नाम का मतलब
मरियम अलैहिस्सलाम (ईसा अलैहिस्सलाम की वालिदा, जिनका वाकिया इस सूरह में है)
पृष्ठभूमि
सूरह मरियम में ज़करिया, यहया, मरियम और ईसा अलैहिस्सलाम के वाकियात का ज़िक्र है। यह सूरह हबशा हिजरत करने वाले सहाबा ने नज्जाशी बादशाह के सामने पढ़ी थी, जिससे उनका दिल पसीज गया था।
फ़ज़ीलत / सार
इसी सूरह की तिलावत ने हबशा के ईसाई बादशाह नज्जाशी को इतना मुतास्सिर किया कि उन्होंने मुसलमान मुहाजिरों को पनाह दी।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ كٓهيعٓصٓ
كٓهيعٓصٓ
ک ہ ی ع ص
काफ॰ हा॰ या॰ ऐन॰ साद॰
तफ़्सीर:
(काफ़, हा, या, ऐन, साद) इस प्रकार के अक्षरों के बारे में सूरतुल-बक़रा के आरंभ में बात की जा चुकी है।
आयत 2
ذِكْرُ رَحْمَتِ رَبِّكَ عَبْدَهُۥ زَكَرِيَّآ
ذِكْرُ
ज़िक्र है
رَحْمَتِ
रहमत का
رَبِّكَ
आपके रब की
عَبْدَهُۥ
अपने बन्दे
زَكَرِيَّآ
ज़करिया पर
वर्णन है तेरे रब की दयालुता का, जो उसने अपने बन्दे ज़करीया पर दर्शाई,
तफ़्सीर:
यह आपके पालनहार की अपने बंदे ज़करिय्या अलैहिस्सलाम पर दया की चर्चा है। हम यह कहानी आपके सामने उससे नसीहत (शिक्षा) प्राप्त करने के लिए बयान कर रहे हैं।
आयत 3
إِذْ نَادَىٰ رَبَّهُۥ نِدَآءً خَفِيًّۭا
إِذْ
जब
نَادَىٰ
उसने पुकारा
رَبَّهُۥ
अपने रब को
نِدَآءً
पुकारना
خَفِيًّۭا
छुपी (आवाज़) से
जबकि उसने अपने रब को चुपके से पुकारा
तफ़्सीर:
जब उसने अपने पवित्र रब से, गुप्त रूप से, दुआ की, ताकि क़बूल होने की उम्मीद ज़्यादा हो।
आयत 4
قَالَ رَبِّ إِنِّى وَهَنَ ٱلْعَظْمُ مِنِّى وَٱشْتَعَلَ ٱلرَّأْسُ شَيْبًۭا وَلَمْ أَكُنۢ بِدُعَآئِكَ رَبِّ شَقِيًّۭا
قَالَ
कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
إِنِّى
बेशक मैं
وَهَنَ
कमज़ोर हो गईं
ٱلْعَظْمُ
हड्डियाँ
مِنِّى
मेरी
وَٱشْتَعَلَ
और भड़क उठा
ٱلرَّأْسُ
सर
شَيْبًۭا
बुढ़ापे से
وَلَمْ
और नहीं
أَكُنۢ
हुआ मैं
بِدُعَآئِكَ
पुकार कर तुझे
رَبِّ
ऐ मेरे रब
شَقِيًّۭا
कभी नामुराद
उसने कहा, "मेरे रब! मेरी हड्डियाँ कमज़ोर हो गई और सिर बुढापे से भड़क उठा। और मेरे रब! तुझे पुकारकर मैं कभी बेनसीब नहीं रहा
तफ़्सीर:
उसने कहा : ऐ मेरे रब! मेरा हाल यह है कि मेरी हड्डियाँ कमज़ोर हो गई हैं और मेरे सिर के अधिकतर बाल सफ़ेद हो चुके हैं, लेकिन मैं तुझसे माँगकर कभी निराश नहीं हुआ। बल्कि, जब भी तुझसे माँगा, तूने मेरी दुआ क़बूल की।
आयत 5
وَإِنِّى خِفْتُ ٱلْمَوَٰلِىَ مِن وَرَآءِى وَكَانَتِ ٱمْرَأَتِى عَاقِرًۭا فَهَبْ لِى مِن لَّدُنكَ وَلِيًّۭا
وَإِنِّى
और बेशक मैं
خِفْتُ
मैं डरता हूँ
ٱلْمَوَٰلِىَ
वारिसों से
مِن
after me
وَرَآءِى
पीछे अपने
وَكَانَتِ
और है
ٱمْرَأَتِى
बीवी मेरी
عَاقِرًۭا
बाँझ
فَهَبْ
पस अता कर
لِى
मुझे
مِن
from
لَّدُنكَ
अपने पास से
وَلِيًّۭا
वारिस
मुझे अपने पीछे अपने भाई-बन्धुओं की ओर से भय है और मेरी पत्नी बाँझ है। अतः तू मुझे अपने पास से एक उत्ताराधिकारी प्रदान कर,
तफ़्सीर:
मुझे अपने रिश्तेदारों के बारे में भय है कि कहीं वे दुनिया में व्यस्त हो जाने के कारण मेरी मृत्यु के बाद धर्म के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन न कर सकें। और मेरी पत्नी (भी) बाँझ है, उसे औलाद नहीं होती। अतः तू अपने पास से मुझे एक सहायक पुत्र प्रदान कर।
आयत 6
يَرِثُنِى وَيَرِثُ مِنْ ءَالِ يَعْقُوبَ ۖ وَٱجْعَلْهُ رَبِّ رَضِيًّۭا
يَرِثُنِى
जो वारिस हो मेरा
وَيَرِثُ
और वारिस हो
مِنْ
from
ءَالِ
(the) family
يَعْقُوبَ ۖ
आले याक़ूब का
وَٱجْعَلْهُ
और बना दे उसे
رَبِّ
ऐ मेरे रब
رَضِيًّۭا
पसंदीदा
जो मेरा भी उत्तराधिकारी हो और याक़ूब के वशंज का भी उत्तराधिकारी हो। और उसे मेरे रब! वांछनीय बना।"
तफ़्सीर:
जो मुझसे नुबुव्वत का उत्तराधिकारी तथा याक़ूब अलैहिस्सलाम के वंशज से उसका वारिस हो और (ऐ मेरे रब!) तू उसे धर्म, नैतिकता और ज्ञान में पसंदीदा बना।
आयत 7
يَـٰزَكَرِيَّآ إِنَّا نُبَشِّرُكَ بِغُلَـٰمٍ ٱسْمُهُۥ يَحْيَىٰ لَمْ نَجْعَل لَّهُۥ مِن قَبْلُ سَمِيًّۭا
يَـٰزَكَرِيَّآ
ऐ ज़करिया
إِنَّا
बेशक हम
نُبَشِّرُكَ
हम ख़ुशख़बरी देते हैं तुझे
بِغُلَـٰمٍ
एक लड़के की
ٱسْمُهُۥ
नाम जिसका
يَحْيَىٰ
याहया (होगा)
لَمْ
नहीं
نَجْعَل
हमने बनाया
لَّهُۥ
इसका
مِن
before
قَبْلُ
इससे पहले
سَمِيًّۭا
कोई हम नाम
(उत्तर मिला,) "ऐ ज़करीया! हम तुझे एक लड़के की शुभ सूचना देते है, जिसका नाम यह्यार होगा। हमने उससे पहले किसी को उसके जैसा नहीं बनाया।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उनकी दुआ क़बूल कर ली और उन्हें पुकारा : ऐ ज़करिय्या! हम तुम्हें एक प्रसन्न करने वाला समाचार सुनाते हैं। हमने तुम्हारी दुआ क़बूल कर ली है और तुम्हें एक बालक प्रदान किया है, जिसका नाम यहया है। हमने उससे पहले यह नाम किसी को नहीं दिया है।
आयत 8
قَالَ رَبِّ أَنَّىٰ يَكُونُ لِى غُلَـٰمٌۭ وَكَانَتِ ٱمْرَأَتِى عَاقِرًۭا وَقَدْ بَلَغْتُ مِنَ ٱلْكِبَرِ عِتِيًّۭا
قَالَ
कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
أَنَّىٰ
कैसे
يَكُونُ
होगा
لِى
मेरे लिए
غُلَـٰمٌۭ
लड़का
وَكَانَتِ
जबकि है
ٱمْرَأَتِى
बीवी मेरी
عَاقِرًۭا
बाँझ
وَقَدْ
और तहक़ीक़
بَلَغْتُ
पहुँचा हुआ हूँ मैं
مِنَ
of
ٱلْكِبَرِ
बुढ़ापे के
عِتِيًّۭا
इन्तिहाई दर्जे को
उसने कहा, "मेरे रब! मेरे लड़का कहाँ से होगा, जबकि मेरी पत्नी बाँझ है और मैं बुढ़ापे की अन्तिम अवस्था को पहुँच चुका हूँ?"
तफ़्सीर:
ज़करिय्या ने अल्लाह की शक्ति पर आश्चर्य करते हुए कहा : मेरे यहाँ किसी बालक का जन्म कैसे होगा, जबकि मेरी पत्नी बाँझ है, उसके औलाद नहीं होती और मैं बुढ़ापे की अंतिम सीमा को पहुँच चुका हूँ और मेरी हड्डियाँ कमज़ोर हो चुकी हैंॽ!
आयत 9
قَالَ كَذَٰلِكَ قَالَ رَبُّكَ هُوَ عَلَىَّ هَيِّنٌۭ وَقَدْ خَلَقْتُكَ مِن قَبْلُ وَلَمْ تَكُ شَيْـًۭٔا
قَالَ
उसने कहा
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
قَالَ
फ़रमाया है
رَبُّكَ
तेरे रब ने
هُوَ
वो
عَلَىَّ
मुझ पर
هَيِّنٌۭ
बहुत आसान है
وَقَدْ
और तहक़ीक़
خَلَقْتُكَ
पैदा किया मैंने तुझे
مِن
before
قَبْلُ
इससे पहले
وَلَمْ
और ना
تَكُ
था तू
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
कहा, "ऐसा ही होगा। तेरे रब ने कहा कि यह मेरे लिए सरल है। इससे पहले मैं तुझे पैदा कर चुका हूँ, जबकि तू कुछ भी न था।"
तफ़्सीर:
फ़रिश्ते ने कहा : मामला ऐसा ही है जैसा आपने कहा कि आपकी पत्नी बच्चा जनने के योग्य नहीं है और आप बुढ़ापे की चरम सीमा को पहुँच चुके हैं तथा आपकी हड्डियाँ भी कमज़ोर हो चुकी हैं। परंतु आपके रब ने कहा है : तेरे रब का बाँझ माता और बुढ़ापे की चरम सीमा को पहुँचे हुए पिता से यहया को पैदा करना आसान है। हालाँकि मैंने (ऐ ज़करिय्या) तुझे इससे पहले पैदा किया है, जबकि तू कुछ भी चर्चा योग्य नहीं था; क्योंकि तेरा अस्तित्व ही नहीं था।
आयत 10
قَالَ رَبِّ ٱجْعَل لِّىٓ ءَايَةًۭ ۚ قَالَ ءَايَتُكَ أَلَّا تُكَلِّمَ ٱلنَّاسَ ثَلَـٰثَ لَيَالٍۢ سَوِيًّۭا
قَالَ
कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
ٱجْعَل
बना
لِّىٓ
मेरे लिए
ءَايَةًۭ ۚ
कोई निशानी
قَالَ
कहा
ءَايَتُكَ
निशानी तेरी
أَلَّا
ये कि ना
تُكَلِّمَ
तू कलाम करेगा
ٱلنَّاسَ
लोगों से
ثَلَـٰثَ
तीन
لَيَالٍۢ
रातें
سَوِيًّۭا
तंदरुस्ती (के बावजूद)
उसने कहा, "मेरे रब! मेरे लिए कोई निशानी निश्चित कर दे।" कहा, "तेरी निशानी यह है कि तू भला-चंगा रहकर भी तीन रात (और दिन) लोगों से बात न करे।"
तफ़्सीर:
ज़करिय्या अलैहिस्सलाम ने कहा : ऐ मेरे रब! मेरे लिए कोई निशानी निर्धारित कर दे जिससे मैं आश्वस्त हो सकूँ, जो मुझे फ़रिश्तों द्वारा दी गई शुभ सूचना की प्राप्ति को इंगित करती हो। अल्लाह ने फरमाया : तुम्हें जो ख़ुशख़बरी दी गई है, उसके प्राप्त होने की निशानी यह है कि तुम तीन दिनों तक लोगों से बात नहीं कर सकोगे, जबकि तुम्हें कोई बीमारी नहीं होगी, बल्कि तुम सही और स्वस्थ होगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
ज़करिया अलैहिस्सलाम की दुआ और यहया अलैहिस्सलाम की बशारत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि बुढ़ापे में भी उम्मीद न छोड़ना और अल्लाह से नेमत मांगते रहना सिखाता है कि अल्लाह की कुदरत की कोई हद नहीं।
आयत 11
فَخَرَجَ عَلَىٰ قَوْمِهِۦ مِنَ ٱلْمِحْرَابِ فَأَوْحَىٰٓ إِلَيْهِمْ أَن سَبِّحُوا۟ بُكْرَةًۭ وَعَشِيًّۭا
فَخَرَجَ
पस वो निकला
عَلَىٰ
to
قَوْمِهِۦ
अपनी क़ौम पर
مِنَ
from
ٱلْمِحْرَابِ
मेहराब से
فَأَوْحَىٰٓ
तो उसने इशारा किया
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
أَن
कि
سَبِّحُوا۟
तस्बीह करो
بُكْرَةًۭ
सुबह
وَعَشِيًّۭا
और शाम
अतः वह मेहराब से निकलकर अपने लोगों के पास आया और उनसे संकेतों में कहा, "प्रातः काल और सन्ध्या समय तसबीह करते रहो।"
तफ़्सीर:
फिर ज़करिय्या अलैहिस्सलाम अपने उपासनागृह से निकलकर अपनी जाति के पास आए और उनसे, बात किए बिना, इशारे से बताया कि दिन के आरंभ और अंत में अल्लाह की पवित्रता का वर्णन करो।
आयत 12
يَـٰيَحْيَىٰ خُذِ ٱلْكِتَـٰبَ بِقُوَّةٍۢ ۖ وَءَاتَيْنَـٰهُ ٱلْحُكْمَ صَبِيًّۭا
يَـٰيَحْيَىٰ
ऐ याहया
خُذِ
पकड़ो
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब को
بِقُوَّةٍۢ ۖ
क़ुव्वत से
وَءَاتَيْنَـٰهُ
और दी हमने उसे
ٱلْحُكْمَ
हिकमत/दानाई
صَبِيًّۭا
बचपन ही से
"ऐ यह्याऔ! किताब को मज़बूत थाम ले।" हमने उसे बचपन ही में निर्णय-शक्ति प्रदान की,
तफ़्सीर:
चुनाँचे उनके यहाँ यहया का जन्म हुआ। फिर जब उसकी आयु इतनी हो गई कि उसे संबोधित कर कुछ कहा जा सके, तो हमने उससे कहा : ऐ यहया! तौरात को पूरी मज़बूती से थाम लो। और हमने उसे बचपन ही से समझ, ज्ञान, गंभीरता और दृढ़ संकल्प प्रदान किया था।
आयत 13
وَحَنَانًۭا مِّن لَّدُنَّا وَزَكَوٰةًۭ ۖ وَكَانَ تَقِيًّۭا
وَحَنَانًۭا
और नर्म दिली
مِّن
from
لَّدُنَّا
अपने पास से
وَزَكَوٰةًۭ ۖ
और पाकीज़गी
وَكَانَ
और था वो
تَقِيًّۭا
परहेज़गार
और अपने पास से नरमी और शौक़ और आत्मविश्वास। और वह बड़ा डरनेवाला था
तफ़्सीर:
और हमने उसपर अपनी ओर से ख़ास दया की थी और उसे पापों से पवित्र रखा था तथा वह एक परहेज़गार व्यक्ति था, जो अल्लाह के आदेशों का पालन करता था और उसकी मना की हुई चीज़ों से दूर रहता था।
आयत 14
وَبَرًّۢا بِوَٰلِدَيْهِ وَلَمْ يَكُن جَبَّارًا عَصِيًّۭا
وَبَرًّۢا
और नेकोकार
بِوَٰلِدَيْهِ
साथ अपने वालिदैन के
وَلَمْ
और ना
يَكُن
था वो
جَبَّارًا
सरकश
عَصِيًّۭا
नाफ़रमान
और अपने माँ-बाप का हक़ पहचानेवाला था। और वह सरकश अवज्ञाकारी न था
तफ़्सीर:
तथा अपने माता-पिता का आज्ञाकारी, उनके प्रति कोमल स्वभाव और उनके साथ अच्छा व्यवहार करने वाला था। वह अपने पालनहार की आज्ञाकारिता या अपने माता-पिता के आज्ञापालन से अभिमान करने वाला नहीं था, और न ही वह अपने पालनहार का अथवा अपने माता-पिता का अवज्ञाकारी था।
आयत 15
وَسَلَـٰمٌ عَلَيْهِ يَوْمَ وُلِدَ وَيَوْمَ يَمُوتُ وَيَوْمَ يُبْعَثُ حَيًّۭا
وَسَلَـٰمٌ
और सलाम है
عَلَيْهِ
उस पर
يَوْمَ
जिस दिन
وُلِدَ
वो पैदा किया गया
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يَمُوتُ
वो फ़ौत होगा
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يُبْعَثُ
वो उठाया जाएगा
حَيًّۭا
ज़िन्दा करके
"सलाम उस पर, जिस दिन वह पैदा हुआ और जिस दिन उसकी मृत्यु हो और जिस दिन वह जीवित करके उठाया जाए!"
तफ़्सीर:
उसपर अल्लाह की ओर से शांति तथा उसकी ओर से उसके लिए सुरक्षा है जिस दिन वह पैदा हुआ, जिस दिन वह मर जाएगा और इस जीवन से निकल जाएगा और जिस दिन वह क़ियामत के दिन दोबारा जीवित होकर उठाया जाएगा। ये तीन स्थान सबसे भयावह हैं जिनसे एक व्यक्ति गुजरता है। अतः यदि वह इनमें सुरक्षित रहा, तो उसके लिए इनके अलावा में कोई डर नहीं है।
आयत 16
وَٱذْكُرْ فِى ٱلْكِتَـٰبِ مَرْيَمَ إِذِ ٱنتَبَذَتْ مِنْ أَهْلِهَا مَكَانًۭا شَرْقِيًّۭا
وَٱذْكُرْ
और ज़िक्र करो
فِى
in
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में
مَرْيَمَ
मरियम का
إِذِ
जब
ٱنتَبَذَتْ
वो अलग हो गई
مِنْ
from
أَهْلِهَا
अपने घर वालों से
مَكَانًۭا
एक जगह पर
شَرْقِيًّۭا
मशरिक़ी जानिब
और इस किताब में मरयम की चर्चा करो, जबकि वह अपने घरवालों से अलग होकर एक पूर्वी स्थान पर चली गई
तफ़्सीर:
तथा (ऐ रसूल!) आप अपने ऊपर उतारे गए क़ुरआन में मरयम अलैहस्सलाम के क़िस्से की चर्चा करें, जब वह अपने घर वालों से अलग होकर उनसे पूरब की ओर एक स्थान में अकेले रहने लगी थी।
आयत 17
فَٱتَّخَذَتْ مِن دُونِهِمْ حِجَابًۭا فَأَرْسَلْنَآ إِلَيْهَا رُوحَنَا فَتَمَثَّلَ لَهَا بَشَرًۭا سَوِيًّۭا
فَٱتَّخَذَتْ
फिर उसने बना लिया
مِن
from them
دُونِهِمْ
उनकी तरफ़ से
حِجَابًۭا
एक पर्दा
فَأَرْسَلْنَآ
तो भेजा हमने
إِلَيْهَا
तरफ़ उसके
رُوحَنَا
अपनी रूह (फ़रिश्ता) को
فَتَمَثَّلَ
तो उसने शक्ल इख़्तियार की
لَهَا
उसके लिए
بَشَرًۭا
एक इन्सान की
سَوِيًّۭا
कामिल
फिर उसने उनसे परदा कर लिया। तब हमने उसके पास अपनी रूह (फ़रिश्तेप) को भेजा और वह उसके सामने एक पूर्ण मनुष्य के रूप में प्रकट हुआ
तफ़्सीर:
फिर उसने अपनी जाति की ओर से अपने लिए एक ओट (परदा) बना लिया, ताकि जब वह अपने पालनहार की इबादत कर रही हो, तो वे लोग उसे न देख सकें। फिर हमने उसके पास जिबरील अलैहिस्सलाम को भेजा, जो उसके पास पूरे तौर पर मानव का रूप धारण करके आया। तो वह डर गई कि कहीं वह कोई बुरा इरादा न रखता हो।
आयत 18
قَالَتْ إِنِّىٓ أَعُوذُ بِٱلرَّحْمَـٰنِ مِنكَ إِن كُنتَ تَقِيًّۭا
قَالَتْ
वो कहने लगी
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَعُوذُ
मैं पनाह लेती हूँ
بِٱلرَّحْمَـٰنِ
रहमान की
مِنكَ
तुझसे
إِن
अगर
كُنتَ
है तू
تَقِيًّۭا
मुत्तक़ी/डरने वाला
वह बोल उठी, "मैं तुझसे बचने के लिए रहमान की पनाह माँगती हूँ; यदि तू (अल्लाह का) डर रखनेवाला है (तो यहाँ से हट जाएगा) ।"
तफ़्सीर:
जब उसने जिबरील को एक पूर्ण मनुष्य के रूप में अपनी ओर बढ़ते हुए देखा, तो बोली : (ऐ मानव!) यदि तू संयमी है और अल्लाह से डरता है, तो मैं तुझसे अत्यंत दयावान अल्लाह की शरण में आती हूँ कि तेरी तरफ से मुझे कोई बुराई पहुँचे।
आयत 19
قَالَ إِنَّمَآ أَنَا۠ رَسُولُ رَبِّكِ لِأَهَبَ لَكِ غُلَـٰمًۭا زَكِيًّۭا
قَالَ
उसने कहा
إِنَّمَآ
बेशक
أَنَا۠
मैं
رَسُولُ
भेजा हुआ हूँ
رَبِّكِ
तेरे रब का
لِأَهَبَ
कि मैं अता करूँ
لَكِ
तुझे
غُلَـٰمًۭا
एक लड़का
زَكِيًّۭا
पाकीज़ा
उसने कहा, "मैं तो केवल तेरे रब का भेजा हुआ हूँ, ताकि तुझे नेकी और भलाई से बढ़ा हुआ लड़का दूँ।"
तफ़्सीर:
जिबरील अलैहिस्सलाम ने कहा : मैं इनसान नहीं हूँ। मैं तो तेरे रब की ओर से भेजा हुआ दूत हूँ। उसने मुझे तेरी ओर भेजा है, ताकि मैं तुझे एक अच्छा और पवित्र पुत्र प्रदान करूँ।
आयत 20
قَالَتْ أَنَّىٰ يَكُونُ لِى غُلَـٰمٌۭ وَلَمْ يَمْسَسْنِى بَشَرٌۭ وَلَمْ أَكُ بَغِيًّۭا
قَالَتْ
वो कहने लगी
أَنَّىٰ
कैसे
يَكُونُ
होगा
لِى
मेरे लिए
غُلَـٰمٌۭ
कोई लड़का
وَلَمْ
हालाँकि नहीं
يَمْسَسْنِى
छुआ मुझे
بَشَرٌۭ
किसी इन्सान ने
وَلَمْ
और नहीं
أَكُ
हूँ मैं
بَغِيًّۭا
बदकार
वह बोली, "मेरे कहाँ से लड़का होगा, जबकि मुझे किसी आदमी ने छुआ तक नही और न मैं कोई बदचलन हूँ?"
तफ़्सीर:
मरयम ने हैरानी से कहा : मेरे यहाँ बालक कैसे हो सकता है, जबकि न तो पति और न ही कोई और मेरे पास आया है, और न मैं व्यभिचारिणी हूँ कि मेरे कोई बच्चा हो?
आज की ज़िंदगी में सबक़
मरियम अलैहिस्सलाम को बशारत मिलने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि मुश्किल और हैरतअंगेज़ हालात में भी अल्लाह की कुदरत पर यकीन रखना चाहिए।
आयत 21
قَالَ كَذَٰلِكِ قَالَ رَبُّكِ هُوَ عَلَىَّ هَيِّنٌۭ ۖ وَلِنَجْعَلَهُۥٓ ءَايَةًۭ لِّلنَّاسِ وَرَحْمَةًۭ مِّنَّا ۚ وَكَانَ أَمْرًۭا مَّقْضِيًّۭا
قَالَ
कहा
كَذَٰلِكِ
इसी तरह (होगा)
قَالَ
कहा
رَبُّكِ
तेरे रब ने
هُوَ
वो
عَلَىَّ
मुझ पर
هَيِّنٌۭ ۖ
बहुत आसान है
وَلِنَجْعَلَهُۥٓ
और ताकि हम बना दें उसे
ءَايَةًۭ
एक निशानी
لِّلنَّاسِ
लोगों के लिए
وَرَحْمَةًۭ
और रहमत
مِّنَّا ۚ
अपनी तरफ़ से
وَكَانَ
और है
أَمْرًۭا
एक काम
مَّقْضِيًّۭا
तयशुदा
उसने कहा, "ऐसा ही होगा। रब ने कहा है कि यह मेरे लिए सहज है। और ऐसा इसलिए होगा (ताकि हम तुझे) और ताकि हम उसे लोगों के लिए एक निशानी बनाएँ और अपनी ओर से एक दयालुता। यह तो ऐसी बात है जिसका निर्णय हो चुका है।"
तफ़्सीर:
जिबरील ने उनसे कहा : मामला ऐसा ही है जैसा तुमने उल्लेख किया है कि तुम्हें पति या किसी और ने नहीं छुआ, और न तुम व्यभिचारिणी हो। लेकिन, तेरे पवित्र पालनहार ने कहा है : पिता के बिना बच्चा पैदा करना मेरे लिए आसान है। साथ ही यह कि तुम्हें प्रदान किया जाने वाला बालक लोगों के लिए अल्लाह की शक्ति की बहुत बड़ी निशानी, तथा हमारी ओर से तेरे लिए और उसपर ईमान लाने वाले के लिए महान दया हो। तथा तेरे इस बालक का पैदा करना अल्लाह का पहले से निर्धारित किया हुआ, लौह-ए-महफ़ूज़ में लिखा हुआ फ़ैसला है।
आयत 22
۞ فَحَمَلَتْهُ فَٱنتَبَذَتْ بِهِۦ مَكَانًۭا قَصِيًّۭا
۞ فَحَمَلَتْهُ
तो हमल ठहर गया उसे उसका
فَٱنتَبَذَتْ
फिर वो अलग हो गई
بِهِۦ
साथ उसके
مَكَانًۭا
एक जगह पर
قَصِيًّۭا
दूर की
फिर उसे उस (बच्चे) का गर्भ रह गया और वह उसे लिए हुए एक दूर के स्थान पर अलग चली गई।
तफ़्सीर:
फिर फ़रिश्ते के फूँकने के पश्चात वह उस (बच्चे) के साथ गर्भवती हो गई और उस गर्भ को लिए हुए लोगों से अलग एक दूर स्थान पर चली गई।
आयत 23
فَأَجَآءَهَا ٱلْمَخَاضُ إِلَىٰ جِذْعِ ٱلنَّخْلَةِ قَالَتْ يَـٰلَيْتَنِى مِتُّ قَبْلَ هَـٰذَا وَكُنتُ نَسْيًۭا مَّنسِيًّۭا
فَأَجَآءَهَا
तो ले आया उसे
ٱلْمَخَاضُ
दर्दे ज़ह
إِلَىٰ
तरफ़
جِذْعِ
तने के
ٱلنَّخْلَةِ
खजूर के
قَالَتْ
वो कहने लगी
يَـٰلَيْتَنِى
ऐ काश कि मैं
مِتُّ
मर जाती मैं
قَبْلَ
पहले
هَـٰذَا
इससे
وَكُنتُ
और होती मैं
نَسْيًۭا
(in) oblivion
مَّنسِيًّۭا
भूली-बिसरी
अन्ततः प्रसव पीड़ा उसे एक खजूर के तने के पास ले आई। वह कहने लगी, "क्या ही अच्छा होता कि मैं इससे पहले ही मर जाती और भूली-बिसरी हो गई होती!"
तफ़्सीर:
फिर प्रसव पीड़ा बढ़ी, जो उसे खजूर के एक तने के पास ले आई। तब मरयम अलैहस्सलाम कहने लगी : ऐ काश! मैं इस दिन से पहले ही मर गई होती, और मैं एक भूली-बिसरी चीज़ होती, ताकि मेरे बारे में कोई बुराई नहीं सोची जाती।
आयत 24
فَنَادَىٰهَا مِن تَحْتِهَآ أَلَّا تَحْزَنِى قَدْ جَعَلَ رَبُّكِ تَحْتَكِ سَرِيًّۭا
فَنَادَىٰهَا
तो पुकारा उसे (फ़रिश्ते ने)
مِن
from
تَحْتِهَآ
उसके नीचे से
أَلَّا
कि ना
تَحْزَنِى
तू ग़मगीन हो
قَدْ
तहक़ीक़
جَعَلَ
बना दिया
رَبُّكِ
तेरे रब ने
تَحْتَكِ
तेरे नीचे
سَرِيًّۭا
एक चश्मा
उस समय उसे उसके नीचे से पुकारा, "शोकाकुल न हो। तेरे रब ने तेरे नीचे एक स्रोत प्रवाहित कर रखा है।
तफ़्सीर:
तो ईसा अलैहिस्सलाम ने उसके पैरों के नीचे से उसे पुकारा : उदास मत हो! तुम्हारे पालनहार ने तुम्हारे नीचे पानी की नहर बहा दी है, जिससे तुम पानी पी सकती हो।
आयत 25
وَهُزِّىٓ إِلَيْكِ بِجِذْعِ ٱلنَّخْلَةِ تُسَـٰقِطْ عَلَيْكِ رُطَبًۭا جَنِيًّۭا
وَهُزِّىٓ
और हिला ले
إِلَيْكِ
तरफ़ अपने
بِجِذْعِ
तने को
ٱلنَّخْلَةِ
खजूर के
تُسَـٰقِطْ
वो गिराएगा
عَلَيْكِ
तुझ पर
رُطَبًۭا
पकी हुई खजूर
جَنِيًّۭا
तरो-ताज़ा
तू खजूर के उस वृक्ष के तने को पकड़कर अपनी ओर हिला। तेरे ऊपर ताज़ा पकी-पकी खजूरें टपक पड़ेगी
तफ़्सीर:
तथा खजूर के पेड़ के तने को पकड़कर हिलाओ, तुम्हारे ऊपर ऐसी ताज़ा पकी हुई खजूरें गिरेंगी, जो उसी समय तोड़ी गई हों।
आयत 26
فَكُلِى وَٱشْرَبِى وَقَرِّى عَيْنًۭا ۖ فَإِمَّا تَرَيِنَّ مِنَ ٱلْبَشَرِ أَحَدًۭا فَقُولِىٓ إِنِّى نَذَرْتُ لِلرَّحْمَـٰنِ صَوْمًۭا فَلَنْ أُكَلِّمَ ٱلْيَوْمَ إِنسِيًّۭا
فَكُلِى
फिर खा
وَٱشْرَبِى
और पी
وَقَرِّى
और ठंडी कर
عَيْنًۭا ۖ
आँखें
فَإِمَّا
फिर अगर
تَرَيِنَّ
तू देखे
مِنَ
from
ٱلْبَشَرِ
इन्सान में से
أَحَدًۭا
किसी एक को
فَقُولِىٓ
तो कह दे
إِنِّى
बेशक मैं
نَذَرْتُ
नज़र मानी है मैंने
لِلرَّحْمَـٰنِ
रहमान के लिए
صَوْمًۭا
रोज़े की
فَلَنْ
तो हरगिज़ नहीं
أُكَلِّمَ
मैं कलाम करूँगी
ٱلْيَوْمَ
आज
إِنسِيًّۭا
किसी इन्सान से
अतः तू उसे खा और पी और आँखें ठंडी कर। फिर यदि तू किसी आदमी को देखे तो कह देना, मैंने तो रहमान के लिए रोज़े की मन्नत मानी है। इसलिए मैं आज किसी मनुष्य से न बोलूँगी।"
तफ़्सीर:
अतः ताज़ा खजूरें खाओ, पानी पियो, अपने नवजात शिशु से दिल बहलाओ और शोक मत करो। फिर यदि कोई आदमी दिखाई दे और वह तुमसे बच्चे के बारे में पूछे, तो उससे कह दो : मैंने अपने पालनहार के लिए अपने आपपर चुप रहने को अनिवार्य कर लिया है। इसलिए आज मैं किसी इनसान से हरगिज़ बात नहीं करूँगी।
आयत 27
فَأَتَتْ بِهِۦ قَوْمَهَا تَحْمِلُهُۥ ۖ قَالُوا۟ يَـٰمَرْيَمُ لَقَدْ جِئْتِ شَيْـًۭٔا فَرِيًّۭا
فَأَتَتْ
तो वो ले आई
بِهِۦ
उसे
قَوْمَهَا
अपनी क़ौम के पास
تَحْمِلُهُۥ ۖ
वो उठाए हुए थी उसे
قَالُوا۟
वो कहने लगे
يَـٰمَرْيَمُ
ऐ मरियम
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
جِئْتِ
लाई है तू
شَيْـًۭٔا
एक चीज़
فَرِيًّۭا
बहुत बुरी/अजीब
फिर वह उस बच्चे को लिए हुए अपनी क़ौम के लोगों के पास आई। वे बोले, "ऐ मरयम, तूने तो बड़ा ही आश्चर्य का काम कर डाला!
तफ़्सीर:
फिर मरयम अपने बेटे को उठाए हुए अपनी जाति के पास आई, तो उसकी जाति के लोगों ने निंदा करते हुए उससे कहा : ऐ मरयम! तूने बिना पिता के पुत्र लाकर एक बड़ा निंदनीय काम किया है।
आयत 28
يَـٰٓأُخْتَ هَـٰرُونَ مَا كَانَ أَبُوكِ ٱمْرَأَ سَوْءٍۢ وَمَا كَانَتْ أُمُّكِ بَغِيًّۭا
يَـٰٓأُخْتَ
ऐ बहन
هَـٰرُونَ
हारून की
مَا
ना
كَانَ
था
أَبُوكِ
बाप तेरा
ٱمْرَأَ
आदमी
سَوْءٍۢ
बुरा
وَمَا
और ना
كَانَتْ
थी
أُمُّكِ
माँ तेरी
بَغِيًّۭا
बदकार
हे हारून की बहन! न तो तेरा बाप ही कोई बुरा आदमी था और न तेरी माँ ही बदचलन थी।"
तफ़्सीर:
ऐ हारून (जो एक सदाचारी व्यक्ति थे) जैसी इबादत करने वाली महिला! तेरा पिता कोई व्यभिचारी नहीं था, और न ही तेरी माता कोई व्यभिचारिणी थी। तुम तो एक पवित्र घराने से हो, जो सदाचार में प्रसिद्ध है। फिर तुम बिना पिता के पुत्र कैसे ले आईॽ!
आयत 29
فَأَشَارَتْ إِلَيْهِ ۖ قَالُوا۟ كَيْفَ نُكَلِّمُ مَن كَانَ فِى ٱلْمَهْدِ صَبِيًّۭا
فَأَشَارَتْ
तो उसने इशारा कर दिया
إِلَيْهِ ۖ
तरफ़ उसके
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
كَيْفَ
किस तरह
نُكَلِّمُ
हम कलाम करें
مَن
उससे जो
كَانَ
है वो
فِى
in
ٱلْمَهْدِ
पंघोड़े में
صَبِيًّۭا
एक बच्चा
तब उसने उस (बच्चे) की ओर संकेत किया। वे कहने लगे, "हम उससे कैसे बात करें जो पालने में पड़ा हुआ एक बच्चा है?"
तफ़्सीर:
तब उसने अपने पुत्र ईसा (अलैहिस्सलाम) की ओर इशारा किया, जो गोद में था। तो उसकी जाति के लोगों ने आश्चर्य करते हुए उससे कहा : हम एक बच्चे से कैसे बात करें जबकि वह गोद में है?!
आयत 30
قَالَ إِنِّى عَبْدُ ٱللَّهِ ءَاتَىٰنِىَ ٱلْكِتَـٰبَ وَجَعَلَنِى نَبِيًّۭا
قَالَ
वो बोला
إِنِّى
बेशक मैं
عَبْدُ
बंदा हूँ
ٱللَّهِ
अल्लाह का
ءَاتَىٰنِىَ
उसने दी मुझे
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
وَجَعَلَنِى
और उसने बनाया मुझे
نَبِيًّۭا
नबी
उसने कहा, "मैं अल्लाह का बन्दा हूँ। उसने मुझे किताब दी और मुझे नबी बनाया
तफ़्सीर:
ईसा (अलैहिस्सलाम) ने कहा : निःसंदेह मैं अल्लाह का बंदा हूँ, उसने मुझे इनजील प्रदान किया है और अपने नबियों में से एक नबी बनाया है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
ईसा अलैहिस्सलाम की पैदाइश और मरियम अलैहिस्सलाम की तकलीफ का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि मुश्किल वक्त में सब्र रखने वाले को अल्लाह मदद और सुकून का रास्ता दिखाता है।
आयत 31
وَجَعَلَنِى مُبَارَكًا أَيْنَ مَا كُنتُ وَأَوْصَـٰنِى بِٱلصَّلَوٰةِ وَٱلزَّكَوٰةِ مَا دُمْتُ حَيًّۭا
وَجَعَلَنِى
और उसने बनाया मुझे
مُبَارَكًا
मुबारक
أَيْنَ
wherever
مَا
जहाँ कहीं
كُنتُ
मैं हूँ
وَأَوْصَـٰنِى
और उसने ताकीद की मुझे
بِٱلصَّلَوٰةِ
नमाज़ की
وَٱلزَّكَوٰةِ
और ज़कात की
مَا
as long as I am
دُمْتُ
जब तक मैं रहूँ
حَيًّۭا
ज़िन्दा
और मुझे बरकतवाला किया जहाँ भी मैं रहूँ, और मुझे नमाज़ और ज़कात की ताकीद की, जब तक कि मैं जीवित रहूँ
तफ़्सीर:
मैं जहाँ कहीं भी रहूँ, उसने मुझे लोगों के लिए बहुत लाभदायक बनाया है और जीवन भर मुझे नमाज़ अदा करते रहने तथा ज़कात देते रहने का आदेश दिया है।
आयत 32
وَبَرًّۢا بِوَٰلِدَتِى وَلَمْ يَجْعَلْنِى جَبَّارًۭا شَقِيًّۭا
وَبَرًّۢا
और नेक सुलूक करने वाला
بِوَٰلِدَتِى
अपनी वालिदा से
وَلَمْ
और नहीं
يَجْعَلْنِى
उसने बनाया मुझे
جَبَّارًۭا
सरकश
شَقِيًّۭا
बदबख़्त
और अपनी माँ का हक़ अदा करनेवाला बनाया। और उसने मुझे सरकश और बेनसीब नहीं बनाया
तफ़्सीर:
और उसने मुझे अपनी माँ के साथ अच्छा व्यवहार करने वाला बनाया है तथा अपने रब के आज्ञापालन से अभिमान करने वाला और उसकी अवज्ञा करने वाला नहीं बनाया है।
आयत 33
وَٱلسَّلَـٰمُ عَلَىَّ يَوْمَ وُلِدتُّ وَيَوْمَ أَمُوتُ وَيَوْمَ أُبْعَثُ حَيًّۭا
وَٱلسَّلَـٰمُ
और सलामती है
عَلَىَّ
मुझ पर
يَوْمَ
जिस दिन
وُلِدتُّ
पैदा किया गया मैं
وَيَوْمَ
और जिस दिन
أَمُوتُ
मैं मरुँगा
وَيَوْمَ
और जिस दिन
أُبْعَثُ
मैं उठाया जाऊँगा
حَيًّۭا
ज़िन्दा करके
सलाम है मुझपर जिस दिन कि मैं पैदा हुआ और जिस दिन कि मैं मरूँ और जिस दिन कि जीवित करके उठाया जाऊँ!"
तफ़्सीर:
तथा मुझे शैतान और उसके सहयोगियों से सुरक्षित रखा गया है जिस दिन मैं पैदा हुआ, जिस दिन मैं मरूँगा और जब क़ियामत के दिन दोबारा जीवित करके उठाया जाऊँगा। अतः मैं इन तीनों वहशतनाक स्थितियों में शैतान के प्रभाव से सुरक्षित रहा।
आयत 34
ذَٰلِكَ عِيسَى ٱبْنُ مَرْيَمَ ۚ قَوْلَ ٱلْحَقِّ ٱلَّذِى فِيهِ يَمْتَرُونَ
ذَٰلِكَ
ये हैं
عِيسَى
(was) Isa
ٱبْنُ
(the) son
مَرْيَمَ ۚ
ईसा इब्ने मरियम
قَوْلَ
बात
ٱلْحَقِّ
हक़ की
ٱلَّذِى
वो जो
فِيهِ
इसमें
يَمْتَرُونَ
वो शक करते हैं
सच्ची और पक्की बात की स्पष्ट से यह है कि मरयम का बेटा ईसा, जिसके विषय में वे सन्देह में पड़े हुए है
तफ़्सीर:
इन सभी गुणों से विशिष्ट व्यक्ति ईसा बिन मरयम है। यही उसके बारे में सत्य बात है, न कि उन गुमराह लोगों की बात, जो उसके बारे में संदेह करते हैं और मतभेद में पड़े हुए हैं।
आयत 35
مَا كَانَ لِلَّهِ أَن يَتَّخِذَ مِن وَلَدٍۢ ۖ سُبْحَـٰنَهُۥٓ ۚ إِذَا قَضَىٰٓ أَمْرًۭا فَإِنَّمَا يَقُولُ لَهُۥ كُن فَيَكُونُ
مَا
नहीं
كَانَ
है (लायक़)
لِلَّهِ
अल्लाह के
أَن
कि
يَتَّخِذَ
वो बनाए
مِن
any son
وَلَدٍۢ ۖ
कोई औलाद
سُبْحَـٰنَهُۥٓ ۚ
पाक है वो
إِذَا
जब
قَضَىٰٓ
वो फ़ैसला करता है
أَمْرًۭا
किसी काम का
فَإِنَّمَا
तो बेशक
يَقُولُ
वो कहता है
لَهُۥ
उसे
كُن
हो जा
فَيَكُونُ
तो वो हो जाता है
अल्लाह ऐसा नहीं कि वह किसी को अपना बेटा बनाए। महान और उच्च है, वह! जब वह किसी चीज़ का फ़ैसला करता है तो बस उसे कह देता है, "हो जा!" तो वह हो जाती है। -
तफ़्सीर:
यह अल्लाह की महिमा के योग्य नहीं है कि वह संतान बनाए। वह इससे बहुत पवित्र और पाक है। जब वह किसी काम का इरादा करता है, तो उसके लिए उस काम को केवल इतना कहना पर्याप्त होता है कि 'हो जा' और वह अनिवार्य रूप से हो जाता है। अतः जिसकी यह महिमा हो, वह बेटा बनाने से सर्वोच्च है।
आयत 36
وَإِنَّ ٱللَّهَ رَبِّى وَرَبُّكُمْ فَٱعْبُدُوهُ ۚ هَـٰذَا صِرَٰطٌۭ مُّسْتَقِيمٌۭ
وَإِنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
رَبِّى
रब है मेरा
وَرَبُّكُمْ
और रब है तुम्हारा
فَٱعْبُدُوهُ ۚ
पस इबादत करो उसकी
هَـٰذَا
ये है
صِرَٰطٌۭ
रास्ता
مُّسْتَقِيمٌۭ
सीधा
"और निस्संदेह अल्लाह मेरा रब भी है और तुम्हारा रब भी। अतः तुम उसी की बन्दगी करो यही सीधा मार्ग है।"
तफ़्सीर:
तथा पवित्र अल्लाह ही मेरा और तुम सब का रब है। अतः पूरी निष्ठा से केवल उसी की इबादत करो। यह जो मैंने तुम्हें बताया, वह सीधा मार्ग है, जो अल्लाह की प्रसन्नता की ओर ले जाता है।
आयत 37
فَٱخْتَلَفَ ٱلْأَحْزَابُ مِنۢ بَيْنِهِمْ ۖ فَوَيْلٌۭ لِّلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِن مَّشْهَدِ يَوْمٍ عَظِيمٍ
فَٱخْتَلَفَ
तो इख़्तिलाफ़ किया
ٱلْأَحْزَابُ
गिरोहों ने
مِنۢ
from among them
بَيْنِهِمْ ۖ
आपस में
فَوَيْلٌۭ
तो हलाकत है
لِّلَّذِينَ
उनके लिए जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
مِن
from
مَّشْهَدِ
हाज़री से
يَوْمٍ
(of) a Day
عَظِيمٍ
बड़े दिन की
किन्तु उनमें कितने ही गिरोहों ने पारस्परिक वैमनस्य के कारण विभेद किया, तो जिन लोगों ने इनकार किया उनके लिए बड़ी तबाही है एक बड़े दिन की उपस्थिति से
तफ़्सीर:
फिर लोग ईसा (अलैहिस्सलाम) के बारे में मतभेद के शिकार हो गए और अलग-अलग गिरोहों में बँट गए। उनमें से कुछ लोग उसपर ईमान लाए और कहा : वह एक रसूल है। जबकि कुछ लोगों ने उसपर विश्वास नहीं किया, जैसा कि यहूदियों का हाल रहा। इसी तरह कुछ संप्रदायों ने उसके बारे में अतिशयोक्ति की। उनमें से कुछ ने कहा कि वह अल्लाह है और कुछ ने कहा कि वह अल्लाह का बेटा है। सच्चाई यह है कि अल्लाह इन सारी बातों से ऊँचा है। अतः उसके बारे में मतभेद करने वालों के लिए क़ियामत के दिन बड़ा विनाश है, जिस दिन भयावह परिस्थितियों का सामना होगा, हिसाब-किताब के दौर से गुज़रना होगा और सज़ा भुगतनी होगी।
आयत 38
أَسْمِعْ بِهِمْ وَأَبْصِرْ يَوْمَ يَأْتُونَنَا ۖ لَـٰكِنِ ٱلظَّـٰلِمُونَ ٱلْيَوْمَ فِى ضَلَـٰلٍۢ مُّبِينٍۢ
أَسْمِعْ
How they will hear
بِهِمْ
क्या ख़ूब सुनने वाले होंगे वो
وَأَبْصِرْ
और क्या ख़ूब देखने वाले
يَوْمَ
जिस दिन
يَأْتُونَنَا ۖ
वो आऐंगे हमारे पास
لَـٰكِنِ
लेकिन
ٱلظَّـٰلِمُونَ
ज़ालिम लोग
ٱلْيَوْمَ
आज
فِى
(are) in
ضَلَـٰلٍۢ
गुमराही में हैं
مُّبِينٍۢ
खुली
भली-भाँति सुननेवाले और भली-भाँति देखनेवाले होंगे, जिस दिन वे हमारे समाने आएँगे! किन्तु आज ये ज़ालिम खुली गुमराही में पड़े हुए है
तफ़्सीर:
उस दिन वे कितना सुनने वाले और कितना देखने वाले होंगे। वे उस समय सुनेंगे जब उन्हें सुनने से कोई फायदा नहीं होगा और उस समय देखेंगे जब देखने से उन्हें कोई लाभ नहीं होगा। परंतु अत्याचारी लोग दुनिया के जीवन में सीधे मार्ग से हटकर स्पष्ट गुमराही में पड़े हुए हैं। अतः वे आख़िरत के लिए कोई तैयारी नहीं करते यहाँ तक कि वह अचानक उन पर आ जाएगी और वे अपने अत्याचार ही में पड़े होंगे।
आयत 39
وَأَنذِرْهُمْ يَوْمَ ٱلْحَسْرَةِ إِذْ قُضِىَ ٱلْأَمْرُ وَهُمْ فِى غَفْلَةٍۢ وَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
وَأَنذِرْهُمْ
और डराइए उन्हें
يَوْمَ
(of the) Day
ٱلْحَسْرَةِ
हसरत के दिन से
إِذْ
जब
قُضِىَ
फ़ैसला किया जाएगा
ٱلْأَمْرُ
इस मामले का
وَهُمْ
और वो
فِى
(are) in
غَفْلَةٍۢ
(अब) ग़फ़लत में हैं
وَهُمْ
और वो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाते
उन्हें पश्चाताप के दिन से डराओ, जबकि मामले का फ़ैसला कर दिया जाएगा, और उनका हाल यह है कि वे ग़फ़लत में पड़े हुए है और वे ईमान नहीं ला रहे है
तफ़्सीर:
तथा (ऐ रसूल!) आप लोगों को पछतावे के दिन से डराएँ, जिस दिन जब सहीफ़े लपेट दिए जाएँगे, लोगों का हिसाब कर दिया जाएगा और हर व्यक्ति अपने कर्मों के हवाले हो जाएगा, तो बुराई करने वाला अपनी बुराई पर पछताएगा और नेकी करने वाला और अधिक नेकियाँ न करने पर पछताएगा। जबकि वे दुनिया के जीवन में उसके धोखे में पड़े हुए हैं, आख़िरत से बेपरवाह हैं और क़ियामत के दिन पर ईमान नहीं लाते हैं।
आयत 40
إِنَّا نَحْنُ نَرِثُ ٱلْأَرْضَ وَمَنْ عَلَيْهَا وَإِلَيْنَا يُرْجَعُونَ
إِنَّا
बेशक हम
نَحْنُ
हम ही
نَرِثُ
हम वारिस होंगे
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन के
وَمَنْ
और जो
عَلَيْهَا
उस पर है
وَإِلَيْنَا
और तरफ़ हमारे ही
يُرْجَعُونَ
वो लौटाए जाऐंगे
धरती और जो भी उसके ऊपर है उसके वारिस हम ही रह जाएँगे और हमारी ही ओर उन्हें लौटना होगा
तफ़्सीर:
निश्चय हम ही प्राणियों के विनाश के बाद बाक़ी रहेंगे और धरती के तथा उसपर मौजूद सारी चीज़ों के वारिस होंगे। क्योंकि उनका विनाश हो जाएगा और उनके बाद हम ही बाक़ी रहेंगे और हम उनके मालिक होंगे और हम जैसे चाहेंगे उन्हें प्रयोग करेंगे। तथा क़ियामत के दिन सारे लोग हिसाब-किताब और बदले के लिए हमारी ही ओर लौटाए जाएँगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
ईसा अलैहिस्सलाम की बचपन में गवाही का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह की कुदरत हर मुश्किल हालात में भी अपने बंदों की मदद कर सकती है।
आयत 41
وَٱذْكُرْ فِى ٱلْكِتَـٰبِ إِبْرَٰهِيمَ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ صِدِّيقًۭا نَّبِيًّا
وَٱذْكُرْ
और ज़िक्र कीजिए
فِى
in
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में
إِبْرَٰهِيمَ ۚ
इब्राहीम का
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
था वो
صِدِّيقًۭا
सच्चा
نَّبِيًّا
नबी
और इस किताब में इबराहीम की चर्चा करो। निस्संदेह वह एक सत्यवान नबी था
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आपके ऊपर जो क़ुरआन उतारा गया है, उसमें इबराहीम अलैहिस्सलाम के वृत्तांत की चर्चा कीजिए। वास्तव में, वह बड़े सत्यवादी, अल्लाह की आयतों को सच मानने वाले और अल्लाह की ओर से भेजे हुए नबी थे।
आयत 42
إِذْ قَالَ لِأَبِيهِ يَـٰٓأَبَتِ لِمَ تَعْبُدُ مَا لَا يَسْمَعُ وَلَا يُبْصِرُ وَلَا يُغْنِى عَنكَ شَيْـًۭٔا
إِذْ
जब
قَالَ
उसने कहा
لِأَبِيهِ
अपने बाप से
يَـٰٓأَبَتِ
ऐ मेरे अब्बाजान
لِمَ
क्यों
تَعْبُدُ
आप इबादत करते हैं
مَا
उसकी जो
لَا
not
يَسْمَعُ
ना वो सुनता है
وَلَا
और ना
يُبْصِرُ
वो देखता है
وَلَا
और ना
يُغْنِى
वो काम आता है
عَنكَ
आपके
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
जबकि उसने अपने बाप से कहा, "ऐ मेरे बाप! आप उस चीज़ को क्यों पूजते हो, जो न सुने और न देखे और न आपके कुछ काम आए?
तफ़्सीर:
जब उन्होंने अपने पिता आज़र से कहा : ऐ मेरे पिता! आप अल्लाह को छोड़कर ऐसे बुत की पूजा क्यों करते हैं, जिसे यदि आप पुकारें, तो वह आपकी पुकार नहीं सुनता है; यदि आप उसकी पूजा करें, तो वह आपकी पूजा को नहीं देखता है, तथा वह न आपकी हानि को दूर करता है और न आपको कोई लाभ देता पहुँचाता हैॽ!
आयत 43
يَـٰٓأَبَتِ إِنِّى قَدْ جَآءَنِى مِنَ ٱلْعِلْمِ مَا لَمْ يَأْتِكَ فَٱتَّبِعْنِىٓ أَهْدِكَ صِرَٰطًۭا سَوِيًّۭا
يَـٰٓأَبَتِ
ऐ मेरे अब्बाजान
إِنِّى
बेशक मैं
قَدْ
तहक़ीक़
جَآءَنِى
आया है मेरे पास
مِنَ
of
ٱلْعِلْمِ
इल्म में से
مَا
जो
لَمْ
नहीं
يَأْتِكَ
आया आपके पास
فَٱتَّبِعْنِىٓ
पस पैरवी कीजिए मेरी
أَهْدِكَ
मैं रहनुमाई करुँगा आपकी
صِرَٰطًۭا
(तरफ़) रास्ते
سَوِيًّۭا
सीधे के
ऐ मेरे बाप! मेरे पास ज्ञान आ गया है जो आपके पास नहीं आया। अतः आप मेरा अनुसरण करें, मैं आपको सीधा मार्ग दिखाऊँगा
तफ़्सीर:
हे मेरे पिता! निश्चय मेरे पास वह़्य के माध्यम से वह ज्ञान आया है, जो आपके पास नहीं आया। इसलिए आप मेरा अनुसरण करें, मैं आपका सीधे रास्ते पर मार्गदर्शन करूँगा।
आयत 44
يَـٰٓأَبَتِ لَا تَعْبُدِ ٱلشَّيْطَـٰنَ ۖ إِنَّ ٱلشَّيْطَـٰنَ كَانَ لِلرَّحْمَـٰنِ عَصِيًّۭا
يَـٰٓأَبَتِ
ऐ मेरे अब्बाजान
لَا
(Do) not
تَعْبُدِ
ना आप इबादत कीजिए
ٱلشَّيْطَـٰنَ ۖ
शैतान की
إِنَّ
बेशक
ٱلشَّيْطَـٰنَ
शैतान
كَانَ
है वो
لِلرَّحْمَـٰنِ
रहमान का
عَصِيًّۭا
नाफ़रमान
ऐ मेरे बाप! शैतान की बन्दगी न कीजिए। शैतान तो रहमान का अवज्ञाकारी है
तफ़्सीर:
ऐ मेरे पिता! शैतान का अनुसरण करके उसकी पूजा न करें। निःसंदेह शैतान अत्यंत दयावान् अल्लाह का अवज्ञाकारी है। क्योंकि अल्लाह ने उसे आदम अलैहिस्सलाम के सामने सजदा करने का आदेश दिया था, लेकिन उसने सजदा नहीं किया।
आयत 45
يَـٰٓأَبَتِ إِنِّىٓ أَخَافُ أَن يَمَسَّكَ عَذَابٌۭ مِّنَ ٱلرَّحْمَـٰنِ فَتَكُونَ لِلشَّيْطَـٰنِ وَلِيًّۭا
يَـٰٓأَبَتِ
ऐ मेरे अब्बाजान
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَخَافُ
मैं डरता हूँ
أَن
कि
يَمَسَّكَ
पहुँचेगा आपको
عَذَابٌۭ
अज़ाब
مِّنَ
from
ٱلرَّحْمَـٰنِ
रहमान की तरफ़ से
فَتَكُونَ
फिर आप हो जाऐंगे
لِلشَّيْطَـٰنِ
शैतान के
وَلِيًّۭا
दोस्त
ऐ मेरे बाप! मैं डरता हूँ कि कहीं आपको रहमान की कोई यातना न आ पकड़े और आप शैतान के साथी होकर रह जाएँ।"
तफ़्सीर:
ऐ मेरे पिता! यदि इसी अविश्वास की अवस्था में आपकी मृत्यु हो गई, तो मुझे भय है कि कहीं आपको रहमान की ओर से कोई यातना न पहुँचे, फिर आप शैतान की दोस्ती के कारण यातना में उसके साथी बन जाएँ।
आयत 46
قَالَ أَرَاغِبٌ أَنتَ عَنْ ءَالِهَتِى يَـٰٓإِبْرَٰهِيمُ ۖ لَئِن لَّمْ تَنتَهِ لَأَرْجُمَنَّكَ ۖ وَٱهْجُرْنِى مَلِيًّۭا
قَالَ
उसने कहा
أَرَاغِبٌ
क्या फिरने वाला है
أَنتَ
तू
عَنْ
(from)
ءَالِهَتِى
मेरे इलाहों से
يَـٰٓإِبْرَٰهِيمُ ۖ
ऐ इब्राहीम
لَئِن
अलबत्ता अगर
لَّمْ
ना
تَنتَهِ
तू बाज़ आया
لَأَرْجُمَنَّكَ ۖ
अलबत्ता मैं ज़रुर संगसार कर दूँगा
وَٱهْجُرْنِى
और छोड़ दे मुझे
مَلِيًّۭا
लम्बी मुद्दत तक
उसने कहा, "ऐ इबराहीम! क्या तू मेरे उपास्यों से फिर गया है? यदि तू बाज़ न आया तो मैं तुझपर पथराव कर दूँगा। तू अलग हो जा मुझसे मुद्दत के लिए!"
तफ़्सीर:
आज़र ने अपने पुत्र इबराहीम अलैहिस्सलाम से कहा : ऐ इबराहीम! जिन बुतों की मैं पूजा करता हूँ, क्या तू उनसे विमुख हो रहा है? यदि तू मेरे बुतों को बुरा-भला कहने से बाज़ न आया, तो मैं तुझपर पत्थर बरसाऊँगा। तू लंबे समय के लिए मुझसे अलग हो जा, सो मुझसे बात न करना और न मेरे सामने आना।
आयत 47
قَالَ سَلَـٰمٌ عَلَيْكَ ۖ سَأَسْتَغْفِرُ لَكَ رَبِّىٓ ۖ إِنَّهُۥ كَانَ بِى حَفِيًّۭا
قَالَ
उसने कहा
سَلَـٰمٌ
सलाम हो
عَلَيْكَ ۖ
आप पर
سَأَسْتَغْفِرُ
ज़रूर मैं बख़्शिश माँगूंगा
لَكَ
आपके लिए
رَبِّىٓ ۖ
अपने रब से
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
है वो
بِى
मुझ पर
حَفِيًّۭا
बड़ा मेहरबान
कहा, "सलाम है आपको! मैं आपके लिए रब से क्षमा की प्रार्थना करूँगा। वह तो मुझपर बहुत मेहरबान है
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम ने अपने पिता से कहा : मेरी ओर से आपको सलाम है। मेरी ओर से आपको कोई कष्ट नहीं पहुँचेगा। मैं आपके लिए अपने रब से क्षमा और मार्गदर्शन माँगूँगा। निःसंदेह वह हमेशा से मुझ पर बहुत दयालु है।
आयत 48
وَأَعْتَزِلُكُمْ وَمَا تَدْعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَأَدْعُوا۟ رَبِّى عَسَىٰٓ أَلَّآ أَكُونَ بِدُعَآءِ رَبِّى شَقِيًّۭا
وَأَعْتَزِلُكُمْ
और मैं छोड़ता हूँ तुम्हें
وَمَا
और जिन्हें
تَدْعُونَ
तुम पुकारते हो
مِن
besides
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَأَدْعُوا۟
और मैं पुकारता हूँ
رَبِّى
अपने रब को
عَسَىٰٓ
उम्मीद है
أَلَّآ
कि ना
أَكُونَ
मैं हूँगा
بِدُعَآءِ
पुकार कर
رَبِّى
अपने रब को
شَقِيًّۭا
महरूम/बदनसीब
मैं आप लोगों को छोड़ता हूँ और उनको भी जिन्हें अल्लाह से हटकर आप लोग पुकारा करते है। मैं तो अपने रब को पुकारूँगा। आशा है कि मैं अपने रब को पुकारकर बेनसीब नहीं रहूँगा।"
तफ़्सीर:
तथा मैं आप लोगों से और आप लोगों के उन पूज्यों से किनारा करता हूँ, जिन्हें आप अल्लाह के सिवा पूजते हैं और मैं केवल अपने अकेले पालनहार को पुकारता हूँ तथा उसके साथ किसी भी चीज़ को साझी नहीं बनाता। आशा है कि जब मैं उससे दुआ करूँगा, तो वह मेरी दुआ को नहीं ठुकराएगा, कि मैं उससे दुआ करके बेनसीब रहूँ।
आयत 49
فَلَمَّا ٱعْتَزَلَهُمْ وَمَا يَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَهَبْنَا لَهُۥٓ إِسْحَـٰقَ وَيَعْقُوبَ ۖ وَكُلًّۭا جَعَلْنَا نَبِيًّۭا
فَلَمَّا
तो जब
ٱعْتَزَلَهُمْ
उसने छोड़ दिया उन्हें
وَمَا
और जिनकी
يَعْبُدُونَ
वो इबादत करते थे
مِن
besides Allah
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَهَبْنَا
अता किए हमने
لَهُۥٓ
उसके लिए
إِسْحَـٰقَ
इसहाक़
وَيَعْقُوبَ ۖ
और याक़ूब
وَكُلًّۭا
और हर एक को
جَعَلْنَا
बनाया हमने
نَبِيًّۭا
नबी
फिर जब वह उन लोगों से और जिन्हें वे अल्लाह के सिवा पूजते थे उनसे अलग हो गया, तो हमने उसे इसहाक़ और याक़ूब प्रदान किए और हर एक को हमने नबी बनाया
तफ़्सीर:
जब इबराहीम (अलैहिस्सलाम) ने उन्हें और उनके उन पूज्यों को छोड़ दिया, जिनकी वे अल्लाह के अलावा पूजा करते थे, तो हमने उसे उसके परिवार से वंचित होने की भरपाई की। इसलिए हमने उसे उसका पुत्र इसहाक़ तथा उसका पोता याक़ूब दिया और उनमें से प्रत्येक को हमने नबी बनाया।
आयत 50
وَوَهَبْنَا لَهُم مِّن رَّحْمَتِنَا وَجَعَلْنَا لَهُمْ لِسَانَ صِدْقٍ عَلِيًّۭا
وَوَهَبْنَا
और अता किया हमने
لَهُم
उन्हें
مِّن
of
رَّحْمَتِنَا
अपनी रहमत से
وَجَعَلْنَا
और कर दी हमने
لَهُمْ
उनके लिए
لِسَانَ
ज़बान/नामवरी
صِدْقٍ
सच्चाई की
عَلِيًّۭا
बुलन्द मर्तबा
और उन्हें अपनी दयालुता से हिस्सा दिया। और उन्हें एक सच्ची उच्च ख्याति प्रदान की
तफ़्सीर:
और हमने उन्हें अपनी दया से नुबुव्वत के साथ बहुत सारी भलाइयाँ प्रदान कीं और उनके लिए लोगों की ज़बानों पर हमेशा के लिए अच्छी प्रशंसा रख दी।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इब्राहीम अलैहिस्सलाम के अपने वालिद को समझाने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि बड़ों को नसीहत करते वक्त भी अदब और नर्मी का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।
आयत 51
وَٱذْكُرْ فِى ٱلْكِتَـٰبِ مُوسَىٰٓ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ مُخْلَصًۭا وَكَانَ رَسُولًۭا نَّبِيًّۭا
وَٱذْكُرْ
और ज़िक्र कीजिए
فِى
in
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में
مُوسَىٰٓ ۚ
मूसा का
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
था वो
مُخْلَصًۭا
ख़ालिस किया हुआ/चुना हुआ
وَكَانَ
और था वो
رَسُولًۭا
एक रसूल
نَّبِيًّۭا
नबी
और इस किताब में मूसा की चर्चा करो। निस्संदेह वह चुना हुआ था और एक रसूल, नबी था
तफ़्सीर:
तथा (ऐ रसूल!) आप अपने ऊपर उतारे गए क़ुरआन में मूसा (अलैहिस्सलाम) के वृत्तांत की चर्चा करें। निश्चय वह एक चुने हुए, मनोनीत व्यक्ति तथा रसूल एवं नबी थे।
आयत 52
وَنَـٰدَيْنَـٰهُ مِن جَانِبِ ٱلطُّورِ ٱلْأَيْمَنِ وَقَرَّبْنَـٰهُ نَجِيًّۭا
وَنَـٰدَيْنَـٰهُ
और पुकारा हमने उसे
مِن
from
جَانِبِ
जानिब से
ٱلطُّورِ
तूर की
ٱلْأَيْمَنِ
दाऐं
وَقَرَّبْنَـٰهُ
और क़रीब कर लिया हमने उसे
نَجِيًّۭا
सरगोशी के लिए
हमने उसे 'तूर' के मुबारक छोर से पुकारा और रहस्य की बातें करने के लिए हमने उसे समीप किया
तफ़्सीर:
और हमने मूसा (अलैहिस्सलाम) को, उसके स्थान के हिसाब से (तूर) पहाड़ की दाहिनी ओर से पुकारा और उसे रहस्य की बात करने के लिए निकट कर लिया। चुनाँचे मूसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह की बात सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
आयत 53
وَوَهَبْنَا لَهُۥ مِن رَّحْمَتِنَآ أَخَاهُ هَـٰرُونَ نَبِيًّۭا
وَوَهَبْنَا
और अता किया हमने
لَهُۥ
उसे
مِن
from
رَّحْمَتِنَآ
अपनी रहमत से
أَخَاهُ
उसका भाई
هَـٰرُونَ
हारून
نَبِيًّۭا
नबी बनाकर
और अपनी दयालुता से अपने भाई हारून को नबी बनाकर उसे दिया
तफ़्सीर:
और हमने (उसपर अपनी दया और अनुग्रह के कारण) उसे उसके भाई हारून अलैहिस्सलाम को नबी बनाकर दिया; जो दरअसल उसकी उस दुआ को स्वीकार करने के रूप में था जो उन्होंने अपने रब से माँगी थी।
आयत 54
وَٱذْكُرْ فِى ٱلْكِتَـٰبِ إِسْمَـٰعِيلَ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ صَادِقَ ٱلْوَعْدِ وَكَانَ رَسُولًۭا نَّبِيًّۭا
وَٱذْكُرْ
और ज़िक्र कीजिए
فِى
in
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में
إِسْمَـٰعِيلَ ۚ
इस्माईल का
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
था वो
صَادِقَ
सच्चा
ٱلْوَعْدِ
वादे का
وَكَانَ
और था वो
رَسُولًۭا
एक रसूल
نَّبِيًّۭا
नबी
और इस किताब में इसमाईल की चर्चा करो। निस्संदेह वह वादे का सच्च, नबी था
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आपपर जो क़ुरआन उतारा गया है, उसमें इसमाईल (अलैहिस्सलाम) के वृत्तांत की चर्चा करें। निश्चय ही वह वचन का पक्का था, जब भी कोई वादा करता उसे ज़रूर पूरा करता था तथा वह रसूल एवं नबी था।
आयत 55
وَكَانَ يَأْمُرُ أَهْلَهُۥ بِٱلصَّلَوٰةِ وَٱلزَّكَوٰةِ وَكَانَ عِندَ رَبِّهِۦ مَرْضِيًّۭا
وَكَانَ
और था वो
يَأْمُرُ
वो हुक्म देता
أَهْلَهُۥ
अपने घर वालों को
بِٱلصَّلَوٰةِ
नमाज़ का
وَٱلزَّكَوٰةِ
और ज़कात का
وَكَانَ
और था वो
عِندَ
near
رَبِّهِۦ
अपने रब का यहाँ
مَرْضِيًّۭا
पसंदीदा
और अपने लोगों को नमाज़ और ज़कात का हुक्म देता था। और वह अपने रब के यहाँ प्रीतिकर व्यक्ति था
तफ़्सीर:
वह अपने परिवार को नमाज़ स्थापित करने और ज़कात देने का आदेश देता था, तथा वह अपने पालनहार के निकट पसंदीदा था।
आयत 56
وَٱذْكُرْ فِى ٱلْكِتَـٰبِ إِدْرِيسَ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ صِدِّيقًۭا نَّبِيًّۭا
وَٱذْكُرْ
और ज़िक्र कीजिए
فِى
in
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में
إِدْرِيسَ ۚ
इदरीस का
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
था वो
صِدِّيقًۭا
सिद्दीक़/निहायत सच्चा
نَّبِيًّۭا
नबी
और इस किताब में इदरीस की भी चर्चा करो। वह अत्यन्त सत्यवान, एक नबी था
तफ़्सीर:
तथा (ऐ रसूल!) आपपर जो क़ुरआन उतारा गया है, उसमें इदरीस (अलैहिस्सलाम) के वृत्तांत की चर्चा करें। वह बड़ा सत्यवादी और अपने रब की आयतों को सच मानने वाला था और अल्लाह के नबियों में से एक नबी था।
आयत 57
وَرَفَعْنَـٰهُ مَكَانًا عَلِيًّا
وَرَفَعْنَـٰهُ
और बुलन्द किया हमने उसे
مَكَانًا
मक़ाम
عَلِيًّا
बुलन्द पर
हमने उसे उच्च स्थान पर उठाया था
तफ़्सीर:
और हमने उसे नुबुव्वत प्रदान करके उसकी चर्चा को ऊँचा कर दिया। इस प्रकार वह उच्च स्थान पर था।
आयत 58
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ أَنْعَمَ ٱللَّهُ عَلَيْهِم مِّنَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ مِن ذُرِّيَّةِ ءَادَمَ وَمِمَّنْ حَمَلْنَا مَعَ نُوحٍۢ وَمِن ذُرِّيَّةِ إِبْرَٰهِيمَ وَإِسْرَٰٓءِيلَ وَمِمَّنْ هَدَيْنَا وَٱجْتَبَيْنَآ ۚ إِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ ءَايَـٰتُ ٱلرَّحْمَـٰنِ خَرُّوا۟ سُجَّدًۭا وَبُكِيًّۭا ۩
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
ٱلَّذِينَ
जो
أَنْعَمَ
इनाम किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَيْهِم
उन पर
مِّنَ
from (among)
ٱلنَّبِيِّـۧنَ
नबियों में से
مِن
of
ذُرِّيَّةِ
औलाद में से
ءَادَمَ
आदम की
وَمِمَّنْ
और उनमें से जिन्हें
حَمَلْنَا
सवार किया हमने
مَعَ
with
نُوحٍۢ
साथ नूह के
وَمِن
and of
ذُرِّيَّةِ
और औलाद में से
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम
وَإِسْرَٰٓءِيلَ
और इस्राईल (याक़ूब) की
وَمِمَّنْ
और उनमें से जिन्हें
هَدَيْنَا
हिदायत दी हमने
وَٱجْتَبَيْنَآ ۚ
और चुन लिया हमने
إِذَا
जब
تُتْلَىٰ
पढ़ी जाती थीं
عَلَيْهِمْ
उन पर
ءَايَـٰتُ
आयात
ٱلرَّحْمَـٰنِ
रहमान की
خَرُّوا۟
वो गिर पड़ते थे
سُجَّدًۭا
सजदा करते हुए
وَبُكِيًّۭا ۩
और रोते हुए
ये वे पैग़म्बर है जो अल्लाह के कृपापात्र हुए, आदम की सन्तान में से और उन लोगों के वंशज में से जिनको हमने नूह के साथ सवार किया, और इबराहीम और इसराईल के वंशज में से और उनमें से जिनको हमने सीधा मार्ग दिखाया और चुन लिया। जब उन्हें रहमान की आयतें सुनाई जातीं तो वे सजदा करते और रोते हुए गिर पड़ते थे
तफ़्सीर:
इस सूरत में ज़करिय्या अलैहिस्सलाम से शुरू होकर इदरीस अलैहिस्सलाम तक वर्णित लोग, वे हैं जिन्हें अल्लाह ने नुबुव्वत से सम्मानित किया, आदम अलैहिस्सलाम की संतान में से, तथा उन लोगों की संतान में से जिन्हें हमने नूह़ अलैहिस्सलाम के साथ नाव पर सवार किया, तथा इबराहीम और याक़ूब अलैहिमस्सलाम के वंशज में से, तथा उन लोगों में से जिन्हें हमने इस्लाम के मार्ग पर चलने का सामर्थ्य प्रदान किया तथा हमने उन्हें चुन लिया और उन्हें नबी बना दिया। इन लोगों का हाल यह था कि जब अल्लाह की आयतों को पढ़ते हुए सुनते, तो अल्लाह के डर से रोते हुए सजदे में गिर जाते थे।
आयत 59
۞ فَخَلَفَ مِنۢ بَعْدِهِمْ خَلْفٌ أَضَاعُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَٱتَّبَعُوا۟ ٱلشَّهَوَٰتِ ۖ فَسَوْفَ يَلْقَوْنَ غَيًّا
۞ فَخَلَفَ
तो पीछे आए
مِنۢ
after them
بَعْدِهِمْ
बाद उनके
خَلْفٌ
बुरे जानशीन
أَضَاعُوا۟
जिन्होंने ज़ाया कर दी
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَٱتَّبَعُوا۟
और उन्होंने पैरवी की
ٱلشَّهَوَٰتِ ۖ
ख़्वाहिशात की
فَسَوْفَ
तो अनक़रीब
يَلْقَوْنَ
वो जा मिलेंगे
غَيًّا
गुमराही/हलाकत को
फिर उनके पश्चात ऐसे बुरे लोग उनके उत्तराधिकारी हुए, जिन्होंने नमाज़ को गँवाया और मन की इच्छाओं के पीछे पड़े। अतः जल्द ही वे गुमराही (के परिणाम) से दोचार होंगा
तफ़्सीर:
फिर अल्लाह के इन चुने हुए नबियों के बाद ऐसे बुरे और गुमराह अनुयायी पैदा हुए, जिन्होंने नमाज़ को नष्ट कर दिया और उसे अपेक्षित तरीक़े से नहीं अदा किया, तथा उनके मन में जिन पापों की इच्छा पैदा हुई, उन्हें कर डाले, यहाँ तक कि व्यभिचार जैसे पाप से भी उपेक्षा नहीं की। तो ऐसे लोग शीघ्र ही जहन्नम में बुराई और नाकामी (निराशा) का सामना करेंगे।
आयत 60
إِلَّا مَن تَابَ وَءَامَنَ وَعَمِلَ صَـٰلِحًۭا فَأُو۟لَـٰٓئِكَ يَدْخُلُونَ ٱلْجَنَّةَ وَلَا يُظْلَمُونَ شَيْـًۭٔا
إِلَّا
सिवाय
مَن
उसके जो
تَابَ
तौबा करे
وَءَامَنَ
और वो ईमान ले आए
وَعَمِلَ
और वो अमल करे
صَـٰلِحًۭا
नेक
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
يَدْخُلُونَ
वो दाख़िल होंगे
ٱلْجَنَّةَ
जन्नत में
وَلَا
और ना
يُظْلَمُونَ
वो ज़ुल्म किए जाऐंगे
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
किन्तु जो तौबा करे और ईमान लाए और अच्छा कर्म करे, तो ऐसे लोग जन्नत में प्रवेश करेंगे। उनपर कुछ भी ज़ुल्म न होगा। -
तफ़्सीर:
किंतु जिसने अपनी कमियों और लापरवाही से तौबा कर ली, अल्लाह पर ईमान लाया और अच्छे कर्म किए, तो इन गुणों से सुसज्जित लोग जन्नत में प्रवेश करेंगे और उनके कर्मों के सवाब में थोड़ी-सी भी कमी नहीं की जाएगी।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मूसा, इस्माईल, इदरीस अलैहिस्सलाम का मुख्तसर ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि सच्चे नबियों की मिसाल हमें सच्चाई और वादा निभाने की तालीम देती है।
आयत 61
جَنَّـٰتِ عَدْنٍ ٱلَّتِى وَعَدَ ٱلرَّحْمَـٰنُ عِبَادَهُۥ بِٱلْغَيْبِ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ وَعْدُهُۥ مَأْتِيًّۭا
جَنَّـٰتِ
बाग़ात
عَدْنٍ
हमेशगी के
ٱلَّتِى
वो जिनका
وَعَدَ
वादा किया
ٱلرَّحْمَـٰنُ
रहमान ने
عِبَادَهُۥ
अपने बन्दों से
بِٱلْغَيْبِ ۚ
ग़ायबाना
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
है
وَعْدُهُۥ
वादा उसका
مَأْتِيًّۭا
आया हुआ
अदन (रहने) के बाग़ जिनका रहमान ने अपने बन्दों से परोक्ष में होते हुए वादा किया है। निश्चय ही उसके वादे पर उपस्थित हाना है। -
तफ़्सीर:
सदा निवास और स्थिरता की जन्नतों में, जिनका अत्यंत दयावान् अल्लाह ने अपने सदाचारी बंदों से (उनके) बिन देखे वादा किया है कि वह उन्हें उनके अंदर दाखिल करेगा। हालाँकि वे उन्हें देखे बिना ही उनपर ईमान ले आए, इसलिए अल्लाह का जन्नत का वादा (भले ही वह अदृश्य हो) अनिवार्य रूप से पूरा होकर रहेगा।
आयत 62
لَّا يَسْمَعُونَ فِيهَا لَغْوًا إِلَّا سَلَـٰمًۭا ۖ وَلَهُمْ رِزْقُهُمْ فِيهَا بُكْرَةًۭ وَعَشِيًّۭا
لَّا
Not
يَسْمَعُونَ
ना वो सुनेंगे
فِيهَا
उसमें
لَغْوًا
कोई लग़्व
إِلَّا
सिवाय
سَلَـٰمًۭا ۖ
सलाम के
وَلَهُمْ
और उनके लिए
رِزْقُهُمْ
उनका रिज़्क़ (होगा)
فِيهَا
उसमें
بُكْرَةًۭ
सुबह
وَعَشِيًّۭا
और शाम
वहाँ वे 'सलाम' के सिवा कोई व्यर्थ बात नहीं सुनेंगे। उनकी रोज़ी उन्हें वहाँ प्रातः और सन्ध्या समय प्राप्त होती रहेगी
तफ़्सीर:
वे उनके अंदर कोई व्यर्थ बात और अश्लील शब्द नहीं सुनेंगे। बल्कि आपस में एक-दूसरे को किया जाने वाला सलाम और फ़रिश्तों की ओर से उन्हें प्रस्तुत किया जाने वाला सलाम सुनेंगे और उनके अंदर उन्हें जो खाना वे चाहेंगे, सुबह-शाम मिलता रहेगा।
आयत 63
تِلْكَ ٱلْجَنَّةُ ٱلَّتِى نُورِثُ مِنْ عِبَادِنَا مَن كَانَ تَقِيًّۭا
تِلْكَ
ये है
ٱلْجَنَّةُ
जन्नत
ٱلَّتِى
जिसका
نُورِثُ
हम वारिस बनाऐंगे
مِنْ
[of] (to)
عِبَادِنَا
अपने बन्दों में से
مَن
उसे जो
كَانَ
होगा
تَقِيًّۭا
मुत्तक़ी/डरने वाला
यह है वह जन्नत जिसका वारिस हम अपने बन्दों में से हर उस व्यक्ति को बनाएँगे, जो डर रखनेवाला हो
तफ़्सीर:
इने विशेषताओं के साथ वर्णित यह जन्नत, वह है जिसका उत्तराधिकारी हम अपने उन बंदों को बनाएँगे, जो (हमारे) आदेशों का पालन करने वाले होंगे और (हमारी) मना की हुई चीज़ों से बचने वाले होंगे।
आयत 64
وَمَا نَتَنَزَّلُ إِلَّا بِأَمْرِ رَبِّكَ ۖ لَهُۥ مَا بَيْنَ أَيْدِينَا وَمَا خَلْفَنَا وَمَا بَيْنَ ذَٰلِكَ ۚ وَمَا كَانَ رَبُّكَ نَسِيًّۭا
وَمَا
और नहीं
نَتَنَزَّلُ
हम उतरा करते
إِلَّا
मगर
بِأَمْرِ
हुक्म से
رَبِّكَ ۖ
आपके रब के
لَهُۥ
उसी के लिए है
مَا
जो
بَيْنَ
(is) before us
أَيْدِينَا
हमारे आगे है
وَمَا
और जो
خَلْفَنَا
हमारे पीछे है
وَمَا
और जो
بَيْنَ
(is) between
ذَٰلِكَ ۚ
दर्मियान है उसके
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
رَبُّكَ
रब आपका
نَسِيًّۭا
भूलने वाला
हम तुम्हारे रब की आज्ञा के बिना नहीं उतरते। जो कुछ हमारे आगे है और जो कुछ हमारे पीछे है और जो कुछ इसके मध्य है सब उसी का है, और तुम्हारा रब भूलनेवाला नहीं है
तफ़्सीर:
और (ऐ जिबरील!) मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कह दें : फ़रिश्ते स्वयं नहीं उतरते हैं। बल्कि वे अल्लाह की आज्ञा से उतरते हैं। अल्लाह ही का है जो कुछ हम आख़िरत के मामले से सामना करने वाले हैं, तथा जो हमने इस दुनिया के मामलों से पीछे छोड़ दिया है और जो कुछ इस दुनिया और आख़िरत के बीच है। तथा (ऐ रसूल!) आपका पालनहार कुछ भूलने वाला नहीं है।
आयत 65
رَّبُّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا فَٱعْبُدْهُ وَٱصْطَبِرْ لِعِبَـٰدَتِهِۦ ۚ هَلْ تَعْلَمُ لَهُۥ سَمِيًّۭا
رَّبُّ
रब है
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन का
وَمَا
और उसका जो
بَيْنَهُمَا
दर्मियान है उन दोनों के
فَٱعْبُدْهُ
पस इबादत करो उसकी
وَٱصْطَبِرْ
और जमे रहो/क़ायम रहो
لِعِبَـٰدَتِهِۦ ۚ
उसकी इबादत पर
هَلْ
क्या
تَعْلَمُ
तुम जानते हो
لَهُۥ
उसका
سَمِيًّۭا
कोई हमनाम
आकाशों और धरती का रब है और उसका भी जो इन दोनों के मध्य है। अतः तुम उसी की बन्दगी पर जमे रहो। क्या तुम्हारे ज्ञान में उस जैसा कोई है?
तफ़्सीर:
वह आकाशों तथा धरती का रचयिता, उन दोनों का मालिक और उनके मामले का प्रबंधक, तथा उन दोनों के बीच की चीज़ों का रचयिता, उनका मालिक तथा उनके मामले का प्रबंधक है। अतः केवल उसी की इबादत करो। क्योंकि वही इबादत का हक़दार है। तथा उसकी इबादत पर दृढ़ रहो। क्योंकि उसका कोई सदृश या समकक्ष नहीं है, जो इबादत में उसका साझीदार हो।
आयत 66
وَيَقُولُ ٱلْإِنسَـٰنُ أَءِذَا مَا مِتُّ لَسَوْفَ أُخْرَجُ حَيًّا
وَيَقُولُ
और कहता है
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
أَءِذَا
What! When
مَا
क्या जब
مِتُّ
मर जाऊँगा मैं
لَسَوْفَ
अलबत्ता अनक़रीब
أُخْرَجُ
मैं निकाला जाऊँगा
حَيًّا
ज़िन्दा करके
और मनुष्य कहता है, "क्या जब मैं मर गया तो फिर जीवित करके निकाला जाऊँगा?"
तफ़्सीर:
मरने के बाद पुनर्जीवित करके उठाए जाने का इनकार करने वाला उपहास करते हुए कहता है : क्या जब मैं मर जाऊँगा, तो फिर से अपनी क़ब्र से जीवित करके निकाला जाऊँगा?! यह तो बड़ी दूर की बात है।
आयत 67
أَوَلَا يَذْكُرُ ٱلْإِنسَـٰنُ أَنَّا خَلَقْنَـٰهُ مِن قَبْلُ وَلَمْ يَكُ شَيْـًۭٔا
أَوَلَا
क्या भला नहीं
يَذْكُرُ
याद करता
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
أَنَّا
कि बेशक हम
خَلَقْنَـٰهُ
पैदा किया हमने उसे
مِن
before
قَبْلُ
इससे क़ब्ल
وَلَمْ
और ना
يَكُ
था वो
شَيْـًۭٔا
कोई चीज़
क्या मनुष्य याद नहीं करता कि हम उसे इससे पहले पैदा कर चुके है, जबकि वह कुछ भी न था?
तफ़्सीर:
क्या पुनः जीवित किए जाने का इनकार करने वाला यह व्यक्ति इस बात को याद नहीं करता कि हमने ही उसे इससे पहले पैदा किया, जबकि वह कुछ भी नहीं था?! यदि ऐसा करता, तो उसे पहली बार पैदा किए जाने से दूसरी बार पैदा किए जाने का प्रमाण मिल जाता। हालाँकि दूसरी बार पैदा करना कहीं अधिक आसान है।
आयत 68
فَوَرَبِّكَ لَنَحْشُرَنَّهُمْ وَٱلشَّيَـٰطِينَ ثُمَّ لَنُحْضِرَنَّهُمْ حَوْلَ جَهَنَّمَ جِثِيًّۭا
فَوَرَبِّكَ
पस क़सम है आपके रब की
لَنَحْشُرَنَّهُمْ
अलबत्ता हम ज़रूर जमा करेंगे उन्हें
وَٱلشَّيَـٰطِينَ
और शैतानों को
ثُمَّ
फिर
لَنُحْضِرَنَّهُمْ
अलबत्ता हम ज़रूर हाज़िर करेंगे उन्हें
حَوْلَ
इर्द-गिर्द
جَهَنَّمَ
जहन्नम के
جِثِيًّۭا
घुटनों के बल गिरे हुए
अतः तुम्हारे रब की क़सम! हम अवश्य उन्हें और शैतानों को भी इकट्ठा करेंगे। फिर हम उन्हें जहन्नम के चतुर्दिक इस दशा में ला उपस्थित करेंगे कि वे घुटनों के बल झुके होंगे
तफ़्सीर:
अतः (हे रसूल!) आपके पालनहार की क़सम! हम अवश्य ही उन्हें उनकी क़ब्रों से निकालकर ह़श्र के मैदान में एकत्र करेंगे तथा उनके साथ वे शैत़ान भी होंगे, जिन्होंने उनको गुमराह किया था। फिर हम उन्हें उनके घुटनों के बल अपमानजनक अवस्था में जहन्नम के दरवाज़ों पर ले जाएँगे।
आयत 69
ثُمَّ لَنَنزِعَنَّ مِن كُلِّ شِيعَةٍ أَيُّهُمْ أَشَدُّ عَلَى ٱلرَّحْمَـٰنِ عِتِيًّۭا
ثُمَّ
फिर
لَنَنزِعَنَّ
अलबत्ता हम ज़रूर खींच लेंगे
مِن
from
كُلِّ
every
شِيعَةٍ
हर गिरोह में से
أَيُّهُمْ
जो भी उनमें से
أَشَدُّ
ज़्यादा सख़्त था
عَلَى
against
ٱلرَّحْمَـٰنِ
रहमान के (मुक़ाबले) पर
عِتِيًّۭا
सरकशी में
फिर प्रत्येक गिरोह में से हम अवश्य ही उसे छाँटकर अलग करेंगे जो उनमें से रहमान (कृपाशील प्रभु) के मुक़ाबले में सबसे बढ़कर सरकश रहा होगा
तफ़्सीर:
फिर हम हर पथभ्रष्ट समुदाय में से उसके सबसे बड़े अवज्ञाकारी व्यक्ति अर्थात् उसके सरगने को बड़ी सख़्ती से अवश्य खींच निकालेंगे।
आयत 70
ثُمَّ لَنَحْنُ أَعْلَمُ بِٱلَّذِينَ هُمْ أَوْلَىٰ بِهَا صِلِيًّۭا
ثُمَّ
फिर
لَنَحْنُ
अलबत्ता हम
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानने वाले हैं
بِٱلَّذِينَ
उनको जो
هُمْ
वो
أَوْلَىٰ
ज़्यादा मुस्तहिक़ हैं
بِهَا
उसमें
صِلِيًّۭا
झोंके जाने के
फिर हम उन्हें भली-भाँति जानते है जो उसमें झोंके जाने के सर्वाधिक योग्य है
तफ़्सीर:
फिर हम उन लोगों को भली-भाँति जानते हैं, जो जहन्नम में प्रवेश करने तथा उसकी गर्मी और पीड़ा को झेलने के अधिक हक़दार हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जन्नत की नेमतों और कयामत के यकीन का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि आखिरत की नेमतों को याद रखने से दुनिया की मुश्किलें आसान लगने लगती हैं।
आयत 71
وَإِن مِّنكُمْ إِلَّا وَارِدُهَا ۚ كَانَ عَلَىٰ رَبِّكَ حَتْمًۭا مَّقْضِيًّۭا
وَإِن
और नहीं
مِّنكُمْ
तुम में से कोई
إِلَّا
मगर
وَارِدُهَا ۚ
वारिद होने वाला है उस पर
كَانَ
है
عَلَىٰ
upon
رَبِّكَ
आपके रब पर
حَتْمًۭا
हतमी/लाज़िम
مَّقْضِيًّۭا
तयशुदा फ़ैसला
तुममें से प्रत्येक को उसपर पहुँचना ही है। यह एक निश्चय पाई हुई बात है, जिसे पूरा करना तेरे रब के ज़िम्मे है।
तफ़्सीर:
और (ऐ लोगो!) तुममें से हर किसी को उस 'सिरात' (पुल) से गुज़रना है, जो जहन्नम के ऊपर बनाया जाएगा। इस पुल से गुज़रना अल्लाह का अटल निर्णय है। अतः उसके निर्णय को कोई टाल नहीं सकता।
आयत 72
ثُمَّ نُنَجِّى ٱلَّذِينَ ٱتَّقَوا۟ وَّنَذَرُ ٱلظَّـٰلِمِينَ فِيهَا جِثِيًّۭا
ثُمَّ
फिर
نُنَجِّى
हम निजात देंगे
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
ٱتَّقَوا۟
तक़वा किया
وَّنَذَرُ
और हम छोड़ देंगे
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़लिमों को
فِيهَا
उसमें
جِثِيًّۭا
घुटनों के बल गिरा हुआ
फिर हम डर रखनेवालों को बचा लेंगे और ज़ालिमों को उसमें घुटनों के बल छोड़ देंगे
तफ़्सीर:
फिर इस पुल से गुज़रने के बाद हम उन लोगों को बचा लेंगे, जो अपने पालनहार से डरते हुए उसके आदेशों का पालन करते तथा उसकी मना की हुई चीज़ों से बचते थे। और हम अत्याचारियों को उनके घुटनों के बल गिरा हुआ छोड़ देंगे, वे वहाँ से भाग नहीं सकते।
आयत 73
وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ ءَايَـٰتُنَا بَيِّنَـٰتٍۢ قَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لِلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَىُّ ٱلْفَرِيقَيْنِ خَيْرٌۭ مَّقَامًۭا وَأَحْسَنُ نَدِيًّۭا
وَإِذَا
और जब
تُتْلَىٰ
पढ़ी जाती हैं
عَلَيْهِمْ
उन पर
ءَايَـٰتُنَا
आयात हमारी
بَيِّنَـٰتٍۢ
वाज़ेह
قَالَ
कहते हैं
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لِلَّذِينَ
उनसे जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए
أَىُّ
कौन सा
ٱلْفَرِيقَيْنِ
दोनों फ़रीक़ों में से
خَيْرٌۭ
बेहतर है
مَّقَامًۭا
मक़ाम में
وَأَحْسَنُ
और ख़ूबतर
نَدِيًّۭا
मजलिस में
जब उन्हें हमारी खुली हुई आयतें सुनाई जाती है तो जिन लोगों ने कुफ़्र किया, वे ईमान लानेवालों से कहते हैं, "दोनों गिरोहों में स्थान की स्पष्ट से कौन उत्तम है और कौन मजलिस की दृष्टि से अधिक अच्छा है?"
तफ़्सीर:
तथा जब लोगों के समक्ष हमारे रसूल पर अवतरित स्पष्ट आयतें पढ़ी जाती हैं, तो काफिर लोग ईमान वालों से कहते हैं : हमारे दोनों गिरोहों में से कौन निवास और आवास में सबसे अच्छा है, तथा किसकी मजलिस व सभा अधिक भव्य है; हमारे गिरोह की अथवा तुम्हारे गिरोह कीॽ!
आयत 74
وَكَمْ أَهْلَكْنَا قَبْلَهُم مِّن قَرْنٍ هُمْ أَحْسَنُ أَثَـٰثًۭا وَرِءْيًۭا
وَكَمْ
और कितनी ही
أَهْلَكْنَا
हलाक कर दीं हमने
قَبْلَهُم
इनसे पहले
مِّن
of
قَرْنٍ
उम्मतें
هُمْ
वो
أَحْسَنُ
ज़्यादा अच्छे थे
أَثَـٰثًۭا
साज़ो सामान में
وَرِءْيًۭا
और नमूद व नुमाइश में
हालाँकि उनसे पहले हम कितनी ही नसलों को विनष्ट कर चुके है जो सामग्री और बाह्य भव्यता में इनसे कहीं अच्छी थीं!
तफ़्सीर:
अपनी भौतिक श्रेष्ठता पर गर्व करने वाले इन काफ़िरों से पहले हम बहुत-सी जातियों को विनष्ट कर चुके हैं, जो धन-संपत्ति में इनसे बेहतर और अच्छी वेशभूषा और शारीरिक सुंदरता के कारण इनसे अच्छे दिखते थे।
आयत 75
قُلْ مَن كَانَ فِى ٱلضَّلَـٰلَةِ فَلْيَمْدُدْ لَهُ ٱلرَّحْمَـٰنُ مَدًّا ۚ حَتَّىٰٓ إِذَا رَأَوْا۟ مَا يُوعَدُونَ إِمَّا ٱلْعَذَابَ وَإِمَّا ٱلسَّاعَةَ فَسَيَعْلَمُونَ مَنْ هُوَ شَرٌّۭ مَّكَانًۭا وَأَضْعَفُ جُندًۭا
قُلْ
कह दीजिए
مَن
जो कोई
كَانَ
है
فِى
in
ٱلضَّلَـٰلَةِ
गुमराही में
فَلْيَمْدُدْ
पस ज़रूर ढील देता है
لَهُ
उसे
ٱلرَّحْمَـٰنُ
रहमान
مَدًّا ۚ
ख़ूब ढील देना
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
رَأَوْا۟
वो देख लेंगे
مَا
जो
يُوعَدُونَ
वो वादा किए जाते हैं
إِمَّا
ख़्वाह
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब हो
وَإِمَّا
और ख़्वाह
ٱلسَّاعَةَ
क़यामत हो
فَسَيَعْلَمُونَ
तो अनक़रीब वो जान लेंगे
مَنْ
कौन है
هُوَ
वो (जो)
شَرٌّۭ
बेहतर है
مَّكَانًۭا
मक़ाम में
وَأَضْعَفُ
और कमज़ोर तर
جُندًۭا
लश्कर के ऐतबार से
कह दो, "जो गुमराही में पड़ा हुआ है उसके प्रति तो यही चाहिए कि रहमान उसकी रस्सी ख़ूब ढीली छोड़ दे, यहाँ तक कि जब ऐसे लोग उस चीज़ को देख लेंगे जिसका उनसे वादा किया जाता है - चाहे यातना हो या क़ियामत की घड़ी - तो वे उस समय जान लेंगे कि अपने स्थान की स्पष्ट से कौन निकृष्ट और जत्थे की दृष्टि से अधिक कमजोर है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दें : जो गुमराही में भटक रहा है, 'रहमान' उसे ढील देगा, ताकि वह गुमराही में और बढ़ जाए। यहाँ तक कि जब वे उस चीज़ को देख लेंगे जिसका उनसे वादा किया जाता है; इस दुनिया में जल्दी मिलने वाली या क़ियामत के दिन स्थगित कर दी गई यातना, तो उस समय उन्हें पता चल जाएगा कि कौन बुरे स्थान वाला और सबसे कम सहायक वाला है, यह उनका समूह है या मोमिनों का समूह?
आयत 76
وَيَزِيدُ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ٱهْتَدَوْا۟ هُدًۭى ۗ وَٱلْبَـٰقِيَـٰتُ ٱلصَّـٰلِحَـٰتُ خَيْرٌ عِندَ رَبِّكَ ثَوَابًۭا وَخَيْرٌۭ مَّرَدًّا
وَيَزِيدُ
और ज़्यादा करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
ٱهْتَدَوْا۟
हिदायत पाई
هُدًۭى ۗ
हिदायत में
وَٱلْبَـٰقِيَـٰتُ
और बाक़ी रहने वाली
ٱلصَّـٰلِحَـٰتُ
नेकियाँ
خَيْرٌ
बेहतर हैं
عِندَ
नज़दीक
رَبِّكَ
आपके रब के
ثَوَابًۭا
सवाब में
وَخَيْرٌۭ
और बेहतर हैं
مَّرَدًّا
अंजाम में
और जिन लोगों ने मार्ग पा लिया है, अल्लाह उनके मार्गदर्शन में अभिवृद्धि प्रदान करता है और शेष रहनेवाली नेकियाँ ही तुम्हारे रब के यहाँ बदले और अन्तिम परिणाम की स्पष्ट से उत्तम है
तफ़्सीर:
उन लोगों को गुमराही में और बढ़ने के लिए ढील देने के विपरीत, अल्लाह सीधी राह पर चलने वालों को ईमान और आज्ञाकारिता में और बढ़ा देता है। तथा शाश्वत सौभाग्य की ओर ले जाने वाले अच्छे कर्म (ऐ रसूल!) आपके पालनहार के निकट प्रतिफल की दृष्टि से अधिक लाभदायक और उत्तम परिणाम वाले हैं।
आयत 77
أَفَرَءَيْتَ ٱلَّذِى كَفَرَ بِـَٔايَـٰتِنَا وَقَالَ لَأُوتَيَنَّ مَالًۭا وَوَلَدًا
أَفَرَءَيْتَ
क्या फिर देखा आपने
ٱلَّذِى
उसे जिसने
كَفَرَ
कुफ़्र किया
بِـَٔايَـٰتِنَا
साथ हमारी आयात के
وَقَالَ
और कहा
لَأُوتَيَنَّ
अलबत्ता मैं ज़रूर दिया जाऊँगा
مَالًۭا
माल
وَوَلَدًا
और औलाद
फिर क्या तुमने उस व्यक्ति को देखा जिसने हमारी आयतों का इनकार किया और कहा, "मुझे तो अवश्य ही धन और सन्तान मिलने को है?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) क्या आपने उस व्यक्ति को देखा, जिसने हमारे प्रमाणों का इनकार किया और हमारी चेतावनी को नकार दिया तथा कहने लगा : यदि मैं मर गया और मुझे पुनः जीवित किया गया, तो मैं अवश्य ही बहुत सारा धन एवं संतान दिया जाऊँगा।
आयत 78
أَطَّلَعَ ٱلْغَيْبَ أَمِ ٱتَّخَذَ عِندَ ٱلرَّحْمَـٰنِ عَهْدًۭا
أَطَّلَعَ
क्या वो मुत्तला हो गया है
ٱلْغَيْبَ
ग़ैब पर
أَمِ
या
ٱتَّخَذَ
उसने ले रखा है
عِندَ
from
ٱلرَّحْمَـٰنِ
रहमान के यहाँ
عَهْدًۭا
कोई अहद
क्या उसने परोक्ष को झाँककर देख लिया है, या रहमान से कोई वचन ले रखा है?
तफ़्सीर:
क्या वह परोक्ष से अवगत हो गया है कि वह इस तरह की बात किसी प्रमाण के आधार पर कह रहा हैॽ! अथवा उसने अपने पालनहार से कोई वचन ले रखा है कि वह उसे जन्नत में अवश्य प्रवेश देगा और उसे अवश्य ही धन एवं संतान प्रदान करेगाॽ!
आयत 79
كَلَّا ۚ سَنَكْتُبُ مَا يَقُولُ وَنَمُدُّ لَهُۥ مِنَ ٱلْعَذَابِ مَدًّۭا
كَلَّا ۚ
हरगिज़ नहीं
سَنَكْتُبُ
अनक़रीब हम लिख लेंगे
مَا
जो
يَقُولُ
वो कहता है
وَنَمُدُّ
और हम बढ़ाते जाऐंगे
لَهُۥ
उसके लिए
مِنَ
from
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब में से
مَدًّۭا
बढ़ाना
कदापि नहीं, हम लिखेंगे जो कुछ वह कहता है और उसके लिए हम यातना को दीर्घ करते चले जाएँगे।
तफ़्सीर:
मामला ऐसा नहीं है जैसा कि उसने दावा किया है। जो कुछ वह कहता है और जो कुछ वह करता है, हम उसे लिख लेंगे और उसके झूठे दावे के कारण उसे यातना पर यातना देते जाएँगे।
आयत 80
وَنَرِثُهُۥ مَا يَقُولُ وَيَأْتِينَا فَرْدًۭا
وَنَرِثُهُۥ
और हम वारिस होंगे उसके
مَا
जो
يَقُولُ
वो कहता है
وَيَأْتِينَا
और वो आएगा हमारे पास
فَرْدًۭا
अकेला
औऱ जो कुछ वह बताता है उसके वारिस हम होंगे और वह अकेला ही हमारे पास आएगा
तफ़्सीर:
हम उसे विनाश करने के बाद उसके छोड़े हुए धन एवं संतान को ले लेंगे और वह क़ियामत के दिन हमारे पास अकेला ही आएगा तथा जिस धन एवं प्रतिष्ठा से वह लाभान्वित हो रहा था, वह उससे छिन चुका होगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दुनियावी माल पर घमंड करने वालों की मज़म्मत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि दुनियावी माल-ओ-औलाद की ज़्यादती को कामयाबी की निशानी समझना गलत है।
आयत 81
وَٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِ ٱللَّهِ ءَالِهَةًۭ لِّيَكُونُوا۟ لَهُمْ عِزًّۭا
وَٱتَّخَذُوا۟
और उन्होंने बना लिए
مِن
besides Allah
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
ءَالِهَةًۭ
कुछ इलाह
لِّيَكُونُوا۟
ताकि वो हों
لَهُمْ
उनके लिए
عِزًّۭا
इज़्ज़त का सबब
और उन्होंने अल्लाह से इतर अपने कुछ पूज्य-प्रभु बना लिए है, ताकि वे उनके लिए शक्ति का कारण बनें।
तफ़्सीर:
तथा बहुदेववादियों ने अपने लिए अल्लाह के सिवा अन्य पूज्य बना लिए हैं, ताकि वे उनके लिए समर्थक और सहायक बन जाएँ, जिनकी वे सहायता ले सकें।
आयत 82
كَلَّا ۚ سَيَكْفُرُونَ بِعِبَادَتِهِمْ وَيَكُونُونَ عَلَيْهِمْ ضِدًّا
كَلَّا ۚ
हरगिज़ नहीं
سَيَكْفُرُونَ
अनक़रीब वो इन्कार करेंगे
بِعِبَادَتِهِمْ
उनकी इबादत का
وَيَكُونُونَ
और वो हो जाऐंगे
عَلَيْهِمْ
उनके
ضِدًّا
मुख़ालिफ़
कुछ नहीं, ये उनकी बन्दगी का इनकार करेंगे और उनके विरोधी बन जाएँगे। -
तफ़्सीर:
मामला ऐसा नहीं है जैसा कि उन्होंने दावा किया है। क्योंकि ये पूज्य जिन्हें वे अल्लाह को छोड़कर पूजते हैं, क़ियामत के दिन इस बात से इनकार कर देंगे कि बहुदेववादियों ने उनकी पूजा की थी। यही नहीं, बल्कि उनसे किनारा कर लेंगे और उनके दुश्मन हो जाएँगे।
आयत 83
أَلَمْ تَرَ أَنَّآ أَرْسَلْنَا ٱلشَّيَـٰطِينَ عَلَى ٱلْكَـٰفِرِينَ تَؤُزُّهُمْ أَزًّۭا
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
أَنَّآ
बेशक हम
أَرْسَلْنَا
छोड़ रखा है हमने
ٱلشَّيَـٰطِينَ
शैतानों को
عَلَى
upon
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों पर
تَؤُزُّهُمْ
वो उकसाते हैं उन्हें
أَزًّۭا
ख़ूब उकसाना
क्या तुमने देखा नहीं कि हमने शैतानों को छोड़ रखा है, जो इनकार करनेवालों पर नियुक्त है?
तफ़्सीर:
क्या (ऐ रसूल!) आपने देखा नहीं कि हमने शैतानों को भेजा है और उन्हें काफ़िरों पर नियुक्त कर दिया है, जो उन्हें पाप करने और अल्लाह के धर्म से रोकने पर उत्तेजित करते रहते हैं।
आयत 84
فَلَا تَعْجَلْ عَلَيْهِمْ ۖ إِنَّمَا نَعُدُّ لَهُمْ عَدًّۭا
فَلَا
तो ना
تَعْجَلْ
आप जल्दी कीजिए
عَلَيْهِمْ ۖ
उन पर
إِنَّمَا
बेशक
نَعُدُّ
हम गिन रहे हैं
لَهُمْ
उनके लिए
عَدًّۭا
ख़ूब गिनना
अतः तुम उनके लिए जल्दी न करो। हम तो बस उनके लिए (उनकी बातें) गिन रहे है
तफ़्सीर:
अतः (ऐ रसूल!) आप अल्लाह से उन्हें जल्द विनाश करने का अनुरोध करने में जल्दी न करें। हम उनके जीवन के एक-एक दिन को गिन रहे हैं। यहाँ तक कि जब उन्हें ढील देने का समय समाप्त हो जाएगा, तो हम उन्हें वह सज़ा देंगे जिसके वे हक़दार हैं।
आयत 85
يَوْمَ نَحْشُرُ ٱلْمُتَّقِينَ إِلَى ٱلرَّحْمَـٰنِ وَفْدًۭا
يَوْمَ
जिस दिन
نَحْشُرُ
हम इकट्ठा करेंगे
ٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों को
إِلَى
to
ٱلرَّحْمَـٰنِ
तरफ़ रहमान के
وَفْدًۭا
मेहमान बनाकर
याद करो जिस दिन हम डर रखनेवालों के सम्मानित गिरोह के रूप में रहमान के पास इकट्ठा करेंगे।
तफ़्सीर:
तथा (ऐ रसूल!) आप क़ियामत के दिन को याद करें, जिस दिन हम उन लोगों को, जो अपने पालनहार से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, डरने वाले हैं, एक सम्मानित और प्रतिष्ठित प्रतिनिधिमंडल के रूप में इकट्ठा करेंगे।
आयत 86
وَنَسُوقُ ٱلْمُجْرِمِينَ إِلَىٰ جَهَنَّمَ وِرْدًۭا
وَنَسُوقُ
और हम हाँक ले जाऐंगे
ٱلْمُجْرِمِينَ
मुजरिमों को
إِلَىٰ
to
جَهَنَّمَ
तरफ़ जहन्नम के
وِرْدًۭا
सख़्त प्यासे
और अपराधियों को जहन्नम के घाट की ओर प्यासा हाँक ले जाएँगे।
तफ़्सीर:
तथा हम काफ़िरों को जहन्नम की ओर प्यासे हाँककर ले जाएँगे।
आयत 87
لَّا يَمْلِكُونَ ٱلشَّفَـٰعَةَ إِلَّا مَنِ ٱتَّخَذَ عِندَ ٱلرَّحْمَـٰنِ عَهْدًۭا
لَّا
Not
يَمْلِكُونَ
ना वो मालिक होंगे
ٱلشَّفَـٰعَةَ
शफ़ाअत के
إِلَّا
मगर
مَنِ
जिसने
ٱتَّخَذَ
ले लिया
عِندَ
from
ٱلرَّحْمَـٰنِ
रहमान से
عَهْدًۭا
कोई अहद
उन्हें सिफ़ारिश का अधिकार प्राप्त न होगा। सिवाय उसके, जिसने रहमान के यहाँ से अनुमोदन प्राप्त कर लिया हो
तफ़्सीर:
इन काफ़िरों को एक-दूसरे के लिए सिफारिश करने का अधिकार प्राप्त न होगा। सिवाय उसके, जिसने दुनिया में अल्लाह से उसपर और उसके रसूलों पर ईमान लाकर वचन ले लिया हो।
आयत 88
وَقَالُوا۟ ٱتَّخَذَ ٱلرَّحْمَـٰنُ وَلَدًۭا
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
ٱتَّخَذَ
बना ली है
ٱلرَّحْمَـٰنُ
रहमान ने
وَلَدًۭا
कोई औलाद
वे कहते है, "रहमान ने किसी को अपना बेटा बनाया है।"
तफ़्सीर:
तथा यहूदियों, ईसाइयों और कुछ बहुदेववादियों ने कहा : रहमान (अत्यंत दयावान् अल्लाह) ने अपना पुत्र बना रखा है।
आयत 89
لَّقَدْ جِئْتُمْ شَيْـًٔا إِدًّۭا
لَّقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
جِئْتُمْ
लाए हो तुम
شَيْـًٔا
एक चीज़
إِدًّۭا
बहुत भारी
अत्यन्त भारी बात है, जो तुम घड़ लाए हो!
तफ़्सीर:
निश्चय (ऐ ऐसी बात कहने वाले लोगो!) तुमने बहुत भारी बात कही है।
आयत 90
تَكَادُ ٱلسَّمَـٰوَٰتُ يَتَفَطَّرْنَ مِنْهُ وَتَنشَقُّ ٱلْأَرْضُ وَتَخِرُّ ٱلْجِبَالُ هَدًّا
تَكَادُ
क़रीब है
ٱلسَّمَـٰوَٰتُ
आसमान
يَتَفَطَّرْنَ
कि वो फट पड़ें
مِنْهُ
उससे
وَتَنشَقُّ
और शक़ हो जाए
ٱلْأَرْضُ
ज़मीन
وَتَخِرُّ
और गिर पड़ें
ٱلْجِبَالُ
पहाड़
هَدًّا
रेज़ा-रेज़ा होकर
निकट है कि आकाश इससे फट पड़े और धरती टुकड़े-टुकड़े हो जाए और पहाड़ धमाके के साथ गिर पड़े,
तफ़्सीर:
निकट है कि इस घृणित बात के कारण आकाश टूट पड़ें, धरती फट जाए और पहाड़ ध्वस्त होकर गिर जाएँ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
गैर-अल्लाह की इबादत की मज़म्मत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि तौहीद ही वह बुनियाद है जिस पर पूरी कायनात का निज़ाम कायम है।
आयत 91
أَن دَعَوْا۟ لِلرَّحْمَـٰنِ وَلَدًۭا
أَن
कि
دَعَوْا۟
उन्होंने दावा किया
لِلرَّحْمَـٰنِ
रहमान के लिए
وَلَدًۭا
औलाद का
इस बात पर कि उन्होंने रहमान के लिए बेटा होने का दावा किया!
तफ़्सीर:
यह सब इस कारण है कि उन्होंने रहमान (परम दयालु अल्लाह) के लिए संतान होने का दावा किया है। अल्लाह इस बात से बहुत ऊँचा है।
आयत 92
وَمَا يَنۢبَغِى لِلرَّحْمَـٰنِ أَن يَتَّخِذَ وَلَدًا
وَمَا
और नहीं
يَنۢبَغِى
लायक़
لِلرَّحْمَـٰنِ
रहमान के
أَن
कि
يَتَّخِذَ
वो बना ले
وَلَدًا
औलाद
जबकि रहमान की प्रतिष्ठा के प्रतिकूल है कि वह किसी को अपना बेटा बनाए
तफ़्सीर:
हालाँकि रहमान (परम दयालु अल्लाह) के योग्य नहीं है कि वह कोई संतान बनाए, क्योंकि वह इससे बहुत पवित्र है।
आयत 93
إِن كُلُّ مَن فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ إِلَّآ ءَاتِى ٱلرَّحْمَـٰنِ عَبْدًۭا
إِن
Not
كُلُّ
नहीं है कोई भी
مَن
जो
فِى
(are) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन में है
إِلَّآ
मगर
ءَاتِى
आने वाला है
ٱلرَّحْمَـٰنِ
रहमान के (पास)
عَبْدًۭا
बन्दा बनकर
आकाशों और धरती में जो कोई भी है एक बन्दें के रूप में रहमान के पास आनेवाला है
तफ़्सीर:
आकाशों और धरती में रहने वाले फ़रिश्तों, मनुष्यों एवं जिन्नों में से हर कोई क़ियामत के दिन अपने पालनहार के पास विनम्रता से आएगा।
आयत 94
لَّقَدْ أَحْصَىٰهُمْ وَعَدَّهُمْ عَدًّۭا
لَّقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
أَحْصَىٰهُمْ
उसने घेर रखा है उन्हें
وَعَدَّهُمْ
और गिन रखा है उन्हें
عَدًّۭا
गिनना
उसने उनका आकलन कर रखा है और उन्हें अच्छी तरह गिन रखा है
तफ़्सीर:
निश्चय अल्लाह ने उन्हें ज्ञान के साथ घेर रखा है और अच्छी तरह से उनकी गणना कर रखी है। अतः उनकी कोई चीज़ उससे छिपी नहीं है।
आयत 95
وَكُلُّهُمْ ءَاتِيهِ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ فَرْدًا
وَكُلُّهُمْ
हर एक उनमें से
ءَاتِيهِ
आने वाला है उसके पास
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
فَرْدًا
अकेला
और उनमें से प्रत्येक क़ियामत के दिन उस अकेले (रहमान) के सामने उपस्थित होगा
तफ़्सीर:
उनमें से प्रत्येक व्यक्ति क़ियामत के दिन बिना किसी सहायक या धन के उसके पास अकेले आएगा।
आयत 96
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ سَيَجْعَلُ لَهُمُ ٱلرَّحْمَـٰنُ وُدًّۭا
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
سَيَجْعَلُ
अनक़रीब पैदा कर देगा
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلرَّحْمَـٰنُ
रहमान
وُدًّۭا
मोहब्बत
निस्संदेह जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए शीघ्र ही रहमान उनके लिए प्रेम उत्पन्न कर देगा
तफ़्सीर:
निःसंदेह जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए और अल्लाह के निकट पसंदीदा नेक कार्य किए, अल्लाह उनसे अपने प्रेम के द्वारा और उन्हें अपने बंदों के निकट प्रिय बनाकर, उनके लिए प्रेम उत्पन्न कर देगा।
आयत 97
فَإِنَّمَا يَسَّرْنَـٰهُ بِلِسَانِكَ لِتُبَشِّرَ بِهِ ٱلْمُتَّقِينَ وَتُنذِرَ بِهِۦ قَوْمًۭا لُّدًّۭا
فَإِنَّمَا
पस बेशक
يَسَّرْنَـٰهُ
आसान कर दिया हमने उसे
بِلِسَانِكَ
आपकी ज़बान में
لِتُبَشِّرَ
ताकि आप ख़ुशख़बरी दें
بِهِ
साथ उसके
ٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों को
وَتُنذِرَ
और आप डराऐं
بِهِۦ
साथ उसके
قَوْمًۭا
ऐसी क़ौम को
لُّدًّۭا
जो झगड़ालू है
अतः हमने इस वाणी को तुम्हारी भाषा में इसी लिए सहज एवं उपयुक्त बनाया है, ताकि तुम इसके द्वारा डर रखनेवालों को शुभ सूचना दो और उन झगड़ालू लोगों को इसके द्वारा डराओ
तफ़्सीर:
हमने इस क़ुरआन को (ऐ रसूल!) आपकी भाषा में अवतरित कर सरल बना दिया है, ताकि इसके द्वारा आप अल्लाह का भय रखने वालों को शुभ सूचना दें, जो मेरे आदेशों का पालन करते हैं और मेरे मना किए हुए कामों से बचते हैं, तथा इसके द्वारा आप उन लोगों को डराएँ, जो बहुत झगड़ालू और सत्य को स्वीकार करने में अहंकार से काम लेने वाले हैं।
आयत 98
وَكَمْ أَهْلَكْنَا قَبْلَهُم مِّن قَرْنٍ هَلْ تُحِسُّ مِنْهُم مِّنْ أَحَدٍ أَوْ تَسْمَعُ لَهُمْ رِكْزًۢا
وَكَمْ
और कितनी ही
أَهْلَكْنَا
हलाक कर दीं हमने
قَبْلَهُم
इनसे पहले
مِّن
of
قَرْنٍ
उम्मतें/बस्तियाँ
هَلْ
क्या
تُحِسُّ
आप महसूस करते हैं
مِنْهُم
उनमें से
مِّنْ
any
أَحَدٍ
किसी एक को भी
أَوْ
या
تَسْمَعُ
आप सुनते हैं
لَهُمْ
उनकी
رِكْزًۢا
कोई आहट/भनक
उनसे पहले कितनी ही नसलों को हम विनष्ट कर चुके है। क्या उनमें किसी की आहट तुम पाते हो या उनकी कोई भनक सुनते हो?
तफ़्सीर:
आपकी जाति के लोगों से पहले हम बहुत-से समुदायों को विनष्ट कर चुके हैं। तो क्या आप आज उन समुदायों में से किसी एक को महसूस करते हैं?! और क्या आप उनकी कोई भनक सुनते हैं?! अतः जो उनके साथ हुआ, वह दूसरों के साथ (भी) हो सकता है। बस अल्लाह की अनुमति की देर है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
रहमान की नेक बंदों से मोहब्बत के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि जो लोग नेक अमल करते हैं, अल्लाह उनके लिए दिलों में मोहब्बत पैदा कर देता है, यह उसकी खास नेमत है।
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