सूरह ता-हा سورة طه
मक्की 135 आयतें
नाम का मतलब
ता-हा (मुक़त्तआत हुरूफ, जिसका पूरा मतलब मालूम नहीं)
पृष्ठभूमि
सूरह ता-हा में मूसा अलैहिस्सलाम का वाकिया तफ्सील से बयान हुआ है, उनकी नबुव्वत से लेकर फिरऔन के मुकाबले और बनी-इस्राईल की आज़ादी तक। यह सूरह नबी ﷺ को तसल्ली देने के लिए नाज़िल हुई कि कुरआन आप पर मुश्किल बनाने के लिए नहीं उतारा गया।
फ़ज़ीलत / सार
कहा जाता है कि इसी सूरह की तिलावत सुनकर हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु का दिल इस्लाम की तरफ मायल हुआ था।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ طه
طه
ط ہ
ता॰ हा॰।
तफ़्सीर:
(ता, हा) इन जैसे अक्षरों के बारे में सूरतुल-बक़रा के आरंभ में बात की जा चुकी है।
आयत 2
مَآ أَنزَلْنَا عَلَيْكَ ٱلْقُرْءَانَ لِتَشْقَىٰٓ
مَآ
नहीं
أَنزَلْنَا
नाज़िल किया हमने
عَلَيْكَ
आप पर
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरआन
لِتَشْقَىٰٓ
कि आप मुसीबत में पड़ जाऐं
हमने तुमपर यह क़ुरआन इसलिए नहीं उतारा कि तुम मशक़्क़त में पड़ जाओ
तफ़्सीर:
हमने (ऐ रसूल!) आपपर यह क़ुरआन इसलिए नहीं उतारा कि वह आपकी जाति के आपपर ईमान लाने से उपेक्षा करने पर खेद के परिणामस्वरूप आपके कष्ट तथा थकावट का कारण बन जाए।
आयत 3
إِلَّا تَذْكِرَةًۭ لِّمَن يَخْشَىٰ
إِلَّا
मगर
تَذْكِرَةًۭ
एक नसीहत
لِّمَن
उसके लिए जो
يَخْشَىٰ
डरता हो
यह तो बस एक अनुस्मृति है, उसके लिए जो डरे,
तफ़्सीर:
हमने इसे केवल उन लोगों की याददहानी के लिए उतारा है, जिन्हें अल्लाह ने अपने डर की तौफ़ीक़ प्रदान की है।
आयत 4
تَنزِيلًۭا مِّمَّنْ خَلَقَ ٱلْأَرْضَ وَٱلسَّمَـٰوَٰتِ ٱلْعُلَى
تَنزِيلًۭا
नाज़िल करदा है
مِّمَّنْ
उसकी तरफ़ से जिसने
خَلَقَ
पैदा किया
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन
وَٱلسَّمَـٰوَٰتِ
और आसमानों को
ٱلْعُلَى
जो बुलन्द हैं
भली-भाँति अवतरित हुआ है उस सत्ता की ओर से, जिसने पैदा किया है धरती और उच्च आकाशों को
तफ़्सीर:
इसे उस अल्लाह ने उतारा है, जिसने धरती की रचना की और ऊँचे आकाश बनाए। अतः यह एक महान क़ुरआन है; क्योंकि यह एक महान अस्तित्व (अल्लाह) की ओर से अवतरित हुआ है।
आयत 5
ٱلرَّحْمَـٰنُ عَلَى ٱلْعَرْشِ ٱسْتَوَىٰ
ٱلرَّحْمَـٰنُ
वो रहमान है
عَلَى
over
ٱلْعَرْشِ
जो अर्श पर
ٱسْتَوَىٰ
बुलन्द हुआ
वह रहमान है, जो राजासन पर विराजमान हुआ
तफ़्सीर:
रहमान (अत्यंत दयावान् अल्लाह) अपनी महिमा के अनुरूप अर्श (सिंहासन) के ऊपर बुलंद हुआ।
आयत 6
لَهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا وَمَا تَحْتَ ٱلثَّرَىٰ
لَهُۥ
उसी के लिए है
مَا
जो
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में है
وَمَا
और जो
بَيْنَهُمَا
दर्मियान है इन दोनों के
وَمَا
और जो
تَحْتَ
नीचे है
ٱلثَّرَىٰ
गीली मिट्टी के
उसी का है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है और जो कुछ इन दोनों के मध्य है और जो कुछ आर्द्र मिट्टी के नीचे है
तफ़्सीर:
जो भी प्राणी आकाशों और धरती में तथा मिट्टी के नीचे हैं, उन सबका स्रष्टा, स्वामी और प्रबंधन करने वाला केवल पवित्र अल्लाह है।
आयत 7
وَإِن تَجْهَرْ بِٱلْقَوْلِ فَإِنَّهُۥ يَعْلَمُ ٱلسِّرَّ وَأَخْفَى
وَإِن
और अगर
تَجْهَرْ
आप बुलन्द आवाज़ से करें
بِٱلْقَوْلِ
बात को
فَإِنَّهُۥ
तो बेशक वो
يَعْلَمُ
वो जानता है
ٱلسِّرَّ
पोशीदा को
وَأَخْفَى
और ज़्यादा ख़ुफ़िया को
तुम चाहे बात पुकार कर कहो (या चुपके से), वह तो छिपी हुई और अत्यन्त गुप्त बात को भी जानता है
तफ़्सीर:
और यदि (ऐ रसूल!) आप ऊँची आवाज़ में बात करें अथवा चुपके से करें, वह पवित्र अल्लाह तो सब कुछ जानता है। क्योंकि वह गुप्त रहस्य को तथा गुप्त रहस्य से भी अधिक गुप्त चीज़, जैसे हृदय में उत्पन्न होने वाले विचारों एवं भावनाओं को भी जानता है। उससे उसमें से कुछ भी छिपा नहीं है।
आयत 8
ٱللَّهُ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ لَهُ ٱلْأَسْمَآءُ ٱلْحُسْنَىٰ
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ ۖ
वो ही
لَهُ
उसी के लिए हैं
ٱلْأَسْمَآءُ
नाम
ٱلْحُسْنَىٰ
बहुत अच्छे
अल्लाह, कि उसके सिवा कोई पूज्य-प्रभू नहीं। उसके नाम बहुत ही अच्छे हैं।
तफ़्सीर:
अल्लाह वह है, जिसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। केवल उसी के ऐसे नाम हैं, जो सुंदरता में पूर्णता को पहुँचे हुए हैं।
आयत 9
وَهَلْ أَتَىٰكَ حَدِيثُ مُوسَىٰٓ
وَهَلْ
और क्या
أَتَىٰكَ
आई आपके पास
حَدِيثُ
ख़बर
مُوسَىٰٓ
मूसा की
क्या तुम्हें मूसा की भी ख़बर पहुँची?
तफ़्सीर:
निश्चय (ऐ रसूल!) आपके पास मूसा बिन इमरान अलैहिस्सलाम की ख़बर पहुँच चुकी है।
आयत 10
إِذْ رَءَا نَارًۭا فَقَالَ لِأَهْلِهِ ٱمْكُثُوٓا۟ إِنِّىٓ ءَانَسْتُ نَارًۭا لَّعَلِّىٓ ءَاتِيكُم مِّنْهَا بِقَبَسٍ أَوْ أَجِدُ عَلَى ٱلنَّارِ هُدًۭى
إِذْ
जब
رَءَا
उसने देखी
نَارًۭا
आग
فَقَالَ
पस कहा
لِأَهْلِهِ
अपने घर वालों से
ٱمْكُثُوٓا۟
ठहरो
إِنِّىٓ
बेशक मैं
ءَانَسْتُ
देखी है मैंने
نَارًۭا
एक आग
لَّعَلِّىٓ
शायद कि मैं
ءَاتِيكُم
मैं ले आऊँ तुम्हारे पास
مِّنْهَا
उसमें से
بِقَبَسٍ
शोला/अंगारा
أَوْ
या
أَجِدُ
मैं पाऊँ
عَلَى
at
ٱلنَّارِ
उस आग पर
هُدًۭى
रहनुमाई
जबकि उसने एक आग देखी तो उसने अपने घरवालों से कहा, "ठहरो! मैंने एक आग देखी है। शायद कि तुम्हारे लिए उसमें से कोई अंगारा ले आऊँ या उस आग पर मैं मार्ग का पता पा लूँ।"
तफ़्सीर:
जब उसने अपनी यात्रा के दौरान एक आग देखी, तो अपने परिवार से कहा : तुम यहीं ठहरो, मैंने एक आग देखी है। शायद मैं उस आग से तुम्हारे लिए कोई अंगारा ले आऊँ, या मुझे वहाँ कोई मार्ग दिखाने वाला मिल जाए।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन के आसानी के लिए होने और मूसा अलैहिस्सलाम को वादी-ए-मुक़द्दस में नबुव्वत मिलने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह का दीन इंसान पर बोझ डालने के लिए नहीं, बल्कि आसानी और हिदायत के लिए है।
आयत 11
فَلَمَّآ أَتَىٰهَا نُودِىَ يَـٰمُوسَىٰٓ
فَلَمَّآ
फिर जब
أَتَىٰهَا
वो आया उसके पास
نُودِىَ
पुकारा गया
يَـٰمُوسَىٰٓ
ऐ मूसा
फिर जब वह वहाँ पहुँचा तो पुकारा गया, "ऐ मूसा!
तफ़्सीर:
फिर जब वह उस आग के पास आया, तो पवित्र अल्लाह ने उसे यह कहकर पुकारा : ऐ मूसा!
आयत 12
إِنِّىٓ أَنَا۠ رَبُّكَ فَٱخْلَعْ نَعْلَيْكَ ۖ إِنَّكَ بِٱلْوَادِ ٱلْمُقَدَّسِ طُوًۭى
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَنَا۠
मैं ही
رَبُّكَ
रब हूँ तुम्हारा
فَٱخْلَعْ
पस उतार दो
نَعْلَيْكَ ۖ
अपने दोनों जूते
إِنَّكَ
बेशक तुम
بِٱلْوَادِ
वादी में हो
ٱلْمُقَدَّسِ
मुक़द्दस
طُوًۭى
तुवा की
मैं ही तेरा रब हूँ। अपने जूते उतार दे। तू पवित्र घाटी 'तुवा' में है
तफ़्सीर:
निःसंदेह मैं ही तेरा पालनहार हूँ। अतः मुझसे बात करने की तैयारी के तौर पर अपने जूते उतार दो। निःसंदेह तुम पवित्र वादी “तुवा” में हो।
आयत 13
وَأَنَا ٱخْتَرْتُكَ فَٱسْتَمِعْ لِمَا يُوحَىٰٓ
وَأَنَا
और मैं
ٱخْتَرْتُكَ
चुन लिया मैंने तुझे
فَٱسْتَمِعْ
पस ग़ौर से सुनो
لِمَا
उसे जो
يُوحَىٰٓ
वही की जाती है
मैंने तुझे चुन लिया है। अतः सुन, जो कुछ प्रकाशना की जाती है
तफ़्सीर:
तथा मैंने (ऐ मूसा!) तुझे अपने संदेश के प्रचार के लिए चुन लिया है। इसलिए मैं तुम्हारी ओर जो वह़्य (प्रकाशना) कर रहा हूँ, उसे सुनो।
आयत 14
إِنَّنِىٓ أَنَا ٱللَّهُ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّآ أَنَا۠ فَٱعْبُدْنِى وَأَقِمِ ٱلصَّلَوٰةَ لِذِكْرِىٓ
إِنَّنِىٓ
बेशक मैं
أَنَا
मैं ही
ٱللَّهُ
अल्लाह हूँ
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّآ
मगर
أَنَا۠
मैं ही
فَٱعْبُدْنِى
पस इबादत करो मेरी
وَأَقِمِ
और क़ायम करो
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
لِذِكْرِىٓ
मेरी याद के लिए
निस्संदेह मैं ही अल्लाह हूँ। मेरे सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं। अतः तू मेरी बन्दगी कर और मेरी याद के लिए नमाज़ क़ायम कर
तफ़्सीर:
निःसंदेह मैं ही अल्लाह हूँ। मेरे सिवा कोई वास्तविक पूज्य नहीं। इसलिए केवल मेरी ही इबादत करो और संपूर्ण रूप से नमाज़ अदा करो, ताकि तुम मुझे उसमें याद रख सको।
आयत 15
إِنَّ ٱلسَّاعَةَ ءَاتِيَةٌ أَكَادُ أُخْفِيهَا لِتُجْزَىٰ كُلُّ نَفْسٍۭ بِمَا تَسْعَىٰ
إِنَّ
बेशक
ٱلسَّاعَةَ
क़यामत
ءَاتِيَةٌ
आने वाली है
أَكَادُ
क़रीब है कि मैं
أُخْفِيهَا
मैं ख़ुफ़िया रखूँगा उसे
لِتُجْزَىٰ
ताकि बदला दिया जाए
كُلُّ
every
نَفْسٍۭ
हर नफ़्स
بِمَا
उसका जो
تَسْعَىٰ
उसने कोशिश की
निश्चय ही वह (क़ियामत की) घड़ी आनेवाली है - शीघ्र ही उसे लाऊँगा, उसे छिपाए रखता हूँ - ताकि प्रत्येक व्यक्ति जो प्रयास वह करता है, उसका बदला पाए
तफ़्सीर:
निश्चय ही क़ियामत आने वाली और घटित होने वाली है। क़रीब है कि मैं उसे छिपाकर रखूँ। इसलिए कोई भी प्राणी उसका समय नहीं जानता। लेकिन नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के उन्हें बताने के कारण, वे उसकी निशानियों को जानते हैं; ताकि हर प्राणी को उसके अच्छे या बुरे किए गए कार्यों का बदला दिया जाए।
आयत 16
فَلَا يَصُدَّنَّكَ عَنْهَا مَن لَّا يُؤْمِنُ بِهَا وَٱتَّبَعَ هَوَىٰهُ فَتَرْدَىٰ
فَلَا
पस ना
يَصُدَّنَّكَ
हरगिज़ रोके तुझे
عَنْهَا
उससे
مَن
वो जो
لَّا
(does) not
يُؤْمِنُ
नहीं वो ईमान रखता
بِهَا
उस पर
وَٱتَّبَعَ
और वो पैरवी करता है
هَوَىٰهُ
अपनी ख़्वाहिशे नफ़्स की
فَتَرْدَىٰ
वरना तू हलाक हो जाएगा
अतः जो कोई उसपर ईमान नहीं लाता और अपनी वासना के पीछे पड़ा है, वह तुझे उससे रोक न दे, अन्यथा तू विनष्ट हो जाएगा
तफ़्सीर:
अतः तुम्हें उसे सच मानने और अच्छे कर्म के द्वारा उसके लिए तैयारी करने से वह व्यक्ति हरगिज़ न रोक, जो उसपर विश्वास नहीं रखता और उन वर्जित चीज़ों का पालन करता है, जिनकी उसका मन इच्छा करता है। क्योंकि उसके कारण तुम्हारा विनाश हो जाएगा।
आयत 17
وَمَا تِلْكَ بِيَمِينِكَ يَـٰمُوسَىٰ
وَمَا
और क्या है
تِلْكَ
ये
بِيَمِينِكَ
तेरे दाऐं हाथ में
يَـٰمُوسَىٰ
ऐ मूसा
और ऐ मूसा! यह तेरे दाहिने हाथ में क्या है?"
तफ़्सीर:
तथा ऐ मूसा! यह तुम्हारे दाहिने हाथ में क्या हैॽ
आयत 18
قَالَ هِىَ عَصَاىَ أَتَوَكَّؤُا۟ عَلَيْهَا وَأَهُشُّ بِهَا عَلَىٰ غَنَمِى وَلِىَ فِيهَا مَـَٔارِبُ أُخْرَىٰ
قَالَ
कहा
هِىَ
ये
عَصَاىَ
मेरी लाठी/असा है
أَتَوَكَّؤُا۟
मैं सहारा लेता हूँ
عَلَيْهَا
इस पर
وَأَهُشُّ
और मैं पत्ते झाड़ता हूँ
بِهَا
साथ इसके
عَلَىٰ
for
غَنَمِى
अपनी बकरियों पर
وَلِىَ
और मेरे लिए
فِيهَا
इसमें
مَـَٔارِبُ
फ़ायदे हैं
أُخْرَىٰ
कुछ दूसरे
उसने कहा, "यह मेरी लाठी है। मैं इसपर टेक लगाता हूँ और इससे अपनी बकरियों के लिए पत्ते झाड़ता हूँ और इससे मेरी दूसरी ज़रूरतें भी पूरी होती है।"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा : यह मेरी लाठी है। मैं इसका सहारा लेकर चलता हूँ और इसे पेड़ पर मारकर अपनी बकरियों के लिए उसके पत्ते गिराता हूँ, तथा इसके अलावा मेरे लिए इसमें अन्य लाभ हैं।
आयत 19
قَالَ أَلْقِهَا يَـٰمُوسَىٰ
قَالَ
फ़रमाया
أَلْقِهَا
डाल दो इसे
يَـٰمُوسَىٰ
ऐ मूसा
कहा, "डाल दे उसे, ऐ मूसा!"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने फरमाया : ऐ मूसा! तुम इसे डाल दो।
आयत 20
فَأَلْقَىٰهَا فَإِذَا هِىَ حَيَّةٌۭ تَسْعَىٰ
فَأَلْقَىٰهَا
तो उसने डाल दिया उसे
فَإِذَا
तो अचानक
هِىَ
वो
حَيَّةٌۭ
साँप था
تَسْعَىٰ
दौड़ता हुआ
अतः उसने डाल दिया। सहसा क्या देखते है कि वह एक साँप है, जो दौड़ रहा है
तफ़्सीर:
अतः मूसा ने उसे डाल दिया, तो वह फुर्ती और हलके से चलने वाला साँप बन गया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मूसा अलैहिस्सलाम को हिम्मत मिलने और असा (लाठी) के मोजिज़े का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह जब कोई ज़िम्मेदारी देता है तो उसके लिए ज़रूरी सामान और हौसला भी अता करता है।
आयत 21
قَالَ خُذْهَا وَلَا تَخَفْ ۖ سَنُعِيدُهَا سِيرَتَهَا ٱلْأُولَىٰ
قَالَ
फ़रमाया
خُذْهَا
पकड़ लो इसे
وَلَا
और ना
تَخَفْ ۖ
तुम डरो
سَنُعِيدُهَا
अनक़रीब हम लौटा देंगे इसे
سِيرَتَهَا
इसकी हालत पर
ٱلْأُولَىٰ
पहली
कहा, "इसे पकड़ ले और डर मत। हम इसे इसकी पहली हालत पर लौटा देंगे
तफ़्सीर:
अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम से कहा : लाठी को पकड़ लो और उसके साँप में बदल जाने से न डरो। जब तुम उसे पकड़ोगे, तो हम उसे उसकी पहली हालत पर लौटा देंगे।
आयत 22
وَٱضْمُمْ يَدَكَ إِلَىٰ جَنَاحِكَ تَخْرُجْ بَيْضَآءَ مِنْ غَيْرِ سُوٓءٍ ءَايَةً أُخْرَىٰ
وَٱضْمُمْ
और मिला लो
يَدَكَ
अपने हाथ को
إِلَىٰ
to
جَنَاحِكَ
अपने बाज़ू (पहलू) के साथ
تَخْرُجْ
वो निकलेगा
بَيْضَآءَ
सफ़ेद/रोशन
مِنْ
without any
غَيْرِ
बग़ैर
سُوٓءٍ
ऐब के
ءَايَةً
निशानी
أُخْرَىٰ
दूसरी
और अपने हाथ अपने बाज़ू की ओर समेट ले। वह बिना किसी ऐब के रौशन दूसरी निशानी के रूप में निकलेगा
तफ़्सीर:
और अपने हाथ को अपनी बग़ल के नीचे ले जाओ, वह कुष्ठरोग के बिना सफ़ेद (चमकता हुआ) निकलेगा; यह तुम्हारे लिए दूसरी निशानी है।
आयत 23
لِنُرِيَكَ مِنْ ءَايَـٰتِنَا ٱلْكُبْرَى
لِنُرِيَكَ
ताकि हम दिखाऐं तुझे
مِنْ
of
ءَايَـٰتِنَا
अपनी निशानियों से
ٱلْكُبْرَى
बड़ी-बड़ी
इसलिए कि हम तुझे अपनी बड़ी निशानियाँ दिखाएँ
तफ़्सीर:
हमने तुम्हें ये दो निशानियाँ दिखाई हैं, ताकि हम (ऐ मूसा!) तुम्हें अपनी कुछ बड़ी निशानियाँ दिखाएँ, जो हमारी शक्ति तथा तुम्हारे अल्लाह के रसूल होने को इंगित करती हैं।
आयत 24
ٱذْهَبْ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ إِنَّهُۥ طَغَىٰ
ٱذْهَبْ
जाओ
إِلَىٰ
to
فِرْعَوْنَ
तरफ़ फ़िरऔन के
إِنَّهُۥ
बेशक वो
طَغَىٰ
सरकश हो गया है
तू फ़िरऔन के पास जा। वह बहुत सरकश हो गया है।"
तफ़्सीर:
(ऐ मूसा!) तुम फ़िरऔन के पास जाओ। क्योंकि वह कुफ़्र और अल्लाह के ख़िलाफ़ विद्रोह में सीमा पार कर चुका है।
आयत 25
قَالَ رَبِّ ٱشْرَحْ لِى صَدْرِى
قَالَ
कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
ٱشْرَحْ
खोल दे
لِى
मेरे लिए
صَدْرِى
सीना मेरा
उसने निवेदन किया, "मेरे रब! मेरा सीना मेरे लिए खोल दे
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा : ऐ मेरे पालनहार! मेरे लिए मेरा सीना विस्तृत कर दे ताकि मैं कष्ट को सहन कर सकूँ।
आयत 26
وَيَسِّرْ لِىٓ أَمْرِى
وَيَسِّرْ
और आसान कर दे
لِىٓ
मेरे लिए
أَمْرِى
काम मेरा
और मेरे काम को मेरे लिए आसान कर दे
तफ़्सीर:
और मेरे लिए मेरा काम सरल कर दे।
आयत 27
وَٱحْلُلْ عُقْدَةًۭ مِّن لِّسَانِى
وَٱحْلُلْ
और खोल दे
عُقْدَةًۭ
गिरह
مِّن
from
لِّسَانِى
मेरी ज़बान की
और मेरी ज़बान की गिरह खोल दे।
तफ़्सीर:
और मुझे स्पष्ट रूप से बात करने की शक्ति प्रदान कर।
आयत 28
يَفْقَهُوا۟ قَوْلِى
يَفْقَهُوا۟
(ताकि) वो समझ जाऐं
قَوْلِى
बात मेरी
कि वे मेरी बात समझ सकें
तफ़्सीर:
ताकि जब मैं तेरा संदेश उन तक पहुँचाऊँ, तो वे मेरी बात समझ सकें।
आयत 29
وَٱجْعَل لِّى وَزِيرًۭا مِّنْ أَهْلِى
وَٱجْعَل
और बना दे
لِّى
मेरे लिए
وَزِيرًۭا
वज़ीर/मददगार
مِّنْ
from
أَهْلِى
मेरे घर वालों में से
और मेरे लिए अपने घरवालों में से एक सहायक नियुक्त कर दें,
तफ़्सीर:
और मेरे परिवार में से मेरा एक सहायक बना दे, जो मेरे कामों में मेरी सहायता करे।
आयत 30
هَـٰرُونَ أَخِى
هَـٰرُونَ
हारून
أَخِى
मेरे भाई को
हारून को, जो मेरा भाई है
तफ़्सीर:
मेरे भाई हारून बिन इमरान को।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मूसा अलैहिस्सलाम की दुआ और हारून अलैहिस्सलाम को मददगार बनाए जाने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि बड़ी ज़िम्मेदारी में साथी और मददगार का होना काम को आसान बना देता है।
आयत 31
ٱشْدُدْ بِهِۦٓ أَزْرِى
ٱشْدُدْ
मज़बूत कर दे
بِهِۦٓ
साथ इसके
أَزْرِى
क़ुव्वत/कमर मेरी
उसके द्वारा मेरी कमर मज़बूत कर
तफ़्सीर:
उसके साथ मेरी पीठ मज़बूत़ कर दे।
आयत 32
وَأَشْرِكْهُ فِىٓ أَمْرِى
وَأَشْرِكْهُ
और शरीक कर दे इसे
فِىٓ
[in]
أَمْرِى
मेरे काम में
और उसे मेरे काम में शरीक कर दें,
तफ़्सीर:
तथा उसे ईश्वरीय संदेश पहुँचाने के कार्य में मेरा साझीदार बना दे।
आयत 33
كَىْ نُسَبِّحَكَ كَثِيرًۭا
كَىْ
ताकि
نُسَبِّحَكَ
हम तस्बीह करें तेरी
كَثِيرًۭا
कसरत से
कि हम अधिक से अधिक तेरी तसबीह करें
तफ़्सीर:
ताकि हम तेरी बहुत ज़्यादा पवित्रता बयान करें।
आयत 34
وَنَذْكُرَكَ كَثِيرًا
وَنَذْكُرَكَ
और हम याद करें तुझे
كَثِيرًا
कसरत से
और तुझे ख़ूब याद करें
तफ़्सीर:
और हम तुझे बहुत ज़्यादा याद करें।
आयत 35
إِنَّكَ كُنتَ بِنَا بَصِيرًۭا
إِنَّكَ
बेशक तू
كُنتَ
तू ही है
بِنَا
हमें
بَصِيرًۭا
ख़ूब देखने वाला
निश्चय ही तू हमें खूब देख रहा है।"
तफ़्सीर:
निश्चय तू हमें अच्छी तरह देख रहा है। हमारा कोई काम तुझसे छिपा नहीं है।
आयत 36
قَالَ قَدْ أُوتِيتَ سُؤْلَكَ يَـٰمُوسَىٰ
قَالَ
फ़रमाया
قَدْ
तहक़ीक़
أُوتِيتَ
तू दे दिया गया
سُؤْلَكَ
सवाल अपना
يَـٰمُوسَىٰ
ऐ मूसा
कहा, "दिया गया तुझे जो तूने माँगा, ऐ मूसा!
तफ़्सीर:
अल्लाह ने कहा : ऐ मूसा! तूने जो माँगा, हमने तुझे दे दिया।
आयत 37
وَلَقَدْ مَنَنَّا عَلَيْكَ مَرَّةً أُخْرَىٰٓ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
مَنَنَّا
एहसान किया था हमने
عَلَيْكَ
तुझ पर
مَرَّةً
एक बार
أُخْرَىٰٓ
और भी
हम तो तुझपर एक बार और भी उपकार कर चुके है
तफ़्सीर:
और हम तुझ पर एक बार और (भी) उपकार कर चुके हैं।
आयत 38
إِذْ أَوْحَيْنَآ إِلَىٰٓ أُمِّكَ مَا يُوحَىٰٓ
إِذْ
जब
أَوْحَيْنَآ
वही (इल्हाम) की हमने
إِلَىٰٓ
to
أُمِّكَ
तरफ़ तेरी माँ के
مَا
जो
يُوحَىٰٓ
वही (इल्हाम) की जाती है
जब हमने तेरी माँ के दिल में यह बात डाली थी, जो अब प्रकाशना की जा रही है,
तफ़्सीर:
जब हमने तेरी माँ के हृदय में वह बात डाल दी, जिसके द्वारा अल्लाह ने तुझे फ़िरऔन के छल-कपट से संरक्षित किया।
आयत 39
أَنِ ٱقْذِفِيهِ فِى ٱلتَّابُوتِ فَٱقْذِفِيهِ فِى ٱلْيَمِّ فَلْيُلْقِهِ ٱلْيَمُّ بِٱلسَّاحِلِ يَأْخُذْهُ عَدُوٌّۭ لِّى وَعَدُوٌّۭ لَّهُۥ ۚ وَأَلْقَيْتُ عَلَيْكَ مَحَبَّةًۭ مِّنِّى وَلِتُصْنَعَ عَلَىٰ عَيْنِىٓ
أَنِ
कि
ٱقْذِفِيهِ
डाल दे इसे
فِى
in
ٱلتَّابُوتِ
ताबूत में
فَٱقْذِفِيهِ
फिर डाल दे उसे
فِى
in
ٱلْيَمِّ
दरिया में
فَلْيُلْقِهِ
फिर ज़रूर डाल देगा उसे
ٱلْيَمُّ
दरिया
بِٱلسَّاحِلِ
साहिल पर
يَأْخُذْهُ
पकड़ लेगा उसे
عَدُوٌّۭ
दुश्मन
لِّى
मेरा
وَعَدُوٌّۭ
और दुश्मन
لَّهُۥ ۚ
उसका
وَأَلْقَيْتُ
और डाल दी मैंने
عَلَيْكَ
तुझ पर
مَحَبَّةًۭ
मोहब्बत
مِّنِّى
अपनी तरफ़ से
وَلِتُصْنَعَ
और ताकि तू परवरिश किया जाए
عَلَىٰ
under
عَيْنِىٓ
मेरी आँखों के सामने
कि उसको सन्दूक में रख दे; फिर उसे दरिया में डाल दे; फिर दरिया उसे तट पर डाल दे कि उसे मेरा शत्रु और उसका शत्रु उठा ले। मैंने अपनी ओर से तुझपर अपना प्रेम डाला। (ताकि तू सुरक्षित रहे) और ताकि मेरी आँख के सामने तेरा पालन-पोषण हो
तफ़्सीर:
जब हमने उसे इल्हाम किया, तो आदेश दिया कि मूसा को उसके जन्म के बाद संदूक़ में डाल दे और संदूक़ को समुद्र में फेंक दे। फिर समुद्र हमारे आदेश से उसे तट पर डाल देगा, तो उसे मेरा शत्रु और उसका शत्रु यानी फ़िरऔन उठा लेगा। तथा मैंने तुझ पर अपनी ओर से प्रेम डाल दिया, तो लोग तुझसे प्रेम करने लगे, और ताकि मेरी आँख के सामने तथा मेरी सुरक्षा और देखभाल में तेरा पालन-पोषण हो।
आयत 40
إِذْ تَمْشِىٓ أُخْتُكَ فَتَقُولُ هَلْ أَدُلُّكُمْ عَلَىٰ مَن يَكْفُلُهُۥ ۖ فَرَجَعْنَـٰكَ إِلَىٰٓ أُمِّكَ كَىْ تَقَرَّ عَيْنُهَا وَلَا تَحْزَنَ ۚ وَقَتَلْتَ نَفْسًۭا فَنَجَّيْنَـٰكَ مِنَ ٱلْغَمِّ وَفَتَنَّـٰكَ فُتُونًۭا ۚ فَلَبِثْتَ سِنِينَ فِىٓ أَهْلِ مَدْيَنَ ثُمَّ جِئْتَ عَلَىٰ قَدَرٍۢ يَـٰمُوسَىٰ
إِذْ
जब
تَمْشِىٓ
चलती थी
أُخْتُكَ
बहन तेरी
فَتَقُولُ
फिर वो कहती थी
هَلْ
क्या
أَدُلُّكُمْ
मैं रहनुमाई करुँ तुम्हारी
عَلَىٰ
[to]
مَن
उस पर जो
يَكْفُلُهُۥ ۖ
किफ़ालत करेगा इसकी
فَرَجَعْنَـٰكَ
तो लौटा दिया हमने तुझे
إِلَىٰٓ
to
أُمِّكَ
तरफ़ तेरी माँ के
كَىْ
that
تَقَرَّ
ताकि ठन्डी हो
عَيْنُهَا
आँख उसकी
وَلَا
और ना
تَحْزَنَ ۚ
वो ग़म करे
وَقَتَلْتَ
और क़त्ल किया था तूने
نَفْسًۭا
एक जान को
فَنَجَّيْنَـٰكَ
तो निजात दी हमने तुझे
مِنَ
from
ٱلْغَمِّ
ग़म से
وَفَتَنَّـٰكَ
और आज़माया था हमने तुझे
فُتُونًۭا ۚ
ख़ूब आज़माना
فَلَبِثْتَ
फिर ठहरा रहा तू
سِنِينَ
कई साल
فِىٓ
with
أَهْلِ
(the) people
مَدْيَنَ
अहले मदयन में
ثُمَّ
फिर
جِئْتَ
आ गया तू
عَلَىٰ
at
قَدَرٍۢ
मुकर्रर अंदाज़े पर
يَـٰمُوسَىٰ
ऐ मूसा
याद कर जबकि तेरी बहन जाती और कहती थी, क्या मैं तुम्हें उसका पता बता दूँ जो इसका पालन-पोषण अपने ज़िम्मे ले ले? इस प्रकार हमने फिर तुझे तेरी माँ के पास पहुँचा दिया, ताकि उसकी आँख ठंड़ी हो और वह शोकाकुल न हो। और हमने तुझे भली-भाँति परखा। फिर तू कई वर्ष मदयन के लोगों में ठहरा रहा। फिर ऐ मूसा! तू ख़ास समय पर आ गया है
तफ़्सीर:
जब तेरी बहन चलने लगी, जहाँ-जहाँ ताबूत (संदूक़) जा रहा था वह उसका पीछा कर रही थी। फिर उसने ताबूत को उठाने वालों से कहा : क्या मैं उसकी तरफ तुम्हारी रहनुमाई करूँ जो इसकी रक्षा करे, इसे दूध पिलाए और इसका पालन-पोषण करेॽ इस प्रकार हमने तुम्हें तुम्हारी माँ के पास वापस पहुँचाकर तुमपर उपकार किया, ताकि वह तुम्हें अपने पास वापस पाकर खुश हो जाए और तुम्हारी वजह से शोक न करे। तथा तुमने उस “क़िब्ती” को क़त्ल कर दिया, जिसे तुमने घूँसा मारा था, तो हमने तुम्हें दंड से बचा लिया। इसी तरह हमने एक के बाद एक तुम्हें हर परीक्षा से बचाया, जिससे तुम ग्रस्त हुए। फिर तू वहाँ से निकलकर वर्षों तक मदयन के लोगों में ठहरा रहा। फिर तू उस समय आया, जब ऐ मूसा! तुझसे बात करने के लिए तेरा आना नियत था।
आज की ज़िंदगी में सबक़
फिरऔन के पास दावत और मूसा अलैहिस्सलाम की परवरिश का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह की तदबीर हमेशा इंसान की सोच से बेहतर होती है, बचपन की मुश्किलें भी बाद में हिकमत साबित होती हैं।
आयत 41
وَٱصْطَنَعْتُكَ لِنَفْسِى
وَٱصْطَنَعْتُكَ
और चुन लिया मैंने तुझे
لِنَفْسِى
अपने लिए
हमने तुझे अपने लिए तैयार किया है
तफ़्सीर:
और मैंने तुझे चुन लिया, ताकि तू मेरा संदेशवाहक हो जाए और जो कुछ मैं तेरी ओर वह़्य करूँ, उसे लोगों तक पहुँचाए।
आयत 42
ٱذْهَبْ أَنتَ وَأَخُوكَ بِـَٔايَـٰتِى وَلَا تَنِيَا فِى ذِكْرِى
ٱذْهَبْ
जाओ
أَنتَ
तुम
وَأَخُوكَ
और भाई तुम्हारा
بِـَٔايَـٰتِى
साथ मेरी निशानियों के
وَلَا
और ना
تَنِيَا
तुम दोनों सुस्ती करना
فِى
in
ذِكْرِى
मेरी याद में
जो, तू और तेरी भाई मेरी निशानियो के साथ; और मेरी याद में ढ़ीले मत पड़ना
तफ़्सीर:
(ऐ मूसा!) तू और तेरा भाई हारून अल्लाह की शक्ति तथा उसके एकेश्वरवाद को दर्शाने वाली हमारी निशानियाँ लेकर जाओ और तुम दोनों मेरी तरफ आमंत्रित करने तथा मुझे याद करने में कमज़ोर मत पड़ना।
आयत 43
ٱذْهَبَآ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ إِنَّهُۥ طَغَىٰ
ٱذْهَبَآ
दोनों जाओ
إِلَىٰ
to
فِرْعَوْنَ
तरफ़ फ़िरऔन के
إِنَّهُۥ
बेशक वो
طَغَىٰ
सरकश हो गया है
जाओ दोनों, फ़िरऔन के पास, वह सरकश हो गया है
तफ़्सीर:
तुम दोनों फ़िरऔन के पास जाओ, क्योंकि वह कुफ़्र और अल्लाह के ख़िलाफ़ विद्रोह में सीमा पार कर चुका है।
आयत 44
فَقُولَا لَهُۥ قَوْلًۭا لَّيِّنًۭا لَّعَلَّهُۥ يَتَذَكَّرُ أَوْ يَخْشَىٰ
فَقُولَا
पस दोनों कहो
لَهُۥ
उसे
قَوْلًۭا
बात
لَّيِّنًۭا
नर्म
لَّعَلَّهُۥ
शायद कि वो
يَتَذَكَّرُ
वो नसीहत पकड़े
أَوْ
या
يَخْشَىٰ
वो डर जाए
उससे नर्म बात करना, कदाचित वह ध्यान दे या डरे।"
तफ़्सीर:
तुम दोनों उससे कोमल बात करना, जिसमें कठोरता न हो। आशा है कि वह उपदेश ग्रहण करे, या अल्लाह से डर जाए और तौबा कर ले।
आयत 45
قَالَا رَبَّنَآ إِنَّنَا نَخَافُ أَن يَفْرُطَ عَلَيْنَآ أَوْ أَن يَطْغَىٰ
قَالَا
दोनों ने कहा
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
إِنَّنَا
बेशक हम
نَخَافُ
हम डरते हैं
أَن
कि
يَفْرُطَ
वो ज़्यादती करेगा
عَلَيْنَآ
हम पर
أَوْ
या
أَن
ये कि
يَطْغَىٰ
वो सरकशी करेगा
दोनों ने कहा, "ऐ हमारे रब! हमें इसका भय है कि वह हमपर ज़्यादती करे या सरकशी करने लग जाए।"
तफ़्सीर:
मूसा और हारून अलैहिमस्सलाम ने कहा : हमें भय है कि उसको निमंत्रण देने से पहले ही वह हमें सज़ा दे दे, अथवा हत्या आदि के द्वारा हमपर अत्याचार करने में सीमा से आगे बढ़ जाए।
आयत 46
قَالَ لَا تَخَافَآ ۖ إِنَّنِى مَعَكُمَآ أَسْمَعُ وَأَرَىٰ
قَالَ
फ़रमाया
لَا
(Do) not
تَخَافَآ ۖ
ना तुम दोनों डरो
إِنَّنِى
बेशक मैं
مَعَكُمَآ
साथ हूँ तुम दोनों के
أَسْمَعُ
मैं सुन रहा हूँ
وَأَرَىٰ
और मैं देख रहा हूँ
कहा, "डरो नहीं, मै तुम्हारे साथ हूँ। सुनता और देखता हूँ
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उन दोनों से फरमाया : तुम दोनों डरो नहीं। निःसंदेह मैं मदद एवं समर्थन करने के लिए तुम्हारे साथ हूँ। मैं वह सब कुछ सुन और देख रहा हूँ, जो तुम दोनों और फ़िरऔन के बीच होने जा रहा है।
आयत 47
فَأْتِيَاهُ فَقُولَآ إِنَّا رَسُولَا رَبِّكَ فَأَرْسِلْ مَعَنَا بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ وَلَا تُعَذِّبْهُمْ ۖ قَدْ جِئْنَـٰكَ بِـَٔايَةٍۢ مِّن رَّبِّكَ ۖ وَٱلسَّلَـٰمُ عَلَىٰ مَنِ ٱتَّبَعَ ٱلْهُدَىٰٓ
فَأْتِيَاهُ
पस दोनों जाओ उसके पास
فَقُولَآ
फिर दोनों कहो
إِنَّا
बेशक हम
رَسُولَا
रसूल हैं
رَبِّكَ
तेरे रब के
فَأَرْسِلْ
पस भेज दे
مَعَنَا
साथ हमारे
بَنِىٓ
(the) Children of Israel
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल को
وَلَا
और ना
تُعَذِّبْهُمْ ۖ
तो अज़ाब दे उन्हें
قَدْ
तहक़ीक़
جِئْنَـٰكَ
लाए हैं हम तेरे पास
بِـَٔايَةٍۢ
निशानी
مِّن
from
رَّبِّكَ ۖ
तेरे रब की तरफ़ से
وَٱلسَّلَـٰمُ
और सलाम है
عَلَىٰ
on
مَنِ
उस पर जो
ٱتَّبَعَ
पैरवी करे
ٱلْهُدَىٰٓ
हिदायत की
अतः जाओ, उसके पास और कहो, हम तेरे रब के रसूल है। इसराईल की सन्तान को हमारे साथ भेज दे। और उन्हें यातना न दे। हम तेरे पास तेरे रब की निशानी लेकर आए है। और सलामती है उसके लिए जो संमार्ग का अनुसरण करे!
तफ़्सीर:
अतः तुम दोनों उसके पास जाओ और उससे कहो : ऐ फ़िरऔन! हम तेरे पालनहार के रसूल हैं। इसलिए बनी इसराईल (इसराईल की संतान) को हमारे साथ भेज दे और उनके बच्चों की हत्या करके और उनकी स्त्रियों को जीवित छोड़कर उन्हें पीड़ा न दे। निश्चय हम तेरे पास तेरे पालनहार की तरफ़ से अपने सच्चे होने का प्रमाण, तथा जो ईमान लाए और अल्लाह के मार्गदर्शन का पालन करे, उसके लिए अल्लाह की यातना से सुरक्षा (की खुशख़बरी) लेकर आए हैं।
आयत 48
إِنَّا قَدْ أُوحِىَ إِلَيْنَآ أَنَّ ٱلْعَذَابَ عَلَىٰ مَن كَذَّبَ وَتَوَلَّىٰ
إِنَّا
बेशक हम
قَدْ
तहक़ीक़
أُوحِىَ
वही की गई
إِلَيْنَآ
तरफ़ हमारे
أَنَّ
कि बेशक
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब है
عَلَىٰ
(will be) on
مَن
उस पर जो
كَذَّبَ
झुठलाए
وَتَوَلَّىٰ
और मुँह मोड़े
निस्संदेह हमारी ओर प्रकाशना हुई है कि यातना उसके लिए है, जो झुठलाए और मुँह फेरे।"
तफ़्सीर:
निःसंदेह अल्लाह ने हमारी ओर वह़्य (प्रकाशना) की है कि दुनिया और आख़िरत में यातना उसी के लिए है, जो अल्लाह की निशानियों को झुठलाए और रसूलों की लाई हुई बातों से मुँह फेरे।
आयत 49
قَالَ فَمَن رَّبُّكُمَا يَـٰمُوسَىٰ
قَالَ
उसने कहा
فَمَن
फिर कौन है
رَّبُّكُمَا
रब तुम दोनों का
يَـٰمُوسَىٰ
ऐ मूसा
उसने कहा, "अच्छा, तुम दोनों का रब कौन है, मूसा?"
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने उन दोनों की लाई हुई बातों का इनकार करते हुए कहा : तुम दोनों का रब कौन है, जिसके बारे में ऐ मूसा! तुम दोनों का दावा है कि उसने तुम दोनों को मेरे पास भेजा हैॽ
आयत 50
قَالَ رَبُّنَا ٱلَّذِىٓ أَعْطَىٰ كُلَّ شَىْءٍ خَلْقَهُۥ ثُمَّ هَدَىٰ
قَالَ
कहा
رَبُّنَا
हमारा रब
ٱلَّذِىٓ
वो है जिसने
أَعْطَىٰ
अता की
كُلَّ
(to) every
شَىْءٍ
हर चीज़ को
خَلْقَهُۥ
सूरत उसकी
ثُمَّ
फिर
هَدَىٰ
रहनुमाई की
कहा, "हमारा रब वह है जिसने हर चीज़ को उसकी आकृति दी, फिर तदनुकूव निर्देशन किया।"
तफ़्सीर:
मूसा ने कहा : हमारा रब वही है, जिसने प्रत्येक चीज़ को उसका उचित रूप और आकार प्रदान किया, फिर पैदा की हुई चीज़ों को उसके लिए निर्देशित किया जिसके लिए उसने उन्हें बनाया था।
आज की ज़िंदगी में सबक़
फिरऔन से नर्मी से बात करने के हुक्म का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि सबसे ज़ालिम इंसान से भी दावत देते वक्त पहले नर्मी और हिकमत आज़मानी चाहिए।
आयत 51
قَالَ فَمَا بَالُ ٱلْقُرُونِ ٱلْأُولَىٰ
قَالَ
कहा
فَمَا
पस क्या
بَالُ
हाल है
ٱلْقُرُونِ
क़ौमों का
ٱلْأُولَىٰ
पहली
उसने कहा, "अच्छा तो उन नस्लों का क्या हाल है, जो पहले थी?"
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने कहा : अच्छा, तो पिछले समुदायों का क्या हाल है, जो कुफ़्र पर थेॽ
आयत 52
قَالَ عِلْمُهَا عِندَ رَبِّى فِى كِتَـٰبٍۢ ۖ لَّا يَضِلُّ رَبِّى وَلَا يَنسَى
قَالَ
कहा
عِلْمُهَا
इल्म उनका
عِندَ
पास है
رَبِّى
मेरे रब के
فِى
in
كِتَـٰبٍۢ ۖ
एक किताब में
لَّا
Not
يَضِلُّ
नहीं भटकता
رَبِّى
मेरा रब
وَلَا
और ना
يَنسَى
वो भूलता है
कहा, "उसका ज्ञान मेरे रब के पास एक किताब में सुरक्षित है। मेरा रब न चूकता है और न भूलता है।"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़िरऔन से कहा : उन उम्मतों की स्थिति का ज्ञान मेरे रब के पास है, जो लौह़-ए-महफ़ूज़ (सुरक्षित-पट्टिका) में अंकित है। मेरा रब उसके जानने में ग़लती नहीं करता और उनकी स्थिति का उसे जो ज्ञान है, उसे नहीं भूलता।
आयत 53
ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُمُ ٱلْأَرْضَ مَهْدًۭا وَسَلَكَ لَكُمْ فِيهَا سُبُلًۭا وَأَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ فَأَخْرَجْنَا بِهِۦٓ أَزْوَٰجًۭا مِّن نَّبَاتٍۢ شَتَّىٰ
ٱلَّذِى
वो जिसने
جَعَلَ
बनाया
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
مَهْدًۭا
बिछौना
وَسَلَكَ
और उसने जारी किया
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
فِيهَا
उसमें
سُبُلًۭا
रास्तों को
وَأَنزَلَ
और उसने उतारा
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مَآءًۭ
पानी
فَأَخْرَجْنَا
फिर निकालीं हमने
بِهِۦٓ
साथ उसके
أَزْوَٰجًۭا
कई अक़साम
مِّن
of
نَّبَاتٍۢ
पोधौं में से
شَتَّىٰ
मुख़्तलिफ़
"वही है जिसने तुम्हारे लिए धरती को पालना (बिछौना) बनाया और उसने तुम्हारे लिए रास्ते निकाले और आकाश से पानी उतारा। फिर हमने उसके द्वारा विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे निकाले
तफ़्सीर:
(उसका ज्ञान) मेरे उस रब के पास है, जिसने तुम्हारे लिए धरती को उसके ऊपर जीवन-यापन करने के लिए हमवार बनाया, उसमें तुम्हारे लिए चलने-योग्य मार्ग बनाए और आकाश से वर्षा का पानी उतारा, फिर हमने उस पानी से विभिन्न प्रकार के पौधे निकाले।
आयत 54
كُلُوا۟ وَٱرْعَوْا۟ أَنْعَـٰمَكُمْ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّأُو۟لِى ٱلنُّهَىٰ
كُلُوا۟
खाओ
وَٱرْعَوْا۟
और चराओ
أَنْعَـٰمَكُمْ ۗ
अपने मवेशियों को
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
لِّأُو۟لِى
for possessors
ٱلنُّهَىٰ
अक़्ल वालों के लिए
खाओ और अपने चौपायों को भी चराओ! निस्संदेह इसमें बुद्धिमानों के लिए बहुत-सी निशानियाँ है
तफ़्सीर:
(ऐ लोगो!) हमने तुम्हारे लिए जो पवित्र चीज़ें उगाई हैं, उनमें से खाओ और अपने पशुओं को चराओ। निःसंदेह इन उपर्युक्त नेमतों में बुद्धि वाले लोगों के लिए अल्लाह की शक्ति और उसके एकेश्वरवाद की बहुत-सी निशानियाँ हैं।
आयत 55
۞ مِنْهَا خَلَقْنَـٰكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَىٰ
۞ مِنْهَا
इसी से
خَلَقْنَـٰكُمْ
पैदा किया हमने तुम्हें
وَفِيهَا
और इसी में
نُعِيدُكُمْ
हम लौटाऐंगे तुम्हें
وَمِنْهَا
और इसी में से
نُخْرِجُكُمْ
हम निकालेंगे तुम्हें
تَارَةً
time
أُخْرَىٰ
दूसरी मर्तबा
उसी से हमने तुम्हें पैदा किया और उसी में हम तुम्हें लौटाते है और उसी से तुम्हें दूसरी बार निकालेंगे।"
तफ़्सीर:
धरती की मिट्टी से हमने तुम्हारे पिता आदम अलैहिस्सलाम को पैदा किया और जब तुम्हारी मृत्यु होगी, तो हम तुम्हें उसी में दोबारा दफ़न करवाएँगे, फिर क़ियामत के दिन पुनर्जीवन के लिए हम तुम्हें उसी से निकालेंगे।
आयत 56
وَلَقَدْ أَرَيْنَـٰهُ ءَايَـٰتِنَا كُلَّهَا فَكَذَّبَ وَأَبَىٰ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَرَيْنَـٰهُ
दिखाईं हमने उसे
ءَايَـٰتِنَا
निशानियाँ अपनी
كُلَّهَا
सारी की सारी
فَكَذَّبَ
तो उसे झुठला दिया
وَأَبَىٰ
और इन्कार किया
और हमने फ़िरऔन को अपनी सब निशानियाँ दिखाई, किन्तु उसने झुठलाया और इनकार किया।-
तफ़्सीर:
तथा निश्चय हमने फ़िरऔन को अपनी सभी नौ निशानियाँ दिखाईं, लेकिन उसने उन्हें देखकर भी झुठला दिया और अल्लाह पर ईमान लाने से इनकार कर दिया।
आयत 57
قَالَ أَجِئْتَنَا لِتُخْرِجَنَا مِنْ أَرْضِنَا بِسِحْرِكَ يَـٰمُوسَىٰ
قَالَ
उसने कहा
أَجِئْتَنَا
क्या आया है तू हमारे पास
لِتُخْرِجَنَا
ताकि तू निकाले हमें
مِنْ
of
أَرْضِنَا
हमारी ज़मीन से
بِسِحْرِكَ
साथ अपने जादू के
يَـٰمُوسَىٰ
ऐ मूसा
उसने कहा, "ऐ मूसा! क्या तू हमारे पास इसलिए आया है कि अपने जादू से हमको हमारे अपने भूभाग से निकाल दे?
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने कहा : (ऐ मूसा!) क्या तू हमारे पास इसलिए आया है कि तू अपने लाए हुए जादू के द्वारा हमें मिस्र से निकाल दे, ताकि तू उसपर राज कर सकेॽ
आयत 58
فَلَنَأْتِيَنَّكَ بِسِحْرٍۢ مِّثْلِهِۦ فَٱجْعَلْ بَيْنَنَا وَبَيْنَكَ مَوْعِدًۭا لَّا نُخْلِفُهُۥ نَحْنُ وَلَآ أَنتَ مَكَانًۭا سُوًۭى
فَلَنَأْتِيَنَّكَ
पस अलबत्ता हम ज़रूर लाऐंगे तेरे पास
بِسِحْرٍۢ
जादू
مِّثْلِهِۦ
ऐसा ही
فَٱجْعَلْ
पस मुक़र्रर कर
بَيْنَنَا
दर्मियान हमारे
وَبَيْنَكَ
और दर्मियान अपने
مَوْعِدًۭا
वादे का वक़्त
لَّا
not
نُخْلِفُهُۥ
नहीं हम ख़िलाफ़ करेंगे उससे
نَحْنُ
हम
وَلَآ
और ना
أَنتَ
तुम
مَكَانًۭا
एक जगह हो
سُوًۭى
हमवार
अच्छा, हम भी तेरे पास ऐसा ही जादू लाते है। अब हमारे और अपने बीच एक निश्चित स्थान ठहरा ले, कोई बीच की जगह, न हम इसके विरुद्ध जाएँ और न तू।"
तफ़्सीर:
अतः हम भी (ऐ मूसा!) तेरे पास तेरे जादू जैसा जादू अवश्य लाएँगे। अतः तू हमारे और अपने बीच एक निश्चित समय और एक विशिष्ट स्थान पर मिलने का एक समय निर्धारित कर ले, जिससे न हम पीछे हटें और न तुम पीछे हटो, तथा वह स्थान दोनों पक्षों के बीच में और बराबर हो।
आयत 59
قَالَ مَوْعِدُكُمْ يَوْمُ ٱلزِّينَةِ وَأَن يُحْشَرَ ٱلنَّاسُ ضُحًۭى
قَالَ
कहा
مَوْعِدُكُمْ
वादे का वक़्त तुम्हारा
يَوْمُ
दिन है
ٱلزِّينَةِ
ज़ीनत (जशन) का
وَأَن
और ये कि
يُحْشَرَ
इकट्ठे किए जाऐंगे
ٱلنَّاسُ
लोग
ضُحًۭى
चाश्त के वक़्त
कहा, "उत्सव का दिन तुम्हारे वादे का है और यह कि लोग दिन चढ़े इकट्ठे हो जाएँ।"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़िरऔन से कहा : हमारे और तुम्हारे बीच मिलने का समय ईद (उत्सव) का दिन है, जब लोग ईद मनाने के लिए दिन चढ़े इकट्ठे होते हैं।
आयत 60
فَتَوَلَّىٰ فِرْعَوْنُ فَجَمَعَ كَيْدَهُۥ ثُمَّ أَتَىٰ
فَتَوَلَّىٰ
तो पलटा
فِرْعَوْنُ
फ़िरऔन
فَجَمَعَ
फिर उसने जमा की
كَيْدَهُۥ
चाल अपनी
ثُمَّ
फिर
أَتَىٰ
आ गया
तब फ़िरऔन ने पलटकर अपने सारे हथकंडे जुटाए। और आ गया
तफ़्सीर:
फिर फ़िरऔन वापस लौटा, सो उसने अपने दाँव-पेंच और हथकंडे जुटाए। फिर मुक़ाबले के लिए नियत समय और स्थान पर आया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जादूगरों के मुकाबले की तारीख तय होने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि बातिल के मुकाबले में हक की तैयारी सोच-समझकर और मुनासिब वक्त पर करनी चाहिए।
आयत 61
قَالَ لَهُم مُّوسَىٰ وَيْلَكُمْ لَا تَفْتَرُوا۟ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًۭا فَيُسْحِتَكُم بِعَذَابٍۢ ۖ وَقَدْ خَابَ مَنِ ٱفْتَرَىٰ
قَالَ
कहा
لَهُم
उन्हें
مُّوسَىٰ
मूसा ने
وَيْلَكُمْ
अफ़सोस तुम पर
لَا
(Do) not
تَفْتَرُوا۟
ना तुम गढ़ो
عَلَى
against
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
كَذِبًۭا
झूठ
فَيُسْحِتَكُم
वरना वो फ़ना कर देगा तुम्हें
بِعَذَابٍۢ ۖ
साथ अज़ाब के
وَقَدْ
और तहक़ीक़
خَابَ
वो नामुराद हुआ
مَنِ
जिसने
ٱفْتَرَىٰ
गढ़ लिया झूठ
मूसा ने उन लोगों से कहा, "तबाही है तुम्हारी; झूठ घड़कर अल्लाह पर न थोपो कि वह तुम्हें एक यातना से विनष्ट कर दे और झूठ जिस किसी ने भी घड़कर थोपा, वह असफल रहा।"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़िरऔन के जादूगरों को उपदेश देते हुए कहा : सावधान रहो, तुम जादू के द्वारा लोगों को धोखा देकर अल्लाह पर झूठ न गढ़ो, अन्यथा वह तुम्हें अपनी ओर से यातना देकर उखाड़ फेंकेगा। निश्चय वह असफल हुआ, जिसने अल्लाह के विरुद्ध झूठ गढ़ा।
आयत 62
فَتَنَـٰزَعُوٓا۟ أَمْرَهُم بَيْنَهُمْ وَأَسَرُّوا۟ ٱلنَّجْوَىٰ
فَتَنَـٰزَعُوٓا۟
तो वो झगड़ने लगे
أَمْرَهُم
अपने मामले में
بَيْنَهُمْ
आपस में
وَأَسَرُّوا۟
और उन्होंने चुपके-चुपके की
ٱلنَّجْوَىٰ
सरगोशी
इसपर उन्होंने परस्पर बड़ा मतभेद किया औऱ और चुपके-चुपके कानाफूसी की
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम की बातें सुनकर जादूगर आपस में वाद-विवाद करने लगे और वे चुपके से आपस में बातें करने लगे।
आयत 63
قَالُوٓا۟ إِنْ هَـٰذَٰنِ لَسَـٰحِرَٰنِ يُرِيدَانِ أَن يُخْرِجَاكُم مِّنْ أَرْضِكُم بِسِحْرِهِمَا وَيَذْهَبَا بِطَرِيقَتِكُمُ ٱلْمُثْلَىٰ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
إِنْ
यक़ीनन
هَـٰذَٰنِ
ये दोनों
لَسَـٰحِرَٰنِ
अलबत्ता जादूगर हैं
يُرِيدَانِ
वो दोनों चाहते हैं
أَن
कि
يُخْرِجَاكُم
वो दोनों निकाल दें तुम्हें
مِّنْ
of
أَرْضِكُم
तुम्हारी ज़मीन से
بِسِحْرِهِمَا
साथ अपने जादू के
وَيَذْهَبَا
और वो दोनों ले जाऐं
بِطَرِيقَتِكُمُ
तुम्हारे तरीक़े को
ٱلْمُثْلَىٰ
जो इन्तिहाई मिसाली है
कहने लगे, "ये दोनों जादूगर है, चाहते है कि अपने जादू से तुम्हें तुम्हारे भूभाग से निकाल बाहर करें। और तुम्हारी उत्तम और उच्च प्रणाली को तहस-नहस करके रख दे।"
तफ़्सीर:
कुछ जादूगरों ने चुपके से एक-दूसरे से कहा : निश्चय मूसा और हारून जादूगर हैं, जो चाहते हैं कि अपने लाए हुए जादू के द्वारा तुम्हें मिस्र से निकाल दें तथा जीवन में तुम्हारे सबसे उत्तम तौर-तरीक़े और तुम्हारे सर्वोच्च सिद्धांत को नष्ट कर दें।
आयत 64
فَأَجْمِعُوا۟ كَيْدَكُمْ ثُمَّ ٱئْتُوا۟ صَفًّۭا ۚ وَقَدْ أَفْلَحَ ٱلْيَوْمَ مَنِ ٱسْتَعْلَىٰ
فَأَجْمِعُوا۟
तो जमा करो
كَيْدَكُمْ
चाल अपनी
ثُمَّ
फिर
ٱئْتُوا۟
आ जाओ
صَفًّۭا ۚ
सफ़ बनाकर
وَقَدْ
और तहक़ीक़
أَفْلَحَ
फ़लाह पा गया
ٱلْيَوْمَ
आज
مَنِ
वो जो
ٱسْتَعْلَىٰ
ग़ालिब हुआ
अतः तुम सब मिलकर अपना उपाय जुटा लो, फिर पंक्तिबद्ध होकर आओ। आज तो प्रभावी रहा, वही सफल है।"
तफ़्सीर:
अतः तुम अपने उपाय को मज़बूत कर लो और उसमें मतभेद न करो, फिर पंक्तिबद्ध होकर आगे बढ़ो और तुम्हारे पास जो कुछ है, उसे एक ही बार में डाल दो। निश्चय आज के दिन वही सफल होगा, जिसने अपने विरोधी को परास्त कर दिया।
आयत 65
قَالُوا۟ يَـٰمُوسَىٰٓ إِمَّآ أَن تُلْقِىَ وَإِمَّآ أَن نَّكُونَ أَوَّلَ مَنْ أَلْقَىٰ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
يَـٰمُوسَىٰٓ
ऐ मूसा
إِمَّآ
या तो
أَن
ये कि
تُلْقِىَ
तुम डालो
وَإِمَّآ
और या
أَن
ये कि
نَّكُونَ
हों हम
أَوَّلَ
पहले
مَنْ
जो
أَلْقَىٰ
डालें
वे बोले, "ऐ मूसा! या तो तुम फेंको या फिर हम पहले फेंकते हैं।"
तफ़्सीर:
जादूगरों ने मूसा अलैहिस्सलाम से कहा : ऐ मूसा! आप दो बातों में से किसी एक का चयन कर लें : या तो आप अपने पास मौजूद जादू को फेंकने की पहले करें, या फिर हम ही इसकी शुरूआत करते हैं।
आयत 66
قَالَ بَلْ أَلْقُوا۟ ۖ فَإِذَا حِبَالُهُمْ وَعِصِيُّهُمْ يُخَيَّلُ إِلَيْهِ مِن سِحْرِهِمْ أَنَّهَا تَسْعَىٰ
قَالَ
कहा
بَلْ
बल्कि
أَلْقُوا۟ ۖ
तुम डालो
فَإِذَا
तो यकायक
حِبَالُهُمْ
रस्सियाँ उनकी
وَعِصِيُّهُمْ
और लाठियाँ उनकी
يُخَيَّلُ
ख़्याल डाला गया
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
مِن
by
سِحْرِهِمْ
उनके जादू की वजह से
أَنَّهَا
कि बेशक वो
تَسْعَىٰ
वो दौड़ रही हैं
कहा, "नहीं, बल्कि तुम्हीं फेंको।" फिर अचानक क्या देखते है कि उनकी रस्सियाँ और लाठियाँ उनके जादू से उनके ख़याल में दौड़ती हुई प्रतीत हुई
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा : बल्कि जो कुछ तुम्हारे पास है, पहले तुम्हीं उसे फेंको। चुनाँचे उनके पास जो कुछ था, उन्होंने उसे फेंका, तो अचानक उनकी फेंकी हुई रस्सियाँ और लाठियाँ उनके जादू के प्रभाव से मूसा अलैहिस्सलाम के लिए ऐसा प्रतीत होने लगीं कि वे साँप बनकर दौड़ रही हैं।
आयत 67
فَأَوْجَسَ فِى نَفْسِهِۦ خِيفَةًۭ مُّوسَىٰ
فَأَوْجَسَ
तो महसूस किया
فِى
in
نَفْسِهِۦ
अपने दिल में
خِيفَةًۭ
ख़ौफ़ को
مُّوسَىٰ
मूसा ने
और मूसा अपने जी में डरा
तफ़्सीर:
तो मूसा को उनके इस कार्य से अपने दिल में भय का अनुभव हुआ।
आयत 68
قُلْنَا لَا تَخَفْ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْأَعْلَىٰ
قُلْنَا
कहा हमने
لَا
(Do) not
تَخَفْ
ना तुम डरो
إِنَّكَ
बेशक तुम
أَنتَ
तुम ही
ٱلْأَعْلَىٰ
ग़ालिब (रहोगे)
हमने कहा, "मत डर! निस्संदेह तू ही प्रभावी रहेगा।
तफ़्सीर:
तब अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम को आश्वासन देते हुए कहा : तुम्हें जो कुछ महसूस हो रहा है, उससे न डरो। निश्चय (ऐ मूसा!) तुम ही उनपर प्रभुत्व एवं विजय प्राप्त करोगे।
आयत 69
وَأَلْقِ مَا فِى يَمِينِكَ تَلْقَفْ مَا صَنَعُوٓا۟ ۖ إِنَّمَا صَنَعُوا۟ كَيْدُ سَـٰحِرٍۢ ۖ وَلَا يُفْلِحُ ٱلسَّاحِرُ حَيْثُ أَتَىٰ
وَأَلْقِ
और डाल दो
مَا
उसको जो
فِى
(is) in
يَمِينِكَ
तुम्हारे दाऐं हाथ में है
تَلْقَفْ
वो निगल जाएगा
مَا
उसको जो
صَنَعُوٓا۟ ۖ
उन्होंने बनाया
إِنَّمَا
बेशक
صَنَعُوا۟
जो उन्होंने बनाया
كَيْدُ
चाल है
سَـٰحِرٍۢ ۖ
एक जादूगर की
وَلَا
और नहीं
يُفْلِحُ
फ़लाह पा सकता
ٱلسَّاحِرُ
जादूगर
حَيْثُ
जहाँ कहीं
أَتَىٰ
वो आए
और डाल दे जो तेरे दाहिने हाथ में है। जो कुछ उन्होंने रचा है, वह उसे निगल जाएगा। जो कुछ उन्होंने रचा है, वह तो बस जादूगर का स्वांग है और जादूगर सफल नहीं होता, चाहे वह जैसे भी आए।"
तफ़्सीर:
तुम्हारे दाहिने हाथ में जो लाठी है, उसे डाल दो। वह साँप बनकर उनके बनाए हुए जादू को निगल जाएगा। क्योंकि उन्होंने जो कुछ बनाया है, वह एक जादुई चाल के अलावा कुछ भी नहीं है। तथा जादूगर जहाँ भी हो, वह किसी उद्देश्य में सफल नहीं होता।
आयत 70
فَأُلْقِىَ ٱلسَّحَرَةُ سُجَّدًۭا قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا بِرَبِّ هَـٰرُونَ وَمُوسَىٰ
فَأُلْقِىَ
तो गिरा दिए गए
ٱلسَّحَرَةُ
जादूगर
سُجَّدًۭا
सजदे में
قَالُوٓا۟
कहने लगे
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
بِرَبِّ
रब पर
هَـٰرُونَ
हारून
وَمُوسَىٰ
और मूसा के
अन्ततः जादूगर सजदे में गिर पड़े, बोले, "हम हारून और मूसा के रब पर ईमान ले आए।"
तफ़्सीर:
फिर मूसा ने अपनी लाठी फेंकी, तो वह एक साँप बनकर जादूगरों के बनाए हुए साँपों को निगल गया। जादूगरों को जब यह यक़ीन हो गया कि मूसा के पास जो कुछ है, वह जादू नहीं है, बल्कि वह अल्लाह की ओर से है, तो वे अल्लाह के लिए सजदे में गिर पड़े और बोल उठे : हम हारून और मूसा के पालनहार पर ईमान ले आए, जो सभी प्राणियों का पालनहार है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जादूगरों की शिकस्त और ईमान लाने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि सच्चाई सामने आने पर उसे फौरन कबूल करने की हिम्मत रखनी चाहिए, चाहे इसकी कीमत जान भी हो।
आयत 71
قَالَ ءَامَنتُمْ لَهُۥ قَبْلَ أَنْ ءَاذَنَ لَكُمْ ۖ إِنَّهُۥ لَكَبِيرُكُمُ ٱلَّذِى عَلَّمَكُمُ ٱلسِّحْرَ ۖ فَلَأُقَطِّعَنَّ أَيْدِيَكُمْ وَأَرْجُلَكُم مِّنْ خِلَـٰفٍۢ وَلَأُصَلِّبَنَّكُمْ فِى جُذُوعِ ٱلنَّخْلِ وَلَتَعْلَمُنَّ أَيُّنَآ أَشَدُّ عَذَابًۭا وَأَبْقَىٰ
قَالَ
कहा (फ़िरऔन) ने
ءَامَنتُمْ
ईमान ले आए तुम
لَهُۥ
इस पर
قَبْلَ
इससे पहले
أَنْ
कि
ءَاذَنَ
मैं इजाज़त दूँ
لَكُمْ ۖ
तुम्हें
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَكَبِيرُكُمُ
अलबत्ता
ٱلَّذِى
जिसने
عَلَّمَكُمُ
सिखाया तुम्हें
ٱلسِّحْرَ ۖ
जादू
فَلَأُقَطِّعَنَّ
तो अलबत्ता मैं ज़रूर काट डालूँगा
أَيْدِيَكُمْ
तुम्हारे हाथों को
وَأَرْجُلَكُم
और तुम्हारे पाँवों को
مِّنْ
of
خِلَـٰفٍۢ
मुख़ालिफ़ (सिम्त) से
وَلَأُصَلِّبَنَّكُمْ
और अलबत्ता मैं ज़रूर सूली चढ़ाऊँगा तुम्हें
فِى
on
جُذُوعِ
तनों पर
ٱلنَّخْلِ
खजूर के दरख़्त के
وَلَتَعْلَمُنَّ
और अलबत्ता तुम ज़रूर जान लोगे
أَيُّنَآ
कौन सा हम में से
أَشَدُّ
ज़्यादा सख़्त है
عَذَابًۭا
सज़ा देने में
وَأَبْقَىٰ
और ज़्यादा बाक़ी रहने वाला
उसने कहा, "तुमने मान लिया उसको, इससे पहले कि मैं तुम्हें इसकी अनुज्ञा देता? निश्चय ही यह तुम सबका प्रमुख है, जिसने जादू सिखाया है। अच्छा, अब मैं तुम्हारा हाथ और पाँव विपरीत दिशाओं से कटवा दूँगा और खंजूर के तनों पर तुम्हें सूली दे दूँगा। तब तुम्हें अवश्य ही मालूम हो जाएगा कि हममें से किसकी यातना अधिक कठोर और स्थायी है!"
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने जादूगरों के ईमान लाने का खंडन करते हुए और उन्हें धमकी देते हुए कहा : क्या तुम लोग मूसा पर ईमान ले आए इससे पहले कि मैं तुम्हें ऐसा करने की अनुमति दूँ?! निश्चय मूसा ही (ऐ जादूगरो!) तुम्हारा वह सरदार है, जिसने तुम्हें जादू सिखाया है। इसलिए निश्चय मैं तुममें से प्रत्येक (जादूगर) का एक हाथ और एक पैर उनकी विपरीत दिशाओं से कटवा दूँगा और तुम्हारे शरीर को खजूर के तनों पर लटका दूँगा, यहाँ तक कि तुम्हारी मृत्यु हो जाए और तुम दूसरों के लिए सीख बन जाओ। उस समय तुम अवश्य ही जान लोगे कि हममें से कौन अधिक कठोर एवं स्थायी यातना देने वाला है : मैं या मूसा का रबॽ!
आयत 72
قَالُوا۟ لَن نُّؤْثِرَكَ عَلَىٰ مَا جَآءَنَا مِنَ ٱلْبَيِّنَـٰتِ وَٱلَّذِى فَطَرَنَا ۖ فَٱقْضِ مَآ أَنتَ قَاضٍ ۖ إِنَّمَا تَقْضِى هَـٰذِهِ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَآ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لَن
हरगिज़ नहीं
نُّؤْثِرَكَ
हम तरजीह देंगे तुझे
عَلَىٰ
over
مَا
उस पर जो
جَآءَنَا
आ गया हमारे पास
مِنَ
of
ٱلْبَيِّنَـٰتِ
खुली निशानियों में से
وَٱلَّذِى
और उस पर जिसने
فَطَرَنَا ۖ
पैदा किया हमें
فَٱقْضِ
पस तू फ़ैसला कर दे
مَآ
जो
أَنتَ
तू
قَاضٍ ۖ
फ़ैसला करने वाला है
إِنَّمَا
बेशक
تَقْضِى
तू फ़ैसला कर सकता है
هَـٰذِهِ
इसी
ٱلْحَيَوٰةَ
life
ٱلدُّنْيَآ
दुनिया की ज़िन्दगी का
उन्होंने कहा, "जो स्पष्ट निशानियाँ हमारे सामने आ चुकी है उनके मुक़ाबले में सौगंध है उस सत्ता की, जिसने हमें पैदा किया है, हम कदापि तुझे प्राथमिकता नहीं दे सकते। तो जो कुछ तू फ़ैसला करनेवाला है, कर ले। तू बस इसी सांसारिक जीवन का फ़ैसला कर सकता है
तफ़्सीर:
जादूगरों ने फ़िरऔन से कहा : (ऐ फ़िरऔन!) हमारे पास जो स्पष्ट निशानियाँ आ चुकी हैं, उनका अनुसरण करने के बजाय हम कभी तेरा अनुसरण करना पसंद नहीं करेंगे, तथा जिस अल्लाह ने हमारी रचना की है, हम उसपर कदापि तुझे तरजीह नहीं देंगे। अतः तू हमारे साथ जो कुछ करने वाला है, कर ले। इस नश्वर जीवन को छोड़कर तेरा हम पर कोई अधिकार नहीं है, और शीध्र ही तेरा अधिकार मिट जाएगा।
आयत 73
إِنَّآ ءَامَنَّا بِرَبِّنَا لِيَغْفِرَ لَنَا خَطَـٰيَـٰنَا وَمَآ أَكْرَهْتَنَا عَلَيْهِ مِنَ ٱلسِّحْرِ ۗ وَٱللَّهُ خَيْرٌۭ وَأَبْقَىٰٓ
إِنَّآ
बेशक हम
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
بِرَبِّنَا
अपने रब पर
لِيَغْفِرَ
ताकि वो बख़्श दे
لَنَا
हमारे लिए
خَطَـٰيَـٰنَا
ख़ताऐं हमारी
وَمَآ
और उसे जो
أَكْرَهْتَنَا
मजबूर किया हमें तूने
عَلَيْهِ
उस पर
مِنَ
of
ٱلسِّحْرِ ۗ
जादू की वजह से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
خَيْرٌۭ
बेहतर है
وَأَبْقَىٰٓ
और बाक़ी रहने वाला है
हम तो अपने रब पर ईमान ले आए, ताकि वह हमारी खताओं को माफ़ कर दे औऱ इस जादू को भी जिसपर तूने हमें बाध्य किया। अल्लाह की उत्तम और शेष रहनेवाला है।" -
तफ़्सीर:
हम अपने रब पर इस आशा में ईमान लाए हैं कि वह हमसे कुफ़्र और अन्य चीजों के हमारे पिछले पापों को मिटा दे, तथा हमारे उस जादू के पाप को क्षमा कर दे, जिसे सीखने और अभ्यास करने तथा उसके द्वारा मूसा को परास्त करने के लिए तूने हमें मजबूर किया था। तथा अल्लाह उससे कहीं बेहतर प्रतिफल देने वाला है, जिसका तूने हमसे वादा किया है तथा उससे कहीं अधिक स्थायी यातना देने वाला है, जिसकी तूने हमें धमकी दी है।
आयत 74
إِنَّهُۥ مَن يَأْتِ رَبَّهُۥ مُجْرِمًۭا فَإِنَّ لَهُۥ جَهَنَّمَ لَا يَمُوتُ فِيهَا وَلَا يَحْيَىٰ
إِنَّهُۥ
बेशक वो
مَن
जो
يَأْتِ
आएगा
رَبَّهُۥ
अपने रब के पास
مُجْرِمًۭا
मुजरिम होकर
فَإِنَّ
तो बेशक
لَهُۥ
उसके लिए
جَهَنَّمَ
जहन्नम है
لَا
Not
يَمُوتُ
ना वो मरेगा
فِيهَا
उसमें
وَلَا
और ना
يَحْيَىٰ
वो ज़िन्दा रहेगा
सत्य यह है कि जो कोई अपने रब के पास अपराधी बनकर आया उसके लिए जहन्नम है, जिसमें वह न मरेगा और न जिएगा
तफ़्सीर:
निःसंदेह तथ्य और निष्कर्ष यह है कि जो भी व्यक्ति क़ियामत के दिन अपने पालनहार के पास इस दशा में आएगा कि वह अल्लाह के साथ कुफ़्र करने वाला होगा, तो उसके लिए जहन्नम की आग है, जिसमें वह प्रवेश करेगा और हमेशा वहीं रहेगा। वह वहाँ न तो मरेगा कि उसकी यातना से आराम पा जाए और न ही वह एक अच्छा जीवन जीएगा।
आयत 75
وَمَن يَأْتِهِۦ مُؤْمِنًۭا قَدْ عَمِلَ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمُ ٱلدَّرَجَـٰتُ ٱلْعُلَىٰ
وَمَن
और जो
يَأْتِهِۦ
आएगा उसके पास
مُؤْمِنًۭا
मोमिन होकर
قَدْ
तहक़ीक़
عَمِلَ
उसने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلدَّرَجَـٰتُ
दर्जे हैं
ٱلْعُلَىٰ
बुलँद
और जो कोई उसके पास मोमिन होकर आया, जिसने अच्छे कर्म किए होंगे, तो ऐसे लोगों के लिए तो ऊँचे दर्जें है
तफ़्सीर:
और जो क़ियामत के दिन अपने रब के पास मोमिन होकर आएगा और उसने अच्छे कर्म किए होंगे, तो ऐसे महान गुणों से सुसज्जित लोगों के लिए उच्च स्थान तथा ऊँचे पद हैं।
आयत 76
جَنَّـٰتُ عَدْنٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۚ وَذَٰلِكَ جَزَآءُ مَن تَزَكَّىٰ
جَنَّـٰتُ
बाग़ात
عَدْنٍۢ
हमेशगी के
تَجْرِى
बहती हैं
مِن
from
تَحْتِهَا
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَا ۚ
उनमें
وَذَٰلِكَ
और ये
جَزَآءُ
बदला है
مَن
उसका जो
تَزَكَّىٰ
पाकीज़गी इख़्तियार करे
अदन के बाग़ है, जिनके नीचें नहरें बहती होंगी। उनमें वे सदैव रहेंगे। यह बदला है उसका जिसने स्वयं को विकसित किया--
तफ़्सीर:
वे पद स्थायी निवास के बाग़ हैं, जिनके महलों के नीचे से नहरें बहती हैं, वे वहाँ हमेशा के लिए रहेंगे। यह उपर्युक्त बदला हर उस व्यक्ति का प्रतिफल है, जो कुफ़्र और पापों से शुद्ध हो गया।
आयत 77
وَلَقَدْ أَوْحَيْنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰٓ أَنْ أَسْرِ بِعِبَادِى فَٱضْرِبْ لَهُمْ طَرِيقًۭا فِى ٱلْبَحْرِ يَبَسًۭا لَّا تَخَـٰفُ دَرَكًۭا وَلَا تَخْشَىٰ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَوْحَيْنَآ
वही की हमने
إِلَىٰ
to
مُوسَىٰٓ
तरफ़ मूसा के
أَنْ
कि
أَسْرِ
ले चलो रात को
بِعِبَادِى
मेरे बन्दों को
فَٱضْرِبْ
पस बना लो
لَهُمْ
उनके लिए
طَرِيقًۭا
एक रास्ता
فِى
in
ٱلْبَحْرِ
समुन्दर में
يَبَسًۭا
ख़ुश्क
لَّا
not
تَخَـٰفُ
ना तुझे ख़ौफ़ होगा
دَرَكًۭا
पा लेने का
وَلَا
और ना
تَخْشَىٰ
तू डरेगा
और हमने मूसा की ओर प्रकाशना की, "रातों रात मेरे बन्दों को लेकर निकल पड़, और उनके लिए दरिया में सूखा मार्ग निकाल ले। न तो तुझे पीछा किए जाने औऱ न पकड़े जाने का भय हो और न किसी अन्य चीज़ से तुझे डर लगे।"
तफ़्सीर:
और हमने मूसा की ओर वह़्य (प्रकाशना) की कि मेरे बंदों को लेकर रातों रात मिस्र से रवाना हो जाओ, ताकि किसी को उनकी भनक न लगे तथा लाठी को समुद्र पर मारकर उनके लिए समुद्र में एक सूखा मार्ग बना लो। तुम्हें इस बात का डर न हो कि फ़िरऔन और उसके सरदार तुम्हें पकड़ लेंगे या तुम समुद्र में डूब जाओगे।
आयत 78
فَأَتْبَعَهُمْ فِرْعَوْنُ بِجُنُودِهِۦ فَغَشِيَهُم مِّنَ ٱلْيَمِّ مَا غَشِيَهُمْ
فَأَتْبَعَهُمْ
तो पीछा किया उनका
فِرْعَوْنُ
फ़िरऔन ने
بِجُنُودِهِۦ
साथ अपने लश्करों के
فَغَشِيَهُم
तो ढाँप लिया उन्हें
مِّنَ
from
ٱلْيَمِّ
समुन्दर से
مَا
जिसने
غَشِيَهُمْ
ढाँप लिया उन्हें
फ़िरऔन ने अपनी सेना के साथ उनका पीछा किया। अन्ततः पानी उनपर छा गया, जैसाकि उसे उनपर छा जाना था
तफ़्सीर:
तब फ़िरऔन ने अपनी सेना के साथ उनका पीछा किया, तो उसे और उसकी सेना को समुद्र से उस चीज़ ने ढाँप लिया जिसकी वास्तविकता केवल अल्लाह ही जानता है। अंततः वे सब डूब गए और नाश हो गए, तथा मूसा और उनके संग के लोग बच गए।
आयत 79
وَأَضَلَّ فِرْعَوْنُ قَوْمَهُۥ وَمَا هَدَىٰ
وَأَضَلَّ
और भटका दिया
فِرْعَوْنُ
फ़िरऔन ने
قَوْمَهُۥ
अपनी क़ौम को
وَمَا
और ना
هَدَىٰ
रहनुमाई की
फ़िरऔन ने अपनी क़ौम को पथभ्रष्ट किया और मार्ग न दिखाया
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने अपनी जाति के लोगों को, उनके आगे कुफ़्र (अविश्वास) को सुंदर रूप में प्रस्तुत कर और उन्हें असत्य के जाल में फाँसकर पथभ्रष्ट किया तथा उन्हें सत्य का मार्ग नहीं दिखाया।
आयत 80
يَـٰبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ قَدْ أَنجَيْنَـٰكُم مِّنْ عَدُوِّكُمْ وَوَٰعَدْنَـٰكُمْ جَانِبَ ٱلطُّورِ ٱلْأَيْمَنَ وَنَزَّلْنَا عَلَيْكُمُ ٱلْمَنَّ وَٱلسَّلْوَىٰ
يَـٰبَنِىٓ
O Children of Israel
إِسْرَٰٓءِيلَ
ऐ बनी इस्राईल
قَدْ
तहक़ीक़
أَنجَيْنَـٰكُم
निजात दी हमने तुम्हें
مِّنْ
from
عَدُوِّكُمْ
तुम्हारे दुश्मन से
وَوَٰعَدْنَـٰكُمْ
और वादा किया हमने तुमसे
جَانِبَ
on (the) side
ٱلطُّورِ
(of) the Mount
ٱلْأَيْمَنَ
तूर की दाईं जानिब का
وَنَزَّلْنَا
और उतारा हमने
عَلَيْكُمُ
तुम पर
ٱلْمَنَّ
मन्न
وَٱلسَّلْوَىٰ
और सलवा
ऐ ईसराईल की सन्तान! हमने तुम्हें तुम्हारे शत्रु से छुटकारा दिया और तुमसे तूर के दाहिने छोर का वादा किया और तुमपर मग्न और सलवा उतारा,
तफ़्सीर:
हमने बनी इसराईल से, उन्हें फ़िरऔन और उसकी सेना से बचाने के बाद कहा : ऐ इसराईल के पुत्रो! हमने तुम्हें तुम्हारे शत्रु से बचा लिया और “तूर” पर्वत के बगल में स्थित घाटी की दाहिनी ओर मूसा से बात करने का तुमसे वादा किया तथा तुमपर “तीह” के मैदान में अपनी नेमतों में से शहद-जैसा मीठा पेय और बटेर की तरह अच्छे मांस वाला छोटा-सा पक्षी उतारा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
बनी इस्राईल की आज़ादी और समुंदर पार करने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि मुश्किल से मुश्किल हालात में भी अल्लाह रास्ता निकाल सकता है, बस भरोसा बनाए रखना चाहिए।
आयत 81
كُلُوا۟ مِن طَيِّبَـٰتِ مَا رَزَقْنَـٰكُمْ وَلَا تَطْغَوْا۟ فِيهِ فَيَحِلَّ عَلَيْكُمْ غَضَبِى ۖ وَمَن يَحْلِلْ عَلَيْهِ غَضَبِى فَقَدْ هَوَىٰ
كُلُوا۟
खाओ
مِن
of
طَيِّبَـٰتِ
पाकीज़ा चीज़ों में से
مَا
जो
رَزَقْنَـٰكُمْ
रिज़्क़ दिया हमने तुम्हें
وَلَا
और ना
تَطْغَوْا۟
तुम सरकशी करो
فِيهِ
इसमें
فَيَحِلَّ
वरना उतरेगा
عَلَيْكُمْ
तुम पर
غَضَبِى ۖ
ग़ज़ब मेरा
وَمَن
और वो जो
يَحْلِلْ
उतरे
عَلَيْهِ
जिस पर
غَضَبِى
ग़ज़ब मेरा
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
هَوَىٰ
वो हलाक हो गया
"खाओ, जो कुछ पाक अच्छी चीज़े हमने तुम्हें प्रदान की है, किन्तु इसमें हद से आगे न बढ़ो कि तुमपर मेरा प्रकोप टूट पड़े और जिस किसी पर मेरा प्रकोप टूटा, वह तो गिरकर ही रहा
तफ़्सीर:
हमने तुम्हें जो हलाल खाद्य पदार्थ प्रदान किए हैं, उनमें से स्वादिष्ट चीज़ें खाओ तथा हमने तुम्हारे लिए जो कुछ वैध किया है, उसे छोड़कर उस चीज़ की ओर न बढ़ो, जो हमने तुम्हारे ऊपर हराम किया है। अन्यथा तुमपर मेरा प्रकोप उतरेगा और जिसपर मेरा प्रकोप उतरा, तो निश्चय उसका सर्वनाश हो गया और दुनिया एवं आख़िरत में वह अभागा है।
आयत 82
وَإِنِّى لَغَفَّارٌۭ لِّمَن تَابَ وَءَامَنَ وَعَمِلَ صَـٰلِحًۭا ثُمَّ ٱهْتَدَىٰ
وَإِنِّى
और बेशक मैं
لَغَفَّارٌۭ
अलबत्ता बहुत बख़्शने वाला हूँ
لِّمَن
उसे जिसने
تَابَ
तौबा की
وَءَامَنَ
और वो ईमान लाया
وَعَمِلَ
और उसने अमल किए
صَـٰلِحًۭا
नेक
ثُمَّ
फिर
ٱهْتَدَىٰ
वो हिदायत पर रहा
और जो तौबा कर ले और ईमान लाए और अच्छा कर्म करे, फिर सीधे मार्ग पर चलता रहे, उसके लिए निश्चय ही मैं अत्यन्त क्षमाशील हूँ।" -
तफ़्सीर:
निःसंदेह मैं उसे बहुत क्षमा करने वाला और माफ़ करने वाला हूँ, जिसने मुझसे तौबा की, ईमान लाया और अच्छा कर्म किया, फिर सत्य मार्ग पर सुदृढ़ रहा।
आयत 83
۞ وَمَآ أَعْجَلَكَ عَن قَوْمِكَ يَـٰمُوسَىٰ
۞ وَمَآ
और क्या चीज़
أَعْجَلَكَ
जल्दी ले आई तुझे
عَن
from
قَوْمِكَ
तेरी क़ौम से
يَـٰمُوسَىٰ
ऐ मूसा
"और अपनी क़ौम को छोड़कर तुझे शीघ्र आने पर किस चीज़ ने उभारा, ऐ मूसा?"
तफ़्सीर:
और किस बात ने तुझे (ऐ मूसा!) अपनी जाति के लोगों से शीघ्र आने पर उकसाया, कि तू उन्हें अपने पीछे छोड़कर उनसे पहले आ गयाॽ
आयत 84
قَالَ هُمْ أُو۟لَآءِ عَلَىٰٓ أَثَرِى وَعَجِلْتُ إِلَيْكَ رَبِّ لِتَرْضَىٰ
قَالَ
कहा
هُمْ
वो
أُو۟لَآءِ
सब लोग
عَلَىٰٓ
upon
أَثَرِى
मेरे नक़्शे क़दम पर हैं
وَعَجِلْتُ
और जल्दी की मैंने
إِلَيْكَ
तरफ़ तेरे
رَبِّ
ऐ मेरे रब
لِتَرْضَىٰ
ताकि तू राज़ी हो जाए
उसने कहा, "वे मेरे पीछे ही और मैं जल्दी बढ़कर आया तेरी ओर, ऐ रब! ताकि तू राज़ी हो जाए।"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा : वे मेरे पीछे ही आ रहे हैं और जल्द ही मुझसे आ मिलेंगे। तथा मैं अपनी क़ौम से पहले तेरी ओर इसलिए आ गया, ताकि तू अपने पास मेरे जल्दी आने के कारण मुझसे प्रसन्न हो जाए।
आयत 85
قَالَ فَإِنَّا قَدْ فَتَنَّا قَوْمَكَ مِنۢ بَعْدِكَ وَأَضَلَّهُمُ ٱلسَّامِرِىُّ
قَالَ
फ़रमाया
فَإِنَّا
पस बेशक हमने
قَدْ
तहक़ीक़
فَتَنَّا
आज़माइश में डाला हमने
قَوْمَكَ
तेरी क़ौम को
مِنۢ
after you
بَعْدِكَ
तेरे बाद
وَأَضَلَّهُمُ
और भटका दिया उन्हें
ٱلسَّامِرِىُّ
सामरी ने
कहा, "अच्छा, तो हमने तेरे पीछे तेरी क़ौम के लोगों को आज़माइश में डाल दिया है। और सामरी ने उन्हें पथभ्रष्ट कर डाला।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने कहा : हमने तेरी क़ौम को, जिन्हें तूने अपने पीछे छोड़ दिया था, बछड़े की पूजा के द्वारा परीक्षा में डाला है। दरअसल, “सामिरी” ने उन्हें उसकी पूजा करने के लिए बुलाया और इसके द्वारा उन्हें पथभ्रष्ट कर दिया।
आयत 86
فَرَجَعَ مُوسَىٰٓ إِلَىٰ قَوْمِهِۦ غَضْبَـٰنَ أَسِفًۭا ۚ قَالَ يَـٰقَوْمِ أَلَمْ يَعِدْكُمْ رَبُّكُمْ وَعْدًا حَسَنًا ۚ أَفَطَالَ عَلَيْكُمُ ٱلْعَهْدُ أَمْ أَرَدتُّمْ أَن يَحِلَّ عَلَيْكُمْ غَضَبٌۭ مِّن رَّبِّكُمْ فَأَخْلَفْتُم مَّوْعِدِى
فَرَجَعَ
पस पलटा
مُوسَىٰٓ
मूसा
إِلَىٰ
to
قَوْمِهِۦ
तरफ़ अपनी कौम के
غَضْبَـٰنَ
सख़्त ग़ज़बनाक
أَسِفًۭا ۚ
ग़मगीन होकर
قَالَ
कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
أَلَمْ
क्या नहीं
يَعِدْكُمْ
वादा किया था तुमसे
رَبُّكُمْ
तुम्हारे रब ने
وَعْدًا
वादा
حَسَنًا ۚ
अच्छा
أَفَطَالَ
क्या फिर तवील हो गई
عَلَيْكُمُ
तुम पर
ٱلْعَهْدُ
वो मुद्दत
أَمْ
या
أَرَدتُّمْ
चाहा तुमने
أَن
कि
يَحِلَّ
उतरे
عَلَيْكُمْ
तुम पर
غَضَبٌۭ
ग़ज़ब
مِّن
of
رَّبِّكُمْ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
فَأَخْلَفْتُم
तो ख़िलाफ़ किया तुमने
مَّوْعِدِى
मेरे वादे के
तब मूसा अत्यन्त क्रोध और खेद में डूबा हुआ अपनी क़ौम के लोगों की ओर पलटा। कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों! क्या तुमसे तुम्हारे रब ने अच्छा वादा नहीं किया था? क्या तुमपर लम्बी मुद्दत गुज़र गई या तुमने यही चाहा कि तुमपर तुम्हारे रब का प्रकोप ही टूटे कि तुमने मेरे वादे के विरुद्ध आचरण किया?"
तफ़्सीर:
तब मूसा अलैहिस्सलाम अपनी क़ौम की ओर वापस आए, इस हाल में कि उनके बछड़ा पूजने के कारण क्रोध से भरे हुए और उनपर खेद में डूबे हुए थे। मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा : ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या अल्लाह ने तुमसे अच्छा वादा नहीं किया था कि वह तुमपर तौरात उतारेगा और तुम्हें जन्नत में दाखिल करेगा? क्या लंबा समय गुज़र जाने के कारण तुम उसे भूल गए होॽ अथवा तुम ऐसा करके यह चाहते थे कि तुमपर तुम्हारे रब की ओर से क्रोध उतरे और तुमपर उसकी यातना आ पड़े, इसलिए मेरे वापस आने तक आज्ञाकारिता पर दृढ़ रहने का मेरा वादा तोड़ दिया?!
आयत 87
قَالُوا۟ مَآ أَخْلَفْنَا مَوْعِدَكَ بِمَلْكِنَا وَلَـٰكِنَّا حُمِّلْنَآ أَوْزَارًۭا مِّن زِينَةِ ٱلْقَوْمِ فَقَذَفْنَـٰهَا فَكَذَٰلِكَ أَلْقَى ٱلسَّامِرِىُّ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
مَآ
नहीं
أَخْلَفْنَا
ख़िलाफ़ किया हमने
مَوْعِدَكَ
तेरे वादे के
بِمَلْكِنَا
अपने इख़्तियार से
وَلَـٰكِنَّا
बल्कि हम
حُمِّلْنَآ
उठवाए गए हम
أَوْزَارًۭا
बोझ
مِّن
from
زِينَةِ
ज़ेवर में से
ٱلْقَوْمِ
लोगों के
فَقَذَفْنَـٰهَا
तो फेंक दिया हमने उन्हें
فَكَذَٰلِكَ
फिर इसी तरह
أَلْقَى
डाल दिया
ٱلسَّامِرِىُّ
सामरी ने
उन्होंने कहा, "हमने आपसे किए हुए वादे के विरुद्ध अपने अधिकार से कुछ नहीं किया, बल्कि लोगों के ज़ेवरों के बोझ हम उठाए हुए थे, फिर हमने उनको (आग में) फेंक दिया, सामरी ने इसी तरह प्रेरित किया था।"
तफ़्सीर:
मूसा की जाति के लोगों ने कहा : हमने (ऐ मूसा!) आपके वचन को अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि मजबूरी में भंग किया है। दरअसल हमपर फ़िरऔन की जाति के गहनों के भारी बोझ लाद दिए गए थे, जिनसे छुटकारा पाने के लिए हमने उन्हें एक गड्ढे में फेंक दिया। जिस प्रकार हमने उन्हें गड्ढे में फेंक दिया, उसी प्रकार सामिरी ने भी अपने पास मौजूद जिबरील अलैहिस्सलाम के घोड़े के खुर की मिट्टी को फेंक दिया।
आयत 88
فَأَخْرَجَ لَهُمْ عِجْلًۭا جَسَدًۭا لَّهُۥ خُوَارٌۭ فَقَالُوا۟ هَـٰذَآ إِلَـٰهُكُمْ وَإِلَـٰهُ مُوسَىٰ فَنَسِىَ
فَأَخْرَجَ
फिर उसने निकाला
لَهُمْ
उनके लिए
عِجْلًۭا
एक बछड़ा
جَسَدًۭا
मुजस्सम
لَّهُۥ
जिसकी थी
خُوَارٌۭ
गाय की आवाज़
فَقَالُوا۟
तो उन्होंने कहा
هَـٰذَآ
यही
إِلَـٰهُكُمْ
इलाह है तुम्हारा
وَإِلَـٰهُ
और इलाह
مُوسَىٰ
मूसा का
فَنَسِىَ
पस वो भूल गया
और उसने उनके लिए एक बछड़ा ढालकर निकाला, एक धड़ जिसकी आवाज़ बैल की थी। फिर उन्होंने कहा, "यही तुम्हारा इष्ट-पूज्य है और मूसा का भी इष्ट -पूज्य है, किन्तु वह भूल गया है।"
तफ़्सीर:
फिर सामिरी ने उन गहनों से बनी इसराईल के लिए बछड़े का एक ढाँचा निकाला, जिसमें जान नहीं थी, परंतु उससे गाय की आवाज़ की तरह आवाज़ निकल रही थी। तो सामिरी के इस कृत्य से मोहित लोगों ने कहा : यही तुम्हारा और मूसा का पूज्य है। मूसा इसे भूलकर यहीं छोड़ गए हैं।
आयत 89
أَفَلَا يَرَوْنَ أَلَّا يَرْجِعُ إِلَيْهِمْ قَوْلًۭا وَلَا يَمْلِكُ لَهُمْ ضَرًّۭا وَلَا نَفْعًۭا
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
يَرَوْنَ
वो देखते
أَلَّا
कि बेशक नहीं
يَرْجِعُ
वो लौटाता
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
قَوْلًۭا
बात को
وَلَا
और नहीं
يَمْلِكُ
वो इख़्तियार रखता
لَهُمْ
उनके लिए
ضَرًّۭا
किसी नुक़सान का
وَلَا
और ना
نَفْعًۭا
किसी नफ़ा का
क्या वे देखते न थे कि न वह किसी बात का उत्तर देता है और न उसे उनकी हानि का कुछ अधिकार प्राप्त है और न लाभ का?
तफ़्सीर:
क्या ये लोग जो बछड़े के फ़ितने में पड़कर उसकी पूजा करने लगे हैं, यह नहीं देखते कि बछड़ा न तो उनसे बात करता है और न ही उन्हें उत्तर देता है, और न उनकी या दूसरों की हानि को दूर कर सकता है, और न उन्हें और न दूसरों को लाभ पहुँचा सकता है?!
आयत 90
وَلَقَدْ قَالَ لَهُمْ هَـٰرُونُ مِن قَبْلُ يَـٰقَوْمِ إِنَّمَا فُتِنتُم بِهِۦ ۖ وَإِنَّ رَبَّكُمُ ٱلرَّحْمَـٰنُ فَٱتَّبِعُونِى وَأَطِيعُوٓا۟ أَمْرِى
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
قَالَ
कहा
لَهُمْ
उन्हें
هَـٰرُونُ
हारून ने
مِن
before
قَبْلُ
इससे पहले
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
إِنَّمَا
बेशक
فُتِنتُم
आज़माइश में डाले गए तुम
بِهِۦ ۖ
इसके ज़रिए
وَإِنَّ
और बेशक
رَبَّكُمُ
रब तुम्हारा
ٱلرَّحْمَـٰنُ
रहमान है
فَٱتَّبِعُونِى
पस पैरवी करो मेरी
وَأَطِيعُوٓا۟
और इताअत करो
أَمْرِى
मेरे हुक्म की
और हारून इससे पहले उनसे कह भी चुका था कि "मेरी क़ौम के लोगों! तुम इसके कारण बस फ़ितने में पड़ गए हो। तुम्हारा रब तो रहमान है। अतः तुम मेरा अनुसरण करो और मेरी बात मानो।"
तफ़्सीर:
तथा हारून अलैहिस्सलाम ने भी उनसे मूसा अलैहिस्सलाम के वापस आने से पहले कहा था : सोने से इस बछड़े का निर्माण और उसका राँभना तुम्हारे लिए एक परीक्षा के सिवा कुछ नहीं है ताकि ईमान वाला, काफिर से प्रकट हो जाए, और (ऐ मेरी क़ौम के लोगो!) निश्चय तुम्हारा पालनहार वह है, जो दया का मालिक है, न कि वह जो तुम्हें हानि या लाभ पहुँचाने का भी मालिक नहीं है, तुम पर दया करना तो बहुत दूर की बात है। अतः अकेले उसी की इबादत करने में मेरा अनुसरण करो तथा उसके अलावा दूसरों की उपासना को त्यागकर मेरी आज्ञा का पालन करो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
बछड़े की पूजा के वाकिये का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि नबी की गैरमौजूदगी में भी हक पर कायम रहना असली ईमान की परख है।
आयत 91
قَالُوا۟ لَن نَّبْرَحَ عَلَيْهِ عَـٰكِفِينَ حَتَّىٰ يَرْجِعَ إِلَيْنَا مُوسَىٰ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لَن
Never
نَّبْرَحَ
हम तो हमेशा रहेंगे
عَلَيْهِ
इस पर
عَـٰكِفِينَ
जम कर बैठने वाले
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَرْجِعَ
लौट आए
إِلَيْنَا
तरफ हमारे
مُوسَىٰ
मूसा
उन्होंने कहा, "जब तक मूसा लौटकर हमारे पास न आ जाए, हम तो इससे ही लगे बैठे रहेंगे।"
तफ़्सीर:
बछड़े की इबादत के फ़ितने में पड़े लोगों ने उत्तर दिया था : हम उसकी पूजा पर डटे रहेंगे, यहाँ तक कि मूसा हमारे पास वापस आ जाएँ।
आयत 92
قَالَ يَـٰهَـٰرُونُ مَا مَنَعَكَ إِذْ رَأَيْتَهُمْ ضَلُّوٓا۟
قَالَ
कहा
يَـٰهَـٰرُونُ
ऐ हारून
مَا
किस चीज़ ने
مَنَعَكَ
मना किया तुझे
إِذْ
जब
رَأَيْتَهُمْ
देखा तूने उन्हें
ضَلُّوٓا۟
कि वो भटक गए हैं
उसने कहा, "ऐ हारून! जब तुमने देखा कि ये पथभ्रष्ट हो गए है, तो किस चीज़ ने तुम्हें रोका
तफ़्सीर:
मूसा ने (वापस आने के बाद) अपने भाई हारून से कहा : जब तूने देखा कि वे अल्लाह को छोड़कर बछड़े की पूजा करके पथभ्रष्ट हो गए हैं, तो तुझे किस बात ने रोका
आयत 93
أَلَّا تَتَّبِعَنِ ۖ أَفَعَصَيْتَ أَمْرِى
أَلَّا
कि ना
تَتَّبِعَنِ ۖ
तू पैरवी करे मेरी
أَفَعَصَيْتَ
क्या फिर नाफ़रमानी की तू ने
أَمْرِى
मेरे हुक्म की
कि तुमने मेरा अनुसरण न किया? क्या तुमने मेरे आदेश की अवहेलना की?"
तफ़्सीर:
कि तू उन्हें छोड़कर मुझसे आ मिलता?! क्या तूने मेरे उस आदेश की अवहेलना की है, जो मैंने तुझे उनपर अपना उत्तराधिकारी बनाते समय दिया था?!
आयत 94
قَالَ يَبْنَؤُمَّ لَا تَأْخُذْ بِلِحْيَتِى وَلَا بِرَأْسِىٓ ۖ إِنِّى خَشِيتُ أَن تَقُولَ فَرَّقْتَ بَيْنَ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ وَلَمْ تَرْقُبْ قَوْلِى
قَالَ
कहा
يَبْنَؤُمَّ
ऐ मेरी माँ के बेटे
لَا
(Do) not
تَأْخُذْ
ना तुम पकड़ो
بِلِحْيَتِى
मेरी दाढ़ी को
وَلَا
और ना
بِرَأْسِىٓ ۖ
मेरे सर को
إِنِّى
बेशक मैं
خَشِيتُ
डरा मैं
أَن
कि
تَقُولَ
तुम कहोगे
فَرَّقْتَ
तफ़रक़ा डाल दिया तूने
بَيْنَ
दर्मियान
بَنِىٓ
(the) Children of Israel
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल के
وَلَمْ
और ना
تَرْقُبْ
तुम ने इन्तिज़ार किया
قَوْلِى
मेरी बात का
उसने कहा, "ऐ मेरी माँ के बेटे! मेरी दाढ़ी न पकड़ और न मेरा सिर! मैं डरा कि तू कहेंगा कि तूने इसराईल की सन्तान में फूट डाल दी और मेरी बात पर ध्यान न दिया।"
तफ़्सीर:
जब मूसा अलैहिस्सलाम अपने भाई के काम की निंदा करते हुए उनकी दाढ़ी एवं सिर को पकड़कर अपनी तरफ़ खींचने लगे, तो हारून ने दया की याचना करते हुए उनसे कहा : आप मेरी दाढ़ी और मेरे सिर के बाल मत पकड़ें। क्योंकि मेरे पास उनके साथ रहने का कारण है। दरअसल मुझे यह भय हुआ कि यदि मैंने उन्हें अकेले छोड़ दिया, तो वे विभेद कर लेंगे। फिर आप कहेंगे कि मैंने उनके बीच फूट डाल दी और मैंने उनके बारे में आपकी वसीयत की परवाह नहीं की।
आयत 95
قَالَ فَمَا خَطْبُكَ يَـٰسَـٰمِرِىُّ
قَالَ
कहा
فَمَا
तो क्या है
خَطْبُكَ
मामला तेरा
يَـٰسَـٰمِرِىُّ
ऐ सामरी
(मूसा ने) कहा, "ऐ सामरी! तेरा क्या मामला है?"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने सामिरी से कहा : ऐ सामिरी! तेरा क्या मामला है? जो कुछ तूने किया है, उसपर तुझे किस बात ने उभारा?
आयत 96
قَالَ بَصُرْتُ بِمَا لَمْ يَبْصُرُوا۟ بِهِۦ فَقَبَضْتُ قَبْضَةًۭ مِّنْ أَثَرِ ٱلرَّسُولِ فَنَبَذْتُهَا وَكَذَٰلِكَ سَوَّلَتْ لِى نَفْسِى
قَالَ
उसने कहा
بَصُرْتُ
देखा मैंने
بِمَا
उसे जो
لَمْ
नहीं
يَبْصُرُوا۟
उन्होंने देखा
بِهِۦ
जिसे
فَقَبَضْتُ
पस मुट्ठी भर ली मैंने
قَبْضَةًۭ
एक मुट्ठी
مِّنْ
from
أَثَرِ
नक़्शे क़दम से
ٱلرَّسُولِ
रसूल के
فَنَبَذْتُهَا
तो डाल दिया मैंने उसे
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
سَوَّلَتْ
अच्छा करके दिखाया
لِى
मेरे लिए
نَفْسِى
मेरे नफ़्स ने
उसने कहा, "मुझे उसकी सूझ प्राप्त हुई, जिसकी सूझ उन्हें प्राप्त॥ न हुई। फिर मैंने रसूल के पद-चिन्ह से एक मुट्ठी उठा ली। फिर उसे डाल दिया और मेरे जी ने मुझे कुछ ऐसा ही सुझाया।"
तफ़्सीर:
सामिरी ने मूसा अलैहिस्सलाम से कहा : मैंने वह चीज़ देखी, जो उन लोगों ने नहीं देखी। मैंने जिबरील को घोड़े पर सवार देखा, तो उनके घोड़े के पद-चिह्न से एक मुट्ठी मिट्टी ले ली और उसे बछड़े के ढाँचे पर डाल दिया, जो उन आभूषणों को पिघलाकर बनाया गया था। चुनाँचे उससे एक बछड़े का शरीर तैयार हो गया, जो राँभता था। इस प्रकार, मेरे मन ने मेरे लिए उस कार्य को सुंदर बना दिया, जो मैंने किया।
आयत 97
قَالَ فَٱذْهَبْ فَإِنَّ لَكَ فِى ٱلْحَيَوٰةِ أَن تَقُولَ لَا مِسَاسَ ۖ وَإِنَّ لَكَ مَوْعِدًۭا لَّن تُخْلَفَهُۥ ۖ وَٱنظُرْ إِلَىٰٓ إِلَـٰهِكَ ٱلَّذِى ظَلْتَ عَلَيْهِ عَاكِفًۭا ۖ لَّنُحَرِّقَنَّهُۥ ثُمَّ لَنَنسِفَنَّهُۥ فِى ٱلْيَمِّ نَسْفًا
قَالَ
कहा
فَٱذْهَبْ
पस जाओ
فَإِنَّ
तो बेशक
لَكَ
तेरे लिए है
فِى
in
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी में
أَن
ये कि
تَقُولَ
तू कहता रहे
لَا
(Do) not
مِسَاسَ ۖ
ना छूना
وَإِنَّ
और बेशक
لَكَ
तेरे लिए
مَوْعِدًۭا
वादा का एक वक़्त मुक़र्रर है
لَّن
हरगिज़ ना
تُخْلَفَهُۥ ۖ
तू पीछे छोड़ा जाएगा इससे
وَٱنظُرْ
और देख
إِلَىٰٓ
at
إِلَـٰهِكَ
तरफ़ अपने इलाह के
ٱلَّذِى
वो जो
ظَلْتَ
रहा तू
عَلَيْهِ
उस पर
عَاكِفًۭا ۖ
जम कर बैठने वाला
لَّنُحَرِّقَنَّهُۥ
अलबत्ता हम ज़रूर जला डालेंगे उसे
ثُمَّ
फिर
لَنَنسِفَنَّهُۥ
अलबत्ता हम ज़रूर बिखेर देंगे उसे
فِى
in
ٱلْيَمِّ
दरिया में
نَسْفًا
बिखेर देना
कहा, "अच्छा, तू जा! अब इस जीवन में तेरे लिए यही है कि कहता रहे, कोई छुए नहीं! और निश्चित वादा है, जो तेरे लिए एक निश्चित वादा है, जो तुझपर से कदापि न टलेगा। और देख अपने इष्ट-पूज्य को जिसपर तू रीझा-जमा बैठा था! हम उसे जला डालेंगे, फिर उसे चूर्ण-विचूर्ण करके दरिया में बिखेर देंगे।"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने सामिरी से कहा: अच्छा, तू यहाँ से निकल जा! तेरी सज़ा यह है कि तू जब तक जीवित रहे, कहता रहे : मैं किसी को नहीं छूता और न मुझे कोई छुए। इस प्रकार तू अछूत बनकर जिएगा। तथा क़ियामत के दिन तेरे लिए एक और वादा है, जिसमें तेरा हिसाब होगा और तुझे दंडित किया जाएगा। अल्लाह इस वादे को तुझसे कदापि न टालेगा। तू अपने उस बछड़े को देख, जिसे तूने अपना पूज्य बना रखा था और अल्लाह को छोड़कर तू उसकी पूजा कर रहा था। हम अवश्य ही उसपर आग दहकाएँगे, यहाँ तक कि वह पिघल जाए, फिर उसे समुद्र में उड़ा देंगे, ताकि उसका कोई निशान न रह जाए।
आयत 98
إِنَّمَآ إِلَـٰهُكُمُ ٱللَّهُ ٱلَّذِى لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۚ وَسِعَ كُلَّ شَىْءٍ عِلْمًۭا
إِنَّمَآ
बेशक
إِلَـٰهُكُمُ
इलाह तुम्हारा
ٱللَّهُ
अल्लाह है
ٱلَّذِى
वो जो
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ ۚ
वो ही
وَسِعَ
उसने घेर रखा है
كُلَّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ को
عِلْمًۭا
इल्म से
"तुम्हारा पूज्य-प्रभु तो बस वही अल्लाह है, जिसके अतिरिक्त कोई पूज्य-प्रभु नहीं। वह अपने ज्ञान से हर चीज़ पर हावी है।"
तफ़्सीर:
निःसंदेह (ऐ लोगो!) तुम्हारा वास्तविक पूज्य वही अल्लाह है, जिसके सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं। उसने प्रत्येक वस्तु को अपने ज्ञान से घेर रखा है। अतः उस पवित्र अल्लाह के ज्ञान से कोई वस्तु छूट नहीं सकती।
आयत 99
كَذَٰلِكَ نَقُصُّ عَلَيْكَ مِنْ أَنۢبَآءِ مَا قَدْ سَبَقَ ۚ وَقَدْ ءَاتَيْنَـٰكَ مِن لَّدُنَّا ذِكْرًۭا
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نَقُصُّ
हम बयान करते हैं
عَلَيْكَ
आप पर
مِنْ
from
أَنۢبَآءِ
कुछ ख़बरें
مَا
वो जो
قَدْ
तहक़ीक़
سَبَقَ ۚ
गुज़र चुकीं
وَقَدْ
और तहक़ीक़
ءَاتَيْنَـٰكَ
दिया हमने आपको
مِن
from
لَّدُنَّا
अपने पास से
ذِكْرًۭا
ज़िक्र
इस प्रकार विगत वृत्तांत हम तुम्हें सुनाते है और हमने तुम्हें अपने पास से एक अनुस्मृति प्रदान की है
तफ़्सीर:
जिस प्रकार हमने (ऐ रसूल!) आपके समक्ष मूसा और फ़िरऔन तथा उनकी क़ौमों के हालात रखे, उसी प्रकार हम आपको आपसे पहले गुज़र चुके पैगंबरों और समुदायों के वृत्तांत सुनाते हैं, ताकि आपको इससे सांत्वना मिले और निःसंदेह हमने आपको अपने पास से क़ुरआन प्रदान किया है, जिससे नसीह़त हासिल करने वाला नसीह़त ग्रहण करता है।
आयत 100
مَّنْ أَعْرَضَ عَنْهُ فَإِنَّهُۥ يَحْمِلُ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ وِزْرًا
مَّنْ
जिसने
أَعْرَضَ
मुँह मोड़ा
عَنْهُ
उससे
فَإِنَّهُۥ
तो बेशक वो
يَحْمِلُ
वो उठाएगा
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
وِزْرًا
एक भारी बोझ
जिस किसी ने उससे मुँह मोड़ा, वह निश्चय ही क़ियामत के दिन एक बोझ उठाएगा
तफ़्सीर:
जिसने आपपर उतरने वाले इस क़ुरआन से मुँह फेरा और उसपर ईमान नहीं लाया तथा उसकी शिक्षाओं पर अमल नहीं किया; वह क़ियामत के दिन बड़े पाप का बोझ उठाए हुए और दर्दनाक यातना का पात्र बनकर आएगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
हारून अलैहिस्सलाम की सफाई और सामरी की गुमराही का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि भीड़ के दबाव में गलत काम में शामिल होने से बचना चाहिए, चाहे कितना भी दबाव क्यों न हो।
आयत 101
خَـٰلِدِينَ فِيهِ ۖ وَسَآءَ لَهُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ حِمْلًۭا
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهِ ۖ
उसमें
وَسَآءَ
और बहुत बुरा है
لَهُمْ
उनके लिए
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
حِمْلًۭا
बोझ उठाना
ऐसे दिन सदैव इसी वबाल में पड़े रहेंगे और क़ियामत के दिन उनके हक़ में यह बहुत ही बुरा बोझ सिद्ध होगा
तफ़्सीर:
वे उस यातना में हमेशा के लिए रहने वाले होंगे और वह बहुत बुरा बोझ होगा, जो वे क़ियामत के दिन उठाए हुए होंगे।
आयत 102
يَوْمَ يُنفَخُ فِى ٱلصُّورِ ۚ وَنَحْشُرُ ٱلْمُجْرِمِينَ يَوْمَئِذٍۢ زُرْقًۭا
يَوْمَ
जिस दिन
يُنفَخُ
फूँका जाएगा
فِى
in
ٱلصُّورِ ۚ
सूर में
وَنَحْشُرُ
और हम इकट्ठा करेंगे
ٱلْمُجْرِمِينَ
मुजरिमों को
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
زُرْقًۭا
नीली आँखों वाले
जिस दिन सूर फूँका जाएगा और हम अपराधियों को उस दिन इस दशा में इकट्ठा करेंगे कि उनकी आँखे नीली पड़ गई होंगी
तफ़्सीर:
जिस दिन मरने के बाद पुनर्जीवन के लिए फ़रिश्ता सूर (नरसिंघा) में दूसरी बार फूँक मारेगा और उस दिन हम काफिरों को इस दशा में इकट्ठा करेंगे कि आख़िरत की गंभीर भयावहता का सामना करने के कारण उनके शरीर तथा आँखों का रंग नीला पड़ चुका होगा।
आयत 103
يَتَخَـٰفَتُونَ بَيْنَهُمْ إِن لَّبِثْتُمْ إِلَّا عَشْرًۭا
يَتَخَـٰفَتُونَ
वो सरगोशियाँ करेंगे
بَيْنَهُمْ
आपस में
إِن
नहीं
لَّبِثْتُمْ
ठहरे तुम
إِلَّا
मगर
عَشْرًۭا
दस (दिन)
वे आपस में चुपके-चुपके कहेंगे कि "तुम बस दस ही दिन ठहरे हो।"
तफ़्सीर:
वे आपस में फुसफुसाते हुए कहेंगे : तुम मृत्यु के बाद बरज़ख़ में दस रातों से अधिक नहीं रहे।
आयत 104
نَّحْنُ أَعْلَمُ بِمَا يَقُولُونَ إِذْ يَقُولُ أَمْثَلُهُمْ طَرِيقَةً إِن لَّبِثْتُمْ إِلَّا يَوْمًۭا
نَّحْنُ
हम
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानते हैं
بِمَا
उसे जो
يَقُولُونَ
वो कहेंगे
إِذْ
जब
يَقُولُ
कहेगा
أَمْثَلُهُمْ
सबसे मिसाली उनका
طَرِيقَةً
तरीक़ा/रविश में
إِن
नहीं
لَّبِثْتُمْ
ठहरे हम
إِلَّا
मगर
يَوْمًۭا
एक दिन
हम भली-भाँति जानते है जो कुछ वे कहेंगे, जबकि उनका सबसे अच्छी सम्मतिवाला कहेगा, "तुम तो बस एक ही दिन ठहरे हो।"
तफ़्सीर:
हम सबसे अधिक जानने वाले हैं कि वे आपस में चुपके-चुपके क्या बात कर रहे होंगे, उनकी कोई चीज़ हमसे छिपी नहीं है। जब उनमें सबसे समझदार व्यक्ति कहेगा : तुम बरज़ख़ में केवल एक दिन रहे हो, उससे अधिक नहीं।
आयत 105
وَيَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلْجِبَالِ فَقُلْ يَنسِفُهَا رَبِّى نَسْفًۭا
وَيَسْـَٔلُونَكَ
और वो सवाल करते हैं आपसे
عَنِ
about
ٱلْجِبَالِ
पहाड़ों के बारे में
فَقُلْ
तो कह दीजिए
يَنسِفُهَا
बिखेर देगा उन्हें
رَبِّى
मेरा रब
نَسْفًۭا
बिखेर देना
वे तुमसे पर्वतों के विषय में पूछते है। कह दो, "मेरा रब उन्हें छूल की तरह उड़ा देगा,
तफ़्सीर:
और वे (ऐ रसूल!) आपसे क़ियामत के दिन पहाड़ों की स्थिति के बारे में पूछते हैं। आप उनसे कह दीजिए : मेरा रब पहाड़ों को उनकी जड़ों से उखाड़कर उड़ा देगा और वे धूल बनकर रह जाएँगे।
आयत 106
فَيَذَرُهَا قَاعًۭا صَفْصَفًۭا
فَيَذَرُهَا
पस वो छोड़ देगा उस (ज़मीन) को
قَاعًۭا
मैदान
صَفْصَفًۭا
चटियल बनाकर
और धरती को एक समतल चटियल मैदान बनाकर छोड़ेगा
तफ़्सीर:
फिर वह उस धरती को, जो उन्हें उठाए हुए थी, समतल मैदान बनाकर छोड़ेगा, जिसपर न कोई निर्माण होगा और न कोई पौधा।
आयत 107
لَّا تَرَىٰ فِيهَا عِوَجًۭا وَلَآ أَمْتًۭا
لَّا
Not
تَرَىٰ
ना तुम देखोगे
فِيهَا
उसमें
عِوَجًۭا
कोई टेढ़ापन
وَلَآ
और ना
أَمْتًۭا
कोई टीला
तुम उसमें न कोई सिलवट देखोगे और न ऊँच-नीच।"
तफ़्सीर:
(ऐ उस धरती की ओर देखने वाले!) वह धरती इतनी समतल और सपाट होगी कि तू उसमें कोई झुकाव और ऊँच-नीच नहीं देखेगा।
आयत 108
يَوْمَئِذٍۢ يَتَّبِعُونَ ٱلدَّاعِىَ لَا عِوَجَ لَهُۥ ۖ وَخَشَعَتِ ٱلْأَصْوَاتُ لِلرَّحْمَـٰنِ فَلَا تَسْمَعُ إِلَّا هَمْسًۭا
يَوْمَئِذٍۢ
जिस दिन
يَتَّبِعُونَ
वो पैरवी करेंगे
ٱلدَّاعِىَ
पुकारने वाले की
لَا
no
عِوَجَ
नहीं कोई कजी
لَهُۥ ۖ
जिसके लिए
وَخَشَعَتِ
और दब जाऐंगी
ٱلْأَصْوَاتُ
आवाज़ें
لِلرَّحْمَـٰنِ
रहमान के लिए
فَلَا
तो ना
تَسْمَعُ
तुम सुनोगे
إِلَّا
सिवाय
هَمْسًۭا
आहट के
उस दिन वे पुकारनेवाले के पीछे चल पड़ेंगे और उसके सामने कोई अकड़ न दिखाई जा सकेगी। आवाज़े रहमान के सामने दब जाएँगी। एक हल्की मन्द आवाज़ के अतिरिक्त तुम कुछ न सुनोगे
तफ़्सीर:
उस दिन लोग महशर (क़ियामत के मैदान) की ओर बुलाने वाले की आवाज़ का अनुसरण करेंगे। उन्हें उसके पीछे चलने से कोई फेरने वाला नहीं होगा और सभी आवाज़ें रहमान के डर से खामोश हो जाएँगी। अतः उस दिन तुम्हें एक धीमी आवाज़ के अतिरिक्त कुछ सुनाई नहीं देगा।
आयत 109
يَوْمَئِذٍۢ لَّا تَنفَعُ ٱلشَّفَـٰعَةُ إِلَّا مَنْ أَذِنَ لَهُ ٱلرَّحْمَـٰنُ وَرَضِىَ لَهُۥ قَوْلًۭا
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
لَّا
not
تَنفَعُ
ना फ़ायदा देगी
ٱلشَّفَـٰعَةُ
शफ़ाअत
إِلَّا
मगर
مَنْ
उसकी
أَذِنَ
इजाज़त दे
لَهُ
जिसे
ٱلرَّحْمَـٰنُ
रहमान
وَرَضِىَ
और वो पसंद करे
لَهُۥ
उसके लिए
قَوْلًۭا
बात को
उस दिन सिफ़ारिश काम न आएगी। यह और बात है कि किसी के लिए रहमान अनुज्ञा दे और उसके लिए बात करने को पसन्द करे
तफ़्सीर:
उस महान दिन किसी सिफ़ारिश करने वाले की सिफ़ारिश लाभ नहीं देगी, सिवाय उस सिफ़ारिश करने वाले के, जिसे अल्लाह सिफारिश करने की आज्ञा प्रदान करे तथा सिफ़ारिश से संबंधित उसकी बात को पसंद करे।
आयत 110
يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلَا يُحِيطُونَ بِهِۦ عِلْمًۭا
يَعْلَمُ
वो जानता है
مَا
जो
بَيْنَ
(is) before them
أَيْدِيهِمْ
उनके आगे है
وَمَا
और जो
خَلْفَهُمْ
उनके पीछे है
وَلَا
और नहीं
يُحِيطُونَ
वो अहाता कर सकते
بِهِۦ
उसके
عِلْمًۭا
इल्म का
वह जानता है जो कुछ उनके आगे है और जो कुछ उनके पीछे है, किन्तु वे अपने ज्ञान से उसपर हावी नहीं हो सकते
तफ़्सीर:
पवित्र अल्लाह जानता है कि लोग क़ियामत से संबंधित किन बातों का सामना करेंगे तथा वह यह भी जानता है कि वे दुनिया में क्या कुछ छोड़ आए हैं। जबकि सभी बंदे अल्लाह के अस्तित्व और उसके गुणों को अपने ज्ञान की घेरे में नहीं ला सकते।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन की सूरतेहाल का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि उस दिन कोई सिफारिश काम नहीं आएगी सिवाय उसके जिसे अल्लाह इजाज़त दे, इसलिए अपने अमल पर तवज्जो देनी चाहिए।
आयत 111
۞ وَعَنَتِ ٱلْوُجُوهُ لِلْحَىِّ ٱلْقَيُّومِ ۖ وَقَدْ خَابَ مَنْ حَمَلَ ظُلْمًۭا
۞ وَعَنَتِ
और झुक जाऐंगे
ٱلْوُجُوهُ
चेहरे
لِلْحَىِّ
वास्ते ज़िन्दा रहने वाले
ٱلْقَيُّومِ ۖ
क़ायम रहने वाले के
وَقَدْ
और तहक़ीक़
خَابَ
वो नामुराद हुआ
مَنْ
जिसने
حَمَلَ
उठाया
ظُلْمًۭا
ज़ुल्म को
चेहरे उस जीवन्त, शाश्वत सत्ता के आगे झुकें होंगे। असफल हुआ वह जिसने ज़ुल्म का बोझ उठाया
तफ़्सीर:
तथा बंदों के चेहरे उस जीवित हस्ती के सामने झुक जाएँगे और उसके लिए विनम्र हो जाएँगे, जिसे मौत नहीं आएगी और जो अपने बंदों के सारे कामों का प्रबंधन और संचालन करने वाला है। तथा वह व्यक्ति विफल हो गया, जिसने स्वयं को विनाश के रास्तों पर डालकर गुनाह का बोझ उठा लिया।
आयत 112
وَمَن يَعْمَلْ مِنَ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَهُوَ مُؤْمِنٌۭ فَلَا يَخَافُ ظُلْمًۭا وَلَا هَضْمًۭا
وَمَن
औ जो कोई
يَعْمَلْ
अमल करेगा
مِنَ
of
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेकियों में से
وَهُوَ
जबकि वो
مُؤْمِنٌۭ
मोमिन हो
فَلَا
तो ना
يَخَافُ
वो डरेगा
ظُلْمًۭا
ज़ुल्म से
وَلَا
और ना
هَضْمًۭا
किसी कमी/नुक़सान से
किन्तु जो कोई अच्छे कर्म करे और हो वह मोमिन, तो उसे न तो किसी ज़ुल्म का भय होगा और न हक़ मारे जाने का
तफ़्सीर:
तथा जो व्यक्ति नेक काम करे और वह अल्लाह तथा उसके रसूलों पर ईमान रखने वाला हो, उसे उसका पूरा बदला मिलेगा। उसे न अत्याचार का भय होगा कि उसे किसी ऐसे पाप का दंड दिया जाए, जो उसने किया न हो और न उसे अपने किए हुए नेक कर्म के सवाब में कमी का डर होगा।
आयत 113
وَكَذَٰلِكَ أَنزَلْنَـٰهُ قُرْءَانًا عَرَبِيًّۭا وَصَرَّفْنَا فِيهِ مِنَ ٱلْوَعِيدِ لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ أَوْ يُحْدِثُ لَهُمْ ذِكْرًۭا
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
أَنزَلْنَـٰهُ
नाज़िल किया हमने उसे
قُرْءَانًا
क़ुरआन
عَرَبِيًّۭا
अरबी
وَصَرَّفْنَا
और फेर-फेर कर लाए हम
فِيهِ
उसमें
مِنَ
of
ٱلْوَعِيدِ
वईदों/तम्बीहात में से
لَعَلَّهُمْ
शायद की वो
يَتَّقُونَ
वो डर जाऐं
أَوْ
या
يُحْدِثُ
वो पैदा कर दे
لَهُمْ
उनके लिए
ذِكْرًۭا
कोई नसीहत
और इस प्रकार हमने इसे अरबी क़ुरआन के रूप में अवतरित किया है और हमने इसमें तरह-तरह से चेतावनी दी है, ताकि वे डर रखें या यह उन्हें होश दिलाए
तफ़्सीर:
और जिस प्रकार हमने पिछले लोगों की कहानियाँ उतारीं हैं, उसी तरह हमने इस क़ुरआन को स्पष्ट अरबी भाषा में उतारा है और उसमें विभिन्न प्रकार की चेतावनियों जैसे धमकियों और डराने वाली बातों का वर्णन किया है; इस आशा में कि वे अल्लाह से डरें या क़ुरआन उनके लिए उपदेश और नसीहत पैदा कर दे।
आयत 114
فَتَعَـٰلَى ٱللَّهُ ٱلْمَلِكُ ٱلْحَقُّ ۗ وَلَا تَعْجَلْ بِٱلْقُرْءَانِ مِن قَبْلِ أَن يُقْضَىٰٓ إِلَيْكَ وَحْيُهُۥ ۖ وَقُل رَّبِّ زِدْنِى عِلْمًۭا
فَتَعَـٰلَى
पस बहुत बुलन्द है
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْمَلِكُ
बादशाह
ٱلْحَقُّ ۗ
हक़ीक़ी
وَلَا
और ना
تَعْجَلْ
आप जल्दी करें
بِٱلْقُرْءَانِ
साथ क़ुरआन के
مِن
before
قَبْلِ
इससे पहले
أَن
कि
يُقْضَىٰٓ
पूरी की जाए
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
وَحْيُهُۥ ۖ
वही उसकी
وَقُل
और कह दीजिए
رَّبِّ
ऐ मेरे रब
زِدْنِى
ज़्यादा कर दे मुझे
عِلْمًۭا
इल्म में
अतः सर्वोच्च है अल्लाह, सच्चा सम्राट! क़ुरआन के (फ़ैसले के) सिलसिले में जल्दी न करो, जब तक कि वह पूरा न हो जाए। तेरी ओर उसकी प्रकाशना हो रही है। और कहो, "मेरे रब, मुझे ज्ञान में अभिवृद्धि प्रदान कर।"
तफ़्सीर:
अतः सर्वोच्च, बहुत पवित्र और गौरवशाली है अल्लाह, जो ऐसा बादशाह है, जिसके पास हर चीज़ का स्वामित्व है, जो सत्य है और उसकी बात सत्य है। वह उस चीज़ से सर्वोच्च है, जो अनेकेश्वरवादी उसके साथ जोड़ते हैं। तथा (ऐ रसूल!) जब तक जिबरील आपको क़ुरआन का कोई अंश पहुँचाने का काम पूरा न कर लें, आप उनके साथ क़ुरआन पढ़ने में जल्दी न करें तथा कहते रहें : ऐ मेरे पालनहार! तूने मुझे जो ज्ञान दिया है, उसके साथ और अधिक ज्ञान प्रदान कर।
आयत 115
وَلَقَدْ عَهِدْنَآ إِلَىٰٓ ءَادَمَ مِن قَبْلُ فَنَسِىَ وَلَمْ نَجِدْ لَهُۥ عَزْمًۭا
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
عَهِدْنَآ
अहद लिया हमने
إِلَىٰٓ
with
ءَادَمَ
आदम से
مِن
before
قَبْلُ
इससे पहले
فَنَسِىَ
तो वो भूल गया
وَلَمْ
और नहीं
نَجِدْ
पाया हमने
لَهُۥ
उसके लिए
عَزْمًۭا
कोई अज़्म
और हमने इससे पहले आदम से वचन लिया था, किन्तु वह भूल गया और हमने उसमें इरादे की मज़बूती न पाई
तफ़्सीर:
हमने इससे पहले आदम को वृक्ष से न खाने की ताकीद की थी तथा उसे उससे रोका था और उसके परिणाम से अवगत करा दिया था। लेकिन वह हमारे आदेश को भूल गया और उस पेड़ से खा लिया, उससे धैर्य नहीं रख सका, तथा हमने उसे जो आदेश दिया था, उसे निभाने के लिए उसके अंदर दृढ़ संकल्प की ताकत को हमने नहीं देखा।
आयत 116
وَإِذْ قُلْنَا لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ ٱسْجُدُوا۟ لِـَٔادَمَ فَسَجَدُوٓا۟ إِلَّآ إِبْلِيسَ أَبَىٰ
وَإِذْ
और जब
قُلْنَا
कहा हमने
لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ
फ़रिश्तों से
ٱسْجُدُوا۟
सजदा करो
لِـَٔادَمَ
आदम को
فَسَجَدُوٓا۟
तो उन्होंने सजदा किया
إِلَّآ
सिवाय
إِبْلِيسَ
इब्लीस के
أَبَىٰ
उसने इन्कार किया
और जब हमने फ़रिश्तों से कहा, "आदम को सजदा करो।" तो उन्होंने सजदा किया सिवाय इबलीस के, वह इनकार कर बैठा
तफ़्सीर:
तथा (ऐ रसूल!) आप उस समय को याद करें, जब हमने फ़रिश्तों से कहा : आदम को सलाम के तौर पर सजदा करो, तो सभी फरिश्तों ने सजदा किया, सिवाय इबलीस के (जो फ़रिश्तों के साथ था, किंतु फ़रिश्तों में से नहीं था)। उसने अहंकार के कारण सजदा करने से इनकार कर दिया।
आयत 117
فَقُلْنَا يَـٰٓـَٔادَمُ إِنَّ هَـٰذَا عَدُوٌّۭ لَّكَ وَلِزَوْجِكَ فَلَا يُخْرِجَنَّكُمَا مِنَ ٱلْجَنَّةِ فَتَشْقَىٰٓ
فَقُلْنَا
तो कहा हमने
يَـٰٓـَٔادَمُ
ऐ आदम
إِنَّ
बेशक
هَـٰذَا
ये
عَدُوٌّۭ
दुश्मन है
لَّكَ
तुम्हारा
وَلِزَوْجِكَ
और तुम्हारी बीवी का
فَلَا
पस ना
يُخْرِجَنَّكُمَا
वो हरगिज़ निकलवाए तुम दोनों को
مِنَ
from
ٱلْجَنَّةِ
जन्नत से
فَتَشْقَىٰٓ
वरना तुम मुसीबत में पड़ जाओगे
इसपर हमने कहा, "ऐ आदम! निश्चय ही यह तुम्हारा और तुम्हारी पत्नी का शत्रु है। ऐसा न हो कि तुम दोनों को जन्नत से निकलवा दे और तुम तकलीफ़ में पड़ जाओ
तफ़्सीर:
इसपर हमने कहा : ऐ आदम! निःसंदेह इबलीस तुम्हारा और तुम्हारी पत्नी का शुत्र है। अतः ऐसा न हो कि उसके बहकावे में आकर उसकी बात मानने के कारण वह तुम्हें और तुम्हारी पत्नी को जन्नत से निकलवा दे और तुम कष्ट एवं कठिनाई में पड़ जाओ।
आयत 118
إِنَّ لَكَ أَلَّا تَجُوعَ فِيهَا وَلَا تَعْرَىٰ
إِنَّ
बेशक
لَكَ
तुम्हारे लिए है
أَلَّا
ये कि ना
تَجُوعَ
तुम भूखे होगे
فِيهَا
उसमें
وَلَا
और ना
تَعْرَىٰ
तुम उरयाँ होगे
तुम्हारे लिए तो ऐसा है कि न तुम यहाँ भूखे रहोगे और न नंगे
तफ़्सीर:
निःसंदेह तुम्हारे लिए अल्लाह के ज़िम्मे यह है कि वह जन्नत में तुम्हें खिलाएगा, तो तुम भूखे नहीं होगे, तथा वह तुम्हें वस्त्र पहनाएगा, तो तुम नग्न नहीं होगे।
आयत 119
وَأَنَّكَ لَا تَظْمَؤُا۟ فِيهَا وَلَا تَضْحَىٰ
وَأَنَّكَ
और बेशक तुम
لَا
not
تَظْمَؤُا۟
ना तुम प्यासे होगे
فِيهَا
उसमें
وَلَا
और ना
تَضْحَىٰ
तुम्हें धूप लगेगी
और यह कि न यहाँ प्यासे रहोगे और न धूप की तकलीफ़ उठाओगे।"
तफ़्सीर:
तथा वह तुम्हें पिलाएगा, तो तुम प्यासे नहीं होगे और तुम्हें छाया देगा, तो तुम्हें सूर्य का ताप नहीं लगेगा।
आयत 120
فَوَسْوَسَ إِلَيْهِ ٱلشَّيْطَـٰنُ قَالَ يَـٰٓـَٔادَمُ هَلْ أَدُلُّكَ عَلَىٰ شَجَرَةِ ٱلْخُلْدِ وَمُلْكٍۢ لَّا يَبْلَىٰ
فَوَسْوَسَ
पस वसवसा डाला
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान ने
قَالَ
कहा
يَـٰٓـَٔادَمُ
ऐ आदम
هَلْ
क्या
أَدُلُّكَ
मैं रहनुमाई करुँ तुम्हारी
عَلَىٰ
to
شَجَرَةِ
दरख़्त पर
ٱلْخُلْدِ
हमेशगी के
وَمُلْكٍۢ
और बादशाहत के
لَّا
not
يَبْلَىٰ
जो ना पुरानी होगी
फिर शैतान ने उसे उकसाया। कहने लगा, "ऐ आदम! क्या मैं तुझे शाश्वत जीवन के वृक्ष का पता दूँ और ऐसे राज्य का जो कभी जीर्ण न हो?"
तफ़्सीर:
फिर शैतान ने आदम के दिल में विचार उत्पन्न किया और उससे कहा : क्या मैं तुझे ऐसे वृक्ष का पता बताऊँ, जो उसका फल खाए, वह कभी न मरेगा, बल्कि वह हमेशा जीवित (अमर) रहेगा, तथा वह ऐसे निरंतर राज्य का मालिक बन जाएगा, जो कभी समाप्त न होगा?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
आदम अलैहिस्सलाम को दोबारा नसीहत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि शैतान का वसवसा इंसान को हमेशा जल्दबाज़ी और लालच में फंसाता है, इससे होशियार रहना चाहिए।
आयत 121
فَأَكَلَا مِنْهَا فَبَدَتْ لَهُمَا سَوْءَٰتُهُمَا وَطَفِقَا يَخْصِفَانِ عَلَيْهِمَا مِن وَرَقِ ٱلْجَنَّةِ ۚ وَعَصَىٰٓ ءَادَمُ رَبَّهُۥ فَغَوَىٰ
فَأَكَلَا
तो दोनों ने खा लिया
مِنْهَا
उसमें से
فَبَدَتْ
तो ज़ाहिर हो गईं
لَهُمَا
उन दोनों के लिए
سَوْءَٰتُهُمَا
शर्मगाहें उन दोनों की
وَطَفِقَا
and they began
يَخْصِفَانِ
और वो दोनों चिपकाने लगे
عَلَيْهِمَا
अपने ऊपर
مِن
from
وَرَقِ
पत्तों से
ٱلْجَنَّةِ ۚ
जन्नत के
وَعَصَىٰٓ
और नाफ़रमानी की
ءَادَمُ
आदम ने
رَبَّهُۥ
अपने रब की
فَغَوَىٰ
तो वो भटक गया
अन्ततः उन दोनों ने उसमें से खा लिया, जिसके परिणामस्वरूप उनकी छिपाने की चीज़े उनके आगे खुल गई और वे दोनों अपने ऊपर जन्नत के पत्ते जोड-जोड़कर रखने लगे। और आदम ने अपने रब की अवज्ञा की, तो वह मार्ग से भटक गया
तफ़्सीर:
अन्ततः आदम और हव्वा ने उस वृक्ष से खा लिया, जिसमें से खाने से उन्हें मना किया गया था। अतः दोनों के सामने उनके गुप्तांग खुल गए, जबकि वे इससे पहले छुपे हुए थे और दोनों जन्नत के वृक्ष के पत्ते तोड़कर उनसे अपने गुप्तांग छुपाने लगे। आदम ने अपने रब की आज्ञा का उल्लंघन किया, क्योंकि उसने पेड़ से खाने से बचने की उसकी आज्ञा का पालन नहीं किया। इसलिए वह ऐसा काम कर बैठा, जो उसके लिए जायज़ नहीं था।
आयत 122
ثُمَّ ٱجْتَبَـٰهُ رَبُّهُۥ فَتَابَ عَلَيْهِ وَهَدَىٰ
ثُمَّ
फिर
ٱجْتَبَـٰهُ
चुन लिया उसे
رَبُّهُۥ
उसके रब ने
فَتَابَ
पस वो मेहरबान हुआ
عَلَيْهِ
उस पर
وَهَدَىٰ
और उसने हिदायत बख़्शी
इसके पश्चात उसके रब ने उसे चुन लिया और दोबारा उसकी ओर ध्यान दिया और उसका मार्गदर्शन किया
तफ़्सीर:
फिर अल्लाह ने उसे चुन लिया और उसकी तौबा क़बूल कर ली और उसे सन्मार्ग पर निर्देशित किया।
आयत 123
قَالَ ٱهْبِطَا مِنْهَا جَمِيعًۢا ۖ بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّۭ ۖ فَإِمَّا يَأْتِيَنَّكُم مِّنِّى هُدًۭى فَمَنِ ٱتَّبَعَ هُدَاىَ فَلَا يَضِلُّ وَلَا يَشْقَىٰ
قَالَ
फ़रमाया
ٱهْبِطَا
दोनों उतर जाओ
مِنْهَا
इससे
جَمِيعًۢا ۖ
इकट्ठे
بَعْضُكُمْ
बाज़ तुम्हारे
لِبَعْضٍ
बाज़ के
عَدُوٌّۭ ۖ
दुश्मन हैं
فَإِمَّا
फिर अगर
يَأْتِيَنَّكُم
आ जाए तुम्हारे पास
مِّنِّى
मेरी तरफ़ से
هُدًۭى
हिदायत
فَمَنِ
तो जिसने
ٱتَّبَعَ
पैरवी की
هُدَاىَ
मेरी हिदायत की
فَلَا
तो ना
يَضِلُّ
वो भटकेगा
وَلَا
और ना
يَشْقَىٰ
वो मुसीबत में पड़ेगा
कहा, "तुम दोनों के दोनों यहाँ से उतरो! तुम्हारे कुछ लोग कुछ के शत्रु होंगे। फिर यदि मेरी ओर से तुम्हें मार्गदर्शन पहुँचे, तो जिस किसी ने मेरे मार्गदर्शन का अनुपालन किया, वह न तो पथभ्रष्ट होगा और न तकलीफ़ में पड़ेगा
तफ़्सीर:
अल्लाह ने आदम और ह़व्वा से कहा : तुम दोनों और इबलीस जन्नत से उतर जाओ। इबलीस तुम दोनों का शत्रु है और तुम दोनों उसके शत्रु हो। फिर यदि तुम्हारे पास मेरी ओर से मेरा मार्गदर्शन आए, तो तुममें से जो मेरे मार्गदर्शन का अनुपालन करेगा और उसके अनुसार कर्म करेगा तथा उससे इधर-उधर नहीं जाएगा; वह न सच्चे मार्ग से भटकेगा और न आख़िरत में इस दुर्भाग्य का शिकार होगा कि यातना सहनी पड़े। बल्कि अल्लाह उसे जन्नत में दाख़िल करेगा।
आयत 124
وَمَنْ أَعْرَضَ عَن ذِكْرِى فَإِنَّ لَهُۥ مَعِيشَةًۭ ضَنكًۭا وَنَحْشُرُهُۥ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ أَعْمَىٰ
وَمَنْ
और जिसने
أَعْرَضَ
ऐराज़ किया
عَن
from
ذِكْرِى
मेरे ज़िक्र से
فَإِنَّ
तो बेशक
لَهُۥ
उसके लिए
مَعِيشَةًۭ
मईशत/गुज़रान
ضَنكًۭا
तंग
وَنَحْشُرُهُۥ
और हम उठाऐंगे उसे
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
أَعْمَىٰ
अँधा
और जिस किसी ने मेरी स्मृति से मुँह मोडा़ तो उसका जीवन संकीर्ण होगा और क़ियामत के दिन हम उसे अंधा उठाएँगे।"
तफ़्सीर:
और जो मेरी नसीहत से मुँह फेरेगा और उसे ग्रहण नहीं करेगा, उसके लिए दुनिया और आख़िरत में तंग जीवन होगा तथा हम उसे क़ियामत के दिन महशर की ओर इस स्थिति में ले जाएँगे कि वह दृष्टिहीन और प्रमाण विहीन होगा।
आयत 125
قَالَ رَبِّ لِمَ حَشَرْتَنِىٓ أَعْمَىٰ وَقَدْ كُنتُ بَصِيرًۭا
قَالَ
वो कहेगा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
لِمَ
क्यों
حَشَرْتَنِىٓ
उठाया तूने मुझे
أَعْمَىٰ
अँधा
وَقَدْ
हालाँकि तहक़ीक़
كُنتُ
था मैं
بَصِيرًۭا
देखने वाला
वह कहेगा, "ऐ मेरे रब! तूने मुझे अंधा क्यों उठाया, जबकि मैं आँखोंवाला था?"
तफ़्सीर:
नसीहत से मुँह फेरने वाला यह व्यक्ति कहेगा : ऐ मेरे रब! आज तूने मुझे अंधा बनाकर क्यों उठाया, जबकि मैं दुनिया में दृष्टि वाला था।
आयत 126
قَالَ كَذَٰلِكَ أَتَتْكَ ءَايَـٰتُنَا فَنَسِيتَهَا ۖ وَكَذَٰلِكَ ٱلْيَوْمَ تُنسَىٰ
قَالَ
वो फ़रमाएगा
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
أَتَتْكَ
आई थीं तेरे पास
ءَايَـٰتُنَا
आयात हमारी
فَنَسِيتَهَا ۖ
पस भूल गया तू उन्हें
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
ٱلْيَوْمَ
आ जाए तुम्हारे पास
تُنسَىٰ
तू भुलाया जाएगा
वह कहेगा, "इसी प्रकार (तू संसार में अंधा रहा था) । तेरे पास मेरी आयतें आई थी, तो तूने उन्हें भूला दिया था। उसी प्रकार आज तुझे भुलाया जा रहा है।"
तफ़्सीर:
सर्वशक्तिमान अल्लाह उस व्यक्ति का उत्तर देते हुए कहेगा : तूने दुनिया में ऐसा ही किया था। तेरे पास हमारी आयतें आई थीं, तो तूने उनसे मुँह फेर लिया था और उन्हें छोड़ दिया था। बिलकुल उसी तरह, आज तुझे यातना में छोड़ दिया जाएगा।
आयत 127
وَكَذَٰلِكَ نَجْزِى مَنْ أَسْرَفَ وَلَمْ يُؤْمِنۢ بِـَٔايَـٰتِ رَبِّهِۦ ۚ وَلَعَذَابُ ٱلْـَٔاخِرَةِ أَشَدُّ وَأَبْقَىٰٓ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
نَجْزِى
हम बदला देते हैं
مَنْ
उसको जो
أَسْرَفَ
हद से गुज़र जाए
وَلَمْ
और ना
يُؤْمِنۢ
वो ईमान लाए
بِـَٔايَـٰتِ
आयात पर
رَبِّهِۦ ۚ
अपने रब की
وَلَعَذَابُ
और अलबत्ता अज़ाब
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत का
أَشَدُّ
ज़्यादा शदीद है
وَأَبْقَىٰٓ
और ज़्यादा बाक़ी रहने वाला
इसी प्रकार हम उसे बदला देते है जो मर्यादा का उल्लंघन करे और अपने रब की आयतों पर ईमान न लाए। और आख़िरत की यातना तो अत्यन्त कठोर और अधिक स्थायी है
तफ़्सीर:
इसी तरह का बदला हम उस व्यक्ति को भी देते हैं, जो निषिद्ध इच्छाओं में संलिप्त रहे और अपने पालनहार के स्पष्ट प्रमाणों पर ईमान लाने से उपेक्षा करे। और निश्चय आख़िरत में अल्लाह का अज़ाब दुनिया और बरज़ख़ के तंग जीवन से कहीं अधिक भयानक एवं कठोर और अधिक समय तक रहने वाला है।
आयत 128
أَفَلَمْ يَهْدِ لَهُمْ كَمْ أَهْلَكْنَا قَبْلَهُم مِّنَ ٱلْقُرُونِ يَمْشُونَ فِى مَسَـٰكِنِهِمْ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّأُو۟لِى ٱلنُّهَىٰ
أَفَلَمْ
क्या फिर नहीं
يَهْدِ
रहनुमाई की
لَهُمْ
उनकी
كَمْ
कि कितनी ही
أَهْلَكْنَا
हलाक कीं हमने
قَبْلَهُم
उनसे पहले
مِّنَ
of
ٱلْقُرُونِ
बस्तियाँ
يَمْشُونَ
वो चलते फिरते हैं
فِى
in
مَسَـٰكِنِهِمْ ۗ
उनके घरों में
إِنَّ
यक़ीनन
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
لِّأُو۟لِى
for possessors
ٱلنُّهَىٰ
अक़्ल वालों के लिए
फिर क्या उनको इससे भी मार्ग न मिला कि हम उनसे पहले कितनी ही नस्लों को विनष्ट कर चुके है, जिनकी बस्तियों में वे चलते-फिरते है? निस्संदेह बुद्धिमानों के लिए इसमें बहुत-सी निशानियाँ है
तफ़्सीर:
क्या बहुदेववादियों के लिए उन समुदायों की बहुतायत स्पष्ट नहीं हुई, जिन्हें हमने उनसे पहले विनष्ट कर चुके हैं, ये लोग उन विनष्ट किए गए समुदायों के रहने के स्थानों में चलते-फिरते हैं और उन्हें पहुँचने वाले विनाश के प्रभावों को देखते हैं? उन बहुत सारे समुदायों को जिस विध्वंस और विनाश से पीड़ित होना पड़ा, उसमें बुद्धिमानों के लिए निश्चय बहुत-सी इबरतें (सीख एवं उपदेश) हैं।
आयत 129
وَلَوْلَا كَلِمَةٌۭ سَبَقَتْ مِن رَّبِّكَ لَكَانَ لِزَامًۭا وَأَجَلٌۭ مُّسَمًّۭى
وَلَوْلَا
और अगर ना होती
كَلِمَةٌۭ
एक बात
سَبَقَتْ
जो गुज़र चुकी
مِن
from
رَّبِّكَ
आप के रब की तरफ़ से
لَكَانَ
अलबत्ता हो जाता
لِزَامًۭا
लाज़िम (अज़ाब)
وَأَجَلٌۭ
और वक़्त (अगर ना होता)
مُّسَمًّۭى
मुकर्रर
यदि तेरे रब की ओर से पहले ही एक बात निश्चित न हो गई होती और एक अवधि नियत न की जा चुकी होती, तो अवश्य ही उन्हें यातना आ पकड़ती
तफ़्सीर:
यदि (ऐ रसूल!) आपके पालनहार की ओर से पहले ही यह बात निश्चित न हो गई होती कि वह किसी को भी, उसपर तर्क स्थापित करने से पहले दंडित नहीं करेगा तथा यदि अल्लाह के यहाँ उनके लिए एक नियत समय न होता, तो शीध्र ही उन्हें यातना का शिकार बना देता, क्योंकि वे यातना के अधिकारी बन ही चुके हैं।
आयत 130
فَٱصْبِرْ عَلَىٰ مَا يَقُولُونَ وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ قَبْلَ طُلُوعِ ٱلشَّمْسِ وَقَبْلَ غُرُوبِهَا ۖ وَمِنْ ءَانَآئِ ٱلَّيْلِ فَسَبِّحْ وَأَطْرَافَ ٱلنَّهَارِ لَعَلَّكَ تَرْضَىٰ
فَٱصْبِرْ
पस सब्र कीजिए
عَلَىٰ
over
مَا
उस पर जो
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
وَسَبِّحْ
और तस्बीह कीजिए
بِحَمْدِ
साथ हम्द के
رَبِّكَ
अपने रब की
قَبْلَ
पहले
طُلُوعِ
(the) rising
ٱلشَّمْسِ
सूरज तुलूअ होने से
وَقَبْلَ
और पहले
غُرُوبِهَا ۖ
उसके ग़ुरुब होने से
وَمِنْ
और कुछ
ءَانَآئِ
घड़ियाँ
ٱلَّيْلِ
रात की
فَسَبِّحْ
पस तस्बीह कीजिए
وَأَطْرَافَ
और किनारों पर
ٱلنَّهَارِ
दिन के
لَعَلَّكَ
ताकि आप
تَرْضَىٰ
आप राज़ी हो जाऐं
अतः जो कुछ वे कहते है उसपर धैर्य से काम लो और अपने रब का गुणगान करो, सूर्योदय से पहले और उसके डूबने से पहले, और रात की घड़ियों में भी तसबीह करो, और दिन के किनारों पर भी, ताकि तुम राज़ी हो जाओ
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आपको झुठलाने वाले लोग आपके बारे में जो झूठी बातें कहते हैं, उनपर धैर्य से काम लें, तथा सूर्य उगने से पहले फज्र की नमाज़ में, और सूर्य ड़ूबने से पहले अस्र की नमाज़ में, और रात की घड़ियों में मग़रिब एवं इशा की नमाज़ में, और दिन के पहले किनारे (हिस्से) के अंत के पश्चात सूर्य के ढलने के समय ज़ुहर की नमाज़ में, और दिन के दूसरे हिस्से के अंत के बाद मग़रिब की नमाज़ में अपने पालनहार की प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता बयान करें; आशा है कि आपको अल्लाह के पास ऐसा सवाब (प्रतिफल) प्राप्त हो, जिससे आप प्रसन्न हो जाएँ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नमाज़ की ताकीद और दुनिया की चमक-दमक से बेनियाज़ी की तलक़ीन का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि तंगदस्ती के डर से नहीं, बल्कि नमाज़ और सब्र से दिल का सुकून तलाश करना चाहिए।
आयत 131
وَلَا تَمُدَّنَّ عَيْنَيْكَ إِلَىٰ مَا مَتَّعْنَا بِهِۦٓ أَزْوَٰجًۭا مِّنْهُمْ زَهْرَةَ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا لِنَفْتِنَهُمْ فِيهِ ۚ وَرِزْقُ رَبِّكَ خَيْرٌۭ وَأَبْقَىٰ
وَلَا
और ना
تَمُدَّنَّ
हरगिज़ आप दराज़ करें
عَيْنَيْكَ
अपनी दोनों आँखें
إِلَىٰ
towards
مَا
तरफ़ उसके जो
مَتَّعْنَا
फ़ायदा दिया हमने
بِهِۦٓ
साथ इसके
أَزْوَٰجًۭا
मुख़्तलिफ़ लोगों को
مِّنْهُمْ
उनमें से
زَهْرَةَ
रौनक़ के लिए
ٱلْحَيَوٰةِ
(of) the life
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की ज़िन्दगी की
لِنَفْتِنَهُمْ
ताकि हम आज़माऐं उन्हें
فِيهِ ۚ
उसमें
وَرِزْقُ
और रिज़्क़
رَبِّكَ
आपके रब का
خَيْرٌۭ
बेहतर है
وَأَبْقَىٰ
और ज़्यादा बाक़ी रहने वाला
और उसकी ओर आँख उठाकर न देखो, जो कुछ हमने उनमें से विभिन्न लोगों को उपभोग के लिए दे रखा है, ताकि हम उसके द्वारा उन्हें आज़माएँ। वह तो बस सांसारिक जीवन की शोभा है। तुम्हारे रब की रोज़ी उत्तम भी है और स्थायी भी
तफ़्सीर:
आप सांसारिक जीवन की उस शोभा की ओर न देखें, जिसे हमने इस तरह के झुठलाने वालों के लिए आनंद का उपकरण बना दिया है, जिसका वे आनंद ले रहे हैं ताकि हम उनका परीक्षण करें। क्योंकि हमने उन्हें इस प्रकार की जो चीज़ दी है, वह नश्वर है। जबकि आपके पालनहार का प्रतिफल, जिसका उसने आपसे वादा किया है, ताकि आप प्रसन्न हो जाएँ, उन नश्वर आनंद की ची़ज़ों से बेहतर और अधिक स्थायी है, जो अल्लाह ने उन्हें प्रदान की हैं। क्योंकि आपको मिलने वाला प्रतिफल कभी समाप्त न होगा।
आयत 132
وَأْمُرْ أَهْلَكَ بِٱلصَّلَوٰةِ وَٱصْطَبِرْ عَلَيْهَا ۖ لَا نَسْـَٔلُكَ رِزْقًۭا ۖ نَّحْنُ نَرْزُقُكَ ۗ وَٱلْعَـٰقِبَةُ لِلتَّقْوَىٰ
وَأْمُرْ
और हुक्म दीजिए
أَهْلَكَ
अपने घर वालों को
بِٱلصَّلَوٰةِ
नमाज़ का
وَٱصْطَبِرْ
और क़ायम रहिए
عَلَيْهَا ۖ
इस पर
لَا
Not
نَسْـَٔلُكَ
नहीं हम सवाल करते आपसे
رِزْقًۭا ۖ
किसी रिज़्क़ का
نَّحْنُ
हम
نَرْزُقُكَ ۗ
हम रिज़्क़ देते है आप को
وَٱلْعَـٰقِبَةُ
और (अच्छा) अंजाम
لِلتَّقْوَىٰ
तक़वा वालों के लिए है
और अपने लोगों को नमाज़ का आदेश करो और स्वयं भी उसपर जमे रहो। हम तुमसे कोई रोज़ी नहीं माँगते। रोज़ी हम ही तुम्हें देते है, और अच्छा परिणाम तो धर्मपरायणता ही के लिए निश्चित है
तफ़्सीर:
तथा (ऐ रसूल!) आप अपने परिवार को नमाज़ अदा करने का आदेश दें और आप स्वयं भी उसके अदा करने के पाबंद रहें। हम आपसे आपके लिए या किसी और के लिए आजीविका नहीं माँगते। आपकी आजीविका के उत्तरदायी भी हम ही हैं। तथा दुनिया और आख़िरत में प्रशंसनीय परिणाम तक़वा वालों के लिए है, जो अल्लाह से डरते हैं। इसलिए उसके आदेशों का पालन करते हैं और उसके निषेधों से बचते हैं।
आयत 133
وَقَالُوا۟ لَوْلَا يَأْتِينَا بِـَٔايَةٍۢ مِّن رَّبِّهِۦٓ ۚ أَوَلَمْ تَأْتِهِم بَيِّنَةُ مَا فِى ٱلصُّحُفِ ٱلْأُولَىٰ
وَقَالُوا۟
और वो कहते हैं
لَوْلَا
क्यों नहीं
يَأْتِينَا
वो लाता हमारे पास
بِـَٔايَةٍۢ
कोई निशानी
مِّن
from
رَّبِّهِۦٓ ۚ
अपने रब की तरफ़ से
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
تَأْتِهِم
आई उनके पास
بَيِّنَةُ
वाज़ेह दलील
مَا
जो
فِى
(was) in
ٱلصُّحُفِ
सहीफ़ों में है
ٱلْأُولَىٰ
पहले
और वे कहते है कि "यह अपने रब की ओर से हमारे पास कोई निशानी क्यों नहीं लाता?" क्या उनके पास उसका स्पष्ट प्रमाण नहीं आ गया, जो कुछ कि पहले की पुस्तकों में उल्लिखित है?
तफ़्सीर:
नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को झुठलाने वाले इन काफिरों ने कहा : मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपने रब की तरफ से हमारे पास कोई ऐसी निशानी क्यों नहीं लाता, जो उसकी सत्यता और उसके संदेष्टा होने का प्रमाण बन सके? क्या इन झुठलाने वालों के पास क़ुरआन नहीं आया, जो पहली आसमानी पुस्तकों की पुष्टि करता हैॽ!
आयत 134
وَلَوْ أَنَّآ أَهْلَكْنَـٰهُم بِعَذَابٍۢ مِّن قَبْلِهِۦ لَقَالُوا۟ رَبَّنَا لَوْلَآ أَرْسَلْتَ إِلَيْنَا رَسُولًۭا فَنَتَّبِعَ ءَايَـٰتِكَ مِن قَبْلِ أَن نَّذِلَّ وَنَخْزَىٰ
وَلَوْ
और अगर
أَنَّآ
बेशक हम
أَهْلَكْنَـٰهُم
हलाक कर देते हम उन्हें
بِعَذَابٍۢ
साथ किसी अज़ाब के
مِّن
before him
قَبْلِهِۦ
इससे पहले
لَقَالُوا۟
अलबत्ता वो कहते
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
لَوْلَآ
क्यों ना
أَرْسَلْتَ
भेजा तूने
إِلَيْنَا
तरफ़ हमारे
رَسُولًۭا
कोई रसूल
فَنَتَّبِعَ
तो हम पैरवी करते
ءَايَـٰتِكَ
तेरी आयात की
مِن
before
قَبْلِ
इससे पहले
أَن
कि
نَّذِلَّ
हम ज़लील होते
وَنَخْزَىٰ
और हम रुस्वा होते
यदि हम उसके पहले इन्हें किसी यातना से विनष्ट कर देते तो ये कहते कि "ऐ हमारे रब, तूने हमारे पास कोई रसूल क्यों न भेजा कि इससे पहले कि हम अपमानित और रुसवा होते, तेरी आयतों का अनुपालन करने लगते?"
तफ़्सीर:
यदि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को झुठलाने वाले इन काफ़िरों को हम उनके कुफ़्र एवं हठ के कारण, उनकी तरफ़ कोई संदेष्टा भेजने और उनपर कोई किताब उतारने से पहले ही, उनपर कोई यातना भेजकर विनष्ट कर देते, तो वे क़ियामत के दिन अपने कुफ़्र का बहाना पेश करते हुए कहते : (ऐ हमारे पालनहार!) तूने दुनिया में हमारी ओर कोई संदेष्टा क्यों नहीं भेजा कि हम उसपर ईमान लाते और उसकी लाई हुई आयतों का पालन करते, इससे पहले कि तेरे दंड के कारण हम अपमान एवं ज़िल्लत का सामना करतेॽ!
आयत 135
قُلْ كُلٌّۭ مُّتَرَبِّصٌۭ فَتَرَبَّصُوا۟ ۖ فَسَتَعْلَمُونَ مَنْ أَصْحَـٰبُ ٱلصِّرَٰطِ ٱلسَّوِىِّ وَمَنِ ٱهْتَدَىٰ
قُلْ
कह दीजिए
كُلٌّۭ
सबके सब
مُّتَرَبِّصٌۭ
इन्तिज़ार करने वाले हैं
فَتَرَبَّصُوا۟ ۖ
तो तुम भी इन्तिज़ार करो
فَسَتَعْلَمُونَ
पस अनक़रीब तुम जान लोगे
مَنْ
कौन
أَصْحَـٰبُ
साथी हैं
ٱلصِّرَٰطِ
रास्ते
ٱلسَّوِىِّ
सीधे के
وَمَنِ
और किसने
ٱهْتَدَىٰ
हिदायत पाई
कह दो, "हर एक प्रतीक्षा में है। अतः अब तुम भी प्रतीक्षा करो। शीघ्र ही तुम जान लोगे कि कौन सीधे मार्गवाला है और किनको मार्गदर्शन प्राप्त है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन झुठलाने वालों से कह दीजिए : हम और तुम में से प्रत्येक इस बात की प्रतीक्षा कर रहा है कि अल्लाह क्या करने वाला है। सो तुम प्रतीक्षा करो। तुम्हें शीघ्र ही (अनिवार्य रूप से) पता चल जाएगा कि कौन सीधे मार्ग वाले हैं और किन लोगों को मार्गदर्शन प्राप्त है : हमें अथवा तुम लोगों कोॽ
आज की ज़िंदगी में सबक़
दूसरों की दुनियावी नेमतों को देखकर रश्क न करने की ताकीद के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि अपनी नेमतों पर शुक्रगुज़ार रहना और सब्र के साथ अंजाम का इंतज़ार करना बेहतर रवैया है।
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