नाम का मतलब
शहद की मक्खी (जिसे अल्लाह ने वही (इशारा) से शहद बनाने की सलाहियत दी)
पृष्ठभूमि
सूरह अन-नहल में अल्लाह की बेशुमार नेमतों जैसे बारिश, जानवर, शहद की मक्खी वगैरह का ज़िक्र है, जो उसकी कुदरत और रहमत को ज़ाहिर करती हैं। इसे सूरतुन-निअम (नेमतों की सूरह) भी कहा जाता है।
फ़ज़ीलत / सार
इस सूरह को नेमतों की सूरह कहा जाता है क्योंकि इसमें अल्लाह की बेशुमार नेमतों का तफ्सीली ज़िक्र है, जो शुक्रगुज़ारी का जज़्बा पैदा करती है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ أَتَىٰٓ أَمْرُ ٱللَّهِ فَلَا تَسْتَعْجِلُوهُ ۚ سُبْحَـٰنَهُۥ وَتَعَـٰلَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ
أَتَىٰٓ
आ पहुँचा
أَمْرُ
हुक्म
ٱللَّهِ
अल्लाह का
فَلَا
पस ना
تَسْتَعْجِلُوهُ ۚ
तुम जल्दी माँगो उसे
سُبْحَـٰنَهُۥ
पाक है वो
وَتَعَـٰلَىٰ
और बुलन्द तर है
عَمَّا
उससे जो
يُشْرِكُونَ
वो शरीक ठहराते हैं
आ गया आदेश अल्लाह का, तो अब उसके लिए जल्दी न मचाओ। वह महान और उच्च है उस शिर्क से जो व कर रहे है
तफ़्सीर:
(ऐ काफ़िरो!) अल्लाह ने तुम्हें यातना देने का जो निर्णय किया है, उसका समय निकट आ गया। अतः समय से पहले उसके जल्द आने की माँग न करो। अल्लाह सर्वशक्तिमान मुश्रिकों के उसके लिए साझी ठहराने से पवित्र और सर्वोच्च है।
आयत 2
يُنَزِّلُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ بِٱلرُّوحِ مِنْ أَمْرِهِۦ عَلَىٰ مَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦٓ أَنْ أَنذِرُوٓا۟ أَنَّهُۥ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّآ أَنَا۠ فَٱتَّقُونِ
يُنَزِّلُ
वो उतारता है
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ
फ़रिश्तों को
بِٱلرُّوحِ
साथ वही के
مِنْ
of
أَمْرِهِۦ
अपने हुक्म से
عَلَىٰ
upon
مَن
जिस पर
يَشَآءُ
वो चाहता है
مِنْ
of
عِبَادِهِۦٓ
अपने बन्दों में से
أَنْ
कि
أَنذِرُوٓا۟
तुम डराओ (लोगों को)
أَنَّهُۥ
कि बेशक वो
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّآ
मगर
أَنَا۠
मैं ही
فَٱتَّقُونِ
पस डरो मुझसे
वह फ़रिश्तों को अपने हुक्म की रूह (वह्यल) के साथ अपने जिस बन्दे पर चाहता है उतारता है कि "सचेत कर दो, मेरे सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं। अतः तुम मेरा ही डर रखो।"
तफ़्सीर:
अल्लाह फ़रिश्तों को वह़्य के साथ, अपने आदेश से, अपने रसूलों में से जिस पर चाहता है, उतारता है कि (ऐ रसूलो!) लोगों को अल्लाह का साझी बनाने से डराओ। क्योंकि मेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। अतः (ऐ लोगो!) मेरे आदेशों का पालन करके और मेरी मना की हुई बातों से बचकर मुझसे डरो।
आयत 3
خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ بِٱلْحَقِّ ۚ تَعَـٰلَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ
خَلَقَ
उसने पैदा किया
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
بِٱلْحَقِّ ۚ
साथ हक़ के
تَعَـٰلَىٰ
बुलन्द तर है
عَمَّا
उससे जो
يُشْرِكُونَ
वो शरीक ठहराते हैं
उसने आकाशों और धरती को सोद्देश्य पैदा किया। वह अत्यन्त उच्च है उस शिर्क से जो वे कर रहे है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने आकाशों तथा धरती को किसी पिछले नमूने के बिना सत्य के साथ पैदा किया। अतः उसने उन्हें व्यर्थ नहीं बनाया, बल्कि उन्हें इसलिए बनाया, ताकि उनसे उसकी महानता का प्रमाण ग्रहण किया जाए। वह लोगों के उसके साथ दूसरों को साझी बनाने से पवित्र है।
आयत 4
خَلَقَ ٱلْإِنسَـٰنَ مِن نُّطْفَةٍۢ فَإِذَا هُوَ خَصِيمٌۭ مُّبِينٌۭ
خَلَقَ
उसने पैदा किया
ٱلْإِنسَـٰنَ
इन्सान को
مِن
from
نُّطْفَةٍۢ
एक नुत्फ़े से
فَإِذَا
फिर अचानक
هُوَ
वो
خَصِيمٌۭ
झगड़ालू है
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
उसने मनुष्यों को एक बूँद से पैदा किया। फिर क्या देखते है कि वह खुला झगड़नेवाला बन गया!
तफ़्सीर:
उसने मनुष्य को एक तुच्छ वीर्य की बूँद से पैदा किया। फिर वह एक अवस्था (रचना) के बाद दूसरी अवस्था (रचना) में स्थानांतिरत होकर बढ़ता गया। फिर देखते-देखते वह सत्य को मिटाने के लिए असत्य के साथ खुल्लम-खुल्ला झगड़ने वाला बन गया।
आयत 5
وَٱلْأَنْعَـٰمَ خَلَقَهَا ۗ لَكُمْ فِيهَا دِفْءٌۭ وَمَنَـٰفِعُ وَمِنْهَا تَأْكُلُونَ
وَٱلْأَنْعَـٰمَ
और चौपाए
خَلَقَهَا ۗ
उसने पैदा किया उन्हें
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
فِيهَا
उनमें
دِفْءٌۭ
गरमी का सामान है
وَمَنَـٰفِعُ
और कई फ़ायदे हैं
وَمِنْهَا
और उनमें से
تَأْكُلُونَ
तुम खाते हो
रहे पशु, उन्हें भी उसी ने पैदा किया, जिसमें तुम्हारे लिए ऊष्मा प्राप्त करने का सामान भी है और हैं अन्य कितने ही लाभ। उनमें से कुछ को तुम खाते भी हो
तफ़्सीर:
(ऐ लोगो!) उसने ऊँट, गाय और बकरी आदि चौपायों को तुम्हारे हितों के लिए पैदा किए हैं। इन हितों में से एक उनके ऊनों और बालों से गर्मी प्राप्त करना है, तथा अन्य हित उनके दूध, उनकी खालों और उनकी पीठ पर सवारी करने में हैं और उनमें से कुछ तुम्हारे खाने के काम आते हैं।
आयत 6
وَلَكُمْ فِيهَا جَمَالٌ حِينَ تُرِيحُونَ وَحِينَ تَسْرَحُونَ
وَلَكُمْ
और तुम्हारे लिए
فِيهَا
उनमें
جَمَالٌ
ख़ूब सूरती है
حِينَ
जिस वक़्त
تُرِيحُونَ
तुम शाम को चरा कर लाते हो
وَحِينَ
और जिस वक़्त
تَسْرَحُونَ
तुम सुबह चराने जाते हो
उनमें तुम्हारे लिए सौन्दर्य भी है, जबकि तुम सायंकाल उन्हें लाते और जबकि तुम उन्हें चराने ले जाते हो
तफ़्सीर:
और चौपायों में तुम्हारे लिए शोभा व सुंदरता है, जब तुम उन्हें शाम को (चराकर घर) लाते हो और जब तुम उन्हें सुबह में चरागाह ले जाते हो।
आयत 7
وَتَحْمِلُ أَثْقَالَكُمْ إِلَىٰ بَلَدٍۢ لَّمْ تَكُونُوا۟ بَـٰلِغِيهِ إِلَّا بِشِقِّ ٱلْأَنفُسِ ۚ إِنَّ رَبَّكُمْ لَرَءُوفٌۭ رَّحِيمٌۭ
وَتَحْمِلُ
और वो उठा ले जाते हैं
أَثْقَالَكُمْ
बोझ तुम्हारे
إِلَىٰ
to
بَلَدٍۢ
तरफ़ उस शहर के
لَّمْ
ना
تَكُونُوا۟
थे तुम
بَـٰلِغِيهِ
पहुँचने वाले उस तक
إِلَّا
मगर
بِشِقِّ
साथ मशक़्क़त के
ٱلْأَنفُسِ ۚ
जानों की
إِنَّ
बेशक
رَبَّكُمْ
रब तुम्हारा
لَرَءُوفٌۭ
अलबत्ता बहुत शफ़क़त करने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
वे तुम्हारे बोझ ढोकर ऐसे भूभाग तक ले जाते हैं, जहाँ तुम जी-तोड़ परिश्रम के बिना नहीं पहुँच सकते थे। निस्संदेह तुम्हारा रब बड़ा ही करुणामय, दयावान है
तफ़्सीर:
और ये चौपाए जिन्हें हमने तुम्हारे लिए पैदा किया है, तुम्हारी यात्राओं में तुम्हारे भारी-भरकम सामान ऐसे नगरों तक उठाकर ले जाते हैं, जहाँ तुम बड़ा कष्ट उठाए बिना नहीं पहुँच सकते थे। निःसंदेह (ऐ लोगो!) तुम्हारा पालनहार तुम पर बड़ा मेहरबान और दयावान् है कि इन चौपायों को तुम्हारे वश में कर दिया है।
आयत 8
وَٱلْخَيْلَ وَٱلْبِغَالَ وَٱلْحَمِيرَ لِتَرْكَبُوهَا وَزِينَةًۭ ۚ وَيَخْلُقُ مَا لَا تَعْلَمُونَ
وَٱلْخَيْلَ
और घोड़े
وَٱلْبِغَالَ
और ख़च्चर
وَٱلْحَمِيرَ
और गधे
لِتَرْكَبُوهَا
ताकि तुम सवारी करो उन पर
وَزِينَةًۭ ۚ
और ज़ीनत भी हैं
وَيَخْلُقُ
और वो पैदा करेगा
مَا
जो
لَا
नहीं
تَعْلَمُونَ
तुम जानते
और घोड़े और खच्चर और गधे भी पैदा किए, ताकि तुम उनपर सवार हो और शोभा का कारण भी। और वह उसे भी पैदा करता है, जिसे तुम नहीं जानते
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने तुम्हारे लिए घोड़े, खच्चर और गधे पैदा किए, ताकि तुम उनकी सवारी करो, और उनपर अपना सामान लादो और ताकि वे लोगों के बीच तुम्हारी शोभा बनें। और वह ऐसी चीज़ें पैदा करता है, जो तुम नहीं जानते।
आयत 9
وَعَلَى ٱللَّهِ قَصْدُ ٱلسَّبِيلِ وَمِنْهَا جَآئِرٌۭ ۚ وَلَوْ شَآءَ لَهَدَىٰكُمْ أَجْمَعِينَ
وَعَلَى
And upon
ٱللَّهِ
और अल्लाह ही पर है
قَصْدُ
सीधा
ٱلسَّبِيلِ
रास्ता
وَمِنْهَا
और उनमें से कुछ
جَآئِرٌۭ ۚ
टेढ़े हैं
وَلَوْ
और अगर
شَآءَ
वो चाहता
لَهَدَىٰكُمْ
अलबत्ता हिदायत दे देता तुम्हें
أَجْمَعِينَ
सबके सबको
अल्लाह के लिए ज़रूरी है उचित एवं अनुकूल मार्ग दिखाना और कुछ मार्ग टेढ़े भी है। यदि वह चाहता तो तुम सबको अवश्य सीधा मार्ग दिखा देता
तफ़्सीर:
और अल्लाह ही के ज़िम्मे उसकी प्रसन्नता की ओर ले जाने वाले सीधे रास्ते को बयान करना है, जो कि इस्लाम है। जबकि कुछ रास्ते, सत्य से हटे हुए शैतान के रास्ते हैं। और इस्लाम के मार्ग के अलावा, हर रास्ता टेढ़ा है। यदि अल्लाह तुम सभी को ईमान की तौफ़ीक़ प्रदान करना चाहता, तो तुम सभी को इसकी तौफ़ीक़ दे देता।
आयत 10
هُوَ ٱلَّذِىٓ أَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ ۖ لَّكُم مِّنْهُ شَرَابٌۭ وَمِنْهُ شَجَرٌۭ فِيهِ تُسِيمُونَ
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِىٓ
जिसने
أَنزَلَ
उतारा
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مَآءًۭ ۖ
पानी
لَّكُم
तुम्हारे लिए
مِّنْهُ
उसमें से
شَرَابٌۭ
पीना है
وَمِنْهُ
और उसमें से
شَجَرٌۭ
दरख़्त है
فِيهِ
जिसमें
تُسِيمُونَ
तुम चराते हो
वही है जिसने आकाश से तुम्हारे लिए पानी उतारा, जिसे तुम पीते हो और उसी से पेड़ और वनस्पतियाँ भी उगती है, जिनमें तुम जानवरों को चराते हो
तफ़्सीर:
वही अल्लाह सर्वशक्तिमान है, जिसने तुम्हारे लिए बादल से कुछ पानी उतारा। उस पानी में से कुछ तुम्हारे लिए पेय है जिसे तुम खुद पीते और तुम्हारे जानवर (भी) पीते हैं, तथा उसी में से कुछ से पेड़-पौधे उगते हैं, जिनमें तुम अपने जानवरों को चराते हो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कायनात की तख्लीक और मवेशियों की नेमत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि रोज़मर्रा इस्तेमाल होने वाली चीज़ों (जैसे जानवर, पानी) में भी अल्लाह की नेमत को पहचानना चाहिए।
आयत 11
يُنۢبِتُ لَكُم بِهِ ٱلزَّرْعَ وَٱلزَّيْتُونَ وَٱلنَّخِيلَ وَٱلْأَعْنَـٰبَ وَمِن كُلِّ ٱلثَّمَرَٰتِ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ لِّقَوْمٍۢ يَتَفَكَّرُونَ
يُنۢبِتُ
वो उगाता है
لَكُم
तुम्हारे लिए
بِهِ
साथ उसके
ٱلزَّرْعَ
खेती
وَٱلزَّيْتُونَ
ज़ैतून
وَٱلنَّخِيلَ
और खजूर के दरख़्त
وَٱلْأَعْنَـٰبَ
और अंगूर
وَمِن
and of
كُلِّ
और हर क़िस्म में से
ٱلثَّمَرَٰتِ ۗ
फलों की
إِنَّ
यक़ीनन
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَةًۭ
अलबत्ता एक निशानी है
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَتَفَكَّرُونَ
जो ग़ौरो फ़िक्र करते हैं
और उसी से वह तुम्हारे लिए खेतियाँ उगाता है और ज़ैतून, खजूर, अंगूर और हर प्रकार के फल पैदा करता है। निश्चय ही सोच-विचार करनेवालों के लिए इसमें एक निशानी है
तफ़्सीर:
अल्लाह उसी पानी से तुम्हारे लिए खेतियाँ (फसलें) उगाता है, जिनसे तुम खाते हो, और उसी (पानी) से तुम्हारे लिए ज़ैतून, खजूर और अंगूर तथा सभी प्रकार के फल उगाता है। निःसंदेह उस पानी और उससे पैदा होने वाली चीज़ों में, उन लोगों के लिए अल्लाह के सामर्थ्य की निशानी है, जो अल्लाह की रचना पर सोच-विचार करते हैं और उससे अल्लाह महिमावान की महानता का पता चलाते हैं।
आयत 12
وَسَخَّرَ لَكُمُ ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ وَٱلشَّمْسَ وَٱلْقَمَرَ ۖ وَٱلنُّجُومُ مُسَخَّرَٰتٌۢ بِأَمْرِهِۦٓ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّقَوْمٍۢ يَعْقِلُونَ
وَسَخَّرَ
और उसने मुसख़्ख़र किया
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلَّيْلَ
रात
وَٱلنَّهَارَ
और दिन को
وَٱلشَّمْسَ
और सूरज
وَٱلْقَمَرَ ۖ
और चाँद को
وَٱلنُّجُومُ
और सितारे
مُسَخَّرَٰتٌۢ
मुसख़्ख़र किए गए हैं
بِأَمْرِهِۦٓ ۗ
उसके हुक्म से
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَعْقِلُونَ
जो अक़्ल रखते हैं
और उसने तुम्हारे लिए रात और दिन को और सूर्य और चन्द्रमा को कार्यरत कर रखा है। और तारे भी उसी की आज्ञा से कार्यरत है - निश्चय ही इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ है जो बुद्धि से काम लेते है-
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने रात को तुम्हारे लिए अधीन कर दिया है, ताकि उसमें चैन और आराम करो, और दिन को भी (अधीन कर दिया है), ताकि उसमें जीवन यापन के लिए कमाई करो। और सूर्य को तुम्हारे लिए अधीन कर दिया है और उसे रोशनी का भंडार बनाया है, और चाँद को भी अधीन कर दिया है और उसे चमकदार बनाया है। तथा तारे उसके आदेश से तुम्हारे लिए अधीन कर दिए गए हैं, जिनके द्वारा तुम जल और थल के अंधेरों में रास्ता पाते हो तथा समय की जानकारी करते हो। इन समस्त चीज़ों को वशीभूत करने में, उन लोगों के लिए अल्लाह की शक्ति की स्पष्ट निशानियाँ हैं, जो अपनी बुद्धि और विवेक से काम लेते हैं। चुनाँचे वही लोग उनकी हिकमत को समझते हैं।
आयत 13
وَمَا ذَرَأَ لَكُمْ فِى ٱلْأَرْضِ مُخْتَلِفًا أَلْوَٰنُهُۥٓ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ لِّقَوْمٍۢ يَذَّكَّرُونَ
وَمَا
और जो कुछ
ذَرَأَ
उसने फैला दिया
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
مُخْتَلِفًا
मुख़्तलिफ़ हैं
أَلْوَٰنُهُۥٓ ۗ
रंग उसके
إِنَّ
यक़ीनन
فِى
in
ذَٰلِكَ
उसमें
لَـَٔايَةًۭ
अलबत्ता एक निशानी है
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَذَّكَّرُونَ
जो नसीहत पकड़ते हैं
और धरती में तुम्हारे लिए जो रंग-बिरंग की चीज़े बिखेर रखी है, उसमें भी उन लोगों के लिए बड़ी निशानी है जो शिक्षा लेनेवाले है
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने धरती के अंदर अपनी पैदा की हुई विभिन्न रंगों की धातुओं, जानवरों, पेड़-पौधों और फ़सलों को भी तुम्हारी सेवा में लगा रखा है। निश्चय इस रचना और वशीकरण में उन लोगों के लिए अल्लाह की शक्ति का एक स्पष्ट संकेत है, जो उनसे सीख लेते हैं और इस बात को समझते हैं कि अल्लाह सक्षम और उपकार करने वाला है।
आयत 14
وَهُوَ ٱلَّذِى سَخَّرَ ٱلْبَحْرَ لِتَأْكُلُوا۟ مِنْهُ لَحْمًۭا طَرِيًّۭا وَتَسْتَخْرِجُوا۟ مِنْهُ حِلْيَةًۭ تَلْبَسُونَهَا وَتَرَى ٱلْفُلْكَ مَوَاخِرَ فِيهِ وَلِتَبْتَغُوا۟ مِن فَضْلِهِۦ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
سَخَّرَ
मुसख़्ख़र किया
ٱلْبَحْرَ
समुन्दर को
لِتَأْكُلُوا۟
ताकि तुम खाओ
مِنْهُ
उससे
لَحْمًۭا
गोश्त
طَرِيًّۭا
ताज़ा
وَتَسْتَخْرِجُوا۟
और तुम निकालो
مِنْهُ
उससे
حِلْيَةًۭ
ज़ेवर
تَلْبَسُونَهَا
तुम पहनते हो उसे
وَتَرَى
और तुम देखते हो
ٱلْفُلْكَ
कश्तियाँ
مَوَاخِرَ
कि फाड़ने वाली हैं
فِيهِ
उसमें
وَلِتَبْتَغُوا۟
और ताकि तुम तलाश करो
مِن
of
فَضْلِهِۦ
उसके फ़ज़ल में से
وَلَعَلَّكُمْ
और ताकि तुम
تَشْكُرُونَ
तुम शुक्र अदा करो
वही तो है जिसने समुद्र को वश में किया है, ताकि तुम उससे ताज़ा मांस लेकर खाओ और उससे आभूषण निकालो, जिसे तुम पहनते हो। तुम देखते ही हो कि नौकाएँ उसको चीरती हुई चलती हैं (ताकि तुम सफ़र कर सको) और ताकि तुम उसका अनुग्रह तलाश करो और ताकि तुम कृतज्ञता दिखलाओ
तफ़्सीर:
और वही अल्लाह है, जिसने सागर को तुम्हारे अधीन कर दिया। चुनाँचे तुम्हें उसमें सफ़र करने और उसमें मौजूद चीज़ों को निकालने की क्षमता दी है। ताकि उसकी मछलियों का शिकार करके ताज़ा मांस खा सको और उससे शोभा की वस्तुएँ निकालकर खुद पहनो और तुम्हारी औरतें भी पहनें, जैसे मोती आदि। और तुम नौकाओं को देखते हो कि सागर की मौजें चीरते हुए निकलती हैं। तथा तुम इन नौकाओं में सवार भी होते हो, व्यापार के लाभ से हासिल होने वाले अल्लाह के अनुग्रह को तलाश करते हुए और इस उम्मीद में कि अल्लाह के उपकारों का शुक्र अदा करो और केवल उसी की इबादत करो।
आयत 15
وَأَلْقَىٰ فِى ٱلْأَرْضِ رَوَٰسِىَ أَن تَمِيدَ بِكُمْ وَأَنْهَـٰرًۭا وَسُبُلًۭا لَّعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ
وَأَلْقَىٰ
और उसने डाल दिए
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
رَوَٰسِىَ
पहाड़
أَن
कि
تَمِيدَ
वो ढुलक जाए (ना)
بِكُمْ
तुम्हें लेकर
وَأَنْهَـٰرًۭا
और नहरें
وَسُبُلًۭا
और रास्ते
لَّعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَهْتَدُونَ
तुम हिदायत पा जाओ
और उसने धरती में अटल पहाड़ डाल दिए, कि वह तुम्हें लेकर झुक न पड़े। और नदियाँ बनाई और प्राकृतिक मार्ग बनाए, ताकि तुम मार्ग पा सको
तफ़्सीर:
और उसने धरती की मज़बूती के लिए उसमें पर्वत रख दिए, ताकि वह तुम्हें लेकर हिले और झुके नहीं, और उसमें नदियाँ बहा दीं ताकि तुम खुद उनका पानी पियो, तथा अपने पशुओं और अपनी फसलों को सैराब करो, और उसमें रास्ते निकाल दिए, ताकि तुम उन पर चलो और इधर-उधर भटके बिना अपने गंतव्य तक पहुँच सको।
आयत 16
وَعَلَـٰمَـٰتٍۢ ۚ وَبِٱلنَّجْمِ هُمْ يَهْتَدُونَ
وَعَلَـٰمَـٰتٍۢ ۚ
और अलामात (रखदीं)
وَبِٱلنَّجْمِ
और साथ सितारों के
هُمْ
वो
يَهْتَدُونَ
वो राह पाते हैं
और मार्ग चिन्ह भी बनाए और तारों के द्वारा भी लोग मार्ग पर लेते है
तफ़्सीर:
और उसने तुम्हारे लिए धरती में बहुत-से स्पष्ट चिह्न बनाए, जिनसे दिन में चलते समय तुम्हें मार्गदर्शन मिलता है, और तुम्हारे लिए आकाश में तारे बनाए, ताकि रात में तुम्हें उनसे मार्गदर्शन प्राप्त हो।
आयत 17
أَفَمَن يَخْلُقُ كَمَن لَّا يَخْلُقُ ۗ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ
أَفَمَن
क्या भला वो जो
يَخْلُقُ
पैदा करता है
كَمَن
मानिन्द उसके है जो
لَّا
(does) not
يَخْلُقُ ۗ
नहीं पैदा करता
أَفَلَا
क्या भला नहीं
تَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ते
फिर क्या जो पैदा करता है वह उस जैसा हो सकता है, जो पैदा नहीं करता? फिर क्या तुम्हें होश नहीं होता?
तफ़्सीर:
तो क्या जो इन चीज़ों और इनके अलावा को पैदा करता है, उसके समान हो सकता है, जो कुछ भी पैदा नहीं करता? तो क्या तुम्हें उस अल्लाह की महानता याद नहीं करते, जो हर चीज़ को पैदा करता है, कि अकेले उसी की इबादत करो और उसके साथ ऐसी चीज़ को साझी न बनाओ जो कुछ भी पैदा नहीं करती?
आयत 18
وَإِن تَعُدُّوا۟ نِعْمَةَ ٱللَّهِ لَا تُحْصُوهَآ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَغَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
وَإِن
और अगर
تَعُدُّوا۟
तुम गिनना चाहो
نِعْمَةَ
नेअमतों को
ٱللَّهِ
अल्लाह की
لَا
not
تُحْصُوهَآ ۗ
नहीं तुम शुमार कर सकते उन्हें
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَغَفُورٌۭ
अलबत्ता बहुत बख़्ने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
और यदि तुम अल्लाह की नेमतों (कृपादानों) को गिनना चाहो तो उन्हें पूर्ण-रूप से गिन नहीं सकते। निस्संदेह अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
और (ऐ लोगो!) यदि तुम अल्लाह की दी हुई बहुल नेमतों को गिनने की कोशिश करो, तो तुम उनकी बहुतायत और विविधता के कारण, ऐसा नहीं कर सकते। निःसंदेह अल्लाह अत्यंत क्षमाशील है कि उसने इन नेमतों का शुक्रिया अदा करने में होने वाली लापरवाही पर तुम्हारी पकड़ नहीं की। बहुत दयावान् है कि उसने पापों और अपने शुक्र में कोताही के कारण तुम्हें उन नेमतों से वंचित नहीं किया।
आयत 19
وَٱللَّهُ يَعْلَمُ مَا تُسِرُّونَ وَمَا تُعْلِنُونَ
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَعْلَمُ
जानता है
مَا
जो कुछ
تُسِرُّونَ
तुम छुपाते हो
وَمَا
और जो कुछ
تُعْلِنُونَ
तुम ज़ाहिर करते हो
और अल्लाह जानता है जो कुछ तुम छिपाते हो और जो कुछ प्रकट करते हो
तफ़्सीर:
और (ऐ बंदो!) अल्लाह तुम्हारे उन कार्यों को जानता है, जिन्हें तुम छिपाते हो और उन्हें भी जानता है, जिन्हें तुम प्रकट करते हो। तुम्हारा कोई कार्य उससे नहीं छिपता। और वह तुम्हें उनका बदला देगा।
आयत 20
وَٱلَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ لَا يَخْلُقُونَ شَيْـًۭٔا وَهُمْ يُخْلَقُونَ
وَٱلَّذِينَ
और जिन्हें
يَدْعُونَ
वो पुकारते हैं
مِن
besides
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
لَا
not
يَخْلُقُونَ
नहीं वो पैदा कर सकते
شَيْـًۭٔا
कोई चीज़
وَهُمْ
और वो
يُخْلَقُونَ
वो पैदा किए जाते हैं
और जिन्हें वे अल्लाह से हटकर पुकारते है वे किसी चीज़ को भी पैदा नहीं करते, बल्कि वे स्वयं पैदा किए जाते है
तफ़्सीर:
बहुदेववादी अल्लाह के सिवा जिनकी पूजा करते हैं, वे कोई मामूली से मामूली चीज़ भी पैदा नहीं कर सकते। बल्कि वे अल्लाह के सिवा जिनकी पूजा करते हैं, उन्हें खुद ही बनाते हैं। फिर वे अल्लाह के सिवा उन मूर्तियों कि पूजा कैसे करते हैं, जिन्हें वे खुद अपने हाथों से बनाते हैं?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
दिन-रात और सितारों की नेमत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि कायनात का हर निज़ाम इंसान की सहूलत के लिए बनाया गया है, इसकी कद्र करनी चाहिए।
आयत 21
أَمْوَٰتٌ غَيْرُ أَحْيَآءٍۢ ۖ وَمَا يَشْعُرُونَ أَيَّانَ يُبْعَثُونَ
أَمْوَٰتٌ
मुर्दे हैं
غَيْرُ
not alive
أَحْيَآءٍۢ ۖ
ज़िन्दा नहीं हैं
وَمَا
और नहीं
يَشْعُرُونَ
वो शऊर रखते
أَيَّانَ
कि कब
يُبْعَثُونَ
वो उठाए जाऐंगे
मृत है, जिनमें प्राण नहीं। उन्हें मालूम नहीं कि वे कब उठाए जाएँगे
तफ़्सीर:
यद्यपि उनके उपासकों ने उन्हें अपने हाथों से बनाया है, वे निर्जीव भी हैं, जिनमें कोई जीवन या ज्ञान नहीं है। चुनाँचे वे नहीं जानते कि वे अपने उपासकों के साथ क़ियामत के दिन कब पुनः जीवित किए जाएँगे, ताकि उन के साथ जहन्नम की आग में फेंके जाएँ।
आयत 22
إِلَـٰهُكُمْ إِلَـٰهٌۭ وَٰحِدٌۭ ۚ فَٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ قُلُوبُهُم مُّنكِرَةٌۭ وَهُم مُّسْتَكْبِرُونَ
إِلَـٰهُكُمْ
इलाह तुम्हारा
إِلَـٰهٌۭ
इलाह है
وَٰحِدٌۭ ۚ
एक ही
فَٱلَّذِينَ
तो वो लोग जो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं ईमान लाते
بِٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत पर
قُلُوبُهُم
दिल उनके
مُّنكِرَةٌۭ
इन्कारी हैं
وَهُم
और वो
مُّسْتَكْبِرُونَ
तकब्बुर करने वाले हैं
तुम्हारा पूज्य-प्रभु अकेला प्रभु-पूज्य है। किन्तु जो आख़िरत में विश्वास नहीं रखते, उनके दिलों को इनकार है। वे अपने आपको बड़ा समझ रहे है
तफ़्सीर:
तुम्हारा सत्य पूज्य केवल एक है, जिसका कोई साझी नहीं और वह अल्लाह है। वे लोग जो बदले के लिए दोबारा जीवितकर उठाए जाने पर ईमान नहीं रखते, उनके दिल अल्लाह के भय से खाली होने के कारण अल्लाह के एकत्व का इनकार करते हैं। अतः वे हिसाब या दंड पर ईमान नहीं रखते हैं। तथा वे अभिमानी हैं, जो सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं और न ही उसके आगे झुकते हैं।
आयत 23
لَا جَرَمَ أَنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ ۚ إِنَّهُۥ لَا يُحِبُّ ٱلْمُسْتَكْبِرِينَ
لَا
No doubt
جَرَمَ
नहीं कोई शक
أَنَّ
यक़ीनन
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَعْلَمُ
जानता है
مَا
जो कुछ
يُسِرُّونَ
वो छुपाते हैं
وَمَا
और जो कुछ
يُعْلِنُونَ ۚ
वो ज़ाहिर करते हैं
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَا
(does) not
يُحِبُّ
नहीं वो पसंद करता
ٱلْمُسْتَكْبِرِينَ
तकब्बुर करने वालों को
निश्चय ही अल्लाह भली-भाँति जानता है, जो कुछ वे छिपाते है और जो कुछ प्रकट करते है। उसे ऐसे लोग प्रिय नहीं, जो अपने आपको बड़ा समझते हो
तफ़्सीर:
इसमें कोई संदेह नहीं कि अल्लाह इनके उन कार्यों को जानता है, जो वे छिपाते हैं और जो वे प्रकट करते हैं। उससे कोई चीज़ छिपी नहीं रहती और वह उन्हें उनके कार्यों का बदला देगा। निश्चय अल्लाह पाक उन लोगों से प्रेम नहीं करता, जो उसकी इबादत करने और उसके आगे झुकने से अभिमान करते हैं। बल्कि उनसे सख़्त घृणा करता है।
आयत 24
وَإِذَا قِيلَ لَهُم مَّاذَآ أَنزَلَ رَبُّكُمْ ۙ قَالُوٓا۟ أَسَـٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ
وَإِذَا
और जब
قِيلَ
कहा जाता है
لَهُم
उन्हें
مَّاذَآ
क्या कुछ
أَنزَلَ
उतारा
رَبُّكُمْ ۙ
तुम्हारे रब ने
قَالُوٓا۟
वो कहते हैं
أَسَـٰطِيرُ
कहानियाँ हैं
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों की
और जब उनसे कहा जाता है कि "तुम्हारे रब ने क्या अवतरित किया है?" कहते है, "वे तो पहले लोगों की कहानियाँ है।"
तफ़्सीर:
और जब इन लोगों से कहा जाता है, जो अल्लाह के एकेश्वरवाद का इनकार करते और पुनर्जीवन को झुठलाते हैं : अल्लाह ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर क्या उतारा है? तो वे कहते हैं : उसने उनपर कुछ नहीं उतारा है। बल्कि वह खुद अपनी ओर से पिछले लोगों की कहानियों और उनकी झूठी बातों को ले आए हैं।
आयत 25
لِيَحْمِلُوٓا۟ أَوْزَارَهُمْ كَامِلَةًۭ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۙ وَمِنْ أَوْزَارِ ٱلَّذِينَ يُضِلُّونَهُم بِغَيْرِ عِلْمٍ ۗ أَلَا سَآءَ مَا يَزِرُونَ
لِيَحْمِلُوٓا۟
ताकि वो उठालें
أَوْزَارَهُمْ
बोझ अपने
كَامِلَةًۭ
पूरे
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ ۙ
क़यामत के
وَمِنْ
and of
أَوْزَارِ
और कुछ बोझ
ٱلَّذِينَ
उन लोगों के भी
يُضِلُّونَهُم
वो गुमराह कर रहे हैं जिन्हें
بِغَيْرِ
बग़ैर
عِلْمٍ ۗ
इल्म के
أَلَا
ख़बरदार
سَآءَ
कितना बुरा है
مَا
जो
يَزِرُونَ
बोझ वो उठा रहे हैं
इसका परिणाम यह होगा कि वे क़ियामत के दिन अपने बोझ भी पूरे उठाएँगे और उनके बोझ में से भी जिन्हें वे अज्ञानता के कारण पथभ्रष्ट कर रहे है। सुन लो, बहुत ही बुरा है वह बोझ जो वे उठा रहे है!
तफ़्सीर:
ताकि उनका अंजाम यह हो कि वे बिना किसी कमी के अपने गुनाहों का बोझ उठाएँ और उन लोगों के गुनाहों का भी कुछ बोझ उठाएँ, जिन्हें उन्होंने अज्ञानता और पूर्वजों के अनुकरण में इस्लाम से भटकाया है। तो उनका अपने पापों और अपने अनुयायियों के पापों का बोझ उठाना कितना बुरा है।
आयत 26
قَدْ مَكَرَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ فَأَتَى ٱللَّهُ بُنْيَـٰنَهُم مِّنَ ٱلْقَوَاعِدِ فَخَرَّ عَلَيْهِمُ ٱلسَّقْفُ مِن فَوْقِهِمْ وَأَتَىٰهُمُ ٱلْعَذَابُ مِنْ حَيْثُ لَا يَشْعُرُونَ
قَدْ
तहक़ीक़
مَكَرَ
चाल चली
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जो
مِن
(were) before them
قَبْلِهِمْ
उनसे पहले थे
فَأَتَى
तो आया
ٱللَّهُ
अल्लाह
بُنْيَـٰنَهُم
उनकी इमारत को
مِّنَ
from
ٱلْقَوَاعِدِ
बुनियादों से
فَخَرَّ
तो गिर पड़ी
عَلَيْهِمُ
उन्हीं पर
ٱلسَّقْفُ
छत
مِن
from
فَوْقِهِمْ
उनके ऊपर से
وَأَتَىٰهُمُ
और आया उनके पास
ٱلْعَذَابُ
अज़ाब
مِنْ
from
حَيْثُ
जहाँ से
لَا
they (did) not perceive
يَشْعُرُونَ
नहीं वो शऊर रखते थे
जो उनसे पहले गुज़र है वे भी मक्कारियाँ कर चुके है। फिर अल्लाह उनके भवन पर नीवों की ओर से आया और छत उनपर उनके ऊपर से आ गिरी और ऐसे रुख़ से उनपर यातना आई जिसका उन्हें एहसास तक न था
तफ़्सीर:
इनसे पहले भी काफ़िरों ने अपने रसूलों के विरुद्ध साज़िशें कीं, तो अल्लाह ने उनके घरों को उनकी नींव से ध्वस्त कर दिया। इसलिए उनकी छतें उनके ऊपर से उनपर गिर पड़ीं और उनपर वहाँ से यातना आई, जहाँ से उन्हें उम्मीद नहीं थी। क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि उनके घर उनकी रक्षा करेंगे, लेकिन वे उनके द्वारा ही नष्ट कर दिए गए।
आयत 27
ثُمَّ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ يُخْزِيهِمْ وَيَقُولُ أَيْنَ شُرَكَآءِىَ ٱلَّذِينَ كُنتُمْ تُشَـٰٓقُّونَ فِيهِمْ ۚ قَالَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْعِلْمَ إِنَّ ٱلْخِزْىَ ٱلْيَوْمَ وَٱلسُّوٓءَ عَلَى ٱلْكَـٰفِرِينَ
ثُمَّ
फिर
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
يُخْزِيهِمْ
वो रुस्वा करेगा उन्हें
وَيَقُولُ
और वो कहेगा
أَيْنَ
कहाँ हैं
شُرَكَآءِىَ
शरीक मेरे
ٱلَّذِينَ
वो जो
كُنتُمْ
थे तुम
تُشَـٰٓقُّونَ
तुम झगड़ते
فِيهِمْ ۚ
जिन (के बारे) में
قَالَ
कहेंगे
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
أُوتُوا۟
दिए गए
ٱلْعِلْمَ
इल्म
إِنَّ
बेशक
ٱلْخِزْىَ
रुस्वाई
ٱلْيَوْمَ
आजके दिन
وَٱلسُّوٓءَ
और बुराई
عَلَى
(are) upon
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों पर है
फिर क़ियामत के दिन अल्लाह उन्हें अपमानित करेगा और कहेगा, "कहाँ है मेरे वे साझीदार, जिनके लिए तुम लड़ते-झगड़ते थे?" जिन्हें ज्ञान प्राप्त था वे कहेंगे, "निश्चय ही आज रुसवाई और ख़राबी है इनकार करनेवालों के लिए।"
तफ़्सीर:
फिर क़ियामत के दिन अल्लाह उन्हें यातना के द्वारा अपमानित करेगा और उनसे कहेगा : मेरे वे साझी कहाँ हैं, जिन्हें तुम इबादत में मेरा साझी बनाया करते थे और उनके कारण मेरे नबियों और ईमान वालों से दुश्मनी रखा करते थे? अल्लाह वाले विद्वान कहेंगे : निश्चय क़ियामत के दिन अपमान तथा यातना काफ़िरों पर है।
आयत 28
ٱلَّذِينَ تَتَوَفَّىٰهُمُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ ظَالِمِىٓ أَنفُسِهِمْ ۖ فَأَلْقَوُا۟ ٱلسَّلَمَ مَا كُنَّا نَعْمَلُ مِن سُوٓءٍۭ ۚ بَلَىٰٓ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌۢ بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
تَتَوَفَّىٰهُمُ
फ़ौत करते हैं उन्हें
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्ते
ظَالِمِىٓ
(जबकि वो) ज़ुल्म करने वाले हैं
أَنفُسِهِمْ ۖ
अपनी जानों पर
فَأَلْقَوُا۟
तो वो पैश करते हैं
ٱلسَّلَمَ
सिपर/सुलह
مَا
Not
كُنَّا
(कहते हैं) ना थे हम
نَعْمَلُ
हम करते
مِن
any
سُوٓءٍۭ ۚ
कोई बुराई
بَلَىٰٓ
क्यों नहीं
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِمَا
उसे जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते
जिनकी रूहों को फ़रिश्ते इस दशा में ग्रस्त करते है कि वे अपने आप पर अत्याचार कर रहे होते है, तब आज्ञाकारी एवं वशीभूत होकर आ झुकते है कि "हम तो कोई बुराई नहीं करते थे।" "नहीं, बल्कि अल्लाह भली-भाँति जानता है जो कुछ तुम करते रहे हो
तफ़्सीर:
मौत का फ़रिश्ता और उसके सहयोगी जिन लोगों की रूह़ इस हाल में निकालते हैं कि वे अल्लाह का इनकार करके स्वयं पर अत्याचार करने वाले होते हैं, तो वे मौत को अपने सामने देखकर आत्मसमर्पण कर देते हैं और अपने कुफ़्र तथा पाप का इनकार कर देते हैं, यह सोचकर कि इनकार करने से उन्हें फायदा होगा। तो इसपर उनसे कहा जाता है : तुम झूठ कहते हो। निश्चय तुम पाप करने वाले काफ़िर थे। तुम दुनिया में जो कुछ किया करते थे, अल्लाह उसे खूब जानता है। उसमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है और वह तुम्हें उसका बदला प्रदान करेगा।
आयत 29
فَٱدْخُلُوٓا۟ أَبْوَٰبَ جَهَنَّمَ خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۖ فَلَبِئْسَ مَثْوَى ٱلْمُتَكَبِّرِينَ
فَٱدْخُلُوٓا۟
पस दाख़िल हो जाओ
أَبْوَٰبَ
दरवाज़ों से
جَهَنَّمَ
जहन्नम के
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले
فِيهَا ۖ
उसमें
فَلَبِئْسَ
पस अलबत्ता कितना बुरा है
مَثْوَى
ठिकाना
ٱلْمُتَكَبِّرِينَ
तकब्बुर करने वालों का
तो अब जहन्नम के द्वारों में, उसमें सदैव रहने के लिए प्रवेश करो। अतः निश्चय ही बहुत ही बुरा ठिकाना है यह अहंकारियों का।"
तफ़्सीर:
और उनसे कहा जाएगा : तुम अपने कर्मों के अनुसार जहन्नम के द्वारों में प्रवेश कर जाओ और उसमें हमेशा के लिए निवास करो। तो अल्लाह पर ईमान लाने और अकेले उसकी इबादत से अभिमान करने वालों का ठिकाना बहुत ही बुरा है।
आयत 30
۞ وَقِيلَ لِلَّذِينَ ٱتَّقَوْا۟ مَاذَآ أَنزَلَ رَبُّكُمْ ۚ قَالُوا۟ خَيْرًۭا ۗ لِّلَّذِينَ أَحْسَنُوا۟ فِى هَـٰذِهِ ٱلدُّنْيَا حَسَنَةٌۭ ۚ وَلَدَارُ ٱلْـَٔاخِرَةِ خَيْرٌۭ ۚ وَلَنِعْمَ دَارُ ٱلْمُتَّقِينَ
۞ وَقِيلَ
और कहा जाता है
لِلَّذِينَ
उनसे जिन्होंने
ٱتَّقَوْا۟
तक़्वा किया
مَاذَآ
क्या कुछ
أَنزَلَ
उतारा
رَبُّكُمْ ۚ
तुम्हारे रब ने
قَالُوا۟
वो कहते हैं
خَيْرًۭا ۗ
बहुत अच्छा
لِّلَّذِينَ
उनके लिए जिन्होंने
أَحْسَنُوا۟
अच्छा किया
فِى
in
هَـٰذِهِ
this
ٱلدُّنْيَا
इस दुनिया में
حَسَنَةٌۭ ۚ
भलाई है
وَلَدَارُ
और अलबत्ता घर
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत का
خَيْرٌۭ ۚ
बहतर है
وَلَنِعْمَ
और अलबत्ता कितना अच्छा है
دَارُ
घर
ٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ीन का
दूसरी ओर जो डर रखनेवाले है उनसे कहा जाता है, "तुम्हारे रब ने क्या अवतरित किया?" वे कहते है, "जो सबसे उत्तम है।" जिन लोगों ने भलाई की उनकी इस दुनिया में भी अच्छी हालत है और आख़िरत का घर तो अच्छा है ही। और क्या ही अच्छा घर है डर रखनेवालों का!
तफ़्सीर:
और उन लोगों से, जो अपने रब के आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई चीज़ों से बचकर उससे डरते रहे, कहा गया : तुम्हारे पालनहार ने तुम्हारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर क्या उतारा है? तो उन्होंने उत्तर दिया : अल्लाह ने उनपर बहुत बड़ी भलाई उतारी है। जिन लोगों ने अच्छे तरीक़े से अल्लाह की इबादत की और उसकी सृष्टि के साथ अच्छा व्यवहार किया, उनके लिए इस सांसारिक जीवन में उत्तम बदला है, जैसे विजय और रोज़ी में विस्तार। जबकि अल्लाह ने आख़िरत में उनके लिए जो बदला तैयार कर रखा है, वह दुनिया में मिलने वाले बदले से कहीं उत्तम है। और अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, डरने वालों का घर अर्थात् आख़िरत का घर क्या ही खूब है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मुशरिकों के इनकार और मौत के वक्त फरिश्तों की गवाही का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि मौत के वक्त हर इंसान की असली हकीकत ज़ाहिर हो जाती है, इसलिए दुनिया में ही सुधरना बेहतर है।
आयत 31
جَنَّـٰتُ عَدْنٍۢ يَدْخُلُونَهَا تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ ۖ لَهُمْ فِيهَا مَا يَشَآءُونَ ۚ كَذَٰلِكَ يَجْزِى ٱللَّهُ ٱلْمُتَّقِينَ
جَنَّـٰتُ
बाग़ात
عَدْنٍۢ
हमेशागी के
يَدْخُلُونَهَا
वो दाख़िल होंगे उनमें
تَجْرِى
बहती हैं
مِن
from
تَحْتِهَا
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ ۖ
नहरें
لَهُمْ
उनके लिए
فِيهَا
उसमें होगा
مَا
जो कुछ
يَشَآءُونَ ۚ
वो चाहेंगे
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يَجْزِى
बदला देगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों को
सदैव रहने के बाग़ जिनमें वे प्रवेश करेंगे, उनके नीचे नहरें बह रहीं होंगी, उनके लिए वहाँ वह सब कुछ संचित होगा, जो वे चाहे। अल्लाह डर रखनेवालों को ऐसा ही प्रतिदान प्रदान करता है
तफ़्सीर:
वे निवास और स्थिरता के बागों में प्रवेश करेंगे, जिनके महलों और पेड़ों के नीचे से नहरें बह रही होंगी। उन्हें उन बाग़ों में खाने-पीने आदि की वे सारी चीज़ें मिलेंगी, जिनकी वे इच्छा प्रकट करेंगे। इसी तरह का बदला, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के समुदाय के भय रखने वाले लोगों को देगा, पिछले समुदायों के भय रखने वाले लोगों को भी देगा।
आयत 32
ٱلَّذِينَ تَتَوَفَّىٰهُمُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ طَيِّبِينَ ۙ يَقُولُونَ سَلَـٰمٌ عَلَيْكُمُ ٱدْخُلُوا۟ ٱلْجَنَّةَ بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
تَتَوَفَّىٰهُمُ
फ़ौत करते हैं उन्हें
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्ते
طَيِّبِينَ ۙ
वो पाक होते हैं (इस हाल में कि)
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
سَلَـٰمٌ
सलाम है
عَلَيْكُمُ
तुम पर
ٱدْخُلُوا۟
दाख़िल हो जाओ
ٱلْجَنَّةَ
जन्नत में
بِمَا
बवजह उसके जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते
जिनकी रूहों को फ़रिश्ते इस दशा में ग्रस्त करते है कि वे पाक और नेक होते है, वे कहते है, "तुम पर सलाम हो! प्रवेश करो जन्नत में उसके बदले में जो कुछ तुम करते रहे हो।"
तफ़्सीर:
जिनकी रूह़ मौत का फ़रिश्ता और उसके सहयोगी फ़रिश्ते इस हाल में निकालते हैं कि उनके दिल कुफ़्र से पवित्र हों, तो फ़रिश्ते उन्हें यह कहकर संबोधित करते हैं : तुमपर शांति हो। तुम हर मुसीबत से सुरक्षित रहो। तुम जन्नत में प्रवेश कर जाओ, इस कारण कि तुम दुनिया में शुद्ध अक़ीदे पर थे और अच्छे कार्य करते थे।
आयत 33
هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّآ أَن تَأْتِيَهُمُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ أَوْ يَأْتِىَ أَمْرُ رَبِّكَ ۚ كَذَٰلِكَ فَعَلَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ وَمَا ظَلَمَهُمُ ٱللَّهُ وَلَـٰكِن كَانُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ
هَلْ
नहीं
يَنظُرُونَ
वो इन्तिज़ार कर रहे
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
تَأْتِيَهُمُ
आजाऐं उनके पास
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्ते
أَوْ
या
يَأْتِىَ
आजाए
أَمْرُ
हुक्म
رَبِّكَ ۚ
आपके रब का
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
فَعَلَ
किया
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जो
مِن
(were) before them
قَبْلِهِمْ ۚ
उनसे पहले थे
وَمَا
और नहीं
ظَلَمَهُمُ
ज़ुल्म किया था उन पर
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
وَلَـٰكِن
और लेकिन
كَانُوٓا۟
थे वो
أَنفُسَهُمْ
अपनी ही जानों पर
يَظْلِمُونَ
वो ज़ुल्म करते
क्या अब वे इसी की प्रतीक्षा कर रहे है कि फ़रिश्ते उनके पास आ पहुँचे या तेरे रब का आदेश ही आ जाए? ऐसा ही उन लोगो ने भी किया, जो इनसे पहले थे। अल्लाह ने उनपर अत्याचार नहीं किया, किन्तु वे स्वयं अपने ऊपर अत्याचार करते रहे
तफ़्सीर:
क्या ये झुठलाने वाले बहुदेववादी इस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि मौत का फ़रिश्ता और उसके सहयोगी फ़रिश्ते उनकी रूह निकालने और उनके चेहरों और उनकी पीठों पर मारने के लिए उनके पास आ जाएँ, या दुनिया ही में अज़ाब के द्वारा उनका उन्मूलन करने के लिए अल्लाह का आदेश आ जाए? इसी तरह का कार्य जो मक्का के मुश्रिक (बहुदेववादी) कर रहे हैं, इनसे पहले के बहुदेववादियों ने किया था। इसलिए अल्लाह ने उन्हें नष्ट कर दिया। और अल्लाह ने उन्हें नष्ट करके उनपर अत्याचार नहीं किया, लेकिन वे स्वयं अपने ऊपर अत्याचार किया करते थे, अल्लाह के इनकार द्वारा खुद को विनाश की जगहों में उतारकर।
आयत 34
فَأَصَابَهُمْ سَيِّـَٔاتُ مَا عَمِلُوا۟ وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ
فَأَصَابَهُمْ
तो पहुँची उन्हें
سَيِّـَٔاتُ
बुराईयाँ
مَا
उसकी जो
عَمِلُوا۟
उन्होंने अमल किए थे
وَحَاقَ
घेर लिया
بِهِم
उन्हें
مَّا
जो
كَانُوا۟
थे वो
بِهِۦ
जिसका
يَسْتَهْزِءُونَ
वो मज़ाक़ उड़ाते
अन्ततः उनकी करतूतों की बुराइयाँ उनपर आ पड़ी, और जिसका उपहास वे कहते थे, उसी ने उन्हें आ घेरा
तफ़्सीर:
चुनाँचे उनपर उनके उन कार्य की सज़ा उतर आई, जो वे किया करते थे, और उन्हें उस यातना ने घेर लिया, जिसके द्वारा नसीहत किए जाने पर वे उसका मज़ाक उड़ाया करते थे।
आयत 35
وَقَالَ ٱلَّذِينَ أَشْرَكُوا۟ لَوْ شَآءَ ٱللَّهُ مَا عَبَدْنَا مِن دُونِهِۦ مِن شَىْءٍۢ نَّحْنُ وَلَآ ءَابَآؤُنَا وَلَا حَرَّمْنَا مِن دُونِهِۦ مِن شَىْءٍۢ ۚ كَذَٰلِكَ فَعَلَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ فَهَلْ عَلَى ٱلرُّسُلِ إِلَّا ٱلْبَلَـٰغُ ٱلْمُبِينُ
وَقَالَ
और कहा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
أَشْرَكُوا۟
शिर्क कया
لَوْ
अगर
شَآءَ
चाहता
ٱللَّهُ
अल्लाह
مَا
ना
عَبَدْنَا
इबादत करते हम
مِن
other than Him
دُونِهِۦ
उसके सिवा
مِن
any
شَىْءٍۢ
किसी चीज़ की
نَّحْنُ
हम
وَلَآ
और ना
ءَابَآؤُنَا
आबा ओ अजदाद हमारे
وَلَا
और ना
حَرَّمْنَا
हराम करते हम
مِن
other than Him
دُونِهِۦ
उसके (हुक्म) के सिवा
مِن
anything
شَىْءٍۢ ۚ
किसी चीज़ को
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
فَعَلَ
किया था
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जो
مِن
(were) before them
قَبْلِهِمْ ۚ
उनसे पहले थे
فَهَلْ
तो नहीं है
عَلَى
on
ٱلرُّسُلِ
रसूलों पर
إِلَّا
मगर
ٱلْبَلَـٰغُ
पहुँचाना
ٱلْمُبِينُ
खुल्लम-खुल्ला
शिर्क करनेवालों का कहना है, "यदि अल्लाह चाहता तो उससे हटकर किसी चीज़ की न हम बन्दगी करते और न हमारे बाप-दादा ही और न हम उसके बिना किसी चीज़ को अवैध ठहराते।" उनसे पहले के लोगों ने भी ऐसा ही किया। तो क्या साफ़-साफ़ सन्देश पहुँचा देने के सिवा रसूलों पर कोई और भी ज़िम्मेदारी है?
तफ़्सीर:
और अल्लाह के साथ अन्य चीज़ों की पूजा करने वालों ने कहा : यदि अल्लाह चाहता कि हम केवल उसी की पूजा करें और किसी को उसका साझी न बनाएँ, तो हम उसके सिवा किसी को न पूजते। न हम और न ही हमसे पहले हमारे बाप-दादा। इसी तरह यदि वह चाहता कि हम किसी चीज़ को हराम न ठहराएँ, तो हम उसे हराम न ठहराते। इसी तरह के झूठे तर्क पिछले काफ़िरों ने भी दिए थे। अतः रसूलों का कर्तव्य केवल उस चीज़ को स्पष्ट रूप से पहुँचा देना है, जिसके पहुँचाने का उन्हें आदेश दिया गया है और निश्चय उन्होंने अपना काम कर दिया है। और काफ़िर लोगों के पास भाग्य को बहाना बनाने में कोई तर्क नहीं है, जबकि अल्लाह ने उन्हें इरादा और चयन का अधिकार दिया है और उनकी ओर अपने रसूल भेजे हैं।
आयत 36
وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِى كُلِّ أُمَّةٍۢ رَّسُولًا أَنِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ وَٱجْتَنِبُوا۟ ٱلطَّـٰغُوتَ ۖ فَمِنْهُم مَّنْ هَدَى ٱللَّهُ وَمِنْهُم مَّنْ حَقَّتْ عَلَيْهِ ٱلضَّلَـٰلَةُ ۚ فَسِيرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ فَٱنظُرُوا۟ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلْمُكَذِّبِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
بَعَثْنَا
भेजा हमने
فِى
into
كُلِّ
every
أُمَّةٍۢ
हर उम्मत में
رَّسُولًا
एक रसूल
أَنِ
कि
ٱعْبُدُوا۟
इबादत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَٱجْتَنِبُوا۟
और बचो
ٱلطَّـٰغُوتَ ۖ
ताग़ूत से
فَمِنْهُم
तो बाज़ उनमें से थे
مَّنْ
जिन्हें
هَدَى
हिदायत दी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
وَمِنْهُم
और बाज़ उनमें से थे
مَّنْ
वो जो
حَقَّتْ
साबित हो गई
عَلَيْهِ
उन पर
ٱلضَّلَـٰلَةُ ۚ
गुमराही
فَسِيرُوا۟
पस चलो-फिरो
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
فَٱنظُرُوا۟
फिर देखो
كَيْفَ
किस तरह
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अंजाम
ٱلْمُكَذِّبِينَ
झुठलाने वालों का
हमने हर समुदाय में कोई न कोई रसूल भेजा कि "अल्लाह की बन्दगी करो और ताग़ूत से बचो।" फिर उनमें से किसी को तो अल्लाह ने सीधे मार्ग पर लगाया और उनमें से किसी पर पथभ्रष्ट सिद्ध होकर रही। फिर तनिक धरती में चल-फिरकर तो देखो कि झुठलानेवालों का कैसा परिणाम हुआ
तफ़्सीर:
हमने पिछले हर समुदाय में एक रसूल भेजा, जो अपने समुदाय के लोगों को आदेश देता कि वे एक अल्लाह की इबादत करें और उसके अलावा मूर्तियों, शैतानों और अन्य चीज़ों की इबादत छोड़ दें। चुनाँचे उनमें से कुछ को अल्लाह ने सामर्थ्य प्रदान किया और वे अल्लाह पर ईमान लाए और उसके रसूल की लाई हुई बातों का पालन किए। तथा उनमें से कुछ ऐसे थे जिन्होंने अल्लाह का इनकार किया और उसके रसूल की अवज्ञा की, तो अल्लाह ने उन्हें सामर्थ्य नहीं दिया। अतः उनपर गुमराही सिद्ध हो गई। इसलिए धरती में चलो-फिरो, ताकि अपनी आँखों से देखो कि झुठलाने वालों पर यातना और विनाश आने के बाद उनका अंजाम कैसा हुआ?
आयत 37
إِن تَحْرِصْ عَلَىٰ هُدَىٰهُمْ فَإِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهْدِى مَن يُضِلُّ ۖ وَمَا لَهُم مِّن نَّـٰصِرِينَ
إِن
अगर
تَحْرِصْ
आप हरीस हैं
عَلَىٰ
[for]
هُدَىٰهُمْ
उनकी हिदायत पर
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(will) not
يَهْدِى
नहीं हिदायत देता
مَن
उसको जिसे
يُضِلُّ ۖ
वो गुमराह करता है
وَمَا
और नहीं
لَهُم
उनके लिए
مِّن
any
نَّـٰصِرِينَ
मददगारों में से कोई
यद्यपि इस बात का कि वे राह पर आ जाएँ तुम्हें लालच ही क्यों न हो, किन्तु अल्लाह जिसे भटका देता है, उसे वह मार्ग नहीं दिखाया करता और ऐसे लोगों का कोई सहायक भी नहीं होता
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) यदि आप इन लोगों को निमंत्रण देने का अपना भरसक प्रयास कर लें और उनके सत्य मार्ग पर आने के लिए बहुत लालायित रहें और उसके कारणों को अपनाएँ; किंतु अल्लाह जिसे गुमराह कर दे, उसे सीधी राह नहीं दिखाता। और ऐसे लोगों को अल्लाह के अलावा कोई नहीं मिलेगा, जो उनसे यातना को दूर करके उनकी मदद करे।
आयत 38
وَأَقْسَمُوا۟ بِٱللَّهِ جَهْدَ أَيْمَـٰنِهِمْ ۙ لَا يَبْعَثُ ٱللَّهُ مَن يَمُوتُ ۚ بَلَىٰ وَعْدًا عَلَيْهِ حَقًّۭا وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
وَأَقْسَمُوا۟
और वो क़समें खाते हैं
بِٱللَّهِ
अल्लाह की
جَهْدَ
पक्की
أَيْمَـٰنِهِمْ ۙ
क़समें अपनी
لَا
Allah will not resurrect
يَبْعَثُ
नहीं उठाएगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
مَن
उसे जो
يَمُوتُ ۚ
मर जाता है
بَلَىٰ
क्यों नहीं
وَعْدًا
वादा है
عَلَيْهِ
उसके ज़िम्मा
حَقًّۭا
सच्चा
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَ
अक्सर
ٱلنَّاسِ
लोग
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
उन्होंने अल्लाह की कड़ी-कड़ी क़समें खाकर कहा, "जो मर जाता है उसे अल्लाह नहीं उठाएगा।" क्यों नहीं? यह तो एक वादा है, जिसे पूरा करना उसके लिए अनिवार्य है - किन्तु अधिकतर लोग जानते नहीं। -
तफ़्सीर:
इन पुनर्जीवन को झुठलाने वालों ने अतिशयोक्ति करते हुए बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पक्की क़समें खाते हुए कहा : अल्लाह मरने वाले को दोबारा ज़िंदा करके नहीं उठाएगा। जबकि उनके पास इसके लिए कोई तर्क नहीं है। क्यों नहीं! अल्लाह हर मरने वाले को ज़िंदा करके उठाएगा। यह उसके ऊपर सच्चा वादा है। किंतु अधिकतर लोग इस बात को नहीं जानते कि अल्लाह मृतकों को दोबारा ज़िंदा करके उठाएगा। यही कारण है कि वे पुनर्जीवन का इनकार करते हैं।
आयत 39
لِيُبَيِّنَ لَهُمُ ٱلَّذِى يَخْتَلِفُونَ فِيهِ وَلِيَعْلَمَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ أَنَّهُمْ كَانُوا۟ كَـٰذِبِينَ
لِيُبَيِّنَ
ताकि वो बयान करे
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلَّذِى
वो चीज़ जो
يَخْتَلِفُونَ
वो इख़्तिलाफ़ करते हें
فِيهِ
जिसमें
وَلِيَعْلَمَ
और ताकि जानलें
ٱلَّذِينَ
वो लोग जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
أَنَّهُمْ
बेशक वो
كَانُوا۟
थे वो
كَـٰذِبِينَ
झूठे
ताकि वह उनपर उसको स्पष्ट। कर दे, जिसके विषय में वे विभेद करते है और इसलिए भी कि इनकार करनेवाले जान लें कि वे झूठे थे
तफ़्सीर:
अल्लाह उन सभी लोगों को क़ियामत के दिन दोबारा जीवित करके उठाएगा, ताकि उनके लिए उन बातों की वास्तविकता को स्पष्ट कर दे, जिनके बारे में वे मतभेद किया करते थे, जैसे एकेश्वरवाद, पुनर्जीवन और नुबुव्वत और ताकि काफ़िर लोग जान लें कि वे अल्लाह के साथ साझी होने के अपने दावे में और पूनर्जीवन के इनकार में झूठे थे।
आयत 40
إِنَّمَا قَوْلُنَا لِشَىْءٍ إِذَآ أَرَدْنَـٰهُ أَن نَّقُولَ لَهُۥ كُن فَيَكُونُ
إِنَّمَا
बेशक
قَوْلُنَا
कहना हमारा
لِشَىْءٍ
किसी चीज़ के लिए
إِذَآ
जब
أَرَدْنَـٰهُ
इरादा करते हैं हम उसका
أَن
ये कि
نَّقُولَ
हम कहते हैं
لَهُۥ
उसे
كُن
हो जा
فَيَكُونُ
तो वो हो जाती है
किसी चीज़ के लिए जब हम उसका इरादा करते है तो हमारा कहना बस यही होता है कि उससे कहते है, "हो जा!" और वह हो जाती है
तफ़्सीर:
जब हम मृतकों को पुनर्जीवित करना और उन्हें उठाना चाहें, तो हमें कोई चीज़ इससे रोक नहीं सकती। जब हम किसी चीज़ को पैदा करना चाहते हैं, तो उसे केवल यह कहते हैं कि : (हो जा), तो वह अनिवार्य रूप से हो जाती है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नबियों को झुठलाने वालों के अंजाम का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि हक की दावत को झुठलाना आखिरकार नुकसानदेह साबित होता है।
आयत 41
وَٱلَّذِينَ هَاجَرُوا۟ فِى ٱللَّهِ مِنۢ بَعْدِ مَا ظُلِمُوا۟ لَنُبَوِّئَنَّهُمْ فِى ٱلدُّنْيَا حَسَنَةًۭ ۖ وَلَأَجْرُ ٱلْـَٔاخِرَةِ أَكْبَرُ ۚ لَوْ كَانُوا۟ يَعْلَمُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
هَاجَرُوا۟
हिजरत की
فِى
in (the way)
ٱللَّهِ
अल्लाह की राह में
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद इसके
مَا
जो
ظُلِمُوا۟
वो ज़ुल्म किए गए
لَنُبَوِّئَنَّهُمْ
अलबत्ता ज़रूर ठिकाना देंगे उन्हें
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
حَسَنَةًۭ ۖ
अच्छा
وَلَأَجْرُ
और यक़ीनन अज्र
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत का
أَكْبَرُ ۚ
सबसे बड़ा है
لَوْ
काश
كَانُوا۟
होते वो
يَعْلَمُونَ
वो जानते
और जिन लोगों ने इसके पश्चात कि उनपर ज़ुल्म ढाया गया था अल्लाह के लिए घर-बार छोड़ा उन्हें हम दुनिया में भी अच्छा ठिकाना देंगे और आख़िरत का प्रतिदान तो बहुत बड़ा है। क्या ही अच्छा होता कि वे जानते
तफ़्सीर:
और जिन लोगों ने काफ़िरों का अत्याचार सहने के बाद, अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए कुफ़्र के देश से इस्लाम के देश की ओर हिजरत करते हुए अपने घर-बार, बीवी-बच्चों और धन-दौलत को छोड़ दिया, हम उन्हें इस दुनिया में एक ऐसे घर में उतारेंगे, जिसमें वे ससम्मान रहेंगे। और आख़िरत का बदला इससे अधिक बड़ा है, क्योंकि उसमें जन्नत भी शामिल है। यदि हिजरत से पीछे रहने वाले हिजरत करने वालों का प्रतिफल जान लेते, तो उससे पीछे न रहते।
आयत 42
ٱلَّذِينَ صَبَرُوا۟ وَعَلَىٰ رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
صَبَرُوا۟
सब्र किया
وَعَلَىٰ
and on
رَبِّهِمْ
और अपने रब पर ही
يَتَوَكَّلُونَ
वो भरोसा करते हैं
ये वे लोग है जो जमे रहे और वे अपने रब पर भरोसा रखते है
तफ़्सीर:
ये अल्लाह के मार्ग में हिजरत करने वाले वे लोग हैं, जिन्होंने अपने समुदाय के कष्ट पर तथा अपने परिवार और अपने घर के लोगों को छोड़ने पर धैर्य रखा, तथा अल्लाह के आज्ञापालन पर धैर्य से काम लिया, तथा वे अपने सभी मामलों में केवल अल्लाह पर भरोसा रखते हैं। इसलिए अल्लाह ने उन्हें यह महान प्रतिफल प्रदान किया।
आयत 43
وَمَآ أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ إِلَّا رِجَالًۭا نُّوحِىٓ إِلَيْهِمْ ۚ فَسْـَٔلُوٓا۟ أَهْلَ ٱلذِّكْرِ إِن كُنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
وَمَآ
और नहीं
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
مِن
before you
قَبْلِكَ
आपसे पहले
إِلَّا
मगर
رِجَالًۭا
मर्दों को
نُّوحِىٓ
हम वही करते थे
إِلَيْهِمْ ۚ
तरफ़ उनके
فَسْـَٔلُوٓا۟
पस पूछलो
أَهْلَ
(the) people
ٱلذِّكْرِ
अहले इल्म से
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
لَا
(do) not
تَعْلَمُونَ
नहीं तुम जानते
हमने तुमसे पहले भी पुरुषों ही को रसूल बनाकर भेजा था - जिनकी ओर हम प्रकाशना करते रहे है। यदि तुम नहीं जानते तो अनुस्मृतिवालों से पूछ लो
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) हमने आपसे पहले मानव जाति ही में से पुरुषों को संदेष्टा बनाकर भेजे, जिनकी ओर हम वह़्य (प्रकाशना) करते थे। हमने फ़रिश्तों में से रसूल बनाकर नहीं भेजे। यही हमारा नित्य तरीक़ा है। यदि तुम इसका इनकार करते हो, तो पिछली पुस्तकों के लोगों से पूछ लो, वे तुम्हें बताएँगे कि रसूल मानव ही थे, वे फ़रिश्ते नहीं थे, यदि तुम नहीं जानते कि वे इनसान थे।
आयत 44
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ وَٱلزُّبُرِ ۗ وَأَنزَلْنَآ إِلَيْكَ ٱلذِّكْرَ لِتُبَيِّنَ لِلنَّاسِ مَا نُزِّلَ إِلَيْهِمْ وَلَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ
साथ वाज़ेह दलाइल
وَٱلزُّبُرِ ۗ
और सहीफ़ों के
وَأَنزَلْنَآ
और नाज़िल किया हमने
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
ٱلذِّكْرَ
ज़िक्र को
لِتُبَيِّنَ
ताकि आप वाज़ेह करें
لِلنَّاسِ
लोंगों के लिए
مَا
जो कुछ
نُزِّلَ
नाज़िल किया गया
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
وَلَعَلَّهُمْ
और ताकि वो
يَتَفَكَّرُونَ
वो ग़ौरो फ़िक्र करें
स्पष्ट प्रमाणों और ज़बूरों (किताबों) के साथ। और अब यह अनुस्मृति तुम्हारी ओर हमने अवतरित की, ताकि तुम लोगों के समक्ष खोल-खोलकर बयान कर दो जो कुछ उनकी ओर उतारा गया है और ताकि वे सोच-विचार करें
तफ़्सीर:
हमने इन मानव रसूलों को स्पष्ट प्रमाणों और अवतरित किताबों के साथ भेजा। और (ऐ रसूल) हमने आपकी ओर क़ुरआन उतारा, ताकि आप लोगों के लिए उसमें से जिसके स्पष्टीकरण की आवश्यकता हो, उसका स्पष्टीकरण कर दें, और ताकि वे अपने सोच-विचार को काम में लाएँ और इस (क़ुरआन) में जो कुछ है उससे उपदेश ग्रहण करें।
आयत 45
أَفَأَمِنَ ٱلَّذِينَ مَكَرُوا۟ ٱلسَّيِّـَٔاتِ أَن يَخْسِفَ ٱللَّهُ بِهِمُ ٱلْأَرْضَ أَوْ يَأْتِيَهُمُ ٱلْعَذَابُ مِنْ حَيْثُ لَا يَشْعُرُونَ
أَفَأَمِنَ
क्या फिर बेख़ौफ़ होगए
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
مَكَرُوا۟
चालें चलीं
ٱلسَّيِّـَٔاتِ
बुरी
أَن
कि
يَخْسِفَ
धंसादे
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِهِمُ
उन्हें
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन में
أَوْ
या
يَأْتِيَهُمُ
आजाए उनके पास
ٱلْعَذَابُ
अज़ाब
مِنْ
from
حَيْثُ
जहाँ से
لَا
not
يَشْعُرُونَ
नहीं वो शऊर रखते
फिर क्या वे लोग जो ऐसी बुरी-बुरी चालें चल रहे है, इस बात से निश्चिन्त हो गए है कि अल्लाह उन्हें धरती में धँसा दे या ऐसे मौके से उनपर यातना आ जाए जिसका उन्हें एहसास तक न हो?
तफ़्सीर:
तो क्या लोगों को अल्लाह के रास्ते से रोकने के लिए साज़िश रचने वाले इस बात से निश्चिंत हो गए हैं कि अल्लाह उन्हें भी क़ारून की तरह धरती में धँसा दे, या उनके पास यातना ऐसी जगह से आ जाए जहाँ से वे उसके आने की प्रतीक्षा न कर रहे हों।
आयत 46
أَوْ يَأْخُذَهُمْ فِى تَقَلُّبِهِمْ فَمَا هُم بِمُعْجِزِينَ
أَوْ
या
يَأْخُذَهُمْ
वो पकड़ ले उन्हें
فِى
in
تَقَلُّبِهِمْ
उनके चलने-फिरने में
فَمَا
तो नहीं
هُم
वो
بِمُعْجِزِينَ
आजिज़ करने वाले
या उन्हें चलते-फिरते ही पकड़ ले, वे क़ाबू से बाहर निकल जानेवाले तो है नहीं?
तफ़्सीर:
या उनपर यातना उनकी यात्राओं में उनके चलने-फिरने और रोज़ी की तलाश में उनके दौड़-धूप करने की हालत में आ जाए। तो वे न तो (अल्लाह की पकड़ से) छूट सकते हैं और न खुद को बचा सकते हैं।
आयत 47
أَوْ يَأْخُذَهُمْ عَلَىٰ تَخَوُّفٍۢ فَإِنَّ رَبَّكُمْ لَرَءُوفٌۭ رَّحِيمٌ
أَوْ
या
يَأْخُذَهُمْ
वो पकड़ले उन्हें
عَلَىٰ
with
تَخَوُّفٍۢ
ख़ौफ़ज़दा होने पर
فَإِنَّ
तो बेशक
رَبَّكُمْ
रब तुम्हारा
لَرَءُوفٌۭ
अलबत्ता शफ़क़त करने वाला है
رَّحِيمٌ
निहायत रहम करने वाला है
क्या अल्लाह की पैदा की हुई किसी चीज़ को उन्होंने देखा नहीं कि किस प्रकार उसकी परछाइयाँ अल्लाह को सजदा करती और विनम्रता दिखाती हुई दाएँ और बाएँ ढलती है?
तफ़्सीर:
या वे इस बात से निश्चिंत हो गए हैं कि उनपर अल्लाह की यातना उस दशा में आ जाए जब वे उससे डरे हुए हों। क्योंकि अल्लाह हर हाल में उन्हें सज़ा देने में सक्षम है। निश्चय आपका रब बहुत करुणामय और अत्यंत दयावान् है। वह अपने बंदों को सज़ा देने में जल्दी नहीं करता कि शायद उसके बंदे उससे तौबा कर लें।
आयत 48
أَوَلَمْ يَرَوْا۟ إِلَىٰ مَا خَلَقَ ٱللَّهُ مِن شَىْءٍۢ يَتَفَيَّؤُا۟ ظِلَـٰلُهُۥ عَنِ ٱلْيَمِينِ وَٱلشَّمَآئِلِ سُجَّدًۭا لِّلَّهِ وَهُمْ دَٰخِرُونَ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَرَوْا۟
वो देखते
إِلَىٰ
[towards]
مَا
तरफ़ उसके जो
خَلَقَ
पैदा की
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِن
from
شَىْءٍۢ
कोई भी चीज़
يَتَفَيَّؤُا۟
झुकते हैं
ظِلَـٰلُهُۥ
साए उसके
عَنِ
to
ٱلْيَمِينِ
दाऐं से
وَٱلشَّمَآئِلِ
और बाऐं से
سُجَّدًۭا
सजदा करते हुए
لِّلَّهِ
अल्लाह के लिए
وَهُمْ
इस हाल में कि वो
دَٰخِرُونَ
आजिज़ करने वाले हैं
या वह उन्हें त्रस्त अवस्था में पकड़ ले? किन्तु तुम्हारा रब तो बड़ा ही करुणामय, दयावान है
तफ़्सीर:
क्या इन झुठलाने वालों ने अल्लाह की सृष्टियों पर चिंतन नहीं किया कि उनकी परछाई दिन में सूर्य की चाल के अनुसार और रात में चाँद की चाल के अनुसार, अपने रब के सामने झुकती हुई और वास्तविक रूप से उसे सजदा करती हुई दाएँ-बाएँ मुड़ती है, इस हाल में कि वह विनम्र होती है।
आयत 49
وَلِلَّهِ يَسْجُدُ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ مِن دَآبَّةٍۢ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ وَهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ
وَلِلَّهِ
और अल्लाह ही के लिए
يَسْجُدُ
सजदा करते हैं
مَا
जो
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में हैं
مِن
of
دَآبَّةٍۢ
जानदारों में से
وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
और फ़रिशते
وَهُمْ
और वो
لَا
(are) not
يَسْتَكْبِرُونَ
नहीं वो तकब्बुर करते
और आकाशों और धरती में जितने भी जीवधारी है वे सब अल्लाह ही को सजदा करते है और फ़रिश्ते भी और वे घमंड बिलकुल नहीं करते
तफ़्सीर:
तथा आकाशों में रहने वाले और धरती में रहने वाले सारे जानदार केवल एक अल्लाह को सजदा करते हैं। तथा फ़रिश्ते भी अकेले उसी को सजदा करते हैं। और वे अल्लाह की इबादत और उसके आज्ञापालन से अभिमान नहीं करते।
आयत 50
يَخَافُونَ رَبَّهُم مِّن فَوْقِهِمْ وَيَفْعَلُونَ مَا يُؤْمَرُونَ ۩
يَخَافُونَ
वो डरते हैं
رَبَّهُم
अपने रब से
مِّن
above them
فَوْقِهِمْ
अपने ऊपर से
وَيَفْعَلُونَ
और वो करते हैं
مَا
जो
يُؤْمَرُونَ ۩
वो हुक्म दिए जाते हैं
अपने ऊपर से अपने रब का डर रखते है और जो उन्हें आदेश होता है, वही करते है
तफ़्सीर:
और वे - अपनी निरंतर इबादत और आज्ञापालन के बावजूद - अपने पालनहार से डरते हैं, जो अपने अस्तित्व, शक्ति एवं प्रभुत्व के साथ उनके ऊपर है। और वे वही करते हैं, जिसका आदेश उनहें उनके पालनहार की ओर से मिलता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
हिजरत करने वालों के सिले (बदले) का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह की राह में घर-बार छोड़ने वालों को दुनिया और आखिरत दोनों में अच्छा बदला मिलता है।
आयत 51
۞ وَقَالَ ٱللَّهُ لَا تَتَّخِذُوٓا۟ إِلَـٰهَيْنِ ٱثْنَيْنِ ۖ إِنَّمَا هُوَ إِلَـٰهٌۭ وَٰحِدٌۭ ۖ فَإِيَّـٰىَ فَٱرْهَبُونِ
۞ وَقَالَ
और फ़रमाया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
لَا
(Do) not
تَتَّخِذُوٓا۟
ना तुम बनाओ
إِلَـٰهَيْنِ
[two] gods
ٱثْنَيْنِ ۖ
दो इलाह
إِنَّمَا
बेशक
هُوَ
वो
إِلَـٰهٌۭ
इलाह है
وَٰحِدٌۭ ۖ
एक ही
فَإِيَّـٰىَ
तो सिर्फ़ मुझ ही से
فَٱرْهَبُونِ
पस डरो मुझसे
अल्लाह का फ़रमान है, "दो-दो पूज्य-प्रभु न बनाओ, वह तो बस अकेला पूज्य-प्रभु है। अतः मुझी से डरो।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने अपने सभी बंदों से कहा : दो पूज्य न बनाओ। सत्य पूज्य तो केवल एक है, उसका कोई दूजा और साझी नहीं। इसलिए मुझी से डरो और मेरे सिवा किसी से न डरो।
आयत 52
وَلَهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَلَهُ ٱلدِّينُ وَاصِبًا ۚ أَفَغَيْرَ ٱللَّهِ تَتَّقُونَ
وَلَهُۥ
और उसी के लिए है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन में है
وَلَهُ
और उसी के लिए है
ٱلدِّينُ
दीन
وَاصِبًا ۚ
दायमी
أَفَغَيْرَ
Then is it other (than)
ٱللَّهِ
क्या फिर ग़ैर अल्लाह से
تَتَّقُونَ
तुम डरते हो
जो कुछ आकाशों और धरती में है सब उसी का है। उसी का दीन (धर्म) स्थायी और अनिवार्य है। फिर क्या अल्लाह के सिवा तुम किसी और का डर रखोगे?
तफ़्सीर:
आकाशों और धरती की सारी चीज़ें केवल उसी की हैं; वही उनका पैदा करने वाला, उनका मालिक और उनका प्रबंध करने वाला है। तथा आज्ञापालन, अधीनता और निष्ठा अकेले उसी के लिए सिद्ध है। तो क्या तुम अल्लाह के अलावा से डरते हो?! ऐसा नहीं होना चाहिए, बल्कि केवल उसी (अल्लाह) से डरो।
आयत 53
وَمَا بِكُم مِّن نِّعْمَةٍۢ فَمِنَ ٱللَّهِ ۖ ثُمَّ إِذَا مَسَّكُمُ ٱلضُّرُّ فَإِلَيْهِ تَجْـَٔرُونَ
وَمَا
और जो भी है
بِكُم
तुम्हारे पास
مِّن
of
نِّعْمَةٍۢ
कोई नेअमत
فَمِنَ
(is) from
ٱللَّهِ ۖ
पस अल्लाह की तरफ़ से है
ثُمَّ
फिर
إِذَا
जब
مَسَّكُمُ
पहुँचती है तुम्हें
ٱلضُّرُّ
तकलीफ़
فَإِلَيْهِ
तो तरफ़ उसी के
تَجْـَٔرُونَ
तुम फ़रयाद करते हो
तुम्हारे पास जो भी नेमत है वह अल्लाह ही की ओर से है। फिर जब तुम्हे कोई तकलीफ़ पहुँचती है, तो तुम उसी से फ़रियाद करते हो
तफ़्सीर:
(ऐ लोगो!) तुम्हारे पास जो भी धार्मिक या सांसारिक नेमत है, सब अल्लाह पाक की दी हुई है, किसी दूसरे की नहीं। फिर जब तुम विपत्ति, या बीमारी, या ग़रीबी से पीड़ित होते हो, तो केवल उसी के सामने गिड़गिड़ाकर दुआ करते हो, ताकि वह तुम्हारी विपत्ति को तुमसे दूर कर दे। इसलिए जो नेमतें प्रदान करता है और विपत्तियों को दूर करता है, वही है जिसकी एकमात्र इबादत की जानी चाहिए।
आयत 54
ثُمَّ إِذَا كَشَفَ ٱلضُّرَّ عَنكُمْ إِذَا فَرِيقٌۭ مِّنكُم بِرَبِّهِمْ يُشْرِكُونَ
ثُمَّ
फिर
إِذَا
जब
كَشَفَ
वो हटा देता है
ٱلضُّرَّ
तकलीफ़ को
عَنكُمْ
तुमसे
إِذَا
यकायक
فَرِيقٌۭ
एर गिरोह (के लोग)
مِّنكُم
तुम में से
بِرَبِّهِمْ
साथ अपने रब के
يُشْرِكُونَ
वो शरीक ठहराते हैं
फिर जब वह उस तकलीफ़ को तुमसे टाल देता है, तो क्या देखते है कि तुममें से कुछ लोग अपने रब के साथ साझीदार ठहराने लगते है,
तफ़्सीर:
फिर जब वह तुम्हारी दुआ को स्वीकार कर लेता है और तुम्हारा दुःख दूर कर देता है, तो तुममें से कुछ लोग अपने पालनहार के साथ साझी बनाने लगते हैं। चुनाँचे उसके साथ उसके अलावा की इबादत करने लगते हैं। तो यह कैसी नीचता है?!
आयत 55
لِيَكْفُرُوا۟ بِمَآ ءَاتَيْنَـٰهُمْ ۚ فَتَمَتَّعُوا۟ ۖ فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ
لِيَكْفُرُوا۟
ताकि वो नाशुक्री करें
بِمَآ
उसकी जो
ءَاتَيْنَـٰهُمْ ۚ
दिया हमने उन्हें
فَتَمَتَّعُوا۟ ۖ
तो तुम फ़ायदे उठालो
فَسَوْفَ
पस अनक़रीब
تَعْلَمُونَ
तुम जान लोगे
कि परिणामस्वरूप जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसके प्रति कृतघ्नता दिखलाएँ। अच्छा, कुछ मज़े ले लो, शीघ्र ही तुम्हें मालूम हो जाएगा
तफ़्सीर:
अल्लाह के साथ साझी ठहराने के कारण वे अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों - जिनमें कष्ट दूर करना भी शामिल है - की नाशुक्री करने लगे। इसीलिए उनसे कहा गया : तुम जिन नेमतों में हो उनसे थोड़ा लाभ उठा लो, यहाँ तक कि अल्लाह का तत्काल और विलंबित अज़ाब आ जाए।
आयत 56
وَيَجْعَلُونَ لِمَا لَا يَعْلَمُونَ نَصِيبًۭا مِّمَّا رَزَقْنَـٰهُمْ ۗ تَٱللَّهِ لَتُسْـَٔلُنَّ عَمَّا كُنتُمْ تَفْتَرُونَ
وَيَجْعَلُونَ
और वो मुक़र्रर करते हैं
لِمَا
उसके लिए जो
لَا
not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो जानते
نَصِيبًۭا
एक हिस्सा
مِّمَّا
उसमें से जो
رَزَقْنَـٰهُمْ ۗ
रिज़्क़ दिया हमने उन्हें
تَٱللَّهِ
क़सम अल्लाह की
لَتُسْـَٔلُنَّ
अलबत्ता तुम ज़रूर सवाल किए जाओगे
عَمَّا
उसके बारे में जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَفْتَرُونَ
तुम गढ़ते
हमने उन्हें जो आजीविका प्रदान की है उसमें वे उसका हिस्सा लगाते है जिन्हें वे जानते भी नहीं। अल्लाह की सौगंध! तुम जो झूठ घड़ते हो उसके विषय में तुमसे अवश्य पूछा जाएगा
तफ़्सीर:
और मुश्रिक लोग हमारे दिए हुए अपने धनों में से एक भाग अपनी उन मूर्तियों के लिए भी निर्धारित करते हैं, जो कुछ नहीं जानती हैं (क्योंकि वे निर्जीव चीज़ें हैं, और न ही वे लाभ या हानि पहुँचाने का अधिकार रखती हैं), वे इसके द्वारा उनकी निकटता प्राप्त करना चाहते हैं। अल्लाह की क़सम! (ऐ मुश्रिको!) तुमसे क़ियामत के दिन तुम्हारे इस दावे के बारे में ज़रूर पूछा जाएगा कि ये मूर्तियाँ पूज्य हैं और यह कि तुम्हारे धन में उनका भी एक हिस्सा है।
आयत 57
وَيَجْعَلُونَ لِلَّهِ ٱلْبَنَـٰتِ سُبْحَـٰنَهُۥ ۙ وَلَهُم مَّا يَشْتَهُونَ
وَيَجْعَلُونَ
और वो बनाते हैं
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
ٱلْبَنَـٰتِ
बेटियाँ
سُبْحَـٰنَهُۥ ۙ
पाक है वो
وَلَهُم
और उनके लिए है
مَّا
जो
يَشْتَهُونَ
वो ख़्वाहिश रखते हैं
और वे अल्लाह के लिए बेटियाँ ठहराते है - महान और उच्च है वह - और अपने लिए वह, जो वे चाहें
तफ़्सीर:
बहुदेववादी लोग अल्लाह के लिए बेटियाँ ठहराते हैं और यह विश्वास रखते हैं कि अल्लाह की बेटियाँ फ़रिश्ते हैं। वह अल्लाह के लिए वह कुछ चुनते हैं, जिसे अपने लिए पसंद नहीं करते। उनके इस कृत्य से अल्लाह पवित्र एवं पाक है। दूसरी तरफ़ वे खुद अपने लिए बेटों का होना पसंद करते हैं। तो इससे बड़ा पाप और क्या हो सकता है?!
आयत 58
وَإِذَا بُشِّرَ أَحَدُهُم بِٱلْأُنثَىٰ ظَلَّ وَجْهُهُۥ مُسْوَدًّۭا وَهُوَ كَظِيمٌۭ
وَإِذَا
और जब
بُشِّرَ
ख़ुशख़बरी दी जाती है
أَحَدُهُم
उनमें से किसी एक को
بِٱلْأُنثَىٰ
लड़की की
ظَلَّ
होजाता है
وَجْهُهُۥ
चेहरा उसका
مُسْوَدًّۭا
स्याह
وَهُوَ
और वो
كَظِيمٌۭ
सख़्त ग़मगीन होता है
और जब उनमें से किसी को बेटी की शुभ सूचना मिलती है तो उसके चहरे पर कलौंस छा जाती है और वह घुटा-घुटा रहता है
तफ़्सीर:
और जब इन मुश्रिकों में से किसी को लड़की पैदा होने की शुभ सूचना दी जाती है, तो यह ख़बर उसपर इतनी नागवार गुज़रती है कि उसका चेहरा काला पड़ जाता है, तथा उसका दिल शोक और दुख से भर जाता है। फिर वह अल्लाह की ओर उस चीज़ की निस्बत करता है, जिसे अपने लिए पसंद नहीं करता!
आयत 59
يَتَوَٰرَىٰ مِنَ ٱلْقَوْمِ مِن سُوٓءِ مَا بُشِّرَ بِهِۦٓ ۚ أَيُمْسِكُهُۥ عَلَىٰ هُونٍ أَمْ يَدُسُّهُۥ فِى ٱلتُّرَابِ ۗ أَلَا سَآءَ مَا يَحْكُمُونَ
يَتَوَٰرَىٰ
वो छुपता है
مِنَ
from
ٱلْقَوْمِ
क़ौम से
مِن
(because) of
سُوٓءِ
बसबब आर के
مَا
जो
بُشِّرَ
वो ख़ुश ख़बरी दिया गया
بِهِۦٓ ۚ
जिसकी
أَيُمْسِكُهُۥ
क्या वो रोके रखे उसे
عَلَىٰ
in
هُونٍ
साथ ज़िल्लत के
أَمْ
या
يَدُسُّهُۥ
वो दबा दे उसे
فِى
in
ٱلتُّرَابِ ۗ
मिट्टी में
أَلَا
ख़बरदार
سَآءَ
कितना बुरा है
مَا
जो
يَحْكُمُونَ
वो फ़ैसला करते हैं
जो शुभ सूचना उसे दी गई वह (उसकी दृष्टि में) ऐसी बुराई की बात हुई जो उसके कारण वह लोगों से छिपता फिरता है कि अपमान सहन करके उसे रहने दे या उसे मिट्टी में दबा दे। देखो, कितना बुरा फ़ैसला है जो वे करते है!
तफ़्सीर:
बेटी पैदा होने की सूचना उसे इतनी बुरी लगती है कि लोगों से छिपता फिरता है। वह दिल ही दिल में सोचता है कि क्या इस नवजात को अपमान और दीनता के साथ अपने पास रखे या उसे ज़िंदा धरती में गाड़ दे? कितना बुरा निर्णय है, जो बहुदेववादी करते हैं कि अपने पालनहार के लिए वह कुछ ठहराते हैं, जिसे अपने लिए नापसंद करते हैं।
आयत 60
لِلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ مَثَلُ ٱلسَّوْءِ ۖ وَلِلَّهِ ٱلْمَثَلُ ٱلْأَعْلَىٰ ۚ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
لِلَّذِينَ
उन लोगों के लिए जो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाते
بِٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत पर
مَثَلُ
मिसाल है
ٱلسَّوْءِ ۖ
बुरी
وَلِلَّهِ
और अल्लाह के लिए
ٱلْمَثَلُ
मिसाल है
ٱلْأَعْلَىٰ ۚ
आला
وَهُوَ
और वो
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त है
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिक्मत वाला है
जो लोग आख़िरत को नहीं मानते बुरी मिसाल है उनकी। रहा अल्लाह, तो उसकी मिसाल अत्यन्त उच्च है। वह तो प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
आख़िरत पर विश्वास न रखने वाले काफ़िरों की बुरी विशेषता है, जैसे- बच्चे की आवश्यकता, अज्ञानता और कुफ़्र आदि। जबकि अल्लाह के प्रताप, पूर्णता, संपन्नता, बेनियाज़ी और ज्ञान जैसे उच्चतम प्रशंसनीय गुण हैं। वह पवित्र अल्लाह अपने राज्य में प्रभुत्वशाली है, उसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता। अपनी रचना, प्रबंधन और क़ानूनसाज़ी में हिकमत वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
बेटियों की पैदाइश पर जाहिली रवैये की मज़म्मत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि औलाद चाहे बेटा हो या बेटी, दोनों अल्लाह की नेमत हैं, इनमें फर्क करना गलत है।
आयत 61
وَلَوْ يُؤَاخِذُ ٱللَّهُ ٱلنَّاسَ بِظُلْمِهِم مَّا تَرَكَ عَلَيْهَا مِن دَآبَّةٍۢ وَلَـٰكِن يُؤَخِّرُهُمْ إِلَىٰٓ أَجَلٍۢ مُّسَمًّۭى ۖ فَإِذَا جَآءَ أَجَلُهُمْ لَا يَسْتَـْٔخِرُونَ سَاعَةًۭ ۖ وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ
وَلَوْ
और अगर
يُؤَاخِذُ
मुआख़िज़ा करे
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلنَّاسَ
लोगों का
بِظُلْمِهِم
बवजह उनके ज़ुल्म के
مَّا
ना
تَرَكَ
वो छोड़े
عَلَيْهَا
इस (ज़मीन) पर
مِن
any
دَآبَّةٍۢ
कोई जानदार
وَلَـٰكِن
और लेकिन
يُؤَخِّرُهُمْ
वो मोहलत दे रहा है उन्हें
إِلَىٰٓ
for
أَجَلٍۢ
एक मुद्दत तक
مُّسَمًّۭى ۖ
मुक़र्रर
فَإِذَا
फिर जब
جَآءَ
आ जाएगा
أَجَلُهُمْ
उनका वक़त मुक़र्रर
لَا
not
يَسْتَـْٔخِرُونَ
ना वो पीछे रहेंगे
سَاعَةًۭ ۖ
एक घड़ी
وَلَا
और ना
يَسْتَقْدِمُونَ
वो आगे बढ़ सकेंगे
यदि अल्लाह लोगों को उनके अत्याचार पर पकड़ने ही लग जाता तो धरती पर किसी जीवधारी को न छोड़ता, किन्तु वह उन्हें एक निश्चित समय तक टाले जाता है। फिर जब उनका नियत समय आ जाता है तो वे न तो एक घड़ी पीछे हट सकते है और न आगे बढ़ सकते है
तफ़्सीर:
यदि अल्लाह लोगों को उनके अत्याचार और क़ुफ़्र के कारण दंडित करने लगे, तो धरती पर चलने वाले किसी मनुष्य या जानवर को न छोड़े। लेकिन वह महिमावान उन्हें अपने ज्ञान में निर्दिष्ट एक समय के लिए विलंबित कर देता है। फिर जब उसके ज्ञान में निर्दिष्ट वह समय आ जाता है, तो वे थोड़े समय के लिए भी न पीछे रहते हैं और न आगे बढ़ते हैं।
आयत 62
وَيَجْعَلُونَ لِلَّهِ مَا يَكْرَهُونَ وَتَصِفُ أَلْسِنَتُهُمُ ٱلْكَذِبَ أَنَّ لَهُمُ ٱلْحُسْنَىٰ ۖ لَا جَرَمَ أَنَّ لَهُمُ ٱلنَّارَ وَأَنَّهُم مُّفْرَطُونَ
وَيَجْعَلُونَ
और वो मुक़र्रर करते हैं
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
مَا
जो
يَكْرَهُونَ
वो (ख़ुद) नापसंद करते हैं
وَتَصِفُ
और बयान करती हैं
أَلْسِنَتُهُمُ
ज़बानें उनकी
ٱلْكَذِبَ
झूठ
أَنَّ
कि बेशक
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلْحُسْنَىٰ ۖ
भलाई है
لَا
No
جَرَمَ
नहीं कोई शक
أَنَّ
यक़ीनन
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلنَّارَ
आग है
وَأَنَّهُم
और यक़ीनन वो
مُّفْرَطُونَ
आगे पहुँचाए जाने वाले हैं
वे अल्लाह के लिए वह कुछ ठहराते है, जिसे ख़ुद अपने लिए नापसन्द करते है और उनकी ज़बाने झूठ कहती है कि उनके लिए अच्छा परिणाम है। निस्संदेह उनके लिए आग है और वे उसी में पड़े छोड़ दिए जाएँगे
तफ़्सीर:
वे अल्लाह के लिए बेटियाँ ठहराते हैं, जिन्हें अपने लिए पसंद नहीं करते। और उनकी ज़बानें झूठ बोलती हैं कि यदि वे पुनः जीवित किए भी गए, जैसा कि मुसलमानों का दावा है, तो उनके लिए अल्लाह के पास सबसे अच्छी स्थिति होगी। जबकि सच्चाई यह है कि जहन्नम उन्हीं के लिए है। वे उसमें छोड़ दिए जाएँगे, उससे बाहर कभी नहीं निकलेंगे।
आयत 63
تَٱللَّهِ لَقَدْ أَرْسَلْنَآ إِلَىٰٓ أُمَمٍۢ مِّن قَبْلِكَ فَزَيَّنَ لَهُمُ ٱلشَّيْطَـٰنُ أَعْمَـٰلَهُمْ فَهُوَ وَلِيُّهُمُ ٱلْيَوْمَ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
تَٱللَّهِ
क़सम अल्लाह की
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
أَرْسَلْنَآ
भेजा हमने (रसूलों को)
إِلَىٰٓ
to
أُمَمٍۢ
तरफ़ कुछ क़ौमों के
مِّن
before you
قَبْلِكَ
आपसे पहले
فَزَيَّنَ
तो मुज़य्यन कर दिया
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान ने
أَعْمَـٰلَهُمْ
उनके आमाल को
فَهُوَ
पस वो ही
وَلِيُّهُمُ
दोस्त है उनका
ٱلْيَوْمَ
आज
وَلَهُمْ
और उनके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
अल्लाह की सौगंध! हम तुमसे पहले भी कितने समुदायों की ओर रसूल भेज चुके है, किन्तु शैतान ने उनकी करतूतों को उनके लिए सुहावना बना दिया। तो वही आज भी उनका संरक्षक है। उनके लिए तो एक दुखद यातना है
तफ़्सीर:
अल्लाह की क़सम! (ऐ रसूल) हमने आपके पहले के समुदायों की ओर भी रसूल भेजे थे। तो शैतान ने उनके शिर्क, कुफ़्र और अवज्ञा जैसे बुरे कार्यों को उनके लिए सुंदर बना दिया। तो वही क़ियामत के दिन उनका तथाकथित सहायक है। इसलिए वे उसी से मदद माँगें। और उनके लिए क़ियामत के दिन दर्दनाक यातना है।
आयत 64
وَمَآ أَنزَلْنَا عَلَيْكَ ٱلْكِتَـٰبَ إِلَّا لِتُبَيِّنَ لَهُمُ ٱلَّذِى ٱخْتَلَفُوا۟ فِيهِ ۙ وَهُدًۭى وَرَحْمَةًۭ لِّقَوْمٍۢ يُؤْمِنُونَ
وَمَآ
और नहीं
أَنزَلْنَا
नाज़िल किया हमने
عَلَيْكَ
आप पर
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब को
إِلَّا
मगर
لِتُبَيِّنَ
ताकि आप वाज़ेह करें
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلَّذِى
वो चीज़
ٱخْتَلَفُوا۟
उन्होंने इख़्तिलाफ़ किया
فِيهِ ۙ
जिसमें
وَهُدًۭى
और हिदायत
وَرَحْمَةًۭ
और रहमत है
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يُؤْمِنُونَ
जो ईमान रखते हों
हमने यह किताब तुमपर इसीलिए अवतरित की है कि जिसमें वे विभेद कर रहे है उसे तुम उनपर स्पष्टा कर दो और यह मार्गदर्शन और दयालुता है उन लोगों के लिए जो ईमान लाएँ
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) हमने आप पर यह क़ुरआन इसलिए उतारा है, ताकि आप सभी लोगों के लिए एकेश्वरवाद, मरणोपरांत पुनर्जीवन और शरीयत के अहकाम खोल-खोलकर बयान कर दें, जिनमें उन्होंने मतभेद किया है। और इसलिए कि यह क़ुरआन अल्लाह और उसके रसूलों पर तथा क़ुरआन की लाई हुए बातों पर ईमान रखने वालों के लिए मार्गदर्शक और दया बन जाए। क्योंकि वही सत्य से लाभ उठाने वाले हैं।
आयत 65
وَٱللَّهُ أَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ فَأَحْيَا بِهِ ٱلْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَآ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ لِّقَوْمٍۢ يَسْمَعُونَ
وَٱللَّهُ
और अल्लाह ने
أَنزَلَ
उतारा
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مَآءًۭ
पानी
فَأَحْيَا
फिर ज़िन्दा कर दिया
بِهِ
साथ उसके
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
بَعْدَ
बाद
مَوْتِهَآ ۚ
उसकी मौत के
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَةًۭ
अलबत्ता एक निशानी है
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَسْمَعُونَ
जो सुनते हैं
और अल्लाह ही ने आकाश से पानी बरसाया। फिर उसके द्वारा धरती को उसके मृत हो जाने के पश्चात जीवित किया। निश्चय ही इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानी है जो सुनते है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने आसमान की ओर से बारिश बरसाई, फिर सूखी बंजर धरती को, उससे पौधे उगाकर पुनर्जीवित किया। निःसंदेह आकाश की ओर से बारिश उतारने और उसके द्वारा पृथ्वी के पौधों को उगाने में, उन लोगों के लिए अल्लाह की शक्ति का एक स्पष्ट संकेत है, जो अल्लाह की वाणी को सुनते और उसपर चिंतन-मनन करते हैं।
आयत 66
وَإِنَّ لَكُمْ فِى ٱلْأَنْعَـٰمِ لَعِبْرَةًۭ ۖ نُّسْقِيكُم مِّمَّا فِى بُطُونِهِۦ مِنۢ بَيْنِ فَرْثٍۢ وَدَمٍۢ لَّبَنًا خَالِصًۭا سَآئِغًۭا لِّلشَّـٰرِبِينَ
وَإِنَّ
और बेशक
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
فِى
in
ٱلْأَنْعَـٰمِ
मवेशी जानवरों में
لَعِبْرَةًۭ ۖ
अलबत्ता इबरत है
نُّسْقِيكُم
हम पिलाते हैं तुम्हें
مِّمَّا
उसमें से जो
فِى
(is) in
بُطُونِهِۦ
उनके पेटों में है
مِنۢ
from
بَيْنِ
दर्मियान
فَرْثٍۢ
गोबर
وَدَمٍۢ
और ख़ून के
لَّبَنًا
दूध
خَالِصًۭا
ख़ालिस
سَآئِغًۭا
ख़ुशगवार
لِّلشَّـٰرِبِينَ
पीने वालों के लिए
और तुम्हारे लिए चौपायों में से एक बड़ी शिक्षा-सामग्री है, जो कुछ उनके पेटों में है उसमें से गोबर और रक्त से मध्य से हम तुम्हे विशुद्ध दूध पिलाते है, जो पीनेवालों के लिए अत्यन्त प्रिय है,
तफ़्सीर:
और (ऐ लोगो!) तुम्हारे लिए, ऊँटों, गायों और भेड़ों में एक उपदेश है। हम तुम्हें इन जानवरों के थनों से दूध पिलाते हैं, जो उनके पेट में मौजूद मल और उनके शरीर में मौजूद रक्त के बीच से निकलता है। किंतु इसके बावजूद साफ, शुद्ध तथा स्वादिष्ट दूध निकलता है, जो पीने वालों के लिए सुखद होता है।
आयत 67
وَمِن ثَمَرَٰتِ ٱلنَّخِيلِ وَٱلْأَعْنَـٰبِ تَتَّخِذُونَ مِنْهُ سَكَرًۭا وَرِزْقًا حَسَنًا ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ لِّقَوْمٍۢ يَعْقِلُونَ
وَمِن
And from
ثَمَرَٰتِ
और फलों में से
ٱلنَّخِيلِ
खजूर
وَٱلْأَعْنَـٰبِ
और अंगूर
تَتَّخِذُونَ
तुम बनालेते हो
مِنْهُ
उससे
سَكَرًۭا
नशाआवर चीज़
وَرِزْقًا
और रिज़्क़
حَسَنًا ۗ
अच्छा
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَةًۭ
अलबत्ता एक निशानी है
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَعْقِلُونَ
जो अक़्ल रखते हैं
और खजूरों और अंगूरों के फलों से भी, जिससे तुम मादक चीज़ भी तैयार कर लेते हो और अच्छी रोज़ी भी। निश्चय ही इसमें बुद्धि से काम लेनेवाले लोगों के लिए एक बड़ी निशानी है
तफ़्सीर:
और तुम्हारे लिए, हमारी ओर से प्राप्त होने वाले खजूर और अंगूर जैसे फलों में भी एक उपदेश है। उनसे तुम नशीला पदार्थ बनाते हो, जिससे बुद्धि चली जाती है, और यह अच्छा नहीं है। तथा तुम उनसे अच्छी जीविका भी बनाते हो, जिसका तुम लाभ उठाते हो, जैसे खजूर, किशमिश, सिरका और शीरा। इन सब चीज़ों में उन लोगों के लिए अल्लाह की शक्ति और अनुग्रह का संकेत है, जो बुद्धि से काम लेते हैं, क्योंकि वही लोग उपदेश ग्रहण करते हैं।
आयत 68
وَأَوْحَىٰ رَبُّكَ إِلَى ٱلنَّحْلِ أَنِ ٱتَّخِذِى مِنَ ٱلْجِبَالِ بُيُوتًۭا وَمِنَ ٱلشَّجَرِ وَمِمَّا يَعْرِشُونَ
وَأَوْحَىٰ
और वही की
رَبُّكَ
आपके रब ने
إِلَى
to
ٱلنَّحْلِ
तरफ़ शहद की मक्खी के
أَنِ
कि
ٱتَّخِذِى
तू बनाले
مِنَ
among
ٱلْجِبَالِ
पहाड़ों में से
بُيُوتًۭا
घर
وَمِنَ
and among
ٱلشَّجَرِ
और दरख़्तों में से
وَمِمَّا
और उसमें से जो
يَعْرِشُونَ
वो ऊपर चढ़ाते हैं
और तुम्हारे रब ने मुधमक्खी के जी में यह बात डाल दी कि "पहाड़ों में और वृक्षों में और लोगों के बनाए हुए छत्रों में घर बना
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) तेरे पालनहार ने मधुमक्खियों के दिल में यह बात डाल दी और उन्हें निर्देशित किया कि : तुम पर्वतों में अपने लिए घर बनाओ, तथा पेड़ों में और उसमें घर बनाओ, जो लोग निर्माण करते और छत बनाते हैं।
आयत 69
ثُمَّ كُلِى مِن كُلِّ ٱلثَّمَرَٰتِ فَٱسْلُكِى سُبُلَ رَبِّكِ ذُلُلًۭا ۚ يَخْرُجُ مِنۢ بُطُونِهَا شَرَابٌۭ مُّخْتَلِفٌ أَلْوَٰنُهُۥ فِيهِ شِفَآءٌۭ لِّلنَّاسِ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ لِّقَوْمٍۢ يَتَفَكَّرُونَ
ثُمَّ
फिर
كُلِى
खा
مِن
from
كُلِّ
हर क़िस्म के
ٱلثَّمَرَٰتِ
फलों की
فَٱسْلُكِى
फिर चलती रह
سُبُلَ
रास्तों पर
رَبِّكِ
अपने रब के
ذُلُلًۭا ۚ
हमवार/आसान
يَخْرُجُ
निकलता है
مِنۢ
from
بُطُونِهَا
उसके पेटों से
شَرَابٌۭ
शरबत/शहद
مُّخْتَلِفٌ
मुख़्तलिफ़ हैं
أَلْوَٰنُهُۥ
रंग उसके
فِيهِ
उसमें
شِفَآءٌۭ
शिफ़ा है
لِّلنَّاسِ ۗ
लोगों के लिए
إِنَّ
यक़ीनन
فِى
in
ذَٰلِكَ
उसमें
لَـَٔايَةًۭ
अलबत्ता निशानी है
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَتَفَكَّرُونَ
जो ग़ौरो फ़िक्र करते हैं
फिर हर प्रकार के फल-फूलों से ख़ुराक ले और अपने रब के समतम मार्गों पर चलती रह।" उसके पेट से विभिन्न रंग का एक पेय निकलता है, जिसमें लोगों के लिए आरोग्य है। निश्चय ही सोच-विचार करनेवाले लोगों के लिए इसमें एक बड़ी निशानी है
तफ़्सीर:
फिर उन सभी फलों से खा, जो तू चाहे और उन रास्तों पर चल, जिनपर चलने के लिए तेरे पालनहार ने तुझे प्रेरित किया है। उन मधुमक्खियों के पेट से विभिन्न रंगों का शहद निकलता है। कुछ सफ़ेद, तो कुछ पीला और कुछ किसी और रंग का। इसमें लोगों के लिए शिफ़ा (आरोग्य) है। वे इसके साथ बीमारियों का इलाज करते हैं। निःसंदेह मधुमक्खियों को यह बात सिखाने और उनके पेट से निकलने वाले शहद में, उन लोगों के लिए अल्लाह की शक्ति और उसके अपनी सृष्टि के मामलों के प्रबंधन का प्रमाण है, जो सोच-विचार करते हैं। क्योंकि वही शिक्षा ग्रहण करते हैं।
आयत 70
وَٱللَّهُ خَلَقَكُمْ ثُمَّ يَتَوَفَّىٰكُمْ ۚ وَمِنكُم مَّن يُرَدُّ إِلَىٰٓ أَرْذَلِ ٱلْعُمُرِ لِكَىْ لَا يَعْلَمَ بَعْدَ عِلْمٍۢ شَيْـًٔا ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌۭ قَدِيرٌۭ
وَٱللَّهُ
और अल्लाह ने
خَلَقَكُمْ
पैदा किया तुम्हें
ثُمَّ
फिर
يَتَوَفَّىٰكُمْ ۚ
वो फ़ौत करता है तुम्हें
وَمِنكُم
और तुम में से
مَّن
कोई
يُرَدُّ
फेरा जाता है
إِلَىٰٓ
तरफ़
أَرْذَلِ
the worst
ٱلْعُمُرِ
नाकारा उमर के
لِكَىْ
ताकि
لَا
not
يَعْلَمَ
ना वो जाने
بَعْدَ
बाद
عِلْمٍۢ
जानने के
شَيْـًٔا ۚ
कुछ भी
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلِيمٌۭ
बहुत इल्म वाला है
قَدِيرٌۭ
ख़ूब क़ुदरत वाला है
अल्लाह ने तुम्हें पैदा किया। फिर वह तुम्हारी आत्माओं को ग्रस्त कर लेता है और तुममें से कोई (बुढापे की) निकृष्ट तम अवस्था की ओर फिर जाता है, कि (परिणामस्वरूप) जानने के पश्चात फिर वह कुछ न जाने। निस्संदेह अल्लाह सर्वज्ञ, बड़ा सामर्थ्यवान है
तफ़्सीर:
और अल्लाह ही ने तुम्हें बिना किसी पूर्व नमूने के पैदा किया है। फिर तुम्हारी आयु ख़त्म होने पर तुम्हें मृत्यु देगा। और तुममें से किसी को आयु के सबसे बुरे चरण तक पहुँचा दिया जाता है और वह पुढ़ापा है। फिर वह उसमें से कुछ भी नहीं जानता, जो वह पहले जानता था। अल्लाह सब कुछ जानने वाला है, उससे बंदों का कोई कार्य छिपा नहीं है। वह हर चीज़ में सक्षम है, उसे कोई चीज़ विवश नहीं कर सकती।
आज की ज़िंदगी में सबक़
शहद की मक्खी की मिसाल का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि छोटी मखलूक (जैसे मक्खी) भी अल्लाह के इशारे पर बेहतरीन निज़ाम बना लेती है, इससे हमें कुदरत की हिकमत का सबक मिलता है।
आयत 71
وَٱللَّهُ فَضَّلَ بَعْضَكُمْ عَلَىٰ بَعْضٍۢ فِى ٱلرِّزْقِ ۚ فَمَا ٱلَّذِينَ فُضِّلُوا۟ بِرَآدِّى رِزْقِهِمْ عَلَىٰ مَا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُهُمْ فَهُمْ فِيهِ سَوَآءٌ ۚ أَفَبِنِعْمَةِ ٱللَّهِ يَجْحَدُونَ
وَٱللَّهُ
और अल्लाह ने
فَضَّلَ
फ़ज़ीलत दी
بَعْضَكُمْ
तुम्हारे बाज़ को
عَلَىٰ
over
بَعْضٍۢ
बाज़ पर
فِى
in
ٱلرِّزْقِ ۚ
रिज़्क़ में
فَمَا
तो नहीं
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
فُضِّلُوا۟
फ़ज़ीलत दिए गए
بِرَآدِّى
लौटाने वाले
رِزْقِهِمْ
रिज़्क़ अपना
عَلَىٰ
ऊपर
مَا
उनके जो
مَلَكَتْ
मालिक हुए
أَيْمَـٰنُهُمْ
दाऐं हाथ उनके
فَهُمْ
तो वो
فِيهِ
उसमें
سَوَآءٌ ۚ
यक्सां/बराबर हों
أَفَبِنِعْمَةِ
क्या फिर नेअमत का
ٱللَّهِ
अल्लाह की
يَجْحَدُونَ
वो इन्कार करते हैं
और अल्लाह ने तुममें से किसी को किसी पर रोज़ी में बड़ाई दी है। किन्तु जिनको बड़ाई दी गई है वे ऐसे नहीं है कि अपनी रोज़ी उनकी ओर फेर दिया करते हों, जो उनके क़ब्ज़े में है कि वे सब इसमें बराबर हो जाएँ। फिर क्या अल्लाह के अनुग्रह का उन्हें इनकार है?
तफ़्सीर:
अल्लाह ने तुम्हें जो रोज़ी दी है, उसमें कुछ को दूसरों पर श्रेष्ठता प्रदान की है। इसलिए तुममें से किसी को धनी तो किसी को निर्धन, किसी को राजा तो किसी को प्रजा बनाया है। तो जिन्हें अल्लाह ने रोज़ी के मामले में आगे रखा है, वे अल्लाह के दिए हुए धन को अपने दासों के हवाले करने वाले नहीं हैं ताकि वे राज्य में उनके साथ समान भागीदार हो सकें। तो भला वे कैसे पसंद करते हैं कि अल्लाह के उसके बंदों में से कोई साझी हों, जबकि उन्हें खुद अपने बारे में यह पसंद नहीं कि उनके दासों में से उनके कोई साझी हों जो उनके साथ बराबर हों? भला यह कैसा अन्याय है? और अल्लाह की नेमतों का इससे बड़ा इनकार और क्या हो सकता है?
आयत 72
وَٱللَّهُ جَعَلَ لَكُم مِّنْ أَنفُسِكُمْ أَزْوَٰجًۭا وَجَعَلَ لَكُم مِّنْ أَزْوَٰجِكُم بَنِينَ وَحَفَدَةًۭ وَرَزَقَكُم مِّنَ ٱلطَّيِّبَـٰتِ ۚ أَفَبِٱلْبَـٰطِلِ يُؤْمِنُونَ وَبِنِعْمَتِ ٱللَّهِ هُمْ يَكْفُرُونَ
وَٱللَّهُ
और अल्लाह ने
جَعَلَ
बनाया
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنْ
from
أَنفُسِكُمْ
तुम्हारे नफ़्सों से
أَزْوَٰجًۭا
बीवियों को
وَجَعَلَ
और उसने बनाया
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنْ
from
أَزْوَٰجِكُم
तुम्हारी बीवियों से
بَنِينَ
बेटों
وَحَفَدَةًۭ
और पोतों को
وَرَزَقَكُم
और उसने रिज़्क़ दिया तुम्हें
مِّنَ
from
ٱلطَّيِّبَـٰتِ ۚ
पाकीज़ा चीज़ों से
أَفَبِٱلْبَـٰطِلِ
क्या फिर बातिल पर
يُؤْمِنُونَ
वो ईमान रखते हैं
وَبِنِعْمَتِ
और नेअमत का
ٱللَّهِ
अल्लाह की
هُمْ
वो
يَكْفُرُونَ
वो इन्कार करते हैं
और अल्लाह ही ने तुम्हारे लिए तुम्हारी सहजाति पत्नियों बनाई और तुम्हारी पत्नियों से तुम्हारे लिए पुत्र और पौत्र पैदा किए और तुम्हे अच्छी पाक चीज़ों की रोज़ी प्रदान की; तो क्या वे मिथ्या को मानते है और अल्लाह के अनुग्रह ही का उन्हें इनकार है?
तफ़्सीर:
और (ऐ लोगो!) अल्लाह ने तुम्हारे लिए तुम्हारे ही वर्ग से पत्नियाँ बनाईं, जिनसे तुम शांति प्राप्त करते हो, और तुम्हारी पत्नियों से तुम्हारे लिए बेटे और पोते बनाए, और तुम्हें खाने की पवित्र चीज़ें प्रदान कीं (जैसे- मांस, अनाज और फल)। तो क्या वे झूठी मूर्तियों और पत्थरों को मानते हैं, और अल्लाह की उन ढेर सारी नेमतों का इनकार करते हैं, जिन्हें वे गिन भी नहीं सकते, और अल्लाह का शुक्रिया नहीं अदा करते कि केवल उसी पर ईमान लाएँ?
आयत 73
وَيَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَمْلِكُ لَهُمْ رِزْقًۭا مِّنَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ شَيْـًۭٔا وَلَا يَسْتَطِيعُونَ
وَيَعْبُدُونَ
और वो इबादत करते हैं
مِن
other than
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مَا
उनकी जो
لَا
not
يَمْلِكُ
नहीं मालिक होते
لَهُمْ
उनके लिए
رِزْقًۭا
रिज़्क़ के
مِّنَ
from
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमामों से
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन से
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
وَلَا
और ना
يَسْتَطِيعُونَ
वो इस्तिताअत रखते हैं
और अल्लाह से हटकर उन्हें पूजते है, जिन्हें आकाशों और धरती से रोज़ी प्रदान करने का कुछ भी अधिकार प्राप्त नहीं है और न उन्हें कोई सामर्थ्य ही प्राप्त है
तफ़्सीर:
और ये बहुदेववादी लोग अल्लाह के अलावा ऐसी मूर्तियों की पूजा करते हैं, जो न उन्हें आकाशों तथा धरती से कुछ भी रोज़ी प्रदान करने का अधिकार रखती हैं और न ही उन्हें इसका अधिकार प्राप्त हो सकता है, क्योंकि वे निर्जीव चीज़ें हैं, जिनके पास जीवन या ज्ञान नहीं है।
आयत 74
فَلَا تَضْرِبُوا۟ لِلَّهِ ٱلْأَمْثَالَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
فَلَا
पस ना
تَضْرِبُوا۟
तुम बयान करो
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
ٱلْأَمْثَالَ ۚ
मिसालें
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَعْلَمُ
जानता है
وَأَنتُمْ
और तुम
لَا
(do) not
تَعْلَمُونَ
नहीं तुम जानते
अतः अल्लाह के लिए मिसालें न घड़ो। जानता अल्लाह है, तुम नहीं जानते
तफ़्सीर:
अतः (ऐ लोगो!) इन मूर्तियों में से जो लाभ या हानि के मालिक नहीं हैं किसी को अल्लाह के समान न ठहराओ। क्योंकि अल्लाह के समान कोई नहीं है कि उसे तुम इबादत में उसका साझी मानो। अल्लाह अपनी महिमा और पूर्णता के गुणों को जानता है और तुम उसे नहीं जानते। यही कारण है कि तुम बहुदेववाद में पड़ जाते हो और दावा करते हो कि वह तुम्हारी मूर्तियों के समान है।
आयत 75
۞ ضَرَبَ ٱللَّهُ مَثَلًا عَبْدًۭا مَّمْلُوكًۭا لَّا يَقْدِرُ عَلَىٰ شَىْءٍۢ وَمَن رَّزَقْنَـٰهُ مِنَّا رِزْقًا حَسَنًۭا فَهُوَ يُنفِقُ مِنْهُ سِرًّۭا وَجَهْرًا ۖ هَلْ يَسْتَوُۥنَ ۚ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
۞ ضَرَبَ
बयान की
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مَثَلًا
मिसाल
عَبْدًۭا
एक ग़ुलाम
مَّمْلُوكًۭا
ममलूक की
لَّا
not
يَقْدِرُ
नहीं वो क़ुदरत रखता
عَلَىٰ
on
شَىْءٍۢ
किसी चीज़ पर
وَمَن
और उसकी जो
رَّزَقْنَـٰهُ
रिज़्क दिया हमने उसे
مِنَّا
अपनी तरफ़ से
رِزْقًا
रिज़्क़
حَسَنًۭا
अच्छा
فَهُوَ
तो वो
يُنفِقُ
वो ख़र्च करता हैं
مِنْهُ
उसमें से
سِرًّۭا
पोशीदा
وَجَهْرًا ۖ
एलानिया
هَلْ
क्या
يَسْتَوُۥنَ ۚ
वो बराबर हो सकते हैं
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
لِلَّهِ ۚ
अल्लाह के लिए है
بَلْ
बल्कि
أَكْثَرُهُمْ
अक्सर उनके
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
अल्लाह ने एक मिसाल पेश की है: एक ग़ुलाम है, जिसपर दूसरे का अधिकार है, उसे किसी चीज़ पर अधिकार प्राप्त नहीं। इसके विपरीत एक वह व्यक्ति है, जिसे हमने अपनी ओर से अच्छी रोज़ी प्रदान की है, फिर वह उसमें से खुले और छिपे ख़र्च करता है। तो क्या वे परस्पर समान है? प्रशंसा अल्लाह के लिए है! किन्तु उनमें अधिकतर लोग जानते नहीं
तफ़्सीर:
अल्लाह ने बहुदेववादियों के खंडन के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत किया है : एक पराधीन दास है, जिसे कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। उसके पास खर्च करने के लिए कुछ भी नहीं है। और एक आज़ाद व्यक्ति है, जिसे हमने अपने पास से वैध धन प्रदान किया है, जिसमें वह जैसे चाहे, व्यवहार करे। चुनाँचे वह उसमें से गुप्त रूप से और खुले तौर पर जितना चाहता है, खर्च करता है। तो ये दोनों व्यक्ति बराबर नहीं हो सकते। फिर तुम उस अल्लाह को, जो मालिक है, अपने स्वामित्व की चीज़ों में जैसे चाहे व्यवहार करता है, अपनी असहाय मूर्तियों के बराबर कैसे बनाते हो?! सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जो प्रशंसा का हक़दार है। परंतु अधिकतर बहुदेववादी इस बात को नहीं जानते कि पूज्यता एकमात्र अल्लाह ही के लिए विशिष्ट है और अकेला वही पूजा किए जाने के योग्य है।
आयत 76
وَضَرَبَ ٱللَّهُ مَثَلًۭا رَّجُلَيْنِ أَحَدُهُمَآ أَبْكَمُ لَا يَقْدِرُ عَلَىٰ شَىْءٍۢ وَهُوَ كَلٌّ عَلَىٰ مَوْلَىٰهُ أَيْنَمَا يُوَجِّههُّ لَا يَأْتِ بِخَيْرٍ ۖ هَلْ يَسْتَوِى هُوَ وَمَن يَأْمُرُ بِٱلْعَدْلِ ۙ وَهُوَ عَلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ
وَضَرَبَ
और बयान की
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مَثَلًۭا
एक मिसाल
رَّجُلَيْنِ
दो मर्दों की
أَحَدُهُمَآ
उन दोनों में से एक
أَبْكَمُ
गूँगा है
لَا
not
يَقْدِرُ
नहीं वो क़ुदरत रखता
عَلَىٰ
on
شَىْءٍۢ
किसी चीज़ पर
وَهُوَ
और वो
كَلٌّ
बोझ है
عَلَىٰ
on
مَوْلَىٰهُ
अपने मालिक पर
أَيْنَمَا
जहां कहीं
يُوَجِّههُّ
वो भेजता है उसे
لَا
not
يَأْتِ
नहीं वो लाता
بِخَيْرٍ ۖ
कोई भलाई
هَلْ
क्या
يَسْتَوِى
बराबर हो सकता है
هُوَ
वो
وَمَن
और वो जो
يَأْمُرُ
हुक्म देता है
بِٱلْعَدْلِ ۙ
इन्साफ़ का
وَهُوَ
और वो
عَلَىٰ
(is) on
صِرَٰطٍۢ
ऊपर रास्ते
مُّسْتَقِيمٍۢ
सीधे के है
अल्लाह ने एक और मिसाल पेश की है: दो व्यक्ति है। उनमें से एक गूँगा है। किसी चीज़ पर उसे अधिकार प्राप्त नहीं। वह अपने स्वामी पर एक बोझ है - उसे वह जहाँ भेजता है, कुछ भला करके नहीं लाता। क्या वह और जो न्याय का आदेश देता है और स्वयं भी सीधे मार्ग पर है वह, समान हो सकते है?
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उनके तर्क के खंडन के लिए एक और उदाहरण दिया है, जो दो आदमियों का उदाहरण है : उनमें से एक गूँगा है। जो अपने बहरेपन और गूँगेपन के कारण, न सुनता है, न बोलता है और न समझता है। वह खुद को और दूसरों को लाभ पहुँचाने में अक्षम है, तथा वह अपने अभिभावक पर एक भारी बोझ है। वह उसे जहाँ भी भेजता है, कोई भलाई लेकर नहीं आता और न किसी अपेक्षित चीज़ को प्राप्त करने में सफल होता है। क्या जिसकी यह स्थिति है, उसके बराबर हो सकता है, जो अच्छी तरह सुनने और बोलने वाला है, तथा उसका लाभ दूसरों तक पहुँचने वाला है। क्योंकि वह लोगों को न्याय करने का आदेश देता है, और वह अपने आप में सदाचारी है। अतः वह एक स्पष्ट मार्ग पर है, जिसमें कोई संदेह और टेढ़ापन नहीं है?! तो भला तुम (ऐ बहुदेववादियो!) अल्लाह को, जो महिमा और पूर्णता के गुणों से विशिष्ट है, अपनी उन मूर्तियों के बराबर कैसे बनाते हो, जो न सुन सकती हैं, न बोल सकती हैं और न कोई लाभ पहुँचा सकती हैं और न कोई हानि दूर कर सकती हैं?!
आयत 77
وَلِلَّهِ غَيْبُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ وَمَآ أَمْرُ ٱلسَّاعَةِ إِلَّا كَلَمْحِ ٱلْبَصَرِ أَوْ هُوَ أَقْرَبُ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ
وَلِلَّهِ
और अल्लाह ही के लिए है
غَيْبُ
ग़ैब
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ ۚ
और ज़मीन का
وَمَآ
और नहीं
أَمْرُ
मामला
ٱلسَّاعَةِ
क़यामत का
إِلَّا
मगर
كَلَمْحِ
जैसे झपकना
ٱلْبَصَرِ
आँख का
أَوْ
या
هُوَ
है वो
أَقْرَبُ ۚ
उस से भी ज़्यादा क़रीब
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌۭ
ख़ूब क़ुदरत रखने वाला है
आकाशों और धरती के रहस्यों का सम्बन्ध अल्लाह ही से है। और उस क़ियामत की घड़ी का मामला तो बस ऐसा है जैसे आँखों का झपकना या वह इससे भी अधिक निकट है। निश्चय ही अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्ती है
तफ़्सीर:
आकाशों और धरती की छिपी बातों का ज्ञान केवल अल्लाह के पास है। उसका ज्ञान उसी के साथ विशिष्ट है, उसकी किसी सृष्टि को इसका ज्ञान नहीं है। और क़ियामत का मामला, जो उसके साथ विशिष्ट ग़ैब (परोक्ष) की बातों में से है, उसके आने की गति में जब वह उसका इरादा करे, तो वह एक आँख की पलक को बंद करने और खोलने की तरह है, बल्कि वह इससे भी अधिक निकट है। निःसंदेह अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है। उसे कोई चीज़ विवश नहीं कर सकती। जब वह किसी चीज़ का इरादा करता है, तो उससे कहता है : (हो जा), तो वह हो जाती है।
आयत 78
وَٱللَّهُ أَخْرَجَكُم مِّنۢ بُطُونِ أُمَّهَـٰتِكُمْ لَا تَعْلَمُونَ شَيْـًۭٔا وَجَعَلَ لَكُمُ ٱلسَّمْعَ وَٱلْأَبْصَـٰرَ وَٱلْأَفْـِٔدَةَ ۙ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
وَٱللَّهُ
और अल्लाह ने
أَخْرَجَكُم
निकाला तुम्हें
مِّنۢ
from
بُطُونِ
पेटों से
أُمَّهَـٰتِكُمْ
तुम्हारी माओं के
لَا
not
تَعْلَمُونَ
नहीं तुम जानते थे
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
وَجَعَلَ
और उसने बनाए
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلسَّمْعَ
कान
وَٱلْأَبْصَـٰرَ
और आँखें
وَٱلْأَفْـِٔدَةَ ۙ
और दिल
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَشْكُرُونَ
तुम शुक्रगुज़ार बनो
अल्लाह ने तुम्हें तुम्हारी माँओ के पेट से इस दशा में निकाला कि तुम कुछ जानते न थे। उसने तुम्हें कान, आँखें और दिल दिए, ताकि तुम कृतज्ञता दिखलाओ
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने तुम्हें (ऐ लोगो!) तुम्हारी माताओं के पेट से, गर्भावस्था के समय के पूरे होने के बाद, शिशु के रूप में निकाला, तुम कुछ नहीं जानते थे, और उसने तुम्हारे लिए कान बनाए ताकि उससे सुन सको, और आँखें बनाईं ताकि उनसे देख सको और हृदय बनाए ताकि उससे समझ सको, इस उम्मीद में कि तुम उसकी नेमतों का शुक्रिया अदा करो।
आयत 79
أَلَمْ يَرَوْا۟ إِلَى ٱلطَّيْرِ مُسَخَّرَٰتٍۢ فِى جَوِّ ٱلسَّمَآءِ مَا يُمْسِكُهُنَّ إِلَّا ٱللَّهُ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّقَوْمٍۢ يُؤْمِنُونَ
أَلَمْ
क्या नहीं
يَرَوْا۟
उन्होंने देखा
إِلَى
towards
ٱلطَّيْرِ
तरफ़ परिन्दों के
مُسَخَّرَٰتٍۢ
जो मुसख़्ख़र किए गए हैं
فِى
in
جَوِّ
फ़ज़ा में
ٱلسَّمَآءِ
आसमान की
مَا
नहीं
يُمْسِكُهُنَّ
थामे हुए उन्हें
إِلَّا
मगर
ٱللَّهُ ۗ
अल्लाह
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियां हैं
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يُؤْمِنُونَ
जो ईमान लाते हों
क्या उन्होंने पक्षियों को नभ मंडल में वशीभूत नहीं देखा? उन्हें तो बस अल्लाह ही थामें हुए होता है। निश्चय ही इसमें उन लोगों के लिए कितनी ही निशानियाँ है जो ईमान लाएँ
तफ़्सीर:
क्या बहुदेववादियों ने पक्षियों को वशीभूत, हवा में उड़ने के लिए तैयार नहीं देखा, कि अल्लाह ने उन्हें पंख प्रदान करके और हवा को हल्की बनाकर तथा उन्हें अपने पंख को फैलाने और समेटने की प्रेरणा देकर कैसे उड़ने के लायक़ बनाया? उन्हें हवा में गिरने से केवल अल्लाह सर्वशक्तिमान ही रोकता है। निश्चय इस वशीकरण और गिरने से थामे रखे में उन लोगों के लिए संकेत हैं, जो अल्लाह पर विश्वास रखते हैं; क्योंकि वही लोग संकेतों और शिक्षाओं से लाभ उठाते हैं।
आयत 80
وَٱللَّهُ جَعَلَ لَكُم مِّنۢ بُيُوتِكُمْ سَكَنًۭا وَجَعَلَ لَكُم مِّن جُلُودِ ٱلْأَنْعَـٰمِ بُيُوتًۭا تَسْتَخِفُّونَهَا يَوْمَ ظَعْنِكُمْ وَيَوْمَ إِقَامَتِكُمْ ۙ وَمِنْ أَصْوَافِهَا وَأَوْبَارِهَا وَأَشْعَارِهَآ أَثَـٰثًۭا وَمَتَـٰعًا إِلَىٰ حِينٍۢ
وَٱللَّهُ
और अल्लाह ने
جَعَلَ
बनाया
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنۢ
[from]
بُيُوتِكُمْ
तुम्हारे घरों को
سَكَنًۭا
रहने की जगह
وَجَعَلَ
और उसने बनाया
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّن
from
جُلُودِ
खालों से
ٱلْأَنْعَـٰمِ
मवेशियों की
بُيُوتًۭا
घरों को
تَسْتَخِفُّونَهَا
तुम हलका-फुलका पाते हो उन्हें
يَوْمَ
दिन
ظَعْنِكُمْ
अपने सफ़र के
وَيَوْمَ
और दिन
إِقَامَتِكُمْ ۙ
अपनी इक़ामत के
وَمِنْ
and from
أَصْوَافِهَا
और उनकी ऊन से
وَأَوْبَارِهَا
और उनकी पशम से
وَأَشْعَارِهَآ
और उनके बालों से
أَثَـٰثًۭا
सामान
وَمَتَـٰعًا
और फायदे की चीज़ें
إِلَىٰ
for
حِينٍۢ
एक वक़्त तक
और अल्लाह ने तुम्हारे घरों को तुम्हारे लिए टिकने की जगह बनाया है और जानवरों की खालों से भी तुम्हारे लिए घर बनाए - जिन्हें तुम अपनी यात्रा के दिन और अपने ठहरने के दिन हल्का-फुलका पाते हो - और एक अवधि के लिए उनके ऊन, उनके लोमचर्म और उनके बालों से कितने ही सामान और बरतने की चीज़े बनाई
तफ़्सीर:
अल्लाह ने तुम्हारे पत्थर एवं अन्य चीज़ों के बनाए हुए घरों को तुम्हारे लिए स्थिरता और विश्राम का स्थान बनाया। तथा ऊँट, गाय और बकरी की खालों से तुम्हारे लिए शहरी घरों की तरह रेगिस्तान (दीहात) में तंबू और गुंबद बनाए, जिन्हें तुम्हारे लिए अपने सफ़र के दौरान एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना आसान होता है, और तुम्हारे पड़ाव डालने के समय उन्हें आसानी से लगाया जा सकता है। तथा भेड़ के ऊन, ऊँट के रोएँ और बकरी के बालों से तुम्हारे घरों के सामान, कपड़े और ग़िलाफ़ बनाए, जिनसे तुम एक निर्धारित समय तक लाभ उठाते हो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
रिज़्क में फर्क और अल्लाह की मिसालों का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि रिज़्क में फर्क अल्लाह की हिकमत है, इस पर हसद करने की बजाय शुक्र करना चाहिए।
आयत 81
وَٱللَّهُ جَعَلَ لَكُم مِّمَّا خَلَقَ ظِلَـٰلًۭا وَجَعَلَ لَكُم مِّنَ ٱلْجِبَالِ أَكْنَـٰنًۭا وَجَعَلَ لَكُمْ سَرَٰبِيلَ تَقِيكُمُ ٱلْحَرَّ وَسَرَٰبِيلَ تَقِيكُم بَأْسَكُمْ ۚ كَذَٰلِكَ يُتِمُّ نِعْمَتَهُۥ عَلَيْكُمْ لَعَلَّكُمْ تُسْلِمُونَ
وَٱللَّهُ
और अल्लाह ने
جَعَلَ
बनाए
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّمَّا
उसमें से जो
خَلَقَ
उसने पैदा किया
ظِلَـٰلًۭا
साये
وَجَعَلَ
और उसने बनाईं
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنَ
from
ٱلْجِبَالِ
पहाड़ों में
أَكْنَـٰنًۭا
छुपने की जगहें
وَجَعَلَ
और उसने बनाए
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
سَرَٰبِيلَ
कुर्ते
تَقِيكُمُ
जो बचाते हैं तुम्हें
ٱلْحَرَّ
गर्मी से
وَسَرَٰبِيلَ
और कुर्ते
تَقِيكُم
जो बचाते हैं तुम्हें
بَأْسَكُمْ ۚ
तुम्हारी जंग से
كَذَٰلِكَ
इस तरह
يُتِمُّ
वो पूरा करता है
نِعْمَتَهُۥ
अपनी नेअमत को
عَلَيْكُمْ
तुम पर
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تُسْلِمُونَ
तुम फरमाबरदार बन जाओ
और अल्लाह ने तुम्हारे लिए अपनी पैदा की हुई चीज़ों से छाँवों का प्रबन्ध किया और पहाड़ो में तुम्हारे लिए छिपने के स्थान बनाए और तुम्हें लिबास दिए जो गर्मी से बचाते है और कुछ अन्य वस्त्र भी दिए जो तुम्हारी लड़ाई में तुम्हारे लिए बचाव का काम करते है। इस प्रकार वह तुमपर अपनी नेमत पूरी करता है, ताकि तुम आज्ञाकारी बनो
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने तुम्हें गर्मी से छाया प्रदान करने के लिए पेड़ों और मकानों की छाया बनाई, और तुम्हारे लिए पहाड़ों में माँद, खोह और गुफाएँ बनाईं, जहाँ तुम ठंड, गर्मी और दुश्मन से बचते हो और तुम्हें सूती तथा अन्य वस्तुओं के कपड़े प्रदान किए, जो तुम्हें गर्मी और ठंड से बचाते हैं, और तुम्हें कवच प्रदान किए, जो युद्ध में दुश्मन की वार से बचाते हैं, जिसके कारण हथियार तुम्हारे शरीर में प्रवेश नहीं करता। जिस तरह अल्लाह ने तुम्हें पिछली नेमतें प्रदान की हैं, उसी तरह वह तुम पर अपनी नेमतें पूरी करता है, इस आशा में एक अल्लाह के आज्ञाकारी बन जाओ और किसी को उसका साझी न बनाओ।
आयत 82
فَإِن تَوَلَّوْا۟ فَإِنَّمَا عَلَيْكَ ٱلْبَلَـٰغُ ٱلْمُبِينُ
فَإِن
फिर अगर
تَوَلَّوْا۟
वो मुंह मोड़ जाऐं
فَإِنَّمَا
तो बेशक
عَلَيْكَ
आप पर
ٱلْبَلَـٰغُ
पहुँचाना है
ٱلْمُبِينُ
खुल्लम-खुल्ला
फिर यदि वे मुँह मोड़ते है तो तुम्हारा दायित्व तो केवल साफ़-साफ़ सन्देश पहुँचा देना है
तफ़्सीर:
फिर यदि वे (ऐ रसूल!) आपके लाए हुए धर्म को मानने और उसकी पुष्टि करने से मुँह मोड़ें, तो आपका कार्य केवल उसे स्पष्ट रूप से पहुँचा देना है, जिसके पहुँचाने का आपको आदेश दिया गया है। आपका काम उन्हें हिदायत स्वीकारने पर मजबूर करना नहीं है।
आयत 83
يَعْرِفُونَ نِعْمَتَ ٱللَّهِ ثُمَّ يُنكِرُونَهَا وَأَكْثَرُهُمُ ٱلْكَـٰفِرُونَ
يَعْرِفُونَ
वो पहुँचाते हैं
نِعْمَتَ
नेअमत को
ٱللَّهِ
अल्लाह की
ثُمَّ
फिर
يُنكِرُونَهَا
वो इन्कार करते हैं उसका
وَأَكْثَرُهُمُ
और अकसर उनके
ٱلْكَـٰفِرُونَ
नाशुक्रे हैं
वे अल्लाह की नेमत को पहचानते है, फिर उसका इनकार करते है और उनमें अधिकतर तो अकृतज्ञ है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने बहुदेववादियों को जो नेमतें दे रखी हैं, वे उन्हें अच्छी तरह पहचानते हैं, जिनमें एक नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को उनकी ओर रसूल बनाकर भेजना भी शामिल है। फिर वे उनके प्रति आभार प्रकट न करके और उसके रसूल को झुठलाकर, उसकी नेमतों का इनकार करते हैं। और उनमें से अधिकतर लोग अल्लाह की नेमतों का इनकार ही करने वाले हैं।
आयत 84
وَيَوْمَ نَبْعَثُ مِن كُلِّ أُمَّةٍۢ شَهِيدًۭا ثُمَّ لَا يُؤْذَنُ لِلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَلَا هُمْ يُسْتَعْتَبُونَ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
نَبْعَثُ
हम खड़ा करेंगे
مِن
from
كُلِّ
every
أُمَّةٍۢ
हर उम्मत से
شَهِيدًۭا
एक गवाह
ثُمَّ
फिर
لَا
not
يُؤْذَنُ
ना इजाज़त दी जाएगी
لِلَّذِينَ
उनके जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يُسْتَعْتَبُونَ
वो उज़्र क़ुबूल किए जाऐंगे
याद करो जिस दिन हम हर समुदाय में से एक गवाह खड़ा करेंगे, फिर जिन्होंने इनकार किया होगा उन्हें कोई अनुमति प्राप्त न होगी। और न उन्हें इसका अवसर ही दिया जाएगा वे उसे राज़ी कर लें
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) याद करें, जिस दिन अल्लाह हर समुदाय के रसूल को खड़ा करेगा, जो उस समुदाय के मोमिन के ईमान और काफ़िर के कुफ़्र की गवाही देगा। फिर उसके बाद काफ़िरों को अपने कुफ़्र का बहाना पेश करने की अनुमति नहीं दी जाएगी, और न ही वे दुनिया में वापस लौटाए जाएँगे कि अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के काम कर सकें। क्योंकि आख़िरत हिसाब का घर है, काम का घर नहीं।
आयत 85
وَإِذَا رَءَا ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ ٱلْعَذَابَ فَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُمْ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ
وَإِذَا
और जब
رَءَا
देखेंगे
ٱلَّذِينَ
वो लोग जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब को
فَلَا
तो ना
يُخَفَّفُ
तख़्फ़ीफ की जाएगी
عَنْهُمْ
उनसे
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يُنظَرُونَ
वो मोहलत दिए जाऐंगे
और जब वे लोग जिन्होंने अत्याचार किया, यातना देख लेंगे तो न वह उनके लिए हलकी की जाएगी और न उन्हें मुहलत ही मिलेगी
तफ़्सीर:
और जब शिर्क करने वाले अत्याचारी लोग यातना को देख लेंगे, तो उनसे यातना कम नहीं की जाएगी और न ही उनसे यातना को टालकर उन्हें मोहलत दी जाएगी। बल्कि वे उसमें हमेशा-हमेशा के लिए प्रवेश करेंगे।
आयत 86
وَإِذَا رَءَا ٱلَّذِينَ أَشْرَكُوا۟ شُرَكَآءَهُمْ قَالُوا۟ رَبَّنَا هَـٰٓؤُلَآءِ شُرَكَآؤُنَا ٱلَّذِينَ كُنَّا نَدْعُوا۟ مِن دُونِكَ ۖ فَأَلْقَوْا۟ إِلَيْهِمُ ٱلْقَوْلَ إِنَّكُمْ لَكَـٰذِبُونَ
وَإِذَا
और जब
رَءَا
देखेंगे
ٱلَّذِينَ
वो लोग जिन्होंने
أَشْرَكُوا۟
शरीक बनाए
شُرَكَآءَهُمْ
अपने शरीकों को
قَالُوا۟
वो कहेंगे
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
هَـٰٓؤُلَآءِ
ये हैं
شُرَكَآؤُنَا
शरीक हमारे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्हें
كُنَّا
थे हम
نَدْعُوا۟
हम पुकारते
مِن
besides You
دُونِكَ ۖ
तेरे सिवा
فَأَلْقَوْا۟
तो वो डालेंगे
إِلَيْهِمُ
तरफ़ उनके
ٱلْقَوْلَ
बात को
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
لَكَـٰذِبُونَ
अलबत्ता झूठे हो
और जब वे लोग जिन्होंने शिर्क किया अपने ठहराए हुए साझीदारों को देखेंगे तो कहेंगे, "हमारे रब! यही हमारे वे साझीदार है जिन्हें हम तुझसे हटकर पुकारते थे।" इसपर वे उनकी ओर बात फेंक मारेंगे कि "तुम बिलकुल झूठे हो।"
तफ़्सीर:
और जब मुश्रिक लोग क़ियामत के दिन अपने उन पूज्यों को देख लेंगे, जिनकी वे अल्लाह को छोड़कर पूजा किया करते थे, तो कहेंगे : ऐ हमारे पालनहार! यही हमारे वे साझी हैं, जिन्हें हम तुझे छोड़कर पूजा करते थे। ऐसा इस उद्देश्य से कहेंगे कि अपना बोझ उनपर डाल दें। तो अल्लाह उनके पूज्यों को बोलने की शक्ति प्रदान कर देगा और वे उनकी बात का खंडन करते हुए कहेंगे : (ऐ मुश्रिको!) निश्चय तुम अल्लाह के साथ एक साझी की पूजा करने में झूठे हो। क्योंकि उसके साथ कोई साझी ही नहीं कि उसकी पूजा की जाए।
आयत 87
وَأَلْقَوْا۟ إِلَى ٱللَّهِ يَوْمَئِذٍ ٱلسَّلَمَ ۖ وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَفْتَرُونَ
وَأَلْقَوْا۟
और वो पेश करेंगे
إِلَى
to
ٱللَّهِ
तरफ़ अल्लाह के
يَوْمَئِذٍ
उस दिन
ٱلسَّلَمَ ۖ
सुलह
وَضَلَّ
और गुम हो जाऐंगे
عَنْهُم
उनसे
مَّا
जो
كَانُوا۟
थे वो
يَفْتَرُونَ
वो झूठ गढ़ते
उस दिन वे अल्लाह के आगे आज्ञाकारी एवं वशीभूत होकर आ पड़ेगे। और जो कुछ वे घड़ा करते थे वह सब उनसे खोकर रह जाएगा
तफ़्सीर:
उस दिन शिर्क करने वाले अल्लाह के समक्ष समर्पण कर देंगे और अकेले उसी के आज्ञानुवर्ती बन जाएँगे, तथा उनका यह गढ़ा हुआ दावा हवा हो जाएगा कि उनकी मूर्तियाँ अल्लाह के निकट उनकी सिफ़ारिश करेंगी।
आयत 88
ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَصَدُّوا۟ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ زِدْنَـٰهُمْ عَذَابًۭا فَوْقَ ٱلْعَذَابِ بِمَا كَانُوا۟ يُفْسِدُونَ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
وَصَدُّوا۟
और रोका
عَن
from
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते से
زِدْنَـٰهُمْ
ज़्यादा देंगे हम उन्हें
عَذَابًۭا
अज़ाब
فَوْقَ
over
ٱلْعَذَابِ
ऊपर अज़ाब के
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يُفْسِدُونَ
वो फ़साद करते
जिन लोगों ने इनकार किया और अल्लाह के मार्ग से रोका उनके लिए हम यातना पर यातना बढ़ाते रहेंगे, उस बिगाड़ के बदले में जो वे पैदा करते रहे
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने अल्लाह का इनकार किया और दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोका, वे अपने कुफ़्र के कारण जिस यातना के हक़दार थे, हम (उनके स्वयं भ्रष्ट होने तथा दूसरों को गुमराह करके भ्रष्टाचार पैदा करने के कारण) उनकी यातना उससे और अधिक कर देंगे।
आयत 89
وَيَوْمَ نَبْعَثُ فِى كُلِّ أُمَّةٍۢ شَهِيدًا عَلَيْهِم مِّنْ أَنفُسِهِمْ ۖ وَجِئْنَا بِكَ شَهِيدًا عَلَىٰ هَـٰٓؤُلَآءِ ۚ وَنَزَّلْنَا عَلَيْكَ ٱلْكِتَـٰبَ تِبْيَـٰنًۭا لِّكُلِّ شَىْءٍۢ وَهُدًۭى وَرَحْمَةًۭ وَبُشْرَىٰ لِلْمُسْلِمِينَ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
نَبْعَثُ
हम उठाऐंगे
فِى
among
كُلِّ
every
أُمَّةٍۢ
हर उम्मत से
شَهِيدًا
एक गवाह
عَلَيْهِم
उन पर
مِّنْ
from
أَنفُسِهِمْ ۖ
उन्हीं में से
وَجِئْنَا
And We (will) bring
بِكَ
और हम लाऐंगे आपको
شَهِيدًا
गवाह बनाकर
عَلَىٰ
over
هَـٰٓؤُلَآءِ ۚ
उन लोगों पर
وَنَزَّلْنَا
और नाज़िल की हमने
عَلَيْكَ
आप पर
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
تِبْيَـٰنًۭا
खोलकर बयान करने वाली
لِّكُلِّ
of every
شَىْءٍۢ
हर चीज़ को
وَهُدًۭى
और हिदायत
وَرَحْمَةًۭ
और रहमत
وَبُشْرَىٰ
और ख़ुशख़बरी
لِلْمُسْلِمِينَ
मुसलमानों के लिए
और उस समय को याद करो जब हम हर समुदाय में स्वयं उसके अपने लोगों में से एक गवाह उनपर नियुक्त करके भेज रहे थे और (इसी रीति के अनुसार) तुम्हें इन लोगों पर गवाह नियुक्त करके लाए। हमने तुमपर किताब अवतरित की हर चीज़ को खोलकर बयान करने के लिए और मुस्लिम (आज्ञाकारियों) के लिए मार्गदर्शन, दयालुता और शुभ सूचना के रूप में
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) उस दिन को याद करें, जब हम हर समुदाय में एक रसूल को खड़ा करेंगे, जो उनके कुफ़्र या ईमान की गवाही देगा। यह रसूल उन्हीं के समुदाय से होगा और उन्हीं की भाषा में बात करेगा। और (ऐ रसूल!) हम आपको सभी समुदायों पर गवाह बनाकर लाएँगे। और हमने आपपर क़ुरआन को हर उस चीज़ को स्पष्ट करने के लिए उतारा है, जिसके स्पष्टीकरण की आवश्यकता है, जैसे कि हलाल एवं हराम, पुण्य एवं दंड, इत्यादि। तथा हमने उसे लोगों को सत्य का मार्ग दिखाने, उसपर ईमान लाने और उसके अनुसार कार्य करने वाले के लिए दया और अल्लाह पर ईमान रखने वालों के लिए उस स्थायी नेमत की शुभ सूचना के रूप में उतारा है, जिसकी उन्हें प्रतीक्षा है।
आयत 90
۞ إِنَّ ٱللَّهَ يَأْمُرُ بِٱلْعَدْلِ وَٱلْإِحْسَـٰنِ وَإِيتَآئِ ذِى ٱلْقُرْبَىٰ وَيَنْهَىٰ عَنِ ٱلْفَحْشَآءِ وَٱلْمُنكَرِ وَٱلْبَغْىِ ۚ يَعِظُكُمْ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ
۞ إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَأْمُرُ
हुक्म देता है
بِٱلْعَدْلِ
अदल का
وَٱلْإِحْسَـٰنِ
और एहसान का
وَإِيتَآئِ
और देने का
ذِى
(to) relatives
ٱلْقُرْبَىٰ
कराबतदारों को
وَيَنْهَىٰ
और वो रोकता है
عَنِ
[from]
ٱلْفَحْشَآءِ
बेहयाई से
وَٱلْمُنكَرِ
और बुराई से
وَٱلْبَغْىِ ۚ
और ज़्यादती से
يَعِظُكُمْ
वो नसीहत करता है तुम्हें
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ो
निश्चय ही अल्लाह न्याय का और भलाई का और नातेदारों को (उनके हक़) देने का आदेश देता है और अश्लीलता, बुराई और सरकशी से रोकता है। वह तुम्हें नसीहत करता है, ताकि तुम ध्यान दो
तफ़्सीर:
अल्लाह अपने बंदों को न्याय का आदेश देता है कि बंदा अल्लाह के हक़ और बंदों के हक़ अदा करे और निर्णय करते समय बिना औचित्य के किसी को किसी पर वरीयता न दे। तथा वह उपकार का आदेश देता है कि बंदा अनुग्रह करते हुए ऐसे कार्य करे, जिसके लिए वह बाध्य नहीं है, जैसे कि स्वेच्छा से खर्च करना और अत्याचारी को क्षमा कर देना। और रिश्तेदारों को उनकी आवश्यकता की चीज़ें देने का आदेश देता है। और हर बुरी चीज़ से रोकता है, चाहे उसका संबंध बात से हो, जैसे- गंदी बात कहना या कार्य से, जैसे- व्यभिचार। और उससे रोकता है, जो शरीयत की नज़र में नापसंदीदा है और इसमें सारे पाप शामिल हैं। और अत्याचार तथा अहंकार से रोकता है। अल्लाह ने इस आयत में तुम्हें जिन बातों का आदेश दिया है और जिन कार्यों से रोका है, उनके निष्पादन का तुम्हें उपदेश देता है। इस उम्मीद में कि तुम उसके उपदेश पर ध्यान दो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नेमतों के शुक्र और इंसाफ-अहसान के हुक्म का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि इंसाफ, अहसान और रिश्तेदारों से नेकी करने का हुक्म हर मुसलमान की रोज़मर्रा ज़िंदगी में लागू होना चाहिए।
आयत 91
وَأَوْفُوا۟ بِعَهْدِ ٱللَّهِ إِذَا عَـٰهَدتُّمْ وَلَا تَنقُضُوا۟ ٱلْأَيْمَـٰنَ بَعْدَ تَوْكِيدِهَا وَقَدْ جَعَلْتُمُ ٱللَّهَ عَلَيْكُمْ كَفِيلًا ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ مَا تَفْعَلُونَ
وَأَوْفُوا۟
और पूरा करो
بِعَهْدِ
अहद को
ٱللَّهِ
अल्लाह के
إِذَا
जब
عَـٰهَدتُّمْ
अहद करो तुम
وَلَا
और ना
تَنقُضُوا۟
तुम तोड़ो
ٱلْأَيْمَـٰنَ
क़समों को
بَعْدَ
बाद
تَوْكِيدِهَا
उनके पक्का करने के
وَقَدْ
हालाँकि तहक़ीक़
جَعَلْتُمُ
बनालिया है तुमने
ٱللَّهَ
अल्लाह को
عَلَيْكُمْ
अपने ऊपर
كَفِيلًا ۚ
ज़ामिन
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَعْلَمُ
जानता है
مَا
जो
تَفْعَلُونَ
तुम करते हो
अल्लाह के साथ की हुई प्रतिज्ञा को पूरा करो, जबकि तुमने प्रतिज्ञा की हो। और अपनी क़समों को उन्हें सुदृढ़ करने के पश्चात मत तोड़ो, जबकि तुम अपने ऊपर अल्लाह को अपना ज़ामिन बना चुके हो। निश्चय ही अल्लाह जानता है जो कुछ तुम करते हो
तफ़्सीर:
अल्लाह या उसके बंदों को दिए हुए हर वचन को पूरा करो, और अल्लाह की क़सम खाकर क़समों को सुदृढ़ करने के बाद, उन्हें मत तोड़ो, हालाँकि तुमने अल्लाह को अपने आपपर गवाह बनाया है कि तुम अपनी क़समों को पूरा करोगे। निश्चय अल्लाह जानता है, जो कुछ तुम करते हो। उसमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है, और वह तुम्हें उसका बदला देगा।
आयत 92
وَلَا تَكُونُوا۟ كَٱلَّتِى نَقَضَتْ غَزْلَهَا مِنۢ بَعْدِ قُوَّةٍ أَنكَـٰثًۭا تَتَّخِذُونَ أَيْمَـٰنَكُمْ دَخَلًۢا بَيْنَكُمْ أَن تَكُونَ أُمَّةٌ هِىَ أَرْبَىٰ مِنْ أُمَّةٍ ۚ إِنَّمَا يَبْلُوكُمُ ٱللَّهُ بِهِۦ ۚ وَلَيُبَيِّنَنَّ لَكُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ مَا كُنتُمْ فِيهِ تَخْتَلِفُونَ
وَلَا
और ना
تَكُونُوا۟
तुम हो जाओ
كَٱلَّتِى
उस औरत की तरह
نَقَضَتْ
जिसने तोड़ डाला
غَزْلَهَا
सूत अपना
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद
قُوَّةٍ
मज़्बूत (कातने) के
أَنكَـٰثًۭا
टुकड़े-टुकड़े करके
تَتَّخِذُونَ
तुम बना लेते हो
أَيْمَـٰنَكُمْ
अपनी क़समों को
دَخَلًۢا
बहाना
بَيْنَكُمْ
आपस में
أَن
ताकि
تَكُونَ
हो जाए
أُمَّةٌ
एक जमाअत
هِىَ
वो
أَرْبَىٰ
ज़्यादा बढ़ी हुई (माल में)
مِنْ
than
أُمَّةٍ ۚ
जमाअत से (दूसरी)
إِنَّمَا
बेशक
يَبْلُوكُمُ
आज़माता है तुम्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِهِۦ ۚ
साथ उसके
وَلَيُبَيِّنَنَّ
और अलबत्ता वो ज़रूर वाज़ेह करेगा
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
مَا
वो जो
كُنتُمْ
थे तुम
فِيهِ
जिसमें
تَخْتَلِفُونَ
तुम इख़्तिलाफ़ करते
तुम उस स्त्री की भाँति न हो जाओ जिसने अपना सूत मेहनत से कातने के पश्चात टुकड़-टुकड़े करके रख दिया। तुम अपनी क़समों को परस्पर हस्तक्षेप करने का बहाना बनाने लगो इस ध्येय से कहीं ऐसा न हो कि एक गिरोह दूसरे गिरोह से बढ़ जाए। बात केवल यह है कि अल्लाह इस प्रतिज्ञा के द्वारा तुम्हारी परीक्षा लेता है और जिस बात में तुम विभेद करते हो उसकी वास्तविकता तो वह क़ियामत के दिन अवश्य ही तुम पर खोल देगा
तफ़्सीर:
तुम प्रतिज्ञाओं को तोड़कर उस मूर्ख स्त्री की तरह मूर्ख और अल्पबुद्धि मत बनो, जिसने पूरी मेहनत से, अच्छी तरह ऊन या सूत काता, फिर उसे उधेड़कर रख दिया। उसने सूत कातने और उसे उधेड़ने में मेहनत की, लेकिन उसे वह नहीं मिला जो वह चाहती थी। तुम अपनी क़समों को एक-दूसरे को धोखा देने का साधन बनाते हो, ताकि तुम्हारा समुदाय तुम्हारे दुश्मन के समुदाय से अधिक और मज़बूत हो जाए। वास्तव में, अल्लाह तुम्हारा प्रतिज्ञाओं की पूर्ति के साथ परीक्षण करता है कि तुम उन्हें पूरा करते हो, या उन्हें तोड़ते हो? और अल्लाह क़ियामत के दिन उन सारे मामलों को निश्चित रूप से स्पष्ट कर देगा, जिनके बारे में तुम दुनिया में मतभेद किया करते थे। चुनाँचे वह बता देगा कि कौन सत्य पर था और कौन असत्य पर, तथा कौन सच्चा था और कौन झूठा।
आयत 93
وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ لَجَعَلَكُمْ أُمَّةًۭ وَٰحِدَةًۭ وَلَـٰكِن يُضِلُّ مَن يَشَآءُ وَيَهْدِى مَن يَشَآءُ ۚ وَلَتُسْـَٔلُنَّ عَمَّا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
وَلَوْ
और अगर
شَآءَ
चाहता
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَجَعَلَكُمْ
अलबत्ता वो बना देता तुम्हें
أُمَّةًۭ
उम्मत
وَٰحِدَةًۭ
एक ही
وَلَـٰكِن
और लेकिन
يُضِلُّ
वो गुमराह करता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
وَيَهْدِى
और वो हिदायत देता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता है
وَلَتُسْـَٔلُنَّ
और अलबत्ता तुम ज़रूर सवाल किए जाओगे
عَمَّا
उसके बारे में जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते
यदि अल्लाह चाहता तो तुम सबको एक ही समुदाय बना देता, परन्तु वह जिसे चाहता है गुमराही में छोड़ देता है और जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखाता है। तुम जो कुछ भी करते हो उसके विषय में तो तुमसे अवश्य पूछा जाएगा
तफ़्सीर:
औ अगर अल्लाह चाहता तो तुम्हें एक ही समुदाय बना देता, जो सत्य मार्ग पर चल रहा होता, मगर अल्लाह जिसे चाहता है, अपने न्याय के अनुसार सत्य से दूर कर देता है और प्रतिज्ञाओं के अनुपालन से वंचित कर देता है। और जिसे चाहता है अपनी कृपा से उसका सामर्थ्य प्रदान करता है। और क़ियामत के दिन तुमसे उसके बारे में अवश्य पूछा जाएगा, जो तुम दुनिया में किया करते थे।
आयत 94
وَلَا تَتَّخِذُوٓا۟ أَيْمَـٰنَكُمْ دَخَلًۢا بَيْنَكُمْ فَتَزِلَّ قَدَمٌۢ بَعْدَ ثُبُوتِهَا وَتَذُوقُوا۟ ٱلسُّوٓءَ بِمَا صَدَدتُّمْ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ ۖ وَلَكُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌۭ
وَلَا
और ना
تَتَّخِذُوٓا۟
तुम बनाओ
أَيْمَـٰنَكُمْ
अपनी क़समों को
دَخَلًۢا
धोखा देने का ज़रिया
بَيْنَكُمْ
आपस में
فَتَزِلَّ
वरना फिसल जाएगा
قَدَمٌۢ
क़दम
بَعْدَ
बाद
ثُبُوتِهَا
उसके जम जाने के
وَتَذُوقُوا۟
और तुम चखोगे
ٱلسُّوٓءَ
बुराई/सज़ा
بِمَا
बवजह उसके जो
صَدَدتُّمْ
रोका तुमने
عَن
from
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के रास्ते से
وَلَكُمْ
और तुम्हारे लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
عَظِيمٌۭ
बहुत बड़ा
तुम अपनी क़समों को परस्पर हस्तक्षेप करने का बहाना न बना लेना। कहीं ऐसा न हो कि कोई क़दम जमने के पश्चात उखड़ जाए और अल्लाह के मार्ग से तुम्हारे रोकने के बदले में तुम्हें तकलीफ़ का मज़ा चखना पड़े और तुम एक बड़ी यातना के भागी ठहरो
तफ़्सीर:
और तुम अपनी क़समों को धोखे का साधन न बनाओ कि अपने मन की इच्छाओं का पालन करते हुए, एक-दूसरे को धोखा दो। चुनाँचे जब चाहो क़समें तोड़ दो और जब चाहो पूरा करो। क्योंकि अगर तुम ऐसा करोगे, तो तुम्हारे पैर सीधे मार्ग से, उसपर जमन के उपरांत भी, हट जाएंँगे और तुम स्वयं अल्लाह के रास्ते से भटकने और दूसरों को उससे भटकाने के कारण यातना चखोगे और तुम्हारे लिए कई गुना यातना होगी।
आयत 95
وَلَا تَشْتَرُوا۟ بِعَهْدِ ٱللَّهِ ثَمَنًۭا قَلِيلًا ۚ إِنَّمَا عِندَ ٱللَّهِ هُوَ خَيْرٌۭ لَّكُمْ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
وَلَا
और ना
تَشْتَرُوا۟
तुम लो
بِعَهْدِ
the covenant
ٱللَّهِ
बदले अल्लाह के अहद के
ثَمَنًۭا
क़ीमत
قَلِيلًا ۚ
थोड़ी
إِنَّمَا
बेशक जो
عِندَ
(is) with
ٱللَّهِ
अल्लाह के पास है
هُوَ
वो
خَيْرٌۭ
बहतर है
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
تَعْلَمُونَ
तुम जानते
और तुच्छ मूल्य के लिए अल्लाह की प्रतिज्ञा का सौदा न करो। अल्लाह के पास जो कुछ है वह तुम्हारे लिए अधिक अच्छा है, यदि तुम जानो;
तफ़्सीर:
और अल्लाह की प्रतिज्ञा को थोड़ी सी क़ीमत से न बदलो कि उसकी प्रतिज्ञा को तोड़ दो और उसे पूरी न करो। वास्तविकता यह है कि इस संसार में अल्लाह जो विजय और ग़नीमत के धन प्रदान करेगा और आख़िरत में जो स्थायी आनंद प्रदान करेगा, वह तुम्हारे लिए उस थोड़े से मुआवज़े से बेहतर है, जो तुम्हें प्रतिज्ञा तोड़ने पर प्राप्त होता है, यदि तुम इस तथ्य को जानते हो।
आयत 96
مَا عِندَكُمْ يَنفَدُ ۖ وَمَا عِندَ ٱللَّهِ بَاقٍۢ ۗ وَلَنَجْزِيَنَّ ٱلَّذِينَ صَبَرُوٓا۟ أَجْرَهُم بِأَحْسَنِ مَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
مَا
जो कुछ
عِندَكُمْ
तुम्हारे पास है
يَنفَدُ ۖ
ख़तम हो जाएगा
وَمَا
और जो कुछ
عِندَ
(is) with
ٱللَّهِ
अल्लाह के पास है
بَاقٍۢ ۗ
बाक़ी रहने वाला है
وَلَنَجْزِيَنَّ
और अलबत्ता हम ज़रूर बदले में देंगे
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
صَبَرُوٓا۟
सब्र किया
أَجْرَهُم
अज्र उनका
بِأَحْسَنِ
बेहतरीन
مَا
उसका जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
तुम्हारे पास जो कुछ है वह तो समाप्त हो जाएगा, किन्तु अल्लाह के पास जो कुछ है वही बाक़ी रहनेवाला है। जिन लोगों ने धैर्य से काम लिया उन्हें तो, जो उत्तम कर्म वे करते रहे उसके बदले में, हम अवश्य उनका प्रतिदान प्रदान करेंगे
तफ़्सीर:
(ऐ लोगो!) जो धन, सुख-सामग्री और नेमतें तुम्हारे पास हैं, वे ख़त्म हो जाएँगी, भले ही वे बहुत अधिक हों। जबकि अल्लाह के पास जो बदला है, वह बाकी रहने वाला है। तो तुम कैसे बाक़ी रहने वाले पर एक नश्वर को वरीयता देते हो? और हम उन लोगों को, जो अपनी प्रतिज्ञाओं पर क़ायम रहे और उन्हें किसी हाल में नहीं तोड़ा, उनका बदला उनके उत्तम कार्यों के अनुसार प्रदान करेंगे। अतः हम उन्हें एक नेकी बदला दस गुना से, सात सौ गुना तक, बल्कि उससे भी अधिक गुना तक देंगे।
आयत 97
مَنْ عَمِلَ صَـٰلِحًۭا مِّن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَىٰ وَهُوَ مُؤْمِنٌۭ فَلَنُحْيِيَنَّهُۥ حَيَوٰةًۭ طَيِّبَةًۭ ۖ وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ أَجْرَهُم بِأَحْسَنِ مَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
مَنْ
जिसने
عَمِلَ
अमल किया
صَـٰلِحًۭا
नेक
مِّن
whether
ذَكَرٍ
ख़्वाह कोई मर्द हो
أَوْ
या
أُنثَىٰ
औरत
وَهُوَ
जबकि वो
مُؤْمِنٌۭ
मोमिन हो
فَلَنُحْيِيَنَّهُۥ
पस अलबत्ता हम ज़रूर ज़िन्दगी देंगे उसे
حَيَوٰةًۭ
ज़िन्दगी
طَيِّبَةًۭ ۖ
पाकीज़ा
وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ
और अलबत्ता हम ज़रूर बदले में देंगे उन्हें
أَجْرَهُم
अज्र उनका
بِأَحْسَنِ
बेहतरीन
مَا
उसका जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
जिस किसी ने भी अच्छा कर्म किया, पुरुष हो या स्त्री, शर्त यह है कि वह ईमान पर हो, तो हम उसे अवश्य पवित्र जीवन-यापन कराएँगे। ऐसे लोग जो अच्छा कर्म करते रहे उसके बदले में हम उन्हें अवश्य उनका प्रतिदान प्रदान करेंगे
तफ़्सीर:
जो भी शरीयत के अनुसार नेक काम करे, चाहे वह पुरुष हो या महिला, और वह अल्लाह पर ईमान रखने वाला हो, तो हम उसे अल्लाह के फ़ैसले से संतुष्टि और उसके साथ संतोष और नेक कार्यों की तौफ़ीक़ से भरा हुआ एक अच्छा जीवन प्रदान करेंगे और हम आख़िरत में उन्हें, दुनिया में उनके द्वारा किए गए अच्छे कार्यों का, सर्वश्रेष्ठ बदला प्रदान करेंगे।
आयत 98
فَإِذَا قَرَأْتَ ٱلْقُرْءَانَ فَٱسْتَعِذْ بِٱللَّهِ مِنَ ٱلشَّيْطَـٰنِ ٱلرَّجِيمِ
فَإِذَا
फिर जब
قَرَأْتَ
पढ़ें आप
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरआन को
فَٱسْتَعِذْ
तो पनाह माँगिए
بِٱللَّهِ
अल्लाह की
مِنَ
from
ٱلشَّيْطَـٰنِ
शैतान से
ٱلرَّجِيمِ
जो मरदूद है
अतः जब तुम क़ुरआन पढ़ने लगो तो फिटकारे हुए शैतान से बचने के लिए अल्लाह की पनाह माँग लिया करो
तफ़्सीर:
अतः (ऐ मोमिन!) जब तुम क़ुरआन पढ़ना चाहो, तो अल्लाह से दुआ करो को वह तुम्हें अल्लाह की दया से निष्कासित शैतान के वसवसे (बुरे ख़याल) से सुरक्षित रखे।
आयत 99
إِنَّهُۥ لَيْسَ لَهُۥ سُلْطَـٰنٌ عَلَى ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَلَىٰ رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَيْسَ
नहीं है
لَهُۥ
उसका
سُلْطَـٰنٌ
कोई ज़ोर
عَلَى
on
ٱلَّذِينَ
उन लोगों पर जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَلَىٰ
and upon
رَبِّهِمْ
और अपने रब पर ही
يَتَوَكَّلُونَ
वो तवक्कल करते हैं
उसका तो उन लोगों पर कोई ज़ोर नहीं चलता जो ईमान लाए और अपने रब पर भरोसा रखते है
तफ़्सीर:
शैतान का ज़ोर उन लोगों पर नहीं चलता, जो अल्लाह पर ईमान लाए और वे अपने सभी कार्यों में केवल अपने पालनहार पर भरोसा रखते हैं।
आयत 100
إِنَّمَا سُلْطَـٰنُهُۥ عَلَى ٱلَّذِينَ يَتَوَلَّوْنَهُۥ وَٱلَّذِينَ هُم بِهِۦ مُشْرِكُونَ
إِنَّمَا
बेशक
سُلْطَـٰنُهُۥ
ज़ोर उसका
عَلَى
(is) over
ٱلَّذِينَ
उन लोगों पर है जो
يَتَوَلَّوْنَهُۥ
दोस्त बनाते हैं उसे
وَٱلَّذِينَ
और (उन पर) जो
هُم
वो
بِهِۦ
उसकी वजह से
مُشْرِكُونَ
शिर्क करने वाले हैं
उसका ज़ोर तो बस उन्हीं लोगों पर चलता है जो उसे अपना मित्र बनाते है और उस (अल्लाह) के साथ साझी ठहराते है
तफ़्सीर:
बुरे ख़यालों द्वारा उसका प्रभुत्व तो केवल उन लोगों पर है, जो उसे अपना दोस्त बनाते हैं और उसके बहकावे में उसका पालन करते हैं, तथा उसके बहकाने के कारण अल्लाह का साझी बनाने वाले हैं, उसके साथ दूसरे की पूजा करते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अहद पूरा करने की ताकीद का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि वादा करके तोड़ना धागा कातने के बाद उसे उधेड़ने जैसा है, यह सख्त नापसंदीदा अमल है।
आयत 101
وَإِذَا بَدَّلْنَآ ءَايَةًۭ مَّكَانَ ءَايَةٍۢ ۙ وَٱللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا يُنَزِّلُ قَالُوٓا۟ إِنَّمَآ أَنتَ مُفْتَرٍۭ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
وَإِذَا
और जब
بَدَّلْنَآ
बदल देते हैं हम
ءَايَةًۭ
किसी आयत को
مَّكَانَ
जगह
ءَايَةٍۢ ۙ
आयत के
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
أَعْلَمُ
ख़ूब जानता है
بِمَا
उसको जो
يُنَزِّلُ
वो नाज़िल करता है
قَالُوٓا۟
वो कहते हैं
إِنَّمَآ
बेशक
أَنتَ
तू
مُفْتَرٍۭ ۚ
गढ़ने वाला है
بَلْ
बल्कि
أَكْثَرُهُمْ
अक्सर उनके
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो जानते
जब हम किसी आयत की जगह दूसरी आयत बदलकर लाते है - और अल्लाह भली-भाँति जानता है जो कुछ वह अवतरित करता है - तो वे कहते है, "तुम स्वयं ही घड़ लेते हो!" नहीं, बल्कि उनमें से अधिकतर लोग नहीं जानते
तफ़्सीर:
जब हम क़ुरआन की किसी आयत का हुक्म दूसरी आयत के ज़रिए निरस्त करते हैं (और अल्लाह उसे अधिक जानने वाला है जो वह क़ुरआन में से किसी हिकमत के कारण निरस्त करता है और उसे भी जानने वाला है, जो वह उसमें से निरस्त नहीं करता है), तो वे कहते हैं : (ऐ मुहम्मद!) तुम तो झूठे हो, अल्लाह पर झूठ गढ़ते हो। बल्कि, उनमें से अधिकांश को यह नहीं पता कि निरस्त करना अल्लाह की व्यापक हिकमत के तहत होता है।
आयत 102
قُلْ نَزَّلَهُۥ رُوحُ ٱلْقُدُسِ مِن رَّبِّكَ بِٱلْحَقِّ لِيُثَبِّتَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَهُدًۭى وَبُشْرَىٰ لِلْمُسْلِمِينَ
قُلْ
कह दीजिए
نَزَّلَهُۥ
नाज़िल किया है उसे
رُوحُ
the Holy Spirit
ٱلْقُدُسِ
रूहल क़ुदुस ने
مِن
from
رَّبِّكَ
आपके रब की तरफ़ से
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
لِيُثَبِّتَ
ताकि वो साबित क़दम रखे
ٱلَّذِينَ
उन्हें जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَهُدًۭى
और हिदायत
وَبُشْرَىٰ
और ख़ुशख़बरी
لِلْمُسْلِمِينَ
मुसलमानों के लिए
कह दो, "इसे ता पवित्र आत्मा ने तुम्हारे रब की ओर क्रमशः सत्य के साथ उतारा है, ताकि ईमान लानेवालों को जमाव प्रदान करे और आज्ञाकारियों के लिए मार्गदर्शन और शुभ सूचना हो
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) उनसे कह दें : इस क़ुरआन को जिबरील अलैहिस्सलाम अल्लाह की ओर से, सत्य के साथ लेकर उतरे हैं, जिसमें कोई त्रुटि, या परिवर्तन या विकृति नहीं है। ताकि जब भी उसकी कोई नई आयत उतरे और उसमें से कुछ को निरस्त किया जाए, तो वह अल्लाह पर ईमान रखने वालों को उनके ईमान पर मज़बूत कर दे, और ताकि यह उनके लिए सत्य का मार्गदर्शन हो, और मुसलमानों के लिए उन्हें प्राप्त होने वाले उत्कृष्ट बदले की शुभ सूचना हो।
आयत 103
وَلَقَدْ نَعْلَمُ أَنَّهُمْ يَقُولُونَ إِنَّمَا يُعَلِّمُهُۥ بَشَرٌۭ ۗ لِّسَانُ ٱلَّذِى يُلْحِدُونَ إِلَيْهِ أَعْجَمِىٌّۭ وَهَـٰذَا لِسَانٌ عَرَبِىٌّۭ مُّبِينٌ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
نَعْلَمُ
हम जानते हैं
أَنَّهُمْ
बेशक वो
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
إِنَّمَا
बेशक
يُعَلِّمُهُۥ
सिखाता है उसे
بَشَرٌۭ ۗ
एक इन्सान
لِّسَانُ
ज़बान
ٱلَّذِى
उसकी
يُلْحِدُونَ
वो ग़लत निस्बत करते हैं
إِلَيْهِ
तरफ़ जिसके
أَعْجَمِىٌّۭ
अजमी है
وَهَـٰذَا
और ये
لِسَانٌ
ज़बान है
عَرَبِىٌّۭ
अरबी
مُّبِينٌ
वाज़ेह
हमें मालूम है कि वे कहते है, "उसको तो बस एक आदमी सिखाता पढ़ाता है।" हालाँकि जिसकी ओर वे संकेत करते है उसकी भाषा विदेशी है और यह स्पष्ट अरबी भाषा है
तफ़्सीर:
हम जानते हैं कि बहुदेववादियों का कहना है कि : मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को क़ुरआन तो एक इनसान सिखाता है। हालाँकि वे अपने दावे में झूठे हैं। क्योंकि जिसके बारे में उनका ख़याल है कि वह आपको क़ुरआन सिखाता है, उसकी भाषा ग़ैर-अरबी है, और यह क़ुरआन उच्च बलाग़त (आलंकारिक शैली) वाले स्पष्ट अरबी भाषा में उतरा है। फिर वे कैसे दावा करते हैं कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने) इसे एक गैर-अरब व्यक्ति से सीखा है?!
आयत 104
إِنَّ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ لَا يَهْدِيهِمُ ٱللَّهُ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं ईमान लाते
بِـَٔايَـٰتِ
in the Verses
ٱللَّهِ
साथ अल्लाह की आयात के
لَا
not
يَهْدِيهِمُ
नहीं हिदायत देता उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
وَلَهُمْ
और उनके लिए है
عَذَابٌ
अज़ाब
أَلِيمٌ
दर्दनाक
सच्ची बात यह है कि जो लोग अल्लाह की आयतों को नहीं मानते, अल्लाह उनका मार्गदर्शन नहीं करता। उनके लिए तो एक दुखद यातना है
तफ़्सीर:
निःसंदेह जो लोग अल्लाह की आयतों पर विश्वास नहीं रखते कि वे उसी महिमावान की ओर से हैं, अल्लाह उन्हें सत्य की ओर मार्गदर्शन का सामर्थ्य नहीं देता जब तक कि वे अपने इस रवैये पर अटल हैं। तथा अल्लाह के इनकार और उसकी आयतों को झुठलाने के कारण उनके लिए दर्दनाक यातना है।
आयत 105
إِنَّمَا يَفْتَرِى ٱلْكَذِبَ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْكَـٰذِبُونَ
إِنَّمَا
बेशक
يَفْتَرِى
गढ़ लेते हैं
ٱلْكَذِبَ
झूठ को
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं ईमान लाते
بِـَٔايَـٰتِ
साथ आयात के
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह की
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْكَـٰذِبُونَ
जो झूठे हैं
झूठ तो बस वही लोग घड़ते है जो अल्लाह की आयतों को मानते नहीं और वही है जो झूठे है
तफ़्सीर:
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने पालनहार की ओर से जो कुछ लाए हैं, उसमें वह झूठे नहीं हैं। बल्कि झूठ तो वे लोग गढ़ते हैं, जो अल्लाह की आयतों को सत्य नहीं मानते। क्योंकि उन्हें न किसी यातना का डर है, और न ही उन्हें किसी प्रतिफल की उम्मीद है। ये लोग जो कुफ़्र की विशेषता रखने वाले हैं, वे झूठे हैं। क्योंकि झूठ बोलना उनकी आदत है जिसके वे आदी हो चुके हैं।
आयत 106
مَن كَفَرَ بِٱللَّهِ مِنۢ بَعْدِ إِيمَـٰنِهِۦٓ إِلَّا مَنْ أُكْرِهَ وَقَلْبُهُۥ مُطْمَئِنٌّۢ بِٱلْإِيمَـٰنِ وَلَـٰكِن مَّن شَرَحَ بِٱلْكُفْرِ صَدْرًۭا فَعَلَيْهِمْ غَضَبٌۭ مِّنَ ٱللَّهِ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌۭ
مَن
जो कोई
كَفَرَ
कुफ़्र करे
بِٱللَّهِ
साथ अल्लाह के
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद
إِيمَـٰنِهِۦٓ
अपने ईमान लाने के
إِلَّا
सिवाय
مَنْ
उसके जो
أُكْرِهَ
मजबूर किया गया
وَقَلْبُهُۥ
और दिल उसका
مُطْمَئِنٌّۢ
मुत्मइन है
بِٱلْإِيمَـٰنِ
ईमान पर
وَلَـٰكِن
और लेकिन
مَّن
जो कोई
شَرَحَ
खोल दे
بِٱلْكُفْرِ
कुफ़्र के लिए
صَدْرًۭا
सीना
فَعَلَيْهِمْ
तो उन पर
غَضَبٌۭ
ग़ज़ब है
مِّنَ
of
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
وَلَهُمْ
और उनके लिए है
عَذَابٌ
अज़ाब
عَظِيمٌۭ
बहुत बड़ा
जिस किसी ने अपने ईमान के पश्चात अल्लाह के साथ कुफ़्र किया -सिवाय उसके जो इसके लिए विवश कर दिया गया हो और दिल उसका ईमान पर सन्तुष्ट हो - बल्कि वह जिसने सीना कुफ़्र के लिए खोल दिया हो, तो ऐसे लोगो पर अल्लाह का प्रकोप है और उनके लिए बड़ी यातना है
तफ़्सीर:
जिसने ईमान लाने के बाद अल्लाह के साथ कुफ़्र किया, सिवाय उस व्यक्ति के जिसे कुफ़्र पर मजबूर किया जाए और वह अपनी ज़बान से कुफ़्र के शब्द का उच्चारण कर ले, जबकि उसका दिल ईमान से संतुष्ट हो और उसकी सच्चाई पर विश्वास रखने वाला हो (तो उसका हुक्म अलग है)। लेकिन जिसका सीना कुफ़्र के लिए खुला हो और वह ईमान के स्थान पर उसी को चुन ले और आज्ञाकारी रूप से अपनी ज़बान से उसका उच्चारण करे, तो वह इस्लाम से फिर जाने वाला है। अतः ऐसे लोगों पर अल्लाह का क्रोध है और उनके लिए बहुत बड़ी यातना है।
आयत 107
ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمُ ٱسْتَحَبُّوا۟ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا عَلَى ٱلْـَٔاخِرَةِ وَأَنَّ ٱللَّهَ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلْكَـٰفِرِينَ
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّهُمُ
बवजह उसके कि वो
ٱسْتَحَبُّوا۟
उन्होंने तरजीह दी
ٱلْحَيَوٰةَ
ज़िन्दगी को
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
عَلَى
over
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत पर
وَأَنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يَهْدِى
नहीं हिदायत देता
ٱلْقَوْمَ
उन लोगों को
ٱلْكَـٰفِرِينَ
जो काफ़िर हैं
यह इसलिए कि उन्होंने आख़िरत की अपेक्षा सांसारिक जीवन को पसन्द किया और यह कि अल्लाह कुफ़्र करनेवालो लोगों का मार्गदर्शन नहीं करता
तफ़्सीर:
इस्लाम से उनका यह फिर जाना इस कारण हुआ कि उन्होंने अपने कुफ़्र के बदले में प्राप्त होने वाले दुनिया के थोड़े-से अंश को आख़िरत पर वरीयता दी। और यह कि अल्लाह काफ़िर समुदाय को ईमान की तौफ़ीक़ नहीं देता, बल्कि उन्हें असहाय छोड़ देता है।
आयत 108
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ طَبَعَ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ وَسَمْعِهِمْ وَأَبْصَـٰرِهِمْ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْغَـٰفِلُونَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
ٱلَّذِينَ
वो जो
طَبَعَ
मोहर लगादी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَىٰ
ऊपर
قُلُوبِهِمْ
उनके दिलों के
وَسَمْعِهِمْ
और उनके कानों के
وَأَبْصَـٰرِهِمْ ۖ
और उनकी आँखों के
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْغَـٰفِلُونَ
जो ग़ाफ़िल हैं
वही लोग है जिनके दिलों और जिनके कानों और जिनकी आँखों पर अल्लाह ने मुहर लगा दी है; और वही है जो ग़फ़लत में पड़े हुए है
तफ़्सीर:
ईमान लाने के बाद उससे फिर जाने वाले लोगों के दिलों पर अल्लाह ने मुहर लगा दी है, इसलिए वे उपदेशों को नहीं समझते, और उनके कानों में मुहर लगा दी है, इसलिए उन्हें लाभ उठाने के उद्देश्य से नहीं सुनते, और उनकी आँखों पर परदे डाल दिए हैं, इसलिए वे ईमान का प्रमाण प्रस्तुत करने वाली निशानियों को नहीं देखते। और यही लोग हैं, जो सौभाग्य और दुर्भाग्य के कारणों से, तथा उस यातना से ग़ाफ़िल हैं, जो अल्लाह ने उनके लिए तैयार की है।
आयत 109
لَا جَرَمَ أَنَّهُمْ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ هُمُ ٱلْخَـٰسِرُونَ
لَا
No
جَرَمَ
नहीं कोई शक
أَنَّهُمْ
यक़ीनन वो
فِى
in
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत में
هُمُ
वो ही
ٱلْخَـٰسِرُونَ
ख़सारा पाने वाले हैं
निश्चय ही आख़िरत में वही घाटे में रहेंगे
तफ़्सीर:
वास्तव में, क़ियामत के दिन यही लोग घाटा उठाने वाले लोग हैं, जिन्होंने ईमान लाने के बाद कुफ़्र करके खुद अपना नुक़सान किया, जो यदि उसी पर क़ायम रहते, तो वे जन्नत में प्रवेश करते।
आयत 110
ثُمَّ إِنَّ رَبَّكَ لِلَّذِينَ هَاجَرُوا۟ مِنۢ بَعْدِ مَا فُتِنُوا۟ ثُمَّ جَـٰهَدُوا۟ وَصَبَرُوٓا۟ إِنَّ رَبَّكَ مِنۢ بَعْدِهَا لَغَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
ثُمَّ
फिर
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
لِلَّذِينَ
उनके लिए जिन्होंने
هَاجَرُوا۟
हिजरत की
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद इसके
مَا
जो
فُتِنُوا۟
वो आज़माइश में डाले गए
ثُمَّ
फिर
جَـٰهَدُوا۟
उन्होंने जिहाद किया
وَصَبَرُوٓا۟
और उन्होंने सबर किया
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
مِنۢ
after it
بَعْدِهَا
बाद इसके
لَغَفُورٌۭ
अलबत्ता बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
फिर तुम्हारा रब उन लोगों के लिए जिन्होंने इसके उपरान्त कि वे आज़माइश में पड़ चुके थे घर-बार छोड़ा, फिर जिहाद (संघर्ष) किया और जमे रहे तो इन बातों के पश्चात तो निश्चय ही तुम्हारा रब बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
फिर (ऐ रसूल!) आपका पालनहार उन कमज़ोर मोमिनों को क्षमा करने वाला और उनपर दया करने वाला है, जिन्होंने मक्का से मदीना की ओर हिजरत की, इसके पश्चात कि बहुदेववादियों ने उन्हें प्रताड़ित किया और उनके धर्म के मामले में उनका परीक्षण किया, यहाँ तक कि वे कुफ़्र का शब्द बोनले पर विवश हो गए, लेकिन उनके दिल ईमान से संतुष्ट थे। फिर उन्होंने अल्लाह के मार्ग में जिहाद किया ताकि अल्लाह की बात सर्वोच्च हो और काफ़िरों की बात नीची रहे और इस मार्ग में आने वाले कष्ट पर धैर्य रखा। निश्चित रूप से आपका पालनहार उस परीक्षण के बाद जिससे वे परीक्षित किए गए और उस प्रताड़ना के बाद जिससे वे प्रताड़ित किए गए, यहाँ तक कि कुफ़्र का शब्द बोलने पर मजबूर हो गए; (आपका पालनहार) उन्हें बहुत क्षमा करने वाला और उनपर अत्यंत दया करने वाला है। क्योंकि उन्होंने कुफ़्र के शब्द का उच्चारण केवल मजबूर किए जाने पर किया था।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मजबूरी में गलत बात कहने की गुंजाइश का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि दिल ईमान पर मज़बूत हो तो सख्त मजबूरी में भी अल्लाह माफी का दरवाज़ा खुला रखता है।
आयत 111
۞ يَوْمَ تَأْتِى كُلُّ نَفْسٍۢ تُجَـٰدِلُ عَن نَّفْسِهَا وَتُوَفَّىٰ كُلُّ نَفْسٍۢ مَّا عَمِلَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
۞ يَوْمَ
जिस दिन
تَأْتِى
आएगा
كُلُّ
हर
نَفْسٍۢ
नफ़्स
تُجَـٰدِلُ
वो झगड़ेगा
عَن
for
نَّفْسِهَا
अपने नफ़्स के बारे में
وَتُوَفَّىٰ
और पूरा-पूरा दिया जाएगा
كُلُّ
हर
نَفْسٍۢ
नफ़्स को
مَّا
जो
عَمِلَتْ
उसने अमल किया
وَهُمْ
और वो
لَا
(will) not
يُظْلَمُونَ
ना वो ज़ुल्म किए जाऐंगे
जिस दिन प्रत्येक व्यक्ति अपनी और प्रत्येक व्यक्ति को जो कुछ उसने किया होगा, उसका पूरा-पूरा बदला चुका दिया जाएगा, और उनपर कुछ भी अत्याचार न होगा
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) उस दिन को याद करें, जिस दिन परिस्थिति इतनी गंभीर होगी कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी ओर से झगड़ रहा होगा। वह किसी दूसरे की ओर से नहीं झगड़ेगा। तथा हर इनसान को उसके अच्छे और बुरे कार्यों का पूरा बदला दिया जाएगा। और उनपर इस प्रकार का कोई अत्याचार नहीं होगा कि उनकी नेकियाँ घटा दी जाएँ या उनके गुनाह बढ़ा दिए जाएँ।
आयत 112
وَضَرَبَ ٱللَّهُ مَثَلًۭا قَرْيَةًۭ كَانَتْ ءَامِنَةًۭ مُّطْمَئِنَّةًۭ يَأْتِيهَا رِزْقُهَا رَغَدًۭا مِّن كُلِّ مَكَانٍۢ فَكَفَرَتْ بِأَنْعُمِ ٱللَّهِ فَأَذَٰقَهَا ٱللَّهُ لِبَاسَ ٱلْجُوعِ وَٱلْخَوْفِ بِمَا كَانُوا۟ يَصْنَعُونَ
وَضَرَبَ
और बयान की
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مَثَلًۭا
मिसाल
قَرْيَةًۭ
एक बस्ती की
كَانَتْ
वो थी
ءَامِنَةًۭ
अमन वाली
مُّطْمَئِنَّةًۭ
मुत्मइन
يَأْتِيهَا
आता था उसके पास
رِزْقُهَا
रिज़्क़ उसका
رَغَدًۭا
बाफ़राग़त
مِّن
from
كُلِّ
every
مَكَانٍۢ
हर जगह से
فَكَفَرَتْ
तो उसने नाशुक्री की
بِأَنْعُمِ
(the) Favors of Allah
ٱللَّهِ
अल्लाह की नेअमतों की
فَأَذَٰقَهَا
तो चखाया उसे
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
لِبَاسَ
लिबास
ٱلْجُوعِ
भूख का
وَٱلْخَوْفِ
और ख़ौफ़ का
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَصْنَعُونَ
किया करते
अल्लाह ने एक मिसाल बयान की है: एक बस्ती थी जो निश्चिन्त और सन्तुष्ट थी। हर जगह से उसकी रोज़ी प्रचुरता के साथ चली आ रही थी कि वह अल्लाह की नेमतों के प्रति अकृतज्ञता दिखाने लगी। तब अल्लाह ने उसके निवासियों को उनकी करतूतों के बदले में भूख का मज़ा चख़ाया और भय का वस्त्र पहनाया
तफ़्सीर:
अल्लाह ने एक बस्ती (जो कि मक्का है) का उदाहरण दिया है, जो सुरक्षित थी उसके निवासियों को कोई भय नहीं था, तथा स्थिरता व शांति वाली थी। जबकि लोग उसके आस-पास से उचक लिए जाते थे। उसकी रोज़ी हर स्थान से आसानी के साथ चली आ रही थी। फिर उसके वासियों ने अल्लाह की नेमतों का इनकार किया और उनका शुक्रिया अदा नहीं किया। तो अल्लाह ने बदले के तौर पर उन्हें भूख और सख़्त भय से ग्रस्त कर दिया, जो उनके शरीर पर घबराहट और कमज़ोरी के रूप में प्रकट हुआ, यहाँ तक कि वे दोनों उनके लिए कपड़े की तरह (चिमट जाने वाले) हो गए। ऐसा दरअसल उनके कुफ़्र एवं झुठलाने के कारण हुआ।
आयत 113
وَلَقَدْ جَآءَهُمْ رَسُولٌۭ مِّنْهُمْ فَكَذَّبُوهُ فَأَخَذَهُمُ ٱلْعَذَابُ وَهُمْ ظَـٰلِمُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
جَآءَهُمْ
आया उनके पास
رَسُولٌۭ
एक रसूल
مِّنْهُمْ
उनमें से
فَكَذَّبُوهُ
तो उन्होंने झुठलाया उसे
فَأَخَذَهُمُ
तो पकड़ लिया उन्हें
ٱلْعَذَابُ
अज़ाब ने
وَهُمْ
जबकि वो
ظَـٰلِمُونَ
ज़ालिम थे
उनके पास उन्हीं में से एक रसूल आया। किन्तु उन्होंने उसे झुठला दिया। अन्ततः यातना ने उन्हें इस दशा में आ लिया कि वे अत्याचारी थे
तफ़्सीर:
मक्का वालों के पास उन्हीं में से एक रसूल आया, जिसे वे सच्चाई और अमानतदारी के साथ जानते थे। यह रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम थे। लेकिन उन्होंने आपपर आपके पालनहार ने जो कुछ उतारा था, उसमें आपको झूठा ठहराया, तो उनपर भूख और भय के रूप में अल्लाह का अज़ाब उतरा। जबकि वे अल्लाह का साझी ठहराने और उसके रसूलों को झुठलाने के कारण अपने आपको विनाश में डालकर स्वयं पर अत्याचार करने वाले थे।
आयत 114
فَكُلُوا۟ مِمَّا رَزَقَكُمُ ٱللَّهُ حَلَـٰلًۭا طَيِّبًۭا وَٱشْكُرُوا۟ نِعْمَتَ ٱللَّهِ إِن كُنتُمْ إِيَّاهُ تَعْبُدُونَ
فَكُلُوا۟
पस खाओ
مِمَّا
उसमें से जो
رَزَقَكُمُ
रिज़्क़ दिया तुम्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
حَلَـٰلًۭا
हलाल
طَيِّبًۭا
पाक
وَٱشْكُرُوا۟
और शुक्र करो
نِعْمَتَ
(for the) Favor
ٱللَّهِ
अल्लाह की नेअमत का
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
إِيَّاهُ
सिर्फ़ उसी की
تَعْبُدُونَ
तुम इबादत करते
अतः जो कुछ अल्लाह ने तुम्हें हलाल-पाक रोज़ी दी है उसे खाओ और अल्लाह की नेमत के प्रति कृतज्ञता दिखाओ, यदि तुम उसी को स्वामी मानते हो
तफ़्सीर:
इसलिए, (ऐ बंदो!) अल्लाह की दी हुई वह वस्तुएँ जो खाने में अच्छी लगें और हलाल हों, खाओ, और अल्लाह की दी हुई नेमतों का, उन्हें अल्लाह की दी हुई नेमत मानकर और उसकी प्रसन्नता के कामों में लगाकर, शुक्रिया अदा करो, यदि तुम अकेले उसी की इबादत करते हो और उसके साथ किसी को साझी नहीं बनाते हो।
आयत 115
إِنَّمَا حَرَّمَ عَلَيْكُمُ ٱلْمَيْتَةَ وَٱلدَّمَ وَلَحْمَ ٱلْخِنزِيرِ وَمَآ أُهِلَّ لِغَيْرِ ٱللَّهِ بِهِۦ ۖ فَمَنِ ٱضْطُرَّ غَيْرَ بَاغٍۢ وَلَا عَادٍۢ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
إِنَّمَا
बेशक
حَرَّمَ
उसने हराम किया
عَلَيْكُمُ
तुम पर
ٱلْمَيْتَةَ
मुर्दार
وَٱلدَّمَ
और ख़ून
وَلَحْمَ
और गोशत
ٱلْخِنزِيرِ
ख़िन्ज़ीर का
وَمَآ
और जो
أُهِلَّ
पुकारा जाए
لِغَيْرِ
वास्ते ग़ैर
ٱللَّهِ
अल्लाह के
بِهِۦ ۖ
उस पर
فَمَنِ
तो जो कोई
ٱضْطُرَّ
मजबूर किया गया
غَيْرَ
ना
بَاغٍۢ
रग़बत करने वाला हो
وَلَا
और ना
عَادٍۢ
हद से गुज़रने वाला
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
उसने तो तुमपर केवल मुर्दार, रक्त, सुअर का मांस और जिसपर अल्लाह के सिवा किसी और का नाम लिया गया हो, हराम ठहराया है। फिर यदि कोई इस प्रकार विवश हो जाए कि न तो उसकी ललक हो और न वह हद से आगे बढ़नेवाला हो तो निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने खाने की जो चीजें तुमपर हराम की हैं, वे इस प्रकार हैं : ज़बह किया जाने वाला वह जानवर जो ज़बह किए बिना मर जाए, बहता रक्त, सुअर अपने सभी हिस्सों सहित और वह जानवर जिसे ज़बह करने वाले ने अल्लाह के अलावा किसी और को भेंट के रूप में ज़बह किया हो। यह निषेध उस समय है, जब आदमी स्वेच्छा से खाए। अलबत्ता, अगर कोई व्यक्ति इन्हें खाने को मजबूर हो जाए और उनमें से कुछ खा ले, इस हाल में कि वह हराम का इच्छुक न हो और ज़रूरत की सीमा से आगे बढ़ने वाला न हो; तो उसपर कोई पाप नहीं है। क्योंकि अल्लाह क्षमा करने वाला है। उसने जो कुछ खाया है, उसे माफ़ कर देगा। उसपर दया करने वाला है कि उसे आवश्यकता पड़ने पर इसकी अनुमति प्रदान कर दी।
आयत 116
وَلَا تَقُولُوا۟ لِمَا تَصِفُ أَلْسِنَتُكُمُ ٱلْكَذِبَ هَـٰذَا حَلَـٰلٌۭ وَهَـٰذَا حَرَامٌۭ لِّتَفْتَرُوا۟ عَلَى ٱللَّهِ ٱلْكَذِبَ ۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ يَفْتَرُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلْكَذِبَ لَا يُفْلِحُونَ
وَلَا
और ना
تَقُولُوا۟
तुम कहो
لِمَا
वो जो
تَصِفُ
बयान करती हैं
أَلْسِنَتُكُمُ
ज़बानें तुम्हारी
ٱلْكَذِبَ
झूठ
هَـٰذَا
कि ये
حَلَـٰلٌۭ
हलाल है
وَهَـٰذَا
और ये
حَرَامٌۭ
हराम है
لِّتَفْتَرُوا۟
ताकि तुम गढ़ सको
عَلَى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
ٱلْكَذِبَ ۚ
झूठ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يَفْتَرُونَ
गढ़ते हैं
عَلَى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
ٱلْكَذِبَ
झूठ
لَا
they will not succeed
يُفْلِحُونَ
नहीं वो फ़लाह पाऐंगे
और अपनी ज़बानों के बयान किए हुए झूठ के आधार पर यह न कहा करो, "यह हलाल है और यह हराम है," ताकि इस तरह अल्लाह पर झूठ आरोपित करो। जो लोग अल्लाह से सम्बद्ध करके झूठ घड़ते है, वे कदापि सफल होनेवाले नहीं
तफ़्सीर:
और (ऐ मुश्रिको!) तुम उसके कारण जो तुम्हारी ज़बानें अल्लाह पर झूठ कहती हैं, यह न कहो कि यह चीज़ हलाल है और यह चीज़ हराम है; इस उद्देश्य से कि उस चीज़ को हराम ठहराकर जो अल्लाह ने हराम नहीं किया, या उस चीज़ को हलाल ठहराकर जो उसने हलाल नहीं किया, अल्लाह पर झूठ गढ़ो। निःसंदेह जो लोग अल्लाह पर झूठ गढ़ते हैं, वे न किसी उद्देश्य में सफल होते हैं, और न किसी भय से छुटकारा पाते हैं।
आयत 117
مَتَـٰعٌۭ قَلِيلٌۭ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
مَتَـٰعٌۭ
फ़ायदा है
قَلِيلٌۭ
थोड़ा सा
وَلَهُمْ
और उनके लिए है
عَذَابٌ
अज़ाब
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
यह उपभोग थोड़ा है, उनके लिए वास्तव में तो दुखद यातना है
तफ़्सीर:
इस दुनिया में उनके लिए अपनी इच्छाओं का पालन करने के कारण थोड़ा-सा तुच्छ सामान है, और क़ियामत के दिन उनके लिए दर्दनाक यातना है।
आयत 118
وَعَلَى ٱلَّذِينَ هَادُوا۟ حَرَّمْنَا مَا قَصَصْنَا عَلَيْكَ مِن قَبْلُ ۖ وَمَا ظَلَمْنَـٰهُمْ وَلَـٰكِن كَانُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ
وَعَلَى
और ऊपर
ٱلَّذِينَ
उन लोगों के जो
هَادُوا۟
यहूदी बन गए
حَرَّمْنَا
हराम कर दिया हमने
مَا
जो
قَصَصْنَا
बयान किया हमने
عَلَيْكَ
आप पर
مِن
before
قَبْلُ ۖ
इससे पहले
وَمَا
और नहीं
ظَلَمْنَـٰهُمْ
ज़ुल्म किया था हमने उन पर
وَلَـٰكِن
और लेकिन
كَانُوٓا۟
थे वो
أَنفُسَهُمْ
अपनी जानों पर
يَظْلِمُونَ
वो ज़ुल्म करते
जो यहूदी है उनपर हम पहले वे चीज़े हराम कर चुके है जिनका उल्लेख हमने तुमसे किया। उनपर तो अत्याचार हमने नहीं किया, बल्कि वे स्वयं ही अपने ऊपर अत्याचार करते रहे
तफ़्सीर:
विशेष रूप से यहूदियों पर हमने वे चीज़ें हराम कीं, जिनका वर्णन हम इससे पहले आपके सामने कर चुके हैं। (जैसाकि सूरतुल्-अन्आम की आयत संख्या : 146 में है)। इन चीज़ों को हराम करके हमने उनपर अत्याचार नहीं किया। बल्कि सज़ा के कारणों को अपनाकर, वे स्वंय अपने ऊपर अत्याचार करते थे। इसलिए हमने उन्हें उनकी सरकशी का बदला दिया, और सज़ा के तौर पर इन वस्तुओं को उनपर हराम कर दिया।
आयत 119
ثُمَّ إِنَّ رَبَّكَ لِلَّذِينَ عَمِلُوا۟ ٱلسُّوٓءَ بِجَهَـٰلَةٍۢ ثُمَّ تَابُوا۟ مِنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ وَأَصْلَحُوٓا۟ إِنَّ رَبَّكَ مِنۢ بَعْدِهَا لَغَفُورٌۭ رَّحِيمٌ
ثُمَّ
फिर
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
لِلَّذِينَ
उन लोगों के लिए जिन्होंने
عَمِلُوا۟
अमल किए
ٱلسُّوٓءَ
बुरे
بِجَهَـٰلَةٍۢ
बवजह जहालत के
ثُمَّ
फिर
تَابُوا۟
उन्होंने तौबा करली
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद
ذَٰلِكَ
इसके
وَأَصْلَحُوٓا۟
और उन्होंने इस्लाह करली
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
مِنۢ
after that
بَعْدِهَا
बाद इसके
لَغَفُورٌۭ
अलबत्ता बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌ
निहायत रहम करने वाला है
फिर तुम्हारा रब उनके लिए जिन्होंने अज्ञानवश बुरा कर्म किया, फिर इसके बाद तौबा करके सुधार कर लिया, तो निश्चय ही तुम्हारा रब इसके पश्चात बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
फिर (ऐ रसूल!) आपका पालनहार उन लोगों के लिए जिन्होंने बुरे कर्म किए उनके परिणामों से अनभिज्ञ होने के कारण, भले ही वे जानबूझकर किए हों, फिर उन्होंने बुरे कार्य करने के बाद अल्लाह के समक्ष तौबा कर ली और अपने उन कार्यों का सुधार कर लिया जिनमें खराबी थी, तो आपका पालनहार तौबा कर लेने के बाद उनके गुनाहों को माफ़ करने वाला, उन पर दया करने वाला है।
आयत 120
إِنَّ إِبْرَٰهِيمَ كَانَ أُمَّةًۭ قَانِتًۭا لِّلَّهِ حَنِيفًۭا وَلَمْ يَكُ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ
إِنَّ
बेशक
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम
كَانَ
था
أُمَّةًۭ
एक उम्मत
قَانِتًۭا
मुतीअ/फ़रमाबरदार
لِّلَّهِ
अल्लाह के लिए
حَنِيفًۭا
यकसू
وَلَمْ
और ना
يَكُ
था वो
مِنَ
of
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकीन में से
निश्चय ही इबराहीम की स्थिति एक समुदाय की थी। वह अल्लाह का आज्ञाकारी और उसकी ओर एकाग्र था। वह कोई बहुदेववादी न था
तफ़्सीर:
निःसंदेह इबराहीम अलैहिस्सलाम सभी अच्छे गुणों से सुसज्जित, सदैव अपने पालनहार का आज्ञापालन करने वाले और सभी धर्मों से विमुख होकर इस्लाम की ओेर आकृष्ट थे। तथा वह कभी भी शिर्क करने वालों में से नहीं थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इब्राहीम अलैहिस्सलाम को एक उम्मत (मिसाली शख्सियत) कहे जाने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि एक अकेला शख्स भी अगर सच्चा और मुखलिस हो तो पूरी उम्मत के बराबर असर छोड़ सकता है।
आयत 121
شَاكِرًۭا لِّأَنْعُمِهِ ۚ ٱجْتَبَىٰهُ وَهَدَىٰهُ إِلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ
شَاكِرًۭا
शुक्र गुज़ार था
لِّأَنْعُمِهِ ۚ
उसकी नेअमतों पर
ٱجْتَبَىٰهُ
उसने चुन लिया उसे
وَهَدَىٰهُ
और उसने हिदायत दी उसे
إِلَىٰ
to
صِرَٰطٍۢ
तरफ़ रास्ते
مُّسْتَقِيمٍۢ
सीधे के
वह उसके (अल्लाह के) उदार अनुग्रहों के प्रति कृतज्ञता दिखलानेवाला था। अल्लाह ने उसे चुन लिया और उसे सीधे मार्ग पर चलाया
तफ़्सीर:
वह अल्लाह की ओर से प्राप्त होने वाली नेमतों के प्रति आभार प्रकट करने वाले थे। अल्लाह ने उन्हें नुबुव्वत (ईशदूतत्व) के लिए चुन लिया था और सीधे धर्म इस्लाम की ओर उनका मार्गदर्शन किया था।
आयत 122
وَءَاتَيْنَـٰهُ فِى ٱلدُّنْيَا حَسَنَةًۭ ۖ وَإِنَّهُۥ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ لَمِنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ
وَءَاتَيْنَـٰهُ
और दी हमने उसे
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
حَسَنَةًۭ ۖ
भलाई
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
فِى
in
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत में
لَمِنَ
(he) will surely (be) among
ٱلصَّـٰلِحِينَ
अलबत्ता सालिहीन में से है
और हमने उसे दुनिया में भी भलाई दी और आख़िरत में भी वह अच्छे पूर्णकाम लोगों मे से होगा
तफ़्सीर:
और हमने उन्हें दुनिया में नबी बनाया, तथा अच्छी प्रशंसा और नेक संतान प्रदान की। और वह आख़िरत में निश्चित रूप से उन सदाचारियों में से हैं, जिनके लिए अल्लाह ने जन्नत के ऊँचे दर्जे तैयार कर रखे हैं।
आयत 123
ثُمَّ أَوْحَيْنَآ إِلَيْكَ أَنِ ٱتَّبِعْ مِلَّةَ إِبْرَٰهِيمَ حَنِيفًۭا ۖ وَمَا كَانَ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ
ثُمَّ
फिर
أَوْحَيْنَآ
वही की हमने
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
أَنِ
कि
ٱتَّبِعْ
पैरवी कीजिए
مِلَّةَ
तरीक़े की
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम के
حَنِيفًۭا ۖ
जो यकसू था
وَمَا
और ना
كَانَ
था वो
مِنَ
of
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकीन में से
फिर अब हमने तुम्हारी ओर प्रकाशना की, "इबराहीम के तरीक़े पर चलो, जो बिलकुल एक ओर का हो गया था और बहुदेववादियों में से न था।"
तफ़्सीर:
फिर (ऐ रसूल!) हमने आपकी ओर वह़्य (प्रकाशना) की कि तौहीद, मुश्रिकों से अलग होने, अल्लाह की ओर बुलाने और उसकी शरीयत पर अमल करने के मामले में, इबराहीम अलैहिस्सलाम के तरीक़े का अनुसरण करें, जो समस्त धर्मों से विमुख होकर इस्लाम धर्म की ओर एकाग्र थे, तथा वह कभी भी मुश्रिकों में से नहीं थे जैसाकि मुश्रिकों का दावा है, बल्कि वह एक अल्लाह की इबादत करने वाले थे।
आयत 124
إِنَّمَا جُعِلَ ٱلسَّبْتُ عَلَى ٱلَّذِينَ ٱخْتَلَفُوا۟ فِيهِ ۚ وَإِنَّ رَبَّكَ لَيَحْكُمُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ فِيمَا كَانُوا۟ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ
إِنَّمَا
बेशक
جُعِلَ
फ़र्ज़ किया गया
ٱلسَّبْتُ
हफ़्ते का दिन
عَلَى
for
ٱلَّذِينَ
उन लोगों पर
ٱخْتَلَفُوا۟
जिन्होंने इख़्तिलाफ़ किया
فِيهِ ۚ
उसमें
وَإِنَّ
औ बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
لَيَحْكُمُ
अलबत्ता वो फ़ैसला करेगा
بَيْنَهُمْ
दर्मियान उनके
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
فِيمَا
उसमें जो
كَانُوا۟
थे वो
فِيهِ
जिसमें
يَخْتَلِفُونَ
वो इख़्तिलाफ़ करते
'सब्त' तो केवल उन लोगों पर लागू हुआ था जिन्होंने उसके विषय में विभेद किया था। निश्चय ही तुम्हारा रब उनके बीच क़ियामत के दिन उसका फ़ैसला कर देगा, जिसमें वे विभेद करते रहे है
तफ़्सीर:
शनिवार के दिन का सम्मान करना तो केवल उन्हीं यहूदियों पर फ़र्ज़ किया गया था, जिन्होंने उसके बारे में मतभेद किया था। ताकि वे उस दिन अपने सारे कार्यों को छोड़कर इबादत में व्यस्त रहें, जबकि वे जुमे के दिन से भटक गए थे, जिसमें उन्हें सारे कार्य छोड़ इबादत का आदेश दिया गया था। और (ऐ रसूल!) निश्चय ही आपका पालनहार इन मतभेद करने वालों के बीच क़ियामत के दिन उस विषय में निर्णय कर देगा, जिसमें वे मतभेद किया करते थे, फिर हर एक को वह बदला देगा, जिसका वह हक़दार होगा।
आयत 125
ٱدْعُ إِلَىٰ سَبِيلِ رَبِّكَ بِٱلْحِكْمَةِ وَٱلْمَوْعِظَةِ ٱلْحَسَنَةِ ۖ وَجَـٰدِلْهُم بِٱلَّتِى هِىَ أَحْسَنُ ۚ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِمَن ضَلَّ عَن سَبِيلِهِۦ ۖ وَهُوَ أَعْلَمُ بِٱلْمُهْتَدِينَ
ٱدْعُ
दावत दीजिए
إِلَىٰ
to
سَبِيلِ
तरफ़ रास्ते के
رَبِّكَ
अपने रब के
بِٱلْحِكْمَةِ
साथ हिकमत के
وَٱلْمَوْعِظَةِ
और नसीहत के
ٱلْحَسَنَةِ ۖ
जो अच्छी हो
وَجَـٰدِلْهُم
और बहस कीजिए उनसे
بِٱلَّتِى
साथ उस तरीक़े के
هِىَ
वो जो
أَحْسَنُ ۚ
बेहतरीन है
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
هُوَ
वो
أَعْلَمُ
ख़ूब जानता है
بِمَن
उसे जो
ضَلَّ
भटक गया
عَن
from
سَبِيلِهِۦ ۖ
उसके रास्ते से
وَهُوَ
और वो
أَعْلَمُ
ख़ूब जानता है
بِٱلْمُهْتَدِينَ
हिदायत याफ़्ता को
अपने रब के मार्ग की ओर तत्वदर्शिता और सदुपदेश के साथ बुलाओ और उनसे ऐसे ढंग से वाद विवाद करो जो उत्तम हो। तुम्हारा रब उसे भली-भाँति जानता है जो उसके मार्ग से भटक गया और वह उन्हें भी भली-भाँति जानता है जो मार्ग पर है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप और आपके मानने वाले मोमिन, आमंत्रित व्यक्ति की दशा, उसकी समझ और उसकी अधीनता (आज्ञाकारिता) की अपेक्षाओं के अनुसार, तथा प्रोत्साहन और धमकी पर आधारित सदुपदेश के साथ इस्लाम के धर्म की ओर बुलाएँ। और उनसे ऐसे तरीक़े से बहस करें, जो कथन, विचार एवं संस्कार के रूप से सबसे अच्छा है। क्योंकि आपका काम लोगों को मार्गदर्शन प्रदान करना नहीं, बल्कि आपका काम केवल उन्हें संदेश पहुँचाना है। निःसंदेह आपका रब उसे सबसे अधिक जानता है, जो इस्लाम के धर्म से भटक गया, और वह उन लोगों को भी सबसे अधिक जानता है, जो उसके मार्ग पर चलने वाले हैं। इसलिए आप उन पर बिल्कुल ही न पछताएँ।
आयत 126
وَإِنْ عَاقَبْتُمْ فَعَاقِبُوا۟ بِمِثْلِ مَا عُوقِبْتُم بِهِۦ ۖ وَلَئِن صَبَرْتُمْ لَهُوَ خَيْرٌۭ لِّلصَّـٰبِرِينَ
وَإِنْ
और अगर
عَاقَبْتُمْ
बदला लो तुम
فَعَاقِبُوا۟
तो बदला लो
بِمِثْلِ
मानिन्द
مَا
उसके जो
عُوقِبْتُم
तकलीफ़ दिए गए तुम
بِهِۦ ۖ
साथ जिसके
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
صَبَرْتُمْ
सब्र करो तुम
لَهُوَ
अलबत्ता वो
خَيْرٌۭ
बहतर है
لِّلصَّـٰبِرِينَ
सब्र करने वालों के लिए
और यदि तुम बदला लो तो उतना ही जितना तुम्हें कष्ट पहुँचा हो, किन्तु यदि तुम सब्र करो तो निश्चय ही यह सब्र करनेवालों के लिए ज़्यादा अच्छा है
तफ़्सीर:
और यदि तुम अपने दुश्मन से बदला लेना चाहो, तो उसे उतनी ही सज़ा दो जितना तुम्हें कष्ट पहुँचाया गया है, उससे अधिक नहीं। और अगर बदला लेने की शक्ति के बावजूद तुम उसे सज़ा देने के बजाय सब्र से काम लो, तो ऐसा करना तुममें से सब्र करने वालों के लिए, उन्हें सज़ा देकर बदला लेने से बेहतर है।
आयत 127
وَٱصْبِرْ وَمَا صَبْرُكَ إِلَّا بِٱللَّهِ ۚ وَلَا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ وَلَا تَكُ فِى ضَيْقٍۢ مِّمَّا يَمْكُرُونَ
وَٱصْبِرْ
और सब्र कीजिए
وَمَا
और नहीं
صَبْرُكَ
सब्र आपका
إِلَّا
मगर
بِٱللَّهِ ۚ
साथ अल्लाह (की तोफ़ीक़) के
وَلَا
और ना
تَحْزَنْ
आप ग़म कीजिए
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَلَا
और ना
تَكُ
आप हों
فِى
in
ضَيْقٍۢ
घुटन/तंगी में
مِّمَّا
उससे जो
يَمْكُرُونَ
वो चालें चल रहे हैं
सब्र से काम लो - और तुम्हारा सब्र अल्लाह ही से सम्बद्ध है - और उन पर दुखी न हो और न उससे दिल तंग हो जो चालें वे चलते है
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आप उनकी ओर से पहुँचने वाले कष्ट पर सब्र करें। और आपको सब्र की तौफ़ीक़ केवल अल्लाह के तौफ़ीक़ प्रदान करने से मिलती है। और आप काफ़िरों के आपसे उपेक्षा करने से दुखी न हों और उनके छल और चाल से आपका दिल तंग न हो।
आयत 128
إِنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلَّذِينَ ٱتَّقَوا۟ وَّٱلَّذِينَ هُم مُّحْسِنُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
مَعَ
साथ है
ٱلَّذِينَ
उनके जो
ٱتَّقَوا۟
तक़वा करें
وَّٱلَّذِينَ
और वो लोग जो
هُم
वो
مُّحْسِنُونَ
एहसान करने वाले हैं
निश्चय ही, अल्लाह उनके साथ है जो डर रखते है और जो उत्तमकार है
तफ़्सीर:
निःसंदेह अल्लाह उन लोगों के साथ है, जो गुनाहों से बचकर अल्लाह से डरते हैं और जो नेकियाँ करके और आदेशों का पालनकर उत्तमकार हैं। अतः वह विजय और समर्थन के साथ उनके साथ है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दावत के सही तरीके (हिकमत-नसीहत) की ताकीद के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि दूसरों को नसीहत करते वक्त हिकमत और नर्मी अपनानी चाहिए, सख्ती से बात बिगड़ सकती है।
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