नाम का मतलब
रात की सफर (नबी ﷺ के मेराज के सफर की तरफ इशारा)
पृष्ठभूमि
सूरह बनी-इस्राईल (अल-इसरा) की शुरुआत नबी ﷺ के मस्जिद-ए-हराम से मस्जिद-ए-अक्सा तक के रात के सफर (इसरा) के ज़िक्र से होती है। इसमें बनी-इस्राईल की तारीख से नसीहत, माता-पिता के हुकूक और अखलाकी तालीमात का मुफस्सल बयान है।
फ़ज़ीलत / सार
इसी सूरह से नबी ﷺ के मेराज के मुकद्दस सफर का ज़िक्र शुरू होता है, जो इस्लामी तारीख का एक अहम मोजिज़ा माना जाता है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ سُبْحَـٰنَ ٱلَّذِىٓ أَسْرَىٰ بِعَبْدِهِۦ لَيْلًۭا مِّنَ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ إِلَى ٱلْمَسْجِدِ ٱلْأَقْصَا ٱلَّذِى بَـٰرَكْنَا حَوْلَهُۥ لِنُرِيَهُۥ مِنْ ءَايَـٰتِنَآ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْبَصِيرُ
سُبْحَـٰنَ
पाक है
ٱلَّذِىٓ
वो जो
أَسْرَىٰ
ले गया
بِعَبْدِهِۦ
अपने बन्दे को
لَيْلًۭا
रात के एक हिस्से में
مِّنَ
from
ٱلْمَسْجِدِ
Al-Masjid Al-Haraam
ٱلْحَرَامِ
मस्जिदे हराम से
إِلَى
तरफ़
ٱلْمَسْجِدِ
Al-Masjid Al-Aqsa
ٱلْأَقْصَا
मस्जिदे अक़्सा के
ٱلَّذِى
वो जो
بَـٰرَكْنَا
बरकत दी हमने
حَوْلَهُۥ
उसके इर्द-गिर्द को
لِنُرِيَهُۥ
ताकि हम दिखाऐं उसे
مِنْ
of
ءَايَـٰتِنَآ ۚ
अपनी निशानियों में से
إِنَّهُۥ
बेशक वो
هُوَ
वो ही है
ٱلسَّمِيعُ
ख़ूब सुनने वाला
ٱلْبَصِيرُ
ख़ूब देखने वाला
क्या ही महिमावान है वह जो रातों-रात अपने बन्दे (मुहम्मद) को प्रतिष्ठित मस्जिद (काबा) से दूरवर्ती मस्जिद (अक़्सा) तक ले गया, जिसके चतुर्दिक को हमने बरकत दी, ताकि हम उसे अपनी कुछ निशानियाँ दिखाएँ। निस्संदेह वही सब कुछ सुनता, देखता है
तफ़्सीर:
महिमावान अल्लाह पवित्र एवं महान है, क्योंकि वह ऐसी चीज़ पर क्षमता रखता है, जो उसके सिवा कोई नहीं कर सकता। वही अपने बंदे मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को रात के एक भाग में, शरीर एवं आत्मा के साथ, जागने की हालत में, मस्जिदे-हराम से बैतुल-मक़्दिस की मस्जिद तक ले गया, जिसके चारों ओर हमने फलों और फसलों के द्वारा तथा नबियों के घरों के रूप में बरकतें रखी हैं। ताकि वह महिमावान अल्लाह की शक्ति को इंगित करने वाली हमारी कुछ निशानियों का अवलोकन करें। निःसंदेह अल्लाह सब कुछ सुनने वाला है, इसलिए कोई भी सुनी जाने वाली चीज़ उससे छिपी नहीं रहती, तथा सब कुछ देखने वाला है, अतः कोई भी देखी जाने वाली चीज़ उससे ओझल नहीं हो सकती।
आयत 2
وَءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ وَجَعَلْنَـٰهُ هُدًۭى لِّبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ أَلَّا تَتَّخِذُوا۟ مِن دُونِى وَكِيلًۭا
وَءَاتَيْنَا
और दी हमने
مُوسَى
मूसा को
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
وَجَعَلْنَـٰهُ
और बनाया हमने उसे
هُدًۭى
हिदायत का ज़रिया
لِّبَنِىٓ
for the Children
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल के लिए
أَلَّا
कि ना
تَتَّخِذُوا۟
तुम बनाओ
مِن
other than Me
دُونِى
मेरे सिवा
وَكِيلًۭا
कोई कारसाज़
हमने मूसा को किताब दी थी और उसे इसराईल की सन्तान के लिए मार्गदर्शन बनाया था कि "हमारे सिवा किसी को कार्य-साधक न ठहराना।"
तफ़्सीर:
और हमने मूसा अलैहिस्सलाम को तौरात प्रदान की और उसे बनी इसराईल के लिए मार्गदर्शक व पथप्रदर्शक बना दिया। तथा हमने बनी इसराईल से कहा : मेरे सिवा किसी और को कार्यसाधक न बनाओ, जिसे तुम अपने मामले सौंप दो। बल्कि केवल मेरे ऊपर भरोसा रखो।
आयत 3
ذُرِّيَّةَ مَنْ حَمَلْنَا مَعَ نُوحٍ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ عَبْدًۭا شَكُورًۭا
ذُرِّيَّةَ
(ऐ) औलाद
مَنْ
उनकी जिन्हें
حَمَلْنَا
सवार किया हमने
مَعَ
with
نُوحٍ ۚ
साथ नूह के
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
था वो
عَبْدًۭا
बन्दा
شَكُورًۭا
शुक्र गुज़ार
ऐ उनकी सन्तान, जिन्हें हमने नूह के साथ (नौका में) सवार किया था! निश्चय ही वह एक कृतज्ञ बन्दा था
तफ़्सीर:
तुम उन लोगों की संतान हो, जिन्हें हमने नूह अलैहिस्सलाम के साथ पानी के तूफान में डूबने से बचाया था। अतः तुम इस नेमत को याद रखो और अकेले अल्लाह की इबादत और उसका आज्ञापालन करके, उसका शुक्रिया अदा करो। तथा इस संबंध में नूह अलैहिस्सलाम का अनुसरण करो, क्योंकि वह अल्लाह तआला का बहुत ज़्यादा शुक्रिया अदा करने वाले थे।
आयत 4
وَقَضَيْنَآ إِلَىٰ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ فِى ٱلْكِتَـٰبِ لَتُفْسِدُنَّ فِى ٱلْأَرْضِ مَرَّتَيْنِ وَلَتَعْلُنَّ عُلُوًّۭا كَبِيرًۭا
وَقَضَيْنَآ
और फ़ैसला सुना दिया हमने
إِلَىٰ
for
بَنِىٓ
(the) Children
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल को
فِى
in
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में
لَتُفْسِدُنَّ
अलबत्ता तुम ज़रूर फ़साद करोगे
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
مَرَّتَيْنِ
दो बार
وَلَتَعْلُنَّ
और अलबत्ता तुम ज़रूर सरकशी करोगे
عُلُوًّۭا
सरकशी
كَبِيرًۭا
बहुत बड़ी
और हमने किताब में इसराईल की सन्तान को इस फ़ैसले की ख़बर दे दी थी, "तुम धरती में अवश्य दो बार बड़ा फ़साद मचाओगे और बड़ी सरकशी दिखाओगे।"
तफ़्सीर:
और हमने बनी इसराईल को तौरात में बता दिया था कि वे अनिवार्य रूप से पाप एवं घमंड के ज़रिए दो बार धरती में उत्पात मचाएँगे तथा अत्याचार और अतिक्रमण के साथ लोगों पर अपनी उच्चता सिद्ध करने का प्रयास करेंगे और इसमें सीमा को पार कर जाएँगे।
आयत 5
فَإِذَا جَآءَ وَعْدُ أُولَىٰهُمَا بَعَثْنَا عَلَيْكُمْ عِبَادًۭا لَّنَآ أُو۟لِى بَأْسٍۢ شَدِيدٍۢ فَجَاسُوا۟ خِلَـٰلَ ٱلدِّيَارِ ۚ وَكَانَ وَعْدًۭا مَّفْعُولًۭا
فَإِذَا
फिर जब
جَآءَ
आ गया
وَعْدُ
वादा
أُولَىٰهُمَا
उन दोनों में से पहला
بَعَثْنَا
भेजा हमने
عَلَيْكُمْ
तुम पर
عِبَادًۭا
servants
لَّنَآ
अपने बन्दों को
أُو۟لِى
those of great military might
بَأْسٍۢ
लड़ाई वाले
شَدِيدٍۢ
शदीद
فَجَاسُوا۟
तो वो घुस गए
خِلَـٰلَ
अन्दर
ٱلدِّيَارِ ۚ
शहरों/घरों के
وَكَانَ
और था वो
وَعْدًۭا
एक वादा
مَّفْعُولًۭا
होकर रहने वाला
फिर जब उन दोनों में से पहले वादे का मौक़ा आ गया तो हमने तुम्हारे मुक़ाबले में अपने ऐसे बन्दों को उठाया जो युद्ध में बड़े बलशाली थे। तो वे बस्तियों में घुसकर हर ओर फैल गए और यह वादा पूरा होना ही था
तफ़्सीर:
फिर जब उन्होंने प्रथम बार उत्पात मचाया, तो हमने उनपर अपने ऐसे बंदों को हावी कर दिया, जो बड़े शक्तिशाली एवं पकड़ वाले थे। वे उन्हें मारते और घरों से निकालते थे। चुनाँचे वे उनके घरों में घुस गए और जहाँ से गुज़रे, विनाश करते चले गए। और अल्लाह का यह वादा निश्चित रूप से पूरा होने वाला था।
आयत 6
ثُمَّ رَدَدْنَا لَكُمُ ٱلْكَرَّةَ عَلَيْهِمْ وَأَمْدَدْنَـٰكُم بِأَمْوَٰلٍۢ وَبَنِينَ وَجَعَلْنَـٰكُمْ أَكْثَرَ نَفِيرًا
ثُمَّ
फिर
رَدَدْنَا
लौटा दी हमने
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْكَرَّةَ
बारी
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَأَمْدَدْنَـٰكُم
और मदद दी हमने तुम्हें
بِأَمْوَٰلٍۢ
साथ मालों
وَبَنِينَ
और बेटों के
وَجَعَلْنَـٰكُمْ
और कर दिया हमने तुम्हें
أَكْثَرَ
ज़्यादा
نَفِيرًا
नफ़री/तादाद में
फिर हमने तुम्हारी बारी उनपर लौटाई कि उनपर प्रभावी हो सको। और धनों और पुत्रों से तुम्हारी सहायता की और तुम्हें बहुसंख्यक लोगों का एक जत्था बनाया
तफ़्सीर:
फिर जब तुमने अल्लाह से तौबा कर ली, तो हमने (ऐ बनी इसराईल) तुम्हें पुनः राज्य और उन लोगों पर आधिपत्य प्रदान किया, जो तुम्हारे ऊपर हावी कर दिए गए थे। और हमने तुम्हें धन छिनने के बाद धन और संतान के बंदी बना लिए जाने के बाद संतान प्रदान की और तुम्हें तुम्हारे शत्रुओं से अधिक संख्याबल प्रदान किया।
आयत 7
إِنْ أَحْسَنتُمْ أَحْسَنتُمْ لِأَنفُسِكُمْ ۖ وَإِنْ أَسَأْتُمْ فَلَهَا ۚ فَإِذَا جَآءَ وَعْدُ ٱلْـَٔاخِرَةِ لِيَسُـۥٓـُٔوا۟ وُجُوهَكُمْ وَلِيَدْخُلُوا۟ ٱلْمَسْجِدَ كَمَا دَخَلُوهُ أَوَّلَ مَرَّةٍۢ وَلِيُتَبِّرُوا۟ مَا عَلَوْا۟ تَتْبِيرًا
إِنْ
अगर
أَحْسَنتُمْ
भलाई की तुमने
أَحْسَنتُمْ
भलाई की तुमने
لِأَنفُسِكُمْ ۖ
अपने नफ़्सों के लिए
وَإِنْ
और अगर
أَسَأْتُمْ
बुरा किया तुमने
فَلَهَا ۚ
तो अपने ही लिए है
فَإِذَا
फिर जब
جَآءَ
आ जाएगा
وَعْدُ
वादा
ٱلْـَٔاخِرَةِ
दूसरी (बारी का)
لِيَسُـۥٓـُٔوا۟
ताकि वो बिगाड़ दें
وُجُوهَكُمْ
चेहरे तुम्हारे
وَلِيَدْخُلُوا۟
और ताकि वो दाख़िल हों
ٱلْمَسْجِدَ
मस्जिद में
كَمَا
जैसा कि
دَخَلُوهُ
वो दाख़िल हुए थे उसमें
أَوَّلَ
पहली
مَرَّةٍۢ
बार
وَلِيُتَبِّرُوا۟
और ताकि वो तबाह कर दें
مَا
जिस पर
عَلَوْا۟
वो ग़लबा पाऐं
تَتْبِيرًا
बुरी तरह तबाह करना
"यदि तुमने भलाई की तो अपने ही लिए भलाई की और यदि तुमने बुराई की तो अपने ही लिए की।" फिर जब दूसरे वादे का मौक़ा आ गया (तो हमने तुम्हारे मुक़ाबले में ऐसे प्रबल को उठाया) कि वे तुम्हारे चेहरे बिगाड़ दें और मस्जिद (बैतुलमक़दिस) में घुसे थे और ताकि जिस चीज़ पर भी उनका ज़ोर चले विनष्टि कर डालें
तफ़्सीर:
ऐ बनी इसराईल! यदि तुमने अच्छे कर्म किए और उन्हें वांछित तरीके से किया, तो उसका प्रतिफल तुम्हें ही मिलने वाला है। क्योंकि अल्लाह तुम्हारे कर्मों से बेनियाज़ है। और यदि तुमने बुरे कर्म किए, तो उसका दुष्परिणाम तुम्हें ही भुगतना पड़ेगा। क्योंकि अल्लाह को, न तो तुम्हारे सुकर्मों से कोई लाभ पहुँचता है और न तुम्हारे कुकर्मों से उसे कोई हानि पहुँचती है। फिर जब दूसरा उपद्रव हुआ, तो हमने तुमपर तुम्हारे शत्रुओं को हावी कर दिया, ताकि वे तुम्हें अपमानित करें और तुम्हें अनेक प्रकार के तिरस्कार व अपमान का स्वाद चखाएँ कि उत्पीड़न तुम्हारे चेहरों पर प्रत्यक्ष हो। और ताकि वे बैतुल मक़्दिस में प्रवेश करें और उसे विनष्ट कर दें, जैसा कि उन्होंने उसमें प्रथम बार प्रवेश किया था और उसे विनष्ट किया था। तथा वे जिन शहरों पर हावी हो सकें, उन्हें पूर्ण रूप से ध्वस्त कर दें।
आयत 8
عَسَىٰ رَبُّكُمْ أَن يَرْحَمَكُمْ ۚ وَإِنْ عُدتُّمْ عُدْنَا ۘ وَجَعَلْنَا جَهَنَّمَ لِلْكَـٰفِرِينَ حَصِيرًا
عَسَىٰ
उम्मीद है
رَبُّكُمْ
रब तुम्हारा
أَن
कि
يَرْحَمَكُمْ ۚ
वो रहम करे तुम पर
وَإِنْ
ओर अगर
عُدتُّمْ
लौटोगे तुम
عُدْنَا ۘ
लौटेंगे हम
وَجَعَلْنَا
और बनाया हमने
جَهَنَّمَ
जहन्नम को
لِلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के लिए
حَصِيرًا
क़ैद ख़ाना
हो सकता है तुम्हारा रब तुमपर दया करे, किन्तु यदि तुम फिर उसी पूर्व नीति की ओर पलटे तो हम भी पलटेंगे, और हमने जहन्नम को इनकार करनेवालों के लिए कारागार बना रखा है
तफ़्सीर:
ऐ बनी इसराईल! यदि तुम तौबा करो और अच्छे कार्य करो, तो संभव है कि तुम्हारा पालनहार इस कठोर प्रतिशोध के बाद भी तुमपर दया करे। और अगर तुमने तीसरी बार या उसके बाद भी उत्पात मचाया, तो हम भी तुमसे प्रतिशोध लेने के लिए लौट आएँगे, तथा हमने जहन्नम को अल्लाह का इनकार करने वालों का बिस्तर और बिछौना (ठिकाना) बना दिया है, जिससे वे छुटकारा नहीं पा सकते।
आयत 9
إِنَّ هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانَ يَهْدِى لِلَّتِى هِىَ أَقْوَمُ وَيُبَشِّرُ ٱلْمُؤْمِنِينَ ٱلَّذِينَ يَعْمَلُونَ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ أَنَّ لَهُمْ أَجْرًۭا كَبِيرًۭا
إِنَّ
बेशक
هَـٰذَا
ये
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरआन
يَهْدِى
वो रहनुमाई करता है
لِلَّتِى
उस (राह) के लिए
هِىَ
वो (जो)
أَقْوَمُ
सबसे ज़्यादा सीधी है
وَيُبَشِّرُ
और वो ख़ुशख़बरी देता है
ٱلْمُؤْمِنِينَ
ईमान वालों को
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَعْمَلُونَ
अमल करते हैं
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
أَنَّ
बेशक
لَهُمْ
उनके लिए
أَجْرًۭا
अजर है
كَبِيرًۭا
बहुत बड़ा
वास्तव में यह क़ुरआन वह मार्ग दिखाता है जो सबसे सीधा है और उन मोमिमों को, जो अच्छे कर्म करते है, शूभ सूचना देता है कि उनके लिए बड़ा बदला है
तफ़्सीर:
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतरने वाला यह क़ुरआन सबसे अच्छा रास्ता बताता है और वह इस्लाम का रास्ता है। तथा अच्छे कर्म करने वाले मोमिनों को उस चीज़ की सूचना देता है जो उन्हें प्रसन्न कर देती है और वह यह है कि उनके लिए अल्लाह की ओर से बहुत बड़ा प्रतिफल है।
आयत 10
وَأَنَّ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ أَعْتَدْنَا لَهُمْ عَذَابًا أَلِيمًۭا
وَأَنَّ
और बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाते
بِٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत पर
أَعْتَدْنَا
तैयार कर रखा है हमने
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابًا
अज़ाब
أَلِيمًۭا
दर्दनाक
और यह कि जो आख़िरत को नहीं मानते उनके लिए हमने दुखद यातना तैयार कर रखी है
तफ़्सीर:
तथा क़ियामत पर ईमान न रखने वालों को उस चीज़ की सूचना देता है, जो उन्हें बुरी लगती है और वह यह है कि हमने उनके लिए क़ियामत के दिन दर्दनाक यातना तैयार कर रखी है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मेराज के सफर और कुरआन की हिदायत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह की कुदरत हर हद से बालातर है, इसलिए किसी भी बड़ी बात पर हैरान होने की बजाय यकीन रखना चाहिए।
आयत 11
وَيَدْعُ ٱلْإِنسَـٰنُ بِٱلشَّرِّ دُعَآءَهُۥ بِٱلْخَيْرِ ۖ وَكَانَ ٱلْإِنسَـٰنُ عَجُولًۭا
وَيَدْعُ
और दुआ करता है
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
بِٱلشَّرِّ
शर/बुराई की
دُعَآءَهُۥ
(जैसा) दुआ करना उसका
بِٱلْخَيْرِ ۖ
ख़ैर/भलाई की
وَكَانَ
और है
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
عَجُولًۭا
बहुत जल्द बाज़
मनुष्य उस प्रकार बुराई माँगता है जिस प्रकार उसकी प्रार्थना भलाई के लिए होनी चाहिए। मनुष्य है ही बड़ा उतावला!
तफ़्सीर:
तथा इनसान, अपनी अज्ञानता के कारण, क्रोध में आकर अपने आप पर तथा अपनी संतान और धन पर बद्दुआ (बुरी चीज़ों की दुआ) करने लगता है, जिस तरह कि वह अपने लिए भलाई की दुआ करता है। यदि हम उसकी बुराई की दुआ क़बूल कर लें, तो वह बर्बाद हो जाए और उसका धन एवं संतान नष्ट हो जाएँ। और मनुष्य जन्मजात जल्दबाज़ प्रकृति का है। इसलिए कभी-कभी वह उस चीज़ के लिए जल्दी करने लगता है, जो उसके लिए हानिकारक होती है।
आयत 12
وَجَعَلْنَا ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ ءَايَتَيْنِ ۖ فَمَحَوْنَآ ءَايَةَ ٱلَّيْلِ وَجَعَلْنَآ ءَايَةَ ٱلنَّهَارِ مُبْصِرَةًۭ لِّتَبْتَغُوا۟ فَضْلًۭا مِّن رَّبِّكُمْ وَلِتَعْلَمُوا۟ عَدَدَ ٱلسِّنِينَ وَٱلْحِسَابَ ۚ وَكُلَّ شَىْءٍۢ فَصَّلْنَـٰهُ تَفْصِيلًۭا
وَجَعَلْنَا
और बनाया हमने
ٱلَّيْلَ
रात
وَٱلنَّهَارَ
और दिन को
ءَايَتَيْنِ ۖ
दो निशानियाँ
فَمَحَوْنَآ
तो मिटा दी हमने
ءَايَةَ
निशानी
ٱلَّيْلِ
रात की
وَجَعَلْنَآ
और बनाई हमने
ءَايَةَ
निशानी
ٱلنَّهَارِ
दिन की
مُبْصِرَةًۭ
रौशन
لِّتَبْتَغُوا۟
ताकि तुम तलाश करो
فَضْلًۭا
फ़ज़ल
مِّن
from
رَّبِّكُمْ
अपने रब का
وَلِتَعْلَمُوا۟
और ताकि तुम जान लो
عَدَدَ
गिनती
ٱلسِّنِينَ
सालों की
وَٱلْحِسَابَ ۚ
और हिसाब
وَكُلَّ
और हर
شَىْءٍۢ
चीज़ को
فَصَّلْنَـٰهُ
खोल कर बयान किया हमने उसे
تَفْصِيلًۭا
खोल कर बयान करना
हमने रात और दिन को दो निशानियाँ बनाई है। फिर रात की निशानी को हमने मिटी हुई (प्रकाशहीन) बनाया और दिन की निशानी को हमने प्रकाशमान बनाया, ताकि तुम अपने रब का अनुग्रह (रोज़ी) ढूँढो और ताकि तुम वर्षो की गणना और हिसाब मालूम कर सको, और हर चीज़ को हमने अलग-अलग स्पष्ट कर रखा है
तफ़्सीर:
हमने रात और दिन को अल्लाह के एकेश्वरवाद और उसकी शक्ति को दर्शाने वाली दो निशानियाँ बनाई हैं। क्योंकि वे दोनों लंबाई एवं लघुता तथा गर्मी और ठंढक में भिन्न होते हैं। अतः हमने रात को आराम करने और सोने के लिए अंधकारमय कर दिया, तथा दिन को प्रकाशमान बनाया, ताकि तुम अल्लाह की उस रोज़ी को ढूंढ़ सको, जो उसने अपने अनुग्रह से तुम्हारे लिए नियत की है, और ताकि तुम उनके आने-जाने से वर्षों की गिनती जान सको, तथा महीनों, दिनों और घंटों के समय की गणना के संदर्भ में तुम्हारी आवश्यकता पूरी हो सके। और हमने प्रत्येक वस्तु को स्पष्ट रूप से बयान कर दिया है ताकि चीज़ों की अलग-अलग पहचान हो सके और सत्यनिष्ठ, झूठे से स्पष्ट हो जाए।
आयत 13
وَكُلَّ إِنسَـٰنٍ أَلْزَمْنَـٰهُ طَـٰٓئِرَهُۥ فِى عُنُقِهِۦ ۖ وَنُخْرِجُ لَهُۥ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ كِتَـٰبًۭا يَلْقَىٰهُ مَنشُورًا
وَكُلَّ
और हर
إِنسَـٰنٍ
इन्सान को
أَلْزَمْنَـٰهُ
लाज़िम कर दिया हमने उसको
طَـٰٓئِرَهُۥ
शगून उसका
فِى
in
عُنُقِهِۦ ۖ
उसकी गर्दन में
وَنُخْرِجُ
और हम निकालेंगे
لَهُۥ
उसके लिए
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
كِتَـٰبًۭا
एक किताब
يَلْقَىٰهُ
वो पाएगा उसे
مَنشُورًا
नशर किया हुआ/खुला हुआ
हमने प्रत्येक मनुष्य का शकुन-अपशकुन उसकी अपनी गरदन से बाँध दिया है और क़ियामत के दिन हम उसके लिए एक किताब निकालेंगे, जिसको वह खुला हुआ पाएगा
तफ़्सीर:
और हमने हर इनसान के कर्म को उससे ऐसे ही संबद्ध कर दिया है, जैसे हार गले से लगा रहता है। जब तक उसका हिसाब नहीं हो जाता, तब तक वह (कर्म) उससे अलग नहीं होगा। तथा क़ियामत के दिन हम उसके लिए एक पुस्तक निकालेंगे जिसमें उसके सारे अच्छे और बुरे कार्य दर्ज होंगे। वह उसे अपने सामने खुली हुई पाएगा।
आयत 14
ٱقْرَأْ كِتَـٰبَكَ كَفَىٰ بِنَفْسِكَ ٱلْيَوْمَ عَلَيْكَ حَسِيبًۭا
ٱقْرَأْ
पढ़ो
كِتَـٰبَكَ
किताब अपनी
كَفَىٰ
काफ़ी है
بِنَفْسِكَ
तेरा नफ़्स ही
ٱلْيَوْمَ
आज
عَلَيْكَ
तुझ पर
حَسِيبًۭا
हिसाब लेने वाला
"पढ़ ले अपनी किताब (कर्मपत्र)! आज तू स्वयं ही अपना हिसाब लेने के लिए काफ़ी है।"
तफ़्सीर:
हम उस दिन उससे कहेंगे : - ऐ इनसान! - तू अपनी किताब पढ़ और अपने कर्मों का अपना हिसाब स्वयं कर। क़ियामत के दिन तू अपना हिसाब करने के लिए खुद काफी है।
आयत 15
مَّنِ ٱهْتَدَىٰ فَإِنَّمَا يَهْتَدِى لِنَفْسِهِۦ ۖ وَمَن ضَلَّ فَإِنَّمَا يَضِلُّ عَلَيْهَا ۚ وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌۭ وِزْرَ أُخْرَىٰ ۗ وَمَا كُنَّا مُعَذِّبِينَ حَتَّىٰ نَبْعَثَ رَسُولًۭا
مَّنِ
जो
ٱهْتَدَىٰ
हिदायत पाए
فَإِنَّمَا
तो बेशक
يَهْتَدِى
वो हिदायत पाता है
لِنَفْسِهِۦ ۖ
अपने ही नफ़्स के लिए
وَمَن
और जो
ضَلَّ
गुमराह हुआ/भटका
فَإِنَّمَا
तो बेशक
يَضِلُّ
वो भटकता है
عَلَيْهَا ۚ
अपने ही ख़िलाफ़
وَلَا
और ना
تَزِرُ
बोझ उठाएगी
وَازِرَةٌۭ
कोई बोझ उठाने वाली
وِزْرَ
बोझ
أُخْرَىٰ ۗ
दूसरी का
وَمَا
और नहीं
كُنَّا
हैं हम
مُعَذِّبِينَ
अज़ाब देने वाले
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
نَبْعَثَ
हम भेजें
رَسُولًۭا
कोई रसूल
जो कोई सीधा मार्ग अपनाए तो उसने अपने ही लिए सीधा मार्ग अपनाया और जो पथभ्रष्टो हुआ, तो वह अपने ही बुरे के लिए भटका। और कोई भी बोझ उठानेवाला किसी दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा। और हम लोगों को यातना नहीं देते जब तक कोई रसूल न भेज दें
तफ़्सीर:
जिसे ईमान की ओर मार्गदर्शन प्राप्त हो गया, तो उसके मार्गदर्शन का प्रतिफल उसी के लिए है। और जो ईमान के मार्ग से भटक गया, तो उसके गुमराह होने की सज़ा उसे ही मिलेगी। तथा कोई प्राणी दूसरे प्राणी के पाप का बोझ नहीं उठाएगा। और हम किसी समुदाय को उस समय तक यातना नहीं देते, जब तक कि हम उनकी ओर रसूल भेजकर उनपर तर्क स्थापित न कर दें।
आयत 16
وَإِذَآ أَرَدْنَآ أَن نُّهْلِكَ قَرْيَةً أَمَرْنَا مُتْرَفِيهَا فَفَسَقُوا۟ فِيهَا فَحَقَّ عَلَيْهَا ٱلْقَوْلُ فَدَمَّرْنَـٰهَا تَدْمِيرًۭا
وَإِذَآ
और जब
أَرَدْنَآ
इरादा करते हैं हम
أَن
कि
نُّهْلِكَ
हम हलाक कर दें
قَرْيَةً
किसी बस्ती को
أَمَرْنَا
हुक्म देते हैं हम
مُتْرَفِيهَا
उसके ख़ुशहाल लोगों को
فَفَسَقُوا۟
तो वो नाफ़रमानी करते हैं
فِيهَا
उसमें
فَحَقَّ
तो साबित हो जाती है
عَلَيْهَا
उस पर
ٱلْقَوْلُ
बात
فَدَمَّرْنَـٰهَا
तो तबाह कर देते हैं हम उसे
تَدْمِيرًۭا
तबाह कर देना
और जब हम किसी बस्ती को विनष्ट करने का इरादा कर लेते है तो उसके सुखभोगी लोगों को आदेश देते है तो (आदेश मानने के बजाए) वे वहाँ अवज्ञा करने लग जाते है, तब उनपर बात पूरी हो जाती है, फिर हम उन्हें बिलकुल उखाड़ फेकते है
तफ़्सीर:
और जब हम किसी बस्ती को उसके अत्याचार के कारण विनष्ट करना चाहते हैं, तो उन लोगों को आज्ञाकारिता का आदेश देते हैं, जिन्हें नेमतों ने सरकश व अभिमानी बना दिया होता है, तो वे बात नहीं मानते। बल्कि अवहेलना और अवज्ञा का रवैया अपनाते हैं। फिर उनपर विनाशकारी यातना की बात सिद्ध हो जाती है, तो हम उन्हें समूल विनष्ट कर देते हैं।
आयत 17
وَكَمْ أَهْلَكْنَا مِنَ ٱلْقُرُونِ مِنۢ بَعْدِ نُوحٍۢ ۗ وَكَفَىٰ بِرَبِّكَ بِذُنُوبِ عِبَادِهِۦ خَبِيرًۢا بَصِيرًۭا
وَكَمْ
और कितनी ही
أَهْلَكْنَا
हलाक कीं हमने
مِنَ
from
ٱلْقُرُونِ
उम्मतें/बस्तियाँ
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद
نُوحٍۢ ۗ
नूह के
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِرَبِّكَ
रब आपका
بِذُنُوبِ
गुनाहों की
عِبَادِهِۦ
अपने बन्दों के
خَبِيرًۢا
ख़ूब ख़बर रखने वाला
بَصِيرًۭا
ख़ूब देखने वाला
हमने नूह के पश्चात कितनी ही नस्लों को विनष्ट कर दिया। तुम्हारा रब अपने बन्दों के गुनाहों की ख़बर रखने, देखने के लिए काफ़ी है
तफ़्सीर:
और कितने ही झुठलाने वाले समुदाय हैं, जिन्हें हमने नूह़ अलैहिस्सलाम के बाद विनष्ट कर दिया, जैसे आद और समूद। और - ऐ रसूल! - आपका पालनहार अपने बंदों के पापों की खबर रखने और देखने के लिए काफी है। उससे इनमें से कोई भी चीज़ छिपी नहीं है और वह उन्हें उनका बदला देगा।
आयत 18
مَّن كَانَ يُرِيدُ ٱلْعَاجِلَةَ عَجَّلْنَا لَهُۥ فِيهَا مَا نَشَآءُ لِمَن نُّرِيدُ ثُمَّ جَعَلْنَا لَهُۥ جَهَنَّمَ يَصْلَىٰهَا مَذْمُومًۭا مَّدْحُورًۭا
مَّن
जो कोई
كَانَ
है
يُرِيدُ
चाहता
ٱلْعَاجِلَةَ
जल्द मिलने वाली चीज़ को
عَجَّلْنَا
जल्द देते हैं हम
لَهُۥ
उसे
فِيهَا
उसमें
مَا
जो
نَشَآءُ
हम चाहते हैं
لِمَن
जिसके लिए
نُّرِيدُ
हम चाहते हैं
ثُمَّ
फिर
جَعَلْنَا
बना देते हैं हम
لَهُۥ
उसके लिए
جَهَنَّمَ
जहन्नम को
يَصْلَىٰهَا
वो जलेगा उसमें
مَذْمُومًۭا
मज़म्मत किया हुआ
مَّدْحُورًۭا
रहमत से दूर किया हुआ
जो कोई शीघ्र प्राप्त, होनेवाली को चाहता है उसके लिए हम उसी में जो कुछ किसी के लिए चाहते है शीघ्र प्रदान कर देते है। फिर उसके लिए हमने जहन्नम तैयार कर रखा है जिसमें वह अपयशग्रस्त और ठुकराया हुआ प्रवेश करेगा
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति नेकी के कामों से सांसारिक जीवन का इरादा रखता है, और आख़िरत पर ईमान नहीं रखता और न ही उसकी कोई परवाह करता है, तो हम उसे दुनिया में वह चीज़ जल्द प्रदान कर देते हैं जो हम चाहते हैं, न कि जो नेमतें वह चाहता है, जिसके साथ हम ऐसा करना चाहते हैं। फिर हमने उसके लिए जहन्नम तैयार कर रखी है, जिसमें वह क़ियामत के दिन प्रवेश करके उसकी गर्मी को सहन करेगा, वह दुनिया को अपनी पसंद बनाने और आखिरत का इनकार करने पर निंदित होगा और अल्लाह की दया से निष्कासित कर दिया गया होगा।
आयत 19
وَمَنْ أَرَادَ ٱلْـَٔاخِرَةَ وَسَعَىٰ لَهَا سَعْيَهَا وَهُوَ مُؤْمِنٌۭ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ كَانَ سَعْيُهُم مَّشْكُورًۭا
وَمَنْ
और जो
أَرَادَ
चाहे
ٱلْـَٔاخِرَةَ
आख़िरत को
وَسَعَىٰ
और वो कोशिश करे
لَهَا
उसके लिए
سَعْيَهَا
(ज़रूरी) कोशिश उसकी
وَهُوَ
जबकि वो
مُؤْمِنٌۭ
मोमिन हो
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
كَانَ
है
سَعْيُهُم
कोशिश उनकी
مَّشْكُورًۭا
क़ाबिले क़द्र
और जो आख़िरत चाहता हो और उसके लिए ऐसा प्रयास भी करे जैसा कि उसके लिए प्रयास करना चाहिए और वह हो मोमिन, तो ऐसे ही लोग है जिनके प्रयास की क़द्र की जाएगी
तफ़्सीर:
और जिस व्यक्ति ने अपने नेक कर्मों से आखिरत के प्रतिफल का इरादा किया और उसके लिए दिखावा और प्रसिद्धि से दूर रहकर प्रयास किया, जबकि वह उन चीज़ों पर ईमान रखने वाला हो, जिनपर ईमान लाना अल्लाह ने अनिवार्य किया है, तो यही इन गुणों से सुसज्जित लोग ही हैं जिनका प्रयास अल्लाह के निकट स्वीकृत होगा और वह उन्हें उसका बदला देगा।
आयत 20
كُلًّۭا نُّمِدُّ هَـٰٓؤُلَآءِ وَهَـٰٓؤُلَآءِ مِنْ عَطَآءِ رَبِّكَ ۚ وَمَا كَانَ عَطَآءُ رَبِّكَ مَحْظُورًا
كُلًّۭا
हर एक को
نُّمِدُّ
हम मदद देते हैं
هَـٰٓؤُلَآءِ
इनको (भी)
وَهَـٰٓؤُلَآءِ
और उनको (भी)
مِنْ
from
عَطَآءِ
अता में से
رَبِّكَ ۚ
आपके रब की
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
عَطَآءُ
अता
رَبِّكَ
आपके रब की
مَحْظُورًا
रोकी गई
इन्हें भी और इनको भी, प्रत्येक को हम तुम्हारे रब की देन में से सहायता पहुँचाए जा रहे है, और तुम्हारे रब की देन बन्द नहीं है
तफ़्सीर:
हम - ऐ रसूल - आपके पालनहार के अनुदान से बिना किसी रुकावट के इन दोनों पक्षों में से प्रत्येक नेक और दुष्ट को प्रदान करते रहते हैं। और इस दुनिया में आपके पालनहार का अनुदान किसी से रोका नहीं गया है, चाहे वह नेक हो या बुरा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दुनिया-आखिरत की चाहत के फर्क का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि जो सिर्फ दुनिया चाहता है वह उसी में उलझ जाता है, आखिरत की तैयारी ज़रूरी है।
आयत 21
ٱنظُرْ كَيْفَ فَضَّلْنَا بَعْضَهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍۢ ۚ وَلَلْـَٔاخِرَةُ أَكْبَرُ دَرَجَـٰتٍۢ وَأَكْبَرُ تَفْضِيلًۭا
ٱنظُرْ
देखो
كَيْفَ
किस तरह
فَضَّلْنَا
फ़ज़ीलत दी हमने
بَعْضَهُمْ
उनके बाज़ को
عَلَىٰ
over
بَعْضٍۢ ۚ
बाज़ पर
وَلَلْـَٔاخِرَةُ
और यक़ीनन आख़िरत
أَكْبَرُ
ज़्यादा बड़ी है
دَرَجَـٰتٍۢ
दरजात में
وَأَكْبَرُ
और ज़्यादा बढ़ कर है
تَفْضِيلًۭا
फ़जीलत में
देखो, कैसे हमने उनके कुछ लोगों को कुछ के मुक़ाबले में आगे रखा है! और आख़िरत दर्जों की दृष्टि से सबसे बढ़कर है और श्रेष्ठ़ता की दृष्टि से भी वह सबसे बढ़-चढ़कर है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप विचार करें कि हमने इस दुनिया में जीविका और पद (दर्जे) के मामले में उनमें से कुछ को दूसरों पर किस प्रकार श्रेष्ठता प्रदान की है। और निश्चित रूप से आख़िरत, सांसारिक जीवन की तुलना में, नेमतों के दर्जों में बहुत अधिक अंतर वाली और श्रेष्ठता के एतिबार से बहुत बढ़कर है। अतः मोमिन को उसके लिए उत्सुक होना चाहिए।
आयत 22
لَّا تَجْعَلْ مَعَ ٱللَّهِ إِلَـٰهًا ءَاخَرَ فَتَقْعُدَ مَذْمُومًۭا مَّخْذُولًۭا
لَّا
ना
تَجْعَلْ
तुम बनाओ
مَعَ
with
ٱللَّهِ
साथ अल्लाह के
إِلَـٰهًا
इलाह
ءَاخَرَ
दूसरा
فَتَقْعُدَ
वरना तुम बैठे रहोगे
مَذْمُومًۭا
मज़म्मत ज़दा
مَّخْذُولًۭا
बेयारो मददगार
अल्लाह के साथ कोई दूसरा पूज्य-प्रभु न बनाओ अन्यथा निन्दित और असहाय होकर बैठे रह जाओगे
तफ़्सीर:
(ऐ बंदे) अल्लाह के साथ कोई अन्य पूज्य बनाकर उसकी पूजा मत कर। यदि ऐसा किया, तो तू अल्लाह के निकट निंदित हो जाएगा, उसके सदाचारी बंदों के निकट तेरी प्रशंसा नहीं की जाएगी, तथा उसकी ओर से उपेक्षित होगा, तेरा कोई मददगार नहीं होगा।
आयत 23
۞ وَقَضَىٰ رَبُّكَ أَلَّا تَعْبُدُوٓا۟ إِلَّآ إِيَّاهُ وَبِٱلْوَٰلِدَيْنِ إِحْسَـٰنًا ۚ إِمَّا يَبْلُغَنَّ عِندَكَ ٱلْكِبَرَ أَحَدُهُمَآ أَوْ كِلَاهُمَا فَلَا تَقُل لَّهُمَآ أُفٍّۢ وَلَا تَنْهَرْهُمَا وَقُل لَّهُمَا قَوْلًۭا كَرِيمًۭا
۞ وَقَضَىٰ
और फ़ैसला कर दिया है
رَبُّكَ
आपके रब ने
أَلَّا
कि ना
تَعْبُدُوٓا۟
तुम इबादत करो
إِلَّآ
मगर
إِيَّاهُ
सिर्फ़ उसी की
وَبِٱلْوَٰلِدَيْنِ
और साथ वालिदैन के
إِحْسَـٰنًا ۚ
एहसान करना
إِمَّا
अगर
يَبْلُغَنَّ
वो पहुँचें
عِندَكَ
तेरे पास
ٱلْكِبَرَ
बुढ़ापे को
أَحَدُهُمَآ
उन दोनों में से एक
أَوْ
या
كِلَاهُمَا
वो दोनों
فَلَا
तो ना
تَقُل
तुम कहना
لَّهُمَآ
उन दोनों के लिए
أُفٍّۢ
उफ़
وَلَا
और ना
تَنْهَرْهُمَا
तुम झिड़कना उन दोनों को
وَقُل
और कहना
لَّهُمَا
उन दोनों को
قَوْلًۭا
बात
كَرِيمًۭا
इज़्ज़त वाली/उम्दा
तुम्हारे रब ने फ़ैसला कर दिया है कि उसके सिवा किसी की बन्दगी न करो और माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो। यदि उनमें से कोई एक या दोनों ही तुम्हारे सामने बुढ़ापे को पहुँच जाएँ तो उन्हें 'उँह' तक न कहो और न उन्हें झिझको, बल्कि उनसे शिष्टतापूर्वक बात करो
तफ़्सीर:
(ऐ बंदे) तेरे पालनहार ने आदेश दिया है और अनिवार्य कर दिया है कि उसके सिवा किसी और की उपासना न की जाए। तथा उसने माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया है, विशेष रूप से उनके वृद्धावस्था में पहुँचने पर। यदि माता-पिता में से कोई एक अथवा दोनों बुढ़ापे को पहुँच जाएँ, तो उनसे उकताकर 'उफ़' तक न कहो, न उन्हें झिड़को और न उन्हें कठोर बात कहो। बल्कि उनसे ऐसी बात कहो जिसमें नरमी और दयालुता हो।
आयत 24
وَٱخْفِضْ لَهُمَا جَنَاحَ ٱلذُّلِّ مِنَ ٱلرَّحْمَةِ وَقُل رَّبِّ ٱرْحَمْهُمَا كَمَا رَبَّيَانِى صَغِيرًۭا
وَٱخْفِضْ
और झुकाए रखना
لَهُمَا
उन दोनों के लिए
جَنَاحَ
बाज़ू
ٱلذُّلِّ
आजिज़ी के
مِنَ
(out) of
ٱلرَّحْمَةِ
रहमत से
وَقُل
और कहना
رَّبِّ
ऐ मेरे रब
ٱرْحَمْهُمَا
रहम कीजिए इन दोनों पर
كَمَا
जैसा कि
رَبَّيَانِى
इन दोनों ने परवरिश की मेरी
صَغِيرًۭا
बचपन में
और उनके आगे दयालुता से नम्रता की भुजाएँ बिछाए रखो और कहो, "मेरे रब! जिस प्रकार उन्होंने बालकाल में मुझे पाला है, तू भी उनपर दया कर।"
तफ़्सीर:
और उनके प्रति दया-भाव और विनति के साथ विनम्रता अपनाओ और (दुआ करते हुए) कहो : ऐ मेरे पालनहार! तू उन दोनों पर दया कर, क्योंकि उन्होंने बचपन में मेरा पालन-पोषण किया है।
आयत 25
رَّبُّكُمْ أَعْلَمُ بِمَا فِى نُفُوسِكُمْ ۚ إِن تَكُونُوا۟ صَـٰلِحِينَ فَإِنَّهُۥ كَانَ لِلْأَوَّٰبِينَ غَفُورًۭا
رَّبُّكُمْ
रब तुम्हारा
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِمَا
उसे जो
فِى
(is) in
نُفُوسِكُمْ ۚ
तुम्हारे नफ़्सों में है
إِن
अगर
تَكُونُوا۟
तुम होगे
صَـٰلِحِينَ
नेक
فَإِنَّهُۥ
तो यक़ीनन वो
كَانَ
है वो
لِلْأَوَّٰبِينَ
रुजूअ करने वालों के लिए
غَفُورًۭا
बहुत बख़्शने वाला
जो कुछ तुम्हारे जी में है उसे तुम्हारा रब भली-भाँति जानता है। यदि तुम सुयोग्य और अच्छे हुए तो निश्चय ही वह भी ऐसे रुजू करनेवालों के लिए बड़ा क्षमाशील है
तफ़्सीर:
(ऐ लोगो) तुम्हारे दिलों में इबादत और भलाई के कार्यों तथा माता-पिता के साथ सद्व्यवहार के प्रति जो निष्ठा (इख़्लास) है, तुम्हारा पालनहार उसे खूब जानता है। यदि तुम्हारी इबादत और अपने माता-पिता के साथ तुम्हारे व्यवहार आदि में तुम्हारे इरादे नेक हैं, तो अल्लाह उन लोगों को क्षमा करने वाला है, जो तौबा करके उसकी ओर पलटने वाले हैं। अतः जो व्यक्ति अल्लाह की इबादत या अपने माता-पिता की सेवा में अपनी पिछली कोताही से तौबा कर ले, तो अल्लाह उसे क्षमा कर देता है।
आयत 26
وَءَاتِ ذَا ٱلْقُرْبَىٰ حَقَّهُۥ وَٱلْمِسْكِينَ وَٱبْنَ ٱلسَّبِيلِ وَلَا تُبَذِّرْ تَبْذِيرًا
وَءَاتِ
और दो
ذَا
the relatives
ٱلْقُرْبَىٰ
क़राबतदार को
حَقَّهُۥ
हक़ उसका
وَٱلْمِسْكِينَ
और मिस्कीन को
وَٱبْنَ
and the wayfarer
ٱلسَّبِيلِ
और मुसाफ़िर को
وَلَا
और ना
تُبَذِّرْ
तुम बेजा ख़र्च करो
تَبْذِيرًا
बेजा ख़र्च करना
और नातेदार को उसका हक़ दो मुहताज और मुसाफ़िर को भी - और फुज़ूलख़र्ची न करो
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वाले) रिश्तेदार को उसकी रिश्तेदारी का हक़ दे। तथा ज़रूरतमंद निर्धन को दे और ऐसे ही उस यात्री को दे, जो अपनी यात्रा में फँस गया है। और अपना धन पाप में, या फालतू में खर्च न कर।
आयत 27
إِنَّ ٱلْمُبَذِّرِينَ كَانُوٓا۟ إِخْوَٰنَ ٱلشَّيَـٰطِينِ ۖ وَكَانَ ٱلشَّيْطَـٰنُ لِرَبِّهِۦ كَفُورًۭا
إِنَّ
बेशक
ٱلْمُبَذِّرِينَ
फ़िज़ूल ख़र्च लोग
كَانُوٓا۟
हैं वो
إِخْوَٰنَ
भाई
ٱلشَّيَـٰطِينِ ۖ
शैतानों के
وَكَانَ
और है
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान
لِرَبِّهِۦ
अपने रब का
كَفُورًۭا
बहुत नाशुक्रा
निश्चय ही फ़ु़ज़ूलख़र्ची करनेवाले शैतान के भाई है और शैतान अपने रब का बड़ा ही कृतघ्न है। -
तफ़्सीर:
निश्चित रूप से अपना धन गुनाह के कामों में खर्च करने वाले तथा खर्च करने में अपव्ययता से काम लेने वाले, शैतान के भाई हैं, जो अपव्यय और फिज़ूलखर्ची करने में उनके आदेशों का पालन करते हैं। और शैतान अपने पालनहार का बहुत नाशुक्रा है। वह केवल वही काम करता है, जिसमें पाप हो तथा वह उसी चीज़ का आदेश देता है, जिससे उसका पालनहार क्रोधित हो।
आयत 28
وَإِمَّا تُعْرِضَنَّ عَنْهُمُ ٱبْتِغَآءَ رَحْمَةٍۢ مِّن رَّبِّكَ تَرْجُوهَا فَقُل لَّهُمْ قَوْلًۭا مَّيْسُورًۭا
وَإِمَّا
और अगर
تُعْرِضَنَّ
तुम ऐराज़ करते हो
عَنْهُمُ
उनसे
ٱبْتِغَآءَ
चाहने को
رَحْمَةٍۢ
रहमत
مِّن
from
رَّبِّكَ
अपने रब की तरफ़ से
تَرْجُوهَا
तुम उम्मीद रखते हो जिसकी
فَقُل
तो कहना
لَّهُمْ
उनसे
قَوْلًۭا
बात
مَّيْسُورًۭا
आसान
किन्तु यदि तुम्हें अपने रब की दयालुता की खोज में, जिसकी तुम आशा रखते हो, उनसे कतराना भी पड़े, तो इस दशा में तुम उनसें नर्म बात करो
तफ़्सीर:
और यदि तुम इन लोगों को कुछ न दे सको; क्योंकि अल्लाह की ओर से जीविका प्रदान किए जाने की प्रतीक्षा करते हुए उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है, तो तुम उनसे नरम और आसान बात कहो। उदाहरण के लिए तुम उनके लिए जीविका के विस्तार की दुआ करो, या अल्लाह की ओर से धन प्राप्त होने पर उन्हें देने का वादा करो।
आयत 29
وَلَا تَجْعَلْ يَدَكَ مَغْلُولَةً إِلَىٰ عُنُقِكَ وَلَا تَبْسُطْهَا كُلَّ ٱلْبَسْطِ فَتَقْعُدَ مَلُومًۭا مَّحْسُورًا
وَلَا
और ना
تَجْعَلْ
तुम रखो
يَدَكَ
हाथ अपना
مَغْلُولَةً
बँधा हुआ
إِلَىٰ
to
عُنُقِكَ
तरफ़ अपनी गर्दन के
وَلَا
और ना
تَبْسُطْهَا
तुम फैला दो उसे
كُلَّ
पूरा
ٱلْبَسْطِ
फैला देना
فَتَقْعُدَ
पस तुम बैठ जाओगे
مَلُومًۭا
मलामत ज़दा
مَّحْسُورًا
हसरत ज़दा होकर
और अपना हाथ न तो अपनी गरदन से बाँधे रखो और न उसे बिलकुल खुला छोड़ दो कि निन्दित और असहाय होकर बैठ जाओ
तफ़्सीर:
अपने हाथ को खर्च करने से मत रोको और न ही खर्च करने में अपव्ययता से काम लो। क्योंकि अगर तुमने अपने हाथ को खर्च करने से रोक लिया, तो तुम निंदित हो जाओगे, तुम्हारी कंजूसी पर लोग तुम्हारी निंदा करेंगे। तथा तुम अपने अपव्यय के कारण खर्च करने से रुक जाओगे, तुम्हारे पास खर्च करने के लिए कुछ न रहेगा।
आयत 30
إِنَّ رَبَّكَ يَبْسُطُ ٱلرِّزْقَ لِمَن يَشَآءُ وَيَقْدِرُ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ بِعِبَادِهِۦ خَبِيرًۢا بَصِيرًۭا
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
يَبْسُطُ
कुशादा कर देता है
ٱلرِّزْقَ
रिज़्क़ को
لِمَن
जिसके लिए
يَشَآءُ
वो चाहता है
وَيَقْدِرُ ۚ
और वो तंग कर देता है
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
है वो
بِعِبَادِهِۦ
अपने बन्दों की
خَبِيرًۢا
पूरी ख़बर रखने वाला
بَصِيرًۭا
ख़ूब देखने वाला
तुम्हारा रब जिसको चाहता है प्रचुर और फैली हुई रोज़ी प्रदान करता है और इसी प्रकार नपी-तुली भी। निस्संदेह वह अपने बन्दों की ख़बर और उनपर नज़र रखता है
तफ़्सीर:
निश्चय ही आपका पालनहार जिसके लिए चाहता है, रोज़ी विस्तृत कर देता है, और जिसके लिए चाहता है अपनी व्यापक हिकमत से रोज़ी तंग कर देता है। निःसंदेह वह अपने बंदों की पूरी ख़बर रखने वाला, खूब देखने वाला है, उनकी कोई भी चीज़ उससे छिपी नहीं है। इसलिए वह उनके बारे में जैसा चाहता है, निर्णय करता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
वालिदैन के हुकूक और फुज़ूलखर्ची की मुमानअत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि माता-पिता के साथ नर्मी और अदब से पेश आना और अपने खर्च में एतिदाल रखना दोनों अहम अखलाकी सबक हैं।
आयत 31
وَلَا تَقْتُلُوٓا۟ أَوْلَـٰدَكُمْ خَشْيَةَ إِمْلَـٰقٍۢ ۖ نَّحْنُ نَرْزُقُهُمْ وَإِيَّاكُمْ ۚ إِنَّ قَتْلَهُمْ كَانَ خِطْـًۭٔا كَبِيرًۭا
وَلَا
और ना
تَقْتُلُوٓا۟
तुम क़त्ल करो
أَوْلَـٰدَكُمْ
औलाद अपनी
خَشْيَةَ
ख़ौफ़ से
إِمْلَـٰقٍۢ ۖ
मुफ़लिसी के
نَّحْنُ
हम
نَرْزُقُهُمْ
हम रिज़्क़ देते हैं उन्हें
وَإِيَّاكُمْ ۚ
और तुम्हें (भी)
إِنَّ
बेशक
قَتْلَهُمْ
क़त्ल करना उनका
كَانَ
है
خِطْـًۭٔا
ख़ता
كَبِيرًۭا
बहुत बड़ी
और निर्धनता के भय से अपनी सन्तान की हत्या न करो, हम उन्हें भी रोज़ी देंगे और तुम्हें भी। वास्तव में उनकी हत्या बहुत ही बड़ा अपराध है
तफ़्सीर:
तथा इस डर से अपने बच्चों की हत्या न करो कि भविष्य में उन पर खर्च करने के कारण तुम ग़रीब हो जाओगे। उन्हें रोज़ी देने की ज़िम्मेदारी हमारी है, तथा तुम्हें भी रोज़ी देने के ज़िम्मेदार हम ही हैं। निःसंदेह उनकी हत्या करना एक बड़ा पाप है। क्योंकि उन्होंने कोई पाप नहीं किया है और न ही कोई ऐसा कारण है जो उनकी हत्या को वैध ठहराता हो।
आयत 32
وَلَا تَقْرَبُوا۟ ٱلزِّنَىٰٓ ۖ إِنَّهُۥ كَانَ فَـٰحِشَةًۭ وَسَآءَ سَبِيلًۭا
وَلَا
और ना
تَقْرَبُوا۟
तुम क़रीब जाओ
ٱلزِّنَىٰٓ ۖ
ज़िना के
إِنَّهُۥ
यक़ीनन वो
كَانَ
है वो
فَـٰحِشَةًۭ
बेहयाई
وَسَآءَ
और बहुत बुरा
سَبِيلًۭا
रास्ता
और व्यभिचार के निकट न जाओ। वह एक अश्लील कर्म और बुरा मार्ग है
तफ़्सीर:
व्यभिचार से सावधान रहो तथा उसके लिए प्रोत्साहित करने वाली चीज़ों से बचो। यह अत्यंत घृणित (घिनावना) काम है और बहुत बुरा रास्ता है, क्योंकि यह नसब (वंश) के मिश्रण और अल्लाह के अज़ाब का कारण बनता है।
आयत 33
وَلَا تَقْتُلُوا۟ ٱلنَّفْسَ ٱلَّتِى حَرَّمَ ٱللَّهُ إِلَّا بِٱلْحَقِّ ۗ وَمَن قُتِلَ مَظْلُومًۭا فَقَدْ جَعَلْنَا لِوَلِيِّهِۦ سُلْطَـٰنًۭا فَلَا يُسْرِف فِّى ٱلْقَتْلِ ۖ إِنَّهُۥ كَانَ مَنصُورًۭا
وَلَا
और ना
تَقْتُلُوا۟
तुम क़त्ल करो
ٱلنَّفْسَ
किसी जान को
ٱلَّتِى
वो जो
حَرَّمَ
हराम की
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
إِلَّا
मगर
بِٱلْحَقِّ ۗ
साथ हक़ के
وَمَن
और जो कोई
قُتِلَ
क़त्ल किया गया
مَظْلُومًۭا
मज़लूम
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
جَعَلْنَا
बनाया हमने
لِوَلِيِّهِۦ
उसके वली के लिए
سُلْطَـٰنًۭا
इख़्तियार/क़ुव्वत
فَلَا
पस ना
يُسْرِف
वो ज़्यादती करे
فِّى
in
ٱلْقَتْلِ ۖ
क़त्ल में
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
है वो
مَنصُورًۭا
मदद किया हुआ
किसी जीव की हत्या न करो, जिसे (मारना) अल्लाह ने हराम ठहराया है। यह और बात है कि हक़ (न्याय) का तक़ाज़ा यही हो। और जिसकी अन्यायपूर्वक हत्या की गई हो, उसके उत्तराधिकारी को हमने अधिकार दिया है (कि वह हत्यारे से बदला ले सकता है), किन्तु वह हत्या के विषय में सीमा का उल्लंघन न करे। निश्चय ही उसकी सहायता की जाएगी
तफ़्सीर:
और उस प्राणी की हत्या न करो, जिसका खून अल्लाह ने ईमान अथवा 'अमान' (सुरक्षा) के कारण संरक्षित कर दिया है, जब तक कि वह मुर्तद्द होने (इस्लाम धर्म त्यागने), या शादीशुदा होने के पश्चात व्यभिचार करने के कारण, या 'क़िसास' (बदले) के तौर पर क़त्ल किए जाने का हक़दार न हो जाए। तथा जिसकी हत्या बिना किसी वैध कारण के अत्याचारपूर्ण ढंग से कर दी जाए, तो हमने उसके उत्तराधिकारियों में से उसके अभिभावक को उसके हत्यारे के ऊपर आधिपत्य प्रदान किया है। चुनाँचे उसे यह अधिकार है कि वह 'क़िसास' के तौर पर हत्यारे को क़त्ल करने का मुतालबा करे, या मुआवज़े के बिना क्षमा कर दे, या दियत (खून की क़ीमत) लेकर क्षमा करे। परंतु वह उस सीमा से आगे न बढ़े, जो अल्लाह ने उसके लिए वैध ठहराया है, जैसे कि हत्यारे के अंगों को काटना, या उसने जिस (हथियार) से हत्या की है, उसके सिवा किसी अन्य चीज़ से हत्या करना, या हत्यारे के अलावा किसी और व्यक्ति की हत्या करना। निश्चित रूप से वह समर्थित और मदद किया हुआ है।
आयत 34
وَلَا تَقْرَبُوا۟ مَالَ ٱلْيَتِيمِ إِلَّا بِٱلَّتِى هِىَ أَحْسَنُ حَتَّىٰ يَبْلُغَ أَشُدَّهُۥ ۚ وَأَوْفُوا۟ بِٱلْعَهْدِ ۖ إِنَّ ٱلْعَهْدَ كَانَ مَسْـُٔولًۭا
وَلَا
और ना
تَقْرَبُوا۟
तुम क़रीब जाओ
مَالَ
माले
ٱلْيَتِيمِ
यतीम के
إِلَّا
मगर
بِٱلَّتِى
साथ उस तरीक़े के
هِىَ
वो (जो)
أَحْسَنُ
ज़्यादा अच्छा है
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَبْلُغَ
वो पहुँच जाए
أَشُدَّهُۥ ۚ
अपनी जवानी को
وَأَوْفُوا۟
और पूरा करो
بِٱلْعَهْدِ ۖ
अहद को
إِنَّ
बेशक
ٱلْعَهْدَ
अहद
كَانَ
है
مَسْـُٔولًۭا
पूछा जाने वाला
और अनाथ के माल को हाथ में लगाओ सिवाय उत्तम रीति के, यहाँ तक कि वह अपनी युवा अवस्था को पहुँच जाए, और प्रतिज्ञा पूरी करो। प्रतिज्ञा के विषय में अवश्य पूछा जाएगा
तफ़्सीर:
जिस बच्चे के पिता की मृत्यु हो गई, उसके धन के संबंध में केवल वही कार्रवाई करो जो उसके लिए सबसे उत्तम हो, जैसे कि उसको विकसित करना (बढ़ाना) और उसका संरक्षण करना, यहाँ तक कि वह अपनी बुद्धि की पूर्णता और परिपक्वता को पहुँच जाए। और तुम्हारे तथा अल्लाह के बीच और तुम्हारे तथा अल्लाह के बंदों के बीच जो भी प्रतिज्ञा है, बिना प्रतिज्ञाभंग या कमी के उसे पूरा करो। अल्लाह क़ियामत के दिन वचन देने वाले से प्रश्न करेगा कि : क्या उसने अपना वचन पूरा किया था, ताकि उसे प्रतिफल दे, या उसने उसे पूरा नहीं किया, ताकि उसे दंडित करे।
आयत 35
وَأَوْفُوا۟ ٱلْكَيْلَ إِذَا كِلْتُمْ وَزِنُوا۟ بِٱلْقِسْطَاسِ ٱلْمُسْتَقِيمِ ۚ ذَٰلِكَ خَيْرٌۭ وَأَحْسَنُ تَأْوِيلًۭا
وَأَوْفُوا۟
और पूरा करो
ٱلْكَيْلَ
पैमाना
إِذَا
जब
كِلْتُمْ
नापो तुम
وَزِنُوا۟
और तोलो
بِٱلْقِسْطَاسِ
साथ तराज़ू
ٱلْمُسْتَقِيمِ ۚ
सीधी के
ذَٰلِكَ
ये
خَيْرٌۭ
बेहतर है
وَأَحْسَنُ
और ज़्यादा अच्छा है
تَأْوِيلًۭا
अंजाम के ऐतबार से
और जब नापकर दो तो, नाप पूरी रखो। और ठीक तराज़ू से तौलो, यही उत्तम और परिणाम की दृष्टि से भी अधिक अच्छा है
तफ़्सीर:
और जब दूसरे को मापकर दो, तो पूरा मापो और उसमें कमी न करो, तथा ठीक तराज़ू से तौलो, जो ज़रा भी कम तौलने वाला न हो। यह माप और वज़न को पूरा करना तुम्हारे लिए इस दुनिया और आख़िरत में बहुत बेहतर है तथा माप और वज़न में कमी करने से उत्तम परिणाम वाला है।
आयत 36
وَلَا تَقْفُ مَا لَيْسَ لَكَ بِهِۦ عِلْمٌ ۚ إِنَّ ٱلسَّمْعَ وَٱلْبَصَرَ وَٱلْفُؤَادَ كُلُّ أُو۟لَـٰٓئِكَ كَانَ عَنْهُ مَسْـُٔولًۭا
وَلَا
और ना
تَقْفُ
तुम पीछे पड़ो
مَا
उसके जो
لَيْسَ
नहीं
لَكَ
तुम्हें
بِهِۦ
उसका
عِلْمٌ ۚ
कोई इल्म
إِنَّ
बेशक
ٱلسَّمْعَ
कान
وَٱلْبَصَرَ
और आँख
وَٱلْفُؤَادَ
और दिल
كُلُّ
हर एक
أُو۟لَـٰٓئِكَ
उनमें से
كَانَ
है
عَنْهُ
उसके बारे में
مَسْـُٔولًۭا
सवाल किया जाने वाला
और जिस चीज़ का तुम्हें ज्ञान न हो उसके पीछे न लगो। निस्संदेह कान और आँख और दिल इनमें से प्रत्येक के विषय में पूछा जाएगा
तफ़्सीर:
और (ऐ आदम की संतान) तुम उस चीज़ के पीछे न पड़ो, जिसका तुम्हें ज्ञान नहीं है, अन्यथा तुम अनुमानों और अटकल का पालन करने लगोगे। निश्चय ही मनुष्य से पूछा जाएगा कि उसने अपने कान, आँख तथा दिल का उपयोग अच्छे कार्य के लिए किया है या बुरे कार्य के लिए। फिर उसे अच्छे कार्य के लिए सवाब दिया जाएगा और बुरे कार्य के लिए दंडित किया जाएगा।
आयत 37
وَلَا تَمْشِ فِى ٱلْأَرْضِ مَرَحًا ۖ إِنَّكَ لَن تَخْرِقَ ٱلْأَرْضَ وَلَن تَبْلُغَ ٱلْجِبَالَ طُولًۭا
وَلَا
और ना
تَمْشِ
तुम चलो
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
مَرَحًا ۖ
इतराते हुए
إِنَّكَ
बेशक तुम
لَن
हरगिज़ नहीं
تَخْرِقَ
तुम फाड़ सकते
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
وَلَن
और हरगिज़ नहीं
تَبْلُغَ
तुम पहुँच सकते
ٱلْجِبَالَ
पहाड़ों को
طُولًۭا
लम्बाई में
और धरती में अकड़कर न चलो, न तो तुम धरती को फाड़ सकते हो और न लम्बे होकर पहाड़ो को पहुँच सकते हो
तफ़्सीर:
तथा धरती पर घमंड करते और इतराते हुए मत चलो। यदि तुम उसपर अकड़ कर चलोगे, तो तुम अपनी चाल से कभी न धरती को फाड़ सकोगे, और न ही तुम्हारा क़द कभी पहाड़ों की लंबाई और ऊँचाई तक पहुँचेगा। तो फिर घमंड क्यों?!
आयत 38
كُلُّ ذَٰلِكَ كَانَ سَيِّئُهُۥ عِندَ رَبِّكَ مَكْرُوهًۭا
كُلُّ
All
ذَٰلِكَ
ये सब (काम)
كَانَ
है
سَيِّئُهُۥ
बुराई उनकी
عِندَ
near
رَبِّكَ
आपके रब के नज़दीक
مَكْرُوهًۭا
मकरूह/नापसंदीदा
इनमें से प्रत्येक की बुराई तुम्हारे रब की स्पष्ट में अप्रिय ही है
तफ़्सीर:
उपर्युक्त सभी चीज़ों में से जो चीज़ बुरी है, वह (ऐ इनसान) तेरे पालनहार के निकट निषिद्ध है। उसके करने वाले से अल्लाह खुश नहीं होता, बल्कि उससे घृणा करता है।
आयत 39
ذَٰلِكَ مِمَّآ أَوْحَىٰٓ إِلَيْكَ رَبُّكَ مِنَ ٱلْحِكْمَةِ ۗ وَلَا تَجْعَلْ مَعَ ٱللَّهِ إِلَـٰهًا ءَاخَرَ فَتُلْقَىٰ فِى جَهَنَّمَ مَلُومًۭا مَّدْحُورًا
ذَٰلِكَ
ये
مِمَّآ
उसमें से है जो
أَوْحَىٰٓ
वही की
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
رَبُّكَ
आपके रब ने
مِنَ
of
ٱلْحِكْمَةِ ۗ
हिकमत में से
وَلَا
और ना
تَجْعَلْ
तुम बनाओ
مَعَ
साथ
ٱللَّهِ
अल्लाह के
إِلَـٰهًا
कोई इलाह
ءَاخَرَ
दूसरा
فَتُلْقَىٰ
वरना तुम डाल दिए जाओगे
فِى
in
جَهَنَّمَ
जहन्नम में
مَلُومًۭا
मलामत किए हुए
مَّدْحُورًا
धुतकारे हुए
ये तत्वदर्शिता की वे बातें है, जिनकी प्रकाशना तुम्हारे रब ने तुम्हारी ओर की है। और देखो, अल्लाह के साथ कोई दूसरा पूज्य-प्रभु न घड़ना, अन्यथा जहन्नम में डाल दिए जाओगे निन्दित, ठुकराए हुए!
तफ़्सीर:
जिन आदेशों, निषेधों और नियमों को हमने स्पष्ट किया है, ये हिकमत की वे बातें हैं, जिनकी आपके पालनहार ने आपकी ओर वह़्य की है। और (ऐ मनुष्य!) तू अल्लाह के साथ किसी और को पूज्य न बना। अन्यथा तू क़ियामत के दिन निंदित जहन्नम में फेंक दिया जाएगा। तेरी आत्मा तेरी निंदा करेगी और दूसरे लोग भी तेरी निंदा करेंगे, तू हर भलाई से निष्कासित एवं धुत्कारा हुआ होगा।
आयत 40
أَفَأَصْفَىٰكُمْ رَبُّكُم بِٱلْبَنِينَ وَٱتَّخَذَ مِنَ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ إِنَـٰثًا ۚ إِنَّكُمْ لَتَقُولُونَ قَوْلًا عَظِيمًۭا
أَفَأَصْفَىٰكُمْ
क्या फिर चुन लिया तुम्हें
رَبُّكُم
तुम्हारे रब ने
بِٱلْبَنِينَ
साथ बेटों के
وَٱتَّخَذَ
और उसने बना लिया
مِنَ
from
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ
फ़रिश्तों को
إِنَـٰثًا ۚ
बेटियाँ
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
لَتَقُولُونَ
अलबत्ता तुम कहते हो
قَوْلًا
बात
عَظِيمًۭا
बहुत बड़ी
क्या तुम्हारे रब ने तुम्हें तो बेटों के लिए ख़ास किया और स्वयं अपने लिए फ़रिश्तों को बेटियाँ बनाया? बहुत भारी बात है जो तुम कह रहे हो!
तफ़्सीर:
ऐ वे लोगो, जो यह दावा करते हो कि फ़रिश्ते अल्लाह की पुत्रियाँ हैं! क्या - ऐ बहुदेववादियों! - तुम्हारे पालनहार ने पुत्र प्रदान करने के लिए तुम्हें खास कर लिया है और अपने लिए फरिश्तों को बेटियाँ बना ली हैं? अल्लाह तुम्हारी बातों से बहुत बुलंद है। निश्चित रूप से तुम अल्लाह के बारे में बहुत ही घृणित बात कह रहे हो कि तुम उसकी ओर संतान की निस्बत करते हो, तथा उसके साथ कुफ़्र में अति करते हुए यह दावा करते हो कि उसकी बेटियाँ हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
औलाद के कत्ल, ज़िना और यतीम के माल की हिफाज़त का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि जान, इज़्ज़त और माल तीनों की हिफाज़त इस्लामी समाज की बुनियादी ज़िम्मेदारी है।
आयत 41
وَلَقَدْ صَرَّفْنَا فِى هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانِ لِيَذَّكَّرُوا۟ وَمَا يَزِيدُهُمْ إِلَّا نُفُورًۭا
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
صَرَّفْنَا
फेर-फेर कर लाए हैं हम
فِى
in
هَـٰذَا
this
ٱلْقُرْءَانِ
इस क़ुरआन में
لِيَذَّكَّرُوا۟
ताकि वो नसीहत पकड़ें
وَمَا
और नहीं
يَزِيدُهُمْ
वो ज़्यादा करता उन्हें
إِلَّا
मगर
نُفُورًۭا
नफ़रत में
हमने इस क़ुरआन में विभिन्न ढंग से बात का स्पष्टीकरण किया कि वे चेतें, किन्तु इसमें उनकी नफ़रत ही बढ़ती है
तफ़्सीर:
हमने इस कुरआन में अहकाम (नियमों), उपदेशों और उदाहरणों को स्पष्ट रूप से बयान कर दिया है, ताकि लोग उनसे सीख प्राप्त करें। चुनाँचे जो उनके लिए लाभदायक है, उसपर चलें, तथा जो उनके लिए हानिकारक है, उसे छोड़ दें। तथ्य यह है कि जिन लोगों की फ़ितरत बदल गई है इससे उनके सत्य से दूरी और उसके प्रति घृणा ही में वृद्धि हुई है।
आयत 42
قُل لَّوْ كَانَ مَعَهُۥٓ ءَالِهَةٌۭ كَمَا يَقُولُونَ إِذًۭا لَّٱبْتَغَوْا۟ إِلَىٰ ذِى ٱلْعَرْشِ سَبِيلًۭا
قُل
कह दीजिए
لَّوْ
अगर
كَانَ
होते
مَعَهُۥٓ
साथ उसके
ءَالِهَةٌۭ
कुछ इलाह
كَمَا
जैसा कि
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
إِذًۭا
तब
لَّٱبْتَغَوْا۟
अलबत्ता वो तलाश करते
إِلَىٰ
तरफ़
ذِى
(the) Owner
ٱلْعَرْشِ
अर्श वाले के
سَبِيلًۭا
कोई रास्ता
कह दो, "यदि उसके साथ अन्य भी पूज्य-प्रभु होते, जैसा कि ये कहते हैं, तब तो वे सिंहासनवाले (के पद) तक पहुँचने का कोई मार्ग अवश्य तलाश करते"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप इन मुश्रिकों से कह दें : यदि अल्लाह के साथ और भी पूज्य होते, जैसा कि ये लोग झूठ बोलते और आरोप लगाते हुए कहते हैं, तो ये तथाकथित पूज्य अर्श वाले अल्लाह की ओर जाने का रास्ता खोजते, ताकि उसके राज्य पर अपना प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए उसे पराजित करने का प्रयास करें और उसके लिए उससे झगड़ा करें।
आयत 43
سُبْحَـٰنَهُۥ وَتَعَـٰلَىٰ عَمَّا يَقُولُونَ عُلُوًّۭا كَبِيرًۭا
سُبْحَـٰنَهُۥ
पाक है वो
وَتَعَـٰلَىٰ
और वो बुलन्दतर है
عَمَّا
उससे जो
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
عُلُوًّۭا
बहुत बुलन्द
كَبِيرًۭا
बहुत बड़ा
महिमावान है वह! और बहुत उच्च है उन बातों से जो वे कहते है!
तफ़्सीर:
अल्लाह उन बातों से पाक और पवित्र है, जो बहुदेववादी उसके साथ संबंधित करते हैं, तथा जो कुछ वे कहते हैं उससे वह बहुत बुलंद है।
आयत 44
تُسَبِّحُ لَهُ ٱلسَّمَـٰوَٰتُ ٱلسَّبْعُ وَٱلْأَرْضُ وَمَن فِيهِنَّ ۚ وَإِن مِّن شَىْءٍ إِلَّا يُسَبِّحُ بِحَمْدِهِۦ وَلَـٰكِن لَّا تَفْقَهُونَ تَسْبِيحَهُمْ ۗ إِنَّهُۥ كَانَ حَلِيمًا غَفُورًۭا
تُسَبِّحُ
तस्बीह कर रहे हैं
لَهُ
उसके लिए
ٱلسَّمَـٰوَٰتُ
आसमान
ٱلسَّبْعُ
सात
وَٱلْأَرْضُ
और ज़मीन
وَمَن
और वो जो
فِيهِنَّ ۚ
इनमें हैं
وَإِن
और नहीं
مِّن
any
شَىْءٍ
कोई चीज़
إِلَّا
मगर
يُسَبِّحُ
वो तस्बीह कर रही है
بِحَمْدِهِۦ
साथ उसकी हम्द के
وَلَـٰكِن
और लेकिन
لَّا
not
تَفْقَهُونَ
नहीं तुम समझते
تَسْبِيحَهُمْ ۗ
तस्बीह उनकी
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
है वो
حَلِيمًا
बहुत हिल्म वाला
غَفُورًۭا
बहुत बख़्शने वाला
सातों आकाश और धरती और जो कोई भी उनमें है सब उसकी तसबीह (महिमागान) करते है और ऐसी कोई चीज़ नहीं जो उसका गुणगान न करती हो। किन्तु तुम उनकी तसबीह को समझते नहीं। निश्चय ही वह अत्यन्त सहनशील, क्षमावान है
तफ़्सीर:
आकाश अल्लाह की पवित्रता का गान करते हैं, धरती अल्लाह की पवित्रता का गान करती है, तथा आकाशों और धरती के सभी प्राणी अल्लाह की पवित्रता का गान करते हैं, बल्कि कोई भी चीज़ ऐसी नहीं है जो उसकी प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता का गान न करती हो। लेकिन तुम यह नहीं समझते कि वे कैसे पवित्रता का गान करते हैं। क्योंकि तुम केवल उन्हीं की तस्बीह (पवित्रता-गान) को समझते हो, जो तुम्हारी भाषा में पवित्रता का गान करते हैं। निःसंदेह अल्लाह अत्यंत सहनशील है, वह जल्दी सज़ा नहीं देता, तौबा करने वालों को बहुत क्षमा करने वाला है।
आयत 45
وَإِذَا قَرَأْتَ ٱلْقُرْءَانَ جَعَلْنَا بَيْنَكَ وَبَيْنَ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ حِجَابًۭا مَّسْتُورًۭا
وَإِذَا
और जब
قَرَأْتَ
पढ़ते हैं आप
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरआन
جَعَلْنَا
बना देते है हम
بَيْنَكَ
दर्मियान आपके
وَبَيْنَ
और दर्मियान
ٱلَّذِينَ
उन लोगों के जो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान रखते
بِٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत पर
حِجَابًۭا
एक पर्दा
مَّسْتُورًۭا
छुपा हुआ
जब तुम क़ुरआन पढ़ते हो तो हम तुम्हारे और उन लोगों के बीच, जो आख़िरत को नहीं मानते एक अदृश्य पर्दे की आड़ कर देते है
तफ़्सीर:
जब (ऐ रसूल) आप क़ुरआन पढ़ते हैं और वे उसकी डराने-धमकाने वाली बातों और उपदेशों को सुनते हैं, तो हम आपके और क़ियामत के दिन पर ईमान न लाने वालों के बीच एक पर्दा डाल देते हैं, जो उन्हें उनके मुँह फेरने की सज़ा के तौर पर क़ुरआन समझने से रोक देता है।
आयत 46
وَجَعَلْنَا عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ أَكِنَّةً أَن يَفْقَهُوهُ وَفِىٓ ءَاذَانِهِمْ وَقْرًۭا ۚ وَإِذَا ذَكَرْتَ رَبَّكَ فِى ٱلْقُرْءَانِ وَحْدَهُۥ وَلَّوْا۟ عَلَىٰٓ أَدْبَـٰرِهِمْ نُفُورًۭا
وَجَعَلْنَا
और डाल देते हैं हम
عَلَىٰ
over
قُلُوبِهِمْ
उनके दिलों पर
أَكِنَّةً
पर्दे
أَن
कि
يَفْقَهُوهُ
(ना) वो समझ सकें उसे
وَفِىٓ
and in
ءَاذَانِهِمْ
और उनके कानों में
وَقْرًۭا ۚ
बोझ
وَإِذَا
और जब
ذَكَرْتَ
ज़िक्र करते आप
رَبَّكَ
अपने रब का
فِى
in
ٱلْقُرْءَانِ
क़ुरआन में
وَحْدَهُۥ
अकेले उसी का
وَلَّوْا۟
वो फिर जाते हैं
عَلَىٰٓ
on
أَدْبَـٰرِهِمْ
अपनी पुश्तों पर
نُفُورًۭا
नफ़रत करते हुए
और उनके दिलों पर भी परदे डाल देते है कि वे समझ न सकें। और उनके कानों में बोझ (कि वे सुन न सकें) । और जब तुम क़ुरआन के माध्यम से अपने रब का वर्णन उसे अकेला बताते हुए करते हो तो वे नफ़रत से अपनी पीठ फेरकर चल देते है
तफ़्सीर:
और हमने उनके दिलों पर पर्दे डाल दिए, ताकि वे क़ुरआन को न समझें। और उनके कानों में भारीपन पैदा कर दिए, ताकि वे उसे लाभ उठाने के लिए न सुनें। तथा जब आप क़ुरआन में अपने अकेले पालनहार का ज़िक्र करते हैं और उनके तथाकथित पूज्यों की चर्चा नहीं करते हैं, तो वे अल्लाह के लिए एकेश्वरवाद को खालिस करने से दूर भागते हुए अपनी एड़ियों के बल पलट जाते हैं।
आयत 47
نَّحْنُ أَعْلَمُ بِمَا يَسْتَمِعُونَ بِهِۦٓ إِذْ يَسْتَمِعُونَ إِلَيْكَ وَإِذْ هُمْ نَجْوَىٰٓ إِذْ يَقُولُ ٱلظَّـٰلِمُونَ إِن تَتَّبِعُونَ إِلَّا رَجُلًۭا مَّسْحُورًا
نَّحْنُ
हम
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानते हैं
بِمَا
उसको जो
يَسْتَمِعُونَ
वो ग़ौर से सुनते हैं
بِهِۦٓ
साथ उसके
إِذْ
जब
يَسْتَمِعُونَ
वो ग़ौर से सुनते हैं
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
وَإِذْ
और जब
هُمْ
वो
نَجْوَىٰٓ
सरगोशियाँ (करते हैं)
إِذْ
जब
يَقُولُ
कहते हैं
ٱلظَّـٰلِمُونَ
ज़ालिम लोग
إِن
नहीं
تَتَّبِعُونَ
तुम पैरवी करते
إِلَّا
मगर
رَجُلًۭا
एक मर्द
مَّسْحُورًا
सहरज़दा की
जब वे तुम्हारी ओर कान लगाते हैं तो हम भली-भाँति जानते है कि उनके कान लगाने का प्रयोजन क्या है और उसे भी जब वे आपस में कानाफूसियाँ करते है, जब वे ज़ालिम कहते है, "तुम लोग तो बस उस आदमी के पीछे चलते हो जो पक्का जादूगर है।"
तफ़्सीर:
हम उनके प्रमुखों के क़ुरआन सुनने के तरीक़े से अच्छी तरह अवगत हैं। उनका उद्देश्य क़ुरआन से हिदायत पाना नहीं है, बल्कि उनका उद्देश्य तिरस्कार करना और आपके क़ुरआन पढ़ने के समय शोर मचाना होता है। और हम खूब जानते हैं कि वे झुठलाने और क़ुरआन से रोकने के लिए चुपके-चुपके एक दूसरे से क्या कुछ कहते हैं, जब कुफ़्र के द्वारा अपने आप पर ज़ुल्म करने वाले ये लोग कहते हैं : (ऐ लोगो) तुम तो केवल एक जादू किए हुए आदमी के पीछे चलते हो, जिसका दिमाग ठीक नहीं है।
आयत 48
ٱنظُرْ كَيْفَ ضَرَبُوا۟ لَكَ ٱلْأَمْثَالَ فَضَلُّوا۟ فَلَا يَسْتَطِيعُونَ سَبِيلًۭا
ٱنظُرْ
देखो
كَيْفَ
किस तरह
ضَرَبُوا۟
उन्होंने बयान कीं
لَكَ
आपके लिए
ٱلْأَمْثَالَ
मिसालें
فَضَلُّوا۟
तो वो भटक गए
فَلَا
पस नहीं
يَسْتَطِيعُونَ
वो इस्तिताअत रखते
سَبِيلًۭا
किसी रास्ते की
देखो, वे कैसी मिसालें तुमपर चस्पाँ करते है! वे तो भटक गए है, अब कोई मार्ग नहीं पा सकते!
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप सोचें, तो आपको आश्चर्य होगा कि उन्होंने आपको किन विभिन्न निंदनीय विशेषताओं से विशिष्ट किया है। अतः वे सत्य मार्ग से विचलित हो गए और भटक गए, फिर उन्हें सही रास्ता नहीं मिला।
आयत 49
وَقَالُوٓا۟ أَءِذَا كُنَّا عِظَـٰمًۭا وَرُفَـٰتًا أَءِنَّا لَمَبْعُوثُونَ خَلْقًۭا جَدِيدًۭا
وَقَالُوٓا۟
और वो कहते हैं
أَءِذَا
क्या जब
كُنَّا
होंगे हम
عِظَـٰمًۭا
हड्डियाँ
وَرُفَـٰتًا
और चूरा-चूरा
أَءِنَّا
क्या बेशक हम
لَمَبْعُوثُونَ
अलबत्ता उठाए जाऐंगे
خَلْقًۭا
पैदा करके
جَدِيدًۭا
नए सिरे से
वे कहते है, "क्या जब हम हड्डियाँ और चूर्ण-विचूर्ण होकर रह जाएँगे, तो क्या हम फिर नए बनकर उठेंगे?"
तफ़्सीर:
और मुश्रिकों ने मरणोपरांत पुनर्जीवन का इनकार करते हुए कहा : क्या जब हम मर जाएँगे और हड्डियाँ बन जाएँगे, तथा हमारे शरीर गल जाएँगे, तो क्या हम पुनर्जीवित किए जाएँगे? यह तो असंभव है।
आयत 50
۞ قُلْ كُونُوا۟ حِجَارَةً أَوْ حَدِيدًا
۞ قُلْ
कह दीजिए
كُونُوا۟
हो जाओ
حِجَارَةً
पत्थर
أَوْ
या
حَدِيدًا
लोहा
कह दो, "तुम पत्थर या लोहो हो जाओ,
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : (ऐ बहुदेववादियो!) यदि तुम्हारे वश में है, तो कठोरता में पत्थर बन जाओ, या शक्ति में लोहा हो जाओ, जबकि तुम ऐसा कभी नहीं कर सकोगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नाप-तोल और तकब्बुर से मुमानअत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि चलने-फिरने और बात करने में भी तवाज़ो अपनानी चाहिए, तकब्बुर अल्लाह को नापसंद है।
आयत 51
أَوْ خَلْقًۭا مِّمَّا يَكْبُرُ فِى صُدُورِكُمْ ۚ فَسَيَقُولُونَ مَن يُعِيدُنَا ۖ قُلِ ٱلَّذِى فَطَرَكُمْ أَوَّلَ مَرَّةٍۢ ۚ فَسَيُنْغِضُونَ إِلَيْكَ رُءُوسَهُمْ وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هُوَ ۖ قُلْ عَسَىٰٓ أَن يَكُونَ قَرِيبًۭا
أَوْ
या
خَلْقًۭا
कोई मख़लूक़
مِّمَّا
उससे जो
يَكْبُرُ
बड़ी हो
فِى
in
صُدُورِكُمْ ۚ
तुम्हारे सीनों में
فَسَيَقُولُونَ
पस अनक़रीब वो कहेंगे
مَن
कौन
يُعِيدُنَا ۖ
लौटाएगा हमें
قُلِ
कह दीजिए
ٱلَّذِى
वो जिसने
فَطَرَكُمْ
पैदा किया तुम्हें
أَوَّلَ
पहली
مَرَّةٍۢ ۚ
बार
فَسَيُنْغِضُونَ
पस अनक़रीब वो हिलाऐंगे
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
رُءُوسَهُمْ
अपने सरों को
وَيَقُولُونَ
और वो कहेंगे
مَتَىٰ
कब है
هُوَ ۖ
वो
قُلْ
कह दीजिए
عَسَىٰٓ
उम्मीद है
أَن
कि
يَكُونَ
हो वो
قَرِيبًۭا
क़रीब ही
या कोई और चीज़ जो तुम्हारे जी में अत्यन्त विकट हो।" तब वे कहेंगे, "कौन हमें पलटाकर लाएगा?" कह दो, "वहीं जिसने तुम्हें पहली बार पैदा किया।" तब वे तुम्हारे आगे अपने सिरों को हिला-हिलाकर कहेंगे, "अच्छा तो वह कह होगा?" कह दो, "कदाचित कि वह निकट ही हो।"
तफ़्सीर:
या उन दोनों से बड़ी कोई और रचना हो जाओ, जो तुम्हारे दिलों में बड़ी मालूम होती हो। फिर भी अल्लाह तुम्हें लौटाएगा, जैसे पहली बार किया था और तुम्हें पुनर्जीवित करेगा, जैसे तुम्हें पहली बार पैदा किया था। इसपर ये हठधर्मी लोग कहेंगे : हमारी मृत्यु के बाद कौन हमें दोबारा जीवित करेगा? आप उनसे कह दें : वही तुम्हें दोबारा लौटाएगा जिसने तुम्हें पहली बार पूर्व उदाहरण के बिना पैदा किया था। फिर वे आपके उत्तर का मज़ाक़ उड़ाते हुए अपने सिर हिलाएँगे और उसे असंभव समझते हुए कहेंगे : यह लौटाना कब होगा? आप उनसे कह दें : शायद यह निकट है। क्योंकि जो भी आने वाला है, वह निकट ही है।
आयत 52
يَوْمَ يَدْعُوكُمْ فَتَسْتَجِيبُونَ بِحَمْدِهِۦ وَتَظُنُّونَ إِن لَّبِثْتُمْ إِلَّا قَلِيلًۭا
يَوْمَ
जिस दिन
يَدْعُوكُمْ
वो पुकारेगा तुम्हें
فَتَسْتَجِيبُونَ
पस तुम जवाब दोगे
بِحَمْدِهِۦ
साथ उसकी हम्द के
وَتَظُنُّونَ
और तुम समझ जाओगे
إِن
कि नहीं
لَّبِثْتُمْ
ठहरे तुम
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا
बहुत थोड़ा
जिस दिन वह तुम्हें पुकारेगा, तो तुम उसकी प्रशंसा करते हुए उसकी आज्ञा को स्वीकार करोगे और समझोगे कि तुम बस थोड़ी ही देर ठहरे रहे हो
तफ़्सीर:
अल्लाह तुम्हें उस दिन दोबारा जीवित करेगा, जिस दिन वह तुम्हें मह़्शर (प्रलय) की भूमि पर बुलाएगा, तो तुम उसके आदेश का पालन करते हुए, उसकी प्रशंसा करते हुए, उसके बुलावे का जवाब दोगो और सोचोगे कि तुम थोड़े समय के लिए ही पृथ्वी पर रहे हो।
आयत 53
وَقُل لِّعِبَادِى يَقُولُوا۟ ٱلَّتِى هِىَ أَحْسَنُ ۚ إِنَّ ٱلشَّيْطَـٰنَ يَنزَغُ بَيْنَهُمْ ۚ إِنَّ ٱلشَّيْطَـٰنَ كَانَ لِلْإِنسَـٰنِ عَدُوًّۭا مُّبِينًۭا
وَقُل
और कह दीजिए
لِّعِبَادِى
मेरे बन्दों को
يَقُولُوا۟
वो कहें
ٱلَّتِى
वो (बात) जो
هِىَ
वो
أَحْسَنُ ۚ
ज़्यादा अच्छी हो
إِنَّ
बेशक
ٱلشَّيْطَـٰنَ
शैतान
يَنزَغُ
फ़साद डालता है
بَيْنَهُمْ ۚ
दर्मियान उनके
إِنَّ
यक़ीनन
ٱلشَّيْطَـٰنَ
शैतान
كَانَ
है
لِلْإِنسَـٰنِ
इन्सान के लिए
عَدُوًّۭا
दुश्मन
مُّبِينًۭا
खुला
मेरे बन्दों से कह दो कि "बात वहीं कहें जो उत्तम हो। शैतान तो उनके बीच उकसाकर फ़साद डालता रहता है। निस्संदेह शैतान मनुष्य का प्रत्यक्ष शत्रु है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप मुझपर ईमान रखने वाले मेरे बंदों से कह दें कि वे वार्तालाप करते समय अच्छी बात कहें और घृणा पैदा करने वाली बुरी बात से बचें। क्योंकि शैतान उसका अनुचित लाभ उठाता है और उनके बीच झगड़ा लगाने का प्रयास करता है, जो उनके सांसारिक तथा आख़िरत के जीवन को खराब कर देता। निःसंदेह शैतान तो मनुष्य का खुला हुआ दुश्मन है। इसलिए मनुष्य को उससे बचना जाए।
आयत 54
رَّبُّكُمْ أَعْلَمُ بِكُمْ ۖ إِن يَشَأْ يَرْحَمْكُمْ أَوْ إِن يَشَأْ يُعَذِّبْكُمْ ۚ وَمَآ أَرْسَلْنَـٰكَ عَلَيْهِمْ وَكِيلًۭا
رَّبُّكُمْ
रब तुम्हारा
أَعْلَمُ
ख़ूब जानता है
بِكُمْ ۖ
तुम्हें
إِن
अगर
يَشَأْ
वो चाहे
يَرْحَمْكُمْ
वो रहम करे तुम पर
أَوْ
या
إِن
अगर
يَشَأْ
वो चाहे
يُعَذِّبْكُمْ ۚ
वो अज़ाब दे तुम्हें
وَمَآ
और नहीं
أَرْسَلْنَـٰكَ
भेजा हमने आपको
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَكِيلًۭا
ज़िम्मेदार बनाकर
तुम्हारा रब तुमसे भली-भाँति परिचित है। वह चाहे तो तुमपर दया करे या चाहे तो तुम्हें यातना दे। हमने तुम्हें उनकी ज़िम्मेदारी लेनेवाला कोई क्यक्ति बनाकर नहीं भेजा है (कि उन्हें अनिवार्यतः संमार्ग पर ला ही दो)
तफ़्सीर:
(ऐ लोगो!) तुम्हारा पालनहार तुम्हें सबसे अधिक जानता है। अतः उससे तुम्हारी कोई चीज़ छिपी नहीं है। यदि वह तुमपर दया करना चाहे, तो दया करे इस प्रकार कि तुम्हें ईमान और अच्छे कार्य की तौफीक़ प्रदान कर दे। और यदि वह तुम्हें सज़ा देना चाहे, तो सज़ा दे इस प्रकार कि तुम्हे ईमान से वंचित कर दे और तुम्हें कुफ्र की अवस्था में मृत्यु दे। और (ऐ रसूल!) हमने आपको उनपर संरक्षक (ज़िम्मेदार) बनाकर नहीं भेजा है कि आप उन्हें ईमान लाने पर मजबूर करें और कुफ्र से रोकें और उनके कार्यों को गिन-गिनकर रखें। आपका काम तो केवल अल्लाह की ओर से उस संदेश को पहुँचा देना है, जिसे पहुँचाने का आपको आदेश दिया गया है।
आयत 55
وَرَبُّكَ أَعْلَمُ بِمَن فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۗ وَلَقَدْ فَضَّلْنَا بَعْضَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ عَلَىٰ بَعْضٍۢ ۖ وَءَاتَيْنَا دَاوُۥدَ زَبُورًۭا
وَرَبُّكَ
और रब आपका
أَعْلَمُ
ख़ूब जानता है
بِمَن
उसे जो
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ ۗ
और ज़मीन में है
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
فَضَّلْنَا
फ़जीलत दी हमने
بَعْضَ
बाज़
ٱلنَّبِيِّـۧنَ
नबियों को
عَلَىٰ
to
بَعْضٍۢ ۖ
बाज़ पर
وَءَاتَيْنَا
और दी हमने
دَاوُۥدَ
दाऊद को
زَبُورًۭا
ज़बूर
तुम्हारा रब उससे भी भली-भाँति परिचित है जो कोई आकाशों और धरती में है, और हमने कुछ नबियों को कुछ की अपेक्षा श्रेष्ठता दी और हमने ही दाऊद को ज़बूर प्रदान की थी
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) आपका पालनहार उन सभी को अच्छी तरह जनता है, जो आकाशों और धरती में हैं तथा वह उनकी स्थितियों को जानता है और यह भी कि वे किस चीज़ के हक़दार हैं। और हमने कुछ नबियों को कुछ पर अनुयायियों की बहुतायत और पुस्तकों के अवतरण के द्वारा श्रेष्ठता प्रदान की तथा दाऊद - अलैहिस्सलाम - को ज़बूर नामक पुस्तक प्रदान की।
आयत 56
قُلِ ٱدْعُوا۟ ٱلَّذِينَ زَعَمْتُم مِّن دُونِهِۦ فَلَا يَمْلِكُونَ كَشْفَ ٱلضُّرِّ عَنكُمْ وَلَا تَحْوِيلًا
قُلِ
कह दीजिए
ٱدْعُوا۟
पुकारो
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्हें
زَعَمْتُم
समझते हो तुम
مِّن
besides Him
دُونِهِۦ
उसके सिवा (माबूद)
فَلَا
तो नहीं
يَمْلِكُونَ
वो मालिक हो सकते
كَشْفَ
दूर करने के
ٱلضُّرِّ
तकलीफ़ को
عَنكُمْ
तुमसे
وَلَا
और ना
تَحْوِيلًا
बदलने के
कह दो, "तुम उससे इतर जिनको भी पूज्य-प्रभु समझते हो उन्हें पुकार कर देखो। वे न तुमसे कोई कष्ट दूर करने का अधिकार रखते है और न उसे बदलने का।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप इन मुश्रिकों से कह दीजिए : (ऐ मुश्रिको) यदि तुम्हें कोई कष्ट पहुँचे, तो तुम उन्हें पुकारो जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पूज्य समझते हो। तो वे अपनी विवशता के कारण तुमसे वह कष्ट दूर नहीं कर सकते, और न ही उसे तुमसे हटाकर किसी अन्य की ओर स्थानांतरित कर सकते हैं। और जो विवश हो, वह पूज्य नहीं हो सकता।
आयत 57
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ يَدْعُونَ يَبْتَغُونَ إِلَىٰ رَبِّهِمُ ٱلْوَسِيلَةَ أَيُّهُمْ أَقْرَبُ وَيَرْجُونَ رَحْمَتَهُۥ وَيَخَافُونَ عَذَابَهُۥٓ ۚ إِنَّ عَذَابَ رَبِّكَ كَانَ مَحْذُورًۭا
أُو۟لَـٰٓئِكَ
ये लोग
ٱلَّذِينَ
जिन्हें
يَدْعُونَ
वो पुकारते हैं
يَبْتَغُونَ
वो (ख़ुद) तलाश करते हैं
إِلَىٰ
to
رَبِّهِمُ
तरफ़ अपने रब के
ٱلْوَسِيلَةَ
वसीला/ज़रिया
أَيُّهُمْ
कौन उनमें से
أَقْرَبُ
ज़्यादा क़रीब है
وَيَرْجُونَ
और वो उम्मीद रखते हैं
رَحْمَتَهُۥ
उसकी रहमत की
وَيَخَافُونَ
और वो डरते हैं
عَذَابَهُۥٓ ۚ
उसके अज़ाब से
إِنَّ
बेशक
عَذَابَ
अज़ाब
رَبِّكَ
आपके रब का
كَانَ
है
مَحْذُورًۭا
डरने की चीज़
जिनको ये लोग पुकारते है वे तो स्वयं अपने रब का सामीप्य ढूँढते है कि कौन उनमें से सबसे अधिक निकटता प्राप्त कर ले। और वे उसकी दयालुता की आशा रखते है और उसकी यातना से डरते रहते है। तुम्हारे रब की यातना तो है ही डरने की चीज़!
तफ़्सीर:
ये (बहुदेववादी) लोग जिन फरिश्तों और उन जैसों को पुकारते हैं, वे स्वयं उन अच्छे कार्यों की तलाश में रहते हैं, जो उन्हें अल्लाह के निकट कर दें तथा वे प्रतिस्पर्धा करते हैं कि उनमें से कौन आज्ञाकारिता के द्वारा अल्लाह के सबसे निकट हो जाए। तथा वे अल्लाह की दया की आशा रखते हैं और उसकी यातना से डरते हैं। निश्चित रूप से (ऐ रसूल) आपके पालनहार की यातना ऐसी है कि उससे डरना चाहिए।
आयत 58
وَإِن مِّن قَرْيَةٍ إِلَّا نَحْنُ مُهْلِكُوهَا قَبْلَ يَوْمِ ٱلْقِيَـٰمَةِ أَوْ مُعَذِّبُوهَا عَذَابًۭا شَدِيدًۭا ۚ كَانَ ذَٰلِكَ فِى ٱلْكِتَـٰبِ مَسْطُورًۭا
وَإِن
और नहीं
مِّن
(is) any
قَرْيَةٍ
कोई बस्ती
إِلَّا
मगर
نَحْنُ
हम
مُهْلِكُوهَا
हलाक करने वाले है उसे
قَبْلَ
क़ब्ल
يَوْمِ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
أَوْ
या
مُعَذِّبُوهَا
अज़ाब देने वाले हैं उसे
عَذَابًۭا
अज़ाब
شَدِيدًۭا ۚ
सख़्त
كَانَ
है
ذَٰلِكَ
ये
فِى
in
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में
مَسْطُورًۭا
लिखा हुआ
कोई भी (अवज्ञाकारी) बस्ती ऐसी नहीं जिसे हम क़ियामत के दिन से पहले विनष्टअ न कर दें या उसे कठोर यातना न दे। यह बात किताब में लिखी जा चुकी है
तफ़्सीर:
काफिर बस्तियों में से कोई बस्ती या शहर ऐसा नहीं है, जिसके कुफ़्र के कारण हम सांसारिक जीवन ही में उसपर यातना और विनाश न उतारें या उसके कुफ़्र के कारण हम उसे हत्या अथवा अन्य किसी कठोर दंड से पीड़ित न करें। यह विनाश और यातना एक दैवीय निर्णय है, जो लौह़े महफ़ूज़ में अंकित है।
आयत 59
وَمَا مَنَعَنَآ أَن نُّرْسِلَ بِٱلْـَٔايَـٰتِ إِلَّآ أَن كَذَّبَ بِهَا ٱلْأَوَّلُونَ ۚ وَءَاتَيْنَا ثَمُودَ ٱلنَّاقَةَ مُبْصِرَةًۭ فَظَلَمُوا۟ بِهَا ۚ وَمَا نُرْسِلُ بِٱلْـَٔايَـٰتِ إِلَّا تَخْوِيفًۭا
وَمَا
और नहीं
مَنَعَنَآ
रोका हमें
أَن
कि
نُّرْسِلَ
हम भेजें
بِٱلْـَٔايَـٰتِ
निशानियाँ
إِلَّآ
मगर
أَن
(इस बात ने) कि
كَذَّبَ
झुठलाया
بِهَا
उन्हें
ٱلْأَوَّلُونَ ۚ
पहलों ने
وَءَاتَيْنَا
और दी हमने
ثَمُودَ
समूद को
ٱلنَّاقَةَ
ऊँटनी
مُبْصِرَةًۭ
वाज़ेह निशानी
فَظَلَمُوا۟
तो उन्होंने ज़ुल्म किया
بِهَا ۚ
साथ उसके
وَمَا
और नहीं
نُرْسِلُ
हम भेजते
بِٱلْـَٔايَـٰتِ
निशानियाँ
إِلَّا
मगर
تَخْوِيفًۭا
डराने के लिए
हमें निशानियाँ (देकर नबी को) भेजने से इसके सिवा किसी चीज़ ने नहीं रोका कि पहले के लोग उनको झुठला चुके है। और (उदाहरणार्थ) हमने समूद को स्पष्ट प्रमाण के रूप में ऊँटनी दी, किन्तु उन्होंने ग़लत नीति अपनाकर स्वयं ही अपनी जानों पर ज़ुल्म किया। हम निशानियाँ तो डराने ही के लिए भेजते है
तफ़्सीर:
और हमने रसूल की सच्चाई को इंगित करने वाली संवेदी निशानियाँ, जिनकी माँग मुश्रिकों ने की थी, जैसे कि मृतकों को जीवित करना आदि, इसलिए उतारना छोड़ दिया, क्योंकि हमने उन्हें पिछले समुदायों पर उतारा था, परन्तु उन्होंने उन्हें झुठला दिया था। चुनाँचे हमने समूद समुदाय को एक महान और स्पष्ट निशानी ऊँटनी के रूप में दी थी। लेकिन उन्होंने उसका इनकार कर दिया। इसलिए हमने उन्हें जल्द ही यातना से ग्रस्त कर दिया। और हम रसूलों के हाथों निशानियाँ केवल उनके समुदायों को डराने के लिए भेजते हैं, ताकि वे इस्लाम ग्रहण कर लें।
आयत 60
وَإِذْ قُلْنَا لَكَ إِنَّ رَبَّكَ أَحَاطَ بِٱلنَّاسِ ۚ وَمَا جَعَلْنَا ٱلرُّءْيَا ٱلَّتِىٓ أَرَيْنَـٰكَ إِلَّا فِتْنَةًۭ لِّلنَّاسِ وَٱلشَّجَرَةَ ٱلْمَلْعُونَةَ فِى ٱلْقُرْءَانِ ۚ وَنُخَوِّفُهُمْ فَمَا يَزِيدُهُمْ إِلَّا طُغْيَـٰنًۭا كَبِيرًۭا
وَإِذْ
और जब
قُلْنَا
कहा हमने
لَكَ
आपको
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
आपके रब ने
أَحَاطَ
घेर लिया है
بِٱلنَّاسِ ۚ
लोगों को
وَمَا
और नहीं
جَعَلْنَا
बनाया हमने
ٱلرُّءْيَا
इस मन्ज़र को
ٱلَّتِىٓ
वो जो
أَرَيْنَـٰكَ
दिखाया हमने आपको
إِلَّا
मगर
فِتْنَةًۭ
एक आज़माइश
لِّلنَّاسِ
लोगों के लिए
وَٱلشَّجَرَةَ
और इस दरख़्त को (भी)
ٱلْمَلْعُونَةَ
जो लानत किया गया
فِى
in
ٱلْقُرْءَانِ ۚ
क़ुरआन में
وَنُخَوِّفُهُمْ
और हम डराते हैं उन्हें
فَمَا
तो नहीं
يَزِيدُهُمْ
वो ज़्यादा करता उन्हें
إِلَّا
मगर
طُغْيَـٰنًۭا
सरकशी में
كَبِيرًۭا
बहुत बड़ी
जब हमने तुमसे कहा, "तुम्हारे रब ने लोगों को अपने घेरे में ले रखा है और जो अलौकिक दर्शन हमने तुम्हें कराया उसे तो हमने लोगों के लिए केवल एक आज़माइश बना दिया और उस वृक्ष को भी जिसे क़ुरआन में तिरस्कृत ठहराया गया है। हम उन्हें डराते है, किन्तु यह चीज़ उनकी बढ़ी हुई सरकशी ही को बढ़ा रही है।"
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आप उस समय को याद कीजिए, जब हमने आपसे कहा था : निःसंदेह आपके पालनहार ने लोगों को अपनी शक्ति से घेर लिया है। इसलिए वे उसके क़ब्ज़े में हैं और अल्लाह आपकी उनसे रक्षा करने वाला है। अतः आप उस बात का प्रचार करें जिसके प्रचार का आपको आदेश दिया गया है। और हमने इस्रा (व मेराज) की रात आपको खुली आँखों जो कुछ दिखाया, उसे लोगों के लिए परीक्षण का विषय बना दिया कि क्या वे उसे मानते हैं या उसे झुठला देते हैं? तथा क़ुरआन में उल्लेख किया गया ज़क़्क़ूम का वृक्ष कि वह जहन्नम की गहराई में उगता है, हमने उसे उनके लिए मात्र एक परीक्षण बनाया है। अगर वे इन दोनों निशानियों को नहीं मानते, तो वे उनके अलावा अन्य निशानियों को कभी नहीं मानेंगे। हम निशानियाँ उतारकर उन्हें डराते हैं, परंतु इससे उनके कुफ़्र ही में वृद्धि होती है और वे गुमराही में बहुत दूर चले जाते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के यकीन और अल्लाह के अच्छे नामों का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह को किसी भी अच्छे नाम से पुकारा जा सकता है, यह उसकी वसीअ रहमत की निशानी है।
आयत 61
وَإِذْ قُلْنَا لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ ٱسْجُدُوا۟ لِـَٔادَمَ فَسَجَدُوٓا۟ إِلَّآ إِبْلِيسَ قَالَ ءَأَسْجُدُ لِمَنْ خَلَقْتَ طِينًۭا
وَإِذْ
और जब
قُلْنَا
कहा हमने
لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ
फ़रिश्तों से
ٱسْجُدُوا۟
सजदा करो
لِـَٔادَمَ
आदम को
فَسَجَدُوٓا۟
तो उन्होंने सजदा किया
إِلَّآ
सिवाय
إِبْلِيسَ
इब्लीस के
قَالَ
उसने कहा
ءَأَسْجُدُ
क्या मैं सजदा करुँ
لِمَنْ
उसको जिसे
خَلَقْتَ
पैदा किया तूने
طِينًۭا
मिट्टी से
याद करो जब हमने फ़रिश्तों से कहा, "आदम को सजदा करो तो इबलीस को छोड़कर सबने सजदा किया।" उसने कहा, "क्या मैं उसे सजदा करूँ, जिसे तूने मिट्टी से बनाया है?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप उस समय को याद कीजिए, जब हमने फरिश्तों से कहा : आदम को अभिवादन के तौर पर सजदा करो, इबादत के तौर पर नहीं। चुनाँचे उन्होंने आज्ञा का पालन किया और सब के सब सजदे में गिर गए। लेकिन इबलीस ने घमंड करते हुए उन्हें सजदा करने से इनकार कर दिया और कहा : क्या मैं उसे सजदा करूँ, जिसे तूने मिट्टी से पैदा किया है, जबकि तूने मुझे आग से पैदा किया है?! इसलिए मैं उससे उत्तम हूँ।
आयत 62
قَالَ أَرَءَيْتَكَ هَـٰذَا ٱلَّذِى كَرَّمْتَ عَلَىَّ لَئِنْ أَخَّرْتَنِ إِلَىٰ يَوْمِ ٱلْقِيَـٰمَةِ لَأَحْتَنِكَنَّ ذُرِّيَّتَهُۥٓ إِلَّا قَلِيلًۭا
قَالَ
उसने कहा
أَرَءَيْتَكَ
क्या देखा तूने
هَـٰذَا
ये
ٱلَّذِى
जिसे
كَرَّمْتَ
इज़्ज़त दी तूने
عَلَىَّ
मुझ पर
لَئِنْ
अलबत्ता अगर
أَخَّرْتَنِ
मोहलत दी तूने मुझे
إِلَىٰ
till
يَوْمِ
(the) Day
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के दिन तक
لَأَحْتَنِكَنَّ
अलबत्ता मैं ज़रूर काबू में कर लूगाँ
ذُرِّيَّتَهُۥٓ
उसकी औलाद को
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا
बहुत थोड़े
कहने लगा, "देख तो सही, उसे जिसको तूने मेरे मुक़ाबले में श्रेष्ठ ता प्रदान की है, यदि तूने मुझे क़ियामत के दिन तक मुहलत दे दी, तो मैं अवश्य ही उसकी सन्तान को वश में करके उसका उन्मूलन कर डालूँगा। केवल थोड़े ही लोग बच सकेंगे।"
तफ़्सीर:
इबलीस ने अपने पालनहार से कहा : क्या तूने इस प्राणी को देखा, जिसे सजदा करने का मुझे आदेश देकर तूने उसे मेरे ऊपर सम्मान दिया है? यदि तूने मुझे सांसारिक जीवन के अंत तक जीवित रखा, तो मैं अवश्य ही उसकी संतानों को उकसाऊँगा और निश्चित रूप से उन्हें तेरे सीधे रास्ते से भटका दूँगा, उनमें से कुछ को छोड़कर जिन्हें तू सुरक्षित रखेगा और वे तेरे चुने हुए बंदे हैं।
आयत 63
قَالَ ٱذْهَبْ فَمَن تَبِعَكَ مِنْهُمْ فَإِنَّ جَهَنَّمَ جَزَآؤُكُمْ جَزَآءًۭ مَّوْفُورًۭا
قَالَ
फ़रमाया
ٱذْهَبْ
जा
فَمَن
पस जो कोई
تَبِعَكَ
पैरवी करे तेरी
مِنْهُمْ
उनमें से
فَإِنَّ
तो बेशक
جَهَنَّمَ
जहन्नम
جَزَآؤُكُمْ
बदला है तुम्हारा
جَزَآءًۭ
बदला
مَّوْفُورًۭا
पूरा-पूरा
कहा, "जा, उनमें से जो भी तेरा अनुसरण करेगा, तो तुझ सहित ऐसे सभी लोगों का भरपूर बदला जहन्नम है
तफ़्सीर:
उसके पालनहार ने उससे कहा : तू (यहाँ से) चला जा। फिर उनमें से जो तेरी बात मानेगा, तो जहन्नम ही तेरा बदला और उनका बदला है, जो कि तुम्हारे कार्यों का भरपूर बदला है।
आयत 64
وَٱسْتَفْزِزْ مَنِ ٱسْتَطَعْتَ مِنْهُم بِصَوْتِكَ وَأَجْلِبْ عَلَيْهِم بِخَيْلِكَ وَرَجِلِكَ وَشَارِكْهُمْ فِى ٱلْأَمْوَٰلِ وَٱلْأَوْلَـٰدِ وَعِدْهُمْ ۚ وَمَا يَعِدُهُمُ ٱلشَّيْطَـٰنُ إِلَّا غُرُورًا
وَٱسْتَفْزِزْ
और बहका ले
مَنِ
जिसे
ٱسْتَطَعْتَ
इस्तिताअत रखता है तू
مِنْهُم
उनमें से
بِصَوْتِكَ
साथ अपनी आवाज़ के
وَأَجْلِبْ
और चढ़ा ला
عَلَيْهِم
उन पर
بِخَيْلِكَ
सवार अपने
وَرَجِلِكَ
और प्यादे अपने
وَشَارِكْهُمْ
और शरीक हो जा उनका
فِى
in
ٱلْأَمْوَٰلِ
मालों में
وَٱلْأَوْلَـٰدِ
और औलाद में
وَعِدْهُمْ ۚ
और वादा कर उनसे
وَمَا
और नहीं
يَعِدُهُمُ
वादा करता उनसे
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान
إِلَّا
मगर
غُرُورًا
धोखे का
उनमें सो जिस किसी पर तेरा बस चले उसके क़दम अपनी आवाज़ से उखाड़ दे। और उनपर अपने सवार और अपने प्यादे (पैदल सेना) चढ़ा ला। और माल और सन्तान में भी उनके साथ साझा लगा। और उनसे वादे कर!" - किन्तु शैतान उनसे जो वादे करता है वह एक धोखे के सिवा और कुछ भी नहीं होता। -
तफ़्सीर:
और उनमें से जिसे भी तू अपनी पाप की ओर बुलाने वाली आवाज़ से बहका सके, बहका ले और उनपर अपने आज्ञापालन की ओर बुलाने वाली पैदल तथा सवार सेना चढ़ा ला, तथा हर शरीयत विरोधी व्यवहार को सुंदर बनाकर उनके धन में उनका साझी बन जा, और उनके बच्चों में भी उनके साथ हिस्सेदार बन जा उनका झूठा दावा करके, उन्हें व्यभिचार के द्वारा प्राप्त कर और उनके ऐसे नाम रखवाकर जो अल्लाह के अलावा की बंदगी को दर्शाने वाले हों। और उनके लिए झूठे वादे और झूठी आकांक्षाएँ सुशोभित कर। और शैतान उनसे केवल झूठे वादे करता है, जो उन्हें धोखा देने वाले होते हैं।
आयत 65
إِنَّ عِبَادِى لَيْسَ لَكَ عَلَيْهِمْ سُلْطَـٰنٌۭ ۚ وَكَفَىٰ بِرَبِّكَ وَكِيلًۭا
إِنَّ
बेशक
عِبَادِى
मेरे बन्दे
لَيْسَ
नहीं है
لَكَ
तेरे लिए
عَلَيْهِمْ
उन पर
سُلْطَـٰنٌۭ ۚ
कोई ज़ोर
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِرَبِّكَ
रब आपका
وَكِيلًۭا
कारसाज़
"निश्चय ही जो मेरे (सच्चे) बन्दे है उनपर तेरा कुछ भी ज़ोर नहीं चल सकता।" तुम्हारा रब इसके लिए काफ़ी है कि अपना मामला उसी को सौंप दिया जाए
तफ़्सीर:
(ऐ इबलीस) निःसंदेह मेरे आज्ञापालन के मार्ग पर चलने वाले मोमिन बंदों पर तेरा कोई बस नहीं चलेगा। क्योंकि अल्लाह तेरी बुराई से उनकी रक्षा करता है। और जो अपने मामलों में अल्लाह पर भरोसा करे, वह उसके लिए संरक्षक के रूप में काफ़ी है।
आयत 66
رَّبُّكُمُ ٱلَّذِى يُزْجِى لَكُمُ ٱلْفُلْكَ فِى ٱلْبَحْرِ لِتَبْتَغُوا۟ مِن فَضْلِهِۦٓ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًۭا
رَّبُّكُمُ
रब तुम्हारा
ٱلَّذِى
वो है जो
يُزْجِى
चलाता है
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْفُلْكَ
कश्तियों को
فِى
in
ٱلْبَحْرِ
समुन्दर में
لِتَبْتَغُوا۟
ताकि तुम तलाश करो
مِن
of
فَضْلِهِۦٓ ۚ
उसके फ़ज़ल से
إِنَّهُۥ
यक़ीनन वो
كَانَ
है वो
بِكُمْ
तुम पर
رَحِيمًۭا
निहायत रहम करने वाला
तुम्हारा रब तो वह है जो तुम्हारे लिए समुद्र में नौका चलाता है, ताकि तुम उसका अनुग्रह (आजीविका) तलाश करो। वह तुम्हारे हाल पर अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
(ऐ लोगो) तुम्हारा पालनहार वह है, जो तुम्हारे लिए समुद्र में कश्तियाँ चलाता है, इस आशा में कि तुम व्यापार और अन्य चीजों के मुनाफे से उसकी आजीविका तलाश करो। निःसंदेह वह तुमपर बड़ा दयावान् है कि उसने तुम्हारे लिए ये साधन उपलब्ध कराए।
आयत 67
وَإِذَا مَسَّكُمُ ٱلضُّرُّ فِى ٱلْبَحْرِ ضَلَّ مَن تَدْعُونَ إِلَّآ إِيَّاهُ ۖ فَلَمَّا نَجَّىٰكُمْ إِلَى ٱلْبَرِّ أَعْرَضْتُمْ ۚ وَكَانَ ٱلْإِنسَـٰنُ كَفُورًا
وَإِذَا
और जब
مَسَّكُمُ
पहुँचती है तुम्हें
ٱلضُّرُّ
तकलीफ़
فِى
in
ٱلْبَحْرِ
समुन्दर में
ضَلَّ
गुम हो जाते हैं
مَن
वो जिन्हें
تَدْعُونَ
तुम पुकारते हो
إِلَّآ
मगर
إِيَّاهُ ۖ
सिर्फ़ वो ही
فَلَمَّا
तो जब
نَجَّىٰكُمْ
वो निजात देता है तुम्हें
إِلَى
to
ٱلْبَرِّ
तरफ़ ख़ुश्की के
أَعْرَضْتُمْ ۚ
तो ऐराज़ करते हो तुम
وَكَانَ
और है
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
كَفُورًا
बड़ा नाशुक्रा
जब समुद्र में तुम पर कोई आपदा आती है तो उसके सिवा वे सब जिन्हें तुम पुकारते हो, गुम होकर रह जाते है, किन्तु फिर जब वह तुम्हें बचाकर थल पर पहुँचा देता है तो तुम उससे मुँह मोड़ जाते हो। मानव बड़ा ही अकृतज्ञ है
तफ़्सीर:
और जब (ऐ मुश्रिको!) तुमपर समुद्र में कोई मुसीबत और परेशानी आती है, यहाँ तक कि तुम्हें अपनी जान का ख़तरा महसूस होता है, तो उस समय अल्लाह के सिवा जिनकी तुम पूजा करते थे, वे सब तुम्हारे दिमाग़ से निकल जाते हैं और तुम्हें अल्लाह के सिवा कोई याद नहीं आता। चुनाँचे तुम उसी से मदद माँगते हो। फिर जब वह तुम्हारी मदद करता है और तुम्हें मुसीबत से बचा लेता है और तुम थल में आ जाते हो, तो तुम उसको एकमात्र पूज्य मानने और अकेले उसी को पुकारने से मुँह फेर लेते हो और अपने बुतों की ओर लौट जाते हो। वास्तव में, मनुष्य अल्लाह की नेमतों का बहुत ज़्यादा इनकार करने वाला है।
आयत 68
أَفَأَمِنتُمْ أَن يَخْسِفَ بِكُمْ جَانِبَ ٱلْبَرِّ أَوْ يُرْسِلَ عَلَيْكُمْ حَاصِبًۭا ثُمَّ لَا تَجِدُوا۟ لَكُمْ وَكِيلًا
أَفَأَمِنتُمْ
क्या बेख़ौफ़ हो गए तुम
أَن
कि
يَخْسِفَ
वो धँसा दे
بِكُمْ
तुम्हें
جَانِبَ
side
ٱلْبَرِّ
ख़ुश्की की जानिब
أَوْ
या
يُرْسِلَ
वो भेज दे
عَلَيْكُمْ
तुम पर
حَاصِبًۭا
पत्थर बरसाने वाली आँधी
ثُمَّ
फिर
لَا
not
تَجِدُوا۟
ना तुम पाओगे
لَكُمْ
अपने लिए
وَكِيلًا
कोई कारसाज़
क्या तुम इससे निश्चिन्त हो कि वह कभी थल की ओर ले जाकर तुम्हें धँसा दे या तुमपर पथराव करनेवाली आँधी भेज दे; फिर अपना कोई कार्यसाधक न पाओ?
तफ़्सीर:
(ऐ मुश्रिको) क्या तुम इस बात से निश्चिंत हो गए हो कि जब उसने तुम्हें बचाकर थल तक पहुँचा दिया, तो तुम्हें वहीं धरती में धँसा दे? या तुम इस बात से निश्चिंत हो गए हो कि तुमपर उसी तरह आकाश से पत्थरों की बारिश कर दे, जिस तरह लूत की जाति के साथ किया था। फिर तुम्हें कोई रक्षक न मिले, जो तुम्हारी रक्षा कर सके और न कोई सहायक मिले, जो तुम्हें विनाश से बचा सके।
आयत 69
أَمْ أَمِنتُمْ أَن يُعِيدَكُمْ فِيهِ تَارَةً أُخْرَىٰ فَيُرْسِلَ عَلَيْكُمْ قَاصِفًۭا مِّنَ ٱلرِّيحِ فَيُغْرِقَكُم بِمَا كَفَرْتُمْ ۙ ثُمَّ لَا تَجِدُوا۟ لَكُمْ عَلَيْنَا بِهِۦ تَبِيعًۭا
أَمْ
या
أَمِنتُمْ
बेख़ौफ़ हो गए तुम
أَن
कि
يُعِيدَكُمْ
वो लौटाए तुम्हें
فِيهِ
उसमें
تَارَةً
another time
أُخْرَىٰ
दूसरी मर्तबा
فَيُرْسِلَ
फिर वो भेजे
عَلَيْكُمْ
तुम पर
قَاصِفًۭا
तोड़-फोड़ देने वाली
مِّنَ
of
ٱلرِّيحِ
हवा में से
فَيُغْرِقَكُم
फिर वो ग़र्क कर दे तुम्हें
بِمَا
बवजह उसके जो
كَفَرْتُمْ ۙ
नाशुक्री की तुमने
ثُمَّ
फिर
لَا
not
تَجِدُوا۟
ना तुम पाओ
لَكُمْ
अपने लिए
عَلَيْنَا
हमारे ख़िलाफ़
بِهِۦ
उसमें
تَبِيعًۭا
कोई पीछा करने वाला
या तुम इससे निश्चिन्त हो कि वह फिर तुम्हें उसमें दोबारा ले जाए और तुमपर प्रचंड तूफ़ानी हवा भेज दे और तुम्हें तुम्हारे इनकार के बदले में डूबो दे। फिर तुम किसी को ऐसा न पाओ जो तुम्हारे लिए इसपर हमारा पीछा करनेवाला हो?
तफ़्सीर:
या तुम इस बात से निश्चिंत हो गए हो कि वह तुम्हें फिर से समुद्र में वापस ले आए, फिर तुमपर प्रचंड हवा भेजकर तुम्हें डुबो दे, क्योंकि तुमने अल्लाह की उस नेमत की नाशुक्री की, जो उसने तुम्हें पहली बार मुक्ति प्रदान की थी। फिर तुम्हें ऐसा कोई न मिले, जो तुम्हारा समर्थन करते हुए हमसे उसके बारे में कुछ माँग करे जो हमने तुम्हारे साथ किया।
आयत 70
۞ وَلَقَدْ كَرَّمْنَا بَنِىٓ ءَادَمَ وَحَمَلْنَـٰهُمْ فِى ٱلْبَرِّ وَٱلْبَحْرِ وَرَزَقْنَـٰهُم مِّنَ ٱلطَّيِّبَـٰتِ وَفَضَّلْنَـٰهُمْ عَلَىٰ كَثِيرٍۢ مِّمَّنْ خَلَقْنَا تَفْضِيلًۭا
۞ وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
كَرَّمْنَا
इज़्ज़त दी हमने
بَنِىٓ
(the) children of Adam
ءَادَمَ
बनी आदम को
وَحَمَلْنَـٰهُمْ
और सवार किया हमने उन्हें
فِى
on
ٱلْبَرِّ
ख़ुश्की में
وَٱلْبَحْرِ
और समुन्दर में
وَرَزَقْنَـٰهُم
और रिज़्क़ दिया हमने
مِّنَ
of
ٱلطَّيِّبَـٰتِ
पाकीज़ा चीज़ों से
وَفَضَّلْنَـٰهُمْ
और फ़ज़ीलत दी हमने उन्हें
عَلَىٰ
over
كَثِيرٍۢ
कसीर तादाद पर
مِّمَّنْ
उनमें से जो
خَلَقْنَا
पैदा किए हमने
تَفْضِيلًۭا
बड़ी फ़ज़ीलत देना
हमने आदम की सन्तान को श्रेष्ठता प्रदान की और उन्हें थल औऱ जल में सवारी दी और अच्छी-पाक चीज़ों की उन्हें रोज़ी दी और अपने पैदा किए हुए बहुत-से प्राणियों की अपेक्षा उन्हें श्रेष्ठता प्रदान की
तफ़्सीर:
और हमने आदम की संतान को विवेक प्रदान करके, फरिश्तों से उनके पिता को सजदा करवाकर तथा अन्य चीज़ों के द्वारा सम्मान प्रदान किया है। तथा हमने थल में उन चीज़ों को उनके अधीन कर दिए, जो उनकी सवारी के काम आती हैं, जैसे चौपाए और वाहनें, तथा जो समुद्र में उनकी सवारी के काम आती हैं, जैसे कश्तियाँ और जहाज़ें आदि। तथा हमने उन्हें खाने और पीने की अच्छी-पाक चीज़ें और स्त्रियाँ इत्यादि प्रदान कीं और हमने उन्हें अपने पैदा किए हुए बहुत-से प्राणियों पर बड़ी श्रेष्ठता प्रदान की। अतः उन्हें चाहिए कि वे अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों का शुक्रिया अदा करें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इबलीस के चैलेंज और इंसान की इज़्ज़त का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह ने इंसान को इज़्ज़त दी है, इसलिए हमें भी अपनी और दूसरों की इंसानी इज़्ज़त का ख्याल रखना चाहिए।
आयत 71
يَوْمَ نَدْعُوا۟ كُلَّ أُنَاسٍۭ بِإِمَـٰمِهِمْ ۖ فَمَنْ أُوتِىَ كِتَـٰبَهُۥ بِيَمِينِهِۦ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ يَقْرَءُونَ كِتَـٰبَهُمْ وَلَا يُظْلَمُونَ فَتِيلًۭا
يَوْمَ
जिस दिन
نَدْعُوا۟
हम बुलाऐंगे
كُلَّ
सब
أُنَاسٍۭ
लोगों को
بِإِمَـٰمِهِمْ ۖ
साथ उनके इमाम के
فَمَنْ
तो जो कोई
أُوتِىَ
दिया गया
كِتَـٰبَهُۥ
किताब अपनी
بِيَمِينِهِۦ
अपने दाऐं हाथ में
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
يَقْرَءُونَ
जो पढ़ेंगे
كِتَـٰبَهُمْ
किताब अपनी
وَلَا
और ना
يُظْلَمُونَ
वो ज़ुल्म किए जाऐंगे
فَتِيلًۭا
धागे बराबर
(उस दिन से डरो) जिस दिन हम मानव के प्रत्येक गिरोह को उसके अपने नायक के साथ बुलाएँगे। फिर जिसे उसका कर्मपत्र उसके दाहिने हाथ में दिया गया, तो ऐसे लोग अपना कर्मपत्र पढ़ेंगे और उनके साथ तनिक भी अन्याय न होगा
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) याद कीजिए, जिस दिन हम प्रत्येक समूह को उसके उस इमाम के साथ बुलाएँगे, जिसके पीछे वे दुनिया में चलते थे। फिर जिसे उसका कर्मपत्र उसके दाहिने हाथ में दिया गया, तो ऐसे लोग अपना कर्मपत्र ख़ुशी से पढ़ेंगे और उनके बदले में कुछ भी कमी नहीं की जाएगी, चाहे वह खजूर की गुठली के बीच पाए जाने वाले धागे जितना छोटा क्यों न हो।
आयत 72
وَمَن كَانَ فِى هَـٰذِهِۦٓ أَعْمَىٰ فَهُوَ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ أَعْمَىٰ وَأَضَلُّ سَبِيلًۭا
وَمَن
और जो कोई
كَانَ
है
فِى
in
هَـٰذِهِۦٓ
इस (दुनिया) में
أَعْمَىٰ
अँधा
فَهُوَ
तो वो
فِى
in
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत में
أَعْمَىٰ
अँधा (होगा)
وَأَضَلُّ
और सब से ज़्यादा भटका हुआ
سَبِيلًۭا
रास्ते से
और जो यहाँ अंधा होकर रहा वह आख़िरत में भी अंधा ही रहेगा, बल्कि वह मार्ग से और भी अधिक दूर पड़ा होगा
तफ़्सीर:
जो कोई भी इस सांसारिक जीवन में सत्य को स्वीकार करने और उसका पालन करने से दिल का अंधा बना रहा, तो क़ियामत के दिन वह अधिक अंधा हो जाएगा। इसलिए उसे जन्नत का रास्ता सुझाई नहीं देगा और वह मार्गदर्शन के पथ से अधिक भटका हुआ होगा। और जैसा कार्य होता है, उसी प्रकार बदला मिलता है।
आयत 73
وَإِن كَادُوا۟ لَيَفْتِنُونَكَ عَنِ ٱلَّذِىٓ أَوْحَيْنَآ إِلَيْكَ لِتَفْتَرِىَ عَلَيْنَا غَيْرَهُۥ ۖ وَإِذًۭا لَّٱتَّخَذُوكَ خَلِيلًۭا
وَإِن
और बेशक
كَادُوا۟
वो क़रीब थे कि
لَيَفْتِنُونَكَ
अलबत्ता वो फ़ितने में डालें आपको
عَنِ
from
ٱلَّذِىٓ
उससे जो
أَوْحَيْنَآ
वही की हमने
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
لِتَفْتَرِىَ
ताकि आप गढ़ लाऐं
عَلَيْنَا
हम पर
غَيْرَهُۥ ۖ
सिवाय उस (वही) के
وَإِذًۭا
और तब
لَّٱتَّخَذُوكَ
ज़रूर वो बना लेते आपको
خَلِيلًۭا
दिली दोस्त
और वे लगते थे कि तुम्हें फ़िले में डालकर उस चीज़ से हटा देने को है जिसकी प्रकाशना हमने तुम्हारी ओर की है, ताकि तुम उससे भिन्न चीज़ घड़कर हमपर थोपो, और तब वे तुम्हें अपना घनिष्ठ मित्र बना लेते
तफ़्सीर:
और क़रीब था कि (ऐ रसूल) अनेकेश्वरवादी लोग आपको उससे फेर दें, जो हमने आपकी ओर क़ुरआन से वह़्य की है; ताकि आप उसके अलावा हमपर कुछ और गढ़ लें, जो उनकी इच्छाओं से मेल खाता हो। और यदि आप वह करते, जो वे चाहते थे, तो वे आपको अपना मित्र बना लेते।
आयत 74
وَلَوْلَآ أَن ثَبَّتْنَـٰكَ لَقَدْ كِدتَّ تَرْكَنُ إِلَيْهِمْ شَيْـًۭٔا قَلِيلًا
وَلَوْلَآ
और अगर ना होता
أَن
ये कि
ثَبَّتْنَـٰكَ
हम साबित क़दम रखते आपको
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
كِدتَّ
क़रीब थे आप
تَرْكَنُ
कि आप झुक जाते
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
شَيْـًۭٔا
कुछ
قَلِيلًا
थोड़ा सा
यदि हम तुम्हें जमाव प्रदान न करते तो तुम उनकी ओर थोड़ा झुकने के निकट जा पहुँचते
तफ़्सीर:
और अगर हमने सत्य पर सुदृढृ करके आप पर उपकार न किया होता, तो निकट था कि आप उनकी ओर कुछ झुक जाते। फिर तो उन्होंने आपको जो सुझाव दिया था, उसमें आप उनसे सहमत हो जाते। क्योंकि उनका छल बहुत मज़बूत और उनकी चालबाज़ी बहुत गंभीर थी, जबकि आप उनके ईमान लाने के प्रति अत्यधिक उत्सुक थे। लेकिन हमने आपको उनकी ओर झुकने से बचा लिया।
आयत 75
إِذًۭا لَّأَذَقْنَـٰكَ ضِعْفَ ٱلْحَيَوٰةِ وَضِعْفَ ٱلْمَمَاتِ ثُمَّ لَا تَجِدُ لَكَ عَلَيْنَا نَصِيرًۭا
إِذًۭا
तब
لَّأَذَقْنَـٰكَ
अलबत्ता चखाते हम आपको
ضِعْفَ
दोगुना (अज़ाब)
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी का
وَضِعْفَ
और दोहरा
ٱلْمَمَاتِ
मौत का
ثُمَّ
फिर
لَا
not
تَجِدُ
ना आप पाते
لَكَ
अपने लिए
عَلَيْنَا
हमारे ख़िलाफ़
نَصِيرًۭا
कोई मददगार
उस समय हम तुम्हें जीवन में भी दोहरा मज़ा चखाते और मृत्यु के पश्चात भी दोहरा मज़ा चखाते। फिर तुम हमारे मुक़ाबले में अपना कोई सहायक न पाते
तफ़्सीर:
और यदि आप उनके प्रस्तावों की ओर झुक जाते, तो हम आपको दुनिया के जीवन में तथा आखिरत में दुगुनी यातना से पीड़ित करते। फिर आपको कोई सहायक न मिलता, जो हमारे विरुद्ध आपकी सहायता करे और आपकी पीड़ा को दूर करे।
आयत 76
وَإِن كَادُوا۟ لَيَسْتَفِزُّونَكَ مِنَ ٱلْأَرْضِ لِيُخْرِجُوكَ مِنْهَا ۖ وَإِذًۭا لَّا يَلْبَثُونَ خِلَـٰفَكَ إِلَّا قَلِيلًۭا
وَإِن
और बेशक
كَادُوا۟
वो क़रीब थे कि
لَيَسْتَفِزُّونَكَ
अलबत्ता वो क़दम उखाड़ दें आपके
مِنَ
from
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन से
لِيُخْرِجُوكَ
ताकि वो निकाल दें आपको
مِنْهَا ۖ
उससे
وَإِذًۭا
और तब
لَّا
not
يَلْبَثُونَ
ना वो ठहरते
خِلَـٰفَكَ
बाद आपके
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا
थोड़ा सा
और निश्चय ही उन्होंने चाल चली कि इस भूभाग से तुम्हारे क़दम उखाड़ दें, ताकि तुम्हें यहाँ से निकालकर ही रहे। और ऐसा हुआ तो तुम्हारे पीछे ये भी रह थोड़े ही पाएँगे
तफ़्सीर:
निश्चय ही काफ़िर लोग अपनी दुश्मनी से आपको परेशान करने वाले थे, ताकि आपको मक्का से बाहर निकाल दें। परंतु अल्लाह ने उन्हें आपको बाहर निकालने से रोक दिया, यहाँ तक कि आप अपने पालनहार की आज्ञा से वहाँ से हिजरत कर (निकल) गए। और यदि वे आपको निष्कासित कर देते, तो वे आपको निकालने के पश्चात थोड़े ही समय के लिए रह पाते।
आयत 77
سُنَّةَ مَن قَدْ أَرْسَلْنَا قَبْلَكَ مِن رُّسُلِنَا ۖ وَلَا تَجِدُ لِسُنَّتِنَا تَحْوِيلًا
سُنَّةَ
तरीक़ा
مَن
उनका जिन्हें
قَدْ
तहक़ीक़
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
قَبْلَكَ
आपसे पहले
مِن
of
رُّسُلِنَا ۖ
अपने रसूलों में से
وَلَا
और ना
تَجِدُ
आप पाऐंगे
لِسُنَّتِنَا
हमारे तरीक़े में
تَحْوِيلًا
कोई तब्दीली
यही कार्य-प्रणाली हमारे उन रसूलों के विषय में भी रही है, जिन्हें हमने तुमसे पहले भेजा था और तुम हमारी कार्य-प्रणाली में कोई अन्तर न पाओगे
तफ़्सीर:
यह निर्णय कि वे आपके बाद वहाँ केवल थोड़े समय के लिए रहेंगे, अल्लाह का वह नियम है, जो आपसे पूर्व भेजे गए रसूलों में निरंतर जारी है। और वह यह है कि जिस रसूल को भी उसकी जाति के लोगों ने अपने बीच से निकाल दिया, अल्लाह ने उनपर अपना अज़ाब भेज दिया। और - ऐ रसूल - आप कदापि हमारे नियम में परिवर्तन नहीं पाएँगे, बल्कि उसे स्थिर और नित्य पाँएगे।
आयत 78
أَقِمِ ٱلصَّلَوٰةَ لِدُلُوكِ ٱلشَّمْسِ إِلَىٰ غَسَقِ ٱلَّيْلِ وَقُرْءَانَ ٱلْفَجْرِ ۖ إِنَّ قُرْءَانَ ٱلْفَجْرِ كَانَ مَشْهُودًۭا
أَقِمِ
क़ायम कीजिए
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
لِدُلُوكِ
ढलने के वक़्त से
ٱلشَّمْسِ
सूरज के
إِلَىٰ
till
غَسَقِ
अँधेरे तक
ٱلَّيْلِ
रात के
وَقُرْءَانَ
और क़ुरआन
ٱلْفَجْرِ ۖ
फ़ज्र का
إِنَّ
बेशक
قُرْءَانَ
क़ुरआन
ٱلْفَجْرِ
फ़ज्र का
كَانَ
है
مَشْهُودًۭا
हाज़िर किया गया
नमाज़ क़ायम करो सूर्य के ढलने से लेकर रात के छा जाने तक और फ़ज्र (प्रभात) के क़ुरआन (अर्थात फ़ज्र की नमाज़ः के पाबन्द रहो। निश्चय ही फ़ज्र का क़ुरआन पढ़ना हुज़ूरी की चीज़ है
तफ़्सीर:
नमाज़ स्थापित करें, इस प्रकार कि उसे सबसे पूर्ण तरीक़े से उसके नियत समय पर अदा करें; आकाश के बीच से सूर्य के ढलने से, जिसमें ज़ुहर और अस्र की नमाज़ें शामिल हैं, रात के अंधेरे तक, जिसमें मग़रिब और इशा की नमाज़ें शामिल हैं। तथा फ़ज्र की नमाज़ क़ायम करें और उसमें क़ुरआन की तिलावत लंबी करें। क्योंकि फ़ज्र की नमाज़ में रात और दिन के फ़रिश्ते उपस्थित होते हैं।
आयत 79
وَمِنَ ٱلَّيْلِ فَتَهَجَّدْ بِهِۦ نَافِلَةًۭ لَّكَ عَسَىٰٓ أَن يَبْعَثَكَ رَبُّكَ مَقَامًۭا مَّحْمُودًۭا
وَمِنَ
And from
ٱلَّيْلِ
और कुछ हिस्सा रात का
فَتَهَجَّدْ
पस तहाज्जुद पढ़ा कीजिए
بِهِۦ
साथ इस (क़ुरआन) के
نَافِلَةًۭ
नफ़िल/ज़ायद हैं
لَّكَ
आपके लिए
عَسَىٰٓ
उम्मीद है
أَن
कि
يَبْعَثَكَ
खड़ा कर दे आपको
رَبُّكَ
रब आपका
مَقَامًۭا
मक़ामे
مَّحْمُودًۭا
महमूद पर
और रात के कुछ हिस्से में उस (क़ुरआन) के द्वारा जागरण किया करो, यह तुम्हारे लिए तद्अधिक (नफ़्ल) है। आशा है कि तुम्हारा रब तुम्हें उठाए ऐसा उठाना जो प्रशंसित हो
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) आप रात के कुछ समय में उठकर नमाज़ पढ़ें। ताकि यह नमाज़ आपके दर्जों को बुलंद करने में वृद्धि का कारण बने। यह इच्छा करते हुए कि आपका पालनहार आपको क़ियामत के दिन लोगों को उस दिन की भयावहता से मुक्ति दिलाने के लिए सिफ़ारिशी बनाकर उठाए और आपको महान सिफारिश का वह स्थान प्राप्त हो, जिसपर पहले और बाद के सभी लोग आपकी प्रशंसा करेंगे।
आयत 80
وَقُل رَّبِّ أَدْخِلْنِى مُدْخَلَ صِدْقٍۢ وَأَخْرِجْنِى مُخْرَجَ صِدْقٍۢ وَٱجْعَل لِّى مِن لَّدُنكَ سُلْطَـٰنًۭا نَّصِيرًۭا
وَقُل
और आप कह दीजिए
رَّبِّ
ऐ मेरे रब
أَدْخِلْنِى
दाख़िल कर मुझे
مُدْخَلَ
दाख़िल करना
صِدْقٍۢ
सच्चा
وَأَخْرِجْنِى
और निकाल मुझे
مُخْرَجَ
निकालना
صِدْقٍۢ
सच्चा
وَٱجْعَل
और बना दे
لِّى
मेरे लिए
مِن
from
لَّدُنكَ
अपने पास से
سُلْطَـٰنًۭا
क़ुव्वत
نَّصِيرًۭا
मददगार
और कहो, "मेरे रब! तू मुझे ख़ूबी के साथ दाख़िल कर और ख़ूबी के साथ निकाल, और अपनी ओर से मुझे सहायक शक्ति प्रदान कर।"
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) आप यह कहकर प्रार्थना कीजिए : ऐ मेरे पालनहार! मेरा प्रवेश करना और मेरा निकलना, सब कुछ अपने आज्ञापालन में और अपनी प्रसन्नता के अनुकूल कर दे। तथा तू मुझे अपनी ओर से एक स्पष्ट प्रमाण (तर्क) प्रदान कर, जिसके द्वारा तू मेरे दुश्मन पर मेरी मदद कर।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नमाज़ों के औकात और तहज्जुद की फ़ज़ीलत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि नमाज़ को उसके सही वक्त पर अदा करना और रात की इबादत का एहतमाम रूहानी तरक्की का ज़रिया है।
आयत 81
وَقُلْ جَآءَ ٱلْحَقُّ وَزَهَقَ ٱلْبَـٰطِلُ ۚ إِنَّ ٱلْبَـٰطِلَ كَانَ زَهُوقًۭا
وَقُلْ
और कह दीजिए
جَآءَ
आ गया
ٱلْحَقُّ
हक़
وَزَهَقَ
और मिट गया
ٱلْبَـٰطِلُ ۚ
बातिल
إِنَّ
बेशक
ٱلْبَـٰطِلَ
बातिल
كَانَ
है
زَهُوقًۭا
मिट जाने वला
कह दो, "सत्य आ गया और असत्य मिट गया; असत्य तो मिट जानेवाला ही होता है।"
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) आप इन मुश्रिकों से कह दीजिए : इस्लाम आ गया और अल्लाह ने उसकी मदद का जो वादा किया था, पूरा हुआ। तथा शिर्क और कुफ़्र मिट गए। निश्चित रूप से असत्य तो मिटने ही वाला है, वह सत्य के सामने नहीं टिक सकता।
आयत 82
وَنُنَزِّلُ مِنَ ٱلْقُرْءَانِ مَا هُوَ شِفَآءٌۭ وَرَحْمَةٌۭ لِّلْمُؤْمِنِينَ ۙ وَلَا يَزِيدُ ٱلظَّـٰلِمِينَ إِلَّا خَسَارًۭا
وَنُنَزِّلُ
और हम नाज़िल करते हैं
مِنَ
from
ٱلْقُرْءَانِ
क़ुरआन से
مَا
जो
هُوَ
वो
شِفَآءٌۭ
शिफ़ा
وَرَحْمَةٌۭ
और रहमत है
لِّلْمُؤْمِنِينَ ۙ
ईमान लाने वालों के लिए
وَلَا
और नहीं
يَزِيدُ
वो ज़्यादा करता
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों को
إِلَّا
मगर
خَسَارًۭا
ख़सारे में
हम क़ुरआन में से जो उतारते है वह मोमिनों के लिए शिफ़ा (आरोग्य) और दयालुता है, किन्तु ज़ालिमों के लिए तो वह बस घाटे ही में अभिवृद्धि करता है
तफ़्सीर:
और हम क़ुरआन में से जो कुछ उतारते हैं, वह अज्ञानता, अविश्वास और संदेह (के रोगों) से दिलों के लिए एक उपचार है। इसी प्रकार वह शरीर के लिए भी इलाज है, यदि उसके द्वारा रुक़्या (दम) किया जाए। तथा वह उन मोमिनों के लिए दया है जो उसके अनुसार कार्य करने वाले हैं। लेकिन इस क़ुरआन से काफिरों के विनाश ही में वृद्धि होती है। क्योंकि इसे सुनने से उन्हें चिढ़ होती है, तथा इससे उनका इनकार करना और उससे मुँह फेरना बढ़ जाता है।
आयत 83
وَإِذَآ أَنْعَمْنَا عَلَى ٱلْإِنسَـٰنِ أَعْرَضَ وَنَـَٔا بِجَانِبِهِۦ ۖ وَإِذَا مَسَّهُ ٱلشَّرُّ كَانَ يَـُٔوسًۭا
وَإِذَآ
और जब
أَنْعَمْنَا
इनआम करते हैं हम
عَلَى
on
ٱلْإِنسَـٰنِ
इन्सान पर
أَعْرَضَ
वो ऐराज़ करता है
وَنَـَٔا
और वो दूर कर लेता है
بِجَانِبِهِۦ ۖ
पहलू अपना
وَإِذَا
और जब
مَسَّهُ
पहुँचती है उसे
ٱلشَّرُّ
तकलीफ़
كَانَ
हो जाता है वो
يَـُٔوسًۭا
बहुत मायूस
मानव पर जब हम सुखद कृपा करते है तो वह मुँह फेरता और अपना पहलू बचाता है। किन्तु जब उसे तकलीफ़ पहुँचती है, तो वह निराश होने लगता है
तफ़्सीर:
और जब हम मनुष्य को कोई नेमत, जैसे स्वास्थ्य और मालदारी आदि प्रदान करते हैं, तो वह अल्लाह का शुक्रिया अदा करने और उसका आज्ञापालन करने से मुँह फेर लेता है, और घमंड के कारण दूर चला जाता है। और जब वह किसी बीमारी या गरीबी आदि से पीड़ित होता है, तो अल्लाह की दया से बहुत निराश और हताश हो जाता है।
आयत 84
قُلْ كُلٌّۭ يَعْمَلُ عَلَىٰ شَاكِلَتِهِۦ فَرَبُّكُمْ أَعْلَمُ بِمَنْ هُوَ أَهْدَىٰ سَبِيلًۭا
قُلْ
कह दीजिए
كُلٌّۭ
हर एक
يَعْمَلُ
अमल करता है
عَلَىٰ
on
شَاكِلَتِهِۦ
अपने तरीक़े पर
فَرَبُّكُمْ
तो रब तुम्हारा
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِمَنْ
उसे जो
هُوَ
वो
أَهْدَىٰ
ज़्यादा हिदायत याफ़्ता है
سَبِيلًۭا
रास्ते (के ऐतबार से)
कह दो, "हर एक अपने ढब पर काम कर रहा है, तो अब तुम्हारा रब ही भली-भाँति जानता है कि कौन अधिक सीधे मार्ग पर है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप कह दीजिए : प्रत्येक व्यक्ति अपनी उस पद्धति के अनुसार काम करता है जो मार्गदर्शन और पथ-भ्रष्टता में उसकी स्थिति के समान होती है। चुनाँचे आपका पालनहार सबसे अधिक जानता है कि कौन सबसे ज़्यादा सत्य मार्ग पर है।
आयत 85
وَيَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلرُّوحِ ۖ قُلِ ٱلرُّوحُ مِنْ أَمْرِ رَبِّى وَمَآ أُوتِيتُم مِّنَ ٱلْعِلْمِ إِلَّا قَلِيلًۭا
وَيَسْـَٔلُونَكَ
और वो सवाल करते हैं आपसे
عَنِ
concerning
ٱلرُّوحِ ۖ
रूह के बारे में
قُلِ
कह दीजिए
ٱلرُّوحُ
रूह
مِنْ
(is) of
أَمْرِ
हुक्म से है
رَبِّى
मेरे रब के
وَمَآ
और नहीं
أُوتِيتُم
दिए गए तुम
مِّنَ
of
ٱلْعِلْمِ
इल्म में से
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا
बहुत थोड़ा
वे तुमसे रूह के विषय में पूछते है। कह दो, "रूह का संबंध तो मेरे रब के आदेश से है, किन्तु ज्ञान तुम्हें मिला थोड़ा ही है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) अह्ले किताब में से काफ़िर लोग आपसे रूह़ (आत्मा) की वास्तविकता के बारे में प्रश्न करते हैं, तो आप उनसे कह दें : अल्लाह के अलावा रूह़ की हक़ीक़त को कोई नहीं जानता है। तथा तुम्हें और सारी सृष्टि को सर्वशक्तिमान अल्लाह के ज्ञान की तुलना में बहुत कम ज्ञान दिया गया है।
आयत 86
وَلَئِن شِئْنَا لَنَذْهَبَنَّ بِٱلَّذِىٓ أَوْحَيْنَآ إِلَيْكَ ثُمَّ لَا تَجِدُ لَكَ بِهِۦ عَلَيْنَا وَكِيلًا
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
شِئْنَا
चाहें हम
لَنَذْهَبَنَّ
अलबत्ता हम ज़रूर ले जाऐं
بِٱلَّذِىٓ
उसे जो
أَوْحَيْنَآ
वही की हमने
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
ثُمَّ
फिर
لَا
not
تَجِدُ
ना आप पाऐंगे
لَكَ
अपने लिए
بِهِۦ
साथ उसके
عَلَيْنَا
हमारे (मुक़ाबले) पर
وَكِيلًا
कोई कारसाज़
यदि हम चाहें तो वह सब छीन लें जो हमने तुम्हारी ओर प्रकाशना की है, फिर इसके लिए हमारे मुक़ाबले में अपना कोई समर्थक न पाओगे
तफ़्सीर:
अल्लाह की क़सम, यदि हम (ऐ रसूल) आपकी ओर उतारी हुई वह़्य को, उसे सीनों और पुस्तकों से मिटाकर, (वापस) ले जाना चाहें, तो हम उसे ले जा सकते हैं। फिर आपको कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिलेगा, जो आपका समर्थन करे और उसे वापस लौटा सके।
आयत 87
إِلَّا رَحْمَةًۭ مِّن رَّبِّكَ ۚ إِنَّ فَضْلَهُۥ كَانَ عَلَيْكَ كَبِيرًۭا
إِلَّا
सिवाय
رَحْمَةًۭ
रहमत के
مِّن
from
رَّبِّكَ ۚ
आपके रब की तरफ़ से
إِنَّ
बेशक
فَضْلَهُۥ
फ़ज़ल उसका
كَانَ
है
عَلَيْكَ
आप पर
كَبِيرًۭا
बहुत बड़ा
यह तो बस तुम्हारे रब की दयालुता है। वास्तविकता यह है कि उसका तुमपर बड़ा अनुग्रह है
तफ़्सीर:
लेकिन हम इसे आपके पालनहार की दया के कारण (वापस) नहीं ले गए और हमने उसे संरक्षित छोड़ दिया। क्योंकि आपके पालनहार की कृपा आपके ऊपर बहुत बड़ी थी कि उसने आपको रसूल बनाया और आप पर नबियों के क्रम को समाप्त कर दिया तथा आप पर क़ुरआन अवतरित किया।
आयत 88
قُل لَّئِنِ ٱجْتَمَعَتِ ٱلْإِنسُ وَٱلْجِنُّ عَلَىٰٓ أَن يَأْتُوا۟ بِمِثْلِ هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانِ لَا يَأْتُونَ بِمِثْلِهِۦ وَلَوْ كَانَ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍۢ ظَهِيرًۭا
قُل
कह दीजिए
لَّئِنِ
अलबत्ता अगर
ٱجْتَمَعَتِ
जमा हो जाऐं
ٱلْإِنسُ
इन्सान
وَٱلْجِنُّ
और जिन्न
عَلَىٰٓ
इस (बात) पर
أَن
कि
يَأْتُوا۟
वो ले आऐं
بِمِثْلِ
मानिन्द
هَـٰذَا
इस
ٱلْقُرْءَانِ
क़ुरआन के
لَا
not
يَأْتُونَ
ना वो ला सकेंगे
بِمِثْلِهِۦ
इसकी तरह का
وَلَوْ
और अगरचे
كَانَ
हों
بَعْضُهُمْ
बाज़ उनके
لِبَعْضٍۢ
बाज़ के लिए
ظَهِيرًۭا
मददगार
कह दो, "यदि मनुष्य और जिन्न इसके लिए इकट्ठे हो जाएँ कि क़ुरआन जैसी कोई चीज़ लाएँ, तो वे इस जैसी कोई चीज़ न ला सकेंगे, चाहे वे आपस में एक-दूसरे के सहायक ही क्यों न हों।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप कह दीजिए : यदि सभी मनुष्य एवं जिन्न इस बात पर इकट्ठा हो जाएँ कि कोई ऐसी किताब ले आएँ, जो अपनी वाक्पटुता, क्रम व व्यवस्था की सुंदरता और फ़साहत (भाषा की सरलता एवं स्वाभाविकता) में आप पर अवतरित क़ुरआन के समान हो, तो वे ऐसा कभी भी नहीं ला सकेंगे, भले ही वे एक-दूसरे के सहायक और समर्थक बन जाएँ।
आयत 89
وَلَقَدْ صَرَّفْنَا لِلنَّاسِ فِى هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانِ مِن كُلِّ مَثَلٍۢ فَأَبَىٰٓ أَكْثَرُ ٱلنَّاسِ إِلَّا كُفُورًۭا
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
صَرَّفْنَا
फेर-फेर कर लाते हैं हम
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
فِى
in
هَـٰذَا
this
ٱلْقُرْءَانِ
इस क़ुरआन में
مِن
from
كُلِّ
हर तरह की
مَثَلٍۢ
मिसाल
فَأَبَىٰٓ
पस इन्कार किया
أَكْثَرُ
अक्सर
ٱلنَّاسِ
लोगों ने
إِلَّا
सिवाय
كُفُورًۭا
कुफ़्र करने के
हमने इस क़ुरआन में लोगों के लिए प्रत्येक तत्वदर्शिता की बात फेर-फेरकर बयान की, फिर भी अधिकतर लोगों के लिए इनकार के सिवा हर चीज़ अस्वीकार्य ही रही
तफ़्सीर:
और हमने इस क़ुरआन में लोगों के लिए सभी उपदेशों, पाठों, आदेशों, निषेधों और कहानियों को खोल-खोलकर बयान किया है और उसमें विविध ढंग अपनाया है, इस आशा में कि वे ईमान लाएँ। परन्तु उनमें से अधिकतर लोगों ने इस क़ुरआन का खंडन और इनकार करने के अलावा कुछ नहीं किया।
आयत 90
وَقَالُوا۟ لَن نُّؤْمِنَ لَكَ حَتَّىٰ تَفْجُرَ لَنَا مِنَ ٱلْأَرْضِ يَنۢبُوعًا
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
لَن
हरगिज़ नहीं
نُّؤْمِنَ
हम ईमान लाऐंगे
لَكَ
तुम पर
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
تَفْجُرَ
तुम जारी करो
لَنَا
हमारे लिए
مِنَ
from
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन से
يَنۢبُوعًا
एक चश्मा
और उन्होंने कहा, "हम तुम्हारी बात नहीं मानेंगे, जब तक कि तुम हमारे लिए धरती से एक स्रोत प्रवाहित न कर दो,
तफ़्सीर:
मुश्रिकों ने कहा : हम तुमपर कदापि ईमान नहीं लाएँगे, यहाँ तक कि तुम हमारे लिए मक्का की धरती से एक बहता हुआ चश्मा निकाल दो, जो कभी न सूखे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन को शिफा और रहमत कहे जाने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कुरआन दिलों के लिए शिफा है, मुश्किल वक्त में इससे रुजू करना चाहिए।
आयत 91
أَوْ تَكُونَ لَكَ جَنَّةٌۭ مِّن نَّخِيلٍۢ وَعِنَبٍۢ فَتُفَجِّرَ ٱلْأَنْهَـٰرَ خِلَـٰلَهَا تَفْجِيرًا
أَوْ
या
تَكُونَ
हो
لَكَ
तुम्हारे लिए
جَنَّةٌۭ
एक बाग़
مِّن
of
نَّخِيلٍۢ
खजूरों से
وَعِنَبٍۢ
और अंगूरों से
فَتُفَجِّرَ
फिर तुम जारी करो
ٱلْأَنْهَـٰرَ
नहरें
خِلَـٰلَهَا
दर्मियान उसके
تَفْجِيرًا
ख़ूब जारी करना
या फिर तुम्हारे लिए खजूरों और अंगूरों का एक बाग़ हो और तुम उसके बीच बहती नहरें निकाल दो,
तफ़्सीर:
अथवा आपके पास खजूरों और अंगूरों का एक बाग़ हो और आप उसमें भरपूर रूप से नहरें बहा दें।
आयत 92
أَوْ تُسْقِطَ ٱلسَّمَآءَ كَمَا زَعَمْتَ عَلَيْنَا كِسَفًا أَوْ تَأْتِىَ بِٱللَّهِ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ قَبِيلًا
أَوْ
या
تُسْقِطَ
तुम गिराओ
ٱلسَّمَآءَ
आसमान को
كَمَا
जैसा कि
زَعَمْتَ
तुम दावा करते हो
عَلَيْنَا
हम पर
كِسَفًا
टुकड़े-टुकड़े करके
أَوْ
या
تَأْتِىَ
तुम ले आओ
بِٱللَّهِ
अल्लाह को
وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ
और फ़रिशतों को
قَبِيلًا
सामने
या आकाश को टुकड़े-टुकड़े करके हम पर गिरा दो जैसा कि तुम्हारा दावा है, या अल्लाह और फ़रिश्तों ही को हमारे समझ ले आओ,
तफ़्सीर:
या आकाश को हमारे ऊपर अज़ाब के तौर पर टुकड़े-टुकड़े करके गिरा दें, (जैसा कि आप कहा करते थे) या अल्लाह और फरिश्तों को हमारी आँखों के सामने ले आएँ, ताकि वे आपके दावे की सच्चाई की गवाही दें।
आयत 93
أَوْ يَكُونَ لَكَ بَيْتٌۭ مِّن زُخْرُفٍ أَوْ تَرْقَىٰ فِى ٱلسَّمَآءِ وَلَن نُّؤْمِنَ لِرُقِيِّكَ حَتَّىٰ تُنَزِّلَ عَلَيْنَا كِتَـٰبًۭا نَّقْرَؤُهُۥ ۗ قُلْ سُبْحَانَ رَبِّى هَلْ كُنتُ إِلَّا بَشَرًۭا رَّسُولًۭا
أَوْ
या
يَكُونَ
हो
لَكَ
तुम्हारे लिए
بَيْتٌۭ
घर
مِّن
of
زُخْرُفٍ
सोने का
أَوْ
या
تَرْقَىٰ
तुम चढ़ जाओ
فِى
into
ٱلسَّمَآءِ
आसमान में
وَلَن
और हरगिज़ नहीं
نُّؤْمِنَ
हम मानेंगे
لِرُقِيِّكَ
तुम्हारे चढ़ने को
حَتَّىٰ
हत्ता कि
تُنَزِّلَ
तुम उतार लाओ
عَلَيْنَا
हम पर
كِتَـٰبًۭا
एक किताब
نَّقْرَؤُهُۥ ۗ
हम पढ़ें उसे
قُلْ
कह दीजिए
سُبْحَانَ
पाक है
رَبِّى
रब मेरा
هَلْ
नहीं
كُنتُ
हूँ मैं
إِلَّا
मगर
بَشَرًۭا
एक इन्सान
رَّسُولًۭا
जो रसूल है
या तुम्हारे लिए स्वर्ण-निर्मित एक घर हो जाए या तुम आकाश में चढ़ जाओ, और हम तुम्हारे चढ़ने को भी कदापि न मानेंगे, जब तक कि तुम हम पर एक किताब न उतार लाओ, जिसे हम पढ़ सकें।" कह दो, "महिमावान है मेरा रब! क्या मैं एक संदेश लानेवाला मनुष्य के सिवा कुछ और भी हूँ?"
तफ़्सीर:
या आपके पास सोने आदि से सजाया हुआ एक घर हो, या आप आकाश में चढ़ जाएँ और यदि आप आकाश में चढ़ भी जाएँ, तब भी हम उस समय तक आपके रसूल होने का कदापि विश्वास नहीं करेंगे, जब तक आप अल्लाह की ओर से लिखित एक पुस्तक न ले आएँ, जिसमें हम यह पढ़ सकें कि आप अल्लाह के रसूल हैं। (ऐ रसूल!) आप उनसे कहें : मेरा पालनहार पवित्र है! मैं तो एक मनुष्य के सिवा कुछ नहीं, जो अन्य सभी रसूलों की तरह एक रसूल बनाकर भेजा गया है। मेरे पास कुछ भी लाने की शक्ति नहीं है। फिर मैं उसे कैसे ला सकता हूँ, जो तुमने सुझाव दिया है?!
आयत 94
وَمَا مَنَعَ ٱلنَّاسَ أَن يُؤْمِنُوٓا۟ إِذْ جَآءَهُمُ ٱلْهُدَىٰٓ إِلَّآ أَن قَالُوٓا۟ أَبَعَثَ ٱللَّهُ بَشَرًۭا رَّسُولًۭا
وَمَا
और नहीं
مَنَعَ
रोका
ٱلنَّاسَ
लोगों को
أَن
कि
يُؤْمِنُوٓا۟
वो ईमान लाऐं
إِذْ
जब
جَآءَهُمُ
आ गई उनके पास
ٱلْهُدَىٰٓ
हिदायत
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَبَعَثَ
क्या भेजा
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
بَشَرًۭا
एक इन्सान को
رَّسُولًۭا
रसूल बना कर
लोगों को जबकि उनके पास मार्गदर्शन आया तो उनको ईमान लाने से केवल यही चीज़ रुकावट बनी कि वे कहने लगे, "क्या अल्लाह ने एक मनुष्य को रसूल बनाकर भेज दिया?"
तफ़्सीर:
और काफिरों को अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाने, तथा जो कुछ रसूल लेकर आए थे, उसपर अमल करने से केवल इस बात ने रोक दिया कि उन्होंने रसूल के मानव जाति में से होने का इनकार किया। चुनाँचे उन्होंने अस्वीकृति व्यक्त करते हुए कहा : क्या अल्लाह ने हमारी ओर एक मनुष्य को रसूल बनाकर भेजा है?!
आयत 95
قُل لَّوْ كَانَ فِى ٱلْأَرْضِ مَلَـٰٓئِكَةٌۭ يَمْشُونَ مُطْمَئِنِّينَ لَنَزَّلْنَا عَلَيْهِم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ مَلَكًۭا رَّسُولًۭا
قُل
कह दीजिए
لَّوْ
अगर
كَانَ
होते
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
مَلَـٰٓئِكَةٌۭ
फ़रिश्ते
يَمْشُونَ
चलते-फिरते
مُطْمَئِنِّينَ
इत्मिनान के साथ
لَنَزَّلْنَا
अलबत्ता नाज़िल करते हम
عَلَيْهِم
उन पर
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مَلَكًۭا
एक फ़रिश्ता
رَّسُولًۭا
रसूल
कह दो, "यदि धरती में फ़रिश्ते आबाद होकर चलते-फिरते होते तो हम उनके लिए अवश्य आकाश से किसी फ़रिश्ते ही को रसूल बनाकर भेजते।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप उन्हें उत्तर देते हुए कहें : यदि धरती पर फ़रिश्ते बसते और तुम्हारी तरह शांति के साथ चलते-फिरते, तो हम अवश्य ही उनकी ओर उन्ही में से एक फ़रिश्ते को रसूल बनाकर भेजते। क्योंकि वही उन्हें अल्लाह का संदेश समझा पाता। इसलिए उनकी ओर मानव जाति में से रसूल भेजना हिकमत नहीं होती। बिल्कुल यही हाल तुम्हारा भी है।
आयत 96
قُلْ كَفَىٰ بِٱللَّهِ شَهِيدًۢا بَيْنِى وَبَيْنَكُمْ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ بِعِبَادِهِۦ خَبِيرًۢا بَصِيرًۭا
قُلْ
कह दीजिए
كَفَىٰ
काफ़ी है
بِٱللَّهِ
अल्लाह
شَهِيدًۢا
गवाह
بَيْنِى
दर्मियान मेरे
وَبَيْنَكُمْ ۚ
और दर्मियान तुम्हारे
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
है वो
بِعِبَادِهِۦ
अपने बन्दों की
خَبِيرًۢا
ख़ूब ख़बर रखने वाला
بَصِيرًۭا
ख़ूब देखने वाला
कह दो, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह ही एक गवाह काफ़ी है। निश्चय ही वह अपने बन्दों की पूरी ख़बर रखनेवाला, देखनेवाला है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप कह दीजिए : मेरे और तुम्हारे बीच इस बात की गवाही के लिए अल्लाह ही काफ़ी है कि मैं तुम्हारी ओर एक रसूल बना कर भेजा गया हूँ, और मैंने वह संदेश तुम्हें पहुँचा दिया, जिसके साथ मैं तुम्हारी ओर भेजा गया हूँ। वह अपने बंदों की स्थितियों से पूरी तरह अवगत है। उससे उनमें से कुछ भी छिपा नहीं है। वह दिलों के सभी रहस्यों को जानने वाला है।
आयत 97
وَمَن يَهْدِ ٱللَّهُ فَهُوَ ٱلْمُهْتَدِ ۖ وَمَن يُضْلِلْ فَلَن تَجِدَ لَهُمْ أَوْلِيَآءَ مِن دُونِهِۦ ۖ وَنَحْشُرُهُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ عَلَىٰ وُجُوهِهِمْ عُمْيًۭا وَبُكْمًۭا وَصُمًّۭا ۖ مَّأْوَىٰهُمْ جَهَنَّمُ ۖ كُلَّمَا خَبَتْ زِدْنَـٰهُمْ سَعِيرًۭا
وَمَن
और जिसे
يَهْدِ
हिदायत दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
فَهُوَ
तो वो ही है
ٱلْمُهْتَدِ ۖ
हिदायत याफ़्ता
وَمَن
और जिसे
يُضْلِلْ
वो भटका दे
فَلَن
तो हरगिज़ नहीं
تَجِدَ
आप पाऐंगे
لَهُمْ
उनके लिए
أَوْلِيَآءَ
कोई मददगार
مِن
besides Him
دُونِهِۦ ۖ
उसके सिवा
وَنَحْشُرُهُمْ
और हम इकट्ठा करेंगे उन्हें
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
عَلَىٰ
on
وُجُوهِهِمْ
उनके चेहरों के बल
عُمْيًۭا
अँधा
وَبُكْمًۭا
और गूँगा
وَصُمًّۭا ۖ
और बहरा (बना कर)
مَّأْوَىٰهُمْ
ठिकाना उनका
جَهَنَّمُ ۖ
जहन्नम (होगा)
كُلَّمَا
जब कभी
خَبَتْ
धीमी होने लगेगी
زِدْنَـٰهُمْ
ज़्यादा कर देंगे हम उन पर
سَعِيرًۭا
दहकती आग
जिसे अल्लाह ही मार्ग दिखाए वही मार्ग पानेवाला है और वह जिसे पथभ्रष्ट होने दे, तो ऐसे लोगों के लिए उससे इतर तुम सहायक न पाओगे। क़ियामत के दिन हम उन्हें औंधे मुँह इस दशा में इकट्ठा करेंगे कि वे अंधे गूँगे और बहरे होंगे। उनका ठिकाना जहन्नम है। जब भी उसकी आग धीमी पड़ने लगेगी तो हम उसे उनके लिए भड़का देंगे
तफ़्सीर:
अल्लाह जिसे सीधे मार्ग की तौफ़ीक़ प्रदान कर दे, तो वह वास्तव में मार्गदर्शित है। तथा वह जिसे छोड़ दे और पथभ्रष्ट कर दे, तो (ऐ रसूल!) आप उन लोगों के लिए संरक्षक नहीं पाएँगे, जो उन्हें सत्य का मार्ग दिखाएँ, तथा उनका कष्ट दूर कर सकें और उन्हें लाभ पहुँचा सकें। और हम उन्हें क़ियामत के दिन इस हाल में उठाएँगे कि वे अपने चेहरों के बल घसीटे जाएँगे, वे न देख सकेंगे, न बोल सकेंगे और न ही सुन सकेंगे। उनका घर जिसमें वे शरण लेंगे जहन्नम होगा। जब भी उसकी लपट कम होगी, हम उसे और भड़का देंगे।
आयत 98
ذَٰلِكَ جَزَآؤُهُم بِأَنَّهُمْ كَفَرُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا وَقَالُوٓا۟ أَءِذَا كُنَّا عِظَـٰمًۭا وَرُفَـٰتًا أَءِنَّا لَمَبْعُوثُونَ خَلْقًۭا جَدِيدًا
ذَٰلِكَ
ये
جَزَآؤُهُم
बदला है उनका
بِأَنَّهُمْ
बवजह इसके कि उन्होंने
كَفَرُوا۟
इन्कार किया
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात का
وَقَالُوٓا۟
और उन्होंने कहा
أَءِذَا
क्या जब
كُنَّا
होंगे हम
عِظَـٰمًۭا
हड्डियाँ
وَرُفَـٰتًا
और चूरा-चूरा
أَءِنَّا
क्या बेशक हम
لَمَبْعُوثُونَ
अलबत्ता उठाए जाने वाले हैं
خَلْقًۭا
पैदा करके
جَدِيدًا
नए सिरे से
यही उनका बदला है, इसलिए कि उन्होंने हमारी आयतों का इनकार किया और कहा, "क्या जब हम केवल हड्डियाँ और चूर्ण-विचूर्ण होकर रह जाएँगे, तो क्या हमें नए सिरे से पैदा करके उठा खड़ा किया जाएगा?"
तफ़्सीर:
यह सज़ा जो उन्हें झेलनी पड़ेगी, यह उनका बदला है उनके हमारी अपने रसूल पर उतारी गई आयतों का इनकार करने और मरणोपरांत पुनर्जीवित होने को असंभव समझते हुए यह कहने के कारण कि : क्या जब हम मरकर सड़ी-गली हड्डियाँ और विचूर्ण टुकड़े हो जाएँगे, तो क्या हम नए सिरे से पैदा करके उठाए जाएँगे?
आयत 99
۞ أَوَلَمْ يَرَوْا۟ أَنَّ ٱللَّهَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ قَادِرٌ عَلَىٰٓ أَن يَخْلُقَ مِثْلَهُمْ وَجَعَلَ لَهُمْ أَجَلًۭا لَّا رَيْبَ فِيهِ فَأَبَى ٱلظَّـٰلِمُونَ إِلَّا كُفُورًۭا
۞ أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَرَوْا۟
उन्होंने देखा
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
ٱلَّذِى
वो है जिसने
خَلَقَ
पैदा किया
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
قَادِرٌ
क़ादिर है
عَلَىٰٓ
उस पर
أَن
कि
يَخْلُقَ
वो पैदा करे
مِثْلَهُمْ
मानिन्द उनके
وَجَعَلَ
और उसने बना रखा है
لَهُمْ
उनके लिए
أَجَلًۭا
एक मुक़र्रर वक़्त
لَّا
no
رَيْبَ
नहीं कोई शक
فِيهِ
इसमें
فَأَبَى
पस इन्कार किया
ٱلظَّـٰلِمُونَ
ज़लिमों ने
إِلَّا
सिवाय
كُفُورًۭا
कुफ़्र करने के
क्या उन्हें यह न सूझा कि जिस अल्लाह ने आकाशों और धरती को पैदा किया है उसे उन जैसों को भी पैदा करने की सामर्थ्य प्राप्त है? उसने तो उनके लिए एक समय निर्धारित कर रखा है, जिसमें कोई सन्देह नहीं है। फिर भी ज़ालिमों के लिए इनकार के सिवा हर चीज़ अस्वीकार्य ही रही
तफ़्सीर:
क्या (मरणोपरांत) दोबारा जीवित किए जाने का इनकार करने वाले इन लोगों को इतना नहीं पता कि जिस अल्लाह ने इतने विशाल आकाशों और विस्तृत धरती को पैदा किया, वह उनकी तरह पैदा करने में (भी) सक्षम हैं? क्योंकि जो महान चीज़ों को पैदा करने में सक्षम है, वह उनसे छोटी चीज़ें भी पैदा कर सकता है। तथा अल्लाह ने दुनिया में उनके लिए एक विशिष्ट समय निर्धारित कर दिया है, जिसमें उनके जीवन का अंत हो जाएगा। और उसने उनके लिए उनके पुनः जीवित होने की भी एक समय सीमा बना दी है, जिसमें कोई संदेह नहीं है। तथा मरणोपरांत पुनर्जीवन के प्रमाणों की स्पष्टता के बावजूद, मुश्रिकों ने मरने के बाद दोबारा जीवित किए जाने का इनकार ही किया।
आयत 100
قُل لَّوْ أَنتُمْ تَمْلِكُونَ خَزَآئِنَ رَحْمَةِ رَبِّىٓ إِذًۭا لَّأَمْسَكْتُمْ خَشْيَةَ ٱلْإِنفَاقِ ۚ وَكَانَ ٱلْإِنسَـٰنُ قَتُورًۭا
قُل
कह दीजिए
لَّوْ
अगर
أَنتُمْ
तुम
تَمْلِكُونَ
तुम मालिक होते
خَزَآئِنَ
ख़जानों के
رَحْمَةِ
रहमत के
رَبِّىٓ
मेरे रब के
إِذًۭا
तब
لَّأَمْسَكْتُمْ
अलबत्ता रोक लेते तुम
خَشْيَةَ
डर से
ٱلْإِنفَاقِ ۚ
ख़र्च हो जाने के
وَكَانَ
और है
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
قَتُورًۭا
बहुत कंजूस/बख़ील
कहो, "यदि कहीं मेरे रब की दयालुता के ख़ज़ाने तुम्हारे अधिकार में होते हो ख़र्च हो जाने के भय से तुम रोके ही रखते। वास्तव में इनसान तो दिल का बड़ा ही तंग है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन बहुदेववादियों से कह दीजिए : यदि तुम लोग मेरे पालनहार की दया के खज़ानों के मालिक होते, जो न घटते हैं और न समाप्त होते हैं, तो उस समय तुम उनके समाप्त होने के डर से उन्हें खर्च करने से रुक जाते ताकि तुम ग़रीब न हो जाओ। और यह मनुष्य के स्वभाव ही में है कि वह कंजूस (कृपण) है, परंतु यदि वह मोमिन है, तो अल्लाह के सवाब (पुण्य) की आशा में खर्च करता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुफ्फार के ऐतराज़ात के जवाब का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि हर ऐतराज़ का जवाब देना ज़रूरी नहीं, कभी हिकमत से खामोशी बेहतर होती है।
आयत 101
وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَىٰ تِسْعَ ءَايَـٰتٍۭ بَيِّنَـٰتٍۢ ۖ فَسْـَٔلْ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ إِذْ جَآءَهُمْ فَقَالَ لَهُۥ فِرْعَوْنُ إِنِّى لَأَظُنُّكَ يَـٰمُوسَىٰ مَسْحُورًۭا
وَلَقَدْ
और अलबत्ता
ءَاتَيْنَا
दीं हमने
مُوسَىٰ
मूसा को
تِسْعَ
नौ
ءَايَـٰتٍۭ
निशानियाँ
بَيِّنَـٰتٍۢ ۖ
वाज़ेह
فَسْـَٔلْ
तो पूछ लो
بَنِىٓ
(the) Children of Israel
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल से
إِذْ
जब
جَآءَهُمْ
वो आया उनके पास
فَقَالَ
तो कहा
لَهُۥ
उसे
فِرْعَوْنُ
फ़िरऔन ने
إِنِّى
बेशक मैं
لَأَظُنُّكَ
अलबत्ता मैं गुमान करता हूँ तुझे
يَـٰمُوسَىٰ
ऐ मूसा
مَسْحُورًۭا
सहरज़दा
हमने मूसा को नौ खुली निशानियाँ प्रदान की थी। अब इसराईल की सन्तान से पूछ लो कि जब वह उनके पास आया और फ़िरऔन ने उससे कहा, "ऐ मूसा! मैं तो तुम्हें बड़ा जादूगर समझता हूँ।"
तफ़्सीर:
निश्चित रूप से हमने मूसा अलैहिस्सलाम को नौ स्पष्ट निशानियाँ दीं, जो उनकी सत्यता की गवाही देती थीं और वे निशानियाँ : लाठी, हाथ, अकाल, फलों की कमी, आँधी (तूफान), टिड्डियाँ, जूँ, मेंढक और खून हैं। तो आप (ऐ रसूल) यहूदियों से पूछ लीजिए कि जब मूसा अलैहिस्सलाम उनके पूर्वजों के पास उन निशानियाँ को लेकर आए, तो फ़िरऔन ने उनसे कहा : मैं निश्चय ही (ऐ मूसा) तुम्हें एक जादू किया हुआ आदमी समझता हूँ; क्योंकि तुम ये अजब-गजब (विचित्र) चीज़ें लाते हो।
आयत 102
قَالَ لَقَدْ عَلِمْتَ مَآ أَنزَلَ هَـٰٓؤُلَآءِ إِلَّا رَبُّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ بَصَآئِرَ وَإِنِّى لَأَظُنُّكَ يَـٰفِرْعَوْنُ مَثْبُورًۭا
قَالَ
उसने कहा
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
عَلِمْتَ
जानते हो तुम
مَآ
नहीं
أَنزَلَ
उतारा
هَـٰٓؤُلَآءِ
उन्हें
إِلَّا
मगर
رَبُّ
रब ने
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन के
بَصَآئِرَ
वाज़ेह निशानियाँ बना कर
وَإِنِّى
और बेशक मैं
لَأَظُنُّكَ
अलबत्ता मैं गुमान करता हूँ तुझे
يَـٰفِرْعَوْنُ
ऐ फ़िरऔन
مَثْبُورًۭا
हलाक किया हुआ
उसने कहा, "तू भली-भाँति जानता हैं कि आकाशों और धऱती के रब के सिवा किसी और ने इन (निशानियों) को स्पष्ट प्रमाण बनाकर नहीं उतारा है। और ऐ फ़िरऔन! मैं तो समझता हूँ कि तू विनष्ट होने को है।"
तफ़्सीर:
मूसा अलैैहिस्सलाम ने उसे उत्तर देते हुए कहा : (ऐ फ़िरऔन) तुझे निश्चितता के साथ विश्वास है कि इन निशानियों को उतारने वाला केवल आकाशों और धरती का पालनहार है। उसने इन्हें अपनी शक्ति तथा अपने रसूल की सच्चाई के प्रमाण के तौर पर उतारा है। लेकिन तूने इनका इनकार किया। और मैं निश्चित रूप से जानता हूँ कि (ऐ फिरऔन) तेरा सर्वनाश हुआ।
आयत 103
فَأَرَادَ أَن يَسْتَفِزَّهُم مِّنَ ٱلْأَرْضِ فَأَغْرَقْنَـٰهُ وَمَن مَّعَهُۥ جَمِيعًۭا
فَأَرَادَ
तो उसने इरादा किया
أَن
कि
يَسْتَفِزَّهُم
वो उखाड़ फेंके उन्हें
مِّنَ
from
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन से
فَأَغْرَقْنَـٰهُ
तो ग़र्क़ कर दिया हमने उसे
وَمَن
और जो
مَّعَهُۥ
उसके साथ थे
جَمِيعًۭا
सबके सबको
अन्ततः उसने चाहा कि उनको उस भूभाग से उखाड़ फेंके, किन्तु हमने उसे और जो उसके साथ थे सभी को डूबो दिया
तफ़्सीर:
फिर फ़िरऔन ने मूसा अलैहिस्सलाम और उनकी जाति के लोगों को मिस्र से बाहर निकाल कर दंडित करना चाहा। तो हमने उसे और उसके साथ उसके सभी सैनिकों को डुबोकर विनष्ट कर दिया।
आयत 104
وَقُلْنَا مِنۢ بَعْدِهِۦ لِبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ ٱسْكُنُوا۟ ٱلْأَرْضَ فَإِذَا جَآءَ وَعْدُ ٱلْـَٔاخِرَةِ جِئْنَا بِكُمْ لَفِيفًۭا
وَقُلْنَا
और कहा हमने
مِنۢ
after him
بَعْدِهِۦ
बाद इसके
لِبَنِىٓ
to the Children of Israel
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल को
ٱسْكُنُوا۟
रहो/बसो
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन में
فَإِذَا
फिर जब
جَآءَ
आ जाएगा
وَعْدُ
वादा
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत का
جِئْنَا
ले आऐंगे हम
بِكُمْ
तुम्हें
لَفِيفًۭا
इकट्ठा करके
और हमने उसके बाद इसराईल की सन्तान से कहा, "तुम इस भूभाग में बसो। फिर जब आख़िरत का वादा आ पूरा होगा, तो हम तुम सबको इकट्ठा ला उपस्थित करेंगे।"
तफ़्सीर:
और हमने फ़िरऔन और उसकी सेना को विनष्ट करने के बाद बनी इसराईल से कहा : तुम लोग शाम (लेवांत) की धरती पर बस जाओ। फिर जब क़ियामत का दिन होगा, तो हम तुम सबको हिसाब के लिए मह्शर (क़ियामत के मैदान) में एकत्रित करेंगे।
आयत 105
وَبِٱلْحَقِّ أَنزَلْنَـٰهُ وَبِٱلْحَقِّ نَزَلَ ۗ وَمَآ أَرْسَلْنَـٰكَ إِلَّا مُبَشِّرًۭا وَنَذِيرًۭا
وَبِٱلْحَقِّ
और साथ हक़ के
أَنزَلْنَـٰهُ
नाज़िल किया हमने उसे
وَبِٱلْحَقِّ
और साथ हक़ के ही
نَزَلَ ۗ
वो उतरा
وَمَآ
और नहीं
أَرْسَلْنَـٰكَ
भेजा हमने आपको
إِلَّا
मगर
مُبَشِّرًۭا
ख़ुशख़बरी देने वाला
وَنَذِيرًۭا
और डराने वाला बनाकर
सत्य के साथ हमने उसे अवतरित किया और सत्य के साथ वह अवतरित भी हुआ। और तुम्हें तो हमने केवल शुभ सूचना देनेवाला और सावधान करनेवाला बनाकर भेजा है
तफ़्सीर:
हमने इस क़ुरआन को मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर सत्य ही के साथ उतारा है। तथा यह उनपर बिना किसी परिवर्तन या विरूपण के सत्य ही के साथ उतरा है। और हमने (ऐ रसूल!) आपको केवल धर्मपरायण लोगों को जन्नत की शुभ सूचना देने वाला और काफिरों तथा अवज्ञाकारियों को जहन्नम से डराने वाला बनाकर भेजा है।
आयत 106
وَقُرْءَانًۭا فَرَقْنَـٰهُ لِتَقْرَأَهُۥ عَلَى ٱلنَّاسِ عَلَىٰ مُكْثٍۢ وَنَزَّلْنَـٰهُ تَنزِيلًۭا
وَقُرْءَانًۭا
और क़ुरआन को
فَرَقْنَـٰهُ
अलग-अलग (नाज़िल) किया हमने उसे
لِتَقْرَأَهُۥ
ताकि आप पढ़ें उसे
عَلَى
to
ٱلنَّاسِ
लोगों पर
عَلَىٰ
at
مُكْثٍۢ
ठहर-ठहर कर
وَنَزَّلْنَـٰهُ
और नाज़िल किया हमने इसे
تَنزِيلًۭا
थोड़ा-थोड़ा नाज़िल करना
और क़ुरआन को हमने थोड़ा-थोड़ा करके इसलिए अवतरित किया, ताकि तुम ठहर-ठहरकर उसे लोगो को सुनाओ, और हमने उसे उत्तम रीति से क्रमशः उतारा है
तफ़्सीर:
और हमने यह क़ुरआन अवतरित किया, जिसे हमने स्पष्ट किया है और विस्तार से समझाया है, इस उम्मीद में कि आप उसे ठहर-ठहर कर लोगों को पढ़कर सुनाएँ। क्योंकि यह समझने और चिंतन करने का अधिक कारण है। तथा हमने इसे घटनाओं और परिस्थितियों के अनुसार थोड़ा-थोड़ा करके अलग-अलग उतारा है।
आयत 107
قُلْ ءَامِنُوا۟ بِهِۦٓ أَوْ لَا تُؤْمِنُوٓا۟ ۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْعِلْمَ مِن قَبْلِهِۦٓ إِذَا يُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ يَخِرُّونَ لِلْأَذْقَانِ سُجَّدًۭا
قُلْ
कह दीजिए
ءَامِنُوا۟
तुम ईमान लाओ
بِهِۦٓ
उस पर
أَوْ
या
لَا
(do) not
تُؤْمِنُوٓا۟ ۚ
ना तुम ईमान लाओ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
أُوتُوا۟
दिए गए
ٱلْعِلْمَ
इल्म
مِن
before it
قَبْلِهِۦٓ
इससे पहले
إِذَا
जब
يُتْلَىٰ
वो पढ़ा जाता है
عَلَيْهِمْ
उन पर
يَخِرُّونَ
वो गिर पड़ते हैं
لِلْأَذْقَانِ
ठोड़ियों के बल
سُجَّدًۭا
सजदा करते हुए
कह दो, "तुम उसे मानो या न मानो, जिन लोगों को इससे पहले ज्ञान दिया गया है, उन्हें जब वह पढ़कर सुनाया जाता है, तो वे ठोड़ियों के बल सजदे में गिर पड़ते है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप कह दें : तुम इसपर ईमान ले आओ, पर तुम्हारे ईमान से इसमें कुछ भी वृद्धि नहीं होगी। या तुम इस पर ईमान न लाओ, पर तुम्हारे कुफ़्र से इसमें कोई कमी नहीं होगी। निःसंदेह जिन लोगों ने पिछली आसमानी पुस्तकें पढ़ रखी हैं और वे वह़्य तथा नुबुव्वत का ज्ञान रखते हैं, जब उनके सामने क़ुरआन पढ़ा जाता है, तो वे आभार प्रकट करते हुए अपने चेहरों के बल सजदे में गिर जाते हैं।
आयत 108
وَيَقُولُونَ سُبْحَـٰنَ رَبِّنَآ إِن كَانَ وَعْدُ رَبِّنَا لَمَفْعُولًۭا
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
سُبْحَـٰنَ
पाक है
رَبِّنَآ
रब हमारा
إِن
बेशक
كَانَ
है
وَعْدُ
वादा
رَبِّنَا
हमारे रब का
لَمَفْعُولًۭا
अलबत्ता होकर रहने वाला
और कहते है, "महान और उच्च है हमारा रब! हमारे रब का वादा तो पूरा होकर ही रहता है।"
तफ़्सीर:
और वे अपने सजदे में कहते हैं : हमारा पालनहार वादे के उल्लंघन से पवित्र है। चुनाँचे उसने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को संदेष्टा बनाकर भेजने का जो वादा किया था, वह होकर रहा। निःसंदेह हमारे पालनहार का इसका तथा इसके अलावा अन्य चीज़ों का वादा अनिवार्य रूप से पूरा होने वाला है।
आयत 109
وَيَخِرُّونَ لِلْأَذْقَانِ يَبْكُونَ وَيَزِيدُهُمْ خُشُوعًۭا ۩
وَيَخِرُّونَ
और वो गिर पड़ते हैं
لِلْأَذْقَانِ
ठोड़ियों के बल
يَبْكُونَ
रोते हुए
وَيَزِيدُهُمْ
और वो बढ़ा देता है उन्हें
خُشُوعًۭا ۩
ख़ुशूअ में
और वे रोते हुए ठोड़ियों के बल गिर जाते है और वह (क़ुरआन) उनकी विनम्रता को और बढ़ा देता है
तफ़्सीर:
और वे अल्लाह को सजदा करते हुए, उसके भय से रोते हुए अपने चेहरों के बल गिर जाते हैं। तथा क़ुरआन का सुनना और उसके अर्थों पर चिंतन करना उन्हें अल्लाह के प्रति विनम्रता और भय में बढ़ा देता है।
आयत 110
قُلِ ٱدْعُوا۟ ٱللَّهَ أَوِ ٱدْعُوا۟ ٱلرَّحْمَـٰنَ ۖ أَيًّۭا مَّا تَدْعُوا۟ فَلَهُ ٱلْأَسْمَآءُ ٱلْحُسْنَىٰ ۚ وَلَا تَجْهَرْ بِصَلَاتِكَ وَلَا تُخَافِتْ بِهَا وَٱبْتَغِ بَيْنَ ذَٰلِكَ سَبِيلًۭا
قُلِ
कह दीजिए
ٱدْعُوا۟
पुकारो
ٱللَّهَ
अल्लाह को
أَوِ
या
ٱدْعُوا۟
पुकारो
ٱلرَّحْمَـٰنَ ۖ
रहमान को
أَيًّۭا
By whatever (name)
مَّا
जिस (नाम) से भी
تَدْعُوا۟
तुम पुकारोगे
فَلَهُ
तो उसी के लिए हैं
ٱلْأَسْمَآءُ
नाम
ٱلْحُسْنَىٰ ۚ
अच्छे-अच्छे
وَلَا
और ना
تَجْهَرْ
आप आवाज़ बुलन्द कीजिए
بِصَلَاتِكَ
अपनी नमाज़ में
وَلَا
और ना
تُخَافِتْ
आप पस्त कीजिए
بِهَا
उसे
وَٱبْتَغِ
और इख़्तियार कीजिए
بَيْنَ
दर्मियान
ذَٰلِكَ
उसके
سَبِيلًۭا
कोई रास्ता
कह दो, "तुम अल्लाह को पुकारो या रहमान को पुकारो या जिस नाम से भी पुकारो, उसके लिए सब अच्छे ही नाम है।" और अपनी नमाज़ न बहुत ऊँची आवाज़ से पढ़ो और न उसे बहुत चुपके से पढ़ो, बल्कि इन दोनों के बीच मध्य मार्ग अपनाओ
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) जिसने आपके "या अल्लाह, या रहमान" कहकर पुकारने का खंडन किया है, आप उससे कह दीजिए : अल्लाह और रहमान दोनों ही उस महिमावान के नाम हैं। अतः तुम इन दोनों में से किसी नाम से या इनके अलावा उसके नामों में से किसी अन्य नाम से उसे पुकारो, उसके सभी नाम अच्छे हैं। और ये दोनों उन्हीं अच्छे नामों में से हैं। इसलिए तुम उसे इनके द्वारा अथवा इनके अलावा उसके अच्छे नामों में से किसी और से पुकारो। तथा आप अपनी नामज़ में क़ुरआन इतनी ऊँची आवाज़ से न पढ़ो कि मुश्रिक लोग सुन लें और न ही उसे इतनी धीमी आवाज़ से पढ़ो कि मोमिन लोग भी न सुन पाएँ। आप इन दोनों के बीच का रास्ता अपनाएँ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मूसा अलैहिस्सलाम के नौ मोजिज़ों और फिरऔन के इनकार का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि निशानियां देखकर भी इनकार करने वाला अपने ही नुकसान में रहता है।
आयत 111
وَقُلِ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِى لَمْ يَتَّخِذْ وَلَدًۭا وَلَمْ يَكُن لَّهُۥ شَرِيكٌۭ فِى ٱلْمُلْكِ وَلَمْ يَكُن لَّهُۥ وَلِىٌّۭ مِّنَ ٱلذُّلِّ ۖ وَكَبِّرْهُ تَكْبِيرًۢا
وَقُلِ
और कह दीजिए
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए है
ٱلَّذِى
वो जिसने
لَمْ
नहीं
يَتَّخِذْ
बनाई
وَلَدًۭا
कोई औलाद
وَلَمْ
और नहीं
يَكُن
है
لَّهُۥ
उसके लिए
شَرِيكٌۭ
कोई शरीक
فِى
in
ٱلْمُلْكِ
बादशाहत में
وَلَمْ
और नहीं
يَكُن
है
لَّهُۥ
उसके लिए
وَلِىٌّۭ
कोई मददगार
مِّنَ
out of
ٱلذُّلِّ ۖ
कमज़ोरी (की वजह) से
وَكَبِّرْهُ
और बड़ाई बयान कीजिए उसकी
تَكْبِيرًۢا
ख़ूब बड़ाई बयान करना
और कहो, "प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने न तो अपना कोई बेटा बनाया और न बादशाही में उसका कोई सहभागी है और न ऐसा ही है कि वह दीन-हीन हो जिसके कारण बचाव के लिए उसका कोई सहायक मित्र हो।" और बड़ाई बयान करो उसकी, पूर्ण बड़ाई
तफ़्सीर:
और आप (ऐ रसूल) कह दीजिए : सब प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जो हर प्रकार की प्रशंसाओं और स्तुतियों के योग्य है, जो संतान से पवित्र है और जो साझी से पवित्र है। अतः उसके राज्य में कोई उसका साझी नहीं है। उसे अपमान और बेइज़्ज़ती छू भी नहीं सकती। इसलिए उसे किसी सहायक की आवश्यकता नहीं, जो उसका समर्थन करे और उसे प्रतिष्ठा प्रदान करे। और आप बहुत अधिक उसकी महिमा का गान करें। अतः आप उसकी ओर संतान, या राज्य में साझी, या मददगार समर्थक की निस्बत न करें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन की तिलावत के आदाब और अल्लाह की तारीफ के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि कुरआन पढ़ते वक्त न बहुत बुलंद न बहुत आहिस्ता, बल्कि दरमियानी आवाज़ अपनानी चाहिए।
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