नाम का मतलब
अल-बक़रह का अर्थ है 'गाय' - इस नाम की वजह सूरह में बनी इस्राईल और गाय की घटना का ज़िक्र है जिसमें अल्लाह ने उन्हें एक गाय ज़बह करने का हुक्म दिया था
पृष्ठभूमि
यह सूरह पैग़ंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की मक्का से मदीना हिजरत के बाद अवतरित हुई और क़ुरआन की सबसे लंबी सूरह है। इसमें मुसलमानों, यहूदियों और मुनाफ़िक़ों को संबोधित किया गया है क्योंकि मदीने में इन तीनों समुदायों का सामना पैग़ंबर को करना पड़ा। इस सूरह में इस्लामी शरीयत के कई बुनियादी अहकाम जैसे नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हज, निकाह-तलाक़ और लेन-देन के नियम बताए गए हैं। इसमें पिछली उम्मतों, ख़ासकर बनी इस्राईल के इतिहास से सबक़ भी दिया गया है।
फ़ज़ीलत / सार
इस सूरह को क़ुरआन की सबसे महत्वपूर्ण सूरहों में गिना जाता है और इसमें आयतुल कुर्सी जैसी अत्यंत फ़ज़ीलत वाली आयत शामिल है। कहा जाता है कि जो घर में यह सूरह पढ़ी जाए वहाँ शैतान का असर कम होता है। इस सूरह में ईमान, इबादत और सामाजिक जीवन के व्यापक सिद्धांत दिए गए हैं जो मुसलमानों के लिए मार्गदर्शक हैं।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ الٓمٓ
الٓمٓ
अलिफ़ लाम मीम
अलीफ़॰ लाम॰ मीम॰
तफ़्सीर:
{अलिफ़, लाम, मीम} ये उन अक्षरों में से हैं, जिनसे कुछ सूरतों (सूरत का बहुवचन) का आरंभ किया गया है। यह अरबी भाषा की वर्णमाला है जिसका अपने आप में कोई अर्थ नहीं है यदि वे इस तरह (अलिफ, बा, ता) अलग-अलग आएँ। लेकिन इनकी एक हिकमत और मतलब है; क्योंकि क़ुरआन में कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसकी कोई ह़िकमत न हो। इनकी सबसे महत्वपूर्ण हिक़मतों में से एक : क़ुरआन के द्वारा चुनौती की ओर संकेत है, जो उन्हीं अक्षरों से बना है, जिन्हें वे जानते और बोलते हैं; यही कारण है कि अक्सर इन अक्षरों के बाद क़ुरआन पाक का उल्लेख होता है, जैसा कि इस सूरत में है।
आयत 2
ذَٰلِكَ ٱلْكِتَـٰبُ لَا رَيْبَ ۛ فِيهِ ۛ هُدًۭى لِّلْمُتَّقِينَ
ذَٰلِكَ
ये
ٱلْكِتَـٰبُ
किताब
لَا
नहीं
رَيْبَ ۛ
कोई शक
فِيهِ ۛ
इस में
هُدًۭى
हिदायत है
لِّلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के लिए
वह किताब यही हैं, जिसमें कोई सन्देह नहीं, मार्गदर्शन हैं डर रखनेवालों के लिए,
तफ़्सीर:
इस महान क़ुरआन में कोई संदेह नहीं। न इसके अल्लाह की ओर से उतरने के संदर्भ में, और न ही इसके शब्द और अर्थ के संदर्भ में। चुनाँचे यह क़ुरआन अल्लाह की वाणी है, जो परहेज़गारों का अल्लाह तक पहुँचाने वाले रास्ते का मार्गदर्शन करता है।
आयत 3
ٱلَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِٱلْغَيْبِ وَيُقِيمُونَ ٱلصَّلَوٰةَ وَمِمَّا رَزَقْنَـٰهُمْ يُنفِقُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जो
يُؤْمِنُونَ
ईमान लाते हैं
بِٱلْغَيْبِ
ग़ैब पर
وَيُقِيمُونَ
और वो क़ायम करते हैं
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَمِمَّا
और उससे जो
رَزَقْنَـٰهُمْ
रिज़्क़ दिया हमने उन्हें
يُنفِقُونَ
वो ख़र्च करते हैं
जो अनदेखे ईमान लाते हैं, नमाज़ क़ायम करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें दिया हैं उसमें से कुछ खर्च करते हैं;
तफ़्सीर:
जो लोग ग़ैब (परोक्ष, अनदेखी) पर ईमान लाते हैं। ग़ैब से अभिप्राय हर वह चीज़ है, जिसका बोध ज्ञानेंद्रियों द्वारा नहीं होता है और वह हमसे ओझल है, जिसके बारे में अल्लाह ने या उसके रसूल ने सूचना दी है, जैसे कि आख़िरत का दिन। तथा वही लोग नमाज़ की स्थापना करते हैं इस प्रकार कि अल्लाह द्वारा निर्धारित की गई शर्तों, अर्कान, वाजिबात और सुन्नतों के अनुसार उसकी अदायगी करते हैं। तथा वही लोग हैं, जो उसमें से खर्च करते हैं जो अल्लाह ने उन्हें प्रदान किया है, अर्थात् अल्लाह के सवाब की आशा में, अनिवार्य दान जैसे कि ज़कात अथवा ग़ैर-वाजिब जैसे कि स्वैच्छिक दान देते हैं। तथा वही हैं जो उस वह़्य पर जो अल्लाह ने - ऐ नबी! - आपपर उतारी है तथा आपसे पूर्व अन्य सभी नबियों पर उतारी है, बिना भेदभाव के ईमान लाते हैं। तथा वही लोग आख़िरत तथा उसके पुण्य एवं दंड पर दृढ़ विश्वास रखते हैं।
आयत 4
وَٱلَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيْكَ وَمَآ أُنزِلَ مِن قَبْلِكَ وَبِٱلْـَٔاخِرَةِ هُمْ يُوقِنُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
يُؤْمِنُونَ
ईमान लाते हैं
بِمَآ
उस पर जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
وَمَآ
और जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
مِن
from
قَبْلِكَ
आपसे पहले
وَبِٱلْـَٔاخِرَةِ
और आख़िरत पर
هُمْ
वो
يُوقِنُونَ
वो यक़ीन रखते हैं
और जो उस पर ईमान लाते हैं जो तुम पर उतरा और जो तुमसे पहले अवतरित हुआ हैं और आख़िरत पर वही लोग विश्वास रखते हैं;
तफ़्सीर:
जो लोग ग़ैब (परोक्ष, अनदेखी) पर ईमान लाते हैं। ग़ैब से अभिप्राय हर वह चीज़ है, जिसका बोध ज्ञानेंद्रियों द्वारा नहीं होता है और वह हमसे ओझल है, जिसके बारे में अल्लाह ने या उसके रसूल ने सूचना दी है, जैसे कि आख़िरत का दिन। तथा वही लोग नमाज़ की स्थापना करते हैं इस प्रकार कि अल्लाह द्वारा निर्धारित की गई शर्तों, अर्कान, वाजिबात और सुन्नतों के अनुसार उसकी अदायगी करते हैं। तथा वही लोग हैं, जो उसमें से खर्च करते हैं जो अल्लाह ने उन्हें प्रदान किया है, अर्थात् अल्लाह के सवाब की आशा में, अनिवार्य दान जैसे कि ज़कात अथवा ग़ैर-वाजिब जैसे कि स्वैच्छिक दान देते हैं। तथा वही हैं जो उस वह़्य पर जो अल्लाह ने - ऐ नबी! - आपपर उतारी है तथा आपसे पूर्व अन्य सभी नबियों पर उतारी है, बिना भेदभाव के ईमान लाते हैं। तथा वही लोग आख़िरत तथा उसके पुण्य एवं दंड पर दृढ़ विश्वास रखते हैं।
आयत 5
أُو۟لَـٰٓئِكَ عَلَىٰ هُدًۭى مِّن رَّبِّهِمْ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
عَلَىٰ
(are) on
هُدًۭى
हिदायत पर
مِّن
from
رَّبِّهِمْ ۖ
अपने रब की तरफ़ से
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْمُفْلِحُونَ
जो फ़लाह पाने वाले हैं
वही लोग हैं जो अपने रब के सीधे मार्ग पर हैं और वही सफलता प्राप्त करनेवाले हैं
तफ़्सीर:
इन विशेषताओं से परिपूर्ण लोग ही हिदायत के पथ पर चलने वाले हैं तथा यही लोग दुनिया एवं आख़िरत में, जिसकी वे आशा करते हैं उसे प्राप्त करके और जिस चीज़ से वे डरते हैं उससे मुक्ति पाकर, कामयाब हैं।
आयत 6
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ سَوَآءٌ عَلَيْهِمْ ءَأَنذَرْتَهُمْ أَمْ لَمْ تُنذِرْهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
سَوَآءٌ
यकसाँ/बराबर है
عَلَيْهِمْ
उन पर
ءَأَنذَرْتَهُمْ
ख़्वाह डराऐं आप उन्हें
أَمْ
या
لَمْ
ना
تُنذِرْهُمْ
आप डराऐं उन्हें
لَا
not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाऐंगे
जिन लोगों ने कुफ़्र (इनकार) किया उनके लिए बराबर हैं, चाहे तुमने उन्हें सचेत किया हो या सचेत न किया हो, वे ईमान नहीं लाएँगे
तफ़्सीर:
जिन लोगों पर ईमान न लाने की अल्लाह की बात सिद्ध हो चुकी है, वे अपनी पथभ्रष्टता और हठ पर क़ायम रहने वाले हैं। इसलिए आपका उन्हें डराना और न डराना बराबर है।
आयत 7
خَتَمَ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ وَعَلَىٰ سَمْعِهِمْ ۖ وَعَلَىٰٓ أَبْصَـٰرِهِمْ غِشَـٰوَةٌۭ ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌۭ
خَتَمَ
मोहर लगा दी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَىٰ
ऊपर
قُلُوبِهِمْ
उनके दिलों के
وَعَلَىٰ
और ऊपर
سَمْعِهِمْ ۖ
उनके कानों के
وَعَلَىٰٓ
और ऊपर
أَبْصَـٰرِهِمْ
उनकी आँखों के
غِشَـٰوَةٌۭ ۖ
पर्दा है
وَلَهُمْ
और उनके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
عَظِيمٌۭ
बहुत बड़ा
अल्लाह ने उनके दिलों पर और कानों पर मुहर लगा दी है और उनकी आँखों पर परदा पड़ा है, और उनके लिए बड़ी यातना है
तफ़्सीर:
क्योंकि अल्लाह ने उनके दिलों पर मुहर लगा दी है और उनमें मौजूद कुफ़्र सहित उन्हें बंद कर दिया है। तथा उनके कानों पर मुहर लगा दी है, अतः वे सत्य को उसे स्वीकारने और उसका अनुसरण करने की नीयत से नहीं सुनते हैं। तथा उनकी आँखों पर पर्दा डाल दिया है, अतः वे सत्य के स्पष्ट होने के बावजूद उसे नहीं देखते हैं, और उनके लिए आख़िरत में बहुत बड़ी यातना है।
आयत 8
وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَقُولُ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَبِٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ وَمَا هُم بِمُؤْمِنِينَ
وَمِنَ
And of
ٱلنَّاسِ
और बाज़ लोग हैं
مَن
जो
يَقُولُ
कहते हैं
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَبِٱلْيَوْمِ
and in the Day
ٱلْـَٔاخِرِ
और आख़िरी दिन पर
وَمَا
और नहीं
هُم
वो
بِمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
कुछ लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि हम अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखते हैं, हालाँकि वे ईमान नहीं रखते
तफ़्सीर:
लोगों का एक समूह ऐसा है, जो यह दावा करता है कि वे ईमान वाले हैं। वे अपनी जान और अपने माल के डर से केवल अपनी ज़बान से ऐसा कहते हैं। जबकि अंदर से वे काफ़िर हैं।
आयत 9
يُخَـٰدِعُونَ ٱللَّهَ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَمَا يَخْدَعُونَ إِلَّآ أَنفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ
يُخَـٰدِعُونَ
वो धोखा देते हैं
ٱللَّهَ
अल्लाह को
وَٱلَّذِينَ
और उनको जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَمَا
और नहीं
يَخْدَعُونَ
वो धोखा देते
إِلَّآ
मगर
أَنفُسَهُمْ
अपने नफ़्सों को
وَمَا
और नहीं
يَشْعُرُونَ
वो शऊर रखते
वे अल्लाह और ईमानवालों के साथ धोखेबाज़ी कर रहे हैं, हालाँकि धोखा वे स्वयं अपने-आपको ही दे रहे हैं, परन्तु वे इसको महसूस नहीं करते
तफ़्सीर:
वे अपनी अज्ञानतावश यह समझते हैं कि वे ईमान का प्रदर्शन करके और कुफ़्र को छिपाकर अल्लाह और मोमिनों को धोखा दे रहे हैं। लेकिन उन्हें इसका एहसास नहीं है; क्योंकि अल्लाह रहस्य और छिपी बातों को जानता है और उसने ईमान वालों को उनकी विशेषताओं और स्थितियों के बारे में सूचित कर दिया है।
आयत 10
فِى قُلُوبِهِم مَّرَضٌۭ فَزَادَهُمُ ٱللَّهُ مَرَضًۭا ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۢ بِمَا كَانُوا۟ يَكْذِبُونَ
فِى
In
قُلُوبِهِم
उनके दिलों में
مَّرَضٌۭ
मर्ज़ है
فَزَادَهُمُ
तो ज़्यादा कर दिया उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مَرَضًۭا ۖ
मर्ज़ में
وَلَهُمْ
और उनके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
أَلِيمٌۢ
अलमनाक/दर्दनाक
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَكْذِبُونَ
वो झूठ बोलते
उनके दिलों में रोग था तो अल्लाह ने उनके रोग को और बढ़ा दिया और उनके लिए झूठ बोलते रहने के कारण उनके लिए एक दुखद यातना है
तफ़्सीर:
कारण यह है कि उनके दिलों में संदेह है। इसलिए अल्लाह ने उनके संदेह में संदेह को और बढ़ा दिया; क्योंकि बदला कार्य ही के समान दिया जाता है। तथा उनके लिए जहन्नम के सबसे निचले गढ़े में दर्दनाक यातना है। इसलिए कि उन्होंने अल्लाह पर और लोगों पर झूठ कहा और मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लाए हुए धर्म को झुठलाया।
आयत 11
وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ لَا تُفْسِدُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ قَالُوٓا۟ إِنَّمَا نَحْنُ مُصْلِحُونَ
وَإِذَا
और जब
قِيلَ
कहा जाता है
لَهُمْ
उन्हें
لَا
(Do) not
تُفْسِدُوا۟
ना तुम फ़साद करो
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
قَالُوٓا۟
वो कहते हैं
إِنَّمَا
बेशक
نَحْنُ
हम तो
مُصْلِحُونَ
इस्लाह करने वाले हैं
और जब उनसे कहा जाता है कि "ज़मीन में बिगाड़ पैदा न करो", तो कहते हैं, "हम तो केवल सुधारक है।""
तफ़्सीर:
जब उन्हें कुफ़्र, पापों और अन्य चीजों के द्वारा धरती पर उपद्रव करने से मना किया जाता है, तो वे इनकार करते हैं और दावा करते हैं कि वे तो सदाचार और सुधार वाले हैं।
आयत 12
أَلَآ إِنَّهُمْ هُمُ ٱلْمُفْسِدُونَ وَلَـٰكِن لَّا يَشْعُرُونَ
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّهُمْ
बेशक वो
هُمُ
वो ही
ٱلْمُفْسِدُونَ
फ़साद करने वाले हैं
وَلَـٰكِن
और लेकिन
لَّا
not
يَشْعُرُونَ
नहीं वो शऊर रखते
जान लो! वही हैं जो बिगाड़ पैदा करते हैं, परन्तु उन्हें एहसास नहीं होता
तफ़्सीर:
जबकि वास्तविकता यह है कि वही उपद्रव करने वाले और उत्पात मचाने वाले हैं, लेकिन उन्हें इसका एहसास नहीं है, और न ही वे यह समझते हैं कि उनका यह कृत्य ही असल उपद्रव है।
आयत 13
وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ ءَامِنُوا۟ كَمَآ ءَامَنَ ٱلنَّاسُ قَالُوٓا۟ أَنُؤْمِنُ كَمَآ ءَامَنَ ٱلسُّفَهَآءُ ۗ أَلَآ إِنَّهُمْ هُمُ ٱلسُّفَهَآءُ وَلَـٰكِن لَّا يَعْلَمُونَ
وَإِذَا
और जब
قِيلَ
कहा जाता है
لَهُمْ
उन्हें
ءَامِنُوا۟
ईमान ले आओ
كَمَآ
जैसा कि
ءَامَنَ
ईमान लाए
ٱلنَّاسُ
लोग
قَالُوٓا۟
वो कहते हैं
أَنُؤْمِنُ
क्या हम ईमान लाऐं
كَمَآ
जैसा कि
ءَامَنَ
ईमान लाए
ٱلسُّفَهَآءُ ۗ
बेवक़ूफ़
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّهُمْ
बेशक वो
هُمُ
वो ही
ٱلسُّفَهَآءُ
बेवक़ूफ़ हैं
وَلَـٰكِن
और लेकिन
لَّا
not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
और जब उनसे कहा जाता है, "ईमान लाओ जैसे लोग ईमान लाए हैं", कहते हैं, "क्या हम ईमान लाए जैसे कम समझ लोग ईमान लाए हैं?" जान लो, वही कम समझ हैं परन्तु जानते नहीं
तफ़्सीर:
जब उन्हें मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथियों के ईमान लाने की तरह ईमान लाने का आदेश दिया जाता है, तो वे अस्वीकृति और उपहास के रूप में उसका उत्तर देते हुए कहते हैं : क्या हम अल्पबुद्धि वालों के ईमान लाने की तरह ईमान ले आएँ?! सच तो यह है कि वे स्वयं मूर्ख हैं, लेकिन वे इससे अनजान हैं।
आयत 14
وَإِذَا لَقُوا۟ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا وَإِذَا خَلَوْا۟ إِلَىٰ شَيَـٰطِينِهِمْ قَالُوٓا۟ إِنَّا مَعَكُمْ إِنَّمَا نَحْنُ مُسْتَهْزِءُونَ
وَإِذَا
और जब
لَقُوا۟
वो मुलाक़ात करते हैं
ٱلَّذِينَ
उनसे जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
قَالُوٓا۟
वो कहते हैं
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
وَإِذَا
और जब
خَلَوْا۟
वो अकेले होते हैं
إِلَىٰ
तरफ़
شَيَـٰطِينِهِمْ
अपने शैतानों के
قَالُوٓا۟
वो कहते हैं
إِنَّا
बेशक हम
مَعَكُمْ
तुम्हारे साथ हैं
إِنَّمَا
बेशक
نَحْنُ
हम तो
مُسْتَهْزِءُونَ
मज़ाक़ उड़ाने वाले हैं
और जब ईमान लानेवालों से मिलते हैं तो कहते, "हम भी ईमान लाए हैं," और जब एकान्त में अपने शैतानों के पास पहुँचते हैं, तो कहते हैं, "हम तो तुम्हारे साथ हैं और यह तो हम केवल परिहास कर रहे हैं।"
तफ़्सीर:
जब वे मोमिनों से मिलते हैं, तो उनके डर से कहते हैं : हम उसपर ईमान लाते हैं जिसपर तुम ईमान लाते हो। और जब वे ईमान वालों के पास से अपने सरदारों की ओर वापस लौटते हैं और उनके साथ एकांत में होते हैं, तो उनके साथ होने का विश्वास दिलाते हुए कहते हैं : निश्चय हम तुम्हारे साथ तुम्हारे मार्ग ही पर हैं। लेकिन हम ईमान वालों से ज़ाहिरी तौर पर, उनका मज़ाक़ उड़ाने और उपहास करने के लिए, सहमत हैं।
आयत 15
ٱللَّهُ يَسْتَهْزِئُ بِهِمْ وَيَمُدُّهُمْ فِى طُغْيَـٰنِهِمْ يَعْمَهُونَ
ٱللَّهُ
अल्लाह
يَسْتَهْزِئُ
मज़ाक़ उड़ाता है
بِهِمْ
उनका
وَيَمُدُّهُمْ
और वो ढील दे रहा है उन्हें
فِى
in
طُغْيَـٰنِهِمْ
उनकी सरकशी में
يَعْمَهُونَ
वो भटकते फिरते हैं
अल्लाह उनके साथ परिहास कर रहा है और उन्हें उनकी सरकशी में ढील दिए जाता है, वे भटकते फिर रहे हैं
तफ़्सीर:
उनके ईमान वालों का उपहास करने के मुक़ाबिले में, अल्लाह उनका मज़ाक़ उड़ाता है, उन्हें उनके कार्य ही के समान बदला देने के तौर पर। यही कारण है कि उनके लिए इस दुनिया में मुसलमानों के नियम लागू किए हैं, लेकिन आख़िरत में उन्हें उनके कुफ़्र तथा निफ़ाक़ का बदला देगा। तथा अल्लाह उन्हें ढील देता है, ताकि वे अपनी गुमराही और सरकशी में बने रहें। इस तरह वे अचंभे तथा असमंजस (दुविधा), में पड़े रहें।
आयत 16
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ ٱشْتَرَوُا۟ ٱلضَّلَـٰلَةَ بِٱلْهُدَىٰ فَمَا رَبِحَت تِّجَـٰرَتُهُمْ وَمَا كَانُوا۟ مُهْتَدِينَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
ٱشْتَرَوُا۟
ख़रीद ली
ٱلضَّلَـٰلَةَ
गुमराही
بِٱلْهُدَىٰ
बदले हिदायत के
فَمَا
तो ना
رَبِحَت
फ़ायदामंद हुई
تِّجَـٰرَتُهُمْ
तिजारत उनकी
وَمَا
और ना
كَانُوا۟
थे वो
مُهْتَدِينَ
हिदायत पाने वाले
यही वे लोग हैं, जिन्होंने मार्गदर्शन के बदले में गुमराही मोल ली, किन्तु उनके इस व्यापार में न कोई लाभ पहुँचाया, और न ही वे सीधा मार्ग पा सके
तफ़्सीर:
वे मुनाफ़िक़ जिन्हें इन विशेषताओं के साथ वर्णित किया गया है, वही लोग हैं जिन्होंने ईमान के बदले कुफ़्र को चुना। इसलिए उनके व्यापार से कोई लाभ नहीं हुआ; क्योंकि वे अल्लाह पर ईमान से हाथ धो बैठे और उन्हें सत्य मार्ग भी प्राप्त नहीं हुआ।
आयत 17
مَثَلُهُمْ كَمَثَلِ ٱلَّذِى ٱسْتَوْقَدَ نَارًۭا فَلَمَّآ أَضَآءَتْ مَا حَوْلَهُۥ ذَهَبَ ٱللَّهُ بِنُورِهِمْ وَتَرَكَهُمْ فِى ظُلُمَـٰتٍۢ لَّا يُبْصِرُونَ
مَثَلُهُمْ
मिसाल उनकी
كَمَثَلِ
जैसे मिसाल
ٱلَّذِى
उसकी जिसने
ٱسْتَوْقَدَ
जलाई
نَارًۭا
आग
فَلَمَّآ
फिर जब
أَضَآءَتْ
उसने रोशन कर दिया
مَا
what
حَوْلَهُۥ
माहौल उसका
ذَهَبَ
ले गया
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِنُورِهِمْ
नूर उनका
وَتَرَكَهُمْ
और उसने छोड़ दिया उन्हें
فِى
in
ظُلُمَـٰتٍۢ
अँधेरों में
لَّا
(so) not
يُبْصِرُونَ
नहीं वो देख पाते
उनकी मिसाल ऐसी हैं जैसे किसी व्यक्ति ने आग जलाई, फिर जब उसने उसके वातावरण को प्रकाशित कर दिया, तो अल्लाह ने उसका प्रकाश ही छीन लिया और उन्हें अँधेरों में छोड़ दिया जिससे उन्हें कुछ सुझाई नहीं दे रहा हैं
तफ़्सीर:
अल्लाह तआला ने इन मुनाफ़िक़ों (पाखंडियों) के दो उदाहरण पेश किए हैं : एक आग का उदाहरण, और दूसरा पानी का उदाहरण। उनका आग का उदाहरण यह है कि : वे (मुनाफ़िक़) उस आदमी की तरह हैं, जिसने रोशनी प्राप्त करने के लिए आग जलाई। जब उसकी रोशनी चमकी और उसने सोचा कि अब उससे लाभान्वित होगा, तो वह बुझ गई। चुनाँचे उसमें जो चमकने वाला तत्व था, वह समाप्त हो गया तथा जो कुछ उसमें जलाने का तत्व था, वह रह गया। इसलिए वे आग जलाने वाले अंधकार में पड़े रह गए। उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता और न वे कोई रास्ता ही पाते हैं।
आयत 18
صُمٌّۢ بُكْمٌ عُمْىٌۭ فَهُمْ لَا يَرْجِعُونَ
صُمٌّۢ
बहरे हैं
بُكْمٌ
गूँगे हैं
عُمْىٌۭ
अँधे हैं
فَهُمْ
पस वो
لَا
not
يَرْجِعُونَ
नहीं वो लौटते
वे बहरे हैं, गूँगें हैं, अन्धे हैं, अब वे लौटने के नहीं
तफ़्सीर:
वे बहरे हैं, सत्य को स्वीकार करने की नीयत से नहीं सुनते। वे गूँगे हैं, सत्य नहीं बोलते हैं। (वे) सत्य को देखने से अंधे हैं। इसलिए वे अपनी पथभ्रष्टता से वापस नहीं लौटते।
आयत 19
أَوْ كَصَيِّبٍۢ مِّنَ ٱلسَّمَآءِ فِيهِ ظُلُمَـٰتٌۭ وَرَعْدٌۭ وَبَرْقٌۭ يَجْعَلُونَ أَصَـٰبِعَهُمْ فِىٓ ءَاذَانِهِم مِّنَ ٱلصَّوَٰعِقِ حَذَرَ ٱلْمَوْتِ ۚ وَٱللَّهُ مُحِيطٌۢ بِٱلْكَـٰفِرِينَ
أَوْ
या
كَصَيِّبٍۢ
जैसे ज़ोरदार बारिश
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
فِيهِ
उसमें
ظُلُمَـٰتٌۭ
अँधेरे
وَرَعْدٌۭ
और गरज
وَبَرْقٌۭ
और बिजली है
يَجْعَلُونَ
वो डाल लेते हैं
أَصَـٰبِعَهُمْ
उँगलियाँ
فِىٓ
in
ءَاذَانِهِم
अपने कानों में
مِّنَ
from
ٱلصَّوَٰعِقِ
बिजली के कड़ाकों से
حَذَرَ
बचने के लिए
ٱلْمَوْتِ ۚ
मौत से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
مُحِيطٌۢ
घेरने वाला है
بِٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों को
या (उनकी मिसाल ऐसी है) जैसे आकाश से वर्षा हो रही हो जिसके साथ अँधेरे हों और गरज और चमक भी हो, वे बिजली की कड़क के कारण मृत्यु के भय से अपने कानों में उँगलियाँ दे ले रहे हों - और अल्लाह ने तो इनकार करनेवालों को घेर रखा हैं
तफ़्सीर:
जहाँ तक उनके पानी के उदाहरण का संबंध है : तो वे संचित अंधकार, गरज और बिजली (चमक) वाले बादलों से होने वाली बहुत अधिक बारिश के समान हैं, जो कुछ लोगों पर उतरती है, तो वे सख़्त घबराहट से ग्रस्त हो जाते हैं, और कड़कने वाले वज्र की तीव्रता के कारण मृत्यु के भय से अपनी उंगलियों से अपने कानों को बंद कर लेते हैं। हालाँकि अल्लाह काफ़िरों को घेरे हुए है, वे उसे विवश नहीं कर सकते।
आयत 20
يَكَادُ ٱلْبَرْقُ يَخْطَفُ أَبْصَـٰرَهُمْ ۖ كُلَّمَآ أَضَآءَ لَهُم مَّشَوْا۟ فِيهِ وَإِذَآ أَظْلَمَ عَلَيْهِمْ قَامُوا۟ ۚ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ لَذَهَبَ بِسَمْعِهِمْ وَأَبْصَـٰرِهِمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ
يَكَادُ
क़रीब है
ٱلْبَرْقُ
बिजली की चमक
يَخْطَفُ
कि वो उचक ले
أَبْصَـٰرَهُمْ ۖ
निगाहें उनकी
كُلَّمَآ
जब कभी
أَضَآءَ
वो रोशनी करती है
لَهُم
उनके लिए
مَّشَوْا۟
वो चल पड़ते हैं
فِيهِ
उसमें
وَإِذَآ
और जब
أَظْلَمَ
वो अँधेरा कर देती है
عَلَيْهِمْ
उन पर
قَامُوا۟ ۚ
वो खड़े हो जाते हैं
وَلَوْ
और अगर
شَآءَ
चाहे
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَذَهَبَ
अलबत्ता वो ले जाए
بِسَمْعِهِمْ
कान उनके
وَأَبْصَـٰرِهِمْ ۚ
और आँखें उनकी
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌۭ
बहुत क़ुदरत रखने वाला है
मानो शीघ्र ही बिजली उनकी आँखों की रौशनी उचक लेने को है; जब भी उनपर चमकती हो, वे चल पड़ते हो और जब उनपर अँधेरा छा जाता हैं तो खड़े हो जाते हो; अगर अल्लाह चाहता तो उनकी सुनने और देखने की शक्ति बिलकुल ही छीन लेता। निस्सन्देह अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
निकट है कि बिजली अपनी चमक और रोशनी की तीव्रता के कारण उनकी आँखों को उचक ले जाए। जब भी बिजली चमकती और उनके लिए रोशनी करती है, तो वे आगे बढ़ते हैं और जब वह रोशनी नहीं करती है, तो वे अंधेरे ही में बने रहते हैं, अपनी जगह से हिल नहीं सकते। हालाँकि यदि अल्लाह चाहता, तो उनके सत्य से मुँह मोड़ने के कारण अपनी सर्वसमावेशी शक्ति के द्वारा उनके कान और उनकी दृष्टियों को छीन लेता, फिर वे उनके पास वापस नहीं लौटतीं। यहाँ बारिश क़ुरआन का उदाहरण है, बिजली की कड़क क़ुरआन की चेतावनियों का उदाहरण है, बिजली की रोशनी कभी-कभी उनके सामने सत्य के स्पष्ट होने का उदाहरण है, तथा बिजली की कड़क की तीव्रता से कानों को बंद कर लेने को उनके सत्य से मुँह मोड़ने और उसे स्वीकार न करने का उदाहरण बनाया गया है। मुनाफ़िक़ों और दोनों उदाहरणों वाले लोगों के बीच सादृश्य का बिंदु : लाभ न उठाना है। चुनाँचे आग के उदाहरण में : आग जलाने वाले को अंधेरे और जलने के सिवा कोई लाभ न हुआ, और पानी के उदाहरण में : बारिश में घिरे हुए लोगों ने भयंकर गरज और चमक के अलावा कोई लाभ नहीं उठाया। यही हाल मुनाफ़िक़ों का है, उन्हें इस्लाम के अंदर सख़्ती एवं कठोरता के सिवा कुछ नज़र नहीं आता।
आयत 21
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ ٱعْبُدُوا۟ رَبَّكُمُ ٱلَّذِى خَلَقَكُمْ وَٱلَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلنَّاسُ
लोगो
ٱعْبُدُوا۟
इबादत करो
رَبَّكُمُ
अपने रब की
ٱلَّذِى
जिसने
خَلَقَكُمْ
पैदा किया तुम्हें
وَٱلَّذِينَ
और उन्हें जो
مِن
from
قَبْلِكُمْ
तुमसे पहले थे
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَتَّقُونَ
तुम बच जाओ
ऐ लोगो! बन्दगी करो अपने रब की जिसने तुम्हें और तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया, ताकि तुम बच सको;
तफ़्सीर:
ऐ लोगो! अकेले अपने पालनहार की इबादत करो, उसके अतिरिक्त किसी और की नहीं; क्योंकि वही है जिसने तुम्हें पैदा किया और उन समुदायों को पैदा किया जो तुमसे पहले थे। इस आशा में कि तुम उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, उसकी यातना से बचने का उपाय कर सको।
आयत 22
ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُمُ ٱلْأَرْضَ فِرَٰشًۭا وَٱلسَّمَآءَ بِنَآءًۭ وَأَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ فَأَخْرَجَ بِهِۦ مِنَ ٱلثَّمَرَٰتِ رِزْقًۭا لَّكُمْ ۖ فَلَا تَجْعَلُوا۟ لِلَّهِ أَندَادًۭا وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ
ٱلَّذِى
वो जिसने
جَعَلَ
बनाया
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
فِرَٰشًۭا
फ़र्श
وَٱلسَّمَآءَ
और आसमान को
بِنَآءًۭ
छत
وَأَنزَلَ
और उसने उतारा
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مَآءًۭ
पानी
فَأَخْرَجَ
फिर उसने निकाला
بِهِۦ
साथ उसके
مِنَ
[of]
ٱلثَّمَرَٰتِ
फलों से
رِزْقًۭا
रिज़्क
لَّكُمْ ۖ
तुम्हारे लिए
فَلَا
पस ना
تَجْعَلُوا۟
तुम बनाओ
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
أَندَادًۭا
शरीक
وَأَنتُمْ
हालाँकि तुम
تَعْلَمُونَ
तुम जानते हो
वही है जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन को फर्श और आकाश को छत बनाया, और आकाश से पानी उतारा, फिर उसके द्वारा हर प्रकार की पैदावार की और फल तुम्हारी रोजी के लिए पैदा किए, अतः जब तुम जानते हो तो अल्लाह के समकक्ष न ठहराओ
तफ़्सीर:
वही है जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन को समतल बिछौना बनाया तथा उसके ऊपर आकाश को एक दृढ़ संरचना बनाया। तथा वही बारिश उतारकर उपकार करने वाला है। चुनाँचे उसने उसके द्वारा धरती से विभिन्न प्रकार के फल उगाए, ताकि वह तुम्हारी जीविका बन सके। अतः अल्लाह के लिए किसी तरह के साझीदार और उदाहरण न बनाओ, जबकि तुम जानते हो कि अल्लाह सर्वशक्तिमान के सिवा कोई स्रष्टा नहीं है।
आयत 23
وَإِن كُنتُمْ فِى رَيْبٍۢ مِّمَّا نَزَّلْنَا عَلَىٰ عَبْدِنَا فَأْتُوا۟ بِسُورَةٍۢ مِّن مِّثْلِهِۦ وَٱدْعُوا۟ شُهَدَآءَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
وَإِن
और अगर
كُنتُمْ
हो तुम
فِى
in
رَيْبٍۢ
किसी शक में
مِّمَّا
उससे जो
نَزَّلْنَا
नाज़िल किया हमने
عَلَىٰ
to
عَبْدِنَا
अपने बन्दे पर
فَأْتُوا۟
पस ले आओ
بِسُورَةٍۢ
कोई सूरत
مِّن
[of]
مِّثْلِهِۦ
इस जैसी
وَٱدْعُوا۟
और बुला लो
شُهَدَآءَكُم
अपने गवाहों को
مِّن
from
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
और अगर उसके विषय में जो हमने अपने बन्दे पर उतारा हैं, तुम किसी सन्देह में न हो तो उस जैसी कोई सूरा ले आओ और अल्लाह से हटकर अपने सहायकों को बुला लो जिनके आ मौजूद होने पर तुम्हें विश्वास हैं, यदि तुम सच्चे हो
तफ़्सीर:
ऐ लोगो! यदि तुम्हें हमारे बंदे मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उतारे गए क़ुरआन के बारे में किसी प्रकार का संदेह है, तो हम तुम्हें चुनौती देते हैं कि उस जैसी एक सूरत ही लाकर उसका विरोध करो, भले ही वह उसकी छोटी से छोटी सूरत के बराबर ही क्यों न हो। तथा अपने समर्थकों में से जिसे भी बुला सकते हो, बुला लो, यदि तुम अपने दावे में सच्चे हो।
आयत 24
فَإِن لَّمْ تَفْعَلُوا۟ وَلَن تَفْعَلُوا۟ فَٱتَّقُوا۟ ٱلنَّارَ ٱلَّتِى وَقُودُهَا ٱلنَّاسُ وَٱلْحِجَارَةُ ۖ أُعِدَّتْ لِلْكَـٰفِرِينَ
فَإِن
फिर अगर
لَّمْ
ना
تَفْعَلُوا۟
तुमने किया
وَلَن
और हरगिज़ नहीं
تَفْعَلُوا۟
तुम कर सकोगे
فَٱتَّقُوا۟
पस डरो
ٱلنَّارَ
उस आग से
ٱلَّتِى
वो जो
وَقُودُهَا
ईंधन हैं उसका
ٱلنَّاسُ
इन्सान
وَٱلْحِجَارَةُ ۖ
और पत्थर
أُعِدَّتْ
तैयार की गई है
لِلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के लिए
फिर अगर तुम ऐसा न कर सको और तुम कदापि नहीं कर सकते, तो डरो उस आग से जिसका ईधन इनसान और पत्थर हैं, जो इनकार करनेवालों के लिए तैयार की गई है
तफ़्सीर:
अगर तुमने ऐसा नहीं किया - और तुम ऐसा कभी नहीं कर पाओगे - तो उस आग से बचो, जो यातना के हक़दार लोगों और उन सभी प्रकार के पत्थरों से भड़काई जाएगी, जिन्हें वे पूजा करते थे। इस आग को अल्लाह तआला ने काफ़िरों के लिए तैयार किया है।
आयत 25
وَبَشِّرِ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ أَنَّ لَهُمْ جَنَّـٰتٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ ۖ كُلَّمَا رُزِقُوا۟ مِنْهَا مِن ثَمَرَةٍۢ رِّزْقًۭا ۙ قَالُوا۟ هَـٰذَا ٱلَّذِى رُزِقْنَا مِن قَبْلُ ۖ وَأُتُوا۟ بِهِۦ مُتَشَـٰبِهًۭا ۖ وَلَهُمْ فِيهَآ أَزْوَٰجٌۭ مُّطَهَّرَةٌۭ ۖ وَهُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ
وَبَشِّرِ
और ख़ुशख़बरी दे दीजिए
ٱلَّذِينَ
उन्हें जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
أَنَّ
बेशक
لَهُمْ
उनके लिए
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात हैं
تَجْرِى
बहती हैं
مِن
[from]
تَحْتِهَا
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ ۖ
नहरें
كُلَّمَا
जब कभी
رُزِقُوا۟
वो दिए जाऐंगे
مِنْهَا
उनसे
مِن
of
ثَمَرَةٍۢ
कोई फल
رِّزْقًۭا ۙ
बतौर रिज़्क़
قَالُوا۟
वो कहेंगे
هَـٰذَا
ये
ٱلَّذِى
वो ही है जो
رُزِقْنَا
दिए गए हम
مِن
from
قَبْلُ ۖ
इससे पहले
وَأُتُوا۟
और वो दिए जाऐंगे
بِهِۦ
उससे
مُتَشَـٰبِهًۭا ۖ
मिलता-जुलता
وَلَهُمْ
और उनके लिए
فِيهَآ
उनमें
أَزْوَٰجٌۭ
बीवियाँ होंगी
مُّطَهَّرَةٌۭ ۖ
निहायत पाकीज़ा
وَهُمْ
और वो
فِيهَا
उनमें
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उन्हें शुभ सूचना दे दो कि उनके लिए ऐसे बाग़ है जिनके नीचे नहरें बह रहीं होगी; जब भी उनमें से कोई फल उन्हें रोजी के रूप में मिलेगा, तो कहेंगे, "यह तो वही हैं जो पहले हमें मिला था," और उन्हें मिलता-जुलता ही (फल) मिलेगा; उनके लिए वहाँ पाक-साफ़ पत्नि याँ होगी, और वे वहाँ सदैव रहेंगे
तफ़्सीर:
अगर पिछली धमकी काफ़िरों के लिए थी; तो - ऐ नबी - आप सत्कर्म करने वाले मोमिनों को ऐसे बाग़ों की शुभ सूचना दे दें, जिनके महलों और पेड़ों के नीचे नहरें बहती हैं। जब भी उन्हें उन बाग़ों के स्वादिष्ट फलों में से कोई फल दिया जाएगा, तो दुनिया के फलों से बिलकुल मिलता-जुलता होने के कारण वे कहेंगे : ये तो बिलकुल वैसे ही फल हैं, जो हमें पहले दिए गए थे। दरअसल उन्हें आकार तथा नाम में समरूप फल इसलिए दिए जाएँगे, ताकि जाने पहचाने फल होने के कारण, दिल उन्हें स्वीकार कर लें। लेकिन वे अपने स्वाद और ज़ायक़े में भिन्न होंगे। उनके लिए जन्नत में ऐसी पत्नियाँ होंगी, जो दुनिया के लोगों में कल्पना की जाने वाली हर उस चीज़ से पवित्र होंगी, जिससे मन भागता है और मानव स्वभाव घृणा करता है। वे दुनिया की बाधित होने वाली नेमतों के विपरीत, हमेशा बाक़ी रहने वाली नेमतों में होंगे, जो कभी ख़त्म नहीं होंगी।
आयत 26
۞ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَسْتَحْىِۦٓ أَن يَضْرِبَ مَثَلًۭا مَّا بَعُوضَةًۭ فَمَا فَوْقَهَا ۚ فَأَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ فَيَعْلَمُونَ أَنَّهُ ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّهِمْ ۖ وَأَمَّا ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ فَيَقُولُونَ مَاذَآ أَرَادَ ٱللَّهُ بِهَـٰذَا مَثَلًۭا ۘ يُضِلُّ بِهِۦ كَثِيرًۭا وَيَهْدِى بِهِۦ كَثِيرًۭا ۚ وَمَا يُضِلُّ بِهِۦٓ إِلَّا ٱلْفَـٰسِقِينَ
۞ إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(is) not
يَسْتَحْىِۦٓ
नहीं हया फ़रमाता/शर्माता
أَن
कि
يَضْرِبَ
वो बयान करे
مَثَلًۭا
कोई मिसाल
مَّا
ख़्वाह
بَعُوضَةًۭ
मादा मच्छर की हो
فَمَا
या जो
فَوْقَهَا ۚ
ऊपर है उसके
فَأَمَّا
तो रहे
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
فَيَعْلَمُونَ
पस वो इल्म रखते हैं
أَنَّهُ
कि बेशक वो
ٱلْحَقُّ
हक़ है
مِن
from
رَّبِّهِمْ ۖ
उनके रब की तरफ़ से
وَأَمَّا
और रहे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
فَيَقُولُونَ
तो वो कहते हैं
مَاذَآ
क्या
أَرَادَ
इरादा किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
بِهَـٰذَا
साथ इस
مَثَلًۭا ۘ
मिसाल के
يُضِلُّ
वो गुमराह करता है
بِهِۦ
साथ इसके
كَثِيرًۭا
कसीर (तादाद) को
وَيَهْدِى
और वो हिदायत देता है
بِهِۦ
साथ इसके
كَثِيرًۭا ۚ
कसीर (तादाद) को
وَمَا
और नहीं
يُضِلُّ
वो गुमराह करता
بِهِۦٓ
साथ इसके
إِلَّا
मगर
ٱلْفَـٰسِقِينَ
फ़ासिक़ों को
निस्संदेह अल्लाह नहीं शरमाता कि वह कोई मिसाल पेश करे चाहे वह हो मच्छर की, बल्कि उससे भी बढ़कर किसी तुच्छ चीज़ की। फिर जो ईमान लाए है वे तो जानते है कि वह उनके रब की ओर से सत्य हैं; रहे इनकार करनेवाले तो वे कहते है, "इस मिसाल से अल्लाह का अभिप्राय क्या है?" इससे वह बहुतों को भटकने देता है और बहुतों को सीधा मार्ग दिखा देता है, मगर इससे वह केवल अवज्ञाकारियों ही को भटकने देता है
तफ़्सीर:
अल्लाह तआला किसी भी चीज़ के साथ उदाहरण देने से नहीं शरमाता है। चुनाँचे वह मच्छर तथा उससे भी छोटी या उससे भी बड़ी वस्तु के साथ उदाहरण देता है। जबकि इन उदाहरणों के प्रति लोगों के दो प्रकार हैं : मोमिन और काफ़िर। मोमिन लोग उनकी पुष्टि करते हैं और इस बात पर विश्वास रखते हैं कि उनके द्वारा उदाहरण देने के पीछे एक हिकमत है। परंतु काफ़िर लोग मज़ाक़ उड़ाते हुए एक-दूसरे से पूछते हैं कि अल्लाह ने मच्छर, मक्खी एवं मकड़ी जैसी इन तुच्छ प्राणियों के साथ उदाहरण क्यों दिया है? तो अल्लाह की तरफ से उसका उत्तर यह आता है : इन उदाहरणों में लोगों के लिए कई प्रकार के मार्गदर्शन, निर्देश और परीक्षण हैं। उनमें से कुछ को अल्लाह, उनके इन पर विचार करने से मुँह फेरने के कारण, गुमराह कर देता है। और ऐसे लोगों की संख्या बहुत है। तथा उनमें से कुछ का मार्गदर्शन करता है क्योंकि वे उनसे उपदेश ग्रहण करते हैं, और ये भी बहुत हैं। वह केवल उसी को गुमराह करता है, जो गुमराही का हक़दार हो। और वे उसकी आज्ञाकारिता से निकल जाने वाले लोग हैं, जैसे कि मुनाफ़िक़ लोग।
आयत 27
ٱلَّذِينَ يَنقُضُونَ عَهْدَ ٱللَّهِ مِنۢ بَعْدِ مِيثَـٰقِهِۦ وَيَقْطَعُونَ مَآ أَمَرَ ٱللَّهُ بِهِۦٓ أَن يُوصَلَ وَيُفْسِدُونَ فِى ٱلْأَرْضِ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْخَـٰسِرُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَنقُضُونَ
तोड़ते हैं
عَهْدَ
अहद
ٱللَّهِ
अल्लाह का
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद
مِيثَـٰقِهِۦ
उसके मज़बूत करने के
وَيَقْطَعُونَ
और वो काटते हैं
مَآ
जो
أَمَرَ
हुक्म दिया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
بِهِۦٓ
उसका
أَن
कि
يُوصَلَ
वो जोड़ा जाए
وَيُفْسِدُونَ
और वो फ़साद करते हैं
فِى
in
ٱلْأَرْضِ ۚ
ज़मीन में
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْخَـٰسِرُونَ
जो ख़सारा पाने वाले हैं
जो अल्लाह की प्रतिज्ञा को उसे सुदृढ़ करने के पश्चात भंग कर देते हैं और जिसे अल्लाह ने जोड़ने का आदेश दिया है उसे काट डालते हैं, और ज़मीन में बिगाड़ पैदा करते हैं, वही हैं जो घाटे में हैं
तफ़्सीर:
जो लोग अल्लाह के उस वचन को तोड़ देते हैं, जो उसने उनसे लिया था कि वे केवल उसी की इबादत करेंगे तथा उसके उस रसूल का अनुसरण करेंगे, जिसके बारे में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पहले के रसूलों ने सूचना दी थी। तथा वे उन रिश्तों-नातों को काटते हैं, जिन्हें अल्लाह ने जोड़ने का आदेश दिया है और पापों के माध्यम से पृथ्वी में भ्रष्टाचार फैलाने की कोशिश करते हैं, तो यही लोग दुनिया एवं आख़िरत में बहुत कम हिस्से वाले हैं।
आयत 28
كَيْفَ تَكْفُرُونَ بِٱللَّهِ وَكُنتُمْ أَمْوَٰتًۭا فَأَحْيَـٰكُمْ ۖ ثُمَّ يُمِيتُكُمْ ثُمَّ يُحْيِيكُمْ ثُمَّ إِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
كَيْفَ
किस तरह
تَكْفُرُونَ
तुम इन्कार करते हो
بِٱللَّهِ
अल्लाह का
وَكُنتُمْ
हालाँकि थे तुम
أَمْوَٰتًۭا
मुर्दे
فَأَحْيَـٰكُمْ ۖ
फिर उसने ज़िन्दा किया तुम्हें
ثُمَّ
फिर
يُمِيتُكُمْ
वो मौत देगा तुम्हें
ثُمَّ
फिर
يُحْيِيكُمْ
वो ज़िन्दा करेगा तुम्हें
ثُمَّ
फिर
إِلَيْهِ
उसी की तरफ़
تُرْجَعُونَ
तुम लौटाए जाओगे
तुम अल्लाह के साथ अविश्वास की नीति कैसे अपनाते हो, जबकि तुम निर्जीव थे तो उसने तुम्हें जीवित किया, फिर वही तुम्हें मौत देता हैं, फिर वही तुम्हें जीवित करेगा, फिर उसी की ओर तुम्हें लौटना हैं?
तफ़्सीर:
ऐ काफ़िरो! तुम्हारा मामला बड़ा अद्भुत है! तुम अल्लाह का इनकार कैसे करते हो, जबकि तुम उसके सामर्थ्य की निशानियाँ खुद अपने अंदर देखते हो; क्योंकि तुम कुछ भी नहीं थे, तो उसने तुम्हें बनाया और जीवन दिया, फिर वह तुम्हें दूसरी मौत देगा, फिर तुम्हें दूसरा जीवन प्रदान करेगा, फिर वह तुम्हें अपनी ओर लौटाएगा, ताकि जो कुछ तुमने किया है उसका तुमसे हिसाब ले।
आयत 29
هُوَ ٱلَّذِى خَلَقَ لَكُم مَّا فِى ٱلْأَرْضِ جَمِيعًۭا ثُمَّ ٱسْتَوَىٰٓ إِلَى ٱلسَّمَآءِ فَسَوَّىٰهُنَّ سَبْعَ سَمَـٰوَٰتٍۢ ۚ وَهُوَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌۭ
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
خَلَقَ
पैदा किया
لَكُم
तुम्हारे लिए
مَّا
जो
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में है
جَمِيعًۭا
सब का सब
ثُمَّ
फिर
ٱسْتَوَىٰٓ
वो मुतावज्जेह हुआ
إِلَى
तरफ
ٱلسَّمَآءِ
आसमान के
فَسَوَّىٰهُنَّ
पस उसने दुरुस्त करके बना दिया उन्हें
سَبْعَ
सात
سَمَـٰوَٰتٍۢ ۚ
आसमान
وَهُوَ
और वो
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ का
عَلِيمٌۭ
ख़ूब इल्म रखने वाला है
वही तो है जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन की सारी चीज़े पैदा की, फिर आकाश की ओर रुख़ किया और ठीक तौर पर सात आकाश बनाए और वह हर चीज़ को जानता है
तफ़्सीर:
अकेला अल्लाह ही है, जिसने धरती पर जो कुछ भी है, जैसे- नदियाँ, पेड़ और अन्य चीज़ें जिनकी गिनती नहीं की जा सकती, तुम्हारे लिए पैदा किया, तथा तुम उससे लाभान्वित होते और उसका आनंद लेते हो जो उसने तुम्हारे अधीन किया है। फिर वह आसमान की रचना करने की ओर मुतवज्जेह हुआ और उन्हें ठीक-ठाक सात आसमान बना दिया। तथा उसके ज्ञान ने हर वस्तु को अपने घेरे में ले रखा है।
आयत 30
وَإِذْ قَالَ رَبُّكَ لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ إِنِّى جَاعِلٌۭ فِى ٱلْأَرْضِ خَلِيفَةًۭ ۖ قَالُوٓا۟ أَتَجْعَلُ فِيهَا مَن يُفْسِدُ فِيهَا وَيَسْفِكُ ٱلدِّمَآءَ وَنَحْنُ نُسَبِّحُ بِحَمْدِكَ وَنُقَدِّسُ لَكَ ۖ قَالَ إِنِّىٓ أَعْلَمُ مَا لَا تَعْلَمُونَ
وَإِذْ
और जब
قَالَ
फ़रमाया
رَبُّكَ
आपके रब ने
لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ
फ़रिश्तों से
إِنِّى
बेशक मैं
جَاعِلٌۭ
बनाने वाला हूँ
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
خَلِيفَةًۭ ۖ
एक ख़लीफ़ा
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَتَجْعَلُ
क्या तू बनाएगा
فِيهَا
इसमें
مَن
उसको जो
يُفْسِدُ
फ़साद करेगा
فِيهَا
इसमें
وَيَسْفِكُ
और वो बहाएगा
ٱلدِّمَآءَ
ख़ून
وَنَحْنُ
और हम
نُسَبِّحُ
हम तस्बीह करते हैं
بِحَمْدِكَ
साथ तेरी तारीफ़ के
وَنُقَدِّسُ
और हम पाकीज़गी बयान करते हैं
لَكَ ۖ
तेरी
قَالَ
फ़रमाया
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَعْلَمُ
मैं जानता हूँ
مَا
जो
لَا
नहीं
تَعْلَمُونَ
तुम जानते
और याद करो जब तुम्हारे रब ने फरिश्तों से कहा कि "मैं धरती में (मनुष्य को) खलीफ़ा (सत्ताधारी) बनानेवाला हूँ।" उन्होंने कहा, "क्या उसमें उसको रखेगा, जो उसमें बिगाड़ पैदा करे और रक्तपात करे और हम तेरा गुणगान करते और तुझे पवित्र कहते हैं?" उसने कहा, "मैं जानता हूँ जो तुम नहीं जानते।"
तफ़्सीर:
अल्लाह तआला सूचना दे रहा है कि उसने फ़रिश्तों से कहा कि वह धरती पर मनुष्य को पैदा करेगा, जो अल्लाह की आज्ञाकारिता पर धरती को आबाद करने के लिए एक-दूसरे के उत्तराधिकारी होंगे। तो फ़रिश्तों ने अपने पालनहार से - मार्गदर्शन और पूछताछ के तौर पर - आदम के बेटों को पृथ्वी पर उत्तराधिकारी बनाने की हिकमत के बारे में पूछा, जबकि वे धरती में बिगाड़ पैदा करेंगे और अन्यायपूर्वक खून बहाएँगे, यह कहते हुए : हालाँकि हम तेरे आज्ञाकारी हैं, तेरी प्रशंसा करते हुए तथा तेरे प्रताप एवं पूर्णता का महिमामंडन करते हुए हम तेरी पवित्रता बयान करते हैं, हम इसमें कोई सुस्ती नहीं करते। तो अल्लाह तआला ने उनके प्रश्न का उत्तर दिया : मैं उन्हें पैदा करने की शानदार हिकमतों तथा उनके उत्तराधिकार के महान उद्देश्यों के बारे में जो जानता हूँ, तुम नहीं जानते।
आयत 31
وَعَلَّمَ ءَادَمَ ٱلْأَسْمَآءَ كُلَّهَا ثُمَّ عَرَضَهُمْ عَلَى ٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ فَقَالَ أَنۢبِـُٔونِى بِأَسْمَآءِ هَـٰٓؤُلَآءِ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
وَعَلَّمَ
और उसने सिखा दिए
ءَادَمَ
आदम को
ٱلْأَسْمَآءَ
नाम
كُلَّهَا
सब उनके
ثُمَّ
फिर
عَرَضَهُمْ
उसने पेश किया उन्हें
عَلَى
to
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ
फ़रिश्तों पर
فَقَالَ
फिर फ़रमाया
أَنۢبِـُٔونِى
ख़बर दो मुझे
بِأَسْمَآءِ
नामों की
هَـٰٓؤُلَآءِ
उन सब के
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
उसने (अल्लाह ने) आदम को सारे नाम सिखाए, फिर उन्हें फ़रिश्तों के सामने पेश किया और कहा, "अगर तुम सच्चे हो तो मुझे इनके नाम बताओ।"
तफ़्सीर:
आदम अलैहिस्सलाम के स्थान (रुतबा) को स्पष्ट करने के लिए, अल्लाह तआला ने उन्हें सभी सजीव एवं निर्जीव वस्तुओं आदि के नाम अर्थात् उनके शब्द एवं अर्थ सिखा दिए। फिर उन वस्तुओं को फ़रिश्तों के सामने रखते हुए कहा : मुझे इनके नाम बताओ, यदि तुम अपने इस दावे में सच्चे हो कि तुम इस प्राणी से अधिक प्रतिष्ठित और उससे बेहतर हो!!
आयत 32
قَالُوا۟ سُبْحَـٰنَكَ لَا عِلْمَ لَنَآ إِلَّا مَا عَلَّمْتَنَآ ۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْعَلِيمُ ٱلْحَكِيمُ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
سُبْحَـٰنَكَ
पाक है तू
لَا
नहीं
عِلْمَ
कोई इल्म
لَنَآ
हमारे लिए
إِلَّا
मगर
مَا
जो
عَلَّمْتَنَآ ۖ
सिखाया तूने हमें
إِنَّكَ
बेशक तू
أَنتَ
तू ही है
ٱلْعَلِيمُ
बहुत इल्म वाला
ٱلْحَكِيمُ
बहुत हिकमत वाला
वे बोले, "पाक और महिमावान है तू! तूने जो कुछ हमें बताया उसके सिवा हमें कोई ज्ञान नहीं। निस्संदेह तू सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है।"
तफ़्सीर:
उन्होंने - अपनी कमी को स्वीकार करते हुए, अल्लाह को श्रेय देते हुए - कहा : ऐ हमारे पालनहार! हम तेरे फ़ैसले और विधान के बारे में तुझपर आपत्ति करने से तुझे पवित्र ठहराते और तेरा महिमामंडन करते हैं। क्योंकि तूने हमें जो ज्ञान दिया है, उसके सिवा हम और कुछ नहीं जानते। निःसंदेह तू सर्वज्ञ है, जिससे कुछ भी छिपा नहीं है, तू पूर्ण हिकमत वाला है, अपनी नियति और अपने विधान में चीजों को उनके उचित स्थान पर रखता है।
आयत 33
قَالَ يَـٰٓـَٔادَمُ أَنۢبِئْهُم بِأَسْمَآئِهِمْ ۖ فَلَمَّآ أَنۢبَأَهُم بِأَسْمَآئِهِمْ قَالَ أَلَمْ أَقُل لَّكُمْ إِنِّىٓ أَعْلَمُ غَيْبَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَأَعْلَمُ مَا تُبْدُونَ وَمَا كُنتُمْ تَكْتُمُونَ
قَالَ
फ़रमाया
يَـٰٓـَٔادَمُ
ऐ आदम
أَنۢبِئْهُم
ख़बर दो उन्हें
بِأَسْمَآئِهِمْ ۖ
उनके नामों की
فَلَمَّآ
फिर जब
أَنۢبَأَهُم
उसने ख़बर दी उन्हें
بِأَسْمَآئِهِمْ
उनके नामों की
قَالَ
फ़रमाया
أَلَمْ
क्या नहीं
أَقُل
मैंने कहा था
لَّكُمْ
तुम से
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَعْلَمُ
मैं जानता हूँ
غَيْبَ
ग़ैब
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन का
وَأَعْلَمُ
और मैं जानता हूँ
مَا
जो कुछ
تُبْدُونَ
तुम ज़ाहिर करते हो
وَمَا
और जो कुछ
كُنتُمْ
हो तुम
تَكْتُمُونَ
तुम छुपाते
उसने कहा, "ऐ आदम! उन्हें उन लोगों के नाम बताओ।" फिर जब उसने उन्हें उनके नाम बता दिए तो (अल्लाह ने) कहा, "क्या मैंने तुमसे कहा न था कि मैं आकाशों और धरती की छिपी बातों को जानता हूँ और मैं जानता हूँ जो कुछ तुम ज़ाहिर करते हो और जो कुछ छिपाते हो।"
तफ़्सीर:
तब अल्लाह तआला ने आदम अलैहिस्सलाम से कहा : उन्हें इन वस्तुओं के नाम बताओ। चुनाँचे जब आदम अलैहिस्सलाम ने उन्हें बता दिया जिस तरह उनके पालनहार ने उन्हें सिखाया था, तो अल्लाह तआला ने फ़रिश्तों से कहा : क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था : निःसंदेह मैं आकाशों तथा धरती की छिपी हुई बातों को जानता हूँ, तथा मैं उसे भी जानता हूँ, जो तुम अपनी स्थितियों में से प्रकट करते हो और जो तुम अपने मन से बातें करते हो।
आयत 34
وَإِذْ قُلْنَا لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ ٱسْجُدُوا۟ لِـَٔادَمَ فَسَجَدُوٓا۟ إِلَّآ إِبْلِيسَ أَبَىٰ وَٱسْتَكْبَرَ وَكَانَ مِنَ ٱلْكَـٰفِرِينَ
وَإِذْ
और जब
قُلْنَا
कहा हमने
لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ
फ़रिश्तों से
ٱسْجُدُوا۟
सजदा करो
لِـَٔادَمَ
आदम को
فَسَجَدُوٓا۟
तो उन्होंने सजदा किया
إِلَّآ
सिवाय
إِبْلِيسَ
इब्लीस के
أَبَىٰ
उसने इन्कार किया
وَٱسْتَكْبَرَ
और तकब्बुर किया
وَكَانَ
और वो हो गया
مِنَ
of
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों में से
और याद करो जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि "आदम को सजदा करो" तो, उन्होंने सजदा किया सिवाय इबलील के; उसने इनकार कर दिया और लगा बड़ा बनने और काफ़िर हो रहा
तफ़्सीर:
अल्लाह तआला बयान कर रहा है कि उसने फ़रिश्तों को आदम को सम्मान स्वरूप सजदा करने का आदेश दिया, तो उन्होंने अल्लाह के आज्ञापालन में ज़रा भी देर नहीं की, फौरन सजदे में गिर गए। इबलीस को छोड़कर जो कि जिन्नों में से था। उसने अल्लाह के सजदे के आदेश पर आपत्ति जताते हुए और आदम पर बड़ा बनते हुए, सजदा करने से मना कर दिया। इस कारण वह अल्लाह के साथ कुफ़्र करने वालों में से हो गया।
आयत 35
وَقُلْنَا يَـٰٓـَٔادَمُ ٱسْكُنْ أَنتَ وَزَوْجُكَ ٱلْجَنَّةَ وَكُلَا مِنْهَا رَغَدًا حَيْثُ شِئْتُمَا وَلَا تَقْرَبَا هَـٰذِهِ ٱلشَّجَرَةَ فَتَكُونَا مِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَقُلْنَا
और कहा हमने
يَـٰٓـَٔادَمُ
ऐ आदम
ٱسْكُنْ
रहो
أَنتَ
तुम
وَزَوْجُكَ
और बीवी तुम्हारी
ٱلْجَنَّةَ
जन्नत में
وَكُلَا
और तुम दोनों खाओ
مِنْهَا
इससे
رَغَدًا
फ़राग़त से
حَيْثُ
जहाँ से
شِئْتُمَا
तुम दोनों चाहो
وَلَا
और ना
تَقْرَبَا
तुम दोनों क़रीब जाना
هَـٰذِهِ
उस
ٱلشَّجَرَةَ
दरख़्त के
فَتَكُونَا
वरना तुम दोनों हो जाओगे
مِنَ
of
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों में से
और हमने कहा, "ऐ आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी जन्नत में रहो और वहाँ जी भर बेरोक-टोक जहाँ से तुम दोनों का जी चाहे खाओ, लेकिन इस वृक्ष के पास न जाना, अन्यथा तुम ज़ालिम ठहरोगे।"
तफ़्सीर:
और हमने कहा : ऐ आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी - ह़व्वा - जन्नत में रहो और उसमें से जन्नत के किसी भी भाग में एक सुखद और विस्तृत भोजन खाओ। तथा तुम दोनों इस पेड़ के पास मत जाना, जिससे मैंने तुम्हें खाने से मना किया है। अन्यथा तुम दोनों मेरी अवज्ञा करने के कारण अत्याचारियों में से हो जाओगे।
आयत 36
فَأَزَلَّهُمَا ٱلشَّيْطَـٰنُ عَنْهَا فَأَخْرَجَهُمَا مِمَّا كَانَا فِيهِ ۖ وَقُلْنَا ٱهْبِطُوا۟ بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّۭ ۖ وَلَكُمْ فِى ٱلْأَرْضِ مُسْتَقَرٌّۭ وَمَتَـٰعٌ إِلَىٰ حِينٍۢ
فَأَزَلَّهُمَا
फिर फुसला दिया उन दोनों को
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान ने
عَنْهَا
उससे
فَأَخْرَجَهُمَا
फिर उसने निकलवा दिया उन दोनों को
مِمَّا
उससे जो
كَانَا
वो दोनों थे
فِيهِ ۖ
जिसमें
وَقُلْنَا
और कहा हमने
ٱهْبِطُوا۟
उतर जाओ
بَعْضُكُمْ
बाज़ तुम्हारे
لِبَعْضٍ
बाज़ के
عَدُوٌّۭ ۖ
दुश्मन हैं
وَلَكُمْ
और तुम्हारे लिए
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
مُسْتَقَرٌّۭ
जाए क़रार है
وَمَتَـٰعٌ
और फ़ायदा उठाना है
إِلَىٰ
for
حِينٍۢ
एक वक़्त तक
अन्ततः शैतान ने उन्हें वहाँ से फिसला दिया, फिर उन दोनों को वहाँ से निकलवाकर छोड़ा, जहाँ वे थे। हमने कहा कि "उतरो, तुम एक-दूसरे के शत्रु होगे और तुम्हें एक समय तक धरती में ठहरना और बिसलना है।"
तफ़्सीर:
चुनाँचे शैतान लगातार दोनों को बहकाता और उनके लिए सुशोभित करता रहा, यहाँ तक कि उन्हें उस पेड़ से खाने के पाप में डाल दिया, जिससे अल्लाह ने उन्हें मना किया था। इसके परिणामस्वरूप, अल्लाह ने उन्हें उस जन्नत से निकाल दिया जिसमें वे दोनों थे, तथा अल्लाह ने उन दोनो से और शैतान से कहा : धरती पर उतर आओ। तुम एक-दूसरे के शत्रु हो। और जब तक तुम्हारी नियत जीवन अवधि समाप्त नहीं हो जाती और क़ियामत क़ायम नहीं हो जाती, तब तक तुम्हें उस धरती पर रहना और उसमें मौजूद अच्छी चीजों से फायदा उठाना है।
आयत 37
فَتَلَقَّىٰٓ ءَادَمُ مِن رَّبِّهِۦ كَلِمَـٰتٍۢ فَتَابَ عَلَيْهِ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ
فَتَلَقَّىٰٓ
पस सीख लिए
ءَادَمُ
आदम ने
مِن
from
رَّبِّهِۦ
अपने रब से
كَلِمَـٰتٍۢ
चंद कलिमात
فَتَابَ
फिर वो मेहरबान हुआ
عَلَيْهِ ۚ
उस पर
إِنَّهُۥ
बेशक वो
هُوَ
वो ही है
ٱلتَّوَّابُ
बहुत तौबा क़ुबूल करने वाला
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला
फिर आदम ने अपने रब से कुछ शब्द पा लिए, तो अल्लाह ने उसकी तौबा क़बूल कर ली; निस्संदेह वही तौबा क़बूल करने वाला, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
फिर आदम अलैहिस्सलाम ने वे शब्द सीख लिए, जो अल्लाह ने उनके दिल में डाल दिए थे और उनके साथ उन्हें दुआ करने के लिए प्रेरित किया था। ये वही शब्द हैं, जिनका उल्लेख अल्लाह के इस कथन में है : (الأعراف: 23)﴾قَالَا رَبَّنَا ظَلَمْنَا أَنفُسَنَا وَإِن لَّمْ تَغْفِرْ لَنَا وَتَرْحَمْنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ﴿ ''उन दोनों ने कहा : ऐ हमारे पालनहार! हमने अपनी जानों पर अत्याचार किया है। और यदि तूने हमें क्षमा न किया और हमपर दया न की, तो निश्चय हम अवश्य नुक़सान उठाने वालों में से हो जाएँगे।'' (सूरतुल आराफ़ : 23) चुनाँचे अल्लाह ने उनकी तौबा क़बूल कर ली और उन्हें क्षमा कर दिया। क्योंकि वह महिमावान् अपने बंदों की तौबा बहुत ज़्यादा क़बूल करने वाला और उनपर दया करने वाला है।
आयत 38
قُلْنَا ٱهْبِطُوا۟ مِنْهَا جَمِيعًۭا ۖ فَإِمَّا يَأْتِيَنَّكُم مِّنِّى هُدًۭى فَمَن تَبِعَ هُدَاىَ فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
قُلْنَا
कहा हमने
ٱهْبِطُوا۟
उतर जाओ
مِنْهَا
इससे
جَمِيعًۭا ۖ
सब के सब
فَإِمَّا
फिर अगर
يَأْتِيَنَّكُم
आए तुम्हारे पास
مِّنِّى
मेरी तरफ़ से
هُدًۭى
कोई हिदायत
فَمَن
तो जिसने
تَبِعَ
पैरवी की
هُدَاىَ
मेरी हिदायत की
فَلَا
तो ना
خَوْفٌ
कोई ख़ौफ़ होगा
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يَحْزَنُونَ
वो ग़मगीन होंगे
हमने कहा, "तुम सब यहाँ से उतरो, फिर यदि तुम्हारे पास मेरी ओर से कोई मार्गदर्शन पहुँचे तो जिस किसी ने मेरे मार्गदर्शन का अनुसरण किया, तो ऐसे लोगों को न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे।"
तफ़्सीर:
हमने उनसे कहा : तुम सब जन्नत से धरती पर उतर जाओ। फिर यदि मेरे रसूलों के हाथों तुम्हारे पास कोई मार्गदर्शन आए, तो उसपर चलने वालों और मेरे रसूलों पर ईमान लाने वालों पर न तो आख़िरत में कोई डर है, और न ही वे दुनिया के छूटने पर दुखी होंगे।
आयत 39
وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَكَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَآ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
وَكَذَّبُوا۟
और झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَآ
हमारी आयात को
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
أَصْحَـٰبُ
साथी
ٱلنَّارِ ۖ
आग के
هُمْ
वो
فِيهَا
उसमें
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
और जिन लोगों ने इनकार किया और हमारी आयतों को झुठलाया, वहीं आग में पड़नेवाले हैं, वे उसमें सदैव रहेंगे
तफ़्सीर:
जहाँ तक उन लोगों की बात है जिन्होंने कुफ़्र किया और हमारी आयतों को झुठलाया, तो वही लोग आग (जहन्नम) वाले हैं, वे उससे कभी बाहर नहीं निकलेंगे।
आयत 40
يَـٰبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ ٱذْكُرُوا۟ نِعْمَتِىَ ٱلَّتِىٓ أَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَأَوْفُوا۟ بِعَهْدِىٓ أُوفِ بِعَهْدِكُمْ وَإِيَّـٰىَ فَٱرْهَبُونِ
يَـٰبَنِىٓ
O Children
إِسْرَٰٓءِيلَ
ऐ बनी इस्राईल
ٱذْكُرُوا۟
याद करो
نِعْمَتِىَ
मेरी नेअमत को
ٱلَّتِىٓ
वो जो
أَنْعَمْتُ
इनाम की मैंने
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَأَوْفُوا۟
और पूरा करो
بِعَهْدِىٓ
मेरे अहद को
أُوفِ
मैं पूरा करुँगा
بِعَهْدِكُمْ
तुम्हारे अहद को
وَإِيَّـٰىَ
और सिर्फ़ मुझ ही से
فَٱرْهَبُونِ
पस डरो मुझ से
ऐ इसराईल का सन्तान! याद करो मेरे उस अनुग्रह को जो मैंने तुमपर किया था। और मेरी प्रतिज्ञा को पूरा करो, मैं तुमसे की हुई प्रतिज्ञा को पूरा करूँगा और हाँ मुझी से डरो
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह के नबी याक़ूब के बेटो! तुम अपने ऊपर अल्लाह की लगातार नेमतों को याद करो और उनका शुक्रिया अदा करो और मुझपर तथा मेरे रसूलों पर ईमान लाने और मेरे निर्धारित किए हुए नियमों पर अमल करने के मेरे आदेश को पूरा करो। यदि तुम इसे पूरा करते हो, तो मैं दुनिया में सौभाग्यशाली जीवन तथा क़ियामत के दिन बेहतर बदले का तुमसे किया हुआ वादा पूरा करूँगा। तथा केवल मुझ ही से डरो और मेरी प्रतिज्ञा को मत तोड़ो।
आयत 41
وَءَامِنُوا۟ بِمَآ أَنزَلْتُ مُصَدِّقًۭا لِّمَا مَعَكُمْ وَلَا تَكُونُوٓا۟ أَوَّلَ كَافِرٍۭ بِهِۦ ۖ وَلَا تَشْتَرُوا۟ بِـَٔايَـٰتِى ثَمَنًۭا قَلِيلًۭا وَإِيَّـٰىَ فَٱتَّقُونِ
وَءَامِنُوا۟
और ईमान लाओ
بِمَآ
उस पर जो
أَنزَلْتُ
नाज़िल किया मैंने
مُصَدِّقًۭا
तसदीक़ करने वाला
لِّمَا
उसके लिए जो
مَعَكُمْ
तुम्हारे पास है
وَلَا
और ना
تَكُونُوٓا۟
तुम हो जाओ
أَوَّلَ
सबसे पहला (गिरोह)
كَافِرٍۭ
इन्कार करने वाला
بِهِۦ ۖ
उसका
وَلَا
और ना
تَشْتَرُوا۟
तुम लो
بِـَٔايَـٰتِى
मेरी आयात के बदले
ثَمَنًۭا
क़ीमत
قَلِيلًۭا
थोड़ी
وَإِيَّـٰىَ
और सिर्फ़ मुझ ही से
فَٱتَّقُونِ
पस डरो मुझ से
और ईमान लाओ उस चीज़ पर जो मैंने उतारी है, जो उसकी पुष्टि में है, जो तुम्हारे पास है, और सबसे पहले तुम ही उसके इनकार करनेवाले न बनो। और मेरी आयतों को थोड़ा मूल्य प्राप्त करने का साधन न बनाओ, मुझसे ही तुम डरो
तफ़्सीर:
तथा उस क़ुरआन पर ईमान लाओ, जिसे मैंने मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतारा है, जो उसकी पुष्टि करने वाला है जो अल्लाह की तौह़ीद (एकेश्वरवाद) तथा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नुबुव्वत के विषय में तौरात में उसके विकृत होने से पूर्व आया है। तथा सावधान रहना, कहीं ऐसा न हो कि तुम उसका इनकार करने वाले पहले दल बन जाओ। तथा मेरी उतारी हुई आयतों के बदले प्रतिष्ठा एवं पद के रूप में एक छोटी सी क़ीमत न लो, और मेरे क्रोध तथा मेरी यातना से डरो।
आयत 42
وَلَا تَلْبِسُوا۟ ٱلْحَقَّ بِٱلْبَـٰطِلِ وَتَكْتُمُوا۟ ٱلْحَقَّ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ
وَلَا
और ना
تَلْبِسُوا۟
तुम मिलाओ
ٱلْحَقَّ
हक़ को
بِٱلْبَـٰطِلِ
साथ बातिल के
وَتَكْتُمُوا۟
और (ना) तुम छुपाओ
ٱلْحَقَّ
हक़ को
وَأَنتُمْ
हालाँकि तुम
تَعْلَمُونَ
तुम इल्म रखते हो
और सत्य में असत्य का घाल-मेल न करो और जानते-बुझते सत्य को छिपाओ मत
तफ़्सीर:
तथा उस सत्य को - जो मैंने अपने रसूलों पर उतारा है - उन झूठी बातों के साथ भ्रमित न करो जो तुम गढ़ते हो। तथा अपनी पुस्तकों में मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के विवरण के बारे में आए हुए सत्य को न छिपाओ, जबकि तुम उसे जानते हो और उसके बारे में निश्चित हो।
आयत 43
وَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُوا۟ ٱلزَّكَوٰةَ وَٱرْكَعُوا۟ مَعَ ٱلرَّٰكِعِينَ
وَأَقِيمُوا۟
और क़ायम करो
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَءَاتُوا۟
और अदा करो
ٱلزَّكَوٰةَ
ज़कात
وَٱرْكَعُوا۟
और रुकू करो
مَعَ
साथ
ٱلرَّٰكِعِينَ
रुकू करने वालों के
और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात दो और (मेरे समक्ष) झुकनेवालों के साथ झुको
तफ़्सीर:
नमाज़ को उसके अरकान, वाजिबात और सुन्नतों के साथ सम्पूर्ण तरीक़े से अदा करो, और अपने उन धनों की ज़कात निकालो जो अल्लाह ने तुम्हारे हाथों में रखा है, तथा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उम्मत में से अल्लाह के समक्ष झुकने वालों के साथ अल्लाह के सामने झुक जाओ।
आयत 44
۞ أَتَأْمُرُونَ ٱلنَّاسَ بِٱلْبِرِّ وَتَنسَوْنَ أَنفُسَكُمْ وَأَنتُمْ تَتْلُونَ ٱلْكِتَـٰبَ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
۞ أَتَأْمُرُونَ
क्या तुम हुक्म देते हो
ٱلنَّاسَ
लोगों को
بِٱلْبِرِّ
नेकी का
وَتَنسَوْنَ
और तुम भूल जाते हो
أَنفُسَكُمْ
अपने नफ़्सों को
وَأَنتُمْ
हालाँकि तुम
تَتْلُونَ
तुम तिलावत करते हो
ٱلْكِتَـٰبَ ۚ
किताब की
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल से काम लेते
क्या तुम लोगों को तो नेकी और एहसान का उपदेश देते हो और अपने आपको भूल जाते हो, हालाँकि तुम किताब भी पढ़ते हो? फिर क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?
तफ़्सीर:
कितनी बुरी बात है कि तुम दूसरों को तो ईमान और भलाई करने का आदेश दो, और अपने आपको भूलकर खुद उससे मुँह फेर लो, हालाँकि तुम तौरात पढ़ते हो, उसमें मौजूद अल्लाह के धर्म का पालन करने तथा उसके रसूलों पर विश्वास करने के आदेश से अवगत हो। तो क्या तुम अपनी बुद्धियों से लाभ नहीं उठाते?!
आयत 45
وَٱسْتَعِينُوا۟ بِٱلصَّبْرِ وَٱلصَّلَوٰةِ ۚ وَإِنَّهَا لَكَبِيرَةٌ إِلَّا عَلَى ٱلْخَـٰشِعِينَ
وَٱسْتَعِينُوا۟
और मदद तलब करो
بِٱلصَّبْرِ
साथ सब्र
وَٱلصَّلَوٰةِ ۚ
और नमाज़ के
وَإِنَّهَا
और बेशक वो
لَكَبِيرَةٌ
अलबत्ता बड़ी (भारी) है
إِلَّا
मगर
عَلَى
ऊपर
ٱلْخَـٰشِعِينَ
ख़ुशू करने वालों के
धैर्य और नमाज़ से मदद लो, और निस्संदेह यह (नमाज) बहुत कठिन है, किन्तु उन लोगों के लिए नहीं जिनके दिल पिघले हुए हो;
तफ़्सीर:
अपने सभी धार्मिक और सांसारिक मामलों में सब्र (धैर्य) के साथ मदद माँगो तथा नमाज़ के साथ जो तुम्हें अल्लाह के क़रीब लाती है और तुम्हें उससे जोड़ती है। अतः वह तुम्हारी मदद करता है और तुम्हारी रक्षा करता है और तुम्हारे नुक़सान को दूर कर देता है। और निश्चय नमाज़ क़ायम करना बहुत कठिन और भारी है, सिवाय उनके जो अपने पालनहार के प्रति समर्पित होने वाले हैं।
आयत 46
ٱلَّذِينَ يَظُنُّونَ أَنَّهُم مُّلَـٰقُوا۟ رَبِّهِمْ وَأَنَّهُمْ إِلَيْهِ رَٰجِعُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَظُنُّونَ
यक़ीन रखते हैं
أَنَّهُم
बेशक वो
مُّلَـٰقُوا۟
मुलाक़ात करने वाले हैं
رَبِّهِمْ
अपने रब से
وَأَنَّهُمْ
और बेशक वो
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
رَٰجِعُونَ
लौटने वाले हैं
जो समझते है कि उन्हें अपने रब से मिलना हैं और उसी की ओर उन्हें पलटकर जाना है
तफ़्सीर:
इसका कारण यह है कि वही लोग हैं जो इस बात पर विश्वास रखते हैं कि वे अपने रब के पास आने वाले और क़ियामत के दिन उससे मिलने वाले हैं। और यह कि वे उसी के पास लौटने वाले हैं, ताकि वह उन्हें उनके कर्मों का प्रतिफल दे।
आयत 47
يَـٰبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ ٱذْكُرُوا۟ نِعْمَتِىَ ٱلَّتِىٓ أَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَأَنِّى فَضَّلْتُكُمْ عَلَى ٱلْعَـٰلَمِينَ
يَـٰبَنِىٓ
O Children
إِسْرَٰٓءِيلَ
ऐ बनी इस्राईल
ٱذْكُرُوا۟
याद करो
نِعْمَتِىَ
मेरी नेअमत
ٱلَّتِىٓ
वो जो
أَنْعَمْتُ
इनाम की मैंने
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَأَنِّى
और बेशक मैं
فَضَّلْتُكُمْ
फ़ज़ीलत दी मैंने तुम्हें
عَلَى
over
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों पर
ऐ इसराईल की सन्तान! याद करो मेरे उस अनुग्रह को जो मैंने तुमपर किया और इसे भी कि मैंने तुम्हें सारे संसार पर श्रेष्ठता प्रदान की थी;
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह के नबी याक़ूब के बेटो! मेरी प्रदान की हुई धार्मिक एवं सांसारिक नेमतों को याद करो और याद रखो कि निःसंदेह मैंने ही तुम्हें तुम्हारे समय के लोगों पर नुबुव्वत एवं बादशाहत द्वारा प्रधानता प्रदान की।
आयत 48
وَٱتَّقُوا۟ يَوْمًۭا لَّا تَجْزِى نَفْسٌ عَن نَّفْسٍۢ شَيْـًۭٔا وَلَا يُقْبَلُ مِنْهَا شَفَـٰعَةٌۭ وَلَا يُؤْخَذُ مِنْهَا عَدْلٌۭ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
يَوْمًۭا
उस दिन से
لَّا
(will) not
تَجْزِى
ना काम आएगा
نَفْسٌ
कोई नफ़्स
عَن
for
نَّفْسٍۢ
किसी नफ़्स के
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
وَلَا
और ना
يُقْبَلُ
क़ुबूल की जाएगी
مِنْهَا
उससे
شَفَـٰعَةٌۭ
कोई सिफ़ारिश
وَلَا
और ना
يُؤْخَذُ
लिया जाएगा
مِنْهَا
उससे
عَدْلٌۭ
कोई बदला
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يُنصَرُونَ
वो मदद किए जाऐंगे
और डरो उस दिन से जब न कोई किसी भी ओर से कुछ तावान भरेगा और न किसी की ओर से कोई सिफ़ारिश ही क़बूल की जाएगी और न किसी की ओर से कोई फ़िद्या (अर्थदंड) लिया जाएगा और न वे सहायता ही पा सकेंगे।
तफ़्सीर:
तथा आदेशों का पालन करके और निषेधों को छोड़कर अपने और क़ियामत के दिन की यातना के बीच, बचाव का साधन अपनाओ। उस दिन कोई किसी के कुछ काम न आएगा, न उस दिन अल्लाह की अनुमति के बिना नुकसान को दूर करने या लाभ प्राप्त करने की किसी की सिफ़ारिश क़बूल की जाएगी, और न ही कोई छुड़ौती स्वीकार की जाएगी; चाहे ज़मीन के बराबर सोना ही क्यों न हो, और न उस दिन उनका कोई मददगार होगा। जब कोई सिफ़ारिशी, या छुड़ौती या मददगार काम नहीं आएगा, तो फिर भागने का स्थान कहाँ है?!
आयत 49
وَإِذْ نَجَّيْنَـٰكُم مِّنْ ءَالِ فِرْعَوْنَ يَسُومُونَكُمْ سُوٓءَ ٱلْعَذَابِ يُذَبِّحُونَ أَبْنَآءَكُمْ وَيَسْتَحْيُونَ نِسَآءَكُمْ ۚ وَفِى ذَٰلِكُم بَلَآءٌۭ مِّن رَّبِّكُمْ عَظِيمٌۭ
وَإِذْ
और जब
نَجَّيْنَـٰكُم
निजात दी हमने तुम्हें
مِّنْ
from
ءَالِ
(the) people
فِرْعَوْنَ
आले फ़िरऔन से
يَسُومُونَكُمْ
वो तकलीफ़ देते थे तुम्हें
سُوٓءَ
बुरे
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब की
يُذَبِّحُونَ
वो ख़ूब ज़िबाह करते थे
أَبْنَآءَكُمْ
तुम्हारे बेटों को
وَيَسْتَحْيُونَ
और वो ज़िन्दा छोड़ देते थे
نِسَآءَكُمْ ۚ
तुम्हारी औरतों को
وَفِى
And in
ذَٰلِكُم
और इसमें
بَلَآءٌۭ
आज़माइश थी
مِّن
from
رَّبِّكُمْ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
عَظِيمٌۭ
बहुत बड़ी
और याद करो जब हमने तुम्हें फ़िरऔनियों से छुटकारा दिलाया जो तुम्हें अत्यन्त बुरी यातना देते थे, तुम्हारे बेटों को मार डालते थे और तुम्हारी स्त्रियों को जीवित रहने देते थे; और इसमं तुम्हारे रब की ओर से बड़ी परीक्षा थी
तफ़्सीर:
ऐ बनी इसराईल! उस समय को याद करो, जब हमने तुम्हें फ़िरऔन के लोगों से छुड़ाया, जो तुम्हें नाना प्रकार की यातनाएँ देते थे; वे तुम्हारे बेटों को बुरी तरह ज़बह कर देते थे, ताकि तुम्हारा कोई अस्तित्व न रहे और तुम्हारी बेटियों को जीवित छोड़ देते थे, ताकि वे उनकी सेवा करने वाली स्त्रियां हो जाएँ। इससे उनका मक़सद तुम्हारा घोर अपमान करना था। तुम्हें फ़िरऔन और उसके अनुयायियों के अत्याचार से बचाना तुम्हारे पालनहार की ओर से एक बड़ी परीक्षा है; ताकि तुम उसका शुक्रिया अदा करो।
आयत 50
وَإِذْ فَرَقْنَا بِكُمُ ٱلْبَحْرَ فَأَنجَيْنَـٰكُمْ وَأَغْرَقْنَآ ءَالَ فِرْعَوْنَ وَأَنتُمْ تَنظُرُونَ
وَإِذْ
और जब
فَرَقْنَا
फाड़ा हमने
بِكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْبَحْرَ
समुन्दर को
فَأَنجَيْنَـٰكُمْ
फिर निजात दी हमने तुम्हें
وَأَغْرَقْنَآ
और ग़र्क़ कर दिया हमने
ءَالَ
(the) people
فِرْعَوْنَ
आले फ़िरऔन को
وَأَنتُمْ
और तुम
تَنظُرُونَ
तुम देख रहे थे
याद करो जब हमने तुम्हें सागर में अलग-अलग चौड़े रास्ते से ले जाकर छुटकारा दिया और फ़िरऔनियों को तुम्हारी आँखों के सामने डूबो दिया
तफ़्सीर:
और तुम अपने ऊपर हमारी नेमतों में से इसे भी याद करो कि हमने तुम्हारे लिए सागर को फाड़ दिया और उसे तुम्हारे चलने के लिए एक सूखा रास्ता बना दिया। चुनाँचे हमने तुम्हें बचा लिया, और तुम्हारे दुश्मन फ़िरऔन और उसके अनुयायियों को तुम्हारी आँखों के सामने डुबो दिया, जबकि तुम उन्हें देख रहे थे।
आयत 51
وَإِذْ وَٰعَدْنَا مُوسَىٰٓ أَرْبَعِينَ لَيْلَةًۭ ثُمَّ ٱتَّخَذْتُمُ ٱلْعِجْلَ مِنۢ بَعْدِهِۦ وَأَنتُمْ ظَـٰلِمُونَ
وَإِذْ
और जब
وَٰعَدْنَا
वादा किया हमने
مُوسَىٰٓ
मूसा से
أَرْبَعِينَ
चालीस
لَيْلَةًۭ
रातों का
ثُمَّ
फिर
ٱتَّخَذْتُمُ
बना लिया तुमने
ٱلْعِجْلَ
बछड़े को (माबूद)
مِنۢ
from
بَعْدِهِۦ
बाद इसके
وَأَنتُمْ
और तुम
ظَـٰلِمُونَ
ज़ालिम थे
और याद करो जब हमने मूसा से चालीस रातों का वादा ठहराया तो उसके पीछे तुम बछड़े को अपना देवता बना बैठे, तुम अत्याचारी थे
तफ़्सीर:
इन नेमतों में से यह भी याद रखो कि हमने मूसा अलैहिस्सलाम से चालीस रातों के लिए वादा किया, ताकि इसमें, प्रकाश और मार्गदर्शन के तौर पर, तौरात को उतारा जाए। फिर तुमने यह किया कि उस अवधि के दौरान बछड़े की पूजा करने लगे। और ऐसा करके तुम अत्याचार करने वाले थे।
आयत 52
ثُمَّ عَفَوْنَا عَنكُم مِّنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
ثُمَّ
फिर
عَفَوْنَا
दरगुज़र किया हमने
عَنكُم
तुम से
مِّنۢ
from
بَعْدِ
बाद
ذَٰلِكَ
इसके
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَشْكُرُونَ
तुम शुक्र अदा करो
फिर इसके पश्चात भी हमने तुम्हें क्षमा किया, ताकि तुम कृतज्ञता दिखालाओ
तफ़्सीर:
फिर तुम्हारे तौबा (क्षमा याचना) कर लेने के बाद, हमने तुम्हें क्षमा कर दिया, चुनाँचे हमने तुम्हारी पकड़ नहीं की, ताकि तुम अल्लाह की अच्छी इबादत और आज्ञापालन करके उसका शुक्रिया अदा करो।
आयत 53
وَإِذْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْفُرْقَانَ لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ
وَإِذْ
और जब
ءَاتَيْنَا
दी हमने
مُوسَى
मूसा को
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
وَٱلْفُرْقَانَ
और फ़ुरक़ान
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَهْتَدُونَ
तुम हिदायत पा जाओ
और याद करो जब मूसा को हमने किताब और कसौटी प्रदान की, ताकि तुम मार्ग पा सको
तफ़्सीर:
इन नेमतों में से इसे भी याद करो कि हमने मूसा अलैहिस्सलाम को सत्य तथा असत्य के बीच अंतर करने वाली तथा हिदायत एवं गुमराही के बीच फ़र्क़ करने वाली पुस्तक तौरात प्रदान की, ताकि तुम उसके द्वारा सत्य का मार्ग पा सको।
आयत 54
وَإِذْ قَالَ مُوسَىٰ لِقَوْمِهِۦ يَـٰقَوْمِ إِنَّكُمْ ظَلَمْتُمْ أَنفُسَكُم بِٱتِّخَاذِكُمُ ٱلْعِجْلَ فَتُوبُوٓا۟ إِلَىٰ بَارِئِكُمْ فَٱقْتُلُوٓا۟ أَنفُسَكُمْ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌۭ لَّكُمْ عِندَ بَارِئِكُمْ فَتَابَ عَلَيْكُمْ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ
وَإِذْ
और जब
قَالَ
कहा
مُوسَىٰ
मूसा ने
لِقَوْمِهِۦ
अपनी क़ौम से
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
ظَلَمْتُمْ
ज़ुल्म किया तुमने
أَنفُسَكُم
अपने नफ़्सों पर
بِٱتِّخَاذِكُمُ
बवजह बनाने के तुम्हारे
ٱلْعِجْلَ
बछड़े को (माबूद)
فَتُوبُوٓا۟
पस तौबा करो
إِلَىٰ
तरफ़
بَارِئِكُمْ
अपने पैदा करने वाले के
فَٱقْتُلُوٓا۟
तो क़त्ल करो
أَنفُسَكُمْ
अपने नफ़्सों को
ذَٰلِكُمْ
ये
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
عِندَ
नज़दीक
بَارِئِكُمْ
तुम्हारे पैदा करने वाले के
فَتَابَ
फिर वो मेहरबान हुआ
عَلَيْكُمْ ۚ
तुम पर
إِنَّهُۥ
बेशक वो
هُوَ
वो ही है
ٱلتَّوَّابُ
बहुत तौबा क़ुबूल करने वाला
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला
और जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा, "ऐ मेरी कौम के लोगो! बछड़े को देवता बनाकर तुमने अपने ऊपर ज़ुल्म किया है, तो तुम अपने पैदा करनेवाले की ओर पलटो, अतः अपने लोगों को स्वयं क़त्ल करो। यही तुम्हारे पैदा करनेवाले की स्पष्ट में तुम्हारे लिए अच्छा है, फिर उसने तुम्हारी तौबा क़बूल कर ली। निस्संदेह वह बड़ी तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है।"
तफ़्सीर:
इन नेमतों में से यह भी याद रखो कि अल्लाह ने तुम्हें बछड़े की पूजा से तौबा करने का सामर्थ्य प्रदान किया। जब मूसा अलैहिस्सलाम ने तुमसे कहा : तुमने बछड़े को उसकी इबादत करने के लिए पूज्य बनाकर अपने आप पर अत्याचार किया है। अतः पश्चाताप करो और अपने पैदा करने वाले की ओर लौट जाओ। इस प्रकार कि तुम एक-दूसरे को क़त्ल करो। इस तरह से पश्चाताप करना, तुम्हारे लिए कुफ़्र में बने रहने से बेहतर है जो कि आग में अमरता की ओर ले जाता है। चुनाँचे अल्लाह की तौफ़ीक़ और मदद से तुमने ऐसा कर लिया, तो उसने तुम्हारी तौबा क़बूल कर ली। क्योंकि वह बहुत ज़्यादा तौबा क़बूल करने वाला, अपने बंदों पर दया करने वाला है।
आयत 55
وَإِذْ قُلْتُمْ يَـٰمُوسَىٰ لَن نُّؤْمِنَ لَكَ حَتَّىٰ نَرَى ٱللَّهَ جَهْرَةًۭ فَأَخَذَتْكُمُ ٱلصَّـٰعِقَةُ وَأَنتُمْ تَنظُرُونَ
وَإِذْ
और जब
قُلْتُمْ
कहा तुमने
يَـٰمُوسَىٰ
ऐ मूसा
لَن
हरगिज़ नहीं
نُّؤْمِنَ
हम ईमान लाऐंगे
لَكَ
तुझ पर
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
نَرَى
हम देख लें
ٱللَّهَ
अल्लाह को
جَهْرَةًۭ
रू-ब-रू/सामने
فَأَخَذَتْكُمُ
फिर पकड़ लिया तुम्हें
ٱلصَّـٰعِقَةُ
बिजली की कड़क ने
وَأَنتُمْ
और तुम
تَنظُرُونَ
तुम देख रहे थे
और याद करो जब तुमने कहा था, "ऐ मूसा, हम तुमपर ईमान नहीं लाएँगे जब तक अल्लाह को खुल्लम-खुल्ला न देख लें।" फिर एक कड़क ने तुम्हें आ दबोचा, तुम देखते रहे
तफ़्सीर:
तथा उस समय को याद करो, जब तुम्हारे पूर्वजों ने मूसा अलैहिस्सलाम को साहसपूर्वक संबोधित करते हुए कहा था : हम तुमपर उस समय तक ईमान नहीं ला सकते, जब तक हम अल्लाह को अपनी आँखों से इस तरह न देख लें कि हमारे बीच कोई आड़ न हो। इसपर जलाने वाली आग ने तुम्हें पकड़ लिया, और तुम्हें मार डाला, जबकि तुम एक-दूसरे को देख रहे थे।
आयत 56
ثُمَّ بَعَثْنَـٰكُم مِّنۢ بَعْدِ مَوْتِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
ثُمَّ
फिर
بَعَثْنَـٰكُم
उठा लिया हमने तुम्हें
مِّنۢ
from
بَعْدِ
बाद
مَوْتِكُمْ
तुम्हारी मौत के
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَشْكُرُونَ
तुम शुक्र अदा करो
फिर तुम्हारे निर्जीव हो जाने के पश्चात हमने तुम्हें जिला उठाया, ताकि तुम कृतज्ञता दिखलाओ
तफ़्सीर:
फिर हमने तुम्हारे मरने के पश्चात तुम्हें पुनर्जीवित किया, ताकि तुम अल्लाह का अपने ऊपर इस उपकार पर शुक्रिया अदा करो।
आयत 57
وَظَلَّلْنَا عَلَيْكُمُ ٱلْغَمَامَ وَأَنزَلْنَا عَلَيْكُمُ ٱلْمَنَّ وَٱلسَّلْوَىٰ ۖ كُلُوا۟ مِن طَيِّبَـٰتِ مَا رَزَقْنَـٰكُمْ ۖ وَمَا ظَلَمُونَا وَلَـٰكِن كَانُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ
وَظَلَّلْنَا
और साया किया हमने
عَلَيْكُمُ
तुम पर
ٱلْغَمَامَ
बादलों का
وَأَنزَلْنَا
और उतारा हमने
عَلَيْكُمُ
तुम पर
ٱلْمَنَّ
मन्न
وَٱلسَّلْوَىٰ ۖ
और सलवा
كُلُوا۟
खाओ
مِن
from
طَيِّبَـٰتِ
इन पाकीज़ा चीज़ों से
مَا
जो
رَزَقْنَـٰكُمْ ۖ
रिज़्क़ दिया हमने तुम्हें
وَمَا
और नहीं
ظَلَمُونَا
उन्होंने ज़ुल्म किया हम पर
وَلَـٰكِن
और लेकिन
كَانُوٓا۟
थे वो
أَنفُسَهُمْ
अपने नफ़्सों ही पर
يَظْلِمُونَ
वो ज़ुल्म करते
और हमने तुमपर बादलों की छाया की और तुमपर 'मन्न' और 'सलबा' उतारा - "खाओ, जो अच्छी पाक चीजें हमने तुम्हें प्रदान की है।" उन्होंने हमारा तो कुछ भी नहीं बिगाड़ा, बल्कि वे अपने ही ऊपर अत्याचार करते रहे
तफ़्सीर:
तुमपर हमारी एक कृपा यह है कि जब तुम धरती में भटक रहे थे, तो हमने तुम्हें सूर्य की गर्मी से छाया देने के लिए बादलों को भेजा। इसी तरह हमने अपनी नेमतों में से तुमपर शहद की तरह एक मीठा पेय, तथा बटेर के सदृश अच्छे माँस वाला एक छोटा पक्षी उतारा, और हमने तुमसे कहा : उन अच्छी चीजों में से खाओ जो हमने तुम्हें प्रदान की हैं। उन्होंने इन नेमतों का इनकार और उनकी नाशुक्री करके हमारा कुछ नुक़सान नहीं किया, बल्कि उन्होंने अपने हिस्से का सवाब कम करके और अपने आपको दंड से दो चार करके ख़ुद पर अत्याचार किया।
आयत 58
وَإِذْ قُلْنَا ٱدْخُلُوا۟ هَـٰذِهِ ٱلْقَرْيَةَ فَكُلُوا۟ مِنْهَا حَيْثُ شِئْتُمْ رَغَدًۭا وَٱدْخُلُوا۟ ٱلْبَابَ سُجَّدًۭا وَقُولُوا۟ حِطَّةٌۭ نَّغْفِرْ لَكُمْ خَطَـٰيَـٰكُمْ ۚ وَسَنَزِيدُ ٱلْمُحْسِنِينَ
وَإِذْ
और जब
قُلْنَا
कहा हमने
ٱدْخُلُوا۟
दाख़िल हो जाओ
هَـٰذِهِ
इस
ٱلْقَرْيَةَ
बस्ती में
فَكُلُوا۟
फिर खाओ
مِنْهَا
उसमें से
حَيْثُ
जहाँ से
شِئْتُمْ
चाहो तुम
رَغَدًۭا
फ़राग़त से
وَٱدْخُلُوا۟
और दाख़िल हो जाओ
ٱلْبَابَ
दरवाज़े से
سُجَّدًۭا
सजदा करते हुए
وَقُولُوا۟
और कहो
حِطَّةٌۭ
हित्तातुन (बख़्श दे)
نَّغْفِرْ
हम बख़्श देंगे
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
خَطَـٰيَـٰكُمْ ۚ
ख़ताऐं तुम्हारी
وَسَنَزِيدُ
और अनक़रीब हम ज़्यादा देंगे
ٱلْمُحْسِنِينَ
एहसान करने वालों को
और जब हमने कहा था, "इस बस्ती में प्रवेश करो फिर उसमें से जहाँ से चाहो जी भर खाओ, और बस्ती के द्वार में सजदागुज़ार बनकर प्रवेश करो और कहो, "छूट हैं।" हम तुम्हारी खताओं को क्षमा कर देंगे और अच्छे से अच्छा काम करनेवालों पर हम और अधिक अनुग्रह करेंगे।"
तफ़्सीर:
अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों में से उस समय को याद करो जब हमने तुमसे कहा : बैतुल-मक़्दिस में प्रवेश कर जाओ और उसमें मौजूद अच्छी चीज़ों में से जिस स्थान से भी चाहो आनंदमय, विशाल भोजन खाओ। तथा जब तुम प्रवेश करो, तो अल्लाह के आगे सिर झुकाए हुए हो और अल्लाह से यह दुआ करते रहो : ऐ हमारे पालनहार! हमारे गुनाहों को मिटा दे; हम तुम्हारी दुआ क़बूल कर लेंगे और हम उन लोगों के सवाब को बढ़ा देंगे, जिन्होंने अच्छे काम किए।
आयत 59
فَبَدَّلَ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ قَوْلًا غَيْرَ ٱلَّذِى قِيلَ لَهُمْ فَأَنزَلْنَا عَلَى ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ رِجْزًۭا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ بِمَا كَانُوا۟ يَفْسُقُونَ
فَبَدَّلَ
तो बदल डाला
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
قَوْلًا
बात को
غَيْرَ
सिवाय
ٱلَّذِى
उसके जो
قِيلَ
कही गई थी
لَهُمْ
उनसे
فَأَنزَلْنَا
तो उतारा हमने
عَلَى
upon
ٱلَّذِينَ
उन पर जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया था
رِجْزًۭا
अज़ाब
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَفْسُقُونَ
वो नाफ़रमानी करते
फिर जो बात उनसे कहीं गई थी ज़ालिमों ने उसे दूसरी बात से बदल दिया। अन्ततः ज़ालिमों पर हमने, जो अवज्ञा वे कर रहे थे उसके कारण, आकाश से यातना उतारी
तफ़्सीर:
लेकिन उनमें से अत्याचारियों ने कार्यों को बदल दिया, और शब्दों को विकृत कर दिया। चुनाँचे वे अपने नितंबों पर घिसटते हुए दाख़िल हुए और अल्लाह के आदेश का मज़ाक़ उड़ाते हुए उन्होंने कहा : 'बाली में दाना'। जिसके परिणामस्वरूप अल्लाह ने उनमें से अत्याचार करने वालों पर, उनके शरीयत की सीमा से बाहर निकलने और आदेश का उल्लंघन करने के कारण आकाश से अज़ाब उतार दिया।
आयत 60
۞ وَإِذِ ٱسْتَسْقَىٰ مُوسَىٰ لِقَوْمِهِۦ فَقُلْنَا ٱضْرِب بِّعَصَاكَ ٱلْحَجَرَ ۖ فَٱنفَجَرَتْ مِنْهُ ٱثْنَتَا عَشْرَةَ عَيْنًۭا ۖ قَدْ عَلِمَ كُلُّ أُنَاسٍۢ مَّشْرَبَهُمْ ۖ كُلُوا۟ وَٱشْرَبُوا۟ مِن رِّزْقِ ٱللَّهِ وَلَا تَعْثَوْا۟ فِى ٱلْأَرْضِ مُفْسِدِينَ
۞ وَإِذِ
और जब
ٱسْتَسْقَىٰ
पानी माँगा
مُوسَىٰ
मूसा ने
لِقَوْمِهِۦ
अपनी क़ौम के लिए
فَقُلْنَا
तो कहा हमने
ٱضْرِب
मारो
بِّعَصَاكَ
अपने असा को
ٱلْحَجَرَ ۖ
इस पत्थर पर
فَٱنفَجَرَتْ
तो फूट पड़े
مِنْهُ
उससे
ٱثْنَتَا
(of)
عَشْرَةَ
बारह
عَيْنًۭا ۖ
चश्मे
قَدْ
तहक़ीक़
عَلِمَ
जान लिया
كُلُّ
सब
أُنَاسٍۢ
लोगों ने
مَّشْرَبَهُمْ ۖ
घाट अपना
كُلُوا۟
खाओ
وَٱشْرَبُوا۟
और पियो
مِن
from
رِّزْقِ
रिज़्क़ से
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَلَا
और ना
تَعْثَوْا۟
तुम फ़साद करो
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
مُفْسِدِينَ
मुफ़सिद बन कर
और याद करो जब मूसा ने अपनी क़ौम के लिए पानी की प्रार्थना को तो हमने कहा, "चट्टान पर अपनी लाठी मारो," तो उससे बारह स्रोत फूट निकले और हर गिरोह ने अपना-अपना घाट जान लिया - "खाओ और पियो अल्लाह का दिया और धरती में बिगाड़ फैलाते न फिरो।"
तफ़्सीर:
तथा अपने ऊपर अल्लाह की उस नेमत को भी याद करो जब तुम चटियल मैदान में भटक रहे थे और तुम बहुत प्यासे थे, तो मूसा अलैहिस्सलाम ने अपने रब से प्रार्थना की और उससे तुम्हारे लिए पानी माँगा। इसलिए हमने उन्हें अपनी लाठी पत्थर पर मारने का आदेश दिया। जब उन्होंने उसको मारा, तो उससे तुम्हारे गोत्रों की संख्या के अनुसार बारह सोते फूट पड़े और उनमें से पानी निकल आया। हमने हर गोत्र के लिए उसके पीने का विशिष्ट स्थान स्पष्ट कर दिया, ताकि उनके बीच कोई विवाद न हो, और हमने तुमसे कहा : अल्लाह की उस रोज़ी से खाओ और पियो, जो उसने तुम्हें बिना किसी परिश्रम या कार्य के प्रदान की है और धरती पर बिगाड़ फैलाते न फिरो।
आयत 61
وَإِذْ قُلْتُمْ يَـٰمُوسَىٰ لَن نَّصْبِرَ عَلَىٰ طَعَامٍۢ وَٰحِدٍۢ فَٱدْعُ لَنَا رَبَّكَ يُخْرِجْ لَنَا مِمَّا تُنۢبِتُ ٱلْأَرْضُ مِنۢ بَقْلِهَا وَقِثَّآئِهَا وَفُومِهَا وَعَدَسِهَا وَبَصَلِهَا ۖ قَالَ أَتَسْتَبْدِلُونَ ٱلَّذِى هُوَ أَدْنَىٰ بِٱلَّذِى هُوَ خَيْرٌ ۚ ٱهْبِطُوا۟ مِصْرًۭا فَإِنَّ لَكُم مَّا سَأَلْتُمْ ۗ وَضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ ٱلذِّلَّةُ وَٱلْمَسْكَنَةُ وَبَآءُو بِغَضَبٍۢ مِّنَ ٱللَّهِ ۗ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَانُوا۟ يَكْفُرُونَ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ وَيَقْتُلُونَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ بِغَيْرِ ٱلْحَقِّ ۗ ذَٰلِكَ بِمَا عَصَوا۟ وَّكَانُوا۟ يَعْتَدُونَ
وَإِذْ
और जब
قُلْتُمْ
कहा तुमने
يَـٰمُوسَىٰ
ऐ मूसा
لَن
हरगिज़ नहीं
نَّصْبِرَ
हम सब्र करेंगे
عَلَىٰ
[on]
طَعَامٍۢ
खाने पर
وَٰحِدٍۢ
एक ही
فَٱدْعُ
पस दुआ करो
لَنَا
हमारे लिए
رَبَّكَ
अपने रब से
يُخْرِجْ
वो निकाले
لَنَا
हमारे लिए
مِمَّا
उसमें से जो
تُنۢبِتُ
उगाती है
ٱلْأَرْضُ
ज़मीन
مِنۢ
of
بَقْلِهَا
सब्ज़ी अपनी
وَقِثَّآئِهَا
और ककड़ी अपनी
وَفُومِهَا
और गन्दुम अपनी
وَعَدَسِهَا
और मसूर अपने
وَبَصَلِهَا ۖ
और प्याज़ अपने
قَالَ
कहा
أَتَسْتَبْدِلُونَ
क्या तुम बदलना चाहते हो
ٱلَّذِى
उसे जो
هُوَ
वो
أَدْنَىٰ
कमतर है
بِٱلَّذِى
बदले उसके जो
هُوَ
वो
خَيْرٌ ۚ
बेहतर है
ٱهْبِطُوا۟
उतर जाओ
مِصْرًۭا
शहर में
فَإِنَّ
तो बेशक
لَكُم
तुम्हारे लिए है
مَّا
जो
سَأَلْتُمْ ۗ
माँगा तुमने
وَضُرِبَتْ
और मार दी गई
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلذِّلَّةُ
ज़िल्लत
وَٱلْمَسْكَنَةُ
और मोहताजी
وَبَآءُو
और वो पलटे
بِغَضَبٍۢ
साथ ग़ज़ब के
مِّنَ
of
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह की तरफ़ से
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّهُمْ
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَكْفُرُونَ
वो कुफ़्र करते
بِـَٔايَـٰتِ
साथ आयात के
ٱللَّهِ
अल्लाह की
وَيَقْتُلُونَ
और वो क़त्ल करते थे
ٱلنَّبِيِّـۧنَ
नबियों को
بِغَيْرِ
बग़ैर
ٱلْحَقِّ ۗ
हक़ के
ذَٰلِكَ
ये
بِمَا
बवजह उसके जो
عَصَوا۟
उन्होंने नाफ़रमानी की
وَّكَانُوا۟
और थे वो
يَعْتَدُونَ
वो हद से निकल जाते
और याद करो जब तुमने कहा था, "ऐ मूसा, हम एक ही प्रकार के खाने पर कदापि संतोष नहीं कर सकते, अतः हमारे लिए अपने रब से प्रार्थना करो कि हमारे वास्ते धरती की उपज से साग-पात और ककड़ियाँ और लहसुन और मसूर और प्याज़ निकाले।" और मूसा ने कहा, "क्या तुम जो घटिया चीज़ है उसको उससे बदलकर लेना चाहते हो जो उत्तम है? किसी नगर में उतरो, फिर जो कुछ तुमने माँगा हैं, तुम्हें मिल जाएगा" - और उनपर अपमान और हीन दशा थोप दी गई, और अल्लाह के प्रकोप के भागी हुए। यह इसलिए कि वे अल्लाह की आयतों का इनकार करते रहे और नबियों की अकारण हत्या करते थे। यह इसलिए कि उन्होंने अवज्ञा की और वे सीमा का उल्लंघन करते रहे
तफ़्सीर:
उस समय को याद करो, जब तुमने अपने रब की नेमत की नाशुक्री की। चुनाँचे मन्न और सलवा के रूप में अल्लाह की उतारी हुई रोज़ी को खाने से ऊब गए और कहने लगे : हम एक ही प्रकार के खाने पर संतोष नहीं कर सकते, जो नहीं बदलता है। फिर तुमने मूसा अलैहिस्सलाम से मुतालबा किया कि वह अल्लाह से दुआ करें कि वह तुम्हारे लिए धरती की उपज में से, जैसे उसकी फलियों एवं साग-सब्ज़ियों, उसकी ककड़ी, अनाज, मसूर और प्याज़ में से कोई खाना निकाले। इसपर मूसा अलैहिस्सलाम ने (तुम्हारे अनुरोध की निंदा करते हुए : क्या तुम मन्न और सलवा जैसे बेहतरीन और अधिक उदार भोजन के बदले एक कमतर और तुच्छ चीज़ को अपनाते हो, जबकि वह तुम्हारे पास बिना परेशानी और थकान के आता था?) फरमाया : तुम यहाँ की धरती से निकलकर किसी भी बस्ती में जा उतरो। तुम्हें वहाँ के खेतों और बाज़ारों में वह सब मिल जाएगा, जो तुमने माँगा है। उनके अपनी इच्छाओं का पालन करने और अल्लाह ने उनके लिए जो चुना था, उससे बार-बार मुँह फेरने के कारण; उन्हें अपमान, दरिद्रता और विपत्ति ने घेर लिया। साथ ही वे अल्लाह की ओर से भारी प्रकोप के साथ लौटे; क्योंकि उन्होंने उसके दीन से मुँह फेरा, उसकी आयतों का इनकार किया और उसके नबियों की अन्यायपूर्ण और आक्रामक तरीक़े से हत्या की; यह सब इस कारण हुआ कि उन्होंने अल्लाह की अवज्ञा की और वे उसकी सीमाओं को पार कर रहे थे।
आयत 62
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَٱلَّذِينَ هَادُوا۟ وَٱلنَّصَـٰرَىٰ وَٱلصَّـٰبِـِٔينَ مَنْ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ وَعَمِلَ صَـٰلِحًۭا فَلَهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
هَادُوا۟
यहूदी बन गए
وَٱلنَّصَـٰرَىٰ
और नस्रानी
وَٱلصَّـٰبِـِٔينَ
और साबी
مَنْ
जो कोई
ءَامَنَ
ईमान लाया
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَٱلْيَوْمِ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرِ
और आख़िरी दिन पर
وَعَمِلَ
और उसने अमल किया
صَـٰلِحًۭا
नेक
فَلَهُمْ
तो उनके लिए
أَجْرُهُمْ
अजर है उनका
عِندَ
पास
رَبِّهِمْ
उनके रब के
وَلَا
और ना
خَوْفٌ
कोई ख़ौफ़ होगा
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يَحْزَنُونَ
वो ग़मगीन होंगे
निस्संदेह, ईमानवाले और जो यहूदी हुए और ईसाई और साबिई, जो भी अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान लाया और अच्छा कर्म किया तो ऐसे लोगों का उनके अपने रब के पास (अच्छा) बदला है, उनको न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे -
तफ़्सीर:
इस उम्मत के जो लोग ईमान लाए, तथा इसी तरह मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नबी बनने से पहले पिछले समुदायों, जैसे यहूदियों, ईसाइयों और साबियों - ये किसी नबी को मानने वालों का एक समूह था - में से जो ईमान लाए, इनमें से जो सही मायने में अल्लाह तथा अंतिम दिन पर ईमान लाए; तो उनका सवाब उनके रब के पास है। वे आख़िरत में जिस चीज़ का सामना करने वाले हैं उसके बारे में उन्हें कोई भय नहीं है, तथा दुनिया में से जो चीज़ उनसे छूट गई है, उसके लिए उन्हें कोई मलाल नहीं होगा।
आयत 63
وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَـٰقَكُمْ وَرَفَعْنَا فَوْقَكُمُ ٱلطُّورَ خُذُوا۟ مَآ ءَاتَيْنَـٰكُم بِقُوَّةٍۢ وَٱذْكُرُوا۟ مَا فِيهِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ
وَإِذْ
और जब
أَخَذْنَا
लिया हमने
مِيثَـٰقَكُمْ
पुख़्ता अहद तुम से
وَرَفَعْنَا
और उठाया हमने
فَوْقَكُمُ
ऊपर तुम्हारे
ٱلطُّورَ
तूर को
خُذُوا۟
पकड़ो
مَآ
जो
ءَاتَيْنَـٰكُم
दिया हमने तुम्हें
بِقُوَّةٍۢ
साथ क़ुव्वत के
وَٱذْكُرُوا۟
और याद करो
مَا
जो
فِيهِ
उसमें है
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَتَّقُونَ
तुम बच जाओ
और याद करो जब हमने इस हाल में कि तूर पर्वत को तुम्हारे ऊपर ऊँचा कर रखा था, तुमसे दृढ़ वचन लिया था, "जो चीज़ हमने तुम्हें दी हैं उसे मजबूती के साथ पकड़ो और जो कुछ उसमें हैं उसे याद रखो ताकि तुम बच सको।"
तफ़्सीर:
अल्लाह तथा उसके रसूलों पर ईमान लाने के उस पक्के वचन को याद करो, जो हमने तुमसे लिया था, और हमने तुम्हें डराने के लिए तथा वचन पर अमल न करने से सावधान करते हुए पहाड़ को तुम्हारे ऊपर उठा लिया, तुम्हें यह आदेश देते हुए कि हमारी उतारी हुई पुस्तक तौरात को पूरी शक्ति के साथ, बिना किसी लापरवाही और आलस्य के थाम लो, तथा जो कुछ उसमें है उसे याद कर लो और उसपर चिंतन-मनन करो। ताकि ऐसा करके, तुम अल्लाह के अज़ाब से बच जाओ।
आयत 64
ثُمَّ تَوَلَّيْتُم مِّنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ ۖ فَلَوْلَا فَضْلُ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُۥ لَكُنتُم مِّنَ ٱلْخَـٰسِرِينَ
ثُمَّ
फिर
تَوَلَّيْتُم
फिर गए तुम
مِّنۢ
from
بَعْدِ
बाद
ذَٰلِكَ ۖ
उसके
فَلَوْلَا
पस अगर ना होता
فَضْلُ
फ़ज़ल
ٱللَّهِ
अल्लाह का
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَرَحْمَتُهُۥ
और रहमत उसकी
لَكُنتُم
अलबत्ता होते तुम
مِّنَ
of
ٱلْخَـٰسِرِينَ
ख़सारा पाने वालों में से
फिर इसके पश्चात भी तुम फिर गए, तो यदि अल्लाह की कृपा और उसकी दयालुता तुम पर न होती, तो तुम घाटे में पड़ गए होते
तफ़्सीर:
लेकिन अपने ऊपर दृढ़ वचन लिए जाने के बाद भी तुमने मुँह फेरा और अवज्ञा की। ऐसे में अगर अल्लाह ने अपनी कृपा से तुम्हें माफ़ न किया होता और अपनी दया से तुम्हारी तौबा क़बूल न करता, तो तुम इस विमुखता और अवज्ञा के कारण नुक़सान उठाने वालों में से होते।
आयत 65
وَلَقَدْ عَلِمْتُمُ ٱلَّذِينَ ٱعْتَدَوْا۟ مِنكُمْ فِى ٱلسَّبْتِ فَقُلْنَا لَهُمْ كُونُوا۟ قِرَدَةً خَـٰسِـِٔينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
عَلِمْتُمُ
जान लिया तुमने
ٱلَّذِينَ
उनको जो
ٱعْتَدَوْا۟
हद से निकल गए
مِنكُمْ
तुम में से
فِى
in
ٱلسَّبْتِ
सब्त (हफ़्ते के दिन) में
فَقُلْنَا
तो कहा हमने
لَهُمْ
उनसे
كُونُوا۟
हो जाओ
قِرَدَةً
बन्दर
خَـٰسِـِٔينَ
ज़लील व ख़्वार
और तुम उन लोगों के विषय में तो जानते ही हो जिन्होंने तुममें से 'सब्त' के दिन के मामले में मर्यादा का उल्लंघन किया था, तो हमने उनसे कह दिया, "बन्दर हो जाओ, धिक्कारे और फिटकारे हुए!"
तफ़्सीर:
तुमने अपने उन पूर्वजों का समाचार संदेह रहित स्पष्ट रूप से जान लिया है, जिन्होंने शनिवार के दिन शिकार करके ज़्यादती की, जिसमें उनके लिए शिकार करना मना था। इसलिए उन्होंने इसके लिए यह चाल चली कि शनिवार से पहले जाल लगा दिया और रविवार को उसे निकाल लिया। चुनाँचे अल्लाह ने इन चालबाज़ों को उनकी चालबाज़ी की सज़ा के रूप में बहिष्कृत बंदर बना दिया।
आयत 66
فَجَعَلْنَـٰهَا نَكَـٰلًۭا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهَا وَمَا خَلْفَهَا وَمَوْعِظَةًۭ لِّلْمُتَّقِينَ
فَجَعَلْنَـٰهَا
तो बना दिया हमने इस (वाक़्ये) को
نَكَـٰلًۭا
इबरत
لِّمَا
उनके लिए जो
بَيْنَ
(in) front
يَدَيْهَا
सामने थे उनके
وَمَا
और जो
خَلْفَهَا
पीछे (बाद) होंगे उनके
وَمَوْعِظَةًۭ
और नसीहत
لِّلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के लिए
फिर हमने इसे सामनेवालों और बाद के लोगों के लिए शिक्षा-सामग्री और डर रखनेवालों के लिए नसीहत बनाकर छोड़ा
तफ़्सीर:
तो हमने इस आक्रामक बस्ती को इसके आस-पास की बस्तियों के लिए एक इबरत तथा इसके बाद आने वाले के लिए एक इबरत बना दिया। ताकि कोई उस जैसा अमल करके उसी तरह के अज़ाब का हक़दार न बने। तथा हमने उसे उन डरने वालों के लिए अनुस्मारक बना दिया, जो अल्लाह की सज़ा और उसकी सीमाओं का उल्लंघन करने वालों से उसके बदला लेने से डरते हैं।
आयत 67
وَإِذْ قَالَ مُوسَىٰ لِقَوْمِهِۦٓ إِنَّ ٱللَّهَ يَأْمُرُكُمْ أَن تَذْبَحُوا۟ بَقَرَةًۭ ۖ قَالُوٓا۟ أَتَتَّخِذُنَا هُزُوًۭا ۖ قَالَ أَعُوذُ بِٱللَّهِ أَنْ أَكُونَ مِنَ ٱلْجَـٰهِلِينَ
وَإِذْ
और जब
قَالَ
कहा
مُوسَىٰ
मूसा ने
لِقَوْمِهِۦٓ
अपनी क़ौम से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَأْمُرُكُمْ
हुक्म देता है तुम्हें
أَن
कि
تَذْبَحُوا۟
तुम ज़िबाह करो
بَقَرَةًۭ ۖ
एक गाय
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَتَتَّخِذُنَا
क्या तुम बनाते हो हमें
هُزُوًۭا ۖ
मज़ाक़
قَالَ
उसने कहा
أَعُوذُ
मैं पनाह लेता हूँ
بِٱللَّهِ
अल्लाह की
أَنْ
कि
أَكُونَ
मैं हो जाऊँ
مِنَ
among
ٱلْجَـٰهِلِينَ
जाहिलों में से
और याद करो जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा, "निश्चय ही अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि एक गाय जब्ह करो।" कहने लगे, "क्या तुम हमसे परिहास करते हो?" उसने कहा, "मैं इससे अल्लाह की पनाह माँगता हूँ कि जाहिल बनूँ।"
तफ़्सीर:
तथा अपने पूर्वजों के समाचार में से उस संवाद को याद करो, जो उनके और मूसा अलैहिस्सलाम के बीच हुआ। जब मूसा अलैहिस्सलाम ने उन्हें सूचित किया कि अल्लाह ने उन्हें एक गाय ज़बह करने का आदेश दिया है। तो उन्होंने अल्लाह के आदेश का पालन करने में जल्दी करने के बजाय हठपूर्वक कहा : क्या तुम हमारा मज़ाक़ उड़ा रहे हो?! मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा : मैं उन लोगों में शामिल होने से अल्लाह की शरण लेता हूँ, जो अल्लाह पर झूठ बोलते हैं और लोगों का मज़ाक़ उड़ाते हैं।
आयत 68
قَالُوا۟ ٱدْعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّن لَّنَا مَا هِىَ ۚ قَالَ إِنَّهُۥ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٌۭ لَّا فَارِضٌۭ وَلَا بِكْرٌ عَوَانٌۢ بَيْنَ ذَٰلِكَ ۖ فَٱفْعَلُوا۟ مَا تُؤْمَرُونَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
ٱدْعُ
दुआ करो
لَنَا
हमारे लिए
رَبَّكَ
अपने रब से
يُبَيِّن
वो वाज़ेह कर दे
لَّنَا
हमारे लिए
مَا
कैसी हो
هِىَ ۚ
वो
قَالَ
कहा
إِنَّهُۥ
बेशक वो
يَقُولُ
वो फ़रमाता है
إِنَّهَا
बेशक वो
بَقَرَةٌۭ
गाय
لَّا
not
فَارِضٌۭ
ना बूढ़ी हो
وَلَا
और ना
بِكْرٌ
छोटी
عَوَانٌۢ
औसत उम्र की हो
بَيْنَ
दर्मियान
ذَٰلِكَ ۖ
इसके
فَٱفْعَلُوا۟
तो करो
مَا
जो
تُؤْمَرُونَ
तुम हुक्म दिए जाते हो
बोले, "हमारे लिए अपने रब से निवेदन करो कि वह हम पर स्पष्टा कर दे कि वह गाय कौन-सी है?" उसने कहा, "वह कहता है कि वह ऐसी गाय है जो न बूढ़ी है, न बछिया, इनके बीच की रास है; तो जो तुम्हें हुक्म दिया जा रहा है, करो।"
तफ़्सीर:
उन्होंने मूसा अलैहिस्सलाम से कहा : अपने रब से प्रार्थना करो कि वह हमें उस गाय का विवरण समझाए जिसे उसने हमें ज़बह करने का आदेश दिया है। उन्होंने उनसे कहा : अल्लाह कहता है : वह एक ऐसी गाय है जो न तो बूढ़ी है और न ही बछड़ी, बल्कि वह दोनों के बीच मध्यम आयु की है। अत: अपने रब की आज्ञा का पालन करने में जल्दी करो।
आयत 69
قَالُوا۟ ٱدْعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّن لَّنَا مَا لَوْنُهَا ۚ قَالَ إِنَّهُۥ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٌۭ صَفْرَآءُ فَاقِعٌۭ لَّوْنُهَا تَسُرُّ ٱلنَّـٰظِرِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
ٱدْعُ
दुआ करो
لَنَا
हमारे लिए
رَبَّكَ
अपने रब से
يُبَيِّن
वो वाज़ेह कर दे
لَّنَا
हमारे लिए
مَا
कैसा हो
لَوْنُهَا ۚ
रंग उसका
قَالَ
कहा
إِنَّهُۥ
बेशक वो
يَقُولُ
वो फ़रमाता है
إِنَّهَا
बेशक वो
بَقَرَةٌۭ
गाय हो
صَفْرَآءُ
ज़र्द रंग की
فَاقِعٌۭ
ख़ूब गहरा हो
لَّوْنُهَا
रंग उसका
تَسُرُّ
ख़ुश करती हो
ٱلنَّـٰظِرِينَ
देखने वालों को
कहने लगे, "हमारे लिए अपने रब से निवेदन करो कि वह हमें बता दे कि उसका रंग कैसा है?" कहा, "वह कहता है कि वह गाय सुनहरी है, गहरे चटकीले रंग की कि देखनेवालों को प्रसन्न कर देती है।"
तफ़्सीर:
उन्होंने अपने तर्क-वितर्क और हठ को जारी रखते हुए मूसा अलैहिस्सलाम से कहा : अपने पालनहार से प्रार्थना करो कि वह हमें समझाए कि उसका रंग क्या है। तो मूसा अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा : अल्लाह कहता है : वह एक बहुत ही पीली गाय है, जो हर किसी को भा जाती है जो उसे देखता है।
आयत 70
قَالُوا۟ ٱدْعُ لَنَا رَبَّكَ يُبَيِّن لَّنَا مَا هِىَ إِنَّ ٱلْبَقَرَ تَشَـٰبَهَ عَلَيْنَا وَإِنَّآ إِن شَآءَ ٱللَّهُ لَمُهْتَدُونَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
ٱدْعُ
दुआ करो
لَنَا
हमारे लिए
رَبَّكَ
अपने रब से
يُبَيِّن
वो वाज़ेह कर दे
لَّنَا
हमारे लिए
مَا
कैसी हो
هِىَ
वो
إِنَّ
बेशक
ٱلْبَقَرَ
गाय
تَشَـٰبَهَ
मुश्तबा हो गई है
عَلَيْنَا
हम पर
وَإِنَّآ
और बेशक हम
إِن
अगर
شَآءَ
चाहा
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
لَمُهْتَدُونَ
अलबत्ता राह पा लेने वाले हैं
बोले, "हमारे लिए अपने रब से निवेदन करो कि वह हमें बता दे कि वह कौन-सी है, गायों का निर्धारण हमारे लिए संदिग्ध हो रहा है। यदि अल्लाह ने चाहा तो हम अवश्य। पता लगा लेंगे।"
तफ़्सीर:
फिर वे अपने हठ में हद से बढ़ते हुए कहने लगे : अपने पालनहार से प्रार्थना करो कि वह हमारे लिए इसके गुणों को और अधिक स्पष्ट कर दे; क्योंकि उपर्युक्त विशेषताओं वाली गायें बहुत हैं, उनमें से हम उसकी पहचान नहीं कर सकते। उन्होंने इस बात की पुष्टि भी की कि - यदि अल्लाह ने चाहा - तो वे ज़बह के लिए अपेक्षित गाय तक पहुँच जाएँगे।
आयत 71
قَالَ إِنَّهُۥ يَقُولُ إِنَّهَا بَقَرَةٌۭ لَّا ذَلُولٌۭ تُثِيرُ ٱلْأَرْضَ وَلَا تَسْقِى ٱلْحَرْثَ مُسَلَّمَةٌۭ لَّا شِيَةَ فِيهَا ۚ قَالُوا۟ ٱلْـَٔـٰنَ جِئْتَ بِٱلْحَقِّ ۚ فَذَبَحُوهَا وَمَا كَادُوا۟ يَفْعَلُونَ
قَالَ
कहा
إِنَّهُۥ
बेशक वो
يَقُولُ
वो फ़रमाता है
إِنَّهَا
बेशक वो
بَقَرَةٌۭ
ऐसी गाय हो
لَّا
ना
ذَلُولٌۭ
जोती हुई हो
تُثِيرُ
कि वो हल चलाती हो
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन में
وَلَا
और ना
تَسْقِى
वो सैराब करती हो
ٱلْحَرْثَ
खेती को
مُسَلَّمَةٌۭ
सही सलामत हो
لَّا
ना हो
شِيَةَ
कोई दाग़
فِيهَا ۚ
उसमें
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
ٱلْـَٔـٰنَ
अब
جِئْتَ
लाया है तू
بِٱلْحَقِّ ۚ
हक़ को
فَذَبَحُوهَا
फिर उन्होंने ज़िबाह किया उसे
وَمَا
और ना
كَادُوا۟
वो क़रीब थे कि
يَفْعَلُونَ
वो करते
उसने कहा, " वह कहता हैं कि वह ऐसा गाय है जो सधाई हुई नहीं है कि भूमि जोतती हो, और न वह खेत को पानी देती है, ठीक-ठाक है, उसमें किसी दूसरे रंग की मिलावट नहीं है।" बोले, "अब तुमने ठीक बात बताई है।" फिर उन्होंने उसे ज़ब्ह किया, जबकि वे करना नहीं चाहते थे
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा : अल्लाह तआला कहता है : वह गाय ऐसी है जो जुताई में काम करने और भूमि को सींचने के लिए सधाई हुई नहीं है, और वह दोषों से मुक्त है, तथा उसमें उसके पीले रंग के अलावा किसी और रंग का निशान नहीं है। तब उन्होंने कहा : अब तू सटीक विवरण के साथ आया है जो पूरी तरह से उस गाय का निर्धारण करता है। और उन्होंने उस गाय को ज़बह किया, जबकि वे वाद-विवाद और हठ के कारण क़रीब थे कि उसे ज़बह न करें।
आयत 72
وَإِذْ قَتَلْتُمْ نَفْسًۭا فَٱدَّٰرَْٰٔتُمْ فِيهَا ۖ وَٱللَّهُ مُخْرِجٌۭ مَّا كُنتُمْ تَكْتُمُونَ
وَإِذْ
और जब
قَتَلْتُمْ
क़त्ल किया तुमने
نَفْسًۭا
एक नफ़्स को
فَٱدَّٰرَْٰٔتُمْ
फिर एक दूसरे पर डालने लगे तुम
فِيهَا ۖ
उस (के बारे) में
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
مُخْرِجٌۭ
निकालने वाला था
مَّا
जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَكْتُمُونَ
तुम छुपाते
और याद करो जब तुमने एक व्यक्ति की हत्या कर दी, फिर उस सिलसिले में तुमने टाल-मटोल से काम लिया - जबकि जिसको तुम छिपा रहे थे, अल्लाह उसे खोल देनेवाला था
तफ़्सीर:
तथा उस समय को याद करो, जब तुमने अपने ही में से एक व्यक्ति की हत्या कर दी, फिर आपस में लड़ने लगे। हर एक अपने आपको हत्या के आरोप से बचाने लगा और दूसरों पर आरोप धरने लगा, यहाँ तक कि तुम आपस में झगड़ बैठे। जबकि अल्लाह उस निर्दोष व्यक्ति की हत्या के मामले को प्रकाश में लाने वाला था, जिसे तुमे छिपा रहे थे।
आयत 73
فَقُلْنَا ٱضْرِبُوهُ بِبَعْضِهَا ۚ كَذَٰلِكَ يُحْىِ ٱللَّهُ ٱلْمَوْتَىٰ وَيُرِيكُمْ ءَايَـٰتِهِۦ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
فَقُلْنَا
पस कहा हमने
ٱضْرِبُوهُ
मारो उसे
بِبَعْضِهَا ۚ
साथ उसके बाज़ हिस्से के
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يُحْىِ
ज़िन्दा करेगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْمَوْتَىٰ
मुर्दों को
وَيُرِيكُمْ
और वो दिखाता है तुम्हें
ءَايَـٰتِهِۦ
अपनी निशानियाँ
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल से काम लो
तो हमने कहा, "उसे उसके एक हिस्से से मारो।" इस प्रकार अल्लाह मुर्दों को जीवित करता है और तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है, ताकि तुम समझो
तफ़्सीर:
तो हमने तुमसे कहा : मरे हुए व्यक्ति के शरीर पर उस गाय के किसी भाग से मारो, जिसे तुम्हें ज़बह करने का आदेश दिया गया था। क्योंकि हत्यारा कौन है यह बताने के लिए अल्लाह उसे पुनर्जीवित करेगा! चुनाँचे उन्होंने वैसा ही किया और उसने अपने हत्यारे को बता दिया। और इस मरे हुए व्यक्ति को फिर से जीवित करने की तरह, अल्लाह क़ियामत के दिन मरे हुओं को पुनर्जीवित करेगा। अल्लाह तुम्हें अपनी शक्ति के स्पष्ट प्रमाण दिखाता है, ताकि तुम उन्हें समझो और अल्लाह पर सही मायने में विश्वास रखो।
आयत 74
ثُمَّ قَسَتْ قُلُوبُكُم مِّنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ فَهِىَ كَٱلْحِجَارَةِ أَوْ أَشَدُّ قَسْوَةًۭ ۚ وَإِنَّ مِنَ ٱلْحِجَارَةِ لَمَا يَتَفَجَّرُ مِنْهُ ٱلْأَنْهَـٰرُ ۚ وَإِنَّ مِنْهَا لَمَا يَشَّقَّقُ فَيَخْرُجُ مِنْهُ ٱلْمَآءُ ۚ وَإِنَّ مِنْهَا لَمَا يَهْبِطُ مِنْ خَشْيَةِ ٱللَّهِ ۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ
ثُمَّ
फिर
قَسَتْ
सख़्त हो गए
قُلُوبُكُم
दिल तुम्हारे
مِّنۢ
from
بَعْدِ
बाद
ذَٰلِكَ
इसके
فَهِىَ
तो वो
كَٱلْحِجَارَةِ
पत्थरों की तरह हैं
أَوْ
या
أَشَدُّ
ज़्यादा शदीद
قَسْوَةًۭ ۚ
सख़्ती में
وَإِنَّ
और बेशक
مِنَ
from
ٱلْحِجَارَةِ
बाज़ पत्थर
لَمَا
अलबत्ता वो हैं जो
يَتَفَجَّرُ
फूट पड़ती हैं
مِنْهُ
उनसे
ٱلْأَنْهَـٰرُ ۚ
नहरें
وَإِنَّ
और बेशक
مِنْهَا
कुछ उनमें से
لَمَا
अलबत्ता वो हैं जो
يَشَّقَّقُ
फट जाते हैं
فَيَخْرُجُ
फिर निकल आता है
مِنْهُ
उनसे
ٱلْمَآءُ ۚ
पानी
وَإِنَّ
और बेशक
مِنْهَا
कुछ उनमें से
لَمَا
अलबत्ता वो हैं जो
يَهْبِطُ
गिर पड़ते हैं
مِنْ
from
خَشْيَةِ
ख़ौफ़ से
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह के
وَمَا
और नहीं
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِغَـٰفِلٍ
ग़ाफ़िल
عَمَّا
उससे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
फिर इसके पश्चात भी तुम्हारे दिल कठोर हो गए, तो वे पत्थरों की तरह हो गए बल्कि उनसे भी अधिक कठोर; क्योंकि कुछ पत्थर ऐसे भी होते है जिनसे नहरें फूट निकलती है, और कुछ ऐसे भी होते है कि फट जाते है तो उनमें से पानी निकलने लगता है, और उनमें से कुछ ऐसे भी होते है जो अल्लाह के भय से गिर जाते है। और अल्लाह, जो कुछ तुम कर रहे हो, उससे बेखबर नहीं है
तफ़्सीर:
फिर इन दिल में उतरने वाले सदुपदेशों और स्पष्ट चमत्कारों के बाद भी तुम्हारे दिल कठोर हो गए। यहाँ तक कि वे पत्थर की तरह, बल्कि उससे भी ज़्यादा सख़्त हो गए; क्योंकि ये अपने हाल में ज़रा भी परिवर्तन स्वीकार करने को तैयार नहीं, जबकि पत्थर परिवर्तित होते और स्थिति बदलते रहते हैं। चुनाँचे कुछ पत्थरों से नहरें फूट निकलती हैं और कुछ पत्थर फट जाते हैं और उनसे पानी के सोते निकल आते हैं, जिनसे इनसान और चौपाए लाभान्वित होते हैं, जबकि कुछ पत्थर अल्लाह के भय से पहाड़ों की ऊँचाइयों से गिर पड़ते हैं। परंतु तुम्हारे दिलों का हाल ऐसा नहीं है। तथा तुम जो कुछ कर रहे हो, अल्ल्लाह उससे से ग़ाफ़िल नहीं है। बल्कि वह उससे अवगत है और तुम्हें उसका बदला देगा।
आयत 75
۞ أَفَتَطْمَعُونَ أَن يُؤْمِنُوا۟ لَكُمْ وَقَدْ كَانَ فَرِيقٌۭ مِّنْهُمْ يَسْمَعُونَ كَلَـٰمَ ٱللَّهِ ثُمَّ يُحَرِّفُونَهُۥ مِنۢ بَعْدِ مَا عَقَلُوهُ وَهُمْ يَعْلَمُونَ
۞ أَفَتَطْمَعُونَ
क्या फिर तुम तमा रखते हो
أَن
कि
يُؤْمِنُوا۟
वो ईमान लाऐंगे
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
وَقَدْ
हालाँकि तहक़ीक़
كَانَ
है
فَرِيقٌۭ
एक गिरोह (के लोग)
مِّنْهُمْ
उनमें से
يَسْمَعُونَ
वो सुनते हैं
كَلَـٰمَ
कलाम
ٱللَّهِ
अल्लाह का
ثُمَّ
फिर
يُحَرِّفُونَهُۥ
वो तहरीफ़ कर डालते हैं उसमें
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद उसके
مَا
जो
عَقَلُوهُ
उन्होंने समझ लिया उसे
وَهُمْ
जबकि वो
يَعْلَمُونَ
वो इल्म रखते हैं
तो क्या तुम इस लालच में हो कि वे तुम्हारी बात मान लेंगे, जबकि उनमें से कुछ लोग अल्लाह का कलाम सुनते रहे हैं, फिर उसे भली-भाँति समझ लेने के पश्चात जान-बूझकर उसमें परिवर्तन करते रहे?
तफ़्सीर:
तो क्या - ऐ मोमिनो! - तुम यहूदियों की स्थिति की वास्तविकता और उनके हठ को जानने के बाद इस बात की आशा रखते हो कि वे ईमान ले आएँगे और तुम्हारी बात स्वीकार कर लेंगे?! जबकि उनके विद्वानों का एक समूह ऐसा रहा है, जो तौरात में उनपर उतरे हुए अल्लाह के वचनों को सुनते हैं; फिर वे उन्हें समझने और जानने के बाद उनके शब्दों और अर्थों को बदल देते हैं, जबकि वे अपने अपराध की गंभीरता को जानते हैं।
आयत 76
وَإِذَا لَقُوا۟ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا وَإِذَا خَلَا بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍۢ قَالُوٓا۟ أَتُحَدِّثُونَهُم بِمَا فَتَحَ ٱللَّهُ عَلَيْكُمْ لِيُحَآجُّوكُم بِهِۦ عِندَ رَبِّكُمْ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
وَإِذَا
और जब
لَقُوا۟
वो मुलाक़ात करते हैं
ٱلَّذِينَ
उनसे जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
قَالُوٓا۟
वो कहते हैं
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
وَإِذَا
और जब
خَلَا
अलेहदा होते हैं
بَعْضُهُمْ
बाज़ उनके
إِلَىٰ
with
بَعْضٍۢ
तरफ़ बाज़ के
قَالُوٓا۟
वो कहते हैं
أَتُحَدِّثُونَهُم
क्या तुम बातें बताते हो उन्हें
بِمَا
जो
فَتَحَ
खोल दीं हैं
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَيْكُمْ
तुम पर
لِيُحَآجُّوكُم
ताकि वो झगड़ा करें तुमसे
بِهِۦ
साथ उसके
عِندَ
पास
رَبِّكُمْ ۚ
तुम्हारे रब के
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल से काम लेते
और जब वे ईमान लानेवाले से मिलते है तो कहते हैं, "हम भी ईमान रखते हैं", और जब आपस में एक-दूसरे से एकान्त में मिलते है तो कहते है, "क्या तुम उन्हें वे बातें, जो अल्लाह ने तुम पर खोली, बता देते हो कि वे उनके द्वारा तुम्हारे रब के यहाँ हुज्जत में तुम्हारा मुक़ाबिला करें? तो क्या तुम समझते नहीं!"
तफ़्सीर:
यहूदियों के विरोधाभासों और छल में से यह (भी) है कि जब वे कुछ मोमिनों से मिलते हैं, तो उनके सामने पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सत्यता और आपके संदेश की शुद्धता को स्वीकार करते हैं, जिसकी स्वयं तौरात भी गवाही देता है। लेकिन जब यहूदी एक-दूसरे के साथ अकेले होते हैं, तो वे इन स्वीकारोक्तियों के कारण एक-दूसरे को दोष देते हैं; क्योंकि मुसलमान उनकी पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सच्चाई की स्वीकृति को उनके खिलाफ सबूत बनाते हैं।
आयत 77
أَوَلَا يَعْلَمُونَ أَنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ
أَوَلَا
क्या भला नहीं
يَعْلَمُونَ
वो इल्म रखते
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَعْلَمُ
जानता है
مَا
जो
يُسِرُّونَ
वो छुपाते हैं
وَمَا
और जो
يُعْلِنُونَ
वो ज़ाहिर करते हैं
क्या वे जानते नहीं कि अल्लाह वह सब कुछ जानता है, जो कुछ वे छिपाते और जो कुछ ज़ाहिर करते हैं?
तफ़्सीर:
ये यहूदी इस घृणित तरीक़े से व्यवहार कर रहे हैं, जैसे कि वे इस बात की अनदेखी कर रहे हैं कि अल्लाह उनके उन सभी कथनों और कार्यों को जानता है, जो वे छिपाते हैं और जो वे ज़ाहिर करते हैं, और शीघ्र ही वह उन्हें अपने बंदों के लिए प्रकट करके उन्हें अपमानित करेगा।
आयत 78
وَمِنْهُمْ أُمِّيُّونَ لَا يَعْلَمُونَ ٱلْكِتَـٰبَ إِلَّآ أَمَانِىَّ وَإِنْ هُمْ إِلَّا يَظُنُّونَ
وَمِنْهُمْ
और उनमें से कुछ
أُمِّيُّونَ
अनपढ़ हैं
لَا
(who) do not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब का
إِلَّآ
सिवाय
أَمَانِىَّ
तमन्नाओं के
وَإِنْ
और नहीं
هُمْ
वो
إِلَّا
मगर
يَظُنُّونَ
वो गुमान करते
और उनमें सामान्य बेपढ़े भी हैं जिन्हें किताब का ज्ञान नहीं है, बस कुछ कामनाओं एवं आशाओं को धर्म जानते हैं, और वे तो बस अटकल से काम लेते हैं
तफ़्सीर:
तथा यहूदियों में से कुछ लोग ऐसे हैं, जो तौरात का केवल पाठ करना जानते हैं और वे उसके आशय (मतलब) को नहीं समझते। तथा उनके पास झूठ के अलावा कुछ भी नहीं है, जो उन्होंने अपने बड़ों से ग्रहण किए हैं, वे समझते हैं कि यही वह तौरात है जिसे अल्लाह ने अवतरित किया है।
आयत 79
فَوَيْلٌۭ لِّلَّذِينَ يَكْتُبُونَ ٱلْكِتَـٰبَ بِأَيْدِيهِمْ ثُمَّ يَقُولُونَ هَـٰذَا مِنْ عِندِ ٱللَّهِ لِيَشْتَرُوا۟ بِهِۦ ثَمَنًۭا قَلِيلًۭا ۖ فَوَيْلٌۭ لَّهُم مِّمَّا كَتَبَتْ أَيْدِيهِمْ وَوَيْلٌۭ لَّهُم مِّمَّا يَكْسِبُونَ
فَوَيْلٌۭ
पस हलाकत है
لِّلَّذِينَ
उनके लिए जो
يَكْتُبُونَ
वो लिखते हैं
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब को
بِأَيْدِيهِمْ
अपने हाथों से
ثُمَّ
फिर
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
هَـٰذَا
ये
مِنْ
(is)
عِندِ
पास से है
ٱللَّهِ
अल्लाह के
لِيَشْتَرُوا۟
ताकि वो ले लें
بِهِۦ
बदले उसके
ثَمَنًۭا
क़ीमत
قَلِيلًۭا ۖ
थोड़ी
فَوَيْلٌۭ
पस हलाकत है
لَّهُم
उनके लिए
مِّمَّا
बवजह उसके जो
كَتَبَتْ
लिखा
أَيْدِيهِمْ
उनके हाथों ने
وَوَيْلٌۭ
और हलाकत है
لَّهُم
उनके लिए
مِّمَّا
बवजह उसके जो
يَكْسِبُونَ
वो कमाते हैं
तो विनाश और तबाही है उन लोगों के लिए जो अपने हाथों से किताब लिखते हैं फिर कहते हैं, "यह अल्लाह की ओर से है", ताकि उसके द्वारा थोड़ा मूल्य प्राप्त कर लें। तो तबाही है उनके हाथों ने लिखा और तबाही है उनके लिए उसके कारण जो वे कमा रहे हैं
तफ़्सीर:
अतः विनाश और घोर यातना इन लोगों की प्रतीक्षा कर रही है, जो अपने हाथों से किताब लिखते हैं, फिर - झूठ-मूठ - कहते हैं : यह अल्लाह की ओर से है; ताकि वे सत्य और मार्गदर्शन का पालन करने के बदले इस दुनिया में एक छोटी सी क़ीमत, जैसे कि धन और सरदारी प्राप्त कर सकें। अतः उनके लिए बड़ी तबाही और सख़्त अज़ाब है उसके कारण जो उनके हाथों ने लिखकर अल्लाह के खिलाफ झूठ बोला है, तथा उनके लिए तबाही और सख़्त अज़ाब है उसके कारण जो वे उससे धन और सरदारी कमाते हैं।
आयत 80
وَقَالُوا۟ لَن تَمَسَّنَا ٱلنَّارُ إِلَّآ أَيَّامًۭا مَّعْدُودَةًۭ ۚ قُلْ أَتَّخَذْتُمْ عِندَ ٱللَّهِ عَهْدًۭا فَلَن يُخْلِفَ ٱللَّهُ عَهْدَهُۥٓ ۖ أَمْ تَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
لَن
हरगिज़ नहीं
تَمَسَّنَا
छुएगी हमें
ٱلنَّارُ
आग
إِلَّآ
मगर
أَيَّامًۭا
दिन
مَّعْدُودَةًۭ ۚ
गिने चुने
قُلْ
कह दीजिए
أَتَّخَذْتُمْ
क्या ले रखा है तुमने
عِندَ
पास
ٱللَّهِ
अल्लाह के
عَهْدًۭا
कोई अहद
فَلَن
तो हरगिज़ नहीं
يُخْلِفَ
ख़िलाफ़ करेगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَهْدَهُۥٓ ۖ
अपने अहद के
أَمْ
या
تَقُولُونَ
तुम कहते हो
عَلَى
against
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
مَا
जो
لَا
not
تَعْلَمُونَ
नहीं तुम इल्म रखते
वे कहते है, "जहन्नम की आग हमें नहीं छू सकती, हाँ, कुछ गिने-चुने दिनों की बात और है।" कहो, "क्या तुमने अल्लाह से कोई वचन ले रखा है? फिर तो अल्लाह कदापि अपने वचन के विरुद्ध नहीं जा सकता? या तुम अल्लाह के ज़िम्मे डालकर ऐसी बात कहते हो जिसका तुम्हें ज्ञान नहीं?
तफ़्सीर:
तथा उन्होंने - झूठ-मूठ और धोखेबाज़ी से - कहा : हमें आग हरगिज़ नहीं छुएगी और हम कुछ दिनों के अलावा उसमें हरगिज़ प्रवेश नहीं करेंगे। ऐ नबी! आप इनसे कह दीजिए : क्या तुमने इसपर अल्लाह से पक्का वादा ले रखा है? अगर तुम्हारे पास ऐसा वादा है; तो निःसंदेह अल्लाह अपना वादा नहीं तोड़ता। या फिर तुम - झूठ का सहारा लेते हुए - अल्लाह के बारे में ऐसी बात कहते हो, जो तुम नहीं जानते?
आयत 81
بَلَىٰ مَن كَسَبَ سَيِّئَةًۭ وَأَحَـٰطَتْ بِهِۦ خَطِيٓـَٔتُهُۥ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ
بَلَىٰ
हाँ (क्यों नहीं)
مَن
जिसने
كَسَبَ
कमाई
سَيِّئَةًۭ
कोई बुराई
وَأَحَـٰطَتْ
और घेर लिया
بِهِۦ
उसको
خَطِيٓـَٔتُهُۥ
उसकी ख़ता ने
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
أَصْحَـٰبُ
साथी
ٱلنَّارِ ۖ
आग के
هُمْ
वो
فِيهَا
उसमें
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
क्यों नहीं; जिसने भी कोई बदी कमाई और उसकी खताकारी ने उसे अपने घरे में ले लिया, तो ऐसे ही लोग आग (जहन्नम) में पड़नेवाले है; वे उसी में सदैव रहेंगे
तफ़्सीर:
मामला वैसा नहीं है, जैसा ये समझ रहे हैं; अल्लाह हर उस व्यक्ति को यातना देगा, जिसने कुफ़्र की बुराई की और उसके गुनाहों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। अल्लाह उन्हें जहन्नम में दाख़िल करेगा, जिसमें वे हमेशा के लिए रहेंगे।
आयत 82
وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلْجَنَّةِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
أَصْحَـٰبُ
साथी
ٱلْجَنَّةِ ۖ
जन्नत के
هُمْ
वो
فِيهَا
उसमें
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
रहे वे लोग जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, वही जन्नतवाले हैं, वे सदैव उसी में रहेंगे।"
तफ़्सीर:
तथा जो लोग अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाए और सत्कर्म किए, अल्लाह के निकट उनका बदला जन्नत में प्रवेश है, जिसमें वे हमेशा के लिए रहने वाले हैं।
आयत 83
وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَـٰقَ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ لَا تَعْبُدُونَ إِلَّا ٱللَّهَ وَبِٱلْوَٰلِدَيْنِ إِحْسَانًۭا وَذِى ٱلْقُرْبَىٰ وَٱلْيَتَـٰمَىٰ وَٱلْمَسَـٰكِينِ وَقُولُوا۟ لِلنَّاسِ حُسْنًۭا وَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُوا۟ ٱلزَّكَوٰةَ ثُمَّ تَوَلَّيْتُمْ إِلَّا قَلِيلًۭا مِّنكُمْ وَأَنتُم مُّعْرِضُونَ
وَإِذْ
और जब
أَخَذْنَا
लिया हमने
مِيثَـٰقَ
पुख़्ता अहद
بَنِىٓ
(from the) Children
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल से
لَا
Not
تَعْبُدُونَ
ना तुम इबादत करोगे
إِلَّا
मगर
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَبِٱلْوَٰلِدَيْنِ
और साथ वालिदैन के
إِحْسَانًۭا
एहसान करना
وَذِى
and (with)
ٱلْقُرْبَىٰ
और रिश्तेदारों
وَٱلْيَتَـٰمَىٰ
और यतीमों
وَٱلْمَسَـٰكِينِ
और मिस्कीनों के
وَقُولُوا۟
और कहो
لِلنَّاسِ
लोगों से
حُسْنًۭا
अच्छी (बात)
وَأَقِيمُوا۟
और क़ायम करो
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَءَاتُوا۟
और अदा करो
ٱلزَّكَوٰةَ
ज़कात
ثُمَّ
फिर
تَوَلَّيْتُمْ
मुँह मोड़ लिया तुमने
إِلَّا
सिवाय
قَلِيلًۭا
क़लील तादाद के
مِّنكُمْ
तुम में से
وَأَنتُم
और तुम
مُّعْرِضُونَ
ऐराज़ करने वाले हो
और याद करो जब इसराईल की सन्तान से हमने वचन लिया, "अल्लाह के अतिरिक्त किसी की बन्दगी न करोगे; और माँ-बाप के साथ और नातेदारों के साथ और अनाथों और मुहताजों के साथ अच्छा व्यवहार करोगे; और यह कि लोगों से भली बात कहो और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात दो।" तो तुम फिर गए, बस तुममें से बचे थोड़े ही, और तुम उपेक्षा की नीति ही अपनाए रहे
तफ़्सीर:
और - ऐ बनी इसराईल! - उस दृढ़ वचन को याद करो, जो हमने तुमसे लिया था, कि तुम अल्लाह को एकमात्र पूज्य मानोगे और उसके साथ किसी की इबादत नहीं करोगे, और यह कि तुम माता-पिता, रिश्तेदारों, अनाथों और ज़रूरतमंद निर्धनों के साथ अच्छा व्यवहार करोगे। और यह कि तुम लोगों से अच्छी बात बोलो, बिना सख़्ती और कठोरता के भलाई का आदेश देते हुए एवं बुराई से रोकते हुए। और यह कि तुम पूरी तरह से नमाज़ अदा करो जैसा मैंने तुम्हें आदेश दिया है, और यह कि तुम ज़कात अदा करो उसे उसके हक़दारों को खुशी के साथ देकर। फिर, इस वचन के बाद, जो तुमसे लिया गया था, तुम उसे पूरा करने से मुँह मोड़ते हुए फिर गए, सिवाय उसके जिसे अल्लाह ने तुममें से बचा लिया, तो उसने अल्लाह के लिए उसके वचन और प्रतिज्ञा को पूरा किया।
आयत 84
وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَـٰقَكُمْ لَا تَسْفِكُونَ دِمَآءَكُمْ وَلَا تُخْرِجُونَ أَنفُسَكُم مِّن دِيَـٰرِكُمْ ثُمَّ أَقْرَرْتُمْ وَأَنتُمْ تَشْهَدُونَ
وَإِذْ
और जब
أَخَذْنَا
लिया हमने
مِيثَـٰقَكُمْ
पुख़्ता अहद तुम से
لَا
Not
تَسْفِكُونَ
ना तुम बहाओगे
دِمَآءَكُمْ
ख़ून अपने
وَلَا
और ना
تُخْرِجُونَ
तुम निकालोगे
أَنفُسَكُم
अपने नफ़्सों को
مِّن
from
دِيَـٰرِكُمْ
अपने घरों से
ثُمَّ
फिर
أَقْرَرْتُمْ
इक़रार किया तुमने
وَأَنتُمْ
और तुम
تَشْهَدُونَ
तुम गवाही देते हो
और याद करो जब तुमसे वचन लिया, "अपने ख़ून न बहाओगे और न अपने लोगों को अपनी बस्तियों से निकालोगे।" फिर तुमने इक़रार किया और तुम स्वयं इसके गवाह हो
तफ़्सीर:
तथा उस पक्के वचन को याद करो, जो हमने तौरात में तुमसे लिया था कि तुम आपस में एक-दूसरे का ख़ून नहीं बहाओगे और न एक-दूसरे को उनके घरों से निकालोगे। फिर तुमने उस वचन को मान लिया जो हमने तुमसे लिया था, और तुम स्वयं इसके सही होने की गवाही देते हो।
आयत 85
ثُمَّ أَنتُمْ هَـٰٓؤُلَآءِ تَقْتُلُونَ أَنفُسَكُمْ وَتُخْرِجُونَ فَرِيقًۭا مِّنكُم مِّن دِيَـٰرِهِمْ تَظَـٰهَرُونَ عَلَيْهِم بِٱلْإِثْمِ وَٱلْعُدْوَٰنِ وَإِن يَأْتُوكُمْ أُسَـٰرَىٰ تُفَـٰدُوهُمْ وَهُوَ مُحَرَّمٌ عَلَيْكُمْ إِخْرَاجُهُمْ ۚ أَفَتُؤْمِنُونَ بِبَعْضِ ٱلْكِتَـٰبِ وَتَكْفُرُونَ بِبَعْضٍۢ ۚ فَمَا جَزَآءُ مَن يَفْعَلُ ذَٰلِكَ مِنكُمْ إِلَّا خِزْىٌۭ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۖ وَيَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ يُرَدُّونَ إِلَىٰٓ أَشَدِّ ٱلْعَذَابِ ۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ
ثُمَّ
फिर
أَنتُمْ
तुम
هَـٰٓؤُلَآءِ
वो ही लोग हो
تَقْتُلُونَ
तुम क़त्ल कर डालते हो
أَنفُسَكُمْ
अपने नफ़्सों को
وَتُخْرِجُونَ
और तुम निकाल देते हो
فَرِيقًۭا
एक गिरोह को
مِّنكُم
अपनों में से
مِّن
from
دِيَـٰرِهِمْ
उनके घरों से
تَظَـٰهَرُونَ
तुम चढ़ाई करते हो
عَلَيْهِم
उन पर
بِٱلْإِثْمِ
साथ गुनाह
وَٱلْعُدْوَٰنِ
और ज़्यादती के
وَإِن
और अगर
يَأْتُوكُمْ
वो आऐं तुम्हारे पास
أُسَـٰرَىٰ
क़ैदी बनकर
تُفَـٰدُوهُمْ
तुम फ़िदया दे कर छुड़ाते हो उन्हें
وَهُوَ
हालाँकि वो
مُحَرَّمٌ
हराम किया गया था
عَلَيْكُمْ
तुम पर
إِخْرَاجُهُمْ ۚ
निकालना उनका
أَفَتُؤْمِنُونَ
क्या फिर तुम ईमान लाते हो
بِبَعْضِ
बाज़ (हिस्से) पर
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब के
وَتَكْفُرُونَ
और तुम कुफ़्र करते हो
بِبَعْضٍۢ ۚ
साथ बाज़ के
فَمَا
तो नहीं
جَزَآءُ
बदला
مَن
उसका जो
يَفْعَلُ
करता है
ذَٰلِكَ
ये
مِنكُمْ
तुम में से
إِلَّا
मगर
خِزْىٌۭ
रुस्वाई
فِى
in
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी में
ٱلدُّنْيَا ۖ
दुनिया की
وَيَوْمَ
और दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
يُرَدُّونَ
वो लौटाए जाऐंगे
إِلَىٰٓ
तरफ़
أَشَدِّ
शदीद तरीन
ٱلْعَذَابِ ۗ
अज़ाब के
وَمَا
और नहीं
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِغَـٰفِلٍ
ग़ाफ़िल
عَمَّا
उससे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
फिर तुम वही हो कि अपने लोगों की हत्या करते हो और अपने ही एक गिरोह के लोगों को उनकी बस्तियों से निकालते हो; तुम गुनाह और ज़्यादती के साथ उनके विरुद्ध एक-दूसरे के पृष्ठपोषक बन जाते हो; और यदि वे बन्दी बनकर तुम्हारे पास आते है, तो उनकी रिहाई के लिए फिद्ए (अर्थदंड) का लेन-देन करते हो जबकि उनको उनके घरों से निकालना ही तुम पर हराम था, तो क्या तुम किताब के एक हिस्से को मानते हो और एक को नहीं मानते? फिर तुममें जो ऐसा करें उसका बदला इसके सिवा और क्या हो सकता है कि सांसारिक जीवन में अपमान हो? और क़यामत के दिन ऐसे लोगों को कठोर से कठोर यातना की ओर फेर दिया जाएगा। अल्लाह उससे बेखबर नहीं है जो कुछ तुम कर रहे हो
तफ़्सीर:
फिर तुम ही इस वचन का उल्लंघन करते हो; चुनाँचे तुम एक-दूसरे की हत्या करते हो और अपने ही में से कुछ लोगों को उनके विरुद्ध दुश्मनों की मदद लेकर नाहक़ और अन्यायपूर्वक उनके घरों से निकालते हो। और यदि वे शत्रुओं के हाथों बंदी बनकर तुम्हारे पास आते हैं, तो उन्हें क़ैद से छुड़ाने के लिए छुड़ौती देने हेतु दौड़-भाग करते हो, जबकि उन्हें उनके घरों से बाहर निकालना तुम्हारे लिए निषिद्ध है। फिर कैसे तुम तौरात के कुछ आदेशों, जैसे बंदियों को फ़िदया देकर छुड़ाने पर ईमान रखते हो और कुछ शिक्षाओं, जैसे खून का संरक्षण करने और एक-दूसरे को उनके घरों से न निकालने के आदेश का इनकार करते हो?! अतः तुम में से ऐसा करने वाले के लिए सांसारिक जीवन में अपमान के अलावा कोई बदला नहीं है, रही बात आख़िरत की तो वह सबसे कठोर यातना की ओर लौटाया जाएगा। और जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उससे असावधान नहीं, बल्कि वह उससे अवगत है और तुम्हें उसका बदला देगा।
आयत 86
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ ٱشْتَرَوُا۟ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا بِٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ فَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ ٱلْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही वो लोग हैं
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
ٱشْتَرَوُا۟
ख़रीद ली
ٱلْحَيَوٰةَ
ज़िन्दगी
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
بِٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ
बदले आख़िरत के
فَلَا
तो ना
يُخَفَّفُ
हल्का किया जाएगा
عَنْهُمُ
उनसे
ٱلْعَذَابُ
अज़ाब
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يُنصَرُونَ
वो मदद किए जाऐंगे
यही वे लोग है जो आख़िरात के बदले सांसारिक जीवन के ख़रीदार हुए, तो न उनकी यातना हल्की की जाएगी और न उन्हें कोई सहायता पहुँच सकेगी
तफ़्सीर:
यही लोग हैं, जिन्होंने अमर पर नश्वर को वरीयता देते हुए सांसारिक जीवन को आख़िरत के बदले चुन लिया। इसलिए आख़िरत में उनकी यातना हल्की नहीं की जाएगी और उस दिन उनकी मदद करने के लिए उनके पास कोई सहायक नहीं होगा।
आयत 87
وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ وَقَفَّيْنَا مِنۢ بَعْدِهِۦ بِٱلرُّسُلِ ۖ وَءَاتَيْنَا عِيسَى ٱبْنَ مَرْيَمَ ٱلْبَيِّنَـٰتِ وَأَيَّدْنَـٰهُ بِرُوحِ ٱلْقُدُسِ ۗ أَفَكُلَّمَا جَآءَكُمْ رَسُولٌۢ بِمَا لَا تَهْوَىٰٓ أَنفُسُكُمُ ٱسْتَكْبَرْتُمْ فَفَرِيقًۭا كَذَّبْتُمْ وَفَرِيقًۭا تَقْتُلُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
ءَاتَيْنَا
दी हमने
مُوسَى
मूसा को
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
وَقَفَّيْنَا
और पै दर पै भेजे हमने
مِنۢ
from
بَعْدِهِۦ
बाद उसके
بِٱلرُّسُلِ ۖ
कई रसूल
وَءَاتَيْنَا
और दीं हमने
عِيسَى
Isa
ٱبْنَ
(the) son
مَرْيَمَ
ईसा इब्ने मरियम को
ٱلْبَيِّنَـٰتِ
वाज़ेह निशानियाँ
وَأَيَّدْنَـٰهُ
और क़ुव्वत दी हमने उसे
بِرُوحِ
(with)
ٱلْقُدُسِ ۗ
साथ रुहुल क़ुदुस के
أَفَكُلَّمَا
क्या फिर जब भी
جَآءَكُمْ
आया तुम्हारे पास
رَسُولٌۢ
कोई रसूल
بِمَا
साथ उसके जो
لَا
(does) not
تَهْوَىٰٓ
नहीं चाहते थे
أَنفُسُكُمُ
नफ़्स तुम्हारे
ٱسْتَكْبَرْتُمْ
तकब्बुर किया तुमने
فَفَرِيقًۭا
तो एक गिरोह को
كَذَّبْتُمْ
झुठलाया तुमने
وَفَرِيقًۭا
और एक गिरोह को
تَقْتُلُونَ
तुम क़त्ल करते रहे
और हमने मूसा को किताब दी थी, और उसके पश्चात आगे-पीछे निरन्तर रसूल भेजते रहे; और मरयम के बेटे ईसा को खुली-खुली निशानियाँ प्रदान की और पवित्र-आत्मा के द्वारा उसे शक्ति प्रदान की; तो यही तो हुआ कि जब भी कोई रसूल तुम्हारे पास वह कुछ लेकर आया जो तुम्हारे जी को पसन्द न था, तो तुम अकड़ बैठे, तो एक गिरोह को तो तुमने झुठलाया और एक गिरोह को क़त्ल करते हो?
तफ़्सीर:
हमने मूसा को तौरात प्रदान किया तथा उनके बाद उनके पीछे ही बहुत से रसूल भेजे, और ईसा बिन मरयम को उनकी सच्चाई को दर्शाने वाली स्पष्ट निशानियाँ प्रदान कीं; जैसे मरे हुए लोगों को पुनर्जीवित करना, अंधे पैदा हुए लोगों को ठीक करना और कोढ़ी को चंगा करना। तथा हमने उन्हें जिबरील नामी फ़रिश्ते द्वारा शक्ति प्रदान की। फिर क्या जब भी - ऐ बनी इसराईल! - अल्लाह की ओर से कोई रसूल तुम्हारे पास वह चीज़ लेकर आया, जो तुम्हारी इच्छाओं के अनुकूल नहीं थी, तो तुमने सत्य को स्वीकार करने से अभिमान किया और अल्लाह के रसूलों पर बड़ा बनने लगे; चुनाँचे उनमें से एक समूह को तुम झुठलाते रहे और एक समूह की हत्या करते रहे?।
आयत 88
وَقَالُوا۟ قُلُوبُنَا غُلْفٌۢ ۚ بَل لَّعَنَهُمُ ٱللَّهُ بِكُفْرِهِمْ فَقَلِيلًۭا مَّا يُؤْمِنُونَ
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
قُلُوبُنَا
दिल हमारे
غُلْفٌۢ ۚ
ग़िलाफ़ हैं
بَل
बल्कि (नहीं)
لَّعَنَهُمُ
लानत की उन पर
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
بِكُفْرِهِمْ
बवजह उनके कुफ़्र के
فَقَلِيلًۭا
so little
مَّا
पस कितना कम
يُؤْمِنُونَ
वो ईमान लाते हैं
वे कहते हैं, "हमारे दिलों पर तो प्राकृतिक आवरण चढ़े है" नहीं, बल्कि उनके इनकार के कारण अल्लाह ने उनपर लानत की है; अतः वे ईमान थोड़े ही लाएँगे
तफ़्सीर:
मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का अनुसरण न करने का यहूदियों का तर्क उनका यह कहना था : वास्तव में, हमारे दिलों पर पर्दे पड़े हुए हैं, आप जो कहते हैं, उसमें से कुछ भी उन तक नहीं पहुँचता और वे उसे नहीं समझते हैं। हालाँकि स्थिति वैसी नहीं है जैसा उन्होंने दावा किया है। बल्कि सच्चाई यह है कि उनके कुफ़्र के कारण अल्लाह ने उन्हें अपनी रहमत से दूर कर दिया। अतः वे अल्लाह की उतारी हुई बातों में से केवल बहुत कम ही पर ईमान लाते हैं।
आयत 89
وَلَمَّا جَآءَهُمْ كِتَـٰبٌۭ مِّنْ عِندِ ٱللَّهِ مُصَدِّقٌۭ لِّمَا مَعَهُمْ وَكَانُوا۟ مِن قَبْلُ يَسْتَفْتِحُونَ عَلَى ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ فَلَمَّا جَآءَهُم مَّا عَرَفُوا۟ كَفَرُوا۟ بِهِۦ ۚ فَلَعْنَةُ ٱللَّهِ عَلَى ٱلْكَـٰفِرِينَ
وَلَمَّا
और जब
جَآءَهُمْ
आ गई उनके पास
كِتَـٰبٌۭ
एक किताब
مِّنْ
of
عِندِ
पास से
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مُصَدِّقٌۭ
तसदीक़ करने वाली
لِّمَا
उसकी जो
مَعَهُمْ
पास है उनके
وَكَانُوا۟
हालाँकि थे वो
مِن
from
قَبْلُ
इससे क़ब्ल
يَسْتَفْتِحُونَ
वो फ़तह माँगते
عَلَى
over
ٱلَّذِينَ
उन पर जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
فَلَمَّا
तो जब
جَآءَهُم
आ गया उनके पास
مَّا
जो
عَرَفُوا۟
उन्होंने पहचान लिया
كَفَرُوا۟
उन्होंने कुफ़्र किया
بِهِۦ ۚ
साथ उसके
فَلَعْنَةُ
तो लानत है
ٱللَّهِ
अल्लाह की
عَلَى
(is) on
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों पर
और जब उनके पास एक किताब अल्लाह की ओर से आई है जो उसकी पुष्टि करती है जो उनके पास मौजूद है - और इससे पहले तो वे न माननेवाले लोगों पर विजय पाने के इच्छुक रहे है - फिर जब वह चीज़ उनके पास आ गई जिसे वे पहचान भी गए हैं, तो उसका इनकार कर बैठे; तो अल्लाह की फिटकार इनकार करने वालों पर!
तफ़्सीर:
जब उनके पास अल्लाह की ओर से क़ुरआन आया, जो सही सामान्य सिद्धांतों में उसके अनुरूप है, जो कुछ तौरात तथा इन्जील में है। जबकि वे इसके उतरने से पहले कहा करते थे : हम बहुदेववादियों पर विजयी होंगे और हमें जीत प्राप्त होगी जब एक नबी भेजा जाएगा, जिसपर हम ईमान लाएँगे और उसका अनुसरण करेंगे। फिर जब क़ुरआन और मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उस विशेषता के साथ आ गए, जिसे उन्होंने पहचान लिया और उस सत्य के साथ, जिसे उन्होंने जान लिया; तो उन्होंने उसके साथ कुफ़्र किया। अतः अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र करने वालों पर अल्लाह की ला'नत है।
आयत 90
بِئْسَمَا ٱشْتَرَوْا۟ بِهِۦٓ أَنفُسَهُمْ أَن يَكْفُرُوا۟ بِمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ بَغْيًا أَن يُنَزِّلَ ٱللَّهُ مِن فَضْلِهِۦ عَلَىٰ مَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦ ۖ فَبَآءُو بِغَضَبٍ عَلَىٰ غَضَبٍۢ ۚ وَلِلْكَـٰفِرِينَ عَذَابٌۭ مُّهِينٌۭ
بِئْسَمَا
कितना बुरा है जो
ٱشْتَرَوْا۟
बेच डाला उन्होंने
بِهِۦٓ
बदले उसके
أَنفُسَهُمْ
अपने नफ़्सों को
أَن
कि
يَكْفُرُوا۟
उन्होंने कुफ़्र किया
بِمَآ
साथ उसके जो
أَنزَلَ
नाज़िल किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
بَغْيًا
ज़िद की वजह से
أَن
कि
يُنَزِّلَ
नाज़िल करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
مِن
of
فَضْلِهِۦ
अपने फ़ज़ल से
عَلَىٰ
on
مَن
जिस पर
يَشَآءُ
वो चाहता है
مِنْ
from
عِبَادِهِۦ ۖ
अपने बन्दों में से
فَبَآءُو
तो वो लौटे
بِغَضَبٍ
साथ ग़ज़ब के
عَلَىٰ
upon
غَضَبٍۢ ۚ
ग़ज़ब पर
وَلِلْكَـٰفِرِينَ
और काफ़िरों के लिए
عَذَابٌۭ
अज़ाब है
مُّهِينٌۭ
रुस्वाकुन/अहानत आमेज़
क्या ही बुरी चीज़ है जिसके बदले उन्होंने अपनी जानों का सौदा किया, अर्थात जो कुछ अल्लाह ने उतारा है उसे सरकशी और इस अप्रियता के कारण नहीं मानते कि अल्लाह अपना फ़ज़्ल (कृपा) अपने बन्दों में से जिसपर चाहता है क्यों उतारता है, अतः वे प्रकोप पर प्रकोप के अधिकारी हो गए है। और ऐसे इनकार करनेवालों के लिए अपमानजनक यातना है
तफ़्सीर:
बहुत बुरी है वह चीज़ जिसे उन्होंने अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान के बदले ले लिया; चुनाँचे उन्होंने अल्लाह की उतारी हुई शरीयत का इनकार कर दिया और उसके रसूलों को झुठलाया, केवल इस कारण अन्याय और ईर्ष्या करते हुए कि नुबुव्वत (पैगंबरी) और क़ुरआन को मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अवतरित किया गया है। अतः मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का इनकार करने और इससे पहले तौरात में फेर-बदल करने के कारण, वे अल्लाह की ओर से दोहरे क्रोध के भागी बन गए। तथा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नुबुव्वत का इनकार करने वालों के लिए क़ियामत के दिन अपमानजनक यातना है।
आयत 91
وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ ءَامِنُوا۟ بِمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ قَالُوا۟ نُؤْمِنُ بِمَآ أُنزِلَ عَلَيْنَا وَيَكْفُرُونَ بِمَا وَرَآءَهُۥ وَهُوَ ٱلْحَقُّ مُصَدِّقًۭا لِّمَا مَعَهُمْ ۗ قُلْ فَلِمَ تَقْتُلُونَ أَنۢبِيَآءَ ٱللَّهِ مِن قَبْلُ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
وَإِذَا
और जब
قِيلَ
कहा जाता है
لَهُمْ
उन्हें
ءَامِنُوا۟
ईमान लाओ
بِمَآ
उस पर जो
أَنزَلَ
नाज़िल किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
قَالُوا۟
वो कहते हैं
نُؤْمِنُ
हम ईमान लाऐंगे
بِمَآ
उस पर जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
عَلَيْنَا
हम पर
وَيَكْفُرُونَ
और वो कुफ़्र करते हैं
بِمَا
साथ उसके जो
وَرَآءَهُۥ
अलावा है इसके
وَهُوَ
हालाँकि वो ही
ٱلْحَقُّ
हक़ है
مُصَدِّقًۭا
तस्दीक़ करने वाला है
لِّمَا
उसकी जो
مَعَهُمْ ۗ
पास है उनके
قُلْ
कह दीजिए
فَلِمَ
तो क्यों
تَقْتُلُونَ
तुम क़त्ल करते रहे
أَنۢبِيَآءَ
नबियों को
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مِن
from
قَبْلُ
इससे पहले
إِن
अगर
كُنتُم
हो तुम
مُّؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
जब उनसे कहा जाता है, "अल्लाह ने जो कुछ उतारा है उस पर ईमान लाओ", तो कहते है, "हम तो उसपर ईमान रखते है जो हम पर उतरा है," और उसे मानने से इनकार करते हैं जो उसके पीछे है, जबकि वही सत्य है, उसकी पुष्टि करता है जो उसके पास है। कहो, "अच्छा तो इससे पहले अल्लाह के पैग़म्बरों की हत्या क्यों करते रहे हो, यदि तुम ईमानवाले हो?"
तफ़्सीर:
जब इन यहूदियों से कहा जाता है : उस सत्य और हिदायत पर ईमान ले आओ, जो अल्लाह ने अपने रसूल पर उतारी है। तो वे कहते हैं : हम उसपर ईमान रखते हैं, जो हमारे नबियों पर उतारा गया है। तथा वे उसका इनकार करते हैं जो मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतारा गया है। हालाँकि यह क़ुरआन ही सत्य है, जो उसके अनुरूप है जो अल्लाह की ओर से उनके पास है। और यदि वे वास्तव में उस पर ईमान रखते होते, जो उन पर उतारा गया है, तो वे क़ुरआन पर अवश्य ईमान लाते। (ऐ नबी!) आप उनके जवाब में कह दें : तुम इससे पहले नबियों की हत्या क्यों किया करते थे, यदि तुम उस सत्य पर सही मायने में ईमान रखने वाले थे, जो वे तुम्हारे पास लेकर आए थे?!
आयत 92
۞ وَلَقَدْ جَآءَكُم مُّوسَىٰ بِٱلْبَيِّنَـٰتِ ثُمَّ ٱتَّخَذْتُمُ ٱلْعِجْلَ مِنۢ بَعْدِهِۦ وَأَنتُمْ ظَـٰلِمُونَ
۞ وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
جَآءَكُم
आया तुम्हारे पास
مُّوسَىٰ
मूसा
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ
साथ वाज़ेह निशानियों के
ثُمَّ
फिर
ٱتَّخَذْتُمُ
बना लिया तुमने
ٱلْعِجْلَ
बछड़े को (माबूद)
مِنۢ
from
بَعْدِهِۦ
बाद उसके
وَأَنتُمْ
और तुम
ظَـٰلِمُونَ
ज़ालिम हो
तुम्हारे पास मूसा खुली-खुली निशानियाँ लेकर आया, फिर भी उसके बाद तुम ज़ालिम बनकर बछड़े को देवता बना बैठे
तफ़्सीर:
निश्चय तुम्हारे रसूल मूसा अलैहिस्सलाम तुम्हारे पास अपने सच्चे नबी होने की पुष्टि करने वाली स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए। फिर उसके बाद, जब मूसा अलैहिस्सलाम अपने रब से मिलने चले गए, तो तुम बछड़े को पूज्य बनाकर उसकी पूजा करने लगे। और तुम अल्लाह के साथ साझी ठहराने के कारण अत्याचार करने वाले थे। हालाँकि वही अकेला इबादत के योग्य है, कोई और नहीं।
आयत 93
وَإِذْ أَخَذْنَا مِيثَـٰقَكُمْ وَرَفَعْنَا فَوْقَكُمُ ٱلطُّورَ خُذُوا۟ مَآ ءَاتَيْنَـٰكُم بِقُوَّةٍۢ وَٱسْمَعُوا۟ ۖ قَالُوا۟ سَمِعْنَا وَعَصَيْنَا وَأُشْرِبُوا۟ فِى قُلُوبِهِمُ ٱلْعِجْلَ بِكُفْرِهِمْ ۚ قُلْ بِئْسَمَا يَأْمُرُكُم بِهِۦٓ إِيمَـٰنُكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
وَإِذْ
और जब
أَخَذْنَا
लिया हमने
مِيثَـٰقَكُمْ
पुख़्ता अहद तुम से
وَرَفَعْنَا
और बुलन्द किया हमने
فَوْقَكُمُ
ऊपर तुम्हारे
ٱلطُّورَ
तूर को
خُذُوا۟
पकड़ो
مَآ
जो
ءَاتَيْنَـٰكُم
दिया हमने तुम्हें
بِقُوَّةٍۢ
साथ क़ुव्वत के
وَٱسْمَعُوا۟ ۖ
और सुनो
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
سَمِعْنَا
सुना हमने
وَعَصَيْنَا
और नाफ़रमानी की हमने
وَأُشْرِبُوا۟
और वो पिला दिए गए
فِى
in
قُلُوبِهِمُ
अपने दिलों में
ٱلْعِجْلَ
बछड़े की (मोहब्बत)
بِكُفْرِهِمْ ۚ
बवजह अपने कुफ़्र के
قُلْ
कह दीजिए
بِئْسَمَا
कितना बुरा है जो
يَأْمُرُكُم
हुक्म देता है तुम्हें
بِهِۦٓ
जिस का
إِيمَـٰنُكُمْ
ईमान तुम्हारा
إِن
अगर
كُنتُم
हो तुम
مُّؤْمِنِينَ
मोमिन
कहो, "यदि अल्लाह के निकट आख़िरत का घर सारे इनसानों को छोड़कर केवल तुम्हारे ही लिए है, फिर तो मृत्यु की कामना करो, यदि तुम सच्चे हो।"
तफ़्सीर:
तथा उस समय को याद करो, जब हमने तुमसे मूसा अलैहिस्सलाम का अनुसरण करने और जो कुछ वह अल्लाह के पास से लाए हैं उसे क़बूल करने का पक्का वचन लिया। हमने तुम्हें डराने के लिए तुम्हारे ऊपर पहाड़ उठा लिया, और हमने तुमसे कहा : हमने तुम्हें जो तौरात दिया है उसे पूरी ताक़त से पकड़ लो, तथा स्वीकार करने और पालन करने के उद्देश्य से सुनो; अन्यथा हम तुम्हारे ऊपर पहाड़ को गिरा देंगे। तो तुमने कहा : हमने अपने कानों से सुना और हमने अपने कार्यों से अवज्ञा की। और उनके कुफ़्र के कारण उनके दिलों में बछड़े की पूजा घर कर चुकी थी। ऐ नबी! आप कह दीजिए : बहुत बुरा है वह काम (अल्लाह के साथ कुफ़्र), जिसका आदेश तुम्हें यह ईमान दे रहा है, यदि तुम ईमान वाले हो; क्योंकि सच्चे ईमान के साथ कुफ़्र इकट्ठा नहीं हो सकता।
आयत 94
قُلْ إِن كَانَتْ لَكُمُ ٱلدَّارُ ٱلْـَٔاخِرَةُ عِندَ ٱللَّهِ خَالِصَةًۭ مِّن دُونِ ٱلنَّاسِ فَتَمَنَّوُا۟ ٱلْمَوْتَ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
قُلْ
कह दीजिए
إِن
अगर
كَانَتْ
है
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلدَّارُ
घर
ٱلْـَٔاخِرَةُ
आख़िरत का
عِندَ
with
ٱللَّهِ
पास अल्लाह के
خَالِصَةًۭ
ख़ास/मख़सूस
مِّن
from
دُونِ
अलावा
ٱلنَّاسِ
लोगों के
فَتَمَنَّوُا۟
तो तुम तमन्ना करो
ٱلْمَوْتَ
मौत की
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
अपने हाथों इन्होंने जो कुछ आगे भेजा है उसके कारण वे कदापि उसकी कामना न करेंगे; अल्लाह तो ज़ालिमों को भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) आप कह दीजिए : यदि आख़िरत में जन्नत (ऐ यहूदियो!) केवल तुम्हारे ही लिए है और तुम्हारे सिवा और कोई उसमें प्रवेश नहीं करेगा; तो तुम मरने की कामना करो; ताकि तुम इस स्थान को जल्दी से प्राप्त कर लो और सांसारिक जीवन के बोझ और उसकी चिंताओं से आराम पा जाओ, यदि तुम अपने इस दावे में सच्चे हो।
आयत 95
وَلَن يَتَمَنَّوْهُ أَبَدًۢا بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌۢ بِٱلظَّـٰلِمِينَ
وَلَن
और हरगिज़ नहीं
يَتَمَنَّوْهُ
वो तमन्ना करेंगे उसकी
أَبَدًۢا
कभी भी
بِمَا
बवजह उसके जो
قَدَّمَتْ
आगे भेजा
أَيْدِيهِمْ ۗ
उनके हाथों ने
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों को
अपने हाथों इन्होंने जो कुछ आगे भेजा है उसके कारण वे कदापि उसकी कामना न करेंगे; अल्लाह तो जालिमों को भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
वे हरगिज़ मौत की कामना कभी नहीं करेंगे; क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में अल्लाह के साथ कुफ़्र, उसके रसूलों को झुठलाने और उसकी किताबों को विकृत करने जैसे पाप करके आगे भेजे हैं। तथा अल्लाह उनमें से और उनके अलावा में से ज़ालिमों को ख़ूब जानने वाला है और वह प्रत्येक को उसके कार्य का बदला देगा।
आयत 96
وَلَتَجِدَنَّهُمْ أَحْرَصَ ٱلنَّاسِ عَلَىٰ حَيَوٰةٍۢ وَمِنَ ٱلَّذِينَ أَشْرَكُوا۟ ۚ يَوَدُّ أَحَدُهُمْ لَوْ يُعَمَّرُ أَلْفَ سَنَةٍۢ وَمَا هُوَ بِمُزَحْزِحِهِۦ مِنَ ٱلْعَذَابِ أَن يُعَمَّرَ ۗ وَٱللَّهُ بَصِيرٌۢ بِمَا يَعْمَلُونَ
وَلَتَجِدَنَّهُمْ
और अलबत्ता तुम ज़रूर पाओगे उन्हें
أَحْرَصَ
सब से ज़्यादा हरीस
ٱلنَّاسِ
लोगों में
عَلَىٰ
for
حَيَوٰةٍۢ
ज़िन्दगी पर
وَمِنَ
and (greedier) than
ٱلَّذِينَ
और उनसे भी जिन्होंने
أَشْرَكُوا۟ ۚ
शिर्क किया
يَوَدُّ
चाहता है
أَحَدُهُمْ
हर एक उनका
لَوْ
काश
يُعَمَّرُ
वो उम्र दिया जाए
أَلْفَ
हज़ार
سَنَةٍۢ
साल
وَمَا
हालाँकि नहीं
هُوَ
वो (उम्र का मिलना)
بِمُزَحْزِحِهِۦ
बचाने वाला उसे
مِنَ
from
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब से
أَن
अगरचे
يُعَمَّرَ ۗ
वो उम्र दिया जाए
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بَصِيرٌۢ
ख़ूब देखने वाला है
بِمَا
उसे जो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते हैं
तुम उन्हें सब लोगों से बढ़कर जीवन का लोभी पाओगे, यहाँ तक कि वे इस सम्बन्ध में शिर्क करनेवालो से भी बढ़े हुए है। उनका तो प्रत्येक व्यक्ति यह इच्छा रखता है कि क्या ही अच्छा होता कि उस हज़ार वर्ष की आयु मिले, जबकि यदि उसे यह आयु प्राप्त भी जाए, तो भी वह अपने आपको यातना से नहीं बचा सकता। अल्लाह देख रहा है, जो कुछ वे कर रहे है
तफ़्सीर:
निश्चय (ऐ नबी!) आप यहूदियों को लोगों में सबसे अधिक जीवन के लिए उत्सुक पाएँगे, चाहे वह कितना भी तुच्छ और अपमानजनक क्यों न हो। बल्कि, वे उन बहुदेववादियों से भी अधिक उत्सुक हैं जो पुनर्जीवन और हिसाब पर ईमान नहीं रखते हैं। वे अह्ले किताब होने तथा दोबारा ज़िंदा होने और हिसाब पर ईमान रखने के बावजूद; उन में से हर व्यक्ति चाहता है कि उसे हज़ार साल की आयु मिले। हालाँकि उसकी लंबी आयु उसे अल्लाह के अज़ाब से बचा नहीं सकती, चाहे वह कितनी भी दीर्घ हो। तथा अल्लाह उनके कर्मों से अवगत और उन्हें देखने वाला है। उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है और वह उन्हें उनका बदला प्रदान करेगा।
आयत 97
قُلْ مَن كَانَ عَدُوًّۭا لِّجِبْرِيلَ فَإِنَّهُۥ نَزَّلَهُۥ عَلَىٰ قَلْبِكَ بِإِذْنِ ٱللَّهِ مُصَدِّقًۭا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ وَهُدًۭى وَبُشْرَىٰ لِلْمُؤْمِنِينَ
قُلْ
कह दीजिए
مَن
जो
كَانَ
है
عَدُوًّۭا
दुश्मन
لِّجِبْرِيلَ
जिब्राईल का
فَإِنَّهُۥ
तो बेशक वो
نَزَّلَهُۥ
उसने नाज़िल किया उसे
عَلَىٰ
on
قَلْبِكَ
आपके दिल पर
بِإِذْنِ
by (the) permission
ٱللَّهِ
अल्लाह के इज़्न से
مُصَدِّقًۭا
तस्दीक़ करने वाला है
لِّمَا
उसकी जो
بَيْنَ
(was)
يَدَيْهِ
इससे पहले है
وَهُدًۭى
और हिदायत
وَبُشْرَىٰ
और ख़ुशख़बरी है
لِلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों के लिए
कहो, "जो कोई जिबरील का शत्रु हो, (तो वह अल्लाह का शत्रु है) क्योंकि उसने तो उसे अल्लाह ही के हुक्म से तम्हारे दिल पर उतारा है, जो उन (भविष्यवाणियों) के सर्वथा अनुकूल है जो उससे पहले से मौजूद हैं; और ईमानवालों के लिए मार्गदर्शन और शुभ-सूचना है
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) आप उन यहूदियों से कह दीजिए, जिन्होंने कहा : "जिब्रील फ़रिश्तों में से हमारा दुश्मन है।" : जो जिब्रील से दुश्मनी रखता हो, तो (वह सुन ले कि) वही अल्लाह के आदेश से आपके दिल पर क़ुरआन लेकर उतरे हैं, जो पिछली आसमानी किताबों; जैसे तौरात तथा इन्जील की पुष्टि करता है, भलाई का मार्ग दिखाता है और ईमान वालों को उन नेमतों की शुभ सूचना देता है, जो अल्लाह ने उनके लिए तैयार कर रखी हैं। अतः जो कोई भी उससे दुश्मनी रखने वाला है, जिसकी यह विशेषता और यह कार्य है, तो वह पथभ्रष्टों में से है।
आयत 98
مَن كَانَ عَدُوًّۭا لِّلَّهِ وَمَلَـٰٓئِكَتِهِۦ وَرُسُلِهِۦ وَجِبْرِيلَ وَمِيكَىٰلَ فَإِنَّ ٱللَّهَ عَدُوٌّۭ لِّلْكَـٰفِرِينَ
مَن
जो कोई
كَانَ
है
عَدُوًّۭا
दुश्मन
لِّلَّهِ
अल्लाह का
وَمَلَـٰٓئِكَتِهِۦ
और उसके फ़रिश्तों का
وَرُسُلِهِۦ
और उसके रसूलों का
وَجِبْرِيلَ
और जिब्राईल का
وَمِيكَىٰلَ
और मीकाईल का
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَدُوٌّۭ
दुश्मन है
لِّلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों का
जो कोई अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसके रसूलों और जिबरील और मीकाईल का शत्रु हो, तो ऐसे इनकार करनेवालों का अल्लाह शत्रु है।"
तफ़्सीर:
जो कोई अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसके रसूलों से दुश्मनी रखता हो तथा उसके दो निकटवर्ती फ़रिश्तों : जिबरील और मीकाईल से बैर रखता हो, तो निःसंदेह अल्लाह तुम में से और तुम्हारे अलावा में से सभी काफ़िरों का दुश्मन है। और जिसका दुश्मन अल्लाह हो, तो निश्चय वह स्पष्ट घाटे के साथ लौटा।
आयत 99
وَلَقَدْ أَنزَلْنَآ إِلَيْكَ ءَايَـٰتٍۭ بَيِّنَـٰتٍۢ ۖ وَمَا يَكْفُرُ بِهَآ إِلَّا ٱلْفَـٰسِقُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَنزَلْنَآ
नाज़िल कीं हमने
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
ءَايَـٰتٍۭ
आयात
بَيِّنَـٰتٍۢ ۖ
वाज़ेह
وَمَا
और नहीं
يَكْفُرُ
कुफ़्र करते
بِهَآ
उनका
إِلَّا
मगर
ٱلْفَـٰسِقُونَ
जो फ़ासिक़ हैं
और हमने तुम्हारी ओर खुली-खुली आयतें उतारी है और उनका इनकार तो बस वही लोग करते हैस जो उल्लंघनकारी हैं
तफ़्सीर:
हमने (ऐ नबी!) आपकी तरफ़ आप जो कुछ नुबुव्वत और वह़्य लेकर आए हैं, उसमें आपकी सत्यता की स्पष्ट निशानियाँ उतारी हैं। और उनकी स्पष्टता और स्पष्टीकरण के बावजूद, उनका इनकार वही लोग करते हैं, जो अल्लाह के दीन से निकलने वाले हों।
आयत 100
أَوَكُلَّمَا عَـٰهَدُوا۟ عَهْدًۭا نَّبَذَهُۥ فَرِيقٌۭ مِّنْهُم ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
أَوَكُلَّمَا
क्या और जब कभी
عَـٰهَدُوا۟
उन्होंने अहद किया
عَهْدًۭا
कोई अहद
نَّبَذَهُۥ
फेंक दिया उसे
فَرِيقٌۭ
एक गिरोह ने
مِّنْهُم ۚ
उनमें से
بَلْ
बल्कि
أَكْثَرُهُمْ
अक्सर उनके
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाते
क्या यह एक निश्चित नीति है कि जब कि उन्होंने कोई वचन दिया तो उनके एक गिरोह ने उसे उठा फेंका? बल्कि उनमें अधिकतर ईमान ही नहीं रखते
तफ़्सीर:
यहूदियों की बुरी स्थिति में से एक यह है कि जब भी उन्होंने अपने आपसे कोई वचन लिया - जिसमें तौरात में मौजूद मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नुबुव्वत पर ईमान लाना भी शामिल है - तो उनके एक गिरोह ने उसे तोड़ दिया। बल्कि तथ्य यह है कि इन यहूदियों में से अधिकांश लोग उसपर सही मायने में ईमान नहीं रखते, जो अल्लाह ने अवतरित किया है; क्योंकि ईमान वचन को पूरा करने की प्रेरणा देता है।
आयत 101
وَلَمَّا جَآءَهُمْ رَسُولٌۭ مِّنْ عِندِ ٱللَّهِ مُصَدِّقٌۭ لِّمَا مَعَهُمْ نَبَذَ فَرِيقٌۭ مِّنَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ كِتَـٰبَ ٱللَّهِ وَرَآءَ ظُهُورِهِمْ كَأَنَّهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
وَلَمَّا
और जब
جَآءَهُمْ
आ गया उनके पास
رَسُولٌۭ
एक रसूल
مِّنْ
(of)
عِندِ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह के पास से
مُصَدِّقٌۭ
तस्दीक़ करने वाला
لِّمَا
उसकी जो
مَعَهُمْ
पास है उनके
نَبَذَ
फेंक दिया
فَرِيقٌۭ
एक गिरोह ने
مِّنَ
of
ٱلَّذِينَ
उन लोगों में से
أُوتُوا۟
दिए गए
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
كِتَـٰبَ
(the) Book
ٱللَّهِ
अल्लाह की किताब को
وَرَآءَ
पीछे
ظُهُورِهِمْ
अपनी पुश्तों के
كَأَنَّهُمْ
गोया कि वो
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
और जब उनके पास अल्लाह की ओर से एक रसूल आया, जिससे उस (भविष्यवाणी) की पुष्टि हो रही है जो उनके पास थी, तो उनके एक गिरोह ने, जिन्हें किताब मिली थी, अल्लाह की किताब को अपने पीठ पीछे डाल दिया, मानो वे कुछ जानते ही नही
तफ़्सीर:
जब मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह की ओर से रसूल बनकर उनके पास आए, और आप उसके बिल्कुल अनुकूल थे, जो तौरात में आपकी विशेषता वर्णित है, तो उनके एक समूह ने तौरात से प्रमाणित होने वाली बात से मुँह मोड़ लिया और उसकी परवाह न करते हुए उसे अपनी पीठ के पीछे फेंक दिया। बिल्कुल उस अज्ञानी व्यक्ति की स्थिति के समान, जो उसमें मौजूद सत्य और मार्गदर्शन से लाभ नहीं उठाता, इसलिए उसकी परवाह नहीं करता है।
आयत 102
وَٱتَّبَعُوا۟ مَا تَتْلُوا۟ ٱلشَّيَـٰطِينُ عَلَىٰ مُلْكِ سُلَيْمَـٰنَ ۖ وَمَا كَفَرَ سُلَيْمَـٰنُ وَلَـٰكِنَّ ٱلشَّيَـٰطِينَ كَفَرُوا۟ يُعَلِّمُونَ ٱلنَّاسَ ٱلسِّحْرَ وَمَآ أُنزِلَ عَلَى ٱلْمَلَكَيْنِ بِبَابِلَ هَـٰرُوتَ وَمَـٰرُوتَ ۚ وَمَا يُعَلِّمَانِ مِنْ أَحَدٍ حَتَّىٰ يَقُولَآ إِنَّمَا نَحْنُ فِتْنَةٌۭ فَلَا تَكْفُرْ ۖ فَيَتَعَلَّمُونَ مِنْهُمَا مَا يُفَرِّقُونَ بِهِۦ بَيْنَ ٱلْمَرْءِ وَزَوْجِهِۦ ۚ وَمَا هُم بِضَآرِّينَ بِهِۦ مِنْ أَحَدٍ إِلَّا بِإِذْنِ ٱللَّهِ ۚ وَيَتَعَلَّمُونَ مَا يَضُرُّهُمْ وَلَا يَنفَعُهُمْ ۚ وَلَقَدْ عَلِمُوا۟ لَمَنِ ٱشْتَرَىٰهُ مَا لَهُۥ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ مِنْ خَلَـٰقٍۢ ۚ وَلَبِئْسَ مَا شَرَوْا۟ بِهِۦٓ أَنفُسَهُمْ ۚ لَوْ كَانُوا۟ يَعْلَمُونَ
وَٱتَّبَعُوا۟
और उन्होंने पैरवी की
مَا
उसकी जो
تَتْلُوا۟
पढ़ते थे
ٱلشَّيَـٰطِينُ
शयातीन
عَلَىٰ
over
مُلْكِ
बादशाहत पर (लगा कर)
سُلَيْمَـٰنَ ۖ
सुलेमान की
وَمَا
और नहीं
كَفَرَ
कुफ़्र किया था
سُلَيْمَـٰنُ
सुलेमान ने
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
ٱلشَّيَـٰطِينَ
शयातीन ने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
يُعَلِّمُونَ
वो सिखाते थे
ٱلنَّاسَ
लोगों को
ٱلسِّحْرَ
जादू
وَمَآ
और जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया था
عَلَى
ऊपर
ٱلْمَلَكَيْنِ
दो फ़रिश्तों के
بِبَابِلَ
बाबिल में
هَـٰرُوتَ
हारूत
وَمَـٰرُوتَ ۚ
और मारूत के
وَمَا
और नहीं
يُعَلِّمَانِ
वो दोनों सिखाते थे
مِنْ
any
أَحَدٍ
किसी एक को
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَقُولَآ
वो दोनों कहते
إِنَّمَا
बेशक
نَحْنُ
हम तो
فِتْنَةٌۭ
एक फ़ितना हैं
فَلَا
पस ना
تَكْفُرْ ۖ
तुम कुफ़्र करो
فَيَتَعَلَّمُونَ
पस वो सीखते थे
مِنْهُمَا
उन दोनों से
مَا
जो
يُفَرِّقُونَ
वो जुदाई डालते थे
بِهِۦ
साथ उसके
بَيْنَ
दर्मियान
ٱلْمَرْءِ
मर्द
وَزَوْجِهِۦ ۚ
और उसकी बीवी के
وَمَا
और नहीं थे
هُم
वो
بِضَآرِّينَ
ज़रर पहुँचाने वाले
بِهِۦ
साथ उसके
مِنْ
any
أَحَدٍ
किसी एक को
إِلَّا
मगर
بِإِذْنِ
by permission
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के इज़्न से
وَيَتَعَلَّمُونَ
और वो सीखते थे
مَا
जो
يَضُرُّهُمْ
नुक़सान देता उन्हें
وَلَا
और ना
يَنفَعُهُمْ ۚ
वो नफ़ा देता उन्हें
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
عَلِمُوا۟
वो जानते थे
لَمَنِ
अलबत्ता जिसने
ٱشْتَرَىٰهُ
ख़रीदा उसे
مَا
नहीं है
لَهُۥ
उसके लिए
فِى
in
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत में
مِنْ
any
خَلَـٰقٍۢ ۚ
कोई हिस्सा
وَلَبِئْسَ
और अलबत्ता कितना बुरा है
مَا
जो
شَرَوْا۟
उन्होंने बेच डाला
بِهِۦٓ
बदले उसके
أَنفُسَهُمْ ۚ
अपनी जानों को
لَوْ
काश
كَانُوا۟
होते वो
يَعْلَمُونَ
वो जानते
और जो वे उस चीज़ के पीछे पड़ गए जिसे शैतान सुलैमान की बादशाही पर थोपकर पढ़ते थे - हालाँकि सुलैमान ने कोई कुफ़्र नहीं किया था, बल्कि कुफ़्र तो शैतानों ने किया था; वे लोगों को जादू सिखाते थे - और उस चीज़ में पड़ गए जो बाबिल में दोनों फ़रिश्तों हारूत और मारूत पर उतारी गई थी। और वे किसी को भी सिखाते न थे जब तक कि कह न देते, "हम तो बस एक परीक्षा है; तो तुम कुफ़्र में न पड़ना।" तो लोग उन दोनों से वह कुछ सीखते है, जिसके द्वारा पति और पत्नी में अलगाव पैदा कर दे - यद्यपि वे उससे किसी को भी हानि नहीं पहुँचा सकते थे। हाँ, यह और बात है कि अल्लाह के हुक्म से किसी को हानि पहुँचनेवाली ही हो - और वह कुछ सीखते है जो उन्हें हानि ही पहुँचाए और उन्हें कोई लाभ न पहुँचाए। और उन्हें भली-भाँति मालूम है कि जो उसका ग्राहक बना, उसका आखिरत में कोई हिस्सा नहीं। कितनी बुरी चीज़ के बदले उन्होंने प्राणों का सौदा किया, यदि वे जानते (तो ठीक मार्ग अपनाते)
तफ़्सीर:
जब उन्होंने अल्लाह के धर्म को छोड़ दिया, तो वे उसके स्थान पर उस चीज़ का अनुसरण करने लगे, जो शैतानों ने अल्लाह के पैग़ंबर सुलैमान अलैहिस्सलाम के राज्य के बारे में झूठ फैला रखा था। क्योंकि उन्होंने दावा किया था कि आप अलैहिस्सलाम ने अपना राज्य जादू द्वारा स्थापित किया था। हालाँकि सुलैमान अलैहिस्सलाम ने जादू का अभ्यास करके कुफ़्र नहीं किया - जैसा कि यहूदियों ने दावा किया - लेकिन शैतानों ने कुफ़्र किया कि वे लोगों को जादू सिखाते थे। तथा वे लोगों को वह जादू सिखाते थे, जो इराक़ के शहर बाबिल में दो फ़रिश्तों : हारूत तथा मारूत पर लोगों की परीक्षा तथा आज़माइश के लिए उतारा गया था। तथा ये दोनों फ़रिश्ते किसी को तब तक जादू नहीं सिखाते जब तक कि वे उसे चेतावनी न दे दें और यह कहकर उसके लिए मामला स्पष्ट न कर दें : हम लोगों के लिए केवल एक परीक्षा और आज़माइश हैं, अतः तुम जादू सीखकर कुफ़्र न करो। अतः जो उन दोनों की सलाह को स्वीकार नहीं करता, उनसे जादू सीखता। उस जादू का एक प्रकार ऐसा भी था, जो आदमी और उसकी पत्नी के बीच नफरत पैदा करके उनके बीच जुदाई डाल देता था। हालाँकि वे जादूगर अल्लाह की अनुमति और उसकी इच्छा के बिना किसी को नुक़सान नहीं पहुँचा सकते थे। और वे ऐसी चीज़ सीखते थे, जो उन्हें हानि पहुँचाती थी और उन्हें लाभ नहीं देती थी। तथा निश्चय वे यहूदी जानते थे कि जिसने जादू को अल्लाह की पुस्तक से बदल लिया, उसके लिए आखिरत में कोई भाग और हिस्सा नहीं है। निश्चय बहुत बुरी है वह चीज़ है, जिसके बदले उन्होंने अपने आपको बेचा डाला; क्योंकि उन्होंने अल्लाह की वह़्य और उसकी शरीयत के बदले जादू को अपना लिया। यदि उन्हें पता होता कि किस वस्तु से उन्हें लाभ होगा, तो वे इस घिनौने कृत्य और स्पष्ट गुमराही में न पड़ते।
आयत 103
وَلَوْ أَنَّهُمْ ءَامَنُوا۟ وَٱتَّقَوْا۟ لَمَثُوبَةٌۭ مِّنْ عِندِ ٱللَّهِ خَيْرٌۭ ۖ لَّوْ كَانُوا۟ يَعْلَمُونَ
وَلَوْ
और अगर
أَنَّهُمْ
बेशक वो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाते
وَٱتَّقَوْا۟
और तक़वा इख़्तियार करते
لَمَثُوبَةٌۭ
अलबत्ता सवाब पाते
مِّنْ
(of)
عِندِ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह के पास से
خَيْرٌۭ ۖ
बेहतर
لَّوْ
काश
كَانُوا۟
होते वो
يَعْلَمُونَ
वो जानते
और यदि वे ईमान लाते और डर रखते, तो अल्लाह के यहाँ से मिलनेवाला बदला कहीं अच्छा था, यदि वे जानते (तो इसे समझ सकते)
तफ़्सीर:
यदि यहूदी सचमुच अल्लाह पर ईमान लाते, तथा उसकी आज्ञाकारिता करके और उसकी अवज्ञा को त्यागकर उससे डरते; तो अल्लाह का सवाब उनके लिए उससे बेहतर होता, जिसपर वे हैं, यदि वे अपने हित से अवगत होते।
आयत 104
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَقُولُوا۟ رَٰعِنَا وَقُولُوا۟ ٱنظُرْنَا وَٱسْمَعُوا۟ ۗ وَلِلْكَـٰفِرِينَ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Do) not
تَقُولُوا۟
ना तुम कहो
رَٰعِنَا
राइना/रिआयत कीजिए हमारी
وَقُولُوا۟
बल्कि कहो
ٱنظُرْنَا
उन्ज़ुरना/नज़र कीजिए हमारी तरफ़
وَٱسْمَعُوا۟ ۗ
और सुना करो
وَلِلْكَـٰفِرِينَ
और काफ़िरों के लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
ऐ ईमान लानेवालो! 'राइना' न कहा करो, बल्कि 'उनज़ुरना' कहा और सुना करो। और इनकार करनेवालों के लिए दुखद यातना है
तफ़्सीर:
अल्लाह तआला मोमिनों को शब्दों के सही चुनाव के लिए निर्देशित करते हुए कहता है : ऐ ईमान वालो! तुम {रा-इना} (अर्थात् हमारा ध्यान रखिए) शब्द का प्रयोग न करो; क्योंकि यहूदी इसे विकृत कर देते हैं और इसके साथ नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को संबोधित करते हैं, जिससे वे एक ग़लत अर्थ 'रुऊनत' (तुच्छता) मुराद लेते हैं। इसलिए अल्लाह ने इस दरवाज़े को बंद करने के लिए इस शब्द के इस्तेमाल से मना कर दिया और अपने बंदों को आदेश दिया कि उसके स्थान पर {उन्ज़ुरना} कहें; अर्थात् हमारी प्रतीक्षा करें, ताकि हम आपकी बात समझ जाएँ। क्योंकि इस शब्द से बिना किसी ख़राबी के अर्थ पूरा हो जाता है। तथा अल्लाह का इनकार करने वालों के लिए कष्टदायी यातना है।
आयत 105
مَّا يَوَدُّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ وَلَا ٱلْمُشْرِكِينَ أَن يُنَزَّلَ عَلَيْكُم مِّنْ خَيْرٍۢ مِّن رَّبِّكُمْ ۗ وَٱللَّهُ يَخْتَصُّ بِرَحْمَتِهِۦ مَن يَشَآءُ ۚ وَٱللَّهُ ذُو ٱلْفَضْلِ ٱلْعَظِيمِ
مَّا
नहीं
يَوَدُّ
चाहते
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
مِنْ
from
أَهْلِ
(the) People
ٱلْكِتَـٰبِ
अहले किताब में से
وَلَا
और ना
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकीन
أَن
कि
يُنَزَّلَ
नाज़िल की जाए
عَلَيْكُم
तुम पर
مِّنْ
any
خَيْرٍۢ
कोई ख़ैर
مِّن
from
رَّبِّكُمْ ۗ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَخْتَصُّ
वो ख़ास कर लेता है
بِرَحْمَتِهِۦ
साथ अपनी रहमत के
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता है
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
ذُو
(is the) Possessor
ٱلْفَضْلِ
फ़ज़ल वाला है
ٱلْعَظِيمِ
बहुत बड़े
इनकार करनेवाले नहीं चाहते, न किताबवाले और न मुशरिक (बहुदेववादी) कि तुम्हारे रब की ओर से तुमपर कोई भलाई उतरे, हालाँकि अल्लाह जिसे चाहे अपनी दयालुता के लिए ख़ास कर ले; अल्लाह बड़ा अनुग्रह करनेवाला है
तफ़्सीर:
काफ़िर - चाहे अह्ले किताब हों या मुश्रिक - यह पसंद नहीं करते हैं कि तुमपर तुम्हारे पालनहार की ओर से कोई भी भलाई उतरे, चाहे वह थोड़ी हो या बहुत। तथा अल्लाह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, अपनी दया, जैसे नुबुव्वत, वह़्य और ईमान के साथ खास कर लेता है। और अल्लाह बहुत बड़े अनुग्रह वाला है। अतः किसी भी प्राणी को, जो भी भलाई पहुँचती है, वह उसी की ओर से होती है तथा उसके अनुग्रह में से रसूल का भेजना और किताब उतारना भी है।
आयत 106
۞ مَا نَنسَخْ مِنْ ءَايَةٍ أَوْ نُنسِهَا نَأْتِ بِخَيْرٍۢ مِّنْهَآ أَوْ مِثْلِهَآ ۗ أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌ
۞ مَا
जो भी
نَنسَخْ
हम मनसूख़ करते हैं
مِنْ
(of)
ءَايَةٍ
कोई आयत
أَوْ
या
نُنسِهَا
हम भुलवा देते हैं उसे
نَأْتِ
हम ले आते हैं
بِخَيْرٍۢ
बेहतर
مِّنْهَآ
उससे
أَوْ
या
مِثْلِهَآ ۗ
उस जैसी
أَلَمْ
क्या नहीं
تَعْلَمْ
आपने जाना
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌ
बहुत क़ुदरत रखने वाला है
हम जिस आयत (और निशान) को भी मिटा दें या उसे भुला देते है, तो उससे बेहतर लाते है या उस जैसा दूसरा ही। क्या तुम नहीं जानते हो कि अल्लाह को हर चीज़ का सामर्थ्य प्राप्त है?
तफ़्सीर:
अल्लाह तआला बयान कर रहा है कि जब वह क़ुरआन की किसी आयत के ह़ुक्म को उठा देता (समाप्त कर देता) है, या उसके शब्द को ख़त्म कर देता है और लोग उसे भूल जाते हैं, तो अल्लाह उसके स्थान पर ऐसी आयत ले आता है, जो तत्काल और भविष्य में उससे अधिक फायदेमंद होती है, अथवा उसके समान होती है, और यह सब कुछ अल्लाह के ज्ञान और उसकी ह़िकमत के मुताबिक़ होता है। और - ऐ नबी! - आप जानते हैं कि अल्लाह हर चीज़ का सामर्थ्य रखता है। चुनाँचे वह जो चाहता है, करता है, और जो चाहता है, आदेश देता है।
आयत 107
أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ ٱللَّهَ لَهُۥ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۗ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِن وَلِىٍّۢ وَلَا نَصِيرٍ
أَلَمْ
क्या नहीं
تَعْلَمْ
आपने जाना
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَهُۥ
उसी के लिए है
مُلْكُ
बादशाहत
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ ۗ
और ज़मीन की
وَمَا
और नहीं
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّن
from
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مِن
any
وَلِىٍّۢ
कोई दोस्त
وَلَا
और ना
نَصِيرٍ
कोई मददगार
क्या तुम नहीं जानते कि आकाशों और धरती का राज्य अल्लाह ही का है और अल्लाह से हटकर न तुम्हारा कोई मित्र है और न सहायक?
तफ़्सीर:
निःसंदेह (ऐ नबी!) आप जानते हैं कि अल्लाह ही आसमानों और ज़मीन का मालिक है, वह जो चाहता है, हुक्म देता है। वह अपने बंदों को जिस चीज़ का चाहता है, आदेश देता है और जिस चीज़ से चाहता है, उन्हें मना कर देता है। तथा वह शरीयत में से जो चाहता है, स्थिर कर देता है और जो चाहता है, निरस्त कर देता है। अल्लाह के बाद, तुम्हारे मामलों को संभालने के लिए तुम्हारे पास कोई संरक्षक नहीं, और न ही तुम्हें नुकसान से बचाने के लिए कोई सहायक है। बल्कि अल्लाह ही इन सब का संरक्षक है और ऐसा करने में सक्षम है।
आयत 108
أَمْ تُرِيدُونَ أَن تَسْـَٔلُوا۟ رَسُولَكُمْ كَمَا سُئِلَ مُوسَىٰ مِن قَبْلُ ۗ وَمَن يَتَبَدَّلِ ٱلْكُفْرَ بِٱلْإِيمَـٰنِ فَقَدْ ضَلَّ سَوَآءَ ٱلسَّبِيلِ
أَمْ
क्या
تُرِيدُونَ
तुम चाहते हो
أَن
कि
تَسْـَٔلُوا۟
तुम सवाल करो
رَسُولَكُمْ
अपने रसूल से
كَمَا
जैसा कि
سُئِلَ
सवाल किए गए
مُوسَىٰ
मूसा
مِن
from
قَبْلُ ۗ
इससे क़ब्ल
وَمَن
और जो कोई
يَتَبَدَّلِ
बदले में लेगा
ٱلْكُفْرَ
कुफ़्र को
بِٱلْإِيمَـٰنِ
ईमान के
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
ضَلَّ
वो भटक गया
سَوَآءَ
सीधे
ٱلسَّبِيلِ
रास्ते से
(ऐ ईमानवालों! तुम अपने रसूल के आदर का ध्यान रखो) या तुम चाहते हो कि अपने रसूल से उसी प्रकार से प्रश्न और बात करो, जिस प्रकार इससे पहले मूसा से बात की गई है? हालाँकि जिस व्यक्ति न ईमान के बदले इनकार की नीति अपनाई, तो वह सीधे रास्ते से भटक गया
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो!) तुम्हें यह शोभा नहीं देता कि तुम अपने रसूल से - आपत्ति और ढिठाई के तौर पर - प्रश्न करो, जिस तरह कि मूसा अलैहिस्सलाम की क़ौम के लोगों ने इससे पहले अपने नबी (मूसा) से किया था। जैसे कि उन्होंने कहा था : (النساء: 153) {أَرِنَا اللَّهَ جَهْرَةً} ''हमें अल्लाह को खुल्लम खुल्ला दिखा दो।'' (सूरतुन्-निसा : 153) और जो व्यक्ति ईमान के बदले कुफ़्र को अपना ले, तो निश्चय वह मध्यम मार्ग से भटक गया जो कि सीधा मार्ग है।
आयत 109
وَدَّ كَثِيرٌۭ مِّنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ لَوْ يَرُدُّونَكُم مِّنۢ بَعْدِ إِيمَـٰنِكُمْ كُفَّارًا حَسَدًۭا مِّنْ عِندِ أَنفُسِهِم مِّنۢ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمُ ٱلْحَقُّ ۖ فَٱعْفُوا۟ وَٱصْفَحُوا۟ حَتَّىٰ يَأْتِىَ ٱللَّهُ بِأَمْرِهِۦٓ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ
وَدَّ
चाहते हैं
كَثِيرٌۭ
बहुत से
مِّنْ
from
أَهْلِ
(the) People
ٱلْكِتَـٰبِ
अहले किताब में से
لَوْ
काश
يَرُدُّونَكُم
वो फेर दें तुम्हें
مِّنۢ
from
بَعْدِ
बाद
إِيمَـٰنِكُمْ
तुम्हारे ईमान के
كُفَّارًا
काफ़िर बना कर
حَسَدًۭا
हसद की बिना पर
مِّنْ
from
عِندِ
पास से
أَنفُسِهِم
अपने नफ़्सों के
مِّنۢ
(even) from
بَعْدِ
बाद उसके
مَا
जो
تَبَيَّنَ
वाज़ेह हो गया
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلْحَقُّ ۖ
हक़
فَٱعْفُوا۟
पस माफ़ कर दो
وَٱصْفَحُوا۟
और दरगुज़र करो
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَأْتِىَ
ले आए
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِأَمْرِهِۦٓ ۗ
हुक्म अपना
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌۭ
बहुत क़ुदरत रखने वाला है
बहुत-से किताबवाले अपने भीतर की ईर्ष्या से चाहते है कि किसी प्रकार वे तुम्हारे ईमान लाने के बाद फेरकर तुम्हे इनकार कर देनेवाला बना दें, यद्यपि सत्य उनपर प्रकट हो चुका है, तो तुम दरगुज़र (क्षमा) से काम लो और जाने दो यहाँ तक कि अल्लाह अपना फ़ैसला लागू न कर दे। निस्संदेह अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
यहूदियों और ईसाइयों में से बहुत-से लोग चाहते हैं कि तुम्हें तुम्हारे ईमान के बाद वापस काफ़िर बना दें, जैसे तुम (पहले) मूर्तियों की पूजा किया करते थे। ऐसा वे उस ईर्ष्या के कारण कर रहे हैं, जो उनके दिलों में है। यह कामना वे उसके बाद कर रहे हैं जब उनके लिए स्पष्ट हो चुका है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जो कुछ लाए हैं, वह अल्लाह की ओर से सत्य है। अतः (ऐ ईमान वालो!) उनके कार्यों को क्षमा करो, और उनकी अज्ञानता और उनकी आत्मा की बुराई को नज़रअंदाज़ करो, यहाँ तक कि उनके बारे में अल्लाह का आदेश आ जाए - और अब अल्लाह का यह आदेश और निर्णय आ चुका है। इसलिए काफ़िर को इस्लाम स्वीकारने या जिज़या देने या लड़ाई करने के बीच चयन करने का विकल्प दिया जाता है - निःसंदेह अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है। इसलिए वे अल्लाह को विवश नहीं कर सकते।
आयत 110
وَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُوا۟ ٱلزَّكَوٰةَ ۚ وَمَا تُقَدِّمُوا۟ لِأَنفُسِكُم مِّنْ خَيْرٍۢ تَجِدُوهُ عِندَ ٱللَّهِ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌۭ
وَأَقِيمُوا۟
और क़ायम करो
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَءَاتُوا۟
और अदा करो
ٱلزَّكَوٰةَ ۚ
ज़कात
وَمَا
और जो भी
تُقَدِّمُوا۟
तुम आगे भेजोगे
لِأَنفُسِكُم
अपने नफ़्सों के लिए
مِّنْ
of
خَيْرٍۢ
कोई ख़ैर
تَجِدُوهُ
तुम पाओगे उसे
عِندَ
with
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह के पास
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
بِمَا
उसको जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
بَصِيرٌۭ
ख़ूब देखने वाला है
और नमाज़ कायम करो और ज़कात दो और तुम स्वयं अपने लिए जो भलाई भी पेश करोगे, उसे अल्लाह के यहाँ मौजूद पाओगे। निस्संदेह जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा है
तफ़्सीर:
नमाज़ को उसके अरकान, वाजिबात और सुन्नतों के साथ पूर्ण रूप से अदा करो, और अपने धनों की ज़कात निकालकर उसके हक़दारों को दो। तुम अपने जीवन काल में जो भी नेक काम करोगे और उसे अपनी मृत्यु से पहले अपने लिए एक कोष के रूप में आगे भेजोगे; क़ियामत के दिन तुम अपने रब के पास उसका सवाब पाओगे। वह तुम्हें उसका प्रतिफल प्रदान करेगा। निःसंदेह अल्लाह, जो कुछ तुम करते हो, उसे ख़ूब देखने वाला है। इसलिए वह हर एक को उसके काम का प्रतिफल देगा।
आयत 111
وَقَالُوا۟ لَن يَدْخُلَ ٱلْجَنَّةَ إِلَّا مَن كَانَ هُودًا أَوْ نَصَـٰرَىٰ ۗ تِلْكَ أَمَانِيُّهُمْ ۗ قُلْ هَاتُوا۟ بُرْهَـٰنَكُمْ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
لَن
हरगिज़ नहीं
يَدْخُلَ
दाख़िल होगा
ٱلْجَنَّةَ
जन्नत में
إِلَّا
मगर
مَن
वो जो
كَانَ
हो
هُودًا
यहूदी
أَوْ
या
نَصَـٰرَىٰ ۗ
नस्रानी
تِلْكَ
ये
أَمَانِيُّهُمْ ۗ
तमन्नाऐं हैं उनकी
قُلْ
कह दीजिए
هَاتُوا۟
ले आओ
بُرْهَـٰنَكُمْ
दलील अपनी
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
और उनका कहना है, "कोई व्यक्ति जन्नत में प्रवेश नहीं करता सिवाय उससे जो यहूदी है या ईसाई है।" ये उनकी अपनी निराधार कामनाएँ है। कहो, "यदि तुम सच्चे हो तो अपने प्रमाण पेश करो।"
तफ़्सीर:
यहूदियों और ईसाइयों में से हर संप्रदाय ने कहा : जन्नत उन्हीं के लिए विशिष्ट है। यहूदियों ने कहा : उसमें केवल वही प्रवेश करेगा, जो यहूदी है। तथा ईसाइयों ने कहा : उसमें केवल वही प्रवेश करेगा, जो ईसाई है। ये उनकी झूठी इच्छाएँ और उनके भ्रष्ट भ्रम हैं। (ऐ नबी!) आप उनका खंडन करते हुए कह दीजिए : तुम जो कुछ दावा करते हो उसपर अपना तर्क प्रस्तुत करो, यदि वास्तव में तुम अपने दावे में सच्चे हो।
आयत 112
بَلَىٰ مَنْ أَسْلَمَ وَجْهَهُۥ لِلَّهِ وَهُوَ مُحْسِنٌۭ فَلَهُۥٓ أَجْرُهُۥ عِندَ رَبِّهِۦ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
بَلَىٰ
हाँ (क्यों नहीं)
مَنْ
जिसने
أَسْلَمَ
सुपुर्द कर दिया
وَجْهَهُۥ
चेहरा अपना
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
وَهُوَ
और वो
مُحْسِنٌۭ
मोहसिन हो
فَلَهُۥٓ
तो उसके लिए है
أَجْرُهُۥ
अजर उसका
عِندَ
पास
رَبِّهِۦ
उसके रब के
وَلَا
और ना
خَوْفٌ
कोई ख़ौफ़ होगा
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يَحْزَنُونَ
वो ग़मगीन होंगे
क्यों नहीं, जिसने भी अपने-आपको अल्लाह के प्रति समर्पित कर दिया और उसका कर्म भी अच्छे से अच्छा हो तो उसका प्रतिदान उसके रब के पास है और ऐसे लोगो के लिए न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे
तफ़्सीर:
केवल वही व्यक्ति जन्नत में प्रवेश करेगा, जो निष्ठा के साथ अपने आप को अल्लाह के अधीन कर दे, तथा वह - अपनी निष्ठा के साथ-साथ - रसूल के लाए हुए तरीक़े का अनुसरण करके अच्छी तरह से इबादत करने वाला है। चुनाँचे ऐसा ही व्यक्ति जन्नत में प्रवेश करेगा, चाहे वह किसी भी संप्रदाय से हो। तथा उसके लिए उसका बदला उसके पालनहार के पास है। आख़िरत में उन्हें न कोई भय होगा और न ही वे दुनिया में न मिलने वाली वस्तुओं पर दुखी होंगे। ज्ञात हो कि ये ऐसी विशेषताएँ हैं, जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आने के बाद, केवल मोमिनों ही में पाई जा सकती हैं।
आयत 113
وَقَالَتِ ٱلْيَهُودُ لَيْسَتِ ٱلنَّصَـٰرَىٰ عَلَىٰ شَىْءٍۢ وَقَالَتِ ٱلنَّصَـٰرَىٰ لَيْسَتِ ٱلْيَهُودُ عَلَىٰ شَىْءٍۢ وَهُمْ يَتْلُونَ ٱلْكِتَـٰبَ ۗ كَذَٰلِكَ قَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ مِثْلَ قَوْلِهِمْ ۚ فَٱللَّهُ يَحْكُمُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ فِيمَا كَانُوا۟ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ
وَقَالَتِ
और कहा
ٱلْيَهُودُ
यहूद ने
لَيْسَتِ
नहीं हैं
ٱلنَّصَـٰرَىٰ
नसारा
عَلَىٰ
(are) on
شَىْءٍۢ
किसी चीज़ पर
وَقَالَتِ
और कहा
ٱلنَّصَـٰرَىٰ
नसारा ने
لَيْسَتِ
नहीं हैं
ٱلْيَهُودُ
यहूद
عَلَىٰ
(are) on
شَىْءٍۢ
किसी चीज़ पर
وَهُمْ
हालाँकि वो
يَتْلُونَ
वो तिलावत करते हैं
ٱلْكِتَـٰبَ ۗ
किताब की
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
قَالَ
कहा
ٱلَّذِينَ
उन्होंने जो
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं इल्म रखते
مِثْلَ
मिसल/मानिन्द
قَوْلِهِمْ ۚ
उनकी बात के
فَٱللَّهُ
तो अल्लाह
يَحْكُمُ
फ़ैसला करेगा
بَيْنَهُمْ
दर्मियान उनके
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
فِيمَا
उसमें जो
كَانُوا۟
थे वो
فِيهِ
जिस में
يَخْتَلِفُونَ
वो इख़्तिलाफ़ करते
यहूदियों ने कहा, "ईसाईयों की कोई बुनियाद नहीं।" और ईसाइयों ने कहा, "यहूदियों की कोई बुनियाद नहीं।" हालाँकि वे किताब का पाठ करते है। इसी तरह की बात उन्होंने भी कही है जो ज्ञान से वंचित है। तो अल्लाह क़यामत के दिन उनके बीच उस चीज़ के विषय में निर्णय कर देगा, जिसके विषय में वे विभेद कर रहे है
तफ़्सीर:
यहूदियों ने कहा : ईसाई सच्चे धर्म पर नहीं हैं। और ईसाइयों ने कहा : यहूदी सच्चे धर्म पर नहीं हैं। हालाँकि हर कोई अपनी किताब में उस चीज़ की पुष्टि पढ़ता है जिसका उसने इनकार किया है, तथा सभी नबियों पर बिना किसी भेदभाव के ईमान लाने का आदेश पढ़ता है। वे अपने इस कार्य में उन मुश्रिकों के कहने के समान हो गए, जिनके पास कोई ज्ञान नहीं; जब उन्होंने सभी रसूलों और उनपर उतारी गई पुस्तकों का इनकार कर दिया। अतः अल्लाह सभी मतभेद करने वाले लोगों के बीच क़ियामत के दिन निर्णय करेगा, अपने उस न्यायपूर्ण फ़ैसले के साथ जिसकी उसने अपने बंदों को सूचना दी है : कि अल्लाह की उतारी हुई समस्त चीज़ों पर ईमान लाए बिना कोई सफलता नहीं है।
आयत 114
وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن مَّنَعَ مَسَـٰجِدَ ٱللَّهِ أَن يُذْكَرَ فِيهَا ٱسْمُهُۥ وَسَعَىٰ فِى خَرَابِهَآ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ مَا كَانَ لَهُمْ أَن يَدْخُلُوهَآ إِلَّا خَآئِفِينَ ۚ لَهُمْ فِى ٱلدُّنْيَا خِزْىٌۭ وَلَهُمْ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ عَذَابٌ عَظِيمٌۭ
وَمَنْ
और कौन
أَظْلَمُ
बड़ा ज़ालिम है
مِمَّن
उससे जो
مَّنَعَ
मना करे
مَسَـٰجِدَ
मस्जिदों से
ٱللَّهِ
अल्लाह की
أَن
कि
يُذْكَرَ
ज़िक्र किया जाए
فِيهَا
उनमें
ٱسْمُهُۥ
नाम उसका
وَسَعَىٰ
और वो कोशिश करे
فِى
for
خَرَابِهَآ ۚ
उनकी ख़राबी/वीरानी की
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
مَا
नहीं
كَانَ
है
لَهُمْ
उनके लिए
أَن
कि
يَدْخُلُوهَآ
वो दाख़िल हों उनमें
إِلَّا
मगर
خَآئِفِينَ ۚ
डरते हुए
لَهُمْ
उनके लिए
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
خِزْىٌۭ
रुस्वाई है
وَلَهُمْ
और उनके लिए
فِى
in
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत में
عَذَابٌ
अज़ाब है
عَظِيمٌۭ
बहुत बड़ा
और उससे बढ़कर अत्याचारी और कौन होगा जिसने अल्लाह की मस्जिदों को उसके नाम के स्मरण से वंचित रखा और उन्हें उजाडने पर उतारू रहा? ऐसे लोगों को तो बस डरते हुए ही उसमें प्रवेश करना चाहिए था। उनके लिए संसार में रुसवाई (अपमान) है और उनके लिए आख़िरत में बड़ी यातना नियत है
तफ़्सीर:
उस व्यक्ति से बड़ा अत्याचारी कोई नहीं है, जो अल्लाह की मस्जिदों में उसका नाम लेने से रोके। चुनाँचे उनमें नमाज़, ज़िक्र और क़ुरआन की तिलावत से मना कर दे, तथा उन्हें गिराकर अथवा उनमें इबादत करने से रोककर, उन्हें बर्बाद और भ्रष्ट करने का भरपूर प्रयास करे। जो लोग मस्जिदों को नष्ट करने में प्रयासरत हैं, उन्हें उनमें प्रवेश नहीं करना चाहिए परंतु इस स्थिति में कि वे डरे सहमे हों, उनके दिल काँप रहे हों; उनके कुफ़्र तथा अल्लाह की मस्जिदों से रोकने के कारण। ऐसे लोगों के लिए सांसारिक जीवन में ईमान वालों के हाथों अपमान एवं रुसवाई है तथा उनके लिए आख़िरत में अल्लाह की मस्जिदों से लोगों को रोकने के कारण एक बड़ी यातना होगी।
आयत 115
وَلِلَّهِ ٱلْمَشْرِقُ وَٱلْمَغْرِبُ ۚ فَأَيْنَمَا تُوَلُّوا۟ فَثَمَّ وَجْهُ ٱللَّهِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ وَٰسِعٌ عَلِيمٌۭ
وَلِلَّهِ
और अल्लाह ही के लिए हैं
ٱلْمَشْرِقُ
मशरिक़
وَٱلْمَغْرِبُ ۚ
और मग़रिब
فَأَيْنَمَا
फिर जिस तरफ़
تُوَلُّوا۟
तुम मुँह करोगे
فَثَمَّ
तो वहीं है
وَجْهُ
चेहरा
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह का
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
وَٰسِعٌ
वुसअत वाला है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
पूरब और पश्चिम अल्लाह ही के है, अतः जिस ओर भी तुम रुख करो उसी ओर अल्लाह का रुख़ है। निस्संदेह अल्लाह बड़ा समाईवाला (सर्वव्यापी) सर्वज्ञ है
तफ़्सीर:
पूर्व एवं पश्चिम और उनके बीच का राज्य अल्लाह ही का है। अल्लाह अपने बंदों को जो चाहता है, आदेश देता है। अतः तुम जिधर भी मुख करोगे, अल्लाह का सामना करोगे। यदि वह तुम्हें बैतुल-मक़दिस या काबा की ओर मुँह करने का आदेश दे, अथवा तुमसे क़िबला (के निर्धारण) में गलती हो जाए, या उसकी ओर मुख करना तुम्हारे लिए मुश्किल हो; तो तुम्हारे लिए कोई हानि की बात नहीं है; क्योंकि सभी दिशाएँ सर्वशक्तिमान अल्लाह के लिए हैं। बेशक अल्लाह सर्वव्यापी है। वह अपनी दया और सुविधा के साथ अपनी समस्त सृष्टि को व्याप्त है, उनके इरादों एवं कार्यों को जानने वाला है।
आयत 116
وَقَالُوا۟ ٱتَّخَذَ ٱللَّهُ وَلَدًۭا ۗ سُبْحَـٰنَهُۥ ۖ بَل لَّهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ كُلٌّۭ لَّهُۥ قَـٰنِتُونَ
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
ٱتَّخَذَ
बना ली
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
وَلَدًۭا ۗ
कोई औलाद
سُبْحَـٰنَهُۥ ۖ
पाक है वो
بَل
बल्कि
لَّهُۥ
उसी के लिए है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ ۖ
और ज़मीन में है
كُلٌّۭ
सब
لَّهُۥ
उसी के
قَـٰنِتُونَ
फ़रमाबरदार हैं
कहते है, अल्लाह औलाद रखता है - महिमावाला है वह! (पूरब और पश्चिम हीं नहीं, बल्कि) आकाशों और धरती में जो कुछ भी है, उसी का है। सभी उसके आज्ञाकारी है
तफ़्सीर:
तथा यहूदियों, ईसाइयों और मुश्रिकों ने कहा : अल्लाह ने अपने लिए कोई संतान बना रखी है! अल्लाह इससे पाक एवं पवित्र है। क्योंकि वह अपनी सृष्टि से बेनियाज़ है और संतान तो वह बनाता है, जिसे उसकी आवश्यकता होती है। बल्कि वही महिमावान आकाशों और धरती की सभी चीज़ों का मालिक है। सभी प्राणी उसी महिमावान के दास और उसके अधीन हैं, वह जैसे चाहता है, उनमें व्यवहार करता है।
आयत 117
بَدِيعُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ وَإِذَا قَضَىٰٓ أَمْرًۭا فَإِنَّمَا يَقُولُ لَهُۥ كُن فَيَكُونُ
بَدِيعُ
ईजाद करने वाला है
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ ۖ
और ज़मीन का
وَإِذَا
और जब
قَضَىٰٓ
वो फ़ैसला करता है
أَمْرًۭا
किसी काम का
فَإِنَّمَا
तो बेशक
يَقُولُ
वो कहता है
لَهُۥ
उसके लिए
كُن
हो जा
فَيَكُونُ
तो वो हो जाता है
वह आकाशों और धरती का प्रथमतः पैदा करनेवाला है। वह तो जब किसी काम का निर्णय करता है, तो उसके लिए बस कह देता है कि "हो जा" और वह हो जाता है
तफ़्सीर:
अल्लाह महिमावान आकाशों तथा धरती और उनमें मौजूद सभी चीज़ों का बिना किसी पूर्व उदाहरण के सृष्टिकर्ता है। जब वह किसी काम का फैसला करता है और उसकी इच्छा करता है, तो उस काम से कहता है : ''हो जा''; तो वह वैसे ही हो जाता है, जैसे अल्लाह चाहता है कि वह हो। उसके आदेश और निर्णय को कोई टालने वाला नहीं।
आयत 118
وَقَالَ ٱلَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ لَوْلَا يُكَلِّمُنَا ٱللَّهُ أَوْ تَأْتِينَآ ءَايَةٌۭ ۗ كَذَٰلِكَ قَالَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِم مِّثْلَ قَوْلِهِمْ ۘ تَشَـٰبَهَتْ قُلُوبُهُمْ ۗ قَدْ بَيَّنَّا ٱلْـَٔايَـٰتِ لِقَوْمٍۢ يُوقِنُونَ
وَقَالَ
और कहा
ٱلَّذِينَ
उन्होंने जो
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं इल्म रखते
لَوْلَا
क्यों नहीं
يُكَلِّمُنَا
कलाम करता हमसे
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَوْ
या
تَأْتِينَآ
आती हमारे पास
ءَايَةٌۭ ۗ
कोई निशानी
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
قَالَ
कहा था
ٱلَّذِينَ
उन्होंने जो
مِن
from
قَبْلِهِم
उनसे पहले थे
مِّثْلَ
मिसल/मानिन्द
قَوْلِهِمْ ۘ
उनकी बात के
تَشَـٰبَهَتْ
मुशाबेह हो गए
قُلُوبُهُمْ ۗ
दिल उनके
قَدْ
तहक़ीक़
بَيَّنَّا
वाज़ेह कर दीं हमने
ٱلْـَٔايَـٰتِ
आयात
لِقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يُوقِنُونَ
जो यक़ीन रखते हैं
जिन्हें ज्ञान नहीं हैं, वे कहते है, "अल्लाह हमसे बात क्यों नहीं करता? या कोई निशानी हमारे पास आ जाए।" इसी प्रकार इनसे पहले के लोग भी कह चुके है। इन सबके दिल एक जैसे है। हम खोल-खोलकर निशानियाँ उन लोगों के लिए बयान कर चुके है जो विश्वास करें
तफ़्सीर:
अह्ले किताब और बहुदेववादियों में से जो नहीं जानते, उन्होंने सत्य के प्रति हठ के कारण कहा : अल्लाह हमसे बिना किसी मध्यस्थ के बात क्यों नहीं करता, या हमारे पास हमारे ही लिए विशिष्ट कोई भौतिक निशानी क्यों नहीं आती? इन लोगों की इसी बात की तरह, इससे पहले झुठलाने वाले समुदायों ने भी अपने रसूलों से कही थी, भले ही उनके समय और स्थान अलग-अलग हों। इन लोगों के दिल कुफ़्र, हठ और अहंकार में उन लोगों के दिलों के समान हैं जो इनसे पहले थे। हमने उन लोगों के लिए आयतें स्पष्ट कर दी हैं, जो सत्य पर विश्वास करते हैं, जब वह उनके सामने प्रकट होता है, न तो उन्हें कोई संदेह घेरता है और न ही हठ उन्हें रोकता है।
आयत 119
إِنَّآ أَرْسَلْنَـٰكَ بِٱلْحَقِّ بَشِيرًۭا وَنَذِيرًۭا ۖ وَلَا تُسْـَٔلُ عَنْ أَصْحَـٰبِ ٱلْجَحِيمِ
إِنَّآ
बेशक हमने
أَرْسَلْنَـٰكَ
भेजा हमने आपको
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
بَشِيرًۭا
ख़ुशख़बरी देने वाला
وَنَذِيرًۭا ۖ
और डराने वाला (बनाकर)
وَلَا
And not
تُسْـَٔلُ
और ना आपसे सवाल किया जाएगा
عَنْ
about
أَصْحَـٰبِ
साथियों के बारे में
ٱلْجَحِيمِ
जहन्नम के
निश्चित रूप से हमने तुम्हें हक़ के साथ शुभ-सूचना देनेवाला और डरानेवाला बनाकर भेजा। भड़कती आग में पड़नेवालों के विषय में तुमसे कुछ न पूछा जाएगा
तफ़्सीर:
हमने आपको (ऐ नबी!) सत्य धर्म के साथ भेजा है, जिसमें कोई संदेह नहीं; ताकि आप ईमान वालों को जन्नत की शुभ सूचना दें और काफ़िरों को जहन्नम की आग से डराएँ। आपका काम केवल स्पष्ट रूप से पहुँचा देना है। अल्लाह आपसे उन जहन्नमियों के बारे में हरगिज़ नहीं पूछेगा, जो आपपर ईमान नहीं लाए।
आयत 120
وَلَن تَرْضَىٰ عَنكَ ٱلْيَهُودُ وَلَا ٱلنَّصَـٰرَىٰ حَتَّىٰ تَتَّبِعَ مِلَّتَهُمْ ۗ قُلْ إِنَّ هُدَى ٱللَّهِ هُوَ ٱلْهُدَىٰ ۗ وَلَئِنِ ٱتَّبَعْتَ أَهْوَآءَهُم بَعْدَ ٱلَّذِى جَآءَكَ مِنَ ٱلْعِلْمِ ۙ مَا لَكَ مِنَ ٱللَّهِ مِن وَلِىٍّۢ وَلَا نَصِيرٍ
وَلَن
और हरगिज़ नहीं
تَرْضَىٰ
राज़ी होंगे
عَنكَ
आप से
ٱلْيَهُودُ
यहूद
وَلَا
और ना
ٱلنَّصَـٰرَىٰ
नसारा
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
تَتَّبِعَ
आप पैरवी करें
مِلَّتَهُمْ ۗ
उनके तरीक़े की
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّ
बेशक
هُدَى
हिदायत
ٱللَّهِ
अल्लाह की
هُوَ
वो ही
ٱلْهُدَىٰ ۗ
हिदायत है
وَلَئِنِ
और अलबत्ता अगर
ٱتَّبَعْتَ
पैरवी की आपने
أَهْوَآءَهُم
उनकी ख़्वाहिशात की
بَعْدَ
बाद उसके
ٱلَّذِى
जो
جَآءَكَ
आ गया आपके पास
مِنَ
of
ٱلْعِلْمِ ۙ
इल्म में से
مَا
नहीं
لَكَ
आपके लिए
مِنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह से (बचाने वाला)
مِن
any
وَلِىٍّۢ
कोई हिमायती
وَلَا
और ना
نَصِيرٍ
कोई मददगार
न यहूदी तुमसे कभी राज़ी होनेवाले है और न ईसाई जब तक कि तुम अनके पंथ पर न चलने लग जाओ। कह दो, "अल्लाह का मार्गदर्शन ही वास्तविक मार्गदर्शन है।" और यदि उस ज्ञान के पश्चात जो तुम्हारे पास आ चुका है, तुमने उनकी इच्छाओं का अनुसरण किया, तो अल्लाह से बचानेवाला न तो तुम्हारा कोई मित्र होगा और न सहायक
तफ़्सीर:
अल्लाह अपने नबी को निर्देश एवं चेतावनी देते हुए उन्हें संबोधित करते हुए कहता है : आपसे यहूदी और ईसाई हरगिज़ राज़ी नहीं होंगे, यहाँ तक कि आप इस्लाम को छोड़कर उनके धर्म का पालन करने लगें। आप कह दीजिए : निःसंदेह अल्लाह की किताब और उसका बयान ही सच्चा मार्गदर्शन है, न कि वह झूठ जिसपर वे क़ायम हैं। यदि आपके पास स्पष्ट सत्य आ जाने के बाद, आपने या आपके किसी अनुयायी ने उनका अनुसरण किया, तो आपको अल्लाह की पकड़ से बचाने के लिए हरगिज़ कोई मदद या सहायता नहीं मिलेगी। यह सत्य को छोड़ने और असत्य के लोगों के साथ क़दम मिलाकर चलने के ख़तरे को स्पष्ट करने के अध्याय से है।
आयत 121
ٱلَّذِينَ ءَاتَيْنَـٰهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ يَتْلُونَهُۥ حَقَّ تِلَاوَتِهِۦٓ أُو۟لَـٰٓئِكَ يُؤْمِنُونَ بِهِۦ ۗ وَمَن يَكْفُرْ بِهِۦ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْخَـٰسِرُونَ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ءَاتَيْنَـٰهُمُ
दी हमने उन्हें
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
يَتْلُونَهُۥ
वो तिलावत करते हैं उसकी
حَقَّ
हक़ है (जैसा)
تِلَاوَتِهِۦٓ
उसकी तिलावत का
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
يُؤْمِنُونَ
जो ईमान लाते हैं
بِهِۦ ۗ
उस पर
وَمَن
और जो कोई
يَكْفُرْ
कुफ़्र करेगा
بِهِۦ
उसका
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْخَـٰسِرُونَ
जो ख़सारा पाने वाले हैं
जिन लोगों को हमने किताब दी है उनमें वे लोग जो उसे उस तरह पढ़ते है जैसा कि उसके पढ़ने का हक़ है, वही उसपर ईमान ला रहे है, और जो उसका इनकार करेंगे, वही घाटे में रहनेवाले है
तफ़्सीर:
इस आयत में क़ुरआन अह्ले किताब के एक समूह के बारे में बात करता है, जो अपने हाथों में मौजूद अवतरित पुस्तकों पर अमल करते हैं और उनका पालन करते हैं जैसे उनका पालन किया जाना चाहिए। ये लोग इन पुस्तकों में नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सच्चे नबी होने को दर्शाने वाली निशानियाँ पाते हैं। यही कारण है कि उन्होंने आपपर ईमान लाने में जल्दी की। जबकि दूसरा समूह अपने कुफ़्र पर अड़ा रहा, तो उसे हानि उठानी पड़ी।
आयत 122
يَـٰبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ ٱذْكُرُوا۟ نِعْمَتِىَ ٱلَّتِىٓ أَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَأَنِّى فَضَّلْتُكُمْ عَلَى ٱلْعَـٰلَمِينَ
يَـٰبَنِىٓ
O Children
إِسْرَٰٓءِيلَ
ऐ बनी इस्राईल
ٱذْكُرُوا۟
याद करो
نِعْمَتِىَ
मेरी नेअमत को
ٱلَّتِىٓ
वो जो
أَنْعَمْتُ
इनाम की मैंने
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَأَنِّى
और बेशक मैं
فَضَّلْتُكُمْ
फ़ज़ीलत दी थी मैंने तुम्हें
عَلَى
over
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों पर
ऐ इसराईल की सन्तान! मेरी उस कृपा को याद करो जो मैंने तुमपर की थी और यह कि मैंने तुम्हें संसारवालों पर श्रेष्ठता प्रदान की
तफ़्सीर:
ऐ बनी इसराईल! मेरी प्रदान की हुई धार्मिक एवं सांसारिक नेमतों को याद करो और याद रखो कि निःसंदेह मैंने ही तुम्हें तुम्हारे समय के लोगों पर नुबुव्वत एवं बादशाहत द्वारा प्रधानता प्रदान की।
आयत 123
وَٱتَّقُوا۟ يَوْمًۭا لَّا تَجْزِى نَفْسٌ عَن نَّفْسٍۢ شَيْـًۭٔا وَلَا يُقْبَلُ مِنْهَا عَدْلٌۭ وَلَا تَنفَعُهَا شَفَـٰعَةٌۭ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
يَوْمًۭا
उस दिन से
لَّا
not
تَجْزِى
नहीं काम आएगा
نَفْسٌ
कोई नफ़्स
عَن
(of)
نَّفْسٍۢ
किसी नफ़्स के
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
وَلَا
और ना
يُقْبَلُ
क़ुबूल किया जाएगा
مِنْهَا
उससे
عَدْلٌۭ
कोई बदला
وَلَا
और ना
تَنفَعُهَا
नफ़ा देगी उसे
شَفَـٰعَةٌۭ
कोई सिफ़ारिश
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يُنصَرُونَ
वो मदद किए जाऐंगे
और उस दिन से डरो, जब कोई न किसी के काम आएगा, न किसी की ओर से अर्थदंड स्वीकार किया जाएगा, और न कोई सिफ़ारिश ही उसे लाभ पहुँचा सकेगी, और न उनको कोई सहायता ही पहुँच सकेगी
तफ़्सीर:
अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर अपने और क़ियामत के दिन की यातना के बीच, बचाव का साधन अपनाओ। क्योंकि उस दिन कोई भी किसी के कुछ काम न आएगा, और उस दिन उससे कोई छुड़ौती स्वीकार नहीं की जाएगी, चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो, और न उस दिन उसे किसी की सिफ़ारिश लाभ देगी, चाहे उसका स्थान कितना भी ऊँचा क्यों न हो। और न ही अल्लाह के अलावा उसके लिए कोई मददगार होगा, जो उसकी मदद कर सके।
आयत 124
۞ وَإِذِ ٱبْتَلَىٰٓ إِبْرَٰهِـۧمَ رَبُّهُۥ بِكَلِمَـٰتٍۢ فَأَتَمَّهُنَّ ۖ قَالَ إِنِّى جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًۭا ۖ قَالَ وَمِن ذُرِّيَّتِى ۖ قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِى ٱلظَّـٰلِمِينَ
۞ وَإِذِ
और जब
ٱبْتَلَىٰٓ
आज़माया
إِبْرَٰهِـۧمَ
इब्राहीम को
رَبُّهُۥ
उसके रब ने
بِكَلِمَـٰتٍۢ
चंद कलिमात से
فَأَتَمَّهُنَّ ۖ
तो उसने पूरा कर दिया उन्हें
قَالَ
फ़रमाया
إِنِّى
बेशक मैं
جَاعِلُكَ
बनाने वाला हूँ तुझे
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
إِمَامًۭا ۖ
इमाम
قَالَ
कहा
وَمِن
And from
ذُرِّيَّتِى ۖ
और मेरी औलाद में से
قَالَ
फ़रमाया
لَا
(Does) not
يَنَالُ
नहीं पहुँचेगा
عَهْدِى
अहद मेरा
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों को
और याद करो जब इबराहीम की उसके रब से कुछ बातों में परीक्षा ली तो उसने उसको पूरा कर दिखाया। उसने कहा, "मैं तुझे सारे इनसानों का पेशवा बनानेवाला हूँ।" उसने निवेदन किया, " और मेरी सन्तान में भी।" उसने कहा, "ज़ालिम मेरे इस वादे के अन्तर्गत नहीं आ सकते।"
तफ़्सीर:
उस समय को याद करो, जब अल्लाह ने इबराहीम अलैहिस्सलाम को उन आदेशों और कर्तव्यों के द्वारा आज़माया, जिनका उन्हें आदेश दिया था, तो उन्होंने उनका निष्पादन किया और उन्हें पूर्णतम रूप से अंजाम दिया। अल्लाह ने अपने नबी इबराहीम अलैहिस्सलाम से कहा : मैं तुम्हें लोगों के लिए आदर्श बनाने वाला हूँ, ताकि तुम्हारे क्रियाकलापों और आचार-व्यवहार में तुम्हारा अनुकरण किया जाए। इबराहीम अलैहिस्सलाम ने कहा : ऐ मेरे पालनहार! मेरी औलाद में से भी कुछ लोगों को इमाम बना, जिनका लोग अनुकरण करें। अल्लाह तआला ने उन्हें उत्तर देते हुए कहा : मेरा तुम्हारे लिए धर्म की पेशवाई का वचन, तुम्हारे वंश के अत्याचारियों को नहीं पहुँचता।
आयत 125
وَإِذْ جَعَلْنَا ٱلْبَيْتَ مَثَابَةًۭ لِّلنَّاسِ وَأَمْنًۭا وَٱتَّخِذُوا۟ مِن مَّقَامِ إِبْرَٰهِـۧمَ مُصَلًّۭى ۖ وَعَهِدْنَآ إِلَىٰٓ إِبْرَٰهِـۧمَ وَإِسْمَـٰعِيلَ أَن طَهِّرَا بَيْتِىَ لِلطَّآئِفِينَ وَٱلْعَـٰكِفِينَ وَٱلرُّكَّعِ ٱلسُّجُودِ
وَإِذْ
और जब
جَعَلْنَا
बनाया हमने
ٱلْبَيْتَ
बैतुल्लाह को
مَثَابَةًۭ
लौटने की जगह/मरकज़
لِّلنَّاسِ
लोगों के लिए
وَأَمْنًۭا
और अमन की जगह
وَٱتَّخِذُوا۟
और बना लो
مِن
[from]
مَّقَامِ
(the) standing place
إِبْرَٰهِـۧمَ
मक़ामे इब्राहीम को
مُصَلًّۭى ۖ
जाए नमाज़
وَعَهِدْنَآ
और अहद लिया हमने
إِلَىٰٓ
with
إِبْرَٰهِـۧمَ
इब्राहीम से
وَإِسْمَـٰعِيلَ
और इस्माईल से
أَن
कि
طَهِّرَا
तुम दोनों पाक करो
بَيْتِىَ
मेरे घर को
لِلطَّآئِفِينَ
वास्ते तवाफ़ करने वालों के
وَٱلْعَـٰكِفِينَ
और एतकाफ़ करने वालों
وَٱلرُّكَّعِ
और रुकू करने वालों
ٱلسُّجُودِ
सजदा करने वालों के
और याद करो जब हमने इस घर (काबा) को लोगों को लिए केन्द्र और शान्तिस्थल बनाया - और, "इबराहीम के स्थल में से किसी जगह को नमाज़ की जगह बना लो!" - और इबराहीम और इसमाईल को ज़िम्मेदार बनाया। "तुम मेरे इस घर को तवाफ़ करनेवालों और एतिकाफ़ करनेवालों के लिए और रुकू और सजदा करनेवालों के लिए पाक-साफ़ रखो।"
तफ़्सीर:
तथा उस समय को याद करो, जब अल्लाह ने सम्मानित घर काबा को लोगों के लिए बार-बार लौट कर आने की जगह बनाई, जिससे उनका दिल जुड़ा हुआ रहता है। जब भी वे वहाँ से वापस जाते हैं, दोबारा उसकी ओर लौटकर आते हैं। तथा उसे उनके लिए सर्वथा शांति का स्थल (सुरक्षित स्थान) बना दिया, जिसमें उनपर कोई अत्याचार नहीं किया जाता। और लोगों से कहा : उस पत्थर को - जिसपर खड़े होकर इबराहीम अलैहिस्सलाम काबा का निर्माण करते थे - नमाज़ की जगह बना लो। तथा हमने इबराहीम और उनके पुत्र इसमाईल अलैहिमस्सलाम को आदेश दिया कि वे काबा को गंदगियों और मूर्तियों से शुद्ध करें, तथा उसे तवाफ़, एतिकाफ़ और नमाज़ आदि के द्वारा इबादत करने वालों के लिए तैयार रखें।
आयत 126
وَإِذْ قَالَ إِبْرَٰهِـۧمُ رَبِّ ٱجْعَلْ هَـٰذَا بَلَدًا ءَامِنًۭا وَٱرْزُقْ أَهْلَهُۥ مِنَ ٱلثَّمَرَٰتِ مَنْ ءَامَنَ مِنْهُم بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۖ قَالَ وَمَن كَفَرَ فَأُمَتِّعُهُۥ قَلِيلًۭا ثُمَّ أَضْطَرُّهُۥٓ إِلَىٰ عَذَابِ ٱلنَّارِ ۖ وَبِئْسَ ٱلْمَصِيرُ
وَإِذْ
और जब
قَالَ
कहा
إِبْرَٰهِـۧمُ
इब्राहीम ने
رَبِّ
ऐ मेरे रब
ٱجْعَلْ
बना दे
هَـٰذَا
इसे
بَلَدًا
शहर
ءَامِنًۭا
अमन वाला
وَٱرْزُقْ
और रिज़्क़ दे
أَهْلَهُۥ
इसके रहने वालों को
مِنَ
with
ٱلثَّمَرَٰتِ
फलों में से
مَنْ
जो कोई
ءَامَنَ
ईमान लाए
مِنْهُم
उनमें से
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَٱلْيَوْمِ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرِ ۖ
और आख़िरी दिन पर
قَالَ
फ़रमाया
وَمَن
और जिसने
كَفَرَ
कुफ़्र किया
فَأُمَتِّعُهُۥ
तो मै फ़ायदा दूँगा उसे
قَلِيلًۭا
थोड़ा सा
ثُمَّ
फिर
أَضْطَرُّهُۥٓ
मैं मजबूर कर दूँगा उसे
إِلَىٰ
तरफ़
عَذَابِ
अज़ाब
ٱلنَّارِ ۖ
आग के
وَبِئْسَ
और कितनी बुरी है
ٱلْمَصِيرُ
लौटने की जगह
और याद करो जब इबराहीम ने कहा, "ऐ मेरे रब! इसे शान्तिमय भू-भाग बना दे और इसके उन निवासियों को फलों की रोज़ी दे जो उनमें से अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान लाएँ।" कहा, "और जो इनकार करेगा थोड़ा फ़ायदा तो उसे भी दूँगा, फिर उसे घसीटकर आग की यातना की ओर पहुँचा दूँगा और वह बहुत-ही बुरा ठिकाना है!"
तफ़्सीर:
तथा (ऐ नबी!) याद कीजिए, जब इबराहीम अलैहिस्सलाम ने अपने पालनहार से दुआ करते हुए कहा : ऐ मेरे पालनहार! मक्का को एक शांति वाला (सुरक्षित) शहर बना दे, जिसमें किसी को कष्ट न पहुँचाया जाए, तथा उसमें रहने वालों को विभिन्न प्रकार के फल प्रदान कर, और उसे तुझपर और अंतिम दिन पर ईमान रखने वालों के लिए एक विशिष्ट रोज़ी बना दे। अल्लाह ने कहा : तथा उनमें से जो कुफ़्र करेगा, तो मैं उसे इस दुनिया में जो कुछ भी प्रदान करता हूँ, उसके साथ उसे थोड़ा-सा लाभ दूँगा, फिर आखिरत में उसे आग की यातना की ओर विवश कर दूँगा और वह बहुत बुरा ठिकाना है, जिसकी ओर वह क़ियामत के दिन लौटकर आएगा।
आयत 127
وَإِذْ يَرْفَعُ إِبْرَٰهِـۧمُ ٱلْقَوَاعِدَ مِنَ ٱلْبَيْتِ وَإِسْمَـٰعِيلُ رَبَّنَا تَقَبَّلْ مِنَّآ ۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ
وَإِذْ
और जब
يَرْفَعُ
बुलन्द कर रहे थे
إِبْرَٰهِـۧمُ
इब्राहीम
ٱلْقَوَاعِدَ
बुनियादें
مِنَ
of
ٱلْبَيْتِ
बैतुल्लाह की
وَإِسْمَـٰعِيلُ
और इस्माईल
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
تَقَبَّلْ
तू क़ुबूल फ़रमा
مِنَّآ ۖ
हम से
إِنَّكَ
बेशक तू
أَنتَ
तू ही है
ٱلسَّمِيعُ
ख़ूब सुनने वाला
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब जानने वाला
और याद करो जब इबराहीम और इसमाईल इस घर की बुनियादें उठा रहे थे, (तो उन्होंने प्रार्थना की), "ऐ हमारे रब! हमारी ओर से इसे स्वीकार कर ले, निस्संदेह तू सुनता-जानता है
तफ़्सीर:
तथा (ऐ नबी!) उस समय को याद करो, जब इबराहीम और इसमाईल अलैहिमस्सलाम काबा की बुनियादें ऊँची कर रहे थे, और वे दोनों (नम्रता के साथ) कह रहे थे : ऐ हमारे पालनहार! हमसे हमारे कार्यों को - जिनमें से एक इस घर का निर्माण है - क़बूल फरमा। निःसंदेह तू ही हमारी दुआ को सुनने वाला, हमारे इरादों और कार्यों को जानने वाला है।
आयत 128
رَبَّنَا وَٱجْعَلْنَا مُسْلِمَيْنِ لَكَ وَمِن ذُرِّيَّتِنَآ أُمَّةًۭ مُّسْلِمَةًۭ لَّكَ وَأَرِنَا مَنَاسِكَنَا وَتُبْ عَلَيْنَآ ۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
وَٱجْعَلْنَا
और बना हमें
مُسْلِمَيْنِ
फ़रमाबरदार
لَكَ
अपने लिए
وَمِن
And from
ذُرِّيَّتِنَآ
और हमारी औलाद में से
أُمَّةًۭ
एक उम्मत
مُّسْلِمَةًۭ
फ़रमाबरदार
لَّكَ
अपने लिए
وَأَرِنَا
और दिखा हमें
مَنَاسِكَنَا
हमारी इबादत के तरीक़े
وَتُبْ
और मेहरबान हो
عَلَيْنَآ ۖ
हम पर
إِنَّكَ
बेशक तू
أَنتَ
तू ही है
ٱلتَّوَّابُ
बहुत तौबा क़ुबूल करने वाला
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला
ऐ हमारे रब! हम दोनों को अपना आज्ञाकारी बना और हमारी संतान में से अपना एक आज्ञाकारी समुदाय बना; और हमें हमारे इबादत के तरीक़े बता और हमारी तौबा क़बूल कर। निस्संदेह तू तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
ऐ हमारे पालनहार! तू हमें अपने आदेश के प्रति समर्पित होने वाला और अपना आज्ञाकारी बना दे कि हम तेरे साथ किसी को भी साझी न बनाएँ। तथा हमारे वंश से भी एक ऐसा समुदाय बना, जो तेरा आज्ञाकारी हो। और हमें अपनी इबादत सिखा दे कि वह कैसे होनी चाहिए, तथा हमारे गुनाहों और अपने आज्ञापालन में हमारी कमियों को क्षमा कर दे; निःसंदेह तू ही है जो अपने तौबा करने वाले बंदों की तौबा को बहुत क़बूल करने वाला, उनपर अत्यंत दयालु है।
आयत 129
رَبَّنَا وَٱبْعَثْ فِيهِمْ رَسُولًۭا مِّنْهُمْ يَتْلُوا۟ عَلَيْهِمْ ءَايَـٰتِكَ وَيُعَلِّمُهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْحِكْمَةَ وَيُزَكِّيهِمْ ۚ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
وَٱبْعَثْ
और मबऊस फ़रमा
فِيهِمْ
उनमें
رَسُولًۭا
एक रसूल को
مِّنْهُمْ
उन्ही में से
يَتْلُوا۟
वो तिलावत करे
عَلَيْهِمْ
उन पर
ءَايَـٰتِكَ
आयात तेरी
وَيُعَلِّمُهُمُ
और वो तालीम दे उन्हें
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
وَٱلْحِكْمَةَ
और हिकमत की
وَيُزَكِّيهِمْ ۚ
और वो तज़किया करे उनका
إِنَّكَ
बेशक तू
أَنتَ
तू ही है
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिकमत वाला
ऐ हमारे रब! उनमें उन्हीं में से एक ऐसा रसूल उठा जो उन्हें तेरी आयतें सुनाए और उनको किताब और तत्वदर्शिता की शिक्षा दे और उन (की आत्मा) को विकसित करे। निस्संदेह तू प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
ऐ हमारे पालनहार!, और उनके बीच उन्हीं में से इसमाईल की संतान से एक रसूल भेज, जो उनपर तेरी उतारी हुई आयतें पढ़े, तथा उन्हें क़ुरआन एवं सुन्नत की शिक्षा दे और उन्हें शिर्क एवं बुराइयों से पाक करे; निःसंदेह तू ही सर्वशक्तिमान, प्रभुत्वशाली और अपने कार्यों एवं आदेशों में पूर्ण हिकमत वाला है।
आयत 130
وَمَن يَرْغَبُ عَن مِّلَّةِ إِبْرَٰهِـۧمَ إِلَّا مَن سَفِهَ نَفْسَهُۥ ۚ وَلَقَدِ ٱصْطَفَيْنَـٰهُ فِى ٱلدُّنْيَا ۖ وَإِنَّهُۥ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ لَمِنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ
وَمَن
और कौन है
يَرْغَبُ
जो मुँह मोड़े
عَن
from
مِّلَّةِ
तरीक़े से
إِبْرَٰهِـۧمَ
इब्राहीम के
إِلَّا
मगर
مَن
वो जिसने
سَفِهَ
बेवक़ूफ़ बनाया
نَفْسَهُۥ ۚ
अपने नफ़्स को
وَلَقَدِ
और अलबत्ता तहक़ीक़
ٱصْطَفَيْنَـٰهُ
चुन लिया था हमने उसे
فِى
in
ٱلدُّنْيَا ۖ
दुनिया में
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
فِى
in
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत में
لَمِنَ
surely (will be) among
ٱلصَّـٰلِحِينَ
अलबत्ता सालेह लोगों में से है
कौन है जो इबराहीम के पंथ से मुँह मोड़े सिवाय उसके जिसने स्वयं को पतित कर लिया? और उसे तो हमने दुनिया में चुन लिया था और निस्संदेह आख़िरत में उसकी गणना योग्य लोगों में होगी
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम के धर्म से विमुख होकर दूसरे धर्मों की ओर वही आकर्षित होगा, जिसने अपनी मूर्खता तथा कुप्रबंधन से सत्य को छोड़ गुमराही को अपनाकर अपने ऊपर अत्याचार किया और अपने लिए अपमान से संतुष्ट हो गया। निश्चय हमने उसे दुनिया में एक रसूल और दोस्त के रूप में चुन लिया, तथा आख़िरत में वह निश्चय उन सदाचारियों में से है, जिन्होंने अपने ऊपर अल्लाह के अनिवार्य किए हुए आदेशों को पूरा करके सर्वोच्च पद प्राप्त किए।
आयत 131
إِذْ قَالَ لَهُۥ رَبُّهُۥٓ أَسْلِمْ ۖ قَالَ أَسْلَمْتُ لِرَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
إِذْ
जब
قَالَ
कहा
لَهُۥ
उसको
رَبُّهُۥٓ
उसके रब ने
أَسْلِمْ ۖ
फ़रमाबरदार हो जा
قَالَ
उसने कहा
أَسْلَمْتُ
मैं फ़रमाबरदार हो गया
لِرَبِّ
रब के लिए
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों के
क्योंकि जब उससे रब ने कहा, "मुस्लिम (आज्ञाकारी) हो जा।" उसने कहा, "मैं सारे संसार के रब का मुस्लिम हो गया।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उन्हें उनके इस्लाम (आज्ञापालन) की ओर जल्दी करने के कारण चुना। जब उनके पालनहार ने उनसे कहा : इबादत को मेरे लिए विशुद्ध कर दो और आज्ञाकारिता के साथ मेरे अधीन हो जाओ, तो उन्होंने अपने रब को उत्तर देते हुए कहा : मैं अल्लाह का आज्ञाकारी हो गया, जो बंदों को पैदा करने वाला, उन्हें रोज़ी देने वाला और उनके मामलों का प्रबंधक है।
आयत 132
وَوَصَّىٰ بِهَآ إِبْرَٰهِـۧمُ بَنِيهِ وَيَعْقُوبُ يَـٰبَنِىَّ إِنَّ ٱللَّهَ ٱصْطَفَىٰ لَكُمُ ٱلدِّينَ فَلَا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَأَنتُم مُّسْلِمُونَ
وَوَصَّىٰ
और वसीयत की
بِهَآ
उसकी
إِبْرَٰهِـۧمُ
इब्राहीम ने
بَنِيهِ
अपने बेटों को
وَيَعْقُوبُ
और याक़ूब ने
يَـٰبَنِىَّ
ऐ मेरे बेटो
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
ٱصْطَفَىٰ
चुन लिया
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلدِّينَ
दीन को
فَلَا
so not
تَمُوتُنَّ
पस तुम हरगिज़ ना मरना
إِلَّا
मगर
وَأَنتُم
इस हाल में कि तुम
مُّسْلِمُونَ
मुसलमान हो
और इसी की वसीयत इबराहीम ने अपने बेटों को की और याक़ूब ने भी (अपनी सन्तानों को की) कि, "ऐ मेरे बेटों! अल्लाह ने तुम्हारे लिए यही दीन (धर्म) चुना है, तो इस्लाम (ईश-आज्ञापालन) को अतिरिक्त किसी और दशा में तुम्हारी मृत्यु न हो।"
तफ़्सीर:
इबराहीम ने अपने बेटों को इसी बात की वसीयत की, कि : {أَسْلَمْتُ لِرَبِّ الْعَالَمِينَ} ''मैं सारे संसारों के पालनहार का आज्ञाकारी हो गया।'', इसी तरह याक़ूब ने भी अपने बेटों को इसी बात की वसीयत की। उन दोनों ने अपने बेटों को आवाज़ देते हुए कहा : निःसंदेह अल्लाह ने तुम्हारे लिए इस्लाम धर्म को चुन लिया है। अतः तुम उसे दृढ़ता से पकड़े रहो यहाँ तक कि तुम्हारे पास मृत्यु आ जाए, और तुम बाहरी और आंतरिक रूप से अल्लाह के आज्ञाकारी हो।
आयत 133
أَمْ كُنتُمْ شُهَدَآءَ إِذْ حَضَرَ يَعْقُوبَ ٱلْمَوْتُ إِذْ قَالَ لِبَنِيهِ مَا تَعْبُدُونَ مِنۢ بَعْدِى قَالُوا۟ نَعْبُدُ إِلَـٰهَكَ وَإِلَـٰهَ ءَابَآئِكَ إِبْرَٰهِـۧمَ وَإِسْمَـٰعِيلَ وَإِسْحَـٰقَ إِلَـٰهًۭا وَٰحِدًۭا وَنَحْنُ لَهُۥ مُسْلِمُونَ
أَمْ
क्या
كُنتُمْ
थे तुम
شُهَدَآءَ
मौजूद
إِذْ
जब
حَضَرَ
आई
يَعْقُوبَ
याक़ूब को
ٱلْمَوْتُ
मौत
إِذْ
जब
قَالَ
उसने कहा
لِبَنِيهِ
अपने बेटों से
مَا
किस की
تَعْبُدُونَ
तुम इबादत करोगे
مِنۢ
from
بَعْدِى
मेरे बाद
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
نَعْبُدُ
हम इबादत करेंगे
إِلَـٰهَكَ
तेरे इलाह की
وَإِلَـٰهَ
और इलाह की
ءَابَآئِكَ
तेरे आबा ओ अजदाद के
إِبْرَٰهِـۧمَ
इब्राहीम
وَإِسْمَـٰعِيلَ
और इस्माईल
وَإِسْحَـٰقَ
और इस्हाक़ के
إِلَـٰهًۭا
इलाह की
وَٰحِدًۭا
एक ही की
وَنَحْنُ
और हम
لَهُۥ
उसी के लिए
مُسْلِمُونَ
फ़रमाबरदार हैं
(क्या तुम इबराहीम के वसीयत करते समय मौजूद थे? या तुम मौजूद थे जब याक़ूब की मृत्यु का समय आया? जब उसने बेटों से कहा, "तुम मेरे पश्चात किसकी इबादत करोगे?" उन्होंने कहा, "हम आपके इष्ट-पूज्य और आपके पूर्वज इबराहीम और इसमाईल और इसहाक़ के इष्ट-पूज्य की बन्दगी करेंगे - जो अकेला इष्ट-पूज्य है, और हम उसी के आज्ञाकारी (मुस्लिम) हैं।"
तफ़्सीर:
या तुम उस समय उपस्थित थे, जब याक़ूब अलैहिस्सलाम की मृत्यु निकट आई। जब उन्होंने अपने बेटों से पूछते हुए कहा : तुम मेरी मृत्यु के बाद किसकी इबादत करोगे? उन्होंने उनके सवाल के जवाब में कहा : हम आपके पूज्य और आपके पूर्वजों इबराहीम, इसमाईल तथा इसह़ाक़ के पूज्य की इबादत करेंगे, जो एक अकेला पूज्य है, उसका कोई साझी नहीं। और हम अकेले उसी के प्रति समर्पित और उसी के आज्ञाकारी हैं।
आयत 134
تِلْكَ أُمَّةٌۭ قَدْ خَلَتْ ۖ لَهَا مَا كَسَبَتْ وَلَكُم مَّا كَسَبْتُمْ ۖ وَلَا تُسْـَٔلُونَ عَمَّا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
تِلْكَ
ये
أُمَّةٌۭ
एक उम्मत थी
قَدْ
तहक़ीक़
خَلَتْ ۖ
वो गुज़र गई
لَهَا
उसके लिए है
مَا
जो
كَسَبَتْ
उसने कमाया
وَلَكُم
और तुम्हारे लिए है
مَّا
जो
كَسَبْتُمْ ۖ
कमाया तुमने
وَلَا
और ना
تُسْـَٔلُونَ
तुम सवाल किए जाओगे
عَمَّا
उसके बारे में जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
वह एक गिरोह था जो गुज़र चुका, जो कुछ उसने कमाया वह उसका है, और जो कुछ तुमने कमाया वह तुम्हारा है। और जो कुछ वे करते रहे उसके विषय में तुमसे कोई पूछताछ न की जाएगी
तफ़्सीर:
यह तुमसे पहले गुज़रे हुए समुदायों में से एक समुदाय था, जो गुज़र चुका और उस कार्य की ओर जा चुका जो उसने आगे बढ़ाया था। अतः उसके लिए उसके कमाए हुए अच्छे या बुरे कर्म हैं, और तुम्हारे लिए तुम्हारे कमाए हुए कर्म। न तुमसे उनके कर्मों के बारे में पूछा जाएगा, न उनसे तुम्हारे कर्मों के बारे में पूछा जाएगा, तथा कोई भी किसी दूसरे के गुनाह के बदले नहीं पकड़ा जाएगा। बल्कि प्रत्येक को उसके कर्म का बदला दिया जाएगा। इसलिए अपने पहले गुज़रे हुए लोगों के कर्म के पीछे पड़ना तुम्हें खुद अपने कर्म को देखने से विचलित न करे। क्योंकि किसी को अल्लाह की दया के बाद, उसके सत्कर्म के सिवा कोई चीज़ हरगिज़ फायदा न देगी।
आयत 135
وَقَالُوا۟ كُونُوا۟ هُودًا أَوْ نَصَـٰرَىٰ تَهْتَدُوا۟ ۗ قُلْ بَلْ مِلَّةَ إِبْرَٰهِـۧمَ حَنِيفًۭا ۖ وَمَا كَانَ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
كُونُوا۟
हो जाओ
هُودًا
यहूदी
أَوْ
या
نَصَـٰرَىٰ
नस्रानी
تَهْتَدُوا۟ ۗ
तुम हिदायत पा लोगे
قُلْ
कह दीजिए
بَلْ
बल्कि
مِلَّةَ
मिल्लत
إِبْرَٰهِـۧمَ
इब्राहीम की
حَنِيفًۭا ۖ
जो यकसू था
وَمَا
और नहीं
كَانَ
था वो
مِنَ
of
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकीन में से
वे कहते हैं, "यहूदी या ईसाई हो जाओ तो मार्ग पर लोगे।" कहो, "नहीं, बल्कि इबराहीम का पंथ अपनाओ जो एक (अल्लाह) का हो गया था, और वह बहुदेववादियों में से न था।"
तफ़्सीर:
यहूदियों ने मुसलमानों से कहा : यहूदी बन जाओ, हिदायत के मार्ग पर चलने लगोगे, तथा ईसाइयों ने कहा : ईसाई बन जाओ, हिदायत के मार्ग पर चलने लगोगे। (ऐ नबी!) आप उन्हें जवाब देते हुए कह दीजिए : बल्कि, हम इबराहीम अलैहिस्सलाम के धर्म का अनुसरण करेंगे, जो झूठे धर्मों से विमुख होकर सच्चे धर्म की ओर प्रवृत थे तथा उन लोगों में से नहीं थे जिन्होंने अल्लाह के साथ किसी को साझी बनाया।
आयत 136
قُولُوٓا۟ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَمَآ أُنزِلَ إِلَيْنَا وَمَآ أُنزِلَ إِلَىٰٓ إِبْرَٰهِـۧمَ وَإِسْمَـٰعِيلَ وَإِسْحَـٰقَ وَيَعْقُوبَ وَٱلْأَسْبَاطِ وَمَآ أُوتِىَ مُوسَىٰ وَعِيسَىٰ وَمَآ أُوتِىَ ٱلنَّبِيُّونَ مِن رَّبِّهِمْ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍۢ مِّنْهُمْ وَنَحْنُ لَهُۥ مُسْلِمُونَ
قُولُوٓا۟
कहो तुम
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَمَآ
और (उस पर) जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
إِلَيْنَا
तरफ़ हमारे
وَمَآ
और जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
إِلَىٰٓ
तरफ़
إِبْرَٰهِـۧمَ
इब्राहीम के
وَإِسْمَـٰعِيلَ
और इस्माईल
وَإِسْحَـٰقَ
और इस्हाक़
وَيَعْقُوبَ
और याक़ूब
وَٱلْأَسْبَاطِ
और औलादे याक़ूब के
وَمَآ
और जो
أُوتِىَ
दिए गए
مُوسَىٰ
मूसा
وَعِيسَىٰ
और ईसा
وَمَآ
और जो
أُوتِىَ
दिए गए
ٱلنَّبِيُّونَ
तमाम अम्बिया
مِن
from
رَّبِّهِمْ
अपने रब की तरफ़ से
لَا
Not
نُفَرِّقُ
नहीं हम फ़र्क़ करते
بَيْنَ
दर्मियान
أَحَدٍۢ
किसी एक के
مِّنْهُمْ
उनमें से
وَنَحْنُ
और हम
لَهُۥ
उसी के लिए
مُسْلِمُونَ
फ़रमाबरदार हैं
कहो, "हम ईमान लाए अल्लाह पर और उस चीज़ पर जो हमारी ओर से उतरी और जो इबराहीम और इसमाईल और इसहाक़ और याक़ूब और उसकी संतान की ओर उतरी, और जो मूसा और ईसा को मिली, और जो सभी नबियों को उनके रब की ओर से प्रदान की गई। हम उनमें से किसी के बीच अन्तर नहीं करते और हम केवल उसी के आज्ञाकारी हैं।"
तफ़्सीर:
ऐ ईमान वालो! इस झूठे दावा वाले यहूदियों और ईसाइयों से कह दो : हम अल्लाह पर और उस क़ुरआन पर ईमान लाए जो हमारी ओर उतारा गया। तथा हम उसपर ईमान लाए जो इबराहीम और उनके पुत्रों इसमाईल, इसह़ाक़ और याक़ूब पर उतारा गया। और हम उसपर ईमान लाए जो याक़ूब अलैहिस्सलाम की संतान में से होने वाले नबियों पर उतारा गाय। इसी तरह हम ईमान लाए उस तौरात पर जो अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम को प्रदान किया और उस इन्जील पर जो अल्लाह ने ईसा अलैहिस्सलाम को प्रदान किया। तथा हम उन किताबों पर ईमान लाए जो अल्लाह ने सभी नबियों को प्रदान कीं। हम उनमें से किसी के बीच अंतर (भेदभाव) नहीं करते, कि हम कुछ पर ईमान लाएँ और कुछ का इनकार कर दें। बल्कि हम उन सभी (नबियों) पर ईमान रखते हैं और हम अकेले उसी महिमावान अल्लाह के आज्ञाकारी और अधीन हैं।
आयत 137
فَإِنْ ءَامَنُوا۟ بِمِثْلِ مَآ ءَامَنتُم بِهِۦ فَقَدِ ٱهْتَدَوا۟ ۖ وَّإِن تَوَلَّوْا۟ فَإِنَّمَا هُمْ فِى شِقَاقٍۢ ۖ فَسَيَكْفِيكَهُمُ ٱللَّهُ ۚ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ
فَإِنْ
फिर अगर
ءَامَنُوا۟
वो ईमान ले आऐं
بِمِثْلِ
in (the) like
مَآ
जिस तरह
ءَامَنتُم
ईमान लाए तुम
بِهِۦ
साथ उसके
فَقَدِ
पस तहक़ीक़
ٱهْتَدَوا۟ ۖ
वो हिदायत पा गए
وَّإِن
और अगर
تَوَلَّوْا۟
वो मुँह फेर लें
فَإِنَّمَا
तो बेशक
هُمْ
वो
فِى
(are) in
شِقَاقٍۢ ۖ
इख़्तिलाफ़ में हैं
فَسَيَكْفِيكَهُمُ
पस अनक़रीब काफ़ी होगा आपको उनसे
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह
وَهُوَ
और वो
ٱلسَّمِيعُ
ख़ूब सुनने वाला है
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब जानने वाला है
फिर यदि वे उसी तरह ईमान लाएँ जिस तरह तुम ईमान लाए हो, तो उन्होंने मार्ग पा लिया। और यदि वे मुँह मोड़े, तो फिर वही विरोध में पड़े हुए है। अतः तुम्हारी जगह स्वयं अल्लाह उनसे निबटने के लिए काफ़ी है; वह सब कुछ सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
यदि यहूदी, ईसाई और अन्य काफ़िर तुम्हारे ईमान लाने की तरह ईमान लाएँ; तो उन्होंने उस सीधे मार्ग को पा लिया, जिसे अल्लाह ने पसंद किया है। लेकिन यदि वे सभी या कुछ नबियों को झुठलाकर ईमान से उपेक्षा करें, तो वे विरोध और शत्रुता में पड़े हुए हैं। इसलिए - ऐ नबी! - आप दुखी न हों, क्योंकि अल्लाह आपको उनके कष्ट से बचाने के लिए पर्याप्त हो जाएगा, आपकी उनकी बुराई से रक्षा करेगा और उनके खिलाफ आपकी मदद करेगा। क्योंकि वह उनकी बातों को सुनने वाला, और उनके इरादों और कार्यों को जानने वाला है।
आयत 138
صِبْغَةَ ٱللَّهِ ۖ وَمَنْ أَحْسَنُ مِنَ ٱللَّهِ صِبْغَةًۭ ۖ وَنَحْنُ لَهُۥ عَـٰبِدُونَ
صِبْغَةَ
रंग
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह का
وَمَنْ
और कौन
أَحْسَنُ
ज़्यादा अच्छा है
مِنَ
than
ٱللَّهِ
अल्लाह से
صِبْغَةًۭ ۖ
रंग में
وَنَحْنُ
और हम
لَهُۥ
उसी की
عَـٰبِدُونَ
इबादत करने वाले हैं
(कहो,) "अल्लाह का रंग ग्रहण करो, उसके रंग से अच्छा और किसका रंह हो सकता है? और हम तो उसी की बन्दगी करते हैं।"
तफ़्सीर:
अल्लाह के उस धर्म पर बाहरी और आंतरिक रूप से जमे रहो, जिसपर उसने तुम्हें पैदा किया है। क्योंकि अल्लाह के धर्म से बेहतर कोई धर्म नहीं। क्योंकि वह प्रकृति के अनुकूल है, हितों को लाने वाला और अहितों को रोकने वाला है। तथा कहो : हम केवल अल्लाह की इबादत करने वाले हैं, हम उसके साथ किसी दूसरे को साझी नहीं बनाते।
आयत 139
قُلْ أَتُحَآجُّونَنَا فِى ٱللَّهِ وَهُوَ رَبُّنَا وَرَبُّكُمْ وَلَنَآ أَعْمَـٰلُنَا وَلَكُمْ أَعْمَـٰلُكُمْ وَنَحْنُ لَهُۥ مُخْلِصُونَ
قُلْ
कह दीजिए
أَتُحَآجُّونَنَا
क्या तुम झगड़ा करते हो हमसे
فِى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह के बारे में
وَهُوَ
हालाँकि वो
رَبُّنَا
रब है हमारा
وَرَبُّكُمْ
और रब है तुम्हारा
وَلَنَآ
और हमारे लिए हैं
أَعْمَـٰلُنَا
आमाल हमारे
وَلَكُمْ
और तुम्हारे लिए हैं
أَعْمَـٰلُكُمْ
आमाल तुम्हारे
وَنَحْنُ
और हम
لَهُۥ
उसी के लिए
مُخْلِصُونَ
मुख़लिस हैं
कहो, "क्या तुम अल्लाह के विषय में हमसे झगड़ते हो, हालाँकि वही हमारा रब भी है, और तुम्हारा रब भी? और हमारे लिए हमारे कर्म हैं और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म। और हम तो बस निरे उसी के है।"
तफ़्सीर:
ऐ नबी! कह दीजिए : (ऐ किताब वालो!) क्या तुम हमसे इस बारे में बहस करते हो कि तुम अल्लाह और उसके धर्म के हमसे ज़्यादा हक़दार हो; इस कारण कि तुम्हारा धर्म पुराना है और तुम्हारी पुस्तक पहले की है। तो (जान लो) इससे तुम्हें कोई फायदा नहीं होगा। क्योंकि अल्लाह ही हम सब का रब है, वह विशेष रूप से केवल तुम्हारा ही रब नहीं है। तथा हमारे लिए हमारे कर्म हैं, जिनके बारे में तुमसे नहीं पूछा जाएगा, और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म हैं, जिनके बारे में हमसे नहीं पूछा जाएगा। बल्कि प्रत्येक को उसके काम का बदला दिया जाएगा। हम इबादत और आज्ञाकारिता में अल्लाह के प्रति निष्ठावान हैं, उसके साथ किसी चीज़ को साझी नहीं ठहराते।
आयत 140
أَمْ تَقُولُونَ إِنَّ إِبْرَٰهِـۧمَ وَإِسْمَـٰعِيلَ وَإِسْحَـٰقَ وَيَعْقُوبَ وَٱلْأَسْبَاطَ كَانُوا۟ هُودًا أَوْ نَصَـٰرَىٰ ۗ قُلْ ءَأَنتُمْ أَعْلَمُ أَمِ ٱللَّهُ ۗ وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن كَتَمَ شَهَـٰدَةً عِندَهُۥ مِنَ ٱللَّهِ ۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ
أَمْ
या
تَقُولُونَ
तुम कहते हो
إِنَّ
बेशक
إِبْرَٰهِـۧمَ
इब्राहीम
وَإِسْمَـٰعِيلَ
और इस्माईल
وَإِسْحَـٰقَ
और इस्हाक़
وَيَعْقُوبَ
और याक़ूब
وَٱلْأَسْبَاطَ
और औलादे याक़ूब
كَانُوا۟
थे वो
هُودًا
यहूदी
أَوْ
या
نَصَـٰرَىٰ ۗ
नस्रानी
قُلْ
कह दीजिए
ءَأَنتُمْ
क्या तुम
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानते हो
أَمِ
या
ٱللَّهُ ۗ
अल्लाह
وَمَنْ
और कौन
أَظْلَمُ
बड़ा ज़ालिम है
مِمَّن
उससे जो
كَتَمَ
छुपाए
شَهَـٰدَةً
गवाही को
عِندَهُۥ
जो पास है उसके
مِنَ
from
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह की तरफ़ से
وَمَا
और नहीं
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِغَـٰفِلٍ
ग़ाफ़िल
عَمَّا
उससे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
या तुम कहते हो कि इबराहीम और इसमाईल और इसहाक़ और याक़ूब और उनकी संतान सब के सब यहूदी या ईसाई थे? कहो, "तुम अधिक जानते हो या अल्लाह? और उससे बढ़कर ज़ालिम कौन होगा, जिसके पास अल्लाह की ओर से आई हुई कोई गवाही हो, और वह उसे छिपाए? और जो कुछ तुम कर रहे हो, अल्लाह उससे बेखबर नहीं है।"
तफ़्सीर:
(ऐ अह्ले किताब!) क्या तुम कहते हो : इबराहीम और इसमाईल और इसह़ाक़ और याक़ूब तथा याक़ूब की संतान में से होने वाले पैग़ंबर, यहूदी या ईसाई धर्म के अनुयायी थे? ऐ नबी! आप उनका उत्तर देते हुए कह दें : क्या तुम अधिक जानते हो या अल्लाह?! यदि उनका दावा है कि वे (उक्त नबीगण) उनके धर्म पर थे, तो निश्चय उन्होंने झूठ बोला है। क्योंकि उनकी नुबुव्वत और मृत्यु का ज़माना तौरात और इंजील उतरने से पहले का है! इससे यह पता चला कि जो कुछ वे कहते हैं, वह अल्लाह और उसके रसूलों के खिलाफ झूठ है, और उन्होंने उस सत्य को छिपाया है, जो उनपर उतरा था। और उससे बड़ा ज़ालिम कोई नहीं, जो अपने पास मौजूद उस पक्की गवाही को छिपाए, जिसका ज्ञान उसे अल्लाह की ओर से हुआ है, जैसा कि किताब वालों ने किया। और अल्लाह तुम्हारे कर्मों से अनजान नहीं है और वह तुम्हें उनका बदला देगा।
आयत 141
تِلْكَ أُمَّةٌۭ قَدْ خَلَتْ ۖ لَهَا مَا كَسَبَتْ وَلَكُم مَّا كَسَبْتُمْ ۖ وَلَا تُسْـَٔلُونَ عَمَّا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
تِلْكَ
ये
أُمَّةٌۭ
एक उम्मत थी
قَدْ
तहक़ीक़
خَلَتْ ۖ
वो गुज़र गई
لَهَا
उसके लिए है
مَا
जो
كَسَبَتْ
उसने कमाया
وَلَكُم
और तुम्हारे लिए है
مَّا
जो
كَسَبْتُمْ ۖ
कमाया तुमने
وَلَا
और ना
تُسْـَٔلُونَ
तुम सवाल किए जाओगे
عَمَّا
उसके बारे में जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
अमल करते
वह एक गिरोह थो जो गुज़र चुका, जो कुछ उसने कमाया वह उसके लिए है और जो कुछ तुमने कमाया वह तुम्हारे लिए है। और तुमसे उसके विषय में न पूछा जाएगा, जो कुछ वे करते रहे है
तफ़्सीर:
यह एक समुदाय था, जो गुज़र चुका और उस कार्य की ओर जा चुका जो उसने आगे बढ़ाया था। अतः उसके लिए उसके कमाए हुए (अच्छे या बुरे) कर्म हैं, और तुम्हारे लिए तुम्हारे कमाए हुए कर्म। न तुमसे उनके कर्मों के बारे में पूछा जाएगा, न उनसे तुम्हारे कर्मों के बारे में पूछा जाएगा, तथा कोई भी किसी दूसरे के गुनाह के बदले नहीं पकड़ा जाएगा और न ही वह किसी दूसरे के कर्म से लाभान्वित होगा। बल्कि प्रत्येक को उसके कर्म का बदला दिया जाएगा।
आयत 142
۞ سَيَقُولُ ٱلسُّفَهَآءُ مِنَ ٱلنَّاسِ مَا وَلَّىٰهُمْ عَن قِبْلَتِهِمُ ٱلَّتِى كَانُوا۟ عَلَيْهَا ۚ قُل لِّلَّهِ ٱلْمَشْرِقُ وَٱلْمَغْرِبُ ۚ يَهْدِى مَن يَشَآءُ إِلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ
۞ سَيَقُولُ
अनक़रीब कहेंगे
ٱلسُّفَهَآءُ
नादान / बेवक़ूफ़
مِنَ
from
ٱلنَّاسِ
लोगों में से
مَا
किसने
وَلَّىٰهُمْ
फेर दिया उन्हें
عَن
from
قِبْلَتِهِمُ
उनके क़िबले से
ٱلَّتِى
वो जो
كَانُوا۟
थे वो
عَلَيْهَا ۚ
उस पर
قُل
कह दीजिए
لِّلَّهِ
अल्लाह ही के लिए हैं
ٱلْمَشْرِقُ
मशरिक़
وَٱلْمَغْرِبُ ۚ
और मग़रिब
يَهْدِى
वो हिदायत देता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
إِلَىٰ
तरफ़
صِرَٰطٍۢ
रास्ते
مُّسْتَقِيمٍۢ
सीधे के
मूर्ख लोग अब कहेंगे, "उन्हें उनके उस क़िबले (उपासना-दिशा) से, जिस पर वे थे किस ची़ज़ ने फेर दिया?" कहो, "पूरब और पश्चिम अल्लाह ही के है, वह जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखाता है।"
तफ़्सीर:
शीघ्र ही अज्ञानी, अल्पबुद्धि यहूदी और उनके जैसे मुनाफ़िक़ (पाखंडी) कहेंगे : मुसलमानों को बैतुल-मक़दिस के क़िबला से, जो पहले उनका क़िबला था, किस चीज़ ने फेर दिया?! (ऐ नबी!) आप उन्हें उत्तर देते हुए कह दीजिए : पूर्व और पश्चिम तथा अन्य दिशाओं का मालिक अकेला अल्लाह ही है, वह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, जिस दिशा की ओर भी चाहता है, निर्देशित कर देता है। तथा वह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, सीधे रास्ते का मार्गदर्शन प्रदान करता है, जिसमें कोई टेढ़ापन और विचलन नहीं है।
आयत 143
وَكَذَٰلِكَ جَعَلْنَـٰكُمْ أُمَّةًۭ وَسَطًۭا لِّتَكُونُوا۟ شُهَدَآءَ عَلَى ٱلنَّاسِ وَيَكُونَ ٱلرَّسُولُ عَلَيْكُمْ شَهِيدًۭا ۗ وَمَا جَعَلْنَا ٱلْقِبْلَةَ ٱلَّتِى كُنتَ عَلَيْهَآ إِلَّا لِنَعْلَمَ مَن يَتَّبِعُ ٱلرَّسُولَ مِمَّن يَنقَلِبُ عَلَىٰ عَقِبَيْهِ ۚ وَإِن كَانَتْ لَكَبِيرَةً إِلَّا عَلَى ٱلَّذِينَ هَدَى ٱللَّهُ ۗ وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيُضِيعَ إِيمَـٰنَكُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ بِٱلنَّاسِ لَرَءُوفٌۭ رَّحِيمٌۭ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
جَعَلْنَـٰكُمْ
बनाया हमने तुम्हें
أُمَّةًۭ
एक उम्मत
وَسَطًۭا
वस्त / दर्मियानी
لِّتَكُونُوا۟
ताकि तुम हो जाओ
شُهَدَآءَ
गवाह
عَلَى
over
ٱلنَّاسِ
लोगों पर
وَيَكُونَ
और हो जाए
ٱلرَّسُولُ
रसूल
عَلَيْكُمْ
तुम पर
شَهِيدًۭا ۗ
गवाह
وَمَا
और नहीं
جَعَلْنَا
बनाया हमने
ٱلْقِبْلَةَ
इस क़िबले को
ٱلَّتِى
वो जो
كُنتَ
थे आप
عَلَيْهَآ
जिस पर
إِلَّا
मगर
لِنَعْلَمَ
ताकि हम जान लें
مَن
कौन
يَتَّبِعُ
पैरवी करता है
ٱلرَّسُولَ
रसूल की
مِمَّن
उससे जो
يَنقَلِبُ
पलट जाता है
عَلَىٰ
on
عَقِبَيْهِ ۚ
अपनी दोनों एड़ियों पर
وَإِن
और बिला शुबा
كَانَتْ
थी (ये बात)
لَكَبِيرَةً
यक़ीनन बड़ी भारी
إِلَّا
मगर
عَلَى
for
ٱلَّذِينَ
उन पर (नहीं) जिन्हें
هَدَى
हिदायत दी
ٱللَّهُ ۗ
अल्लाह ने
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِيُضِيعَ
कि वो ज़ाया कर दे
إِيمَـٰنَكُمْ ۚ
ईमान तुम्हारा
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
بِٱلنَّاسِ
लोगों पर
لَرَءُوفٌۭ
यक़ीनन शफ़ीक़ है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
और इसी प्रकार हमने तुम्हें बीच का एक उत्तम समुदाय बनाया है, ताकि तुम सारे मनुष्यों पर गवाह हो, और रसूल तुमपर गवाह हो। और जिस (क़िबले) पर तुम रहे हो उसे तो हमने केवल इसलिए क़िबला बनाया था कि जो लोग पीठ-पीछे फिर जानेवाले है, उनसे हम उनको अलग जान लें जो रसूल का अनुसरण करते है। और यह बात बहुत भारी (अप्रिय) है, किन्तु उन लोगों के लिए नहीं जिन्हें अल्लाह ने मार्ग दिखाया है। और अल्लाह ऐसा नहीं कि वह तुम्हारे ईमान को अकारथ कर दे, अल्लाह तो इनसानों के लिए अत्यन्त करूणामय, दयावान है
तफ़्सीर:
जिस तरह हमने तुम्हारे लिए वह क़िबला निर्धारित किया है, जिसे हमने तुम्हारे लिए पसंद किया है; वैसे ही हमने तुम्हें सबसे बेहतर, न्यायपूर्ण उम्मत (समुदाय) बनाया, जो अक़ायद, इबादात और मामलात में सभी उम्मतों (समुदायों) के बीच मध्यम है; ताकि तुम क़ियामत के दिन अल्लाह के सभी रसूलों के लिए गवाही देने वाले बन जाओ कि उन्होंने अपनी उम्मतों को वह संदेश पहुँचा दिया था जिसे पहुँचाने का अल्लाह ने उन्हे आदेश दिया था, तथा रसूल मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तुमपर यह गवाही देने वाले हो जाएँ कि उन्होंने तुम्हें अल्लाह का धर्म पहुँचा दिया। तथा हमने उस क़िबले को जिसकी ओर आप रुख़ करते थे अर्थात् बैतुल-मक़दिस को इसलिए बदल दिया, ताकि हम - इस तरह प्रत्यक्ष रुप से जिसपर बदला निष्कर्षित होता है - जान लें कि कौन अल्लाह के निर्धारित किए हुए नियम से संतुष्ट होता है और उसके सामने अपना सिर झुकाते हुए रसूल का अनुसरण करता है, तथा कौन अपने धर्म से फिर जाता है और अपनी इच्छाओं का पालन करता है। इसलिए वह अल्लाह के बनाए हुए नियम के आगे सिर नहीं झुकाता। वास्तव में, पहले क़िबले को बदलने की बात बहुत बड़ी थी, सिवाय उन लोगों के लिए जिन्हें अल्लाह ने उसपर तथा इस बात पर विश्वास करने की तौफ़ीक़ दी कि अल्लाह अपने बंदों के लिए जो नियम बनाता है, वह व्यापक हिकमतों की वजह से बनाता है। तथा अल्लाह ऐसा नहीं कि तुम्हारा ईमान बर्बाद कर दे, जिसमें तुम्हारी वे नमाज़ें भी शामिल हैं, जो तुमने क़िबला बदलने से पहले पढ़ी थीं। निःसंदेह अल्लाह लोगों पर बहुत करुणा करने वाला, अत्यंत दयावान् है। इसलिए वह उन्हें कष्ट में नहीं डालता है, और उनके कर्मों का प्रतिफल व्यर्थ नहीं करता है।
आयत 144
قَدْ نَرَىٰ تَقَلُّبَ وَجْهِكَ فِى ٱلسَّمَآءِ ۖ فَلَنُوَلِّيَنَّكَ قِبْلَةًۭ تَرْضَىٰهَا ۚ فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ ۚ وَحَيْثُ مَا كُنتُمْ فَوَلُّوا۟ وُجُوهَكُمْ شَطْرَهُۥ ۗ وَإِنَّ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ لَيَعْلَمُونَ أَنَّهُ ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّهِمْ ۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا يَعْمَلُونَ
قَدْ
तहक़ीक़
نَرَىٰ
हम देखते हैं
تَقَلُّبَ
बार बार फिरना
وَجْهِكَ
आपके चेहरे का
فِى
towards
ٱلسَّمَآءِ ۖ
आसमान की तरफ़
فَلَنُوَلِّيَنَّكَ
पस अलबत्ता हम ज़रूर फेर देंगे आपको
قِبْلَةًۭ
उस क़िबले की (तरफ़)
تَرْضَىٰهَا ۚ
आप राज़ी हो जाऐं जिससे
فَوَلِّ
पस फेर लीजिए
وَجْهَكَ
अपने चेहरे को
شَطْرَ
तरफ़
ٱلْمَسْجِدِ
मस्जिदे
ٱلْحَرَامِ ۚ
हराम के
وَحَيْثُ
and wherever
مَا
और जहाँ कहीं
كُنتُمْ
हो तुम
فَوَلُّوا۟
पस फेर लो
وُجُوهَكُمْ
अपने चेहरों को
شَطْرَهُۥ ۗ
तरफ़ उसके
وَإِنَّ
और बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
أُوتُوا۟
दिए गए
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
لَيَعْلَمُونَ
अलबत्ता वो जानते हैं
أَنَّهُ
बेशक वो
ٱلْحَقُّ
हक़ है
مِن
from
رَّبِّهِمْ ۗ
उनके रब की तरफ़ से
وَمَا
और नहीं
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِغَـٰفِلٍ
ग़ाफ़िल
عَمَّا
उससे जो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते हैं
हम आकाश में तुम्हारे मुँह की गर्दिश देख रहे है, तो हम अवश्य ही तुम्हें उसी क़िबले का अधिकारी बना देंगे जिसे तुम पसन्द करते हो। अतः मस्जिदे हराम (काबा) की ओर अपना रूख़ करो। और जहाँ कहीं भी हो अपने मुँह उसी की ओर करो - निश्चय ही जिन लोगों को किताब मिली थी, वे भली-भाँति जानते है कि वही उनके रब की ओर से हक़ है, इसके बावजूद जो कुछ वे कर रहे है अल्लाह उससे बेखबर नहीं है
तफ़्सीर:
हमने - ऐ नबी! - आपके चेहरे और निगाह को बार-बार आसमान की ओर उठते हुए देखा है, इस प्रत्याशा में कि आपको अपने मनपसंद क़िबले की ओर मुख करके नमाज़ पढ़ने की अनुमति प्राप्त हो जाए। अतः निश्चय हम वर्तमान क़िबला बैतुल-मक़दिस के बदले, आपको उस क़िबले की ओर फेर देंगे, जिसे आप पसंद करते हैं (और वह अल्लाह का पवित्र घर काबा है)। सो (अब) आप अपना चेहरा मक्का मुकर्रमा में स्थित अल्लाह के पवित्र घर की ओर फेर लें। तथा - ऐ ईमान वालो! - तुम जहाँ भी हो, नमाज़ पढ़ते समय उसी की ओर मुख कर लो। निश्चय यहूदी तथा ईसाई इस बात से अवगत हैं कि क़िबले का बदलना उनके पालनहार और उनके मामलों के प्रभंधक की ओर से अवतिरत सत्य है; क्योंकि यह उनकी पुस्तक में प्रमाणित है। तथा अल्लाह उस बात से अनजान नहीं है जो ये सत्य से मुँह मोड़ने वाले करते हैं। बल्कि, वह महिमावान् उसे जानता है और उन्हें उसका बदला देगा।
आयत 145
وَلَئِنْ أَتَيْتَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ بِكُلِّ ءَايَةٍۢ مَّا تَبِعُوا۟ قِبْلَتَكَ ۚ وَمَآ أَنتَ بِتَابِعٍۢ قِبْلَتَهُمْ ۚ وَمَا بَعْضُهُم بِتَابِعٍۢ قِبْلَةَ بَعْضٍۢ ۚ وَلَئِنِ ٱتَّبَعْتَ أَهْوَآءَهُم مِّنۢ بَعْدِ مَا جَآءَكَ مِنَ ٱلْعِلْمِ ۙ إِنَّكَ إِذًۭا لَّمِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَلَئِنْ
और अलबत्ता अगर
أَتَيْتَ
लाऐं आप (उनके पास)
ٱلَّذِينَ
वो जो
أُوتُوا۟
दिए गए
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
بِكُلِّ
हर
ءَايَةٍۢ
निशानी
مَّا
नहीं
تَبِعُوا۟
वो पैरवी करेंगे
قِبْلَتَكَ ۚ
आपके क़िबले की
وَمَآ
और नहीं
أَنتَ
आप
بِتَابِعٍۢ
पैरवी करने वाले
قِبْلَتَهُمْ ۚ
उनके क़िबले की
وَمَا
और ना
بَعْضُهُم
बाज़ उनका
بِتَابِعٍۢ
पैरवी करने वाला है
قِبْلَةَ
क़िबले की
بَعْضٍۢ ۚ
बाज़ के
وَلَئِنِ
और अलबत्ता अगर
ٱتَّبَعْتَ
पैरवी की आपने
أَهْوَآءَهُم
उनकी ख़्वाहिशात की
مِّنۢ
from
بَعْدِ
बाद उसके
مَا
जो
جَآءَكَ
आ गया आपके पास
مِنَ
of
ٱلْعِلْمِ ۙ
इल्म में से
إِنَّكَ
बेशक आप
إِذًۭا
तब
لَّمِنَ
(be) surely among
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़रूर ज़ालिमों मे से होंगे
यदि तुम उन लोगों के पास, जिन्हें किताब दी गई थी, कोई भी निशानी ले आओ, फिर भी वे तुम्हारे क़िबले का अनुसरण नहीं करेंगे और तुम भी उसके क़िबले का अनुसरण करने वाले नहीं हो। और वे स्वयं परस्पर एक-दूसरे के क़िबले का अनुसरण करनेवाले नहीं हैं। और यदि तुमने उस ज्ञान के पश्चात, जो तुम्हारे पास आ चुका है, उनकी इच्छाओं का अनुसरण किया, तो निश्चय ही तुम्हारी गणना ज़ालिमों में होगी
तफ़्सीर:
अल्लाह की क़सम! (ऐ नबी!) यदि आप उन यहूदियों और ईसाइयों के पास जिन्हें किताब दी गई थी, इस बात पर हर प्रकार की निशानी और प्रमाण ले आएँ कि क़िबला का बदलना सत्य है; तब भी वे आपके क़िबले की ओर रुख नहीं करेंगे, उसके प्रति हठ करके जो आप लेकर आए हैं तथा सत्य का पालन करने से अहंकार करते हुए। तथा आप उनके क़िबले की ओर मुख करने वाले नहीं हैं जबकि अल्लाह ने आपको उससे फेर दिया है। तथा वे स्वयं परस्पर एक-दूसरे के क़िबले की ओर रुख़ करने वाले नहीं हैं; क्योंकि उनमें से प्रत्येक दूसरे समूह को काफ़िर कहता है। यदि आपने क़िबला तथा अन्य नियमों और विधानों के बारे में इन लोगों की इच्छाओं का पालन किया, इसके बाद कि आपके पास सही ज्ञान आ चुका है, जिसमें कोई संदेह नहीं; तो निश्चय आप उस समय हिदायत को छोड़ने तथा इच्छा का अनुसरण करने के कारण, अत्याचारियों में से हो जाएँगे। यहाँ नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को संबोधित करने का मक़सद अह्ले किताब का पालन करने की बुराई (कुरूपता) को दर्शाना है। अन्यथा, अल्लाह ने अपने नबी को उससे सुरक्षित रखा है। इसलिए यह आपके बाद आपकी उम्मत के लिए एक चेतावनी है।
आयत 146
ٱلَّذِينَ ءَاتَيْنَـٰهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ يَعْرِفُونَهُۥ كَمَا يَعْرِفُونَ أَبْنَآءَهُمْ ۖ وَإِنَّ فَرِيقًۭا مِّنْهُمْ لَيَكْتُمُونَ ٱلْحَقَّ وَهُمْ يَعْلَمُونَ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ءَاتَيْنَـٰهُمُ
दी हमने उन्हें
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
يَعْرِفُونَهُۥ
वो पहचानते हैं उसे
كَمَا
जैसा कि
يَعْرِفُونَ
वो पहचानते हैं
أَبْنَآءَهُمْ ۖ
अपने बेटों को
وَإِنَّ
और बेशक
فَرِيقًۭا
एक गिरोह (के लोग)
مِّنْهُمْ
उनमें से
لَيَكْتُمُونَ
अलबत्ता वो छुपाते हैं
ٱلْحَقَّ
हक़ को
وَهُمْ
हालाँकि वो
يَعْلَمُونَ
वो जानते हैं
जिन लोगों को हमने किताब दी है वे उसे पहचानते है, जैसे अपने बेटों को पहचानते है और उनमें से कुछ सत्य को जान-बूझकर छिपा रहे हैं
तफ़्सीर:
यहूदियों और ईसाइयों के विद्वानों में से जिन्हें हमने किताब दी थी; वे क़िबला के बदलने की बात को, जो कि उनके निकट मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नुबुव्वत की निशानियों में से है, बिल्कुल वैसे ही जानते हैं, जैसे अपने बच्चों को जानते हैं और उन्हें दूसरों से अलग करते हैं। फिर भी उनमें से एक समूह, अपनी ओर से ईर्ष्या करते हुए, उस सत्य को छिपाता है, जो आप लाए हैं। वे यह जानते हुए भी ऐसा करते हैं कि यह सच है।
आयत 147
ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّكَ ۖ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلْمُمْتَرِينَ
ٱلْحَقُّ
हक़
مِن
(is) from
رَّبِّكَ ۖ
आपके रब की तरफ़ से है
فَلَا
so (do) not
تَكُونَنَّ
पस हरगिज़ ना हों आप
مِنَ
among
ٱلْمُمْتَرِينَ
शक करने वालों मे से
सत्य तुम्हारे रब की ओर से है। अतः तुम सन्देह करनेवालों में से कदापि न होगा
तफ़्सीर:
यही आपके पालनहार की और से सत्य है। अतः (ऐ रसूल!) आप कदापि इसकी प्रामाणिकता पर संदेह करने वालों में से न हों।
आयत 148
وَلِكُلٍّۢ وِجْهَةٌ هُوَ مُوَلِّيهَا ۖ فَٱسْتَبِقُوا۟ ٱلْخَيْرَٰتِ ۚ أَيْنَ مَا تَكُونُوا۟ يَأْتِ بِكُمُ ٱللَّهُ جَمِيعًا ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ
وَلِكُلٍّۢ
और हर एक के लिए
وِجْهَةٌ
एक सिम्त है
هُوَ
वो
مُوَلِّيهَا ۖ
फेरने वाला है (मुँह) उसकी तरफ़
فَٱسْتَبِقُوا۟
पस सबक़त करो तुम
ٱلْخَيْرَٰتِ ۚ
नेकियों में
أَيْنَ
Wherever
مَا
जहाँ कहीं भी
تَكُونُوا۟
तुम होगे
يَأْتِ
ले आएगा
بِكُمُ
तुम्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
جَمِيعًا ۚ
सबको
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌۭ
ख़ूब क़ुदरत रखने वाला है
प्रत्येक की एक ही दिशा है, वह उसी की ओर मुख किेए हुए है, तो तुम भलाईयों में अग्रसरता दिखाओ। जहाँ कहीं भी तुम होगे अल्लाह तुम सबको एकत्र करेगा। निस्संदेह अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
हर क़ौम की कोई न कोई दिशा होती है, जिसकी ओर वह रुख करती है, चाहे वह दिशा इंद्रियगोचर हो या अगोचर (अभौतिक) हो। यही कारण है कि अलग-अलग समुदायों के अलग-अलग क़िबले और शरई प्रावधान हैं। इसलिए उनकी दिशाओं की विविधता से कोई नुक़सान नहीं, यदि वह अल्लाह के आदेश और उसकी शरीयत के अनुसार है। अतः - ऐ मोमिनो! - उन अच्छे कामों को करने में एक-दूसरे से आगे बढ़ो, जिन्हें करने का तुम्हें आदेश दिया गया है। तथा तुम जहाँ भी होगे, वहाँ से क़ियामत के दिन अल्लाह तुम्हें इकट्ठा करेगा; ताकि तुम्हें तुम्हारे कार्यों का बदला दे। निःसंदेह अल्लाह हर चीज़ का सामर्थ्य रखता है। अतः उसका तुम्हें इकट्ठा करना और बदला देना उसे विवश नहीं कर सकता।
आयत 149
وَمِنْ حَيْثُ خَرَجْتَ فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ ۖ وَإِنَّهُۥ لَلْحَقُّ مِن رَّبِّكَ ۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ
وَمِنْ
And from
حَيْثُ
और जहाँ कहीं से
خَرَجْتَ
निकलें आप
فَوَلِّ
तो फेर लीजिए
وَجْهَكَ
चेहरा अपना
شَطْرَ
तरफ़
ٱلْمَسْجِدِ
मस्जिदे
ٱلْحَرَامِ ۖ
हराम के
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
لَلْحَقُّ
अलबत्ता हक़ है
مِن
from
رَّبِّكَ ۗ
आपके रब की तरफ़ से
وَمَا
और नहीं है
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِغَـٰفِلٍ
ग़ाफ़िल
عَمَّا
उससे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
और जहाँ से भी तुम निकलों, 'मस्जिदे हराम' (काबा) की ओर अपना मुँह फेर लिया करो। निस्संदेह यही तुम्हारे रब की ओर से हक़ है। जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उससे बेख़बर नहीं है
तफ़्सीर:
तथा (ऐ नबी!) आप और आपके अनुयायी जहाँ से भी निकलें और जिस स्थान पर भी हों और नमाज़ का इरादा करें, तो अपना चेहरा सम्मानित मस्जिद (काबा शरीफ़) की ओर कर लें। क्योंकि यही सत्य है जिसकी आपके रब ने आपकी ओर वह़्य की है। और तुम जो कुछ करते हो, अल्लाह उससे अनजान नहीं है, बल्कि वह उसके बारे में खू़ब जानता है और तुम्हें उसका बदल देगा।
आयत 150
وَمِنْ حَيْثُ خَرَجْتَ فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ ۚ وَحَيْثُ مَا كُنتُمْ فَوَلُّوا۟ وُجُوهَكُمْ شَطْرَهُۥ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَيْكُمْ حُجَّةٌ إِلَّا ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ مِنْهُمْ فَلَا تَخْشَوْهُمْ وَٱخْشَوْنِى وَلِأُتِمَّ نِعْمَتِى عَلَيْكُمْ وَلَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ
وَمِنْ
And from
حَيْثُ
और जहाँ कहीं से
خَرَجْتَ
निकलें आप
فَوَلِّ
तो फेर लीजिए
وَجْهَكَ
चेहरा अपना
شَطْرَ
तरफ़
ٱلْمَسْجِدِ
मस्जिदे
ٱلْحَرَامِ ۚ
हराम के
وَحَيْثُ
And wherever
مَا
और जहाँ कहीं भी
كُنتُمْ
हो तुम
فَوَلُّوا۟
तो फेर लो
وُجُوهَكُمْ
अपने चेहरों को
شَطْرَهُۥ
तरफ़ उसके
لِئَلَّا
ताकि ना
يَكُونَ
हो
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
عَلَيْكُمْ
तुम पर
حُجَّةٌ
कोई हुज्जत
إِلَّا
सिवाय
ٱلَّذِينَ
उनके जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
مِنْهُمْ
उनमें से
فَلَا
तो ना
تَخْشَوْهُمْ
तुम डरो उनसे
وَٱخْشَوْنِى
और डरो मुझसे
وَلِأُتِمَّ
और ताकि मैं पूरी कर दूँ
نِعْمَتِى
अपनी नेअमत
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَلَعَلَّكُمْ
और ताकि तुम
تَهْتَدُونَ
तुम हिदायत पा जाओ
जहाँ से भी तुम निकलो, 'मस्जिदे हराम' की ओर अपना मुँह फेर लिया करो, और जहाँ कहीं भी तुम हो उसी की ओर मुँह कर लिया करो, ताकि लोगों के पास तुम्हारे ख़िलाफ़ कोई हुज्जत बाक़ी न रहे - सिवाय उन लोगों के जो उनमें ज़ालिम हैं, तुम उनसे न डरो, मुझसे ही डरो - और ताकि मैं तुमपर अपनी नेमत पूरी कर दूँ, और ताकि तुम सीधी राह चलो
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) आप जिस स्थान से भी निकलें और नमाज़ पढ़ना चाहें, तो अपना चेहरा मस्जिदे-ह़राम की ओर कर लें। तथा - ऐ मोमिनो! - तुम जिस स्थान पर भी हो, तो अगर तुम नमाज़ पढ़ना चाहो, तो अपने चेहरे उसी की दिशा में कर लो; ताकि लोगों के पास कोई तर्क (हुज्जत) न रहे जिसके द्वारा वे तुमसे वाद-विवाद करें, सिवाय उन लोगों के जिन्होंने उनमें से अत्याचार किया। क्योंकि वे अपने हठ पर बने रहेंगे और तुम्हारे विरुद्ध कमज़ोर से कमज़ोर तर्क के साथ बहस करेंगे। अतः उनसे मत डरो और अकेले अपने पालनहार से डरो, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर। क्योंकि अल्लाह ने काबा की ओर चेहरा करने का नियम इसलिए बनाया है, ताकि तुम्हें शेष सारी क़ौमों से उत्कृष्ट करके तुमपर अपनी नेमत पूरी करे और ताकि लोगों के लिए सबसे सम्माननीय क़िबला की ओर तुम्हारा मार्गदर्शन करे।
आयत 151
كَمَآ أَرْسَلْنَا فِيكُمْ رَسُولًۭا مِّنكُمْ يَتْلُوا۟ عَلَيْكُمْ ءَايَـٰتِنَا وَيُزَكِّيكُمْ وَيُعَلِّمُكُمُ ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْحِكْمَةَ وَيُعَلِّمُكُم مَّا لَمْ تَكُونُوا۟ تَعْلَمُونَ
كَمَآ
जैसा कि
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
فِيكُمْ
तुम में
رَسُولًۭا
एक रसूल
مِّنكُمْ
तुममें से
يَتْلُوا۟
वो तिलावत करता है
عَلَيْكُمْ
तुम पर
ءَايَـٰتِنَا
आयात हमारी
وَيُزَكِّيكُمْ
और वो पाक करता है तुम्हें
وَيُعَلِّمُكُمُ
और वो तालीम देता है तुम्हें
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
وَٱلْحِكْمَةَ
और हिकमत की
وَيُعَلِّمُكُم
और वो तालीम देता है तुम्हें
مَّا
उसकी जो
لَمْ
ना
تَكُونُوا۟
थे तुम
تَعْلَمُونَ
तुम इल्म रखते
जैसाकि हमने तुम्हारे बीच एक रसूल तुम्हीं में से भेजा जो तुम्हें हमारी आयतें सुनाता है, तुम्हें निखारता है, और तुम्हें किताब और हिकमत (तत्वदर्शिता) की शिक्षा देता है और तुम्हें वह कुछ सिखाता है, जो तुम जानते न थे
तफ़्सीर:
इसी तरह हमने तुम्हें एक और नेमत प्रदान की; कि हमने तुम्हारी ओर तुम्हारे बीच से एक रसूल भेजा, जो तुम्हें हमारी आयतें पढ़कर सुनाता है, तुम्हें अच्छाइयों तथा भली बात का आदेश देकर और घृणित चीज़ों तथा बुरी बात से मनाही करके पवित्र करता है, तथा तुम्हें क़ुरआन और सुन्नत सिखाता है और तुम्हें तुम्हारे धर्म एवं संसार के मामलों के बारे में ऐसी बातें सिखाता है, जो तुम नहीं जानते थे।
आयत 152
فَٱذْكُرُونِىٓ أَذْكُرْكُمْ وَٱشْكُرُوا۟ لِى وَلَا تَكْفُرُونِ
فَٱذْكُرُونِىٓ
पस याद करो मुझे
أَذْكُرْكُمْ
मैं याद करुँगा तुम्हें
وَٱشْكُرُوا۟
and be grateful
لِى
और शुक्र करो मेरा
وَلَا
और ना
تَكْفُرُونِ
तुम नाशुक्री करो मेरी
अतः तुम मुझे याद रखो, मैं भी तुम्हें याद रखूँगा। और मेरा आभार स्वीकार करते रहना, मेरे प्रति अकृतज्ञता न दिखलाना
तफ़्सीर:
तुम मुझे अपने दिलों और शारीरिक अंगों द्वारा याद करो; मैं तुम्हारी प्रशंसा करके और तुम्हें संरक्षण प्रदान करके तुम्हें याद रखूँगा। क्योंकि बदला कार्य के समान ही मिलता है। तथा मेरी उन नेमतों का शुक्रिया अदा करो, जो मैंने तुम्हें प्रदान की हैं, और उनका इनकार करके और उन्हें हराम चीज़ों में इस्तेमाल करके मेरी नाशुक्री न करो।
आयत 153
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱسْتَعِينُوا۟ بِٱلصَّبْرِ وَٱلصَّلَوٰةِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلصَّـٰبِرِينَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
ٱسْتَعِينُوا۟
तुम मदद माँगो
بِٱلصَّبْرِ
साथ सब्र के
وَٱلصَّلَوٰةِ ۚ
और नमाज़ के
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
مَعَ
साथ है
ٱلصَّـٰبِرِينَ
सब्र करने वालों के
ऐ ईमान लानेवालो! धैर्य और नमाज़ से मदद प्राप्त। करो। निस्संदेह अल्लाह उन लोगों के साथ है जो धैर्य और दृढ़ता से काम लेते है
तफ़्सीर:
ऐ ईमान वालो! धैर्य तथा नमाज़ के साथ मेरी आज्ञाकारिता करने और मेरे आदेश के प्रति समर्पित होने में मदद हासिल करो। निश्चय अल्लाह धैर्य रखने वालों के साथ है, उन्हें सामर्थ्य प्रदान करता तथा उनकी सहायता करता है।
आयत 154
وَلَا تَقُولُوا۟ لِمَن يُقْتَلُ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ أَمْوَٰتٌۢ ۚ بَلْ أَحْيَآءٌۭ وَلَـٰكِن لَّا تَشْعُرُونَ
وَلَا
और ना
تَقُولُوا۟
तुम कहो
لِمَن
उन्हें जो
يُقْتَلُ
क़त्ल कर दिए जाऐं
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
أَمْوَٰتٌۢ ۚ
कि मुर्दा हैं
بَلْ
बल्कि
أَحْيَآءٌۭ
ज़िन्दा हैं (वो)
وَلَـٰكِن
और लेकिन
لَّا
you (do) not
تَشْعُرُونَ
नहीं तुम शऊर रखते
और जो लोग अल्लाह के मार्ग में मारे जाएँ उन्हें मुर्दा न कहो, बल्कि वे जीवित है, परन्तु तुम्हें एहसास नहीं होता
तफ़्सीर:
(ऐ मोमिनो!) तुम उनके बारे में जो अल्लाह के मार्ग में जिहाद के कारण मारे जाएँ, यह मत कहो : वे मर गए, जैसे उनके अलावा दूसरे लोग मरते हैं। बल्कि, वे अपने रब के पास जीवित हैं। लेकिन तुम उनके जीवन का एहसास नहीं करते; क्योंकि वह एक विशिष्ट जीवन है, जिसे जानने का एकमात्र तरीक़ा अल्लाह की वह़्य है।
आयत 155
وَلَنَبْلُوَنَّكُم بِشَىْءٍۢ مِّنَ ٱلْخَوْفِ وَٱلْجُوعِ وَنَقْصٍۢ مِّنَ ٱلْأَمْوَٰلِ وَٱلْأَنفُسِ وَٱلثَّمَرَٰتِ ۗ وَبَشِّرِ ٱلصَّـٰبِرِينَ
وَلَنَبْلُوَنَّكُم
और अलबत्ता हम ज़रूर आज़माऐंगे
بِشَىْءٍۢ
साथ किसी भी चीज़ के
مِّنَ
of
ٱلْخَوْفِ
ख़ौफ़ से
وَٱلْجُوعِ
और भूख से
وَنَقْصٍۢ
और कमी (करके)
مِّنَ
of
ٱلْأَمْوَٰلِ
मालों से
وَٱلْأَنفُسِ
और जानों से
وَٱلثَّمَرَٰتِ ۗ
और फलों से
وَبَشِّرِ
और ख़ुशख़बरी दे दीजिए
ٱلصَّـٰبِرِينَ
सब्र करने वालों को
और हम अवश्य ही कुछ भय से, और कुछ भूख से, और कुछ जान-माल और पैदावार की कमी से तुम्हारी परीक्षा लेंगे। और धैर्य से काम लेनेवालों को शुभ-सूचना दे दो
तफ़्सीर:
हम अनेक प्रकार की विपत्तियों के साथ तुम्हें ज़रूर आज़माएँगे; अपने दुश्मनों के कुछ भय के साथ, भोजन की कमी के कारण भूख के साथ, धन के समाप्त हो जाने या उसे प्राप्त करने की कठिनाई के कारण धन की कमी के साथ, लोगों को नष्ट करने वाली आपदाओं के कारण या अल्लाह के मार्ग में शहीद होने के कारण जानों के नुक़सान के साथ, तथा उन फलों की कमी के साथ जिन्हें धरती उगाती है। ऐसे में - ऐ नबी! - इन विपत्तियों पर धैर्य रखने वालों को उस चीज़ की शुभ सूचना सुना दें, जिससे उन्हें दुनिया एवं आख़िरत में प्रसन्नता हासिल होगी।
आयत 156
ٱلَّذِينَ إِذَآ أَصَـٰبَتْهُم مُّصِيبَةٌۭ قَالُوٓا۟ إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّآ إِلَيْهِ رَٰجِعُونَ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
إِذَآ
जब
أَصَـٰبَتْهُم
पहुँचती है उन्हें
مُّصِيبَةٌۭ
कोई मुसीबत
قَالُوٓا۟
वो कहते हैं
إِنَّا
बेशक हम
لِلَّهِ
अल्लाह ही के लिए हैं
وَإِنَّآ
और बेशक हम
إِلَيْهِ
तरफ़ उसी के
رَٰجِعُونَ
लौटने वाले हैं
जो लोग उस समय, जबकि उनपर कोई मुसीबत आती है, कहते है, "निस्संदेह हम अल्लाह ही के है और हम उसी की ओर लौटने वाले है।"
तफ़्सीर:
जब उनपर इन विपत्तियों में से कोई विपत्ति आती है, तो वे अल्लाह के निर्णय के प्रति संतोष और समर्पण के साथ कहते हैं : निःसंदेह हम अल्लाह के हैं, वह हमारे साथ जैसा चाहता है, व्यवहार करता है। तथा निःसंदेह हम क़ियामत के दिन उसी की ओर लौटने वाले हैं। क्योंकि उसी ने हमें पैदा किया और हमें विभिन्न प्रकार की नेमतें प्रदान कीं, तथा उसी की तरफ़ हमारा लौटना और हमारे मामले का अंत है।
आयत 157
أُو۟لَـٰٓئِكَ عَلَيْهِمْ صَلَوَٰتٌۭ مِّن رَّبِّهِمْ وَرَحْمَةٌۭ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُهْتَدُونَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही वो लोग हैं
عَلَيْهِمْ
जिन पर
صَلَوَٰتٌۭ
नवाज़िशें/इनायतें हैं
مِّن
from
رَّبِّهِمْ
उनके रब की तरफ़ से
وَرَحْمَةٌۭ ۖ
और रहमत है
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْمُهْتَدُونَ
जो हिदायत याफ़्ता हैं
यही लोग है जिनपर उनके रब की विशेष कृपाएँ है और दयालुता भी; और यही लोग है जो सीधे मार्ग पर हैं
तफ़्सीर:
इस विशेषता के मालिक लोगों के लिए फ़रिश्तों की सर्वोच्च सभा में अल्लाह की ओर से प्रशंसा है, तथा उनपर रहमत उतरती है और यही लोग सत्य के मार्ग पर निर्देशित हैं।
आयत 158
۞ إِنَّ ٱلصَّفَا وَٱلْمَرْوَةَ مِن شَعَآئِرِ ٱللَّهِ ۖ فَمَنْ حَجَّ ٱلْبَيْتَ أَوِ ٱعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَن يَطَّوَّفَ بِهِمَا ۚ وَمَن تَطَوَّعَ خَيْرًۭا فَإِنَّ ٱللَّهَ شَاكِرٌ عَلِيمٌ
۞ إِنَّ
बेशक
ٱلصَّفَا
सफ़ा
وَٱلْمَرْوَةَ
और मरवा
مِن
(are) from
شَعَآئِرِ
निशानियों में से हैं
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह की
فَمَنْ
पस जो कोई
حَجَّ
हज करे
ٱلْبَيْتَ
बैतुल्लाह का
أَوِ
या
ٱعْتَمَرَ
उमरा करे
فَلَا
तो नहीं
جُنَاحَ
कोई गुनाह
عَلَيْهِ
उस पर
أَن
कि
يَطَّوَّفَ
वो तवाफ़ (सई) करे
بِهِمَا ۚ
उन दोनों का
وَمَن
और जो कोई
تَطَوَّعَ
ख़ुशी से करे
خَيْرًۭا
कोई नेकी
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
شَاكِرٌ
क़द्रदान है
عَلِيمٌ
ख़ूब जानने वाला है
निस्संदेह सफ़ा और मरवा अल्लाह की विशेष निशानियों में से हैं; अतः जो इस घर (काबा) का हज या उमपा करे, उसके लिए इसमें कोई दोष नहीं कि वह इन दोनों (पहाडियों) के बीच फेरा लगाए। और जो कोई स्वेच्छा और रुचि से कोई भलाई का कार्य करे तो अल्लाह भी गुणग्राहक, सर्वज्ञ है
तफ़्सीर:
काबा के पास सफ़ा और मरवा के नाम से जानी जाने वाली दो पहाड़ियाँ, शरीयत के दृश्य स्थलों में से हैं। इसलिए जो हज्ज अथवा उम्रा के लिए काबा पहुँचे; उसपर कोई पाप नहीं कि वह इन दोनों के बीच दौड़ लगाए। यहाँ पाप का इनकार करने में उन मुसलमानों के लिए आश्वासन है, जो इन दोनों के बीच दौड़ लगाने को जाहिलिय्यत (पूर्व-इस्लामी युग) का काम समझकर गुनाह समझते थे। चुनाँचे अल्लाह ने स्पष्ट कर दिया कि यह हज्ज के अनुष्ठानों में से है। जो भी व्यक्ति स्वेच्छा से निष्ठापूर्वक मुस्तहब आज्ञाकारिता का कार्य करे; अल्लाह उसकी क़द्र करने वाला है, उसे उससे स्वीकार करेगा और उसे उसपर बदला देगा। वह उसके बारे में जानने वाला है, जो अच्छा काम करता है और सवाब का हक़दार है।
आयत 159
إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكْتُمُونَ مَآ أَنزَلْنَا مِنَ ٱلْبَيِّنَـٰتِ وَٱلْهُدَىٰ مِنۢ بَعْدِ مَا بَيَّنَّـٰهُ لِلنَّاسِ فِى ٱلْكِتَـٰبِ ۙ أُو۟لَـٰٓئِكَ يَلْعَنُهُمُ ٱللَّهُ وَيَلْعَنُهُمُ ٱللَّـٰعِنُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يَكْتُمُونَ
छुपाते हैं
مَآ
उसे जो
أَنزَلْنَا
नाज़िल किया हमने
مِنَ
of
ٱلْبَيِّنَـٰتِ
वाज़ेह निशानियों में से
وَٱلْهُدَىٰ
और हिदायत में से
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद उसके
مَا
जो
بَيَّنَّـٰهُ
वाज़ेह कर दिया हमने उसे
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
فِى
in
ٱلْكِتَـٰبِ ۙ
किताब में
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही वो लोग हैं
يَلْعَنُهُمُ
लानत करता है उन पर
ٱللَّهُ
अल्लाह
وَيَلْعَنُهُمُ
और लानत करते हैं उन पर
ٱللَّـٰعِنُونَ
लानत करने वाले
जो लोग हमारी उतारी हुई खुली निशानियों और मार्गदर्शन को छिपाते है, इसके बाद कि हम उन्हें लोगों के लिए किताब में स्पष्ट कर चुके है; वही है जिन्हें अल्लाह धिक्कारता है - और सभी धिक्कारने वाले भी उन्हें धिक्कारते है
तफ़्सीर:
यहूदियों, ईसाइयों और अन्य लोगों में से जो लोग नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके लाए हुए संदेश की सच्चाई को दर्शाने वाले स्पष्ट प्रमाणों को छिपाते हैं, इसके बाद कि हमने उन्हें उनकी किताबों में लोगों के लिए खोलकर बयान कर दिया है; वे ऐसे लोग हैं जिन्हें अल्लाह अपनी दया से निष्कासित कर देता है। साथ ही फ़रिश्ते, नबी गण और सभी लोग यह दुआ करते हैं कि अल्लाह उन्हें अपनी रहमत से निष्कासित कर दे।
आयत 160
إِلَّا ٱلَّذِينَ تَابُوا۟ وَأَصْلَحُوا۟ وَبَيَّنُوا۟ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ أَتُوبُ عَلَيْهِمْ ۚ وَأَنَا ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ
إِلَّا
सिवाय
ٱلَّذِينَ
उनके जिन्होंने
تَابُوا۟
तौबा की
وَأَصْلَحُوا۟
और इस्लाह की
وَبَيَّنُوا۟
और वाज़ेह कर दिया
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही वो लोग हैं
أَتُوبُ
मैं मेहरबान होता हूँ
عَلَيْهِمْ ۚ
उन पर
وَأَنَا
और मैं
ٱلتَّوَّابُ
बहुत तौबा क़ुबूल करने वाला हूँ
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला हूँ
सिवाय उनके जिन्होंने तौबा कर ली और सुधार कर लिया, और साफ़-साफ़ बयान कर दिया, तो उनकी तौबा मैं क़बूल करूँगा; मैं बड़ा तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान हूँ
तफ़्सीर:
परंतु जो लोग उन स्पष्ट निशानियों को छिपाने पर पछतावा करते हुए अल्लाह की ओर लौट आए, तथा अपने बाहरी और आंतरिक कार्यों को सुधार लिया और उन्होंने जो सच्चाई और मार्गदर्शन छुपाया था, उन्हें स्पष्ट कर दिया; तो ऐसे लोगों की मैं अपनी आज्ञाकारिता की ओर वापसी को स्वीकार करता हूँ, और मैं तौबा करने वाले बंदों की तौबा क़बूल करने वाला, उनपर दया करने वाला हूँ।
आयत 161
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَمَاتُوا۟ وَهُمْ كُفَّارٌ أُو۟لَـٰٓئِكَ عَلَيْهِمْ لَعْنَةُ ٱللَّهِ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ وَٱلنَّاسِ أَجْمَعِينَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
وَمَاتُوا۟
और वो मर गए
وَهُمْ
इस हाल में कि वो
كُفَّارٌ
काफ़िर थे
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही वो लोग हैं
عَلَيْهِمْ
उन पर है
لَعْنَةُ
लानत
ٱللَّهِ
अल्लाह की
وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ
और फ़रिश्तों की
وَٱلنَّاسِ
और लोगों की
أَجْمَعِينَ
सब के सब की
जिन लोगों ने कुफ़्र किया और काफ़िर (इनकार करनेवाले) ही रहकर मरे, वही हैं जिनपर अल्लाह की, फ़रिश्तों की और सारे मनुष्यों की, सबकी फिटकार है
तफ़्सीर:
निःसंदेह जिन लोगों ने कुफ़्र किया और उससे तौबा करने से पहले कुफ़्र ही की अवस्था में मर गए, तो ऐसे लोगों पर अल्लाह का यह अभिशाप है कि उन्हें अपनी दया से निष्कासित कर देता है, तथा फ़रिश्तों और सभी लोगों का उनपर यह श्राप है कि अल्लाह उन्हें अपनी दया से निष्कासित और दूर कर दे।
आयत 162
خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۖ لَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ ٱلْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَا ۖ
उसमें
لَا
Not
يُخَفَّفُ
ना हल्का किया जाएगा
عَنْهُمُ
उनसे
ٱلْعَذَابُ
अज़ाब
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يُنظَرُونَ
वो मोहलत दिए जाऐंगे
इसी दशा में वे सदैव रहेंगे, न उनकी यातना हल्की की जाएगी और न उन्हें मुहलत ही मिलेगी
तफ़्सीर:
वे इसी लानत (अभिशाप) से पीड़ित रहेंगे, उनकी यातना एक दिन के लिए भी कम नहीं होगी और न उन्हें क़ियामत के दिन मोहलत दी जाएगी।
आयत 163
وَإِلَـٰهُكُمْ إِلَـٰهٌۭ وَٰحِدٌۭ ۖ لَّآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلرَّحْمَـٰنُ ٱلرَّحِيمُ
وَإِلَـٰهُكُمْ
और इलाह तुम्हारा
إِلَـٰهٌۭ
इलाह है
وَٰحِدٌۭ ۖ
एक ही
لَّآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ
वो ही
ٱلرَّحْمَـٰنُ
जो बहुत मेहरबान है
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला है
तुम्हारा पूज्य-प्रभु अकेला पूज्य-प्रभु है, उस कृपाशील और दयावान के अतिरिक्त कोई पूज्य-प्रभु नहीं
तफ़्सीर:
(ऐ लोगो!) तुम्हारा सच्चा मा'बूद एक ही है, जो अपने अस्तित्व और गुणों में अद्वितीय है, उसके अलावा कोई सच्चा मा'बूद नहीं। वह अत्यंत दयावान् विशाल दया वाला, अपने बंदों पर असीम दयालु है। क्योंकि उसने उन्हें अनगिनत नेमतें प्रदान की हैं।
आयत 164
إِنَّ فِى خَلْقِ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَٱخْتِلَـٰفِ ٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ وَٱلْفُلْكِ ٱلَّتِى تَجْرِى فِى ٱلْبَحْرِ بِمَا يَنفَعُ ٱلنَّاسَ وَمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مِن مَّآءٍۢ فَأَحْيَا بِهِ ٱلْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا وَبَثَّ فِيهَا مِن كُلِّ دَآبَّةٍۢ وَتَصْرِيفِ ٱلرِّيَـٰحِ وَٱلسَّحَابِ ٱلْمُسَخَّرِ بَيْنَ ٱلسَّمَآءِ وَٱلْأَرْضِ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّقَوْمٍۢ يَعْقِلُونَ
إِنَّ
बेशक
فِى
in
خَلْقِ
पैदा करने में
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन के
وَٱخْتِلَـٰفِ
और इख़्तिलाफ़ में
ٱلَّيْلِ
रात
وَٱلنَّهَارِ
और दिन के
وَٱلْفُلْكِ
और कश्तियों में
ٱلَّتِى
वो जो
تَجْرِى
चलती हैं
فِى
in
ٱلْبَحْرِ
समुन्दर में
بِمَا
साथ उसके जो
يَنفَعُ
नफ़ा देता है
ٱلنَّاسَ
लोगों को
وَمَآ
और उसमें जो
أَنزَلَ
नाज़िल किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مِن
[of]
مَّآءٍۢ
पानी में से
فَأَحْيَا
फिर उसने ज़िन्दा किया
بِهِ
साथ उसके
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
بَعْدَ
बाद
مَوْتِهَا
उसकी मौत के
وَبَثَّ
और उसने फैला दी
فِيهَا
उसमें
مِن
[of]
كُلِّ
every
دَآبَّةٍۢ
हर क़िस्म की जानदार मख़लूक़
وَتَصْرِيفِ
और फेरने में
ٱلرِّيَـٰحِ
हवाओं के
وَٱلسَّحَابِ
और बादलों में
ٱلْمُسَخَّرِ
जो मुसख़्ख़र किए गए हैं
بَيْنَ
दर्मियान
ٱلسَّمَآءِ
आसमान
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन के
لَـَٔايَـٰتٍۢ
यक़ीनन निशानियाँ हैं
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَعْقِلُونَ
जो अक़्ल रखते हैं
निस्संदेह आकाशों और धरती की संरचना में, और रात और दिन की अदला-बदली में, और उन नौकाओं में जो लोगों की लाभप्रद चीज़े लेकर समुद्र (और नदी) में चलती है, और उस पानी में जिसे अल्लाह ने आकाश से उतारा, फिर जिसके द्वारा धरती को उसके निर्जीव हो जाने के पश्चात जीवित किया और उसमें हर एक (प्रकार के) जीवधारी को फैलाया और हवाओं को गर्दिश देने में और उन बादलों में जो आकाश और धरती के बीच (काम पर) नियुक्त होते है, उन लोगों के लिए कितनी ही निशानियाँ है जो बुद्धि से काम लें
तफ़्सीर:
निःसंदेह आसमानों और ज़मीन की रचना और उनमें उपस्थित अद्भुत प्राणियों में, तथा रात और दिन के एक-दूसरे के पश्चात आने-जाने में, तथा उन कश्तियों में जो लोगों को लाभ पहुँचाने वाले भोजन, वस्त्र, व्यापार और अन्य आवश्यकता की चीज़ों को लेकर समुद्र के पानी में दौड़ती हैं, तथा उस पानी में जो अल्लाह ने आसमान से उतारा, फिर उसके द्वारा धरती को उसमें उगने वाली फसलों और पौधों (घास) के द्वारा पुनर्जीवित किया। तथा धरती के ऊपर जीवित प्राणियों को फैलाने में, तथा एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ हवाओं के फेरने में, तथा धरती और आकाश के बीच वशीभूत किए हुए बादलों में; निश्चय इन सब में उन लोगों के लिए अल्लाह के एकत्व (एकेश्वरवाद) के स्पष्ट संकेत (प्रमाण) हैं, जो तर्कों और प्रमाणों को समझते हैं।
आयत 165
وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَتَّخِذُ مِن دُونِ ٱللَّهِ أَندَادًۭا يُحِبُّونَهُمْ كَحُبِّ ٱللَّهِ ۖ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَشَدُّ حُبًّۭا لِّلَّهِ ۗ وَلَوْ يَرَى ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓا۟ إِذْ يَرَوْنَ ٱلْعَذَابَ أَنَّ ٱلْقُوَّةَ لِلَّهِ جَمِيعًۭا وَأَنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلْعَذَابِ
وَمِنَ
And among
ٱلنَّاسِ
और बाज़ लोग हैं
مَن
जो
يَتَّخِذُ
बना लेते हैं
مِن
from
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
أَندَادًۭا
कई शरीक
يُحِبُّونَهُمْ
वो मोहब्बत करते हैं उनसे
كَحُبِّ
जैसी मोहब्बत करना
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह से
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए
أَشَدُّ
ज़्यादा शदीद हैं
حُبًّۭا
मोहब्बत करने में
لِّلَّهِ ۗ
अल्लाह से
وَلَوْ
और काश
يَرَى
देख लें
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
ظَلَمُوٓا۟
ज़ुल्म किया
إِذْ
जब
يَرَوْنَ
वो देखेंगे
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब को
أَنَّ
बेशक
ٱلْقُوَّةَ
क़ुव्वत
لِلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
جَمِيعًۭا
सारी की सारी
وَأَنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
شَدِيدُ
सख़्त है
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब (देने में)
कुछ लोग ऐसे भी है जो अल्लाह से हटकर दूसरों को उसके समकक्ष ठहराते है, उनसे ऐसा प्रेम करते है जैसा अल्लाह से प्रेम करना चाहिए। और कुछ ईमानवाले है उन्हें सबसे बढ़कर अल्लाह से प्रेम होता है। और ये अत्याचारी (बहुदेववादी) जबकि यातना देखते है, यदि इस तथ्य को जान लेते कि शक्ति सारी की सारी अल्लाह ही को प्राप्त हो और यह कि अल्लाह अत्यन्त कठोर यातना देनेवाला है (तो इनकी नीति कुछ और होती)
तफ़्सीर:
इन स्पष्ट निशानियों के बावजूद, कुछ लोग ऐसे हैं, जो अल्लाह के अलावा कुछ पूज्य ठहराकर उन्हें अल्लाह का समकक्ष बना लेते हैं, जिनसे वे वैसा ही प्रेम करते हैं जैसा प्रेम अल्लाह से करते हैं। परंतु जो लोग ईमान लाए, वे अल्लाह से इन लोगों के अपने पूज्यों (देवताओं) से प्रेम करने से कहीं बढ़कर प्रेम करने वाले होते हैं। क्योंकि वे अल्लाह के साथ किसी को साझी नहीं बनाते, तथा वे समृद्धि और विपत्ति दोनों में उससे प्रेम करते हैं। जबकि इन लोगों का हाल यह है कि वे केवल समृद्धि में अपने पूज्यों से प्रेम करते हैं, लेकिन विपत्ति में केवल अल्लाह को पुकारते हैं। यदि अपने शिर्क और बुरे कर्मों के द्वारा अत्याचार करने वाले आख़िरत में अपनी स्थिति को देख लें जब वे अज़ाब को देखेंगे; तो जान लें कि सर्वशक्तिमान केवल अल्लाह ही है तथा वह अपने अवज्ञाकारियों को कठिन यातना देने वाला है। यदि ये लोग उस स्थिति को देख लेते, तो अल्लाह के साथ किसी को साझी न बनाते।
आयत 166
إِذْ تَبَرَّأَ ٱلَّذِينَ ٱتُّبِعُوا۟ مِنَ ٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُوا۟ وَرَأَوُا۟ ٱلْعَذَابَ وَتَقَطَّعَتْ بِهِمُ ٱلْأَسْبَابُ
إِذْ
जब
تَبَرَّأَ
बेज़ार होंगे
ٱلَّذِينَ
वो जो
ٱتُّبِعُوا۟
पैरवी किए गए
مِنَ
[from]
ٱلَّذِينَ
उनसे जिन्होंने
ٱتَّبَعُوا۟
पैरवी की
وَرَأَوُا۟
और वो देख लेंगे
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब
وَتَقَطَّعَتْ
और कट जाऐंगे
بِهِمُ
उनके
ٱلْأَسْبَابُ
तमाम असबाब
जब वे लोग जिनके पीछे वे चलते थे, यातना को देखकर अपने अनुयायियों से विरक्त हो जाएँगे और उनके सम्बन्ध और सम्पर्क टूट जाएँगे
तफ़्सीर:
यह उस समय होगा जब अनुसरण किए गए सरदार उन कमज़ोरों से अलग हो जाएँगे जिन्होंने उनका अनुसरण किया था; क्योंकि वे क़ियामत के दिन की भयावहता और उसकी कठिनाइयों को देख रहे होंगे, तथा मुक्ति के सभी कारण और साधन उनसे कट जाएँगे।
आयत 167
وَقَالَ ٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُوا۟ لَوْ أَنَّ لَنَا كَرَّةًۭ فَنَتَبَرَّأَ مِنْهُمْ كَمَا تَبَرَّءُوا۟ مِنَّا ۗ كَذَٰلِكَ يُرِيهِمُ ٱللَّهُ أَعْمَـٰلَهُمْ حَسَرَٰتٍ عَلَيْهِمْ ۖ وَمَا هُم بِخَـٰرِجِينَ مِنَ ٱلنَّارِ
وَقَالَ
और कहेंगे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
ٱتَّبَعُوا۟
पैरवी की
لَوْ
काश
أَنَّ
कि
لَنَا
हमारे लिए होता
كَرَّةًۭ
एक मर्तबा लौटना
فَنَتَبَرَّأَ
तो हम बेज़ार होते
مِنْهُمْ
उनसे
كَمَا
जैसा कि
تَبَرَّءُوا۟
वो बेज़ार हुए
مِنَّا ۗ
हमसे
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يُرِيهِمُ
दिखाएगा उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَعْمَـٰلَهُمْ
आमाल उनके
حَسَرَٰتٍ
हसरतें बनाकर
عَلَيْهِمْ ۖ
उन पर
وَمَا
और नहीं
هُم
वो
بِخَـٰرِجِينَ
निकलने वाले
مِنَ
from
ٱلنَّارِ
आग से
वे लोग जो उनके पीछे चले थे कहेंगे, "काश! हमें एक बार (फिर संसार में लौटना होता तो जिस तरह आज ये हमसे विरक्त हो रहे हैं, हम भी इनसे विरक्त हो जाते।" इस प्रकार अल्लाह उनके लिए संताप बनाकर उन्हें कर्म दिखाएगा और वे आग (जहन्नम) से निकल न सकेंगे
तफ़्सीर:
तथा कमज़ोर और अनुयायी लोग कहेंगे : काश! हमें दुनिया में वापस जाने का एक अवसर मिल जाता, तो हम भी अपने पेशवाओं से उसी तरह बिल्कुल अलग हो जाते, जैसे वे आज हमसे बिल्कुल अलग हो गए। जिस तरह अल्लाह ने उन्हें आख़िरत में कठिन यातना दिखाई है, उन्हें उनके पेशवाओं का असत्य पर अनुसरण करने का परिणाम पछतावे और दुखों के रूप में दिखाएगा, और वे कभी भी आग (जहन्नम) से बाहर नहीं आएँगे।
आयत 168
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ كُلُوا۟ مِمَّا فِى ٱلْأَرْضِ حَلَـٰلًۭا طَيِّبًۭا وَلَا تَتَّبِعُوا۟ خُطُوَٰتِ ٱلشَّيْطَـٰنِ ۚ إِنَّهُۥ لَكُمْ عَدُوٌّۭ مُّبِينٌ
يَـٰٓأَيُّهَا
O
ٱلنَّاسُ
ऐ लोगो
كُلُوا۟
खाओ
مِمَّا
उससे जो
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में है
حَلَـٰلًۭا
हलाल
طَيِّبًۭا
पाकीज़ा
وَلَا
और ना
تَتَّبِعُوا۟
तुम पैरवी करो
خُطُوَٰتِ
क़दमों की
ٱلشَّيْطَـٰنِ ۚ
शैतान के
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
عَدُوٌّۭ
दुश्मन है
مُّبِينٌ
खुल्लम-खुल्ला
ऐ लोगों! धरती में जो हलाल और अच्छी-सुथरी चीज़ें हैं उन्हें खाओ और शैतान के पदचिन्हों पर न चलो। निस्संदेह वह तुम्हारा खुला शत्रु है
तफ़्सीर:
ऐ लोगो! धरती में मौजूद चीज़ों जैसे जानवरों, पौधों और पेड़ों में से खाओ, जिसकी कमाई हलाल हो और वह अपने आप में अच्छी हो, बुरी (अशुद्ध) न हो। तथा शैतान के उन रास्तों पर मत चलो, जिनके द्वारा वह तुम्हें लुभाता है। क्योंकि वह तुम्हारा एक ऐसा शत्रु है जिसकी शत्रुता स्पष्ट है। और एक समझदार व्यक्ति के लिए अपने शत्रु का अनुसरण करना जायज़ नहीं है, जो उसे नुक़सान पहुँचाने और गुमराह करने का लोभी होता है!
आयत 169
إِنَّمَا يَأْمُرُكُم بِٱلسُّوٓءِ وَٱلْفَحْشَآءِ وَأَن تَقُولُوا۟ عَلَى ٱللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
إِنَّمَا
बेशक
يَأْمُرُكُم
वो हुक्म देता है तुम्हें
بِٱلسُّوٓءِ
बुराई का
وَٱلْفَحْشَآءِ
और बेहयाई का
وَأَن
और ये कि
تَقُولُوا۟
तुम कहो
عَلَى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
مَا
जो
لَا
नहीं
تَعْلَمُونَ
तुम जानते
वह तो बस तुम्हें बुराई और अश्लीलता पर उकसाता है और इसपर कि तुम अल्लाह पर थोपकर वे बातें कहो जो तुम नहीं जानते
तफ़्सीर:
वह केवल तुम्हें बुरे पापों तथा बड़े एवं गंभीर गुनाहों का आदेश देता है और यह कि तुम अक़ीदे और शरीयत के नियमों के संबंध में अल्लाह पर कोई बात कहो, जिसके बारे में तुम्हारे पास अल्लाह या उसके रसूल की तरफ़ से कोई ज्ञान न आया हो।
आयत 170
وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ٱتَّبِعُوا۟ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ قَالُوا۟ بَلْ نَتَّبِعُ مَآ أَلْفَيْنَا عَلَيْهِ ءَابَآءَنَآ ۗ أَوَلَوْ كَانَ ءَابَآؤُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ شَيْـًۭٔا وَلَا يَهْتَدُونَ
وَإِذَا
और जब
قِيلَ
कहा जाता है
لَهُمُ
उन्हें
ٱتَّبِعُوا۟
पैरवी करो
مَآ
उसकी जो
أَنزَلَ
नाज़िल किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
قَالُوا۟
वो कहते हैं
بَلْ
बल्कि
نَتَّبِعُ
हम पैरवी करेंगे
مَآ
उसकी जो
أَلْفَيْنَا
पाया हमने
عَلَيْهِ
जिस पर
ءَابَآءَنَآ ۗ
अपने आबा ओ अजदाद को
أَوَلَوْ
क्या भला अगरचे
كَانَ
हों
ءَابَآؤُهُمْ
आबा ओ अजदाद उनके
لَا
(did) not
يَعْقِلُونَ
ना वो अक़्ल रखते
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
وَلَا
और ना
يَهْتَدُونَ
वो हिदायत याफ़्ता हों
और जब उनसे कहा जाता है, "अल्लाह ने जो कुछ उतारा है उसका अनुसरण करो।" तो कहते है, "नहीं बल्कि हम तो उसका अनुसरण करेंगे जिसपर हमने अपने बाप-दादा को पाया है।" क्या उस दशा में भी जबकि उनके बाप-दादा कुछ भी बुद्धि से काम न लेते रहे हों और न सीधे मार्ग पर रहे हों?
तफ़्सीर:
जब इन काफ़िरों से कहा जाता है कि उस मार्गदर्शन और प्रकाश का अनुसरण करो, जो अल्लाह ने उतारा है, तो वे हठ करते हुए कहते हैं : बल्कि हम उन मान्यताओं और परंपराओं का अनुसरण करेंगे, जिनपर हमने अपने बाप-दादा को पाया है। क्या वे अपने बाप-दादा का अनुसरण करेंगे, यद्यपि वे मार्गदर्शन और प्रकाश के बारे में कुछ भी न समझते हों, और न ही वे उस सत्य की ओर मार्गदर्शन पाते हों, जिससे अल्लाह प्रसन्न होता है?!
आयत 171
وَمَثَلُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ كَمَثَلِ ٱلَّذِى يَنْعِقُ بِمَا لَا يَسْمَعُ إِلَّا دُعَآءًۭ وَنِدَآءًۭ ۚ صُمٌّۢ بُكْمٌ عُمْىٌۭ فَهُمْ لَا يَعْقِلُونَ
وَمَثَلُ
और मिसाल
ٱلَّذِينَ
उनकी जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
كَمَثَلِ
मानिन्द मिसाल
ٱلَّذِى
उसके है जो
يَنْعِقُ
चीख़ कर पुकारता है
بِمَا
उसे जो
لَا
not
يَسْمَعُ
नहीं सुनता
إِلَّا
मगर
دُعَآءًۭ
पुकार
وَنِدَآءًۭ ۚ
और आवाज़
صُمٌّۢ
बहरे
بُكْمٌ
गूँगे
عُمْىٌۭ
अँधे हैं
فَهُمْ
पस वो
لَا
(do) not
يَعْقِلُونَ
नहीं वो अक़्ल रखते
इन इनकार करनेवालों की मिसाल ऐसी है जैसे कोई ऐसी चीज़ों को पुकारे जो पुकार और आवाज़ के सिवा कुछ न सुनती और समझती हो। ये बहरे हैं, गूँगें हैं, अन्धें हैं; इसलिए ये कुछ भी नहीं समझ सकते
तफ़्सीर:
अपने बाप-दादा का अनुसरण करने में काफ़िरों का उदाहरण उस चरवाहे के समान है, जो अपने पशुओं को आवाज़ देता है, तो वे (पशु) उसकी आवाज़ तो सुनते हैं, परंतु उसकी बात नहीं समझते हैं। इसी तरह, वे (काफ़िर) सत्य को इस प्रकार सुनने से बहरे हैं कि उसका लाभ उठा सकें, गूंगे हैं, उनकी ज़बानें सच बोलने से मूक हैं, तथा सत्य को देखने से अंधे हैं। इसलिए वे उस मार्गदर्शन को नहीं समझते हैं जिसकी ओर आप उन्हें बुला रहे हैं।
आयत 172
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ كُلُوا۟ مِن طَيِّبَـٰتِ مَا رَزَقْنَـٰكُمْ وَٱشْكُرُوا۟ لِلَّهِ إِن كُنتُمْ إِيَّاهُ تَعْبُدُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
كُلُوا۟
खाओ तुम
مِن
from
طَيِّبَـٰتِ
पाकीज़ा चीज़ों में से
مَا
जो
رَزَقْنَـٰكُمْ
अता कीं हमने तुम्हें
وَٱشْكُرُوا۟
और शुक्र करो
لِلَّهِ
अल्लाह का
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
إِيَّاهُ
सिर्फ़ उसी की
تَعْبُدُونَ
तुम इबादत करते
ऐ ईमान लानेवालो! जो अच्छी-सुथरी चीज़ें हमने तुम्हें प्रदान की हैं उनमें से खाओ और अल्लाह के आगे कृतज्ञता दिखलाओ, यदि तुम उसी की बन्दगी करते हो
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! उन अच्छी चीजों में से खाओ जो अल्लाह ने तुम्हें प्रदान की हैं और तुम्हारे लिए उन्हें अनुमेय किया है। तथा बाहरी और आंतरिक रूप से उन नेमतों के लिए अल्लाह का शुक्र अदा करो, जो उसने तुम्हें प्रदान की हैं। उसका शुक्र अदा करने में यह भी शामिल है कि उसकी आज्ञा का पालन करो तथा उसकी अवज्ञा से बचो, यदि तुम वास्तव में अकेले उसी की इबादत करते हो और उसके साथ किसी को साझी नहीं बनाते हो।
आयत 173
إِنَّمَا حَرَّمَ عَلَيْكُمُ ٱلْمَيْتَةَ وَٱلدَّمَ وَلَحْمَ ٱلْخِنزِيرِ وَمَآ أُهِلَّ بِهِۦ لِغَيْرِ ٱللَّهِ ۖ فَمَنِ ٱضْطُرَّ غَيْرَ بَاغٍۢ وَلَا عَادٍۢ فَلَآ إِثْمَ عَلَيْهِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌ
إِنَّمَا
बेशक
حَرَّمَ
उसने हराम किया है
عَلَيْكُمُ
तुम पर
ٱلْمَيْتَةَ
मुरदार
وَٱلدَّمَ
और ख़ून
وَلَحْمَ
और गोश्त
ٱلْخِنزِيرِ
ख़िन्ज़ीर का
وَمَآ
और जो
أُهِلَّ
पुकारा गया
بِهِۦ
उसको
لِغَيْرِ
वास्ते ग़ैर
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के
فَمَنِ
तो जो कोई
ٱضْطُرَّ
मजबूर किया गया
غَيْرَ
ना
بَاغٍۢ
सरकशी करने वाला हो
وَلَا
और ना
عَادٍۢ
हद से बढ़ने वाला हो
فَلَآ
तो नहीं
إِثْمَ
कोई गुनाह
عَلَيْهِ ۚ
उस पर
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌ
निहायत रहम करने वाला है
उसने तो तुमपर केवल मुर्दार और ख़ून और सूअर का माँस और जिस पर अल्लाह के अतिरिक्त किसी और का नाम लिया गया हो, हराम ठहराया है। इसपर भी जो बहुत मजबूर और विवश हो जाए, वह अवज्ञा करनेवाला न हो और न सीमा से आगे बढ़नेवाला हो तो उसपर कोई गुनाह नहीं। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने तुमपर केवल ये खाने की चीज़ें हराम की हैं : वह जानवर जो शरई तरीक़े से ज़बह किए बिना मर जाए, बहता खून, सूअर का माँस और वह जानवर जिसे ज़बह करते समय अल्लाह के सिवा किसी और का नाम लिया गया हो। लेकिन यदि आदमी इनमें से कोई वस्तु खाने पर मजबूर हो जाए, जबकि वह उनमें से बिना आवश्यकता के खाकर अत्याचार करने वाला और ज़रूरत की सीमा से आगे बढ़ने वाला नहीं है; तो उसपर कोई दोष तथा दंड नहीं है। निःसंदेह अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है। उसकी दया में से यह भी है कि उसने मजबूरी की हालत में इन हराम वस्तुओं को खाने की अनुमति प्रदान की है।
आयत 174
إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكْتُمُونَ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ مِنَ ٱلْكِتَـٰبِ وَيَشْتَرُونَ بِهِۦ ثَمَنًۭا قَلِيلًا ۙ أُو۟لَـٰٓئِكَ مَا يَأْكُلُونَ فِى بُطُونِهِمْ إِلَّا ٱلنَّارَ وَلَا يُكَلِّمُهُمُ ٱللَّهُ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ وَلَا يُزَكِّيهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَكْتُمُونَ
छुपाते हैं
مَآ
उसे जो
أَنزَلَ
नाज़िल किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِنَ
of
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में से
وَيَشْتَرُونَ
और वो ले लेते हैं
بِهِۦ
बदले उसके
ثَمَنًۭا
क़ीमत
قَلِيلًا ۙ
बहुत थोड़ी
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
مَا
नहीं
يَأْكُلُونَ
वो खाते
فِى
in
بُطُونِهِمْ
अपने पेटों में
إِلَّا
सिवाय
ٱلنَّارَ
आग के
وَلَا
और नहीं
يُكَلِّمُهُمُ
कलाम करेगा उनसे
ٱللَّهُ
अल्लाह
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
وَلَا
और ना
يُزَكِّيهِمْ
वो पाक करेगा उन्हें
وَلَهُمْ
और उनके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
أَلِيمٌ
दर्दनाक
जो लोग उस चीज़ को छिपाते है जो अल्लाह ने अपनी किताब में से उतारी है और उसके बदले थोड़े मूल्य का सौदा करते है, वे तो बस आग खाकर अपने पेट भर रहे है; और क़ियामत के दिन अल्लाह न तो उनसे बात करेगा और न उन्हें निखारेगा; और उनके लिए दुखद यातना है
तफ़्सीर:
निःसंदेह जो लोग अल्लाह की उतारी हुई किताबों और उनमें मौजूद सत्य और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नुबुव्वत के संकेत (प्रमाण) को छिपाते हैं, जैसा कि यहूदी और ईसाई करते हैं, तथा वे इसे छिपाकर थोड़ा मुआवज़ा जैसे सरदारी, या पद (प्रतिष्ठा), या धन प्राप्त करते हैं; वे वास्तव में अपने पेटों में इसके सिवा कुछ नहीं खाते जो उनके आग से यातना दिए जाने का कारण होगा। तथा अल्लाह क़ियामत के दिन उनसे ऐसी बात नहीं करेगा, जो उन्हें पसंद हो, बल्कि ऐसी बात करेगा जो उन्हें बुरी लगे। तथा न उन्हें पवित्र करेगा और न उनकी प्रशंसा करेगा और उनके लिए दर्दनाक यातना है।
आयत 175
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ ٱشْتَرَوُا۟ ٱلضَّلَـٰلَةَ بِٱلْهُدَىٰ وَٱلْعَذَابَ بِٱلْمَغْفِرَةِ ۚ فَمَآ أَصْبَرَهُمْ عَلَى ٱلنَّارِ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही वो लोग हैं
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
ٱشْتَرَوُا۟
ख़रीद लिया
ٱلضَّلَـٰلَةَ
गुमराही को
بِٱلْهُدَىٰ
बदले हिदायत के
وَٱلْعَذَابَ
और अज़ाब को
بِٱلْمَغْفِرَةِ ۚ
बदले मग़फ़िरत के
فَمَآ
So what (is)
أَصْبَرَهُمْ
तो कितना सब्र है उनका
عَلَى
on
ٱلنَّارِ
आग पर
यहीं लोग हैं जिन्होंने मार्गदर्शन के बदले पथभ्रष्टका मोल ली; और क्षमा के बदले यातना के ग्राहक बने। तो आग को सहन करने के लिए उनका उत्साह कितना बढ़ा हुआ है!
तफ़्सीर:
जिन लोगों की विशेषता उस ज्ञान को छिपाना है जिसकी लोगों को आवश्यकता होती है, वही लोग हैं, जिन्होंने सच्चे ज्ञान को छिपाने के कारण हिदायत के बदले गुमराही और अल्लाह की क्षमा के बदले उसकी यातना को अपना लिया। तो ये लोग ऐसे कार्य को करने पर कितना धैर्य रखने वाले हैं, जो उनके लिए जहन्नम में प्रवेश करने का कारण बनता है, मानो कि वे उसमें पाई जाने वाली यातना की परवाह नहीं करते हैं, इस कारण उसपर धैर्य से काम ले रहे हैं।
आयत 176
ذَٰلِكَ بِأَنَّ ٱللَّهَ نَزَّلَ ٱلْكِتَـٰبَ بِٱلْحَقِّ ۗ وَإِنَّ ٱلَّذِينَ ٱخْتَلَفُوا۟ فِى ٱلْكِتَـٰبِ لَفِى شِقَاقٍۭ بَعِيدٍۢ
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّ
बवजह इसके कि
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
نَزَّلَ
नाज़िल किया
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब को
بِٱلْحَقِّ ۗ
साथ हक़ के
وَإِنَّ
और बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
ٱخْتَلَفُوا۟
इख़्तिलाफ़ किया
فِى
in
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में
لَفِى
(are) surely in
شِقَاقٍۭ
अलबत्ता मुख़ालिफ़त में हैं
بَعِيدٍۢ
दूर की
वह (यातना) इसलिए होगी कि अल्लाह ने तो हक़ के साथ किताब उतारी, किन्तु जिन लोगों ने किताब के मामले में विभेद किया वे हठ और विरोध में बहुत दूर निकल गए
तफ़्सीर:
ज्ञान और मार्गदर्शन को छिपाने का यह दंड इस कारण है कि अल्लाह ने ईश्वरीय पुस्तकों को सत्य के साथ उतारा है और इसकी अपेक्षा यह है कि उन्हें स्पष्ट किया जाए, न कि छिपाया जाए। निःसंदेह जिन लोगों ने ईश्वरीय पुस्तकों में मतभेद किया, चुनाँचे उनमें से कुछ पर ईमान लाए और उनमें से कुछ को छिपाया, निश्चय वे सत्य से बहुत दूर और विरोध में हैं।
आयत 177
۞ لَّيْسَ ٱلْبِرَّ أَن تُوَلُّوا۟ وُجُوهَكُمْ قِبَلَ ٱلْمَشْرِقِ وَٱلْمَغْرِبِ وَلَـٰكِنَّ ٱلْبِرَّ مَنْ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ وَٱلْكِتَـٰبِ وَٱلنَّبِيِّـۧنَ وَءَاتَى ٱلْمَالَ عَلَىٰ حُبِّهِۦ ذَوِى ٱلْقُرْبَىٰ وَٱلْيَتَـٰمَىٰ وَٱلْمَسَـٰكِينَ وَٱبْنَ ٱلسَّبِيلِ وَٱلسَّآئِلِينَ وَفِى ٱلرِّقَابِ وَأَقَامَ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَى ٱلزَّكَوٰةَ وَٱلْمُوفُونَ بِعَهْدِهِمْ إِذَا عَـٰهَدُوا۟ ۖ وَٱلصَّـٰبِرِينَ فِى ٱلْبَأْسَآءِ وَٱلضَّرَّآءِ وَحِينَ ٱلْبَأْسِ ۗ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ صَدَقُوا۟ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُتَّقُونَ
۞ لَّيْسَ
नहीं है
ٱلْبِرَّ
नेकी
أَن
कि
تُوَلُّوا۟
तुम फेर लो
وُجُوهَكُمْ
अपने चेहरों को
قِبَلَ
तरफ़
ٱلْمَشْرِقِ
मशरिक़
وَٱلْمَغْرِبِ
और मग़रिब के
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
ٱلْبِرَّ
नेकी (उसकी है)
مَنْ
जो
ءَامَنَ
ईमान लाए
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَٱلْيَوْمِ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرِ
और आख़िरी दिन पर
وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ
और फ़रिश्तों पर
وَٱلْكِتَـٰبِ
और किताब पर
وَٱلنَّبِيِّـۧنَ
और नबियों पर
وَءَاتَى
और वो दे
ٱلْمَالَ
माल
عَلَىٰ
in
حُبِّهِۦ
उसकी मोहब्बत में
ذَوِى
(to) those
ٱلْقُرْبَىٰ
क़राबतदारों को
وَٱلْيَتَـٰمَىٰ
और यतीमों को
وَٱلْمَسَـٰكِينَ
और मिस्कीनों को
وَٱبْنَ
and (of)
ٱلسَّبِيلِ
और मुसाफ़िरों को
وَٱلسَّآئِلِينَ
और सवाल करने वालों को
وَفِى
and in
ٱلرِّقَابِ
और गर्दनें (छुड़ाने) में
وَأَقَامَ
और वो क़ायम करे
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَءَاتَى
और वो अदा करे
ٱلزَّكَوٰةَ
ज़कात
وَٱلْمُوفُونَ
और जो पूरा करने वाले हैं
بِعَهْدِهِمْ
अपने अहद को
إِذَا
जब
عَـٰهَدُوا۟ ۖ
वो अहद करें
وَٱلصَّـٰبِرِينَ
और जो सब्र करने वाले हैं
فِى
in
ٱلْبَأْسَآءِ
तंगदस्ती में
وَٱلضَّرَّآءِ
और तकलीफ़ में
وَحِينَ
और वक़्त
ٱلْبَأْسِ ۗ
जंग के
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही वो लोग हैं
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
صَدَقُوا۟ ۖ
सच कहा
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْمُتَّقُونَ
जो मुत्तक़ी हैं
नेकी केवल यह नहीं है कि तुम अपने मुँह पूरब और पश्चिम की ओर कर लो, बल्कि नेकी तो उसकी नेकी है जो अल्लाह अन्तिम दिन, फ़रिश्तों, किताब और नबियों पर ईमान लाया और माल, उसके प्रति प्रेम के बावजूद नातेदारों, अनाथों, मुहताजों, मुसाफ़िरों और माँगनेवालों को दिया और गर्दनें छुड़ाने में भी, और नमाज़ क़ायम की और ज़कात दी और अपने वचन को ऐसे लोग पूरा करनेवाले है जब वचन दें; और तंगी और विशेष रूप से शारीरिक कष्टों में और लड़ाई के समय में जमनेवाले हैं, तो ऐसे ही लोग है जो सच्चे सिद्ध हुए और वही लोग डर रखनेवाले हैं
तफ़्सीर:
अल्लाह के निकट पसंदीदा नेकी केवल पूर्व या पश्चिम की ओर मुँह कर लेना और उसके बारे में मतभेद करना नहीं है। बल्कि सारी की सारी अच्छाई उस व्यक्ति में है, जो अल्लाह पर उसे एकमात्र पूज्य मानते हुए ईमान लाए, तथा क़ियामत के दिन पर और सभी फ़रिश्तों पर, और सभी अवतरित की गई किताबों पर और सभी नबियों पर बिना किसी भेदभाव के ईमान लाए, तथा धन खर्च करे उसके मोह और लोभ के बावजूद अपने रिश्तेदारों पर, तथा व्यस्क होने से पहले अपने पिता को खो देने वाले पर, ज़रूरतमंदों, अपने परिवार और स्वदेश से कट जाने वाले परदेशी और उन लोगों पर जिन्हें किसी आवश्यकता के कारण लोगों से माँगना पड़ जाता है। तथा गुलामी और क़ैद से गर्दनों को छुड़ाने में पैसा खर्च करे। तथा अल्लाह की आज्ञा के अनुसार पूरी तरह से नमाज़ अदा करे, और अनिवार्य ज़कात का भुगतान करे। इसी तरह वे लोग, जो यदि वचन देते हैं तो अपने वचन को पूरा करते हैं, और जो लोग ग़रीबी और कठिनाई पर तथा बीमारी पर और भीषण युद्ध के समय धैर्य से काम लेते हैं, चुनाँचे वे भागते नहीं हैं। जो लोग इन विशेषताओं से सुसज्जित हैं, वही लोग हैं जो अपने ईमान और कर्मों में अल्लाह के प्रति सच्चे हैं, और वही परहेज़गार लोग हैं, जिन्होंने अल्लाह के आदेशों का पालन किया और उसकी मना की हुई चीज़ों से परहेज़ किया।
आयत 178
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ كُتِبَ عَلَيْكُمُ ٱلْقِصَاصُ فِى ٱلْقَتْلَى ۖ ٱلْحُرُّ بِٱلْحُرِّ وَٱلْعَبْدُ بِٱلْعَبْدِ وَٱلْأُنثَىٰ بِٱلْأُنثَىٰ ۚ فَمَنْ عُفِىَ لَهُۥ مِنْ أَخِيهِ شَىْءٌۭ فَٱتِّبَاعٌۢ بِٱلْمَعْرُوفِ وَأَدَآءٌ إِلَيْهِ بِإِحْسَـٰنٍۢ ۗ ذَٰلِكَ تَخْفِيفٌۭ مِّن رَّبِّكُمْ وَرَحْمَةٌۭ ۗ فَمَنِ ٱعْتَدَىٰ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَلَهُۥ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
كُتِبَ
लिख दिया गया
عَلَيْكُمُ
तुम पर
ٱلْقِصَاصُ
बदला लेना
فِى
in
ٱلْقَتْلَى ۖ
मक़तूलों (के बारे) में
ٱلْحُرُّ
आज़ाद
بِٱلْحُرِّ
बदले आज़ाद के
وَٱلْعَبْدُ
और ग़ुलाम
بِٱلْعَبْدِ
बदले ग़ुलाम के
وَٱلْأُنثَىٰ
और औरत
بِٱلْأُنثَىٰ ۚ
बदले औरत के
فَمَنْ
तो जो कोई
عُفِىَ
माफ़ कर दिया गया
لَهُۥ
उसको
مِنْ
from
أَخِيهِ
उसके भाई (की तरफ़) से
شَىْءٌۭ
कुछ भी
فَٱتِّبَاعٌۢ
तो पैरवी करना है
بِٱلْمَعْرُوفِ
साथ भले तरीक़े के
وَأَدَآءٌ
और अदा करना है
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
بِإِحْسَـٰنٍۢ ۗ
साथ एहसान के
ذَٰلِكَ
ये
تَخْفِيفٌۭ
तख़्फ़ीफ़ / रिआयत है
مِّن
from
رَّبِّكُمْ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
وَرَحْمَةٌۭ ۗ
और रहमत है
فَمَنِ
तो जो कोई
ٱعْتَدَىٰ
ज़्यादती करे
بَعْدَ
बाद
ذَٰلِكَ
इसके
فَلَهُۥ
तो उसके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
ऐ ईमान लानेवालो! मारे जानेवालों के विषय में हत्यादंड (क़िसास) तुमपर अनिवार्य किया गया, स्वतंत्र-स्वतंत्र बराबर है और ग़़ुलाम-ग़ुलाम बराबर है और औरत-औरत बराबर है। फिर यदि किसी को उसके भाई की ओर से कुछ छूट मिल जाए तो सामान्य रीति का पालन करना चाहिए; और भले तरीके से उसे अदा करना चाहिए। यह तुम्हारें रब की ओर से एक छूट और दयालुता है। फिर इसके बाद भो जो ज़्यादती करे तो उसके लिए दुखद यातना है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! उन लोगों के मामले में जो जानबूझकर और आक्रामकता में दूसरों हत्या कर देते हैं, हत्यारे को उसके अपराध के समान दंड देना तुमपर अनिवार्य कर दिया गया है। अतः आज़ाद आदमी को आज़ाद के बदले क़त्ल किया जाएगा, ग़ुलाम को ग़ुलाम के बदले क़त्ल किया जाएगा तथा नारी को नारी के बदले क़त्ल किया जाएगा। यदि वधित व्यक्ति अपनी मृत्यु से पहले क्षमा कर दे, या उसका अभिभावक दियत - वह धनराशि जो हत्यारा अपनी क्षमा के बदले में भुगतान करता है - लेकर क्षमा कर दे, तो क्षमा करने वाले को चाहिए कि क़ातिल से दियत (रक्त धन) की माँग अच्छे तरीक़े से करे, उपकार जतलाने तथा कष्ट देने से बचे। क़ातिल को भी चाहिए कि बिना टाल-मटोल के भले तरीक़े से दियत (ख़ून-बहा) अदा कर दे। यह क्षमा करना और ख़ून-बहा लेना, तुम्हारे पालनहार की ओर से तुमपर एक आसानी और इस उम्मत पर एक दया है। फिर जो व्यक्ति क्षमा करने और ख़ून-बहा लेने के बाद क़ातिल पर अत्याचार करे; तो उसके लिए अल्लाह की ओर से एक दर्दनाक सज़ा है।
आयत 179
وَلَكُمْ فِى ٱلْقِصَاصِ حَيَوٰةٌۭ يَـٰٓأُو۟لِى ٱلْأَلْبَـٰبِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ
وَلَكُمْ
और तुम्हारे लिए
فِى
in
ٱلْقِصَاصِ
बदला लेने में
حَيَوٰةٌۭ
ज़िन्दगी है
يَـٰٓأُو۟لِى
O men
ٱلْأَلْبَـٰبِ
ऐ अक़्ल वालो
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَتَّقُونَ
तुम बच जाओ
ऐ बुद्धि और समझवालों! तुम्हारे लिए हत्यादंड (क़िसास) में जीवन है, ताकि तुम बचो
तफ़्सीर:
अल्लाह ने तुम्हारे लिए क़िसास का जो नियम निर्धारित किया है, उसमें तुम्हारे लिए जीवन है; क्योंकि इससे तुम्हारे ख़ून की रक्षा होती है और तुम्हारे बीच ज़्यादती (अत्याचार) को रोका जाता है। इसे वे बुद्धि वाले लोग महसूस करते हैं, जो अल्लाह की शरीयत का पालन करके और उसके आदेश के अनुसार कार्य करके उससे डरते हैं।
आयत 180
كُتِبَ عَلَيْكُمْ إِذَا حَضَرَ أَحَدَكُمُ ٱلْمَوْتُ إِن تَرَكَ خَيْرًا ٱلْوَصِيَّةُ لِلْوَٰلِدَيْنِ وَٱلْأَقْرَبِينَ بِٱلْمَعْرُوفِ ۖ حَقًّا عَلَى ٱلْمُتَّقِينَ
كُتِبَ
लिख दिया गया
عَلَيْكُمْ
तुम पर
إِذَا
जब
حَضَرَ
आ जाए
أَحَدَكُمُ
तुममें से किसी एक को
ٱلْمَوْتُ
मौत
إِن
अगर
تَرَكَ
वो छोड़ जाए
خَيْرًا
माल को
ٱلْوَصِيَّةُ
वसीयत करना
لِلْوَٰلِدَيْنِ
वालिदैन के लिए
وَٱلْأَقْرَبِينَ
और कराबतदारों के लिए
بِٱلْمَعْرُوفِ ۖ
भले तरीक़े से
حَقًّا
ये हक़ है
عَلَى
ऊपर
ٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के
जब तुममें से किसी की मृत्यु का समय आ जाए, यदि वह कुछ माल छोड़ रहा हो, तो माँ-बाप और नातेदारों को भलाई की वसीयत करना तुमपर अनिवार्य किया गया। यह हक़ है डर रखनेवालों पर
तफ़्सीर:
जब तुममें से किसी की मृत्यु के लक्षण तथा कारण सामने आ जाएँ, और यदि उसने बहुत सारा धन छोड़ा है, तो उसपर माता-पिता और रिश्तेदारों के लिए शरीयत की निर्धारित की हुई मात्रा के अनुसार वसीयत करना ज़रूरी है, जो कि एक तिहाई धन से अधिक नहीं होना चाहिए। ऐसा करना उन लोगों पर एक पक्का अधिकार है जो सर्वशक्तिमान अल्लाह से डरने वाले हैं। ज्ञात रहे कि यह हुक्म मीरास की आयतें उतरने से पहले था। जब मीरास की आयतें उतरीं, तो उनके द्वारा स्पष्ट कर दिया गया कि मृतक का वारिस कौन होगा और उसे विरासत में कितना मिलेगा।
आयत 181
فَمَنۢ بَدَّلَهُۥ بَعْدَ مَا سَمِعَهُۥ فَإِنَّمَآ إِثْمُهُۥ عَلَى ٱلَّذِينَ يُبَدِّلُونَهُۥٓ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌۭ
فَمَنۢ
तो जो कोई
بَدَّلَهُۥ
बदल दे उसे
بَعْدَ مَا
बाद उसके जो
سَمِعَهُۥ
उसने सुना उसे
فَإِنَّمَآ
तो बेशक
إِثْمُهُۥ
गुनाह उसका
عَلَى
(would be) on
ٱلَّذِينَ
उन पर है जो
يُبَدِّلُونَهُۥٓ ۚ
बदल देते हैं उसे
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
سَمِيعٌ
ख़ूब सुनने वाला है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
तो जो कोई उसके सुनने के पश्चात उसे बदल डाले तो उसका गुनाह उन्हीं लोगों पर होगा जो इसे बदलेंगे। निस्संदेह अल्लाह सब कुछ सुननेवाला और जाननेवाला है
तफ़्सीर:
फिर जो व्यक्ति वसीयत के बारे में जानने के बाद, कोई वृद्धि या कमी करके या उसे रोककर वसीयत में बदलाव कर दे; तो उस परिवर्तन का पाप परिवर्तन करने वालों पर होगा, वसीयतकर्ता पर नहीं। निःसंदेह अल्लाह अपने बंदों की बातों को सुनने वाला और उनके कार्यों को जानने वाला है। उनकी स्थितियों में से कोई चीज़ उससे छूटती नहीं है।
आयत 182
فَمَنْ خَافَ مِن مُّوصٍۢ جَنَفًا أَوْ إِثْمًۭا فَأَصْلَحَ بَيْنَهُمْ فَلَآ إِثْمَ عَلَيْهِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
فَمَنْ
तो जो कोई
خَافَ
ख़ौफ़ करे
مِن
from
مُّوصٍۢ
वसीयत करने वाले से
جَنَفًا
तरफ़दारी का
أَوْ
या
إِثْمًۭا
गुनाह का
فَأَصْلَحَ
तो वो इस्लाह करा दे
بَيْنَهُمْ
दर्मियान उनके
فَلَآ
तो नहीं
إِثْمَ
कोई गुनाह
عَلَيْهِ ۚ
उस पर
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
फिर जिस किसी वसीयत करनेवाले को न्याय से किसी प्रकार के हटने या हक़़ मारने की आशंका हो, इस कारण उनके (वारिसों के) बीच सुधार की व्यवस्था कर दें, तो उसपर कोई गुनाह नहीं। निस्संदेह अल्लाह क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
जिस व्यक्ति को वसीयत करने वाले के बारे में सत्य से विचलन, या वसीयत में अन्याय (अनुचितता) का पता चले; फिर वह, वसीयतकर्ता ने जो अनुचित किया है उसे सलाह देकर उसका सुधार कर दे, तथा वसीयत के बारे में मतभेद करने वालों के बीच संधि (मेल-मिलाप) करा दे, तो उसपर कोई गुनाह नहीं है। बल्कि उसे संधि कराने का सवाब मिलेगा। निश्चय अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला और उनपर दया करने वाला है।
आयत 183
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ كُتِبَ عَلَيْكُمُ ٱلصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
كُتِبَ
लिख दिया गया
عَلَيْكُمُ
तुम पर
ٱلصِّيَامُ
रोज़ा रखना
كَمَا
जैसा कि
كُتِبَ
लिख दिया गया
عَلَى
to
ٱلَّذِينَ
उन पर जो
مِن
from
قَبْلِكُمْ
तुमसे पहले थे
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَتَّقُونَ
मुत्तक़ी बन जाओ
ऐ ईमान लानेवालो! तुमपर रोज़े अनिवार्य किए गए, जिस प्रकार तुमसे पहले के लोगों पर किए गए थे, ताकि तुम डर रखनेवाले बन जाओ
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान लाने वालो और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! तुमपर तुम्हारे पालनहार की ओर से रोज़ा रखना फ़र्ज़ कर दिया गया है, जैसे तुमसे पहले समुदायों पर फ़र्ज़ किया गया था; ताकि तुम अल्लाह से डरो। अर्थात् अपने और उसके दंड के बीच अच्छे कर्मों को बचाव का साधन बना लो, और उनमें से एक महान कार्य रोज़ा रखना है।
आयत 184
أَيَّامًۭا مَّعْدُودَٰتٍۢ ۚ فَمَن كَانَ مِنكُم مَّرِيضًا أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍۢ فَعِدَّةٌۭ مِّنْ أَيَّامٍ أُخَرَ ۚ وَعَلَى ٱلَّذِينَ يُطِيقُونَهُۥ فِدْيَةٌۭ طَعَامُ مِسْكِينٍۢ ۖ فَمَن تَطَوَّعَ خَيْرًۭا فَهُوَ خَيْرٌۭ لَّهُۥ ۚ وَأَن تَصُومُوا۟ خَيْرٌۭ لَّكُمْ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
أَيَّامًۭا
दिन हैं
مَّعْدُودَٰتٍۢ ۚ
गिने चुने
فَمَن
तो जो कोई
كَانَ
हो
مِنكُم
तुममें से
مَّرِيضًا
मरीज़
أَوْ
या
عَلَىٰ
on
سَفَرٍۢ
सफ़र पर
فَعِدَّةٌۭ
तो गिनती पूरी करना है
مِّنْ
of
أَيَّامٍ
दिनों से
أُخَرَ ۚ
दूसरे
وَعَلَى
And on
ٱلَّذِينَ
और उन पर जो
يُطِيقُونَهُۥ
ताक़त रखते हों उसकी
فِدْيَةٌۭ
फ़िदया है
طَعَامُ
खाना
مِسْكِينٍۢ ۖ
एक मिस्कीन का
فَمَن
फिर जो कोई
تَطَوَّعَ
ख़ुशी से करे
خَيْرًۭا
कोई नेकी
فَهُوَ
तो वो
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لَّهُۥ ۚ
उसके लिए
وَأَن
और ये कि
تَصُومُوا۟
तुम रोज़ा रखो
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لَّكُمْ ۖ
तुम्हारे लिए
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
تَعْلَمُونَ
तुम इल्म रखते
गिनती के कुछ दिनों के लिए - इसपर भी तुममें कोई बीमार हो, या सफ़र में हो तो दूसरे दिनों में संख्या पूरी कर ले। और जिन (बीमार और मुसाफ़िरों) को इसकी (मुहताजों को खिलाने की) सामर्थ्य हो, उनके ज़िम्मे बदलें में एक मुहताज का खाना है। फिर जो अपनी ख़ुशी से कुछ और नेकी करे तो यह उसी के लिए अच्छा है और यह कि तुम रोज़ा रखो तो तुम्हारे लिए अधिक उत्तम है, यदि तुम जानो
तफ़्सीर:
तुमपर अनिवार्य किया गया रोज़ा यह है कि तुम वर्ष में कुछ दिनों के रोज़े रखो। तुममें से जो कोई ऐसी बीमारी से पीड़ित है जिसके साथ रोज़ा रखना मुश्किल है, या वह एक यात्री है; तो उसके लिए रोज़ा तोड़ देना अनुमेय है, फिर वह उतने दिनों की क़ज़ा करेगा जिनके रोज़े उसने तोड़ दिए हैं। तथा जो लोग रोज़ा रखने की शक्ति रखते हैं, यदि वे रोज़ा तोड़ दें, तो उनपर फ़िदया अनिवार्य है, जो कि हर उस दिन के बदले जिसका वे रोज़ा तोड़ देते हैं, एक ग़रीब व्यक्ति को खाना खिलाना है। परंतु जो व्यक्ति एक से अधिक गरीबों को खाना खिलाए, या रोज़ा रखने के साथ खाना (भी) खिलाए, तो यह उसके लिए बेहतर है। हालाँकि, तुम्हारा रोज़ा रखना तुम्हारे लिए रोज़ा तोड़कर फ़िदया देने से बेहतर है, यदि तुम जानते हो कि रोज़े के क्या गुण हैं। ज्ञात होना चाहिए कि जब अल्लाह ने पहले पहल रोज़ा धर्मसंगत किया था, तो यही हुक्म था। चुनाँचे जो चाहता, रोज़ा रखता और जो चाहता, रोज़ा तोड़ देता और (उसके बदले) खाना खिलाता। फिर उसके बाद, अल्लाह ने रोज़े को अनिवार्य कर दिया और उसे हर व्यस्क (बालिग़) सक्षम व्यक्ति पर फ़र्ज़ क़रार दिया।
आयत 185
شَهْرُ رَمَضَانَ ٱلَّذِىٓ أُنزِلَ فِيهِ ٱلْقُرْءَانُ هُدًۭى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَـٰتٍۢ مِّنَ ٱلْهُدَىٰ وَٱلْفُرْقَانِ ۚ فَمَن شَهِدَ مِنكُمُ ٱلشَّهْرَ فَلْيَصُمْهُ ۖ وَمَن كَانَ مَرِيضًا أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍۢ فَعِدَّةٌۭ مِّنْ أَيَّامٍ أُخَرَ ۗ يُرِيدُ ٱللَّهُ بِكُمُ ٱلْيُسْرَ وَلَا يُرِيدُ بِكُمُ ٱلْعُسْرَ وَلِتُكْمِلُوا۟ ٱلْعِدَّةَ وَلِتُكَبِّرُوا۟ ٱللَّهَ عَلَىٰ مَا هَدَىٰكُمْ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
شَهْرُ
महीना
رَمَضَانَ
रमज़ान का
ٱلَّذِىٓ
वो है जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
فِيهِ
इसमें
ٱلْقُرْءَانُ
क़ुरआन
هُدًۭى
हिदायत है
لِّلنَّاسِ
लोगों के लिए
وَبَيِّنَـٰتٍۢ
और वाज़ेह निशानियाँ हैं
مِّنَ
of
ٱلْهُدَىٰ
हिदायत की
وَٱلْفُرْقَانِ ۚ
और फ़ुरक़ान की
فَمَن
तो जो कोई
شَهِدَ
हाज़िर /मौजूद हो
مِنكُمُ
तुममें से
ٱلشَّهْرَ
इस महीने में
فَلْيَصُمْهُ ۖ
पस ज़रूर रोज़े रखे इसके
وَمَن
और जो कोई
كَانَ
हो
مَرِيضًا
मरीज़
أَوْ
या
عَلَىٰ
on
سَفَرٍۢ
सफ़र पर
فَعِدَّةٌۭ
तो गिनती पूरी करना है
مِّنْ
from
أَيَّامٍ
दिनों से
أُخَرَ ۗ
दूसरे
يُرِيدُ
चाहता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِكُمُ
साथ तुम्हारे
ٱلْيُسْرَ
आसानी
وَلَا
और नहीं
يُرِيدُ
चाहता
بِكُمُ
साथ तुम्हारे
ٱلْعُسْرَ
तंगी
وَلِتُكْمِلُوا۟
और ताकि तुम मुकम्मल करो
ٱلْعِدَّةَ
गिनती को
وَلِتُكَبِّرُوا۟
और ताकि तुम बड़ाई बयान करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
عَلَىٰ
ऊपर
مَا
उसके जो
هَدَىٰكُمْ
उसने हिदायत दी तुम्हें
وَلَعَلَّكُمْ
और ताकि तुम
تَشْكُرُونَ
तुम शुक्र अदा को
रमज़ान का महीना जिसमें कुरआन उतारा गया लोगों के मार्गदर्शन के लिए, और मार्गदर्शन और सत्य-असत्य के अन्तर के प्रमाणों के साथा। अतः तुममें जो कोई इस महीने में मौजूद हो उसे चाहिए कि उसके रोज़े रखे और जो बीमार हो या सफ़र में हो तो दूसरे दिनों में गिनती पूरी कर ले। अल्लाह तुम्हारे साथ आसानी चाहता है, वह तुम्हारे साथ सख़्ती और कठिनाई नहीं चाहता, (वह तुम्हारे लिए आसानी पैदा कर रहा है) और चाहता है कि तुम संख्या पूरी कर लो और जो सीधा मार्ग तुम्हें दिखाया गया है, उस पर अल्लाह की बड़ाई प्रकट करो और ताकि तुम कृतज्ञ बनो
तफ़्सीर:
रमज़ान का महीना वह है, जिसकी सम्मानित रात (लैलतुल क़द्र) में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर पवित्र क़ुरआन उतरना शुरू हुआ। अल्लाह ने इसे लोगों के लिए मार्गदर्शन के रूप में उतारा है। इसमें मार्गदर्शन तथा सत्य और असत्य के बीच अंतर करने के स्पष्ट प्रमाण हैं। अतः जो व्यक्ति रमज़ान के महीने में उपस्थित हो, इस हाल में कि वह स्वस्थ एवं निवासी हो (यात्रा पर न हो), तो वह अनिवार्य रूप से उसका रोज़ा रखे। तथा जो व्यक्ति ऐसी बीमारी से पीड़ित हो कि उसके लिए रोज़ा रखना कठिन हो, या वह मुसाफ़िर हो; तो उसके लिए रोज़ा न रखना अनुमेय है। यदि वह रोज़ा न रखे, तो उसके लिए अनिवार्य है कि (बाद में) उन दिनों की क़ज़ा करे जिनके रोज़े उसने नहीं रखे थे। अल्लाह के इन विधानों का मक़सद तुम्हारे लिए आसानी पैदा करना है, न कि कठिनाई। और ताकि तुम पूरे महीने के रोज़े की गिनती पूरी करो और ताकि रमज़ान का महीना समाप्त होने के बाद तथा ईद के दिन इस बात पर अल्लाह की महिमा का वर्णन करो कि उसने तुम्हें इसका रोज़ा रखने का सामर्थ्य दिया और उसे पूरा करने पर तुम्हारी मदद की, और ताकि तुम अल्लाह का इस धर्म के लिए तुम्हारा मार्गदर्शन करने पर शुक्रिया अदा करो, जिसे उसने तुम्हारे लिए पसंद किया है।
आयत 186
وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِى عَنِّى فَإِنِّى قَرِيبٌ ۖ أُجِيبُ دَعْوَةَ ٱلدَّاعِ إِذَا دَعَانِ ۖ فَلْيَسْتَجِيبُوا۟ لِى وَلْيُؤْمِنُوا۟ بِى لَعَلَّهُمْ يَرْشُدُونَ
وَإِذَا
और जब
سَأَلَكَ
सवाल करें आपसे
عِبَادِى
मेरे बन्दे
عَنِّى
मेरे बारे में
فَإِنِّى
तो बेशक मैं
قَرِيبٌ ۖ
क़रीब हूँ
أُجِيبُ
मैं जवाब देता हूँ
دَعْوَةَ
दुआ का
ٱلدَّاعِ
दुआ करने वाले की
إِذَا
जब
دَعَانِ ۖ
वो दुआ करे मुझसे
فَلْيَسْتَجِيبُوا۟
पस ज़रूर वो हुक्म मानें
لِى
मेरा
وَلْيُؤْمِنُوا۟
और ज़रूर वो ईमान लाऐं
بِى
मुझ पर
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَرْشُدُونَ
वो हिदायत पाऐं
और जब तुमसे मेरे बन्दे मेरे सम्बन्ध में पूछें, तो मैं तो निकट ही हूँ, पुकार का उत्तर देता हूँ, जब वह मुझे पुकारता है, तो उन्हें चाहिए कि वे मेरा हुक्म मानें और मुझपर ईमान रखें, ताकि वे सीधा मार्ग पा लें
तफ़्सीर:
और (ऐ नबी!) जब मेरे बंदे आपसे मेरी निकटता और उनकी दुआ को क़बूल करने के बारे में पूछें; तो निश्चय मैं उनके निकट हूँ, उनकी स्थितियों को जानता हूँ और उनकी दुआओं को सुनता हूँ। इसलिए उन्हें मध्यस्थों (बिचौलियों) की, या अपनी आवाज़ें ऊँची करने की आवश्यकता नहीं है। मैं पुकारने वाले की पुकार का जवाब देता हूँ जब वह मुझे अपनी दुआ में निष्ठा के साथ पुकारता है। इसलिए उन्हें चाहिए कि वे मेरा और मेरी आज्ञाओं का पालन करें, और अपने ईमान पर जमे रहें; क्योंकि यह मेरे उत्तर देने का सबसे लाभकारी तरीक़ा है। ताकि वे ऐसा करके अपने धार्मिक और सांसारिक मामलों में मार्गदर्शन के रास्ते पर चल सकें।
आयत 187
أُحِلَّ لَكُمْ لَيْلَةَ ٱلصِّيَامِ ٱلرَّفَثُ إِلَىٰ نِسَآئِكُمْ ۚ هُنَّ لِبَاسٌۭ لَّكُمْ وَأَنتُمْ لِبَاسٌۭ لَّهُنَّ ۗ عَلِمَ ٱللَّهُ أَنَّكُمْ كُنتُمْ تَخْتَانُونَ أَنفُسَكُمْ فَتَابَ عَلَيْكُمْ وَعَفَا عَنكُمْ ۖ فَٱلْـَٔـٰنَ بَـٰشِرُوهُنَّ وَٱبْتَغُوا۟ مَا كَتَبَ ٱللَّهُ لَكُمْ ۚ وَكُلُوا۟ وَٱشْرَبُوا۟ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَكُمُ ٱلْخَيْطُ ٱلْأَبْيَضُ مِنَ ٱلْخَيْطِ ٱلْأَسْوَدِ مِنَ ٱلْفَجْرِ ۖ ثُمَّ أَتِمُّوا۟ ٱلصِّيَامَ إِلَى ٱلَّيْلِ ۚ وَلَا تُبَـٰشِرُوهُنَّ وَأَنتُمْ عَـٰكِفُونَ فِى ٱلْمَسَـٰجِدِ ۗ تِلْكَ حُدُودُ ٱللَّهِ فَلَا تَقْرَبُوهَا ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ ءَايَـٰتِهِۦ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ
أُحِلَّ
हलाल किया गया
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
لَيْلَةَ
रात में
ٱلصِّيَامِ
रोज़े की
ٱلرَّفَثُ
रग़बत करना
إِلَىٰ
तरफ़
نِسَآئِكُمْ ۚ
अपनी औरतों के
هُنَّ
वो
لِبَاسٌۭ
लिबास हैं
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
وَأَنتُمْ
और तुम
لِبَاسٌۭ
लिबास हो
لَّهُنَّ ۗ
उनके लिए
عَلِمَ
जान लिया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
أَنَّكُمْ
बेशक तुम
كُنتُمْ
थे तुम
تَخْتَانُونَ
तुम ख़यानत करते
أَنفُسَكُمْ
अपने नफ़्सों से
فَتَابَ
तो वो मेहरबान हुआ
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَعَفَا
और उसने दरगुज़र किया
عَنكُمْ ۖ
तुमसे
فَٱلْـَٔـٰنَ
पस अब
بَـٰشِرُوهُنَّ
मुबाशरत करो उनसे
وَٱبْتَغُوا۟
और तलाश करो
مَا
जो
كَتَبَ
लिखा
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
لَكُمْ ۚ
तुम्हारे लिए
وَكُلُوا۟
और खाओ
وَٱشْرَبُوا۟
और पियो
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَتَبَيَّنَ
वाज़ेह हो जाए
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْخَيْطُ
धागा
ٱلْأَبْيَضُ
सफ़ेद
مِنَ
from
ٱلْخَيْطِ
the thread
ٱلْأَسْوَدِ
स्याह धागे से
مِنَ
of
ٱلْفَجْرِ ۖ
फ़ज्र के (वक़्त)
ثُمَّ
फिर
أَتِمُّوا۟
तुम पूरा करो
ٱلصِّيَامَ
रोज़े को
إِلَى
till
ٱلَّيْلِ ۚ
रात तक
وَلَا
और ना
تُبَـٰشِرُوهُنَّ
तुम मुबाशरत करो उनसे
وَأَنتُمْ
इस हाल में कि तुम
عَـٰكِفُونَ
एतेकाफ़ करने वाले हो
فِى
in
ٱلْمَسَـٰجِدِ ۗ
मस्जिदों में
تِلْكَ
ये
حُدُودُ
हुदूद हैं
ٱللَّهِ
अल्लाह की
فَلَا
तो ना
تَقْرَبُوهَا ۗ
तुम क़रीब जाओ उनके
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يُبَيِّنُ
वाज़ेह करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
ءَايَـٰتِهِۦ
आयात अपनी
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَتَّقُونَ
वो बच जाऐं
तुम्हारे लिए रोज़ो की रातों में अपनी औरतों के पास जाना जायज़ (वैध) हुआ। वे तुम्हारे परिधान (लिबास) हैं और तुम उनका परिधान हो। अल्लाह को मालूम हो गया कि तुम लोग अपने-आपसे कपट कर रहे थे, तो उसने तुमपर कृपा की और तुम्हें क्षमा कर दिया। तो अब तुम उनसे मिलो-जुलो और अल्लाह ने जो कुछ तुम्हारे लिए लिख रखा है, उसे तलब करो। और खाओ और पियो यहाँ तक कि तुम्हें उषाकाल की सफ़ेद धारी (रात की) काली धारी से स्पष्टा दिखाई दे जाए। फिर रात तक रोज़ा पूरा करो और जब तुम मस्जिदों में 'एतकाफ़' की हालत में हो, तो तुम उनसे न मिलो। ये अल्लाह की सीमाएँ हैं। अतः इनके निकट न जाना। इस प्रकार अल्लाह अपनी आयतें लोगों के लिए खोल-खोलकर बयान करता है, ताकि वे डर रखनेवाले बनें
तफ़्सीर:
रोज़ा अनिवार्य होने की शुरुआत में, यदि कोई व्यक्ति रोज़े की रात में सो जाता, फिर फ़ज्र से पहले उठता, तो उसके लिए खाना-पीना अथवा अपनी पत्नी से सहवास करना हराम हो जाता था। तो अल्लाह ने इस हुक्म को निरस्त कर दिया। अब अल्लाह ने (ऐ मोमिनो!) तुम्हारे लिए रोज़े की रातों में अपनी पत्नियों से सहवास करना अनुमेय कर दिया है। क्योंकि वे तुम्हारे लिए परदा एवं सतीत्व की रक्षा का कारण हैं और तुम उनके लिए परदा और सतीत्व की रक्षा का कारण हो। तुम एक-दूसरे से अलग नहीं रह सकते। अल्लाह ने जान लिया कि जिससे उसने तुम्हें मना किया था, उसे करके तुम अपने आपसे ख़यानत करते थे। इसलिए उसने तुम पर दया करते हुए तुम्हारी तौबा क़बूल कर ली और तुम्हें राहत प्रदान की। अतः अब उनके साथ संभोग करो और अल्लाह ने तुम्हारे लिए जो कुछ संतान नियत की है, उसकी खोज करो और पूरी रात में खाओ और पियो, यहाँ तक कि तुम्हारे लिए फ़ज्र की सफ़ेदी और उसके रात के अंधेरे से अलग होने के साथ फ़ज्र-सादिक़ (सुबह सादिक़) का उदय होना स्पष्ट हो जाए। फिर फ़ज्र के उदय होने से सूर्यास्त तक रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों से परहेज़ करके रोज़ा पूरा करो। तथा जब तुम मस्जिदों में एतिकाफ़ में हो, तो स्त्रियों के साथ संभोग न करो; क्योंकि यह इसे अमान्य कर देता है। उपर्युक्त अह़काम हलाल एवं हराम के बीच अल्लाह की सीमाएँ हैं, इसलिए तुम उनके पास बिल्कुल भी न जाओ; क्योंकि जो कोई भी अल्लाह की सीमाओं के क़रीब गया, वह निषिद्ध (हराम) में पड़ने के निकट है। इन अहकाम (प्रावधानों) को इस तरह स्पष्ट रूप से बयान करने की तरह ही अल्लाह अपनी निशानियों को लोगों के सामने स्पष्ट रूप से बयान करता है, ताकि वे उसकी आज्ञा का पालन करके और उसके निषेध से बचकर, उससे डरें।
आयत 188
وَلَا تَأْكُلُوٓا۟ أَمْوَٰلَكُم بَيْنَكُم بِٱلْبَـٰطِلِ وَتُدْلُوا۟ بِهَآ إِلَى ٱلْحُكَّامِ لِتَأْكُلُوا۟ فَرِيقًۭا مِّنْ أَمْوَٰلِ ٱلنَّاسِ بِٱلْإِثْمِ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ
وَلَا
और ना
تَأْكُلُوٓا۟
तुम खाओ
أَمْوَٰلَكُم
अपने मालों को
بَيْنَكُم
आपस में
بِٱلْبَـٰطِلِ
बातिल (तरीक़े) से
وَتُدْلُوا۟
और (ना) तुम पहुँचाओ
بِهَآ
उन्हें
إِلَى
to
ٱلْحُكَّامِ
तरफ़ हाकिमों के
لِتَأْكُلُوا۟
ताकि तुम खाओ
فَرِيقًۭا
एक हिस्सा
مِّنْ
from
أَمْوَٰلِ
मालों मे से
ٱلنَّاسِ
लोगों के
بِٱلْإِثْمِ
साथ गुनाह के
وَأَنتُمْ
हालाँकि तुम
تَعْلَمُونَ
तुम जानते हो
और आपस में तुम एक-दूसरे के माल को अवैध रूप से न खाओ, और न उन्हें हाकिमों के आगे ले जाओ कि (हक़ मारकर) लोगों के कुछ माल जानते-बूझते हड़प सको
तफ़्सीर:
तुम एक-दूसरे के धन को अवैध रूप से न लो, जैसे चोरी, जबरन क़ब्ज़ा और धोखाधड़ी। तथा उसके झगड़े को शासकों के पास न ले जाओ ताकि लोगों के धन का एक भाग अवज्ञा के साथ रंगे हाथ ले लो, जबकि तुम्हें पता है कि अल्लाह ने इसे ह़राम किया है। क्योंकि यह जानते हुए पाप करना कि यह निषिद्ध है, सबसे जघन्य है और उसका दंड सबसे कठोर है।
आयत 189
۞ يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلْأَهِلَّةِ ۖ قُلْ هِىَ مَوَٰقِيتُ لِلنَّاسِ وَٱلْحَجِّ ۗ وَلَيْسَ ٱلْبِرُّ بِأَن تَأْتُوا۟ ٱلْبُيُوتَ مِن ظُهُورِهَا وَلَـٰكِنَّ ٱلْبِرَّ مَنِ ٱتَّقَىٰ ۗ وَأْتُوا۟ ٱلْبُيُوتَ مِنْ أَبْوَٰبِهَا ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ
۞ يَسْـَٔلُونَكَ
वो सवाल करते हैं आपसे
عَنِ
about
ٱلْأَهِلَّةِ ۖ
नए चाँदों के बारे में
قُلْ
कह दीजिए
هِىَ
वो
مَوَٰقِيتُ
औक़ात मुक़र्ररह हैं
لِلنَّاسِ
वास्ते लोगों के
وَٱلْحَجِّ ۗ
और हज के
وَلَيْسَ
और नहीं है
ٱلْبِرُّ
नेकी
بِأَن
ये कि
تَأْتُوا۟
तुम आओ
ٱلْبُيُوتَ
घरों को
مِن
from
ظُهُورِهَا
उनकी पिछली तरफ़ से
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
ٱلْبِرَّ
नेकी (उसकी है)
مَنِ
जो
ٱتَّقَىٰ ۗ
तक़वा करे
وَأْتُوا۟
और आओ तुम
ٱلْبُيُوتَ
घरों को
مِنْ
from
أَبْوَٰبِهَا ۚ
उनके दरवाज़ों से
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تُفْلِحُونَ
तुम फ़लाह पा जाओ
वे तुमसे (प्रतिष्ठित) महीनों के विषय में पूछते है। कहो, "वे तो लोगों के लिए और हज के लिए नियत है। और यह कोई ख़ूबी और नेकी नहीं हैं कि तुम घरों में उनके पीछे से आओ, बल्कि नेकी तो उसकी है जो (अल्लाह का) डर रखे। तुम घरों में उनके दरवाड़ों से आओ और अल्लाह से डरते रहो, ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) लोग आपसे नये चाँदों के गठन और उनकी स्थितियों में परिवर्तन के बारे में पूछते हैं। आप उन्हें उसकी हिकमत के बारे में उत्तर देते हुए कह दीजिए : वे लोगों के लिए समय के निर्धारण का ज़रिया हैं, जिनके द्वारा वे अपनी इबादतों के समय को जानते हैं; जैसे हज्ज के महीने, रोज़े का महीना और ज़कात अदा करने के लिए साल पूरा होने का ज्ञान। तथा वे लेन-देन में अपना समय जानते हैं; जैसे रक्त धन और क़र्ज़ की अदायगी के समय का निर्धारण। तथा नेकी और अच्छाई यह नहीं है कि तुम ह़ज्ज अथवा उम्रा का एह़राम बाँधने की अवस्था में अपने घरों में उनके पीछे से प्रवेश करो - जैसा कि तुम जाहिलिय्यत (पूर्व-इस्लामिक युग) में गुमान करते थे - बल्कि वास्तविक नेकी उस व्यक्ति की नेकी है, जो परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से अल्लाह से डरे। तथा तुम्हारा घरों में उनके द्वारों से प्रवेश करना तुम्हारे लिए अधिक आसान और कठिनाई से बहुत दूर है। क्योंकि अल्लाह ने तुम्हें किसी ऐसे कार्य का बाध्य नहीं किया है, जिसमें तुम्हारे लिए कष्ट और कठिनाई हो। तथा अपने और अल्लाह के अज़ाब के बीच नेक कार्य को आड़ (बचाव) बना लो; ताकि तुम जो चाहते हो, उसे प्राप्त करने में सफल हो, और जिससे डरते हो उससे बच जाओ।
आयत 190
وَقَـٰتِلُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ٱلَّذِينَ يُقَـٰتِلُونَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوٓا۟ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ ٱلْمُعْتَدِينَ
وَقَـٰتِلُوا۟
और जंग करो
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
ٱلَّذِينَ
उनसे जो
يُقَـٰتِلُونَكُمْ
जंग करते हैं तुमसे
وَلَا
और ना
تَعْتَدُوٓا۟ ۚ
तुम ज़्यादती करो
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يُحِبُّ
नहीं पसंद करता
ٱلْمُعْتَدِينَ
ज़्यादती करने वालों को
और अल्लाह के मार्ग में उन लोगों से लड़ो जो तुमसे लड़े, किन्तु ज़्यादती न करो। निस्संदेह अल्लाह ज़्यादती करनेवालों को पसन्द नहीं करता
तफ़्सीर:
तथा - अल्लाह के कलिमा को ऊँचा करने के लिए - उन काफ़िरों से युद्ध करो, जो तुम्हें अल्लाह के धर्म से रोकने के लिए तुमसे युद्ध करते हैं। परंतु बच्चों, महिलाओं और बूढ़ों को क़त्ल करके अथवा मरे हुए व्यक्तियों के अंगों को काटकर (शवों का उत्परिवर्तन करके) अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन न करो। निःसंदेह अल्लाह अपने निर्धारित किए हुए नियमों और आदेशों में सीमाओं का उल्लंघन करने वालों से प्रेम नहीं करता।
आयत 191
وَٱقْتُلُوهُمْ حَيْثُ ثَقِفْتُمُوهُمْ وَأَخْرِجُوهُم مِّنْ حَيْثُ أَخْرَجُوكُمْ ۚ وَٱلْفِتْنَةُ أَشَدُّ مِنَ ٱلْقَتْلِ ۚ وَلَا تُقَـٰتِلُوهُمْ عِندَ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ حَتَّىٰ يُقَـٰتِلُوكُمْ فِيهِ ۖ فَإِن قَـٰتَلُوكُمْ فَٱقْتُلُوهُمْ ۗ كَذَٰلِكَ جَزَآءُ ٱلْكَـٰفِرِينَ
وَٱقْتُلُوهُمْ
और क़त्ल करो उन्हें
حَيْثُ
जहाँ भी
ثَقِفْتُمُوهُمْ
पाओ तुम उन्हें
وَأَخْرِجُوهُم
और निकालो उन्हें
مِّنْ
from
حَيْثُ
जहाँ से
أَخْرَجُوكُمْ ۚ
उन्होंने निकाला तुम्हें
وَٱلْفِتْنَةُ
और फ़ितना
أَشَدُّ
ज़्यादा सख़्त है
مِنَ
than
ٱلْقَتْلِ ۚ
क़त्ल से
وَلَا
और ना
تُقَـٰتِلُوهُمْ
तुम लड़ो उनसे
عِندَ
पास
ٱلْمَسْجِدِ
मस्जिदे
ٱلْحَرَامِ
हराम के
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يُقَـٰتِلُوكُمْ
वो लड़ें तुमसे
فِيهِ ۖ
उसमें
فَإِن
फिर अगर
قَـٰتَلُوكُمْ
वो लड़ें तुमसे
فَٱقْتُلُوهُمْ ۗ
तो क़त्ल करो उन्हें
كَذَٰلِكَ
यही है
جَزَآءُ
बदला
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों का
और जहाँ कहीं उनपर क़ाबू पाओ, क़त्ल करो और उन्हें निकालो जहाँ से उन्होंने तुम्हें निकाला है, इसलिए कि फ़ितना (उत्पीड़न) क़त्ल से भी बढ़कर गम्भीर है। लेकिन मस्जिदे हराम (काबा) के निकट तुम उनसे न लड़ो जब तक कि वे स्वयं तुमसे वहाँ युद्ध न करें। अतः यदि वे तुमसे युद्ध करें तो उन्हें क़त्ल करो - ऐसे इनकारियों का ऐसा ही बदला है
तफ़्सीर:
उन्हें जहाँ पाओ, क़त्ल करो और उन्हें उस जगह - अर्थात् मक्का - से निकाल दो, जहाँ से उन्होंने तुम्हें निकाला है। मोमिन को उसके धर्म से रोकने और उसके कुफ़्र की ओर लौटने के परिणामस्वरूप सामने आने वाला फ़ितना क़त्ल से बड़ा है। और मस्जिदे-ह़राम का सम्मान करते हुए उसके पास उनसे लड़ाई की शुरूआत न करो, यहाँ तक कि वे उसमें तुमसे लड़ना शुरू कर दें। यदि वे मस्जिदे-ह़राम में तुमसे लड़ना शुरू कर दें, तो उन्हें क़त्ल करो। इसी तरह का बदला - अर्थात् मस्जिदे-ह़राम में उनके युद्ध करने पर उन्हें क़त्ल करना - काफ़िरों का बदला है।
आयत 192
فَإِنِ ٱنتَهَوْا۟ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
فَإِنِ
फिर अगर
ٱنتَهَوْا۟
वो बाज़ आ जाऐं
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
बहुत रहम करने वाला है
फिर यदि वे बाज़ आ जाएँ तो अल्लाह भी क्षमा करनेवाला, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
यदि वे तुमसे लड़ना बंद कर दें और अपने कुफ़्र से बाज़ आ जाएँ, तो उनसे हाथ उठा लो। निःसंदेह अल्लाह तौबा करने वालों को क्षमा करने वाला है, इसलिए उनके पिछले गुनाहों पर उनकी पकड़ नहीं करता। उनपर दया करने वाला है, उन्हें दंड देने में जल्दी नहीं करता।
आयत 193
وَقَـٰتِلُوهُمْ حَتَّىٰ لَا تَكُونَ فِتْنَةٌۭ وَيَكُونَ ٱلدِّينُ لِلَّهِ ۖ فَإِنِ ٱنتَهَوْا۟ فَلَا عُدْوَٰنَ إِلَّا عَلَى ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَقَـٰتِلُوهُمْ
और लड़ो उनसे
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
لَا
ना
تَكُونَ
रहे
فِتْنَةٌۭ
कोई फ़ितना
وَيَكُونَ
और हो जाए
ٱلدِّينُ
दीन
لِلَّهِ ۖ
अल्लाह ही के लिए
فَإِنِ
फिर अगर
ٱنتَهَوْا۟
वो बाज़ आ जाऐं
فَلَا
तो नहीं
عُدْوَٰنَ
कोई ज़्यादती
إِلَّا
मगर
عَلَى
against
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों पर
तुम उनसे लड़ो यहाँ तक कि फ़ितना शेष न रह जाए और दीन (धर्म) अल्लाह के लिए हो जाए। अतः यदि वे बाज़ आ जाएँ तो अत्याचारियों के अतिरिक्त किसी के विरुद्ध कोई क़दम उठाना ठीक नहीं
तफ़्सीर:
काफ़िरों से युद्ध करो, यहाँ तक कि वे शिर्क, लोगों को अल्लाह के मार्ग से रोकने और कुफ़्र से बाज़ आ जाएँ, तथा प्रभावी धर्म अल्लाह का धर्म हो जाए। यदि वे अपने कुफ़्र तथा अल्लाह के मार्ग से रोकने से बाज़ आ जाएँ, तो उनसे लड़ाई करना छोड़ दो। क्योंकि कुफ़्र और अल्लाह के मार्ग से रोकने के द्वारा अत्याचार करने वालों के सिवा किसी पर कोई अत्याचार उचित नहीं है।
आयत 194
ٱلشَّهْرُ ٱلْحَرَامُ بِٱلشَّهْرِ ٱلْحَرَامِ وَٱلْحُرُمَـٰتُ قِصَاصٌۭ ۚ فَمَنِ ٱعْتَدَىٰ عَلَيْكُمْ فَٱعْتَدُوا۟ عَلَيْهِ بِمِثْلِ مَا ٱعْتَدَىٰ عَلَيْكُمْ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلْمُتَّقِينَ
ٱلشَّهْرُ
माहे
ٱلْحَرَامُ
हराम
بِٱلشَّهْرِ
बदले माहे
ٱلْحَرَامِ
हराम के
وَٱلْحُرُمَـٰتُ
और हुरमतों का
قِصَاصٌۭ ۚ
बदला है
فَمَنِ
तो जो कोई
ٱعْتَدَىٰ
ज़्यादती करे
عَلَيْكُمْ
तुम पर
فَٱعْتَدُوا۟
तो ज़्यादती करो
عَلَيْهِ
उस पर
بِمِثْلِ
उसी तरह
مَا
जैसे
ٱعْتَدَىٰ
उसने ज़्यादती की
عَلَيْكُمْ ۚ
तुम पर
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَٱعْلَمُوٓا۟
और जान लो
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
مَعَ
साथ है
ٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के
प्रतिष्ठित महीना बराबर है प्रतिष्ठित महिने के, और समस्त प्रतिष्ठाओं का भी बराबरी का बदला है। अतः जो तुमपर ज़्यादती करे, तो जैसी ज़्यादती वह तुम पर के, तुम भी उसी प्रकार उससे ज़्यादती का बदला लो। और अल्लाह का डर रखो और जान लो कि अल्लाह डर रखनेवालों के साथ है
तफ़्सीर:
वर्ष 7 हिजरी का हुरमत वाला महीना, जिसमें अल्लाह ने तुम्हें हरम में प्रवेश करने और उम्रा अदा करने में सक्षम किया, उस हुरमत वाले महीने के बदले है, जिसमें मुश्रिकों ने तुम्हें वर्ष 6 हिजरी में ह़रम में प्रवेश कने से रोक दिया था। सभी हुरमत वाली चीज़ों - जैसे हुरमत वाले नगर की हुरमत, हुरमत वाले महीने की हुरमत और एह़राम की हुरमत - में ज़्यादती करने वालों पर क़िसास का नियम लागू होगा। अतः जिसने भी इनमें तुमपर ज़्यादती की है, उसके साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा उसने किया है, और समानता की सीमा से आगे न बढ़ो। निश्चय अल्लाह अपनी सीमाओं का उल्लंघन करने वालों से प्रेम नहीं करता। तथा अल्लाह ने तुम्हें जो कुछ करने की अनुमति दी है, उससे आगे न बढ़ो, और जान लो कि अल्लाह सामर्थ्य एवं समर्थन के द्वारा उन लोगों के साथ है, जो उससे डरने वाले हैं।
आयत 195
وَأَنفِقُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَلَا تُلْقُوا۟ بِأَيْدِيكُمْ إِلَى ٱلتَّهْلُكَةِ ۛ وَأَحْسِنُوٓا۟ ۛ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُحْسِنِينَ
وَأَنفِقُوا۟
और ख़र्च करो
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
وَلَا
और ना
تُلْقُوا۟
तुम डालो
بِأَيْدِيكُمْ
अपने हाथों को
إِلَى
into
ٱلتَّهْلُكَةِ ۛ
तरफ़ हलाकत के
وَأَحْسِنُوٓا۟ ۛ
और एहसान करो
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يُحِبُّ
मोहब्बत रखता है
ٱلْمُحْسِنِينَ
एहसान करने वालों से
और अल्लाह के मार्ग में ख़र्च करो और अपने ही हाथों से अपने-आपकोतबाही में न डालो, और अच्छे से अच्छा तरीक़ा अपनाओ। निस्संदेह अल्लाह अच्छे से अच्छा काम करनेवालों को पसन्द करता है
तफ़्सीर:
अल्लाह की आज्ञाकारिता के कार्यों, जैसे जिहाद आदि में धन खर्च करो, तथा अपने आपको विनाश में न डालो, इस प्रकार कि उसके रास्ते में जिहाद और खर्च करना छोड़ दो, या अपने आपको ऐसी चीज़ में डाल दो जो तुम्हारे विनाश का कारण हो। तथा अपनी इबादतों, मामलों और आचरण में अच्छा बनो। निःसंदेह अल्लाह अपने सभी मामलों में अच्छा करने वालों से प्यार करता है। इसलिए वह उनके सवाब को बढ़ा देता है और उन्हें सीधे रास्ते पर चलने का सामर्थ्य प्रदान करता है।
आयत 196
وَأَتِمُّوا۟ ٱلْحَجَّ وَٱلْعُمْرَةَ لِلَّهِ ۚ فَإِنْ أُحْصِرْتُمْ فَمَا ٱسْتَيْسَرَ مِنَ ٱلْهَدْىِ ۖ وَلَا تَحْلِقُوا۟ رُءُوسَكُمْ حَتَّىٰ يَبْلُغَ ٱلْهَدْىُ مَحِلَّهُۥ ۚ فَمَن كَانَ مِنكُم مَّرِيضًا أَوْ بِهِۦٓ أَذًۭى مِّن رَّأْسِهِۦ فَفِدْيَةٌۭ مِّن صِيَامٍ أَوْ صَدَقَةٍ أَوْ نُسُكٍۢ ۚ فَإِذَآ أَمِنتُمْ فَمَن تَمَتَّعَ بِٱلْعُمْرَةِ إِلَى ٱلْحَجِّ فَمَا ٱسْتَيْسَرَ مِنَ ٱلْهَدْىِ ۚ فَمَن لَّمْ يَجِدْ فَصِيَامُ ثَلَـٰثَةِ أَيَّامٍۢ فِى ٱلْحَجِّ وَسَبْعَةٍ إِذَا رَجَعْتُمْ ۗ تِلْكَ عَشَرَةٌۭ كَامِلَةٌۭ ۗ ذَٰلِكَ لِمَن لَّمْ يَكُنْ أَهْلُهُۥ حَاضِرِى ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلْعِقَابِ
وَأَتِمُّوا۟
और पूरा करो
ٱلْحَجَّ
हज
وَٱلْعُمْرَةَ
और उमरा को
لِلَّهِ ۚ
अल्लाह के लिए
فَإِنْ
फिर अगर
أُحْصِرْتُمْ
घेर लिए जाओ तुम
فَمَا
तो जो
ٱسْتَيْسَرَ
मयस्सर आए
مِنَ
of
ٱلْهَدْىِ ۖ
क़ुर्बानी से (वो कर लो)
وَلَا
और ना
تَحْلِقُوا۟
तुम मुँडवाओ
رُءُوسَكُمْ
अपने सरों को
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَبْلُغَ
पहुँच जाए
ٱلْهَدْىُ
क़ुर्बानी
مَحِلَّهُۥ ۚ
अपनी हलाल गाह को
فَمَن
तो जो कोई
كَانَ
हो
مِنكُم
तुममें से
مَّرِيضًا
मरीज़
أَوْ
या
بِهِۦٓ
उसे
أَذًۭى
तकलीफ़ हो
مِّن
of
رَّأْسِهِۦ
उसके सर में
فَفِدْيَةٌۭ
तो फ़िदया देना है
مِّن
of
صِيَامٍ
रोज़ों से
أَوْ
या
صَدَقَةٍ
सदक़े से
أَوْ
या
نُسُكٍۢ ۚ
क़ुर्बानी से
فَإِذَآ
पस जब
أَمِنتُمْ
अमन में आ जाओ तुम
فَمَن
तो जो कोई
تَمَتَّعَ
फ़ायदा उठाए
بِٱلْعُمْرَةِ
साथ उमरा के
إِلَى
followed
ٱلْحَجِّ
हज तक
فَمَا
तो जो भी
ٱسْتَيْسَرَ
मयस्सर हो
مِنَ
of
ٱلْهَدْىِ ۚ
क़ुर्बानी से (वो कर लो)
فَمَن
फिर जो कोई
لَّمْ
ना
يَجِدْ
पाए
فَصِيَامُ
तो रोज़े रखना है
ثَلَـٰثَةِ
तीन
أَيَّامٍۢ
दिनों के
فِى
during
ٱلْحَجِّ
हज में
وَسَبْعَةٍ
और सात
إِذَا
जब
رَجَعْتُمْ ۗ
लौटो तुम
تِلْكَ
ये
عَشَرَةٌۭ
दस हैं
كَامِلَةٌۭ ۗ
पूरे
ذَٰلِكَ
ये
لِمَن
उसके लिए जो
لَّمْ
ना
يَكُنْ
हों
أَهْلُهُۥ
उसके अहले ख़ाना
حَاضِرِى
रहने वाले (पास)
ٱلْمَسْجِدِ
मस्जिदे
ٱلْحَرَامِ ۚ
हराम के
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَٱعْلَمُوٓا۟
और जान लो
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
شَدِيدُ
सख़्त
ٱلْعِقَابِ
सज़ा वाला है
और हज और उमरा जो कि अल्लाह के लिए है, पूरे करो। फिर यदि तुम घिर जाओ, तो जो क़ुरबानी उपलब्ध हो पेश कर दो। और अपने सिर न मूड़ो जब तक कि क़ुरबानी अपने ठिकाने न पहुँच जाए, किन्तु जो व्यक्ति तुममें बीमार हो या उसके सिर में कोई तकलीफ़ हो, तो रोज़े या सदक़ा या क़रबानी के रूप में फ़िद्याी देना होगा। फिर जब तुम पर से ख़तरा टल जाए, तो जो व्यक्ति हज तक उमरा से लाभान्वित हो, जो जो क़ुरबानी उपलब्ध हो पेश करे, और जिसको उपलब्ध न हो तो हज के दिनों में तीन दिन के रोज़े रखे और सात दिन के रोज़े जब तुम वापस हो, ये पूरे दस हुए। यह उसके लिए है जिसके बाल-बच्चे मस्जिदे हराम के निकट न रहते हों। अल्लाह का डर रखो और भली-भाँति जान लो कि अल्लाह कठोर दंड देनेवाला है
तफ़्सीर:
अल्लाह तआला की प्रसन्नता की तलाश में, ह़ज्ज और उम्रा संपूर्ण रूप से अदा करो। यदि बीमारी या दुश्मन या इसी प्रकार के अन्य कारणों से उन्हें पूरा करने से तुम्हें रोक दिया जाए; तो तुम्हें अपने एह़राम से हलाल होने के लिए - ऊँट या गाय अथवा बकरी में से - जो भी क़ुर्बानी का जानवर उपलब्ध हो, उसे ज़बह़ करना होगा। तथा उस समय तक अपने सिर न मुँडाओ या बाल न कटाओ, जब तक क़ुर्बानी उस स्थान पर न पहुँच जाए, जहाँ उसे ज़बह करना हलाल है। यदि उसे ह़रम पहुँचने से रोक दिया जाए, तो वहीं ज़बह़ कर दिया जाए, जहाँ उसे रोक दिया गया है। यदि ह़रम से नहीं रोका गया है, तो हरम में क़ुर्बानी के दिन और उसके बाद 'तशरीक़ के दिनों' में ज़बह किया जाना चाहिए। फिर तुममें से जो व्यक्ति बीमार हो, अथवा उसके सिर के बालों में कोई तकलीफ़ हो, जैसे जूँ आदि, और इसके कारण वह अपना सिर मुँडा ले, तो उसपर कोई गुनाह नहीं है। लेकिन उसके बदले उसे फ़िदया अदा करना पड़ेगा। फ़िदया के तौर पर या तो तीन रोज़े रखे, या ह़रम के निर्धनों में से तीन निर्धनों को खाना खिलाए, या एक बकरी ज़बह करके हरम के ग़रीबों में बाँट दे। फिर यदि तुम्हें कोई भय न हो, तो तुममें से जो व्यक्ति ह़ज्ज के महीनों में उम्रा अदा करने के बाद एह़राम खोलना चाहे और उसी साल ह़ज्ज का एहराम बाँधने तक उन वस्तुओं से लाभान्वित होना चाहे, जो एह़राम की अवस्था में हराम हैं; तो जो कुछ उसके पास उपलब्ध हो उसे ज़बह करे : एक बकरी ज़बह करे अथवा एक ऊँट या गाय में सात आदमी शरीक हो जाएँ। यदि वह क़ुर्बानी न कर सके, तो उसके बदले ह़ज्ज के दिनों में तीन रोज़े रखे और सात रोज़े अपने घर वापस आने के बाद रखे, ताकि कुल दस दिन पूरे हो जाएँ। क़ुर्बानी अथवा उसकी शक्ति न होने की स्थिति में रोज़े की अनिवार्यता के साथ उम्रा का यह लाभ उठाना उस व्यक्ति के लिए है, जो ह़रम का निवासी और हरम के आस-पास रहने वाला न हो। तथा अल्लाह की शरीयत का अनुसरण करके और उसकी सीमाओं का सम्मान करके उससे डरो और जान लो कि अल्लाह अपने आदेशों का उल्लंघन करने वालों को कठोर दंड देने वाला है।
आयत 197
ٱلْحَجُّ أَشْهُرٌۭ مَّعْلُومَـٰتٌۭ ۚ فَمَن فَرَضَ فِيهِنَّ ٱلْحَجَّ فَلَا رَفَثَ وَلَا فُسُوقَ وَلَا جِدَالَ فِى ٱلْحَجِّ ۗ وَمَا تَفْعَلُوا۟ مِنْ خَيْرٍۢ يَعْلَمْهُ ٱللَّهُ ۗ وَتَزَوَّدُوا۟ فَإِنَّ خَيْرَ ٱلزَّادِ ٱلتَّقْوَىٰ ۚ وَٱتَّقُونِ يَـٰٓأُو۟لِى ٱلْأَلْبَـٰبِ
ٱلْحَجُّ
हज (के)
أَشْهُرٌۭ
महीने
مَّعْلُومَـٰتٌۭ ۚ
मालूम हैं
فَمَن
तो जो कोई
فَرَضَ
फ़र्ज़ कर ले
فِيهِنَّ
इनमे
ٱلْحَجَّ
हज को
فَلَا
तो ना
رَفَثَ
जिन्सी गुफ़्तगू करना
وَلَا
और ना
فُسُوقَ
गुनाह करना
وَلَا
और ना
جِدَالَ
झगड़ा करना है
فِى
during
ٱلْحَجِّ ۗ
हज में
وَمَا
और जो भी
تَفْعَلُوا۟
तुम करोगे
مِنْ
of
خَيْرٍۢ
कोई नेकी
يَعْلَمْهُ
जान लेगा उसे
ٱللَّهُ ۗ
अल्लाह
وَتَزَوَّدُوا۟
और तुम ज़ादे राह ले लिया करो
فَإِنَّ
पस बेशक
خَيْرَ
बेहतरीन
ٱلزَّادِ
ज़ादे राह
ٱلتَّقْوَىٰ ۚ
तक़वा है
وَٱتَّقُونِ
और डरो मुझसे
يَـٰٓأُو۟لِى
O men
ٱلْأَلْبَـٰبِ
ऐ अक़्ल वालो
हज के महीने जाने-पहचाने और निश्चित हैं, तो जो इनमें हज करने का निश्चय करे, को हज में न तो काम-वासना की बातें हो सकती है और न अवज्ञा और न लड़ाई-झगड़े की कोई बात। और जो भलाई के काम भी तुम करोंगे अल्लाह उसे जानता होगा। और (ईश-भय) पाथेय ले लो, क्योंकि सबसे उत्तम पाथेय ईश-भय है। और ऐ बुद्धि और समझवालो! मेरा डर रखो
तफ़्सीर:
ह़ज्ज का समय कुछ ज्ञात महीने हैं, जो शव्वाल के महीने से शुरू होते हैं और ज़ुल-ह़िज्जा के दस दिनों के साथ समाप्त हो जाते हैं। जो व्यक्ति इन महीनों में अपने आपको ह़ज्ज के लिए बाध्य कर ले और उसका एहराम बाँध ले; उसके लिए संभोग और संभोग पूर्व क्रीड़ाएँ ह़राम हैं। तथा समय और जगह की महानता के कारण, उसके लिए पाप करके अल्लाह के आज्ञापालन से निकलने का निषेध (दोष) बढ़ जाता है। इसी तरह उसके लिए ऐसी बहस (वाद-विवाद) में पड़ना भी हराम है, जो क्रोध और झगड़े की ओर ले जाती है। तथा तुम जो भी अच्छा कार्य करोगे, अल्लाह उसे जान लेगा और तुम्हें उसका बदला प्रदान करेगा। तथा खाने-पीने की ज़रूरत की चीजें लेकर ह़ज्ज की अदायगी में मदद हासिल करो और जान लो कि तुम्हारे सभी मामलों में तुम्हारी मदद के लिए सबसे अच्छी चीज़ अल्लाह का तक़्वा (डर) है। अतः ऐ स्वस्थ बुद्धि वालो! मेरी आज्ञाओं का पालन करके और मेरे निषेधों से बचकर मुझसे डरो।
आयत 198
لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَن تَبْتَغُوا۟ فَضْلًۭا مِّن رَّبِّكُمْ ۚ فَإِذَآ أَفَضْتُم مِّنْ عَرَفَـٰتٍۢ فَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ عِندَ ٱلْمَشْعَرِ ٱلْحَرَامِ ۖ وَٱذْكُرُوهُ كَمَا هَدَىٰكُمْ وَإِن كُنتُم مِّن قَبْلِهِۦ لَمِنَ ٱلضَّآلِّينَ
لَيْسَ
नहीं है
عَلَيْكُمْ
तुम पर
جُنَاحٌ
कोई गुनाह
أَن
कि
تَبْتَغُوا۟
तुम तलाश करो
فَضْلًۭا
फ़ज़ल
مِّن
from
رَّبِّكُمْ ۚ
अपने रब की तरफ़ से
فَإِذَآ
फिर जब
أَفَضْتُم
पलटो तुम
مِّنْ
from
عَرَفَـٰتٍۢ
अरफ़ात से
فَٱذْكُرُوا۟
तो ज़िक्र करो
ٱللَّهَ
अल्लाह का
عِندَ
पास
ٱلْمَشْعَرِ
मशअरे
ٱلْحَرَامِ ۖ
हराम के
وَٱذْكُرُوهُ
और ज़िक्र करो उसका
كَمَا
जैसा कि
هَدَىٰكُمْ
उसने रहनुमाई की तुम्हारी
وَإِن
और बेशक
كُنتُم
थे तुम
مِّن
[from]
قَبْلِهِۦ
इससे क़ब्ल
لَمِنَ
surely among
ٱلضَّآلِّينَ
अलबत्ता गुमराहों में से
इसमे तुम्हारे लिए कोई गुनाह नहीं कि अपने रब का अनुग्रह तलब करो। फिर जब तुम अरफ़ात से चलो तो 'मशअरे हराम' (मुज़दल्फ़ा) के निकट ठहरकर अल्लाह को याद करो, और उसे याद करो जैसाकि उसने तुम्हें बताया है, और इससे पहले तुम पथभ्रष्ट थे
तफ़्सीर:
ह़ज्ज के दौरान व्यापार और अन्य चीज़ों के माध्यम से ह़लाल जीविका की तलाश करने में तुमपर कोई पाप नहीं है। जब तुम ज़ुल-ह़िज्जा की नौ तारीख़ को अरफ़ा में ठहरने के बाद, दसवीं तारीख़ की रात को वहाँ से मुज़दलिफ़ा की ओर प्रस्थान करो; तो मुज़दलिफ़ा में मश्अरे ह़राम के पास तसबीह़ (सुब्ह़ानल्लाह), तहलील (ला इलाहा इल्लल्लाह) और दुआ करके अल्लाह को याद करो। तथा अल्लाह को इसलिए याद करो कि उसने अपने धर्म के स्थलों और अपने घर के ह़ज्ज के अनुष्ठानों के लिए तुम्हारा मार्गदर्शन किया, क्योंकि इससे पहले तुम उन लोगों में से थे जो उसकी शरीयत से अनजान थे।
आयत 199
ثُمَّ أَفِيضُوا۟ مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ ٱلنَّاسُ وَٱسْتَغْفِرُوا۟ ٱللَّهَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
ثُمَّ
फिर
أَفِيضُوا۟
पलटो तुम
مِنْ
from
حَيْثُ
जहाँ से
أَفَاضَ
पलटते हैं
ٱلنَّاسُ
लोग
وَٱسْتَغْفِرُوا۟
और बख़्शिश माँगो
ٱللَّهَ ۚ
अल्लाह से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
इसके पश्चात जहाँ से और सब लोग चलें, वहीं से तुम भी चलो, और अल्लाह से क्षमा की प्रार्थना करो। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
फिर तुम अरफ़ात से वापस आओ, जैसे कि इबराहीम अलैहिस्सलाम का अनुसरण करने वाले लोग करते थे, उन जाहिलिय्यत के लोगों की तरह नहीं, जो यहाँ ठहरते ही नहीं थे। तथा तुम अल्लाह के आदेश का पालन करने में अपनी कोताही पर उससे क्षमा माँगो। निःसंदेह अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला और उनपर दया करने वाला है।
आयत 200
فَإِذَا قَضَيْتُم مَّنَـٰسِكَكُمْ فَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ كَذِكْرِكُمْ ءَابَآءَكُمْ أَوْ أَشَدَّ ذِكْرًۭا ۗ فَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَقُولُ رَبَّنَآ ءَاتِنَا فِى ٱلدُّنْيَا وَمَا لَهُۥ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ مِنْ خَلَـٰقٍۢ
فَإِذَا
फिर जब
قَضَيْتُم
पूरे कर चुको तुम
مَّنَـٰسِكَكُمْ
अपने मनासिके हज
فَٱذْكُرُوا۟
तो ज़िक्र करो
ٱللَّهَ
अल्लाह का
كَذِكْرِكُمْ
जैसा कि ज़िक्र करना है तुम्हारा
ءَابَآءَكُمْ
अपने आबा ओ अजदाद का
أَوْ
या
أَشَدَّ
ज़्यादा शदीद
ذِكْرًۭا ۗ
ज़िक्र करना
فَمِنَ
And from
ٱلنَّاسِ
पस लोगों में से कोई है
مَن
जो
يَقُولُ
कहता है
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
ءَاتِنَا
दे हमें
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
وَمَا
और नहीं है
لَهُۥ
उसके लिए
فِى
in
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत में
مِنْ
[of]
خَلَـٰقٍۢ
कोई हिस्सा
फिर जब तुम अपनी हज सम्बन्धी रीतियों को पूरा कर चुको तो अल्लाह को याद करो जैसे अपने बाप-दादा को याद करते रहे हो, बल्कि उससे भी बढ़कर याद करो। फिर लोगों सें कोई तो ऐसा है जो कहता है, "हमारे रब! हमें दुनिया में दे दो।" ऐसी हालत में आख़िरत में उसका कोई हिस्सा नहीं
तफ़्सीर:
जब तुम ह़ज्ज के कार्य पूरे कर लो और उनसे फारिग़ हो जाओ, तो अल्लाह को याद करो और उसकी अत्यधिक प्रशंसा करो, जैसे तुम अपने बाप-दादा पर गर्व और उनकी प्रशंसा किया करते थे, अथवा अल्लाह को अपने बाप-दादा को याद करने से कहीं बढ़कर याद करो। क्योंकि हर वह नेमत जिसका तुम आनंद ले रहे हो, वह अल्लाह ही की दी हुई है। इस विषय में लोग अलग-अलग प्रकार के हैं। उनमें से एक बहुदेववादी काफ़िर है, जो केवल इस सांसारिक जीवन पर विश्वास करता है। इसलिए वह अपने पालनहार से केवल संसार की नेमतों और उसकी शोभा, जैसे स्वास्थ्य, धन और संतान को माँगता है। ऐसे लोगों के लिए, उनके दुनिया की इच्छा रखने और आख़िरत से उपेक्षा करने के कारण, उसमें कोई हिस्सा नहीं है, जो अल्लाह ने अपने मोमिन बंदों के लिए आख़िरत में तैयार कर रखा है।
आयत 201
وَمِنْهُم مَّن يَقُولُ رَبَّنَآ ءَاتِنَا فِى ٱلدُّنْيَا حَسَنَةًۭ وَفِى ٱلْـَٔاخِرَةِ حَسَنَةًۭ وَقِنَا عَذَابَ ٱلنَّارِ
وَمِنْهُم
और उनमें से कोई है
مَّن
जो
يَقُولُ
कहता है
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
ءَاتِنَا
दे हमें
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
حَسَنَةًۭ
भलाई
وَفِى
and in
ٱلْـَٔاخِرَةِ
और आख़िरत में
حَسَنَةًۭ
भलाई
وَقِنَا
और बचा हमें
عَذَابَ
अज़ाब से
ٱلنَّارِ
आग के
और उनमें कोई ऐसा है जो कहता है, "हमारे रब! हमें प्रदान कर दुनिया में भी अच्छी दशा और आख़िरत में भी अच्छा दशा, और हमें आग (जहन्नम) की यातना से बचा ले।"
तफ़्सीर:
जबकि लोगों का एक समूह अल्लाह पर ईमान रखने वाला है और आख़िरत पर ईमान रखता है। इसलिए वह अपने पालनहार से दुनिया की नेमत और उसमें अच्छे कार्य का सवाल करता है, साथ ही वह उससे जन्नत की प्राप्ति और आग की यातना से सुरक्षित रहने का प्रश्न करता है।
आयत 202
أُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمْ نَصِيبٌۭ مِّمَّا كَسَبُوا۟ ۚ وَٱللَّهُ سَرِيعُ ٱلْحِسَابِ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
لَهُمْ
जिनके लिए
نَصِيبٌۭ
एक हिस्सा है
مِّمَّا
उससे जो
كَسَبُوا۟ ۚ
उन्होंने कमाया
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
سَرِيعُ
जल्द लेने वाला है
ٱلْحِسَابِ
हिसाब
ऐसे ही लोग है कि उन्होंने जो कुछ कमाया है उसकी जिन्स का हिस्सा उनके लिए नियत है। और अल्लाह जल्द ही हिसाब चुकानेवाला है
तफ़्सीर:
दुनिया एवं आख़िरत की भलाइयाँ माँगने वाले ही वे लोग हैं, जिनके लिए उनके दुनिया में किए हुए नेक कार्यों के बदले में बहुत बड़ा सवाब है और अल्लाह कार्यों का बहुत जल्द हिसाब लेने वाला है।
आयत 203
۞ وَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ فِىٓ أَيَّامٍۢ مَّعْدُودَٰتٍۢ ۚ فَمَن تَعَجَّلَ فِى يَوْمَيْنِ فَلَآ إِثْمَ عَلَيْهِ وَمَن تَأَخَّرَ فَلَآ إِثْمَ عَلَيْهِ ۚ لِمَنِ ٱتَّقَىٰ ۗ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّكُمْ إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ
۞ وَٱذْكُرُوا۟
और याद करो
ٱللَّهَ
अल्लाह को
فِىٓ
during
أَيَّامٍۢ
दिनों में
مَّعْدُودَٰتٍۢ ۚ
गिने-चुने
فَمَن
तो जो कोई
تَعَجَّلَ
जल्दी करे
فِى
in
يَوْمَيْنِ
दो दिनों में
فَلَآ
तो नहीं
إِثْمَ
कोई गुनाह
عَلَيْهِ
उस पर
وَمَن
और जो कोई
تَأَخَّرَ
ताख़ीर करे
فَلَآ
तो नहीं
إِثْمَ
कोई गुनाह
عَلَيْهِ ۚ
उस पर
لِمَنِ
उसके लिए जो
ٱتَّقَىٰ ۗ
तक़वा करे
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَٱعْلَمُوٓا۟
और जान लो
أَنَّكُمْ
बेशक तुम
إِلَيْهِ
तरफ़ उसी के
تُحْشَرُونَ
तुम इकट्ठे किए जाओगे
और अल्लाह की याद में गिनती के ये कुछ दिन व्यतीत करो। फिर जो कोई जल्दी करके दो ही दिन में कूच करे तो इसमें उसपर कोई गुनाह नहीं। और जो ठहरा रहे तो इसमें भी उसपर कोई गुनाह नहीं। यह उसके लिेए है जो अल्लाह का डर रखे। और अल्लाह का डर रखो और जान रखो कि उसी के पास तुम इकट्ठा होगे
तफ़्सीर:
कुछ थोड़े दिनों अर्थात् ज़ुल-ह़िज्जा के ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें दिन में तकबीर (अल्लाहु अकबर) और तहलील (ला इलाहा इल्लल्लाह) के साथ अल्लाह को याद करो। फिर जो जल्दी करे और बारहवीं तारीख़ को कंकरी मारने के बाद मिना से निकल जाए, तो उसके लिए ऐसा करना अनुमेय है और उसपर कोई पाप नहीं; क्योंकि अल्लाह ने उसे यह आसानी प्रदान की है। तथा जो तेरहवीं तारीख़ तक देरी करे यहाँ तक कि कंकरी मार ले, तो वह ऐसा भी कर सकता है और उसपर कोई आपत्ति की बात नहीं है, बल्कि उसने सबसे पूर्ण रूप अपनाया, और उसने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कृत्य का पालन किया। यह सब कुछ उसके लिए है, जो अपने हज्ज में अल्लाह से डरे और उसे अल्लाह के आदेश के अनुसार अदा करे। तथा अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई बातों से बचकर उससे डरो और सुनिश्चित रहो कि तुम केवल उसी की ओर लौटाए जाओगे, फिर वह तुम्हें तुम्हारे कार्यों का बदला देगा।
आयत 204
وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يُعْجِبُكَ قَوْلُهُۥ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا وَيُشْهِدُ ٱللَّهَ عَلَىٰ مَا فِى قَلْبِهِۦ وَهُوَ أَلَدُّ ٱلْخِصَامِ
وَمِنَ
And of
ٱلنَّاسِ
और लोगों में से कोई है
مَن
जो
يُعْجِبُكَ
ख़ुश करती है आपको
قَوْلُهُۥ
बात उसकी
فِى
in
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी में
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
وَيُشْهِدُ
और वो गवाह बनाता है
ٱللَّهَ
अल्लाह को
عَلَىٰ
ऊपर
مَا
उसके जो
فِى
(is) in
قَلْبِهِۦ
उसके दिल में है
وَهُوَ
हालाँकि वो
أَلَدُّ
सख़्त झगड़ालू है
ٱلْخِصَامِ
झगड़ा करने में
लोगों में कोई तो ऐसा है कि इस सांसारिक जीवन के विषय में उसकी बाते तुम्हें बहुत भाती है, उस (खोट) के बावजूद जो उसके दिल में होती है, वह अल्लाह को गवाह ठहराता है और झगड़े में वह बड़ा हठी है
तफ़्सीर:
लोगों में कोई व्यक्ति मुनाफ़िक़ भी है, जिसकी बात इस दुनिया के बारे में - ऐ नबी! - आपको अच्छी लगती है। चुनाँचे आप उसे सुभाषी देखते हैं, यहाँ तक कि आपको उसके सच्चे और शुभचिंतक होने का गुमान होता है। जबकि उसका उद्देश्य केवल अपने धन एवं प्राण की रक्षा करना है। तथा उसके दिल में जो ईमान और भलाई है, उसपर वह अल्लाह को गवाह बनाता है - हालाँकि वह झूठा है -, तथा वह मुसलमानों के प्रति बहुत शत्रुतापूर्ण और सख़्त झगड़ालू है।
आयत 205
وَإِذَا تَوَلَّىٰ سَعَىٰ فِى ٱلْأَرْضِ لِيُفْسِدَ فِيهَا وَيُهْلِكَ ٱلْحَرْثَ وَٱلنَّسْلَ ۗ وَٱللَّهُ لَا يُحِبُّ ٱلْفَسَادَ
وَإِذَا
और जब
تَوَلَّىٰ
वो मुँह मोड़ता है
سَعَىٰ
वो कोशिश करता है
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
لِيُفْسِدَ
ताकि वो फ़साद करे
فِيهَا
उसमें
وَيُهْلِكَ
और वो हलाक करे
ٱلْحَرْثَ
खेती
وَٱلنَّسْلَ ۗ
और नस्ल को
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
لَا
(does) not
يُحِبُّ
नहीं वो पसंद करता
ٱلْفَسَادَ
फ़साद को
और जब वह लौटता है, तो धरती में इसलिए दौड़-धूप करता है कि इसमें बिगाड़ पैदा करे और खेती और नस्ल को तबाह करे, जबकि अल्लाह बिगाड़ को पसन्द नहीं करता
तफ़्सीर:
जब वह आपके पास से जुदा होता है, तो धरती में दौड़-धूप करता है ताकि गुनाहों से उपद्रव फैलाए, फसलों को नाश करे और पशुओं को मार डाले। जबकि अल्लाह धरती में उपद्रव को और उपद्रव करने वाले को पसंद नहीं करता।
आयत 206
وَإِذَا قِيلَ لَهُ ٱتَّقِ ٱللَّهَ أَخَذَتْهُ ٱلْعِزَّةُ بِٱلْإِثْمِ ۚ فَحَسْبُهُۥ جَهَنَّمُ ۚ وَلَبِئْسَ ٱلْمِهَادُ
وَإِذَا
और जब
قِيلَ
कहा जाता है
لَهُ
उसे
ٱتَّقِ
डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
أَخَذَتْهُ
आमादा करती है उसे
ٱلْعِزَّةُ
इज़्ज़त
بِٱلْإِثْمِ ۚ
गुनाह पर
فَحَسْبُهُۥ
तो काफ़ी है उसे
جَهَنَّمُ ۚ
जहन्नम
وَلَبِئْسَ
और अलबत्ता कितना बुरा है
ٱلْمِهَادُ
ठिकाना
और जब उससे कहा जाता है, "अल्लाह से डर", तो अहंकार उसे और गुनाह पर जमा देता है। अतः उसके लिए तो जहन्नम ही काफ़ी है, और वह बहुत-ही बुरी शय्या है!
तफ़्सीर:
जब उस उपद्रव करने वाले से - सदुपदेश के तौर पर - कहा जाता है : अल्लाह की सीमाओं का सम्मान करके और उसके निषेधों से बचकर उससे डर, तो उसका गर्व और अहंकार उसे सच्चाई की ओर लौटने से रोक देता है और वह पाप में लीन रहता है। अतः उसका बदला जो उसके लिए पर्याप्त है, जहन्नम में प्रवेश है और निश्चय वह उसके वासियों के लिए बहुत बुरा ठिकाना और स्थान है।
आयत 207
وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَشْرِى نَفْسَهُ ٱبْتِغَآءَ مَرْضَاتِ ٱللَّهِ ۗ وَٱللَّهُ رَءُوفٌۢ بِٱلْعِبَادِ
وَمِنَ
And of
ٱلنَّاسِ
और लोगों में से कोई है
مَن
जो
يَشْرِى
बेचता है
نَفْسَهُ
अपने नफ़्स को
ٱبْتِغَآءَ
चाहने के लिए
مَرْضَاتِ
रज़ा
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह की
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
رَءُوفٌۢ
बहुत शफ़ीक़ है
بِٱلْعِبَادِ
बन्दों पर
और लोगों में वह भी है जो अल्लाह की प्रसन्नता के संसाधन की चाह में अपनी जान खता देता है। अल्लाह भी अपने ऐसे बन्दों के प्रति अत्यन्त करुणाशील है
तफ़्सीर:
तथा लोगों में एक ईमान वाला भी है, जो अपना प्राण बेच देता है। इसलिए वह अपने पालनहार की आज्ञाकारिता में, उसके मार्ग में जिहाद करते हुए और उसकी खुशी की तलाश में उसे न्योछावर कर देता है। तथा अल्लाह अपने बंदों पर विशाल दया वाला और उनपर अनंत करुणामय है।
आयत 208
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱدْخُلُوا۟ فِى ٱلسِّلْمِ كَآفَّةًۭ وَلَا تَتَّبِعُوا۟ خُطُوَٰتِ ٱلشَّيْطَـٰنِ ۚ إِنَّهُۥ لَكُمْ عَدُوٌّۭ مُّبِينٌۭ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
ٱدْخُلُوا۟
दाख़िल हो जाओ
فِى
in
ٱلسِّلْمِ
इस्लाम में
كَآفَّةًۭ
पूरे के पूरे
وَلَا
और ना
تَتَّبِعُوا۟
तुम पैरवी करो
خُطُوَٰتِ
क़दमों की
ٱلشَّيْطَـٰنِ ۚ
शैतान के
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَكُمْ
तुम्हारा
عَدُوٌّۭ
दुश्मन है
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
ऐ ईमान लानेवालो! तुम सब इस्लाम में दाख़िल हो जाओ और शैतान के पदचिन्ह पर न चलो। वह तो तुम्हारा खुला हुआ शत्रु है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! समग्र इस्लाम में प्रवेश कर जाओ और उसकी किसी भी वस्तु को न छोड़ो, जैसा कि अह्ले-किताब का रवैया रहा है कि किताब के कुछ भाग पर ईमान रखते हैं और कुछ भाग का इनकार करते हैं। और शैतान के मार्गों पर न चलो; क्योंकि वह तुम्हारा स्पष्ट शत्रु है, अपनी शत्रुता को प्रकट करने वाला है।
आयत 209
فَإِن زَلَلْتُم مِّنۢ بَعْدِ مَا جَآءَتْكُمُ ٱلْبَيِّنَـٰتُ فَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ
فَإِن
फिर अगर
زَلَلْتُم
फिसल जाओ तुम
مِّنۢ
from
بَعْدِ
बाद इसके
مَا
जो
جَآءَتْكُمُ
आ गईं तुम्हारे पास
ٱلْبَيِّنَـٰتُ
वाज़ेह निशानियाँ
فَٱعْلَمُوٓا۟
तो जान लो
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَزِيزٌ
बहुत ज़बरदस्त है
حَكِيمٌ
ख़ूब हिकमत वाला है
फिर यदि तुम उन स्पष्टा दलीलों के पश्चात भी, जो तुम्हारे पास आ चुकी है, फिसल गए, तो भली-भाँति जान रखो कि अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
यदि तुम अपने पास संदेह रहित स्पष्ट प्रमाण आ जाने के पश्चात भी किसी त्रुटि और झुकाव में पड़ जाओ; तो जान लो कि अल्लाह अपनी शक्ति एवं वशीकरण में पराक्रमी है, अपने प्रबंधन एवं विधान में पूर्ण हिकमत वाला है। इसलिए उससे डरो और उसका सम्मान करो।
आयत 210
هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّآ أَن يَأْتِيَهُمُ ٱللَّهُ فِى ظُلَلٍۢ مِّنَ ٱلْغَمَامِ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ وَقُضِىَ ٱلْأَمْرُ ۚ وَإِلَى ٱللَّهِ تُرْجَعُ ٱلْأُمُورُ
هَلْ
नहीं
يَنظُرُونَ
वो इन्तिज़ार कर रहे
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
يَأْتِيَهُمُ
आ जाए उनके पास
ٱللَّهُ
अल्लाह
فِى
in
ظُلَلٍۢ
सायबानों में
مِّنَ
of
ٱلْغَمَامِ
बादलों के
وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
और फ़रिश्ते
وَقُضِىَ
और पूरा कर दिया जाए
ٱلْأَمْرُ ۚ
काम
وَإِلَى
और तरफ़
ٱللَّهِ
अल्लाह ही के
تُرْجَعُ
लौटाए जाते है
ٱلْأُمُورُ
सब काम
क्या वे (इसराईल की सन्तान) बस इसकी प्रतीक्षा कर रहे है कि अल्लाह स्वयं ही बादलों की छायों में उनके सामने आ जाए और फ़रिश्ते भी, हालाँकि बात तय कर दी गई है? मामले तो अल्लाह ही की ओर लौटते है
तफ़्सीर:
शैतान के रास्तों पर चलने वाले, सत्य के मार्ग से विचलित ये लोग केवल इस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि उनके बीच निर्णय करने के लिए क़ियामत के दिन अल्लाह अपनी महिमा एवं प्रताप के योग्य, बादलों के सायों में उनके पास आ जाए, तथा फ़रिश्ते भी उन्हें चारों ओर से घेरे हुए उनके पास आ जाएँ, और उस समय उनके बारे में अल्लाह के हुक्म को पूरा कर दिया जाएगा और काम तमाम हो जाएगा। तथा लोगों के सारे मामले और विषय अकेले अल्लाह ही की ओर लौटाए जाते हैं।
आयत 211
سَلْ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ كَمْ ءَاتَيْنَـٰهُم مِّنْ ءَايَةٍۭ بَيِّنَةٍۢ ۗ وَمَن يُبَدِّلْ نِعْمَةَ ٱللَّهِ مِنۢ بَعْدِ مَا جَآءَتْهُ فَإِنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلْعِقَابِ
سَلْ
पूछ लीजिए
بَنِىٓ
(the) Children
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल से
كَمْ
कितनी
ءَاتَيْنَـٰهُم
दीं हमने उन्हें
مِّنْ
of
ءَايَةٍۭ
निशानियाँ
بَيِّنَةٍۢ ۗ
वाज़ेह
وَمَن
और जो कोई
يُبَدِّلْ
बदल देगा
نِعْمَةَ
नेअमत को
ٱللَّهِ
अल्लाह की
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद इसके
مَا
जो
جَآءَتْهُ
आ गई उसके पास
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
شَدِيدُ
सख़्त
ٱلْعِقَابِ
सज़ा वाला है
इसराईल की सन्तान से पूछो, हमने उन्हें कितनी खुली-खुली निशानियाँ प्रदान की। और जो अल्लाह की नेमत को इसके बाद कि वह उसे पहुँच चुकी हो बदल डाले, तो निस्संदेह अल्लाह भी कठोर दंड देनेवाला है
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) बनी इसराईल से उनकी भर्त्सना करते हुए पूछिए : अल्लाह ने तुम्हारे सामने नबियों की सच्चाई को उजागर करने वाली कितनी स्पष्ट निशानियाँ रखीं?! तो तुमने उन्हें झुठला दिया और उनसे मुँह फेर लिया। तथा जो अल्लाह की नेमत को उसे पहचान लेने और उसके स्पष्ट हो जाने के पश्चात झुठला दे और इनकार कर दे; तो (ज्ञात होना चाहिए कि) निःसंदेह अल्लाह झुठलाने वाले काफ़िरों को कठिन यातना देने वाला है।
आयत 212
زُيِّنَ لِلَّذِينَ كَفَرُوا۟ ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَا وَيَسْخَرُونَ مِنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ۘ وَٱلَّذِينَ ٱتَّقَوْا۟ فَوْقَهُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ وَٱللَّهُ يَرْزُقُ مَن يَشَآءُ بِغَيْرِ حِسَابٍۢ
زُيِّنَ
मुज़य्यन कर दी गई
لِلَّذِينَ
उनके लिए जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
ٱلْحَيَوٰةُ
ज़िन्दगी
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
وَيَسْخَرُونَ
और वो मज़ाक़ करते हैं
مِنَ
[of]
ٱلَّذِينَ
उनसे जो
ءَامَنُوا۟ ۘ
ईमान लाए
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
ٱتَّقَوْا۟
तक़वा किया
فَوْقَهُمْ
ऊपर होंगे उनके
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ
क़यामत के
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَرْزُقُ
रिज़्क़ देता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
بِغَيْرِ
बग़ैर
حِسَابٍۢ
हिसाब के
इनकार करनेवाले सांसारिक जीवन पर रीझे हुए है और ईमानवालों का उपहास करते है, जबकि जो लोग अल्लाह का डर रखते है, वे क़ियामत के दिन उनसे ऊपर होंगे। अल्लाह जिस चाहता है बेहिसाब देता है
तफ़्सीर:
अल्लाह का इनकार करने वालों के लिए सांसारिक जीवन और उसमें मौजूद क्षणिक सुखों और समाप्त हो जाने वाली खुशियों को सुंदर बना दिया गया है। तथा वे अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखने वालों का मज़ाक़ उड़ाते हैं। जबकि जो लोग अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों को त्याग करके अल्लाह से डरते हैं, वे आख़िरत में इन काफ़िरों से ऊपर होंगे। क्योंकि अल्लाह उन्हें हमेशा रहने वाली जन्नतों में ठहराएगा और अल्लाह अपनी मख़्लूक़ में से जिसे चाहता है, बिना गिनती और गणना के प्रदान करता है।
आयत 213
كَانَ ٱلنَّاسُ أُمَّةًۭ وَٰحِدَةًۭ فَبَعَثَ ٱللَّهُ ٱلنَّبِيِّـۧنَ مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ وَأَنزَلَ مَعَهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ بِٱلْحَقِّ لِيَحْكُمَ بَيْنَ ٱلنَّاسِ فِيمَا ٱخْتَلَفُوا۟ فِيهِ ۚ وَمَا ٱخْتَلَفَ فِيهِ إِلَّا ٱلَّذِينَ أُوتُوهُ مِنۢ بَعْدِ مَا جَآءَتْهُمُ ٱلْبَيِّنَـٰتُ بَغْيًۢا بَيْنَهُمْ ۖ فَهَدَى ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لِمَا ٱخْتَلَفُوا۟ فِيهِ مِنَ ٱلْحَقِّ بِإِذْنِهِۦ ۗ وَٱللَّهُ يَهْدِى مَن يَشَآءُ إِلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍ
كَانَ
थे
ٱلنَّاسُ
लोग
أُمَّةًۭ
उम्मत
وَٰحِدَةًۭ
एक ही
فَبَعَثَ
फिर भेजा
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلنَّبِيِّـۧنَ
नबियों को
مُبَشِّرِينَ
ख़ुशख़बरी देने वाले
وَمُنذِرِينَ
और डराने वाले (बना कर)
وَأَنزَلَ
और उसने नाज़िल की
مَعَهُمُ
उनके साथ
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
لِيَحْكُمَ
ताकि वो फ़ैसला करे
بَيْنَ
दर्मियान
ٱلنَّاسِ
लोगों के
فِيمَا
उसमें जो
ٱخْتَلَفُوا۟
उन्होंने इख़्तिलाफ़ किया
فِيهِ ۚ
जिसमें
وَمَا
और नहीं
ٱخْتَلَفَ
इख़्तिलाफ़ किया
فِيهِ
उसमें
إِلَّا
मगर
ٱلَّذِينَ
उन्होंने जो
أُوتُوهُ
दिए गए थे उसे
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद इसके
مَا
जो
جَآءَتْهُمُ
आईं उनके पास
ٱلْبَيِّنَـٰتُ
वाज़ेह निशानियाँ
بَغْيًۢا
बवजह ज़िद के
بَيْنَهُمْ ۖ
आपस में
فَهَدَى
तो हिदायत दी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلَّذِينَ
उन्हें जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
لِمَا
उसकी जो
ٱخْتَلَفُوا۟
उन्होंने इख़्तिलाफ़ किया
فِيهِ
उसमें
مِنَ
of
ٱلْحَقِّ
हक़ में से
بِإِذْنِهِۦ ۗ
अपने हुक्म से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَهْدِى
हिदायत देता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
إِلَىٰ
तरफ़
صِرَٰطٍۢ
रास्ते
مُّسْتَقِيمٍ
सीधे के
सारे मनुष्य एक ही समुदाय थे (उन्होंने विभेद किया) तो अल्लाह ने नबियों को भेजा, जो शुभ-सूचना देनेवाले और डरानवाले थे; और उनके साथ हक़ पर आधारित किताब उतारी, ताकि लोगों में उन बातों का जिनमें वे विभेद कर रहे है, फ़ैसला कर दे। इसमें विभेद तो बस उन्हीं लोगों ने, जिन्हें वह मिली थी, परस्पर ज़्यादती करने के लिए इसके पश्चात किया, जबकि खुली निशानियाँ उनके पास आ चुकी थी। अतः ईमानवालों को अल्लाह ने अपनी अनूज्ञा से उस सत्य के विषय में मार्गदर्शन किया, जिसमें उन्होंने विभेद किया था। अल्लाह जिसे चाहता है, सीधे मार्ग पर चलाता है
तफ़्सीर:
(शुरू में) लोग एक ही समुदाय थे, अपने पिता आदम के धर्म पर (रहते हुए) मार्गदर्शन पर सहमत थे, यहाँ तक कि शैतान ने उन्हें गुमराह कर दिया, तो वे मतभेद के शिकार होकर मोमिन और काफिर में बँट गए। इस कारण से, अल्लाह ने रसूलों को भेजा, जो ईमान वालों और आज्ञाकारियों को उस चीज़ की शुभ सूचना देने वाले थे जो अल्लाह ने अपनी दया में से उनके लिए तैयार कर रखी है, तथा कुफ़्र का मार्ग अपनाने वालों को अल्लाह की कठिन यातना से डराने वाले थे जिसकी उसने उन्हें धमकी दी है। तथा अल्लाह ने अपने रसूलों के साथ संदेह रहित सत्य पर आधारित किताबें उतारीं; ताकि वे लोगों के बीच उनके विवादित मामलों का निर्णय करें। और उस पुस्तक में जिसे अल्लाह ने अवतरित किया - और वह तौरात है - उन्हीं लोगों ने मतभेद किया जो यहूदियों में से उसका ज्ञान दिए गए थे, इसके बाद कि उनके पास अल्लाह के प्रमाण आ चुके थे कि वह अल्लाह की ओर से सच्ची (पुस्तक) है, जिसमें उनके लिए मतभेद करना संभव नहीं था, उन्होंने ऐसा अत्याचार करते हुए किया। इसलिए अल्लाह ने अपनी अनुमति और इच्छा से मोमिनों को गुमराही से मार्गदर्शन को पहचानने का सामर्थ्य प्रदान किया। तथा अल्लाह जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखाता है, जिसमें कोई टेढ़ापन नहीं है और वह ईमान का मार्ग है।
आयत 214
أَمْ حَسِبْتُمْ أَن تَدْخُلُوا۟ ٱلْجَنَّةَ وَلَمَّا يَأْتِكُم مَّثَلُ ٱلَّذِينَ خَلَوْا۟ مِن قَبْلِكُم ۖ مَّسَّتْهُمُ ٱلْبَأْسَآءُ وَٱلضَّرَّآءُ وَزُلْزِلُوا۟ حَتَّىٰ يَقُولَ ٱلرَّسُولُ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَعَهُۥ مَتَىٰ نَصْرُ ٱللَّهِ ۗ أَلَآ إِنَّ نَصْرَ ٱللَّهِ قَرِيبٌۭ
أَمْ
क्या
حَسِبْتُمْ
ख़्याल किया तुमने
أَن
कि
تَدْخُلُوا۟
तुम दाख़िल हो जाओगे
ٱلْجَنَّةَ
जन्नत में
وَلَمَّا
हालाँकि नहीं
يَأْتِكُم
आई तुम्हारे पास
مَّثَلُ
मिसाल
ٱلَّذِينَ
उनकी जो
خَلَوْا۟
गुज़र चुके
مِن
from
قَبْلِكُم ۖ
तुमसे पहले
مَّسَّتْهُمُ
पहुँचीं उन्हें
ٱلْبَأْسَآءُ
सख़्तियाँ
وَٱلضَّرَّآءُ
और मुसीबतें
وَزُلْزِلُوا۟
और वो हिला दिए गए
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَقُولَ
कहने लगा
ٱلرَّسُولُ
रसूल
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
مَعَهُۥ
साथ उसके
مَتَىٰ
कब (आएगी)
نَصْرُ
मदद
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह की
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّ
बेशक
نَصْرَ
मदद
ٱللَّهِ
अल्लाह की
قَرِيبٌۭ
क़रीब है
क्या तुमने यह समझ रखा है कि जन्नत में प्रवेश पा जाओगे, जबकि अभी तुम पर वह सब कुछ नहीं बीता है जो तुमसे पहले के लोगों पर बीत चुका? उनपर तंगियाँ और तकलीफ़े आई और उन्हें हिला मारा गया यहाँ तक कि रसूल बोल उठे और उनके साथ ईमानवाले भी कि अल्लाह की सहायता कब आएगी? जान लो! अल्लाह की सहायता निकट है
तफ़्सीर:
या (ऐ मोमिनो!) तुमने समझ रखा है कि तुम जन्नत में प्रवेश कर जाओगे, जबकि तुम अभी तक अपने से पहले गुज़रे हुए लोगों के परीक्षा की तरह किसी परीक्षा से पीड़ित नहीं हुए। वे सख़्त ग़रीबी और गंभीर बीमारी से प्रभावित हुए और डर ने उन्हें हिलाकर रख दिया, यहाँ तक कि उनपर विपत्ति इस हद तक पहुँच गई कि वे अल्लाह की मदद के जल्दी आने की कामना करने लगे। चुनाँचे रसूल और उनके साथ ईमान लाने वाले कहने लगे : अल्लाह की मदद कब आएगी? सुन लो, अल्लाह की मदद उसपर ईमान रखने वालों और उसपर भरोसा करने वालों से क़रीब ही है।
आयत 215
يَسْـَٔلُونَكَ مَاذَا يُنفِقُونَ ۖ قُلْ مَآ أَنفَقْتُم مِّنْ خَيْرٍۢ فَلِلْوَٰلِدَيْنِ وَٱلْأَقْرَبِينَ وَٱلْيَتَـٰمَىٰ وَٱلْمَسَـٰكِينِ وَٱبْنِ ٱلسَّبِيلِ ۗ وَمَا تَفْعَلُوا۟ مِنْ خَيْرٍۢ فَإِنَّ ٱللَّهَ بِهِۦ عَلِيمٌۭ
يَسْـَٔلُونَكَ
वो सवाल करते हैं आपसे
مَاذَا
क्या कुछ
يُنفِقُونَ ۖ
वो ख़र्च करें
قُلْ
कह दीजिए
مَآ
जो
أَنفَقْتُم
ख़र्च करो तुम
مِّنْ
of
خَيْرٍۢ
माल में से
فَلِلْوَٰلِدَيْنِ
तो वालिदैन के लिए है
وَٱلْأَقْرَبِينَ
और क़राबतदारों
وَٱلْيَتَـٰمَىٰ
और यतीमों
وَٱلْمَسَـٰكِينِ
और मिस्कीनों
وَٱبْنِ
and (of)
ٱلسَّبِيلِ ۗ
और मुसाफ़िर के लिए है
وَمَا
और जो भी
تَفْعَلُوا۟
तुम करोगे
مِنْ
of
خَيْرٍۢ
नेकी में से
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
بِهِۦ
उसे
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
वे तुमसे पूछते है, "कितना ख़र्च करें?" कहो, "(पहले यह समझ लो कि) जो माल भी तुमने ख़र्च किया है, वह तो माँ-बाप, नातेदारों और अनाथों, और मुहताजों और मुसाफ़िरों के लिए ख़र्च हुआ है। और जो भलाई भी तुम करो, निस्संदेह अल्लाह उसे भली-भाँति जान लेगा।
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) आपके साथी आपसे पूछते हैं : वे अपने विभिन्न प्रकार के धनों में से क्या ख़र्च करें और कहाँ ख़र्च करें? तो आप उन्हें जवाब देते हुए कह दीजिए : तुम ख़ैर - अर्थात् हलाल एवं पवित्र धन - में से जो भी ख़र्च करो, तो उसे माता-पिता पर, आवश्यकता के अनुसार अपने निकटतम रिश्तेदारों पर, ज़रूरतमंद यतीमों पर, उन बेसहारा लोगों पर जिनके पास कोई धन नहीं, तथा उस यात्री पर ख़र्च करना चाहिए जो यात्रा के कारण अपने परिवार और स्वदेश से कट गया है। (ऐ मोमिनो!) तुम जो भी भलाई करोगे, चाहे वह कम हो या अधिक, निःसंदेह अल्लाह उसे जानने वाला है, उससे कुछ भी छिपा नहीं है, और वह तुम्हें उसका बदला देगा।
आयत 216
كُتِبَ عَلَيْكُمُ ٱلْقِتَالُ وَهُوَ كُرْهٌۭ لَّكُمْ ۖ وَعَسَىٰٓ أَن تَكْرَهُوا۟ شَيْـًۭٔا وَهُوَ خَيْرٌۭ لَّكُمْ ۖ وَعَسَىٰٓ أَن تُحِبُّوا۟ شَيْـًۭٔا وَهُوَ شَرٌّۭ لَّكُمْ ۗ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
كُتِبَ
लिख दिया गया
عَلَيْكُمُ
तुम पर
ٱلْقِتَالُ
जंग करना
وَهُوَ
और वो
كُرْهٌۭ
नापसंदीदा है
لَّكُمْ ۖ
तुम्हारे लिए
وَعَسَىٰٓ
और हो सकता है
أَن
कि
تَكْرَهُوا۟
तुम नापसंद करो
شَيْـًۭٔا
किसी चीज़ को
وَهُوَ
और वो
خَيْرٌۭ
बेहतर हो
لَّكُمْ ۖ
तुम्हारे लिए
وَعَسَىٰٓ
और हो सकता है
أَن
कि
تُحِبُّوا۟
तुम पसंद करो
شَيْـًۭٔا
किसी चीज़ को
وَهُوَ
और वो
شَرٌّۭ
बुरी हो
لَّكُمْ ۗ
तुम्हारे लिए
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَعْلَمُ
जानता है
وَأَنتُمْ
और तुम
لَا
(do) not
تَعْلَمُونَ
नहीं जानते
तुम पर युद्ध अनिवार्य किया गया और वह तुम्हें अप्रिय है, और बहुत सम्भव है कि कोई चीज़ तुम्हें अप्रिय हो और वह तुम्हारे लिए अच्छी हो। और बहुत सम्भव है कि कोई चीज़ तुम्हें प्रिय हो और वह तुम्हारे लिए बुरी हो। और जानता अल्लाह है, और तुम नहीं जानते।"
तफ़्सीर:
(ऐ मोमिनो!) तुमपर अल्लाह के रास्ते में लड़ाई करना अनिवार्य कर दिया गया है, हालाँकि स्वाभाविक रूप से दिल उसे नापसंद करता है; क्योंकि इसमें जान एवं माल दोनों ख़र्च करना पड़ता है। और शायद तुम किसी चीज़ को नापसंद करो और वह वास्तव में तुम्हारे हक़ में बेहतर और लाभदायक हो; जैसे कि अल्लाह के मार्ग में लड़ाई करना। क्योंकि इसके प्रतिफल की महानता के साथ, इसमें शत्रुओं पर विजय और अल्लाह के धर्म की सर्वोपरि है। तथा शायद तुम किसी चीज़ को पसंद करो और वह चीज़ तुम्हारे लिए बुरी और विपत्ति (संकट) का करण हो; जैसे कि जिहाद से पीछे रहना। क्योंकि इसमें निःसहायता और दुश्मनों का प्रभुत्व है। और अल्लाह अच्छी और बुरी बातों को भली-भाँति जानता है, और तुम उसे नहीं जानते, सो तुम उसकी आज्ञा का पालन करो; क्योंकि इसी में तुम्हारे लिए भलाई है।
आयत 217
يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلشَّهْرِ ٱلْحَرَامِ قِتَالٍۢ فِيهِ ۖ قُلْ قِتَالٌۭ فِيهِ كَبِيرٌۭ ۖ وَصَدٌّ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ وَكُفْرٌۢ بِهِۦ وَٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ وَإِخْرَاجُ أَهْلِهِۦ مِنْهُ أَكْبَرُ عِندَ ٱللَّهِ ۚ وَٱلْفِتْنَةُ أَكْبَرُ مِنَ ٱلْقَتْلِ ۗ وَلَا يَزَالُونَ يُقَـٰتِلُونَكُمْ حَتَّىٰ يَرُدُّوكُمْ عَن دِينِكُمْ إِنِ ٱسْتَطَـٰعُوا۟ ۚ وَمَن يَرْتَدِدْ مِنكُمْ عَن دِينِهِۦ فَيَمُتْ وَهُوَ كَافِرٌۭ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ حَبِطَتْ أَعْمَـٰلُهُمْ فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ
يَسْـَٔلُونَكَ
वो सवाल करते हैं आपसे
عَنِ
about
ٱلشَّهْرِ
the month
ٱلْحَرَامِ
हराम महीने के बारे में
قِتَالٍۢ
जंग करना
فِيهِ ۖ
उसमें (कैसा है)
قُلْ
कह दीजिए
قِتَالٌۭ
जंग करना
فِيهِ
उसमें
كَبِيرٌۭ ۖ
बड़ा (गुनाह है)
وَصَدٌّ
और रोकना
عَن
from
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते से
وَكُفْرٌۢ
और कुफ़्र करना
بِهِۦ
उसका
وَٱلْمَسْجِدِ
and (preventing access to) Al-Masjid
ٱلْحَرَامِ
और (रोकना) मस्जिदे हराम से
وَإِخْرَاجُ
और निकालना
أَهْلِهِۦ
उसके रहने वालों को
مِنْهُ
उससे
أَكْبَرُ
ज़्यादा बड़ा (गुनाह) है
عِندَ
near
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के नज़दीक
وَٱلْفِتْنَةُ
और फ़ितना
أَكْبَرُ
ज़्यादा बड़ा है
مِنَ
than
ٱلْقَتْلِ ۗ
क़त्ल से
وَلَا
And not
يَزَالُونَ
और वो हमेशा रहेंगे
يُقَـٰتِلُونَكُمْ
जंग करते तुमसे
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَرُدُّوكُمْ
वो फेर दें तुम्हें
عَن
from
دِينِكُمْ
तुम्हारे दीन से
إِنِ
अगर
ٱسْتَطَـٰعُوا۟ ۚ
वो इस्तिताअत रखें
وَمَن
और जो कोई
يَرْتَدِدْ
फिर जाए
مِنكُمْ
तुममें से
عَن
from
دِينِهِۦ
अपने दीन से
فَيَمُتْ
फिर वो मर जाए
وَهُوَ
इस हाल में कि वो
كَافِرٌۭ
काफ़िर हो
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
حَبِطَتْ
ज़ाया हो गए
أَعْمَـٰلُهُمْ
आमाल उनके
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ
और आख़िरत में
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
أَصْحَـٰبُ
साथी
ٱلنَّارِ ۖ
आग के
هُمْ
वो
فِيهَا
उसमें
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
वे तुमसे आदरणीय महीने में युद्ध के विषय में पूछते है। कहो, "उसमें लड़ना बड़ी गम्भीर बात है, परन्तु अल्लाह के मार्ग से रोकना, उसके साथ अविश्वास करना, मस्जिदे हराम (काबा) से रोकना और उसके लोगों को उससे निकालना, अल्लाह की स्पष्ट में इससे भी अधिक गम्भीर है और फ़ितना (उत्पीड़न), रक्तपात से भी बुरा है।" और उसका बस चले तो वे तो तुमसे बराबर लड़ते रहे, ताकि तुम्हें तुम्हारे दीन (धर्म) से फेर दें। और तुममे से जो कोई अपने दीन से फिर जाए और अविश्वासी होकर मरे, तो ऐसे ही लोग है जिनके कर्म दुनिया और आख़िरत में नष्ट हो गए, और वही आग (जहन्नम) में पड़नेवाले है, वे उसी में सदैव रहेंगे
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) लोग आपसे सम्मानित महीनों : ज़ुल-क़ादा, ज़ुल-ह़िज्जा, मुहर्रम और रजब में युद्ध करने के बारे में पूछते हैं। आप उन्हें जवाब देते हुए कह दीजिए : इन महीनों में युद्ध करना अल्लाह के यहाँ बहुत गंभीर और नापसंदीदा (निंदनीय) है, जिस तरह कि मुश्रिकों का अल्लाह की राह से रोकना भी नापसंदीदा (निंदनीय) है। जबकि मोमिनों को मस्जिदे-हराम से रोकना और मस्जिदे-हराम के वासियों को वहाँ से निकालना अल्लाह के निकट सम्मानित महीनों में युद्ध करने की तुलना में अधिक गंभीर (पाप) है। तथा वह शिर्क जिसमें वे लिप्त हैं, क़त्ल से भी अधिक गंभीर है। तथा ये अनेकेश्वरवादी (मुश्रिक लोग) अपने अत्याचार के उपरांत - ऐ ईमान वालो! - तुमसे लड़ते रहेंगे यहाँ तक कि तुम्हें तुम्हारे सच्चे धर्म से हटाकर अपने असत्य धर्म की ओर फेर दें, यदि वे ऐसा करने में सक्षम हों। परंतु तुममें से जो व्यक्ति अपने धर्म से फिर जाए और अल्लाह के इनकार ही की हालत में मर जाए; तो निश्चय उसका अच्छा कार्य बेकार हो गया और आख़िरत में उसका परिणाम आग में दाख़िल होना और हमेशा के लिए उसी में रहना है।
आयत 218
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَٱلَّذِينَ هَاجَرُوا۟ وَجَـٰهَدُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ أُو۟لَـٰٓئِكَ يَرْجُونَ رَحْمَتَ ٱللَّهِ ۚ وَٱللَّهُ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
هَاجَرُوا۟
हिजरत की
وَجَـٰهَدُوا۟
और जिहाद किया
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
يَرْجُونَ
जो उम्मीद रखते हैं
رَحْمَتَ
(for) Mercy
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह की रहमत की
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
रहे वे लोग जो ईमान लाए और जिन्होंने अल्लाह के मार्ग में घर-बार छोड़ा और जिहाद किया, वहीं अल्लाह की दयालुता की आशा रखते है। निस्संदेह अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
निःसंदेह जो लोग अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाए, और जिन्होंने अपने घर-बार छोड़कर अल्लाह और उसके रसूल की ओर हिजरत की तथा अल्लाह के धर्म को सर्वोच्च करने के लिए जिहाद किया; वही लोग अल्लाह की रहमत और उसकी क्षमा की उम्मीद रखते हैं और अल्लाह अपने बंदों के गुनाहों को बहुत क्षमा करने वाला, उनपर बेहद दया करने वाला है।
आयत 219
۞ يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلْخَمْرِ وَٱلْمَيْسِرِ ۖ قُلْ فِيهِمَآ إِثْمٌۭ كَبِيرٌۭ وَمَنَـٰفِعُ لِلنَّاسِ وَإِثْمُهُمَآ أَكْبَرُ مِن نَّفْعِهِمَا ۗ وَيَسْـَٔلُونَكَ مَاذَا يُنفِقُونَ قُلِ ٱلْعَفْوَ ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمُ ٱلْـَٔايَـٰتِ لَعَلَّكُمْ تَتَفَكَّرُونَ
۞ يَسْـَٔلُونَكَ
वो सवाल करते हैं आपसे
عَنِ
about
ٱلْخَمْرِ
शराब (नशे) के बारे में
وَٱلْمَيْسِرِ ۖ
और जुए के
قُلْ
कह दीजिए
فِيهِمَآ
इन दोनों में
إِثْمٌۭ
गुनाह है
كَبِيرٌۭ
बहुत बड़ा
وَمَنَـٰفِعُ
और कुछ फ़ायदे हैं
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
وَإِثْمُهُمَآ
और गुनाह इन दोनों का
أَكْبَرُ
ज़्यादा बड़ा है
مِن
than
نَّفْعِهِمَا ۗ
इन दोनों के फ़ायदे से
وَيَسْـَٔلُونَكَ
और वो सवाल करते हैं आपसे
مَاذَا
क्या कुछ
يُنفِقُونَ
वो ख़र्च करें
قُلِ
कह दीजिए
ٱلْعَفْوَ ۗ
ज़ाइद अज़ ज़रुरत
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يُبَيِّنُ
वाज़ेह करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْـَٔايَـٰتِ
आयात
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَتَفَكَّرُونَ
तुम ग़ौरो फ़िक्र करो
तुमसे शराब और जुए के विषय में पूछते है। कहो, "उन दोनों चीज़ों में बड़ा गुनाह है, यद्यपि लोगों के लिए कुछ फ़ायदे भी है, परन्तु उनका गुनाह उनके फ़ायदे से कहीं बढकर है।" और वे तुमसे पूछते है, "कितना ख़र्च करें?" कहो, "जो आवश्यकता से अधिक हो।" इस प्रकार अल्लाह दुनिया और आख़िरत के विषय में तुम्हारे लिए अपनी आयते खोल-खोलकर बयान करता है, ताकि तुम सोच-विचार करो।
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) आपके साथी आपसे शराब (अर्थात् हर वह चीज़ जो अक़्ल को ढाँप ले और उससे बुद्धि चली जाए) के बारे में पूछते हैं; वे आपसे उसके पीने, बेचने और खरीदने के हुक्म के बारे में पूछते हैं। तथा वे आपसे जुए के हुक्म के बारे में पूछते हैं (जुआ से अभिप्राय वह धन है जो उन प्रतियोगिताओं के माध्यम से प्राप्त किया जाता है जिनमें प्रतियोगिता में शामिल दोनों पक्षों की ओर से मुआवज़ा रखा जाता है) तो आप उन्हें जवाब देते हुए कह दीजिए : इन दोनों में बहुत-से सांसारिक एवं धार्मिक नुक़सान और बुराइयाँ हैं; जैसे- बुद्धि और धन की हानि, दुश्मनी और द्वेष में पड़ना। जबकि उन दोनों में थोड़े लाभ भी हैं, जैसे- कुछ धन की प्राप्ति। परंतु इनका नुक़सान और इनके द्वारा होने वाला पाप इनके लाभ से अधिक है। और जिस चीज़ का नुक़सान उसके लाभ से अधिक हो; बुद्धिमान व्यक्ति उससे बचता है। अल्लाह की ओर से यह वर्णन शराब के निषेध की प्रस्तावना है। तथा (ऐ नबी!) आपके सह़ाबा आपसे पूछते हैं कि वे अपने धन की कितनी मात्रा स्वेच्छा से और दान के रूप में खर्च करें? आप उन्हें जवाब देते हुए कह दीजिए : अपने धन में से उसे ख़र्च करो, जो तुम्हारी ज़रूरत से अधिक हो। (यह शुरू इस्लाम में था, फिर उसके बाद अल्लाह ने विशिष्ट धनों और निर्धारित निसाबों में अनिवार्य ज़कात का क़ानून बना दिया।) इसी तरह के स्पष्ट बयान के साथ, अल्लाह तुम्हारे लिए शरीयत के आदेशों को बयान करता है, ताकि तुम सोच-विचार करो।
आयत 220
فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۗ وَيَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلْيَتَـٰمَىٰ ۖ قُلْ إِصْلَاحٌۭ لَّهُمْ خَيْرٌۭ ۖ وَإِن تُخَالِطُوهُمْ فَإِخْوَٰنُكُمْ ۚ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ ٱلْمُفْسِدَ مِنَ ٱلْمُصْلِحِ ۚ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ لَأَعْنَتَكُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌۭ
فِى
Concerning
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۗ
और आख़िरत में
وَيَسْـَٔلُونَكَ
और वो सवाल करते हैं आपसे
عَنِ
about
ٱلْيَتَـٰمَىٰ ۖ
यतीमों के बारे में
قُلْ
कह दीजिए
إِصْلَاحٌۭ
इस्लाह करना
لَّهُمْ
उनकी
خَيْرٌۭ ۖ
बेहतर है
وَإِن
और अगर
تُخَالِطُوهُمْ
तुम मिला लो उन्हें
فَإِخْوَٰنُكُمْ ۚ
तो वो भाई हैं तुम्हारे
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَعْلَمُ
जानता है
ٱلْمُفْسِدَ
फ़साद करने वाले को
مِنَ
from
ٱلْمُصْلِحِ ۚ
इस्लाह करने वाले से
وَلَوْ
और अगर
شَآءَ
चाहता
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَأَعْنَتَكُمْ ۚ
अलबत्ता वो मुश्किल में डाल देता तुम्हें
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَزِيزٌ
बहुत ज़बरदस्त है
حَكِيمٌۭ
ख़ूब हिकमत वाला है
और वे तुमसे अनाथों के विषय में पूछते है। कहो, "उनके सुधार की जो रीति अपनाई जाए अच्छी है। और यदि तुम उन्हें अपने साथ सम्मिलित कर लो तो वे तुम्हारे भाई-बन्धु ही हैं। और अल्लाह बिगाड़ पैदा करनेवाले को बचाव पैदा करनेवाले से अलग पहचानता है। और यदि अल्लाह चाहता तो तुमको ज़हमत (कठिनाई) में डाल देता। निस्संदेह अल्लाह प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।"
तफ़्सीर:
यह (उक्त विधान) इसलिए निर्धारित किया गया है ताकि तुम सोच-विचार करो कि दुनिया एवं आख़िरत में कौन-सी चीज़ तुम्हारे लिए लाभदायक है। तथा (ऐ नबी!) आपके साथी आपसे अनाथों के अभिभावक बनने के बारे में पूछते हैं कि : वे उनके साथ कैसा व्यवहार करें? क्या वे अनाथों के धन को ख़र्च, खाने-पीने और रहने-सहने में अपने धन के साथ मिला लें? आप उन्हें जवाब देते हुए कह दीजिए : यदि तुम बिना मुआवज़े के या उनके धन को अपने धन में मिलाए बिना उनके धन के सुधार के लिए काम करो, तो तुम्हारे लिए अल्लाह के निकट सबसे अच्छा और अधिक अज्र व सवाब वाला है, तथा यह उनके लिए उनके धन में उत्तम है; क्योंकि इसमें उनके धन का संरक्षण है। और यदि तुम उनके धन को अपने धन के साथ मिलाकर खाने-पीने और आवास आदि में उनके साथ साझा कर लो; तो इसमें कोई आपत्ति की बात नहीं है। क्योंकि वे तुम्हारे धार्मिक भाई हैं और भाई एक-दूसरे की मदद करते हैं और एक-दूसरे के मामलों की देख-भाल करते हैं। और अल्लाह खूब जानता है कि कौन अभिभावक अनाथों के धन को अपने साथ मिलाकर उसमें सुधार चाहता है और कौन बिगाड़ चाहता है। यदि अल्लाह यतीमों के बारे में तुम्हें परेशानी में डालना चाहता, तो वह तुम्हें अवश्य परेशानी में डाल देता। लेकिन अल्लाह ने तुम्हारे लिए उनके साथ व्यवहार का रास्ता आसान कर दिया; क्योंकि उसकी शरीयत आसानी पर आधारित है। निःसंदेह अल्लाह सब पर प्रभुत्वशाली है, उसे कोई चीज़ परास्त नहीं कर सकती। वह अपनी रचना, प्रबंधन और विधान में हिकमत वाला है।
आयत 221
وَلَا تَنكِحُوا۟ ٱلْمُشْرِكَـٰتِ حَتَّىٰ يُؤْمِنَّ ۚ وَلَأَمَةٌۭ مُّؤْمِنَةٌ خَيْرٌۭ مِّن مُّشْرِكَةٍۢ وَلَوْ أَعْجَبَتْكُمْ ۗ وَلَا تُنكِحُوا۟ ٱلْمُشْرِكِينَ حَتَّىٰ يُؤْمِنُوا۟ ۚ وَلَعَبْدٌۭ مُّؤْمِنٌ خَيْرٌۭ مِّن مُّشْرِكٍۢ وَلَوْ أَعْجَبَكُمْ ۗ أُو۟لَـٰٓئِكَ يَدْعُونَ إِلَى ٱلنَّارِ ۖ وَٱللَّهُ يَدْعُوٓا۟ إِلَى ٱلْجَنَّةِ وَٱلْمَغْفِرَةِ بِإِذْنِهِۦ ۖ وَيُبَيِّنُ ءَايَـٰتِهِۦ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ
وَلَا
और ना
تَنكِحُوا۟
तुम निकाह करो
ٱلْمُشْرِكَـٰتِ
मुशरिका औरतों से
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يُؤْمِنَّ ۚ
वो ईमान ले आऐं
وَلَأَمَةٌۭ
और अलबत्ता लौंडी
مُّؤْمِنَةٌ
मोमिना
خَيْرٌۭ
बेहतर है
مِّن
than
مُّشْرِكَةٍۢ
मुशरिका औरत से
وَلَوْ
और अगरचे
أَعْجَبَتْكُمْ ۗ
वो अच्छी लगे तुम्हें
وَلَا
और ना
تُنكِحُوا۟
तुम निकाह करके दो
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिक मर्दों को
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يُؤْمِنُوا۟ ۚ
वो ईमान ले आऐं
وَلَعَبْدٌۭ
और अलबत्ता ग़ुलाम
مُّؤْمِنٌ
मोमिन
خَيْرٌۭ
बेहतर है
مِّن
than
مُّشْرِكٍۢ
मुशरिक मर्द से
وَلَوْ
और अगरचे
أَعْجَبَكُمْ ۗ
वो अच्छा लगे तुम्हें
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
يَدْعُونَ
जो बुलाते हैं
إِلَى
to
ٱلنَّارِ ۖ
तरफ़ आग के
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَدْعُوٓا۟
बुलाता है
إِلَى
to
ٱلْجَنَّةِ
तरफ़ जन्नत के
وَٱلْمَغْفِرَةِ
और बख़्शिश के
بِإِذْنِهِۦ ۖ
अपने इज़्न से
وَيُبَيِّنُ
और वो वाज़ेह करता है
ءَايَـٰتِهِۦ
आयात अपनी
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَتَذَكَّرُونَ
वो नसीहत पकड़ें
और मुशरिक (बहुदेववादी) स्त्रियों से विवाह न करो जब तक कि वे ईमान न लाएँ। एक ईमानदारी बांदी (दासी), मुशरिक स्त्री से कहीं उत्तम है; चाहे वह तुम्हें कितनी ही अच्छी क्यों न लगे। और न (ईमानवाली स्त्रियाँ) मुशरिक पुरुषों से विवाह करो, जब तक कि वे ईमान न लाएँ। एक ईमानवाला गुलाम आज़ाद मुशरिक से कहीं उत्तम है, चाहे वह तुम्हें कितना ही अच्छा क्यों न लगे। ऐसे लोग आग (जहन्नम) की ओर बुलाते है और अल्लाह अपनी अनुज्ञा से जन्नत और क्षमा की ओर बुलाता है। और वह अपनी आयतें लोगों के सामने खोल-खोलकर बयान करता है, ताकि वे चेतें
तफ़्सीर:
(ऐ मोमिनो!) अल्लाह के साथ शिर्क करने वाली स्त्रियों से शादी न करो, यहाँ तक कि वे एक अल्लाह पर ईमान ले आएँ और इस्लाम में प्रवेश कर जाएँ। निश्चय अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रखने वाली दासी, एक मूर्ति की पूजा करने वाली आज़ाद स्त्री से उत्तम है, भले ही वह अपनी सुंदरता और धन के कारण आपको पसंद हो। इसी तरह मुसलमान स्त्रियों का निकाह मुश्रिक मर्दों से न करो, निश्चय अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास रखने वाला एक मोमिन ग़ुलाम, एक आज़ाद मुश्रिक से उत्तम है, भले ही वह तुम्हें अच्छा लगे। ये शिर्क में लिप्त लोग - पुरुष और महिलाएँ - अपने शब्दों और कार्यों के साथ उसकी ओर बुलाते हैं, जो जहन्नम में प्रवेश करने की ओर ले जाता है। जबकि अल्लाह अच्छे कार्यों की ओर बुलाता है, जो उसकी अनुमति और अनुग्रह से जन्नत में प्रवेश करने और पापों की क्षमा का कारण बनते हैं। तथा वह अपनी आयतों को लोगों के लिए स्पष्ट करता है, ताकि वे उसपर विचार कर सकें जो उनसे इंगित होता है, फिर उसके अनुसार कार्य करें।
आयत 222
وَيَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلْمَحِيضِ ۖ قُلْ هُوَ أَذًۭى فَٱعْتَزِلُوا۟ ٱلنِّسَآءَ فِى ٱلْمَحِيضِ ۖ وَلَا تَقْرَبُوهُنَّ حَتَّىٰ يَطْهُرْنَ ۖ فَإِذَا تَطَهَّرْنَ فَأْتُوهُنَّ مِنْ حَيْثُ أَمَرَكُمُ ٱللَّهُ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلتَّوَّٰبِينَ وَيُحِبُّ ٱلْمُتَطَهِّرِينَ
وَيَسْـَٔلُونَكَ
और वो सवाल करते हैं आपसे
عَنِ
about
ٱلْمَحِيضِ ۖ
हैज़ के बारे में
قُلْ
कह दीजिए
هُوَ
वो
أَذًۭى
अज़ियत है
فَٱعْتَزِلُوا۟
तो अलग रहो
ٱلنِّسَآءَ
औरतों से
فِى
during
ٱلْمَحِيضِ ۖ
हैज़ में
وَلَا
और ना
تَقْرَبُوهُنَّ
तुम क़रीब जाओ उनके
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَطْهُرْنَ ۖ
वो पाक हो जाऐं
فَإِذَا
फिर जब
تَطَهَّرْنَ
वो अच्छी तरह पाक हो जाऐं
فَأْتُوهُنَّ
तो आओ उनके पास
مِنْ
from
حَيْثُ
जहाँ से
أَمَرَكُمُ
हुक्म दिया तुम्हें
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह ने
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يُحِبُّ
मोहब्बत रखता है
ٱلتَّوَّٰبِينَ
बहुत तौबा करने वालों से
وَيُحِبُّ
और मोहब्बत रखता है
ٱلْمُتَطَهِّرِينَ
पाक साफ़ रहने वालों से
और वे तुमसे मासिक-धर्म के विषय में पूछते है। कहो, "वह एक तकलीफ़ और गन्दगी की चीज़ है। अतः मासिक-धर्म के दिनों में स्त्रियों से अलग रहो और उनके पास न जाओ, जबतक कि वे पाक-साफ़ न हो जाएँ। फिर जब वे भली-भाँति पाक-साफ़ हो जाए, तो जिस प्रकार अल्लाह ने तुम्हें बताया है, उनके पास आओ। निस्संदेह अल्लाह बहुत तौबा करनेवालों को पसन्द करता है और वह उन्हें पसन्द करता है जो स्वच्छता को पसन्द करते है
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) आपके साथी आपसे मासिक धर्म (यह एक प्राकृतिक रक्त है जो विशिष्ट समय पर महिला के गर्भाशय से निकलता है) के बारे में पूछते हैं। आप उन्हें जवाब देते हुए कह दीजिए : मासिक धर्म पुरुष और महिला दोनों के लिए कष्टदायक (हानिकारक) है, इसलिए उसके समय पर महिलाओं के साथ संभोग करने से बचो, तथा संभोग के उद्देश्य से उनके पास न जाओ, यहाँ तक कि उनका रक्त बंद हो जाए और वे स्नान करके उससे अच्छी तरह पाक-साफ़ हो जाएँ। जब रक्त बंद हो जाए और वे उससे पवित्र हो जाएँ, तो उनसे उस तरीक़े से संभोग करो, जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए अनुमेय किया है : इस हाल में कि वे पाक हों और उनकी योनि में संभोग किया जाए। अल्लाह उन लोगों से प्रेम करता है, जो गुनाहों से बहुत ज़्यादा तौबा करने वाले और गंदगियों से पवित्रता हासिल करने में अतिशयोक्ति से काम लेने वाले हैं।
आयत 223
نِسَآؤُكُمْ حَرْثٌۭ لَّكُمْ فَأْتُوا۟ حَرْثَكُمْ أَنَّىٰ شِئْتُمْ ۖ وَقَدِّمُوا۟ لِأَنفُسِكُمْ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّكُم مُّلَـٰقُوهُ ۗ وَبَشِّرِ ٱلْمُؤْمِنِينَ
نِسَآؤُكُمْ
औरतें तुम्हारी
حَرْثٌۭ
खेती हैं
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
فَأْتُوا۟
तो आओ
حَرْثَكُمْ
अपनी खेती में
أَنَّىٰ
जिस तरह
شِئْتُمْ ۖ
चाहो तुम
وَقَدِّمُوا۟
और आगे भेजो
لِأَنفُسِكُمْ ۚ
अपने नफ़्सों के लिए
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَٱعْلَمُوٓا۟
और जान लो
أَنَّكُم
बेशक तुम
مُّلَـٰقُوهُ ۗ
मुलाक़ात करने वाले हो उससे
وَبَشِّرِ
और ख़ुशख़बरी दे दीजिए
ٱلْمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वालों को
तुम्हारी स्त्रियों तुम्हारी खेती है। अतः जिस प्रकार चाहो तुम अपनी खेती में आओ और अपने लिए आगे भेजो; और अल्लाह से डरते रहो; भली-भाँति जान ले कि तुम्हें उससे मिलना है; और ईमान लानेवालों को शुभ-सूचना दे दो
तफ़्सीर:
तुम्हारी पत्नियाँ तुम्हारे लिए रोपण स्थान हैं, वे तुम्हारे लिए बच्चे जनती हैं; वैसे ही जैसे भूमि फल देती है। इसलिए रोपने के स्थान पर - जो कि योनि है - जिस दिशा से भी चाहो और जिस तरह भी चाहो आओ, बशर्ते कि वह योनि में हो। तथा अपने लिए अच्छे कार्य आगे भेजो, जिसमें यह भी शामिल है कि आदमी अपनी पत्नी के साथ अल्लाह की निकटता प्राप्त करने और नेक संतान की उम्मीद में संभोग करे। तथा अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, उससे डरो। जिसमें वह भी शामिल है जो उसने महिलाओं के बारे में तुम्हारे लिए निर्धारित किया है। और जान लो कि तुम क़ियामत के दिन उससे मिलने वाले हो, उसके सामने खड़े होने वाले हो और वह तुम्हें तुम्हारे कार्यों का बदला देने वाला है। और - ऐ नबी! - मोमिनों को शुभ समाचार सुना दीजिए कि उन्हें अपने पालनहार से मुलाक़ात के समय हमेशा बाक़ी रहने वाली नेमतें मिलेंगी और अल्लाह के सम्मानित चेहरे को देखने का सौभाग्य प्राप्त होगा।
आयत 224
وَلَا تَجْعَلُوا۟ ٱللَّهَ عُرْضَةًۭ لِّأَيْمَـٰنِكُمْ أَن تَبَرُّوا۟ وَتَتَّقُوا۟ وَتُصْلِحُوا۟ بَيْنَ ٱلنَّاسِ ۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌۭ
وَلَا
और ना
تَجْعَلُوا۟
तुम बनाओ
ٱللَّهَ
अल्लाह को
عُرْضَةًۭ
आड़
لِّأَيْمَـٰنِكُمْ
अपनी क़समों के लिए
أَن
कि
تَبَرُّوا۟
तुम नेकी करोगे (ना)
وَتَتَّقُوا۟
और (ना) तुम तक़वा करोगे
وَتُصْلِحُوا۟
और (ना) तुम सुलाह कराओगे
بَيْنَ
दर्मियान
ٱلنَّاسِ ۗ
लोगों के
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
سَمِيعٌ
ख़ूब सुनने वाला है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
अपने नेक और धर्मपरायण होने और लोगों के मध्य सुधारक होने के सिलसिले में अपनी क़समों के द्वारा अल्लाह को आड़ और निशाना न बनाओ कि इन कामों को छोड़ दो। अल्लाह सब कुछ सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
अल्लाह की क़सम को नेकी करने, परहेज़गारी तथा लोगों के बीच मेल-मिलाप कराने के विरुद्ध तर्क मत बनाओ। बल्कि अगर तुम भलाई न करने की क़सम खा लो; तो भलाई का कार्य करो और अपनी क़समों का कफ़्फ़ारा अदा कर दो। तथा अल्लाह तुम्हारी बातों को सुनने वाला, तुम्हारे कार्यों को जानने वाला है, और वह तुम्हें उनका बदला देगा।
आयत 225
لَّا يُؤَاخِذُكُمُ ٱللَّهُ بِٱللَّغْوِ فِىٓ أَيْمَـٰنِكُمْ وَلَـٰكِن يُؤَاخِذُكُم بِمَا كَسَبَتْ قُلُوبُكُمْ ۗ وَٱللَّهُ غَفُورٌ حَلِيمٌۭ
لَّا
Not
يُؤَاخِذُكُمُ
नहीं मुआख़्ज़ा करेगा तुम्हारा
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِٱللَّغْوِ
साथ लग़्व के
فِىٓ
in
أَيْمَـٰنِكُمْ
तुम्हारी क़समों के
وَلَـٰكِن
और लेकिन
يُؤَاخِذُكُم
वो मुआख़्ज़ा करेगा तुम्हारा
بِمَا
बवजह उसके जो
كَسَبَتْ
कमाया
قُلُوبُكُمْ ۗ
तुम्हारे दिलों ने
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
غَفُورٌ
बहुत बख़्शने वाला है
حَلِيمٌۭ
बहुत हिल्म वाला है
अल्लाह तुम्हें तुम्हारी ऐसी कसमों पर नहीं पकड़ेगा जो यूँ ही मुँह से निकल गई हो, लेकिन उन क़समों पर वह तुम्हें अवश्य पकड़ेगा जो तुम्हारे दिल के इरादे का नतीजा हों। अल्लाह बहुत क्षमा करनेवाला, सहनशील है
तफ़्सीर:
अल्लाह तुम्हें उन क़समों के कारण नहीं पकड़ता, जो बिना इरादे के तुम्हारी ज़बानों पर आ जाती हैं, जैसे तुममें से किसी व्यक्ति का : 'ला वल्लाह' (नहीं, अल्लाह की क़सम!) और 'बला वल्लाह' (हाँ, अल्लाह की क़सम!) कहना। इन क़समों में तुमपर न कोई कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) है और न कोई दंड। परंतु उन क़समों में से जिसका तुमने इरादा किया है, उसपर वह तुम्हारी पकड़ करेगा। तथा अल्लाह अपने बंदों के गुनाहों को बहुत क्षमा करने वाला, अत्यंत सहनशील है, उन्हें सज़ा देने में जल्दी नहीं करता।
आयत 226
لِّلَّذِينَ يُؤْلُونَ مِن نِّسَآئِهِمْ تَرَبُّصُ أَرْبَعَةِ أَشْهُرٍۢ ۖ فَإِن فَآءُو فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
لِّلَّذِينَ
उन लोगों के लिए जो
يُؤْلُونَ
इला करते हैं
مِن
from
نِّسَآئِهِمْ
अपनी औरतों से
تَرَبُّصُ
इन्तिज़ार करना है
أَرْبَعَةِ
चार
أَشْهُرٍۢ ۖ
महीने
فَإِن
फिर अगर
فَآءُو
वो रुजु कर लें
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
जो लोग अपनी स्त्रियों से अलग रहने की क़सम खा बैठें, उनके लिए चार महीने की प्रतिक्षा है। फिर यदि वे पलट आएँ, तो अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
जो लोग अपनी पत्नियों से संभोग न करने की क़सम खा लेते हैं, उन्हें क़सम खाने के समय से लेकर अधिकतम चार महीने तक प्रतीक्षा करना है। जिसे 'ईला' के नाम से जाना जाता है। यदि वे संभोग न करने की क़सम खाने के बाद चार महीने या उससे कम की अवधि के भीतर अपनी पत्नियों के साथ संभोग करने की ओर वापस लौट आएँ; तो अल्लाह बहुत क्षमा करने वाला है, जो कुछ उनसे हुआ है (अल्लाह) उसे उनके लिए क्षमा कर देगा, तथा उनपर बहुत दया करने वाला है क्योंकि उसने उनके लिए इस क़सम से बाहर निकलने के लिए कफ़्फ़ारा निर्धारित किया है।
आयत 227
وَإِنْ عَزَمُوا۟ ٱلطَّلَـٰقَ فَإِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌۭ
وَإِنْ
और अगर
عَزَمُوا۟
वो अज़म कर लें
ٱلطَّلَـٰقَ
तलाक़ का
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
سَمِيعٌ
ख़ूब सुनने वाला है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
और यदि वे तलाक़ ही की ठान लें, तो अल्लाह भी सुननेवाला भली-भाँति जाननेवाला है
तफ़्सीर:
तथा यदि वे अपनी स्त्रियों के साथ संभोग को छोड़ना जारी रखते हुए और उसकी ओर वापस न लौटकर तलाक़ का इरादा कर लें, तो अल्लाह उनकी बातों को सुनने वाला है, जिनमें से तलाक़ भी शामिल है, उनकी स्थितियों और उनके इरादों को जानता है और उन्हें उनका बदला देगा।
आयत 228
وَٱلْمُطَلَّقَـٰتُ يَتَرَبَّصْنَ بِأَنفُسِهِنَّ ثَلَـٰثَةَ قُرُوٓءٍۢ ۚ وَلَا يَحِلُّ لَهُنَّ أَن يَكْتُمْنَ مَا خَلَقَ ٱللَّهُ فِىٓ أَرْحَامِهِنَّ إِن كُنَّ يُؤْمِنَّ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۚ وَبُعُولَتُهُنَّ أَحَقُّ بِرَدِّهِنَّ فِى ذَٰلِكَ إِنْ أَرَادُوٓا۟ إِصْلَـٰحًۭا ۚ وَلَهُنَّ مِثْلُ ٱلَّذِى عَلَيْهِنَّ بِٱلْمَعْرُوفِ ۚ وَلِلرِّجَالِ عَلَيْهِنَّ دَرَجَةٌۭ ۗ وَٱللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ
وَٱلْمُطَلَّقَـٰتُ
और जो तलाक़ याफ़्ता औरतें हैं
يَتَرَبَّصْنَ
वो इन्तिज़ार में रखें
بِأَنفُسِهِنَّ
अपने आपको
ثَلَـٰثَةَ
तीन
قُرُوٓءٍۢ ۚ
हैज़ / तोहर
وَلَا
और नहीं
يَحِلُّ
हलाल
لَهُنَّ
उनके लिए
أَن
कि
يَكْتُمْنَ
वो छुपाऐं
مَا
जो
خَلَقَ
पैदा किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
فِىٓ
in
أَرْحَامِهِنَّ
उनके रहमों में
إِن
अगर
كُنَّ
हैं वो
يُؤْمِنَّ
वो ईमान रखतीं
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَٱلْيَوْمِ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرِ ۚ
और आख़िरी दिन पर
وَبُعُولَتُهُنَّ
और शौहर उनके
أَحَقُّ
ज़्यादा हक़दार हैं
بِرَدِّهِنَّ
उनको लौटाने के
فِى
in
ذَٰلِكَ
उसमें
إِنْ
अगर
أَرَادُوٓا۟
वो इरादा करें
إِصْلَـٰحًۭا ۚ
इस्लाह का
وَلَهُنَّ
और उनके लिए है
مِثْلُ
मानिन्द
ٱلَّذِى
उसके जो
عَلَيْهِنَّ
उनके ज़िम्मा है
بِٱلْمَعْرُوفِ ۚ
साथ मारूफ़ तरीक़े के
وَلِلرِّجَالِ
और मर्दों के लिए
عَلَيْهِنَّ
उन (औरतों) पर
دَرَجَةٌۭ ۗ
एक दर्जा है
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَزِيزٌ
बहुत ज़बरदस्त है
حَكِيمٌ
बहुत हिकमत वाला है
और तलाक़ पाई हुई स्त्रियाँ तीन हैज़ (मासिक-धर्म) गुज़रने तक अपने-आप को रोके रखे, और यदि वे अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखती है तो उनके लिए यह वैध न होगा कि अल्लाह ने उनके गर्भाशयों में जो कुछ पैदा किया हो उसे छिपाएँ। इस बीच उनके पति, यदि सम्बन्धों को ठीक कर लेने का इरादा रखते हों, तो वे उन्हें लौटा लेने के ज़्यादा हक़दार है। और उन पत्नियों के भी सामान्य नियम के अनुसार वैसे ही अधिकार हैं, जैसी उन पर ज़िम्मेदारियाँ डाली गई है। और पतियों को उनपर एक दर्जा प्राप्त है। अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
तलाक़शुदा औरतें तीन मासिक धर्म तक प्रतीक्षा करेंगी, जिसके दौरान वे शादी नहीं करेंगी। तथा उनके लिए यह जायज़ नहीं है कि वे उस गर्भ को छिपाएँ, जो अल्लाह ने उनके गर्भाशयों में पैदा किया है, यदि वे अल्लाह तथा अंतिम दिन पर अपने ईमान में सच्ची हैं। तथा उन्हें तलाक़ देने वाले उनके पतियों को प्रतीक्षा अवधि के दौरान उन्हें लौटाने का अधिक अधिकार है, यदि उनके लौटाने का उद्देश्य प्यार-मोहब्बत (से रहना) और तलाक़ के कारण पैदा होने वाले मनमुटाव को दूर करना हो। तथा पत्नियों के लिए भी परंपरा के अनुसार उसी प्रकार अधिकार और कर्तव्य हैं, जिस तरह उनके पतियों के लिए उनके ऊपर हैं। जबकि पुरुषों को स्त्रियों पर एक दर्जा (वरीयता) प्राप्त है, जैसे संरक्षकता और तलाक़ का अधिकार। और अल्लाह सब पर प्रभुत्वशाली है, उसे कोई चीज़ परास्त नहीं कर सकती। वह अपनी शरीयत (विधान) और प्रबंधन में हिकमत वाला है।
आयत 229
ٱلطَّلَـٰقُ مَرَّتَانِ ۖ فَإِمْسَاكٌۢ بِمَعْرُوفٍ أَوْ تَسْرِيحٌۢ بِإِحْسَـٰنٍۢ ۗ وَلَا يَحِلُّ لَكُمْ أَن تَأْخُذُوا۟ مِمَّآ ءَاتَيْتُمُوهُنَّ شَيْـًٔا إِلَّآ أَن يَخَافَآ أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ ٱللَّهِ ۖ فَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا يُقِيمَا حُدُودَ ٱللَّهِ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا فِيمَا ٱفْتَدَتْ بِهِۦ ۗ تِلْكَ حُدُودُ ٱللَّهِ فَلَا تَعْتَدُوهَا ۚ وَمَن يَتَعَدَّ حُدُودَ ٱللَّهِ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ
ٱلطَّلَـٰقُ
तलाक़
مَرَّتَانِ ۖ
दो बार है
فَإِمْسَاكٌۢ
फिर रोक लेना है
بِمَعْرُوفٍ
साथ भले तरीक़े के
أَوْ
या
تَسْرِيحٌۢ
रुख़्सत कर देना है
بِإِحْسَـٰنٍۢ ۗ
साथ एहसान के
وَلَا
और नहीं
يَحِلُّ
हलाल हो सकता
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
أَن
कि
تَأْخُذُوا۟
तुम ले लो
مِمَّآ
उसमें से जो
ءَاتَيْتُمُوهُنَّ
दे दिया है तुमने उन्हें
شَيْـًٔا
कुछ भी
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
يَخَافَآ
वो दोनों डरें
أَلَّا
कि ना
يُقِيمَا
वो दोनों क़ायम रख सकेंगे
حُدُودَ
हुदूद को
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह की
فَإِنْ
फिर अगर
خِفْتُمْ
ख़ौफ़ खाओ तुम
أَلَّا
कि ना
يُقِيمَا
वो दोनों क़ायम रख सकेंगे
حُدُودَ
हुदूद को
ٱللَّهِ
अल्लाह की
فَلَا
तो नहीं
جُنَاحَ
कोई गुनाह
عَلَيْهِمَا
उन दोनो पर
فِيمَا
उस (चीज़) में जो
ٱفْتَدَتْ
वो औरत फ़िदया दे दे
بِهِۦ ۗ
साथ उस (माल) के
تِلْكَ
ये
حُدُودُ
हुदूद हैं
ٱللَّهِ
अल्लाह की
فَلَا
तो ना
تَعْتَدُوهَا ۚ
तुम तजावुज़ करना उनसे
وَمَن
और जो कोई
يَتَعَدَّ
तजावुज़ करेगा
حُدُودَ
हुदूद से
ٱللَّهِ
अल्लाह की
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلظَّـٰلِمُونَ
जो ज़ालिम हैं
तलाक़ दो बार है। फिर सामान्य नियम के अनुसार (स्त्री को) रोक लिया जाए या भले तरीक़े से विदा कर दिया जाए। और तुम्हारे लिए वैध नहीं है कि जो कुछ तुम उन्हें दे चुके हो, उसमें से कुछ ले लो, सिवाय इस स्थिति के कि दोनों को डर हो कि अल्लाह की (निर्धारित) सीमाओं पर क़ायम न रह सकेंगे तो यदि तुमको यह डर हो कि वे अल्लाह की सीमाओ पर क़ायम न रहेंगे तो स्त्री जो कुछ देकर छुटकारा प्राप्त करना चाहे उसमें उन दोनो के लिए कोई गुनाह नहीं। ये अल्लाह की सीमाएँ है। अतः इनका उल्लंघन न करो। और जो कोई अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करे तो ऐसे लोग अत्याचारी है
तफ़्सीर:
ऐसा तलाक़ जिसमें पति अपनी पत्नी को लौटाने का अधिकार रखता है, दो बार है। इस प्रकार कि वह तलाक़ दे, फिर लौटा ले, फिर (दूसरी बार) तलाक़ दे, फिर लौटा ले। फिर दो तलाक़ों के बाद या तो उसे अच्छे सहवास के साथ अपने पत्नीत्व में रखे, या उसके साथ भलाई करते हुए और उसके अधिकारों को पूरा करते हुए उसे तीसरा तलाक़ दे दे। तथा - ऐ पतियो! - तुम्हारे लिए अपनी पत्नियों को दी हुई महर में से कुछ भी लेना हलाल नहीं है। हाँ, यदि पत्नी अपने पति को उसके चरित्र अथवा रंग-रूप के कारण नापसंद करती हो और दंपति इस नफरत के कारण सोचते हैं कि वे अपने अधिकारों को पूरा नहीं कर सकेंगे, तो वे अपना मामला उस व्यक्ति के सामने पेश करें जिसके साथ उनकी रिश्तेदारी या संबंध हो। अब अगर अभिभावकों को डर है कि वे दोनों आपस में अपने वैवाहिक अधिकारों को पूरा नहीं कर सकेंगे, तो दोनों पर कोई पाप नहीं है कि पत्नी अपने पति को उसे अलग करने के बदले में कुछ धन भुगतान करके ख़ुला' ले ले। ये शरई अहकाम, हलाल एवं हराम (अनुमेय और निषिद्ध) के बीच विभाजक हैं, इसलिए उनसे आगे न बढ़ो, और जो कोई भी हलाल एवं हराम के बीच अल्लाह की सीमाओं को पार करता है; तो वही लोग अपने आपको विनाश के साधनों पर लाकर और उन्हें अल्लाह के क्रोध और दंड का भागी बनाकर स्वयं पर अत्याचार करने वाले हैं।
आयत 230
فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا تَحِلُّ لَهُۥ مِنۢ بَعْدُ حَتَّىٰ تَنكِحَ زَوْجًا غَيْرَهُۥ ۗ فَإِن طَلَّقَهَا فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَآ أَن يَتَرَاجَعَآ إِن ظَنَّآ أَن يُقِيمَا حُدُودَ ٱللَّهِ ۗ وَتِلْكَ حُدُودُ ٱللَّهِ يُبَيِّنُهَا لِقَوْمٍۢ يَعْلَمُونَ
فَإِن
फिर अगर
طَلَّقَهَا
वो तलाक़ दे दे उसे
فَلَا
तो नहीं
تَحِلُّ
वो हलाल हो सकती
لَهُۥ
उसके लिए
مِنۢ
from
بَعْدُ
बाद इसके
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
تَنكِحَ
वो निकाह कर ले
زَوْجًا
शौहर से
غَيْرَهُۥ ۗ
उसके अलावा
فَإِن
फिर अगर
طَلَّقَهَا
वो तलाक़ दे दे उसे
فَلَا
तो नहीं
جُنَاحَ
कोई गुनाह
عَلَيْهِمَآ
उन दोनों पर
أَن
ये कि
يَتَرَاجَعَآ
वो बाहम रुजू कर लें
إِن
अगर
ظَنَّآ
वो दोनों समझें
أَن
कि
يُقِيمَا
वो दोनों क़ायम रखेंगे
حُدُودَ
हुदूद को
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह की
وَتِلْكَ
और ये
حُدُودُ
हुदूद हैं
ٱللَّهِ
अल्लाह की
يُبَيِّنُهَا
वो वाज़ेह करता है उन्हें
لِقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَعْلَمُونَ
जो इल्म रखते हैं
(दो तलाक़ो के पश्चात) फिर यदि वह उसे तलाक़ दे दे, तो इसके पश्चात वह उसके लिए वैध न होगी, जबतक कि वह उसके अतिरिक्त किसी दूसरे पति से निकाह न कर ले। अतः यदि वह उसे तलाक़ दे दे तो फिर उन दोनों के लिए एक-दूसरे को पलट आने में कोई गुनाह न होगा, यदि वे समझते हो कि अल्लाह की सीमाओं पर क़ायम रह सकते है। और ये अल्लाह कि निर्धारित की हुई सीमाएँ है, जिन्हें वह उन लोगों के लिए बयान कर रहा है जो जानना चाहते हो
तफ़्सीर:
यदि उसका पति उसे तीसरा तलाक़ दे दे, तो पति के लिए उससे पुनर्विवाह करने की अनुमति नहीं है, यहाँ तक कि वह स्त्री किसी अन्य पुरुष से विवाह करे, जो (जीवन बसर करने की) इच्छा से, एक वैध विवाह हो, (प्रथम पति के लिए) हलाल करने के उद्देश्य से न हो, और वह इस विवाह में उसके साथ संभोग करे। फिर यदि दूसरा पति उसे तलाक़ दे दे या मर जाए; तो उस स्त्री और उसके प्रथम पति पर कोई पाप नहीं है कि वे एक नए अनुबंध और नयी महर के साथ आपस में रुजू' (दोबारा मिलाप) कर लें, अगर उन्हें प्रबल गुमान है कि वे अपने प्रति अनिवार्य शरई नियमों का पालन करेंगे। इन शरई नियमों को अल्लाह उन लोगों के लिए खोलकर बयान करता है, जो उसके नियमों और सीमाओं को जानते हैं; क्योंकि वही लोग इनसे लाभ उठाते हैं।
आयत 231
وَإِذَا طَلَّقْتُمُ ٱلنِّسَآءَ فَبَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَأَمْسِكُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍ أَوْ سَرِّحُوهُنَّ بِمَعْرُوفٍۢ ۚ وَلَا تُمْسِكُوهُنَّ ضِرَارًۭا لِّتَعْتَدُوا۟ ۚ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ فَقَدْ ظَلَمَ نَفْسَهُۥ ۚ وَلَا تَتَّخِذُوٓا۟ ءَايَـٰتِ ٱللَّهِ هُزُوًۭا ۚ وَٱذْكُرُوا۟ نِعْمَتَ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ وَمَآ أَنزَلَ عَلَيْكُم مِّنَ ٱلْكِتَـٰبِ وَٱلْحِكْمَةِ يَعِظُكُم بِهِۦ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌۭ
وَإِذَا
और जब
طَلَّقْتُمُ
तुम तलाक़ दे दो
ٱلنِّسَآءَ
औरतों को
فَبَلَغْنَ
फिर वो पहुँचें
أَجَلَهُنَّ
अपनी मुद्दत को
فَأَمْسِكُوهُنَّ
तो रोक लो उन्हें
بِمَعْرُوفٍ
साथ भले तरीक़े के
أَوْ
या
سَرِّحُوهُنَّ
रुख़्सत कर दो उन्हें
بِمَعْرُوفٍۢ ۚ
साथ भले तरीक़े के
وَلَا
और ना
تُمْسِكُوهُنَّ
तुम रोके रखो उन्हें
ضِرَارًۭا
तकलीफ़ देने के लिए
لِّتَعْتَدُوا۟ ۚ
ताकि तुम ज़्यादती करो
وَمَن
और जो कोई
يَفْعَلْ
करेगा
ذَٰلِكَ
ऐसा
فَقَدْ
तो तहक़ीक
ظَلَمَ
उसने ज़ुल्म किया
نَفْسَهُۥ ۚ
अपने नफ़्स पर
وَلَا
और ना
تَتَّخِذُوٓا۟
तुम बनाओ
ءَايَـٰتِ
(the) Verses
ٱللَّهِ
अल्लाह की आयात को
هُزُوًۭا ۚ
मज़ाक़
وَٱذْكُرُوا۟
और याद करो
نِعْمَتَ
नेअमत
ٱللَّهِ
अल्लाह की
عَلَيْكُمْ
जो तुम पर है
وَمَآ
और जो
أَنزَلَ
उसने नाज़िल किया
عَلَيْكُم
तुम पर
مِّنَ
of
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब से
وَٱلْحِكْمَةِ
और हिकमत से
يَعِظُكُم
वो नसीहत करता है तुम्हें
بِهِۦ ۚ
साथ उसके
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَٱعْلَمُوٓا۟
और जान लो
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ को
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
और यदि जब तुम स्त्रियों को तलाक़ दे दो और वे अपनी निश्चित अवधि (इद्दत) को पहुँच जाएँ, जो सामान्य नियम के अनुसार उन्हें रोक लो या सामान्य नियम के अनुसार उन्हें विदा कर दो। और तुम उन्हें नुक़सान पहुँचाने के ध्येय से न रोको कि ज़्यादती करो। और जो ऐसा करेगा, तो उसने स्वयं अपने ही ऊपर ज़ुल्म किया। और अल्लाह की आयतों को परिहास का विषय न बनाओ, और अल्लाह की कृपा जो तुम पर हुई है उसे याद रखो और उस किताब और तत्वदर्शिता (हिकमत) को याद रखो जो उसने तुम पर उतारी है, जिसके द्वारा वह तुम्हें नसीहत करता है। और अल्लाह का डर रखो और भली-भाँति जान लो कि अल्लाह हर चीज को जाननेवाला है
तफ़्सीर:
जब तुम अपनी पत्नियों को तलाक़ दे दो और वे अपनी प्रतीक्षा अवधि के अंत होने के क़रीब हो जाएँ; तो तुम्हारे लिए अनुमेय है कि उन्हें लौटा लो, अथवा उन्हें बिना लौटाए उचित तरीक़े से छोड़ दो यहाँ तक कि उनकी इद्दत ख़त्म हो जाए। तथा उनपर अत्याचार करने और उन्हें नुक़सान पहुँचाने के उद्देश्य से न लौटाओ, जैसा कि जाहिलिय्यत (पूर्व-इस्लामिक युग) में किया जाता था। जो कोई भी ऐसा उन्हें नुक़सान पहुँचाने के इरादे से करे; तो निश्चय उसने अपने आपको पाप और दंड का भागी बनाकर खुद पर अत्याचार किया। तथा अल्लाह की आयतों को उनके साथ खिलवाड़ करके और उनके विरुद्ध साहस दिखाकर उपहास का विषय न बनाओ। और अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों को याद करो, जिनमें से सबसे बड़ी नेमत उसका तुमपर क़ुरआन एवं सुन्नत का उतारना है। वह तुम्हें इसके द्वारा प्रलोभन और धमकी के रूप में उपदेश देता है। तथा अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, डरो और जान लो कि अल्लाह हर चीज़ को जानने वाला है। अतः उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है और वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों का बदला देगा।
आयत 232
وَإِذَا طَلَّقْتُمُ ٱلنِّسَآءَ فَبَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا تَعْضُلُوهُنَّ أَن يَنكِحْنَ أَزْوَٰجَهُنَّ إِذَا تَرَٰضَوْا۟ بَيْنَهُم بِٱلْمَعْرُوفِ ۗ ذَٰلِكَ يُوعَظُ بِهِۦ مَن كَانَ مِنكُمْ يُؤْمِنُ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۗ ذَٰلِكُمْ أَزْكَىٰ لَكُمْ وَأَطْهَرُ ۗ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
وَإِذَا
और जब
طَلَّقْتُمُ
तलाक़ दे दो तुम
ٱلنِّسَآءَ
औरतों को
فَبَلَغْنَ
फिर वो पहुँचें
أَجَلَهُنَّ
अपनी मुद्दत को
فَلَا
तो ना
تَعْضُلُوهُنَّ
तुम रोको उन्हें
أَن
कि
يَنكِحْنَ
वो निकाह कर लें
أَزْوَٰجَهُنَّ
अपने शौहरों से
إِذَا
जब
تَرَٰضَوْا۟
वो बाहम रज़ामंद हो जाऐं
بَيْنَهُم
आपस में
بِٱلْمَعْرُوفِ ۗ
भले तरीक़े से
ذَٰلِكَ
ये (बात)
يُوعَظُ
नसीहत की जाती है
بِهِۦ
साथ इसके
مَن
उसको जो
كَانَ
हो
مِنكُمْ
तुम में से
يُؤْمِنُ
ईमान रखता
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَٱلْيَوْمِ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرِ ۗ
और आख़िरी दिन पर
ذَٰلِكُمْ
ये (बात)
أَزْكَىٰ
ज़्यादा पाकीज़ा है
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
وَأَطْهَرُ ۗ
और ज़्यादा पाक है
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَعْلَمُ
जानता है
وَأَنتُمْ
और तुम
لَا
(do) not
تَعْلَمُونَ
नहीं तुम जानते
और जब तुम स्त्रियों को तलाक़ दे दो और वे अपनी निर्धारित अवधि (इद्दत) को पहुँच जाएँ, तो उन्हें अपने होनेवाले दूसरे पतियों से विवाह करने से न रोको, जबकि वे सामान्य नियम के अनुसार परस्पर रज़ामन्दी से मामला तय करें। यह नसीहत तुममें से उसको की जा रही है जो अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखता है। यही तुम्हारे लिए ज़्यादा बरकतवाला और सुथरा तरीक़ा है। और अल्लाह जानता है, तुम नहीं जानते
तफ़्सीर:
जब तुम अपनी पत्नियों को तीन से कम तलाक़ दो और उनकी प्रतीक्षा अवधि (इद्दत) समाप्त हो जाए, तो - ऐ अभिभावको! - उन्हें उस समय नए निकाह के साथ अपने पतियों के पास लौटने से न रोको, यदि वे ऐसा करना चाहें और अपने पतियों के साथ उसपर सहमत हो जाएँ। उन्हें मना करने के निषेध पर आधारित इस हुक्म का उपदेश उसे दिया जा रहा है, जो तुम में से अल्लाह तथा अंतिम दिन (प्रलय) पर ईमान रखता है। इससे तुम्हारे बीच भलाई को अधिक बढ़ावा मिलेगा तथा तुम्हारी इस्मतें और तुम्हारे कर्म गंदगियों से अधिक पवित्र रहेंगे। अल्लाह सारे मामलों के तथ्यों और उनके परिणामों से अवगत है, और तुम इनसे अनभिज्ञ हो।
आयत 233
۞ وَٱلْوَٰلِدَٰتُ يُرْضِعْنَ أَوْلَـٰدَهُنَّ حَوْلَيْنِ كَامِلَيْنِ ۖ لِمَنْ أَرَادَ أَن يُتِمَّ ٱلرَّضَاعَةَ ۚ وَعَلَى ٱلْمَوْلُودِ لَهُۥ رِزْقُهُنَّ وَكِسْوَتُهُنَّ بِٱلْمَعْرُوفِ ۚ لَا تُكَلَّفُ نَفْسٌ إِلَّا وُسْعَهَا ۚ لَا تُضَآرَّ وَٰلِدَةٌۢ بِوَلَدِهَا وَلَا مَوْلُودٌۭ لَّهُۥ بِوَلَدِهِۦ ۚ وَعَلَى ٱلْوَارِثِ مِثْلُ ذَٰلِكَ ۗ فَإِنْ أَرَادَا فِصَالًا عَن تَرَاضٍۢ مِّنْهُمَا وَتَشَاوُرٍۢ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَا ۗ وَإِنْ أَرَدتُّمْ أَن تَسْتَرْضِعُوٓا۟ أَوْلَـٰدَكُمْ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ إِذَا سَلَّمْتُم مَّآ ءَاتَيْتُم بِٱلْمَعْرُوفِ ۗ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌۭ
۞ وَٱلْوَٰلِدَٰتُ
और माँऐं
يُرْضِعْنَ
दूध पिलाऐं
أَوْلَـٰدَهُنَّ
अपनी औलाद को
حَوْلَيْنِ
दो साल
كَامِلَيْنِ ۖ
मुकम्मल
لِمَنْ
उसके लिए जो
أَرَادَ
इरादा करे
أَن
कि
يُتِمَّ
वो पूरा करे
ٱلرَّضَاعَةَ ۚ
रज़ाअत की मुद्दत
وَعَلَى
और ऊपर
ٱلْمَوْلُودِ
the father
لَهُۥ
उस (वालिद) के बच्चा है जिसका
رِزْقُهُنَّ
ख़ुराक है उन औरतों की
وَكِسْوَتُهُنَّ
और लिबास है उन औरतों का
بِٱلْمَعْرُوفِ ۚ
भले तरीक़े से
لَا
Not
تُكَلَّفُ
ना तकलीफ़ दिया जाए
نَفْسٌ
कोई नफ़्स
إِلَّا
मगर
وُسْعَهَا ۚ
उसकी वुसअत के मुताबिक़
لَا
Not
تُضَآرَّ
ना नुक़सान पहुँचाया जाए
وَٰلِدَةٌۢ
वालिदा को
بِوَلَدِهَا
उसके बच्चे की वजह से
وَلَا
और ना
مَوْلُودٌۭ
(the) father
لَّهُۥ
वालिद को
بِوَلَدِهِۦ ۚ
उसके बच्चे की वजह से
وَعَلَى
और ऊपर
ٱلْوَارِثِ
वारिस के है
مِثْلُ
मिसल
ذَٰلِكَ ۗ
उसी के
فَإِنْ
फिर अगर
أَرَادَا
वो दोनों इरादा कर लें
فِصَالًا
दूध छुड़ाने का
عَن
through
تَرَاضٍۢ
बाहम रज़ामंदी से
مِّنْهُمَا
उन दोनों की
وَتَشَاوُرٍۢ
और बाहम मशवरे से
فَلَا
तो नहीं
جُنَاحَ
कोई गुनाह
عَلَيْهِمَا ۗ
उन दोनों पर
وَإِنْ
और अगर
أَرَدتُّمْ
इरादा करो तुम
أَن
कि
تَسْتَرْضِعُوٓا۟
तुम दूध पिलवाओ
أَوْلَـٰدَكُمْ
अपनी औलाद को
فَلَا
तो नहीं
جُنَاحَ
कोई गुनाह
عَلَيْكُمْ
तुम पर
إِذَا
जब
سَلَّمْتُم
सुपुर्द कर दो तुम
مَّآ
जो
ءَاتَيْتُم
देना था तुमने
بِٱلْمَعْرُوفِ ۗ
मारूफ़ तरीक़े से
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَٱعْلَمُوٓا۟
और जान लो
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
بِمَا
उसे जो
تَعْمَلُونَ
तुम करते हो
بَصِيرٌۭ
ख़ूब देखने वाला है
और जो कोई पूरी अवधि तक (बच्चे को) दूध पिलवाना चाहे, तो माएँ अपने बच्चों को पूरे दो वर्ष तक दूध पिलाएँ। और वह जिसका बच्चा है, सामान्य नियम के अनुसार उनके खाने और उनके कपड़े का ज़िम्मेदार है। किसी पर बस उसकी अपनी समाई भर ही ज़िम्मेदारी है, न तो कोई माँ अपने बच्चे के कारण (बच्चे के बाप को) नुक़सान पहुँचाए और न बाप अपने बच्चे के कारण (बच्चे की माँ को) नुक़सान पहुँचाए। और इसी प्रकार की ज़िम्मेदारी उसके वारिस पर भी आती है। फिर यदि दोनों पारस्परिक स्वेच्छा और परामर्श से दूध छुड़ाना चाहें तो उनपर कोई गुनाह नहीं। और यदि तुम अपनी संतान को किसी अन्य स्त्री से दूध पिलवाना चाहो तो इसमें भी तुम पर कोई गुनाह नहीं, जबकि तुमने जो कुछ बदले में देने का वादा किया हो, सामान्य नियम के अनुसार उसे चुका दो। और अल्लाह का डर रखो और भली-भाँति जान लो कि जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसे देख रहा है
तफ़्सीर:
माताएँ अपने बच्चों को पूरे दो साल तक दूध पिलाएँ। दो साल की यह समय सीमा उसके लिए है, जो दूध पिलाने की अवधि पूरी करना चाहता हो। बच्चे के पिता पर तलाक़शुदा दूध पिलाने वाली माताओं के ख़र्च और उनके कपड़ों की ज़िम्मेदारी है, उसके अनुसार जो लोगों में प्रचलित है, जो शरीयत के विरुद्ध न हो। अल्लाह किसी व्यक्ति पर उसकी क्षमता एवं शक्ति से अधिक बोझ नहीं डालता। माता-पिता में से किसी के लिए जायज़ नहीं है कि बच्चे को दूसरे को नुक़सान पहुँचाने का माध्यम बना ले। यदि बाप न हो और बच्चे के पास धन न हो, तो बच्चे के वारिस (उत्तराधिकारी) पर भी उसी प्रकार के अधिकार हैं जो पिता पर होते हैं। यदि माता-पिता दो साल पूरे होने से पहले ही बच्चे का दूध छुड़ाना चाहें और दोनों बच्चे के हित को ध्यान में रखते हुए आपसी परामर्श और सहमति के बाद यह क़दम उठाएँ, तो उनपर कोई गुनाह नहीं है। फिर यदि तुम अपने बच्चों के लिए उनकी माताओं के अलावा अन्य दूध पिलाने वालियाँ रखना चाहो, तो तुमपर कोई गुनाह नहीं, यदि दूध पिलाने वाली के साथ जिस पारिश्रमिक पर सहमत हुए हो, उसे बिना कमी-बेशी अथवा टाल-मटोल के अदा कर दो। अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से दूर रहकर उससे डरो, और जान लो कि जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसे देखता है, चुनाँचे उसमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है, और वह तुम्हारे किए हुए कामों के लिए तुम्हें प्रतिफल देगा।
आयत 234
وَٱلَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَٰجًۭا يَتَرَبَّصْنَ بِأَنفُسِهِنَّ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍۢ وَعَشْرًۭا ۖ فَإِذَا بَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا فَعَلْنَ فِىٓ أَنفُسِهِنَّ بِٱلْمَعْرُوفِ ۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌۭ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
يُتَوَفَّوْنَ
फ़ौत कर लिए जाते हैं
مِنكُمْ
तुम में से
وَيَذَرُونَ
और वो छोड़ जाते हैं
أَزْوَٰجًۭا
बीवियाँ
يَتَرَبَّصْنَ
वो इन्तिज़ार में रखें
بِأَنفُسِهِنَّ
अपने आपको
أَرْبَعَةَ
चार
أَشْهُرٍۢ
महीने
وَعَشْرًۭا ۖ
और दस (दिन)
فَإِذَا
फिर जब
بَلَغْنَ
वो पहुँचें
أَجَلَهُنَّ
अपनी इद्दत को
فَلَا
तो नहीं
جُنَاحَ
कोई गुनाह
عَلَيْكُمْ
तुम पर
فِيمَا
उस में जो
فَعَلْنَ
वो करें
فِىٓ
concerning
أَنفُسِهِنَّ
अपने नफ़्सों के बारे में
بِٱلْمَعْرُوفِ ۗ
मारूफ़ तरीक़े से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بِمَا
उसकी जो
تَعْمَلُونَ
तुम करते हो
خَبِيرٌۭ
ख़ूब ख़बर रखने वाला है
और तुममें से जो लोग मर जाएँ और अपने पीछे पत्नियों छोड़ जाएँ, तो वे पत्नियों अपने-आपको चार महीने और दस दिन तक रोके रखें। फिर जब वे अपनी निर्धारित अवधि (इद्दत) को पहुँच जाएँ, तो सामान्य नियम के अनुसार वे अपने लिए जो कुछ करें, उसमें तुमपर कोई गुनाह नहीं। जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी ख़बर रखता है
तफ़्सीर:
जो लोग मर जाते हैं और अपने पीछे अगर्भवती पत्नियाँ छोड़ जाते हैं; वे पत्नियाँ अनिवार्य रूप से चार महीने और दस दिन की अवधि के लिए अपने आपको प्रतीक्षा में रखेंगी, जिसके दौरान वे पति के घर से निकलने, श्रृंगार करने और विवाह से बचेंगी। जब यह अवधि समाप्त हो जाए; तो - ऐ अभिभावको! - तुमपर कोई पाप नहीं कि वे शरई और प्रथागत तरीक़े के अनुसार, वह कार्य करें जो उस अवधि के दौरान उनके लिए वर्जित था। तथा अल्लाह उससे, जो कुछ तुम करते हो, भली-भाँति अवगत है। उससे तुम्हारे प्रोक्ष और प्रत्यक्ष में से कोई चीज़ छिपी नहीं है और वह तुम्हें उसका बदला देगा।
आयत 235
وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا عَرَّضْتُم بِهِۦ مِنْ خِطْبَةِ ٱلنِّسَآءِ أَوْ أَكْنَنتُمْ فِىٓ أَنفُسِكُمْ ۚ عَلِمَ ٱللَّهُ أَنَّكُمْ سَتَذْكُرُونَهُنَّ وَلَـٰكِن لَّا تُوَاعِدُوهُنَّ سِرًّا إِلَّآ أَن تَقُولُوا۟ قَوْلًۭا مَّعْرُوفًۭا ۚ وَلَا تَعْزِمُوا۟ عُقْدَةَ ٱلنِّكَاحِ حَتَّىٰ يَبْلُغَ ٱلْكِتَـٰبُ أَجَلَهُۥ ۚ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ مَا فِىٓ أَنفُسِكُمْ فَٱحْذَرُوهُ ۚ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ حَلِيمٌۭ
وَلَا
और नहीं
جُنَاحَ
कोई गुनाह
عَلَيْكُمْ
तुम पर
فِيمَا
उस में जो
عَرَّضْتُم
इशारा करो तुम
بِهِۦ
साथ उसके
مِنْ
of
خِطْبَةِ
पैग़ामे निकाह से
ٱلنِّسَآءِ
औरतों के
أَوْ
या
أَكْنَنتُمْ
छुपाए रखो तुम
فِىٓ
in
أَنفُسِكُمْ ۚ
अपने नफ़्सों में
عَلِمَ
जानता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَنَّكُمْ
कि बेशक तुम
سَتَذْكُرُونَهُنَّ
ज़रूर तुम ज़िक्र करोगे उनका
وَلَـٰكِن
और लेकिन
لَّا
(do) not
تُوَاعِدُوهُنَّ
ना तुम वादा लो उनसे
سِرًّا
छुप कर
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
تَقُولُوا۟
तुम कहो
قَوْلًۭا
बात
مَّعْرُوفًۭا ۚ
भली
وَلَا
और ना
تَعْزِمُوا۟
तुम अज़म करो
عُقْدَةَ
अक़द का
ٱلنِّكَاحِ
निकाह के
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَبْلُغَ
पहुँच जाए
ٱلْكِتَـٰبُ
मुक़र्रर मियाद
أَجَلَهُۥ ۚ
अपनी मुद्दत को
وَٱعْلَمُوٓا۟
और जान लो
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَعْلَمُ
जानता है
مَا
उसे जो
فِىٓ
(is) within
أَنفُسِكُمْ
तुम्हारे नफ़्सों में है
فَٱحْذَرُوهُ ۚ
पस डरो उससे
وَٱعْلَمُوٓا۟
और जान लो
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌ
बहुत बख़्शने वाला है
حَلِيمٌۭ
बहुत बुर्दबार है
और इसमें भी तुम पर कोई गुनाह नहीं जो तुम उन औरतों को विवाह के सन्देश सांकेतिक रूप से दो या अपने मन में छिपाए रखो। अल्लाह जानता है कि तुम उन्हें याद करोगे, परन्तु छिपकर उन्हें वचन न देना, सिवाय इसके कि सामान्य नियम के अनुसार कोई बात कह दो। और जब तक निर्धारित अवधि (इद्दत) पूरी न हो जाए, विवाह का नाता जोड़ने का निश्चय न करो। जान रखो कि अल्लाह तुम्हारे मन की बात भी जानता है। अतः उससे सावधान रहो और अल्लाह अत्यन्त क्षमा करनेवाला, सहनशील है
तफ़्सीर:
शादी करने की इच्छा घोषित किए बिना, पति की मृत्यु अथवा 'तलाक़े बाइन' की इद्दत गुज़ारने वाली स्त्री को शादी के संदेश का संकेत देने में तुमपर कोई पाप नहीं है; जैसे कि वह कहे : जब तुम्हारी प्रतीक्षा अवधि समाप्त हो जाए, तो मुझे बताओ। तथा इसमें भी तुमपर कोई गुनाह नहीं है कि तुमने इद्दत गुज़ारने वाली स्त्री से उसकी प्रतीक्षा अवधि समाप्त होने के बाद निकाह करने की इच्छा को अपने दिल में छिपाए रखा है। अल्लाह जानता है कि तुम उनके लिए अपनी तीव्र इच्छा के कारण उन्हें अवश्य याद करोगे, इसलिए उसने तुम्हें बिना घोषणा किए संकेत देने की अनुमति प्रदान की। तथा जब वे प्रतीक्षा अवधि में हों, तो एक-दूसरे से गुप्त रूप से शादी का वादा करने से सावधान रहो। सिवाय प्रथागत बात के और वह सांकेतिक रूप से बात कहना है। तथा प्रतीक्षा अवधि के दौरान विवाह का अनुबंध पक्का न करो। और यह जान लो कि अल्लाह जानता है कि उसने तुम्हारे लिए जो कुछ हलाल किया है और जो कुछ तुमपर हराम ठहराया है, उसमें से कौन-सी बात तुम अपने दिलों में छिपाए हुए हो। इसलिए उससे सावधान रहो और उसकी आज्ञा का उल्लंघन न करो। तथा जान लो कि अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला, अत्यंत सहनशील है, सज़ा देने में जल्दी नहीं करता।
आयत 236
لَّا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ إِن طَلَّقْتُمُ ٱلنِّسَآءَ مَا لَمْ تَمَسُّوهُنَّ أَوْ تَفْرِضُوا۟ لَهُنَّ فَرِيضَةًۭ ۚ وَمَتِّعُوهُنَّ عَلَى ٱلْمُوسِعِ قَدَرُهُۥ وَعَلَى ٱلْمُقْتِرِ قَدَرُهُۥ مَتَـٰعًۢا بِٱلْمَعْرُوفِ ۖ حَقًّا عَلَى ٱلْمُحْسِنِينَ
لَّا
(There is) no
جُنَاحَ
नहीं कोई गुनाह
عَلَيْكُمْ
तुम पर
إِن
अगर
طَلَّقْتُمُ
तलाक़ दे दो तुम
ٱلنِّسَآءَ
औरतों को
مَا
जब कि
لَمْ
ना
تَمَسُّوهُنَّ
तुमने छुआ हो उन्हें
أَوْ
या
تَفْرِضُوا۟
तुमने मुक़र्रर किया
لَهُنَّ
उनके लिए
فَرِيضَةًۭ ۚ
कोई महर
وَمَتِّعُوهُنَّ
और माल व मता दो उन्हें
عَلَى
upon
ٱلْمُوسِعِ
ऊपर वुसअत वाले के
قَدَرُهُۥ
उसकी वुसअत के मुताबिक़
وَعَلَى
और ऊपर
ٱلْمُقْتِرِ
तंगदस्त के
قَدَرُهُۥ
उसकी वुसअत के मुताबिक़
مَتَـٰعًۢا
फ़ायदा पहुँचाना है
بِٱلْمَعْرُوفِ ۖ
भले तरीक़े से
حَقًّا
हक़ है
عَلَى
ऊपर
ٱلْمُحْسِنِينَ
नेकी करने वालों के
यदि तुम स्त्रियों को इस स्थिति मे तलाक़ दे दो कि यह नौबत पेश न आई हो कि तुमने उन्हें हाथ लगाया हो और उनका कुछ हक़ (मह्रन) निश्चित किया हो, तो तुमपर कोई भार नहीं। हाँ, सामान्य नियम के अनुसार उन्हें कुछ ख़र्च दो - समाई रखनेवाले पर उसकी अपनी हैसियत के अनुसार और तंगदस्त पर उसकी अपनी हैसियत के अनुसार अनिवार्य है - यह अच्छे लोगों पर एक हक़ है
तफ़्सीर:
जिन पत्नियों से तुमने निकाह किया है, यदि तुम उन्हें उनके साथ संभोग करने से पहले तथा उनके लिए एक विशिष्ट महर निर्धारित करने से पहले तलाक़ दे दो, तो तुमपर कोई पाप नहीं है। यदि तुम उन्हें इस स्थिति में तलाक़ देते हो, तो तुमपर उनके लिए कोई महर वाजिब नहीं होगी। लेकिन आदमी धनी हो या निर्धन उस पर यह ज़रूरी होगा कि अपनी क्षमता के अनुसार उन्हें कुछ दे दे, जिससे वे लाभ उठा सकें और उनके टूटे हुए दिल की सांत्वना हो जाए। यह देना उन लोगों पर एक निश्चित अधिकार है, जो अपने कार्यों और लेनदेन में सदाचारी हैं।
आयत 237
وَإِن طَلَّقْتُمُوهُنَّ مِن قَبْلِ أَن تَمَسُّوهُنَّ وَقَدْ فَرَضْتُمْ لَهُنَّ فَرِيضَةًۭ فَنِصْفُ مَا فَرَضْتُمْ إِلَّآ أَن يَعْفُونَ أَوْ يَعْفُوَا۟ ٱلَّذِى بِيَدِهِۦ عُقْدَةُ ٱلنِّكَاحِ ۚ وَأَن تَعْفُوٓا۟ أَقْرَبُ لِلتَّقْوَىٰ ۚ وَلَا تَنسَوُا۟ ٱلْفَضْلَ بَيْنَكُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ
وَإِن
और अगर
طَلَّقْتُمُوهُنَّ
तलाक़ दे दो तुम
مِن
from
قَبْلِ
इससे पहले
أَن
कि
تَمَسُّوهُنَّ
तुमने छुआ उन्हें
وَقَدْ
और तहक़ीक़
فَرَضْتُمْ
मुक़र्रर कर दिया था तुमने
لَهُنَّ
उनके लिए
فَرِيضَةًۭ
कोई महर
فَنِصْفُ
तो आधा है
مَا
उसका जो
فَرَضْتُمْ
मुक़र्रर कर चुके तुम (महर)
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
يَعْفُونَ
वो (औरतें) माफ़ कर दें
أَوْ
या
يَعْفُوَا۟
माफ़ कर दे
ٱلَّذِى
वो शख़्स
بِيَدِهِۦ
जिसके हाथ में है
عُقْدَةُ
गिरह
ٱلنِّكَاحِ ۚ
निकाह की
وَأَن
और ये कि
تَعْفُوٓا۟
तुम माफ़ कर दो
أَقْرَبُ
ज़्यादा क़रीब है
لِلتَّقْوَىٰ ۚ
तक़वा के
وَلَا
और ना
تَنسَوُا۟
तुम भूलो
ٱلْفَضْلَ
एहसान को
بَيْنَكُمْ ۚ
आपस में
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
بِمَا
उसे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
بَصِيرٌ
ख़ूब देखने वाला है
और यदि तुम उन्हें हाथ लगाने से पहले तलाक़ दे दो, किन्तु उसका मह्र- निश्चित कर चुके हो, तो जो मह्रह तुमने निश्चित किया है उसका आधा अदा करना होगा, यह और बात है कि वे स्वयं छोड़ दे या पुरुष जिसके हाथ में विवाह का सूत्र है, वह नर्मी से काम ले (और मह्र पूरा अदा कर दे) । और यह कि तुम नर्मी से काम लो तो यह परहेज़गारी से ज़्यादा क़रीब है और तुम एक-दूसरे को हक़ से बढ़कर देना न भूलो। निश्चय ही अल्लाह उसे देख रहा है, जो तुम करते हो
तफ़्सीर:
यदि तुम अपनी उन पत्नियों को जिनसे तुमने निकाह किया है, उनके साथ संभोग करने से पहले तलाक़ दे दो, जबकि तुम उनके लिए एक विशिष्ट महर निर्धारित कर चुके हो, तो तुम्हें उन्हें निर्धारित महर का आधा भुगतान करना होगा, परंतु यह कि वे - यदि वे समझदार हों - उसे तुम्हारे लिए माफ़ कर दें, अथवा पतिगण स्वयं उन्हें पूरा महर दे दें। तुम्हारा अपने बीच अधिकारों के प्रति सहिष्णु होना अल्लाह के भय और उसकी आज्ञाकारिता के अधिक निकट है। तथा - ऐ लोगो! - तुम एक-दूसरे पर उपकार करना और अधिकारों के बारे में क्षमा से काम लेना न छोड़ो। क्योंकि अल्लाह जो तुम करते हो, उसे देख रहा है। इसलिए ख़ूब भलाई करो, ताकि उसपर अल्लाह का बदला पाओ।
आयत 238
حَـٰفِظُوا۟ عَلَى ٱلصَّلَوَٰتِ وَٱلصَّلَوٰةِ ٱلْوُسْطَىٰ وَقُومُوا۟ لِلَّهِ قَـٰنِتِينَ
حَـٰفِظُوا۟
हिफ़ाज़त करो
عَلَى
[on]
ٱلصَّلَوَٰتِ
सब नमाज़ों की
وَٱلصَّلَوٰةِ
और नमाज़
ٱلْوُسْطَىٰ
दर्मियानी की
وَقُومُوا۟
और खड़े हो जाओ
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
قَـٰنِتِينَ
फ़रमाबरदार बन कर
सदैव नमाज़ो की और अच्छी नमाज़ों की पाबन्दी करो, और अल्लाह के आगे पूरे विनीत और शान्तभाव से खड़े हुआ करो
तफ़्सीर:
नमाज़ों को अल्लाह के आदेश के अनुसार पूर्ण रूप से अदा करके, उनका संरक्षण (पाबंदी) करो और समस्त नमाज़ों के बीच मध्य नमाज़ अर्थात् अस्र की नमाज़ का संरक्षण (पाबंदी) करो और अपनी नमाज़ में अल्लाह के आज्ञाकारी बनकर विनयपूर्वक खड़े रहो।
आयत 239
فَإِنْ خِفْتُمْ فَرِجَالًا أَوْ رُكْبَانًۭا ۖ فَإِذَآ أَمِنتُمْ فَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ كَمَا عَلَّمَكُم مَّا لَمْ تَكُونُوا۟ تَعْلَمُونَ
فَإِنْ
फिर अगर
خِفْتُمْ
ख़ौफ़ हो तुम्हें
فَرِجَالًا
तो पैदल (पढ़ लो)
أَوْ
या
رُكْبَانًۭا ۖ
सवार होकर
فَإِذَآ
फिर जब
أَمِنتُمْ
अमन में आ जाओ तुम
فَٱذْكُرُوا۟
तो याद करो
ٱللَّهَ
अल्लाह को
كَمَا
जैसा कि
عَلَّمَكُم
उसने सिखाया तुम्हें
مَّا
जो
لَمْ
नहीं
تَكُونُوا۟
थे तुम
تَعْلَمُونَ
तुम जानते
फिर यदि तुम्हें (शत्रु आदि का) भय हो, तो पैदल या सवार जिस तरह सम्भव हो नमाज़ पढ़ लो। फिर जब निश्चिन्त हो तो अल्लाह को उस प्रकार याद करो जैसाकि उसने तुम्हें सिखाया है, जिसे तुम नहीं जानते थे
तफ़्सीर:
यदि तुम्हें किसी शत्रु आदि का भय हो और नमाज़ को संपूर्ण रूप से अदा करने में सक्षम न हो, तो अपने पैरों पर चलते हुए, या ऊँट और घोड़े आदि पर सवार होकर, अथवा जिस तरह भी तुम सक्षम हो, नमाज़ पढ़ो। फिर जब तुम्हारा डर दूर हो जाए, तो सभी प्रकार के ज़िक्र के साथ अल्लाह को याद करो, जिसमें नमाज़ को पूर्ण रूप से अदा करना भी शामिल है, जैसे उसने तुम्हें उस प्रकाश और मार्गदर्शन की शिक्षा दी, जिसे तुम नहीं जानते थे।
आयत 240
وَٱلَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَٰجًۭا وَصِيَّةًۭ لِّأَزْوَٰجِهِم مَّتَـٰعًا إِلَى ٱلْحَوْلِ غَيْرَ إِخْرَاجٍۢ ۚ فَإِنْ خَرَجْنَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِى مَا فَعَلْنَ فِىٓ أَنفُسِهِنَّ مِن مَّعْرُوفٍۢ ۗ وَٱللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌۭ
وَٱلَّذِينَ
और वो लोग जो
يُتَوَفَّوْنَ
फ़ौत कर लिए जाते हैं
مِنكُمْ
तुम में से
وَيَذَرُونَ
और वो छोड़ जाते हैं
أَزْوَٰجًۭا
बीवियाँ
وَصِيَّةًۭ
वसीयत (करें)
لِّأَزْوَٰجِهِم
अपनी बीवियों के लिए
مَّتَـٰعًا
फ़ायदा पहुँचाने की
إِلَى
for
ٱلْحَوْلِ
एक साल तक
غَيْرَ
बग़ैर
إِخْرَاجٍۢ ۚ
निकालने के
فَإِنْ
फिर अगर
خَرَجْنَ
वो निकल जाऐं
فَلَا
तो नहीं
جُنَاحَ
कोई गुनाह
عَلَيْكُمْ
तुम पर
فِى
in
مَا
उस मामले में जो
فَعَلْنَ
वो करें
فِىٓ
concerning
أَنفُسِهِنَّ
अपने नफ़्सों के बारे में
مِن
[of]
مَّعْرُوفٍۢ ۗ
भले तरीक़े से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَزِيزٌ
बहुत ज़बरदस्त है
حَكِيمٌۭ
ख़ूब हिकमत वाला है
और तुममें से जिन लोगों की मृत्यु हो जाए और अपने पीछे पत्नियों छोड़ जाए, अर्थात अपनी पत्नियों के हक़ में यह वसीयत छोड़ जाए कि घर से निकाले बिना एक वर्ष तक उन्हें ख़र्च दिया जाए, तो यदि वे निकल जाएँ तो अपने लिए सामान्य नियम के अनुसार वे जो कुछ भी करें उसमें तुम्हारे लिए कोई दोष नहीं। अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
तुममें से जो मर जाते हैं और अपने पीछे पत्नियाँ छोड़ जाते हैं, वे आवश्यक रूप से अपनी पत्नियों के लिए वसीयत कर जाएँ कि उनके लिए पूरे एक वर्ष के आवास और खर्च (रखरखाव) का प्रबंध किया जाए, और तुम्हारे वारिस उन्हें घर से न निकालें। ऐसा आदेश उन्हें पहुँचने वाली मुसीबत की क्षतिपूर्ति के लिए और मृतक के प्रति वफ़ादारी निभाने के लिए दिया गया है। यदि वे एक साल पूरा होने से पहले अपनी मर्ज़ी से निकल जाएँ, तो न तो तुमपर पाप है और न ही उन पर, जो वे अपने आप में बनाव-शृंगार और सुगंध का इस्तेमाल करें। अल्लाह सब पर प्रभुत्वशाली है, उसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता। वह अपने प्रबंधन, विधान और नियति में हिकमत वाला है। जमहूर (बहुसंख्यक) मुफ़स्सिरीन का मानना है कि इस आयत का हुक्म अल्लाह तआला के इस कथन द्वारा निरस्त कर दिया गया है : {وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنْكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا يَتَرَبَّصْنَ بِأَنْفُسِهِنَّ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا } (البقرة: ٢٣٤) ''और जो लोग तुममें से मर जाएँ और पत्नियाँ छोड़ जाएँ, वे (पत्नियाँ) अपने आपको चार महीने और दस दिन प्रतीक्षा में रखें।'' (सूरतुल्-बक़रा : 234)
आयत 241
وَلِلْمُطَلَّقَـٰتِ مَتَـٰعٌۢ بِٱلْمَعْرُوفِ ۖ حَقًّا عَلَى ٱلْمُتَّقِينَ
وَلِلْمُطَلَّقَـٰتِ
और तलाक़ याफ़्ता औरतों को
مَتَـٰعٌۢ
फ़ायदा पहुँचाना है
بِٱلْمَعْرُوفِ ۖ
भले तरीक़े से
حَقًّا
हक़ है
عَلَى
upon
ٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों पर
और तलाक़ पाई हुई स्त्रियों को सामान्य नियम के अनुसार (इद्दत की अवधि में) ख़र्च भी मिलना चाहिए। यह डर रखनेवालो पर एक हक़ है
तफ़्सीर:
तलाक़शुदा महिलाओं को, पति की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए रीति के अनुसार, कपड़ा या पैसा या अन्य चीज़ों के रूप में, कुछ न कुछ सामग्री देना चाहिए; ताकि तलाक़ के कारण उनके टूटे हुए दिलों की सांत्वना हो सके। यह हुक्म उन लोगों पर एक निश्चित (अनिवार्य) अधिकार है, जो अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, डरने वाले हैं।
आयत 242
كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمْ ءَايَـٰتِهِۦ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يُبَيِّنُ
वाज़ेह करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
ءَايَـٰتِهِۦ
अपनी आयात को
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल से काम लो
इस प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतें खोलकर बयान करता है, ताकि तुम समझ से काम लो
तफ़्सीर:
उक्त स्पष्टीकरण की तरह, अल्लाह तुम्हारे लिए - ऐ मोमिनो! - अपनी सीमाओं और आदेशों पर आधारित आयतों को स्पष्ट करता है; ताकि तुम उन्हें समझो और उनपर अमल करो, जिसके परिणामस्वरूप तुम्हें दुनिया एवं आख़िरत में भलाई प्राप्त हो।
आयत 243
۞ أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ خَرَجُوا۟ مِن دِيَـٰرِهِمْ وَهُمْ أُلُوفٌ حَذَرَ ٱلْمَوْتِ فَقَالَ لَهُمُ ٱللَّهُ مُوتُوا۟ ثُمَّ أَحْيَـٰهُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى ٱلنَّاسِ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ
۞ أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
إِلَى
तरफ़
ٱلَّذِينَ
उनके जो
خَرَجُوا۟
निकल गए
مِن
from
دِيَـٰرِهِمْ
अपने घरों से
وَهُمْ
और वो
أُلُوفٌ
हज़ारों थे
حَذَرَ
बचने के लिए
ٱلْمَوْتِ
मौत से
فَقَالَ
तो कहा
لَهُمُ
उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مُوتُوا۟
मर जाओ
ثُمَّ
फिर
أَحْيَـٰهُمْ ۚ
उसने ज़िन्दा किया उन्हें
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَذُو
(is) surely Possessor
فَضْلٍ
यक़ीनन फ़ज़ल वाला है
عَلَى
for
ٱلنَّاسِ
लोगों पर
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَ
अक्सर
ٱلنَّاسِ
लोग
لَا
(are) not
يَشْكُرُونَ
नहीं वो शुक्र करते
क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जो हज़ारों की संख्या में होने पर भी मृत्यु के भय से अपने घर-बार छोड़कर निकले थे? तो अल्लाह ने उनसे कहा, "मृत्यु प्राय हो जाओ तुम।" फिर उसने उन्हें जीवन प्रदान किया। अल्लाह तो लोगों के लिए उदार अनुग्राही है, किन्तु अधिकतर लोग कृतज्ञता नहीं दिखलाते
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) क्या आपके संज्ञान में उन लोगों की ख़बर नहीं आई, जो महामारी या किसी और कारण मौत के डर से, अपने घरों को छोड़कर निकल पड़े, जबकि वे बहुत बड़ी संख्या में थे। वे बनी इसराईल का एक समूह थे। अल्लाह ने उनसे कहा : मर जाओ; सो वे मर गए। फिर अल्लाह ने उन्हें जीवित कर दिया। ताकि उनके लिए यह तथ्य स्पष्ट कर दे कि सारा मामला उसी महिमावान् के हाथ में है और यह कि वे अपने लिए किसी लाभ या हानि के मालिक नहीं हैं। निःसंदेह अल्लाह लोगों के प्रति उदार और अनुग्रहकारी है, परंतु अधिकांश लोग अल्लाह का उसकी नेमतों पर शुक्रिया अदा नहीं करते।
आयत 244
وَقَـٰتِلُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌۭ
وَقَـٰتِلُوا۟
और जंग करो
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
وَٱعْلَمُوٓا۟
और जान लो
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
سَمِيعٌ
ख़ूब सुनने वाला है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
और अल्लाह के मार्ग में युद्ध करो और जान लो कि अल्लाह सब कुछ सुननेवाला, जाननेवाले है
तफ़्सीर:
(ऐ मोमिनो!) अल्लाह के धर्म के समर्थन और उसके वचन को सर्वोच्च करने के लिए, उसके शत्रुओं से युद्ध करो और जान लो कि अल्लाह तुम्हारी बातों को सुनने वाला, तुम्हारे इरादों और कार्यों को जानने वाला है, और वह तुम्हें उनका बदला देगा।
आयत 245
مَّن ذَا ٱلَّذِى يُقْرِضُ ٱللَّهَ قَرْضًا حَسَنًۭا فَيُضَـٰعِفَهُۥ لَهُۥٓ أَضْعَافًۭا كَثِيرَةًۭ ۚ وَٱللَّهُ يَقْبِضُ وَيَبْصُۜطُ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
مَّن
कौन है
ذَا
(is) the one
ٱلَّذِى
वो जो
يُقْرِضُ
क़र्ज़ दे
ٱللَّهَ
अल्लाह को
قَرْضًا
क़र्ज़
حَسَنًۭا
अच्छा
فَيُضَـٰعِفَهُۥ
तो वो बढ़ा दे उसे
لَهُۥٓ
उसके लिए
أَضْعَافًۭا
कई गुना
كَثِيرَةًۭ ۚ
ज़्यादा
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَقْبِضُ
तंगी करता है
وَيَبْصُۜطُ
और वो कुशादगी करता है
وَإِلَيْهِ
और तरफ़ उसी के
تُرْجَعُونَ
तुम लौटाए जाओगे
कौन है जो अल्लाह को अच्छा ऋण दे कि अल्लाह उसे उसके लिए कई गुना बढ़ा दे? और अल्लाह ही तंगी भी देता है और कुशादगी भी प्रदान करता है, और उसी की ओर तुम्हें लौटना है
तफ़्सीर:
वह कौन व्यक्ति है जो क़र्ज़ देने वाले का कार्य करे, चुनाँचे वह अच्छे इरादे और अच्छे मन के साथ अल्लाह के मार्ग में अपना धन ख़र्च करे, ताकि वह उसके पास बहुत अधिक गुना होकर वापस आए? अल्लाह अपनी हिकमत और न्याय के साथ जीविका, स्वास्थ्य और अन्य में (कभी) तंगी करता है, तथा (कभी) उन सब में विस्तार करता है। तथा आख़िरत में तुम उसी की ओर लौटाए जाओगे, फिर वह तुम्हें तुम्हारे कार्यों का बदला प्रदान करेगा।
आयत 246
أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلْمَلَإِ مِنۢ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ مِنۢ بَعْدِ مُوسَىٰٓ إِذْ قَالُوا۟ لِنَبِىٍّۢ لَّهُمُ ٱبْعَثْ لَنَا مَلِكًۭا نُّقَـٰتِلْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ۖ قَالَ هَلْ عَسَيْتُمْ إِن كُتِبَ عَلَيْكُمُ ٱلْقِتَالُ أَلَّا تُقَـٰتِلُوا۟ ۖ قَالُوا۟ وَمَا لَنَآ أَلَّا نُقَـٰتِلَ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَقَدْ أُخْرِجْنَا مِن دِيَـٰرِنَا وَأَبْنَآئِنَا ۖ فَلَمَّا كُتِبَ عَلَيْهِمُ ٱلْقِتَالُ تَوَلَّوْا۟ إِلَّا قَلِيلًۭا مِّنْهُمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌۢ بِٱلظَّـٰلِمِينَ
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
إِلَى
तरफ़
ٱلْمَلَإِ
सरदारों के
مِنۢ
of
بَنِىٓ
(the) Children
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल में से
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद
مُوسَىٰٓ
मूसा के
إِذْ
जब
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لِنَبِىٍّۢ
नबी के लिए
لَّهُمُ
अपने
ٱبْعَثْ
मुक़र्रर कर
لَنَا
हमारे लिए
مَلِكًۭا
एक बादशाह
نُّقَـٰتِلْ
हम लड़ें
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के रास्ते में
قَالَ
उसने कहा
هَلْ
क्या
عَسَيْتُمْ
उम्मीद है तुमसे
إِن
अगर
كُتِبَ
लिख दिया जाए
عَلَيْكُمُ
तुम पर
ٱلْقِتَالُ
जंग करना
أَلَّا
कि ना
تُقَـٰتِلُوا۟ ۖ
तुम लड़ो
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
وَمَا
और क्या है
لَنَآ
हमें
أَلَّا
कि ना
نُقَـٰتِلَ
हम लड़ें
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
وَقَدْ
हालाँकि तहक़ीक़
أُخْرِجْنَا
निकाले गए हम
مِن
from
دِيَـٰرِنَا
अपने घरों से
وَأَبْنَآئِنَا ۖ
और अपने बेटों से
فَلَمَّا
फिर जब
كُتِبَ
लिख दिया गया
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلْقِتَالُ
लड़ना
تَوَلَّوْا۟
तो वो फिर गए
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا
थोड़े से
مِّنْهُمْ ۗ
उनमें से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों को
क्या तुमने मूसा के पश्चात इसराईल की सन्तान के सरदारों को नहीं देखा, जब उन्होंने अपने एक नबी से कहा, "हमारे लिए एक सम्राट नियुक्त कर दो ताकि हम अल्लाह के मार्ग में युद्ध करें?" उसने कहा, "यदि तुम्हें लड़ाई का आदेश दिया जाए तो क्या तुम्हारे बारे में यह सम्भावना नहीं है कि तुम न लड़ो?" वे कहने लगे, "हम अल्लाह के मार्ग में क्यों न लड़े, जबकि हम अपने घरों से निकाल दिए गए है और अपने बाल-बच्चों से भी अलग कर दिए गए है?" - फिर जब उनपर युद्ध अनिवार्य कर दिया गया तो उनमें से थोड़े लोगों के सिवा सब फिर गए। और अल्लाह ज़ालिमों को भली-भाँति जानता है। -
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) क्या आपके संज्ञान में मूसा अलैहिस्सलाम के समय के बाद बनी इसराईल के प्रमुखों की ख़बर नहीं आई, जब उन्होंने अपने एक नबी से कहा : हमारे लिए एक बादशाह स्थापित कर दीजिए, जिसके साथ मिलकर हम अल्लाह के रास्ते में युद्ध करें। तो उनके नबी ने उनसे कहा : हो सकता है कि यदि तुमपर युद्ध करना अनिवार्य कर दिया जाए, तो तुम अल्लाह के मार्ग में युद्ध न करो! उन्होंने अपने बारे में नबी के गुमान का खंडन करते हुए कहा : कौन सी बाधा हमें अल्लाह के मार्ग में लड़ने से रोकती है जबकि ऐसे कारण मौजूद हैं जो हमसे ऐसा करने की अपेक्षा करते हैं? क्योंकि हमारे शत्रुओं ने हमें हमारे घर से निकाल दिया, और हमारे बच्चों को बंदी बना लिया। इसलिए हम अपनी मातृभूमि को बहाल करने और अपने क़ैदियों को मुक्त कराने के लिए लड़ेंगे। परंतु जब अल्लाह ने उनपर युद्ध फ़र्ज़ कर दिया, तो वे पीछे हट गए, क्योंकि उनमें से कुछ को छोड़कर, उन्होंने जो वादा किया था उसे पूरा नहीं किया। तथा अल्लाह उन अत्याचारियों को खूब जानने वाला है, जो उसकी आज्ञा से मुकर जाने वाले, उसके वचन को तोड़ देने वाले हैं, और वह उन्हें उसका बदला देगा।
आयत 247
وَقَالَ لَهُمْ نَبِيُّهُمْ إِنَّ ٱللَّهَ قَدْ بَعَثَ لَكُمْ طَالُوتَ مَلِكًۭا ۚ قَالُوٓا۟ أَنَّىٰ يَكُونُ لَهُ ٱلْمُلْكُ عَلَيْنَا وَنَحْنُ أَحَقُّ بِٱلْمُلْكِ مِنْهُ وَلَمْ يُؤْتَ سَعَةًۭ مِّنَ ٱلْمَالِ ۚ قَالَ إِنَّ ٱللَّهَ ٱصْطَفَىٰهُ عَلَيْكُمْ وَزَادَهُۥ بَسْطَةًۭ فِى ٱلْعِلْمِ وَٱلْجِسْمِ ۖ وَٱللَّهُ يُؤْتِى مُلْكَهُۥ مَن يَشَآءُ ۚ وَٱللَّهُ وَٰسِعٌ عَلِيمٌۭ
وَقَالَ
और कहा
لَهُمْ
उन्हें
نَبِيُّهُمْ
उनके नबी ने
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
قَدْ
तहक़ीक़
بَعَثَ
मुक़र्रर कर दिया है
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
طَالُوتَ
तालूत को
مَلِكًۭا ۚ
बादशाह
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَنَّىٰ
कैसे
يَكُونُ
हो सकती है
لَهُ
उसके लिए
ٱلْمُلْكُ
बादशाहत
عَلَيْنَا
हम पर
وَنَحْنُ
हालाँकि हम
أَحَقُّ
ज़्यादा हक़दार हैं
بِٱلْمُلْكِ
बादशाहत के
مِنْهُ
उससे
وَلَمْ
और नहीं
يُؤْتَ
वो दिया गया
سَعَةًۭ
वुसअत
مِّنَ
of
ٱلْمَالِ ۚ
माल से
قَالَ
उसने कहा
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
ٱصْطَفَىٰهُ
चुन लिया है उसे
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَزَادَهُۥ
और उसने ज़्यादा दी है उसे
بَسْطَةًۭ
वुसअत
فِى
in
ٱلْعِلْمِ
इल्म में
وَٱلْجِسْمِ ۖ
और जिस्म में
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يُؤْتِى
देता है
مُلْكَهُۥ
बादशाहत अपनी
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता है
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
وَٰسِعٌ
वुसअत वाला है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
उनसे नबी ने उनसे कहा, "अल्लाह ने तुम्हारे लिए तालूत को सम्राट नियुक्त किया है।" बोले, "उसकी बादशाही हम पर कैसे हो सकती है, जबबकि हम उसके मुक़ाबले में बादशाही के ज़्यादा हक़दार है और जबकि उस माल की कुशादगी भी प्राप्त नहीं है?" उसने कहा, "अल्लाह ने तुम्हारे मुक़ाबले में उसको ही चुना है और उसे ज्ञान में और शारीरिक क्षमता में ज़्यादा कुशादगी प्रदान की है। अल्लाह जिसको चाहे अपना राज्य प्रदान करे। और अल्लाह बड़ी समाईवाला, सर्वज्ञ है।"
तफ़्सीर:
उनके नबी ने उनसे कहा : अल्लाह ने तालूत को तुमपर बादशाह निर्धारित किया है, ताकि तुम उसके झंडे तले लड़ो। उनके प्रमुखों ने इस चयन का खंडन करते और इसपर आपत्ति जताते हुए कहा : वह हमपर राज्य कैसे कर सकता है, जबकि हम राज्य के उससे अधिक योग्य हैं; क्योंकि वह राजाओं के पुत्रों में से नहीं है और न ही उसे कोई बड़ी संपत्ति दी गई है, जिससे वह राज-काज पर सहायता ले सके?! उनके नबी ने उनसे कहा : अल्लाह ने उसे तुम्हारे ऊपर चुन लिया है और तुमसे अधिक ज्ञान में विस्तार तथा शारीरिक बल प्रदान किया है। और अल्लाह अपनी हिकमत और दया से जिसे चाहता है उसे अपना राज्य प्रदान करता है। अल्लाह बहुत विस्तृत अनुग्रह वाला है, वह जिसे चाहता है देता है, वह जानता है कि उसकी सृष्टि में कौन उसका हक़दार है।
आयत 248
وَقَالَ لَهُمْ نَبِيُّهُمْ إِنَّ ءَايَةَ مُلْكِهِۦٓ أَن يَأْتِيَكُمُ ٱلتَّابُوتُ فِيهِ سَكِينَةٌۭ مِّن رَّبِّكُمْ وَبَقِيَّةٌۭ مِّمَّا تَرَكَ ءَالُ مُوسَىٰ وَءَالُ هَـٰرُونَ تَحْمِلُهُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ لَّكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
وَقَالَ
और कहा
لَهُمْ
उन्हें
نَبِيُّهُمْ
उनके नबी ने
إِنَّ
बेशक
ءَايَةَ
निशानी
مُلْكِهِۦٓ
उसकी बादशाहत की
أَن
कि
يَأْتِيَكُمُ
आ जाएगा तुम्हारे पास
ٱلتَّابُوتُ
ताबूत / सन्दूक़
فِيهِ
जिसमें
سَكِينَةٌۭ
तसकीन है
مِّن
from
رَّبِّكُمْ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
وَبَقِيَّةٌۭ
और बाक़ी माँदा
مِّمَّا
उसमें से जो
تَرَكَ
छोड़ गए
ءَالُ
(by the) family
مُوسَىٰ
आले मूसा
وَءَالُ
and family
هَـٰرُونَ
और आले हारून
تَحْمِلُهُ
उठाए हुए होंगे उसे
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ ۚ
फ़रिश्ते
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
उसमें
لَـَٔايَةًۭ
अलबत्ता एक निशानी है
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
إِن
अगर
كُنتُم
हो तुम
مُّؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
उनके नबी ने उनसे कहा, "उसकी बादशाही की निशानी यह है कि वह संदूक तुम्हारे पर आ जाएगा, जिसमें तुम्हारे रह की ओर से सकीनत (प्रशान्ति) और मूसा के लोगों और हारून के लोगों की छोड़ी हुई यादगारें हैं, जिसको फ़रिश्ते उठाए हुए होंगे। यदि तुम ईमानवाले हो तो, निस्संदेह इसमें तुम्हारे लिए बड़ी निशानी है।"
तफ़्सीर:
उनके नबी ने उनसे कहा : उसके तुम्हारे ऊपर राजा चुने जाने की सच्चाई की निशानी यह है कि अल्लाह तुम्हें वह ताबूत - यह एक संदूक़ था जिसका बनी इसराईल सम्मान करते थे, जो उनसे छीन लिया गया था - लौटा देगा, जिसमें एक संतोष है जो उसके साथ है, तथा मूसा और हारून के घरानों द्वारा छोड़े गए अवशेष हैं, जैसे लाठी और कुछ तख़्तियाँ। निःसंदेह इसमें तुम्हारे लिए एक स्पष्ट निशानी है, यदि तुम सच में ईमान वाले हो।
आयत 249
فَلَمَّا فَصَلَ طَالُوتُ بِٱلْجُنُودِ قَالَ إِنَّ ٱللَّهَ مُبْتَلِيكُم بِنَهَرٍۢ فَمَن شَرِبَ مِنْهُ فَلَيْسَ مِنِّى وَمَن لَّمْ يَطْعَمْهُ فَإِنَّهُۥ مِنِّىٓ إِلَّا مَنِ ٱغْتَرَفَ غُرْفَةًۢ بِيَدِهِۦ ۚ فَشَرِبُوا۟ مِنْهُ إِلَّا قَلِيلًۭا مِّنْهُمْ ۚ فَلَمَّا جَاوَزَهُۥ هُوَ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَعَهُۥ قَالُوا۟ لَا طَاقَةَ لَنَا ٱلْيَوْمَ بِجَالُوتَ وَجُنُودِهِۦ ۚ قَالَ ٱلَّذِينَ يَظُنُّونَ أَنَّهُم مُّلَـٰقُوا۟ ٱللَّهِ كَم مِّن فِئَةٍۢ قَلِيلَةٍ غَلَبَتْ فِئَةًۭ كَثِيرَةًۢ بِإِذْنِ ٱللَّهِ ۗ وَٱللَّهُ مَعَ ٱلصَّـٰبِرِينَ
فَلَمَّا
पस जब
فَصَلَ
जुदा हुआ
طَالُوتُ
तालूत
بِٱلْجُنُودِ
साथ लश्करों के
قَالَ
उसने कहा
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
مُبْتَلِيكُم
आज़माने वाला है तुम्हें
بِنَهَرٍۢ
एक नहर से
فَمَن
तो जिसने
شَرِبَ
पिया
مِنْهُ
उससे
فَلَيْسَ
तो नहीं वो
مِنِّى
मुझसे
وَمَن
और जिसने
لَّمْ
ना
يَطْعَمْهُ
चखा उसे
فَإِنَّهُۥ
तो बेशक वो
مِنِّىٓ
मुझसे है
إِلَّا
मगर
مَنِ
जो
ٱغْتَرَفَ
चुल्लु भर ले
غُرْفَةًۢ
एक चुल्लु
بِيَدِهِۦ ۚ
अपने हाथ से
فَشَرِبُوا۟
तो उन्होंने पी लिया
مِنْهُ
उससे
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا
बहुत थोड़े
مِّنْهُمْ ۚ
उनमें से
فَلَمَّا
फिर जब
جَاوَزَهُۥ
उसने पार किया उसे
هُوَ
उसने
وَٱلَّذِينَ
और उन्होंने जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए थे
مَعَهُۥ
साथ उसके
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لَا
No
طَاقَةَ
नहीं कोई ताक़त
لَنَا
हमारे लिए
ٱلْيَوْمَ
आज
بِجَالُوتَ
साथ जालूत
وَجُنُودِهِۦ ۚ
और उसके लश्करों के
قَالَ
कहा
ٱلَّذِينَ
उन्होंने जो
يَظُنُّونَ
यक़ीन रखते थे
أَنَّهُم
कि बेशक वो
مُّلَـٰقُوا۟
मुलाक़ात करने वाले हैं
ٱللَّهِ
अल्लाह से
كَم
कितनी ही
مِّن
of
فِئَةٍۢ
जमाअतें
قَلِيلَةٍ
कम (तादाद) की
غَلَبَتْ
ग़ालिब आ जाती है
فِئَةًۭ
जमाअतों पर
كَثِيرَةًۢ
कसीर (तादाद) की
بِإِذْنِ
by (the) permission
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह के इज़्न से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
مَعَ
साथ है
ٱلصَّـٰبِرِينَ
सब्र करने वालों के
फिर तब तालूत सेनाएँ लेकर चला तो उनने कहा, "अल्लाह निश्चित रूप से एक नदी द्वारा तुम्हारी परीक्षा लेनेवाला है। तो जिसने उसका पानी पी लिया, वह मुझमें से नहीं है और जिसने उसको नहीं चखा, वही मुझमें से है। यह और बात है कि कोई अपने हाथ से एक चुल्लू भर ले ले।" फिर उनमें से थोड़े लोगों के सिवा सभी ने उसका पानी पी लिया, फिर जब तालूत और ईमानवाले जो उसके साथ थे नदी पार कर गए तो कहने लगे, "आज हममें जालूत और उसकी सेनाओं का मुक़ाबला करने की शक्ति नहीं हैं।" इस पर लोगों ने, जो समझते थे कि उन्हें अल्लाह से मिलना है, कहा, "कितनी ही बार एक छोटी-सी टुकड़ी ने अल्लाह की अनुज्ञा से एक बड़े गिरोह पर विजय पाई है। अल्लाह तो जमनेवालो के साथ है।"
तफ़्सीर:
जब तालूत सेनाओं के साथ नगर से निकले, तो उनसे कहा : निःसंदेह अल्लाह तुम्हें एक नहर द्वारा आज़माने वाला है। सो जिसने उसमें से पी लिया, वह मेरे मार्ग पर नहीं है और युद्ध में मेरे साथ नहीं चलेगा। और जिसने उसमें से नहीं पिया, वह मेरे मार्ग पर है और युद्ध में मेरे साथ चलेगा। परंतु जो कोई मजबूर हो जाए और एक चुल्लू भर पानी पी ले, तो उस पर कुछ भी नहीं है। लेकिन सभी सैनिकों ने उससे पानी पी लिया सिवाय उनमें से थोड़े लोगों के, जिन्होंने सख़्त प्यास के बावजूद न पीने पर धैर्य से काम लिया। फिर जब तालूत और उसके साथ ईमान वालों ने नहर पार किया, तो उसके कुछ सैनिकों ने कहा : आज हमारे पास जालूत और उसके सैनिकों से लड़ने की कोई क्षमता नहीं है। उस समय उन लोगों ने, जो क़ियामत के दिन अल्लाह से मिलने पर विश्वास रखते थे, कहा : कितने ईमान वाले दल, जिनकी संख्या कम थी, अल्लाह की अनुमति और सहायता से, अधिक संख्या वाले काफ़िर दलों पर विजय प्राप्त कर चुके हैं। इसलिए विजय में ईमान का एतिबार है, अधिकता का नहीं। और अल्लाह अपने धैर्य रखने वाले बंदों के साथ है, उनका समर्थन करता और उनकी मदद करता है।
आयत 250
وَلَمَّا بَرَزُوا۟ لِجَالُوتَ وَجُنُودِهِۦ قَالُوا۟ رَبَّنَآ أَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًۭا وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا وَٱنصُرْنَا عَلَى ٱلْقَوْمِ ٱلْكَـٰفِرِينَ
وَلَمَّا
और जब
بَرَزُوا۟
वो सामने हुए
لِجَالُوتَ
जालूत के
وَجُنُودِهِۦ
और उसके लश्करों के
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
أَفْرِغْ
डाल दे
عَلَيْنَا
हम पर
صَبْرًۭا
सब्र
وَثَبِّتْ
और जमा दे
أَقْدَامَنَا
हमारे क़दमों को
وَٱنصُرْنَا
और मदद कर हमारी
عَلَى
against
ٱلْقَوْمِ
उस क़ौम पर
ٱلْكَـٰفِرِينَ
जो काफ़िर है
और जब वे जालूत और उसकी सेनाओं के मुक़ाबले पर आए तो कहा, "ऐ हमारे रब! हमपर धैर्य उडेल दे और हमारे क़दम जमा दे और इनकार करनेवाले लोगों पर हमें विजय प्रदान कर।"
तफ़्सीर:
जब वे जालूत और उसकी सेना का सामना करने के लिए निकले, तो उन्होंने अल्लाह की ओर मुतवज्जेह होकर दुआ करते हुए कहा : ऐ हमारे पालनहार! हमारे दिलों पर सब्र उँडेल दे, और हमारे पाँवों को जमा दे ताकि हम भागें नहीं और न अपने दुश्मन के सामने पराजित हों, तथा अपनी शक्ति और समर्थन के साथ काफ़िर क़ौम पर हमारी मदद कर।
आयत 251
فَهَزَمُوهُم بِإِذْنِ ٱللَّهِ وَقَتَلَ دَاوُۥدُ جَالُوتَ وَءَاتَىٰهُ ٱللَّهُ ٱلْمُلْكَ وَٱلْحِكْمَةَ وَعَلَّمَهُۥ مِمَّا يَشَآءُ ۗ وَلَوْلَا دَفْعُ ٱللَّهِ ٱلنَّاسَ بَعْضَهُم بِبَعْضٍۢ لَّفَسَدَتِ ٱلْأَرْضُ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ ذُو فَضْلٍ عَلَى ٱلْعَـٰلَمِينَ
فَهَزَمُوهُم
तो उन्होंने शिकस्त दे दी उन्हें
بِإِذْنِ
by (the) permission
ٱللَّهِ
अल्लाह के इज़्न से
وَقَتَلَ
और क़त्ल कर दिया
دَاوُۥدُ
दाऊद ने
جَالُوتَ
जालूत को
وَءَاتَىٰهُ
और अता की उसे
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلْمُلْكَ
बादशाहत
وَٱلْحِكْمَةَ
और हिकमत
وَعَلَّمَهُۥ
और उसने सिखाया उसे
مِمَّا
उसमें से जो
يَشَآءُ ۗ
उसने चाहा
وَلَوْلَا
और अगर ना होता
دَفْعُ
हटा देना
ٱللَّهِ
अल्लाह का
ٱلنَّاسَ
लोगों को
بَعْضَهُم
उनके बाज़ को
بِبَعْضٍۢ
साथ बाज़ के
لَّفَسَدَتِ
अलबत्ता फ़साद फैल जाता
ٱلْأَرْضُ
ज़मीन में
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
ٱللَّهَ
अल्लाह
ذُو
(is) Possessor
فَضْلٍ
फज़ल वाला है
عَلَى
to
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों पर
अन्ततः अल्लाह की अनुज्ञा से उन्होंने उनको पराजित कर दिया और दाऊद ने जालूत को क़त्ल कर दिया, और अल्लाह ने उसे राज्य और तत्वदर्शिता (हिकमत) प्रदान की, जो कुछ वह (दाऊद) चाहे, उससे उसको अवगत कराया। और यदि अल्लाह मनुष्यों के एक गिरोह को दूसरे गिरोह के द्वारा हटाता न रहता तो धरती की व्यवस्था बिगड़ जाती, किन्तु अल्लाह संसारवालों के लिए उदार अनुग्राही है
तफ़्सीर:
उन्होंने अल्लाह के हुक्म से उन्हें पराजित कर दिया और दाऊद ने उनके सरदार जालूत को क़त्ल कर दिया। फिर अल्लाह ने दाऊद को बादशाहत और नुबुव्वत प्रदान की और उन्हें जिस प्रकार के भी ज्ञान चाहता था, सिखाया। इस तरह दुनिया और आख़िरत के लिए जो भी चीज़ उपयुक्त थी, उनके लिए एकत्रित कर दिया। यदि अल्लाह का यह नियम न होता कि वह कुछ लोगों द्वारा कुछ लोगों के उपद्रव को हटाता है; तो निश्चय धरती उसमें उपद्रव (भ्रष्टाचार) करने वालों के प्रभुत्व से भ्रष्ट हो जाती। लेकिन, अल्लाह सभी प्राणियों पर अनुग्रह वाला है।
आयत 252
تِلْكَ ءَايَـٰتُ ٱللَّهِ نَتْلُوهَا عَلَيْكَ بِٱلْحَقِّ ۚ وَإِنَّكَ لَمِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ
تِلْكَ
ये
ءَايَـٰتُ
आयात हैं
ٱللَّهِ
अल्लाह की
نَتْلُوهَا
हम पढ़ते हैं उन्हें
عَلَيْكَ
आप पर
بِٱلْحَقِّ ۚ
साथ हक़ के
وَإِنَّكَ
और बेशक आप
لَمِنَ
(are) surely of
ٱلْمُرْسَلِينَ
अलबत्ता रसूलों में से हैं
ये अल्लाह की सच्ची आयतें है जो हम तुम्हें (सोद्देश्य) सुना रहे है और निश्चय ही तुम उन लोगों में से हो, जो रसूस बनाकर भेजे गए है
तफ़्सीर:
ये अल्लाह की खुली हुई स्पष्ट आयतें हैं, जो हम - ऐ नबी! - आपको सुनाते हैं, जिनमें सच्ची सूचनाएँ और न्यायसंगत विधान मौजूद हैं। और निःसंदेह आप सर्व संसार के पालनहार की ओर से भेजे गए रसूलों में से हैं।
आयत 253
۞ تِلْكَ ٱلرُّسُلُ فَضَّلْنَا بَعْضَهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍۢ ۘ مِّنْهُم مَّن كَلَّمَ ٱللَّهُ ۖ وَرَفَعَ بَعْضَهُمْ دَرَجَـٰتٍۢ ۚ وَءَاتَيْنَا عِيسَى ٱبْنَ مَرْيَمَ ٱلْبَيِّنَـٰتِ وَأَيَّدْنَـٰهُ بِرُوحِ ٱلْقُدُسِ ۗ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ مَا ٱقْتَتَلَ ٱلَّذِينَ مِنۢ بَعْدِهِم مِّنۢ بَعْدِ مَا جَآءَتْهُمُ ٱلْبَيِّنَـٰتُ وَلَـٰكِنِ ٱخْتَلَفُوا۟ فَمِنْهُم مَّنْ ءَامَنَ وَمِنْهُم مَّن كَفَرَ ۚ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ مَا ٱقْتَتَلُوا۟ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ يَفْعَلُ مَا يُرِيدُ
۞ تِلْكَ
ये
ٱلرُّسُلُ
रसूल
فَضَّلْنَا
फ़ज़ीलत दी हमने
بَعْضَهُمْ
उनके बाज़ को
عَلَىٰ
over
بَعْضٍۢ ۘ
बाज़ पर
مِّنْهُم
उनमें से बाज़ (वो हैं)
مَّن
जिनसे
كَلَّمَ
कलाम किया
ٱللَّهُ ۖ
अल्लाह ने
وَرَفَعَ
और उसने बुलन्द किया
بَعْضَهُمْ
उनमें से बाज़ को
دَرَجَـٰتٍۢ ۚ
दरजात में
وَءَاتَيْنَا
और दीं हमने
عِيسَى
ईसा
ٱبْنَ
son
مَرْيَمَ
इब्ने मरियम को
ٱلْبَيِّنَـٰتِ
वाज़ेह निशानियाँ
وَأَيَّدْنَـٰهُ
और क़ुव्वत दी हमने उसे
بِرُوحِ
with Spirit
ٱلْقُدُسِ ۗ
साथ रूहुल क़ुदुस के
وَلَوْ
और अगर
شَآءَ
चाहता
ٱللَّهُ
अल्लाह
مَا
ना
ٱقْتَتَلَ
बाहम लड़ते
ٱلَّذِينَ
वो जो
مِنۢ
(came) from
بَعْدِهِم
थे उनके बाद
مِّنۢ
from
بَعْدِ
बाद
مَا
उसके जो
جَآءَتْهُمُ
आ गईं उनके पास
ٱلْبَيِّنَـٰتُ
वाज़ेह निशानियाँ
وَلَـٰكِنِ
और लेकिन
ٱخْتَلَفُوا۟
उन्होंने इख़्तिलाफ़ किया
فَمِنْهُم
फिर उनमें से कोई है
مَّنْ
जो
ءَامَنَ
ईमान लाया
وَمِنْهُم
और उनमें से कोई है
مَّن
जिसने
كَفَرَ ۚ
कुफ़्र किया
وَلَوْ
और अगर
شَآءَ
चाहता
ٱللَّهُ
अल्लाह
مَا
ना
ٱقْتَتَلُوا۟
वो बाहम लड़ते
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَفْعَلُ
करता है
مَا
जो
يُرِيدُ
वो चाहता है
ये रसूल ऐसे हुए है कि इनमें हमने कुछ को कुछ पर श्रेष्ठता प्रदान की। इनमें कुछ से तो अल्लाह ने बातचीत की और इनमें से कुछ को दर्जों की स्पष्ट से उच्चता प्रदान की। और मरयम के बेटे ईसा को हमने खुली निशानियाँ दी और पवित्र आत्मा से उसकी सहायता की। और यदि अल्लाह चाहता तो वे लोग, जो उनके पश्चात हुए, खुली निशानियाँ पा लेने के बाद परस्पर न लड़ते। किन्तु वे विभेद में पड़ गए तो उनमें से कोई तो ईमान लाया और उनमें से किसी ने इनकार की नीति अपनाई। और यदि अल्लाह चाहता तो वे परस्पर न लड़ते, परन्तु अल्लाह जो चाहता है, करता है
तफ़्सीर:
ये रसूल जिनका हमने आपसे वर्णन किया है, उनमें से कुछ को हमने वह़्य, अनुयायियों और दर्जों के मामले में दूसरों पर श्रेष्ठता प्रदान की है। उनमें से कुछ वे हैं जिनसे अल्लाह ने बात की, जैसे- मूसा अलैहिस्सलाम, और उनमें से कुछ को ऊँचे पद प्रदान किए, जैसे मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम; क्योंकि आपको सभी मानव जाति के लिए भेजा गया तथा आपपर नुबुव्वत (ईश्दूतत्व) की मुहर लगा दी गई (और ईश्दूतत्व का क्रम समाप्त हो गया) और आपकी उम्मत को दूसरी उम्मतों पर श्रेष्ठता दी गई। और हमने मरयम के पुत्र ईसा को, उनकी नुबुव्वत (ईश्दूतत्व) को प्रमाणित करने वाले स्पष्ट चमत्कार दिए; जैसे मरे हुए व्यक्ति को पुनर्जीवित करना और जन्मजात अंधे और कोढ़ी को ठीक करना। तथा अल्लाह के आदेश को पूरा करने के लिए शक्ति प्रदान करने हेतु, हमने जिबरील अलैहिस्सलाम के द्वारा उनका समर्थन किया। अगर अल्लाह चाहता, तो रसूलों के बाद आने वाले लोग, उनके पास स्पष्ट निशानियाँ आ जाने के पश्चात आपस में न लड़ते। परंतु उन लोगों ने विवाद किया और वे विभाजित हो गए; उनमें से कुछ अल्लाह पर ईमान लाए और कुछ ने उसका इनकार किया। अगर अल्लाह चाहता कि वे आपस में न लड़ें, तो वे आपस में न लड़ते, लेकिन अल्लाह जो चाहता है, करता है। अतः वह जिसे चाहता है अपनी दया और अनुग्रह से ईमान की हिदायत देता है और जिसे चाहता है अपने न्याय और हिकमत से गुमराह कर देता है।
आयत 254
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَنفِقُوا۟ مِمَّا رَزَقْنَـٰكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِىَ يَوْمٌۭ لَّا بَيْعٌۭ فِيهِ وَلَا خُلَّةٌۭ وَلَا شَفَـٰعَةٌۭ ۗ وَٱلْكَـٰفِرُونَ هُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
أَنفِقُوا۟
ख़र्च करो
مِمَّا
उसमें से जो
رَزَقْنَـٰكُم
रिज़्क़ दिया हमने तुम्हें
مِّن
from
قَبْلِ
इससे पहले
أَن
कि
يَأْتِىَ
आ जाए
يَوْمٌۭ
वो दिन
لَّا
नहीं
بَيْعٌۭ
कोई ख़रीद व फ़रोख़्त
فِيهِ
उसमें
وَلَا
और ना
خُلَّةٌۭ
कोई दोस्ती
وَلَا
और ना
شَفَـٰعَةٌۭ ۗ
कोई सिफ़ारिश
وَٱلْكَـٰفِرُونَ
और जो काफ़िर हैं
هُمُ
वो ही
ٱلظَّـٰلِمُونَ
ज़ालिम हैं
ऐ ईमान लानेवालो! हमने जो कुछ तुम्हें प्रदान किया है उसमें से ख़र्च करो, इससे पहले कि वह दिन आ जाए जिसमें न कोई क्रय-विक्रय होगा और न कोई मित्रता होगी और न कोई सिफ़ारिश। ज़ालिम वही है, जिन्होंने इनकार की नीति अपनाई है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान लाने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! हमने तुम्हें विभिन्न हलाल (वैध) धन में से जो कुछ प्रदान किया है, उसमें से खर्च करो, इससे पहले कि क़ियामत का दिन आ जाए। उस समय, वहाँ न कोई क्रय-विक्रय होगा कि जिससे मनुष्य वह चीज़ प्राप्त कर सके जो उसे लाभ दे, न कोई दोस्ती होगी जो उसे संकट के समय में लाभ दे, और न ही कोई मध्यस्थता (सिफ़ारिश) होगी जो हानि को दूर करे या लाभ पहुँचाए। सिवाय इसके कि जब अल्लाह जिसे चाहे और जिससे वह प्रसन्न हो, अनुमति प्रदान कर दे। और काफ़िर लोग ही वास्तव में अत्याचारी हैं क्योंकि वे सर्वशक्तिमान अल्लाह का इनकार करते हैं।
आयत 255
ٱللَّهُ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلْحَىُّ ٱلْقَيُّومُ ۚ لَا تَأْخُذُهُۥ سِنَةٌۭ وَلَا نَوْمٌۭ ۚ لَّهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۗ مَن ذَا ٱلَّذِى يَشْفَعُ عِندَهُۥٓ إِلَّا بِإِذْنِهِۦ ۚ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ ۖ وَلَا يُحِيطُونَ بِشَىْءٍۢ مِّنْ عِلْمِهِۦٓ إِلَّا بِمَا شَآءَ ۚ وَسِعَ كُرْسِيُّهُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ ۖ وَلَا يَـُٔودُهُۥ حِفْظُهُمَا ۚ وَهُوَ ٱلْعَلِىُّ ٱلْعَظِيمُ
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ
वो ही
ٱلْحَىُّ
ज़िन्दा है
ٱلْقَيُّومُ ۚ
क़ायम रखने वाला है
لَا
Not
تَأْخُذُهُۥ
नहीं पकड़ती उसे
سِنَةٌۭ
ऊँघ
وَلَا
और ना
نَوْمٌۭ ۚ
नीन्द
لَّهُۥ
उसी के लिए है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَمَا
और जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ ۗ
ज़मीन में है
مَن
कौन है
ذَا
(is) the one
ٱلَّذِى
वो जो
يَشْفَعُ
सिफ़ारिश करे
عِندَهُۥٓ
उसके पास
إِلَّا
मगर
بِإِذْنِهِۦ ۚ
उसके इज़्न से
يَعْلَمُ
वो जानता है
مَا
जो
بَيْنَ
दर्मियान है
أَيْدِيهِمْ
उनके हाथों के
وَمَا
और जो
خَلْفَهُمْ ۖ
उनके पीछे है
وَلَا
और नहीं
يُحِيطُونَ
वो इहाता कर सकते
بِشَىْءٍۢ
किसी चीज़ का
مِّنْ
of
عِلْمِهِۦٓ
उसके इल्म में से
إِلَّا
मगर
بِمَا
जो
شَآءَ ۚ
वो चाहे
وَسِعَ
घेर रखा है
كُرْسِيُّهُ
उसकी कुर्सी ने
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ ۖ
और ज़मीन को
وَلَا
और नहीं
يَـُٔودُهُۥ
थकाती उसे
حِفْظُهُمَا ۚ
हिफ़ाज़त उन दोनों की
وَهُوَ
और वो
ٱلْعَلِىُّ
बुलन्दतर है
ٱلْعَظِيمُ
बहुत बड़ा है
अल्लाह कि जिसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं, वह जीवन्त-सत्ता है, सबको सँभालने और क़ायम रखनेवाला है। उसे न ऊँघ लगती है और न निद्रा। उसी का है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है। कौन है जो उसके यहाँ उसकी अनुमति के बिना सिफ़ारिश कर सके? वह जानता है जो कुछ उनके आगे है और जो कुछ उनके पीछे है। और वे उसके ज्ञान में से किसी चीज़ पर हावी नहीं हो सकते, सिवाय उसके जो उसने चाहा। उसकी कुर्सी (प्रभुता) आकाशों और धरती को व्याप्त है और उनकी सुरक्षा उसके लिए तनिक भी भारी नहीं और वह उच्च, महान है
तफ़्सीर:
अल्लाह वह है जिस अकेले के सिवा कोई भी वास्तविक रूप से इबादत के लायक़ नहीं है। वह जीवित है, एक पूर्ण जीवन वाला है जिसमें कोई मृत्यु या कमी नहीं है। हर चीज़ को सँभालने वाला है, जो स्वयं क़ायम है, अतः वह अपनी सारी सृष्टि से बेनियाज़ है। तथा उसी से सारी सृष्टि क़ायम है, इसलिए वे अपनी सभी स्थितियों में उससे बेनियाज़ नहीं हो सकते। उसके जीवन की पूर्णता और उसके संपूर्ण रूप से हर चीज़ को संभालने के कारण, उसे न कुछ ऊँघ आती है और न कोई नींद। जो कुछ आकाशों में और जो कुछ धरती में है, सबका अकेला वही मालिक है। उसकी अनुमति और सहमति के बिना किसी को भी उसके पास किसी के लिए सिफ़ारिश करने का अधिकार नहीं है। वह जानता है अपनी सृष्टि के पिछले मामलों को जो घटित हो चुके और जिनका वे भविष्य में सामना करने वाले हैं, जो अभी घटित नहीं हुए। और वे उस सर्वशक्तिमान के ज्ञान में से किसी भी चीज़ को अपने ज्ञान से नहीं घेर सकते, सिवाय उसके जिससे वह उन्हें स्वयं अवगत कराना चाहे। उसकी कुर्सी ने (जो उसके पाँव रखने का स्थान है) आकाशों और धरती को, उनकी विशालता और महानता के बावजूद घेर रखा है। उन दोनों का संरक्षण करना उसके लिए कुछ कठिन या भारी नहीं है। वह अपने अस्तित्व, अपनी नियति और अपने प्रभुत्व में सबसे ऊँचा, अपने राज्य और अधिकार में सबसे महान है।
आयत 256
لَآ إِكْرَاهَ فِى ٱلدِّينِ ۖ قَد تَّبَيَّنَ ٱلرُّشْدُ مِنَ ٱلْغَىِّ ۚ فَمَن يَكْفُرْ بِٱلطَّـٰغُوتِ وَيُؤْمِنۢ بِٱللَّهِ فَقَدِ ٱسْتَمْسَكَ بِٱلْعُرْوَةِ ٱلْوُثْقَىٰ لَا ٱنفِصَامَ لَهَا ۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
لَآ
(There is) no
إِكْرَاهَ
नहीं कोई जबर/ज़बरदस्ती
فِى
in
ٱلدِّينِ ۖ
दीन में
قَد
तहक़ीक़
تَّبَيَّنَ
वाज़ेह हो गई है
ٱلرُّشْدُ
हिदायत
مِنَ
from
ٱلْغَىِّ ۚ
गुमराही से
فَمَن
तो जो कोई
يَكْفُرْ
कुफ़्र करेगा
بِٱلطَّـٰغُوتِ
ताग़ूत का
وَيُؤْمِنۢ
और वो ईमान लाएगा
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
فَقَدِ
पस तहक़ीक़
ٱسْتَمْسَكَ
उसने थाम लिया
بِٱلْعُرْوَةِ
कड़ा
ٱلْوُثْقَىٰ
मज़बूत
لَا
(which) not
ٱنفِصَامَ
नहीं है कोई टूटना
لَهَا ۗ
उसके लिए
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
سَمِيعٌ
ख़ूब सुनने वाला है
عَلِيمٌ
ख़ूब जानने वाला है
धर्म के विषय में कोई ज़बरदस्ती नहीं। सही बात नासमझी की बात से अलग होकर स्पष्ट हो गई है। तो अब जो कोई बढ़े हुए सरकश को ठुकरा दे और अल्लाह पर ईमान लाए, उसने ऐसा मज़बूत सहारा थाम लिया जो कभी टूटनेवाला नहीं। अल्लाह सब कुछ सुनने, जाननेवाला है
तफ़्सीर:
इस्लाम धर्म में प्रवेश करने के लिए किसी को भी मजबूर नहीं किया जाएगा; क्योंकि यह स्पष्ट सत्य धर्म है। अतः किसी को इसे ग्रहण करने के लिए मजबूर करने की कोई आवश्यकता नहीं है। हिदायत, गुमराही से बिल्कुल स्पष्ट हो चुकी है। इसलिए जो व्यक्ति अल्लाह के अलावा पूजा की जाने वाली हर चीज़ का इनकार करे और उससे अलगाव प्रकट करे और केवल अल्लाह पर ईमान रखे; तो उसने क़ियामत के दिन मोक्ष के लिए धर्म की सबसे मज़बूत रस्सी पकड़ ली है, जो कभी नहीं टूटेगी। और अल्लाह अपने बंदों की बातों को सुनने वाला, उनके कर्मों को जानने वाला है और वह उन्हें उनका बदला देगा।
आयत 257
ٱللَّهُ وَلِىُّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ يُخْرِجُهُم مِّنَ ٱلظُّلُمَـٰتِ إِلَى ٱلنُّورِ ۖ وَٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ أَوْلِيَآؤُهُمُ ٱلطَّـٰغُوتُ يُخْرِجُونَهُم مِّنَ ٱلنُّورِ إِلَى ٱلظُّلُمَـٰتِ ۗ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ
ٱللَّهُ
अल्लाह
وَلِىُّ
दोस्त है
ٱلَّذِينَ
उनका जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
يُخْرِجُهُم
वो निकालता है उन्हें
مِّنَ
from
ٱلظُّلُمَـٰتِ
अँधेरों से
إِلَى
towards
ٱلنُّورِ ۖ
तरफ़ नूर के
وَٱلَّذِينَ
और जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
أَوْلِيَآؤُهُمُ
दोस्त उनके
ٱلطَّـٰغُوتُ
ताग़ूत हैं
يُخْرِجُونَهُم
वो निकालते है उन्हें
مِّنَ
from
ٱلنُّورِ
नूर से
إِلَى
towards
ٱلظُّلُمَـٰتِ ۗ
तरफ़ अँधेरों के
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
أَصْحَـٰبُ
साथी
ٱلنَّارِ ۖ
आग के
هُمْ
वो
فِيهَا
उसमें
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
जो लोग ईमान लाते है, अल्लाह उनका रक्षक और सहायक है। वह उन्हें अँधेरों से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाता है। रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया तो उनके संरक्षक बढ़े हुए सरकश है। वे उन्हें प्रकाश से निकालकर अँधेरों की ओर ले जाते है। वही आग (जहन्नम) में पड़नेवाले है। वे उसी में सदैव रहेंगे
तफ़्सीर:
अल्लाह उन लोगों की देखभाल (संरक्षण) करता है जो उस पर ईमान लाए हैं, वह उन्हें सामर्थ्य प्रदान करता और उनकी सहायता करता है, तथा उन्हें कुफ़्र और अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ईमान और ज्ञान के प्रकाश में लाता है। और जिन लोगों ने कुफ़्र किया, उनके संरक्षक वे मूर्तियाँ और साझेदार हैं, जिन्होंने उनके लिए कुफ़्र को सुशोभित किया है। और उन्हें ईमान और ज्ञान के प्रकाश से निकालकर कुफ़्र और अज्ञानता के अँधियारों में डाल दिया है। वे लोग आग (दोज़ख़) वाले हैं, वे हमेशा उसी में रहेंगे।
आयत 258
أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِى حَآجَّ إِبْرَٰهِـۧمَ فِى رَبِّهِۦٓ أَنْ ءَاتَىٰهُ ٱللَّهُ ٱلْمُلْكَ إِذْ قَالَ إِبْرَٰهِـۧمُ رَبِّىَ ٱلَّذِى يُحْىِۦ وَيُمِيتُ قَالَ أَنَا۠ أُحْىِۦ وَأُمِيتُ ۖ قَالَ إِبْرَٰهِـۧمُ فَإِنَّ ٱللَّهَ يَأْتِى بِٱلشَّمْسِ مِنَ ٱلْمَشْرِقِ فَأْتِ بِهَا مِنَ ٱلْمَغْرِبِ فَبُهِتَ ٱلَّذِى كَفَرَ ۗ وَٱللَّهُ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلظَّـٰلِمِينَ
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
إِلَى
[towards]
ٱلَّذِى
तरफ़ उसके जिसने
حَآجَّ
झगड़ा किया
إِبْرَٰهِـۧمَ
इब्राहीम से
فِى
concerning
رَبِّهِۦٓ
उसके रब के बारे में
أَنْ
कि
ءَاتَىٰهُ
अता की उसे
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلْمُلْكَ
बादशाहत
إِذْ
जब
قَالَ
कहा
إِبْرَٰهِـۧمُ
इब्राहीम ने
رَبِّىَ
मेरा रब
ٱلَّذِى
वो है जो
يُحْىِۦ
ज़िन्दा करता है
وَيُمِيتُ
और वो मौत देता है
قَالَ
उसने कहा
أَنَا۠
मैं
أُحْىِۦ
मैं ज़िन्दा करता हूँ
وَأُمِيتُ ۖ
और मैं मौत देता हूँ
قَالَ
कहा
إِبْرَٰهِـۧمُ
इब्राहीम ने
فَإِنَّ
पस बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَأْتِى
लाता है
بِٱلشَّمْسِ
सूरज को
مِنَ
from
ٱلْمَشْرِقِ
मशरिक़ से
فَأْتِ
पस तुम ले आओ
بِهَا
उसे
مِنَ
from
ٱلْمَغْرِبِ
मग़रिब से
فَبُهِتَ
पस मबहूत रह गया
ٱلَّذِى
वो जिसने
كَفَرَ ۗ
कुफ़्र किया था
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
لَا
(does) not
يَهْدِى
नहीं वो हिदायत देता
ٱلْقَوْمَ
उन लोगों को
ٱلظَّـٰلِمِينَ
जो ज़ालिम हैं
क्या तुमने उनको नहीं देखा, जिसने इबराहीम से उसके 'रब' के सिलसिले में झगड़ा किया था, इस कारण कि अल्लाह ने उसको राज्य दे रखा था? जब इबराहीम ने कहा, "मेरा 'रब' वह है जो जिलाता और मारता है।" उसने कहा, "मैं भी तो जिलाता और मारता हूँ।" इबराहीम ने कहा, "अच्छा तो अल्लाह सूर्य को पूरब से लाता है, तो तू उसे पश्चिम से ले आ।" इसपर वह अधर्मी चकित रह गया। अल्लाह ज़ालिम लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) क्या आपने उस सरकश की जुर्अत (दुःसाहस) से अधिक आश्चर्यजनक चीज़ देखी, जिसने इबराहीम अलैहिस्सलाम से अल्लाह की रुबूबियत (ईश्वरत्व) और तौहीद (एकेश्वरवाद) के संबंध में बहस की? उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि अल्लाह ने उसे राज्य प्रदान किया, जिससे वह सरकश हो गया। इसपर इबराहीम अलैहिस्सलाम ने उससे अपने पालनहार की विशेषताओं का वर्णन करते हुए कहा : मेरा रब वह है, जो प्राणियों को जीवन और मृत्यु देता है। उस सरकश ने दुराग्रह से कहा : मैं भी जीवन और मृत्यु देता हूँ, इस प्रकार कि मैं जिसे चाहता हूँ, क़त्ल कर देता हूँ और जिसे चाहता हूँ, छोड़ देता हूँ। तब इबराहीम अलैहिस्सलाम ने एक दूसरा उससे बड़ा तर्क प्रस्तुत किया, आपने उससे कहा : मेरा पालनहार, जिसकी मैं इबादत करता हूँ, पूर्व दिशा से सूर्य लाता है, अतः तू उसे पश्चिम की दिशा से ले आ। इसपर वह सरकश चकित रह गया और उससे कोई जवाब नहीं बन पड़ा, तथा तर्क की शक्ति से पराजित हो गया। और अल्लाह अत्याचारियों को, उनके अत्याचार और सरकशी के कारण, अपने पथ पर चलने की तौफीक़ नहीं देता।
आयत 259
أَوْ كَٱلَّذِى مَرَّ عَلَىٰ قَرْيَةٍۢ وَهِىَ خَاوِيَةٌ عَلَىٰ عُرُوشِهَا قَالَ أَنَّىٰ يُحْىِۦ هَـٰذِهِ ٱللَّهُ بَعْدَ مَوْتِهَا ۖ فَأَمَاتَهُ ٱللَّهُ مِا۟ئَةَ عَامٍۢ ثُمَّ بَعَثَهُۥ ۖ قَالَ كَمْ لَبِثْتَ ۖ قَالَ لَبِثْتُ يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍۢ ۖ قَالَ بَل لَّبِثْتَ مِا۟ئَةَ عَامٍۢ فَٱنظُرْ إِلَىٰ طَعَامِكَ وَشَرَابِكَ لَمْ يَتَسَنَّهْ ۖ وَٱنظُرْ إِلَىٰ حِمَارِكَ وَلِنَجْعَلَكَ ءَايَةًۭ لِّلنَّاسِ ۖ وَٱنظُرْ إِلَى ٱلْعِظَامِ كَيْفَ نُنشِزُهَا ثُمَّ نَكْسُوهَا لَحْمًۭا ۚ فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُۥ قَالَ أَعْلَمُ أَنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ
أَوْ
या
كَٱلَّذِى
मानिन्द उसके जो
مَرَّ
गुज़रा
عَلَىٰ
ऊपर
قَرْيَةٍۢ
एक बस्ती के
وَهِىَ
और वो
خَاوِيَةٌ
गिरी हुई थी
عَلَىٰ
on
عُرُوشِهَا
अपनी छतों पर
قَالَ
उसने कहा
أَنَّىٰ
किस तरह
يُحْىِۦ
ज़िन्दा करेगा
هَـٰذِهِ
इसको
ٱللَّهُ
अल्लाह
بَعْدَ
बाद
مَوْتِهَا ۖ
इसकी मौत के
فَأَمَاتَهُ
तो मौत दे दी उसे
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِا۟ئَةَ
सौ
عَامٍۢ
साल
ثُمَّ
फिर
بَعَثَهُۥ ۖ
उसने उठाया उसे
قَالَ
फ़रमाया
كَمْ
कितना (अरसा)
لَبِثْتَ ۖ
ठहरे रहे तुम
قَالَ
उसने कहा
لَبِثْتُ
ठहरा रहा मैं
يَوْمًا
एक दिन
أَوْ
या
بَعْضَ
कुछ हिस्सा
يَوْمٍۢ ۖ
दिन का
قَالَ
फ़रमाया
بَل
बल्कि
لَّبِثْتَ
ठहरे रहे तुम
مِا۟ئَةَ
सौ
عَامٍۢ
साल
فَٱنظُرْ
पस देखो
إِلَىٰ
तरफ़
طَعَامِكَ
अपने खाने के
وَشَرَابِكَ
और अपने पीने के
لَمْ
नहीं
يَتَسَنَّهْ ۖ
बासी हुआ वो
وَٱنظُرْ
और देखो
إِلَىٰ
तरफ़
حِمَارِكَ
अपने गधे के
وَلِنَجْعَلَكَ
और ताकि हम बना दें तुम्हें
ءَايَةًۭ
एक निशानी
لِّلنَّاسِ ۖ
लोगों के लिए
وَٱنظُرْ
और देखो
إِلَى
तरफ़
ٱلْعِظَامِ
हड्डियों के
كَيْفَ
किस तरह
نُنشِزُهَا
हम उठा कर जोड़ते हैं उन्हें
ثُمَّ
फिर
نَكْسُوهَا
हम पहनाते हैं उन्हें
لَحْمًۭا ۚ
गोश्त
فَلَمَّا
फिर जब
تَبَيَّنَ
वाज़ेह हो गया
لَهُۥ
उसके लिए
قَالَ
उसने कहा
أَعْلَمُ
मैं जानता हूँ
أَنَّ
कि बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌۭ
बहुत क़ादिर है
या उस जैसे (व्यक्ति) को नहीं देखा, जिसका एक ऐसी बस्ती पर से गुज़र हुआ, जो अपनी छतों के बल गिरी हुई थी। उसने कहा, "अल्लाह इसके विनष्ट हो जाने के पश्चात इसे किस प्रकार जीवन प्रदान करेगा?" तो अल्लाह ने उसे सौ वर्ष की मृत्यु दे दी, फिर उसे उठा खड़ा किया। कहा, "तू कितनी अवधि तक इस अवस्था नें रहा।" उसने कहा, "मैं एक या दिन का कुछ हिस्सा रहा।" कहा, "नहीं, बल्कि तू सौ वर्ष रहा है। अब अपने खाने और पीने की चीज़ों को देख ले, उन पर समय का कोई प्रभाव नहीं, और अपने गधे को भी देख, और यह इसलिए कह रहे है ताकि हम तुझे लोगों के लिए एक निशानी बना दें और हड्डियों को देख कि किस प्रकार हम उन्हें उभारते है, फिर, उनपर माँस चढ़ाते है।" तो जब वास्तविकता उस पर प्रकट हो गई तो वह पुकार उठा, " मैं जानता हूँ कि अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है।"
तफ़्सीर:
या क्या आपने उस व्यक्ति की तरह कोई आदमी देखा है, जिसका गुज़र एक ऐसी बस्ती से हुआ, जिसकी छतें गिर गई थीं, उसकी दीवारें ढह गई थीं और उसके निवासी नष्ट हो गए थे, इसलिए वह एक सुनसान उजाड़ बन गई थी? उस आदमी ने आश्चर्य से कहा : अल्लाह इस बस्ती के लोगों को मरने के बाद कैसे पुनर्जीवित करेगा?! तो अल्लाह ने उसे एक सौ साल के लिए मौत दे दी, फिर उसे जीवित किया और उससे पूछा : तू कितने समय तक मरा हुआ रहा? उसने उत्तर दिया : मैं एक दिन या उसका कुछ भाग रहा हूँ। अल्लाह ने उससे कहा : बल्कि, तू पूरे सौ साल रहा है। इसलिए तेरे साथ जो खाना और पानी था उसे देख। वह अपनी हालत पर बाक़ी है, उसमें कोई बदलाव नही आया। हालाँकि सबसे तेज़ बदलाव खाना और पानी में होता है। तथा तू अपने मरे हुए गधे को देख। हमने ऐसा इसलिए किया, ताकि हम तुझे लोगों के लिए इस बात की स्पष्ट निशानी बना दें कि अल्लाह उन्हें दोबारा ज़िंदा करने की पूरी शक्ति रखता है। तथा तू अपने गधे की हड्डियों को देख जो बिखरी हुई और अलग हो गई हैं, हम उन्हें कैसे उठाते हैं और उन्हें एक साथ जोड़ते हैं, फिर उसके बाद उनपर माँस चढ़ाते हैं और उन्हें फिर से जीवित कर देते हैं। जब उसने यह देखा, तो उसके लिए मामले की वास्तविकता स्पष्ट हो गई और उसने अल्लाह की शक्ति को जान लिया। इसलिए उसने इसे स्वीकारते हुए कहा : मैं जानता हूँ कि अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है।
आयत 260
وَإِذْ قَالَ إِبْرَٰهِـۧمُ رَبِّ أَرِنِى كَيْفَ تُحْىِ ٱلْمَوْتَىٰ ۖ قَالَ أَوَلَمْ تُؤْمِن ۖ قَالَ بَلَىٰ وَلَـٰكِن لِّيَطْمَئِنَّ قَلْبِى ۖ قَالَ فَخُذْ أَرْبَعَةًۭ مِّنَ ٱلطَّيْرِ فَصُرْهُنَّ إِلَيْكَ ثُمَّ ٱجْعَلْ عَلَىٰ كُلِّ جَبَلٍۢ مِّنْهُنَّ جُزْءًۭا ثُمَّ ٱدْعُهُنَّ يَأْتِينَكَ سَعْيًۭا ۚ وَٱعْلَمْ أَنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌۭ
وَإِذْ
और जब
قَالَ
कहा
إِبْرَٰهِـۧمُ
इब्राहीम ने
رَبِّ
ऐ मेरे रब
أَرِنِى
दिखा मुझे
كَيْفَ
किस तरह
تُحْىِ
तू ज़िन्दा करेगा
ٱلْمَوْتَىٰ ۖ
मुर्दों को
قَالَ
फ़रमाया
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
تُؤْمِن ۖ
तुम ईमान रखते
قَالَ
उसने कहा
بَلَىٰ
क्यों नहीं
وَلَـٰكِن
और लेकिन
لِّيَطْمَئِنَّ
ताकि मुत्मईन हो जाए
قَلْبِى ۖ
दिल मेरा
قَالَ
फ़रमाया
فَخُذْ
पस ले लो
أَرْبَعَةًۭ
चार
مِّنَ
of
ٱلطَّيْرِ
परिन्दों में से
فَصُرْهُنَّ
फिर माइल करो उन्हें
إِلَيْكَ
तरफ़ अपने
ثُمَّ
फिर
ٱجْعَلْ
रख दो
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
جَبَلٍۢ
पहाड़ के
مِّنْهُنَّ
उनमें से
جُزْءًۭا
एक हिस्सा
ثُمَّ
फिर
ٱدْعُهُنَّ
बुलाओ उन्हें
يَأْتِينَكَ
वो आ जाऐंगे तेरे पास
سَعْيًۭا ۚ
दौड़ते हुए
وَٱعْلَمْ
और जान लो
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَزِيزٌ
बहुत ज़बरदस्त है
حَكِيمٌۭ
ख़ूब हिकमत वाला है
और याद करो जब इबराहीम ने कहा, "ऐ मेरे रब! मुझे दिखा दे, तू मुर्दों को कैसे जीवित करेगा?" कहा," क्या तुझे विश्वास नहीं?" उसने कहा,"क्यों नहीं, किन्तु निवेदन इसलिए है कि मेरा दिल संतुष्ट हो जाए।" कहा, "अच्छा, तो चार पक्षी ले, फिर उन्हें अपने साथ भली-भाँति हिला-मिला से, फिर उनमें से प्रत्येक को एक-एक पर्वत पर रख दे, फिर उनको पुकार, वे तेरे पास लपककर आएँगे। और जान ले कि अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।"
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) उस समय को याद कीजिए जब इबराहीम अलैहिस्सलाम ने कहा : ऐ मेरे रब! मुझे मेरी दृष्टि से दिखा कि मुर्दों को पुनर्जीवित करना कैसे होगा? अल्लाह ने उनसे कहा : क्या तुमने इस बात पर विश्वास नहीं किया? इबराहीम ने उत्तर दिया : क्यों नहीं, मैंने विश्वास किया, परंतु यह मेरे दिल के आश्वासन में वृद्धि के उद्देश्य से है। अल्लाह ने उन्हें आदेश किया और फरमाया : चार पक्षियों को ले लो, फिर उन्हें अपने से अच्छी तरह परचा लो और उनके टुकड़े-दुकड़े कर दो, फिर अपने आस-पास के पहाड़ों में से हर पहाड़ पर उनका एक हिस्सा रख दो, फिर उन्हें बुलाओ। वे तुम्हारे पास दोड़ते हुए आएँगे, उनमें जीवन लौट आया होगा। और ऐ इबराहीम! जान लो कि अल्लाह अपने राज्य में बहुत प्रभुत्वशाली और अपने आदेश, विधान और रचना में पूर्ण हिकमत वाला है।
आयत 261
مَّثَلُ ٱلَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَٰلَهُمْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ كَمَثَلِ حَبَّةٍ أَنۢبَتَتْ سَبْعَ سَنَابِلَ فِى كُلِّ سُنۢبُلَةٍۢ مِّا۟ئَةُ حَبَّةٍۢ ۗ وَٱللَّهُ يُضَـٰعِفُ لِمَن يَشَآءُ ۗ وَٱللَّهُ وَٰسِعٌ عَلِيمٌ
مَّثَلُ
मिसाल
ٱلَّذِينَ
उनकी जो
يُنفِقُونَ
ख़र्च करते हैं
أَمْوَٰلَهُمْ
अपने मालों को
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
كَمَثَلِ
मानिन्द मिसाल
حَبَّةٍ
एक दाने के है
أَنۢبَتَتْ
उसने उगाईं
سَبْعَ
सात
سَنَابِلَ
बालियाँ
فِى
in
كُلِّ
each
سُنۢبُلَةٍۢ
हर बाली में
مِّا۟ئَةُ
सौ
حَبَّةٍۢ ۗ
दाने
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يُضَـٰعِفُ
बढ़ाता है
لِمَن
जिसके लिए
يَشَآءُ ۗ
वो चाहता है
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
وَٰسِعٌ
वुसअत वाला है
عَلِيمٌ
ख़ूब जानने वाला है
जो लोग अपने माल अल्लाह के मार्ग में ख़र्च करते है, उनकी उपमा ऐसी है, जैसे एक दाना हो, जिससे सात बालें निकलें और प्रत्येक बाल में सौ दाने हो। अल्लाह जिसे चाहता है बढ़ोतरी प्रदान करता है। अल्लाह बड़ी समाईवाला, जाननेवाला है
तफ़्सीर:
अल्लाह के मार्ग में अपना धन खर्च करने वाले मोमिनों के सवाब का उदहारण एक दाने की तरह है, जिसे किसान एक अच्छी भूमि में डालता है, फिर उससे सात बालियाँ निकलती हैं, जिनमें से प्रत्येक बाली में एक सौ दाने होते हैं। अल्लाह अपने बंदों में से जिसका चाहता है, सवाब बढ़ा देता है, चुनाँचे वह उन्हें उनका प्रतिफल बिना हिसाब देता है। और अल्लाह अनुग्रह और देने में बहुत विस्तार वाला है, वह ख़ूब जानता है कि कौन कई गुना बढ़ाकर दिए जाने का हक़दार है।
आयत 262
ٱلَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَٰلَهُمْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ثُمَّ لَا يُتْبِعُونَ مَآ أَنفَقُوا۟ مَنًّۭا وَلَآ أَذًۭى ۙ لَّهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जो
يُنفِقُونَ
ख़र्च करते हैं
أَمْوَٰلَهُمْ
अपने मालों को
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
ثُمَّ
फिर
لَا
not
يُتْبِعُونَ
नहीं वो पीछे लाते
مَآ
उसके जो
أَنفَقُوا۟
उन्होंने ख़र्च किया
مَنًّۭا
एहसान को
وَلَآ
और ना
أَذًۭى ۙ
अज़ियत को
لَّهُمْ
उनके लिए है
أَجْرُهُمْ
अजर उनका
عِندَ
पास
رَبِّهِمْ
उनके रब के
وَلَا
और ना
خَوْفٌ
कोई ख़ौफ़ होगा
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يَحْزَنُونَ
वो ग़मगीन होंगे
जो लोग अपने माल अल्लाह के मार्ग में ख़र्च करते है, फिर ख़र्च करके उसका न एहसान जताते है और न दिल दुखाते है, उनका बदला उनके अपने रब के पास है। और न तो उनके लिए कोई भय होगा और न वे दुखी होंगे
तफ़्सीर:
जो लोग अपना धन अल्लाह की आज्ञाकारिता और उसकी प्रसन्नता की चीज़ों में खर्च करते हैं, फिर अपने खर्च करने के बाद कोई ऐसा काम नहीं करते, जो उसके प्रतिफल को नष्ट करने वाला हो, जैसे कि अपने शब्द या कर्म से लोगों पर उपकार जताना, उनके लिए उनका प्रतिफल उनके पालनहार के पास है। वे जिस चीज़ का सामना करने वाले है उसमें उनके लिए कोई भय नहीं है, और न ही वे, उन्हें प्राप्त नेमतों की महानता के कारण, बीत चुकी चीज़ों पर शोक करेंगे।
आयत 263
۞ قَوْلٌۭ مَّعْرُوفٌۭ وَمَغْفِرَةٌ خَيْرٌۭ مِّن صَدَقَةٍۢ يَتْبَعُهَآ أَذًۭى ۗ وَٱللَّهُ غَنِىٌّ حَلِيمٌۭ
۞ قَوْلٌۭ
बात
مَّعْرُوفٌۭ
अच्छी (कहना)
وَمَغْفِرَةٌ
और माफ़ करना
خَيْرٌۭ
बेहतर है
مِّن
than
صَدَقَةٍۢ
उस सदक़े से
يَتْبَعُهَآ
पीछे आए जिसके
أَذًۭى ۗ
कोई अज़ियत
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
غَنِىٌّ
बड़ा बेनियाज़ है
حَلِيمٌۭ
बहुत बुर्दबार है
एक भली बात कहनी और क्षमा से काम लेना उस सदक़े से अच्छा है, जिसके पीछे दुख हो। और अल्लाह अत्यन्कृत निस्पृह (बेनियाज़), सहनशील है
तफ़्सीर:
एक अच्छी बात जिससे आप किसी ईमान वाले के दिल में खुशी ले आएँ, और जिस व्यक्ति ने आपके साथ दुर्व्यवहार किया है, क्षमा कर दें; यह उस दान से बेहतर है, जिसके बाद उस आदमी पर उपकार जताकर कष्ट दिया जाए, जिसपर दान किया गया है। और अल्लाह अपने बंदों से बहुत बेनियाज़, अत्यंत सहनशील है उन्हें दंड देने में जल्दी नहीं करता है।
आयत 264
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تُبْطِلُوا۟ صَدَقَـٰتِكُم بِٱلْمَنِّ وَٱلْأَذَىٰ كَٱلَّذِى يُنفِقُ مَالَهُۥ رِئَآءَ ٱلنَّاسِ وَلَا يُؤْمِنُ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۖ فَمَثَلُهُۥ كَمَثَلِ صَفْوَانٍ عَلَيْهِ تُرَابٌۭ فَأَصَابَهُۥ وَابِلٌۭ فَتَرَكَهُۥ صَلْدًۭا ۖ لَّا يَقْدِرُونَ عَلَىٰ شَىْءٍۢ مِّمَّا كَسَبُوا۟ ۗ وَٱللَّهُ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلْكَـٰفِرِينَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Do) not
تُبْطِلُوا۟
ना तुम ज़ाया करो
صَدَقَـٰتِكُم
अपने सदक़ात को
بِٱلْمَنِّ
साथ एहसान
وَٱلْأَذَىٰ
और अज़ियत के
كَٱلَّذِى
उसकी तरह जो
يُنفِقُ
ख़र्च करता है
مَالَهُۥ
माल अपना
رِئَآءَ
दिखाने के लिए
ٱلنَّاسِ
लोगों को
وَلَا
और नहीं
يُؤْمِنُ
वो ईमान लाता
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَٱلْيَوْمِ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرِ ۖ
और आख़िरी दिन पर
فَمَثَلُهُۥ
तो मिसाल उसकी
كَمَثَلِ
मानिन्द मिसाल
صَفْوَانٍ
चिकने पत्थर के है
عَلَيْهِ
जिस पर
تُرَابٌۭ
मिट्टी हो
فَأَصَابَهُۥ
तो पहुँचे उसे
وَابِلٌۭ
तेज़ बारिश
فَتَرَكَهُۥ
तो वो छोड़ दे उसे
صَلْدًۭا ۖ
साफ़ चट्टान
لَّا
Not
يَقْدِرُونَ
नहीं वो क़ुदरत रखते होंगे
عَلَىٰ
on
شَىْءٍۢ
किसी चीज़ पर
مِّمَّا
उसमें से जो
كَسَبُوا۟ ۗ
उन्होंने कमाई की
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
لَا
(does) not
يَهْدِى
नहीं वो हिदायत देता
ٱلْقَوْمَ
उन लोगों को
ٱلْكَـٰفِرِينَ
जो काफ़िर हैं
ऐ ईमानवालो! अपने सदक़ो को एहसान जताकर और दुख देकर उस व्यक्ति की तरह नष्ट न करो जो लोगों को दिखाने के लिए अपना माल ख़र्च करता है और अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान नहीं रखता। तो उसकी हालत उस चट्टान जैसी है जिसपर कुछ मिट्टी पड़ी हुई थी, फिर उस पर ज़ोर की वर्षा हुई और उसे साफ़ चट्टान की दशा में छोड़ गई। ऐसे लोग अपनी कमाई कुछ भी प्राप्त नहीं करते। और अल्लाह इनकार की नीति अपनानेवालों को मार्ग नहीं दिखाता
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! जिसे दान दिया गया है, उसपर एहसान जताकर और उसे कष्ट पहुँचाकर अपने दान का प्रतिफल खराब न करो। क्योंकि ऐसा करने वाले का उदाहरण उस व्यक्ति के समान है जो अपना धन इस इरादे से खर्च करता है कि लोग उसे देखें और उसकी प्रशंसा करें। और वह एक काफ़िर व्यक्ति है, जो न अल्लाह पर और न क़ियामत के दिन और उसमें मौजूद सवाब एवं सज़ा पर ईमान रखता है। तो इसका उदाहरण एक चिकने पत्थर जैसा है, जिसपर मिट्टी पड़ी हो, फिर उसपर तेज़ बारिश हो जाए और वह पत्थर से मिट्टी को हटा दे और उसे चिकना छोड़ दे, उसपर कोई चीज़ न हो। इसी तरह दिखावा करने वालों का मामला है, उनके कार्यों और खर्च का सवाब समाप्त हो जाता है और उसमें से कुछ भी अल्लाह के पास बाक़ी नहीं रहता। और अल्लाह काफ़िरों को उसकी हिदायत नहीं देता, जिससे वह सर्वशक्तिमान प्रसन्न होता है और जो उन्हें उनके कार्यों और उनके खर्च में लाभ पहुँचाए।
आयत 265
وَمَثَلُ ٱلَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَٰلَهُمُ ٱبْتِغَآءَ مَرْضَاتِ ٱللَّهِ وَتَثْبِيتًۭا مِّنْ أَنفُسِهِمْ كَمَثَلِ جَنَّةٍۭ بِرَبْوَةٍ أَصَابَهَا وَابِلٌۭ فَـَٔاتَتْ أُكُلَهَا ضِعْفَيْنِ فَإِن لَّمْ يُصِبْهَا وَابِلٌۭ فَطَلٌّۭ ۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ
وَمَثَلُ
और मिसाल
ٱلَّذِينَ
उनकी जो
يُنفِقُونَ
ख़र्च करते है
أَمْوَٰلَهُمُ
अपने माल
ٱبْتِغَآءَ
चाहने के लिए
مَرْضَاتِ
रज़ामन्दी
ٱللَّهِ
अल्लाह की
وَتَثْبِيتًۭا
और पुख़्तगी के लिए
مِّنْ
from
أَنفُسِهِمْ
अपने नफ़्सों की
كَمَثَلِ
मानिन्द मिसाल
جَنَّةٍۭ
एक बाग़ के है
بِرَبْوَةٍ
ऊँची जगह पर
أَصَابَهَا
पहुँचे उसे
وَابِلٌۭ
तेज़ बारिश
فَـَٔاتَتْ
तो वो दे
أُكُلَهَا
फल अपना
ضِعْفَيْنِ
दोगुना
فَإِن
फिर अगर
لَّمْ
ना
يُصِبْهَا
पहुँचे उसे
وَابِلٌۭ
तेज़ बारिश
فَطَلٌّۭ ۗ
तो फुहार (ही काफ़ी है)
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بِمَا
उसे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
بَصِيرٌ
ख़ूब देखने वाला है
और जो लोग अपने माल अल्लाह की प्रसन्नता के संसाधनों की तलब में और अपने दिलों को जमाव प्रदान करने के कारण ख़र्च करते है उनकी हालत उस बाग़़ की तरह है जो किसी अच्छी और उर्वर भूमि पर हो। उस पर घोर वर्षा हुई तो उसमें दुगुने फल आए। फिर यदि घोर वर्षा उस पर नहीं हुई, तो फुहार ही पर्याप्त होगी। तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह उसे देख रहा है
तफ़्सीर:
उन ईमान वालों का उदाहरण, जो अपना धन अल्लाह की प्रसन्नता की तलाश में खर्च करते हैं, इस हाल में कि उनके दिल बिना किसी मजबूरी के अल्लाह के वादे की सच्चाई से आश्वस्त होते हैं, उस बाग़ के उदाहरण जैसा है, जो किसी अच्छे ऊँचे स्थान पर हो। जिसपर एक भारी बारिश बरसे, तो वह (बाग़) दुगना फल उत्पन्न करे। फिर यदि उसपर भारी वर्षा न हो, तो उस पर एक हल्की वर्षा हो, जो उस भूमि के अच्छी होने के कारण उसके लिए काफी हो। इसी तरह, निष्ठावान लोगों के खर्च को अल्लाह स्वीकार करता और उनके प्रतिफल को कई गुना कर देता है, भले ही वह कम हो। और अल्लाह जो कुछ तुम करते हो, उसे देख रहा है। उससे दिखावा करने वालों और निष्ठा के साथ खर्च करने वालों का हाल छिपा हुआ नहीं है और वह प्रत्येक को वह बदला देगा, जिसका वह योग्य है।
आयत 266
أَيَوَدُّ أَحَدُكُمْ أَن تَكُونَ لَهُۥ جَنَّةٌۭ مِّن نَّخِيلٍۢ وَأَعْنَابٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ لَهُۥ فِيهَا مِن كُلِّ ٱلثَّمَرَٰتِ وَأَصَابَهُ ٱلْكِبَرُ وَلَهُۥ ذُرِّيَّةٌۭ ضُعَفَآءُ فَأَصَابَهَآ إِعْصَارٌۭ فِيهِ نَارٌۭ فَٱحْتَرَقَتْ ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمُ ٱلْـَٔايَـٰتِ لَعَلَّكُمْ تَتَفَكَّرُونَ
أَيَوَدُّ
क्या चाहता है
أَحَدُكُمْ
कोई एक तुम में से
أَن
कि
تَكُونَ
हो
لَهُۥ
उसके लिए
جَنَّةٌۭ
एक बाग़
مِّن
of
نَّخِيلٍۢ
खजूरों का
وَأَعْنَابٍۢ
और अँगूरों का
تَجْرِى
बहती हों
مِن
[from]
تَحْتِهَا
उसके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
لَهُۥ
उसके लिए
فِيهَا
उस में
مِن
of
كُلِّ
हर तरह के
ٱلثَّمَرَٰتِ
फल हों
وَأَصَابَهُ
और पहुँचे उसे
ٱلْكِبَرُ
बुढ़ापा
وَلَهُۥ
और उसकी
ذُرِّيَّةٌۭ
औलाद हो
ضُعَفَآءُ
कमज़ोर (छोटी)
فَأَصَابَهَآ
फिर पहुँचे उसे
إِعْصَارٌۭ
एक बगोला
فِيهِ
जिसमें
نَارٌۭ
आग हो
فَٱحْتَرَقَتْ ۗ
पस वो जल जाए
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يُبَيِّنُ
वाज़ेह करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْـَٔايَـٰتِ
निशानियाँ
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَتَفَكَّرُونَ
तुम ग़ौरो फ़िक्र करो
क्या तुममें से कोई यह चाहेगा कि उसके पास ख़जूरों और अंगूरों का एक बाग़ हो, जिसके नीचे नहरें बह रही हो, वहाँ उसे हर प्रकार के फल प्राप्त हो और उसका बुढ़ापा आ गया हो और उसके बच्चे अभी कमज़ोर ही हों कि उस बाग़ पर एक आग भरा बगूला आ गया, और वह जलकर रह गया? इस प्रकार अल्लाह तुम्हारे सामने आयतें खोल-खोलकर बयान करता है, ताकि सोच-विचार करो
तफ़्सीर:
क्या तुममें से किसी को पसंद है कि उसके पास खजूरों और अँगूरों का एक बाग़ हो, जिसके बीच से मीठा पानी बहता हो। उस बाग़ में उसके लिए प्रत्येक प्रकार के अच्छे फल हों। उस बाग़ के मालिक को बुढ़ापा आ पहुँचे और वह इतना बूढ़ा हो गया हो कि काम करने और कमाने में असमर्थ हो, तथा उसके कमज़ोर छोटे-छोटे बच्चे हों, जो काम न कर सकते हों। फिर उस बाग़ पर एक आँधी चले, जिसमें एक तेज़ आग हो और सारा बाग़ जलकर खाक हो जाए। हालाँकि अपने बुढ़ापे और अपने बच्चों की कमज़ोरी के कारण उसे इसकी सख़्त ज़रूरत थी?! अतः लोगों को दिखाने के लिए अपना धन खर्च करने वाले की स्थिति इसी आदमी की तरह है; वह क़ियामत के दिन अल्लाह के पास बिना नेकियों के आएगा, एक ऐसे समय में जब उसे उनकी सबसे अधिक आवश्यकता होगी। इसी प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए वे चीज़ें खोल-खोलकर बयान करती है, जो दुनिया और आख़िरत में तुम्हें लाभ पहुँचाने वाली हैं, ताकि तुम उनपर चिंतन करो।
आयत 267
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَنفِقُوا۟ مِن طَيِّبَـٰتِ مَا كَسَبْتُمْ وَمِمَّآ أَخْرَجْنَا لَكُم مِّنَ ٱلْأَرْضِ ۖ وَلَا تَيَمَّمُوا۟ ٱلْخَبِيثَ مِنْهُ تُنفِقُونَ وَلَسْتُم بِـَٔاخِذِيهِ إِلَّآ أَن تُغْمِضُوا۟ فِيهِ ۚ وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ ٱللَّهَ غَنِىٌّ حَمِيدٌ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
أَنفِقُوا۟
ख़र्च करो
مِن
from
طَيِّبَـٰتِ
पाकीज़ा चीज़ों में से
مَا
जो
كَسَبْتُمْ
कमाईं तुमने
وَمِمَّآ
और उसमें से जो
أَخْرَجْنَا
निकाला हमने
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنَ
from
ٱلْأَرْضِ ۖ
ज़मीन से
وَلَا
और ना
تَيَمَّمُوا۟
तुम इरादा करो
ٱلْخَبِيثَ
नापाक का
مِنْهُ
उसमें से जो
تُنفِقُونَ
तुम ख़र्च करते हो
وَلَسْتُم
हालाँकि नहीं तुम
بِـَٔاخِذِيهِ
लेने वाले उसे
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
تُغْمِضُوا۟
तुम चश्म पोशी कर जाओ
فِيهِ ۚ
उसमें
وَٱعْلَمُوٓا۟
और जान लो
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَنِىٌّ
बहुत बेनियाज़ है
حَمِيدٌ
बहुत तारीफ़ वाला है
ऐ ईमान लानेवालो! अपनी कमाई को पाक और अच्छी चीज़ों में से ख़र्च करो और उन चीज़ों में से भी जो हमने धरती से तुम्हारे लिए निकाली है। और देने के लिए उसके ख़राब हिस्से (के देने) का इरादा न करो, जबकि तुम स्वयं उसे कभी न लोगे। यह और बात है कि उसको लेने में देखी-अनदेखी कर जाओ। और जान लो कि अल्लाह निस्पृह, प्रशंसनीय है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! जो अच्छा हलाल (वैध) धन तुमने कमाया है, उसमें से खर्च करो, और जो कुछ हमने तुम्हारे लिए पृथ्वी के पौधों में से निकाला है, उसमें से खर्च करो, और उसमें से रद्दी (दोषपूर्ण) चीज़ का इरादा न करो कि तुम उसे खर्च करो, हालाँकि यदि वह तुमको दी जाए, तो तुम उसे नहीं लोगो, सिवाय इसके कि तुम उसकी बुराई (ख़राबी) की उनदेखी कर जाओ। तो तुम अल्लाह के लिए वह चीज़ कैसे पसंद करते हो, जो तुम अपने लिए पसंद नहीं करते?! और जान लो कि अल्लाह तुम्हारे खर्च से बेनियाज़ है, अपने अस्तित्व और अपने कार्यों में प्रशंसनीय है।
आयत 268
ٱلشَّيْطَـٰنُ يَعِدُكُمُ ٱلْفَقْرَ وَيَأْمُرُكُم بِٱلْفَحْشَآءِ ۖ وَٱللَّهُ يَعِدُكُم مَّغْفِرَةًۭ مِّنْهُ وَفَضْلًۭا ۗ وَٱللَّهُ وَٰسِعٌ عَلِيمٌۭ
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान
يَعِدُكُمُ
डराता है तुम्हें
ٱلْفَقْرَ
फ़क़्र से
وَيَأْمُرُكُم
और वो हुक्म देता है तुम्हें
بِٱلْفَحْشَآءِ ۖ
बेहयाई का
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَعِدُكُم
वादा करता है तुमसे
مَّغْفِرَةًۭ
बख़्शिश का
مِّنْهُ
अपनी तरफ़ से
وَفَضْلًۭا ۗ
और फ़ज़ल का
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
وَٰسِعٌ
वुसअत वाला है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
शैतान तुम्हें निर्धनता से डराता है और निर्लज्जता के कामों पर उभारता है, जबकि अल्लाह अपनी क्षमा और उदार कृपा का तुम्हें वचन देता है। अल्लाह बड़ी समाईवाला, सर्वज्ञ है
तफ़्सीर:
शैतान तुम्हें ग़रीबी से डराता और कंजूसी पर उभारता है, तथा तुम्हें पाप और अवज्ञा करने के लिए बुलाता है। जबकि अल्लाह तुम्हारे पापों के लिए बड़ी क्षमा तथा व्यापक जीविका का वादा करता है। और अल्लाह विशाल अनुग्रह वाला, अपने बंदों की स्थितियों के बारे में ख़ूब जानने वाला है।
आयत 269
يُؤْتِى ٱلْحِكْمَةَ مَن يَشَآءُ ۚ وَمَن يُؤْتَ ٱلْحِكْمَةَ فَقَدْ أُوتِىَ خَيْرًۭا كَثِيرًۭا ۗ وَمَا يَذَّكَّرُ إِلَّآ أُو۟لُوا۟ ٱلْأَلْبَـٰبِ
يُؤْتِى
वो देता है
ٱلْحِكْمَةَ
हिकमत को
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता है
وَمَن
और जो कोई
يُؤْتَ
दिया गया
ٱلْحِكْمَةَ
हिकमत
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
أُوتِىَ
वो दिया गया
خَيْرًۭا
ख़ैर
كَثِيرًۭا ۗ
कसीर/बहुत ज़्यादा
وَمَا
और नहीं
يَذَّكَّرُ
नसीहत पकड़ते
إِلَّآ
मगर
أُو۟لُوا۟
those
ٱلْأَلْبَـٰبِ
अक़्ल वाले
वह जिसे चाहता है तत्वदर्शिता प्रदान करता है और जिसे तत्वदर्शिता प्राप्त हुई उसे बड़ी दौलत मिल गई। किन्तु चेतते वही है जो बुद्धि और समझवाले है
तफ़्सीर:
अल्लाह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, उसे कथन में सत्यता एवं कार्य में शुद्धता प्रदान करता है और जिसे यह विशेषता दे दी गई, तो वास्तव में उसे बहुत भलाई दी गई। तथा अल्लाह की निशानियों से केवल वे पूर्ण बुद्धि वाले उपदेश ग्रहण करते हैं, जो अल्लाह के प्रकाश से प्रकाश प्राप्त करते और उसके मार्गदर्शन से निर्देश हासिल करते हैं।
आयत 270
وَمَآ أَنفَقْتُم مِّن نَّفَقَةٍ أَوْ نَذَرْتُم مِّن نَّذْرٍۢ فَإِنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُهُۥ ۗ وَمَا لِلظَّـٰلِمِينَ مِنْ أَنصَارٍ
وَمَآ
और जो
أَنفَقْتُم
ख़र्च किया तुमने
مِّن
(out) of
نَّفَقَةٍ
कोई ख़र्च
أَوْ
या
نَذَرْتُم
नज़र मानी तुमने
مِّن
of
نَّذْرٍۢ
कोई नज़र
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَعْلَمُهُۥ ۗ
जानता है उसे
وَمَا
और नहीं
لِلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों के लिए
مِنْ
any
أَنصَارٍ
मददगारों में से कोई
और तुमने जो कुछ भी ख़र्च किया और जो कुछ भी नज़र (मन्नत) की हो, निस्सन्देह अल्लाह उसे भली-भाँति जानता है। और अत्याचारियों का कोई सहायक न होगा
तफ़्सीर:
तुम अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए जो भी थोड़ा हो या बहुत खर्च करो, या तुम अपनी ओर से अल्लाह की आज्ञाकारिता का कोई कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध हो जाओ, जिसके लिए तुम बाध्य नहीं किए गए हो; तो निःसंदेह अल्लाह वह सब जानता है। अतः उसमें से कोई भी चीज़ उसके पास बर्बाद नहीं होगी और वह तुम्हें उसका सबसे बड़ा बदला देगा। तथा उन अत्याचारियों के लिए, जो अपने ऊपर अनिवार्य चीज़ों को रोकने वाले, अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करने वाले हैं, कोई मदद करने वाले नहीं होंगे, जो उनसे क़ियामत के दिन की सज़ा को दूर कर सकें।
आयत 271
إِن تُبْدُوا۟ ٱلصَّدَقَـٰتِ فَنِعِمَّا هِىَ ۖ وَإِن تُخْفُوهَا وَتُؤْتُوهَا ٱلْفُقَرَآءَ فَهُوَ خَيْرٌۭ لَّكُمْ ۚ وَيُكَفِّرُ عَنكُم مِّن سَيِّـَٔاتِكُمْ ۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌۭ
إِن
अगर
تُبْدُوا۟
तुम ज़ाहिर करो
ٱلصَّدَقَـٰتِ
सदक़ात
فَنِعِمَّا
तो क्या ही अच्छा है
هِىَ ۖ
वो
وَإِن
और अगर
تُخْفُوهَا
तुम छुपाओ उन्हें
وَتُؤْتُوهَا
और तुम दो उन्हें
ٱلْفُقَرَآءَ
फुक़रा को
فَهُوَ
तो वो
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لَّكُمْ ۚ
तुम्हारे लिए
وَيُكَفِّرُ
और वो दूर कर देगा
عَنكُم
तुम से
مِّن
[of]
سَيِّـَٔاتِكُمْ ۗ
तुम्हारी बुराईयों को
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بِمَا
उससे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
خَبِيرٌۭ
ख़ूब बाख़बर है
यदि तुम खुले रूप मे सदक़े दो तो यह भी अच्छा है और यदि उनको छिपाकर मुहताजों को दो तो यह तुम्हारे लिए अधिक अच्छा है। और यह तुम्हारे कितने ही गुनाहों को मिटा देगा। और अल्लाह को उसकी पूरी ख़बर है, जो कुछ तुम करते हो
तफ़्सीर:
तुम जो कुछ भी दान में धन देते हो, यदि उसे दिखाकर दो तो तुम्हारा यह दान देना अच्छा है, परंतु यदि तमु उसे गुप्त रखते हुए ग़रीबों को दो, तो यह तुम्हारे लिए दिखाने से बेहतर है। क्योंकि यह इख़्लास (निष्ठा) के अधिक निकट है। तथा निष्ठावानों के दान में उनके पापों के लिए एक आवरण और उनके लिए क्षमा है। तथा अल्लाह तुम्हारे कार्यों से अवगत है। अतः तुम्हारी हालतों में से कुछ भी उससे छिपा नहीं है।
आयत 272
۞ لَّيْسَ عَلَيْكَ هُدَىٰهُمْ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ يَهْدِى مَن يَشَآءُ ۗ وَمَا تُنفِقُوا۟ مِنْ خَيْرٍۢ فَلِأَنفُسِكُمْ ۚ وَمَا تُنفِقُونَ إِلَّا ٱبْتِغَآءَ وَجْهِ ٱللَّهِ ۚ وَمَا تُنفِقُوا۟ مِنْ خَيْرٍۢ يُوَفَّ إِلَيْكُمْ وَأَنتُمْ لَا تُظْلَمُونَ
۞ لَّيْسَ
नहीं है
عَلَيْكَ
आप पर
هُدَىٰهُمْ
हिदायत देना उन्हें
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَهْدِى
हिदायत देता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۗ
वो चाहता है
وَمَا
और जो
تُنفِقُوا۟
तुम ख़र्च करोगे
مِنْ
of
خَيْرٍۢ
माल में से
فَلِأَنفُسِكُمْ ۚ
तो तुम्हारे नफ़्सों के लिए है
وَمَا
और नहीं
تُنفِقُونَ
तुम ख़र्च करते
إِلَّا
मगर
ٱبْتِغَآءَ
चाहने के लिए
وَجْهِ
चेहरा
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह का
وَمَا
और जो
تُنفِقُوا۟
तुम ख़र्च करोगे
مِنْ
of
خَيْرٍۢ
माल में से
يُوَفَّ
वो पूरा दे दिया जाएगा
إِلَيْكُمْ
तुम्हें
وَأَنتُمْ
और तुम
لَا
(will) not
تُظْلَمُونَ
ना तुम ज़ुल्म किए जाओगे
उन्हें मार्ग पर ला देने का दायित्व तुम पर नहीं है, बल्कि अल्लाह ही जिसे चाहता है मार्ग दिखाता है। और जो कुछ भी माल तुम ख़र्च करोगे, वह तुम्हारे अपने ही भले के लिए होगा और तुम अल्लाह के (बताए हुए) उद्देश्य के अतिरिक्त किसी और उद्देश्य से ख़र्च न करो। और जो माल भी तुम्हें तुम ख़र्च करोगे, वह पूरा-पूरा तुम्हें चुका दिया जाएगा और तुम्हारा हक़ न मारा जाएगा
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) उन्हें सत्य को स्वीकार करने और उसका पालन करने की हिदायत देना और उन्हें उसपर तत्पर करना आपके ज़िम्मे नहीं है। आपका काम केवल उन्हें सत्य के लिए मार्गदर्शन करना और उन्हें उसके बारे में परिचय देना है। क्योंकि सत्य की तौफ़ीक़ देना और उसकी हिदायत प्रदान करना अल्लाह के हाथ में है। वह जिसे चाहता है, हिदायत प्रदान करता है। तथा तुम जो भी धन खर्च करोगे, उसका लाभ तुम्हारे पास ही आएगा, क्योंकि अल्लाह उससे बेनियाज़ है। और तुम्हारा खर्च केवल अल्लाह के लिए होना चाहिए। क्योंकि सच्चे ईमान वाले केवल अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए ही खर्च करते हैं। तथा तुम जो कुछ भी खर्च करोगे, चाहे थोड़ा या बहुत, तुम्हें उसका भरपूर बदला दिया जाएगा, उसमें कोई कमी नहीं की जाएगी। क्योंकि अल्लाह किसी पर अत्याचार नहीं करता।
आयत 273
لِلْفُقَرَآءِ ٱلَّذِينَ أُحْصِرُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ لَا يَسْتَطِيعُونَ ضَرْبًۭا فِى ٱلْأَرْضِ يَحْسَبُهُمُ ٱلْجَاهِلُ أَغْنِيَآءَ مِنَ ٱلتَّعَفُّفِ تَعْرِفُهُم بِسِيمَـٰهُمْ لَا يَسْـَٔلُونَ ٱلنَّاسَ إِلْحَافًۭا ۗ وَمَا تُنفِقُوا۟ مِنْ خَيْرٍۢ فَإِنَّ ٱللَّهَ بِهِۦ عَلِيمٌ
لِلْفُقَرَآءِ
फ़ुक़रा के लिए हैं (सदक़ात)
ٱلَّذِينَ
वो जो
أُحْصِرُوا۟
घेर लिए गए
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
لَا
not
يَسْتَطِيعُونَ
नहीं वो इस्तिताअत रखते
ضَرْبًۭا
चलने फिरने की
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
يَحْسَبُهُمُ
समझता है उन्हें
ٱلْجَاهِلُ
जाहिल/ना समझ
أَغْنِيَآءَ
मालदार
مِنَ
(because) of
ٱلتَّعَفُّفِ
बचने की वजह से (सवाल से)
تَعْرِفُهُم
तुम पहचान लोगे उन्हें
بِسِيمَـٰهُمْ
उनके चेहरे की अलामत से
لَا
Not
يَسْـَٔلُونَ
नहीं वो माँगते
ٱلنَّاسَ
लोगों से
إِلْحَافًۭا ۗ
लिपट कर
وَمَا
और जो
تُنفِقُوا۟
तुम ख़र्च करोगे
مِنْ
of
خَيْرٍۢ
माल में से
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
بِهِۦ
उसे
عَلِيمٌ
ख़ूब जानने वाला है
यह उन मुहताजों के लिए है जो अल्लाह के मार्ग में घिर गए कि धरती में (जीविकोपार्जन के लिए) कोई दौड़-धूप नहीं कर सकते। उनके स्वाभिमान के कारण अपरिचित व्यक्ति उन्हें धनवान समझता है। तुम उन्हें उनके लक्षणो से पहचान सकते हो। वे लिपटकर लोगों से नहीं माँगते। जो माल भी तुम ख़र्च करोगे, वह अल्लाह को ज्ञात होगा
तफ़्सीर:
यह दान उन ग़रीबों को दो, जिन्हें अल्लाह के मार्ग में जिहाद ने आजीविका की तलाश में यात्रा करने से रोक दिया है। उनकी स्थिति से अनभिज्ञ व्यक्ति उन्हें उनके माँगने से बचने के कारण धनवान् समझता है। हालाँकि जो व्यक्ति उनसे परिचित है, वह उन्हें उनके लक्षणों से पहचानता है, क्योंकि उनके शरीर और कपड़ों पर आवश्यकता स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी पहचान यह भी है कि वे अन्य ग़रीब लोगों की तरह नहीं हैं, जो लोगों से माँगते हुए उनके पीछे पड़ जाते हैं। तथा तुम अपने धन इत्यादि में से जो कुछ भी ख़र्च करोगे, तो निश्चय अल्लाह उसे भली-भाँति जानता है और वह तुम्हें उसका बहुत बड़ा बदला देगा।
आयत 274
ٱلَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَٰلَهُم بِٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ سِرًّۭا وَعَلَانِيَةًۭ فَلَهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जो
يُنفِقُونَ
ख़र्च करते हैं
أَمْوَٰلَهُم
अपने मालों को
بِٱلَّيْلِ
रात
وَٱلنَّهَارِ
और दिन
سِرًّۭا
छुपा कर
وَعَلَانِيَةًۭ
और ऐलानिया तौर पर
فَلَهُمْ
तो उनके लिए है
أَجْرُهُمْ
अजर उनका
عِندَ
पास
رَبِّهِمْ
उनके रब के
وَلَا
और ना
خَوْفٌ
कोई ख़ौफ़ होगा
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يَحْزَنُونَ
वो ग़मगीन होंगे
जो लोग अपने माल रात-दिन छिपे और खुले ख़र्च करें, उनका बदला तो उनके रब के पास है, और न उन्हें कोई भय है और न वे शोकाकुल होंगे
तफ़्सीर:
जो लोग रात और दिन, छिपे और खुले, बिना किसी दिखावा और ख्याति के अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए अपना धन खर्च करते हैं, तो उनके लिए उनका प्रतिफल क़ियामत के दिन उनके पालनहार के पास है। उनको अपने भविष्य के बारे में कोई डर नहीं है और न ही वे संसार की छूटी हुई चीज़ों का शोक करेंगे। यह सब अल्लाह की ओर से एक अनुग्रह और कृपा के तौर पर है।
आयत 275
ٱلَّذِينَ يَأْكُلُونَ ٱلرِّبَوٰا۟ لَا يَقُومُونَ إِلَّا كَمَا يَقُومُ ٱلَّذِى يَتَخَبَّطُهُ ٱلشَّيْطَـٰنُ مِنَ ٱلْمَسِّ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَالُوٓا۟ إِنَّمَا ٱلْبَيْعُ مِثْلُ ٱلرِّبَوٰا۟ ۗ وَأَحَلَّ ٱللَّهُ ٱلْبَيْعَ وَحَرَّمَ ٱلرِّبَوٰا۟ ۚ فَمَن جَآءَهُۥ مَوْعِظَةٌۭ مِّن رَّبِّهِۦ فَٱنتَهَىٰ فَلَهُۥ مَا سَلَفَ وَأَمْرُهُۥٓ إِلَى ٱللَّهِ ۖ وَمَنْ عَادَ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَأْكُلُونَ
खाते हैं
ٱلرِّبَوٰا۟
सूद
لَا
not
يَقُومُونَ
नहीं वो खड़े होंगे
إِلَّا
मगर
كَمَا
जैसा कि
يَقُومُ
खड़ा होता है
ٱلَّذِى
वो जो
يَتَخَبَّطُهُ
ख़ब्ती बना दिया हो उसे
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान ने
مِنَ
with
ٱلْمَسِّ ۚ
छू कर
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّهُمْ
बवजह उसके कि वो
قَالُوٓا۟
वो कहते हैं
إِنَّمَا
बेशक
ٱلْبَيْعُ
तिजारत
مِثْلُ
मानिन्द है
ٱلرِّبَوٰا۟ ۗ
सूद के
وَأَحَلَّ
हालाँकि हलाल किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلْبَيْعَ
तिजारत को
وَحَرَّمَ
और उसने हराम किया
ٱلرِّبَوٰا۟ ۚ
सूद को
فَمَن
तो जो कोई
جَآءَهُۥ
आ जाए उसके पास
مَوْعِظَةٌۭ
कोई नसीहत
مِّن
from
رَّبِّهِۦ
उसके रब की तरफ़ से
فَٱنتَهَىٰ
फिर वो बाज़ आ जाए
فَلَهُۥ
तो उसके लिए है
مَا
जो
سَلَفَ
पहले हो चुका
وَأَمْرُهُۥٓ
और मामला उसका है
إِلَى
(is) with
ٱللَّهِ ۖ
तरफ़ अल्लाह के
وَمَنْ
और जो कोई
عَادَ
लौट आए
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग
أَصْحَـٰبُ
साथी
ٱلنَّارِ ۖ
आग के
هُمْ
वो
فِيهَا
उसमें
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
और लोग ब्याज खाते है, वे बस इस प्रकार उठते है जिस प्रकार वह क्यक्ति उठता है जिसे शैतान ने छूकर बावला कर दिया हो और यह इसलिए कि उनका कहना है, "व्यापार भी तो ब्याज के सदृश है," जबकि अल्लाह ने व्यापार को वैध और ब्याज को अवैध ठहराया है। अतः जिसको उसके रब की ओर से नसीहत पहुँची और वह बाज़ आ गया, तो जो कुछ पहले ले चुका वह उसी का रहा और मामला उसका अल्लाह के हवाले है। और जिसने फिर यही कर्म किया तो ऐसे ही लोग आग (जहन्नम) में पड़नेवाले है। उसमें वे सदैव रहेंगे
तफ़्सीर:
जो लोग ब्याज का लेन-देन करते और उसे लेते हैं, वे क़ियामत के दिन अपनी क़ब्रों से ऐसे उठेंगे, जैसे वह आदमी उठता है जिसे शैतान ने छू लिया हो। चुनाँचे वह अपनी क़ब्र से ऐसे लड़खड़ाते हुए उठेगा, जैसे मिर्गी से ग्रस्त व्यक्ति अपने उठने-बैठने में लड़खड़ाता है। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि उन्होंने सूद का उपभोग करना जायज़ ठहरा लिया और उन्होंने अल्लाह के हलाल किए हुए व्यापार के मुनाफे और ब्याज के बीच कोई अंतर नहीं किया। उन्होंने कहा : व्यापार तो हलाल होने में ब्याज ही की तरह है। क्योंकि दोनों से धन में वृद्धि और बढ़ोतरी होती है। तो अल्लाह ने उनका खंडन किया, उनके क़यास को अमान्य करते हुए उन्हें झुठला दिया और यह स्पष्ट कर दिया कि अल्लाह ने व्यापार को ह़लाल किया है; क्योंकि उसमें सामान्य और विशिष्ट लाभ है और ब्याज को हराम (अवैध) किया है; क्योंकि उसमें अत्याचार और लोगों का धन बिना मुआवज़े के अनुचित तरीक़े से खाना शामिल है। फिर जिसके पास उसके पालनहार की ओर से कोई उपदेश आए, जिसमें ब्याज से निषेध और उससे सावधान किया गया हो, तो वह उससे रुक जाए और अल्लाह से तौबा कर ले; तो इससे पहले जो कुछ ब्याज वह ले चुका है, उसके बारे में उसपर कोई पाप नहीं है। तथा उसके बाद भविष्य में जो कुछ वह करता है, उसका मामला अल्लाह के हवाले है। परंतु जो व्यक्ति अल्लाह की ओर से निषेधाज्ञा पहुँच जाने के बाद तथा उसपर तर्क स्थापित हो जाने के पश्चात दोबारा ब्याज लेने की ओर लौट आया; तो वह जहन्नम में प्रवेश करने और उसमें हमेशा रहने का भागी बन गया। यहाँ जहन्नम में हमेशा रहने का मतलब सूद को हलाल समझते हुए उसका उपभोग करना है या इसका अभिप्राय उसमें लंबे समय तक रहना है। क्योंकि जहन्नम में हमेशा के लिए केवल काफ़िरों को रहना है। तौहीद पर क़ायम रहने वाले लोग उसमें हमेशा के लिए नहीं रहेंगे।
आयत 276
يَمْحَقُ ٱللَّهُ ٱلرِّبَوٰا۟ وَيُرْبِى ٱلصَّدَقَـٰتِ ۗ وَٱللَّهُ لَا يُحِبُّ كُلَّ كَفَّارٍ أَثِيمٍ
يَمْحَقُ
मिटाता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلرِّبَوٰا۟
सूद को
وَيُرْبِى
और वो बढ़ाता है
ٱلصَّدَقَـٰتِ ۗ
सदक़ात को
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
لَا
(does) not
يُحِبُّ
नहीं वो पसंद करता
كُلَّ
हर
كَفَّارٍ
सख़्त नाशुक्रे
أَثِيمٍ
बहुत गुनाह गार को
अल्लाह ब्याज को घटाता और मिटाता है और सदक़ों को बढ़ाता है। और अल्लाह किसी अकृतज्ञ, हक़ मारनेवाले को पसन्द नहीं करता
तफ़्सीर:
अल्लाह ब्याज के धन को नष्ट और समाप्त कर देता है; या तो ज़ाहिरी तौर पर उसे विनष्ट कर देता है या आंतरिक तौर पर उससे बरकत को छीन लेता है। तथा वह दान के प्रतिफल को कई गुना करके, उसे बढ़ाता और विकसित करता है। चुनाँचे वह एक नेकी को दस गुना से सात सौ गुना तक बल्कि उससे भी अधिक गुना तक कर देता है और दान करने वालों के धन में बरकत देता है। तथा अल्लाह किसी ऐसे व्यक्ति से प्रेम नहीं करता जो हठी काफिर हो, जो हराम को हलाल ठहराने वाला, अवज्ञा और कुकर्मों में लिप्त रहने वाला हो।
आयत 277
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَأَقَامُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَوُا۟ ٱلزَّكَوٰةَ لَهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
وَأَقَامُوا۟
और उन्होंने क़ायम की
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَءَاتَوُا۟
और उन्होंने अदा की
ٱلزَّكَوٰةَ
ज़कात
لَهُمْ
उनके लिए है
أَجْرُهُمْ
अजर उनका
عِندَ
पास
رَبِّهِمْ
उनके रब के
وَلَا
और ना
خَوْفٌ
कोई ख़ौफ़ होगा
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يَحْزَنُونَ
वो ग़मगीन होंगे
निस्संदेह जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए और नमाज़ क़ायम की्य और ज़कात दी, उनके लिए उनका बदला उनके रब के पास है, और उन्हें न कोई भय हो और न वे शोकाकुल होंगे
तफ़्सीर:
निःसंदेह जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए, उसके रसूल का अनुसरण किया,अच्छे काम किए और अल्लाह ने जैसा निर्धारित किया है, उसके अनुसार पूरी तरह से नमाज़ अदा की और उन लोगों को अपने धन की ज़कात दी जो उसके हक़दार हैं; उनका प्रतिफल उनके रब के पास है, उन्हें भविष्य में अपने मामलों के बारे में किसी चीज़ का भय नहीं है और न ही वे दुनिया की छूटी हुई चीज़ों और उसकी नेमतों पर दुःखी होंगे।
आयत 278
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَذَرُوا۟ مَا بَقِىَ مِنَ ٱلرِّبَوٰٓا۟ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
ٱتَّقُوا۟
डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَذَرُوا۟
और छोड़ दो
مَا
जो
بَقِىَ
बाक़ी रह गया हो
مِنَ
of
ٱلرِّبَوٰٓا۟
सूद में से
إِن
अगर
كُنتُم
हो तुम
مُّؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह का डर रखो और जो कुछ ब्याज बाक़ी रह गया है उसे छोड़ दो, यदि तुम ईमानवाले हो
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! अल्लाह से डरो; इस तौर पर कि उसके आदेशों का पालन करो और उसके निषेधों से बचो, तथा लोगों के पास ब्याज के धन से जो कुछ बचा है, उसे माँगना छोड़ दो, यदि तुम वास्तव में अल्लाह पर और उसपर विश्वास रखते हो जो अल्लाह ने तुम्हें ब्याज से मना किया है।
आयत 279
فَإِن لَّمْ تَفْعَلُوا۟ فَأْذَنُوا۟ بِحَرْبٍۢ مِّنَ ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ ۖ وَإِن تُبْتُمْ فَلَكُمْ رُءُوسُ أَمْوَٰلِكُمْ لَا تَظْلِمُونَ وَلَا تُظْلَمُونَ
فَإِن
फिर अगर
لَّمْ
ना
تَفْعَلُوا۟
तुम करो
فَأْذَنُوا۟
तो ऐलान सुन लो
بِحَرْبٍۢ
जंग का
مِّنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह से
وَرَسُولِهِۦ ۖ
और उसके रसूल से
وَإِن
और अगर
تُبْتُمْ
तौबा कर लो तुम
فَلَكُمْ
तो तुम्हारे लिए है
رُءُوسُ
असल
أَمْوَٰلِكُمْ
तुम्हारे मालों का
لَا
(do) not
تَظْلِمُونَ
ना तुम ज़ुल्म करोगे
وَلَا
और ना
تُظْلَمُونَ
तुम ज़ुल्म किए जाओगे
फिर यदि तुमने ऐसा न किया तो अल्लाह और उसके रसूल से युद्ध के लिए ख़बरदार हो जाओ। और यदि तौबा कर लो तो अपना मूलधन लेने का तुम्हें अधिकार है। न तुम अन्याय करो और न तुम्हारे साथ अन्याय किया जाए
तफ़्सीर:
अगर तुम वह काम न करो, जिसका तुम्हें आदेश दिया गया है, तो तुम जान लो और यक़ीन कर लो कि अल्लाह और उसके रसूल की ओर से युद्ध की घोषणा है। अगर तुम अल्लाह के समक्ष तौबा कर लो और ब्याज छोड़ दो, तो तुम्हें उधार दी हुई मूल पूँजी वसूल करने का अधिकार है। अपनी मूल पूँजी से अधिक लेकर न तुम किसी पर अत्याचार करोगे और न उसमें कमी करके तुमपर अत्याचार किया जाएगा।
आयत 280
وَإِن كَانَ ذُو عُسْرَةٍۢ فَنَظِرَةٌ إِلَىٰ مَيْسَرَةٍۢ ۚ وَأَن تَصَدَّقُوا۟ خَيْرٌۭ لَّكُمْ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
وَإِن
और अगर
كَانَ
है वो
ذُو
the (debtor)
عُسْرَةٍۢ
तंगदस्त
فَنَظِرَةٌ
तो मोहलत देना है
إِلَىٰ
until
مَيْسَرَةٍۢ ۚ
आसानी तक
وَأَن
और ये कि
تَصَدَّقُوا۟
तुम सदक़ा कर दो
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لَّكُمْ ۖ
तुम्हारे लिए
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
تَعْلَمُونَ
तुम जानते
और यदि कोई तंगी में हो तो हाथ खुलने तक मुहलत देनी होगी; और सदक़ा कर दो (अर्थात मूलधन भी न लो) तो यह तुम्हारे लिए अधिक उत्तम है, यदि तुम जान सको
तफ़्सीर:
और यदि तुम जिससे क़र्ज़ चुकाने की माँग कर रहे हो वह दिवालिया हो, अपना क़र्ज़ चुकाने में समर्थ न हो, तो उससे क़र्ज़ की माँग को विलंबित कर दो यहाँ तक कि उसके पास धन उपलब्ध हो जाए और वह क़र्ज़ का भुगतान करने में सक्षम हो जाए। और यह कि तुम क़र्ज़ चुकाने का मुतालबा त्यागकर या उसमें से कुछ हिस्सा छोड़कर उसपर दान कर दो, तो तुम्हारे लिए बेहतर है, यदि तुम जानते हो कि अल्लाह के पास इसकी क्या फज़ीलत है।
आयत 281
وَٱتَّقُوا۟ يَوْمًۭا تُرْجَعُونَ فِيهِ إِلَى ٱللَّهِ ۖ ثُمَّ تُوَفَّىٰ كُلُّ نَفْسٍۢ مَّا كَسَبَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
يَوْمًۭا
उस दिन से
تُرْجَعُونَ
तुम लौटाए जाओगे
فِيهِ
जिस में
إِلَى
to
ٱللَّهِ ۖ
तरफ़ अल्लाह के
ثُمَّ
फिर
تُوَفَّىٰ
पूरा पूरा दिया जाएगा
كُلُّ
हर
نَفْسٍۢ
नफ़्स को
مَّا
जो
كَسَبَتْ
उसने कमाया
وَهُمْ
और वो
لَا
not
يُظْلَمُونَ
ज़ुल्म ना किए जाऐंगे
और उस दिन का डर रखो जबकि तुम अल्लाह की ओर लौटोगे, फिर प्रत्येक व्यक्ति को जो कुछ उसने कमाया पूरा-पूरा मिल जाएगा और उनके साथ कदापि कोई अन्याय न होगा
तफ़्सीर:
उस दिन की यातना से डरो, जब तुम सब अल्लाह की ओर लौटाए जाओगे और उसके सामने खड़े हो जाओगे, फिर हर प्राणी को उसके किए हुए का बदला दिया जाएगा, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। उनके अच्छे कर्मों के प्रतिफल को कम करके, या उनके बुरे कर्मों की सज़ा को बढ़ाकर उन पर अत्याचार नहीं किया जाएगा।
आयत 282
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِذَا تَدَايَنتُم بِدَيْنٍ إِلَىٰٓ أَجَلٍۢ مُّسَمًّۭى فَٱكْتُبُوهُ ۚ وَلْيَكْتُب بَّيْنَكُمْ كَاتِبٌۢ بِٱلْعَدْلِ ۚ وَلَا يَأْبَ كَاتِبٌ أَن يَكْتُبَ كَمَا عَلَّمَهُ ٱللَّهُ ۚ فَلْيَكْتُبْ وَلْيُمْلِلِ ٱلَّذِى عَلَيْهِ ٱلْحَقُّ وَلْيَتَّقِ ٱللَّهَ رَبَّهُۥ وَلَا يَبْخَسْ مِنْهُ شَيْـًۭٔا ۚ فَإِن كَانَ ٱلَّذِى عَلَيْهِ ٱلْحَقُّ سَفِيهًا أَوْ ضَعِيفًا أَوْ لَا يَسْتَطِيعُ أَن يُمِلَّ هُوَ فَلْيُمْلِلْ وَلِيُّهُۥ بِٱلْعَدْلِ ۚ وَٱسْتَشْهِدُوا۟ شَهِيدَيْنِ مِن رِّجَالِكُمْ ۖ فَإِن لَّمْ يَكُونَا رَجُلَيْنِ فَرَجُلٌۭ وَٱمْرَأَتَانِ مِمَّن تَرْضَوْنَ مِنَ ٱلشُّهَدَآءِ أَن تَضِلَّ إِحْدَىٰهُمَا فَتُذَكِّرَ إِحْدَىٰهُمَا ٱلْأُخْرَىٰ ۚ وَلَا يَأْبَ ٱلشُّهَدَآءُ إِذَا مَا دُعُوا۟ ۚ وَلَا تَسْـَٔمُوٓا۟ أَن تَكْتُبُوهُ صَغِيرًا أَوْ كَبِيرًا إِلَىٰٓ أَجَلِهِۦ ۚ ذَٰلِكُمْ أَقْسَطُ عِندَ ٱللَّهِ وَأَقْوَمُ لِلشَّهَـٰدَةِ وَأَدْنَىٰٓ أَلَّا تَرْتَابُوٓا۟ ۖ إِلَّآ أَن تَكُونَ تِجَـٰرَةً حَاضِرَةًۭ تُدِيرُونَهَا بَيْنَكُمْ فَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَلَّا تَكْتُبُوهَا ۗ وَأَشْهِدُوٓا۟ إِذَا تَبَايَعْتُمْ ۚ وَلَا يُضَآرَّ كَاتِبٌۭ وَلَا شَهِيدٌۭ ۚ وَإِن تَفْعَلُوا۟ فَإِنَّهُۥ فُسُوقٌۢ بِكُمْ ۗ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ۖ وَيُعَلِّمُكُمُ ٱللَّهُ ۗ وَٱللَّهُ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌۭ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
إِذَا
जब
تَدَايَنتُم
तुम बाहम लेन-देन करो
بِدَيْنٍ
क़र्ज़ का
إِلَىٰٓ
for
أَجَلٍۢ
a term
مُّسَمًّۭى
एक मुक़र्ररह वक़्त तक
فَٱكْتُبُوهُ ۚ
तो लिख लो उसे
وَلْيَكْتُب
और चाहिए कि लिखे
بَّيْنَكُمْ
दर्मियान तुम्हारे
كَاتِبٌۢ
एक लिखने वाला
بِٱلْعَدْلِ ۚ
साथ अदल के
وَلَا
और ना
يَأْبَ
इन्कार करे
كَاتِبٌ
लिखने वाला
أَن
कि
يَكْتُبَ
वो लिखे
كَمَا
जैसा कि
عَلَّمَهُ
सिखाया उसे
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह ने
فَلْيَكْتُبْ
पस चाहिए कि वो लिखे
وَلْيُمْلِلِ
और चाहिए कि इमला कराए
ٱلَّذِى
वो शख़्स
عَلَيْهِ
जिस पर
ٱلْحَقُّ
हक़ है
وَلْيَتَّقِ
और चाहिए कि वो डरे
ٱللَّهَ
अल्लाह से
رَبَّهُۥ
जो रब है उसका
وَلَا
और ना
يَبْخَسْ
वो कमी करे
مِنْهُ
उसमें से
شَيْـًۭٔا ۚ
किसी चीज़ की
فَإِن
फिर अगर
كَانَ
हो
ٱلَّذِى
वो शख़्स
عَلَيْهِ
जिस पर
ٱلْحَقُّ
हक़ है
سَفِيهًا
नादान
أَوْ
या
ضَعِيفًا
कमज़ोर
أَوْ
या
لَا
not
يَسْتَطِيعُ
नहीं वो इस्तिताअत रखता
أَن
कि
يُمِلَّ
इमला कराए
هُوَ
वो
فَلْيُمْلِلْ
पस चाहिए कि इमला कराए
وَلِيُّهُۥ
सरपरस्त उसका
بِٱلْعَدْلِ ۚ
साथ अदल के
وَٱسْتَشْهِدُوا۟
और गवाह बना लो
شَهِيدَيْنِ
दो गवाह
مِن
among
رِّجَالِكُمْ ۖ
अपने मर्दों में से
فَإِن
फिर अगर
لَّمْ
ना
يَكُونَا
हों वो दोनों
رَجُلَيْنِ
दो मर्द
فَرَجُلٌۭ
तो एक मर्द
وَٱمْرَأَتَانِ
और दो औरतें
مِمَّن
उनमें से जिन्हें
تَرْضَوْنَ
तुम पसंद करते हो
مِنَ
of
ٱلشُّهَدَآءِ
गवाहों में से
أَن
कि
تَضِلَّ
भूल जाए
إِحْدَىٰهُمَا
उन दोनों में से एक
فَتُذَكِّرَ
तो याद दिहानी करा दे
إِحْدَىٰهُمَا
उन दोनों में से एक
ٱلْأُخْرَىٰ ۚ
दूसरी को
وَلَا
और ना
يَأْبَ
इन्कार करें
ٱلشُّهَدَآءُ
गवाह
إِذَا
when
مَا
जब भी
دُعُوا۟ ۚ
वो बुलाए जाऐं
وَلَا
और ना
تَسْـَٔمُوٓا۟
तुम उकताहट महसूस करो
أَن
कि
تَكْتُبُوهُ
तुम लिख लो उसे
صَغِيرًا
छोटा हो
أَوْ
या
كَبِيرًا
बड़ा हो
إِلَىٰٓ
for
أَجَلِهِۦ ۚ
उसके मुक़र्रर वक़्त तक
ذَٰلِكُمْ
ये
أَقْسَطُ
ज़्यादा इन्साफ़ वाला है
عِندَ
नज़दीक
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَأَقْوَمُ
और ज़्यादा दुरुस्त है
لِلشَّهَـٰدَةِ
गवाही के लिए
وَأَدْنَىٰٓ
और ज़्यादा क़रीब है
أَلَّا
कि ना
تَرْتَابُوٓا۟ ۖ
तुम शक में पड़ो
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
تَكُونَ
हो
تِجَـٰرَةً
तिजारत
حَاضِرَةًۭ
हाज़िर
تُدِيرُونَهَا
तुम लेन-देन करते हो जिसका
بَيْنَكُمْ
आपस में
فَلَيْسَ
तो नहीं है
عَلَيْكُمْ
तुम पर
جُنَاحٌ
कोई गुनाह
أَلَّا
कि ना
تَكْتُبُوهَا ۗ
तुम लिखो उसे
وَأَشْهِدُوٓا۟
और गवाह बना लो
إِذَا
जब
تَبَايَعْتُمْ ۚ
बाहम ख़रीदो फ़रोख़्त करो तुम
وَلَا
और ना
يُضَآرَّ
नुक़सान पहुँचाए / पहुँचाया जाए
كَاتِبٌۭ
कातिब
وَلَا
और ना
شَهِيدٌۭ ۚ
गवाह
وَإِن
और अगर
تَفْعَلُوا۟
तुम (ऐसा) करोगे
فَإِنَّهُۥ
तो बेशक वो
فُسُوقٌۢ
नाफ़रमानी है
بِكُمْ ۗ
तुम्हारी
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ ۖ
अल्लाह से
وَيُعَلِّمُكُمُ
और सिखाता है तुम्हें
ٱللَّهُ ۗ
अल्लाह
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ को
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
ऐ ईमान लानेवालो! जब किसी निश्चित अवधि के लिए आपस में ऋण का लेन-देन करो तो उसे लिख लिया करो और चाहिए कि कोई लिखनेवाला तुम्हारे बीच न्यायपूर्वक (दस्तावेज़) लिख दे। और लिखनेवाला लिखने से इनकार न करे; जिस प्रकार अल्लाह ने उसे सिखाया है, उसी प्रकार वह दूसरों के लिए लिखने के काम आए और बोलकर वह लिखाए जिसके ज़िम्मे हक़ की अदायगी हो। और उसे अल्लाह का, जो उसका रब है, डर रखना चाहिए और उसमें कोई कमी न करनी चाहिए। फिर यदि वह व्यक्ति जिसके ज़िम्मे हक़ की अदायगी हो, कम समझ या कमज़ोर हो या वह बोलकर न लिखा सकता हो तो उसके संरक्षक को चाहिए कि न्यायपूर्वक बोलकर लिखा दे। और अपने पुरुषों में से दो गवाहो को गवाह बना लो और यदि दो पुरुष न हों तो एक पुरुष और दो स्त्रियाँ, जिन्हें तुम गवाह के लिए पसन्द करो, गवाह हो जाएँ (दो स्त्रियाँ इसलिए रखी गई है) ताकि यदि एक भूल जाए तो दूसरी उसे याद दिला दे। और गवाहों को जब बुलाया जाए तो आने से इनकार न करें। मामला चाहे छोटा हो या बड़ा एक निर्धारित अवधि तक के लिए है, तो उसे लिखने में सुस्ती से काम न लो। यह अल्लाह की स्पष्ट से अधिक न्यायसंगत बात है और इससे गवाही भी अधिक ठीक रहती है। और इससे अधि क संभावना है कि तुम किसी संदेह में नहीं पड़ोगे। हाँ, यदि कोई सौदा नक़द हो, जिसका लेन-देन तुम आपस में कर रहे हो, तो तुम्हारे उसके न लिखने में तुम्हारे लिए कोई दोष नहीं। और जब आपम में क्रय-विक्रय का मामला करो तो उस समय भी गवाह कर लिया करो, और न किसी लिखनेवाले को हानि पहुँचाए जाए और न किसी गवाह को। और यदि ऐसा करोगे तो यह तुम्हारे लिए अवज्ञा की बात होगी। और अल्लाह का डर रखो। अल्लाह तुम्हें शिक्षा दे रहा है। और अल्लाह हर चीज़ को जानता है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! जब तुम आपस में उधार का लेन-देन करो, इस प्रकार कि तुममें से एक व्यक्ति दूसरे को एक निश्चित अवधि के लिए उधार दे, तो उस उधार को लिख लो। और एक लिखने वाला तुम्हारे बीच शरीयत के अनुसार सच्चाई और न्याय के साथ लिखे। तथा लिखने वाला उधार को उसके अनुसार लिखने से इनकार न करे जो अल्लाह ने उसे न्याय के साथ लिखना सिखाया है। अतः उसे चाहिए कि देनदार जो कुछ लिखवा रहा हो, उसे लिख दे; ताकि यह देनदार की ओर से एक स्वीकृति हो जाए। लिखवाने वाले को चाहिए कि अल्लाह से डरे और लिखवाने में उधार की मात्रा, या उसके प्रकार या उसके विवरण में से कुछ भी कम न करे। यदि जिसके ज़िम्मे अधिकार है, वह अच्छी तरह से अपने कार्य का नियंत्रण करने में अक्षम है, या वह अपनी बालावस्था या पागलपन के कारण कमज़ोर है, या अपने गूँगेपन के कारण बोलकर लिखवाने में सक्षम नहीं है, तो इन जैसी परिस्थितियों में उसकी तरफ से उसका वह अभिभावक सच्चाई और न्याय के साथ लिखवाए, जो उसके बारे में ज़िम्मेदार है। तथा दो समझदार और न्यायप्रिय पुरुषों को गवाह बना लो। अगर दो पुरुष न मिलें, तो एक पुरुष और दो महिलाओं को गवाह बना लो, जिनके धर्म और ईमानदारी से तुम संतुष्ट हो, ताकि यदि एक महिला भूल जाए, तो उसकी बहन उसे याद दिला दे। और गवाहों से जब क़र्ज पर गवाही देने के लिए कहा जाए, तो पीछे न हटें। और अगर उन्हें ऐसा करने के लिए बुलाया जाए तो उनके लिए गवाही देना अनिवार्य है। तथा क़र्ज़ को, चाहे वह थोड़ा हो या बहुत, उसकी निर्धारित अवधि के लिए लिखने में तुम ऊब से ग्रस्त न हो। क्योंकि क़र्ज़ का लिख लेना, अल्लाह की शरीयत में अधिक न्यायसंगत है, गवाही को क़ायम करने और उसकी अदायगी में अधिक प्रभावी है और क़र्ज़ के प्रकार, उसकी मात्रा और उसकी अवधि के बारे में किसी भी संदेह को दूर करने के अधिक निकट है। परंतु यदि तुम्हारे बीच अनुबंध वर्तमान सामान और वर्तमान मूल्य में व्यापार पर हो; तो उस समय लिखना छोड़ देने में तुमपर कोई पाप नहीं, क्योंकि इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन विवाद के कारणों को रोकने के लिए, तुम्हारे लिए गवाह रखना धर्मसंगत है। तथा लिखने वालों और गवाहों को नुक़सान पहुँचाना जायज़ नहीं है। इसी तरह लिखने वालों तथा गवाहों के लिए उस व्यक्ति को नुक़सान पहुँचाना जायज़ नहीं है, जो उनसे लिखने या गवाही देने के लिए कहे। अगर तुम्हारी ओर से उन्हें नुक़सान पहुँचाया जाता है, तो यह अल्लाह की आज्ञाकारिता से उसकी अवज्ञा की ओर निकलना है। तथा - ऐ ईमान वालो! - अल्लाह से डरो, इस तौर पर कि उसके आदेशों का पालन करो और उसके निषेधों से बचो। अल्लाह तुम्हें वह बातें सिखाता है, जिनमें तुम्हारी दुनिया और आख़िरत की बेहतरी व भलाई है। और अल्लाह हर चीज़ को ख़ूब जानने वाला है। अतः उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है।
आयत 283
۞ وَإِن كُنتُمْ عَلَىٰ سَفَرٍۢ وَلَمْ تَجِدُوا۟ كَاتِبًۭا فَرِهَـٰنٌۭ مَّقْبُوضَةٌۭ ۖ فَإِنْ أَمِنَ بَعْضُكُم بَعْضًۭا فَلْيُؤَدِّ ٱلَّذِى ٱؤْتُمِنَ أَمَـٰنَتَهُۥ وَلْيَتَّقِ ٱللَّهَ رَبَّهُۥ ۗ وَلَا تَكْتُمُوا۟ ٱلشَّهَـٰدَةَ ۚ وَمَن يَكْتُمْهَا فَإِنَّهُۥٓ ءَاثِمٌۭ قَلْبُهُۥ ۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌۭ
۞ وَإِن
और अगर
كُنتُمْ
हो तुम
عَلَىٰ
on
سَفَرٍۢ
सफ़र पर
وَلَمْ
और ना
تَجِدُوا۟
तुम पाओ
كَاتِبًۭا
कोई कातिब
فَرِهَـٰنٌۭ
तो रहन रखना है
مَّقْبُوضَةٌۭ ۖ
क़ब्ज़ा में दी हुई (चीज़)
فَإِنْ
फिर अगर
أَمِنَ
ऐतबार करे
بَعْضُكُم
बाज़ तुम्हारा
بَعْضًۭا
बाज़ पर
فَلْيُؤَدِّ
तो चाहिए कि अदा करे
ٱلَّذِى
वो जो
ٱؤْتُمِنَ
अमीन बनाया गया
أَمَـٰنَتَهُۥ
उसकी अमानत को
وَلْيَتَّقِ
और चाहिए कि वो डरे
ٱللَّهَ
अल्लाह से
رَبَّهُۥ ۗ
जो रब है उसका
وَلَا
और ना
تَكْتُمُوا۟
तुम छुपाओ
ٱلشَّهَـٰدَةَ ۚ
गवाही को
وَمَن
और जो कोई
يَكْتُمْهَا
छुपाएगा उसे
فَإِنَّهُۥٓ
तो बेशक वो
ءَاثِمٌۭ
गुनाहगार है
قَلْبُهُۥ ۗ
दिल उसका
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بِمَا
उसे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
और यदि तुम किसी सफ़र में हो और किसी लिखनेवाले को न पा सको, तो गिरवी रखकर मामला करो। फिर यदि तुममें से एक-दूसरे पर भरोसा के, तो जिस पर भरोसा किया है उसे चाहिए कि वह यह सच कर दिखाए कि वह विश्वासपात्र है और अल्लाह का, जो उसका रब है, डर रखे। और गवाही को न छिपाओ। जो उसे छिपाता है तो निश्चय ही उसका दिल गुनाहगार है, और तुम जो कुछ करते हो अल्लाह उसे भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
यदि तुम यात्रा कर रहे हो और तुम्हें कोई लिखने वाला न मिले, जो तुम्हारे लिए क़र्ज़ की दस्तावेज़ लिखे, तो देनदार के लिए इतना काफी है कि कोई सामान गिरवी रख दे, जिसे ऋण देने वाला अपने क़ब्ज़े में ले लेगा, जो उसके अधिकार की गारंटी होगी, यहाँ तक कि देनदार अपने क़र्ज़ का भुगतान कर दे। अगर तुममें से कोई व्यक्ति किसी पर भरोसा करे, तो ऐसी स्थिति में लिखने, या गवाह बनाने या गिरवी रखने की आवश्यकता नहीं है। उस समय क़र्ज़ देनदार के ज़िम्मे एक अमानत के तौर पर रहेगा, उसपर उसे अपने लेनदार को चुकाना अनिवार्य है। उसे चाहिए कि इस अमानत के बारे में अल्लाह से डरे और उसमें से किसी भी चीज़ का इनकार न करे। अगर वह इनकार करता है, तो लेन-देन को देखने वाले को गवाही देनी चाहिए। और उसके लिए गवाही छिपाना जायज़ नहीं है। और जो कोई गवाही छिपाता है, तो उसका दिल एक पापी (दुष्ट) दिल है। याद रखो कि जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसे जानता है, उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है। और वह तुम्हें तुम्हारे कार्यों का बदला देगा।
आयत 284
لِّلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۗ وَإِن تُبْدُوا۟ مَا فِىٓ أَنفُسِكُمْ أَوْ تُخْفُوهُ يُحَاسِبْكُم بِهِ ٱللَّهُ ۖ فَيَغْفِرُ لِمَن يَشَآءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَآءُ ۗ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌ
لِّلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
مَا
जो
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ ۗ
ज़मीन में है
وَإِن
और अगर
تُبْدُوا۟
तुम ज़ाहिर करोगे
مَا
जो
فِىٓ
(is) in
أَنفُسِكُمْ
तुम्हारे नफ़्सों में है
أَوْ
या
تُخْفُوهُ
तुम छुपाओगे उसे
يُحَاسِبْكُم
मुहासबा करेगा तुम्हारा
بِهِ
साथ उसके
ٱللَّهُ ۖ
अल्लाह
فَيَغْفِرُ
फिर वो बख़्श देगा
لِمَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहेगा
وَيُعَذِّبُ
और वो अज़ाब देगा
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۗ
वो चाहेगा
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌ
बहुत क़ुदरत रखने वाला है
अल्लाह ही का है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है। और जो कुछ तुम्हारे मन है, यदि तुम उसे व्यक्त करो या छिपाओं, अल्लाह तुमसे उसका हिसाब लेगा। फिर वह जिसे चाहे क्षमा कर दे और जिसे चाहे यातना दे। अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
जो कुछ आकाशों में और जो कुछ पृथ्वी पर है, सबका पैदा करने वाला, मालिक और प्रबंधन करने वाला केवल अल्लाह है। यदि तुम अपने दिलों में जो कुछ है उसे प्रकट करो या उसे छिपाओ, अल्लाह उसे जानता है और वह तुमसे उसका हिसाब लेगा। फिर उसके बाद अपनी कृपा और दया से जिसे चाहेगा, क्षमा कर देगा और जिसे चाहेगा, अपने न्याय और हिकमत से यातना देगा। और अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है।
आयत 285
ءَامَنَ ٱلرَّسُولُ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيْهِ مِن رَّبِّهِۦ وَٱلْمُؤْمِنُونَ ۚ كُلٌّ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَمَلَـٰٓئِكَتِهِۦ وَكُتُبِهِۦ وَرُسُلِهِۦ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍۢ مِّن رُّسُلِهِۦ ۚ وَقَالُوا۟ سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا ۖ غُفْرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيْكَ ٱلْمَصِيرُ
ءَامَنَ
ईमान लाया
ٱلرَّسُولُ
रसूल
بِمَآ
उस पर जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
مِن
from
رَّبِّهِۦ
उसके रब की तरफ़ से
وَٱلْمُؤْمِنُونَ ۚ
और सारे मोमिन (भी)
كُلٌّ
हर एक
ءَامَنَ
ईमान लाया
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَمَلَـٰٓئِكَتِهِۦ
और उसके फ़रिश्तों पर
وَكُتُبِهِۦ
और उसकी किताबों पर
وَرُسُلِهِۦ
और उसके रसूलों पर
لَا
Not
نُفَرِّقُ
नहीं हम फ़र्क़ करते
بَيْنَ
दर्मियान
أَحَدٍۢ
किसी एक के
مِّن
of
رُّسُلِهِۦ ۚ
उसके रसूलों में से
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
سَمِعْنَا
सुना हमने
وَأَطَعْنَا ۖ
और इताअत की हमने
غُفْرَانَكَ
तेरी मग़फ़िरत (चाहते हैं)
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
وَإِلَيْكَ
और तेरी ही तरफ़
ٱلْمَصِيرُ
पलटना है
रसूल उसपर, जो कुछ उसके रब की ओर से उसकी ओर उतरा, ईमान लाया और ईमानवाले भी, प्रत्येक, अल्लाह पर, उसके फ़रिश्तों पर, उसकी किताबों पर और उसके रसूलों पर ईमान लाया। (और उनका कहना यह है,) "हम उसके रसूलों में से किसी को दूसरे रसूलों से अलग नहीं करते।" और उनका कहना है, "हमने सुना और आज्ञाकारी हुए। हमारे रब! हम तेरी क्षमा के इच्छुक है और तेरी ही ओर लौटना है।"
तफ़्सीर:
रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हर उस चीज़ पर ईमान लाए, जो उनके पालनहार की ओर से उनकी तरफ़ उतारी गई और इसी प्रकार मोमिन भी ईमान लाए। वे सभी अल्लाह पर ईमान लाए, तथा उसके सभी फरिश्तों पर, उसकी सभी उन किताबों पर जो उसने नबियों पर उतारी और उसके भेजे हुए सभी रसूलों पर ईमान लाए। वे उनपर यह कहते हुए ईमान लाए : हम अल्लाह के रसूलों में से किसी के बीच भी अंतर नहीं करते। तथा उन लोगों ने कहा : हमने उसे सुना जिसका तूने हमें आदेश दिया और जिससे हमें मना किया, तथा जिस चीज़ का तूने आदेश दिया उसे अंजाम देकर और जिससे तूने मना किया उसे त्यागकर हमने तेरी आज्ञा का पालन किया। ऐ हमारे रब! हम तुझसे प्रार्थना करते हैं कि तू हमें क्षमा कर दे। क्योंकि हमारे सभी मामलों में हमारा लौटना केवल तेरी ही ओर है।
आयत 286
لَا يُكَلِّفُ ٱللَّهُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا ۚ لَهَا مَا كَسَبَتْ وَعَلَيْهَا مَا ٱكْتَسَبَتْ ۗ رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذْنَآ إِن نَّسِينَآ أَوْ أَخْطَأْنَا ۚ رَبَّنَا وَلَا تَحْمِلْ عَلَيْنَآ إِصْرًۭا كَمَا حَمَلْتَهُۥ عَلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِنَا ۚ رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِۦ ۖ وَٱعْفُ عَنَّا وَٱغْفِرْ لَنَا وَٱرْحَمْنَآ ۚ أَنتَ مَوْلَىٰنَا فَٱنصُرْنَا عَلَى ٱلْقَوْمِ ٱلْكَـٰفِرِينَ
لَا
(Does) not
يُكَلِّفُ
नहीं तकलीफ़ देता
ٱللَّهُ
अल्लाह
نَفْسًا
किसी नफ़्स को
إِلَّا
मगर
وُسْعَهَا ۚ
उसकी वुसअत भर
لَهَا
उसी के लिए है
مَا
जो
كَسَبَتْ
उसने (नेकी) कमाई
وَعَلَيْهَا
और उसके ज़िम्मा है
مَا
जो
ٱكْتَسَبَتْ ۗ
उसने (बुराई) कमाई
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
لَا
(Do) not
تُؤَاخِذْنَآ
ना तू मुआख़ज़ा करना हमारा
إِن
अगर
نَّسِينَآ
भूल जाऐं हम
أَوْ
या
أَخْطَأْنَا ۚ
ख़ता करें हम
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
وَلَا
और ना
تَحْمِلْ
तू डाल
عَلَيْنَآ
हम पर
إِصْرًۭا
ऐसा बोझ
كَمَا
जैसा कि
حَمَلْتَهُۥ
डाला तूने उसे
عَلَى
on
ٱلَّذِينَ
उन पर जो
مِن
(were) from
قَبْلِنَا ۚ
हमसे पहले थे
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
وَلَا
और ना
تُحَمِّلْنَا
तू उठवा हमसे
مَا
वो जो
لَا
not
طَاقَةَ
नहीं ताक़त
لَنَا
हमारे लिए
بِهِۦ ۖ
जिसकी
وَٱعْفُ
और दरगुज़र फ़रमा
عَنَّا
हमसे
وَٱغْفِرْ
और बख़्श दे
لَنَا
हमें
وَٱرْحَمْنَآ ۚ
और रहम फ़रमा हम पर
أَنتَ
तू
مَوْلَىٰنَا
मौला है हमारा
فَٱنصُرْنَا
पस मदद फ़रमा हमारी
عَلَى
against
ٱلْقَوْمِ
उन लोगों पर
ٱلْكَـٰفِرِينَ
जो काफ़िर हैं
अल्लाह किसी जीव पर बस उसकी सामर्थ्य और समाई के अनुसार ही दायित्व का भार डालता है। उसका है जो उसने कमाया और उसी पर उसका वबाल (आपदा) भी है जो उसने किया। "हमारे रब! यदि हम भूलें या चूक जाएँ तो हमें न पकड़ना। हमारे रब! और हम पर ऐसा बोझ न डाल जैसा तूने हमसे पहले के लोगों पर डाला था। हमारे रब! और हमसे वह बोझ न उठवा, जिसकी हमें शक्ति नहीं। और हमें क्षमा कर और हमें ढाँक ले, और हमपर दया कर। तू ही हमारा संरक्षक है, अतएव इनकार करनेवालों के मुक़ाबले में हमारी सहायता कर।"
तफ़्सीर:
अल्लाह किसी प्राणी पर केवल उसी का भार डालता है जिसके करने में वह सक्षम हो।क्योंकि अल्लाह का दीन (धर्म) आसानी पर आधारित है, इसलिए उसमें कोई कठिनाई नहीं है। अतः जिसने अच्छा कार्य किया, उसे अपने किए का प्रतिफल मिलेगा, उसमें कोई कमी नहीं की जाएगी। तथा जिसना बुरा कार्य किया, उसे अपने किए हुए पाप का दंड मिलेगा, उसकी ओर से कोई दूसरा उसका भार नहीं उठाएगा। रसूल और ईमान वालों ने कहा : ऐ हमारे पालनहार! अगर हम भूल गए हों या बिना इरादे के किसा कार्य या बात में हमसे कोई गलती हो गई हो, तो हमें सज़ा न दे। ऐ हमारे पालनहार! और हम पर उस चीज़ का भार न डाल, जो हमारे लिए कठिन हो और हम उसे सहन न कर सकें, जैसा कि तूने हमसे पहले उन लोगों पर भार डाला था, जिन्हें तूने उनके अत्याचार के कारण दंडित किया था, जैसे यहूदी लोग। तथा हमपर ऐसे आदेशों और निषेधों का बोझ न डाल, जो हमारे लिए कठिन हों और हम उन्हें करने में सक्षम न हों। तथा हमारे पापों को क्षमा कर दे और हमें माफ़ी प्रदान कर, तथा अपनी कृपा से हमपर दया कर। तू ही हमारा संरक्षक और सहायक है, अतः हमें काफ़िरों पर विजय प्रदान कर।
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