सूरह अल-अंबिया سورة الأنبياء
मक्की 112 आयतें
नाम का मतलब
नबी लोग (कई नबियों के वाकियात इस सूरह में इकट्ठे बयान हुए हैं)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-अंबिया में एक के बाद एक कई नबियों (इब्राहीम, नूह, दाऊद, सुलेमान, अय्यूब, यूनुस वगैरह) के वाकियात मुख्तसर मगर मुतास्सिर अंदाज़ में बयान हुए हैं। यह सूरह तौहीद और कयामत के यकीन को मज़बूत करती है।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह कई नबियों की ज़िंदगी के अहम सबक को एक ही जगह समेटती है, जिससे सब्र और तवक्कुल की तालीम मिलती है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ ٱقْتَرَبَ لِلنَّاسِ حِسَابُهُمْ وَهُمْ فِى غَفْلَةٍۢ مُّعْرِضُونَ
ٱقْتَرَبَ
क़रीब आ गया
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
حِسَابُهُمْ
हिसाब उनका
وَهُمْ
और वो
فِى
(are) in
غَفْلَةٍۢ
ग़फ़्लत में
مُّعْرِضُونَ
ऐराज़ करने वाले हैं
निकट आ गया लोगों का हिसाब और वे है कि असावधान कतराते जा रहे है
तफ़्सीर:
क़ियामत के दिन लोगों के लिए उनके कार्यों का हिसाब बहुत निकट आ गया। इसके बावजूद वे लापरवाही में पड़े हुए हैं, आख़िरत से मुँह मोड़कर दुनिया में व्यस्त हैं।
आयत 2
مَا يَأْتِيهِم مِّن ذِكْرٍۢ مِّن رَّبِّهِم مُّحْدَثٍ إِلَّا ٱسْتَمَعُوهُ وَهُمْ يَلْعَبُونَ
مَا
नहीं
يَأْتِيهِم
आता उनके पास
مِّن
of
ذِكْرٍۢ
कोई ज़िक्र
مِّن
from
رَّبِّهِم
उनके रब की तरफ़ से
مُّحْدَثٍ
नया
إِلَّا
मगर
ٱسْتَمَعُوهُ
वो सुनते हैं उसे
وَهُمْ
जब कि वो
يَلْعَبُونَ
वो खैल रहे होते हैं
उनके पास जो ताज़ा अनुस्मृति भी उनके रब की ओर से आती है, उसे वे हँसी-खेल करते हुए ही सुनते है
तफ़्सीर:
उनके पास उनके पालनहार की ओर से क़ुरआन की जो भी नई अवतरित बात आती है, तो वे उसे लाभ उठाने के लिए (गंभीरता से) नहीं सुनते हैं। बल्कि, वे इस बात की परवाह किए बिना कि उसमें क्या है, हँसी-खेल करते हुए सुनते हैं।
आयत 3
لَاهِيَةًۭ قُلُوبُهُمْ ۗ وَأَسَرُّوا۟ ٱلنَّجْوَى ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ هَلْ هَـٰذَآ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُكُمْ ۖ أَفَتَأْتُونَ ٱلسِّحْرَ وَأَنتُمْ تُبْصِرُونَ
لَاهِيَةًۭ
ग़ाफ़िल हैं
قُلُوبُهُمْ ۗ
दिल उनके
وَأَسَرُّوا۟
और चुपके-चुपके की
ٱلنَّجْوَى
सरगोशी
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
هَلْ
नहीं
هَـٰذَآ
ये
إِلَّا
मगर
بَشَرٌۭ
एक इन्सान
مِّثْلُكُمْ ۖ
तुम्हारे जैसा
أَفَتَأْتُونَ
क्या फिर तुम आते हो
ٱلسِّحْرَ
जादू को
وَأَنتُمْ
जब कि तुम
تُبْصِرُونَ
तुम देखते हो
उनके दिल दिलचस्पियों में खोए हुए होते है। उन्होंने चुपके-चुपके कानाफूसी की - अर्थात अत्याचार की नीति अपनानेवालों ने कि "यह तो बस तुम जैसा ही एक मनुष्य है। फिर क्या तुम देखते-बूझते जादू में फँस जाओगे?"
तफ़्सीर:
उन्होंने इसे इस हाल में सुना कि उनके दिल इससे पूरी तरह ग़ाफ़िल थे। और कुफ़्र के द्वारा अत्याचार करने वालों ने उस बात को गुप्त रखा, जो वे आपस में यह कहते हुए कानाफूसी कर रहे थे : यह व्यक्ति जो रसूल होने का दावा करता है, तुम्हारे ही जैसे एक इनसान के सिवा क्या है, जिसे तुमसे हटकर कोई विशिष्टता प्राप्त नहीं है?! तथा वह जो कुछ लेकर आया है, केवल जादू है। तो क्या तुम यह जानते हुए भी कि वह तुम्हारे ही जैसा एक इनसान है और वह जो कुछ लेकर आया है, मात्र जादू है, तुम उसके पीछे चलने के लिए तैयार हो?!
आयत 4
قَالَ رَبِّى يَعْلَمُ ٱلْقَوْلَ فِى ٱلسَّمَآءِ وَٱلْأَرْضِ ۖ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ
قَالَ
कहा
رَبِّى
रब मेरा
يَعْلَمُ
जानता है
ٱلْقَوْلَ
हर बात को
فِى
in
ٱلسَّمَآءِ
आसमान में
وَٱلْأَرْضِ ۖ
और ज़मीन में
وَهُوَ
और वो
ٱلسَّمِيعُ
ख़ूब सुनने वाला है
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब जानने वाला है
उसने कहा, "मेरा रब जानता है उस बात को जो आकाश और धरती में हो। और वह भली-भाँति सब कुछ सुनने, जाननेवाला है।"
तफ़्सीर:
रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा : तुमने गुप्त रूप से जो बात कही है, मेरा पालनहार उसे खूब जानता है। क्योंकि वह आकाशों और धरती में बोलने वाले के मुँह से निकलने वाली हर बात को जानता है। वह अपने बंदों की बातों को सुनने वाला, उनके कार्यों को जानने वाला है और वह उन्हें उनका बदला देगा।
आयत 5
بَلْ قَالُوٓا۟ أَضْغَـٰثُ أَحْلَـٰمٍۭ بَلِ ٱفْتَرَىٰهُ بَلْ هُوَ شَاعِرٌۭ فَلْيَأْتِنَا بِـَٔايَةٍۢ كَمَآ أُرْسِلَ ٱلْأَوَّلُونَ
بَلْ
बल्कि
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَضْغَـٰثُ
परेशान
أَحْلَـٰمٍۭ
ख़्वाब हैं
بَلِ
बल्कि
ٱفْتَرَىٰهُ
उसने गढ़ लिया है उसे
بَلْ
बल्कि
هُوَ
वो
شَاعِرٌۭ
शायर है
فَلْيَأْتِنَا
पस चाहिए कि लाए हमारे पास
بِـَٔايَةٍۢ
कोई निशानी
كَمَآ
जैसा कि
أُرْسِلَ
भेजे गए
ٱلْأَوَّلُونَ
पहले (रसूल)
नहीं, बल्कि वे कहते है, "ये तो संभ्रमित स्वप्नं है, बल्कि उसने इसे स्वयं ही घड़ लिया है, बल्कि वह एक कवि है! उसे तो हमारे पास कोई निशानी लानी चाहिए, जैसे कि (निशानियाँ लेकर) पहले के रसूल भेजे गए थे।"
तफ़्सीर:
बल्कि सच्चाई यह है कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जो क़ुरआन लाए हैं, उसके बारे में वे असमंजस में पड़े हुए हैं। चुनाँचे कभी कहते हैं कि ये मिश्रित सपने हैं जिनकी कोई व्याख्या नहीं होती। कभी कहते हैं कि नहीं, बल्कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इसे गढ़ लिया है, जिसका कोई आधार नहीं है। तथा कभी कहते हैं कि आप शायर हैं। और यदि आप अपने दावे में सच्चे हैं, तो पहले रसूलों की तरह हमारे पास कोई चमत्कार लेकर आएँ। क्योंकि वे चमत्कार लाए थे, जैसे कि मूसा अलैहिस्सलाम की लाठी और सालेह अलैहिस्सलाम की ऊँटनी।
आयत 6
مَآ ءَامَنَتْ قَبْلَهُم مِّن قَرْيَةٍ أَهْلَكْنَـٰهَآ ۖ أَفَهُمْ يُؤْمِنُونَ
مَآ
नहीं
ءَامَنَتْ
ईमान लाई थी
قَبْلَهُم
उनसे पहले
مِّن
any
قَرْيَةٍ
कोई बस्ती
أَهْلَكْنَـٰهَآ ۖ
हलाक कर दिया हमने जिसे
أَفَهُمْ
क्या फिर वो
يُؤْمِنُونَ
वो ईमान लाऐंगे
इनसे पहले कोई बस्ती भी, जिसको हमने विनष्ट किया, ईमान न लाई। फिर क्या ये ईमान लाएँगे?
तफ़्सीर:
इन चमत्कार की माँग करने वालों से पहले कोई बस्ती, जिसने चमत्कारों का प्रस्ताव रखा, फिर उसे उसके सुझाव के अनुसार दिया गया, ईमान नहीं लाई। बल्कि उन्होंने उसे झुठला दिया, तो हमने उन्हें नष्ट कर दिया। तो क्या ये लोग ईमान ले आएँगे।
आयत 7
وَمَآ أَرْسَلْنَا قَبْلَكَ إِلَّا رِجَالًۭا نُّوحِىٓ إِلَيْهِمْ ۖ فَسْـَٔلُوٓا۟ أَهْلَ ٱلذِّكْرِ إِن كُنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
وَمَآ
और नहीं
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
قَبْلَكَ
आपसे पहले
إِلَّا
मगर
رِجَالًۭا
मर्दों को
نُّوحِىٓ
हम वही करते थे
إِلَيْهِمْ ۖ
तरफ़ उनके
فَسْـَٔلُوٓا۟
पस पूछ लो
أَهْلَ
(the) people
ٱلذِّكْرِ
अहले ज़िक्र से
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
لَا
(do) not
تَعْلَمُونَ
नहीं तुम जानते
और तुमसे पहले भी हमने पुरुषों ही को रसूल बनाकर भेजा, जिनकी ओर हम प्रकाशना करते थे। - यदि तुम्हें मालूम न हो तो ज़िक्रवालों (किताबवालों) से पूछ लो। -
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) हमने आपसे पहले मनुष्यों ही में से कुछ पुरुषों को रसूल बनाकर भेजे, जिनकी ओर हम वह़्य (प्रकाशना) करते थे। हमने रसूल बनाकर फ़रिश्तों को नहीं भेजा। इसलिए, यदि तुम नहीं जानते हो, तो अपने से पहले किताब वालों से पूछ लो।
आयत 8
وَمَا جَعَلْنَـٰهُمْ جَسَدًۭا لَّا يَأْكُلُونَ ٱلطَّعَامَ وَمَا كَانُوا۟ خَـٰلِدِينَ
وَمَا
और नहीं
جَعَلْنَـٰهُمْ
बनाए हमने उनके
جَسَدًۭا
ऐसे जिस्म
لَّا
not
يَأْكُلُونَ
कि ना वो खाते हों
ٱلطَّعَامَ
खाना
وَمَا
और ना
كَانُوا۟
थे वो
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले
उनको हमने कोई ऐसा शरीर नहीं दिया था कि वे भोजन न करते हों और न वे सदैव रहनेवाले ही थे
तफ़्सीर:
हमने उन रसूलों को, जिन्हें हम भेजते थे, ऐसे शरीर वाले नहीं बनाए थे, जो खाना न खाते हों। बल्कि वे अन्य लोगों की तरह खाते-पीते थे। तथा वे इस दुनिया में हमेशा रहने वाले अमर नहीं थे।
आयत 9
ثُمَّ صَدَقْنَـٰهُمُ ٱلْوَعْدَ فَأَنجَيْنَـٰهُمْ وَمَن نَّشَآءُ وَأَهْلَكْنَا ٱلْمُسْرِفِينَ
ثُمَّ
फिर
صَدَقْنَـٰهُمُ
सच्चा किया हमने उसे
ٱلْوَعْدَ
वादा
فَأَنجَيْنَـٰهُمْ
पस निजात दी हमने उन्हें
وَمَن
और जिसे
نَّشَآءُ
हमने चाहा
وَأَهْلَكْنَا
और हलाक कर दिया हमने
ٱلْمُسْرِفِينَ
हद से बढ़ने वालों को
फिर हमने उनके साथ वादे को सच्चा कर दिखाया और उन्हें हमने छुटकारा दिया, और जिसे हम चाहें उसे छुटकारा मिलता है। और मर्यादाहीनों को हमने विनष्ट कर दिया
तफ़्सीर:
फिर हमने अपने रसूलों से किए हुए अपने वचन को पूरा कर दिया। चुनाँचे हमने उन्हें और जिन मोमिनों को चाहा, विनाश से बचा लिया, और उन लोगों को नष्ट कर दिया, जो अल्लाह का इनकार करके और गुनाह के कार्यों में पड़कर हद से आगे बढ़ने वाले थे।
आयत 10
لَقَدْ أَنزَلْنَآ إِلَيْكُمْ كِتَـٰبًۭا فِيهِ ذِكْرُكُمْ ۖ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
أَنزَلْنَآ
नाज़िल की हमने
إِلَيْكُمْ
तरफ़ तुम्हारे
كِتَـٰبًۭا
एक किताब
فِيهِ
जिसमें
ذِكْرُكُمْ ۖ
ज़िक्र है तुम्हारा
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल से काम लेते
लो, हमने तुम्हारी ओर एक किताब अवतरित कर दी है, जिसमें तुम्हारे लिए याददिहानी है। तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?
तफ़्सीर:
हमने तुम्हारी ओर क़ुरआन उतारा है, जिसमें तुम्हारा सम्मान और गौरव है अगर तुम उसे सत्य मानो और उसकी शिक्षाओं पर अमल करो। तो क्या तुम इस बात को नहीं समझते, कि तुम उसपर ईमान लाने में जल्दी करो और उसमें जो कुछ है, उसके अनुसार कार्य करो?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत की गफलत पर तनबीह का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि लोग हिसाब के दिन से गाफिल रहते हैं, जबकि उसकी तैयारी अभी से ज़रूरी है।
आयत 11
وَكَمْ قَصَمْنَا مِن قَرْيَةٍۢ كَانَتْ ظَالِمَةًۭ وَأَنشَأْنَا بَعْدَهَا قَوْمًا ءَاخَرِينَ
وَكَمْ
और कितनी ही
قَصَمْنَا
तोड़ कर रखदीं हमने
مِن
of
قَرْيَةٍۢ
बस्तियाँ
كَانَتْ
थीं वो
ظَالِمَةًۭ
ज़ालिम
وَأَنشَأْنَا
और उठाया हमने
بَعْدَهَا
बाद इसके
قَوْمًا
क़ौमों को
ءَاخَرِينَ
दूसरी
कितनी ही बस्तियों को, जो ज़ालिम थीं, हमने तोड़कर रख दिया और उनके बाद हमने दूसरे लोगों को उठाया
तफ़्सीर:
और कितनी ही बस्तियाँ ऐसी हैं, जिन्हें हमने उनके कुफ़्र के द्वारा अत्याचार करने के कारण नष्ट कर दिया और उनके बाद दूसरे लोगों को पैदा कर दिया।
आयत 12
فَلَمَّآ أَحَسُّوا۟ بَأْسَنَآ إِذَا هُم مِّنْهَا يَرْكُضُونَ
فَلَمَّآ
तो जब
أَحَسُّوا۟
उन्होंने महसूस किया
بَأْسَنَآ
अज़ाब हमारा
إِذَا
अचानक
هُم
वो
مِّنْهَا
उनसे
يَرْكُضُونَ
वो भागने लगे
फिर जब उन्हें हमारी यातना का आभास हुआ तो लगे वहाँ से भागने
तफ़्सीर:
चुनाँजे जब विनष्ट लोगों ने हमारी उन्मूलनकारी यातना को देखा, तो विनाश से बचने के लिए अपनी बस्ती से बहुत तेज़ी के साथ भागने लगे।
आयत 13
لَا تَرْكُضُوا۟ وَٱرْجِعُوٓا۟ إِلَىٰ مَآ أُتْرِفْتُمْ فِيهِ وَمَسَـٰكِنِكُمْ لَعَلَّكُمْ تُسْـَٔلُونَ
لَا
Flee not
تَرْكُضُوا۟
ना तुम भागो
وَٱرْجِعُوٓا۟
और लौट आओ
إِلَىٰ
to
مَآ
तरफ़ उसके जो
أُتْرِفْتُمْ
ऐश दिए गए तुम
فِيهِ
जिसमें
وَمَسَـٰكِنِكُمْ
और अपने घरों के
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تُسْـَٔلُونَ
तुम पूछे जाओ
कहा गया, "भागो नहीं! लौट चलो, उसी भोग-विलास की ओर जो तुम्हें प्राप्त था और अपने घरों की ओर ताकि तुमसे पूछा जाए।"
तफ़्सीर:
तो उनसे उपहास के तौर पर कहा जाएगा : भागो नहीं, और अपने उन सुखों की ओर जिनका तुम आनंद ले रहे थे, और अपने घरों की ओर लौट चलो, ताकि तुमसे तुम्हारी दुनिया के बारे में कुछ पूछा जाए।
आयत 14
قَالُوا۟ يَـٰوَيْلَنَآ إِنَّا كُنَّا ظَـٰلِمِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
يَـٰوَيْلَنَآ
हाय अफ़्सोस हम पर
إِنَّا
बेशक हम
كُنَّا
थे हम
ظَـٰلِمِينَ
ज़ालिम
कहने लगे, "हाय हमारा दुर्भाग्य! निस्संदेह हम ज़ालिम थे।"
तफ़्सीर:
इन अत्याचारियों ने अपने पाप को स्वीकार करते हुए कहा : हाय हमारा विनाश और हमारा नुकसान! निश्चय हम अत्याचारी थे क्योंकि हम अल्लाह का इनकार करते थे।
आयत 15
فَمَا زَالَت تِّلْكَ دَعْوَىٰهُمْ حَتَّىٰ جَعَلْنَـٰهُمْ حَصِيدًا خَـٰمِدِينَ
فَمَا
Then not
زَالَت
तो मुसलसल रही
تِّلْكَ
यही
دَعْوَىٰهُمْ
पुकार उनकी
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
جَعَلْنَـٰهُمْ
बना दिया हमने उन्हें
حَصِيدًا
जड़ से कटी हुई खेती
خَـٰمِدِينَ
बुझी हुई
फिर उनकी निरन्तर यही पुकार रही, यहाँ तक कि हमने उन्हें ऐसा कर दिया जैसे कटी हुई खेती, बुझी हुई आग हो
तफ़्सीर:
तो उनका अपने पाप को स्वीकार करना और अपने हक़ में विनाश की बद्-दुआ करना ही उनकी निरंतर पुकार रही, जिसे वे दोहराते रहे, यहाँ तक कि हमने उन्हें कटी हुई खेती की तरह, मरे हुए बना दिया, उनमें कोई हरकत नहीं थी।
आयत 16
وَمَا خَلَقْنَا ٱلسَّمَآءَ وَٱلْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا لَـٰعِبِينَ
وَمَا
और नहीं
خَلَقْنَا
पैदा किया हमने
ٱلسَّمَآءَ
आसमान
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
وَمَا
और जो
بَيْنَهُمَا
इन दोनों के दर्मियान है
لَـٰعِبِينَ
खेलते हुए
और हमने आकाश और धरती को और जो कुछ उसके मध्य में है कुछ इस प्रकार नहीं बनाया कि हम कोई खेल करने वाले हो
तफ़्सीर:
हमने आकाश और धरती तथा उन दोनों के बीच मौजूद चीज़ों को खेल-तमाशा के तौर पर और व्यर्थ नहीं बनाया, बल्कि हमने उन्हें अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य के संकेत के रूप में बनाया है।
आयत 17
لَوْ أَرَدْنَآ أَن نَّتَّخِذَ لَهْوًۭا لَّٱتَّخَذْنَـٰهُ مِن لَّدُنَّآ إِن كُنَّا فَـٰعِلِينَ
لَوْ
अगर
أَرَدْنَآ
चाहते हम
أَن
कि
نَّتَّخِذَ
हम बना लें
لَهْوًۭا
कोई खेल
لَّٱتَّخَذْنَـٰهُ
यक़ीनन बना लेते हम उसे
مِن
from
لَّدُنَّآ
अपने पास से
إِن
अगर
كُنَّا
होते हम
فَـٰعِلِينَ
करने वाले
यदि हम कोई खेल-तमाशा करना चाहते हो अपने ही पास से कर लेते, यदि हम ऐसा करने ही वाले होते
तफ़्सीर:
यदि हम पत्नी या पुत्र बनाना चाहते, तो निश्चय हम उसे उससे बना लेते जो हमारे पास है। हालाँकि हम ऐसा करने वाले नहीं हैं, क्योंकि हम इससे पवित्र हैं।
आयत 18
بَلْ نَقْذِفُ بِٱلْحَقِّ عَلَى ٱلْبَـٰطِلِ فَيَدْمَغُهُۥ فَإِذَا هُوَ زَاهِقٌۭ ۚ وَلَكُمُ ٱلْوَيْلُ مِمَّا تَصِفُونَ
بَلْ
बल्कि
نَقْذِفُ
हम फेंकते हैं
بِٱلْحَقِّ
हक़ को
عَلَى
against
ٱلْبَـٰطِلِ
बातिल पर
فَيَدْمَغُهُۥ
पस वो सर तोड़ देता है उसका
فَإِذَا
तो यकायक
هُوَ
वो
زَاهِقٌۭ ۚ
ज़ाइल हो जाता है
وَلَكُمُ
और तुम्हारे लिए
ٱلْوَيْلُ
हलाकत है
مِمَّا
उससे जो
تَصِفُونَ
तुम बयान करते हो
नहीं, बल्कि हम तो असत्य पर सत्य की चोट लगाते है, तो वह उसका सिर तोड़ देता है। फिर क्या देखते है कि वह मिटकर रह जाता है और तुम्हारे लिए तबाही है उन बातों के कारण जो तुम बनाते हो!
तफ़्सीर:
बल्कि हम उस सत्य को, जिसकी हम अपने रसूल की ओर वह़्य करते हैं, कुफ़्र वालों के असत्य पर फेंक मारते हैं, तो वह उसे खंडित कर देता है। फिर एकाएक उनका असत्य नष्ट-भ्रष्ट होने वाला होता है। और (ऐ अल्लाह के पत्नी और पुत्र बनाने का दावा करने वालो!) तुम्हारे लिए विनाश है, क्योंकि तुम अल्लाह को ऐसी चीज़ के साथ विशेषित करते हो, जो उसके लिए योग्य नहीं है।
आयत 19
وَلَهُۥ مَن فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ وَمَنْ عِندَهُۥ لَا يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِهِۦ وَلَا يَسْتَحْسِرُونَ
وَلَهُۥ
और उसी के लिए है
مَن
जो
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ ۚ
और ज़मीन में है
وَمَنْ
और जो
عِندَهُۥ
उसके पास हैं
لَا
not
يَسْتَكْبِرُونَ
नहीं वो तकब्बुर करते
عَنْ
to
عِبَادَتِهِۦ
उसकी इबादत से
وَلَا
और ना
يَسْتَحْسِرُونَ
वो थकते हैं
और आकाशों और धरती में जो कोई है उसी का है। और जो (फ़रिश्ते) उसके पास है वे न तो अपने को बड़ा समझकर उसकी बन्दगी से मुँह मोड़ते है औऱ न वे थकते है
तफ़्सीर:
तथा अकेले अल्लाह ही के लिए आकाशों और धरती का राज्य है। और उसके पास जो फ़रिश्ते हैं, उसकी इबादत से अभिमान नहीं करते और न ही वे उससे थकते हैं।
आयत 20
يُسَبِّحُونَ ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ لَا يَفْتُرُونَ
يُسَبِّحُونَ
वो तस्बीह करते हैं
ٱلَّيْلَ
रात
وَٱلنَّهَارَ
और दिन
لَا
not
يَفْتُرُونَ
नहीं वो दम लेते
रात और दिन तसबीह करते रहते है, दम नहीं लेते
तफ़्सीर:
वे हमेशा अल्लाह की पवित्रता का गान करते हैं। उससे उकताते नहीं हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
गुज़री बस्तियों के अंजाम का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि ज़ुल्म करने वाली बस्तियां आखिरकार तबाह हुईं, यह हमें इंसाफ पर कायम रहने की नसीहत देता है।
आयत 21
أَمِ ٱتَّخَذُوٓا۟ ءَالِهَةًۭ مِّنَ ٱلْأَرْضِ هُمْ يُنشِرُونَ
أَمِ
क्या
ٱتَّخَذُوٓا۟
उन्होंने बना लिए हैं
ءَالِهَةًۭ
कुछ इलाह
مِّنَ
from
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन से
هُمْ
कि वो
يُنشِرُونَ
वो ज़िन्दा करेंगे
(क्या उन्होंने आकाश से कुछ पूज्य बना लिए है)... या उन्होंने धरती से ऐसे इष्ट -पूज्य बना लिए है, जो पुनर्जीवित करते हों?
तफ़्सीर:
बल्कि मुश्रिकों ने अल्लाह के अलावा ऐसे पूज्य बना लिए हैं, जो मरे हुए लोगों को ज़िंदा नहीं कर सकते। तो फिर वे इससे असमर्थ की पूजा कैसे करते हैं?!
आयत 22
لَوْ كَانَ فِيهِمَآ ءَالِهَةٌ إِلَّا ٱللَّهُ لَفَسَدَتَا ۚ فَسُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ رَبِّ ٱلْعَرْشِ عَمَّا يَصِفُونَ
لَوْ
अगर
كَانَ
होते
فِيهِمَآ
उन दोनों में
ءَالِهَةٌ
कुछ इलाह
إِلَّا
सिवाए
ٱللَّهُ
अल्लाह के
لَفَسَدَتَا ۚ
अलबत्ता वो दोनों बिगड़ जाते
فَسُبْحَـٰنَ
पस पाक है
ٱللَّهِ
अल्लाह
رَبِّ
जो रब है
ٱلْعَرْشِ
अर्श का
عَمَّا
उससे जो
يَصِفُونَ
वो बयान करते हैं
यदि इन दोनों (आकाश और धरती) में अल्लाह के सिवा दूसरे इष्ट-पूज्य भी होते तो दोनों की व्यवस्था बिगड़ जाती। अतः महान और उच्च है अल्लाह, राजासन का स्वामी, उन बातों से जो ये बयान करते है
तफ़्सीर:
यदि आकाशों और धरती में अल्लाह के अलावा कई पूज्य होते, तो राज्य (प्रभुत्व) को लेकर पूज्यों के बीच विवाद (संघर्ष) के कारण दोनों नष्ट-भ्रष्ट हो जाते। जबकि वस्तुस्थिति इसके विपरीत है। इसलिए, अर्श का मालिक अल्लाह उससे पवित्र है, जो मुश्रिक लोग झूठे तरीक़े से उसके बारे में वर्णन करते हैं कि उसके कोई साझेदार हैं।
आयत 23
لَا يُسْـَٔلُ عَمَّا يَفْعَلُ وَهُمْ يُسْـَٔلُونَ
لَا
Not
يُسْـَٔلُ
नहीं वो पूछा जाता
عَمَّا
उसके बारे में जो
يَفْعَلُ
वो करता है
وَهُمْ
और वो
يُسْـَٔلُونَ
वो पूछे जाऐंगे
जो कुछ वह करता है उससे उसकी कोई पूछ नहीं हो सकती, किन्तु इनसे पूछ होगी
तफ़्सीर:
अल्लाह अपने राज्य और निर्णय में अकेला है। उसके किसी फ़ैसले और निर्णय के बारे में कोई उससे पूछ नहीं सकता। जबकि वह अपने बंदों से उनके कार्यों के बारे में पूछेगा और उन्हें उनके कर्मों का बदला देगा।
आयत 24
أَمِ ٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِهِۦٓ ءَالِهَةًۭ ۖ قُلْ هَاتُوا۟ بُرْهَـٰنَكُمْ ۖ هَـٰذَا ذِكْرُ مَن مَّعِىَ وَذِكْرُ مَن قَبْلِى ۗ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ ٱلْحَقَّ ۖ فَهُم مُّعْرِضُونَ
أَمِ
या
ٱتَّخَذُوا۟
उन्होंने बना लिए
مِن
besides Him
دُونِهِۦٓ
उसके सिवा
ءَالِهَةًۭ ۖ
कुछ इलाह
قُلْ
कह दीजिए
هَاتُوا۟
लाओ
بُرْهَـٰنَكُمْ ۖ
दलील अपनी
هَـٰذَا
ये
ذِكْرُ
ज़िक्र है
مَن
उनका जो
مَّعِىَ
मेरे साथ हैं
وَذِكْرُ
और ज़िक्र है
مَن
उनका भी( जो)
قَبْلِى ۗ
मुझसे पहले थे
بَلْ
बल्कि
أَكْثَرُهُمْ
अकसर उनके
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नही वो जानते
ٱلْحَقَّ ۖ
हक़ को
فَهُم
तो वो
مُّعْرِضُونَ
ऐराज़ करने वाले हैं
(क्या ये अल्लाह के हक़ को नहीं पहचानते) या उसे छोड़कर इन्होंने दूसरे इष्ट-पूज्य बना लिए है (जिसके लिए इनके पास कुछ प्रमाण है)? कह दो, "लाओ, अपना प्रमाण! यह अनुस्मृति है उनकी जो मेरे साथ है और अनुस्मृति है उनकी जो मुझसे पहले हुए है, किन्तु बात यह है कि इनमें अधिकतर सत्य को जानते नहीं, इसलिए कतरा रहे है
तफ़्सीर:
बल्कि उन्होंने अल्लाह के अलावा कई पूज्य बना लिए हैं। (ऐ रसूल!) आप इन मुश्रिकों से कह दें : तुम इनके पूजा के योग्य होने पर अपना प्रमाण प्रस्तुत करो। क्योंकि मुझपर उतरने वाली इस किताब (क़ुरआन) और पिछले रसूलों पर उतरने वाली किताबों में तुम्हारे लिए कोई प्रमाण नहीं है। बल्कि असल बात यह है कि अधिकांश मुश्रिक केवल अज्ञानता और बाप-दादों के अनुकरण पर भरोसा करते हैं। अतः वे सत्य को स्वीकार करने से मुँह फेरने वाले हैं।
आयत 25
وَمَآ أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ مِن رَّسُولٍ إِلَّا نُوحِىٓ إِلَيْهِ أَنَّهُۥ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّآ أَنَا۠ فَٱعْبُدُونِ
وَمَآ
और नहीं
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
مِن
before you
قَبْلِكَ
आपसे पहले
مِن
any
رَّسُولٍ
कोई रसूल
إِلَّا
मगर
نُوحِىٓ
हमने वही की
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
أَنَّهُۥ
कि बैशक वो
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّآ
मगर
أَنَا۠
मैं ही
فَٱعْبُدُونِ
पस इबादत करो मेरी
हमने तुमसे पहले जो रसूल भी भेजा, उसकी ओर यही प्रकाशना की कि " "मेरे सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं। अतः तुम मेरी ही बन्दगी करो।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) हमने आपसे पहले जो भी रसूल भेजा, उसकी ओर यही वह़्य (प्रकाशना) करते रहे कि मेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। इसलिए एकमात्र मेरी इबादत करो और मेरे साथ किसी भी चीज़ को साझी न बनाओ।
आयत 26
وَقَالُوا۟ ٱتَّخَذَ ٱلرَّحْمَـٰنُ وَلَدًۭا ۗ سُبْحَـٰنَهُۥ ۚ بَلْ عِبَادٌۭ مُّكْرَمُونَ
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
ٱتَّخَذَ
बना ली है
ٱلرَّحْمَـٰنُ
रहमान ने
وَلَدًۭا ۗ
औलाद
سُبْحَـٰنَهُۥ ۚ
पाक है वो
بَلْ
बल्कि
عِبَادٌۭ
वो बन्दे हैं
مُّكْرَمُونَ
जो इज़्ज़त दिए गए हैं
और वे कहते है कि "रहमान सन्तान रखता है।" महान हो वह! बल्कि वे तो प्रतिष्ठित बन्दे हैं
तफ़्सीर:
और मुश्रिकों (बहुदेववादियों) ने कहा : अल्लाह ने फ़रिश्तों को बेटियाँ बना लिया है। अल्लाह उनके इस झूठ से पाक एवं पवित्र है। बल्कि फ़रिश्ते अल्लाह के बंदे हैं। उसकी ओर से सम्मान दिए गए हैं और उसके निकटवर्ती हैं।
आयत 27
لَا يَسْبِقُونَهُۥ بِٱلْقَوْلِ وَهُم بِأَمْرِهِۦ يَعْمَلُونَ
لَا
Not
يَسْبِقُونَهُۥ
नहीं वो आगे बढ़ते उससे
بِٱلْقَوْلِ
बात में
وَهُم
और वो
بِأَمْرِهِۦ
उसके हुक्म पर ही
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते हैं
उससे आगे बढ़कर नहीं बोलते और उनके आदेश का पालन करते है
तफ़्सीर:
वे अपने पालनहार से आगे बढ़कर नहीं बोलते। चुनाँचे उसकी अनुमति के बिना कोई बात नहीं करते, तथा वे उसके आदेश के अनुसार ही काम करते हैं। अतः उसके किसी आदेश का विरोध नहीं करते।
आयत 28
يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلَا يَشْفَعُونَ إِلَّا لِمَنِ ٱرْتَضَىٰ وَهُم مِّنْ خَشْيَتِهِۦ مُشْفِقُونَ
يَعْلَمُ
वो जानता है
مَا
जो कुछ
بَيْنَ
(is) before them
أَيْدِيهِمْ
उनके आगे है
وَمَا
और जो कुछ
خَلْفَهُمْ
उनके पीछे है
وَلَا
और नहीं
يَشْفَعُونَ
वो शफ़ाअत करेंगे
إِلَّا
मगर
لِمَنِ
जिसके लिए
ٱرْتَضَىٰ
वो राज़ी होजाए
وَهُم
और वो
مِّنْ
from
خَشْيَتِهِۦ
उसकी ख़शियत से
مُشْفِقُونَ
डरने वाले हैं
वह जानता है जो कुछ उनके आगे है और जो कुछ उनके पीछे है, और वे किसी की सिफ़ारिश नहीं करते सिवाय उसके जिसके लिए अल्लाह पसन्द करे। और वे उसके भय से डरते रहते है
तफ़्सीर:
वह उनके अगले और पिछले कर्मों को जानता है। वे (क़ियामत के दिन) उसकी अनुमति ही से केवल उसके हक़ में सिफ़ारिश करेंगे, जिसके लिए सिफ़ारिश को वह पसंद करेगा। तथा वे अल्लाह के भय से सहमे हुए रहते हैं। चुनाँचे किसी आदेश या निषेध में उसका विरोध नहीं करते।
आयत 29
۞ وَمَن يَقُلْ مِنْهُمْ إِنِّىٓ إِلَـٰهٌۭ مِّن دُونِهِۦ فَذَٰلِكَ نَجْزِيهِ جَهَنَّمَ ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلظَّـٰلِمِينَ
۞ وَمَن
और जो कोई
يَقُلْ
कहे
مِنْهُمْ
उनमें से
إِنِّىٓ
बेशक मैं
إِلَـٰهٌۭ
इलाह हूँ
مِّن
besides Him
دُونِهِۦ
उसके सिवा
فَذَٰلِكَ
तो एसी सूरत में
نَجْزِيهِ
हम बदले में देंगे उसे
جَهَنَّمَ ۚ
जहन्नम
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نَجْزِى
हम बदला देते हैं
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों को
और जो उनमें से यह कहे कि "उनके सिवा मैं भी एक इष्ट -पूज्य हूँ।" तो हम उसे बदले में जहन्नम देंगे। ज़ालिमों को हम ऐसा ही बदला दिया करते है
तफ़्सीर:
मान लिया जाए कि यदि फ़रिश्तों में से कोई यह कहे कि मैं अल्लाह के सिवा पूज्य हूँ, तो हम उसे उसके इस कथन के कारण क़ियामत के दिन जहन्नम की सज़ा देंगे, जिसमें वह हमेशा रहेगा। तथा हम अल्लाह के साथ कुफ़्र और शिर्क के द्वारा अत्याचार करने वालों को इसी तरह दंडित करते हैं।
आयत 30
أَوَلَمْ يَرَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ أَنَّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ كَانَتَا رَتْقًۭا فَفَتَقْنَـٰهُمَا ۖ وَجَعَلْنَا مِنَ ٱلْمَآءِ كُلَّ شَىْءٍ حَىٍّ ۖ أَفَلَا يُؤْمِنُونَ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَرَ
देखा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
أَنَّ
कि बेशक
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमान
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन
كَانَتَا
थे वो दोनों
رَتْقًۭا
मिले हुए
فَفَتَقْنَـٰهُمَا ۖ
तो जुदा-जुदा कर दिया हमने उन दोनों को
وَجَعَلْنَا
और बनाई हमने
مِنَ
from
ٱلْمَآءِ
पानी से
كُلَّ
every
شَىْءٍ
हर चीज़
حَىٍّ ۖ
ज़िन्दा
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
يُؤْمِنُونَ
वो ईमान लाते
क्या उन लोगों ने जिन्होंने इनकार किया, देखा नहीं कि ये आकाश और धरती बन्द थे। फिर हमने उन्हें खोल दिया। और हमने पानी से हर जीवित चीज़ बनाई, तो क्या वे मानते नहीं?
तफ़्सीर:
क्या अल्लाह का इनकार करने वाले नहीं जानते कि आकाश और धरती दोनों आपस में मिले हुए थे, दोनों के बीच कोई खाली स्थान नहीं था, जहाँ से बारिश उतरती, तो हमने दोनों को अलग-अलग कर दिया। तथा हमने आसमान से धरती पर उतरने वाली बारिश से हर तरह की जानदार चीज़ें और पौधे बनाए। तो क्या वे इन बातों से सीख नहीं लेते और एक अल्लाह पर ईमान नहीं लाते?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
तौहीद की दलील का ज़िक्र है कि अगर दो खुदा होते तो कायनात का निज़ाम बिगड़ जाता। यह हमें सिखाता है कि कायनात का मुनज़्ज़म निज़ाम खुद अल्लाह की वहदानियत का सुबूत है।
आयत 31
وَجَعَلْنَا فِى ٱلْأَرْضِ رَوَٰسِىَ أَن تَمِيدَ بِهِمْ وَجَعَلْنَا فِيهَا فِجَاجًۭا سُبُلًۭا لَّعَلَّهُمْ يَهْتَدُونَ
وَجَعَلْنَا
और बनाया हमने
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
رَوَٰسِىَ
पहाड़ों को
أَن
कि
تَمِيدَ
वो ढुलक (ना) जाए
بِهِمْ
साथ उनके
وَجَعَلْنَا
और बनाए हमने
فِيهَا
उसमें
فِجَاجًۭا
कुशादा
سُبُلًۭا
रास्ते
لَّعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَهْتَدُونَ
वो राह पा जाऐं
और हमने धरती में अटल पहाड़ रख दिए, ताकि कहीं ऐसा न हो कि वह उन्हें लेकर ढुलक जाए और हमने उसमें ऐसे दर्रे बनाए कि रास्तों का काम देते है, ताकि वे मार्ग पाएँ
तफ़्सीर:
और हमने धरती में स्थिर पहाड़ बनाए, ताकि वह अपने ऊपर मौजूद लोगों को लेकर हिलने-डुलने न लगे, और हमने उसमें चौड़े रास्ते बना दिए, ताकि लोग अपनी यात्राओं में अपने गंतव्यों तक मार्ग प्राप्त कर सकें।
आयत 32
وَجَعَلْنَا ٱلسَّمَآءَ سَقْفًۭا مَّحْفُوظًۭا ۖ وَهُمْ عَنْ ءَايَـٰتِهَا مُعْرِضُونَ
وَجَعَلْنَا
और बनाया हमने
ٱلسَّمَآءَ
आसमान को
سَقْفًۭا
छत
مَّحْفُوظًۭا ۖ
महफ़ूज़
وَهُمْ
और वो
عَنْ
from
ءَايَـٰتِهَا
उसकी निशानियों से
مُعْرِضُونَ
मूँह मोड़ने वाले हैं
और हमने आकाश को एक सुरक्षित छत बनाया, किन्तु वे है कि उसकी निशानियों से कतरा जाते है
तफ़्सीर:
और हमने आकाश को एक खंभे के बिना गिरने से संरक्षित, तथा शैतानों के चोरी-छिपे सुनने से सुरक्षित छत बनाया। जबकि मुश्रिकों का हाल यह है कि वे आकाश में मौजूद निशानियों (जैसे सूर्य और चाँद) से मुँह फेरने वाले हैं, उनसे सीख नहीं लेते।
आयत 33
وَهُوَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ وَٱلشَّمْسَ وَٱلْقَمَرَ ۖ كُلٌّۭ فِى فَلَكٍۢ يَسْبَحُونَ
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
خَلَقَ
बनाया
ٱلَّيْلَ
रात
وَٱلنَّهَارَ
और दिन को
وَٱلشَّمْسَ
और सूरज
وَٱلْقَمَرَ ۖ
और चाँद को
كُلٌّۭ
सब के सब
فِى
in
فَلَكٍۢ
मदार में (अपने)
يَسْبَحُونَ
वो तैरते हैं
वही है जिसने रात और दिन बनाए और सूर्य और चन्द्र भी। प्रत्येक अपने-अपने कक्ष में तैर रहा है
तफ़्सीर:
अकेला अल्लाह ही है, जिसने आराम के लिए रात बनाई और रोज़ी-रोटी कमाने के लिए दिन बनाया, तथा सूर्य को दिन का संकेत और चाँद को रात का संकेत बनाया। प्रत्येक सूर्य और चंद्रमा अपनी कक्षा में चल रहे हैं, कोई उससे विचलित और इधर-उधर नहीं होता।
आयत 34
وَمَا جَعَلْنَا لِبَشَرٍۢ مِّن قَبْلِكَ ٱلْخُلْدَ ۖ أَفَإِي۟ن مِّتَّ فَهُمُ ٱلْخَـٰلِدُونَ
وَمَا
और नहीं
جَعَلْنَا
बनाई हमने
لِبَشَرٍۢ
किसी इन्सान के लिए
مِّن
before you
قَبْلِكَ
आपसे पहले
ٱلْخُلْدَ ۖ
हमेशगी
أَفَإِي۟ن
क्या फिर अगर
مِّتَّ
आप फ़ौत होगए
فَهُمُ
तो वो
ٱلْخَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले
हमने तुमसे पहले भी किसी आदमी के लिए अमरता नहीं रखी। फिर क्या यदि तुम मर गए तो वे सदैव रहनेवाले है?
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) हमने आपसे पहले किसी मनुष्य को इस जीवन में हमेशा रहने वाला नहीं बनाया। फिर क्या यदि इस जीवन में आपका नियत समय पूरा हो जाए और आपकी मृत्यु हो जाए, तो ये लोग आपके बाद हमेशा रहने वाले हैं?! हरगिज़ नहीं।
आयत 35
كُلُّ نَفْسٍۢ ذَآئِقَةُ ٱلْمَوْتِ ۗ وَنَبْلُوكُم بِٱلشَّرِّ وَٱلْخَيْرِ فِتْنَةًۭ ۖ وَإِلَيْنَا تُرْجَعُونَ
كُلُّ
Every
نَفْسٍۢ
हर नफ़्स
ذَآئِقَةُ
चखने वाला है
ٱلْمَوْتِ ۗ
मौत को
وَنَبْلُوكُم
और हम मुब्तिला करते हैं तुम्हें
بِٱلشَّرِّ
साथ बुराई
وَٱلْخَيْرِ
और भलाई के
فِتْنَةًۭ ۖ
आज़माने के लिए
وَإِلَيْنَا
और हमारी ही तरफ़
تُرْجَعُونَ
तुम लौटाए जाओगे
हर जीव को मौत का मज़ा चखना है और हम अच्छी और बुरी परिस्थितियों में डालकर तुम सबकी परीक्षा करते है। अन्ततः तुम्हें हमारी ही ओर पलटकर आना है
तफ़्सीर:
प्रत्येक प्राणी को, चाहे मोमिन हो या काफ़िर, इस दुनिया में मौत का स्वाद चखना है। और (ऐ लोगो!) हम दुनिया के जीवन में शरई कर्तव्यों का पाबंद बनाकर तथा नेमतों और विपत्तियों से ग्रस्त कर तुम्हारी आज़माइश करते हैं। फिर तुम अपनी मौत के बाद केवल हमारी ही ओर लौटाए जाओगे। फिर हम तुम्हें तुम्हारे कार्यों का बदला देंगे।
आयत 36
وَإِذَا رَءَاكَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ إِن يَتَّخِذُونَكَ إِلَّا هُزُوًا أَهَـٰذَا ٱلَّذِى يَذْكُرُ ءَالِهَتَكُمْ وَهُم بِذِكْرِ ٱلرَّحْمَـٰنِ هُمْ كَـٰفِرُونَ
وَإِذَا
और जब
رَءَاكَ
देखते हैं आपको
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
إِن
नहीं
يَتَّخِذُونَكَ
वो बनाते आपका
إِلَّا
मगर
هُزُوًا
मज़ाक़
أَهَـٰذَا
क्या ये है
ٱلَّذِى
वो जो
يَذْكُرُ
ज़िक्र करता है
ءَالِهَتَكُمْ
तुम्हारे इलाहों का
وَهُم
हालाँकि वो
بِذِكْرِ
ज़िक्र से
ٱلرَّحْمَـٰنِ
रहमान के
هُمْ
वो
كَـٰفِرُونَ
इन्कारी हैं
जिन लोगों ने इनकार किया वे जब तुम्हें देखते है तो तुम्हारा उपहास ही करते है। (कहते है,) "क्या यही वह व्यक्ति है, जो तुम्हारे इष्ट -पूज्यों की बुराई के साथ चर्चा करता है?" और उनका अपना हाल यह है कि वे रहमान के ज़िक्र (स्मरण) से इनकार करते हैं
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) जब ये मुश्रिक लोग आपको देखते हैं, तो आपका मज़ाक़ उड़ाने लगते हैं और अपने अनुयायियों को यह कहकर आपसे नफ़रत दिलाते हैं कि : क्या यही वह व्यक्ति है, जो तुम्हारे देवताओं को, जिनकी तुम पूजा करते हो, बुरा-भला कहता है?! वे आपका मज़ाक उड़ाने के साथ-साथ उस क़ुरआन का भी इनकार करने वाले हैं, जो अल्लाह ने उनपर अवतरित किया है तथा उन नेमतों की नाशुक्री करते हैं, जो उसने उन्हें प्रदान की हैं। इसलिए वे खुद ही दोष के सबसे अधिक योग्य हैं क्योंकि उनके अंदर हर तरह की बुराई पाई जाती है।
आयत 37
خُلِقَ ٱلْإِنسَـٰنُ مِنْ عَجَلٍۢ ۚ سَأُو۟رِيكُمْ ءَايَـٰتِى فَلَا تَسْتَعْجِلُونِ
خُلِقَ
पैदा किया गया
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
مِنْ
of
عَجَلٍۢ ۚ
उजलत (के ख़मीर) से
سَأُو۟رِيكُمْ
अनक़रीब मैं दिखाऊँगा तुम्हें
ءَايَـٰتِى
अपनी निशानियाँ
فَلَا
पस ना
تَسْتَعْجِلُونِ
तुम जल्दी माँगो मुझसे
मनुष्य उतावला पैदा किया गया है। मैं तुम्हें शीघ्र ही अपनी निशानियाँ दिखाए देता हूँ। अतः तुम मुझसे जल्दी मत मचाओ
तफ़्सीर:
जल्दबाज़ी मनुष्य की प्रकृित में शामिल है। इसलिए वह चीज़ों के होने से पहले ही उनके लिए जल्दी मचाने लगता है। इसी का एक उदाहरण मुश्रिकों का यातना के लिए जल्दी मचाना है। (ऐ मेरी यातना के लिए जल्दी मचाने वालो!) मैं निकट ही तुम्हें वह चीज़ दिखाऊँगा, जिसके लिए तुमने जल्दी मचाई है। इसलिए उसे जल्दी करने के लिए न कहो।
आयत 38
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَـٰذَا ٱلْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
مَتَىٰ
कब है
هَـٰذَا
ये
ٱلْوَعْدُ
वादा
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
वे कहते है कि "यह वादा कब पूरा होगा, यदि तुम सच्चे हो?"
तफ़्सीर:
मरणोपरांत दोबारा जीवित होने का इनकार करने वाले जल्दी मचाते हुए कहते हैं : (ऐ मुसलमानो!) यदि तुम अपने इस दावे में सच्चे हो कि हमें मरने के बाद दोबारा जीवित होकर उठना है, तो यह वादा कब पूरा होगा?!
आयत 39
لَوْ يَعْلَمُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ حِينَ لَا يَكُفُّونَ عَن وُجُوهِهِمُ ٱلنَّارَ وَلَا عَن ظُهُورِهِمْ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ
لَوْ
अगर
يَعْلَمُ
जानलें
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
حِينَ
जिस वक़्त
لَا
(when) not
يَكُفُّونَ
ना वो रोक सकेंगे
عَن
from
وُجُوهِهِمُ
अपने चहरों से
ٱلنَّارَ
आग को
وَلَا
और ना
عَن
from
ظُهُورِهِمْ
अपनी पुश्तों से
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يُنصَرُونَ
वो मदद किए जाऐंगे
अगर इनकार करनेवालें उस समय को जानते, जबकि वे न तो अपने चहरों की ओर आग को रोक सकेंगे और न अपनी पीठों की ओर से और न उन्हें कोई सहायता ही पहुँच सकेगी तो (यातना की जल्दी न मचाते)
तफ़्सीर:
अगर मरणोपरांत दोबारा जीवित होने का इनकार करने वाले ये काफ़िर उस समय को जान लेते, जब वे अपने चेहरों और अपनी पीठों से आग को दूर नहीं कर सकेंगे, और यह कि उनका कोई मददगार नहीं होगा, जो उनसे अज़ाब को दूर कर सके। अगर इन्हें इस बात का यक़ीन होता, तो वे अज़ाब की जल्दी न मचाते।
आयत 40
بَلْ تَأْتِيهِم بَغْتَةًۭ فَتَبْهَتُهُمْ فَلَا يَسْتَطِيعُونَ رَدَّهَا وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ
بَلْ
बल्कि
تَأْتِيهِم
वो आ जाएगी उनके पास
بَغْتَةًۭ
अचानक
فَتَبْهَتُهُمْ
तो वो मबहूत/हैरान कर देगी उन्हें
فَلَا
तो ना
يَسْتَطِيعُونَ
वो इस्तिताअत रखते होंगे
رَدَّهَا
उसको रद करने की
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يُنظَرُونَ
वो मोहलत दिए जाऐंगे
बल्कि वह अचानक उनपर आएगी और उन्हें स्तब्ध कर देगी। फिर न उसे वे फेर सकेंगे और न उन्हें मुहलत ही मिलेगी
तफ़्सीर:
यह आग, जिसके द्वारा उन्हें अज़ाब दिया जाएगा, इस तरह नहीं आएगी कि उन्हें उसका ज्ञान होगा। बल्कि, यह उनपर अचानक आएगी। इसलिए वे उसे अपने आपसे दूर नहीं कर पाएँगे, और न उन्हें इतनी मोहलत दी जाएगी कि तौबा कर लें और उन्हें अल्लाह की दया प्राप्त हो जाए।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इंसान की जल्दबाज़ी की फितरत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि इंसान फितरी तौर पर जल्दबाज़ है, इसलिए सब्र सीखना एक मुसलसल कोशिश है।
आयत 41
وَلَقَدِ ٱسْتُهْزِئَ بِرُسُلٍۢ مِّن قَبْلِكَ فَحَاقَ بِٱلَّذِينَ سَخِرُوا۟ مِنْهُم مَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ
وَلَقَدِ
अलबत्ता तहक़ीक़
ٱسْتُهْزِئَ
मज़ाक़ उड़ाया गया
بِرُسُلٍۢ
कई रसूलों का
مِّن
before you
قَبْلِكَ
आपसे पहले
فَحَاقَ
तो घेर लिया
بِٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
سَخِرُوا۟
मज़ाक़ उड़ाया
مِنْهُم
उनमें से
مَّا
उसने जो
كَانُوا۟
थे वो
بِهِۦ
जिसका
يَسْتَهْزِءُونَ
वो मज़ाक उड़ाते
तुमसे पहले भी रसूलों की हँसी उड़ाई जा चुकी है, किन्तु उनमें से जिन लोगों ने उनकी हँसी उड़ाई थी उन्हें उसी चीज़ ने आ घेरा, जिसकी वे हँसी उड़ाते थे
तफ़्सीर:
यदि आपकी जाति ने आपका मज़ाक़ उड़ाया है, तो आप इस मामले में कोई अनूठे नहीं हैं। निश्चय (ऐ रसूल!) आपसे पहले भी कई रसूलों का मज़ाक़ उड़ाया गया। तो उन काफ़िरों को जो उनका मज़ाक़ उड़ाते थे, उसी यातना ने घेर लिया, जिसका वे दुनिया में मज़ाक़ उड़ाते थे, जब उनके रसूल उन्हें उससे डराते थे।
आयत 42
قُلْ مَن يَكْلَؤُكُم بِٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ مِنَ ٱلرَّحْمَـٰنِ ۗ بَلْ هُمْ عَن ذِكْرِ رَبِّهِم مُّعْرِضُونَ
قُلْ
कह दीजिए
مَن
कौन
يَكْلَؤُكُم
निग्हबानी कर रहा है तुम्हारी
بِٱلَّيْلِ
रात
وَٱلنَّهَارِ
और दिन को
مِنَ
from
ٱلرَّحْمَـٰنِ ۗ
रहमान से
بَلْ
बल्कि
هُمْ
वो
عَن
from
ذِكْرِ
ज़िक्र से
رَبِّهِم
अपने रब के
مُّعْرِضُونَ
ऐराज़ करने वाले हैं
कहो कि "कौन रहमान के मुक़ाबले में रात-दिन तुम्हारी रक्षा करेगा? बल्कि बात यह है कि वे अपने रब की याददिहानी से कतरा रहे है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) इन यातना की जल्दी मचाने वालों से कह दें : वह कौन है जो रात और दिन में 'रहमान' (अत्यंत दयावान् अल्लाह) की ओर से तुमपर उतरने वाले अज़ाब और विनाश से तुम्हारी रक्षा करता है? बल्कि वे अपने पालनहार के उपदेशों और तर्कों को याद करने से मुँह फेरने वाले हैं, अपनी अज्ञानता और मूर्खता के कारण उनमें से किसी भी चीज़ पर विचार नहीं करते हैं।
आयत 43
أَمْ لَهُمْ ءَالِهَةٌۭ تَمْنَعُهُم مِّن دُونِنَا ۚ لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَ أَنفُسِهِمْ وَلَا هُم مِّنَّا يُصْحَبُونَ
أَمْ
या
لَهُمْ
उनके लिए
ءَالِهَةٌۭ
कुछ इलाह हैं
تَمْنَعُهُم
जो बचाते हैं उन्हें
مِّن
from
دُونِنَا ۚ
हमारे सिवा
لَا
Not
يَسْتَطِيعُونَ
नहीं वो इस्तिताअत रखते
نَصْرَ
मदद की
أَنفُسِهِمْ
अपनी जानों की
وَلَا
और ना
هُم
वो
مِّنَّا
हमारी तरफ़ से
يُصْحَبُونَ
वो साथ दिए जाते हैं
(क्या वे हमें नहीं जानते) या हमसे हटकर उनके और भी इष्ट-पूज्य है, जो उन्हें बचा ले? वे तो स्वयं अपनी ही सहायता नहीं कर सकते है और न हमारे मुक़ाबले में उनका कोई साथ ही दे सकता है
तफ़्सीर:
या क्या उनके पास ऐसे पूज्य हैं, जो उन्हें हमारी यातना से बचाते हैं? वे तो अपने आपसे नुक़सान को दूर करके या अपने आपको लाभ पहुँचाकर खुद की भी मदद नहीं कर सकते। और जो खुद अपनी मदद नहीं कर सकता, वह किसी और की मदद कैसे करेगा?! और न ही कोई उन्हें हमारी यातना से बचाने वाला होगा।
आयत 44
بَلْ مَتَّعْنَا هَـٰٓؤُلَآءِ وَءَابَآءَهُمْ حَتَّىٰ طَالَ عَلَيْهِمُ ٱلْعُمُرُ ۗ أَفَلَا يَرَوْنَ أَنَّا نَأْتِى ٱلْأَرْضَ نَنقُصُهَا مِنْ أَطْرَافِهَآ ۚ أَفَهُمُ ٱلْغَـٰلِبُونَ
بَلْ
बल्कि
مَتَّعْنَا
फायदा दिया हमने
هَـٰٓؤُلَآءِ
उन लोगों को
وَءَابَآءَهُمْ
और उनके आबाओ अजदाद को
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
طَالَ
लम्बी होगई
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلْعُمُرُ ۗ
उम्र
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
يَرَوْنَ
वो देखते
أَنَّا
कि बेशक हम
نَأْتِى
हम आते हैं
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
نَنقُصُهَا
हम घटाते हैं उसे
مِنْ
from
أَطْرَافِهَآ ۚ
उसके किनारों से
أَفَهُمُ
क्या फिर वो
ٱلْغَـٰلِبُونَ
ग़ालिब आने वाले हैं
बल्कि बात यह है कि हमने उन्हें और उनके बाप-दादा को सुख-सुविधा प्रदान की, यहाँ तक कि इसी दशा में एक लम्बी मुद्दत उनपर गुज़र गई, तो क्या वे देखते नहीं कि हम इस भूभाग को उसके चतुर्दिक से घटाते हुए बढ़ रहे है? फिर क्या वे अभिमानी रहेंगे?
तफ़्सीर:
बल्कि हमने इन काफ़िरों और इनके बाप-दादों के लिए, उन्हें ढील देते हुए, दुनिया की नेमतें विस्तारित कर दीं, यहाँ तक कि उनपर लंबा समय बीत गया, तो इससे वे धोखे में पड़ गए, और अपने कुफ़्र पर क़ायम रहे। तो क्या हमारी नेमतों से धोखा खाने वाले और हमारी यातना के लिए जल्दी मचाने वाले ये काफ़िर नहीं देखते कि हम धरती के लोगों को पराजित करके, उसे उसके किनारों से कम करते आ रहे हैं। इसलिए उन्हें इससे सीख ग्रहण करना चाहिए ताकि उनके साथ भी वही न हो, जो दूसरों के साथ हुआ?! चुनाँचे ये लोग विजयी (प्रभावी) रहने वाले नहीं हैं, बल्कि ये पराजित (हारे हुए) हैं।
आयत 45
قُلْ إِنَّمَآ أُنذِرُكُم بِٱلْوَحْىِ ۚ وَلَا يَسْمَعُ ٱلصُّمُّ ٱلدُّعَآءَ إِذَا مَا يُنذَرُونَ
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّمَآ
बेशक
أُنذِرُكُم
मैं डराता हूँ तुम्हें
بِٱلْوَحْىِ ۚ
साथ वही के
وَلَا
और नहीं
يَسْمَعُ
सुना करते
ٱلصُّمُّ
बहरे
ٱلدُّعَآءَ
पुकार को
إِذَا
when
مَا
जब कभी
يُنذَرُونَ
वो डराए जाते हैं
कह दो, "मैं तो बस प्रकाशना के आधार पर तुम्हें सावधान करता हूँ।" किन्तु बहरे पुकार को नहीं सुनते, जबकि उन्हें सावधान किया जाए
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) कह दें : (ऐ लोगो!) मैं तुम्हें अल्लाह की यातना से उस वह़्य के अनुसार डराता हूँ, जो मेरा रब मेरी ओर भेजता है। परंतु सत्य से बहरे, जब अल्लाह की यातना से डराए जाते हैं, तो उसे स्वीकार करने के उद्देश्य से नहीं सुनते।
आयत 46
وَلَئِن مَّسَّتْهُمْ نَفْحَةٌۭ مِّنْ عَذَابِ رَبِّكَ لَيَقُولُنَّ يَـٰوَيْلَنَآ إِنَّا كُنَّا ظَـٰلِمِينَ
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
مَّسَّتْهُمْ
छू जाए
نَفْحَةٌۭ
एक झोंका
مِّنْ
of
عَذَابِ
अज़ाब से
رَبِّكَ
आपके रब के
لَيَقُولُنَّ
अलबत्ता वो ज़रूर कहेंगे
يَـٰوَيْلَنَآ
हाय अफ़सोस हम पर
إِنَّا
बेशक हम
كُنَّا
थे हम ही
ظَـٰلِمِينَ
ज़लिम
और यदि तुम्हारे रब की यातना का कोई झोंका भी उन्हें छू जाए तो वे कहन लगे, "हाय, हमारा दुर्भाग्य! निस्संदेह हम ज़ालिम थे।"
तफ़्सीर:
और यदि इन यातना के लिए जल्दी मचाने वाले लोगों को (ऐ रसूल!) आपके पालनहार की यातना का तनिक हिस्सा भी छू जाए, तो वे उस समय अवश्य कहेंगे : हाय हमारा विनाश और हमारा नुक़सान! निश्चय हम अल्लाह का साझी बनाकर और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की लाई हुई शरीयत का इनकार करके अत्याचार करने वाले थे।
आयत 47
وَنَضَعُ ٱلْمَوَٰزِينَ ٱلْقِسْطَ لِيَوْمِ ٱلْقِيَـٰمَةِ فَلَا تُظْلَمُ نَفْسٌۭ شَيْـًۭٔا ۖ وَإِن كَانَ مِثْقَالَ حَبَّةٍۢ مِّنْ خَرْدَلٍ أَتَيْنَا بِهَا ۗ وَكَفَىٰ بِنَا حَـٰسِبِينَ
وَنَضَعُ
और हम रख देंगे
ٱلْمَوَٰزِينَ
तराज़ू
ٱلْقِسْطَ
इन्साफ़ वाले
لِيَوْمِ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
فَلَا
तो ना
تُظْلَمُ
ज़ुल्म किया जाएगा
نَفْسٌۭ
किसी नफ़्स पर
شَيْـًۭٔا ۖ
कुछ भी
وَإِن
और अगरचे
كَانَ
हो वो
مِثْقَالَ
बराबर
حَبَّةٍۢ
दाने
مِّنْ
of
خَرْدَلٍ
राई के
أَتَيْنَا
हम ले आऐंगे
بِهَا ۗ
उसे
وَكَفَىٰ
और काफ़ी हैं
بِنَا
हम
حَـٰسِبِينَ
हिसाब लेने वाले
और हम बज़नी, अच्छे न्यायपूर्ण कामों को क़ियामत के दिन के लिए रख रहे है। फिर किसी व्यक्ति पर कुछ भी ज़ुल्म न होगा, यद्यपि वह (कर्म) राई के दाने के बराबर हो, हम उसे ला उपस्थित करेंगे। और हिसाब करने के लिए हम काफ़ी है
तफ़्सीर:
और हम क़ियामत के दिन लोगों के कर्मों को तौलने के लिए न्याय के तराज़ू स्थापित करेंगे। तो उस दिन किसी व्यक्ति पर उसके अच्छे कर्मों में कमी या उसके बुरे कर्मों में वृद्धि द्वारा ज़ुल्म नहीं किया जाएगा। यदि राई के एक दाने के बराबर भी कोई चीज़ होगी, तो हम उसे ले आएँगे। और हम अपने बंदों के कामों को गिनने के लिए काफ़ी हैं।
आयत 48
وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَىٰ وَهَـٰرُونَ ٱلْفُرْقَانَ وَضِيَآءًۭ وَذِكْرًۭا لِّلْمُتَّقِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
ءَاتَيْنَا
दिया हमने
مُوسَىٰ
मूसा
وَهَـٰرُونَ
और हारून को
ٱلْفُرْقَانَ
फ़ुरक़ान
وَضِيَآءًۭ
और रौशनी
وَذِكْرًۭا
और ज़िक्र
لِّلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के लिए
और हम मूसा और हारून को कसौटी और रौशनी और याददिहानी प्रदान कर चुके हैं, उन डर रखनेवालों के लिए
तफ़्सीर:
हमने मूसा और हारून अलैहिमस्सलाम को तौरात दिया, जो सत्य तथा असत्य और हलाल तथा हराम के बीच अंतर करने वाला, उसपर ईमान लाने वालों को राह दिखाने वाला और अपने रब से डरने वालों के लिए उपदेश था।
आयत 49
ٱلَّذِينَ يَخْشَوْنَ رَبَّهُم بِٱلْغَيْبِ وَهُم مِّنَ ٱلسَّاعَةِ مُشْفِقُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَخْشَوْنَ
डरते हैं
رَبَّهُم
अपने रब से
بِٱلْغَيْبِ
ग़ायबाना तौर पर
وَهُم
और वो
مِّنَ
of
ٱلسَّاعَةِ
क़यामत से
مُشْفِقُونَ
डरने वाले हैं
जो परोक्ष में रहते हुए अपने रब से डरते है और उन्हें क़ियामत की घड़ी का भय लगा रहता है
तफ़्सीर:
जो अपने उस रब की यातना से डरते हैं, जिसपर वे ईमान रखते हैं, जबकि उन्होंने उसे नहीं देखा है और वे क़ियामत से डरने वाले हैं।
आयत 50
وَهَـٰذَا ذِكْرٌۭ مُّبَارَكٌ أَنزَلْنَـٰهُ ۚ أَفَأَنتُمْ لَهُۥ مُنكِرُونَ
وَهَـٰذَا
और ये है
ذِكْرٌۭ
ज़िक्र
مُّبَارَكٌ
बाबरकत
أَنزَلْنَـٰهُ ۚ
नाज़िल किया हमने उसे
أَفَأَنتُمْ
क्या फिर तुम
لَهُۥ
उसका
مُنكِرُونَ
इन्कार करने वाले हो
और वह बरकतवाली अनुस्मृति है, जिसको हमने अवतरित किया है। तो क्या तुम्हें इससे इनकार है
तफ़्सीर:
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतरने वाला यह क़ुरआन, उन लोगों के लिए एक स्मरण और उपदेश है, जो इससे उपदेश ग्रहण करना चाहें, बहुत लाभ और भलाई वाला है। तो क्या इन सब के बावजूद तुम इसका इनकार कर रहे हो?! न इसकी शिक्षाओं को स्वीकार करने वाले हो और न उनपर अमल करने वालो हो?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
इब्राहीम अलैहिस्सलाम की तौहीद की दावत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि बुतों (झूठे मआबूदों) की हकीकत पर सवाल उठाना और गौर करना अक्लमंदी की निशानी है।
आयत 51
۞ وَلَقَدْ ءَاتَيْنَآ إِبْرَٰهِيمَ رُشْدَهُۥ مِن قَبْلُ وَكُنَّا بِهِۦ عَـٰلِمِينَ
۞ وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
ءَاتَيْنَآ
दी हमने
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम को
رُشْدَهُۥ
समझ बूझ उसकी
مِن
before
قَبْلُ
इससे क़ब्ल
وَكُنَّا
और थे हम
بِهِۦ
उसे
عَـٰلِمِينَ
जानने वाले
और इससे पहले हमने इबराहीम को उसकी हिदायत और समझ दी थी - और हम उसे भली-भाँति जानते थे। -
तफ़्सीर:
और हमने इबराहीम को बचपन में उनकी जाति के विरुद्ध तर्क प्रदान किया था और हम उन्हें अच्छी तरह जानते थे। इसलिए हमने उन्हें उनकी जाति के विरुद्ध वह तर्क प्रदान किया, जिसके वह हमारे ज्ञान के अनुसार योग्य थे।
आयत 52
إِذْ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِۦ مَا هَـٰذِهِ ٱلتَّمَاثِيلُ ٱلَّتِىٓ أَنتُمْ لَهَا عَـٰكِفُونَ
إِذْ
जब
قَالَ
उसने कहा
لِأَبِيهِ
अपने बाप से
وَقَوْمِهِۦ
और अपनी क़ौम से
مَا
क्या हैं
هَـٰذِهِ
ये
ٱلتَّمَاثِيلُ
मूर्तियाँ
ٱلَّتِىٓ
वो जो
أَنتُمْ
तुम
لَهَا
उनके लिए
عَـٰكِفُونَ
जम कर बैठने वाले हो
जब उसने अपने बाप और अपनी क़ौम से कहा, "ये मूर्तियाँ क्या है, जिनसे तुम लगे बैठे हो?"
तफ़्सीर:
जब उन्होंने अपने पिता आज़र और अपनी जाति से कहा : ये मूर्तियाँ क्या हैं, जिन्हें तुमने अपने हाथों से बनाया है और जिनकी तुम पूजा में लगे हुए हो?!
आयत 53
قَالُوا۟ وَجَدْنَآ ءَابَآءَنَا لَهَا عَـٰبِدِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
وَجَدْنَآ
पाया हमने
ءَابَآءَنَا
अपने आबा ओ अजदाद को
لَهَا
उनकी
عَـٰبِدِينَ
इबादत करने वाले
वे बोले, "हमने अपने बाप-दादा को इन्हीं की पूजा करते पाया है।"
तफ़्सीर:
उनकी जाति के लोगों ने उनसे कहा : हमने अपने बाप-दादा को इनकी पूजा करते हुए पाया है, इसलिए उनका अनुकरण करते हुए हमने भी इनकी पूजा की।
आयत 54
قَالَ لَقَدْ كُنتُمْ أَنتُمْ وَءَابَآؤُكُمْ فِى ضَلَـٰلٍۢ مُّبِينٍۢ
قَالَ
उसने कहा
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
كُنتُمْ
हो तुम
أَنتُمْ
तुम
وَءَابَآؤُكُمْ
और आबा ओ अजदाद तुम्हारे
فِى
(were) in
ضَلَـٰلٍۢ
गुमराही में
مُّبِينٍۢ
खुली
उसने कहा, "तुम भी और तुम्हारे बाप-दादा भी खुली गुमराही में हो।"
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा : (ऐ अपने बाप-दादा के अनुयायियो!) निश्चय तुम और तुम्हारे बाप-दादा, जिनका तुमने अनुकरण किया है, सत्य के मार्ग से स्पष्ट रूप से भटके हुए थे।
आयत 55
قَالُوٓا۟ أَجِئْتَنَا بِٱلْحَقِّ أَمْ أَنتَ مِنَ ٱللَّـٰعِبِينَ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَجِئْتَنَا
क्या तू लाया है हमारे पास
بِٱلْحَقِّ
हक़ को
أَمْ
या
أَنتَ
तू
مِنَ
(are) of
ٱللَّـٰعِبِينَ
दिल्लगी करने वालों में से है
उन्होंने कहा, "क्या तू हमारे पास सत्य लेकर आया है या यूँ ही खेल कर रहा है?"
तफ़्सीर:
उनकी जाति के लोगों ने उनसे कहा : आपने जो यह बात कही है, गंभीरता से कही है या आप मज़ाक़ कर रहे हैं?
आयत 56
قَالَ بَل رَّبُّكُمْ رَبُّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ٱلَّذِى فَطَرَهُنَّ وَأَنَا۠ عَلَىٰ ذَٰلِكُم مِّنَ ٱلشَّـٰهِدِينَ
قَالَ
कहा
بَل
बल्कि
رَّبُّكُمْ
रब तुम्हारा
رَبُّ
रब है
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन का
ٱلَّذِى
जिसने
فَطَرَهُنَّ
पैदा किया है उन्हें
وَأَنَا۠
और मैं
عَلَىٰ
ऊपर
ذَٰلِكُم
इसके
مِّنَ
of
ٱلشَّـٰهِدِينَ
गवाहों में से हूँ
उसने कहा, "नहीं, बल्कि बात यह है कि तुम्हारा रब आकाशों और धरती का रब है, जिसने उनको पैदा किया है और मैं इसपर तुम्हारे सामने गवाही देता हूँ
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम ने कहा : यह मज़ाक़ नहीं है, बल्कि मैंने गंभीरता से यह बात कही है। क्योंकि तुम्हारा रब वह है, जो आकाशों और धरती का रब है, जिसने उन्हें भूतपूर्व नमूने के बिना पैदा किया है। तथा मैं इस बात का गवाह हूँ कि वही तुम्हारा रब और आकाशों तथा धरती का रब है, और तुम्हारी मूर्तियों का इसमें कोई हिस्सा नहीं है।
आयत 57
وَتَٱللَّهِ لَأَكِيدَنَّ أَصْنَـٰمَكُم بَعْدَ أَن تُوَلُّوا۟ مُدْبِرِينَ
وَتَٱللَّهِ
और क़सम अल्लाह की
لَأَكِيدَنَّ
अलबत्ता मैं ज़रूर चाल चलूँगा
أَصْنَـٰمَكُم
तुम्हारे बुतों से
بَعْدَ
इसके बाद
أَن
कि
تُوَلُّوا۟
तुम चले जाओगे
مُدْبِرِينَ
पीठ फेर कर
और अल्लाह की क़सम! इसके पश्चात कि तुम पीठ फेरकर लौटो, मैं तुम्हारी मूर्तियों के साथ अवश्य् एक चाल चलूँगा।"
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम ने इस तरह से कहा कि उनकी जाति के लोग उसे न सुनें : अल्लाह की क़सम! मैं अवश्य ही तुम्हारी मूर्तियों के प्रति ऐसा उपाय करूँगा, जो तुम नापसंद करोगे, इसके बाद कि तुम उन्हें छोड़कर अपने उत्सव में चले जाओगे।
आयत 58
فَجَعَلَهُمْ جُذَٰذًا إِلَّا كَبِيرًۭا لَّهُمْ لَعَلَّهُمْ إِلَيْهِ يَرْجِعُونَ
فَجَعَلَهُمْ
तो उसने कर दिया उन्हें
جُذَٰذًا
टुकड़े-टुकड़े
إِلَّا
सिवाए
كَبِيرًۭا
एक बड़े के
لَّهُمْ
उनके
لَعَلَّهُمْ
शायद की वो
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
يَرْجِعُونَ
वो रुजूअ करें
अतएव उसने उन्हें खंड-खंड कर दिया सिवाय उनकी एक बड़ी के, कदाचित वे उसकी ओर रुजू करें
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम ने उनकी मूर्तियों को तोड़कर उनके छोटे-छोटे टुकड़े कर दिए। और उनमें से सबसे बड़े को रहने दिया, ताकि वे उससे यह पूछने के लिए लौटें कि उन्हें किसने तोड़ा।
आयत 59
قَالُوا۟ مَن فَعَلَ هَـٰذَا بِـَٔالِهَتِنَآ إِنَّهُۥ لَمِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
مَن
किस ने
فَعَلَ
किया है
هَـٰذَا
ये
بِـَٔالِهَتِنَآ
साथ हमारे इलाहों के
إِنَّهُۥ
यक़ीनन वो
لَمِنَ
(is) of
ٱلظَّـٰلِمِينَ
अलबत्ता ज़ालिमों में से है
वे कहने लगे, "किसने हमारे देवताओं के साथ यह हरकत की है? निश्चय ही वह कोई ज़ालिम है।"
तफ़्सीर:
जब वे वापस आए और देखा कि उनकी मूर्तियों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए हैं, तो उन्होंने एक-दूसरे से पूछा : हमारे पूज्यों को किसने तोड़ डाला? निःसंदेह जिसने उन्हें तोड़ा है, वह निश्चय ज़ालिमों में से है। क्योंकि उसने उसका तिरस्कार किया जो सम्मान और पवित्रीकरण के योग्य है।
आयत 60
قَالُوا۟ سَمِعْنَا فَتًۭى يَذْكُرُهُمْ يُقَالُ لَهُۥٓ إِبْرَٰهِيمُ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
سَمِعْنَا
सुना हमने
فَتًۭى
एक नौजवान को
يَذْكُرُهُمْ
वो ज़िक्र करता था उनका
يُقَالُ
कहा जाता है
لَهُۥٓ
उसे
إِبْرَٰهِيمُ
इब्राहीम
(कुछ लोग) बोले, "हमने एक नवयुवक को, जिसे इबराहीम कहते है, उसके विषय में कुछ कहते सुना है।"
तफ़्सीर:
उनमें से किसी ने कहा : हमने एक नवयुवक को सुना है, जो इनकी बुराई कर रहा था, उसे इबराहीम कहा जाता है। शायद उसी ने इनके टुकड़े-टुकड़े किए हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बुत तोड़ने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि हक बात कहने में जान का खतरा हो तब भी सच्चाई पर कायम रहना चाहिए।
आयत 61
قَالُوا۟ فَأْتُوا۟ بِهِۦ عَلَىٰٓ أَعْيُنِ ٱلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَشْهَدُونَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
فَأْتُوا۟
पस लाओ
بِهِۦ
उसे
عَلَىٰٓ
before
أَعْيُنِ
आँखों के सामने
ٱلنَّاسِ
लोगों की
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَشْهَدُونَ
वो गवाह हो जाऐं
उन्होंने कहा, "तो उसे ले आओ लोगों की आँखों के सामने कि वे भी गवाह रहें।"
तफ़्सीर:
उनके सरदारों ने कहा : इबराहीम को लोगों की दृष्टि के सामने लाओ, ताकि वे उसके अपने किए का इक़रार करने पर गवाह हो जाएँ। फिर उसका इक़रार तुम्हारे लिए उसके ख़िलाफ़ सबूत बन जाए।
आयत 62
قَالُوٓا۟ ءَأَنتَ فَعَلْتَ هَـٰذَا بِـَٔالِهَتِنَا يَـٰٓإِبْرَٰهِيمُ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
ءَأَنتَ
क्या तुम
فَعَلْتَ
किया तुमने
هَـٰذَا
ये
بِـَٔالِهَتِنَا
साथ हमारे इलाहों के
يَـٰٓإِبْرَٰهِيمُ
ऐ इब्राहीम
उन्होंने कहा, "क्या तूने हमारे देवों के साथ यह हरकत की है, ऐ इबराहीम!"
तफ़्सीर:
अतः उन्होंने इबराहीम अलैहिस्सलाम को हाज़िर किया और उनसे पूछा : ऐ इबराहीम! क्या तूने ही हमारी मूर्तियों के साथ यह घिनौना काम किया है?!
आयत 63
قَالَ بَلْ فَعَلَهُۥ كَبِيرُهُمْ هَـٰذَا فَسْـَٔلُوهُمْ إِن كَانُوا۟ يَنطِقُونَ
قَالَ
उसने कहा
بَلْ
बल्कि
فَعَلَهُۥ
किया है उसे
كَبِيرُهُمْ
उनके बड़े
هَـٰذَا
उसने
فَسْـَٔلُوهُمْ
पस पूछो उनसे
إِن
अगर
كَانُوا۟
हैं वो
يَنطِقُونَ
वो बोलते
उसने कहा, "नहीं, बल्कि उनके इस बड़े ने की होगी, उन्हीं से पूछ लो, यदि वे बोलते हों।"
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम ने (उनका मज़ाक़ उड़ाते हुए, लोगों की दृष्टि के सामने उनकी मूर्तियों की विवशता उजागर करते हुए) कहा : मैंने ऐसा नहीं किया, बल्कि यह काम सबसे बड़ी मूर्ति का है। इसलिए अपनी मूर्तियों से पूछ लो, यदि वे बोलती हैं।
आयत 64
فَرَجَعُوٓا۟ إِلَىٰٓ أَنفُسِهِمْ فَقَالُوٓا۟ إِنَّكُمْ أَنتُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ
فَرَجَعُوٓا۟
तो वो पलटे
إِلَىٰٓ
to
أَنفُسِهِمْ
तरफ़ अपने दिलों के
فَقَالُوٓا۟
तो उन्होंने कहा
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
أَنتُمُ
तुम ही
ٱلظَّـٰلِمُونَ
ज़ालिम हो
तब वे उसकी ओर पलटे और कहने लगे, "वास्तव में, ज़ालिम तो तुम्हीं लोग हो।"
तफ़्सीर:
उन्होंने अपने मन में विचार और चिंतन किया, तो उनके लिए यह स्पष्ट हो गया कि उनकी मूर्तियाँ लाभ या हानि पहुँचाने की मालिक नहीं हैं। इसलिए वे अल्लाह को छोड़कर उनकी पूजा करने के कारण खुद ही ज़ालिम हैं।
आयत 65
ثُمَّ نُكِسُوا۟ عَلَىٰ رُءُوسِهِمْ لَقَدْ عَلِمْتَ مَا هَـٰٓؤُلَآءِ يَنطِقُونَ
ثُمَّ
फिर
نُكِسُوا۟
वो औंधे कर दिए गए
عَلَىٰ
on
رُءُوسِهِمْ
अपने सरों पर
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
عَلِمْتَ
जानता है तू
مَا
नहीं
هَـٰٓؤُلَآءِ
हैं ये
يَنطِقُونَ
बोलते
किन्तु फिर वे बिल्कुल औंधे हो रहे। (फिर बोले,) "तुझे तो मालूम है कि ये बोलते नहीं।"
तफ़्सीर:
फिर वे अपने हठ और इनकार पर लौट आए और बोले : (ऐ इबराहीम!) तुम अच्छी तरह जानते हो कि ये मूर्तियाँ बोलती नहीं हैं, तो तुम हमें उनसे पूछने का आदेश कैसे देते हो? यह बात उन्होंने अपने लिए एक तर्क के रूप में कही, लेकिन यह खुद उनके खिलाफ़ तर्क बन गई।
आयत 66
قَالَ أَفَتَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَنفَعُكُمْ شَيْـًۭٔا وَلَا يَضُرُّكُمْ
قَالَ
उसने कहा
أَفَتَعْبُدُونَ
क्या भला तुम इबादत करते हो
مِن
besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مَا
उनकी जो
لَا
(does) not
يَنفَعُكُمْ
नहीं वो नफ़ा देते तुम्हें
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
وَلَا
और ना
يَضُرُّكُمْ
वो नुक़्सान दे सकते हैं तुम्हें
उसने कहा, "फिर क्या तुम अल्लाह से इतर उसे पूजते हो, जो न तुम्हें कुछ लाभ पहुँचा सके और न तुम्हें कोई हानि पहुँचा सके?
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम ने (उनका खंडन करते हुए) कहा : क्या तुम अल्लाह को छोड़कर ऐसी मूर्तियों की पूजा करते हो, जो न तुम्हें कुछ लाभ पहुँचाती हैं, और न तुम्हें हानि पहुँचाती है। बल्कि वे खुद से हानि को टालने या अपने आपको लाभ पहुँचाने में असमर्थ हैं।
आयत 67
أُفٍّۢ لَّكُمْ وَلِمَا تَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ ۖ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
أُفٍّۢ
उफ़ है
لَّكُمْ
तुम पर
وَلِمَا
और जिनकी
تَعْبُدُونَ
तुम इबादत करते हो
مِن
besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के
أَفَلَا
क्या भला नहीं
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल से काम लेते
धिक्कार है तुमपर, और उनपर भी, जिनको तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो! तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?"
तफ़्सीर:
तुम्हारा बुरा हो, और उन मूर्तियों का भी बुरा हो, जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पूजने में लगे हो, जो न लाभ पहुँचाती हैं न हानि। क्या तुम यह बात नहीं समझते, कि उनकी पूजा छोड़ दो।
आयत 68
قَالُوا۟ حَرِّقُوهُ وَٱنصُرُوٓا۟ ءَالِهَتَكُمْ إِن كُنتُمْ فَـٰعِلِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
حَرِّقُوهُ
जला डालो इसे
وَٱنصُرُوٓا۟
और मदद करो
ءَالِهَتَكُمْ
अपने इलाहों की
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
فَـٰعِلِينَ
करने वाले
उन्होंने कहा, "जला दो उसे, और सहायक हो अपने देवताओं के, यदि तुम्हें कुछ करना है।"
तफ़्सीर:
जब वे तर्क द्वारा उनका सामना करने में असमर्थ रहे, तो उन्होंने बल का सहारा लिया और बोले : अपनी उन मूर्तियों का समर्थन करते हुए, इबराहीम को आग से जला दो, जिन्हें इसने तोड़कर नष्ट कर दिया, यदि तुम इसे एक निवारक सज़ा देना चाहते हो।
आयत 69
قُلْنَا يَـٰنَارُ كُونِى بَرْدًۭا وَسَلَـٰمًا عَلَىٰٓ إِبْرَٰهِيمَ
قُلْنَا
कहा हमने
يَـٰنَارُ
ऐ आग
كُونِى
हो जा
بَرْدًۭا
ठंडी
وَسَلَـٰمًا
और सलामती( वाली)
عَلَىٰٓ
for
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम पर
हमने कहा, "ऐ आग! ठंड़ी हो जा और सलामती बन जा इबराहीम पर!"
तफ़्सीर:
उन्होंने एक आग जलाई और इबराहीम अलैहिस्सलाम को उसमें फेंक दिया, तो हमने कहा : ऐ आग! इबराहीम पर ठंडक और सुरक्षा बन जा। चुनाँचे वह ऐसी हो गई। इसलिए उन्हें कोई कष्ट नहीं पहुँचा।
आयत 70
وَأَرَادُوا۟ بِهِۦ كَيْدًۭا فَجَعَلْنَـٰهُمُ ٱلْأَخْسَرِينَ
وَأَرَادُوا۟
और उन्होंने इरादा किया
بِهِۦ
साथ उसके
كَيْدًۭا
चाल चलने का
فَجَعَلْنَـٰهُمُ
तो बना दिया हमने उन्हें
ٱلْأَخْسَرِينَ
सब से ज़्यादा ख़सारा पाने वाला
उन्होंने उसके साथ एक चाल चलनी चाही, किन्तु हमने उन्हीं को घाटे में डाल दिया
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम की जाति के लोगों ने उनके साथ यह चाल चलनी चाही कि उन्हें जला दें, तो हमने उनकी चाल को निरस्त कर दिया और उन्हीं को विनष्ट एवं पराजित होने वाले कर दिया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इब्राहीम अलैहिस्सलाम को आग में डाले जाने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह अपने सच्चे बंदों की मदद ऐसे तरीकों से करता है जिनका इंसान तसव्वुर भी नहीं कर सकता।
आयत 71
وَنَجَّيْنَـٰهُ وَلُوطًا إِلَى ٱلْأَرْضِ ٱلَّتِى بَـٰرَكْنَا فِيهَا لِلْعَـٰلَمِينَ
وَنَجَّيْنَـٰهُ
और निजात दी हमने उसे
وَلُوطًا
और लूत को
إِلَى
to
ٱلْأَرْضِ
तरफ़ उस ज़मीन के
ٱلَّتِى
वो जो
بَـٰرَكْنَا
बरकत रखी हमने
فِيهَا
उसमें
لِلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों के लिए
और हम उसे और लूत को बचाकर उस भूभाग की ओर निकाल ले गए, जिसमें हमने दुनियावालों के लिए बरकतें रखी थीं
तफ़्सीर:
और हमने उन्हें और लूत को बचा लिया और दोनों को निकालकर शाम (लेवंत) की भूमि पर ले गए, जिसमें हमने बरकत रखी। क्योंकि हमने उसमें नबियों को भेजे और लोगों के लिए उसमें भलाइयाँ रख दीं।
आयत 72
وَوَهَبْنَا لَهُۥٓ إِسْحَـٰقَ وَيَعْقُوبَ نَافِلَةًۭ ۖ وَكُلًّۭا جَعَلْنَا صَـٰلِحِينَ
وَوَهَبْنَا
और अता किया हमने
لَهُۥٓ
उसे
إِسْحَـٰقَ
इस्हाक़
وَيَعْقُوبَ
और याक़ूब
نَافِلَةًۭ ۖ
मज़ीद
وَكُلًّۭا
और सब को
جَعَلْنَا
बनाया हमने
صَـٰلِحِينَ
सालेह/नेक
और हमने उसे इसहाक़ प्रदान किया और तदधिक याक़ूब भी। और प्रत्येक को हमने नेक बनाया
तफ़्सीर:
हमने उन्हें इसहाक़ प्रदान किया, जब उन्होंने अपने रब से एक पुत्र देने के लिए दुआ की, तथा हमने उन्हें एक अतिरिक्त याक़ूब भी प्रदान किया। इबराहीम और उनके बेटे इसहाक़ और (पोते) याक़ूब में से हर एक को हमने नेक और अल्लाह का आज्ञाकारी बनाया।
आयत 73
وَجَعَلْنَـٰهُمْ أَئِمَّةًۭ يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا وَأَوْحَيْنَآ إِلَيْهِمْ فِعْلَ ٱلْخَيْرَٰتِ وَإِقَامَ ٱلصَّلَوٰةِ وَإِيتَآءَ ٱلزَّكَوٰةِ ۖ وَكَانُوا۟ لَنَا عَـٰبِدِينَ
وَجَعَلْنَـٰهُمْ
और बनाया हमने उन्हें
أَئِمَّةًۭ
इमाम
يَهْدُونَ
वो रहनुमाई करते थे
بِأَمْرِنَا
हमारे हुक्म से
وَأَوْحَيْنَآ
और वही की हमने
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
فِعْلَ
करने को
ٱلْخَيْرَٰتِ
भलाइयाँ
وَإِقَامَ
और क़ायम करना
ٱلصَّلَوٰةِ
नमाज़ का
وَإِيتَآءَ
और अदा करना
ٱلزَّكَوٰةِ ۖ
ज़कात का
وَكَانُوا۟
और थे वो
لَنَا
हमारे लिए
عَـٰبِدِينَ
इबादत गुज़ार
और हमने उन्हें नायक बनाया कि वे हमारे आदेश से मार्ग दिखाते थे और हमने उनकी ओर नेक कामों के करने और नमाज़ की पाबन्दी करने और ज़कात देने की प्रकाशना की, और वे हमारी बन्दगी में लगे हुए थे
तफ़्सीर:
और हमने उन्हें पेशवा बनाया, जिनसे लोग भलाई में मार्गदर्शन प्राप्त करते थे। वे अल्लाह की अनुमति से लोगों को अकेले अल्लाह की इबादत की ओर बुलाते थे। तथा हमने उनकी ओर वह़्य भेजी कि अच्छे कार्य करो, संपूर्ण तरीक़े से नमाज़ अदा करो और ज़कात दो। और वे हमारे आज्ञाकारी थे।
आयत 74
وَلُوطًا ءَاتَيْنَـٰهُ حُكْمًۭا وَعِلْمًۭا وَنَجَّيْنَـٰهُ مِنَ ٱلْقَرْيَةِ ٱلَّتِى كَانَت تَّعْمَلُ ٱلْخَبَـٰٓئِثَ ۗ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَوْمَ سَوْءٍۢ فَـٰسِقِينَ
وَلُوطًا
और लूत
ءَاتَيْنَـٰهُ
अता किया हमने उसे
حُكْمًۭا
हुक्म
وَعِلْمًۭا
और इल्म
وَنَجَّيْنَـٰهُ
और निजात दी हमने
مِنَ
from
ٱلْقَرْيَةِ
उस बस्ती से
ٱلَّتِى
वो जो
كَانَت
थी
تَّعْمَلُ
वो करती
ٱلْخَبَـٰٓئِثَ ۗ
ख़बीस काम
إِنَّهُمْ
यक़ीनन वो
كَانُوا۟
थे वो
قَوْمَ
लोग
سَوْءٍۢ
बुरे
فَـٰسِقِينَ
फ़ासिक़
और रहा लूत तो उसे हमने निर्णय-शक्ति और ज्ञान प्रदान किया और उसे उस बस्ती से छुटकारा दिया जो गन्दे कर्म करती थी। वास्तव में वह बहुत ही बुरी और अवज्ञाकारी क़ौम थी
तफ़्सीर:
और लूत को हमने विरोधियों के बीच निर्णय करने की क्षमता प्रदान की और उन्हें उनके धर्म का ज्ञान दिया, तथा उन्हें उस यातना से बचा लिया, जिसे हमने उनकी बस्ती (सदूम) पर उतारी थी, जिसके लोग अनैतिक कार्य करते थे। निश्चय वे भ्रष्ट लोग थे, जो अपने रब के आज्ञापालन से निकलने वाले थे।
आयत 75
وَأَدْخَلْنَـٰهُ فِى رَحْمَتِنَآ ۖ إِنَّهُۥ مِنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ
وَأَدْخَلْنَـٰهُ
और दाख़िल किया हमने उसे
فِى
into
رَحْمَتِنَآ ۖ
अपनी रहमत में
إِنَّهُۥ
यक़ीनन वो
مِنَ
(was) of
ٱلصَّـٰلِحِينَ
नेक लोगों में से था
और उसको हमने अपनी दयालुता में प्रवेश कराया। निस्संदेह वह अच्छे लोगों में से था
तफ़्सीर:
और हमने उन्हें उनकी जाति पर उतरने वाली यातना से बचाकर, अपनी दया में दाखिल कर लिया। वह उन नेक लोगों में से थे, जो हमारे आदेश का पालन करते हैं और हमारे निषेधों से बचते हैं।
आयत 76
وَنُوحًا إِذْ نَادَىٰ مِن قَبْلُ فَٱسْتَجَبْنَا لَهُۥ فَنَجَّيْنَـٰهُ وَأَهْلَهُۥ مِنَ ٱلْكَرْبِ ٱلْعَظِيمِ
وَنُوحًا
और नूह
إِذْ
जब
نَادَىٰ
उसने पुकारा
مِن
before
قَبْلُ
इससे पहले
فَٱسْتَجَبْنَا
तो दुआ क़ुबूल कर ली हमने
لَهُۥ
उसकी
فَنَجَّيْنَـٰهُ
तो निजात दी हमने उसे
وَأَهْلَهُۥ
और उसके घर वालों को
مِنَ
from
ٱلْكَرْبِ
कर्ब/दुख से
ٱلْعَظِيمِ
बहुत बड़े
और नूह की भी चर्चा करो, जबकि उसने इससे पहले हमें पुकारा था, तो हमने उसकी सुन ली और हमने उसे और उसके लोगों को बड़े क्लेश से छुटकारा दिया
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) नूह़ अलैहिस्सलाम की कहानी को याद करो, जब उन्होंने इबराहीम और लूत अलैहिमस्सलाम से पहले अल्लाह को पुकारा, तो हमने उनकी पुकार का जवाब देते हुए उनकी माँग पूरी कर दी। फिर हमने उन्हें और उनके ईमान वाले परिजनों को बड़े दुःख से बचा लिया।
आयत 77
وَنَصَرْنَـٰهُ مِنَ ٱلْقَوْمِ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَآ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَوْمَ سَوْءٍۢ فَأَغْرَقْنَـٰهُمْ أَجْمَعِينَ
وَنَصَرْنَـٰهُ
और मदद की हमने उसकी
مِنَ
from
ٱلْقَوْمِ
उन लोगों के मुक़ाबले में
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَآ ۚ
हमारी आयात को
إِنَّهُمْ
बेशक वो
كَانُوا۟
थे वो
قَوْمَ
लोग
سَوْءٍۢ
बुरे
فَأَغْرَقْنَـٰهُمْ
तो ग़र्क़ कर दिया हमने उनको
أَجْمَعِينَ
सब के सब को
औऱ उस क़ौम के मुक़ाबले में जिसने हमारी आयतों को झुठला दिया था, हमने उसकी सहायता की। वास्तव में वे बुरे लोग थे। अतः हमने उन सबको डूबो दिया
तफ़्सीर:
और हमने उन्हें उस जाति की चाल से बचाया, जिन्होंने रसूल की सच्चाई को दर्शाने वाली उन निशानियों को झुठलाया, जिनके द्वारा हमने उनका समर्थन किया था। निश्चय वे बिगाड़ और बुराई वाले लोग थे। तो हमने उन सभी को डुबो कर नष्ट कर दिया।
आयत 78
وَدَاوُۥدَ وَسُلَيْمَـٰنَ إِذْ يَحْكُمَانِ فِى ٱلْحَرْثِ إِذْ نَفَشَتْ فِيهِ غَنَمُ ٱلْقَوْمِ وَكُنَّا لِحُكْمِهِمْ شَـٰهِدِينَ
وَدَاوُۥدَ
और दाऊद
وَسُلَيْمَـٰنَ
और सुलैमान
إِذْ
जब
يَحْكُمَانِ
वो दोनों फ़ैसला कर रहे थे
فِى
concerning
ٱلْحَرْثِ
खेत के मामले में
إِذْ
जब
نَفَشَتْ
रात को चर लिया था
فِيهِ
उसमें
غَنَمُ
बकरियों ने
ٱلْقَوْمِ
क़ौम की
وَكُنَّا
और थे हम
لِحُكْمِهِمْ
उनके फ़ैसले को
شَـٰهِدِينَ
देखने वाले
औऱ दाऊद और सुलैमान पर भी हमने कृपा-स्पष्ट की। याद करो जबकि वे दोनों खेती के एक झगड़े का निबटारा कर रहे थे, जब रात को कुछ लोगों की बकरियाँ उसे रौंद गई थीं। और उनका (क़ौम के लोगों का) फ़ैसला हमारे सामने था
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) दाऊद और उनके बेटे सुलैमान अलैहिमस्सलाम की कहानी को याद करें, जब दोनों, दो झगड़ने वालों के मामले में फ़ैसला कर रहे थे, जो उनके पास आए थे। मामला यह था एक व्यक्ति की बकरियों ने रात को दूसरे व्यक्ति के खेत में घुसकर नुक़सान कर दिया था। और हम दाऊद और सुलैमान के फ़ैसले को देख रहे थे। उनके फैसले से कुछ भी हमारी निगाहों से ओझल नहीं था।
आयत 79
فَفَهَّمْنَـٰهَا سُلَيْمَـٰنَ ۚ وَكُلًّا ءَاتَيْنَا حُكْمًۭا وَعِلْمًۭا ۚ وَسَخَّرْنَا مَعَ دَاوُۥدَ ٱلْجِبَالَ يُسَبِّحْنَ وَٱلطَّيْرَ ۚ وَكُنَّا فَـٰعِلِينَ
فَفَهَّمْنَـٰهَا
पस समझा दिया हमने ये(फ़ैसला)
سُلَيْمَـٰنَ ۚ
सुलैमान को
وَكُلًّا
और हर एक को
ءَاتَيْنَا
दिया हमने
حُكْمًۭا
हुक्म
وَعِلْمًۭا ۚ
और इल्म
وَسَخَّرْنَا
और मुसख़्ख़र किए हमने
مَعَ
साथ
دَاوُۥدَ
दाऊद के
ٱلْجِبَالَ
पहाड़
يُسَبِّحْنَ
वो तस्बीह करते थे
وَٱلطَّيْرَ ۚ
और परिन्दे ( भी )
وَكُنَّا
और थे हम ही
فَـٰعِلِينَ
करने वाले
तब हमने उसे सुलैमान को समझा दिया और यूँ तो हरेक को हमने निर्णय-शक्ति और ज्ञान प्रदान किया था। और दाऊद के साथ हमने पहाड़ों को वशीभूत कर दिया था, जो तसबीह करते थे, और पक्षियों को भी। और ऐसा करनेवाले हम भी थे
तफ़्सीर:
तो हमने दाऊद के बजाय, उनके बेटे सुलैमान को इस मामले का सही निर्णय सुझा दिया। जबकि दाऊद और सुलैमान में से हर एक को हमने नुबुव्वत और शरीयत के अहकाम का ज्ञान दिया था। ऐसा नहीं था कि ये चीज़ें केवल सुलैमान को प्रदान की गई हों। और हमने पहाड़ों को दाऊद के अधीन कर दिया था, जो उनके साथ अल्लाह की पवित्रता बयान करते थे। और पक्षियों को भी उनके अधीन कर दिया था। और ये मामले की समझ, हुक्म और ज्ञान प्रदान करने वाले तथा वस्तुओं को उनके अधीन करने वाले हम ही थे।
आयत 80
وَعَلَّمْنَـٰهُ صَنْعَةَ لَبُوسٍۢ لَّكُمْ لِتُحْصِنَكُم مِّنۢ بَأْسِكُمْ ۖ فَهَلْ أَنتُمْ شَـٰكِرُونَ
وَعَلَّمْنَـٰهُ
और सिखाया हमने उसे
صَنْعَةَ
बनाना
لَبُوسٍۢ
लिबास का
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
لِتُحْصِنَكُم
ताकि वो बचाए तुम्हें
مِّنۢ
from
بَأْسِكُمْ ۖ
तुम्हारी जंग से
فَهَلْ
तो क्या
أَنتُمْ
तुम
شَـٰكِرُونَ
शुक्र गुज़ार हो
और हमने उसे तुम्हारे लिए एक परिधान (बनाने) की शिल्प-कला भी सिखाई थी, ताकि युद्ध में वह तुम्हारी रक्षा करे। फिर क्या तुम आभार मानते हो?
तफ़्सीर:
और हमने सुलैमान के बिना, दाऊद को कवच बनाने का हुनर सिखाया, ताकि वह हथियारों के तुम्हारे शरीर को आघात पहुँचाने से तुम्हारी रक्षा करें। तो क्या (ऐ लोगो!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की इस नेमत का शुक्रिया अदा करने वाले हो?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
लूत, नूह, दाऊद-सुलेमान अलैहिस्सलाम के इंसाफ का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि इल्म और हिकमत अल्लाह की खास नेमत है, जिसे इंसाफ के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।
आयत 81
وَلِسُلَيْمَـٰنَ ٱلرِّيحَ عَاصِفَةًۭ تَجْرِى بِأَمْرِهِۦٓ إِلَى ٱلْأَرْضِ ٱلَّتِى بَـٰرَكْنَا فِيهَا ۚ وَكُنَّا بِكُلِّ شَىْءٍ عَـٰلِمِينَ
وَلِسُلَيْمَـٰنَ
और सुलैमान के लिए
ٱلرِّيحَ
हवा (मुसख़्ख़र की)
عَاصِفَةًۭ
तुंदो तेज़ चलने वाली
تَجْرِى
वो चलती थी
بِأَمْرِهِۦٓ
उसके हुक्म से
إِلَى
to
ٱلْأَرْضِ
तरफ़ उस ज़मीन के
ٱلَّتِى
वो जो
بَـٰرَكْنَا
बरकत रखी हमने
فِيهَا ۚ
जिस में
وَكُنَّا
और थे हम
بِكُلِّ
of every
شَىْءٍ
हर चीज़ को
عَـٰلِمِينَ
जानने वाले
और सुलैमान के लिए हमने तेज वायु को वशीभूत कर दिया था, जो उसके आदेश से उस भूभाग की ओर चलती थी जिसे हमने बरकत दी थी। हम तो हर चीज़ का ज्ञान रखते है
तफ़्सीर:
और हमने तेज़ बहने वाली हवा को सुलैमान के अधीन कर दिया, जो उनके आदेश पर शाम (लेवंत) की भूमि की ओर बहती थी, जिसमें हमने नबियों को भेजकर और भलाइयाँ फैलाकर बरकतें रखी थीं। और हम हमेशा से हर वस्तु को जानने वाले हैं। उसमें से कोई चीज़ हमसे छिपी नहीं है।
आयत 82
وَمِنَ ٱلشَّيَـٰطِينِ مَن يَغُوصُونَ لَهُۥ وَيَعْمَلُونَ عَمَلًۭا دُونَ ذَٰلِكَ ۖ وَكُنَّا لَهُمْ حَـٰفِظِينَ
وَمِنَ
And of
ٱلشَّيَـٰطِينِ
और कुछ शयातीन
مَن
जो
يَغُوصُونَ
ग़ोता लगाते थे
لَهُۥ
उसके लिए
وَيَعْمَلُونَ
और वो करते थे
عَمَلًۭا
कुछ काम
دُونَ
अलावा
ذَٰلِكَ ۖ
उसके
وَكُنَّا
और थे हम ही
لَهُمْ
उनकी
حَـٰفِظِينَ
निगरानी करने वाले
और कितने ही शैतानों को भी अधीन किया था, जो उसके लिए गोते लगाते और इसके अतिरिक्त दूसरा काम भी करते थे। और हम ही उनको संभालनेवाले थे
तफ़्सीर:
और हमने शैतानों में से भी कुछ उनके अधीन कर दिए थे, जो उनके लिए समुद्रों में डुबकी लगाकर मोतियाँ और दूसरी चीज़ें निकालते थे और इसके अलावा अन्य कार्य भी करते थे, जैसे घर बनाना। और हम उनकी संख्या और उनके कार्यों को संरक्षित करने वाले थे। उसमें से कोई चीज़ हमसे नहीं छूटती।
आयत 83
۞ وَأَيُّوبَ إِذْ نَادَىٰ رَبَّهُۥٓ أَنِّى مَسَّنِىَ ٱلضُّرُّ وَأَنتَ أَرْحَمُ ٱلرَّٰحِمِينَ
۞ وَأَيُّوبَ
और अय्यूब
إِذْ
जब
نَادَىٰ
पुकारा उसने
رَبَّهُۥٓ
अपने रब को
أَنِّى
कि बेशक मैं
مَسَّنِىَ
पहुँची है मुझे
ٱلضُّرُّ
तक्लीफ़
وَأَنتَ
और तू
أَرْحَمُ
सबसे ज़्यादा रहम वाला है
ٱلرَّٰحِمِينَ
सब रहम करने वालों से
और अय्यूब पर भी दया दर्शाई। याद करो जबकि उसने अपने रब को पुकारा कि "मुझे बहुत तकलीफ़ पहुँची है, और तू सबसे बढ़कर दयावान है।"
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) अय्यूब अलैहिस्सलाम की कहानी को याद करें, जब उन्होंने विपत्ति से ग्रस्त होने पर अपने रब को यह कहते हुए पुकारा : ऐ मेरे रब! मुझे बीमारी लग गई है और घर वाले बिछड़ गए। और तू सभी दया करने वालों में सबसे अधिक दया करने वाला है। अतः मुझसे उस विपत्ति को दूर कर दे, जो मुझे पहुँची है।
आयत 84
فَٱسْتَجَبْنَا لَهُۥ فَكَشَفْنَا مَا بِهِۦ مِن ضُرٍّۢ ۖ وَءَاتَيْنَـٰهُ أَهْلَهُۥ وَمِثْلَهُم مَّعَهُمْ رَحْمَةًۭ مِّنْ عِندِنَا وَذِكْرَىٰ لِلْعَـٰبِدِينَ
فَٱسْتَجَبْنَا
तो दुआ क़ुबूल कर ली हमने
لَهُۥ
उसकी
فَكَشَفْنَا
तो दूर कर दी हमने
مَا
जो कुछ
بِهِۦ
उसे
مِن
of
ضُرٍّۢ ۖ
तक्लीफ़ थी
وَءَاتَيْنَـٰهُ
और दिए हमने उसे
أَهْلَهُۥ
अहल व अयाल उसके
وَمِثْلَهُم
और उनकी मानिन्द
مَّعَهُمْ
साथ उसके
رَحْمَةًۭ
बतौर ए रहमत
مِّنْ
from Ourselves
عِندِنَا
अपने पास से
وَذِكْرَىٰ
और नसीहत
لِلْعَـٰبِدِينَ
इबादत करने वालों के लिए
अतः हमने उसकी सुन ली और जिस तकलीफ़ में वह पड़ा था उसको दूर कर दिया, और हमने उसे उसके परिवार के लोग दिए और उनके साथ उनके जैसे और भी दिए अपने यहाँ दयालुता के रूप में और एक याददिहानी के रूप में बन्दगी करनेवालों के लिए
तफ़्सीर:
तो हमने उनकी दुआ स्वीकार कर ली और उन्हें जो भी कष्ट पहुँचा था, उनसे दूर कर दिया और उन्हें उनके बिछड़े हुए परिजन और बच्चे प्रदान कर दिए और उनके साथ उनके बराबर और भी दिए। यह सब कुछ हमने अपनी ओर से दया के रूप में और हर उस व्यक्ति की याद-दहानी के लिए किया, जो इबादत के साथ अल्लाह का आज्ञापालन करने वाला है, ताकि वह भी अय्यूब अलैहिस्सलाम की तरह सब्र करे।
आयत 85
وَإِسْمَـٰعِيلَ وَإِدْرِيسَ وَذَا ٱلْكِفْلِ ۖ كُلٌّۭ مِّنَ ٱلصَّـٰبِرِينَ
وَإِسْمَـٰعِيلَ
और इस्माइल
وَإِدْرِيسَ
और इदरीस
وَذَا
and Dhul-Kifl
ٱلْكِفْلِ ۖ
और ज़ुल किफ़्ल
كُلٌّۭ
सब
مِّنَ
(were) of
ٱلصَّـٰبِرِينَ
सब्र करने वालों में से थे
और इसमाईल और इदरीस और ज़ुलकिफ़्ल पर भी कृपा-स्पष्ट की। इनमें से प्रत्येक धैर्यवानों में से था
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) इसमाईल, इदरीस और ज़ुल-किफ़्ल अलैहिमुस्सलाम को याद करें। इनमें से हर एक विपत्ति पर और अल्लाह की दी हुई ज़िम्मेवारी को अदा करने पर धैर्य से काम लेने वालों में से था।
आयत 86
وَأَدْخَلْنَـٰهُمْ فِى رَحْمَتِنَآ ۖ إِنَّهُم مِّنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ
وَأَدْخَلْنَـٰهُمْ
और दाख़िल किया हमने उन्हें
فِى
in
رَحْمَتِنَآ ۖ
अपनी रहमत में
إِنَّهُم
यक़ीनन वो
مِّنَ
(were) of
ٱلصَّـٰلِحِينَ
सालेह लोगों में से थे
औऱ उन्हें हमने अपनी दयालुता में प्रवेश कराया। निस्संदेह वे सब अच्छे लोगों में से थे
तफ़्सीर:
हमने उन्हें अपनी दया में दाख़िल कर लिया। चुनाँचे हमने उन्हें नबी बनाए और उन्हें जन्नत में दाखिल किए। वे अल्लाह के उन सदाचारी बंदों में से थे, जिन्होंने अपने पालनहार की आज्ञा का पालन किया और उनके ज़ाहिर-ओ-बातिन (अंदर और बाहर) अच्छे थे।
आयत 87
وَذَا ٱلنُّونِ إِذ ذَّهَبَ مُغَـٰضِبًۭا فَظَنَّ أَن لَّن نَّقْدِرَ عَلَيْهِ فَنَادَىٰ فِى ٱلظُّلُمَـٰتِ أَن لَّآ إِلَـٰهَ إِلَّآ أَنتَ سُبْحَـٰنَكَ إِنِّى كُنتُ مِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَذَا
And Dhun-Nun
ٱلنُّونِ
और मछली वाला
إِذ
जब
ذَّهَبَ
वो चला गया
مُغَـٰضِبًۭا
ग़ज़बनाक हो कर
فَظَنَّ
तो उसने समझ लिया
أَن
कि
لَّن
हरगिज़ नहीं
نَّقْدِرَ
हम क़ादिर होंगे
عَلَيْهِ
उस पर
فَنَادَىٰ
तो उसने पुकारा
فِى
in
ٱلظُّلُمَـٰتِ
अँघेरों में
أَن
कि
لَّآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़ )
إِلَّآ
मगर
أَنتَ
तू ही
سُبْحَـٰنَكَ
पाक है तू
إِنِّى
बेशक मैं
كُنتُ
हूँ मैं
مِنَ
of
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़लिमों में से
और ज़ुन्नून (मछलीवाले) पर भी दया दर्शाई। याद करो जबकि वह अत्यन्त क्रद्ध होकर चल दिया और समझा कि हम उसे तंगी में न डालेंगे। अन्त में उसनें अँधेरों में पुकारा, "तेरे सिवा कोई इष्ट-पूज्य नहीं, महिमावान है तू! निस्संदेह मैं दोषी हूँ।"
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) मछली वाले नबी, यूनुस अलैहिस्सलाम की कहानी याद करें, जब वह अपनी जाति के लोगों की लगातार अवज्ञा के कारण उनसे नाराज़ होकर अपने रब की अनुमति के बिना चले गए। उन्होंने समझा कि हम उनके चले जाने की सज़ा के तौर पर उन्हें तंगी में नहीं डालेंगे। लेकिन जब मछली ने उन्हें निगल लिया, तो वह गंभीर तंगी और क़ैद से पीड़ित हुए। तो उन्होंने मछली के पेट, समुद्र और रात के अंधेरे में, अपने पाप को स्वीकार करते हुए, अल्लाह के सामने तौबा करते हुए दुआ की : तेरे सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं, तू पाक एवं पवित्र है। निश्चय मैं ही अत्याचारियों में से हो गया हूँ।
आयत 88
فَٱسْتَجَبْنَا لَهُۥ وَنَجَّيْنَـٰهُ مِنَ ٱلْغَمِّ ۚ وَكَذَٰلِكَ نُـۨجِى ٱلْمُؤْمِنِينَ
فَٱسْتَجَبْنَا
तो दुआ क़ुबूल कर ली हमने
لَهُۥ
उसकी
وَنَجَّيْنَـٰهُ
और निजात दी हमने उसे
مِنَ
from
ٱلْغَمِّ ۚ
ग़म से
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
نُـۨجِى
हम निजात दिया करते हैं
ٱلْمُؤْمِنِينَ
ईमान वालों को
तब हमने उसकी प्रार्थना स्वीकार की और उसे ग़म से छुटकारा दिया। इसी प्रकार तो हम मोमिनों को छुटकारा दिया करते है
तफ़्सीर:
तो हमने उनकी दुआ स्वीकार कर ली और उन्हें अंधेरों से और मछली के पेट से निकालकर, उस संकट की तीव्रता से मुक्ति प्रदान की। और जिस तरह यूनुस अलैहिस्सलाम को संकट से मुक्ति दी, उसी तरह हम मोमिनों को मुक्ति देते हैं, यदि वे किसी संकट में पड़ जाएँ और अल्लाह से दुआ करें।
आयत 89
وَزَكَرِيَّآ إِذْ نَادَىٰ رَبَّهُۥ رَبِّ لَا تَذَرْنِى فَرْدًۭا وَأَنتَ خَيْرُ ٱلْوَٰرِثِينَ
وَزَكَرِيَّآ
और ज़करिया
إِذْ
जब
نَادَىٰ
उसने पुकारा
رَبَّهُۥ
अपने रब को
رَبِّ
ऐ मेरे रब
لَا
(Do) not
تَذَرْنِى
ना तू छोड़ मुझे
فَرْدًۭا
अकेला
وَأَنتَ
और तू ही
خَيْرُ
बेहतर है
ٱلْوَٰرِثِينَ
सब वारिसों में
और ज़करिया पर भी कृपा की। याद करो जबकि उसने अपने रब को पुकारा, "ऐ मेरे रब! मुझे अकेला न छोड़ यूँ, सबसे अच्छा वारिस तो तू ही है।"
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) ज़करिया अलैहिस्सलाम की कहानी को याद करें, जब उन्होंने अपने पालनहार को यह कहते हुए पुकारा : ऐ मेरे रब! मुझे अकेला न छोड़ कि मेरी कोई औलाद न हो। और तू सबसे बेहतर बाक़ी रहने वाला है। इसलिए मुझे एक बेटा प्रदान कर, जो मेरे बाद बाक़ी रहे।
आयत 90
فَٱسْتَجَبْنَا لَهُۥ وَوَهَبْنَا لَهُۥ يَحْيَىٰ وَأَصْلَحْنَا لَهُۥ زَوْجَهُۥٓ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ يُسَـٰرِعُونَ فِى ٱلْخَيْرَٰتِ وَيَدْعُونَنَا رَغَبًۭا وَرَهَبًۭا ۖ وَكَانُوا۟ لَنَا خَـٰشِعِينَ
فَٱسْتَجَبْنَا
तो दुआ क़ुबूल कर ली हमने
لَهُۥ
उसकी
وَوَهَبْنَا
और अता किया हमने
لَهُۥ
उसे
يَحْيَىٰ
यहया
وَأَصْلَحْنَا
और दुरुस्त कर दी हमने
لَهُۥ
उसके लिए
زَوْجَهُۥٓ ۚ
बीवी उसकी
إِنَّهُمْ
यक़ीनन वो
كَانُوا۟
थे वो
يُسَـٰرِعُونَ
वो जल्दी करते
فِى
in
ٱلْخَيْرَٰتِ
नेकियों में
وَيَدْعُونَنَا
और वो पुकारते थे हमें
رَغَبًۭا
रग़बत
وَرَهَبًۭا ۖ
और ख़ौफ़ से
وَكَانُوا۟
और थे वो
لَنَا
हमारे ही लिए
خَـٰشِعِينَ
ख़ुशूअ करने वाले
अतः हमने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और उसे याह्या् प्रदान किया और उसके लिए उसकी पत्नी को स्वस्थ कर दिया। निश्चय ही वे नेकी के कामों में एक-दूसरे के मुक़ाबले में जल्दी करते थे। और हमें ईप्सा (चाह) और भय के साथ पुकारते थे और हमारे आगे दबे रहते थे
तफ़्सीर:
तो हमने उनकी दुआ स्वीकार कर ली और उन्हें यह़या के रूप में एक बेटा प्रदान किया और उनकी पत्नी को ठीक कर दिया। चुनाँचे वह बच्चा जनने वाली हो गई, जबकि वह पहले बच्चा जनने के योग्य नहीं थी। निश्चय ज़करिया, उनकी पत्नी और उनके बेटे, नेकियाँ करने में बहुत जल्दी करते थे तथा वे हमें हमारे सवाब के लोभ में और हमारी सज़ा से डरते हुए पुकारते थे और हमारे सामने गिड़गिड़ाने वाले थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अय्यूब अलैहिस्सलाम के सब्र और यूनुस अलैहिस्सलाम की दुआ का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि सख्त बीमारी और मुसीबत में भी सब्र के साथ अल्लाह से दुआ मांगते रहना चाहिए।
आयत 91
وَٱلَّتِىٓ أَحْصَنَتْ فَرْجَهَا فَنَفَخْنَا فِيهَا مِن رُّوحِنَا وَجَعَلْنَـٰهَا وَٱبْنَهَآ ءَايَةًۭ لِّلْعَـٰلَمِينَ
وَٱلَّتِىٓ
और उस औरत को
أَحْصَنَتْ
जिसने हिफ़ाज़त की
فَرْجَهَا
अपनी शर्मगाह की
فَنَفَخْنَا
तो फूँक दिया हमने
فِيهَا
उसमें
مِن
of
رُّوحِنَا
अपनी रूह से
وَجَعَلْنَـٰهَا
और बनाया हमने उसे
وَٱبْنَهَآ
और उसके बेटे को
ءَايَةًۭ
एक निशानी
لِّلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों के लिए
और वह नारी जिसने अपने सतीत्व की रक्षा की थी, हमने उसके भीतर अपनी रूह फूँकी और उसे और उसके बेटे को सारे संसार के लिए एक निशानी बना दिया
तफ़्सीर:
तथा (ऐ रसूल!) मरयम अलैहस्सलाम की कहानी को याद करें, जिसने अपने गुप्तांग को व्यभिचार से सुरक्षित रखा, तो अल्लाह ने उनकी ओर जिबरील अलैहिस्सलाम को भेजा, जिन्होंने उनके भीतर फूँक मारी, तो उन्होंने ईसा अलैहिस्सलाम का गर्भ धारण कर लिया। वह और उनके बेटे ईसा अलैहिस्सलाम, लोगों के लिए अल्लाह के सामर्थ्य की निशानी थे, और यह कि उसे कोई भी चीज़ विवश नही कर सकती, क्योंकि उसने उन्हें बिना पिता के पैदा किया था।
आयत 92
إِنَّ هَـٰذِهِۦٓ أُمَّتُكُمْ أُمَّةًۭ وَٰحِدَةًۭ وَأَنَا۠ رَبُّكُمْ فَٱعْبُدُونِ
إِنَّ
यक़ीनन
هَـٰذِهِۦٓ
ये
أُمَّتُكُمْ
उम्मत है तुम्हारी
أُمَّةًۭ
उम्मत
وَٰحِدَةًۭ
एक ही
وَأَنَا۠
और मैं
رَبُّكُمْ
रब हूँ तुम्हारा
فَٱعْبُدُونِ
पस इबादत करो मेरी
"निश्चय ही यह तुम्हारा समुदाय एक ही समुदाय है और मैं तुम्हारा रब हूँ। अतः तुम मेरी बन्दगी करो।"
तफ़्सीर:
(ऐ लोगो!) यह तुम्हारा धर्म एक ही धर्म है। और वह एकेश्वरवाद (तौहीद) है, जो इस्लाम का धर्म है। और मैं तुम्हारा रब हूँ, इसलिए एकमात्र मेरी ही इबादत करो।
आयत 93
وَتَقَطَّعُوٓا۟ أَمْرَهُم بَيْنَهُمْ ۖ كُلٌّ إِلَيْنَا رَٰجِعُونَ
وَتَقَطَّعُوٓا۟
और उन्होंने टुकड़े-टुकड़े कर डाला
أَمْرَهُم
अपने काम (दीन ) को
بَيْنَهُمْ ۖ
आपस में
كُلٌّ
सब के सब
إِلَيْنَا
तरफ़ हमारे
رَٰجِعُونَ
लौटने वाले हैं
किन्तु उन्होंने आपस में अपने मामलों को टुकड़े-टुकड़े कर डाला। - प्रत्येक को हमारी ओर पलटना है। -
तफ़्सीर:
और लोग विभिन्न गुटों में बट गए। चुनाँचे उनमें कोई एकेश्वरवादी तो कोई बहुदेववादी, कोई काफ़िर तो कोई मोमिन हो गया। तथा ये सभी अलग-अलग हो जाने वाले लोग क़ियामत के दिन केवल हमारी ही ओर लौटकर आने वाले हैं। फिर हम उन्हें उनके कर्मों का बदला देंगे।
आयत 94
فَمَن يَعْمَلْ مِنَ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَهُوَ مُؤْمِنٌۭ فَلَا كُفْرَانَ لِسَعْيِهِۦ وَإِنَّا لَهُۥ كَـٰتِبُونَ
فَمَن
तो जो कोई
يَعْمَلْ
अमल करेगा
مِنَ
[of]
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेकियों में से
وَهُوَ
जबकि वो
مُؤْمِنٌۭ
मोमिन हो
فَلَا
तो नहीं
كُفْرَانَ
कोई नाक़दरी
لِسَعْيِهِۦ
उसकी कोशिश की
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَهُۥ
उसके लिए
كَـٰتِبُونَ
लिखने वाले हैं
फिर जो अच्छे कर्म करेगा, शर्त या कि वह मोमिन हो, तो उसके प्रयास की उपेक्षा न होगी। हम तो उसके लिए उसे लिख रहे है
तफ़्सीर:
उनमें से जो व्यक्ति भी नेक अमल करेगा और वह अल्लाह, उसके रसूल और आख़िरत के दिन पर ईमान रखने वाला होगा, तो उसके अच्छे कार्य को नकारा नहीं जाएगा, बल्कि अल्लाह उसका आदर करते हुए उसके प्रतिफल को कई गुना कर देगा, और वह उसे उस दिन अपने कर्म पत्र में लिखा हुआ पाएगा, जिस दिन मरणोपरांत दोबारा जीवित होगा, तो वह उसे देखकर प्रसन्न हो जाएगा।
आयत 95
وَحَرَٰمٌ عَلَىٰ قَرْيَةٍ أَهْلَكْنَـٰهَآ أَنَّهُمْ لَا يَرْجِعُونَ
وَحَرَٰمٌ
और लाज़िम है
عَلَىٰ
upon
قَرْيَةٍ
बस्ती (वालों ) पर
أَهْلَكْنَـٰهَآ
हलाक कर दिया हमने जिसे
أَنَّهُمْ
कि बेशक वो
لَا
not
يَرْجِعُونَ
नहीं वो लौटेंगे
और किसी बस्ती के लिए असम्भव है जिसे हमने विनष्ट कर दिया कि उसके लोग (क़ियामत के दिन दंड पाने हेतु) न लौटें
तफ़्सीर:
जिस बस्ती के लोगों को हम उनके कुफ़्र के कारण नष्ट कर दें, उनके लिए यह असंभव कि वे इस दुनिया में लौटें; ताकि वे तौबा कर लें और उनकी तौबा स्वीकार कर ली जाए।
आयत 96
حَتَّىٰٓ إِذَا فُتِحَتْ يَأْجُوجُ وَمَأْجُوجُ وَهُم مِّن كُلِّ حَدَبٍۢ يَنسِلُونَ
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
فُتِحَتْ
खोले जाऐंगे
يَأْجُوجُ
याजूज
وَمَأْجُوجُ
और माजूज
وَهُم
और वो
مِّن
from
كُلِّ
every
حَدَبٍۢ
हर बुलन्दी से
يَنسِلُونَ
वो तेज़ चल पड़ेंगे
यहाँ तक कि वह समय आ जाए जब याजूज और माजूज खोल दिए जाएँगे। और वे हर ऊँची जगह से निकल पड़ेंगे
तफ़्सीर:
वे दोबारा कभी नहीं लौटेंगे, यहाँ तक कि जब याजूज और माजूज का बाँध खोल दिया जाएगा और वे उस दिन धरती के हर ऊँचे स्थान से तेज़ी से दौड़ते हुए आएँगे।
आयत 97
وَٱقْتَرَبَ ٱلْوَعْدُ ٱلْحَقُّ فَإِذَا هِىَ شَـٰخِصَةٌ أَبْصَـٰرُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ يَـٰوَيْلَنَا قَدْ كُنَّا فِى غَفْلَةٍۢ مِّنْ هَـٰذَا بَلْ كُنَّا ظَـٰلِمِينَ
وَٱقْتَرَبَ
और क़रीब आ जाएगा
ٱلْوَعْدُ
वादा
ٱلْحَقُّ
सच्चा
فَإِذَا
तो अचानक
هِىَ
वो
شَـٰخِصَةٌ
खली की खुली रह जाऐंगी
أَبْصَـٰرُ
आँखें
ٱلَّذِينَ
उनकी जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
يَـٰوَيْلَنَا
हाय अफ़सोस हम पर
قَدْ
तहक़ीक़
كُنَّا
थे हम
فِى
in
غَفْلَةٍۢ
ग़फ़्लत में
مِّنْ
of
هَـٰذَا
इससे
بَلْ
बल्कि
كُنَّا
थे हम ही
ظَـٰلِمِينَ
ज़ालिम
और सच्चा वादा निकट आ लगेगा, तो क्या देखेंगे कि उन लोगों की आँखें फटी की फटी रह गई हैं, जिन्होंने इनकार किया था, "हाय, हमारा दुर्भाग्य! हम इसकी ओर से असावधान रहे, बल्कि हम ही अत्याचारी थे।"
तफ़्सीर:
उनके निकलने से क़ियामत क़रीब आ जाएगी और उसकी भयावहता और कठिनाइयाँ दिखाई देनी लगेंगी, जिनकी सख़्त भयंकरता से काफ़िरों की आँखें खुली रह जाएँगी और वे कहेंगे : हाय हमारा विनाश, हम दुनिया में इस महान दिन की तैयारी से मस्ती और ग़फ़लत में थे। बल्कि हम कुफ़्र एवं अवज्ञा करके स्वयं पर अत्याचार करने वाले थे।
आयत 98
إِنَّكُمْ وَمَا تَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ حَصَبُ جَهَنَّمَ أَنتُمْ لَهَا وَٰرِدُونَ
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
وَمَا
और जिनकी
تَعْبُدُونَ
तुम इबादत करते हो
مِن
besides Allah
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
حَصَبُ
ईंधन होंगे
جَهَنَّمَ
जहन्नम का
أَنتُمْ
तुम
لَهَا
उसी पर
وَٰرِدُونَ
वारिद/दाख़िल होने वाले हो
"निश्चय ही तुम और वह कुछ जिनको तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो सब जहन्नम के ईधन हो। तुम उसके घाट उतरोगे।"
तफ़्सीर:
(ऐ मुश्रिको!) निश्चय तुम और वे मूर्तियाँ, जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो और ऐसे जिन्न तथा इनसान जिनकी तुम पूजा करते हो और वे तुम्हारी इस पूजा से खुश हैं, ये सभी जहन्नम का ईंधन बनेंगे, तुम अपने पूज्यों के साथ उसमें प्रवेश करोगे।
आयत 99
لَوْ كَانَ هَـٰٓؤُلَآءِ ءَالِهَةًۭ مَّا وَرَدُوهَا ۖ وَكُلٌّۭ فِيهَا خَـٰلِدُونَ
لَوْ
अगर
كَانَ
होते
هَـٰٓؤُلَآءِ
ये
ءَالِهَةًۭ
इलाह
مَّا
ना
وَرَدُوهَا ۖ
वो वारिद होते उसमें
وَكُلٌّۭ
और सब के सब
فِيهَا
उसमें
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
यदि वे पूज्य होते, तो उसमें न उतरते। और वे सब उसमें सदैव रहेंगे भी
तफ़्सीर:
यदि उनके ये पूज्य (देवता), वास्तव में पूजे जाने के योग्य होते, तो वे उन लोगों के साथ नरक में प्रवेश नहीं करते, जो उनकी पूजा करते थे। तथा पूजा करने वालों और पूज्यों में से प्रत्येक जहन्नम में जाएँगे, जिनमें वे हमेशा के लिए रहेंगे, कभी भी उससे बाहर नहीं निकलेंगे।
आयत 100
لَهُمْ فِيهَا زَفِيرٌۭ وَهُمْ فِيهَا لَا يَسْمَعُونَ
لَهُمْ
उनके लिए
فِيهَا
उसमें
زَفِيرٌۭ
चिल्लाना होगा
وَهُمْ
और वो
فِيهَا
उसमें
لَا
not
يَسْمَعُونَ
ना वो सुनेंगे
उनके लिए वहाँ शोर गुल होगा और वे वहाँ कुछ भी नहीं सुन सकेंगे
तफ़्सीर:
उसमें (दर्द की तीव्रता से) उनकी साँसे ज़ोर-ज़ोर से निकल रही होंगी, तथा जहन्नम में उन्हें पहुँचने वाली भयानक भयावहता की तीव्रता से वे कोई आवाज़ नहीं सुनेंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
ज़करिया और मरियम अलैहिस्सलाम का मुख्तसर ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि नेक औलाद की दुआ हर हाल में मांगते रहनी चाहिए।
आयत 101
إِنَّ ٱلَّذِينَ سَبَقَتْ لَهُم مِّنَّا ٱلْحُسْنَىٰٓ أُو۟لَـٰٓئِكَ عَنْهَا مُبْعَدُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग
سَبَقَتْ
पहले तय हो गई
لَهُم
उनके लिए
مِّنَّا
हमारी तरफ़ से
ٱلْحُسْنَىٰٓ
भलाई
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
عَنْهَا
उससे
مُبْعَدُونَ
दूर रखे जाने वाले
रहे वे लोग जिनके लिए पहले ही हमारी ओर से अच्छे इनाम का वादा हो चुका है, वे उससे दूर रहेंगे
तफ़्सीर:
जब मुश्रिकों ने कहा : (निश्चय ईसा और वे फ़रिश्ते जिनकी पूजा की गई है, जहन्नम में जाएँगे) तो अल्लाह ने फ़रमाया : निश्चय जिनके बारे में पहले से अल्लाह के ज्ञान में है कि वे सौभाग्यशाली हैं, जैसे ईसा अलैहिस्सलाम, वे जहन्नम से दूर रखे जाएँगे।
आयत 102
لَا يَسْمَعُونَ حَسِيسَهَا ۖ وَهُمْ فِى مَا ٱشْتَهَتْ أَنفُسُهُمْ خَـٰلِدُونَ
لَا
Not
يَسْمَعُونَ
नहीं वो सुनेंगे
حَسِيسَهَا ۖ
उसकी आहट को
وَهُمْ
और वो
فِى
in
مَا
उसमें जो
ٱشْتَهَتْ
ख़्वाहिश करेंगे
أَنفُسُهُمْ
नफ़्स उनके
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
वे उसकी आहट भी नहीं सुनेंगे और अपनी मनचाही चीज़ों के मध्य सदैव रहेंगे
तफ़्सीर:
उनके कानों तक जहन्नम की आवाज़ नहीं पहुँचेगी और वे अपनी मनपसंद नेमतों और सुख-सुविधाओं में हमेशा रहने वाले होंगे। उनकी नेमतें कभी खत्म नहीं होंगी।
आयत 103
لَا يَحْزُنُهُمُ ٱلْفَزَعُ ٱلْأَكْبَرُ وَتَتَلَقَّىٰهُمُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ هَـٰذَا يَوْمُكُمُ ٱلَّذِى كُنتُمْ تُوعَدُونَ
لَا
Not
يَحْزُنُهُمُ
ना ग़मगीन करेगी उन्हें
ٱلْفَزَعُ
घबराहट
ٱلْأَكْبَرُ
बड़ी
وَتَتَلَقَّىٰهُمُ
और इस्तक़बाल करेंगे उनका
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्ते
هَـٰذَا
ये है
يَوْمُكُمُ
दिन तुम्हारा
ٱلَّذِى
वो जो
كُنتُمْ
थे तुम
تُوعَدُونَ
तुम वादा दिए जाते
वह सबसे बड़ी घबराहट उन्हें ग़म में न डालेगी। फ़रिश्ते उनका स्वागत करेगें, "यह तुम्हारा वही दिन है, जिसका तुमसे वादा किया जाता रहा है।"
तफ़्सीर:
उस दिन बड़ी घबराहट उनको भयभीत नहीं करेगी, जब जहन्नम को जहन्नम वासियों समेत बंद कर दिया जाएगा और फ़रिश्ते उनका यह कहकर स्वागत करेंगे : यह है तुम्हारा वह दिन जिसका तुम दुनिया में वादा दिए जाते थे और उसमें मिलने वाली नेमतों की तुम्हें खुशख़बरी दी जाती थी।
आयत 104
يَوْمَ نَطْوِى ٱلسَّمَآءَ كَطَىِّ ٱلسِّجِلِّ لِلْكُتُبِ ۚ كَمَا بَدَأْنَآ أَوَّلَ خَلْقٍۢ نُّعِيدُهُۥ ۚ وَعْدًا عَلَيْنَآ ۚ إِنَّا كُنَّا فَـٰعِلِينَ
يَوْمَ
जिस दिन
نَطْوِى
हम लपेट देंगे
ٱلسَّمَآءَ
आसमान को
كَطَىِّ
मानिन्द लपेटना
ٱلسِّجِلِّ
तूमार के (औराक़ को )
لِلْكُتُبِ ۚ
किताबों के लिए
كَمَا
जैसा कि
بَدَأْنَآ
इब्तिदा की हमने
أَوَّلَ
पहली
خَلْقٍۢ
पैदाइश की
نُّعِيدُهُۥ ۚ
हम एआदा करेंगे उसका
وَعْدًا
वादा है
عَلَيْنَآ ۚ
हमारे ज़िम्मे
إِنَّا
बेशक हम
كُنَّا
हैं हम
فَـٰعِلِينَ
करने वाले
जिस दिन हम आकाश को लपेट लेंगे, जैसे पंजी में पन्ने लपेटे जाते हैं, जिस प्रकाऱ पहले हमने सृष्टि का आरम्भ किया था उसी प्रकार हम उसकी पुनरावृत्ति करेंगे। यह हमारे ज़िम्मे एक वादा है। निश्चय ही हमें यह करना है
तफ़्सीर:
जिस दिन हम आकाश को उसी तरह लपेट देंगे जिस तरह पंजिका के पन्ने पर लिखकर उसे लपेट दिया जाता है, तथा हम लोगों को उसी हाल में जमा करेंगे, जिस हाल में वे पहली बार पैदा किए गए थे। यह हमारा सच्चा वादा है जिसका उल्लंघन नहीं हो सकता। हम जो वादा करते हैं, उसे पूरा करने वाले हैं।
आयत 105
وَلَقَدْ كَتَبْنَا فِى ٱلزَّبُورِ مِنۢ بَعْدِ ٱلذِّكْرِ أَنَّ ٱلْأَرْضَ يَرِثُهَا عِبَادِىَ ٱلصَّـٰلِحُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
كَتَبْنَا
लिख दिया हमने
فِى
in
ٱلزَّبُورِ
ज़बूर में
مِنۢ
after
بَعْدِ
after
ٱلذِّكْرِ
बाद ज़िक्र के
أَنَّ
कि बेशक
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन
يَرِثُهَا
वारिस होंगे उसके
عِبَادِىَ
मेरे बन्दे
ٱلصَّـٰلِحُونَ
जो नेक हैं
और हम ज़बूर में याददिहानी के पश्चात लिए चुके है कि "धरती के वारिस मेरे अच्छे बन्दें होंगे।"
तफ़्सीर:
हमने 'लौह़े मह़फ़ूज़' में लिखने के बाद, उन किताबों में लिख दिया, जिन्हें हमने अपने रसूलों पर उतारा कि धरती के उत्तराधिकारी अल्लाह के सदाचारी और उसका आज्ञापालन करने वाले बंदे ही होंगे। और वे मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उम्मत के लोग हैं।
आयत 106
إِنَّ فِى هَـٰذَا لَبَلَـٰغًۭا لِّقَوْمٍ عَـٰبِدِينَ
إِنَّ
बेशक
فِى
in
هَـٰذَا
उसमें
لَبَلَـٰغًۭا
अलबत्ता एक बड़ी ख़बर है
لِّقَوْمٍ
उस क़ौम के लिए
عَـٰبِدِينَ
जो इबादत गुज़ार है
इसमें बन्दगी करनेवालों लोगों के लिए एक संदेश है
तफ़्सीर:
निःसंदेह हमारी उतारी हुई इस नसीहत में, उन लोगों के लिए लाभ और पर्याप्तता है, जो अपने रब के बताए हुए तरीक़े के अनुसार उसकी इबादत करने वाले हैं। क्योंकि वही लोग हैं जो इससे लाभान्वित होते हैं।
आयत 107
وَمَآ أَرْسَلْنَـٰكَ إِلَّا رَحْمَةًۭ لِّلْعَـٰلَمِينَ
وَمَآ
और नहीं
أَرْسَلْنَـٰكَ
भेजा हमने आपको
إِلَّا
मगर
رَحْمَةًۭ
रहमत बना कर
لِّلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों के लिए
हमने तुम्हें सारे संसार के लिए बस एक सर्वथा दयालुता बनाकर भेजा है
तफ़्सीर:
और (ऐ मुह़म्मद!) हमने आपको समस्त मख़लूक़ के लिए दया बनाकर भेजा है, क्योंकि आप लोगों को सीधा रास्ता दिखाने और उन्हें अल्लाह की यातना से बचाने के लिए बड़े उत्सुक हैं।
आयत 108
قُلْ إِنَّمَا يُوحَىٰٓ إِلَىَّ أَنَّمَآ إِلَـٰهُكُمْ إِلَـٰهٌۭ وَٰحِدٌۭ ۖ فَهَلْ أَنتُم مُّسْلِمُونَ
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّمَا
कि बेशक
يُوحَىٰٓ
वही की जाती है
إِلَىَّ
मेरी तरफ़
أَنَّمَآ
बेशक
إِلَـٰهُكُمْ
इलाह तुम्हारा
إِلَـٰهٌۭ
इलाह है
وَٰحِدٌۭ ۖ
एक ही
فَهَلْ
तो क्या
أَنتُم
तुम
مُّسْلِمُونَ
फ़रमांबरदार हो
कहो, "मेरे पास को बस यह प्रकाशना की जाती है कि तुम्हारा पूज्य-प्रभु अकेला पूज्य-प्रभु है। फिर क्या तुम आज्ञाकारी होते हो?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) मेरी ओर, मेरे पालनहार की तरफ़ से, केवल यही वह़्य की जाती है कि तुम्हारा सच्चा पूज्य केवल एक पूज्य है, जिसका कोई साझी नहीं और वह अल्लाह है। इसलिए उसपर ईमान लाओ और उसकी आज्ञा का पालन करो।
आयत 109
فَإِن تَوَلَّوْا۟ فَقُلْ ءَاذَنتُكُمْ عَلَىٰ سَوَآءٍۢ ۖ وَإِنْ أَدْرِىٓ أَقَرِيبٌ أَم بَعِيدٌۭ مَّا تُوعَدُونَ
فَإِن
फिर अगर
تَوَلَّوْا۟
वो मुँह मोड़ लें
فَقُلْ
तो कह दीजिए
ءَاذَنتُكُمْ
ख़बरदार कर दिया मैं ने तुम्हें
عَلَىٰ
equally
سَوَآءٍۢ ۖ
यक्साँ तौर पर
وَإِنْ
और नहीं
أَدْرِىٓ
मैं जानता
أَقَرِيبٌ
क्या क़रीब है
أَم
या
بَعِيدٌۭ
दूर है
مَّا
जो
تُوعَدُونَ
तुम वादा दिए जाते हो
फिर यदि वे मुँह फेरें तो कह दो, "मैंने तुम्हें सामान्य रूप से सावधान कर दिया है। अब मैं यह नहीं जानता कि जिसका तुमसे वादा किया जा रहा है वह निकट है या दूर।"
तफ़्सीर:
फिर अगर ये लोग उस संदेश से मुँह फेरें जो आप उनके पास लाए हैं, तो (ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : मैंने तुम्हें बता दिया है कि मैं और तुम अलगाव के एक समान मामले पर हैं। और मुझे नहीं पता कि अल्लाह ने अपनी जिस यातना का वादा किया है, वह तुम पर कब आएगी।
आयत 110
إِنَّهُۥ يَعْلَمُ ٱلْجَهْرَ مِنَ ٱلْقَوْلِ وَيَعْلَمُ مَا تَكْتُمُونَ
إِنَّهُۥ
बेशक वो
يَعْلَمُ
वो जानता है
ٱلْجَهْرَ
ज़ाहिर को
مِنَ
[of]
ٱلْقَوْلِ
बात में से
وَيَعْلَمُ
और वो जानता है
مَا
उस को जो
تَكْتُمُونَ
तुम छुपाते हो
निश्चय ही वह ऊँची आवाज़ में कही हुई बात को जानता है और उसे भी जानता है जो तुम छिपाते हो
तफ़्सीर:
निःसंदेह अल्लाह वह बात जानता है जो तुम खुल्लम-खुल्ला कहते हो और उसे भी जानता है जो तुम छिपाते हो। उसमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है और वह तुम्हें उसका बदला देगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन नेक बंदों की सलामती का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि जो अल्लाह की राह पर चलते हैं, कयामत की हौलनाकी भी उन्हें ग़मगीन नहीं करेगी।
आयत 111
وَإِنْ أَدْرِى لَعَلَّهُۥ فِتْنَةٌۭ لَّكُمْ وَمَتَـٰعٌ إِلَىٰ حِينٍۢ
وَإِنْ
और नहीं
أَدْرِى
मैं जानता
لَعَلَّهُۥ
शायद कि वो
فِتْنَةٌۭ
फ़ितना हो
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
وَمَتَـٰعٌ
और फ़ायदा उठाना
إِلَىٰ
for
حِينٍۢ
एक मुद्दत तक
मुझे नहीं मालूम कि कदाचित यह तुम्हारे लिए एक परीक्षा हो और एक नियत समय तक के लिए जीवन-सुख
तफ़्सीर:
मुझे नहीं पता शायद तुम्हें यातना देने में देरी करना, तुम्हारे लिए एक परीक्षा, ढील (प्रलोभन) और अल्लाह के ज्ञान में एक निर्धारित अवधि के लिए आपको लाभ उठाने का अवसर देना हो; ताकि तुम अपने कुफ़्र और गुमराही में अत्यधिक हो जाओ।
आयत 112
قَـٰلَ رَبِّ ٱحْكُم بِٱلْحَقِّ ۗ وَرَبُّنَا ٱلرَّحْمَـٰنُ ٱلْمُسْتَعَانُ عَلَىٰ مَا تَصِفُونَ
قَـٰلَ
कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
ٱحْكُم
फ़ैसला कर दे
بِٱلْحَقِّ ۗ
साथ हक़ के
وَرَبُّنَا
और रब तुम्हारा
ٱلرَّحْمَـٰنُ
रहमान है
ٱلْمُسْتَعَانُ
जिससे मदद तलब की जाती है
عَلَىٰ
उस पर
مَا
जो
تَصِفُونَ
तुम बयान करते हो
उसने कहा, "ऐ मेरे रब, सत्य का फ़ैसला कर दे! और हमारा रब रहमान है। उसी से सहायता की प्रार्थना है, उन बातों के मुक़ाबले में जो तुम लोग बयान करते हो।"
तफ़्सीर:
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने रब से दुआ करते हुए कहा : ऐ मेरे रब! हमारे बीच और हमारे इस कुफ़्र पर क़ायम रहने वाले समुदाय के बीच सच्चे फैसले के साथ निर्णय कर दे। और हम तुम्हारे इनकार और झुठलाने पर अपने अत्यंत दयावान् पालनहार ही की सहायता माँगते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नबी ﷺ को पूरी कायनात के लिए रहमत बताए जाने के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि नबी ﷺ की तालीम पूरी इंसानियत के लिए रहमत है, इसे अपनाना हर इंसान के फायदे में है।
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