमान्यता उनके सामने उजागर हो जाएगी, तो वे कामना करेंगे कि काश! वे मुसलमान होते।
आयत 3
ذَرْهُمْ يَأْكُلُوا۟ وَيَتَمَتَّعُوا۟ وَيُلْهِهِمُ ٱلْأَمَلُ ۖ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ
ذَرْهُمْ
छोड़ दीजिए उन्हें
يَأْكُلُوا۟
वो खाऐं
وَيَتَمَتَّعُوا۟
और मज़े उड़ाऐं
وَيُلْهِهِمُ
और ग़ाफ़िल रखे उन्हें
ٱلْأَمَلُ ۖ
उम्मीद
فَسَوْفَ
पस अनक़रीब
يَعْلَمُونَ
वो जान लेंगे
छोड़ो उन्हें खाएँ और मज़े उड़ाएँ और (लम्बी) आशा उन्हें भुलावे में डाले रखे। उन्हें जल्द ही मालूम हो जाएगा!
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) इन झुठलाने वालों को छोड़ दें कि वे पशुओं की तरह खाते रहें और दुनिया के नश्वर सुखों का आनंद लेते रहें तथा लंबी आशा उन्हें ईमान और अच्छे कार्य से गाफ़िल किए रखे। जब वे क़ियामत के दिन अल्लाह के सामने उपस्थित होंगे, तो उन्हें पता चल जाएगा कि वे कितने घाटे में हैं।
आयत 4
وَمَآ أَهْلَكْنَا مِن قَرْيَةٍ إِلَّا وَلَهَا كِتَابٌۭ مَّعْلُومٌۭ
وَمَآ
और नहीं
أَهْلَكْنَا
हलाक किया
مِن
any
قَرْيَةٍ
किसी बस्ती को
إِلَّا
मगर
وَلَهَا
जबकि उसके लिए
كِتَابٌۭ
लिखा हुआ है
مَّعْلُومٌۭ
मालूम (वक़्त)
हमने जिस बस्ती को भी विनष्ट किया है, उसके लिए अनिवार्यतः एक निश्चित फ़ैसला रहा है!
तफ़्सीर:
और अत्याचारी बस्तियों में से जिस बस्ती पर भी हमने विनाश उतारा, उसका अल्लाह के ज्ञान में एक निर्धारित समय था, जिससे वह न आगे बढ़ सकती और न पीछे हट सकती थी।
आयत 5
مَّا تَسْبِقُ مِنْ أُمَّةٍ أَجَلَهَا وَمَا يَسْتَـْٔخِرُونَ
مَّا
नहीं
تَسْبِقُ
सबक़त करती/आगे बढ़ती
مِنْ
any
أُمَّةٍ
कोई उम्मत
أَجَلَهَا
अपने मुक़र्रर वक़्त से
وَمَا
और ना
يَسْتَـْٔخِرُونَ
वो पीछे रह सकती है
किसी समुदाय के लोग न अपने निश्चित समय से आगे बढ़ सकते है और न वे पीछे रह सकते है
तफ़्सीर:
किसी भी समुदाय पर उसका विनाश उसके नियत समय से पहले नहीं आता। तथा जब उसका नियत समय आ जाए, तो उसका विनाश उससे पीछे नहीं रहता। इसलिए अत्याचारियों को, अल्लाह के उन्हें ढील देने से, धोखे में नहीं पड़ना चाहिए।
आयत 6
وَقَالُوا۟ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِى نُزِّلَ عَلَيْهِ ٱلذِّكْرُ إِنَّكَ لَمَجْنُونٌۭ
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلَّذِى
वो शख़्स
نُزِّلَ
उतारा गया
عَلَيْهِ
जिस पर
ٱلذِّكْرُ
ज़िक्र (क़ुरआन)
إِنَّكَ
यक़ीनन तू
لَمَجْنُونٌۭ
अलबत्ता मजनून है
वे कहते है, "ऐ व्यक्ति, जिसपर अनुस्मरण अवतरित हुआ, तुम निश्चय ही दीवाने हो!
तफ़्सीर:
मक्का के काफ़िरों ने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कहा : ऐ वह व्यक्ति जिसपर स्मरण (क़ुरआन) उतारा गया है (जैसा कि वह दावा करता है), निश्चित रूप से तू अपने इस दावे से पागल लगता है, जो पागलों की तरह व्यवहार करता है।
आयत 7
لَّوْ مَا تَأْتِينَا بِٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ
لَّوْ
Why
مَا
क्यों नहीं
تَأْتِينَا
तू लाया हमारे पास
بِٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ
फ़रिश्तों को
إِن
अगर
كُنتَ
है तू
مِنَ
of
ٱلصَّـٰدِقِينَ
सच्चों में से
यदि तुम सच्चे हो तो हमारे समक्ष फ़रिश्तों को क्यों नहीं ले आते?"
तफ़्सीर:
तुम हमारे पास फ़रिश्तों को क्यों नहीं ले आते, जो तुम्हारे हक़ में गवाही दें, यदि तुम सच्चे हो कि तुम एक भेजे गए रसूल हो और यह कि हमपर यातना उतरने वाली है।
आयत 8
مَا نُنَزِّلُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ إِلَّا بِٱلْحَقِّ وَمَا كَانُوٓا۟ إِذًۭا مُّنظَرِينَ
مَا
नहीं
نُنَزِّلُ
हम उतारा करते
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ
फ़रिश्तों को
إِلَّا
मगर
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
وَمَا
और नहीं
كَانُوٓا۟
होते वो
إِذًۭا
तब
مُّنظَرِينَ
मोहलत दिए गए
फ़रिश्तों को हम केवल सत्य के प्रयोजन हेतु उतारते है और उस समय लोगों को मुहलत नहीं मिलेगी
तफ़्सीर:
अल्लाह तआला ने उनके फ़रिश्तों के आने के सुझाव के जवाब में कहा : हम फ़रिश्तों को उसी समय उतारते हैं, जब हमारी हिकमत के अनुसार उन्हें अज़ाब के द्वारा विनष्ट करने का समय आ जाए। और - अगर हम फ़रिश्तों को ले आएँ और वे ईमान न लाएँ, तो - उन्हें मोहलत नहीं दी जाएगी, बल्कि उन्हें तुरंत दंडित किया जाएगा।
आयत 9
إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا ٱلذِّكْرَ وَإِنَّا لَهُۥ لَحَـٰفِظُونَ
إِنَّا
बेशक हम
نَحْنُ
हम ही ने
نَزَّلْنَا
नाज़िल किया हमने
ٱلذِّكْرَ
ज़िक्र (क़ुरआन)
وَإِنَّا
और बेशक हम ही
لَهُۥ
उसकी
لَحَـٰفِظُونَ
अलबत्ता हिफ़ज़त करने वाले हैं
यह अनुसरण निश्चय ही हमने अवतरित किया है और हम स्वयं इसके रक्षक हैं
तफ़्सीर:
निःसंदेह हमने ही इस क़ुरआन को मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दिल पर लोगों के अनुस्मरण (याद-दहानी) के लिए उतारा है, और निःसंदेह हम ही क़ुरआन को वृद्धि और कमी, परिवर्तन और विकृति से सुरक्षित रखने वाले हैं।
आयत 10
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ فِى شِيَعِ ٱلْأَوَّلِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَرْسَلْنَا
भेजे हमने
مِن
before you
قَبْلِكَ
आपसे पहले (रसूल)
فِى
in
شِيَعِ
गिरोहों में
ٱلْأَوَّلِينَ
पहले लोगों के
तुमसे पहले कितने ही विगत गिरोंहों में हम रसूल भेज चुके है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) हमने आपसे पहले पिछले काफ़िर समुदायों में (भी) रसूल भेजे थे, तो उन्होंने उन रसूलों को झुठला दिया था। इसलिए, आपके समुदाय के आपको झुठलाने के मामले में, आप अनूठे रसूल नहीं हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन की हिफाज़त के वादे का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कुरआन में कोई तहरीफ (बदलाव) नहीं हो सकती, यह अल्लाह की खुद ज़िम्मेदारी है, इससे हमें कुरआन पर मुकम्मल भरोसा रखना चाहिए।
आयत 11
وَمَا يَأْتِيهِم مِّن رَّسُولٍ إِلَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ
وَمَا
और नहीं
يَأْتِيهِم
आया उनके पास
مِّن
any
رَّسُولٍ
कोई रसूल
إِلَّا
मगर
كَانُوا۟
थे वो
بِهِۦ
उसका
يَسْتَهْزِءُونَ
वो मज़ाक़ उड़ाते
कोई भी रसूल उनके पास ऐसा नहीं आया, जिसका उन्होंने उपहास न किया हो
तफ़्सीर:
पिछले काफ़िर समुदायों के पास जो भी रसूल आता था, वे उसे झुठला देते और उसका मज़ाक उड़ाया करते थे।
आयत 12
كَذَٰلِكَ نَسْلُكُهُۥ فِى قُلُوبِ ٱلْمُجْرِمِينَ
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نَسْلُكُهُۥ
हम दाख़िल करते हैं उसको
فِى
in
قُلُوبِ
दिलों में
ٱلْمُجْرِمِينَ
मुजरिमों के
इसी तरह हम अपराधियों के दिलों में इसे उतारते है
तफ़्सीर:
जिस तरह हमने उन (विगत) समुदायों के दिलों में झुठलाने की प्रवृत्ति डाल दी थी, उसी तरह हम उसे मक्का के मुश्रिकों के दिलों में डाल देंगे, उनकी विमुखता और हठ के कारण।
आयत 13
لَا يُؤْمِنُونَ بِهِۦ ۖ وَقَدْ خَلَتْ سُنَّةُ ٱلْأَوَّلِينَ
لَا
Not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाऐंगे
بِهِۦ ۖ
इस पर
وَقَدْ
और तहक़ीक़
خَلَتْ
गुज़र चुका
سُنَّةُ
तरीक़ा
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों का
वे इसे मानेंगे नहीं। पहले के लोगों की मिसालें गुज़र चुकी हैं
तफ़्सीर:
ये लोग मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अवतरित इस क़ुरआन पर ईमान नहीं लाएँगे। और अल्लाह की यह परंपरा रही है कि वह अपने रसूलों के लाए हुए संदेश को झुठलाने वालों को विनष्ट कर देता है। इसलिए आपको झुठलाने वाले लोगों को इससे सीख लेनी चाहिए।
आयत 14
وَلَوْ فَتَحْنَا عَلَيْهِم بَابًۭا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ فَظَلُّوا۟ فِيهِ يَعْرُجُونَ
وَلَوْ
और अगर
فَتَحْنَا
खोलदें हमने
عَلَيْهِم
उन पर
بَابًۭا
कोई दरवाज़ा
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
فَظَلُّوا۟
तो शिरू होजाऐं
فِيهِ
उसमें
يَعْرُجُونَ
वो चढ़ते
यदि हम उनपर आकाश से कोई द्वार खोल दें और वे दिन-दहाड़े उसमें चढ़ने भी लगें,
तफ़्सीर:
ये झुठलाने वाले लोग हठी हैं, भले ही स्पष्ट प्रमाणों के साथ सत्य उनके सामने उजागर हो जाए। चुनाँचे यदि हम उनके लिए आसमान का कोई द्वार खोल दें और वे उसमें चढ़ते चले जाएँ।
आयत 15
لَقَالُوٓا۟ إِنَّمَا سُكِّرَتْ أَبْصَـٰرُنَا بَلْ نَحْنُ قَوْمٌۭ مَّسْحُورُونَ
لَقَالُوٓا۟
अलबत्ता वो कहेंगे
إِنَّمَا
बेशक
سُكِّرَتْ
मदहोश करदी गई हैं
أَبْصَـٰرُنَا
निगाहें हमारी
بَلْ
बल्कि
نَحْنُ
हम तो
قَوْمٌۭ
लोग हैं
مَّسْحُورُونَ
सहरज़दा
फिर भी वे यही कहेंगे, "हमारी आँखें मदमाती हैं, बल्कि हम लोगों पर जादू कर दिया गया है!"
तफ़्सीर:
तब भी वे सत्य को नहीं मानते और कहते : हमारी दृष्टि को देखने से अवरुद्ध कर दिया गया है, बल्कि हम जो कुछ देख रहे हैं, वह जादू का प्रभाव है। क्योंकि हम मंत्रमुग्ध हैं।
आयत 16
وَلَقَدْ جَعَلْنَا فِى ٱلسَّمَآءِ بُرُوجًۭا وَزَيَّنَّـٰهَا لِلنَّـٰظِرِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
جَعَلْنَا
बनाए हमने
فِى
in
ٱلسَّمَآءِ
आसमान में
بُرُوجًۭا
कई बुर्ज
وَزَيَّنَّـٰهَا
और मुज़य्यन किया हमने उसे
لِلنَّـٰظِرِينَ
देखने वालों के लिए
हमने आकाश में बुर्ज (तारा-समूह) बनाए और हमने उसे देखनेवालों के लिए सुसज्जित भी किया
तफ़्सीर:
निःसंदेह हमने आसमान में महान सितारे बनाए हैं, जिनके माध्यम से लोग जल एवं थल के अंधेरों में अपनी यात्राओं के दौरान रास्ता मालूम करते हैं। और उन्हें देखने वालों के लिए सुशोभित किया है। ताकि वे उनसे सर्वशक्तिमान अल्लाह की शक्ति का प्रमाण प्राप्त करें।
आयत 17
وَحَفِظْنَـٰهَا مِن كُلِّ شَيْطَـٰنٍۢ رَّجِيمٍ
وَحَفِظْنَـٰهَا
और हिफ़ाज़त की हमने उसकी
مِن
from
كُلِّ
every
شَيْطَـٰنٍۢ
हर शैतान से
رَّجِيمٍ
जो मरदूद है
और हर फिटकारे हुए शैतान से उसे सुरक्षित रखा -
तफ़्सीर:
और हमने आसमान को अल्लाह की दया से निष्कासित हर शैतान से सुरक्षित कर दिया है।
आयत 18
إِلَّا مَنِ ٱسْتَرَقَ ٱلسَّمْعَ فَأَتْبَعَهُۥ شِهَابٌۭ مُّبِينٌۭ
إِلَّا
मगर
مَنِ
जिसने
ٱسْتَرَقَ
चुरा लिया
ٱلسَّمْعَ
सुनी हुई बात को
فَأَتْبَعَهُۥ
तो पीछा करता है उसका
شِهَابٌۭ
एक शोला
مُّبِينٌۭ
चमकता हुआ
यह और बात है कि किसी ने चोरी-छिपे कुछ सुनगुन ले लिया तो एक प्रत्यक्ष अग्निशिखा ने भी झपटकर उसका पीछा किया -
तफ़्सीर:
परंतु जो निकटवर्ती फ़रिश्तों (मलए-आला) की बात चुपके से सुन ले, तो एक चमकदार ज्वाला (उल्का) उसका पीछा करती है और उसे जला देती है।
आयत 19
وَٱلْأَرْضَ مَدَدْنَـٰهَا وَأَلْقَيْنَا فِيهَا رَوَٰسِىَ وَأَنۢبَتْنَا فِيهَا مِن كُلِّ شَىْءٍۢ مَّوْزُونٍۢ
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
مَدَدْنَـٰهَا
फैला दिया हमने उसे
وَأَلْقَيْنَا
और डाले हमने
فِيهَا
उसमें
رَوَٰسِىَ
पहाड़
وَأَنۢبَتْنَا
और उगाई हमने
فِيهَا
उसमें
مِن
of
كُلِّ
हर तरह की
شَىْءٍۢ
चीज़
مَّوْزُونٍۢ
मोज़ूं/मुनासिब
और हमने धरती को फैलाया और उसमें अटल पहाड़ डाल दिए और उसमें हर चीज़ नपे-तुले अन्दाज़ में उगाई
तफ़्सीर:
और हमने धरती को फैलाया ताकि लोग उसके ऊपर रह सकें, और उसमें मज़बूत (अटल) पहाड़ बनाए ताकि वह (धरती) लोगों को लेकर डगमगाने न लगे, तथा उसमें विभिन्न प्रकार के पौधे उगाए जो हिकमत की अपेक्षानुसार निर्धारित व निर्दिष्ट हैं।
आयत 20
وَجَعَلْنَا لَكُمْ فِيهَا مَعَـٰيِشَ وَمَن لَّسْتُمْ لَهُۥ بِرَٰزِقِينَ
وَجَعَلْنَا
और बनाए हमने
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
فِيهَا
उसमें
مَعَـٰيِشَ
असबाबे मईशत
وَمَن
और उसके लिए (भी)
لَّسْتُمْ
नहीं हो तुम
لَهُۥ
जिसके
بِرَٰزِقِينَ
राज़िक़
और उसमें तुम्हारे गुज़र-बसर के सामान निर्मित किए, और उनको भी जिनको रोज़ी देनेवाले तुम नहीं हो
तफ़्सीर:
और (ऐ लोगो!) हमने धरती में तुम्हारे लिए ऐसी खाने और पीने की चीज़ें बनाईं, जिनसे तुम्हारा जीवन यापन हो सके जब तक तुम दुनिया के जीवन में रहो। और हमने तुम्हारे सिवा उन लोगों और जानवरों के लिए (भी) जीवन यापन के साधन बनाए, जिन्हें तुम रोज़ी नहीं देते।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कायनात की तख्लीक में तर्तीब का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि कायनात का हर निज़ाम एक मुकर्रर हिकमत के तहत बना है, इत्तेफाकन नहीं।
आयत 21
وَإِن مِّن شَىْءٍ إِلَّا عِندَنَا خَزَآئِنُهُۥ وَمَا نُنَزِّلُهُۥٓ إِلَّا بِقَدَرٍۢ مَّعْلُومٍۢ
وَإِن
और नहीं
مِّن
(is) any
شَىْءٍ
कोई चीज़
إِلَّا
मगर
عِندَنَا
हमारे पास
خَزَآئِنُهُۥ
ख़ज़ाने हैं उसके
وَمَا
और नहीं
نُنَزِّلُهُۥٓ
हम उतारते उसे
إِلَّا
मगर
بِقَدَرٍۢ
साथ अंदाज़े
مَّعْلُومٍۢ
मालूम के
कोई भी चीज़ तो ऐसी नहीं है जिसके भंडार हमारे पास न हों, फिर भी हम उसे एक ज्ञात (निश्चिंत) मात्रा के साथ उतारते है
तफ़्सीर:
इनसानों और जानवरों के लाभ की जितनी वस्तुएँ हैं, हम उन्हें पैदा करने और लोगों को उनसे लाभ पहुँचाने का सामर्थ्य रखते हैं। और हम उनमें से जिस चीज़ को पैदा करते हैं, उसे अपनी हिकमत और अपनी इच्छा के अनुसार एक निश्चित मात्रा ही में पैदा करते हैं।
आयत 22
وَأَرْسَلْنَا ٱلرِّيَـٰحَ لَوَٰقِحَ فَأَنزَلْنَا مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ فَأَسْقَيْنَـٰكُمُوهُ وَمَآ أَنتُمْ لَهُۥ بِخَـٰزِنِينَ
وَأَرْسَلْنَا
और भेजा हमने
ٱلرِّيَـٰحَ
हवाओं को
لَوَٰقِحَ
बारआवर
فَأَنزَلْنَا
फिर नाज़िल किया हमने
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مَآءًۭ
पानी
فَأَسْقَيْنَـٰكُمُوهُ
पस पिलाया हमने तुम्हें वो
وَمَآ
और नहीं
أَنتُمْ
हो तुम
لَهُۥ
उसे
بِخَـٰزِنِينَ
ज़ख़ीरा करने वाले
हम ही वर्षा लानेवाली हवाओं को भेजते है। फिर आकाश से पानी बरसाते है और उससे तुम्हें सिंचित करते है। उसके ख़जानादार तुम नहीं हो
तफ़्सीर:
और हमने हवाएँ भेजीं जो बादलों को पानी से गर्भित करती हैं। फिर उन गर्भित बादलों से बारिश बरसाई और तुम्हें बारिश के पानी से सैराब किया। और (ऐ लोगो!) तुम इस पानी को धरती के अंदर स्रोतों और कुओं के रूप में संग्रह करने वाले नहीं हो। परंतु यह केवल अल्लाह है जो इसे धरती में संग्रह करता है।
आयत 23
وَإِنَّا لَنَحْنُ نُحْىِۦ وَنُمِيتُ وَنَحْنُ ٱلْوَٰرِثُونَ
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَنَحْنُ
यक़ीनन हम ही
نُحْىِۦ
हम ज़िन्दा करते हैं
وَنُمِيتُ
और हम मौत देते हैं
وَنَحْنُ
और हम ही
ٱلْوَٰرِثُونَ
वारिस हैं
हम ही जीवन और मृत्यु देते है और हम ही उत्तराधिकारी रह जाते है
तफ़्सीर:
निःसंदेह हम ही मृतकों को, उन्हें अनस्तित्व से अस्तित्व में लाकर तथा मृत्यु के बाद उन्हें पुनर्जीवित कर, जीवन प्रदान करते हैं। और जब जीवित लोग अपनी नियत अवधि पूरी कर लेते हैं, तो हम उन्हें मौत देते हैं। तथा हम ही बाक़ी रहने वाले हैं, जो धरती एवं उसके ऊपर मौजूद सारी चीज़ों के उत्तराधिकारी बनेंगे।
आयत 24
وَلَقَدْ عَلِمْنَا ٱلْمُسْتَقْدِمِينَ مِنكُمْ وَلَقَدْ عَلِمْنَا ٱلْمُسْتَـْٔخِرِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
عَلِمْنَا
जान लिया हमने
ٱلْمُسْتَقْدِمِينَ
आगे बढ़ने वालों को
مِنكُمْ
तुम में से
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
عَلِمْنَا
जान लिया हमने
ٱلْمُسْتَـْٔخِرِينَ
पीछे रहने वालों को
हम तुम्हारे पहले के लोगों को भी जानते है और बाद के आनेवालों को भी हम जानते है
तफ़्सीर:
निश्चित रूप से हमें उन लोगों का ज्ञान है, जो तुमसे पहले पैदा हुए और मर चुके, तथा हमें उन लोगों का भी ज्ञान है जिनका बाद में जन्म एवं मृत्यु होगी। इसमें से कुछ भी हमसे छिपा नहीं है।
आयत 25
وَإِنَّ رَبَّكَ هُوَ يَحْشُرُهُمْ ۚ إِنَّهُۥ حَكِيمٌ عَلِيمٌۭ
وَإِنَّ
और बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
هُوَ
वो
يَحْشُرُهُمْ ۚ
वो इकट्ठा करेगा उन्हें
إِنَّهُۥ
बेशक वो ही है
حَكِيمٌ
बहुत हिक्मत वाला
عَلِيمٌۭ
ख़ूब इल्म वाला
तुम्हारा रब ही है, जो उन्हें इकट्ठा करेगा। निस्संदेह वह तत्वदर्शी, सर्वज्ञ है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) निश्चय आपका पालनहार क़ियामत के दिन उन सबको एकत्र करेगा। ताकि अच्छे कार्य करने वाले को उसके अच्छे कार्य का बदला दे और बुरे कार्य करने वाले को उसके बुरे कार्य का बदला दे। वह अपने प्रबंधन में हिकमत वाला, तथा सब कुछ जानने वाला है, उससे कोई बात छिपी नहीं रहती।
आयत 26
وَلَقَدْ خَلَقْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ مِن صَلْصَـٰلٍۢ مِّنْ حَمَإٍۢ مَّسْنُونٍۢ
وَلَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
خَلَقْنَا
पैदा किया हमने
ٱلْإِنسَـٰنَ
इंसान को
مِن
(out) of
صَلْصَـٰلٍۢ
खनकती मिट्टी से
مِّنْ
from
حَمَإٍۢ
कीचड़ से
مَّسْنُونٍۢ
बदबूदार
हमने मनुष्य को सड़े हुए गारे की खनखनाती हुई मिट्टी से बनाया है,
तफ़्सीर:
हमने आदम को सूखी मिट्टी से पैदा किया, जिसे ठोकर मारी जाए तो आवाज़ दे। और यह मिट्टी जिससे उन्हें बनाया गया, काले रंग की थी और ज़्यादा दिनों तक रहने के कारण बदबूदार हो गई थी।
आयत 27
وَٱلْجَآنَّ خَلَقْنَـٰهُ مِن قَبْلُ مِن نَّارِ ٱلسَّمُومِ
وَٱلْجَآنَّ
और जिन्न को
خَلَقْنَـٰهُ
पैदा किया हमने उसे
مِن
before
قَبْلُ
इससे क़ब्ल
مِن
from
نَّارِ
fire
ٱلسَّمُومِ
आग की लपट से
और उससे पहले हम जिन्नों को लू रूपी अग्नि से पैदा कर चुके थे
तफ़्सीर:
और हमने आदम अलैहिस्सलाम को पैदा करने से पहले जिन्नों के पिता को तीव्र गर्मी वाली आग से पैदा किया।
आयत 28
وَإِذْ قَالَ رَبُّكَ لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ إِنِّى خَـٰلِقٌۢ بَشَرًۭا مِّن صَلْصَـٰلٍۢ مِّنْ حَمَإٍۢ مَّسْنُونٍۢ
وَإِذْ
और जब
قَالَ
फ़रमाया
رَبُّكَ
आपके रब ने
لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ
फ़रिश्तों से
إِنِّى
बेशक मैं
خَـٰلِقٌۢ
पैदा करने वाला हूँ
بَشَرًۭا
एक इन्सान
مِّن
(out) of
صَلْصَـٰلٍۢ
खनकती मिट्टी से
مِّنْ
from
حَمَإٍۢ
कीचड़ से
مَّسْنُونٍۢ
बदबूदार
याद करो जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों से कहा, "मैं सड़े हुए गारे की खनखनाती हुई मिट्टी से एक मनुष्य पैदा करनेवाला हूँ
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) उस समय को याद कीजिए, जब आपके पालनहार ने फ़रिश्तों से और इबलीस से (जो कि फ़रिश्तों के साथ था) कहा : मैं काली बदबूदार, खनखनाती हुई सूखी मिट्टी से एक इनसान बनाऊँगा।
आयत 29
فَإِذَا سَوَّيْتُهُۥ وَنَفَخْتُ فِيهِ مِن رُّوحِى فَقَعُوا۟ لَهُۥ سَـٰجِدِينَ
فَإِذَا
फिर जब
سَوَّيْتُهُۥ
दुरुस्त कर दूँ मैं उसे
وَنَفَخْتُ
और फूँक दूँ मैं
فِيهِ
उसमें
مِن
of
رُّوحِى
अपनी रूह से
فَقَعُوا۟
तो गिर पड़ना
لَهُۥ
उसके लिए
سَـٰجِدِينَ
सजदा करते हुए
तो जब मैं उसे पूरा बना चुकूँ और उसमें अपनी रूह फूँक दूँ तो तुम उसके आगे सजदे में गिर जाना!"
तफ़्सीर:
जब मैं उसकी शक्ल-सूरत ठीक-ठाक कर दूँ और उसकी रचना को पूरा कर लूँ, तो तुम सब मेरी आज्ञा के अनुपालन में और उसे अभिवादन करते हुए उसके आगे सजदे में गिर जाओ।
आयत 30
فَسَجَدَ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ كُلُّهُمْ أَجْمَعُونَ
فَسَجَدَ
तो सजदा किया
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्तों ने
كُلُّهُمْ
सबके सबने
أَجْمَعُونَ
इकट्ठे
अतएव सब के सब फ़रिश्तो ने सजदा किया,
तफ़्सीर:
तो फ़रिश्तों ने आज्ञापालन किया और सब के सब उनके आगे सजदे में गिर गए, जैसा कि उनके पालनहार ने उन्हें आदेश दिया था।
आज की ज़िंदगी में सबक़
आदम अलैहिस्सलाम की तख्लीक और इबलीस के इनकार का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि घमंड और नाफरमानी इबलीस की तरह इंसान को भी रांदा-दरगाह बना सकती है।
आयत 31
إِلَّآ إِبْلِيسَ أَبَىٰٓ أَن يَكُونَ مَعَ ٱلسَّـٰجِدِينَ
إِلَّآ
सिवाय
إِبْلِيسَ
इबलीस के
أَبَىٰٓ
उसने इन्कार किया
أَن
कि
يَكُونَ
हो वो
مَعَ
साथ
ٱلسَّـٰجِدِينَ
सजदा करने वालों के
सिवाय इबलीस के। उसने सजदा करनेवालों के साथ शामिल होने से इनकार कर दिया
तफ़्सीर:
परंतु इबलीस (जो फ़रिश्तों के साथ रहता था, लेकिन उनमें से नहीं था) फ़रिश्तों के साथ आदम को सजदा करने से उपेक्षा किया।
आयत 32
قَالَ يَـٰٓإِبْلِيسُ مَا لَكَ أَلَّا تَكُونَ مَعَ ٱلسَّـٰجِدِينَ
قَالَ
फ़रमाया
يَـٰٓإِبْلِيسُ
ऐ इब्लीस
مَا
क्या है
لَكَ
तुझे
أَلَّا
कि नहीं
تَكُونَ
हुआ तू
مَعَ
with
ٱلسَّـٰجِدِينَ
साथ सजदा करने वालों के
कहा, "ऐ इबलीस! तुझे क्या हुआ कि तू सजदा करनेवालों में शामिल नहीं हुआ?"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने इबलीस से उसके आदम को सजदा करने से मना कर देने के बाद कहा : तुझे मेरी आज्ञा का पालन करते हुए सजदा करने वाले फ़रिश्तों के साथ सजदा करने से किस चीज़ ने रोकाॽ
आयत 33
قَالَ لَمْ أَكُن لِّأَسْجُدَ لِبَشَرٍ خَلَقْتَهُۥ مِن صَلْصَـٰلٍۢ مِّنْ حَمَإٍۢ مَّسْنُونٍۢ
قَالَ
उसने कहा
لَمْ
नहीं
أَكُن
हूँ मैं
لِّأَسْجُدَ
कि मैं सजदा करूँ
لِبَشَرٍ
ऐसे इन्सान को
خَلَقْتَهُۥ
बनाया तूने उसे
مِن
(out) of
صَلْصَـٰلٍۢ
खनकती मिट्टी से
مِّنْ
from
حَمَإٍۢ
कीचड़ से
مَّسْنُونٍۢ
बदबूदार
उसने कहा, "मैं ऐसा नहीं हूँ कि मैं उस मनुष्य को सजदा करूँ जिसको तू ने सड़े हुए गारे की खनखनाती हुए मिट्टी से बनाया।"
तफ़्सीर:
इबलीस ने अहंकारपूर्वक कहा : मेरे लिए यह उचित नहीं कि मैं एक मनुष्य को सजदा करूँ, जिसे तूने सूखी मिट्टी से पैदा किया, जो पहले एक काली बदबूदार मिट्टी थी।
आयत 34
قَالَ فَٱخْرُجْ مِنْهَا فَإِنَّكَ رَجِيمٌۭ
قَالَ
फ़रमाया
فَٱخْرُجْ
पस निकल जा
مِنْهَا
इससे
فَإِنَّكَ
पस बेशक तू
رَجِيمٌۭ
मरदूद है
कहा, "अच्छा, तू निकल जा यहाँ से, क्योंकि तुझपर फिटकार है!
तफ़्सीर:
अल्लाह ने इबलीस से कहा : तू जन्नत से निकल जा। क्योंकि तू धिक्कार दिया गया है।
आयत 35
وَإِنَّ عَلَيْكَ ٱللَّعْنَةَ إِلَىٰ يَوْمِ ٱلدِّينِ
وَإِنَّ
और बेशक
عَلَيْكَ
तुझ पर
ٱللَّعْنَةَ
लानत है
إِلَىٰ
till
يَوْمِ
(the) Day
ٱلدِّينِ
बदले के दिन तक
निश्चय ही बदले के दिन तक तुझ पर धिक्कार है।"
तफ़्सीर:
और निश्चय ही क़ियामत के दिन तक तुझपर धिक्कार और मेरी दया से दूरी है।
आयत 36
قَالَ رَبِّ فَأَنظِرْنِىٓ إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ
قَالَ
वो बोला
رَبِّ
ऐ मेरे रब
فَأَنظِرْنِىٓ
पस मोहलत दे मुझे
إِلَىٰ
till
يَوْمِ
उस दिन तक
يُبْعَثُونَ
वो सब उठाए जाऐंगे (कि)
उसने कहा, "मेरे रब! फिर तू मुझे उस दिन तक के लिए मुहलत दे, जबकि सब उठाए जाएँगे।"
तफ़्सीर:
इबलीस ने कहा : ऐ मेरे पालनहार! मुझे उस दिन तक मोहलत दे और जीवित रख, जिस दिन सभी लोग दोबारा जीवित किए जाएँगे।
आयत 37
قَالَ فَإِنَّكَ مِنَ ٱلْمُنظَرِينَ
قَالَ
फ़रमाया
فَإِنَّكَ
पस बेशक तू
مِنَ
(are) of
ٱلْمُنظَرِينَ
मोहलत दिए जाने वालों में से है
कहा, "अच्छा, तुझे मुहलत है,
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उससे कहा : निःसंदेह तू मोहलत दिए गए लोगों में से है जिनकी मृत्यु को मैंने विलंबित कर दी है।
आयत 38
إِلَىٰ يَوْمِ ٱلْوَقْتِ ٱلْمَعْلُومِ
إِلَىٰ
Till
يَوْمِ
उस दिन तक
ٱلْوَقْتِ
वक़्त (जिस का)
ٱلْمَعْلُومِ
मालूम/मुक़र्रर है
उस दिन तक के लिए जिसका समय ज्ञात एवं नियत है।"
तफ़्सीर:
उस समय तक, जब प्रथम बार सूर फूँके जाने पर सभी लोग मर जाएँगे।
आयत 39
قَالَ رَبِّ بِمَآ أَغْوَيْتَنِى لَأُزَيِّنَنَّ لَهُمْ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَأُغْوِيَنَّهُمْ أَجْمَعِينَ
قَالَ
उसने कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
بِمَآ
बवजह उसके जो
أَغْوَيْتَنِى
बेराह किया तूने मुझे
لَأُزَيِّنَنَّ
अलबत्ता मैं ज़रूर मुज़य्यन कर दूँ गा
لَهُمْ
उनके लिए
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَلَأُغْوِيَنَّهُمْ
और अलबत्ता मैं ज़रूर बहकाऊँगा उनको
أَجْمَعِينَ
सबके सबको
उसने कहा, "मेरे रब! इसलिए कि तूने मुझे सीधे मार्ग से विचलित कर दिया है, अतः मैं भी धरती में उनके लिए मनमोहकता पैदा करूँगा और उन सबको बहकाकर रहूँगा,
तफ़्सीर:
इबलीस ने कहा : ऐ मेरे रब! तूने मुझे गुमराह किया है, इस कारण मैं अवश्य ही उनके लिए धरती में गुनाहों को सुंदर बनाऊँगा और उन सभी को सीधे रास्ते से गुमराह करूँगा।
आयत 40
إِلَّا عِبَادَكَ مِنْهُمُ ٱلْمُخْلَصِينَ
إِلَّا
सिवाय
عِبَادَكَ
तेरे बन्दों के
مِنْهُمُ
उनमें से
ٱلْمُخْلَصِينَ
जो चुने हुए हैं
सिवाय उनके जो तेरे चुने हुए बन्दे होंगे।"
तफ़्सीर:
सिवाय तेरे उन बंदों के, जिन्हें तूने अपनी इबादत के लिए चुन लिया है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इबलीस को मोहलत मिलने और जन्नत के वादे का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि शैतान हमेशा वसवसे डालता रहेगा, मगर सच्चे बंदों पर उसका कोई ज़ोर नहीं चलता।
आयत 41
قَالَ هَـٰذَا صِرَٰطٌ عَلَىَّ مُسْتَقِيمٌ
قَالَ
फ़रमाया
هَـٰذَا
ये
صِرَٰطٌ
रास्ता है
عَلَىَّ
मुझ तक
مُسْتَقِيمٌ
सीधा
कहा, "मुझ तक पहुँचने का यही सीधा मार्ग है,
तफ़्सीर:
अल्लाह ने फरमाया : यही मेरे पास पहुँचाने वाला सीधा रास्ता है।
आयत 42
إِنَّ عِبَادِى لَيْسَ لَكَ عَلَيْهِمْ سُلْطَـٰنٌ إِلَّا مَنِ ٱتَّبَعَكَ مِنَ ٱلْغَاوِينَ
إِنَّ
बेशक
عِبَادِى
मेर बन्दे
لَيْسَ
नहीं
لَكَ
तेरे लिए
عَلَيْهِمْ
उन पर
سُلْطَـٰنٌ
कोई ज़ोर
إِلَّا
मगर
مَنِ
जो
ٱتَّبَعَكَ
पैरवी करे तेरी
مِنَ
of
ٱلْغَاوِينَ
बहके हुओं में से
मेरे बन्दों पर तो तेरा कुछ ज़ोर न चलेगा, सिवाय उन बहके हुए लोगों को जो तेरे पीछे हो लें
तफ़्सीर:
मेरे चयनित बंदों को गुमराह करने की तेरा कोई शक्ति और अधिकार नहीं, सिवाय इसके गुमराहों में से जो खुद तेरे पीछे चलने लगें।
आयत 43
وَإِنَّ جَهَنَّمَ لَمَوْعِدُهُمْ أَجْمَعِينَ
وَإِنَّ
और बेशक
جَهَنَّمَ
जहन्नम
لَمَوْعِدُهُمْ
अलबत्ता उनके वादे की जगह है
أَجْمَعِينَ
सबके सबकी
निश्चय ही जहन्नम ही का ऐसे समस्त लोगों से वादा है
तफ़्सीर:
निश्चय इबलीस और उसके पीछे चलने वाले सभी भटके हुए लोगों के वादा का स्थान जहन्नम है।
आयत 44
لَهَا سَبْعَةُ أَبْوَٰبٍۢ لِّكُلِّ بَابٍۢ مِّنْهُمْ جُزْءٌۭ مَّقْسُومٌ
لَهَا
उसके
سَبْعَةُ
सात
أَبْوَٰبٍۢ
दरवाज़े हैं
لِّكُلِّ
वास्ते हर
بَابٍۢ
दरवाज़े के
مِّنْهُمْ
उनमें से
جُزْءٌۭ
एक हिस्सा है
مَّقْسُومٌ
तक़सीम शुदा
उसके सात द्वार है। प्रत्येक द्वार के लिए एक ख़ास हिस्सा होगा।"
तफ़्सीर:
जहन्नम के सात द्वार हैं, जिनसे वे प्रवेश करेंगे। उनमें से हर द्वार से इबलीस के पीछे चलने वालों की एक निश्चित संख्या प्रवेश करेगी।
आयत 45
إِنَّ ٱلْمُتَّقِينَ فِى جَنَّـٰتٍۢ وَعُيُونٍ
إِنَّ
बेशक
ٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोग
فِى
(will be) in
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ों में होंगे
وَعُيُونٍ
और चश्मों में
निस्संदेह डर रखनेवाले बाग़ों और स्रोतों में होंगे,
तफ़्सीर:
निश्चय अपने पालनहार के आदेश का पालन करके और उसकी मना की हुई चीज़ों से बचकर, उससे डरने वाले लोग बाग़ों और स्रोतों में होंगे।
आयत 46
ٱدْخُلُوهَا بِسَلَـٰمٍ ءَامِنِينَ
ٱدْخُلُوهَا
दाख़िल हो जाओ इनमें
بِسَلَـٰمٍ
साथ सलामती के
ءَامِنِينَ
अमन में रहने वाले
"प्रवेश करो इनमें निर्भयतापूर्वक सलामती के साथ!"
तफ़्सीर:
उसमें प्रवेश के समय उनसे कहा जाएगा : इसमें हर प्रकार की आपदा से सुरक्षित होकर और भयमुक्त होकर प्रवेश कर जाओ।
आयत 47
وَنَزَعْنَا مَا فِى صُدُورِهِم مِّنْ غِلٍّ إِخْوَٰنًا عَلَىٰ سُرُرٍۢ مُّتَقَـٰبِلِينَ
وَنَزَعْنَا
और निकाल देंगे हम
مَا
जो भी
فِى
(is) in
صُدُورِهِم
उनके सीनों में है
مِّنْ
of
غِلٍّ
कोई कीना
إِخْوَٰنًا
भाई-भाई बनकर
عَلَىٰ
on
سُرُرٍۢ
तख़्तों पर
مُّتَقَـٰبِلِينَ
आमने-सामने (होंगे)
उनके सीनों में जो मन-मुटाव होगा उसे हम दूर कर देंगे। वे भाई-भाई बनकर आमने-सामने तख़्तों पर होंगे
तफ़्सीर:
और हम उनके दिलों को हर तरह के द्वेष और दुश्मनी से पवित्र कर देंगे। वे भाई-भाई बनकर, एक-दूसरे को देखते हुए तख़्तों पर बैठे होंगे।
आयत 48
لَا يَمَسُّهُمْ فِيهَا نَصَبٌۭ وَمَا هُم مِّنْهَا بِمُخْرَجِينَ
لَا
Not
يَمَسُّهُمْ
ना छुएगी उन्हें
فِيهَا
उनमें
نَصَبٌۭ
कोई थकावट
وَمَا
और ना
هُم
वो
مِّنْهَا
उनसे
بِمُخْرَجِينَ
निकाले जाऐंगे
उन्हें वहाँ न तो कोई थकान और तकलीफ़ पहुँचेगी औऱ न वे वहाँ से कभी निकाले ही जाएँगे
तफ़्सीर:
उन्हें वहाँ न कोई थकान होगी और न वे वहाँ से निकाले जाएँगे। बल्कि वे वहाँ हमेशा रहेंगे।
आयत 49
۞ نَبِّئْ عِبَادِىٓ أَنِّىٓ أَنَا ٱلْغَفُورُ ٱلرَّحِيمُ
۞ نَبِّئْ
ख़बर दे दीजिए
عِبَادِىٓ
मेर बन्दों को
أَنِّىٓ
बेशक मैं
أَنَا
मैं ही हूँ
ٱلْغَفُورُ
बहुत बख़्शने वाला
ٱلرَّحِيمُ
बहुत रहम करने वाला
मेरे बन्दों को सूचित कर दो कि मैं अत्यन्त क्षमाशील, दयावान हूँ;
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) मेरे बंदों को बता दें कि मैं अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला, उनपर दयावान् हूँ।
आयत 50
وَأَنَّ عَذَابِى هُوَ ٱلْعَذَابُ ٱلْأَلِيمُ
وَأَنَّ
और बेशक
عَذَابِى
अज़ाब मेरा
هُوَ
वो ही
ٱلْعَذَابُ
अज़ाब है
ٱلْأَلِيمُ
दर्दनाक
और यह कि मेरी यातना भी अत्यन्त दुखदायिनी यातना है
तफ़्सीर:
और उन्हें बता दें कि मेरी यातना ही कष्टदायक यातना है। इसलिए वे मुझ से तौबा करें, ताकि मेरी क्षमा के भागीदार बन सकें और मेरी यातना से बच सकें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जन्नत की नेमतों का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि जन्नत के हुसूल के लिए दुनिया में सब्र और नेकी की कोशिश ज़रूरी है।
आयत 51
وَنَبِّئْهُمْ عَن ضَيْفِ إِبْرَٰهِيمَ
وَنَبِّئْهُمْ
और ख़बर दे दीजिए उन्हें
عَن
about
ضَيْفِ
मेहमानों की
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम के
और उन्हें इबराहीम के अतिथियों का वृत्तान्त सुनाओ,
तफ़्सीर:
और आप उन्हें इबराहीम अलैहिस्सलाम के पास अतिथि बनकर आने वाले फ़रिश्तों के बारे में बताएँ, जो उनके पास बेटे की शुभ सूचना और लूत अलैहिस्सलाम की जाति के विनाश की सूचना लेकर आए थे।
आयत 52
إِذْ دَخَلُوا۟ عَلَيْهِ فَقَالُوا۟ سَلَـٰمًۭا قَالَ إِنَّا مِنكُمْ وَجِلُونَ
إِذْ
जब
دَخَلُوا۟
वो दाख़िल हुए
عَلَيْهِ
उस पर
فَقَالُوا۟
तो उन्होंने कहा
سَلَـٰمًۭا
सलाम (हो तुम पर)
قَالَ
उसने कहा
إِنَّا
बेशक हम
مِنكُمْ
तुमसे
وَجِلُونَ
ख़ौफ़ज़दा हैं
जब वे उसके यहाँ आए और उन्होंने सलाम किया तो उसने कहा, "हमें तो तुमसे डर लग रहा है।"
तफ़्सीर:
जब वे इबराहीम अलैहिस्सलाम के पास आए, तो उन्होंने उसे सलाम किया। उसने उन्हें उनके सलाम से बेहतर जवाब दिया और उनके सामने खाने के लिए एक भूना हुआ बछड़ा रखा। क्योंकि वह उन्हें इनसान समझ रहे थे, परंतु जब उन्होंने खाने को हाथ नहीं लगाया, तो बोले : हमें तुमसे डर महसूस हो रहा है।
आयत 53
قَالُوا۟ لَا تَوْجَلْ إِنَّا نُبَشِّرُكَ بِغُلَـٰمٍ عَلِيمٍۢ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لَا
(Do) not
تَوْجَلْ
ना तुम डरो
إِنَّا
बेशक हम
نُبَشِّرُكَ
हम ख़ुशख़बरी देते हैं तुझे
بِغُلَـٰمٍ
एक लड़के की
عَلِيمٍۢ
बहुत इल्म वाले
वे बोले, "डरो नहीं, हम तुम्हें एक ज्ञानवान पुत्र की शुभ सूचना देते है।"
तफ़्सीर:
तो संदेश लाने वाले फ़रिश्तों ने कहा : डरिए नहीं। हम आपको एक ऐसी चीज़ की सूचना दे रहे हैं जिससे आपको खुशी प्राप्त होगी। आपको एक ज्ञानी बेटा होगा।
आयत 54
قَالَ أَبَشَّرْتُمُونِى عَلَىٰٓ أَن مَّسَّنِىَ ٱلْكِبَرُ فَبِمَ تُبَشِّرُونَ
قَالَ
उसने कहा
أَبَشَّرْتُمُونِى
क्या ख़ुशख़बरी देते हो तुम मुझे
عَلَىٰٓ
बावजूद इसके
أَن
कि
مَّسَّنِىَ
पहूँच चुका मुझे
ٱلْكِبَرُ
बुढ़ापा
فَبِمَ
पस किस चीज़ की
تُبَشِّرُونَ
तुम ख़ुशख़बरी देते हो
उसने कहा, "क्या तुम मुझे शुभ सूचना दे रहे हो, इस अवस्था में कि मेरा बुढापा आ गया है? तो अब मुझे किस बात की शुभ सूचना दे रहे हो?"
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम ने बेटे की शुभ सूचना पर आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा : क्या तुम मुझे इस बुढ़ापे के बावजूद बेटे की शुभ सूचना देते हो, तो तुम किस आधार पर मुझे शुभ सूचना दे रहे हो?
आयत 55
قَالُوا۟ بَشَّرْنَـٰكَ بِٱلْحَقِّ فَلَا تَكُن مِّنَ ٱلْقَـٰنِطِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
بَشَّرْنَـٰكَ
ख़ुशख़बरी दी है हमने तुझे
بِٱلْحَقِّ
हक़ की
فَلَا
पस ना
تَكُن
तुम हो
مِّنَ
of
ٱلْقَـٰنِطِينَ
मायूस होने वालों में से
उन्होंने कहा, "हम तुम्हें सच्ची शुभ सूचना दे रहे हैं, तो तुम निराश न हो"
तफ़्सीर:
शुभ सूचना लाने वाले फ़रिश्तों ने इबराहीम अलैहिस्सलाम से कहा : हमने आपको उस सत्य की शुभ सूचना दी है जिसमें कोई संदेह नहीं है। इसलिए आप उस चीज़ से निराश न हों, जिसकी हमने आपको शुभ सूचना दी है।
आयत 56
قَالَ وَمَن يَقْنَطُ مِن رَّحْمَةِ رَبِّهِۦٓ إِلَّا ٱلضَّآلُّونَ
قَالَ
उसने कहा
وَمَن
और कौन
يَقْنَطُ
मायूस हो सकता है
مِن
of
رَّحْمَةِ
रहमत से
رَبِّهِۦٓ
अपने रब की
إِلَّا
सिवाय
ٱلضَّآلُّونَ
गुमराह लोगों के
उसने कहा, "अपने रब की दयालुता से पथभ्रष्टों के सिवा और कौन निराश होगा?"
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम ने कहा : क्या अल्लाह के सीधे रास्ते से भटके हुए लोगों के सिवा भी कोई अपने रब की दया से निराश होता है?!
आयत 57
قَالَ فَمَا خَطْبُكُمْ أَيُّهَا ٱلْمُرْسَلُونَ
قَالَ
उसने कहा
فَمَا
तो क्या
خَطْبُكُمْ
मामला है तुम्हारा
أَيُّهَا
ऐ
ٱلْمُرْسَلُونَ
भेजे हुओ (फ़रिश्तो)
उसने कहा, "ऐ दूतो, तुम किस अभियान पर आए हो?"
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम ने कहा : ऐ अल्लाह के भेजे हुए फ़रिश्तो! तुम किस अभियान के तहत आए हो?
आयत 58
قَالُوٓا۟ إِنَّآ أُرْسِلْنَآ إِلَىٰ قَوْمٍۢ مُّجْرِمِينَ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
إِنَّآ
बेशक हम
أُرْسِلْنَآ
भेजे गए हम
إِلَىٰ
to
قَوْمٍۢ
तरफ़ उन लोगों के
مُّجْرِمِينَ
जो मुजरिम हैं
वे बोले, "हम तो एक अपराधी क़ौम की ओर भेजे गए है,
तफ़्सीर:
संदेश लाने वाले फ़रिश्तों ने कहा : अल्लाह ने हमें एक महा भ्रष्टाचारी, महा बुराई वाले समुदाय को नष्ट करने के लिए भेजा है, और वे लूत की जाति के लोग हैं।
आयत 59
إِلَّآ ءَالَ لُوطٍ إِنَّا لَمُنَجُّوهُمْ أَجْمَعِينَ
إِلَّآ
सिवाय
ءَالَ
the family
لُوطٍ
आले लूत के
إِنَّا
बेशक हम
لَمُنَجُّوهُمْ
अलबत्ता निजात देने वाले हैं उनको
أَجْمَعِينَ
सबके सबको
सिवाय लूत के घरवालों के। उन सबको तो हम बचा लेंगे,
तफ़्सीर:
लूत के घर वालों और उनके अनुयायी मोमिनों के सिवा। विनाश का आदेश उनके लिए नहीं है। हम उन सबको उससे अवश्य बचा लेने वाले हैं।
आयत 60
إِلَّا ٱمْرَأَتَهُۥ قَدَّرْنَآ ۙ إِنَّهَا لَمِنَ ٱلْغَـٰبِرِينَ
إِلَّا
सिवाय
ٱمْرَأَتَهُۥ
उसकी वीवी के
قَدَّرْنَآ ۙ
मुक़द्दर करदिया हमने
إِنَّهَا
बेशक वो
لَمِنَ
(is) surely of
ٱلْغَـٰبِرِينَ
अलबत्ता पीछे रहने वालों में से है
सिवाय उसकी पत्नी के - हमने निश्चित कर दिया है, वह तो पीछे रह जानेवालों में रहेंगी।"
तफ़्सीर:
परंतु उनकी पत्नी का मामला अलग है। हमारा निर्णय है कि वह उन बाक़ी लोगों में से है, जो विनाश से पीड़ित होंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इब्राहीम अलैहिस्सलाम के मेहमान फरिश्तों का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि मेहमाननवाज़ी और खुशखबरी पर भरोसा रखना अच्छे किरदार की निशानी है।
आयत 61
فَلَمَّا جَآءَ ءَالَ لُوطٍ ٱلْمُرْسَلُونَ
فَلَمَّا
तो जब
جَآءَ
आगए
ءَالَ
(to the) family
لُوطٍ
आले लूत (के पास)
ٱلْمُرْسَلُونَ
भेजे हुए (फरिश्ते)
फिर जब ये दूत लूत के यहाँ पहुँचे,
तफ़्सीर:
फिर जब अल्लाह के भेजे हुए फ़रिश्ते पुरुषों की शक्ल में लूत के घर वालों के पास आए।
आयत 62
قَالَ إِنَّكُمْ قَوْمٌۭ مُّنكَرُونَ
قَالَ
उसने कहा
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
قَوْمٌۭ
एक क़ौम हो
مُّنكَرُونَ
अजनबी
तो उसने कहा, "तुम तो अपरिचित लोग हो।"
तफ़्सीर:
लूत अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा : तुम अनजान लोग हो।
आयत 63
قَالُوا۟ بَلْ جِئْنَـٰكَ بِمَا كَانُوا۟ فِيهِ يَمْتَرُونَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
بَلْ
बल्कि
جِئْنَـٰكَ
लाए हैं हम तेरे पास
بِمَا
वो जो
كَانُوا۟
थे वो
فِيهِ
जिसमें
يَمْتَرُونَ
वो शक करते
उन्होंने कहा, "नहीं, बल्कि हम तो तुम्हारे पास वही चीज़ लेकर आए है, जिसके विषय में वे सन्देह कर रहे थे
तफ़्सीर:
संदेशवाहक फ़रिश्तों ने लूत अलैहिस्सलाम से कहा : डरिए मत। बल्कि - ऐ लूत! - हम आपके पास वह यातना लेकर आए हैं, जिसके बारे में आपकी जाति के लोग संदेह किया करते थे, जो उनका विनाश करने वाली है।
आयत 64
وَأَتَيْنَـٰكَ بِٱلْحَقِّ وَإِنَّا لَصَـٰدِقُونَ
وَأَتَيْنَـٰكَ
और लाए हैं हम तेरे पास
بِٱلْحَقِّ
हक़ को
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَصَـٰدِقُونَ
अलबत्ता सच्चे हैं
और हम तुम्हारे पास यक़ीनी चीज़ लेकर आए है, और हम बिलकुल सच कह रहे है
तफ़्सीर:
हम आपके पास वह सच्चाई लेकर आए हैं जिसमें कोई मज़ाक़ नहीं है, और हमने आपको जो कुछ बताया है उसमें हम बिल्कुल सच्चे हैं।
आयत 65
فَأَسْرِ بِأَهْلِكَ بِقِطْعٍۢ مِّنَ ٱلَّيْلِ وَٱتَّبِعْ أَدْبَـٰرَهُمْ وَلَا يَلْتَفِتْ مِنكُمْ أَحَدٌۭ وَٱمْضُوا۟ حَيْثُ تُؤْمَرُونَ
فَأَسْرِ
पस ले चलो
بِأَهْلِكَ
अपने घर वालों को
بِقِطْعٍۢ
एक हिस्से में
مِّنَ
of
ٱلَّيْلِ
रात के
وَٱتَّبِعْ
और चलते चलो
أَدْبَـٰرَهُمْ
पीछे उनके
وَلَا
और ना
يَلْتَفِتْ
पीछे मुड़कर देखे
مِنكُمْ
तुम में से
أَحَدٌۭ
कोई एक भी
وَٱمْضُوا۟
और चलते जाओ
حَيْثُ
जहाँ का
تُؤْمَرُونَ
तुम हुक्म दिए जाते हो
अतएव अब तुम अपने घरवालों को लेकर रात्रि के किसी हिस्से में निकल जाओ, और स्वयं उन सबके पीछे-पीछे चलो। और तुममें से कोई भी पीछे मुड़कर न देखे। बस चले जाओ, जिधर का तुम्हे आदेश है।"
तफ़्सीर:
इसलिए रात के एक हिस्से के बीत जाने के बाद अपने परिवार के साथ चल पड़ें। तथा आप स्वयं उनके पीछे-पीछे चलें। और आप लोगों में से कोई भी पीछे मुड़कर न देखे कि उनके साथ क्या हुआ। और अल्लाह ने आप लोगों को जहाँ जाने का आदेश दिया है, वहाँ चलते जाओ।
आयत 66
وَقَضَيْنَآ إِلَيْهِ ذَٰلِكَ ٱلْأَمْرَ أَنَّ دَابِرَ هَـٰٓؤُلَآءِ مَقْطُوعٌۭ مُّصْبِحِينَ
وَقَضَيْنَآ
और फ़ैसला पहुँचा दिया हमने
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
ذَٰلِكَ
उस
ٱلْأَمْرَ
मामले का
أَنَّ
बेशक
دَابِرَ
जड़
هَـٰٓؤُلَآءِ
उन लोगों की
مَقْطُوعٌۭ
काटदी जाएगी
مُّصْبِحِينَ
जबकि वो सुबह करने वाले होंगे
हमने उसे अपना यह फ़ैसला पहुँचा दिया कि प्रातः होते-होते उनकी जड़ कट चुकी होगी
तफ़्सीर:
और हमने लूत अलैहिस्सलाम को वह़्य (प्रकाशना) द्वारा उस मामले से सूचित कर दिया जिसका हमने निर्णय किया था कि सुबह होते ही इनके अंतिम व्यक्ति तक को विनष्ट करके इनका उन्मूलन कर दिया जाएगा।
आयत 67
وَجَآءَ أَهْلُ ٱلْمَدِينَةِ يَسْتَبْشِرُونَ
وَجَآءَ
और आगए
أَهْلُ
(the) people
ٱلْمَدِينَةِ
शहर वाले
يَسْتَبْشِرُونَ
ख़ुशियाँ मनाते हुए
इतने में नगर के लोग ख़ुश-ख़ुश आ पहुँचे
तफ़्सीर:
और सदूम वाले, दुष्कर्म करने की लालच में, लूत अलैहिस्सलाम के अतिथियों पर बहुत खुश होकर आए।
आयत 68
قَالَ إِنَّ هَـٰٓؤُلَآءِ ضَيْفِى فَلَا تَفْضَحُونِ
قَالَ
कह (लूत ने)
إِنَّ
बेशक
هَـٰٓؤُلَآءِ
ये लोग
ضَيْفِى
मेहमान हैं मेरे
فَلَا
पस ना
تَفْضَحُونِ
तुम रुस्वा करो मुझे
उसने कहा, "ये मेरे अतिथि है। मेरी फ़ज़ीहत मत करना,
तफ़्सीर:
लूत अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा : ये लोग मेरे अतिथि हैं। अतः मुझे उस चीज़ के द्वारा अपमानित न करो जो तुम उनके साथ करना चाहते हो।
आयत 69
وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَلَا تُخْزُونِ
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَلَا
और ना
تُخْزُونِ
तुम ज़लील करो मुझे
अल्लाह का डर ऱखो, मुझे रुसवा न करो।"
तफ़्सीर:
इस अश्लीलता को छोड़कर अल्लाह से डरो और अपने इस जघन्य कार्य से मुझे अपमानित न करो।
आयत 70
قَالُوٓا۟ أَوَلَمْ نَنْهَكَ عَنِ ٱلْعَـٰلَمِينَ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
نَنْهَكَ
हमने रोका था तुझे
عَنِ
from
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों से
उन्होंने कहा, "क्या हमने तुम्हें दुनिया भर के लोगों का ज़िम्मा लेने से रोका नहीं था?"
तफ़्सीर:
उनकी जाति ने उनसे कहा : क्या हमने आपको किसी भी व्यक्ति को अतिथि बनाने से मना नहीं किया?
आज की ज़िंदगी में सबक़
लूत अलैहिस्सलाम की कौम पर आए अज़ाब का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि बेहयाई फैलाने वाले समाज का अंजाम इबरतनाक होता है।
आयत 71
قَالَ هَـٰٓؤُلَآءِ بَنَاتِىٓ إِن كُنتُمْ فَـٰعِلِينَ
قَالَ
उसने कहा
هَـٰٓؤُلَآءِ
ये
بَنَاتِىٓ
बेटियाँ हैं मेरी
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
فَـٰعِلِينَ
करने वाले
उसने कहा, "तुमको यदि कुछ करना है, तो ये मेरी (क़ौम की) बेटियाँ (विधितः विवाह के लिए) मौजूद है।"
तफ़्सीर:
लूत अलैहिस्सलाम ने अपने अतिथियों के सामने अपने लिए उज़्र प्रस्तुत करते हुए अपनी जाति के लोगों से कहा : ये तुम्हारी कुल स्त्रियों में से मेरी बेटियाँ हैं। अतः यदि तुम अपनी कामवासना की पूर्ति चाहते हो, तो इनसे शादी कर लो।
आयत 72
لَعَمْرُكَ إِنَّهُمْ لَفِى سَكْرَتِهِمْ يَعْمَهُونَ
لَعَمْرُكَ
आपकी ज़िन्दगी की क़सम
إِنَّهُمْ
बेशक वो
لَفِى
were in
سَكْرَتِهِمْ
अलबत्ता अपने नशे में
يَعْمَهُونَ
वो बहक रहे थे
तुम्हारे जीवन की सौगन्ध, वे अपनी मस्ती में खोए हुए थे,
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आपके जीवन की क़सम, निःसंदेह लूत अलैहिस्सलाम की जाति के लोग अपनी कामवासना की प्रबलता में भटक रहे थे।
आयत 73
فَأَخَذَتْهُمُ ٱلصَّيْحَةُ مُشْرِقِينَ
فَأَخَذَتْهُمُ
तो पकड़ लिया उन्हें
ٱلصَّيْحَةُ
एक चिंघाड़ ने
مُشْرِقِينَ
सुरज तुलू होते वक़्त
अन्ततः पौ फटते-फटते एक भयंकर आवाज़ ने उन्हें आ लिया,
तफ़्सीर:
अंततः उनके सूरज निकलने के समय में प्रवेश करते ही उन्हें एक तेज़ विनाशकारी आवाज़ ने पकड़ लिया।
आयत 74
فَجَعَلْنَا عَـٰلِيَهَا سَافِلَهَا وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِمْ حِجَارَةًۭ مِّن سِجِّيلٍ
فَجَعَلْنَا
तो करदिया हमने
عَـٰلِيَهَا
ऊपर वाला उसका
سَافِلَهَا
निचला उसका
وَأَمْطَرْنَا
और बरसाए हमने
عَلَيْهِمْ
उन पर
حِجَارَةًۭ
पत्थर
مِّن
of
سِجِّيلٍ
पकी हुई मिट्टी के
और हमने उस बस्ती को तलपट कर दिया, और उनपर कंकरीले पत्थर बरसाए
तफ़्सीर:
तो हमने उनकी बस्तियों को ऊपर-नीचे पलट दिया और उनपर कंकड़ के पत्थर बरसाए।
आयत 75
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّلْمُتَوَسِّمِينَ
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
उसमें
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
لِّلْمُتَوَسِّمِينَ
गहरी नज़र से देखने वालों के लिए
निश्चय ही इसमें भापनेवालों के लिए निशानियाँ है
तफ़्सीर:
लूत अलैहिस्सलाम की जाति पर उतरने वाले विनाश की घटना में, सोच-विचार करने वालों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं।
आयत 76
وَإِنَّهَا لَبِسَبِيلٍۢ مُّقِيمٍ
وَإِنَّهَا
और बेशक वो
لَبِسَبِيلٍۢ
अलबत्ता एसे रास्ते पर है
مُّقِيمٍ
जो क़ायम है
और वह (बस्ती) सार्वजनिक मार्ग पर है
तफ़्सीर:
लूत अलैहिस्सलाम की जाति की बस्तियाँ एक स्थायी रास्ते (सार्वजनिक मार्ग) पर स्थित हैं, वहाँ से गुज़रने वाले यात्री उन्हें देख सकते हैं।
आयत 77
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ لِّلْمُؤْمِنِينَ
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
उसमें
لَـَٔايَةًۭ
अलबत्ता एक निशानी है
لِّلْمُؤْمِنِينَ
ईमान वालों के लिए
निश्चय ही इसमें मोमिनों के लिए एक बड़ी निशानी है
तफ़्सीर:
यह जो कुछ घटित हुआ, इसमें ईमान वालों के लिए एक निशानी है, जिससे वे सीख ले सकते हैं।
आयत 78
وَإِن كَانَ أَصْحَـٰبُ ٱلْأَيْكَةِ لَظَـٰلِمِينَ
وَإِن
और बेशक
كَانَ
थे
أَصْحَـٰبُ
(the) companions
ٱلْأَيْكَةِ
ऐका/जंगल वाले
لَظَـٰلِمِينَ
अलबत्ता ज़ालिम
और निश्चय ही ऐसा वाले भी अत्याचारी थे,
तफ़्सीर:
घने पेड़ों वाली बस्ती वाले, शुऐब अलैहिस्सलाम की जाति के लोग भी अत्याचारी थे। क्योंकि उन्होंने अल्लाह का इनकार किया था और उसके रसूल शुऐब अलैहिस्सलाम को झुठलाया था।
आयत 79
فَٱنتَقَمْنَا مِنْهُمْ وَإِنَّهُمَا لَبِإِمَامٍۢ مُّبِينٍۢ
فَٱنتَقَمْنَا
तो इन्तिक़ाम लिया हमने
مِنْهُمْ
उनसे
وَإِنَّهُمَا
और बेशक वो दोनों हैं
لَبِإِمَامٍۢ
अलबत्ता रास्ते पर
مُّبِينٍۢ
वाज़ेह
फिर हमने उनसे भी बदला लिया, और ये दोनों (भू-भाग) खुले मार्ग पर स्थित है
तफ़्सीर:
तो हमने उनसे प्रतिशोध (बदला) लिया। चुनाँचे उन्हें यातना ने पकड़ लिया। और लूत अलैहिस्सलाम की जाति की बस्तियाँ और शुऐब अलैहिस्सलाम के मानने वालों के घर ऐसे मार्ग पर स्थित हैं जो वहाँ से गुज़रने वाले के लिए बिल्कुल स्पष्ट है।
आयत 80
وَلَقَدْ كَذَّبَ أَصْحَـٰبُ ٱلْحِجْرِ ٱلْمُرْسَلِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
كَذَّبَ
झुठलाया
أَصْحَـٰبُ
(the) companions
ٱلْحِجْرِ
हिज्र वालों ने
ٱلْمُرْسَلِينَ
रसूलों को
हिज्रवाले भी रसूलों को झुठला चुके है
तफ़्सीर:
और समूद की जाति अर्थात् ह़िज्र (हिजाज़ और शाम के बीच एक स्थान) के रहने वालों ने अपने नबी सालेह अलैहिस्सलाम को झुठलाकर सभी रसूलों को झुठलाया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
ऐका और हिज्र वालों के अंजाम का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि पिछली निशानियों से इबरत न लेने वाली कौमें बार-बार तबाह हुईं, हमें उनसे सबक लेना चाहिए।
आयत 81
وَءَاتَيْنَـٰهُمْ ءَايَـٰتِنَا فَكَانُوا۟ عَنْهَا مُعْرِضِينَ
وَءَاتَيْنَـٰهُمْ
और दीं हमने इन्हें
ءَايَـٰتِنَا
अपनी निशानियाँ
فَكَانُوا۟
तो थे वो
عَنْهَا
उनसे
مُعْرِضِينَ
ऐराज़ करने वाले
हमने तो उन्हें अपनी निशानियाँ प्रदान की थी, परन्तु वे उनकी उपेक्षा ही करते रहे
तफ़्सीर:
और हमने उन्हें उनके सच्चे नबी होने के प्रमाण और निशानियाँ दी थीं, जिनमें से एक निशानी ऊँटनी थी। परंतु उन्होंने उन प्रमाणों से सीख नहीं लिया और उनकी कोई परवाह नहीं की।
आयत 82
وَكَانُوا۟ يَنْحِتُونَ مِنَ ٱلْجِبَالِ بُيُوتًا ءَامِنِينَ
وَكَانُوا۟
और थे वो
يَنْحِتُونَ
वो तराशते
مِنَ
from
ٱلْجِبَالِ
पहाड़ों से
بُيُوتًا
घरों को
ءَامِنِينَ
अमन से रहने वाले
वे बड़ी बेफ़िक्री से पहाड़ो को काट-काटकर घर बनाते थे
तफ़्सीर:
वे पहाड़ों को काटते थे ताकि अपने लिए घर बनाकर उनमें भयमुक्त होकर निवास करें।
आयत 83
فَأَخَذَتْهُمُ ٱلصَّيْحَةُ مُصْبِحِينَ
فَأَخَذَتْهُمُ
तो पकड़ लिया उन्हें
ٱلصَّيْحَةُ
चिंघाड़ ने
مُصْبِحِينَ
जबकि वो सुबह करने वाले थे
अन्ततः एक भयानक आवाज़ ने प्रातः होते- होते उन्हें आ लिया
तफ़्सीर:
अंततः उनके सुबह के समय में प्रवेश करते ही, उन्हें यातना के चीत्कार ने पकड़ लिया।
आयत 84
فَمَآ أَغْنَىٰ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ
فَمَآ
तो ना
أَغْنَىٰ
काम आया
عَنْهُم
उन्हें
مَّا
जो कुछ
كَانُوا۟
थे वो
يَكْسِبُونَ
वो कमाई करते
फिर जो कुछ वे कमाते रहे, वह उनके कुछ काम न आ सका
तफ़्सीर:
परंतु उनके कमाए हुए धन और उनके घर उनसे अल्लाह की यातना को टाल न सके।
आयत 85
وَمَا خَلَقْنَا ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَآ إِلَّا بِٱلْحَقِّ ۗ وَإِنَّ ٱلسَّاعَةَ لَـَٔاتِيَةٌۭ ۖ فَٱصْفَحِ ٱلصَّفْحَ ٱلْجَمِيلَ
وَمَا
और नहीं
خَلَقْنَا
पैदा किया हमने
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
وَمَا
और जो
بَيْنَهُمَآ
दर्मियान है इन दोनों के
إِلَّا
मगर
بِٱلْحَقِّ ۗ
साथ हक़ के
وَإِنَّ
और बेशक
ٱلسَّاعَةَ
क़यामत
لَـَٔاتِيَةٌۭ ۖ
ज़रूर आनेवाली है
فَٱصْفَحِ
पस दरगुज़र कीजिए
ٱلصَّفْحَ
दरगुज़र करना
ٱلْجَمِيلَ
ख़ूबसूरती से
हमने तो आकाशों और धरती को और जो कुछ उनके मध्य है, सोद्देश्य पैदा किया है, और वह क़ियामत की घड़ी तो अनिवार्यतः आनेवाली है। अतः तुम भली प्रकार दरगुज़र (क्षमा) से काम लो
तफ़्सीर:
हमने आसमानों और ज़मीन और उनके बीच की समस्त चीज़ों को बिना हिकमत के व्यर्थ (निरुद्देश्य) पैदा नहीं किया है। हमने यह सब सत्य के साथ पैदा किया है और निःसंदेह क़ियामत अवश्य आने वाली है। अतः (ऐ रसूल!) आप झुठलाने वालों को नज़रअंदाज़ कर दें और उन्हें भले तौर पर क्षमा कर दें।
आयत 86
إِنَّ رَبَّكَ هُوَ ٱلْخَلَّـٰقُ ٱلْعَلِيمُ
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
هُوَ
वो ही है
ٱلْخَلَّـٰقُ
ख़ूब पैदा करने वाला
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब जानने वाला
निश्चय ही तुम्हारा रब ही बड़ा पैदा करनेवाला, सब कुछ जाननेवाला है
तफ़्सीर:
निःसंदेह (ऐ रसूल!) आपका पालनहार ही हर चीज़ को पैदा करने वाला और उसका ज्ञान रखने वाला है।
आयत 87
وَلَقَدْ ءَاتَيْنَـٰكَ سَبْعًۭا مِّنَ ٱلْمَثَانِى وَٱلْقُرْءَانَ ٱلْعَظِيمَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
ءَاتَيْنَـٰكَ
दीं हमने आपको
سَبْعًۭا
सात
مِّنَ
of
ٱلْمَثَانِى
दोहराई जाने वाली (आयात)
وَٱلْقُرْءَانَ
और क़ुरआने
ٱلْعَظِيمَ
अज़ीम
हमने तुम्हें सात 'मसानी' का समूह यानी महान क़ुरआन दिया-
तफ़्सीर:
और हमने आपको सूरतुल-फ़ातिहा प्रदान की, जो सात आयतें हैं और वही महान क़ुरआन है।
आयत 88
لَا تَمُدَّنَّ عَيْنَيْكَ إِلَىٰ مَا مَتَّعْنَا بِهِۦٓ أَزْوَٰجًۭا مِّنْهُمْ وَلَا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ وَٱخْفِضْ جَنَاحَكَ لِلْمُؤْمِنِينَ
لَا
(Do) not
تَمُدَّنَّ
गरगिज़ ना आप दराज़ कीजिए
عَيْنَيْكَ
अपनी दोनो आँखें
إِلَىٰ
towards
مَا
तरफ़ उसके जो
مَتَّعْنَا
फ़ायदा दिया हमने
بِهِۦٓ
साथ जिसके
أَزْوَٰجًۭا
मुख़्तलिफ़ लोगों को
مِّنْهُمْ
उनमें से
وَلَا
और ना
تَحْزَنْ
आप ग़म कीजिए
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَٱخْفِضْ
और झुका लीजिए
جَنَاحَكَ
बाज़ू अपना
لِلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों के लिए
जो कुछ सुख-सामग्री हमने उनमें से विभिन्न प्रकार के लोगों को दी है, तुम उसपर अपनी आँखें न पसारो और न उनपर दुखी हो, तुम तो अपनी भुजाएँ मोमिनों के लिए झुकाए रखो,
तफ़्सीर:
हमने काफ़िरों के विभिन्न प्रकार के लोगों को, नष्ट हो जाने वाली जीवन की जो सामग्रियाँ दे रखी हैं, आप उनकी ओर न देखें और उनके झुठलाने पर दुखी न हों और मोमिनों के प्रति विनम्रता अपनाएँ।
आयत 89
وَقُلْ إِنِّىٓ أَنَا ٱلنَّذِيرُ ٱلْمُبِينُ
وَقُلْ
और कह दीजिए
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَنَا
मैं तो
ٱلنَّذِيرُ
डराने वाला हूँ
ٱلْمُبِينُ
खुल्लम-खुल्ला
और कह दो, "मैं तो साफ़-साफ़ चेतावनी देनेवाला हूँ।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दें कि मैं यातना से खुले तौर पर सावधान करने वाला हूँ।
आयत 90
كَمَآ أَنزَلْنَا عَلَى ٱلْمُقْتَسِمِينَ
كَمَآ
जैसा कि
أَنزَلْنَا
नाज़िल किया हमने
عَلَى
on
ٱلْمُقْتَسِمِينَ
तक़सीम करने वालों पर
जिस प्रकार हमने हिस्सा-बख़रा करनेवालों पर उतारा था,
तफ़्सीर:
मैं तुम्हें इस बात से डराता हूँ कि तुमपर उसी तरह की यातना आए, जिस तरह की यातना अल्लाह ने उन लोगो पर अवतिरत की थी, जिन्होंने अल्लाह की किताबों को विभिन्न भागों में बाँट दिया था। चुनाँचे वे कुछ भागों पर ईमान रखते थे और कुछ भागों का इनकार करते थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन को सात मशहूर आयतों (सूरह फातिहा) की नेमत बताई गई है। यह हमें सिखाता है कि कुरआन की तालीम पर पूरा यकीन रखते हुए उसे चुनिंदा हिस्सा मानने से बचना चाहिए।
आयत 91
ٱلَّذِينَ جَعَلُوا۟ ٱلْقُرْءَانَ عِضِينَ
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
جَعَلُوا۟
कर दिया
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरआन को
عِضِينَ
टुकड़े-टुकड़े
जिन्होंने (अपने) क़ुरआन को टुकड़े-टुकड़े कर डाला
तफ़्सीर:
जिन्होंने क़ुरआन को खंड-खंड कर डाला। चुनाँचे उन्होंने कहा : यह जादू है, या कहानत (ज्योतिष) है, या शे'र (काव्य) है।
आयत 92
فَوَرَبِّكَ لَنَسْـَٔلَنَّهُمْ أَجْمَعِينَ
فَوَرَبِّكَ
पस क़सम है आपके रब की
لَنَسْـَٔلَنَّهُمْ
अलबत्ता हम ज़रूर सवाल करेंगे उनसे
أَجْمَعِينَ
सबके सबसे
अब तुम्हारे रब की क़सम! हम अवश्य ही उन सबसे उसके विषय में पूछेंगे
तफ़्सीर:
अतः (ऐ रसूल!) आपके पालनहार की क़सम! हम क़ियामत के दिन उन सभी लोगों से अवश्य पूछेंगे, जिन्होंने क़ुरआन को खंड-खंड बना लिया।
आयत 93
عَمَّا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
عَمَّا
उस चीज़ के बारे में जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
जो कुछ वे करते रहे।
तफ़्सीर:
हम उनसे कुफ़्र और गुनाहों के बारे में अवश्य पूछेंगे, जो वे दुनिया में किया करते थे।
आयत 94
فَٱصْدَعْ بِمَا تُؤْمَرُ وَأَعْرِضْ عَنِ ٱلْمُشْرِكِينَ
فَٱصْدَعْ
पस आप खुल्लम-खुल्ला सुना दीजिए
بِمَا
जिसका
تُؤْمَرُ
आप हुक्म दिए जाते हो
وَأَعْرِضْ
और ऐराज़ कीजिए
عَنِ
from
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकों से
अतः तु्म्हें जिस चीज़ का आदेश हुआ है, उसे हाँक-पुकारकर बयान कर दो, और मुशरिको की ओर ध्यान न दो
तफ़्सीर:
अतः (ऐ रसूल!) अल्लाह ने आपको जिसकी ओर लोगों को बुलाने का आदेश दिया है, उसकी घोषणा कर दें और मुश्रिक लोग जो कुछ कहते और करते हैं, उस पर ध्यान न दें।
आयत 95
إِنَّا كَفَيْنَـٰكَ ٱلْمُسْتَهْزِءِينَ
إِنَّا
बेशक हम
كَفَيْنَـٰكَ
काफ़ी हैं हम आपको
ٱلْمُسْتَهْزِءِينَ
मज़ाक़ उड़ाने वालों से
उपहास करनेवालों के लिए हम तुम्हारी ओर से काफ़ी है
तफ़्सीर:
आप उनसे न डरें। क्योंकि हम क़ुरैश के मज़ाक़ उड़ाने वाले कुफ़्र के प्रमुखों की चालों को नाकाम बनाने के लिए आपकी ओर से काफ़ी हैं।
आयत 96
ٱلَّذِينَ يَجْعَلُونَ مَعَ ٱللَّهِ إِلَـٰهًا ءَاخَرَ ۚ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يَجْعَلُونَ
बना लेते हैं
مَعَ
साथ
ٱللَّهِ
अल्लाह के
إِلَـٰهًا
इलाह
ءَاخَرَ ۚ
दूसरा
فَسَوْفَ
पस अनक़रीब
يَعْلَمُونَ
वो जान लेंगे
जो अल्लाह के साथ दूसरों को पूज्य-प्रभु ठहराते है, तो शीघ्र ही उन्हें मालूम हो जाएगा!
तफ़्सीर:
जो अल्लाह के साथ अन्य पूज्य बनाते हैं। अतः वे अपने शिर्क का बुरा परिणाम जान लेंगे।
आयत 97
وَلَقَدْ نَعْلَمُ أَنَّكَ يَضِيقُ صَدْرُكَ بِمَا يَقُولُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
نَعْلَمُ
हम जानते हैं
أَنَّكَ
कि बेशक आप
يَضِيقُ
तंग होता है
صَدْرُكَ
सीना आपका
بِمَا
बवजह उसके जो
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
हम जानते है कि वे जो कुछ कहते है, उससे तुम्हारा दिल तंग होता है
तफ़्सीर:
और निश्चय हम जानते हैं कि (ऐ रसूल!) उनके आपको झुठलाने और आपका मज़ाक़ उड़ाने के कारण आपका सीना तंग होता है।
आयत 98
فَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ وَكُن مِّنَ ٱلسَّـٰجِدِينَ
فَسَبِّحْ
पस तस्बीह कीजिए
بِحَمْدِ
साथ हम्द के
رَبِّكَ
अपने रब की
وَكُن
और हो जाइए
مِّنَ
of
ٱلسَّـٰجِدِينَ
सजदा करने वालों में से
तो तुम अपने रब का गुणगान करो और सजदा करनेवालों में सम्मिलित रहो
तफ़्सीर:
अतः आप अल्लाह को उन चीज़ों से पाक करके जो उसके योग्य नहीं हैं, तथा उसके पूर्णता के गुणों के साथ उसकी प्रशंसा करते हुए अल्लाह का आश्रय लें, तथा अल्लाह की उपासना करने वालों, उसके लिए नमाज़ पढ़ने वालों में से हो जाएँ। क्योंकि इसमें आपके दिल की तंगी का इलाज है।
आयत 99
وَٱعْبُدْ رَبَّكَ حَتَّىٰ يَأْتِيَكَ ٱلْيَقِينُ
وَٱعْبُدْ
और इबादत कीजिए
رَبَّكَ
अपने रब की
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَأْتِيَكَ
आजाए आपके पास
ٱلْيَقِينُ
यक़ीन (मौत)
और अपने रब की बन्दगी में लगे रहो, यहाँ तक कि जो यक़ीनी है, वह तुम्हारे सामने आ जाए
तफ़्सीर:
तथा जब तक आप जीवित हैं, अपने रब की इबादत करना जारी रखें और उसपर क़ायम रहें, यहाँ तक कि इसी अवस्था में आपके पास मौत आ जाए।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सब्र और इबादत की ताकीद के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि मज़ाक उड़ाने वालों के मुकाबले में सब्र, तस्बीह और मौत तक इबादत जारी रखना चाहिए।
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