नाम का मतलब
गुफा (असहाब-ए-कहफ के गुफा में पनाह लेने के वाकिये से)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-कहफ में चार अहम वाकियात बयान हुए हैं: असहाब-ए-कहफ (गुफा वाले नौजवान), दो बाग़ों वाला शख्स, मूसा-खिज़्र अलैहिस्सलाम का सफर, और ज़ुल-क़रनैन। यह सूरह चार बड़े फितनों — दीन, माल, इल्म और ताकत के फितनों से खबरदार करती है।
फ़ज़ीलत / सार
नबी ﷺ ने जुमे के दिन इस सूरह की तिलावत की ताकीद फरमाई है, और कहा जाता है कि इसे पढ़ने वाला दज्जाल के फितने से महफूज़ रहता है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِىٓ أَنزَلَ عَلَىٰ عَبْدِهِ ٱلْكِتَـٰبَ وَلَمْ يَجْعَل لَّهُۥ عِوَجَا ۜ
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए है
ٱلَّذِىٓ
वो जिसने
أَنزَلَ
नाज़िल किया
عَلَىٰ
to
عَبْدِهِ
अपने बन्दे पर
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब को
وَلَمْ
और नहीं
يَجْعَل
उसने रखा
لَّهُۥ
उसमें
عِوَجَاۜ
कोई टेढ़ापन
प्रशंसा अल्लाह के लिए है जिसने अपने बन्दे पर यह किताब अवतरित की और उसमें (अर्थात उस बन्दे में) कोई टेढ़ नहीं रखी,
तफ़्सीर:
पूर्णता और प्रताप के गुणों के साथ सब प्रशंसा तथा खुली एवं छिपी नेमतों पर हर प्रकार की स्तुति अकेले अल्लाह के लिए है, जिसने अपने बंदे और रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर क़ुरआन अवतिरत किया और इस क़ुरआन में कोई टेढ़ापन और सत्य से झुकाव नहीं रखा है।
आयत 2
قَيِّمًۭا لِّيُنذِرَ بَأْسًۭا شَدِيدًۭا مِّن لَّدُنْهُ وَيُبَشِّرَ ٱلْمُؤْمِنِينَ ٱلَّذِينَ يَعْمَلُونَ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ أَنَّ لَهُمْ أَجْرًا حَسَنًۭا
قَيِّمًۭا
बिल्कुल सीधी
لِّيُنذِرَ
ताकि वो डराए
بَأْسًۭا
अज़ाब
شَدِيدًۭا
सख़्त से
مِّن
from
لَّدُنْهُ
उसकी तरफ़ से
وَيُبَشِّرَ
और वो ख़ुशख़बरी दे
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों को
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَعْمَلُونَ
अमल करते हैं
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
أَنَّ
कि बेशक
لَهُمْ
उनके लिए
أَجْرًا
अजर है
حَسَنًۭا
अच्छा
ठीक और दूरुस्त, ताकि एक कठोर आपदा से सावधान कर दे जो उसकी और से आ पड़ेगी। और मोमिनों को, जो अच्छे कर्म करते है, शुभ सूचना दे दे कि उनके लिए अच्छा बदला है;
तफ़्सीर:
बल्कि उसे सीधा बनाया, जिसमें कोई अंतर्विरोध और विभेद नहीं है, ताकि वह काफिरों को अल्लाह के पास से एक भारी यातना से डराए, जो उनकी प्रतीक्षा कर रही है, तथा अच्छे कर्म करने वाले मोमिनों को शुभ सूचना दे कि उनके लिए एक अच्छा बदला है, जिसके समान कोई अन्य बदला नहीं हो सकता।
आयत 3
مَّـٰكِثِينَ فِيهِ أَبَدًۭا
مَّـٰكِثِينَ
रहने वाले हैं
فِيهِ
उसमें
أَبَدًۭا
हमेशा-हमेशा
जिसमें वे सदैव रहेंगे
तफ़्सीर:
वे इस प्रतिफल में हमेशा रहेंगे, जो उनसे कभी खत्म नहीं होगा।
आयत 4
وَيُنذِرَ ٱلَّذِينَ قَالُوا۟ ٱتَّخَذَ ٱللَّهُ وَلَدًۭا
وَيُنذِرَ
और वो डराए
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
قَالُوا۟
कहा
ٱتَّخَذَ
बना ली
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
وَلَدًۭا
कोई औलाद
और उनको सावधान कर दे, जो कहते है, "अल्लाह सन्तानवाला है।"
तफ़्सीर:
तथा यहूदियों, ईसाइयों और कुछ मुशरिकों को डराए, जिन्होंने कहा : अल्लाह ने कोई संतान बना रखी है।
आयत 5
مَّا لَهُم بِهِۦ مِنْ عِلْمٍۢ وَلَا لِـَٔابَآئِهِمْ ۚ كَبُرَتْ كَلِمَةًۭ تَخْرُجُ مِنْ أَفْوَٰهِهِمْ ۚ إِن يَقُولُونَ إِلَّا كَذِبًۭا
مَّا
नहीं
لَهُم
उन्हें
بِهِۦ
इसका
مِنْ
any
عِلْمٍۢ
कोई इल्म
وَلَا
और ना
لِـَٔابَآئِهِمْ ۚ
उनके आबा ओ अजदाद को
كَبُرَتْ
बहुत बड़ी है
كَلِمَةًۭ
बात
تَخْرُجُ
जो निकलती है
مِنْ
of
أَفْوَٰهِهِمْ ۚ
उनके मुँहों से
إِن
नहीं
يَقُولُونَ
वो कहते
إِلَّا
मगर
كَذِبًۭا
झूठ
इसका न उन्हें कोई ज्ञान है और न उनके बाप-दादा ही को था। बड़ी बात है जो उनके मुँह से निकलती है। वे केवल झूठ बोलते है
तफ़्सीर:
इन मिथ्यारोपण करने वालों के पास अल्लाह की ओर संतान की निस्बत करने के दावे का कोई ज्ञान या उसका कोई प्रमाण नहीं है, और न ही इनके उन बाप-दादाओं के पास कोई ज्ञान था, जिनका इन्होंने इस विषय में अनुकरण किया है। बहुत घृणित है वह बात, जो उनके मुँह से बिना समझ-बूझ के निकल रही है। वे केवल झूठ बोल रहे हैं, जिसका कोई आधार और सबूत नहीं है।
आयत 6
فَلَعَلَّكَ بَـٰخِعٌۭ نَّفْسَكَ عَلَىٰٓ ءَاثَـٰرِهِمْ إِن لَّمْ يُؤْمِنُوا۟ بِهَـٰذَا ٱلْحَدِيثِ أَسَفًا
فَلَعَلَّكَ
पस शायद कि आप
بَـٰخِعٌۭ
हलाक करने वाले हैं
نَّفْسَكَ
अपनी जान को
عَلَىٰٓ
over
ءَاثَـٰرِهِمْ
उनके पीछे
إِن
अगर
لَّمْ
ना
يُؤْمِنُوا۟
वो ईमान लाऐं
بِهَـٰذَا
साथ इस
ٱلْحَدِيثِ
कलाम के
أَسَفًا
ग़म के मारे
अच्छा, शायद उनके पीछे, यदि उन्होंने यह बात न मानी तो तुम अफ़सोस के मारे अपने प्राण ही खो दोगे!
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) यदि वे इस क़ुरआन पर ईमान न लाए, तो शायद आप अफ़सोस और दू:ख से खुद को नष्ट कर लेंगे। तो आप ऐसा न करें। क्योंकि उन्हें सीधे मार्ग पर लाने की ज़िम्मेदारी आपपर नहीं है। आपका काम केवल संदेश पहुँचा देना है।
आयत 7
إِنَّا جَعَلْنَا مَا عَلَى ٱلْأَرْضِ زِينَةًۭ لَّهَا لِنَبْلُوَهُمْ أَيُّهُمْ أَحْسَنُ عَمَلًۭا
إِنَّا
बेशक हम
جَعَلْنَا
बनाया हमने
مَا
उसको जो
عَلَى
(is) on
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन पर है
زِينَةًۭ
ज़ीनत/आराइश
لَّهَا
उसके लिए
لِنَبْلُوَهُمْ
ताकि हम आज़माऐं उन्हें
أَيُّهُمْ
कौन सा उनमें से
أَحْسَنُ
ज़्यादा अच्छा है
عَمَلًۭا
अमल में
धरती पर जो कुछ है उसे तो हमने उसकी शोभा बनाई है, ताकि हम उनकी परीक्षा लें कि उनमें कर्म की दृष्टि से कौन उत्तम है
तफ़्सीर:
और हमने धरती पर पाए जाने वाले सभी प्राणियों को उसकी शोभा बना दिया है, ताकि हम उनका परीक्षण कर सकें कि उनमें से कौन अल्लाह को प्रसन्न करने वाले सबसे अच्छे कार्य करता है और कौन सबसे बुरे कार्य करता है। ताकि हम प्रत्येक को उसके योग्य बदला दें।
आयत 8
وَإِنَّا لَجَـٰعِلُونَ مَا عَلَيْهَا صَعِيدًۭا جُرُزًا
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَجَـٰعِلُونَ
अलबत्ता बनाने वाले हैं
مَا
उसको जो
عَلَيْهَا
उस पर है
صَعِيدًۭا
मैदान
جُرُزًا
चटियल
और जो कुछ उसपर है उसे तो हम एक चटियल मैदान बना देनेवाले है
तफ़्सीर:
और धरती पर पाए जाने वाले सभी जीवों को हम वनस्पति से रहित मिट्टी बना देंगे। और यह धरती पर उपस्थित प्राणियों के जीवन का अंत हो जाने के बाद होगा। अतः इससे नसीहत प्राप्त करो।
आयत 9
أَمْ حَسِبْتَ أَنَّ أَصْحَـٰبَ ٱلْكَهْفِ وَٱلرَّقِيمِ كَانُوا۟ مِنْ ءَايَـٰتِنَا عَجَبًا
أَمْ
क्या
حَسِبْتَ
समझा आपने
أَنَّ
कि बेशक
أَصْحَـٰبَ
(the) companions
ٱلْكَهْفِ
ग़ार वाले
وَٱلرَّقِيمِ
और कतबे वाले
كَانُوا۟
थे वो
مِنْ
among
ءَايَـٰتِنَا
हमारी निशानियों में से
عَجَبًا
अजीब
क्या तुम समझते हो कि गुफा और रक़ीमवाले हमारी अद्भु त निशानियों में से थे?
तफ़्सीर:
(ऐ रसलू) आप हरगिज़ यह न समझें कि गुफा वालों की कहानी और उनकी वह शिला जिस पर उनके नाम लिखे गए हैं, हमारी अद्भुत निशानियों में से हैं। बल्कि उसके अलावा उससे भी अधिक अद्भुत चीज़ें मौजूद हैं, जैसे कि आकाशों और पृथ्वी की रचना।
आयत 10
إِذْ أَوَى ٱلْفِتْيَةُ إِلَى ٱلْكَهْفِ فَقَالُوا۟ رَبَّنَآ ءَاتِنَا مِن لَّدُنكَ رَحْمَةًۭ وَهَيِّئْ لَنَا مِنْ أَمْرِنَا رَشَدًۭا
إِذْ
जब
أَوَى
पनाह ली
ٱلْفِتْيَةُ
उन नौजवानों ने
إِلَى
तरफ़
ٱلْكَهْفِ
ग़ार के
فَقَالُوا۟
फिर वो कहने लगे
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
ءَاتِنَا
दे हमें
مِن
from
لَّدُنكَ
अपने पास से
رَحْمَةًۭ
रहमत
وَهَيِّئْ
और मुहैय्या कर
لَنَا
हमारे लिए
مِنْ
[from]
أَمْرِنَا
हमारे मामले में
رَشَدًۭا
रहनुमाई
जब उन नवयुवकों ने गुफ़ा में जाकर शरण ली तो कहा, "हमारे रब! हमें अपने यहाँ से दयालुता प्रदान कर और हमारे लिए हमारे अपने मामले को ठीक कर दे।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उस समय को याद कीजिए, जब ईमान वाले युवकों ने अपने धर्म के साथ भागकर गुफा में शरण ली, तो उन्होंने अपने पालनहार से प्रार्थना करते हुए कहा : ऐ हमारे पालनहार! तू हमें अपनी ओर से दया प्रदान कर, कि तू हमारे पापों को क्षमा कर दे और हमें हमारे शत्रुओं से मुक्ति प्रदान कर, तथा काफिरों से हिजरत करने और ईमान लाने के मामले में तू हमारे लिए सत्य मार्ग की ओर रहनुमाई और शुद्धता बना दे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन की हिदायत और असहाब-ए-कहफ (गुफा वाले नौजवान) के तआरुफ का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि जब माहौल दीन के लिए मुश्किल हो जाए तो अल्लाह की हिफाज़त में पनाह लेने से न हिचकिचाएं, जैसे उन नौजवानों ने गुफा में की।
आयत 11
فَضَرَبْنَا عَلَىٰٓ ءَاذَانِهِمْ فِى ٱلْكَهْفِ سِنِينَ عَدَدًۭا
فَضَرَبْنَا
तो डाल दिया हमने (पर्दा)
عَلَىٰٓ
over
ءَاذَانِهِمْ
उनके कानों पर
فِى
in
ٱلْكَهْفِ
ग़ार में
سِنِينَ
कई साल
عَدَدًۭا
गिनती के
फिर हमने उस गुफा में कई वर्षो के लिए उनके कानों पर परदा डाल दिया
तफ़्सीर:
फिर, उनके चलने और गुफा में शरण लेने के बाद, हमने उनके कानों पर पर्दा डाल दिया ताकि कोई आवाज़ न सुन सकें और कई वर्षों तक सोने के लिए उन्हें नींद से ग्रस्त कर दिया।
आयत 12
ثُمَّ بَعَثْنَـٰهُمْ لِنَعْلَمَ أَىُّ ٱلْحِزْبَيْنِ أَحْصَىٰ لِمَا لَبِثُوٓا۟ أَمَدًۭا
ثُمَّ
फिर
بَعَثْنَـٰهُمْ
उठाया हमने उन्हें
لِنَعْلَمَ
ताकि हम जान लें
أَىُّ
कौन सा
ٱلْحِزْبَيْنِ
दो गिरोहों मे से
أَحْصَىٰ
ख़ूब गिनने वाला है
لِمَا
उसको जो
لَبِثُوٓا۟
वो ठहरे रहे
أَمَدًۭا
मुद्दत
फिर हमने उन्हें भेजा, ताकि मालूम करें कि दोनों गिरोहों में से किसने याद रखा है कि कितनी अवधि तक वे रहे
तफ़्सीर:
फिर, उनकी लंबी नींद के बाद, हमने उन्हें इसलिए जगाया, ताकि हम जान ले (उसके ज्ञान के प्रकटन के तौर पर) कि उनके गुफा में ठहरने की अवधि के बारे में परस्पर विरोधी दो समूहों में से कौन उस अवधि को अधिक जानने वाला है।
आयत 13
نَّحْنُ نَقُصُّ عَلَيْكَ نَبَأَهُم بِٱلْحَقِّ ۚ إِنَّهُمْ فِتْيَةٌ ءَامَنُوا۟ بِرَبِّهِمْ وَزِدْنَـٰهُمْ هُدًۭى
نَّحْنُ
हम
نَقُصُّ
हम बयान करते हैं
عَلَيْكَ
आप पर
نَبَأَهُم
ख़बर उनकी
بِٱلْحَقِّ ۚ
साथ हक़ के
إِنَّهُمْ
बेशक वो
فِتْيَةٌ
चंद नौजवान थे
ءَامَنُوا۟
जो ईमान लाए
بِرَبِّهِمْ
अपने रब पर
وَزِدْنَـٰهُمْ
और ज़्यादा कर दिया हमने उन्हें
هُدًۭى
हिदायत में
हम तुन्हें ठीक-ठीक उनका वृत्तान्त सुनाते है। वे कुछ नवयुवक थे जो अपने रब पर ईमान लाए थे, और हमने उन्हें मार्गदर्शन में बढ़ोत्तरी प्रदान की
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) हम आपको उनकी खबर के बारे में सच्चाई के साथ बता रहे हैं, जिसमें कोई संदेह नहीं है। निःसंदेह वे कुछ युवक थे, जो अपने पालनहार पर ईमान लाए और उसका आज्ञापालन किया। तथा हमने उनके मार्गदर्शन और सत्य पर दृढ़ता में वृद्धि कर दी।
आयत 14
وَرَبَطْنَا عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ إِذْ قَامُوا۟ فَقَالُوا۟ رَبُّنَا رَبُّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ لَن نَّدْعُوَا۟ مِن دُونِهِۦٓ إِلَـٰهًۭا ۖ لَّقَدْ قُلْنَآ إِذًۭا شَطَطًا
وَرَبَطْنَا
और मज़बूत कर दिया हमने
عَلَىٰ
[on]
قُلُوبِهِمْ
उनके दिलों को
إِذْ
जब
قَامُوا۟
वो खड़े हुए
فَقَالُوا۟
फिर कहने लगे
رَبُّنَا
रब हमारा
رَبُّ
रब है
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन का
لَن
हरगिज़ नहीं
نَّدْعُوَا۟
हम पुकारेंगे
مِن
besides Him
دُونِهِۦٓ
उसके सिवा
إِلَـٰهًۭا ۖ
इलाह (किसी को)
لَّقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
قُلْنَآ
कही हमने
إِذًۭا
तब
شَطَطًا
बात नाइन्साफ़ी की
और हमने उनके दिलों को सुदृढ़ कर दिया। जब वे उठे तो उन्होंने कहा, "हमारा रब तो वही है जो आकाशों और धरती का रब है। हम उससे इतर किसी अन्य पूज्य को कदापि न पुकारेंगे। यदि हमने ऐसा किया तब तो हमारी बात हक़ से बहुत हटी हुई होगी
तफ़्सीर:
और हमने उनके दिलों को ईमान और उसपर दृढ़ता, तथा उसके लिए स्वदेश छोड़ने पर धैर्य के साथ मज़बूत कर दिया, जब उन्होंने काफ़िर राजा के सामने खड़े होकर एक अल्लाह पर अपने ईमान लाने की घोषणा की और उससे कहा : जिस पालनहार पर हम ईमान लाए और उसकी पूजा की, वह आकाशों और धरती का पालनहार है। हम उसके सिवा तथाकथित झूठे पूज्यों की हरगिज़ पूजा नहीं करेंगे। यदि हमने उसके सिवा किसी अन्य की पूजा की, तो हमने सत्य से दूर एक अनुचित बात कही।
आयत 15
هَـٰٓؤُلَآءِ قَوْمُنَا ٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِهِۦٓ ءَالِهَةًۭ ۖ لَّوْلَا يَأْتُونَ عَلَيْهِم بِسُلْطَـٰنٍۭ بَيِّنٍۢ ۖ فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًۭا
هَـٰٓؤُلَآءِ
ये है
قَوْمُنَا
क़ौम हमारी
ٱتَّخَذُوا۟
इन्होंने बना लिए
مِن
besides Him
دُونِهِۦٓ
उसके सिवा
ءَالِهَةًۭ ۖ
कई इलाह
لَّوْلَا
क्यों नहीं
يَأْتُونَ
वो लाए
عَلَيْهِم
उन पर
بِسُلْطَـٰنٍۭ
कोई दलील
بَيِّنٍۢ ۖ
वाज़ेह
فَمَنْ
तो कौन
أَظْلَمُ
बड़ा ज़ालिम है
مِمَّنِ
उससे जो
ٱفْتَرَىٰ
गढ़ ले
عَلَى
against
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
كَذِبًۭا
झूठ
ये हमारी क़ौम के लोग है, जिन्होंने उससे इतर कुछ अन्य पूज्य-प्रभु बना लिए है। आख़िर ये उनके हक़ में कोई स्पष्ट, प्रमाण क्यों नहीं लाते! भला उससे बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जो झूठ घड़कर अल्लाह पर थोपे?
तफ़्सीर:
फिर वे एक-दूसरे की ओर यह कहते हुए मुड़े : ये हमारी जाति के लोग हैं। इन्होंने अल्लाह के अलावा दूसरे पूज्य बना रखे हैं, जिनकी ये पूजा करते हैं। हालाँकि इनके पास उनकी पूजा का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है। अतः उससे बड़ा अत्याचारी कोई नहीं हो सकता, जो अल्लाह की ओर साझी की निस्बत करके उसपर झूठ गढ़े।
आयत 16
وَإِذِ ٱعْتَزَلْتُمُوهُمْ وَمَا يَعْبُدُونَ إِلَّا ٱللَّهَ فَأْوُۥٓا۟ إِلَى ٱلْكَهْفِ يَنشُرْ لَكُمْ رَبُّكُم مِّن رَّحْمَتِهِۦ وَيُهَيِّئْ لَكُم مِّنْ أَمْرِكُم مِّرْفَقًۭا
وَإِذِ
और जब
ٱعْتَزَلْتُمُوهُمْ
अलग हो गए तुम उनसे
وَمَا
और जिन की
يَعْبُدُونَ
वो इबादत कर रहे हैं
إِلَّا
सिवाय
ٱللَّهَ
अल्लाह के
فَأْوُۥٓا۟
तो पनाह लो
إِلَى
तरफ़
ٱلْكَهْفِ
ग़ार के
يَنشُرْ
वो फैला देगा
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
رَبُّكُم
रब तुम्हारा
مِّن
of
رَّحْمَتِهِۦ
अपनी रहमत में से
وَيُهَيِّئْ
और वो मुहैय्या करेगा
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنْ
[from]
أَمْرِكُم
तुम्हारे मामले में से
مِّرْفَقًۭا
सहूलत/आसानी
और जबकि इनसे तुम अलग हो गए हो और उनसे भी जिनको अल्लाह के सिवा ये पूजते है, तो गुफा में चलकर शरण लो। तुम्हारा रब तुम्हारे लिए अपनी दयालुता का दामन फैला देगा और तुम्हारे लिए तुम्हारे अपने काम से सम्बन्ध में सुगमता का उपकरण उपलब्ध कराएगा।"
तफ़्सीर:
और जब तुमने अपनी जाति से किनारा कर लिया और वे अल्लाह के अतिरिक्त जिनकी पूजा करते हैं, उन्हें छोड़ दिया और तुमने अकेले अल्लाह की इबादत की, तो अब तुम अपने धर्म को बचाकर गुफा में शरण लो, जहाँ तुम्हारा पालनहार तुमपर अपनी दया का विस्तार कर देगा, जिससे वह तुम्हारे शत्रुओं से तुम्हारी रक्षा और सुरक्षा करेगा। तथा तुम्हारे लिए तुम्हारे काम में उस चीज़ को आसान बना देगा जिसका तुम लाभ उठाओगे, जिससे तुम्हारे अपने लोगों के बीच रहने की क्षतिपूर्ति हो जाएगी।
आयत 17
۞ وَتَرَى ٱلشَّمْسَ إِذَا طَلَعَت تَّزَٰوَرُ عَن كَهْفِهِمْ ذَاتَ ٱلْيَمِينِ وَإِذَا غَرَبَت تَّقْرِضُهُمْ ذَاتَ ٱلشِّمَالِ وَهُمْ فِى فَجْوَةٍۢ مِّنْهُ ۚ ذَٰلِكَ مِنْ ءَايَـٰتِ ٱللَّهِ ۗ مَن يَهْدِ ٱللَّهُ فَهُوَ ٱلْمُهْتَدِ ۖ وَمَن يُضْلِلْ فَلَن تَجِدَ لَهُۥ وَلِيًّۭا مُّرْشِدًۭا
۞ وَتَرَى
और आप देखते
ٱلشَّمْسَ
सूरज को
إِذَا
जब
طَلَعَت
वो तुलूअ होता
تَّزَٰوَرُ
वो किनारा कर जाता
عَن
from
كَهْفِهِمْ
उनके ग़ार से
ذَاتَ
to
ٱلْيَمِينِ
दाऐं जानिब
وَإِذَا
और जब
غَرَبَت
वो ग़ुरूब होता
تَّقْرِضُهُمْ
वो कतरा जाता उनसे
ذَاتَ
to
ٱلشِّمَالِ
बाऐं जानिब
وَهُمْ
और वो
فِى
(lay) in
فَجْوَةٍۢ
एक खुली जगह में थे
مِّنْهُ ۚ
उस (ग़ार) की
ذَٰلِكَ
ये
مِنْ
(was) from
ءَايَـٰتِ
निशानियों में से है
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह की
مَن
जिसे
يَهْدِ
हिदायत दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
فَهُوَ
तो वो ही
ٱلْمُهْتَدِ ۖ
हिदायत पाने वाला है
وَمَن
और जिसे
يُضْلِلْ
वो भटका दे
فَلَن
तो हरगिज़ नहीं
تَجِدَ
आप पाऐंगे
لَهُۥ
उसके लिए
وَلِيًّۭا
कोई दोस्त
مُّرْشِدًۭا
रहनुमाई करने वाला
और तुम सूर्य को उसके उदित होते समय देखते तो दिखाई देता कि वह उनकी गुफा से दाहिनी ओर को बचकर निकल जाता है और जब अस्त होता है तो उनकी बाई ओर से कतराकर निकल जाता है। और वे है कि उस (गुफा) के एक विस्तृत स्थान में हैं। यह अल्लाह की निशानियों में से है। जिसे अल्लाह मार्ग दिखाए, वही मार्ग पानेवाला है और जिसे वह भटकता छोड़ दे उसका तुम कोई सहायक मार्गदर्शक कदापि न पाओगे
तफ़्सीर:
चुनाँचे उन्होंने उसका पालन किया, जिसका उन्हें आदेश दिया गया था। और अल्लाह ने उन्हें नींद से ग्रस्त कर दिया और उनके दुश्मनों से उनकी रक्षा की। और (ऐ उनको देखने वाले!) तुम सूरज को देखोगे कि जब वह पूरब से निकलता है, तो उनकी गुफा से उसमें प्रवेश करने वाले की दाईं ओर मुड़ जाता है, और जब डूबता है, तो उससे कतराकर उसकी बाईं ओर मुड़ जाता है और उस (गुफा) पर सूरज की किरणें नहीं पड़ती हैं। इस प्रकार वे स्थायी छाया में रहते हैं, सूरज की गर्मी उन्हें नुकसान नहीं पहुँचाती है। वे गुफा की एक विस्तृत जगह में हैं, उन्हें ज़रूरत भर हवा मिलती रहती है। उनके साथ होने वाली ये चीज़ें, जैसे कि गुफा में उन्हें शरण देना, उन्हें नींद से ग्रस्त करना, सूरज का उनसे कतराकर गुज़रना, उनके स्थान का विस्तृत होना और उन्हें उनकी जाति के लोगें से बचाना : अल्लाह की अद्भुत कारीगरी में से हैं, जो उसकी शक्ति को दर्शाती हैं। जिसे अल्लाह हिदायत के मार्ग की तौफ़ीक़ दे, वह वास्तव में मार्गदर्शित है, और जिसे वह छोड़ दे और पथभ्रष्ट कर दे, तो आप उसके लिए कोई सहायक नहीं पाएँगे, जो उसे हिदायत की तौफ़ीक़ दे सके और उसकी ओर उसका मार्गदर्शन कर सके। क्योंकि मार्गदर्शन केवल अल्लाह के हाथ में है, उसके अपने हाथ में नहीं है।
आयत 18
وَتَحْسَبُهُمْ أَيْقَاظًۭا وَهُمْ رُقُودٌۭ ۚ وَنُقَلِّبُهُمْ ذَاتَ ٱلْيَمِينِ وَذَاتَ ٱلشِّمَالِ ۖ وَكَلْبُهُم بَـٰسِطٌۭ ذِرَاعَيْهِ بِٱلْوَصِيدِ ۚ لَوِ ٱطَّلَعْتَ عَلَيْهِمْ لَوَلَّيْتَ مِنْهُمْ فِرَارًۭا وَلَمُلِئْتَ مِنْهُمْ رُعْبًۭا
وَتَحْسَبُهُمْ
और आप समझते उन्हें
أَيْقَاظًۭا
कि वो जाग रहे हैं
وَهُمْ
हालाँकि वो
رُقُودٌۭ ۚ
सोए हुए थे
وَنُقَلِّبُهُمْ
और हम करवटें बदलते रहते उनकी
ذَاتَ
to
ٱلْيَمِينِ
दाऐं जानिब
وَذَاتَ
and to
ٱلشِّمَالِ ۖ
और बाऐं जानिब
وَكَلْبُهُم
और कुत्ता उनका
بَـٰسِطٌۭ
फैलाए हुए था
ذِرَاعَيْهِ
अपने दोनों हाथ
بِٱلْوَصِيدِ ۚ
दहाने पर
لَوِ
अगर
ٱطَّلَعْتَ
झाँकते आप
عَلَيْهِمْ
उन पर
لَوَلَّيْتَ
अलबत्ता पीठ फेर लेते आप
مِنْهُمْ
उनसे
فِرَارًۭا
भागते हुए
وَلَمُلِئْتَ
और अलबत्ता भर दिए जाते आप
مِنْهُمْ
उनसे
رُعْبًۭا
रौब में
और तुम समझते कि वे जाग रहे है, हालाँकि वे सोए हुए होते। हम उन्हें दाएँ और बाएँ फेरते और उनका कुत्ता ड्योढ़ी पर अपनी दोनों भुजाएँ फैलाए हुए होता। यदि तुम उन्हें कहीं झाँककर देखते तो उनके पास से उलटे पाँव भाग खड़े होते और तुममें उसका भय समा जाता
तफ़्सीर:
और (ऐ उनकी ओर देखने वाले) तुम उनकी आँखें खुली होने के कारण उन्हें जगा हुआ समझते, जबकि वास्तव में वे सोए हुए थे। तथा हम उन्हें उनकी नींद में कभी दाईं करवट और कभी बाईं करवट पलटते रहते थे, ताकि मिट्टी उनके शरीर न खा ले। और उनके साथ जाने वाला कुत्ता गुफा के द्वार पर अपनी बाँहें फैलाए हुए था। यदि आप उन्हें झाँककर देख लेते, तो उनके भय से पीठ फेरकर भाग खड़े होते और आपके दिल में उनका डर भर जाता।
आयत 19
وَكَذَٰلِكَ بَعَثْنَـٰهُمْ لِيَتَسَآءَلُوا۟ بَيْنَهُمْ ۚ قَالَ قَآئِلٌۭ مِّنْهُمْ كَمْ لَبِثْتُمْ ۖ قَالُوا۟ لَبِثْنَا يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍۢ ۚ قَالُوا۟ رَبُّكُمْ أَعْلَمُ بِمَا لَبِثْتُمْ فَٱبْعَثُوٓا۟ أَحَدَكُم بِوَرِقِكُمْ هَـٰذِهِۦٓ إِلَى ٱلْمَدِينَةِ فَلْيَنظُرْ أَيُّهَآ أَزْكَىٰ طَعَامًۭا فَلْيَأْتِكُم بِرِزْقٍۢ مِّنْهُ وَلْيَتَلَطَّفْ وَلَا يُشْعِرَنَّ بِكُمْ أَحَدًا
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
بَعَثْنَـٰهُمْ
उठाया हमने उन्हें
لِيَتَسَآءَلُوا۟
ताकि वो एक दूसरे से सवाल करें
بَيْنَهُمْ ۚ
आपस में
قَالَ
कहा
قَآئِلٌۭ
कहने वाले ने
مِّنْهُمْ
उनमें से
كَمْ
कितना
لَبِثْتُمْ ۖ
ठहरे तुम
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لَبِثْنَا
ठहरे हम
يَوْمًا
एक दिन
أَوْ
या
بَعْضَ
कुछ हिस्सा
يَوْمٍۢ ۚ
दिन का
قَالُوا۟
वो कहने लगे
رَبُّكُمْ
रब तुम्हारा
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِمَا
उसे जो
لَبِثْتُمْ
ठहरे तुम
فَٱبْعَثُوٓا۟
पस भेजो
أَحَدَكُم
अपने में से किसी एक को
بِوَرِقِكُمْ
with this silver coin of yours
هَـٰذِهِۦٓ
साथ अपनी इस चाँदी के
إِلَى
to
ٱلْمَدِينَةِ
तरफ़ शहर के
فَلْيَنظُرْ
फिर चाहिए कि वो देखे
أَيُّهَآ
कौन सा उनमें से
أَزْكَىٰ
ज़्यादा पाकीज़ा
طَعَامًۭا
खाना है
فَلْيَأْتِكُم
पस चाहिए कि वो लाए तुम्हारे पास
بِرِزْقٍۢ
खाना
مِّنْهُ
उस से
وَلْيَتَلَطَّفْ
और चाहिए कि वो नर्मी करे
وَلَا
और ना
يُشْعِرَنَّ
वो हरगिज़ ख़बर दे
بِكُمْ
तुम्हारे बारे में
أَحَدًا
किसी एक को
और इसी तरह हमने उन्हें उठा खड़ा किया कि वे आपस में पूछताछ करें। उनमें एक कहनेवाले ने कहा, "तुम कितना ठहरे रहे?" वे बोले, "हम यही कोई एक दिन या एक दिन से भी कम ठहरें होंगे।" उन्होंने कहा, "जितना तुम यहाँ ठहरे हो उसे तुम्हारा रब ही भली-भाँति जानता है। अब अपने में से किसी को यह चाँदी का सिक्का देकर नगर की ओर भेजो। फिर वह देख ले कि उसमें सबसे अच्छा खाना किस जगह मिलता है। तो उसमें से वह तुम्हारे लिए कुछ खाने को ले आए और चाहिए की वह नरमी और होशियारी से काम ले और किसी को तुम्हारी ख़बर न होने दे
तफ़्सीर:
जिस प्रकार हमने उनके साथ वह कुछ किया, जिसका हमने अपनी शक्ति के अजूबों में से उल्लेख किया है, उसी प्रकार हमने उन्हें एक लंबी अवधि के बाद जगा दिया, ताकि वे एक-दूसरे से उस अवधि के बारे में पूछें, जो उन्होंने सोते हुए बिताई। चुनाँचे उनमें से कुछ ने उत्तर दिया : हम एक दिन या दिन के कुछ समय तक सोए रहे। जबकि उनमें से जिसके लिए उनके सोए रहने की अवधि स्पष्ट नहीं हो सकी, उसने उत्तर दिया : तुम्हारा पालनहार ही अधिक जानता है कि तुम कितने दिनों तक सोए रहे। अतः इसके ज्ञान को उसी के हवाले कर दो और अपने काम में व्यस्त हो जाओ। इसलिए अब तुम अपने में से किसी व्यक्ति को चाँदी के ये सिक्के देकर अपने शहर की ओर भेजो। वह देख ले कि नगर का कौन व्यक्ति अधिक उत्तम एवं पवित्र भोजन रखता है, तो उससे तुम्हारे पास कुछ खाना ले आए। और वह जाते-आते तथा सौदा करते समय सावधान रहे तथा व्यवहार कुशलता से काम ले और किसी को भी तुम्हारे स्थान का पता न चलने दे। क्योंकि इससे बड़ा नुकसान हो सकता है।
आयत 20
إِنَّهُمْ إِن يَظْهَرُوا۟ عَلَيْكُمْ يَرْجُمُوكُمْ أَوْ يُعِيدُوكُمْ فِى مِلَّتِهِمْ وَلَن تُفْلِحُوٓا۟ إِذًا أَبَدًۭا
إِنَّهُمْ
बेशक वो
إِن
अगर
يَظْهَرُوا۟
वो मुत्तिलाअ हो गए
عَلَيْكُمْ
तुम पर
يَرْجُمُوكُمْ
वो संगसार कर देंगे तुम्हें
أَوْ
या
يُعِيدُوكُمْ
वो लौटा ले जाऐंगे तुम्हें
فِى
to
مِلَّتِهِمْ
अपनी मिल्लत में
وَلَن
और हरगिज़ नहीं
تُفْلِحُوٓا۟
तुम फ़लाह पाओगे
إِذًا
तब
أَبَدًۭا
कभी भी
यदि वे कहीं तुम्हारी ख़बर पा जाएँगे तो पथराव करके तुम्हें मार डालेंगे या तुम्हें अपने पंथ में लौटा ले जाएँगे और तब तो तुम कभी भी सफल न पो सकोगे।"
तफ़्सीर:
यदि तुम्हारे समुदाय के लोगों को तुम्हारी सूचना मिल गई तथा तुम्हारे स्थान का पता चल गया, तो वे पत्थर मार-मारकर तुम्हारी हत्या कर देंगे अथवा तुम्हें अपने उस भ्रष्ट धर्म में वापस लौटा लेंगे, जिसपर तुम अल्लाह की कृपा से सत्य धर्म की ओर मार्गदर्शन पाने से पहले चला करते थे। और यदि तुम उस पूर्व धर्म में लौट गए, तो कभी सफल नहीं होगे, न इस सांसारिक जीवन में और न ही आखिरत में। बल्कि अल्लाह ने जिस सत्य धर्म का रास्ता तुम्हें दिखाया है, उसे त्यागने तथा उस भ्रष्ट धर्म में लौट जाने के कारण, तुम्हें दोनों लोकों में बहुत बड़े घाटे का सामना करना पड़ेगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
गुफा वालों की नींद और हिफाज़त का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि सच्चे ईमान वालों को अल्लाह हर हाल में महफूज़ रखता है, चाहे हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों।
आयत 21
وَكَذَٰلِكَ أَعْثَرْنَا عَلَيْهِمْ لِيَعْلَمُوٓا۟ أَنَّ وَعْدَ ٱللَّهِ حَقٌّۭ وَأَنَّ ٱلسَّاعَةَ لَا رَيْبَ فِيهَآ إِذْ يَتَنَـٰزَعُونَ بَيْنَهُمْ أَمْرَهُمْ ۖ فَقَالُوا۟ ٱبْنُوا۟ عَلَيْهِم بُنْيَـٰنًۭا ۖ رَّبُّهُمْ أَعْلَمُ بِهِمْ ۚ قَالَ ٱلَّذِينَ غَلَبُوا۟ عَلَىٰٓ أَمْرِهِمْ لَنَتَّخِذَنَّ عَلَيْهِم مَّسْجِدًۭا
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
أَعْثَرْنَا
आगाह कर दिया हमने
عَلَيْهِمْ
उन पर (लोगों को)
لِيَعْلَمُوٓا۟
ताकि वो जान लें
أَنَّ
कि बेशक
وَعْدَ
वादा
ٱللَّهِ
अल्लाह का
حَقٌّۭ
सच्चा है
وَأَنَّ
और बेशक
ٱلسَّاعَةَ
क़यामत
لَا
(there is) no
رَيْبَ
नहीं कोई शक
فِيهَآ
उसमें
إِذْ
जब
يَتَنَـٰزَعُونَ
वो झगड़ रहे थे
بَيْنَهُمْ
आपस में
أَمْرَهُمْ ۖ
उनके मामले में
فَقَالُوا۟
तो उन्होंने कहा
ٱبْنُوا۟
बनाओ
عَلَيْهِم
उन पर
بُنْيَـٰنًۭا ۖ
एक इमारत
رَّبُّهُمْ
रब उनका
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِهِمْ ۚ
उन्हें
قَالَ
कहा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जो
غَلَبُوا۟
ग़ालिब थे
عَلَىٰٓ
in
أَمْرِهِمْ
उनके मामले में
لَنَتَّخِذَنَّ
अलबत्ता हम ज़रूर बनाऐंगे
عَلَيْهِم
उन पर
مَّسْجِدًۭا
एक सजदागाह
इस तरह हमने लोगों को उनकी सूचना दे दी, ताकि वे जान लें कि अल्लाह का वादा सच्चा है और यह कि क़ियामत की घड़ी में कोई सन्देह नहीं है। वह समय भी उल्लेखनीय है जब वे आपस में उनके मामले में छीन-झपट कर रहे थे। फिर उन्होंने कहा, "उनपर एक भवन बना दे। उनका रब उन्हें भली-भाँति जानता है।" और जो लोग उनके मामले में प्रभावी रहे उन्होंने कहा, "हम तो उनपर अवश्य एक उपासना गृह बनाएँगे।"
तफ़्सीर:
और जिस प्रकार हमने उनके साथ हमारी शक्ति को दर्शाने वाले अद्भुत कार्य किए, जैसे बहुत वर्षों तक उन्हें नींद के आगोश में रखना और उसके बाद उन्हें जगाना, उसी प्रकार हमने उनके शहर के लोगों को उनसे अवगत कर दिया, ताकि उनके शहर के लोगों को पता चल जाए कि अल्लाह का ईमान वालों की मदद करने और मरने के बाद दोबारा जीवित करने का वादा सच्चा है और यह कि क़ियामत आने वाली है, उसके आने में कोई संदेह नहीं है। फिर जब गुफा वालों का मामला प्रकाश में आ गया और उनकी मृत्यु हो गई, तो उनसे अवगत होने वालों के बीच इस बारे में मतभेद हो गया कि : वे उनके संबंध में क्या करें? उनमें से एक समूह ने कहा : उनकी गुफा के द्वार पर एक भवन बना दो, जिससे वे छिपे तथा सुरक्षित रहें। उनका पालनहार उनकी स्थिति के बारे में सबसे अधिक जानता है। क्योंकि उनकी स्थिति की अपेक्षा यह है कि उन्हें अल्लाह के यहाँ विशेष स्थान प्राप्त है। तथा प्रभावशाली लोगों ने, जिनके पास ज्ञान तथा सही दावत नहीं थी, कहा : हम उनके इस स्थान पर उनके सम्मान हेतु तथा उनके स्थान की यादगार के तौर पर एक मस्जिद बनाएँगे।
आयत 22
سَيَقُولُونَ ثَلَـٰثَةٌۭ رَّابِعُهُمْ كَلْبُهُمْ وَيَقُولُونَ خَمْسَةٌۭ سَادِسُهُمْ كَلْبُهُمْ رَجْمًۢا بِٱلْغَيْبِ ۖ وَيَقُولُونَ سَبْعَةٌۭ وَثَامِنُهُمْ كَلْبُهُمْ ۚ قُل رَّبِّىٓ أَعْلَمُ بِعِدَّتِهِم مَّا يَعْلَمُهُمْ إِلَّا قَلِيلٌۭ ۗ فَلَا تُمَارِ فِيهِمْ إِلَّا مِرَآءًۭ ظَـٰهِرًۭا وَلَا تَسْتَفْتِ فِيهِم مِّنْهُمْ أَحَدًۭا
سَيَقُولُونَ
अनक़रीब वो कहेंगे
ثَلَـٰثَةٌۭ
तीन थे
رَّابِعُهُمْ
चौथा उनका
كَلْبُهُمْ
कुत्ता था उनका
وَيَقُولُونَ
और वो कहेंगे
خَمْسَةٌۭ
पाँच थे
سَادِسُهُمْ
छटा उनका
كَلْبُهُمْ
कुत्ता था उनका
رَجْمًۢا
फेंकते हुए (बात)
بِٱلْغَيْبِ ۖ
बिन देखे
وَيَقُولُونَ
और वो कहेंगे
سَبْعَةٌۭ
सात थे
وَثَامِنُهُمْ
और आठवाँ उनका
كَلْبُهُمْ ۚ
कुत्ता था उनका
قُل
कह दीजिए
رَّبِّىٓ
मेरा रब
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِعِدَّتِهِم
तादाद उनकी
مَّا
नहीं
يَعْلَمُهُمْ
जानते उन्हें
إِلَّا
मगर
قَلِيلٌۭ ۗ
थोड़े
فَلَا
तो ना
تُمَارِ
आप झगड़ा कीजिए
فِيهِمْ
उनके बारे में
إِلَّا
मगर
مِرَآءًۭ
झगड़ना
ظَـٰهِرًۭا
सरसरी
وَلَا
और ना
تَسْتَفْتِ
आप पूछिए
فِيهِم
उनके बारे में
مِّنْهُمْ
उनमें से
أَحَدًۭا
किसी एक से
अब वे कहेंगे, "वे तीन थे और उनमें चौथा कुत्ता था।" और वे यह भी कहेंगे, "वे पाँच थे और उनमें छठा उनका कुत्ता था।" यह बिना निशाना देखे पत्थर चलाना है। और वे यह भी कहेंगे, "वे सात थे और उनमें आठवाँ उनका कुत्ता था।" कह दो, "मेरा रब उनकी संख्या को भली-भाँति जानता है।" उनको तो थोड़े ही जानते है। तुम ज़ाहिरी बात के सिवा उनके सम्बन्ध में न झगड़ो और न उनमें से किसी से उनके विषय में कुछ पूछो
तफ़्सीर:
उनकी कहानी के बारे में बातचीत करने वाले कुछ लोग उनकी संख्या के बारे में कहेंगे : वे तीन हैं, उनमें से चौथा उनका कुत्ता है। तथा उनमें से कुछ अन्य लोग कहेंगे : वे पाँच हैं, उनमें से छठा उनका कुत्ता है। जबकि इन दोनों समूहों ने जो कुछ कहा है, वह बिना सबूत के अपने गुमान के अनुसार कहा है। उनमें से कुछ दूसरे लोग कहेंगे : वे सात हैं और उनमें से आठवाँ उनका कुत्ता है। (ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : मेरा पालनहार ही उनकी संख्या बेहतर जानता है, उनकी संख्या केवल कुछ ही लोगों को पता है, जिन्हें अल्लाह ने उनकी संख्या सिखाई है। अतः आप उनकी संख्या या उनकी अन्य स्थितियों के बारे में किताब वालों या अन्य लोगों से सरसरी बहस के अलावा गहरी बहस न करें। इस प्रकार कि आप उसी तक सीमित रहें जो उनके विषय में आपपर वह़्य उतरी है। तथा आप उनमें से किसी से भी उनके मामले के विवरण के बारे में न पूछें, क्योंकि उन्हें इसका ज्ञान नहीं है।
आयत 23
وَلَا تَقُولَنَّ لِشَا۟ىْءٍ إِنِّى فَاعِلٌۭ ذَٰلِكَ غَدًا
وَلَا
और ना
تَقُولَنَّ
हरगिज़ आप कहें
لِشَا۟ىْءٍ
किसी चीज़ के लिए
إِنِّى
कि बेशक मैं
فَاعِلٌۭ
करने वाला हूँ
ذَٰلِكَ
ये
غَدًا
कल
और न किसी चीज़ के विषय में कभी यह कहो, "मैं कल इसे कर दूँगा।"
तफ़्सीर:
और (ऐ नबी) आप हरगिज़ किसी चीज़ के बारे में, जिसे आप कल करना चाहते हों, यह न कहें : मैं कल यह काम करूँगा। क्योंकि आप नहीं जानते कि आप इसे करेंगे, या आपके और उसके बीच कोई बाधा आ जाएगी? यह हर मुसलमान के लिए एक निर्देशन है।
आयत 24
إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ ۚ وَٱذْكُر رَّبَّكَ إِذَا نَسِيتَ وَقُلْ عَسَىٰٓ أَن يَهْدِيَنِ رَبِّى لِأَقْرَبَ مِنْ هَـٰذَا رَشَدًۭا
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
يَشَآءَ
चाहे
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह
وَٱذْكُر
और याद कीजिए
رَّبَّكَ
अपने रब को
إِذَا
जब
نَسِيتَ
भूल जाऐं आप
وَقُلْ
और कह दीजिए
عَسَىٰٓ
उम्मीद है
أَن
कि
يَهْدِيَنِ
रहनुमाई करेगा मेरी
رَبِّى
मेरा रब
لِأَقْرَبَ
क़रीबतर की
مِنْ
than
هَـٰذَا
इससे
رَشَدًۭا
भलाई में
बल्कि अल्लाह की इच्छा ही लागू होती है। और जब तुम भूल जाओ तो अपने रब को याद कर लो और कहो, "आशा है कि मेरा रब इससे भी क़रीब सही बात ही ओर मार्गदर्शन कर दे।"
तफ़्सीर:
परंतु यह कि आप उसके करने को अल्लाह की चाहत के साथ जोड़ दें और यूँ कहें : मैं - इन शा अल्लाह - (यदि अल्लाह चाहे) उसे कल करूँगा। और यदि आप यह कहना भूल जाएँ, तो अपने पालनहार को "इन शा अल्लाह " कह कर याद कर लें और कहें : मुझे आशा है कि मेरा पालनहार मुझे इस मामले से निकटतर मार्गदर्शन और सफलता की राह दिखाएगा।
आयत 25
وَلَبِثُوا۟ فِى كَهْفِهِمْ ثَلَـٰثَ مِا۟ئَةٍۢ سِنِينَ وَٱزْدَادُوا۟ تِسْعًۭا
وَلَبِثُوا۟
और वो ठहरे
فِى
in
كَهْفِهِمْ
अपने ग़ार में
ثَلَـٰثَ
तीन
مِا۟ئَةٍۢ
सौ
سِنِينَ
साल
وَٱزْدَادُوا۟
और उन्होंने ज़्यादा कर दिए
تِسْعًۭا
नौ (साल)
और वे अपनी गुफा में तीन सौ वर्ष रहे और नौ वर्ष उससे अधिक
तफ़्सीर:
और गुफा वाले अपनी गुफा में तीन सौ नौ साल रहे।
आयत 26
قُلِ ٱللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا لَبِثُوا۟ ۖ لَهُۥ غَيْبُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ أَبْصِرْ بِهِۦ وَأَسْمِعْ ۚ مَا لَهُم مِّن دُونِهِۦ مِن وَلِىٍّۢ وَلَا يُشْرِكُ فِى حُكْمِهِۦٓ أَحَدًۭا
قُلِ
कह दीजिए
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِمَا
उसे जो
لَبِثُوا۟ ۖ
वो ठहरे
لَهُۥ
उसी के लिए है
غَيْبُ
ग़ैब
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ ۖ
और ज़मीन का
أَبْصِرْ
How clearly He sees
بِهِۦ
क्या ख़ूब देखने वाला है वो
وَأَسْمِعْ ۚ
और क्या ख़ूब सुनने वाला है
مَا
नहीं
لَهُم
उनके लिए
مِّن
besides Him
دُونِهِۦ
उसके सिवा
مِن
any
وَلِىٍّۢ
कोई दोस्त
وَلَا
और नहीं
يُشْرِكُ
वो शरीक करता
فِى
[in]
حُكْمِهِۦٓ
अपने हुक्म में
أَحَدًۭا
किसी एक को
कह दो, "अल्लाह भली-भाँति जानता है जितना वे ठहरे।" आकाशों और धरती की छिपी बात का सम्बन्ध उसी से है। वह क्या ही देखनेवाला और सुननेवाला है! उससे इतर न तो उनका कोई संरक्षक है और न वह अपने प्रभुत्व और सत्ता में किसी को साझीदार बनाता है
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) आप कह दीजिए : अल्लाह सबसे अधिक जानता है कि वे अपनी गुफा में कितने समय तक ठहरे, तथा उसने हमें बता दिया है कि वे उसमें कितने समय तक रहे। इसलिए उस महिमावान के कथन के बाद किसी अन्य की बात मान्य नहीं। आकाशों तथा धरती की छिपी हुई समस्त चीज़ों को पैदा करना और उनका ज्ञान रखना उसी महिमावान का काम है। वह महिमावान क्या ही खूब देखने वाला है! चुनाँचे वह सब कुछ देखता है। तथा वह क्या ही खूब सुनने वाला है! चुनाँचे वह सब कुछ सुनता है। उसके सिवा उनका कोई सहायक नहीं है, जो उनके मामले को संभाल सके और वह अपने शासन में किसी को साझी नहीं बनाता है। वह अकेला एकमात्र शासक है।
आयत 27
وَٱتْلُ مَآ أُوحِىَ إِلَيْكَ مِن كِتَابِ رَبِّكَ ۖ لَا مُبَدِّلَ لِكَلِمَـٰتِهِۦ وَلَن تَجِدَ مِن دُونِهِۦ مُلْتَحَدًۭا
وَٱتْلُ
और पढ़िए
مَآ
जो
أُوحِىَ
वही किया गया है
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
مِن
of
كِتَابِ
किताब से
رَبِّكَ ۖ
आपके रब की
لَا
नहीं
مُبَدِّلَ
कोई बदलने वाला
لِكَلِمَـٰتِهِۦ
उसके कलिमात को
وَلَن
और हरगिज़ नहीं
تَجِدَ
आप पाऐंगे
مِن
besides Him
دُونِهِۦ
उसके सिवा
مُلْتَحَدًۭا
कोई पनाहगाह
अपने रब की क़िताब, जो कुछ तुम्हारी ओर प्रकाशना (वह्यस) हुई, पढ़ो। कोई नहीं जो उनके बोलो को बदलनेवाला हो और न तुम उससे हटकर क शरण लेने की जगह पाओगे
तफ़्सीर:
और क़ुरआन में से जो कुछ अल्लाह ने आपकी ओर वह़्य की है (ऐ रसूल) आप उसे पढ़ें और उसपर अमल करें। क्योंकि उसकी बातों को कोई बदलने वाला नहीं; इसलिए वे सर्वथा सत्य और सर्वथा न्याय हैं। और आप उस महिमावान् अल्लाह के सिवा हरगिज़ कोई शरण स्थल और पनाह लेने की जगह नहीं पाएँगे, जहाँ आप शरण ले सकें।
आयत 28
وَٱصْبِرْ نَفْسَكَ مَعَ ٱلَّذِينَ يَدْعُونَ رَبَّهُم بِٱلْغَدَوٰةِ وَٱلْعَشِىِّ يُرِيدُونَ وَجْهَهُۥ ۖ وَلَا تَعْدُ عَيْنَاكَ عَنْهُمْ تُرِيدُ زِينَةَ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۖ وَلَا تُطِعْ مَنْ أَغْفَلْنَا قَلْبَهُۥ عَن ذِكْرِنَا وَٱتَّبَعَ هَوَىٰهُ وَكَانَ أَمْرُهُۥ فُرُطًۭا
وَٱصْبِرْ
और रोक रखिए
نَفْسَكَ
अपने नफ़्स को
مَعَ
साथ
ٱلَّذِينَ
उन लोगों के जो
يَدْعُونَ
पुकारते हैं
رَبَّهُم
अपने रब को
بِٱلْغَدَوٰةِ
सुबह
وَٱلْعَشِىِّ
और शाम
يُرِيدُونَ
वो चाहते हैं
وَجْهَهُۥ ۖ
चेहरा उसका
وَلَا
और ना
تَعْدُ
आप फेरिए
عَيْنَاكَ
अपनी दोनों आँखों को
عَنْهُمْ
उनसे
تُرِيدُ
आप चाहते हैं
زِينَةَ
ज़ीनत
ٱلْحَيَوٰةِ
(of) the life
ٱلدُّنْيَا ۖ
दुनिया की ज़िन्दगी की
وَلَا
और ना
تُطِعْ
आप इताअत कीजिए
مَنْ
उसकी जो
أَغْفَلْنَا
ग़ाफ़िल कर दिया हमने
قَلْبَهُۥ
दिल उसका
عَن
of
ذِكْرِنَا
अपने ज़िक्र से
وَٱتَّبَعَ
और उसने पैरवी की
هَوَىٰهُ
अपनी ख़्वाहिश की
وَكَانَ
और है
أَمْرُهُۥ
मामला उसका
فُرُطًۭا
हद से बढ़ा हुआ
अपने आपको उन लोगों के साथ थाम रखो, जो प्रातःकाल और सायंकाल अपने रब को उसकी प्रसन्नता चाहते हुए पुकारते है और सांसारिक जीवन की शोभा की चाह में तुम्हारी आँखें उनसे न फिरें। और ऐसे व्यक्ति की बात न मानना जिसके दिल को हमने अपनी याद से ग़ाफ़िल पाया है और वह अपनी इच्छा और वासना के पीछे लगा हुआ है और उसका मामला हद से आगे बढ़ गया है
तफ़्सीर:
आप अपने आपको उन लोगों के संग रखें, जो निष्ठापूर्वक अपने पालनहार को दिन की शुरुआत और उसके अंत में, इबादत के तौर पर और कुछ माँगने के लिए, पुकारते हैं। तथा आप धन और सम्मान वाले लोगों के साथ बैठने की इच्छा में उनसे अपनी आँखें न फेरें। और आप उसकी बात न मानें, जिसके दिल पर मुहर लगाकर हमने उसे हमारी याद से असावधान कर दिया है। जिसके कारण उसने आपको अपनी बैठक से गरीबों को हटाने का आदेश दिया, और उसने अपने पालनहार की आज्ञाकारिता पर अपनी इच्छा के अनुपालन को प्रधानता दी और उसके सभी कार्य व्यर्थ और बर्बाद हैं।
आयत 29
وَقُلِ ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّكُمْ ۖ فَمَن شَآءَ فَلْيُؤْمِن وَمَن شَآءَ فَلْيَكْفُرْ ۚ إِنَّآ أَعْتَدْنَا لِلظَّـٰلِمِينَ نَارًا أَحَاطَ بِهِمْ سُرَادِقُهَا ۚ وَإِن يَسْتَغِيثُوا۟ يُغَاثُوا۟ بِمَآءٍۢ كَٱلْمُهْلِ يَشْوِى ٱلْوُجُوهَ ۚ بِئْسَ ٱلشَّرَابُ وَسَآءَتْ مُرْتَفَقًا
وَقُلِ
और कह दीजिए
ٱلْحَقُّ
हक़
مِن
(is) from
رَّبِّكُمْ ۖ
तुम्हारे रब की तरफ़ से है
فَمَن
तो जो
شَآءَ
चाहे
فَلْيُؤْمِن
पस वो ईमान ले आए
وَمَن
और जो
شَآءَ
चाहे
فَلْيَكْفُرْ ۚ
पस वो कुफ़्र करे
إِنَّآ
बेशक हम
أَعْتَدْنَا
तैयार कर रखी है हमने
لِلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों के लिए
نَارًا
ऐसी आग
أَحَاطَ
घेर लेंगी
بِهِمْ
उन्हें
سُرَادِقُهَا ۚ
क़नातें (लपटें) उसकी
وَإِن
और अगर
يَسْتَغِيثُوا۟
वो फ़रियाद करेंगे
يُغَاثُوا۟
फ़रियादरसी किए जाऐंगे
بِمَآءٍۢ
साथ पानी के
كَٱلْمُهْلِ
मानिन्द तेल की तिलछट के
يَشْوِى
जो भून डालेगा
ٱلْوُجُوهَ ۚ
चेहरों को
بِئْسَ
कितनी बुरी है
ٱلشَّرَابُ
पीने की चीज़
وَسَآءَتْ
और कितनी बुरी है
مُرْتَفَقًا
आरामग़ाह
कह दो, "वह सत्य है तुम्हारे रब की ओर से। तो अब जो कोई चाहे माने और जो चाहे इनकार कर दे।" हमने तो अत्याचारियों के लिए आग तैयार कर रखी है, जिसकी क़नातों ने उन्हें घेर लिया है। यदि वे फ़रियाद करेंगे तो फ़रियाद के प्रत्युत्तर में उन्हें ऐसा पानी मिलेगा जो तेल की तलछट जैसा होगा; वह उनके मुँह भून डालेगा। बहुत ही बुरा है वह पेय और बहुत ही बुरा है वह विश्रामस्थल!
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आप इन लोगों से, जो अपने हृदय की लापरवाही के कारण अल्लाह की याद से गाफ़िल हैं, कह दीजिए : मैं तुम्हारे पास जो कुछ लेकर आया हूँ, वह सत्य है। और वह अल्लाह की ओर से है, मेरी ओर से नहीं। और मैं तुम्हारी यह माँग स्वीकार करने वाला नहीं कि मैं ईमान वालों को निष्कासित कर दूँ। अब तुम में से जो इस सच्चाई पर ईमान लाना चाहे, वह उसपर ईमान ले आए और वह उसके प्रतिफल से प्रसन्न होगा। और तुम में से जो उसपर विश्वास न करना चाहे, वह विश्वास न करे और शीघ्र ही वह उस दंड से दुखी होगा जो उसकी प्रतीक्षा कर रहा है। हमने कुफ़्र अपनाकर स्वयं पर अत्याचार करने वाले लोगों के लिए भयानक आग तैयार कर रखी है, जिसकी दीवारें उन्हें घेरी हुई होंगी। इसलिए वे उससे भाग नहीं सकेंगे। अगर वे अपनी प्यास की तीव्रता के कारण पानी की फ़र्याद करेंगे, तो उन्हें तलछट जैसा बहुत गर्म पानी दिया जाएगा, जिसकी गर्मी की तीव्रता के कारण उनके चेहरे भुन जाएँगे। क्या बुरा है वह पेय जो उन्हें दिया जाएगा। क्योंकि वह प्यास नहीं बुझाएगा, बल्कि उसे और बढ़ा देगा। तथा वह उस लपट को भी नहीं बुझाएगा जो उनकी खाल उधेड़ रही होगी। जहन्नम क्या ही बुरा घर है जहाँ वे उतरेंगे और क्या ही बुरा ठिकाना है जिसमें वे ठहरेंगे।
आयत 30
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ إِنَّا لَا نُضِيعُ أَجْرَ مَنْ أَحْسَنَ عَمَلًا
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
إِنَّا
बेशक हम
لَا
will not let go waste
نُضِيعُ
नहीं हम ज़ाया करते
أَجْرَ
अजर
مَنْ
उसका जो
أَحْسَنَ
अच्छा करे
عَمَلًا
अमल
रहे वे लोग जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, तो निश्चय ही किसी ऐसे व्यक्ति का प्रतिदान जिसने अच्छे कर्म किया हो, हम अकारथ नहीं करते
तफ़्सीर:
निःसंदेह जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए और नेक कार्य किए, उन्होंने अच्छा काम किया है। इसलिए उनके लिए बहुत बड़ा प्रतिफल है। निःसंदेह हम अच्छे कर्म करने वाले लोगों का बदला व्यर्थ नहीं करते, बल्कि उन्हें कोई कमी किए बिना पूरा-पूरा बदला देते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दुनिया की ज़िंदगी की मिसाल का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि दुनिया की ज़िंदगी बारिश के बाद उगी हरियाली जैसी अस्थायी है, इसमें ग़ुरूर नहीं करना चाहिए।
आयत 31
أُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمْ جَنَّـٰتُ عَدْنٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهِمُ ٱلْأَنْهَـٰرُ يُحَلَّوْنَ فِيهَا مِنْ أَسَاوِرَ مِن ذَهَبٍۢ وَيَلْبَسُونَ ثِيَابًا خُضْرًۭا مِّن سُندُسٍۢ وَإِسْتَبْرَقٍۢ مُّتَّكِـِٔينَ فِيهَا عَلَى ٱلْأَرَآئِكِ ۚ نِعْمَ ٱلثَّوَابُ وَحَسُنَتْ مُرْتَفَقًۭا
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
لَهُمْ
उनके लिए
جَنَّـٰتُ
बाग़ात हैं
عَدْنٍۢ
हमेशगी के
تَجْرِى
बहती हैं
مِن
from
تَحْتِهِمُ
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
يُحَلَّوْنَ
वो पहनाए जाऐंगे
فِيهَا
उनमें
مِنْ
[of] (with)
أَسَاوِرَ
कंगन
مِن
of
ذَهَبٍۢ
सोने के
وَيَلْبَسُونَ
और वो पहनेंगे
ثِيَابًا
लिबास
خُضْرًۭا
सब्ज़
مِّن
of
سُندُسٍۢ
बारीक रेशम के
وَإِسْتَبْرَقٍۢ
और मोटे रेशम के
مُّتَّكِـِٔينَ
तकिया लगाए होंगे
فِيهَا
उनमें
عَلَى
on
ٱلْأَرَآئِكِ ۚ
तख़्तों पर
نِعْمَ
कितना अच्छा है
ٱلثَّوَابُ
बदला
وَحَسُنَتْ
और कितनी अच्छी है
مُرْتَفَقًۭا
आरामगाह
ऐसे ही लोगों के लिए सदाबहार बाग़ है। उनके नीचे नहरें बह रही होंगी। वहाँ उन्हें सोने के कंगन पहनाए जाएँगे और वे हरे पतले और गाढ़े रेशमी कपड़े पहनेंगे और ऊँचे तख़्तों पर तकिया लगाए होंगे। क्या ही अच्छा बदला है और क्या ही अच्छा विश्रामस्थल!
तफ़्सीर:
ईमान एवं अच्छे कार्य करने की विशेषताओं से विशिष्ट इन लोगों के लिए हमेशा के लिए निवास करने के लिए बगीचे हैं, उनके महलों के नीचे से स्वर्ग की मीठी नहरें बहती हैं। वे वहाँ सोने के कंगनों से सुशोभित किए जाएँगे तथा पतले और मोटे रेशम से बने हरे कपड़े पहनेंगे। वे सुंदर पर्दों से सजाए गए बिस्तरों पर टेक लगाए बैठे होंगे। उनका प्रतिफल बहुत अच्छा है और जन्नत उनके लिए निवास करने के लिए एक बेहतरीन घर और ठिकाना है।
आयत 32
۞ وَٱضْرِبْ لَهُم مَّثَلًۭا رَّجُلَيْنِ جَعَلْنَا لِأَحَدِهِمَا جَنَّتَيْنِ مِنْ أَعْنَـٰبٍۢ وَحَفَفْنَـٰهُمَا بِنَخْلٍۢ وَجَعَلْنَا بَيْنَهُمَا زَرْعًۭا
۞ وَٱضْرِبْ
और बयान कीजिए
لَهُم
उनके लिए
مَّثَلًۭا
मिसाल
رَّجُلَيْنِ
दो आदमियों की
جَعَلْنَا
बनाए हमने
لِأَحَدِهِمَا
उन दोनों में से एक के
جَنَّتَيْنِ
दो बाग़
مِنْ
of
أَعْنَـٰبٍۢ
अँगूरों के
وَحَفَفْنَـٰهُمَا
और घेर लिया हमने उन दोनों को
بِنَخْلٍۢ
खजूर के दरख़्तों से
وَجَعَلْنَا
और बनाए हमने
بَيْنَهُمَا
दर्मियान उन दोनों के
زَرْعًۭا
खेत
उनके समक्ष एक उपमा प्रस्तुत करो, दो व्यक्ति है। उनमें से एक को हमने अंगूरों के दो बाग़ दिए और उनके चारों ओर हमने खजूरो के वृक्षो की बाड़ लगाई और उन दोनों के बीच हमने खेती-बाड़ी रखी
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आप (उनके सामने) दो व्यक्तियों का उदाहरण दें, जिनमें से एक काफ़िर और दूसरा मोमिन था। हमने उनमें से काफ़िर के लिए अंगूर के दो बाग़ बनाए। और हमने दोनों बाग़ों को खजूर के पेड़ों से घेर दिया, तथा हमने उनके खाली क्षेत्र में फसलें उगाईं।
आयत 33
كِلْتَا ٱلْجَنَّتَيْنِ ءَاتَتْ أُكُلَهَا وَلَمْ تَظْلِم مِّنْهُ شَيْـًۭٔا ۚ وَفَجَّرْنَا خِلَـٰلَهُمَا نَهَرًۭا
كِلْتَا
दोनों
ٱلْجَنَّتَيْنِ
बाग़ों ने
ءَاتَتْ
दिया
أُكُلَهَا
फल अपना
وَلَمْ
और ना
تَظْلِم
कमी की
مِّنْهُ
उसमें
شَيْـًۭٔا ۚ
कुछ भी
وَفَجَّرْنَا
और जारी कर दी हमने
خِلَـٰلَهُمَا
उन दोनों के बीच
نَهَرًۭا
एक नहर
दोनों में से प्रत्येक बाग़ अपने फल लाया और इसमें कोई कमी नहीं की। और उन दोनों के बीच हमने एक नहर भी प्रवाहित कर दी
तफ़्सीर:
प्रत्येक बगीचे ने अपने फल दिए, जिसमें खजूर, अंगूर और फसलें शामिल थीं। और उसमें से कुछ भी कम नहीं किया, बल्कि पूरा-पूरा फल दिया। तथा हमने उन्हें आसानी से पानी देने के लिए उनके बीच एक नहर जारी कर दी।
आयत 34
وَكَانَ لَهُۥ ثَمَرٌۭ فَقَالَ لِصَـٰحِبِهِۦ وَهُوَ يُحَاوِرُهُۥٓ أَنَا۠ أَكْثَرُ مِنكَ مَالًۭا وَأَعَزُّ نَفَرًۭا
وَكَانَ
और हुआ
لَهُۥ
उसके लिए
ثَمَرٌۭ
फल
فَقَالَ
तो उसने कहा
لِصَـٰحِبِهِۦ
अपने साथी से
وَهُوَ
जब कि वो
يُحَاوِرُهُۥٓ
वो उससे बात चीत कर रहा था
أَنَا۠
मैं
أَكْثَرُ
ज़्यादा हूँ
مِنكَ
तुझसे
مَالًۭا
माल में
وَأَعَزُّ
और ज़्यादा इज़्ज़त वाला हूँ
نَفَرًۭا
जत्थे में
उसे ख़ूब फल और पैदावार प्राप्त हुई। इसपर वह अपने साथी से, जबकि वह उससे बातचीत कर रहा था, कहने लगा, "मैं तुझसे माल और दौलत में बढ़कर हूँ और मुझे जनशक्ति भी अधिक प्राप्त है।"
तफ़्सीर:
और इन दो बाग़ों के मालिक के पास अन्य धन और फल भी थे। चुनाँचे उसने गर्व करते हुए अपने मोमिन साथी से, जबकि वह उसे प्रभावित करने के लिए उससे संबोधित था, कहा : मैं तुमसे अधिक धनवान, तुमसे बढ़कर सम्मान वाला और तुमसे ज़्यादा शक्तिशाली बिरादरी वाला हूँ।
आयत 35
وَدَخَلَ جَنَّتَهُۥ وَهُوَ ظَالِمٌۭ لِّنَفْسِهِۦ قَالَ مَآ أَظُنُّ أَن تَبِيدَ هَـٰذِهِۦٓ أَبَدًۭا
وَدَخَلَ
और वो दाख़िल हुआ
جَنَّتَهُۥ
अपने बाग़ में
وَهُوَ
इस हाल में कि वो
ظَالِمٌۭ
ज़ुल्म करने वाला था
لِّنَفْسِهِۦ
अपनी जान पर
قَالَ
कहने लगा
مَآ
नहीं
أَظُنُّ
मैं गुमान करता
أَن
कि
تَبِيدَ
बर्बाद होगा
هَـٰذِهِۦٓ
ये (बाग़)
أَبَدًۭا
कभी भी
वह अपने हकड में ज़ालिम बनकर बाग़ में प्रविष्ट हुआ। कहने लगा, "मैं ऐसा नहीं समझता कि वह कभी विनष्ट होगा
तफ़्सीर:
और उस काफ़िर ने ईमान वाले के साथ अपने बाग़ में प्रवेश किया, ताकि उसे अपना बाग़ दिखाए, जबकि वह कुफ़्र और गर्व के द्वारा अपने आप पर अत्याचार करने वाला था। काफ़िर ने कहा : मुझे नहीं लगता कि यह बाग़ जो तुम देख रहे हो, नष्ट हो जाएगा। क्योंकि मैंने उसके बाकी रहने के कारण अपना लिए हैं।
आयत 36
وَمَآ أَظُنُّ ٱلسَّاعَةَ قَآئِمَةًۭ وَلَئِن رُّدِدتُّ إِلَىٰ رَبِّى لَأَجِدَنَّ خَيْرًۭا مِّنْهَا مُنقَلَبًۭا
وَمَآ
और नहीं
أَظُنُّ
मैं गुमान करता कि
ٱلسَّاعَةَ
क़यामत
قَآئِمَةًۭ
क़ायम होने वाली है
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
رُّدِدتُّ
मैं लौटाया गया
إِلَىٰ
to
رَبِّى
तरफ़ अपने रब के
لَأَجِدَنَّ
अलबत्ता मैं ज़रूर पाऊँगा
خَيْرًۭا
बेहतर
مِّنْهَا
उससे
مُنقَلَبًۭا
लौटने की जगह/अंजाम
और मैं नहीं समझता कि वह (क़ियामत की) घड़ी कभी आएगी। और यदि मैं वास्तव में अपने रब के पास पलटा भी तो निश्चय ही पलटने की जगह इससे भी उत्तम पाऊँगा।"
तफ़्सीर:
मुझे नहीं लगता कि क़ियामत आने वाली है। बल्कि यह एक निरंतर जीवन है। और यह मानते हुए कि वह आ ही गई, तो जब मैं पुनर्जीवित किया जाऊँगा और अपने पालनहार की ओर लौटाया जाऊँगा, तो पुनर्जीवन के बाद मैं जिसकी ओर लौटूँगा उसे अपने इस बाग़ से उत्तम पाऊँगा। क्योंकि इस दुनया में मेरे समृद्ध होने की अपेक्षा यह है कि मैं पुनर्जीवन के बाद भी समृद्ध होऊँ।
आयत 37
قَالَ لَهُۥ صَاحِبُهُۥ وَهُوَ يُحَاوِرُهُۥٓ أَكَفَرْتَ بِٱلَّذِى خَلَقَكَ مِن تُرَابٍۢ ثُمَّ مِن نُّطْفَةٍۢ ثُمَّ سَوَّىٰكَ رَجُلًۭا
قَالَ
कहा
لَهُۥ
उसे
صَاحِبُهُۥ
उसके साथी ने
وَهُوَ
जब कि वो
يُحَاوِرُهُۥٓ
वो उससे बात चीत कर रहा था
أَكَفَرْتَ
क्या इन्कार करता है तू
بِٱلَّذِى
उसका जिसने
خَلَقَكَ
पैदा किया तुझे
مِن
from
تُرَابٍۢ
मिट्टी से
ثُمَّ
फिर
مِن
from
نُّطْفَةٍۢ
नुत्फ़े से
ثُمَّ
फिर
سَوَّىٰكَ
दुरुस्त बनाया तुझे
رَجُلًۭا
एक मर्द
उसके साथी ने उससे बातचीत करते हुए कहा, "क्या तू उस सत्ता के साथ कुफ़्र करता है जिसने तुझे मिट्टी से, फिर वीर्य से पैदा किया, फिर तुझे एक पूरा आदमी बनाया?
तफ़्सीर:
उसके मोमिन साथी ने उसकी बात का उत्तर देते हुए उससे कहा : क्या तूने उस अस्तित्व के साथ क़ुफ़्र किया, जिसने तेरे पिता आदम को मिट्टी से पैदा किया, फिर तुझे वीर्य से पैदा किया, फिर तुझे एक पुरुष बनाया, औ तेरे अंगों को ठीक-ठीक किया और तुझे परिपूर्ण बनाया? क्योंकि जो इन सभी चीज़ों को कर सकता है, वह तुझे पुनः जीवित करने में भी सक्षम है।
आयत 38
لَّـٰكِنَّا۠ هُوَ ٱللَّهُ رَبِّى وَلَآ أُشْرِكُ بِرَبِّىٓ أَحَدًۭا
لَّـٰكِنَّا۠
लेकिन
هُوَ
वो
ٱللَّهُ
अल्लाह
رَبِّى
मेरा रब है
وَلَآ
और नहीं
أُشْرِكُ
मैं शरीक ठहराता
بِرَبِّىٓ
साथ अपने रब के
أَحَدًۭا
किसी एक को
लेकिन मेरा रब तो वही अल्लाह है और मैं किसी को अपने रब के साथ साझीदार नहीं बनाता
तफ़्सीर:
लेकिन मैं यह बात नहीं कहता, बल्कि मैं कहता हूँ : वह महिमावान् अल्लाह ही मेरा पालनहार है, जिसने अपनी नेमतों के द्वारा हम पर उपकार किया, और मैं इबादत में किसी को भी उसका साझी नहीं बनाता।
आयत 39
وَلَوْلَآ إِذْ دَخَلْتَ جَنَّتَكَ قُلْتَ مَا شَآءَ ٱللَّهُ لَا قُوَّةَ إِلَّا بِٱللَّهِ ۚ إِن تَرَنِ أَنَا۠ أَقَلَّ مِنكَ مَالًۭا وَوَلَدًۭا
وَلَوْلَآ
और क्यों ना
إِذْ
जब
دَخَلْتَ
दाख़िल हुआ तू
جَنَّتَكَ
अपने बाग़ में
قُلْتَ
कहा तूने
مَا
जो
شَآءَ
चाहा
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
لَا
(there is) no
قُوَّةَ
नहीं कोई क़ुव्वत
إِلَّا
मगर
بِٱللَّهِ ۚ
अल्लाह की (तौफ़ीक़) से
إِن
अगर
تَرَنِ
तू देखता है मुझे
أَنَا۠
कि मैं
أَقَلَّ
कमतर हूँ
مِنكَ
तुझसे
مَالًۭا
माल में
وَوَلَدًۭا
और औलाद में
और ऐसा क्यों न हुआ कि जब तूने अपने बाग़ में प्रवेश किया तो कहता, 'जो अल्लाह चाहे, बिना अल्लाह के कोई शक्ति नहीं?' यदि तू देखता है कि मैं धन और संतति में तुझसे कम हूँ,
तफ़्सीर:
और जब तूने अपने बाग़ में प्रवेश किया, तो तूने यह क्यों नहीं कहा : जो अल्लाह ने चाहा, अल्लाह की मदद के बिना किसी के लिए कोई शक्ति नहीं है। क्योंकि वही है, जो वह चाहता है, करता है और वह सर्वशक्तिमान् है। यदि तू मुझे अपने से ज़्यादा ग़रीब और संतान में कमतर देखता है।
आयत 40
فَعَسَىٰ رَبِّىٓ أَن يُؤْتِيَنِ خَيْرًۭا مِّن جَنَّتِكَ وَيُرْسِلَ عَلَيْهَا حُسْبَانًۭا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ فَتُصْبِحَ صَعِيدًۭا زَلَقًا
فَعَسَىٰ
तो उम्मीद है
رَبِّىٓ
मेरा रब
أَن
कि
يُؤْتِيَنِ
वो दे दे मुझे
خَيْرًۭا
बेहतर
مِّن
than
جَنَّتِكَ
तेरे बाग़ से
وَيُرْسِلَ
और वो भेजे
عَلَيْهَا
उस पर
حُسْبَانًۭا
कोई अज़ाब
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
فَتُصْبِحَ
तो वो हो जाए
صَعِيدًۭا
मैदान
زَلَقًا
साफ़/चटियल
तो आशा है कि मेरा रब मुझे तेरे बाग़ से अच्छा प्रदान करें और तेरे इस बाग़ पर आकाश से कोई क़ुर्क़ी (आपदा) भेज दे। फिर वह साफ़ मैदान होकर रह जाए
तफ़्सीर:
मुझे आशा है कि अल्लाह मुझे तुम्हारे बाग़ से अच्छा प्रदान करे और तुम्हारे बाग़ पर आकाश से कोई अज़ाब भेज दे। फिर तुम्हारा बाग़ एक ऐसी भूमि बन जाए, जहाँ कोई वनस्पति न हो, जिसमें उसकी चिकनाहट के कारण पैर फिसलते हों।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दो बाग़ों वाले शख्स के घमंड का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि माली कामयाबी पर घमंड करना और अल्लाह को भूल जाना आखिरकार नुकसान का सबब बनता है।
आयत 41
أَوْ يُصْبِحَ مَآؤُهَا غَوْرًۭا فَلَن تَسْتَطِيعَ لَهُۥ طَلَبًۭا
أَوْ
या
يُصْبِحَ
हो जाए
مَآؤُهَا
पानी उसका
غَوْرًۭا
गहरा
فَلَن
तो हरगिज़ नहीं
تَسْتَطِيعَ
तुम इस्तिताअत रखोगे
لَهُۥ
उसे
طَلَبًۭا
तलाश करने की
या उसका पानी बिलकुल नीचे उतर जाए। फिर तू उसे ढूँढ़कर न ला सके।"
तफ़्सीर:
अथवा उसका पानी धरती की गहराई में चला जाए। फिर तुम किसी भी तरह से उस तक नहीं पहुँच सकते हो। और अगर उसका पानी नीचे चला गया, तो वह बाकी नहीं रह सकती।
आयत 42
وَأُحِيطَ بِثَمَرِهِۦ فَأَصْبَحَ يُقَلِّبُ كَفَّيْهِ عَلَىٰ مَآ أَنفَقَ فِيهَا وَهِىَ خَاوِيَةٌ عَلَىٰ عُرُوشِهَا وَيَقُولُ يَـٰلَيْتَنِى لَمْ أُشْرِكْ بِرَبِّىٓ أَحَدًۭا
وَأُحِيطَ
और घेर लिया गया
بِثَمَرِهِۦ
फल उसका
فَأَصْبَحَ
तो उसने सुबह की
يُقَلِّبُ
वो मलता था
كَفَّيْهِ
अपनी दोनों हथेलियाँ
عَلَىٰ
उस पर
مَآ
जो
أَنفَقَ
उसने ख़र्च किया था
فِيهَا
उसमें
وَهِىَ
और वो (बाग़)
خَاوِيَةٌ
गिरा पड़ा था
عَلَىٰ
on
عُرُوشِهَا
अपनी छतों पर
وَيَقُولُ
और वो कह रहा था
يَـٰلَيْتَنِى
ऐ काश कि मैं
لَمْ
ना
أُشْرِكْ
मैं शरीक करता
بِرَبِّىٓ
साथ अपने रब के
أَحَدًۭا
किसी एक को
हुआ भी यही कि उसका सारा फल घिराव में आ गया। उसने उसमें जो कुछ लागत लगाई थी, उसपर वह अपनी हथेलियों को नचाता रह गया. और स्थिति यह थी कि बाग़ अपनी टट्टियों पर हा पड़ा था और वह कह रहा था, "क्या ही अच्छा होता कि मैंने अपने रब के साथ किसी को साझीदार न बनाया होता!"
तफ़्सीर:
उस मोमिन व्यक्ति ने जो आशा व्यक्त की थी, वह पूरी हो गई। चुनाँचे उस काफ़िर के बाग़ के फलों को विनाश ने घेर लिया। फिर वह काफ़िर अपने बाग़ के बनाने और मरम्मत के लिए खर्च किए गए धन पर अफ़सोस के मारे हाथ मलने लगा। जबकि वह बाग़ उन छप्परों पर गिरा पड़ा था, जिनपर अंगूर की बेलों को फैलाया जाता है। और वह कहता था : काश मैं अपने अकेले पालनहार पर ईमान लाया होता और इबादत में उसके साथ किसी को साझी न बनाता।
आयत 43
وَلَمْ تَكُن لَّهُۥ فِئَةٌۭ يَنصُرُونَهُۥ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَمَا كَانَ مُنتَصِرًا
وَلَمْ
और ना
تَكُن
थे
لَّهُۥ
उसके लिए
فِئَةٌۭ
जमाअत (के लोग)
يَنصُرُونَهُۥ
जो मदद करते उसकी
مِن
other than
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَمَا
और ना
كَانَ
था वो
مُنتَصِرًا
बदला लेने वाला
उसका कोई जत्था न हुआ जो उसके और अल्लाह के बीच पड़कर उसकी सहायता करता और न उसे स्वयं बदला लेने की सामर्थ्य प्राप्त थी
तफ़्सीर:
इस काफ़िर के पास उसे उसपर उतरने वाले दंड से बचाने के लिए कोई समूह नहीं था, जबकि वह अपने समूह पर गर्व कर रहा था। और वह स्वयं भी अल्लाह के उसके बाग़ को विनष्ट करने से बचने वाला न था।
आयत 44
هُنَالِكَ ٱلْوَلَـٰيَةُ لِلَّهِ ٱلْحَقِّ ۚ هُوَ خَيْرٌۭ ثَوَابًۭا وَخَيْرٌ عُقْبًۭا
هُنَالِكَ
वहाँ
ٱلْوَلَـٰيَةُ
सारा इख़्तियार
لِلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
ٱلْحَقِّ ۚ
जो सच्चा है
هُوَ
वो
خَيْرٌۭ
बेहतर है
ثَوَابًۭا
बदला (देने में)
وَخَيْرٌ
और बेहतर है
عُقْبًۭا
अंजाम के ऐतबार से
ऐसे अवसर पर काम बनाने का सारा अधिकार परम सत्य अल्लाह ही को प्राप्त है। वही बदला देने में सबसे अच्छा है और वही अच्छा परिणाम दिखाने की स्पष्ट से भी सर्वोत्तम है
तफ़्सीर:
उस स्थिति में, सहायता करना केवल अल्लाह के अधिकार में है। वह अपने ईमान वाले मित्रों को सबसे उत्तम बदला देने वाला है, क्योंकि वह उनके प्रतिफल को कई गुना बढ़ा देता है, तथा वह उनके लिए अंजाम के एतिबार से भी सबसे अच्छा है।
आयत 45
وَٱضْرِبْ لَهُم مَّثَلَ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا كَمَآءٍ أَنزَلْنَـٰهُ مِنَ ٱلسَّمَآءِ فَٱخْتَلَطَ بِهِۦ نَبَاتُ ٱلْأَرْضِ فَأَصْبَحَ هَشِيمًۭا تَذْرُوهُ ٱلرِّيَـٰحُ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ مُّقْتَدِرًا
وَٱضْرِبْ
और बयान कीजिए
لَهُم
उनके लिए
مَّثَلَ
मिसाल
ٱلْحَيَوٰةِ
(of) the life
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की ज़िन्दगी की
كَمَآءٍ
जैसे पानी
أَنزَلْنَـٰهُ
उतारा हमने उसे
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
فَٱخْتَلَطَ
तो मिल जुल गईं
بِهِۦ
साथ उसके
نَبَاتُ
नबातात
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन की
فَأَصْبَحَ
तो वो हो गईं
هَشِيمًۭا
चूरा-चूरा
تَذْرُوهُ
बिखेरती हैं उसे
ٱلرِّيَـٰحُ ۗ
हवाऐं
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
مُّقْتَدِرًا
क़ुदरत रखने वाला है
और उनके समक्ष सांसारिक जीवन की उपमा प्रस्तुत करो, यह ऐसी है जैसे पानी हो, जिसे हमने आकाश से उतारा तो उससे धरती की पौध घनी होकर परस्पर गुँथ गई। फिर वह चूरा-चूरा होकर रह गई, जिसे हवाएँ उड़ाए लिए फिरती है। अल्लाह को तो हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) दुनिया के धोखे में पड़े हुए लोगों को (सांसारिक जीवन का) एक उदाहरण दें। चुनाँचे दुनिया का उदाहरण उसके नष्ट होने और जल्दी समाप्त होने में, उस बारिश के पानी की तरह है, जिसे हमने आकाश से उतारा। फिर उस जल से धरती के पौधे उगे और पक गए। फिर वह पौधा टूटकर चूरा-चूरा बन गया। हवाएँ जिसके हिस्सों को अन्य क्षेत्रों में उड़ा ले जाती हैं। फिर धरती वापस वैसी ही हो जाती है जैसी पहले थी। और अल्लाह हर चीज़ का सामर्थ्य रखने वाला है। उसे कोई चीज़ विवश नहीं कर सकती। इसलिए वह जो चाहता है, जीवित रखता है और जो चाहता है, नष्ट कर देता है।
आयत 46
ٱلْمَالُ وَٱلْبَنُونَ زِينَةُ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۖ وَٱلْبَـٰقِيَـٰتُ ٱلصَّـٰلِحَـٰتُ خَيْرٌ عِندَ رَبِّكَ ثَوَابًۭا وَخَيْرٌ أَمَلًۭا
ٱلْمَالُ
माल
وَٱلْبَنُونَ
और बेटे
زِينَةُ
ज़ीनत हैं
ٱلْحَيَوٰةِ
(of) the life
ٱلدُّنْيَا ۖ
दुनिया की ज़िन्दगी की
وَٱلْبَـٰقِيَـٰتُ
और बाक़ी रहने वाली
ٱلصَّـٰلِحَـٰتُ
नेकियाँ
خَيْرٌ
बेहतर हैं
عِندَ
near
رَبِّكَ
आपके रब के नज़दीक
ثَوَابًۭا
सवाब के ऐतबार से
وَخَيْرٌ
और बेहतर है
أَمَلًۭا
उम्मीद के ऐतबार से
माल और बेटे तो केवल सांसारिक जीवन की शोभा है, जबकि बाक़ी रहनेवाली नेकियाँ ही तुम्हारे रब के यहाँ परिणाम की दृष्टि से भी उत्तम है और आशा की दृष्टि से भी वही उत्तम है
तफ़्सीर:
धन और संतान सांसारिक जीवन की शोभा हैं। और आखिरत में धन का कोई लाभ नहीं है जब तक कि उसे अल्लाह को प्रसन्न करने वाले काम में न खर्च किया जाए। तथा अल्लाह के निकट पसंदीदा कार्य और बातें, सवाब की दृष्टि से, संसार की सभी शोभाओं से उत्तम हैं। और वे सबसे उत्तम वस्तु हैं, जिनकी इनसान आशा करता है। क्योंकि दुनिया की शोभा नश्वर है, जबकि अल्लाह के निकट पसंदीदा कामों और बातों का सवाब बाक़ी रहने वाला है।
आयत 47
وَيَوْمَ نُسَيِّرُ ٱلْجِبَالَ وَتَرَى ٱلْأَرْضَ بَارِزَةًۭ وَحَشَرْنَـٰهُمْ فَلَمْ نُغَادِرْ مِنْهُمْ أَحَدًۭا
وَيَوْمَ
और जिस दिन
نُسَيِّرُ
हम चलाऐंगे
ٱلْجِبَالَ
पहाड़ों को
وَتَرَى
और आप देखेंगे
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
بَارِزَةًۭ
खुली हुई/अयाँ
وَحَشَرْنَـٰهُمْ
और इकट्ठा कर लेंगे हम उन्हें
فَلَمْ
फिर नहीं
نُغَادِرْ
हम छोड़ेंगे
مِنْهُمْ
उनमें से
أَحَدًۭا
किसी एक को
जिस दिन हम पहाड़ों को चलाएँगे और तुम धरती को बिलकुल नग्न देखोगे और हम उन्हें इकट्ठा करेंगे तो उनमें से किसी एक को भी न छोड़ेंगे
तफ़्सीर:
और उस दिन को याद करो, जब हम पर्वतों को उनके स्थानों से हटा देंगे। और तुम धरती को साफ़ और खुला मैदान देखोगे, क्योंकि उस पर उपस्थित पहाड़, पेड़ और इमारत सब गायब हो जाएँगे। और हम सभी प्राणियों को इकट्ठा कर लेंगे। चुनाँचे हम उनमें से किसी को भी नहीं छोड़ेंगे, जिसे हमने पुनर्जीवित करके उठाया न हो।
आयत 48
وَعُرِضُوا۟ عَلَىٰ رَبِّكَ صَفًّۭا لَّقَدْ جِئْتُمُونَا كَمَا خَلَقْنَـٰكُمْ أَوَّلَ مَرَّةٍۭ ۚ بَلْ زَعَمْتُمْ أَلَّن نَّجْعَلَ لَكُم مَّوْعِدًۭا
وَعُرِضُوا۟
और वो पेश किए जाऐंगे
عَلَىٰ
before
رَبِّكَ
आपके रब पर
صَفًّۭا
सफ़ दर सफ़
لَّقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
جِئْتُمُونَا
आ गए तुम हमारे पास
كَمَا
जैसा कि
خَلَقْنَـٰكُمْ
पैदा किया था हमने तुम्हें
أَوَّلَ
पहली
مَرَّةٍۭ ۚ
बार/मर्तबा
بَلْ
बल्कि
زَعَمْتُمْ
गुमान किया तुमने
أَلَّن
कि हरगिज़ नहीं
نَّجْعَلَ
हम बनाऐंगे
لَكُم
तुम्हारे लिए
مَّوْعِدًۭا
कोई वादे का वक़्त/जगह
वे तुम्हारे रब के सामने पंक्तिबद्ध उपस्थित किए जाएँगे - "तुम हमारे सामने आ पहुँचे, जैसा हमने तुम्हें पहली बार पैदा किया था। नहीं, बल्कि तुम्हारा तो यह दावा था कि हम तुम्हारे लिए वादा किया हुआ कोई समय लाएँगे ही नहीं।"
तफ़्सीर:
और लोग आपके पालनहार के समक्ष पंक्तियों में प्रस्तुत किए जाएँगे, तो वह उनका हिसाब लेगा। और उनसे कहा जाएगा : तुम हमारे पास वैसे ही अकेले, नंगे पैर, नंगे शरीर और बिना ख़तना के आए हो, जैसे हमने तुम्हें पहली बार पैदा किया था। लेकिन तुम तो यह सोचते थे कि तुम कभी पुनर्जीवित नहीं किए जाओगे और हम तुम्हें तुम्हारे कर्मों का बदला देने के लिए कभी कोई समय और स्थान निर्धारित नहीं करेंगे।
आयत 49
وَوُضِعَ ٱلْكِتَـٰبُ فَتَرَى ٱلْمُجْرِمِينَ مُشْفِقِينَ مِمَّا فِيهِ وَيَقُولُونَ يَـٰوَيْلَتَنَا مَالِ هَـٰذَا ٱلْكِتَـٰبِ لَا يُغَادِرُ صَغِيرَةًۭ وَلَا كَبِيرَةً إِلَّآ أَحْصَىٰهَا ۚ وَوَجَدُوا۟ مَا عَمِلُوا۟ حَاضِرًۭا ۗ وَلَا يَظْلِمُ رَبُّكَ أَحَدًۭا
وَوُضِعَ
और रख दी जाएगी
ٱلْكِتَـٰبُ
किताब
فَتَرَى
पस आप देखेंगे
ٱلْمُجْرِمِينَ
मुजरिमों को
مُشْفِقِينَ
डर रहे होंगे
مِمَّا
उससे जो
فِيهِ
उसमें (होगा)
وَيَقُولُونَ
और वो कहेंगे
يَـٰوَيْلَتَنَا
हाय अफ़सोस हम पर
مَالِ
What (is) for
هَـٰذَا
this
ٱلْكِتَـٰبِ
क्या है इस किताब को
لَا
not
يُغَادِرُ
नहीं छोड़ा
صَغِيرَةًۭ
किसी छोटी (चीज़) को
وَلَا
और ना
كَبِيرَةً
बड़ी (चीज़) को
إِلَّآ
मगर
أَحْصَىٰهَا ۚ
उसने शुमार कर रखा है उसे
وَوَجَدُوا۟
और वो पा लेंगे
مَا
जो
عَمِلُوا۟
उन्होंने अमल किए
حَاضِرًۭا ۗ
हाज़िर
وَلَا
और ना
يَظْلِمُ
ज़ुल्म करेगा
رَبُّكَ
रब आपका
أَحَدًۭا
किसी एक पर
किताब (कर्मपत्रिका) रखी जाएगी तो अपराधियों को देखोंगे कि जो कुछ उसमें होगा उससे डर रहे है और कह रहे है, "हाय, हमारा दुर्भाग्य! यह कैसी किताब है कि यह न कोई छोटी बात छोड़ती है न बड़ी, बल्कि सभी को इसने अपने अन्दर समाहित कर रखा है।" जो कुछ उन्होंने किया होगा सब मौजूद पाएँगे। तुम्हारा रब किसी पर ज़ुल्म न करेगा
तफ़्सीर:
और कर्मपत्र रख दिया जाएगा। तो कुछ लोग अपना कर्मपत्र अपने दाएँ हाथ में पकड़े होंगे और कुछ उसे अपने बाएँ हाथ में। और (ऐ इनसान) तुम काफिरों को देखोगे कि जो कुछ उसमें लिखा होगा, उससे डरे हुए होंगे। क्योंकि वे खूब जानते होंगे कि उन्होंने दुनिया में क्या कुफ़्र और पाप किए थे। और वे कहेंगे : हाय हमारा विनाश और हमारा दुर्भाग्य! इस पुस्तक को क्या हुआ है कि हमारे कर्मों में से कोई छोटा या बड़ा नहीं छोड़ा है, मगर उसे संरक्षित कर रखा है और गिन रखा है। और उन्होंने सांसारिक जीवन में जो पाप किए थे, उन्हें लिखा हुआ और अंकित पाएँगे। और (ऐ रसूल) आपका पालनहार किसी पर अत्याचार नहीं करेगा। चुनाँचे वह किसी को बिना पाप के दंड नहीं देगा और न किसी आज्ञाकारी व्यक्ति की नेकी में से कुछ कम करेगा।
आयत 50
وَإِذْ قُلْنَا لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ ٱسْجُدُوا۟ لِـَٔادَمَ فَسَجَدُوٓا۟ إِلَّآ إِبْلِيسَ كَانَ مِنَ ٱلْجِنِّ فَفَسَقَ عَنْ أَمْرِ رَبِّهِۦٓ ۗ أَفَتَتَّخِذُونَهُۥ وَذُرِّيَّتَهُۥٓ أَوْلِيَآءَ مِن دُونِى وَهُمْ لَكُمْ عَدُوٌّۢ ۚ بِئْسَ لِلظَّـٰلِمِينَ بَدَلًۭا
وَإِذْ
और जब
قُلْنَا
कहा हमने
لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ
फ़रिश्तों से
ٱسْجُدُوا۟
सजदा करो
لِـَٔادَمَ
आदम को
فَسَجَدُوٓا۟
तो उन्होंने सजदा किया
إِلَّآ
सिवाय
إِبْلِيسَ
इब्लीस के
كَانَ
था वो
مِنَ
of
ٱلْجِنِّ
जिन्नों में से
فَفَسَقَ
तो उसने नाफ़रमानी की
عَنْ
against
أَمْرِ
हुक्म की
رَبِّهِۦٓ ۗ
अपने रब के
أَفَتَتَّخِذُونَهُۥ
क्या फिर तुम बनाते हो उसे
وَذُرِّيَّتَهُۥٓ
और उसकी औलाद को
أَوْلِيَآءَ
दोस्त
مِن
other than Me
دُونِى
मेरे सिवा
وَهُمْ
हालाँकि वो
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
عَدُوٌّۢ ۚ
दुश्मन है
بِئْسَ
कितना बुरा है
لِلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों के लिए
بَدَلًۭا
बतौर बदल
याद करो जब हमने फ़रिश्तों से कहा, "आदम को सजदा करो।" तो इबलीस के सिवा सबने सजदा किया। वह जिन्नों में से था। तो उसने अपने रब के आदेश का उल्लंघन किया। अब क्या तुम मुझसे इतर उसे और उसकी सन्तान को संरक्षक मित्र बनाते हो? हालाँकि वे तुम्हारे शत्रु है। क्या ही बुरा विकल्प है, जो ज़ालिमों के हाथ आया!
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) उस समय को याद कीजिए, जब हमने फरिश्तों से कहा था : तुम सब आदम को अभिवादन के लिए सजदा करो। तो उन सभी ने अपने पालनहार के आदेश का पालन करते हुए उन्हें सजदा किया, परंतु इबलीस ने सजदा नहीं किया। वह जिन्नों में से था, फ़रिश्तों में से नहीं था। अतः उसने सजदा करने से इनकार किया और अभिमान का शिकार हो गया। इस तरह वह अपने पालनहार के आज्ञापालन से निकल गया। तो क्या फिर भी (ऐ लोगो) तुम मुझे छोड़कर उसे और उसकी संतान को अपना मित्र बनाते हो, हालाँकि वे तुम्हारे दुश्मन हैं। भला तुम अपने शत्रुओं को अपना मित्र कैसे ठहरा रहे हो?! अत्याचारियों का यह कार्य कितना बुरा और घृणित है कि उन्होंने अल्लाह सर्वशक्तिमान से दोस्ती की बजाय शैतान को अपना दोस्त बना लिया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
बाग़ की तबाही और इबलीस की नाफरमानी का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि जो नेमत आज है वह कल न भी रहे, इसलिए हमेशा अल्लाह का शुक्रगुज़ार रहना चाहिए।
आयत 51
۞ مَّآ أَشْهَدتُّهُمْ خَلْقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَلَا خَلْقَ أَنفُسِهِمْ وَمَا كُنتُ مُتَّخِذَ ٱلْمُضِلِّينَ عَضُدًۭا
۞ مَّآ
नहीं
أَشْهَدتُّهُمْ
मैंने हाज़िर किया था उन्हें
خَلْقَ
पैदाइश (के वक़्त)
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन की
وَلَا
और ना
خَلْقَ
पैदाइश में
أَنفُسِهِمْ
उनकी अपनी
وَمَا
और नहीं
كُنتُ
हूँ मैं
مُتَّخِذَ
बनाने वाला
ٱلْمُضِلِّينَ
गुमराह करने वालों को
عَضُدًۭا
बाज़ू (मददगार)
मैंने न तो आकाशों और धरती को उन्हें दिखाकर पैदा किया और न स्वयं उनको बनाने और पैदा करने के समय ही उन्हें बुलाया। मैं ऐसा नहीं हूँ कि गुमराह करनेवालों को अपनी बाहु-भुजा बनाऊँ
तफ़्सीर:
ये लोग जिन्हें तुमने मुझे छोड़कर अपना सहायक व मित्र बना रखा है, तुम्हारे ही जैसे बंदे हैं। मैंने आकाशों तथा धरती को पैदा करते समय उन्हें उपस्थित नहीं किया था। बल्कि उस समय उनका अस्तित्व ही नहीं था। और न ही मैंने उनमें से कुछ को दूसरों के पैदा करने में उपस्थित किया था। क्योंकि मैं सृजन और प्रबंधन में अकेला हूँ। और मैं मानव जाति और जिन्न के शैतानों में से गुमराह करने वालों को अपना सहायक बनाने वाला न था। क्योंकि मैं सहायकों से बेनियाज़ हूँ।
आयत 52
وَيَوْمَ يَقُولُ نَادُوا۟ شُرَكَآءِىَ ٱلَّذِينَ زَعَمْتُمْ فَدَعَوْهُمْ فَلَمْ يَسْتَجِيبُوا۟ لَهُمْ وَجَعَلْنَا بَيْنَهُم مَّوْبِقًۭا
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يَقُولُ
वो फ़रमाएगा
نَادُوا۟
पुकारो
شُرَكَآءِىَ
मेरे शरीकों को
ٱلَّذِينَ
वो जिन्हें
زَعَمْتُمْ
गुमान करते थे तुम
فَدَعَوْهُمْ
तो वो पुकारेंगे उन्हें
فَلَمْ
पस ना
يَسْتَجِيبُوا۟
वो जवाब देंगे
لَهُمْ
उन्हें
وَجَعَلْنَا
और बना देंगे हम
بَيْنَهُم
दर्मियान उनके
مَّوْبِقًۭا
हलाकत की जगह
याद करो जिस दिन वह कहेगा, "बुलाओ मेरे साझीदारों को, जिनके साझीदार होने का तुम्हें दावा था।" तो वे उनको पुकारेंगे, किन्तु वे उन्हें कोई उत्तर न देंगे और हम उनके बीच सामूहिक विनाश-स्थल निर्धारित कर देंगे
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) उनके सामने क़ियामत के दिन की चर्चा कीजिए, जिस दिन अल्लाह उन लोगों से कहेगा, जिन्होंने दुनिया में उसका साझी बनाया था : मेरे उन साझियों को पुकारो, जिनके बारे में तुमने दावा किया था कि वे मेरे साझी हैं, ताकि वे तुम्हारी कुछ मदद कर सकें। चुनाँचे वे उन्हें पुकारेंगे, लेकिन वे उनकी पुकार का न कोई उत्तर देंगे और न उनकी कोई मदद करेंगे। तथा हम पूजने वालों और पूजे गए लोगों के बीच एक विनाश का स्थान बना देंगे, जिसमें वे दोनों दाखिल होंगे और वह जहन्नम की आग है।
आयत 53
وَرَءَا ٱلْمُجْرِمُونَ ٱلنَّارَ فَظَنُّوٓا۟ أَنَّهُم مُّوَاقِعُوهَا وَلَمْ يَجِدُوا۟ عَنْهَا مَصْرِفًۭا
وَرَءَا
और देखेंगे
ٱلْمُجْرِمُونَ
मुजरिम
ٱلنَّارَ
आग को
فَظَنُّوٓا۟
तो वो समझ लेंगे
أَنَّهُم
बेशक वो
مُّوَاقِعُوهَا
गिरने वाले हैं उसमें
وَلَمْ
और ना
يَجِدُوا۟
वो पाऐंगे
عَنْهَا
उससे
مَصْرِفًۭا
फिरने की जगह
अपराधी लोग आग को देखेंगे तो समझ लेंगे कि वे उसमें पड़नेवाले है और उससे बच निकलने की कोई जगह न पाएँगे
तफ़्सीर:
और अल्लाह का साझी बनाने वाले लोग जहन्नम को देखेंगे, तो वे पूरी तरह से निश्चित हो जाएँगे कि वे उसमें गिरने वाले हैं और उन्हें कोई स्थान नहीं मिलेगा जहाँ वे उससे मुड़कर शरण ले सकें।
आयत 54
وَلَقَدْ صَرَّفْنَا فِى هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانِ لِلنَّاسِ مِن كُلِّ مَثَلٍۢ ۚ وَكَانَ ٱلْإِنسَـٰنُ أَكْثَرَ شَىْءٍۢ جَدَلًۭا
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
صَرَّفْنَا
फेर-फेर कर बयान की हमने
فِى
in
هَـٰذَا
this
ٱلْقُرْءَانِ
इस क़ुरआन में
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
مِن
of
كُلِّ
हर तरह की
مَثَلٍۢ ۚ
मिसाल
وَكَانَ
और है
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
أَكْثَرَ
ज़्यादा
شَىْءٍۢ
हर चीज़ से
جَدَلًۭا
झगड़ा करने में
हमने लोगों के लिए इस क़ुरआन में हर प्रकार के उत्तम विषयों को तरह-तरह से बयान किया है, किन्तु मनुष्य सबसे बढ़कर झगड़ालू है
तफ़्सीर:
हमने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतरने वाले इस क़ुरआन में अनेक प्रकार के बहुत-से उदाहरण प्रस्तुत किए हैं और उन्हें विविधता के साथ बयान किए हैं। ताकि लोग नसीहत और सदुपदेश प्राप्त करें। लेकिन मनुष्य - विशेष रूप से एक काफ़िर - की ओर से जो चीज़ सबसे ज़्यादा सामने आती है, वह ना-हक़ (सच्चाई के बिना) झगड़ना (बहस करना) है।
आयत 55
وَمَا مَنَعَ ٱلنَّاسَ أَن يُؤْمِنُوٓا۟ إِذْ جَآءَهُمُ ٱلْهُدَىٰ وَيَسْتَغْفِرُوا۟ رَبَّهُمْ إِلَّآ أَن تَأْتِيَهُمْ سُنَّةُ ٱلْأَوَّلِينَ أَوْ يَأْتِيَهُمُ ٱلْعَذَابُ قُبُلًۭا
وَمَا
और नहीं
مَنَعَ
रोका
ٱلنَّاسَ
लोगों को
أَن
कि
يُؤْمِنُوٓا۟
वो ईमान लाऐं
إِذْ
जब
جَآءَهُمُ
आ गई उनके पास
ٱلْهُدَىٰ
हिदायत
وَيَسْتَغْفِرُوا۟
और वो बख़्शिश माँगें
رَبَّهُمْ
अपने रब से
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
تَأْتِيَهُمْ
आ जाए उनके पास
سُنَّةُ
तरीक़ा/मामला
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों का
أَوْ
या
يَأْتِيَهُمُ
आ जाए उनके पास
ٱلْعَذَابُ
अज़ाब
قُبُلًۭا
सामने से
आख़िर लोगों को, जबकि उनके पास मार्गदर्शन आ गया, तो इस बात से कि वे ईमान लाते और अपने रब से क्षमा चाहते, इसके सिवा किसी चीज़ ने नहीं रोका कि उनके लिए वही कुछ सामने आए जो पूर्व जनों के सामने आ चुका है, यहाँ तक कि यातना उनके सामने आ खड़ी हो
तफ़्सीर:
हठी काफिरों और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने पालनहार की ओर से जो कुछ लेकर आए थे उसपर ईमान लाने के बीच, तथा उनके और उनके अपने गुनाहों से तौबा करने के बीच (प्रमाणों के) स्पष्टीकरण का अभाव बाधक नहीं बना। क्योंकि क़ुरआन में उनके लिए उदाहरण दिए गए थे, और उनके पास स्पष्ट तर्क आए थे। बल्कि उनके लिए रुकावट केवल उनकी यह - हठपूर्ण - माँग बन गई कि उनपर पिछले समुदायों वाला अज़ाब लाया जाए, तथा वे उस अज़ाब को अपनी आँखों से देख लें जिसका उनसे वादा किया गया था।
आयत 56
وَمَا نُرْسِلُ ٱلْمُرْسَلِينَ إِلَّا مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ ۚ وَيُجَـٰدِلُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِٱلْبَـٰطِلِ لِيُدْحِضُوا۟ بِهِ ٱلْحَقَّ ۖ وَٱتَّخَذُوٓا۟ ءَايَـٰتِى وَمَآ أُنذِرُوا۟ هُزُوًۭا
وَمَا
और नहीं
نُرْسِلُ
हम भेजते
ٱلْمُرْسَلِينَ
रसूलों को
إِلَّا
मगर
مُبَشِّرِينَ
ख़ुशख़बरी देने वाले
وَمُنذِرِينَ ۚ
और डराने वाले बनाकर
وَيُجَـٰدِلُ
और झगड़ते हैं
ٱلَّذِينَ
वो लोग जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
بِٱلْبَـٰطِلِ
साथ बातिल के
لِيُدْحِضُوا۟
ताकि वो फुसला दें
بِهِ
साथ उसके
ٱلْحَقَّ ۖ
हक़ को
وَٱتَّخَذُوٓا۟
और उन्होंने बना लिया
ءَايَـٰتِى
मेरी आयात को
وَمَآ
और जिससे
أُنذِرُوا۟
वो डराए गए
هُزُوًۭا
मज़ाक़
रसूलों को हम केवल शुभ सूचना देनेवाले और सचेतकर्त्ता बनाकर भेजते है। किन्तु इनकार करनेवाले लोग है कि असत्य के सहारे झगड़ते है, ताकि सत्य को डिगा दें। उन्होंने मेरी आयतों का और जो चेतावनी उन्हें दी गई उसका मज़ाक बना दिया है
तफ़्सीर:
और हम अपने जो भी रसूल भेजते हैं, उन्हें ईमान और आज्ञाकारिता के लोगों को शुभ सूचना देने वाले, तथा कुफ्र और अवज्ञा करने वालों को डराने वाले बनाकर भेजते हैं। और उनका लोगों के दिलों पर कोई अधिकार (ज़ोर) नहीं होता कि उन्हें मार्गदर्शन स्वीकारने पर उभार सकें। और जिन लोगों ने अल्लाह का इनकार किया है, वे अपने सामने प्रमाणों के स्पष्ट हो जाने के बावजूद भी रसूलों के साथ झगड़ा (बहस) करते हैं; ताकि वे अपने असत्य के द्वारा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतरने वाले सत्य को निराकृत कर दें। तथा उन्होंने क़ुरआन को और उस चीज़ को जिससे उन्हें डराया गया था, हँसी और मज़ाक बना लिया।
आयत 57
وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن ذُكِّرَ بِـَٔايَـٰتِ رَبِّهِۦ فَأَعْرَضَ عَنْهَا وَنَسِىَ مَا قَدَّمَتْ يَدَاهُ ۚ إِنَّا جَعَلْنَا عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ أَكِنَّةً أَن يَفْقَهُوهُ وَفِىٓ ءَاذَانِهِمْ وَقْرًۭا ۖ وَإِن تَدْعُهُمْ إِلَى ٱلْهُدَىٰ فَلَن يَهْتَدُوٓا۟ إِذًا أَبَدًۭا
وَمَنْ
और कौन
أَظْلَمُ
बड़ा ज़ालिम है
مِمَّن
उससे जो
ذُكِّرَ
नसीहत किया गया
بِـَٔايَـٰتِ
आयात के ज़रिए
رَبِّهِۦ
अपने रब की
فَأَعْرَضَ
फिर उसने ऐराज़ किया
عَنْهَا
उससे
وَنَسِىَ
और वो भूल गया
مَا
जो
قَدَّمَتْ
आगे भेजा
يَدَاهُ ۚ
उसके दोनों हाथों ने
إِنَّا
बेशक हम
جَعَلْنَا
डाल दिए हमने
عَلَىٰ
over
قُلُوبِهِمْ
उनके दिलों पर
أَكِنَّةً
पर्दे
أَن
कि
يَفْقَهُوهُ
(ना) वो समझ सकें उसे
وَفِىٓ
and in
ءَاذَانِهِمْ
और उनके कानों में
وَقْرًۭا ۖ
बोझ है
وَإِن
और अगर
تَدْعُهُمْ
आप बुलाए उन्हें
إِلَى
to
ٱلْهُدَىٰ
तरफ़ हिदायत के
فَلَن
तो हरगिज़ नहीं
يَهْتَدُوٓا۟
वो हिदायत पाऐंगे
إِذًا
तब
أَبَدًۭا
कभी भी
उस व्यक्ति से बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जिसे उसके रब की आयतों के द्वारा समझाया गया, तो उसने उनसे मुँह फेर लिया और उसे भूल गया, जो सामान उसके हाथ आगे बढ़ा चुके है? निश्चय ही हमने उनके दिलों पर परदे डाल दिए है कि कहीं वे उसे समझ न लें और उनके कानों में बोझ डाल दिया (कि कहीं वे सुन न ले) । यद्यपि तुम उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुलाओ, वे कभी भी मार्ग नहीं पा सकते
तफ़्सीर:
और कोई भी उससे बढ़कर अत्याचारी नहीं हो सकता, जिसे उसके पालनहार की आयतों द्वारा समझाया जाए, लेकिन वह उसमें पाई जाने वाली अज़ाब की धमकी की परवाह न करे और उससे नसीहत प्राप्त करने से मुँह मोड़ ले। तथा उसने अपने सांसारिक जीवन में जो कुफ़्र और पाप करके आगे बढ़ाए हैं, उन्हें भूल जाए और उनसे तौबा न करे। निश्चय हमने ऐसे लोगों के दिलों पर पर्दे डाल दिए हैं, जो उन्हें क़ुरआन समझने से रोक रहे हैं, और उनके कानों में बहरापन डाल दिया है, जिसके कारण वे उसे स्वीकार करने के लिए नहीं सुनते हैं। यदि तुम उन्हें ईमान की ओर बुलाओ, तो जब तक उनके दिलों पर पर्दे और उनके कानों में बहरापन है, तुम्हारे बुलावे का कदापि उत्तर नहीं देंगे।
आयत 58
وَرَبُّكَ ٱلْغَفُورُ ذُو ٱلرَّحْمَةِ ۖ لَوْ يُؤَاخِذُهُم بِمَا كَسَبُوا۟ لَعَجَّلَ لَهُمُ ٱلْعَذَابَ ۚ بَل لَّهُم مَّوْعِدٌۭ لَّن يَجِدُوا۟ مِن دُونِهِۦ مَوْئِلًۭا
وَرَبُّكَ
और रब आपका
ٱلْغَفُورُ
बहुत बख़्शने वाला है
ذُو
Owner
ٱلرَّحْمَةِ ۖ
रहमत वाला है
لَوْ
अगर
يُؤَاخِذُهُم
वो पकड़े उन्हें
بِمَا
बवजह उसके जो
كَسَبُوا۟
उन्होंने कमाई की
لَعَجَّلَ
अलबत्ता वो जल्दी दे दे
لَهُمُ
उन्हें
ٱلْعَذَابَ ۚ
अज़ाब
بَل
बल्कि
لَّهُم
उनके लिए है
مَّوْعِدٌۭ
वादे का एक वक़्त
لَّن
हरगिज़ ना
يَجِدُوا۟
वो पाऐंगे
مِن
other than it
دُونِهِۦ
उसके सिवा
مَوْئِلًۭا
कोई पनाहगाह
तुम्हारा रब अत्यन्त क्षमाशील और दयावान है। यदि वह उन्हें उसपर पकड़ता जो कुछ कि उन्होंने कमाया है तो उनपर शीघ्र ही यातना ला देता। नहीं, बल्कि उनके लिए तो वादे का एक समय निशिचत है। उससे हटकर वे बच निकलने का कोई मार्ग न पाएँगे
तफ़्सीर:
और ऐसा न हो कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आपको झुठलाने वालों को जल्दी यातना देने की आकांक्षा करें, अल्लाह तआला ने आपसे फरमाया : और (ऐ रसूल!) आपका पालनहार अपने तौबा करने वाले बंदो के पापों को क्षमा करने वाला, तथा ऐसी दया वाला है, जो हर चीज़ को शामिल है। और उसकी दया में से यह भी है कि वह अवज्ञाकारियों को ढील देता है, ताकि वे उसके समक्ष तौबा कर लें। यदि अल्लाह इन मुँह मोड़ने वालों को सज़ा देता, तो इसी सांसारिक जीवन में उन्हें जल्दी सज़ा दे देता। परंतु वह सहनशील और दयालु है। उनसे यातना को टाल रखा है, ताकि वे तौबा कर लें। बल्कि उनके लिए एक विशिष्ट स्थान और समय है, जिनमें उन्हें उनके कुफ्र एवं मुँह मोड़ने की सज़ा दी जाएगी, यदि उन्होंने तौबा नहीं की। उसके सिवा, उन्हें बचने का कोई ऐसा स्थान नहीं मिलेगा, जहाँ वे शरण ले सकें।
आयत 59
وَتِلْكَ ٱلْقُرَىٰٓ أَهْلَكْنَـٰهُمْ لَمَّا ظَلَمُوا۟ وَجَعَلْنَا لِمَهْلِكِهِم مَّوْعِدًۭا
وَتِلْكَ
और ये
ٱلْقُرَىٰٓ
बस्तियाँ हैं
أَهْلَكْنَـٰهُمْ
हलाक किया हमने उन्हें
لَمَّا
जब
ظَلَمُوا۟
उन्होंने ज़ुल्म किया
وَجَعَلْنَا
और बना दिया हमने
لِمَهْلِكِهِم
उनकी हलाकत के लिए
مَّوْعِدًۭا
वादे का एक वक़्त
और ये बस्तियाँ वे है कि जब उन्होंने अत्याचार किया तो हमने उन्हें विनष्ट कर दिया, और हमने उनके विनाश के लिए एक समय निश्चित कर रखा था
तफ़्सीर:
तथा वे काफ़िर बस्तियाँ, जो तुम्हारे आस-पास ही आबाद थीं, जैसे हूद, सालेह और शुऐब अलैहिस्सलाम की जातियों की बस्तियाँ, हमने उन्हें विनष्ट कर दिया, जब उन्होंने कुफ़्र और गुनाहों के द्वारा खुद पर अत्याचार किया, और हमने उनके विनाश का एक विशिष्ट समय निर्धारित कर रखा था।
आयत 60
وَإِذْ قَالَ مُوسَىٰ لِفَتَىٰهُ لَآ أَبْرَحُ حَتَّىٰٓ أَبْلُغَ مَجْمَعَ ٱلْبَحْرَيْنِ أَوْ أَمْضِىَ حُقُبًۭا
وَإِذْ
और जब
قَالَ
कहा
مُوسَىٰ
मूसा ने
لِفَتَىٰهُ
अपने नौजवान को
لَآ
Not
أَبْرَحُ
नहीं मैं हटूँगा
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
أَبْلُغَ
मैं पहुँच जाऊँ
مَجْمَعَ
जमा होने की जगह
ٱلْبَحْرَيْنِ
दो समुन्दरों के
أَوْ
या
أَمْضِىَ
मैं चलता रहूँगा
حُقُبًۭا
मुद्दतों
याद करो, जब मूसा ने अपने युवक सेवक से कहा, "जब तक कि मैं दो दरियाओं के संगम तक न पहुँच जाऊँ चलना नहीं छोड़ूँगा, चाहे मैं यूँ ही दीर्धकाल तक सफ़र करता रहूँ।"
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) वह समय याद करें, जब मूसा अलैहिस्सलाम ने अपने सेवक यूशा बिन नून से कहा : मैं लगातार चलता ही रहूँगा, यहाँ तक कि दो सागरों के संगम पर पहुँच जाऊँ या लंबे समय तक चलता ही रहूँ, यहाँ तक कि सदाचारी बंदे से मिलकर उससे कुछ ज्ञान अर्जित कर लूँ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के मंज़र और अल्लाह की रहमत की वुसअत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह की रहमत बहुत वसीअ है, मगर गुनाहों पर मुसिर रहने वालों के लिए सज़ा भी बरहक है।
आयत 61
فَلَمَّا بَلَغَا مَجْمَعَ بَيْنِهِمَا نَسِيَا حُوتَهُمَا فَٱتَّخَذَ سَبِيلَهُۥ فِى ٱلْبَحْرِ سَرَبًۭا
فَلَمَّا
तो जब
بَلَغَا
वो दोनों पहुँचे
مَجْمَعَ
जमा होने की जगह
بَيْنِهِمَا
दर्मियान उन दो (समुन्दरों) के
نَسِيَا
तो दोनों भूल गए
حُوتَهُمَا
अपनी मछली
فَٱتَّخَذَ
पस उसने बना लिया
سَبِيلَهُۥ
रास्ता अपना
فِى
into
ٱلْبَحْرِ
समुन्दर में
سَرَبًۭا
सुरंग की तरह
फिर जब वे दोनों संगम पर पहुँचे तो वे अपनी मछली से ग़ाफ़िल हो गए और उस (मछली) ने दरिया में सुरंह बनाती अपनी राह ली
तफ़्सीर:
फिर वे दोनों चल पड़े और जब वे दो सागरों के संगम पर पहुँचे, तो वे अपनी वह मछली भूल गए, जिसे उन्होंने अपने लिए भोजन के रूप में लिया था। चुनाँचे अल्लाह ने मछली को जीवित कर दिया और उसने समुद्र में सुरंग की तरह रास्ता बना लिया, उसके साथ पानी मिलता नहीं था।
आयत 62
فَلَمَّا جَاوَزَا قَالَ لِفَتَىٰهُ ءَاتِنَا غَدَآءَنَا لَقَدْ لَقِينَا مِن سَفَرِنَا هَـٰذَا نَصَبًۭا
فَلَمَّا
तो जब
جَاوَزَا
वो दोनों आगे बढ़े
قَالَ
उसने कहा
لِفَتَىٰهُ
अपने नौजवान से
ءَاتِنَا
दो हमें
غَدَآءَنَا
खाना हमारा
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
لَقِينَا
पाई हमने
مِن
in
سَفَرِنَا
our journey
هَـٰذَا
अपने इस सफ़र में
نَصَبًۭا
थकावट
फिर जब वे वहाँ से आगे बढ़ गए तो उसने अपने सेवक से कहा, "लाओ, हमारा नाश्ता। अपने इस सफ़र में तो हमें बड़ी थकान पहुँची है।"
तफ़्सीर:
जब वे दोनों उस स्थान से आगे बढ़ गए, तो मूसा अलैहिस्सलाम ने अपने सेवक से कहा : हमें दोपहर का खाना लाओ, हम इस यात्रा से बहुत थक गए हैं।
आयत 63
قَالَ أَرَءَيْتَ إِذْ أَوَيْنَآ إِلَى ٱلصَّخْرَةِ فَإِنِّى نَسِيتُ ٱلْحُوتَ وَمَآ أَنسَىٰنِيهُ إِلَّا ٱلشَّيْطَـٰنُ أَنْ أَذْكُرَهُۥ ۚ وَٱتَّخَذَ سَبِيلَهُۥ فِى ٱلْبَحْرِ عَجَبًۭا
قَالَ
उसने कहा
أَرَءَيْتَ
क्या देखा तुमने
إِذْ
जब
أَوَيْنَآ
पनाह ली थी हमने
إِلَى
to
ٱلصَّخْرَةِ
तरफ़ चट्टान के
فَإِنِّى
तो बेशक मैं
نَسِيتُ
भूल गया था मैं
ٱلْحُوتَ
मछली को
وَمَآ
और नहीं
أَنسَىٰنِيهُ
भुलाया मुझे उसको
إِلَّا
मगर
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान ने
أَنْ
कि
أَذْكُرَهُۥ ۚ
मैं ज़िक्र करूँ उसका
وَٱتَّخَذَ
और उसने बना लिया था
سَبِيلَهُۥ
रास्ता अपना
فِى
into
ٱلْبَحْرِ
समुन्दर में
عَجَبًۭا
अजीब तरह से
उसने कहा, "ज़रा देखिए तो सही, जब हम उस चट्टान के पास ठहरे हुए थे तो मैं मछली को भूल ही गया - और शैतान ही ने उसको याद रखने से मुझे ग़ाफ़िल कर दिया - और उसने आश्चर्य रूप से दरिया में अपनी राह ली।"
तफ़्सीर:
युवक ने कहा : क्या आपने देखा कि जब हम चट्टान के पास ठहरे थे तब क्या हुआ था?! वास्तव में, मैं आपसे मछली की बात का उल्लेख करना भूल गया था। और मुझे आपसे उसका उल्लेख करना शैतान ही ने भुलाया था। हुआ यह कि मछली ज़िंदा हो गई और उसने आश्चर्यजनक रूप से समुद्र में अपना रास्ता बना लिया।
आयत 64
قَالَ ذَٰلِكَ مَا كُنَّا نَبْغِ ۚ فَٱرْتَدَّا عَلَىٰٓ ءَاثَارِهِمَا قَصَصًۭا
قَالَ
कहा
ذَٰلِكَ
यही है
مَا
जो
كُنَّا
थे हम
نَبْغِ ۚ
हम चाहते
فَٱرْتَدَّا
तो वो दोनों पलटे
عَلَىٰٓ
on
ءَاثَارِهِمَا
अपने निशानाते क़दम पर
قَصَصًۭا
इत्तिबा करते हुए
(मूसा ने) कहा, "यही तो है जिसे हम तलाश कर रहे थे।" फिर वे दोनों अपने पदचिन्हों को देखते हुए वापस हुए
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने अपने सेवक से कहा : यह वही है, जो हम चाहते थे। यही तो उस नेक बंदे के स्थान की निशानी है। फिर वे दोनों अपने पैरों के निशान देखते हुए वापस हुए; ताकि राह न भटकें, यहाँ तक कि चट्टान के पास पहुँच गए और वहाँ से मछली के प्रवेश की जगह तक पहुँचे।
आयत 65
فَوَجَدَا عَبْدًۭا مِّنْ عِبَادِنَآ ءَاتَيْنَـٰهُ رَحْمَةًۭ مِّنْ عِندِنَا وَعَلَّمْنَـٰهُ مِن لَّدُنَّا عِلْمًۭا
فَوَجَدَا
तो दोनों ने पाया
عَبْدًۭا
एक बन्दे को
مِّنْ
from
عِبَادِنَآ
हमारे बन्दों में से
ءَاتَيْنَـٰهُ
दी थी हमने उसे
رَحْمَةًۭ
रहमत
مِّنْ
from
عِندِنَا
अपने पास से
وَعَلَّمْنَـٰهُ
और सिखाया था हमने उसे
مِن
from
لَّدُنَّا
अपने पास से
عِلْمًۭا
एक (ख़ास) इल्म
फिर उन्होंने हमारे बन्दों में से एक बन्दे को पाया, जिसे हमने अपने पास से दयालुता प्रदान की थी और जिसे अपने पास से ज्ञान प्रदान किया था
तफ़्सीर:
जब वे दोनों मछली गुम होने के स्थान पर पहुँचे, तो हमारे एक सदाचारी बंदे को पाया (जो कि ख़ज़िर अलैहिस्सलाम थे)। हमने उसे अपने पास से दया प्रदान की थी और उसे अपनी ओर से ऐसा ज्ञान सिखाया था, जिसे लोग नहीं जानते थे। और यह कहानी उसी ज्ञान पर आधारित है।
आयत 66
قَالَ لَهُۥ مُوسَىٰ هَلْ أَتَّبِعُكَ عَلَىٰٓ أَن تُعَلِّمَنِ مِمَّا عُلِّمْتَ رُشْدًۭا
قَالَ
कहा
لَهُۥ
उसे
مُوسَىٰ
मूसा ने
هَلْ
क्या
أَتَّبِعُكَ
मैं पैरवी करूँ तुम्हारी
عَلَىٰٓ
उस पर
أَن
कि
تُعَلِّمَنِ
तुम सिखाओ मुझे
مِمَّا
उसमें से जो
عُلِّمْتَ
तुम सिखाए गए
رُشْدًۭا
हिदायत (समझ बूझ)
मूसा ने उससे कहा, "क्या मैं आपके पीछे चलूँ, ताकि आप मुझे उस ज्ञान औऱ विवेक की शिक्षा दें, जो आपको दी गई है?"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने उनसे विनम्रता के साथ कहा : क्या मैं इस (शर्त) पर आपका अनुसरण करूँ कि अल्लाह ने आपको जो ज्ञान सिखाया है, जो सच्चाई के लिए एक मार्गदर्शक है, उसमें से कुछ मुझे सिखा दें?
आयत 67
قَالَ إِنَّكَ لَن تَسْتَطِيعَ مَعِىَ صَبْرًۭا
قَالَ
उसने कहा
إِنَّكَ
बेशक तुम
لَن
हरगिज़ ना
تَسْتَطِيعَ
तुम इस्तिताअत रखोगे
مَعِىَ
मेरे साथ
صَبْرًۭا
सब्र की
उसने कहा, "तुम मेरे साथ धैर्य न रख सकोगे,
तफ़्सीर:
ख़ज़िर अलैहिस्सलाम ने कहा : तुम मेरे ज्ञान में से जो कुछ देखोगे, उसपर हरगिज़ धैर्य नहीं रख सकोगे, क्योंकि वह तुम्हारे पास मौजूद ज्ञान से मेल नहीं खाएगा।
आयत 68
وَكَيْفَ تَصْبِرُ عَلَىٰ مَا لَمْ تُحِطْ بِهِۦ خُبْرًۭا
وَكَيْفَ
और किस तरह
تَصْبِرُ
तुम सब्र कर सकते हो
عَلَىٰ
उस पर
مَا
जो
لَمْ
नहीं
تُحِطْ
तुमने अहाता किया
بِهِۦ
जिसका
خُبْرًۭا
इल्म से
और जो चीज़ तुम्हारे ज्ञान-परिधि से बाहर हो, उस पर तुम धैर्य कैसे रख सकते हो?"
तफ़्सीर:
और तुम उन कामों को देखकर कैसे धैर्य रख सकते हो, जिनके बारे में तुम्हें नहीं पता कि उसमें क्या सही है; क्योंकि तुम उनके बारे में अपने ज्ञान की मात्रा के अनुसार फ़ैसला करोगे?!
आयत 69
قَالَ سَتَجِدُنِىٓ إِن شَآءَ ٱللَّهُ صَابِرًۭا وَلَآ أَعْصِى لَكَ أَمْرًۭا
قَالَ
उसने कहा
سَتَجِدُنِىٓ
यक़ीनन तुम पाओगे मुझे
إِن
अगर
شَآءَ
चाहा
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
صَابِرًۭا
सब्र करने वाला
وَلَآ
और नहीं
أَعْصِى
मैं नाफ़रमानी करूँगा
لَكَ
तुम्हारी
أَمْرًۭا
किसी हुक्म में
(मूसा ने) कहा, "यदि अल्लाह ने चाहा तो आप मुझे धैर्यवान पाएँगे। और मैं किसी मामले में भी आपकी अवज्ञा नहीं करूँगा।"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा : अगर अल्लाह ने चाहा, तो आप मुझे, मेरे द्वारा देखे गए अपने कार्यों पर धैर्य रखने वाला, आपकी आज्ञाकारिता के लिए प्रतिबद्ध पाएँगे। आप मुझे जो आदेश देंगे, मैं उसकी अवज्ञा नहीं करूँगा।
आयत 70
قَالَ فَإِنِ ٱتَّبَعْتَنِى فَلَا تَسْـَٔلْنِى عَن شَىْءٍ حَتَّىٰٓ أُحْدِثَ لَكَ مِنْهُ ذِكْرًۭا
قَالَ
कहा
فَإِنِ
फिर अगर
ٱتَّبَعْتَنِى
पैरवी करो तुम मेरी
فَلَا
पस ना
تَسْـَٔلْنِى
तुम सवाल करना मुझसे
عَن
about
شَىْءٍ
किसी चीज़ के बारे में
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
أُحْدِثَ
मैं बयान करूँ
لَكَ
तुम्हारे लिए
مِنْهُ
उसका
ذِكْرًۭا
ज़िक्र
उसने कहा, "अच्छा, यदि तुम मेरे साथ चलते हो तो मुझसे किसी चीज़ के विषय में न पूछना, यहाँ तक कि मैं स्वयं ही तुमसे उसकी चर्चा करूँ।"
तफ़्सीर:
ख़ज़िर ने मूसा से कहा : यदि आप मेरा अनुसरण करते हैं, तो मुझसे उस चीज़ के बारे में मत पूछें, जो आप मुझे करते हुए देखते हैं, यहाँ तक कि मैं खुद ही उसकी वजह बताना शुरू कर दूँ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मूसा-खिज़्र अलैहिस्सलाम के सफर की शुरुआत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि इल्म चाहे कितना भी हो, हमेशा सीखने और सब्र करने की गुंजाइश बाकी रहती है।
आयत 71
فَٱنطَلَقَا حَتَّىٰٓ إِذَا رَكِبَا فِى ٱلسَّفِينَةِ خَرَقَهَا ۖ قَالَ أَخَرَقْتَهَا لِتُغْرِقَ أَهْلَهَا لَقَدْ جِئْتَ شَيْـًٔا إِمْرًۭا
فَٱنطَلَقَا
तो दोनों चल दिए
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
رَكِبَا
वो दोनों सवार हुए
فِى
on
ٱلسَّفِينَةِ
कश्ती में
خَرَقَهَا ۖ
तो उसने सूराख़ कर दिया उसमें
قَالَ
कहा
أَخَرَقْتَهَا
क्या सूराख़ कर दिया तुमने इसमें
لِتُغْرِقَ
ताकि तुम ग़र्क़ करो
أَهْلَهَا
उसके मालिकों (सवारों) को
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
جِئْتَ
लाए हो तुम
شَيْـًٔا
एक चीज़
إِمْرًۭا
बड़ी अजीब
अन्ततः दोनों चले, यहाँ तक कि जब नौका में सवार हुए तो उसने उसमें दरार डाल दी। (मूसा ने) कहा, "आपने इसमें दरार डाल दी, ताकि उसके सवारों को डुबो दें? आपने तो एक अनोखी हरकत कर डाली।"
तफ़्सीर:
जब वे दोनों इस बात पर सहमत हो गए, तो समुद्र के तट की ओर चल पड़े, यहाँ तक कि एक नौका मिली, और वे दोनों ख़ज़िर के सम्मान में किराए के बिना ही उसमें सवार हो गए। लेकिन ख़ज़िर ने नौका का एक तख़्ता उखाड़कर उसे फाड़ दिया। मूसा अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा : क्या आपने उस नौका को फाड़ दिया, जिसके लोगों ने हमें बिना किसी किराए के सवार किया, ताकि आप उसके सवारों को डुबो दें?! निश्चित रूप से आपने एक गंभीर काम किया है।
आयत 72
قَالَ أَلَمْ أَقُلْ إِنَّكَ لَن تَسْتَطِيعَ مَعِىَ صَبْرًۭا
قَالَ
उसने कहा
أَلَمْ
क्या नहीं
أَقُلْ
मैंने कहा था
إِنَّكَ
बेशक तुम
لَن
हरगिज़ ना
تَسْتَطِيعَ
तुम इस्तिताअत रखोगे
مَعِىَ
मेरे साथ
صَبْرًۭا
सब्र की
उसने कहा, "क्या मैंने कहा नहीं था कि तुम मेरे साथ धैर्य न रख सकोंगे?"
तफ़्सीर:
ख़ज़िर ने मूसा से कहा : क्या मैंने नहीं कहा था : तुम जो कुछ मुझसे देखोगे, उसपर मेरे साथ हरगिज़ धैर्य नहीं रख सकोगे?!
आयत 73
قَالَ لَا تُؤَاخِذْنِى بِمَا نَسِيتُ وَلَا تُرْهِقْنِى مِنْ أَمْرِى عُسْرًۭا
قَالَ
कहा
لَا
(Do) not
تُؤَاخِذْنِى
ना तुम मुआख़ज़ा करो मेरा
بِمَا
उस पर जो
نَسِيتُ
भूल गया मैं
وَلَا
और ना
تُرْهِقْنِى
छा जा मुझपर
مِنْ
in
أَمْرِى
मेरे मामले में
عُسْرًۭا
तँगी करके
कहा, "जो भूल-चूक मुझसे हो गई उसपर मुझे न पकड़िए और मेरे मामलें में मुझे तंगी में न डालिए।"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने ख़ज़िर से कहा : मेरे भूलवश आपकी प्रतिज्ञा छोड़ने के कारण आप मेरी पकड़ न करें और अपनी संगत के मामले में मुझे तंगी में न डालें और सख़्ती न करें।
आयत 74
فَٱنطَلَقَا حَتَّىٰٓ إِذَا لَقِيَا غُلَـٰمًۭا فَقَتَلَهُۥ قَالَ أَقَتَلْتَ نَفْسًۭا زَكِيَّةًۢ بِغَيْرِ نَفْسٍۢ لَّقَدْ جِئْتَ شَيْـًۭٔا نُّكْرًۭا
فَٱنطَلَقَا
तो दोनों चल दिए
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
لَقِيَا
वो दोनों मिले
غُلَـٰمًۭا
एक लड़के को
فَقَتَلَهُۥ
तो उसने क़त्ल कर दिया उसे
قَالَ
कहा
أَقَتَلْتَ
क्या क़त्ल कर दिया तुमने
نَفْسًۭا
एक जान को
زَكِيَّةًۢ
जो पाक थी
بِغَيْرِ
बग़ैर
نَفْسٍۢ
किसी जान के (बदले)
لَّقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
جِئْتَ
लाए हो तुम
شَيْـًۭٔا
एक चीज़
نُّكْرًۭا
इन्तिहाई नापसंदीदा
फिर वे दोनों चले, यहाँ तक कि जब वे एक लड़के से मिले तो उसने उसे मार डाला। कहा, "क्या आपने एक अच्छी-भली जान की हत्या कर दी, बिना इसके कि किसी की हत्या का बदला लेना अभीष्ट हो? यह तो आपने बहुत ही बुरा किया!"
तफ़्सीर:
फिर नाव से उतरने के बाद, वे दोनो तट पर चलने लगे। तो उन्होंने एक बच्चे को, जो अभी बालिग नहीं हुआ था, अन्य बच्चों के साथ खेलते देखा। तो ख़ज़िर ने उसे मार डाला। इसपर मूसा अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा : क्या आपने एक पवित्र (निर्दोष) जान को जो बालिग नहीं हुई थी, बिना किसी अपराध के क़त्ल कर दिया?! आपने एक बहुत ही बुरा काम किया है!
आयत 75
۞ قَالَ أَلَمْ أَقُل لَّكَ إِنَّكَ لَن تَسْتَطِيعَ مَعِىَ صَبْرًۭا
۞ قَالَ
उसने कहा
أَلَمْ
क्या नहीं
أَقُل
मैंने कहा था
لَّكَ
तुम्हें
إِنَّكَ
बेशक तुम
لَن
हरगिज़ नहीं
تَسْتَطِيعَ
तुम इस्तिताअत रखोगे
مَعِىَ
मेरे साथ
صَبْرًۭا
सब्र की
उसने कहा, "क्या मैंने तुमसे कहा नहीं था कि तुम मेरे साथ धैर्य न रख सकोगे?"
तफ़्सीर:
ख़ज़िर ने मूसा अलैहिस्सलाम से कहा : मैंने आपसे कहा था कि (ऐ मूसा!) आप मेरे द्वारा किए गए कार्यों को देखकर धैर्य नहीं रख पाएँगे!
आयत 76
قَالَ إِن سَأَلْتُكَ عَن شَىْءٍۭ بَعْدَهَا فَلَا تُصَـٰحِبْنِى ۖ قَدْ بَلَغْتَ مِن لَّدُنِّى عُذْرًۭا
قَالَ
कहा (मूसा ने)
إِن
अगर
سَأَلْتُكَ
सवाल करूँ मैं तुमसे
عَن
about
شَىْءٍۭ
किसी चीज़ के बारे में
بَعْدَهَا
बाद इसके
فَلَا
तो ना
تُصَـٰحِبْنِى ۖ
तुम साथ रखना मुझे
قَدْ
तहक़ीक़
بَلَغْتَ
पहुँच गए तुम
مِن
from me
لَّدُنِّى
मेरी तरफ़ से
عُذْرًۭا
उज़र को
कहा, "इसके बाद यदि मैं आपसे कुछ पूछूँ तो आप मुझे साथ न रखें। अब तो मेरी ओर से आप पूरी तरह उज़ को पहुँच चुके है।"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा : यदि मैं इस बार के बाद आपसे किसी चीज़ के बारे में पूछूँ, तो मुझे अलग कर दीजिएगा। निश्चय आप उस सीमा तक पहुँच चुके हैं, जहाँ आपके पास मेरा साथ छोड़ने का उचित कारण है; क्योंकि मैंने आपकी दो बार अवज्ञा की।
आयत 77
فَٱنطَلَقَا حَتَّىٰٓ إِذَآ أَتَيَآ أَهْلَ قَرْيَةٍ ٱسْتَطْعَمَآ أَهْلَهَا فَأَبَوْا۟ أَن يُضَيِّفُوهُمَا فَوَجَدَا فِيهَا جِدَارًۭا يُرِيدُ أَن يَنقَضَّ فَأَقَامَهُۥ ۖ قَالَ لَوْ شِئْتَ لَتَّخَذْتَ عَلَيْهِ أَجْرًۭا
فَٱنطَلَقَا
पस वो दोनों चल दिए
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَآ
जब
أَتَيَآ
वो दोनों आए
أَهْلَ
(to the) people
قَرْيَةٍ
एक बस्ती वालों के पास
ٱسْتَطْعَمَآ
उन दोनों ने खाना माँगा
أَهْلَهَا
उसके रहने वालों से
فَأَبَوْا۟
तो उन्होंने इन्कार कर दिया
أَن
कि
يُضَيِّفُوهُمَا
वो मेहमान बनाऐं उन्हें
فَوَجَدَا
तो उन दोनों ने पाई
فِيهَا
उसमें
جِدَارًۭا
एक दीवार
يُرِيدُ
वो चाहती थी
أَن
कि
يَنقَضَّ
वो टूट गिरे
فَأَقَامَهُۥ ۖ
तो उसने सीधा खड़ा कर दिया उसे
قَالَ
उसने कहा
لَوْ
अगर
شِئْتَ
चाहते तुम
لَتَّخَذْتَ
अलबत्ता ले लेते तुम
عَلَيْهِ
उस पर
أَجْرًۭا
कोई उजरत
फिर वे दोनों चले, यहाँ तक कि जब वे एक बस्तीवालों के पास पहुँचे और उनसे भोजन माँगा, किन्तु उन्होंने उनके आतिथ्य से इनकार कर दिया। फिर वहाँ उन्हें एक दीवार मिली जो गिरा चाहती थी, तो उस व्यक्ति ने उसको खड़ा कर दिया। (मूसा ने) कहा, "यदि आप चाहते तो इसकी कुछ मज़दूरी ले सकते थे।"
तफ़्सीर:
फिर दोनों चल पड़े, यहाँ तक कि जब वे एक गाँव वालों के पास आए, उसके रहने वालों से भोजन माँगा, तो गाँव वालों ने दोनों को भोजन कराने और उनकी मेहमानी का हक़ अदा करने से इनकार कर दिया। इसी बीच दोनों को गाँव में एक दीवार मिली, जो झुकी हुई थी और गिरने ही वाली थी। ख़ज़िर ने उसे बराबर करके सीधा कर दिया। इसपर मूसा अलैहिस्सलाम ने ख़ज़िर से कहा : यदि आप इसकी मरम्मत के लिए कुछ मज़दूरी लेना चाहते, तो ज़रूर ले लेते, जिसकी हमें उनके हमारी मेज़बानी करने से इनकार करने के बाद आवश्यकता भी थी।
आयत 78
قَالَ هَـٰذَا فِرَاقُ بَيْنِى وَبَيْنِكَ ۚ سَأُنَبِّئُكَ بِتَأْوِيلِ مَا لَمْ تَسْتَطِع عَّلَيْهِ صَبْرًا
قَالَ
कहा
هَـٰذَا
ये है
فِرَاقُ
जुदाई
بَيْنِى
दर्मियान मेरे
وَبَيْنِكَ ۚ
और दर्मियान तुम्हारे
سَأُنَبِّئُكَ
अनक़रीब मैं बताऊँगा तुम्हें
بِتَأْوِيلِ
हक़ीक़त
مَا
उसकी जो
لَمْ
नहीं
تَسْتَطِع
तुम कर सके
عَّلَيْهِ
जिस पर
صَبْرًا
सब्र
उसने कहा, "यह मेरे और तुम्हारे बीच जुदाई का अवसर है। अब मैं तुमको उसकी वास्तविकता बताए दे रहा हूँ, जिसपर तुम धैर्य से काम न ले सके।"
तफ़्सीर:
ख़ज़िर ने मूसा अलैहिस्सलाम से कहा : दीवार सीधी करने पर मेरे पारिश्रमिक न लेने पर यह आपत्ति आपके और मेरे बीच जुदाई का बिंदु है। अब मैं आपको उसकी वास्तविकता बताऊँगा, जो मुझे करते हुए देख आप धैर्य नहीं रख सके।
आयत 79
أَمَّا ٱلسَّفِينَةُ فَكَانَتْ لِمَسَـٰكِينَ يَعْمَلُونَ فِى ٱلْبَحْرِ فَأَرَدتُّ أَنْ أَعِيبَهَا وَكَانَ وَرَآءَهُم مَّلِكٌۭ يَأْخُذُ كُلَّ سَفِينَةٍ غَصْبًۭا
أَمَّا
रही
ٱلسَّفِينَةُ
कश्ती
فَكَانَتْ
तो थी वो
لِمَسَـٰكِينَ
मिस्कीनों की
يَعْمَلُونَ
जो काम करते थे
فِى
in
ٱلْبَحْرِ
दरिया में
فَأَرَدتُّ
तो चाहा मैंने
أَنْ
कि
أَعِيبَهَا
मैं ऐबदार कर दूँ उसे
وَكَانَ
और था
وَرَآءَهُم
आगे उनके
مَّلِكٌۭ
एक बादशाह
يَأْخُذُ
जो ले रहा था
كُلَّ
हर
سَفِينَةٍ
कश्ती को
غَصْبًۭا
ज़ुल्म/जबर से
वह जो नौका थी, कुछ निर्धन लोगों की थी जो दरिया में काम करते थे, तो मैंने चाहा कि उसे ऐबदार कर दूँ, क्योंकि आगे उनके परे एक सम्राट था, जो प्रत्येक नौका को ज़बरदस्ती छीन लेता था
तफ़्सीर:
जहाँ तक नाव की बात है, जिसे फाड़ देने पर आपने मेरा विरोध किया था, तो उसके मालिक कुछ कमज़ोर लोग थे, जो सागर में उसपर काम करते थे और वे उसकी रक्षा करने में असमर्थ थे। इसलिए मैंने सोचा कि उसे फाड़कर ऐबदार बना दूँ; ताकि एक राजा जो उनके आगे था उसपर क़ब्ज़ा न कर ले, जो हर अच्छी नाव को उसके मालिकों से ज़बरदस्ती छीन लेता था, तथा हर ऐबदार (खराब) नाव को छोड़ देता था।
आयत 80
وَأَمَّا ٱلْغُلَـٰمُ فَكَانَ أَبَوَاهُ مُؤْمِنَيْنِ فَخَشِينَآ أَن يُرْهِقَهُمَا طُغْيَـٰنًۭا وَكُفْرًۭا
وَأَمَّا
और रहा
ٱلْغُلَـٰمُ
लड़का
فَكَانَ
तो थे
أَبَوَاهُ
वालिदैन उसके
مُؤْمِنَيْنِ
दोनों मोमिन
فَخَشِينَآ
तो डर हुआ हमें
أَن
कि
يُرْهِقَهُمَا
वो तकलीफ़ देगा उन्हें
طُغْيَـٰنًۭا
सरकशी
وَكُفْرًۭا
और कुफ़्र से
और रहा वह लड़का, तो उसके माँ-बाप ईमान पर थे। हमें आशंका हुई कि वह सरकशी और कुफ़्र से उन्हें तंग करेगा
तफ़्सीर:
और रहा वह बालक, जिसकी हत्या करने पर आपने मेरा खंडन किया था, तो उसके माता-पिता ईमान वाले थे और वह (बालक) अल्लाह के ज्ञान में काफ़िर था। इसलिए हमें डर था कि कहीं वह बड़ा होने के बाद अपने माता-पिता को अल्लाह के साथ कुफ़्र और सरकशी के लिए न प्रेरित करे, क्योंकि माता-पिता को अपने बच्चे से असीम प्रेम होने के साथ-साथ उन्हें उसकी आवश्यकता भी होती है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
खिज़्र अलैहिस्सलाम के अजीब कामों का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि हर बात की असली हिकमत फौरन समझ नहीं आती, कभी सब्र से इंतज़ार करना पड़ता है।
आयत 81
فَأَرَدْنَآ أَن يُبْدِلَهُمَا رَبُّهُمَا خَيْرًۭا مِّنْهُ زَكَوٰةًۭ وَأَقْرَبَ رُحْمًۭا
فَأَرَدْنَآ
तो इरादा किया हमने
أَن
कि
يُبْدِلَهُمَا
बदल कर दे उन दोनों को
رَبُّهُمَا
रब उन दोनों का
خَيْرًۭا
बेहतर
مِّنْهُ
उससे
زَكَوٰةًۭ
पाकीज़गी में
وَأَقْرَبَ
और ज़्यादा क़रीब
رُحْمًۭا
रहमत में
इसलिए हमने चाहा कि उनका रब उन्हें इसके बदले दूसरी संतान दे, जो आत्मविकास में इससे अच्छा हो और दया-करूणा से अधिक निकट हो
तफ़्सीर:
इसलिए हमने चाहा कि अल्लाह उन दोनों को उसके बदले में एक ऐसा बालक प्रदान करे, जो धार्मिकता, भलाई और पाप से बचने के मामले में उससे बेहतर हो और अपने माता-पिता के प्रति दया-भाव में उससे अधिक निकट हो।
आयत 82
وَأَمَّا ٱلْجِدَارُ فَكَانَ لِغُلَـٰمَيْنِ يَتِيمَيْنِ فِى ٱلْمَدِينَةِ وَكَانَ تَحْتَهُۥ كَنزٌۭ لَّهُمَا وَكَانَ أَبُوهُمَا صَـٰلِحًۭا فَأَرَادَ رَبُّكَ أَن يَبْلُغَآ أَشُدَّهُمَا وَيَسْتَخْرِجَا كَنزَهُمَا رَحْمَةًۭ مِّن رَّبِّكَ ۚ وَمَا فَعَلْتُهُۥ عَنْ أَمْرِى ۚ ذَٰلِكَ تَأْوِيلُ مَا لَمْ تَسْطِع عَّلَيْهِ صَبْرًۭا
وَأَمَّا
और रही
ٱلْجِدَارُ
दीवार
فَكَانَ
पस वो थी
لِغُلَـٰمَيْنِ
दो लड़कों की
يَتِيمَيْنِ
जो दोनों यतीम थे
فِى
in
ٱلْمَدِينَةِ
शहर में
وَكَانَ
और था
تَحْتَهُۥ
नीचे उसके
كَنزٌۭ
एक ख़ज़ाना
لَّهُمَا
उन दोनों का
وَكَانَ
और था
أَبُوهُمَا
उन दोनों का बाप
صَـٰلِحًۭا
नेक
فَأَرَادَ
तो इरादा किया
رَبُّكَ
तेरे रब ने
أَن
कि
يَبْلُغَآ
वो दोनों पहुँचें
أَشُدَّهُمَا
अपनी जवानी को
وَيَسْتَخْرِجَا
और वो दोनों निकालें
كَنزَهُمَا
अपने ख़ज़ाने को
رَحْمَةًۭ
बतौरे रहमत
مِّن
from
رَّبِّكَ ۚ
तेरे रब की तरफ़ से
وَمَا
और नहीं
فَعَلْتُهُۥ
किया मैंने उसे
عَنْ
on
أَمْرِى ۚ
अपनी राय से
ذَٰلِكَ
ये है
تَأْوِيلُ
हक़ीक़त
مَا
उसकी जो
لَمْ
नहीं
تَسْطِع
तुम कर सके
عَّلَيْهِ
जिस पर
صَبْرًۭا
सब्र
और रही यह दीवार तो यह दो अनाथ बालकों की है जो इस नगर में रहते है। और इसके नीचे उनका ख़जाना मौजूद है। और उनका बाप नेक था, इसलिए तुम्हारे रब ने चाहा कि वे अपनी युवावस्था को पहुँच जाएँ और अपना ख़जाना निकाल लें। यह तुम्हारे रब की दयालुता के कारण हुआ। मैंने तो अपने अधिकार से कुछ नहीं किया। यह है वास्तविकता उसकी जिसपर तुम धैर्य न रख सके।"
तफ़्सीर:
और रही बात उस दीवार की, जिसकी मैंने मरम्मत की थी तथा आपने उसकी मरम्मत करने पर मेरा विरोध किया था, वह उस नगर के दो बालकों की थी, जिसमें हम आए थे : उनके पिता की मृत्यु हो चुकी थी और दीवार के नीचे उन दोनों के लिए धन गाड़ा हुआ था और इन दोनों बालकों का पिता नेक था। इसलिए (हे मूसा!) आपके पालनहार ने चाहा कि वे दोनों वयस्कता तक पहुँचें और बड़े हो जाएँ और दीवार के नीचे से अपने गड़े हुए धन को निकालें; क्योंकि यदि दीवार अभी गिर जाती, तो उनका धन प्रकट हो जाता और क्षति से ग्रस्त हो जाता। दरअसल, यह उपाय आपके पालनहार की ओर से उन दोनों पर एक दया थी। मैंने इसे अपने विवेक से नहीं किया था। यह है असल वास्तविकता उन घटनाओं की, जिनपर आप धैर्य नहीं रख सके।
आयत 83
وَيَسْـَٔلُونَكَ عَن ذِى ٱلْقَرْنَيْنِ ۖ قُلْ سَأَتْلُوا۟ عَلَيْكُم مِّنْهُ ذِكْرًا
وَيَسْـَٔلُونَكَ
और वो सवाल करते हैं आपसे
عَن
about
ذِى
Dhul-qarnain
ٱلْقَرْنَيْنِ ۖ
ज़ुलक़रनैन के बारे में
قُلْ
कह दीजिए
سَأَتْلُوا۟
अनक़रीब मैं पढ़ूँगा
عَلَيْكُم
तुम पर
مِّنْهُ
उसका
ذِكْرًا
कुछ हाल
वे तुमसे ज़ुलक़रनैन के विषय में पूछते हैं। कह दो, "मैं तुम्हें उसका कुछ वृतान्त सुनाता हूँ।"
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) अनेकेश्वरवादी तथा यहूदी आपको परखने के लिए आपसे ज़ुल-क़रनैन के समाचार के बारे में पूछते हैं। आप कह दें : मैं तुम्हें उसके वृत्तांत का एक भाग अवश्य सुनाऊँगा, जिससे तुम शिक्षा ग्रहण कर सको और नसीहत हासिल कर सको।
आयत 84
إِنَّا مَكَّنَّا لَهُۥ فِى ٱلْأَرْضِ وَءَاتَيْنَـٰهُ مِن كُلِّ شَىْءٍۢ سَبَبًۭا
إِنَّا
बेशक हम
مَكَّنَّا
इक़्तिदार दिया हमने
لَهُۥ
उसे
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَءَاتَيْنَـٰهُ
और दिए हमने उसे
مِن
of
كُلِّ
every
شَىْءٍۢ
हर चीज़ से
سَبَبًۭا
असबाब
हमने उसे धरती में सत्ता प्रदान की थी और उसे हर प्रकार के संसाधन दिए थे
तफ़्सीर:
हमने उसे धरती में प्रभुत्व प्रदान किया, तथा हमने उसे उसकी ज़रूरत से जुड़ी हर चीज़ का रास्ता दिया, जिससे वह अपने लक्ष्य तक पहुँच सके।
आयत 85
فَأَتْبَعَ سَبَبًا
فَأَتْبَعَ
तो उसने पीछे लगाया
سَبَبًا
असबाब को
अतएव उसने एक अभियान का आयोजन किया
तफ़्सीर:
हमने उसे अपने उद्देश्य तक पहुँचने के लिए जो साधन एवं तरीक़े प्रदान किए थे, उसने उन्हें अपनाया और पश्चिम की ओर चल पड़ा।
आयत 86
حَتَّىٰٓ إِذَا بَلَغَ مَغْرِبَ ٱلشَّمْسِ وَجَدَهَا تَغْرُبُ فِى عَيْنٍ حَمِئَةٍۢ وَوَجَدَ عِندَهَا قَوْمًۭا ۗ قُلْنَا يَـٰذَا ٱلْقَرْنَيْنِ إِمَّآ أَن تُعَذِّبَ وَإِمَّآ أَن تَتَّخِذَ فِيهِمْ حُسْنًۭا
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
بَلَغَ
वो पहुँच गया
مَغْرِبَ
ग़ुरूब होने की जगह
ٱلشَّمْسِ
सूरज के
وَجَدَهَا
उसने पाया उसे
تَغْرُبُ
वो ग़ुरूब हो रहा है
فِى
in
عَيْنٍ
एक चश्मे में
حَمِئَةٍۢ
स्याह कीचड़ वाले
وَوَجَدَ
और उसने पाया
عِندَهَا
पास उसके
قَوْمًۭا ۗ
एक क़ौम को
قُلْنَا
कहा हमने
يَـٰذَا
O Dhul-qarnain
ٱلْقَرْنَيْنِ
ऐ ज़ुलक़रनैन
إِمَّآ
ख़्वाह
أَن
ये कि
تُعَذِّبَ
तू सज़ा दे
وَإِمَّآ
और ख़्वाह
أَن
ये कि
تَتَّخِذَ
तू इख़्तियार करे
فِيهِمْ
उनके मामले में
حُسْنًۭا
भलाई
यहाँ तक कि जब वह सूर्यास्त-स्थल तक पहुँचा तो उसे मटमैले काले पानी के एक स्रोत में डूबते हुए पाया और उसके निकट उसे एक क़ौम मिली। हमने कहा, "ऐ ज़ुलक़रनैन! तुझे अधिकार है कि चाहे तकलीफ़ पहुँचाए और चाहे उनके साथ अच्छा व्यवहार करे।"
तफ़्सीर:
तथा वह पृथ्वी पर चलता रहा, यहाँ तक कि जब सूर्यास्त की दिशा से (आँख की दृष्टि में) पृथ्वी के अंत तक पहुँच गया, तो उसने सूर्य को देखा, मानो कि वह एक काले कीचड़ वाले गर्म जलस्रोत में ड़ूब रहा है। तथा उसने सूर्यास्त के स्थान के पास अल्लाह पर विश्वास न रखने वाली एक जाति को पाया। हमने उसे एक विकल्प के रूप में कहा : ऐ ज़ुल-क़रनैन! या तो तुम इन लोगों को क़त्ल करके या किसी अन्य चीज़ के साथ यातना दो, और या तो तुम उनके साथ अच्छा व्यवहार करो।
आयत 87
قَالَ أَمَّا مَن ظَلَمَ فَسَوْفَ نُعَذِّبُهُۥ ثُمَّ يُرَدُّ إِلَىٰ رَبِّهِۦ فَيُعَذِّبُهُۥ عَذَابًۭا نُّكْرًۭا
قَالَ
उसने कहा
أَمَّا
रहा वो
مَن
जिसने
ظَلَمَ
ज़ुल्म किया
فَسَوْفَ
तो अनक़रीब
نُعَذِّبُهُۥ
हम सज़ा देंगे उसे
ثُمَّ
फिर
يُرَدُّ
वो लौटाया जाएगा
إِلَىٰ
to
رَبِّهِۦ
तरफ़ अपने रब के
فَيُعَذِّبُهُۥ
तो वो अजाब देगा उसे
عَذَابًۭا
अज़ाब
نُّكْرًۭا
सख़्त
उसने कहा, "जो कोई ज़ुल्म करेगा उसे तो हम दंड देंगे। फिर वह अपने रब की ओर पलटेगा और वह उसे कठोर यातना देगा
तफ़्सीर:
ज़ुल-क़रनैन ने कहा : जो कोई हमारी ओर से एक अल्लाह की इबादत के लिए बुलाने के बाद भी अल्लाह के साथ साझी ठहराएगा और उसपर अटल रहेगा, तो हम उसे दुनिया में क़त्ल का दंड देंगे, फिर वह क़ियामत के दिन अपने पालनहार की ओर लौटाया जाएगा, तो वह उसे भयानक सज़ा देगा।
आयत 88
وَأَمَّا مَنْ ءَامَنَ وَعَمِلَ صَـٰلِحًۭا فَلَهُۥ جَزَآءً ٱلْحُسْنَىٰ ۖ وَسَنَقُولُ لَهُۥ مِنْ أَمْرِنَا يُسْرًۭا
وَأَمَّا
और रहा
مَنْ
वो जो
ءَامَنَ
ईमान लाया
وَعَمِلَ
और उसने अमल किए
صَـٰلِحًۭا
नेक
فَلَهُۥ
तो उसके लिए
جَزَآءً
जज़ा है
ٱلْحُسْنَىٰ ۖ
अच्छी
وَسَنَقُولُ
और अनक़रीब हम कहेंगे
لَهُۥ
उसे
مِنْ
from
أَمْرِنَا
अपने काम में से
يُسْرًۭا
आसान
किन्तु जो कोई ईमान लाया औऱ अच्छा कर्म किया, उसके लिए तो अच्छा बदला है और हम उसे अपना सहज एवं मृदुल आदेश देंगे।"
तफ़्सीर:
किंतु, उनमें से जो ईमान लाएगा तथा अच्छे कर्म करेगा, उसके लिए जन्नत है। यह उसके पालनहार की ओर से उसके ईमान तथा अच्छे कर्म का प्रतिफल है। तथा हम उसे अपने कामों में से सहज और सरल का आदेश देंगे।
आयत 89
ثُمَّ أَتْبَعَ سَبَبًا
ثُمَّ
फिर
أَتْبَعَ
उसने पीछे लगाया
سَبَبًا
असबाब को
फिर उसने एक और अभियान का आयोजन किया
तफ़्सीर:
फिर वह सूर्योदय की दिशा की ओर रुख करते हुए अपने पहले मार्ग को छोड़ दूसरे रास्ते पर चल पड़ा।
आयत 90
حَتَّىٰٓ إِذَا بَلَغَ مَطْلِعَ ٱلشَّمْسِ وَجَدَهَا تَطْلُعُ عَلَىٰ قَوْمٍۢ لَّمْ نَجْعَل لَّهُم مِّن دُونِهَا سِتْرًۭا
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
بَلَغَ
वो पहुँच गया
مَطْلِعَ
तुलूअ होने की जगह
ٱلشَّمْسِ
सूरज के
وَجَدَهَا
उसने पाया उसे
تَطْلُعُ
कि वो तुलूअ हो रहा है
عَلَىٰ
on
قَوْمٍۢ
उन लोगों पर
لَّمْ
नहीं
نَجْعَل
बनाया हमने
لَّهُم
उनके लिए
مِّن
against it
دُونِهَا
उस (सूरज) के आगे
سِتْرًۭا
कोई परदा/ओट
यहाँ तक कि जब वह सूर्योदय स्थल पर जा पहुँचा तो उसने उसे ऐसे लोगों पर उदित होते पाया जिनके लिए हमने सूर्य के मुक़ाबले में कोई ओट नहीं रखी थी
तफ़्सीर:
और वह चलता रहा, यहाँ तक कि जब वह (आँख की दृष्टि में) सूरज उगने की दिशा में पहुँच गया, तो उसने सूरज को ऐसे लोगों पर उगता हुआ पाया, जिनके लिए हमने सूर्य के ताप से बचने की कोई ओट, जैसे घर और पेड़ों की छाया नहीं बनाई थी।
आज की ज़िंदगी में सबक़
खिज़्र अलैहिस्सलाम की हिकमत के इंकिशाफ और ज़ुल-क़रनैन के ज़िक्र की शुरुआत है। यह हमें सिखाता है कि जो बात बाहर से बुरी लगे, हो सकता है उसके पीछे कोई बड़ी भलाई छुपी हो।
आयत 91
كَذَٰلِكَ وَقَدْ أَحَطْنَا بِمَا لَدَيْهِ خُبْرًۭا
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
وَقَدْ
और तहक़ीक़
أَحَطْنَا
घेर रखा था हमने
بِمَا
उसको जो
لَدَيْهِ
उसके पास था
خُبْرًۭا
ख़बर में से
ऐसा ही हमने किया था और जो कुछ उसके पास था, उसकी हमें पूरी ख़बर थी
तफ़्सीर:
ज़ुल-क़रनैन का मामला ऐसा ही था, तथा हमारे ज्ञान ने उसकी शक्ति और अधिकार के विवरण को घेर रखा था।
आयत 92
ثُمَّ أَتْبَعَ سَبَبًا
ثُمَّ
फिर
أَتْبَعَ
उसने पीछे लगाया
سَبَبًا
असबाब को
उसने फिर एक अभियान का आयोजन किया,
तफ़्सीर:
फिर उसने पूर्व और पश्चिम के बीच पहले दो मार्गों के अलावा एक अन्य मार्ग अपनाया।
आयत 93
حَتَّىٰٓ إِذَا بَلَغَ بَيْنَ ٱلسَّدَّيْنِ وَجَدَ مِن دُونِهِمَا قَوْمًۭا لَّا يَكَادُونَ يَفْقَهُونَ قَوْلًۭا
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
بَلَغَ
वो पहुँचा
بَيْنَ
between
ٱلسَّدَّيْنِ
दर्मियान दो पहाड़ों के
وَجَدَ
उसने पाया
مِن
besides them
دُونِهِمَا
उन दोनों से उस तरफ़
قَوْمًۭا
ऐसे लोगों को
لَّا
not
يَكَادُونَ
ना वो क़रीब थे
يَفْقَهُونَ
कि वो समझते
قَوْلًۭا
बात को
यहाँ तक कि जब वह दो पर्वतों के बीच पहुँचा तो उसे उनके इस किनारे कुछ पहुँचा तो उसे उनके इस किनारे कुछ लोग मिले, जो ऐसा लगाता नहीं था कि कोई बात समझ पाते हों
तफ़्सीर:
और वह चलता रहा, यहाँ तक कि दो पर्वतों के बीच एक दर्रे तक पहुँचा, तो दोनों के उस पार एक ऐसी जाति को पाया, जो मुश्किल से किसी और की बात समझ पाती थी।
आयत 94
قَالُوا۟ يَـٰذَا ٱلْقَرْنَيْنِ إِنَّ يَأْجُوجَ وَمَأْجُوجَ مُفْسِدُونَ فِى ٱلْأَرْضِ فَهَلْ نَجْعَلُ لَكَ خَرْجًا عَلَىٰٓ أَن تَجْعَلَ بَيْنَنَا وَبَيْنَهُمْ سَدًّۭا
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
يَـٰذَا
O Dhul-qarnain
ٱلْقَرْنَيْنِ
ऐ ज़ुलक़रनैन
إِنَّ
बेशक
يَأْجُوجَ
याजूज
وَمَأْجُوجَ
और माजूज
مُفْسِدُونَ
फ़साद करने वाले हैं
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
فَهَلْ
तो क्या
نَجْعَلُ
हम (जमा) कर दें
لَكَ
तेरे लिए
خَرْجًا
कुछ ख़राज
عَلَىٰٓ
इस पर
أَن
कि
تَجْعَلَ
तू बना दे
بَيْنَنَا
दर्मियान हमारे
وَبَيْنَهُمْ
और दर्मियान उनके
سَدًّۭا
एक बँद/दीवार
उन्होंने कहा, "ऐ ज़ुलक़रनैन! याजूज और माजूज इस भूभाग में उत्पात मचाते हैं। क्या हम तुम्हें कोई कर इस बात काम के लिए दें कि तुम हमारे और उनके बीच एक अवरोध निर्मित कर दो?"
तफ़्सीर:
उन लोगों ने कहा : ऐ ज़ुल-क़रनैन! याजूज और माजूज (इससे अभिप्राय दो बड़े मानव समुदाय थे।) हत्या आदि के द्वारा इस भूभाग में उत्पात मचाते रहते हैं। तो क्या हम आपको कुछ धन प्रदान करें कि आप हमारे और उनके बीच एक अवरोध निर्मित कर देंॽ
आयत 95
قَالَ مَا مَكَّنِّى فِيهِ رَبِّى خَيْرٌۭ فَأَعِينُونِى بِقُوَّةٍ أَجْعَلْ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُمْ رَدْمًا
قَالَ
उसने कहा
مَا
जो
مَكَّنِّى
क़ुदरत दी है मुझे
فِيهِ
इसमें
رَبِّى
मेरे रब ने
خَيْرٌۭ
बेहतर है
فَأَعِينُونِى
पस तुम सब मदद करो मेरी
بِقُوَّةٍ
साथ क़ुव्वत के
أَجْعَلْ
मैं बनाऊँ
بَيْنَكُمْ
दर्मियान तुम्हारे
وَبَيْنَهُمْ
और दर्मियान उनके
رَدْمًا
एक मज़बूत बँद
उसने कहा, "मेरे रब ने मुझे जो कुछ अधिकार एवं शक्ति दी है वह उत्तम है। तुम तो बस बल में मेरी सहायता करो। मैं तुम्हारे और उनके बीच एक सुदृढ़ दीवार बनाए देता हूँ
तफ़्सीर:
ज़ुल-क़रनैन ने कहा : मेरे पालनहार ने मुझे जो शक्ति एवं सत्ता प्रदान की है, वह मेरे लिए उससे बेहतर है जो तुम मुझे धन दे रहे हो। अतः तुम मानवबल और उपकरणों के द्वारा मेरी सहायता करो, मैं तुम्हारे और उनके बीच एक अवरोध बना दूँगा।
आयत 96
ءَاتُونِى زُبَرَ ٱلْحَدِيدِ ۖ حَتَّىٰٓ إِذَا سَاوَىٰ بَيْنَ ٱلصَّدَفَيْنِ قَالَ ٱنفُخُوا۟ ۖ حَتَّىٰٓ إِذَا جَعَلَهُۥ نَارًۭا قَالَ ءَاتُونِىٓ أُفْرِغْ عَلَيْهِ قِطْرًۭا
ءَاتُونِى
दो मुझे
زُبَرَ
तख़्ते
ٱلْحَدِيدِ ۖ
लोहे के
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
سَاوَىٰ
उसने बराबर कर दिया
بَيْنَ
दर्मियान
ٱلصَّدَفَيْنِ
दो पहाड़ों के ख़ला को
قَالَ
कहा
ٱنفُخُوا۟ ۖ
फूँको
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
جَعَلَهُۥ
उसने कर दिया उसे
نَارًۭا
आग
قَالَ
कहा
ءَاتُونِىٓ
दो मुझे
أُفْرِغْ
मैं उँडेलूं
عَلَيْهِ
इस पर
قِطْرًۭا
पिघला हुआ ताँबा
मुझे लोहे के टुकड़े ला दो।" यहाँ तक कि जब दोनों पर्वतों के बीच के रिक्त स्थान को पाटकर बराबर कर दिया तो कहा, "धौंको!" यहाँ तक कि जब उसे आग कर दिया तो कहा, "मुझे पिघला हुआ ताँबा ला दो, ताकि मैं उसपर उँड़ेल दूँ।"
तफ़्सीर:
तुम लोहे के टुकड़े ले आओ। चुनाँचे वे लोहे के टुकड़े ले आए, तो वह उनके साथ दोनों पहाड़ों के बीच दीवार बनाना शुरू कर दिया, यहाँ तक कि जब उसने दीवार को दोनों पर्वतों के बराबर कर दिया, तो उसने श्रमिकों से कहा : इन टुकड़ों पर आग दहकाओ। यहाँ तक कि जब लोहे के टुकड़े लाल हो गए, तो उसने कहा : ताँबा ले आओ कि मैं उसे इसपर उंडेल दूँ।
आयत 97
فَمَا ٱسْطَـٰعُوٓا۟ أَن يَظْهَرُوهُ وَمَا ٱسْتَطَـٰعُوا۟ لَهُۥ نَقْبًۭا
فَمَا
तो ना
ٱسْطَـٰعُوٓا۟
वो ताक़त रखते थे
أَن
कि
يَظْهَرُوهُ
वो चढ़ सकें उस पर
وَمَا
और ना
ٱسْتَطَـٰعُوا۟
वो ताक़त रखते थे
لَهُۥ
उसमें
نَقْبًۭا
सूराख़ करने की
तो न तो वे (याजूज, माजूज) उसपर चढ़कर आ सकते थे और न वे उसमें सेंध ही लगा सकते थे
तफ़्सीर:
फिर याजूज और माजूज उसकी ऊँचाई के कारण उसपर चढ़ नहीं सके और उसकी मज़बूती के कारण उसमें नीचे से सेंध भी नहीं लगा सके।
आयत 98
قَالَ هَـٰذَا رَحْمَةٌۭ مِّن رَّبِّى ۖ فَإِذَا جَآءَ وَعْدُ رَبِّى جَعَلَهُۥ دَكَّآءَ ۖ وَكَانَ وَعْدُ رَبِّى حَقًّۭا
قَالَ
कहा
هَـٰذَا
ये है
رَحْمَةٌۭ
रहमत
مِّن
from
رَّبِّى ۖ
मेरे रब की तरफ़ से
فَإِذَا
फिर जब
جَآءَ
आ जाएगा
وَعْدُ
वादा
رَبِّى
मेरे रब का
جَعَلَهُۥ
वो कर देगा उसे
دَكَّآءَ ۖ
रेज़ा-रेज़ा
وَكَانَ
और है
وَعْدُ
वादा
رَبِّى
मेरे रब का
حَقًّۭا
बरहक़
उसने कहा, "यह मेरे रब की दयालुता है, किन्तु जब मेरे रब के वादे का समय आ जाएगा तो वह उसे ढाकर बराबर कर देगा, और मेरे रब का वादा सच्चा है।"
तफ़्सीर:
ज़ुल-क़रनैन ने कहा : यह बाँध मेरे रब की ओर से एक दया है, जो याजूज और माजूज को धरती में उपद्रव मचाने से रोकने का काम करेगा। फिर जब वह समय आ जाएगा, जिसे अल्लाह ने क़ियामत से पहले उनके निकलने के लिए निर्धारित कर रखा है, तो अल्लाह उसे ध्वस्त कर देगा। तथा उसे ध्वस्त करके ज़मीन के बराबर करने और याजूज एवं माजूज के निकलने से संबंधित अल्लाह का वादा अटल है, जिसका उल्लंघन नहीं हो सकता।
आयत 99
۞ وَتَرَكْنَا بَعْضَهُمْ يَوْمَئِذٍۢ يَمُوجُ فِى بَعْضٍۢ ۖ وَنُفِخَ فِى ٱلصُّورِ فَجَمَعْنَـٰهُمْ جَمْعًۭا
۞ وَتَرَكْنَا
और छोड़ देंगे हम
بَعْضَهُمْ
उनके बाज़ को
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
يَمُوجُ
वो मौज की तरह घुस जाऐंगे
فِى
over
بَعْضٍۢ ۖ
बाज़ में
وَنُفِخَ
और फूँक मारी जाएगी
فِى
in
ٱلصُّورِ
सूर में
فَجَمَعْنَـٰهُمْ
तो जमा कर लेंगे हम उन्हें
جَمْعًۭا
जमा करना
उस दिन हम उन्हें छोड़ देंगे कि वे एक-दूसरे से मौज़ों की तरह परस्पर गुत्मथ-गुत्था हो जाएँगे। और "सूर" फूँका जाएगा। फिर हम उन सबको एक साथ इकट्ठा करेंगे
तफ़्सीर:
और हम अंतिम काल में लोगों को इस अवस्था में छोड़ देंगे कि वे एक-दूसरे से मौजों की तरह परस्पर गुत्थम-गुत्था हो जाएँगे और “सूर” फूँक दिया जाएगा, तो हम सभी प्राणियों को हिसाब और बदले के लिए इकट्ठा कर लेंगे।
आयत 100
وَعَرَضْنَا جَهَنَّمَ يَوْمَئِذٍۢ لِّلْكَـٰفِرِينَ عَرْضًا
وَعَرَضْنَا
और पेश करेंगे हम
جَهَنَّمَ
जहन्नम को
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
لِّلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के लिए
عَرْضًا
पेश करना
और उस दिन जहन्नम को इनकार करनेवालों के सामने कर देंगे
तफ़्सीर:
और (उस दिन) हम काफ़िरों के लिए जहन्नम को स्पष्ट रूप से प्रकट कर देंगे, ताकि वे उसे अपनी आँखों से देख लें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
याजूज-माजूज की दीवार का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि ताकत और वसाइल का सही इस्तेमाल दूसरों की हिफाज़त के लिए करना चाहिए, यही असली कामयाबी है।
आयत 101
ٱلَّذِينَ كَانَتْ أَعْيُنُهُمْ فِى غِطَآءٍ عَن ذِكْرِى وَكَانُوا۟ لَا يَسْتَطِيعُونَ سَمْعًا
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
كَانَتْ
थीं
أَعْيُنُهُمْ
आँखें उनकी
فِى
within
غِطَآءٍ
पर्दे में
عَن
from
ذِكْرِى
मेरे ज़िक्र से
وَكَانُوا۟
और थे वो
لَا
not
يَسْتَطِيعُونَ
ना वो इस्तिताअत रखते
سَمْعًا
सुनने की
जिनके नेत्र मेरी अनुस्मृति की ओर से परदे में थे और जो कुछ सुन भी नहीं सकते थे
तफ़्सीर:
हम उसे उन काफ़िरों के लिए प्रकट करेंगे, जो संसार में अल्लाह के स्मरण से अंधे थे, क्योंकि उनकी आँखों पर अल्लाह की याद से रोकने वाला पर्दा पड़ा था और वे अल्लाह की आयतों को इस तरह सुनने में सक्षम नहीं थे कि उन्हें स्वीकार कर लें।
आयत 102
أَفَحَسِبَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ أَن يَتَّخِذُوا۟ عِبَادِى مِن دُونِىٓ أَوْلِيَآءَ ۚ إِنَّآ أَعْتَدْنَا جَهَنَّمَ لِلْكَـٰفِرِينَ نُزُلًۭا
أَفَحَسِبَ
क्या फिर गुमान करते हैं
ٱلَّذِينَ
वो लोग जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
أَن
कि
يَتَّخِذُوا۟
वो बना लेंगे
عِبَادِى
मेरे बन्दों को
مِن
besides Me
دُونِىٓ
मेरे सिवा
أَوْلِيَآءَ ۚ
हिमायती/दोस्त
إِنَّآ
बेशक हम
أَعْتَدْنَا
तैयार कर रखा है हमने
جَهَنَّمَ
जहन्नम को
لِلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के लिए
نُزُلًۭا
बतौरे मेहमानी के
तो क्या इनकार करनेवाले इस ख़याल में हैं कि मुझसे हटकर मेरे बन्दों को अपना हिमायती बना लें? हमने ऐसे इनकार करनेवालों के आतिथ्य-सत्कार के लिए जहन्नम तैयार कर रखा है
तफ़्सीर:
क्या अल्लाह पर विश्वास न रखने वालों ने समझ रखा है कि वे मुझे छोड़कर मेरे बंदों; फ़रिश्तों, रसूलों और शैतानों को पूज्य बना लेंगे?! निःसंदेह हमने जहन्नम को विश्वास न रखने वालों के लिए ठिकाने के रूप में तैयार कर रखा है।
आयत 103
قُلْ هَلْ نُنَبِّئُكُم بِٱلْأَخْسَرِينَ أَعْمَـٰلًا
قُلْ
कह दीजिए
هَلْ
क्या
نُنَبِّئُكُم
हम बताऐं तुम्हें
بِٱلْأَخْسَرِينَ
सबसे ज़्यादा ख़सारा वाले
أَعْمَـٰلًا
आमाल में
कहो, "क्या हम तुम्हें उन लोगों की ख़बर दें, जो अपने कर्मों की स्पष्ट से सबसे बढ़कर घाटा उठानेवाले हैं?
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : क्या हम (ऐ लोगो!) तुम्हें उन लोगों के बारे में बताएँ जो अपने कर्म की दृष्टि से सबसे अधिक घाटा उठाने वाले हैंॽ
आयत 104
ٱلَّذِينَ ضَلَّ سَعْيُهُمْ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا وَهُمْ يَحْسَبُونَ أَنَّهُمْ يُحْسِنُونَ صُنْعًا
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ضَلَّ
ज़ाया हो गई
سَعْيُهُمْ
कोशिश उनकी
فِى
in
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी में
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
وَهُمْ
और वो
يَحْسَبُونَ
वो समझते हैं
أَنَّهُمْ
कि बेशक वो
يُحْسِنُونَ
वो अच्छे कर रहे हैं
صُنْعًا
काम
यो वे लोग है जिनका प्रयास सांसारिक जीवन में अकारथ गया और वे यही समझते है कि वे बहुत अच्छा कर्म कर रहे है
तफ़्सीर:
वे लोग जो क़ियामत के दिन यह देखेंगे कि वे दुनिया में जो प्रयास कर रहे थे, वह बेकार हो गया। जबकि वे समझते हैं कि वे अच्छी कोशिश कर रहे हैं और वे अपने कर्मों से लाभान्वित होंगे, हालाँकि वास्तविकता इसके विपरीत है।
आयत 105
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِـَٔايَـٰتِ رَبِّهِمْ وَلِقَآئِهِۦ فَحَبِطَتْ أَعْمَـٰلُهُمْ فَلَا نُقِيمُ لَهُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ وَزْنًۭا
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही वो लोग हैं
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
بِـَٔايَـٰتِ
साथ आयात के
رَبِّهِمْ
अपने रब की
وَلِقَآئِهِۦ
और उसकी मुलाक़ात की
فَحَبِطَتْ
तो ज़ाया हो गए
أَعْمَـٰلُهُمْ
आमाल उनके
فَلَا
तो नहीं
نُقِيمُ
हम क़ायम करेंगे
لَهُمْ
उनके लिए
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
وَزْنًۭا
कोई वज़न
यही वे लोग है जिन्होंने अपने रब की आयतों का और उससे मिलन का इनकार किया। अतः उनके कर्म जान को लागू हुए, तो हम क़ियामत के दिन उन्हें कोई वज़न न देंगे
तफ़्सीर:
यही वे लोग हैं, जिन्होंने अपने पालनहार की उन आयतों का इनकार किया, जो उसके एकेश्वरवाद को दर्शाती हैं और उससे मिलने का इनकार किया। अतः उनके इस इनकार के कारण उनके सारे कर्म बेकार हो गए। इसलिए, क़ियामत के दिन अल्लाह के निकट उनका कोई मान नहीं होगा।
आयत 106
ذَٰلِكَ جَزَآؤُهُمْ جَهَنَّمُ بِمَا كَفَرُوا۟ وَٱتَّخَذُوٓا۟ ءَايَـٰتِى وَرُسُلِى هُزُوًا
ذَٰلِكَ
ये है
جَزَآؤُهُمْ
बदला उनका
جَهَنَّمُ
जहन्नम
بِمَا
बवजह उसके जो
كَفَرُوا۟
उन्होंने कुफ़्र किया
وَٱتَّخَذُوٓا۟
और उन्होंने बना लिया
ءَايَـٰتِى
मेरी आयात को
وَرُسُلِى
और मेरे रसूलों को
هُزُوًا
मज़ाक़
उनका बदला वही जहन्नम है, इसलिए कि उन्होंने कुफ़्र की नीति अपनाई और मेरी आयतों और मेरे रसूलों का उपहास किया
तफ़्सीर:
वह बदला जो उनके लिए तैयार किया गया है, जहन्नम है। क्योंकि उन्होंने अल्लाह के साथ कुफ़्र किया, तथा मेरी उतारी हुई आयतों और मेरे रसूलों का उपहास किया।
आयत 107
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ كَانَتْ لَهُمْ جَنَّـٰتُ ٱلْفِرْدَوْسِ نُزُلًا
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
كَانَتْ
हैं
لَهُمْ
उनके लिए
جَنَّـٰتُ
बाग़ात
ٱلْفِرْدَوْسِ
फ़िरदौस के
نُزُلًا
बतौरे मेहमनी
निश्चय ही जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उनके आतिथ्य के लिए फ़िरदौस के बाग़ होंगे,
तफ़्सीर:
निश्चय जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए और अच्छे कर्म किए, उन्हें उनके सम्मान स्वरूप जन्नत का सर्वोच्च स्थान प्राप्त होगा।
आयत 108
خَـٰلِدِينَ فِيهَا لَا يَبْغُونَ عَنْهَا حِوَلًۭا
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَا
उनमें
لَا
Not
يَبْغُونَ
ना वो चाहेंगे
عَنْهَا
उनसे
حِوَلًۭا
फिरना
जिनमें वे सदैव रहेंगे, वहाँ से हटना न चाहेंगे।"
तफ़्सीर:
जिसमें वे सदैव रहेंगे, वहाँ से स्थानांतरित होना नहीं चाहेंगे, क्योंकि उसके बराबर का कोई प्रतिफल नहीं होगा।
आयत 109
قُل لَّوْ كَانَ ٱلْبَحْرُ مِدَادًۭا لِّكَلِمَـٰتِ رَبِّى لَنَفِدَ ٱلْبَحْرُ قَبْلَ أَن تَنفَدَ كَلِمَـٰتُ رَبِّى وَلَوْ جِئْنَا بِمِثْلِهِۦ مَدَدًۭا
قُل
कह दीजिए
لَّوْ
अगर
كَانَ
हो जाए
ٱلْبَحْرُ
समन्दर (का पानी)
مِدَادًۭا
रोशनाई
لِّكَلِمَـٰتِ
कलिमात के लिए
رَبِّى
मेरे रब के
لَنَفِدَ
अलबत्ता ख़त्म हो जाए
ٱلْبَحْرُ
समन्दर (का पानी)
قَبْلَ
इससे पहले
أَن
कि
تَنفَدَ
ख़त्म हों
كَلِمَـٰتُ
कलिमात
رَبِّى
मेरे रब के
وَلَوْ
और अगरचे
جِئْنَا
लाऐं हम
بِمِثْلِهِۦ
मानिन्द इसके
مَدَدًۭا
मदद (मज़ीद)
कहो, "यदि समुद्र मेरे रब के बोल को लिखने के लिए रोशनाई हो जाए तो इससे पहले कि मेरे रब के बोल समाप्त हों, समुद्र ही समाप्त हो जाएगा। यद्यपि हम उसके सदृश्य एक और भी समुद्र उसके साथ ला मिलाएँ।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : मेरे पालनहार की बातें बहुत ज़्यादा हैं। अतः यदि उन्हें लिखने के लिए समुद्र स्याही बन जाए, तो पवित्र अल्लाह की बातें समाप्त होने से पहले ही समुद्र का पानी समाप्त हो जाएगा। बल्कि यदि हम और भी समुद्र ले आएँ, तो वे भी समाप्त हो जाएँगे।
आयत 110
قُلْ إِنَّمَآ أَنَا۠ بَشَرٌۭ مِّثْلُكُمْ يُوحَىٰٓ إِلَىَّ أَنَّمَآ إِلَـٰهُكُمْ إِلَـٰهٌۭ وَٰحِدٌۭ ۖ فَمَن كَانَ يَرْجُوا۟ لِقَآءَ رَبِّهِۦ فَلْيَعْمَلْ عَمَلًۭا صَـٰلِحًۭا وَلَا يُشْرِكْ بِعِبَادَةِ رَبِّهِۦٓ أَحَدًۢا
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّمَآ
बेशक
أَنَا۠
मैं
بَشَرٌۭ
एक इन्सान हूँ
مِّثْلُكُمْ
तुम जैसा
يُوحَىٰٓ
वही की जाती है
إِلَىَّ
मेरी तरफ़
أَنَّمَآ
बेशक
إِلَـٰهُكُمْ
इलाह तुम्हारा
إِلَـٰهٌۭ
इलाह है
وَٰحِدٌۭ ۖ
एक ही
فَمَن
तो जो कोई
كَانَ
हो वो
يَرْجُوا۟
वो उम्मीद रखता
لِقَآءَ
मुलाक़ात की
رَبِّهِۦ
अपने रब से
فَلْيَعْمَلْ
पस चाहिए कि वो अमल करे
عَمَلًۭا
अमल
صَـٰلِحًۭا
नेक
وَلَا
और ना
يُشْرِكْ
वो शरीक ठहराए
بِعِبَادَةِ
इबादत में
رَبِّهِۦٓ
अपने रब की
أَحَدًۢا
किसी एक को
कह दो, "मैं तो केवल तुम्हीं जैसा मनुष्य हूँ। मेरी ओर प्रकाशना की जाती है कि तुम्हारा पूज्य-प्रभु बस अकेला पूज्य-प्रभु है। अतः जो कोई अपने रब से मिलन की आशा रखता हो, उसे चाहिए कि अच्छा कर्म करे और अपने रब की बन्दगी में किसी को साझी न बनाए।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : मैं तो तुम्हारे ही जैसा एक मनुष्य हूँ। मेरी ओर वह़्य (प्रकाशना) की जाती है कि तुम्हारा वास्तविक पूज्य बस एक ही है, उसका कोई साझी नहीं और वह अल्लाह है। अतः जो अपने रब से मिलने का भय रखता हो, वह अपने पालनहार के प्रति निष्ठावान होकर उसकी शरीयत के अनुसार कार्य करे और अपने पालनहार की उपासना में किसी को साझी न बनाए।
आज की ज़िंदगी में सबक़
आमाल के तौलने के मेयार और इखलास की ताकीद के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि सबसे ज़्यादा घाटे में वह है जो नेकी समझकर बुरे काम करता रहे, इसलिए अमल में इखलास (सिर्फ अल्लाह के लिए) ज़रूरी है।
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