नाम का मतलब
ईमान वाले (कामयाब मोमिनों की सिफात के बयान से)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-मुमिनून की शुरुआत कामयाब ईमान वालों की सिफात से होती है, जैसे नमाज़ में खुशूअ, फुज़ूल बातों से बचना, अमानतदारी वगैरह। इसमें इंसान की तख्लीक के मराहिल और कई नबियों के मुख्तसर वाकियात भी हैं।
फ़ज़ीलत / सार
इस सूरह की शुरुआती आयतें कामयाब मोमिन की सबसे जामे तारीफ मानी जाती हैं, जो हर मुसलमान के लिए एक अमली नमूना पेश करती हैं।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ قَدْ أَفْلَحَ ٱلْمُؤْمِنُونَ
قَدْ
यक़ीनन
أَفْلَحَ
फ़लाह पा गए
ٱلْمُؤْمِنُونَ
ईमान लाने वाले
सफल हो गए ईमानवाले,
तफ़्सीर:
अल्लाह पर ईमान लाने वाले और उसकी शरीयत के अनुसार काम करने वाले लोग अपनी अपेक्षित चीज़ को प्राप्त करके और भय वाली चीज़ों से मुक्ति पाकर सफल हो गए।
आयत 2
ٱلَّذِينَ هُمْ فِى صَلَاتِهِمْ خَـٰشِعُونَ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
هُمْ
वो
فِى
during
صَلَاتِهِمْ
अपनी नमाज़ में
خَـٰشِعُونَ
ख़ुशूअ करने वाले
जो अपनी नमाज़ों में विनम्रता अपनाते है;
तफ़्सीर:
जो अपनी नमाज़ में इस तरह विनम्रता अपनाने वाले होते हैं कि उसमें उनके शारीरिक अंग शांत होते हैं और उनके दिल व्यस्त करने वाली चीज़ों से खाली होते हैं।
आयत 3
وَٱلَّذِينَ هُمْ عَنِ ٱللَّغْوِ مُعْرِضُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
هُمْ
वो
عَنِ
from
ٱللَّغْوِ
लग़्व बात से
مُعْرِضُونَ
ऐराज़ करने वाले हैं
और जो व्यर्थ बातों से पहलू बचाते है;
तफ़्सीर:
जो व्यर्थ, निरर्थक और अवज्ञा की बातों और कामों से उपेक्षा करने वाले हैं।
आयत 4
وَٱلَّذِينَ هُمْ لِلزَّكَوٰةِ فَـٰعِلُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
هُمْ
वो
لِلزَّكَوٰةِ
ज़कात को
فَـٰعِلُونَ
(अदा) करने वाले हैं
और जो ज़कात अदा करते है;
तफ़्सीर:
जो लोग अपने आपको दोषों और मलिनताओं से शुद्ध करने वाले और ज़कात अदा करके अपने धन को पाक करने वाले हैं।
आयत 5
وَٱلَّذِينَ هُمْ لِفُرُوجِهِمْ حَـٰفِظُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
هُمْ
वो
لِفُرُوجِهِمْ
अपनी शर्मगाहों की
حَـٰفِظُونَ
हिफ़ाज़त करने वाले हैं
और जो अपने गुप्तांगों की रक्षा करते है-
तफ़्सीर:
जो अपने गुप्तांगों को व्यभिचार,समलैंगिकता और अश्लीलता से दूर रखकर उनकी रक्षा करने वाले हैं। चुनाँचे वे पवित्र और पाक-बाज़ हैं।
आयत 6
إِلَّا عَلَىٰٓ أَزْوَٰجِهِمْ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُهُمْ فَإِنَّهُمْ غَيْرُ مَلُومِينَ
إِلَّا
मगर
عَلَىٰٓ
ऊपर
أَزْوَٰجِهِمْ
अपनी बीवियों के
أَوْ
या
مَا
जिनके
مَلَكَتْ
मालिक हुए
أَيْمَـٰنُهُمْ
उनके दाऐं हाथ
فَإِنَّهُمْ
तो बेशक वो
غَيْرُ
नहीं
مَلُومِينَ
मलामत किए गए
सिवाय इस सूरत के कि अपनी पत्नि यों या लौंडियों के पास जाएँ कि इसपर वे निन्दनीय नहीं है
तफ़्सीर:
परंतु अपनी पत्नियों या अपने स्वामित्व में आई हुई दासियों को छोड़कर। क्योंकि उनसे संभोग और अन्य चीजों के साथ लाभ उठाने में उनकी निंदा नहीं की जा सकती।
आयत 7
فَمَنِ ٱبْتَغَىٰ وَرَآءَ ذَٰلِكَ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْعَادُونَ
فَمَنِ
तो जो कोई
ٱبْتَغَىٰ
चाहे
وَرَآءَ
अलावा
ذَٰلِكَ
इसके
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْعَادُونَ
जो हद से गुज़रने वाले हैं
परन्तु जो कोई इसके अतिरिक्त कुछ और चाहे तो ऐसे ही लोग सीमा उल्लंघन करनेवाले है।-
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति पत्नियों या अपने स्वामित्व में आई दासियों के अलावा के साथ आनंद (भोग) की तलाश करे, तो वह अल्लाह की सीमाओं को उल्लंघन करने वाला है। क्योंकि वह अल्लाह के हलाल ठहराए हुए आनंद (भोग) से परे जाकर हराम (भोग) की तलाश करने वाला है।
आयत 8
وَٱلَّذِينَ هُمْ لِأَمَـٰنَـٰتِهِمْ وَعَهْدِهِمْ رَٰعُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
هُمْ
वो
لِأَمَـٰنَـٰتِهِمْ
अपनी अमानतों को
وَعَهْدِهِمْ
और अपने अहद की
رَٰعُونَ
निगरानी करने वाले हैं
और जो अपनी अमानतों और अपनी प्रतिज्ञा का ध्यान रखते है;
तफ़्सीर:
और जो उस अमानत की, जो अल्लाह ने उन्हें सौंपी है या उसके बंदों ने उनके हवाले की है, तथा अपनी प्रतिज्ञाओं की रक्षा करने वाले हैं। उन्हें नष्ट नहीं करते हैं, बल्कि उन्हें पूरा करते हैं।
आयत 9
وَٱلَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَوَٰتِهِمْ يُحَافِظُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
هُمْ
वो
عَلَىٰ
over
صَلَوَٰتِهِمْ
अपनी नमाज़ों पर
يُحَافِظُونَ
वो हिफ़ाज़त करते हैं
और जो अपनी नमाज़ों की रक्षा करते हैं;
तफ़्सीर:
जो लोग अपनी नामज़ों को उनके अरकान (स्तंभों) वाजिबात (अनिवार्य कार्यों) और मुस्तहब्बात (वांछित कार्यों) के साथ, उनके समय पर नियमित रूप से अदा करके, उनकी रक्षा करते हैं।
आयत 10
أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْوَٰرِثُونَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْوَٰرِثُونَ
जो वारिस हैं
वही वारिस होने वाले है
तफ़्सीर:
इन गुणों से सुसज्जित लोग ही हैं, जो वारिस होंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कामयाब मोमिनों की सिफात का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि नमाज़ में तवज्जो, फुज़ूल बातों से परहेज़ और अमानतदारी असली कामयाबी की निशानियां हैं।
आयत 11
ٱلَّذِينَ يَرِثُونَ ٱلْفِرْدَوْسَ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَرِثُونَ
वारिस होंगे
ٱلْفِرْدَوْسَ
फ़िरदौस के
هُمْ
वो
فِيهَا
उस में
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
जो फ़िरदौस की विरासत पाएँगे। वे उसमें सदैव रहेंगे
तफ़्सीर:
जो सबसे ऊँची जन्नत के वारिस होंगे, वे उसमें हमेशा के लिए रहेंगे। उसमें उन्हें जो नेमतें प्राप्त होंगी, उनका सिलसिला कभी नहीं रुकेगा।
आयत 12
وَلَقَدْ خَلَقْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ مِن سُلَـٰلَةٍۢ مِّن طِينٍۢ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
خَلَقْنَا
पैदा किया हमनें
ٱلْإِنسَـٰنَ
इन्सान को
مِن
from
سُلَـٰلَةٍۢ
सत्त / निचोड़ से
مِّن
of
طِينٍۢ
मिट्टी के
हमने मनुष्य को मिट्टी के सत से बनाया
तफ़्सीर:
निश्चय हमने मानव जाति के पिता आदम को मिट्टी से पैदा किया। उनकी मिट्टी पृथ्वी की मिट्टी के साथ मिश्रित पानी से निकाले गए सार से ली गई थी।
आयत 13
ثُمَّ جَعَلْنَـٰهُ نُطْفَةًۭ فِى قَرَارٍۢ مَّكِينٍۢ
ثُمَّ
फ़िर
جَعَلْنَـٰهُ
बनाया हमने उसे
نُطْفَةًۭ
नुत्फ़ा
فِى
in
قَرَارٍۢ
a resting place
مَّكِينٍۢ
एक महफ़ूज़ ठिकाने में
फिर हमने उसे एक सुरक्षित ठहरने की जगह टपकी हुई बूँद बनाकर रखा
तफ़्सीर:
फिर हमने उनकी संतान को वीर्य से पैदा किया, जो जन्म के समय तक माँ के गर्भाशय में सुरक्षित रहता है।
आयत 14
ثُمَّ خَلَقْنَا ٱلنُّطْفَةَ عَلَقَةًۭ فَخَلَقْنَا ٱلْعَلَقَةَ مُضْغَةًۭ فَخَلَقْنَا ٱلْمُضْغَةَ عِظَـٰمًۭا فَكَسَوْنَا ٱلْعِظَـٰمَ لَحْمًۭا ثُمَّ أَنشَأْنَـٰهُ خَلْقًا ءَاخَرَ ۚ فَتَبَارَكَ ٱللَّهُ أَحْسَنُ ٱلْخَـٰلِقِينَ
ثُمَّ
फिर
خَلَقْنَا
बनाया हम ने
ٱلنُّطْفَةَ
नुत्फ़े को
عَلَقَةًۭ
अल्क़ा/ जमा हुआ ख़ून
فَخَلَقْنَا
फ़िर बनाया हम ने
ٱلْعَلَقَةَ
जमे हुए ख़ून को
مُضْغَةًۭ
मुदग़ा/ गोश्त की बेटी
فَخَلَقْنَا
फिर बनाया हम ने
ٱلْمُضْغَةَ
बोटी को
عِظَـٰمًۭا
हड्डियाँ
فَكَسَوْنَا
फिर पहनाया हम ने
ٱلْعِظَـٰمَ
हड्डियों को
لَحْمًۭا
गोश्त
ثُمَّ
फिर
أَنشَأْنَـٰهُ
उठाया हम ने उसे
خَلْقًا
मख़्लूक़
ءَاخَرَ ۚ
दूसरी
فَتَبَارَكَ
तो बहुत बाबरकत है
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَحْسَنُ
जो सबसे अच्छा है
ٱلْخَـٰلِقِينَ
पैदा करने वालों में
फिर हमने उस बूँद को लोथड़े का रूप दिया; फिर हमने उस लोथड़े को बोटी का रूप दिया; फिर हमने उन हड्डियों पर मांस चढाया; फिर हमने उसे एक दूसरा ही सर्जन रूप देकर खड़ा किया। अतः बहुत ही बरकतवाला है अल्लाह, सबसे उत्तम स्रष्टा!
तफ़्सीर:
फिर हमने उसके बाद माँ के गर्भाशय में सुरक्षित उस वीर्य को जमे हुए लाल रक्त का रूप दिया, फिर उस जमे हुए लाल रक्त को मांस के एक चबाए हुए टुकड़े के रूप में बनाया, फिर माँस के उस टुकड़े को कठोर हड्डियों का रूप दे दिया, फिर उन हड्डियों को माँस पहना दिया, फिर हमने उसमें प्राण डालकर और जीवन में लाकर एक और रचना बना दिया। तो बहुत बरकत वाला है अल्लाह, जो बनाने वालों में सबसे अच्छा है।
आयत 15
ثُمَّ إِنَّكُم بَعْدَ ذَٰلِكَ لَمَيِّتُونَ
ثُمَّ
फिर
إِنَّكُم
बेशक तुम
بَعْدَ
after
ذَٰلِكَ
बाद इसके
لَمَيِّتُونَ
ज़रूर मरने वाले हो
फिर तुम अवश्य मरनेवाले हो
तफ़्सीर:
फिर तुम (ऐ लोगो!) उन चरणों से गुज़रने के बाद, अपना निर्धारित समय समाप्त होने पर मर जाओगे।
आयत 16
ثُمَّ إِنَّكُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ تُبْعَثُونَ
ثُمَّ
फिर
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
تُبْعَثُونَ
तुम उठाए जाओगे
फिर क़ियामत के दिन तुम निश्चय ही उठाए जाओगे
तफ़्सीर:
फिर तुम अपनी मृत्यु के बाद क़ियामत के दिन अपनी क़ब्रों से उठाए जाओगे, ताकि तुमसे तुम्हारे किए हुए काम का हिसाब लिया जाए।
आयत 17
وَلَقَدْ خَلَقْنَا فَوْقَكُمْ سَبْعَ طَرَآئِقَ وَمَا كُنَّا عَنِ ٱلْخَلْقِ غَـٰفِلِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
خَلَقْنَا
बनाए हम ने
فَوْقَكُمْ
तुम्हारे ऊपर
سَبْعَ
सात
طَرَآئِقَ
रास्ते
وَمَا
और नहीं
كُنَّا
हैं हम
عَنِ
of
ٱلْخَلْقِ
मख़्लूक़ से
غَـٰفِلِينَ
ग़ाफ़िल
और हमने तुम्हारे ऊपर सात रास्ते बनाए है। और हम सृष्टि-कार्य से ग़ाफ़िल नहीं
तफ़्सीर:
और हमने (ऐ लोगो!) तुम्हारे ऊपर, ऊपर-तले, सात आकाश बनाए, और हम कभी अपनी सृष्टि से अनजान नहीं, और न ही उसे भूले हैं।
आयत 18
وَأَنزَلْنَا مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۢ بِقَدَرٍۢ فَأَسْكَنَّـٰهُ فِى ٱلْأَرْضِ ۖ وَإِنَّا عَلَىٰ ذَهَابٍۭ بِهِۦ لَقَـٰدِرُونَ
وَأَنزَلْنَا
और उतारा हम ने
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مَآءًۢ
पानी
بِقَدَرٍۢ
साथ एक अन्दाज़े के
فَأَسْكَنَّـٰهُ
फिर ठहराया हम ने उसे
فِى
in
ٱلْأَرْضِ ۖ
ज़मीन में
وَإِنَّا
और बेशक हम
عَلَىٰ
on
ذَهَابٍۭ
ले जाने पर
بِهِۦ
उसे
لَقَـٰدِرُونَ
अलबत्ता क़ादिर हैं
और हमने आकाश से एक अंदाज़े के साथ पानी उतारा। फिर हमने उसे धरती में ठहरा दिया, और उसे विलुप्त करने की सामर्थ्य भी हमें प्राप्त है
तफ़्सीर:
हमने आकाश से आवश्यकता अनुसार बारिश का पानी उतारा, न अधिक कि आपदा का रूप धारण कर ले, न कम कि ज़रूरत के लिए भी पर्याप्त न हो। फिर हमने उस पानी को धरती में ठहरा दिया, जिससे मनुष्य और पशु लाभ उठाते हैं। और निश्चय हम उसे ले जाने में भी सक्षम हैं। फिर तुम उससे लाभ न उठा सकोगे।
आयत 19
فَأَنشَأْنَا لَكُم بِهِۦ جَنَّـٰتٍۢ مِّن نَّخِيلٍۢ وَأَعْنَـٰبٍۢ لَّكُمْ فِيهَا فَوَٰكِهُ كَثِيرَةٌۭ وَمِنْهَا تَأْكُلُونَ
فَأَنشَأْنَا
फिर पैदा किया हम ने
لَكُم
तुम्हारे लिए
بِهِۦ
साथ उसके
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात को
مِّن
of date-palms
نَّخِيلٍۢ
खजूरों के
وَأَعْنَـٰبٍۢ
और अंगूरों के
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
فِيهَا
इन में
فَوَٰكِهُ
फल हैं
كَثِيرَةٌۭ
बहुत से
وَمِنْهَا
और इन में से
تَأْكُلُونَ
तुम खाते हो
फिर हमने उसके द्वारा तुम्हारे लिए खजूरो और अंगूरों के बाग़ पैदा किए। तुम्हारे लिए उनमें बहुत-से फल है (जिनमें तुम्हारे लिए कितने ही लाभ है) और उनमें से तुम खाते हो
तफ़्सीर:
फिर हमने उस पानी से तुम्हारे लिए खजूरों और अंगूरों के बाग़ पैदा किए। तुम्हारे लिए उनके अंदर विभिन्न आकार और रंगों के फल हैं, जैसे कि अंजीर, अनार और सेब। और तुम उन्हीं फलों में से खाते हो।
आयत 20
وَشَجَرَةًۭ تَخْرُجُ مِن طُورِ سَيْنَآءَ تَنۢبُتُ بِٱلدُّهْنِ وَصِبْغٍۢ لِّلْـَٔاكِلِينَ
وَشَجَرَةًۭ
और एक दरख़्त
تَخْرُجُ
जो निकलता है
مِن
from
طُورِ
Mount Sinai
سَيْنَآءَ
तूरे-सीना से
تَنۢبُتُ
वो उगता है
بِٱلدُّهْنِ
साथ चिकनाई के
وَصِبْغٍۢ
और सालन
لِّلْـَٔاكِلِينَ
खाने वालों के लिए
और वह वृक्ष भी जो सैना पर्वत से निकलता है, जो तेल और खानेवालों के लिए सालन लिए हुए उगता है
तफ़्सीर:
और हमने उसी पानी से तुम्हारे लिए ज़ैतून का वृक्ष उगाया, जो सैना पर्वत के क्षेत्र में निकलता है। वह उस तेल को उगाता है, जो उसके फल से निकाला जाता है, जिसे शरीर पर लगाने और सालन के रूप में प्रयोग किया जाता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इंसान की तख्लीक के मराहिल का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि इंसान की पैदाइश का हर मरहला अल्लाह की कुदरत का सुबूत है, इस पर गौर करना ईमान बढ़ाता है।
आयत 21
وَإِنَّ لَكُمْ فِى ٱلْأَنْعَـٰمِ لَعِبْرَةًۭ ۖ نُّسْقِيكُم مِّمَّا فِى بُطُونِهَا وَلَكُمْ فِيهَا مَنَـٰفِعُ كَثِيرَةٌۭ وَمِنْهَا تَأْكُلُونَ
وَإِنَّ
और बेशक
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
فِى
in
ٱلْأَنْعَـٰمِ
मवेशियों में
لَعِبْرَةًۭ ۖ
अलबत्ता इबरत/ सबक़ है
نُّسْقِيكُم
हम पिलाते हैं तुम्हें
مِّمَّا
उस से जो
فِى
(is) in
بُطُونِهَا
उनके पेटों में है
وَلَكُمْ
और तुम्हारे लिए
فِيهَا
उन में
مَنَـٰفِعُ
फ़ायदे हैं
كَثِيرَةٌۭ
बहुत से
وَمِنْهَا
और उन में से
تَأْكُلُونَ
तुम खाते हो
और निश्चय ही तुम्हारे लिए चौपायों में भी एक शिक्षा है। उनके पेटों में जो कुछ है उसमें से हम तुम्हें पिलाते है। औऱ तुम्हारे लिए उनमें बहुत-से फ़ायदे है और उन्हें तुम खाते भी हो
तफ़्सीर:
निःसंदेह (ऐ लोगो!) तुम्हारे लिए पशुओं (ऊँट, गाय और बकरी) में एक बड़ी शिक्षा एवं संकेत है, जिससे तुम अल्लाह की शक्ति और अपने ऊपर उसकी दयालुता का पता लगा सकते हो। हम तुम्हें इन पशुओं के पेटों में जो कुछ है, उससे शुद्ध दूध पिलाते हैं, जो पीने वालों के लिए सुस्वाद है। तथा तुम्हारे लिए इनमें और भी बहुत-से लाभ हैं जिनसे तुम लाभ उठाते हो, जैसे- सवारी, ऊन, रोवां और बाल। तथा तुम इनका माँस भी खाते हो।
आयत 22
وَعَلَيْهَا وَعَلَى ٱلْفُلْكِ تُحْمَلُونَ
وَعَلَيْهَا
और उन पर
وَعَلَى
and on
ٱلْفُلْكِ
और कश्तियों पर
تُحْمَلُونَ
तुम सवार किए जाते हो
और उनपर और नौकाओं पर तुम सवार होते हो
तफ़्सीर:
ज़मीन पर पशुओं में से ऊँट की और समुद्र में नावों (जहाज़ों) की तुम सवारी करते हो।
आयत 23
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِۦ فَقَالَ يَـٰقَوْمِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَـٰهٍ غَيْرُهُۥٓ ۖ أَفَلَا تَتَّقُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
نُوحًا
नूह को
إِلَىٰ
to
قَوْمِهِۦ
तरफ़ उसकी क़ौम के
فَقَالَ
तो उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
ٱعْبُدُوا۟
इबादत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
مَا
नहीं
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنْ
(is) any
إِلَـٰهٍ
कोई इलाह ( बरहक़)
غَيْرُهُۥٓ ۖ
उसके सिवा
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
تَتَّقُونَ
तुम डरते
हमने नूह को उसकी क़ौम की ओर भेजा तो उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! अल्लाह की बन्दगी करो। उसके सिवा तुम्हारा और कोई इष्ट-पूज्य नहीं है तो क्या तुम डर नहीं रखते?"
तफ़्सीर:
हमने नूह अलैहिस्सलाम को उनकी जाति के पास, उनको अल्लाह की ओर बुलाने के लिए भेजा। तो नूह (अलैहिस्सलाम) ने उनसे कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! अकेले अल्लाह की इबादत (पूजा) करो। उस पवित्र हस्ती के सिवा तुम्हारा कोई सत्य पूज्य नहीं। क्या तुम अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, डरते नहीं?!
आयत 24
فَقَالَ ٱلْمَلَؤُا۟ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِن قَوْمِهِۦ مَا هَـٰذَآ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُكُمْ يُرِيدُ أَن يَتَفَضَّلَ عَلَيْكُمْ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ لَأَنزَلَ مَلَـٰٓئِكَةًۭ مَّا سَمِعْنَا بِهَـٰذَا فِىٓ ءَابَآئِنَا ٱلْأَوَّلِينَ
فَقَالَ
तो कहा
ٱلْمَلَؤُا۟
सरदारों ने
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
مِن
among
قَوْمِهِۦ
उसकी क़ौम में से
مَا
नहीं
هَـٰذَآ
ये
إِلَّا
मगर
بَشَرٌۭ
एक इन्सान
مِّثْلُكُمْ
तुम्हारे जैसा
يُرِيدُ
जो चाहता है
أَن
कि
يَتَفَضَّلَ
वो फ़ज़ीलत हासिल कर ले
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَلَوْ
और अगर
شَآءَ
चाहता
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَأَنزَلَ
अलबत्ता वो उतारता
مَلَـٰٓئِكَةًۭ
फ़रिश्ते
مَّا
नहीं
سَمِعْنَا
सुना हमने
بِهَـٰذَا
इस बात को
فِىٓ
from
ءَابَآئِنَا
अपने आबा ओ अजदाद में
ٱلْأَوَّلِينَ
पहले
इसपर उनकी क़ौम के सरदार, जिन्होंने इनकार किया था, कहने लगे, "यह तो बस तुम्हीं जैसा एक मनुष्य है। चाहता है कि तुमपर श्रेष्ठता प्राप्त करे।""अल्लाह यदि चाहता तो फ़रिश्ते उतार देता। यह बात तो हमने अपने अगले बाप-दादा के समयों से सुनी ही नहीं
तफ़्सीर:
तो उनकी जाति के अशराफिया एवं प्रमुख लोगों ने, जिन्होंने अल्लाह का इनकार किया था, अपने अनुयायियों और आम लोगों से कहा : यह आदमी, जो रसूल होने का दावा करता है, तुम्हारे ही जैसा एक इनसान है, जो तुमपर सरदारी और संप्रभुता चाहता है। अगर अल्लाह हमारे पास कोई रसूल भेजना चाहता, तो अवश्य उसे फ़रिश्तों में से भेजता, उसे मनुष्यों में से नहीं भेजता। हमने अपने पहले के पूर्वजों में इस प्रकार की दावेदारी नहीं सुनी।
आयत 25
إِنْ هُوَ إِلَّا رَجُلٌۢ بِهِۦ جِنَّةٌۭ فَتَرَبَّصُوا۟ بِهِۦ حَتَّىٰ حِينٍۢ
إِنْ
नहीं
هُوَ
वो
إِلَّا
मगर
رَجُلٌۢ
एक शख़्स
بِهِۦ
जिस को
جِنَّةٌۭ
जुनून है
فَتَرَبَّصُوا۟
तो इन्तज़ार करो
بِهِۦ
साथ उसके
حَتَّىٰ
until
حِينٍۢ
एक वक़्त तक
यह तो बस एक उन्मादग्रस्त व्यक्ति है। अतः एक समय तक इसकी प्रतीक्षा कर लो।"
तफ़्सीर:
यह एक ऐसा व्यक्ति है, जो पागलपन का शिकार है। यह क्या कह रहा है, उसके बारे में इसे खुद पता नहीं है। इसलिए जब तक इसका मामला लोगों के लिए स्पष्ट नहीं हो जाता है, तब तक इसके बारे में प्रतीक्षा करो।
आयत 26
قَالَ رَبِّ ٱنصُرْنِى بِمَا كَذَّبُونِ
قَالَ
कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
ٱنصُرْنِى
मदद फ़रमा मेरी
بِمَا
उस वजह से जो
كَذَّبُونِ
उन्होंने झुठलाया मुझे
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! इन्होंने मुझे जो झुठलाया है, इसपर तू मेरी सहायता कर।"
तफ़्सीर:
नूह अलैहिस्सलाम ने कहा : ऐ मेरे पालनहार! तू इन लोगों के विरुद्ध मेरी मदद कर, इस प्रकार कि तू इनके मुझे झुठलाने के कारण इनसे मेरा बदला ले।
आयत 27
فَأَوْحَيْنَآ إِلَيْهِ أَنِ ٱصْنَعِ ٱلْفُلْكَ بِأَعْيُنِنَا وَوَحْيِنَا فَإِذَا جَآءَ أَمْرُنَا وَفَارَ ٱلتَّنُّورُ ۙ فَٱسْلُكْ فِيهَا مِن كُلٍّۢ زَوْجَيْنِ ٱثْنَيْنِ وَأَهْلَكَ إِلَّا مَن سَبَقَ عَلَيْهِ ٱلْقَوْلُ مِنْهُمْ ۖ وَلَا تُخَـٰطِبْنِى فِى ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓا۟ ۖ إِنَّهُم مُّغْرَقُونَ
فَأَوْحَيْنَآ
पस वही की हम ने
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
أَنِ
कि
ٱصْنَعِ
बना
ٱلْفُلْكَ
कश्ती
بِأَعْيُنِنَا
हमारी निगाहों के सामने
وَوَحْيِنَا
और हमारी वही के मुताबिक़
فَإِذَا
फिर जब
جَآءَ
आ जाए
أَمْرُنَا
हुक्म हमारा
وَفَارَ
और जोश मारे
ٱلتَّنُّورُ ۙ
तन्नूर
فَٱسْلُكْ
तो दाख़िल कर ले
فِيهَا
उस में
مِن
of
كُلٍّۢ
हर क़िस्म के
زَوْجَيْنِ
जोड़े (नर व मादा)
ٱثْنَيْنِ
दोनों
وَأَهْلَكَ
और अपने अहलो अयाल को
إِلَّا
मगर
مَن
जो
سَبَقَ
पहले हो चुकी
عَلَيْهِ
उस पर
ٱلْقَوْلُ
बात
مِنْهُمْ ۖ
उनमें से
وَلَا
और ना
تُخَـٰطِبْنِى
तुम बात करना मुझसे
فِى
concerning
ٱلَّذِينَ
उनके मामले में जिन्होंने
ظَلَمُوٓا۟ ۖ
ज़ुल्म किया
إِنَّهُم
बेशक वो
مُّغْرَقُونَ
ग़र्क़ किए जाने वाले हैं
तब हमने उसकी ओर प्रकाशना की कि "हमारी आँखों के सामने और हमारी प्रकाशना के अनुसार नौका बना और फिर जब हमारा आदेश आ जाए और तूफ़ान उमड़ पड़े तो प्रत्येक प्रजाति में से एक-एक जोड़ा उसमें रख ले और अपने लोगों को भी, सिवाय उनके जिनके विरुद्ध पहले फ़ैसला हो चुका है। और अत्याचारियों के विषय में मुझसे बात न करना। वे तो डूबकर रहेंगे
तफ़्सीर:
हमने नूह़ (अलैहिस्सलाम) को सूचना दी कि हमारी आँखों के सामने और हमारे बताए हुए तरीक़े के अनुसार नौका बना। फिर जब उन्हें नष्ट करने का हमारा आदेश आ जाए और पानी उस स्थान से ज़ोर से उबलने लगे, जिसमें रोटी पकाई जाती है, तो हर जीव में से एक नर और एक मादा उस (नौका) में प्रवेश कर ले, ताकि नस्ल चलती रहे, और अपने परिवार वालों को भी उसमें सवार कर ले, उसको छोड़कर जिसके विनाश की बात अल्लाह की ओर से पहले ही तय हो चुकी, जैसे कि तेरी पत्नी और तेरा पुत्र। और मुझसे उन लोगों की मुक्ति और उन्हें विनाश से बचाने के बारे में बात न करना, जिन्होंने कुफ़्र करके अत्याचार किया है। वे - अनिवार्य रूप से - बाढ़ के पानी में डूबने के द्वारा विनष्ट किए जाने वाले हैं।
आयत 28
فَإِذَا ٱسْتَوَيْتَ أَنتَ وَمَن مَّعَكَ عَلَى ٱلْفُلْكِ فَقُلِ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِى نَجَّىٰنَا مِنَ ٱلْقَوْمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ
فَإِذَا
फिर जब
ٱسْتَوَيْتَ
सवार हो जाओ तुम
أَنتَ
तुम
وَمَن
और जो
مَّعَكَ
तुम्हारे साथ हैं
عَلَى
[on]
ٱلْفُلْكِ
कश्ती पर
فَقُلِ
तो कहना
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए है
ٱلَّذِى
जिस ने
نَجَّىٰنَا
निजात दी हमें
مِنَ
from
ٱلْقَوْمِ
उन लोगों से
ٱلظَّـٰلِمِينَ
जो ज़ालिम हैं
फिर जब तू नौका पर सवार हो जाए और तेरे साथी भी तो कह, प्रशंसा है अल्लाह की, जिसने हमें ज़ालिम लोगों से छुटकारा दिया
तफ़्सीर:
फिर जब तुम और तुम्हारे मुक्ति पाने वाले मोमिन साथी नाव पर सवार हो जाएँ, तो कहो : सब प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने हमें काफ़िर लोगों से बचाया और उन्हें नष्ट कर दिया।
आयत 29
وَقُل رَّبِّ أَنزِلْنِى مُنزَلًۭا مُّبَارَكًۭا وَأَنتَ خَيْرُ ٱلْمُنزِلِينَ
وَقُل
और कहना
رَّبِّ
ऐ मेरे रब
أَنزِلْنِى
उतार मुझे
مُنزَلًۭا
उतारने की जगह
مُّبَارَكًۭا
बाबरकत
وَأَنتَ
और तू
خَيْرُ
बेहतर है
ٱلْمُنزِلِينَ
सब उतारने वालों से
और कह, ऐ मेरे रब! मुझे बरकतवाली जगह उतार। और तू सबसे अच्छा मेज़बान है।"
तफ़्सीर:
और यह दुआ करो कि ऐ मेरे पालनहार! तू मुझे भूमि पर बरकत वाला उतारना उतार और तू सब उतारने वालों से उत्तम है।
आयत 30
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍۢ وَإِن كُنَّا لَمُبْتَلِينَ
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इस में
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
وَإِن
और बेशक
كُنَّا
हैं हम
لَمُبْتَلِينَ
अलबत्ता आज़माने वाले
निस्संदेह इसमें कितनी ही निशानियाँ हैं और परीक्षा तो हम करते ही है
तफ़्सीर:
नूह़ (अलैहिस्सलाम) और उनके मोमिन साथियों को बचाने और काफ़िरों को विनष्ट करने में इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि हम अपने रसूलों की मदद करने और उन्हें झुठलाने वालों को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं। निश्चय हम नूह अलैहिस्सलाम की जाति की ओर नूह़ अलैहिल्लाम को भेजकर उनका परीक्षण करने वाले थे, ताकि काफ़िर से मोमिन और अवज्ञाकारी से आज्ञाकारी स्पष्ट हो जाए।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नूह अलैहिस्सलाम के वाकिये का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि हक की दावत में मुखालिफत के बावजूद सब्र और मुसलसल कोशिश ज़रूरी है।
आयत 31
ثُمَّ أَنشَأْنَا مِنۢ بَعْدِهِمْ قَرْنًا ءَاخَرِينَ
ثُمَّ
फिर
أَنشَأْنَا
उठाए हमने
مِنۢ
after them
بَعْدِهِمْ
बाद उनके
قَرْنًا
लोग
ءَاخَرِينَ
दूसरे
फिर उनके पश्चात हमने एक दूसरी नस्ल को उठाया;
तफ़्सीर:
फिर नूह अलैहिस्सलाम की जाति को विनष्ट करने के बाद हमने एक और समुदाय को पैदा किया।
आयत 32
فَأَرْسَلْنَا فِيهِمْ رَسُولًۭا مِّنْهُمْ أَنِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَـٰهٍ غَيْرُهُۥٓ ۖ أَفَلَا تَتَّقُونَ
فَأَرْسَلْنَا
तो भेजा हमने
فِيهِمْ
उन में
رَسُولًۭا
एक रसूल
مِّنْهُمْ
उन्हीं में से
أَنِ
कि
ٱعْبُدُوا۟
इबादत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
مَا
नहीं
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنْ
(is) any
إِلَـٰهٍ
कोई इलाह( बरहक़)
غَيْرُهُۥٓ ۖ
उसके सिवा
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
تَتَّقُونَ
तुम डरते
और उनमें हमने स्वयं उन्हीं में से एक रसूल भेजा कि "अल्लाह की बन्दगी करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई इष्ट-पूज्य नहीं। तो क्या तुम डर नहीं रखते?"
तफ़्सीर:
तो हमने उनके अंदर उन्हीं में से एक रसूल भेजा, ताकि उन्हें अल्लाह की ओर बुलाए। चुनाँचे उसने उनसे कहा : अकेले अल्लाह की इबादत करो। उस महिमावान के अलावा तुम्हारा कोई सत्य पूज्य नहीं। तो क्या तुम अल्लाह के निषेधों से बचकर और उसके आदेशों का पालन करके उससे नहीं डरते?
आयत 33
وَقَالَ ٱلْمَلَأُ مِن قَوْمِهِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَكَذَّبُوا۟ بِلِقَآءِ ٱلْـَٔاخِرَةِ وَأَتْرَفْنَـٰهُمْ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا مَا هَـٰذَآ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُكُمْ يَأْكُلُ مِمَّا تَأْكُلُونَ مِنْهُ وَيَشْرَبُ مِمَّا تَشْرَبُونَ
وَقَالَ
और कहा
ٱلْمَلَأُ
सरदारों ने
مِن
of
قَوْمِهِ
उस की क़ौम से
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
وَكَذَّبُوا۟
और झुठलाया
بِلِقَآءِ
मुलाक़ात को
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत की
وَأَتْرَفْنَـٰهُمْ
और ख़ुशहाली दी हमने उन्हें
فِى
in
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी में
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
مَا
नहीं
هَـٰذَآ
ये
إِلَّا
मगर
بَشَرٌۭ
एक इन्सान
مِّثْلُكُمْ
तुम्हारे जैसा
يَأْكُلُ
वो खाता है
مِمَّا
उस से जो
تَأْكُلُونَ
तुम खाते हो
مِنْهُ
जिससे
وَيَشْرَبُ
और वो पीता है
مِمَّا
उस से जो
تَشْرَبُونَ
तुम पीते हो
उसकी क़ौम के सरदार, जिन्होंने इनकार किया और आख़िरत के मिलन को झूठलाया और जिन्हें हमने सांसारिक जीवन में सुख प्रदान किया था, कहने लगे, "यह तो बस तुम्हीं जैसा एक मनुष्य है। जो कुछ तुम खाते हो, वही यह भी खाता है और जो कुछ तुम पीते हो, वही यह भी पीता है
तफ़्सीर:
उसकी जाति के अशराफिया एवं प्रमुख लोग, जिन्होंने अल्लाह का इनकार किया, आख़िरत तथा उसके इनाम और सज़ा को झुठलाया, और सांसारिक जीवन में हमारी दी हुई विस्तृत नेमतों ने उन्हें सरकश बना दिया था, उन्होंने अपने अनुयायियों और आम लोगों से कहा : यह तो तुम्हारे ही जैसा एक इनसान है। जो वही कुछ खाता और पीता है, जो कुछ तुम खाते और पीते हो। इसलिए इसे तुम्हारे ऊपर कोई विशिष्टता प्राप्त नहीं है कि वह तुम्हारी ओर रसूल बनाकर भेजा जाए।
आयत 34
وَلَئِنْ أَطَعْتُم بَشَرًۭا مِّثْلَكُمْ إِنَّكُمْ إِذًۭا لَّخَـٰسِرُونَ
وَلَئِنْ
और अलबत्ता अगर
أَطَعْتُم
इताअत की तुम ने
بَشَرًۭا
एक इन्सान की
مِّثْلَكُمْ
अपने जैसे
إِنَّكُمْ
यक़ीनन तुम
إِذًۭا
तब होगे
لَّخَـٰسِرُونَ
अलबत्ता ख़सारा पाने वाले
यदि तुम अपने ही जैसे एक मनुष्य के आज्ञाकारी हुए तो निश्चय ही तुम घाटे में पड़ गए
तफ़्सीर:
अगर तुमने अपने ही जैसे एक इनसान की बात मान ली, तो निश्चय तुम उस समय अवश्य घाटा उठाने वाले होगे, क्योंकि तुम्हें उसकी आज्ञाकारिता से कोई लाभ नहीं होगा। इसलिए कि तुमने अपने देवताओं को छोड़कर, ऐसे व्यक्ति का अनुसरण किया, जिसको तुमपर कोई विशेषता प्राप्त नहीं है।
आयत 35
أَيَعِدُكُمْ أَنَّكُمْ إِذَا مِتُّمْ وَكُنتُمْ تُرَابًۭا وَعِظَـٰمًا أَنَّكُم مُّخْرَجُونَ
أَيَعِدُكُمْ
क्या वो वादा देता है तुम्हें
أَنَّكُمْ
कि बेशक तुम
إِذَا
जब
مِتُّمْ
मर जाओगे तुम
وَكُنتُمْ
और हो जाओगे तुम
تُرَابًۭا
मिट्टी
وَعِظَـٰمًا
और हड्डियाँ
أَنَّكُم
बेशक तुम
مُّخْرَجُونَ
निकाले जाने वाले हो
क्या यह तुमसे वादा करता है कि जब तुम मरकर मिट्टी और हड़्डियाँ होकर रह जाओगे तो तुम निकाले जाओगे?
तफ़्सीर:
क्या यह आदमी, जो रसूल होने का दावा करता है, तुमसे यह वादा करता है कि जब तुम मर गए और धूल तथा सड़ी-गली हड्डियाँ हो गए, तो तुम अपनी क़ब्रों से जीवित निकाले जाओगे? क्या यह समझ में आता है?!
आयत 36
۞ هَيْهَاتَ هَيْهَاتَ لِمَا تُوعَدُونَ
۞ هَيْهَاتَ
बहुत दूर है
هَيْهَاتَ
बहुत दूर है
لِمَا
वो जो
تُوعَدُونَ
तुम वादा दिए जा रहे हो
दूर की बात है, बहुत दूर की, जिसका तुमसे वादा किया जा रहा है!
तफ़्सीर:
तुमसे अपनी मृत्यु तथा धूल और सड़ी-गली हड्डियाँ हो जाने के बाद, अपनी क़ब्रों से जीवित बाहर निकाले जाने का जो वादा किया जाता है, वह बहुत दूर कि बात है।
आयत 37
إِنْ هِىَ إِلَّا حَيَاتُنَا ٱلدُّنْيَا نَمُوتُ وَنَحْيَا وَمَا نَحْنُ بِمَبْعُوثِينَ
إِنْ
नहीं
هِىَ
ये
إِلَّا
मगर
حَيَاتُنَا
ज़िन्दगी हमारी
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
نَمُوتُ
हम मरते हैं
وَنَحْيَا
और हम जीते हैं
وَمَا
और नहीं
نَحْنُ
हम
بِمَبْعُوثِينَ
उठाए जाने वाले
वह तो बस हमारा सांसारिक जीवन ही है। (यहीं) हम मरते और जीते है। हम कोई दोबारा उठाए जानेवाले नहीं है
तफ़्सीर:
जीवन तो केवल इस संसार का जीवन है। आख़िरत का जीवन कुछ भी नहीं है। हम में से जीवित लोग मरते हैं और वे फिर से जीवित नहीं होते। तथा अन्य लोग जन्म लेते हैं और वे जीवित रहते हैं। और हम अपनी मौत के बाद क़ियामत के दिन हिसाब के लिए निकाले जाने वाले नहीं हैं।
आयत 38
إِنْ هُوَ إِلَّا رَجُلٌ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًۭا وَمَا نَحْنُ لَهُۥ بِمُؤْمِنِينَ
إِنْ
नहीं
هُوَ
वो
إِلَّا
मगर
رَجُلٌ
एक मर्द
ٱفْتَرَىٰ
उसने गढ़ लिया
عَلَى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
كَذِبًۭا
झूठ
وَمَا
और नहीं
نَحْنُ
हम
لَهُۥ
उसे
بِمُؤْمِنِينَ
मानने वाले
वह तो बस एक ऐसा व्यक्ति है जिसने अल्लाह पर झूठ घड़ा है। हम उसे कदापि माननेवाले नहीं।"
तफ़्सीर:
यह जो तुम्हारे पास रसूल बनकर आने का दावा करता है, एक ऐसा व्यक्ति है जिसने अपना यह दावा करके अल्लाह पर एक झूठ गढ़ा है। और हम इसकी बातों पर विश्वास करने वाले नहीं हैं।
आयत 39
قَالَ رَبِّ ٱنصُرْنِى بِمَا كَذَّبُونِ
قَالَ
कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
ٱنصُرْنِى
मदद कर मेरी
بِمَا
बवजह उसके जो
كَذَّبُونِ
उन्होंने झुठलाया मुझे
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! उन्होंने जो मुझे झुठलाया, उसपर तू मेरी सहायता कर।"
तफ़्सीर:
रसूल ने कहा : ऐ मेरे पालनहार! तू इन लोगों के विरुद्ध मेरी मदद कर, इस प्रकार कि तू इनके मुझे झुठलाने के कारण इनसे मेरा बदला ले।
आयत 40
قَالَ عَمَّا قَلِيلٍۢ لَّيُصْبِحُنَّ نَـٰدِمِينَ
قَالَ
कहा
عَمَّا
इस(मुद्दत) में जो
قَلِيلٍۢ
थोड़ी है
لَّيُصْبِحُنَّ
अलबत्ता वो ज़रूर हो जाऐंगे
نَـٰدِمِينَ
नादिम
कहा, "शीघ्र ही वे पछताकर रहेंगे।"
तफ़्सीर:
तो अल्लाह ने उनका उत्तर यह कहकर दिया : थोड़े समय के बाद, आपके लाए हुए संदेश को झुठलाने वाले ये लोग, अपने झुठलाने के रवैये पर पछताएँगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
बाद की कौमों के इनकार का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि पिछली कौमों की तरह बार-बार निशानियां देखकर भी इनकार करना खतरनाक रवैया है।
आयत 41
فَأَخَذَتْهُمُ ٱلصَّيْحَةُ بِٱلْحَقِّ فَجَعَلْنَـٰهُمْ غُثَآءًۭ ۚ فَبُعْدًۭا لِّلْقَوْمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ
فَأَخَذَتْهُمُ
तो पकड़ लिया उन्हें
ٱلصَّيْحَةُ
चिंघाड़ ने
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
فَجَعَلْنَـٰهُمْ
तो कर दिया हमने उन्हें
غُثَآءًۭ ۚ
कूड़ा-करकट
فَبُعْدًۭا
तो दूरी है
لِّلْقَوْمِ
उन लोगों के लिए
ٱلظَّـٰلِمِينَ
जो ज़ालिम हैं
फिर घटित होनेवाली बात के अनुसार उन्हें एक प्रचंड आवाज़ ने आ लिया और हमने उन्हें कूड़ा-कर्कट बनाकर रख दिया। अतः फिटकार है, ऐसे अत्याचारी लोगों पर!
तफ़्सीर:
चुनाँचे उन्हें एक भयंकर, घातक आवाज़ ने पकड़ लिया, क्योंकि वे अपने दुराग्रह के कारण यातना के हक़दार बन गए थे, तो उन्हें सैलाब की झाग की तरह विनष्ट कर दिया। तो विनाश है अत्याचारी लोगों के लिए।
आयत 42
ثُمَّ أَنشَأْنَا مِنۢ بَعْدِهِمْ قُرُونًا ءَاخَرِينَ
ثُمَّ
फिर
أَنشَأْنَا
उठाईं हमने
مِنۢ
after them
بَعْدِهِمْ
उनके बाद
قُرُونًا
क़ौमें
ءَاخَرِينَ
दूसरी
फिर हमने उनके पश्चात दूसरी नस्लों को उठाया
तफ़्सीर:
फिर हमने उनका विनाश करने के बाद, अन्य समुदायों और दूसरी जातियों को पैदा किया, जैसे- लूत अलैहिस्सलाम की जाति, शुऐब अलैहिस्सलाम की जाति और यूनुस अलैहिस्सलाम की जाति।
आयत 43
مَا تَسْبِقُ مِنْ أُمَّةٍ أَجَلَهَا وَمَا يَسْتَـْٔخِرُونَ
مَا
ना
تَسْبِقُ
आगे बढ़ सकती है
مِنْ
any
أُمَّةٍ
कोई उम्मत
أَجَلَهَا
अपने मुक़र्रर वक़्त से
وَمَا
और ना
يَسْتَـْٔخِرُونَ
वो पीछे रह सकती
कोई समुदाय न तो अपने निर्धारित समय से आगे बढ़ सकता है और न पीछे रह सकता है
तफ़्सीर:
इन झुठलाने वाले समुदायों में से कोई भी समुदाय अपने विनाश के आने के नियत समय से न आगे बढ़ता है, न उससे पीछे रहता है। चाहे उसके पास कितने भी संसाधन हों।
आयत 44
ثُمَّ أَرْسَلْنَا رُسُلَنَا تَتْرَا ۖ كُلَّ مَا جَآءَ أُمَّةًۭ رَّسُولُهَا كَذَّبُوهُ ۚ فَأَتْبَعْنَا بَعْضَهُم بَعْضًۭا وَجَعَلْنَـٰهُمْ أَحَادِيثَ ۚ فَبُعْدًۭا لِّقَوْمٍۢ لَّا يُؤْمِنُونَ
ثُمَّ
फिर
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
رُسُلَنَا
अपने रसूलों को
تَتْرَا ۖ
पै- दर- पै
كُلَّ
Every time
مَا
जब कभी
جَآءَ
आया
أُمَّةًۭ
किसी उम्मत में
رَّسُولُهَا
रसूल उसका
كَذَّبُوهُ ۚ
उन्होंने झुठला दिया उसे
فَأَتْبَعْنَا
तो पीछे लाए हम
بَعْضَهُم
उनके बाज़ को
بَعْضًۭا
बाज़ के
وَجَعَلْنَـٰهُمْ
और बना दिया हमने उन्हें
أَحَادِيثَ ۚ
क़िस्से कहानियाँ
فَبُعْدًۭا
तो दूरी है
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
لَّا
not
يُؤْمِنُونَ
जो नहीं ईमान लाते
फिर हमने निरन्तर अपने रसूल भेजे। जब भी किसी समुदाय के पास उसका रसूल आया, तो उसके लोगों ने उसे झुठला दिया। अतः हम एक दूसरे के पीछे (विनाश के लिए) लगाते चले गए और हमने उन्हें ऐसा कर दिया कि वे कहानियाँ होकर रह गए। फिटकार हो उन लोगों पर जो ईमान न लाएँ
तफ़्सीर:
फिर हम लगातार एक के बाद एक रसूल भेजते रहे। जब भी उनमें से किसी समुदाय के पास अल्लाह का भेजा हुआ रसूल आया, तो उसके लोगों ने उसे झुठला दिया। तो हम उन्हें एक-दूसरे के पीछे विनष्ट करते गए। फिर उनके बारे में लोगों की बातचीत के अलावा उनका कोई वजूद बाक़ी न रहा। तो विनाश हो, ऐसे लोगों का जो रसूलों की अपने पालनहार की ओर से लाई हुई बातों पर ईमान नहीं लाते।
आयत 45
ثُمَّ أَرْسَلْنَا مُوسَىٰ وَأَخَاهُ هَـٰرُونَ بِـَٔايَـٰتِنَا وَسُلْطَـٰنٍۢ مُّبِينٍ
ثُمَّ
फिर
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
مُوسَىٰ
मूसा को
وَأَخَاهُ
और उसके भाई
هَـٰرُونَ
हारून को
بِـَٔايَـٰتِنَا
साथ अपनी निशानियों के
وَسُلْطَـٰنٍۢ
और दलील
مُّبِينٍ
वाज़ेह के
फिर हमने मूसा और उसके भाई हारून को अपनी निशानियों और खुले प्रमाण के साथ फ़िरऔन और उसके सरदारों की ओर भेजा।
तफ़्सीर:
फिर हमने मूसा और उसके भाई हारून को अपनी नौ निशानियाँ (लाठी, चमकता हाथ, टिड्डी, जूँ, मेंढक, रक्त, बाढ़, अकाल और फलों की कमी) और एक स्पष्ट तर्क देकर भेजा।
आयत 46
إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَإِي۟هِۦ فَٱسْتَكْبَرُوا۟ وَكَانُوا۟ قَوْمًا عَالِينَ
إِلَىٰ
To
فِرْعَوْنَ
तरफ़ फ़िरऔन
وَمَلَإِي۟هِۦ
और उसके सरदारों के
فَٱسْتَكْبَرُوا۟
तो उन्होंने तकब्बुर किया
وَكَانُوا۟
और थे वो
قَوْمًا
लोग
عَالِينَ
सरकश
किन्तु उन्होंने अहंकार किया। वे थे ही सरकश लोग
तफ़्सीर:
हमने उन दोनों को फ़िरऔन और उसकी जाति के अशराफिया के पास भेजा। तो उन्होंने अहंकार दिखाया और उन दोनों को मानने को तैयार नहीं हुए। और वे उत्पीड़न और अत्याचार के द्वारा लोगों को दबाए हुए थे।
आयत 47
فَقَالُوٓا۟ أَنُؤْمِنُ لِبَشَرَيْنِ مِثْلِنَا وَقَوْمُهُمَا لَنَا عَـٰبِدُونَ
فَقَالُوٓا۟
तो वो कहने लगे
أَنُؤْمِنُ
क्या हम ईमान लाऐं
لِبَشَرَيْنِ
दो इन्सानों पर
مِثْلِنَا
अपने जैसे
وَقَوْمُهُمَا
और क़ौम उन दोनों की
لَنَا
हमारे लिए
عَـٰبِدُونَ
ताबेअदार है
तो व कहने लगे, "क्या हम अपने ही जैसे दो मनुष्यों की बात मान लें, जबकि उनकी क़ौम हमारी ग़ुलाम भी है?"
तफ़्सीर:
तो उन्होंने कहा : क्या हम अपने जैसे दो व्यक्तियों पर ईमान ले आएँ, जिनकी हमारे ऊपर कोई उत्कृष्टता नहीं है और उनके लोग (बनी इसराईल) हमारे आज्ञाकारी और अधीन हैं?!
आयत 48
فَكَذَّبُوهُمَا فَكَانُوا۟ مِنَ ٱلْمُهْلَكِينَ
فَكَذَّبُوهُمَا
तो उन्होंने झुठला दिया उन दोनों को
فَكَانُوا۟
तो हो गए वो
مِنَ
of
ٱلْمُهْلَكِينَ
हलाक होने वालों में से
अतः उन्होंने उन दोनों को झुठला दिया और विनष्ट होनेवालों में सम्मिलित होकर रहे
तफ़्सीर:
तो उन्होंने उन दोनों को उस चीज़ में झुठला दिया, जो वे दोनों अल्लाह के पास से लेकर आए थे। चुनाँचे वे उन्हें झुठलाने के कारण डुबोकर विनष्ट किए जाने वालो में से हो गए।
आयत 49
وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ لَعَلَّهُمْ يَهْتَدُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
ءَاتَيْنَا
दी हमने
مُوسَى
मूसा को
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَهْتَدُونَ
वो हिदायत पाऐं
और हमने मूसा को किताब प्रदान की, ताकि वे लोग मार्ग पा सकें
तफ़्सीर:
और हमने मूसा को तौरात प्रदान की, इस उम्मीद पर कि उनकी जाति के लोग इससे सत्य का रास्ता पा जाएँ और उसके अनुसार कार्य करें।
आयत 50
وَجَعَلْنَا ٱبْنَ مَرْيَمَ وَأُمَّهُۥٓ ءَايَةًۭ وَءَاوَيْنَـٰهُمَآ إِلَىٰ رَبْوَةٍۢ ذَاتِ قَرَارٍۢ وَمَعِينٍۢ
وَجَعَلْنَا
और बनाया हमने
ٱبْنَ
(the) son
مَرْيَمَ
इब्ने मरियम
وَأُمَّهُۥٓ
और उसकी माँ को
ءَايَةًۭ
एक निशानी
وَءَاوَيْنَـٰهُمَآ
और पनाह दी हमने उन दोनों को
إِلَىٰ
to
رَبْوَةٍۢ
तरफ़ बुलन्द जगह के
ذَاتِ
of tranquility
قَرَارٍۢ
क़रार/सुकून वाली
وَمَعِينٍۢ
और बहते चश्मे वाली
और मरयम के बेटे और उसकी माँ को हमने एक निशानी बनाया। और हमने उन्हें रहने योग्य स्रोतबाली ऊँची जगह शरण दी,
तफ़्सीर:
हमने ईसा बिन मरयम और उनकी माँ मरयम को अपनी शक्ति को दर्शाने वाली एक निशानी बनाया। क्योंकि मरयम के पेट में ईसा का गर्भ बिना बाप के ठहर गया। और हमने उन दोनों को एक ऊँचे स्थान पर शरण दी, जो समतल, रहने के योग्य था तथा उसमें ताजा बहता पानी था।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मूसा-हारून और ईसा-मरियम अलैहिस्सलाम का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि हर नबी की तालीम एक ही थी, इसलिए उम्मत में तफरका डालना गलत है।
आयत 51
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلرُّسُلُ كُلُوا۟ مِنَ ٱلطَّيِّبَـٰتِ وَٱعْمَلُوا۟ صَـٰلِحًا ۖ إِنِّى بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌۭ
يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلرُّسُلُ
पैग़म्बरो
كُلُوا۟
खाओ
مِنَ
of
ٱلطَّيِّبَـٰتِ
पाकीज़ा चीज़ों में से
وَٱعْمَلُوا۟
और अमल करो
صَـٰلِحًا ۖ
नेक
إِنِّى
बेशक मैं
بِمَا
उसे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला हूँ
"ऐ पैग़म्बरो! अच्छी पाक चीज़े खाओ और अच्छा कर्म करो। जो कुछ तुम करते हो उसे मैं जानता हूँ
तफ़्सीर:
ऐ रसूलो! जो खाने योग्य वस्तुएँ हमने तुम्हारे लिए हलाल की हैं, उनमें से खाओ और शरीयत के अनुसार अच्छे कार्य करो। तुम जो भी कार्य करते हो, मैं उससे अवगत हूँ। तुम्हारा कोई भी कार्य मुझसे छिपा नहीं है।
आयत 52
وَإِنَّ هَـٰذِهِۦٓ أُمَّتُكُمْ أُمَّةًۭ وَٰحِدَةًۭ وَأَنَا۠ رَبُّكُمْ فَٱتَّقُونِ
وَإِنَّ
और बेशक
هَـٰذِهِۦٓ
ये
أُمَّتُكُمْ
उम्मत तुम्हारी
أُمَّةًۭ
उम्मत है
وَٰحِدَةًۭ
एक ही
وَأَنَا۠
और मैं
رَبُّكُمْ
रब हूँ तुम्हारा
فَٱتَّقُونِ
पस डरो मुझ से
और निश्चय ही यह तुम्हारा समुदाय, एक ही समुदाय है और मैं तुम्हारा रब हूँ। अतः मेरा डर रखो।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूलो!) निश्चय तुम्हारा यह धर्म एक ही धर्म है, जो इस्लाम है। और मैं ही तुम्हारा पालनहार हूँ, मेरे अलावा तुम्हारा कोई पालनहार नहीं। अतः मेरे आदेशों का पालन करके और मेरे निषेधों से बचकर, मुझसे डरो।
आयत 53
فَتَقَطَّعُوٓا۟ أَمْرَهُم بَيْنَهُمْ زُبُرًۭا ۖ كُلُّ حِزْبٍۭ بِمَا لَدَيْهِمْ فَرِحُونَ
فَتَقَطَّعُوٓا۟
तो उन्होंने जुदा-जुदा कर लिया
أَمْرَهُم
मामला अपना
بَيْنَهُمْ
आपस में
زُبُرًۭا ۖ
टुकड़े-टुकड़े करके
كُلُّ
each
حِزْبٍۭ
हर फ़रीक़/ गिरोह( के लोग)
بِمَا
उस पर जो
لَدَيْهِمْ
उनके पास है
فَرِحُونَ
ख़ुश हैं
किन्तु उन्होंने स्वयं अपने मामले (धर्म) को परस्पर टुकड़े-टुकड़े कर डाला। हर गिरोह उसी पर खुश है, जो कुछ उसके पास है
तफ़्सीर:
फिर उनके बाद, उनके अनुयायी धर्म में बिखराव का शिकार होकर, कई समूहों और दलों में विभाजित हो गए। हर दल उसी पर खुश है, जिसे वह यह मानता है कि वही अल्लाह के निकट पसंदीदा धर्म है, तथा जो कुछ उसके अलावा के पास है, उसपर ध्यान नहीं देता है।
आयत 54
فَذَرْهُمْ فِى غَمْرَتِهِمْ حَتَّىٰ حِينٍ
فَذَرْهُمْ
तो छोड़ दीजिए उन्हें
فِى
in
غَمْرَتِهِمْ
उनकी ग़फ़्लत में
حَتَّىٰ
until
حِينٍ
एक वक़्त तक
अच्छा तो उन्हें उनकी अपनी बेहोशी में डूबे हुए ही एक समय तक छोड़ दो
तफ़्सीर:
अतः, (ऐ रसूल!) आप उन्हें, उनपर यातना के उतरने के समय तक, उसी अज्ञानता और भ्रांति की स्थिति में रहने दें, जिसमें वे पड़े हुए हैं।
आयत 55
أَيَحْسَبُونَ أَنَّمَا نُمِدُّهُم بِهِۦ مِن مَّالٍۢ وَبَنِينَ
أَيَحْسَبُونَ
क्या वो समझते हैं
أَنَّمَا
कि बेशक
نُمِدُّهُم
जो हम मदद दे रहे हैं उन्हें
بِهِۦ
साथ किसी भी(चीज़) के
مِن
of
مَّالٍۢ
माल से
وَبَنِينَ
और बेटों से
क्या वे समझते है कि हम जो उनकी धन और सन्तान से सहायता किए जा रहे है,
तफ़्सीर:
क्या अपनी स्थिति पर खुश रहने वाले इन दलों के लोग यह सोचते हैं कि हम उन्हें दुनिया के जीवन में जो धन और संतान दे रहे हैं, वह उन्हें जल्दी से प्रदान की जाने वाली भलाई है, जिसके वे हक़दार हैं?! मामला ऐसा नहीं है जो उन्होंने सोचा है।बल्कि वास्तविकता यह है कि हम उन्हें यह सब उन्हें ढील और मोहलत देने की नीति के तहत प्रदान कर रहे हैं। लेकिन उन्हें इसका एहसास नहीं हैं।
आयत 56
نُسَارِعُ لَهُمْ فِى ٱلْخَيْرَٰتِ ۚ بَل لَّا يَشْعُرُونَ
نُسَارِعُ
कि हम जल्दी कर रहे हैं
لَهُمْ
उनके लिए
فِى
in
ٱلْخَيْرَٰتِ ۚ
भलाइयों में
بَل
बल्कि
لَّا
not
يَشْعُرُونَ
नहीं वो शऊर रखते
तो यह उनके भलाइयों में कोई जल्दी कर रहे है?
तफ़्सीर:
क्या अपनी स्थिति पर खुश रहने वाले इन दलों के लोग यह सोचते हैं कि हम उन्हें दुनिया के जीवन में जो धन और संतान दे रहे हैं, वह उन्हें जल्दी से प्रदान की जाने वाली भलाई है, जिसके वे हक़दार हैं?! मामला ऐसा नहीं है जो उन्होंने सोचा है।बल्कि वास्तविकता यह है कि हम उन्हें यह सब उन्हें ढील और मोहलत देने की नीति के तहत प्रदान कर रहे हैं। लेकिन उन्हें इसका एहसास नहीं हैं।
आयत 57
إِنَّ ٱلَّذِينَ هُم مِّنْ خَشْيَةِ رَبِّهِم مُّشْفِقُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
هُم
वो
مِّنْ
from
خَشْيَةِ
ख़ौफ़ से
رَبِّهِم
अपने रब के
مُّشْفِقُونَ
डरने वाले हैं
नहीं, बल्कि उन्हें इसका एहसास नहीं है। निश्चय ही जो लोग अपने रब के भय से काँपते रहते हैं;
तफ़्सीर:
निःसंदेह जो लोग अपने ईमान और अच्छे कार्य करने के बावजूद अपने पालनहार से डरते रहते हैं।
आयत 58
وَٱلَّذِينَ هُم بِـَٔايَـٰتِ رَبِّهِمْ يُؤْمِنُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
هُم
वो
بِـَٔايَـٰتِ
आयात पर
رَبِّهِمْ
अपने रब की
يُؤْمِنُونَ
वो ईमान लाते हैं
और जो लोग अपने रब की आयतों पर ईमान लाते है;
तफ़्सीर:
तथा जो अपने पालनहार की किताब की आयतों पर ईमान रखते हैं।
आयत 59
وَٱلَّذِينَ هُم بِرَبِّهِمْ لَا يُشْرِكُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
هُم
वो
بِرَبِّهِمْ
अपने रब के साथ
لَا
(do) not
يُشْرِكُونَ
नहीं वो शरीक करते
और जो लोग अपने रब के साथ किसी को साझी नहीं ठहराते;
तफ़्सीर:
और जो लोग अपने पालनहार को एकमात्र पूज्य मानते हैं, उसके साथ किसी चीज़ को साझी नहीं बनाते।
आयत 60
وَٱلَّذِينَ يُؤْتُونَ مَآ ءَاتَوا۟ وَّقُلُوبُهُمْ وَجِلَةٌ أَنَّهُمْ إِلَىٰ رَبِّهِمْ رَٰجِعُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
يُؤْتُونَ
देते हैं
مَآ
जो कुछ
ءَاتَوا۟
वो देते हैं
وَّقُلُوبُهُمْ
जब कि दिल उनके
وَجِلَةٌ
लरज़ते हैं
أَنَّهُمْ
कि बेशक वो
إِلَىٰ
to
رَبِّهِمْ
तरफ़ अपने रब के
رَٰجِعُونَ
लौटने वाले हैं
और जो लोग देते है, जो कुछ देते है और हाल यह होता है कि दिल उनके काँप रहे होते है, इसलिए कि उन्हें अपने रब की ओर पलटना है;
तफ़्सीर:
और वे लोग जो नेकी के कामों में भरपूर प्रयास करते हैं और अच्छे कार्यों के द्वारा अल्लाह की निकटता प्राप्त करते हैं, इसके बावजूद उन्हें यह भय लगा रहता है कि अल्लाह उनके दान और नेक कार्यों को उस समय अस्वीकार न कर दे, जब वे क़ियामत के दिन उसके पास लौटेंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नेक अमल में जल्दी करने वालों की तारीफ का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि नेकी के काम में जल्दी करना और साथ ही अल्लाह से कुबूलियत की उम्मीद रखना ईमान वालों की सिफत है।
आयत 61
أُو۟لَـٰٓئِكَ يُسَـٰرِعُونَ فِى ٱلْخَيْرَٰتِ وَهُمْ لَهَا سَـٰبِقُونَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
يُسَـٰرِعُونَ
जो जल्दी करते हैं
فِى
in
ٱلْخَيْرَٰتِ
भलाइयों में
وَهُمْ
और वो ही
لَهَا
उनके लिए
سَـٰبِقُونَ
सबक़त करने वाले हैं
यही वे लोग है, जो भलाइयों में जल्दी करते है और यही उनके लिए अग्रसर रहनेवाले है।
तफ़्सीर:
इन महान गुणों के साथ विशेषित लोग ही अच्छे कर्मों की ओर जल्दी करते हैं और यही लोग उनकी तरफ़ आगे बढ़ने वाले हैं और उन्हें प्राप्त करने में अन्य लोगों से आगे बढ़ गए हैं।
आयत 62
وَلَا نُكَلِّفُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا ۖ وَلَدَيْنَا كِتَـٰبٌۭ يَنطِقُ بِٱلْحَقِّ ۚ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
وَلَا
और नहीं
نُكَلِّفُ
हम तकलीफ़ देते
نَفْسًا
किसी नफ़्स को
إِلَّا
मगर
وُسْعَهَا ۖ
उसकी वुसअत के मुताबिक़
وَلَدَيْنَا
और हमारे पास
كِتَـٰبٌۭ
एक किताब है
يَنطِقُ
जो बोलती है
بِٱلْحَقِّ ۚ
साथ हक़ के
وَهُمْ
और वो
لَا
(will) not
يُظْلَمُونَ
ना वो ज़ुल्म किए जाऐंगे
हम किसी व्यक्ति पर उसकी समाई (क्षमता) से बढ़कर ज़िम्मेदारी का बोझ नहीं डालते और हमारे पास एक किताब है, जो ठीक-ठीक बोलती है, और उनपर ज़ुल्म नहीं किया जाएगा
तफ़्सीर:
हम किसी प्राणी पर केवल उतने ही कार्य का भार डालते हैं, जितना वह कर सकता है। और हमारे पास एक किताब है, जिसमें हमने हर कार्यकर्ता के काम को अंकित कर रखा है। वह सत्य के साथ बोलती है, जो संदेह से परे है। और उनपर, उनकी नेकियों को घटाकर अथवा उनके गुनाहों को बढ़ाकर कोई अत्याचार नहीं किया जाएगा।
आयत 63
بَلْ قُلُوبُهُمْ فِى غَمْرَةٍۢ مِّنْ هَـٰذَا وَلَهُمْ أَعْمَـٰلٌۭ مِّن دُونِ ذَٰلِكَ هُمْ لَهَا عَـٰمِلُونَ
بَلْ
बल्कि
قُلُوبُهُمْ
दिल उनके
فِى
(are) in
غَمْرَةٍۢ
ग़फ़्लत में हैं
مِّنْ
over
هَـٰذَا
उस से
وَلَهُمْ
और उनके लिए
أَعْمَـٰلٌۭ
कई आमाल हैं
مِّن
besides
دُونِ
अलावा
ذَٰلِكَ
उसके
هُمْ
वो
لَهَا
उन्हें
عَـٰمِلُونَ
करने वाले हैं
बल्कि उनके दिल इसकी (सत्य धर्म की) ओर से हटकर (वसवसों और गफ़लतों आदि के) भँवर में पडे हुए है और उससे (ईमानवालों की नीति से) हटकर उनके कुछ और ही काम है। वे उन्हीं को करते रहेंगे;
तफ़्सीर:
बल्कि काफ़िरों के दिल इस सत्य के साथ बोलने वाली किताब और उस किताब से जो उनपर उतरी है, ग़फ़लत में पड़े हुए हैं। तथा जिस कुफ़्र पर वे क़ायम हैं, उसके सिवा भी उनके अन्य कार्य हैं, जिन्हें वे करने वाले हैं।
आयत 64
حَتَّىٰٓ إِذَآ أَخَذْنَا مُتْرَفِيهِم بِٱلْعَذَابِ إِذَا هُمْ يَجْـَٔرُونَ
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَآ
जब
أَخَذْنَا
पकड़ेंगे हम
مُتْرَفِيهِم
उनके ख़ुशहाल लोगों को
بِٱلْعَذَابِ
साथ अज़ाब के
إِذَا
तब यकायक
هُمْ
वो
يَجْـَٔرُونَ
वो चिल्लाने लगेंगे
यहाँ तक कि जब हम उनके खुशहाल लोगों को यातना में पकड़ेगे तो क्या देखते है कि वे विलाप और फ़रियाद कर रहे है
तफ़्सीर:
यहाँ तक कि जब हम उनके उन लोगों को, जो दुनिया में समृद्ध थे, क़ियामत के दिन सज़ा देंगे, तो वे चीख-चीख कर मदद माँगेगे।
आयत 65
لَا تَجْـَٔرُوا۟ ٱلْيَوْمَ ۖ إِنَّكُم مِّنَّا لَا تُنصَرُونَ
لَا
(Do) not
تَجْـَٔرُوا۟
ना तुम चिल्लाओ
ٱلْيَوْمَ ۖ
आज
إِنَّكُم
बेशक तुम
مِّنَّا
हमसे
لَا
not
تُنصَرُونَ
ना तुम मदद किए जाओगे
(कहा जाएगा,) "आज चिल्लाओ मत, तुम्हें हमारी ओर से कोई सहायता मिलनेवाली नहीं
तफ़्सीर:
तो उन्हें अल्लाह की दया से निराश करते हुए कहा जाएगा : आज मत चिल्लाओ और न मदद माँगो। क्योंकि आज तुम्हारा कोई मददगार नहीं है, जो तुम्हें अल्लाह की यातना से बचा सके।
आयत 66
قَدْ كَانَتْ ءَايَـٰتِى تُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ فَكُنتُمْ عَلَىٰٓ أَعْقَـٰبِكُمْ تَنكِصُونَ
قَدْ
तहक़ीक़
كَانَتْ
थीं
ءَايَـٰتِى
मोरी आयात
تُتْلَىٰ
पढ़ी जातीं
عَلَيْكُمْ
तुम पर
فَكُنتُمْ
तो थे तुम
عَلَىٰٓ
(to) on
أَعْقَـٰبِكُمْ
अपनी एड़ियों पर
تَنكِصُونَ
तुम फिर जाते
तुम्हें मेरी आयतें सुनाई जाती थीं, तो तुम अपनी एड़ियों के बल फिर जाते थे।
तफ़्सीर:
दुनिया में अल्लाह की किताब की आयतें तुम्हें सुनाई जाती थीं, तो तुम उन्हें सुनकर उनसे घृणा के कारण मुँह फेरते हुए पलट जाते थे।
आयत 67
مُسْتَكْبِرِينَ بِهِۦ سَـٰمِرًۭا تَهْجُرُونَ
مُسْتَكْبِرِينَ
तकब्बुर करते हुए
بِهِۦ
साथ उसके
سَـٰمِرًۭا
रात को बातें करते हुए
تَهْجُرُونَ
तुम बेहूदा गोई करते थे
हाल यह था कि इसके कारण स्वयं को बड़ा समझते थे, उसे एक कहानी कहनेवाला ठहराकर छोड़ चलते थे
तफ़्सीर:
तुम यह कार्य लोगों पर बड़ा बनते हुए कर रहे थे, क्योंकि तुम्हारा यह भ्रम था कि तुम हरम वाले हो। हालाँकि वास्तव में तुम हरम वाले नहीं हो। क्योंकि हरम वाले तो वे लोग हैं, जो अल्लाह से डरने वाले हैं। तथा तुम हरम के आस पास रात में बुरी बातें करते हो। अतः तुम उसकी पवित्रता का सम्मान नहीं करते।
आयत 68
أَفَلَمْ يَدَّبَّرُوا۟ ٱلْقَوْلَ أَمْ جَآءَهُم مَّا لَمْ يَأْتِ ءَابَآءَهُمُ ٱلْأَوَّلِينَ
أَفَلَمْ
क्या भला नहीं
يَدَّبَّرُوا۟
उन्होंने ग़ौरो फ़िक्र किया
ٱلْقَوْلَ
कलाम में
أَمْ
या
جَآءَهُم
आया है उनके पास
مَّا
जो
لَمْ
नहीं
يَأْتِ
आया
ءَابَآءَهُمُ
उनके आबा ओ अजदाद के पास
ٱلْأَوَّلِينَ
पहले
क्या उन्होंने इस वाणी पर विचार नहीं किया या उनके पास वह चीज़ आ गई जो उनके पहले बाप-दादा के पास न आई थी?
तफ़्सीर:
क्या इन अनेकेश्वरवादियों ने अल्लाह के उतारे हुए क़ुरआन पर विचार नहीं किया कि उसप ईमान लाते और उसके अनुसार कार्य करते, या क्या उनके पास कोई ऐसी चीज़ आई है, जो उनसे पहले उनके पूर्वजों के पास नहीं आई, इसलिए वे इससे दूर हो गए और इसका इनकार कर दिया?!
आयत 69
أَمْ لَمْ يَعْرِفُوا۟ رَسُولَهُمْ فَهُمْ لَهُۥ مُنكِرُونَ
أَمْ
या
لَمْ
नहीं
يَعْرِفُوا۟
उन्होंने पहचाना
رَسُولَهُمْ
अपने रसूल को
فَهُمْ
तो वो
لَهُۥ
उसके
مُنكِرُونَ
इन्कारी हैं
या उन्होंने अपने रसूल को पहचाना नहीं, इसलिए उसका इनकार कर रहे है?
तफ़्सीर:
या उन्होंने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को नहीं पहचाना, जिन्हें अल्लाह ने उनके पास रसूल बनाकर भेजा। इस कारण वे उनका इनकार कर रहे हैं?! निश्चित रूप से वे उन्हें जानते थे तथा उनकी सच्चाई और अमानतदारी को भी जानते थे।
आयत 70
أَمْ يَقُولُونَ بِهِۦ جِنَّةٌۢ ۚ بَلْ جَآءَهُم بِٱلْحَقِّ وَأَكْثَرُهُمْ لِلْحَقِّ كَـٰرِهُونَ
أَمْ
या
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
بِهِۦ
उसे
جِنَّةٌۢ ۚ
जुनून है
بَلْ
बल्कि
جَآءَهُم
वो लाया है उनके पास
بِٱلْحَقِّ
हक़
وَأَكْثَرُهُمْ
और अक्सर उनके
لِلْحَقِّ
हक़ को
كَـٰرِهُونَ
नापसंद करने वाले हैं
या वे कहते है, "उसे उन्माद हो गया है।" नहीं, बल्कि वह उनके पास सत्य लेकर आया है। किन्तु उनमें अधिकांश को सत्य अप्रिय है
तफ़्सीर:
बल्कि वे कहते हैं : वह पागल है। निश्चय उन्होंने झूठ बोला। बल्कि वह उनके पास अल्लाह की ओर से सत्य लेकर आए हैं, जिसके अल्लाह की ओर से होने में कोई संदेह नहीं है। जबकि उनमें से अधिकांश लोग अपनी ईर्ष्या और अपने झूठ के लिए कट्टरता (हठ) के कारण, सत्य को नापसंद करने वाले, उससे नफ़रत करने वाले हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुफ्फार की गफलत और सरकशी का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि नेमत और मोहलत को अपनी ताकत समझने की बजाय शुक्रगुज़ारी का ज़रिया बनाना चाहिए।
आयत 71
وَلَوِ ٱتَّبَعَ ٱلْحَقُّ أَهْوَآءَهُمْ لَفَسَدَتِ ٱلسَّمَـٰوَٰتُ وَٱلْأَرْضُ وَمَن فِيهِنَّ ۚ بَلْ أَتَيْنَـٰهُم بِذِكْرِهِمْ فَهُمْ عَن ذِكْرِهِم مُّعْرِضُونَ
وَلَوِ
और अगर
ٱتَّبَعَ
पैरवी करता
ٱلْحَقُّ
हक़
أَهْوَآءَهُمْ
उनकी ख़्वाहिशात की
لَفَسَدَتِ
अलबत्ता बिगड़ जाते
ٱلسَّمَـٰوَٰتُ
आसमान
وَٱلْأَرْضُ
और ज़मीन
وَمَن
और जो कोई
فِيهِنَّ ۚ
उनमें है
بَلْ
बल्कि
أَتَيْنَـٰهُم
लाए हैं हम उनके पास
بِذِكْرِهِمْ
ज़िक्र उनका
فَهُمْ
तो वो
عَن
from
ذِكْرِهِم
अपने ही ज़िक्र से
مُّعْرِضُونَ
मुँह मोड़ने वाले हैं
और यदि सत्य कहीं उनकी इच्छाओं के पीछे चलता तो समस्त आकाश और धरती और जो भी उनमें है, सबमें बिगाड़ पैदा हो जाता। नहीं, बल्कि हम उनके पास उनके हिस्से की अनुस्मृति लाए है। किन्तु वे अपनी अनुस्मृति से कतरा रहे है
तफ़्सीर:
यदि अल्लाह चीज़ों का संचालन और उनका प्रबंध उनके मन की इच्छाओं के अनुसार करने लगे, तो आकाशों और धरती की व्यवस्था बिगड़ जाए और उनमें जो भी मौजूद हैं सब बिगाड़ के शिकार हो जाएँ। क्योंकि वे चीजों के परिणामों, तथा सही और भ्रष्ट उपाय (प्रबंधन) से अनजान हैं। बल्कि, हम उनके पास वह क़ुरआन लेकर आए हैं, जिसमें उनकी प्रतिष्ठा और सम्मान है, तो वे इससे मुँह मोड़ने वाले हैं।
आयत 72
أَمْ تَسْـَٔلُهُمْ خَرْجًۭا فَخَرَاجُ رَبِّكَ خَيْرٌۭ ۖ وَهُوَ خَيْرُ ٱلرَّٰزِقِينَ
أَمْ
या
تَسْـَٔلُهُمْ
आप सवाल करते हैं उनसे
خَرْجًۭا
माल/अदायगी का
فَخَرَاجُ
तो ख़िराज/अजरो सवाब
رَبِّكَ
आपके रब का
خَيْرٌۭ ۖ
बेहतर है
وَهُوَ
और वो
خَيْرُ
बेहतर है
ٱلرَّٰزِقِينَ
सब रिज़्क़ देने वालों से
या तुम उनसे कुथ शुल्क माँग रहे हो? तुम्हारे रब का दिया ही उत्तम है। और वह सबसे अच्छी रोज़ी देनेवाला है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) क्या आपने उस (धर्म) पर जो आप इन लोगों के पास लेकर आए हैं, इनसे कोई पारिश्रमिक माँगा है, जिसके कारण वे निमंत्रण को अस्वीकार कर रहे हैं? यह तो आपके द्वारा नहीं हुआ है। क्योंकि आपके रब का सवाब और उसका बदला, इनके और इनके अलावा लोगों के बदले (पारिश्रमिक) से बेहतर है। और वह - महिमावान् - सब रोज़ी देने वालों से बेहतर है।
आयत 73
وَإِنَّكَ لَتَدْعُوهُمْ إِلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ
وَإِنَّكَ
और बेशक आप
لَتَدْعُوهُمْ
अलबत्ता आप बुलाते हैं उन्हें
إِلَىٰ
to
صِرَٰطٍۢ
तरफ़ रास्ते
مُّسْتَقِيمٍۢ
सीधे के
और वास्तव में तुम उन्हें सीधे मार्ग की ओर बुला रहे हो
तफ़्सीर:
तथा निश्चय (ऐ रसूल!) आप इनको और इनके अलावा लोगों को एक सीधे रास्ते की ओर बुलाते हैं, जिसमें कोई टेढ़ापन नहीं है, और वह इस्लाम का रास्ता है।
आयत 74
وَإِنَّ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ عَنِ ٱلصِّرَٰطِ لَنَـٰكِبُونَ
وَإِنَّ
और बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाते
بِٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत पर
عَنِ
from
ٱلصِّرَٰطِ
रास्ते से
لَنَـٰكِبُونَ
अलबत्ता हट जाने वाले हैं
किन्तु जो लोग आख़िरत पर ईमान नहीं रखते वे इस मार्ग से हटकर चलना चाहते है
तफ़्सीर:
जो लोग आख़िरत और उसमें घटित होने वाले हिसाब, दंड और प्रतिफल पर ईमान नहीं रखते, वे इस्लाम के मार्ग से हटकर दूसरे टेढ़े रास्तों पर चलने वाले हैं, जो जहन्नम की ओर ले जाते हैं।
आयत 75
۞ وَلَوْ رَحِمْنَـٰهُمْ وَكَشَفْنَا مَا بِهِم مِّن ضُرٍّۢ لَّلَجُّوا۟ فِى طُغْيَـٰنِهِمْ يَعْمَهُونَ
۞ وَلَوْ
और अगर
رَحِمْنَـٰهُمْ
रहम करें हम उन पर
وَكَشَفْنَا
और खोल दें हम
مَا
जो
بِهِم
उन्हें है
مِّن
of
ضُرٍّۢ
तकलीफ़ में से
لَّلَجُّوا۟
अलबत्ता वो अड़े रहेंगे
فِى
in
طُغْيَـٰنِهِمْ
अपनी सरकशी में
يَعْمَهُونَ
भटकते हुए
यदि हम (किसी आज़माइश में डालने के पश्चात) उनपर दया करते और जिस तकलीफ़ में वे होते उसे दूर कर देते तो भी वे अपनी सरकशी में हठात बहकते रहते
तफ़्सीर:
अगर हम उनपर दया करें और जिस अकाल और भुखमरी से वे पीड़ित हैं, उसे उनसे दूर कर दें, तो भी वे सत्य से अपनी गुमराही में बने रहेंगे इस हाल में कि संकोचवश भटक रहे होंगे।
आयत 76
وَلَقَدْ أَخَذْنَـٰهُم بِٱلْعَذَابِ فَمَا ٱسْتَكَانُوا۟ لِرَبِّهِمْ وَمَا يَتَضَرَّعُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَخَذْنَـٰهُم
पकड़ लिया हमने उन्हें
بِٱلْعَذَابِ
साथ अज़ाब के
فَمَا
पस ना
ٱسْتَكَانُوا۟
उन्होंने आजिज़ी की
لِرَبِّهِمْ
अपने रब के लिए
وَمَا
और ना
يَتَضَرَّعُونَ
वो गिड़गिड़ाए
यद्यपि हमने उन्हें यातना में पकड़ा, फिर भी वे अपने रब के आगे न तो झुके और न वे गिड़गिड़ाते ही थे
तफ़्सीर:
हमने विभिन्न प्रकार की आपदाओं द्वारा उनका परीक्षण किया। परन्तु वे न अपने पालनहार के सामने झुके और न ही उससे विनम्रतापूर्वक दुआ की कि उनसे आपदाओं को दूर कर दे।
आयत 77
حَتَّىٰٓ إِذَا فَتَحْنَا عَلَيْهِم بَابًۭا ذَا عَذَابٍۢ شَدِيدٍ إِذَا هُمْ فِيهِ مُبْلِسُونَ
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
فَتَحْنَا
खोल दिया हमने
عَلَيْهِم
उन पर
بَابًۭا
दरवाज़ा
ذَا
of a punishment
عَذَابٍۢ
of a punishment
شَدِيدٍ
सख़्त अज़ाब वाला
إِذَا
यकायक
هُمْ
वो
فِيهِ
उसमें
مُبْلِسُونَ
मायूस होने वाले थे
यहाँ तक कि जब हम उनपर कठोर यातना का द्वार खोल दें तो क्या देखेंगे कि वे उसमें निराश होकर रह गए है
तफ़्सीर:
यहाँ तक कि जब हमने उनपर सख़्त यातना का कोई द्वार खोल दिया, तो तुरंत वे उसमें हर राहत और भलाई से निराश हो गए।
आयत 78
وَهُوَ ٱلَّذِىٓ أَنشَأَ لَكُمُ ٱلسَّمْعَ وَٱلْأَبْصَـٰرَ وَٱلْأَفْـِٔدَةَ ۚ قَلِيلًۭا مَّا تَشْكُرُونَ
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِىٓ
जिसने
أَنشَأَ
पैदा किए
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلسَّمْعَ
कान
وَٱلْأَبْصَـٰرَ
और आँखें
وَٱلْأَفْـِٔدَةَ ۚ
और दिल
قَلِيلًۭا
little
مَّا
कितना कम
تَشْكُرُونَ
तुम शुक्र अदा करते हो
और वही है जिसने तुम्हारे लिए कान और आँखे और दिल बनाए। तुम कृतज्ञता थोड़े ही दिखाते हो!
तफ़्सीर:
(ऐ पुनर्जीवन को झुठलाने वालो!) अल्लाह पाक ही ने तुम्हारे लिए कान बनाए; ताकि उनसे सुनो, आँखें बनाईं; ताकि उनसे देखो और दिल बनाए; ताकि उनसे समझो। फिर भी तुम इन नेमतों पर उसका बहुत कम ही शुक्रिया अदा करते हो।
आयत 79
وَهُوَ ٱلَّذِى ذَرَأَكُمْ فِى ٱلْأَرْضِ وَإِلَيْهِ تُحْشَرُونَ
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
ذَرَأَكُمْ
फैला दिया तुम्हें
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَإِلَيْهِ
और तरफ़ उसी के
تُحْشَرُونَ
तुम इकट्ठे किए जाओगे
वही है जिसने तुम्हें धरती में पैदा करके फैलाया और उसी की ओर तुम इकट्ठे होकर जाओगे
तफ़्सीर:
वही है जिसने (ऐ लोगो!) तुम्हें धरती में पैदा किया और तुम क़ियामत के दिन अकेले उसी के पास हिसाब और बदले के लिए एकत्र किए जाओगे।
आयत 80
وَهُوَ ٱلَّذِى يُحْىِۦ وَيُمِيتُ وَلَهُ ٱخْتِلَـٰفُ ٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जो
يُحْىِۦ
ज़िन्दा करता है
وَيُمِيتُ
और वो मौत देता है
وَلَهُ
और उसी के लिए है
ٱخْتِلَـٰفُ
आगे पीछे आना
ٱلَّيْلِ
रात
وَٱلنَّهَارِ ۚ
और दिन का
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल से काम लेते
और वही है जो जीवन प्रदान करता और मृत्यु देता है और रात और दिन का उलट-फेर उसी के अधिकार में है। फिर क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?
तफ़्सीर:
वही अकेला सर्वशक्तिमान है, जो जीवन देता है, उसके सिवा कोई दूसरा जीवन देने वाला नहीं। वही अकेला मौत देता है, उसके सिवा कोई दूसरा मौत देने वाला नहीं। तथा उसी अकेले के अधिकार में अंधेरे और रोशनी, लंबाई और लघुता के एतिबार से रात और दिन के बदलने का आकलन करना है। तो क्या तुम उसकी शक्ति तथा पैदा करने और प्रबंध करने में उसकी एकता को नहीं समझते?
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह की रोज़ी और सुनने-देखने की नेमत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि कान, आंख और दिल जैसी नेमतों का शुक्र अदा करना चाहिए, इन्हें बेकार कामों में ज़ाया नहीं करना चाहिए।
आयत 81
بَلْ قَالُوا۟ مِثْلَ مَا قَالَ ٱلْأَوَّلُونَ
بَلْ
बल्कि
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
مِثْلَ
मानिन्द
مَا
उसके जो
قَالَ
कहा था
ٱلْأَوَّلُونَ
पहलों ने
नहीं, बल्कि वे लोग वहीं कुछ करते है जो उनके पहले के लोग कह चुके है
तफ़्सीर:
बल्कि उन्होंने भी वैसी ही बात कही, जो उनके बाप-दादा तथा कुफ़्र में उनके पूर्वजों ने कही थी।
आयत 82
قَالُوٓا۟ أَءِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًۭا وَعِظَـٰمًا أَءِنَّا لَمَبْعُوثُونَ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَءِذَا
क्या जब
مِتْنَا
मर जाऐंगे हम
وَكُنَّا
और हो जाऐंगे हम
تُرَابًۭا
मिट्टी
وَعِظَـٰمًا
और हड्डियाँ
أَءِنَّا
क्या वाक़ई हम
لَمَبْعُوثُونَ
अलबत्ता उठाए जाने वाले हैं
उन्होंने कहा, "क्या जब हम मरकर मिट्टी और हड्डियाँ होकर रह जाएँगे , तो क्या हमें दोबारा जीवित करके उठाया जाएगा?
तफ़्सीर:
उन्होंने पुनर्जीवन का इनकार करते हुए और उसे असंभव जताते हुए कहा : क्या जब हम मर जाएँगे और मिट्टी तथा सड़ी-गली हड्डियाँ बन जाएँगे, तो क्या सचमुच हमें हिसाब के लिए जीवित करके उठाया जाएगा?!
आयत 83
لَقَدْ وُعِدْنَا نَحْنُ وَءَابَآؤُنَا هَـٰذَا مِن قَبْلُ إِنْ هَـٰذَآ إِلَّآ أَسَـٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
وُعِدْنَا
वादा किए गए हम
نَحْنُ
हम
وَءَابَآؤُنَا
और आबा ओ अजदाद हमारे
هَـٰذَا
इसका
مِن
before
قَبْلُ
इससे क़ब्ल
إِنْ
नहीं
هَـٰذَآ
ये
إِلَّآ
मगर
أَسَـٰطِيرُ
कहानियाँ
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों की
यह वादा तो हमसे और इससे पहले हमारे बाप-दादा से होता आ रहा है। कुछ नहीं, यह तो बस अगलों की कहानियाँ है।"
तफ़्सीर:
हमसे यह वादा किया गया है - कि मरने के बाद पुनर्जीवित होना है - तथा इससे पहले हमारे पूर्वजों से भी यही वादा किया गया था। लेकिन हमने उस वादे को पूरा होते नहीं देखा। यह कुछ और नहीं बल्कि पहले लोगों की किंवदंतियां और झूठी कहानियाँ हैं।
आयत 84
قُل لِّمَنِ ٱلْأَرْضُ وَمَن فِيهَآ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
قُل
कह दीजिए
لِّمَنِ
किस के लिए है
ٱلْأَرْضُ
ज़मीन
وَمَن
और जो कुछ
فِيهَآ
इसमें है
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
تَعْلَمُونَ
तु जानते
कहो, "यह धरती और जो भी इसमें आबाद है, वे किसके है, बताओ यदि तुम जानते हो?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) पुनर्जीवन का इनकार करने वाले इन काफ़िरों से कह दें : यह धरती और जो कोई भी इस पर है, किसका है? अगर तुम्हारे पास ज्ञान हो तो बताओ?
आयत 85
سَيَقُولُونَ لِلَّهِ ۚ قُلْ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ
سَيَقُولُونَ
अनक़रीब वो कहेंगे
لِلَّهِ ۚ
अल्लाह ही के लिए
قُلْ
कह दीजिए
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
تَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ते
वे बोल पड़ेगे, "अल्लाह के!" कहो, "फिर तुम होश में क्यों नहीं आते?"
तफ़्सीर:
वे कहेंगे : यह धरती और जो कोई भी इसपर है, सब अल्लाह का है। अतः आप उनसे कह दें : क्या तुम्हें यह बात समझ में नहीं आती कि जो धरती और उसपर मौजूद सारी चीज़ों का मालिक है, वह तुम्हारी मृत्यु के बाद तुम्हें पुनर्जीवित करने में सक्षम है?
आयत 86
قُلْ مَن رَّبُّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ ٱلسَّبْعِ وَرَبُّ ٱلْعَرْشِ ٱلْعَظِيمِ
قُلْ
कह दीजिए
مَن
कौन
رَّبُّ
रब है
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
(of) the seven heavens
ٱلسَّبْعِ
सात आसमानों का
وَرَبُّ
और रब है
ٱلْعَرْشِ
अर्शे
ٱلْعَظِيمِ
अज़ीम का
कहो, "सातों आकाशों का मालिक और महान राजासन का स्वामीकौन है?"
तफ़्सीर:
आप उनसे पूछिए : सातों आकाशों का स्वामी कौन है? तथा महान सिंहासन का स्वामी कौन है, जिससे बड़ा कोई सृजन नहीं है?
आयत 87
سَيَقُولُونَ لِلَّهِ ۚ قُلْ أَفَلَا تَتَّقُونَ
سَيَقُولُونَ
अनक़रीब वो कहेंगे
لِلَّهِ ۚ
अल्लाह ही के लिए
قُلْ
कह दीजिए
أَفَلَا
क्या भला नहीं
تَتَّقُونَ
तुम डरते
वे कहेंगे, "सब अल्लाह के है।" कहो, "फिर डर क्यों नहीं रखते?"
तफ़्सीर:
वे कहेंगे : सातों आकाश और महान सिंहासन अल्लाह के हैं। तो आप उनसे कह दें : फिर अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई चीज़ों से बचकर, तुम उससे डरते क्यों नहीं, ताकि उसकी यातना से सुरक्षित रहो?
आयत 88
قُلْ مَنۢ بِيَدِهِۦ مَلَكُوتُ كُلِّ شَىْءٍۢ وَهُوَ يُجِيرُ وَلَا يُجَارُ عَلَيْهِ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
قُلْ
कह दीजिए
مَنۢ
कौन है
بِيَدِهِۦ
जिसके हाथ में है
مَلَكُوتُ
बादशाहत
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ की
وَهُوَ
और वो
يُجِيرُ
वो पनाह देता है
وَلَا
और नहीं
يُجَارُ
पनाह दी जा सकती
عَلَيْهِ
उसके ख़िलाफ़
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
تَعْلَمُونَ
तुम इल्म रखते
कहो, "हर चीज़ की बादशाही किसके हाथ में है, वह जो शरण देता है औऱ जिसके मुक़ाबले में कोई शरण नहीं मिल सकती, बताओ यजि तुम जानते हो?"
तफ़्सीर:
आप उनसे पूछिए : कौन है वह, जिसके स्वामित्व में प्रत्येक वस्तु है, कोई चीज़ उसके स्वामित्व से निकल नहीं सकती, वह अपने बंदों में से जिसकी चाहे मदद करता है तथा जिसके साथ वह बुराई का इरादा करे उसे कोई उससे छुड़ा नहीं सकता कि उससे यातना को टाल दे। यदि तुम ज्ञान रखते हो, तो बताओ।
आयत 89
سَيَقُولُونَ لِلَّهِ ۚ قُلْ فَأَنَّىٰ تُسْحَرُونَ
سَيَقُولُونَ
अनक़रीब वो कहेंगे
لِلَّهِ ۚ
अल्लाह ही के लिए
قُلْ
कह दीजिए
فَأَنَّىٰ
तो कहाँ से
تُسْحَرُونَ
तुम मसहूर किए जाते हो
वे बोल पड़ेगे, "अल्लाह की।" कहो, "फिर कहाँ से तुमपर जादू चल जाता है?"
तफ़्सीर:
वे कहेंगे : प्रत्येक वस्तु का स्वामित्व अल्लाह पाक के हाथ में है। अतः आप उनसे कह दें : जब तुम यह स्वीकार करते हो, तो फिर तुम्हारी बुद्धि कहाँ चली जाती है कि उसके अलावा किसी और की पूजा करते हो?!
आयत 90
بَلْ أَتَيْنَـٰهُم بِٱلْحَقِّ وَإِنَّهُمْ لَكَـٰذِبُونَ
بَلْ
बल्कि
أَتَيْنَـٰهُم
हम लाए हैं उनके पास
بِٱلْحَقِّ
हक़ को
وَإِنَّهُمْ
और बेशक वो
لَكَـٰذِبُونَ
अलबत्ता झूठे हैं
नहीं, बल्कि हम उनके पास सत्य लेकर आए है और निश्चय ही वे झूठे है
तफ़्सीर:
मामला वैसा नहीं है, जैसा वे दावा करते हैं। बल्कि हम उनके पास ऐसा सत्य लाए हैं, जिसमें कोई संदेह नहीं। और वे अल्लाह के साझी और संतान होने का दावा करने में निश्चय झूठे हैं। अल्लाह उनकी इस बात से बहुत ऊँचा है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मुशरिकों से सवाल-जवाब का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि जब कोई खुद तस्लीम करे कि सब कुछ अल्लाह का है, फिर भी उसकी इबादत न करे, तो यह बड़ा तज़ाद (विरोधाभास) है।
आयत 91
مَا ٱتَّخَذَ ٱللَّهُ مِن وَلَدٍۢ وَمَا كَانَ مَعَهُۥ مِنْ إِلَـٰهٍ ۚ إِذًۭا لَّذَهَبَ كُلُّ إِلَـٰهٍۭ بِمَا خَلَقَ وَلَعَلَا بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍۢ ۚ سُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ عَمَّا يَصِفُونَ
مَا
नहीं
ٱتَّخَذَ
बनाई
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِن
any
وَلَدٍۢ
कोई औलाद
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
مَعَهُۥ
साथ उसके
مِنْ
any
إِلَـٰهٍ ۚ
कोई इलाह
إِذًۭا
तब
لَّذَهَبَ
अलबत्ता ले जाता
كُلُّ
हर
إِلَـٰهٍۭ
इलाह
بِمَا
उसे जो
خَلَقَ
उसने पैदा किया
وَلَعَلَا
और अलबत्ता चढ़ाई करता
بَعْضُهُمْ
बाज़ उनका
عَلَىٰ
[on]
بَعْضٍۢ ۚ
बाज़ पर
سُبْحَـٰنَ
पाक है
ٱللَّهِ
अल्लाह
عَمَّا
उससे जो
يَصِفُونَ
वो बयान करते हैं
अल्लाह ने अपना कोई बेटा नहीं बनाया और न उसके साथ कोई अन्य पूज्य-प्रभु है। ऐसा होता तो प्रत्येक पूज्य-प्रभु अपनी सृष्टि को लेकर अलग हो जाता और उनमें से एक-दूसरे पर चढ़ाई कर देता। महान और उच्च है अल्लाह उन बातों से, जो वे बयान करते है;
तफ़्सीर:
अल्लाह ने कोई संतान नहीं बनाई, जैसा कि काफिरों का दावा है, और उसके साथ वास्तव में कभी कोई पूज्य नहीं था। यदि मान लिया जाए कि उसके साथ वास्तव में कोई पूज्य है, तो प्रत्यक पूज्य उस सृष्टि के अपने हिस्से के साथ चला जाता, जो उसने बनाया था, और वे अवश्य एक-दूसरे पर चढ़ दौड़ते। इस प्रकार ब्रह्मांड की व्यवस्था बिगड़ जाती। जबकि वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। अतः यह इंगित करता है कि सत्य पूज्य एक ही है और वह अकेला अल्लाह है। वह बहुत पवित्र एवं महान है उन अयोग्य बातों से, जो अनेकेश्वरवादी उसके साझी और संतान होने की बयान करते हैं।
आयत 92
عَـٰلِمِ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَـٰدَةِ فَتَعَـٰلَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ
عَـٰلِمِ
जानने वाला है
ٱلْغَيْبِ
ग़ैब
وَٱلشَّهَـٰدَةِ
और हाज़िर का
فَتَعَـٰلَىٰ
पस वो बहुत बुलन्द है
عَمَّا
उस से जो
يُشْرِكُونَ
वो शरीक करते हैं
जाननेवाला है छुपे और खुले का। सो वह उच्चतर है वह शिर्क से जो वे करते है!
तफ़्सीर:
वह हर उस चीज़ को जानने वाला है, जो उसकी मख़लूक़ से अदृश्य है तथा हर उस चीज़ को जानने वाला है, जिसे इंद्रियों द्वारा देखा और जाना जाता है। इनमें से कोई चीज़ उससे छिपी नहीं है। अतः वह महिमावान् इस बात से सर्वोच्च है कि उसका कोई साझी हो।
आयत 93
قُل رَّبِّ إِمَّا تُرِيَنِّى مَا يُوعَدُونَ
قُل
कह दीजिए
رَّبِّ
ऐ मेरे रब
إِمَّا
अगर
تُرِيَنِّى
तू दिखाए मुझे
مَا
जो
يُوعَدُونَ
वो वादा किए जाते हैं
कहो, "ऐ मेरे रब! जिस चीज़ का वादा उनसे किया जा रहा है, वह यदि तू मुझे दिखाए
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप दुआ करें : ऐ मेरे पालनहार! अगर तू कभी मुझे इन बहुदेववादियों के बारे में वह यातना दिखाए, जिसका तूने इनसे वादा किया है।
आयत 94
رَبِّ فَلَا تَجْعَلْنِى فِى ٱلْقَوْمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ
رَبِّ
ऐ मेरे रब
فَلَا
तो ना
تَجْعَلْنِى
तू करना मुझे
فِى
among
ٱلْقَوْمِ
उन लोगों में
ٱلظَّـٰلِمِينَ
जो ज़ालिम हैं
तो मेरे रब! मुझे उन अत्याचारी लोगों में सम्मिलित न करना।"
तफ़्सीर:
ऐ मेरे पालनहार! यदि तू उनको दंडित करे और मैं उस समय उपस्थित रहूँ, तो मुझे उनमें शामिल न करना कि मुझे भी उनके साथ यातना का सामना करना पड़ जाए।
आयत 95
وَإِنَّا عَلَىٰٓ أَن نُّرِيَكَ مَا نَعِدُهُمْ لَقَـٰدِرُونَ
وَإِنَّا
और बेशक हम
عَلَىٰٓ
इस( बात) पर
أَن
कि
نُّرِيَكَ
हम दिखाऐं आपको
مَا
जिसका
نَعِدُهُمْ
हम वादा कर रहे हैं उनसे
لَقَـٰدِرُونَ
अलबत्ता क़ादिर हैं
निश्चय ही हमें इसकी सामर्थ्य प्राप्त है कि हम उनसे जो वादा कर रहे है, वह तुम्हें दिखा दें।
तफ़्सीर:
निश्चय हम आपको वह अज़ाब दिखाने में सक्षम हैं, जिसका हम उनसे वादा कर रहे हैं। हम ऐसा करने या इसके अलावा करने में असमर्थ नहीं हैं।
आयत 96
ٱدْفَعْ بِٱلَّتِى هِىَ أَحْسَنُ ٱلسَّيِّئَةَ ۚ نَحْنُ أَعْلَمُ بِمَا يَصِفُونَ
ٱدْفَعْ
दूर कर दीजिए
بِٱلَّتِى
उस (तरीक़े) से
هِىَ
वो (जो)
أَحْسَنُ
ज़्यादा अच्छा है
ٱلسَّيِّئَةَ ۚ
बुराई को
نَحْنُ
हम
أَعْلَمُ
ख़ूब जानते हैं
بِمَا
उसे जो
يَصِفُونَ
वो बयान करते हैं
बुराई को उस ढंग से दूर करो, जो सबसे उत्तम हो। हम भली-भाँति जानते है जो कुछ बातें वे बनाते है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) जो आपके साथ बुरा व्यवहार करे, आप उसका जवाब ऐसे व्यवहार से दें, जो सबसे अच्छा हो; इस प्रकार कि आप उसे माफ़ कर दें और उसकी ओर से पहुँचने वाले कष्ट पर धैर्य रखें। हम उस शिर्क और झुठलाने की बातों से भली-भाँति अवगत हैं, जो वे बयान करते हैं और जो वे आपके बारे में ऐसी बातें वर्णन करते हैं, जो आपके योग्य नहीं हैं, जैसे कि जादू और पागलपन।
आयत 97
وَقُل رَّبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ هَمَزَٰتِ ٱلشَّيَـٰطِينِ
وَقُل
और कह दीजिए
رَّبِّ
ऐ मेरे रब
أَعُوذُ
I seek refuge
بِكَ
मैं पनाह लेता हूँ तेरी
مِنْ
from
هَمَزَٰتِ
वसवसों से
ٱلشَّيَـٰطِينِ
शैतानों के
और कहो, "ऐ मेरे रब! मैं शैतान की उकसाहटों से तेरी शरण चाहता हूँ
तफ़्सीर:
और आप दुआ करें : ऐ मेरे पालनहार! मै शैतानों की उकसाहटों और उनके वसवसों से तेरी शरण में आता हूँ।
आयत 98
وَأَعُوذُ بِكَ رَبِّ أَن يَحْضُرُونِ
وَأَعُوذُ
And I seek refuge
بِكَ
और मैं पनाह लेता हूँ तेरी
رَبِّ
ऐ मेरे रब
أَن
इस से कि
يَحْضُرُونِ
वो हाज़िर हों मेरे पास
और मेरे रब! मैं इससे भी तेरी शरण चाहता हूँ कि वे मेरे पास आएँ।" -
तफ़्सीर:
तथा ऐ मेरे पालनहार! मैं इस बात से तेरी शरण माँगता हूँ कि वे मेरे किसी भी मामले में मेरे पास उपस्थित हों।
आयत 99
حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءَ أَحَدَهُمُ ٱلْمَوْتُ قَالَ رَبِّ ٱرْجِعُونِ
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
جَآءَ
आ जाएगी
أَحَدَهُمُ
उनमें से एक को
ٱلْمَوْتُ
मौत
قَالَ
कहेगा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
ٱرْجِعُونِ
वापस लौटा दो मुझे
यहाँ तक कि जब उनमें से किसी की मृत्यु आ गई तो वह कहेगा, "ऐ मेरे रब! मुझे लौटा दे। - ताकि जिस (संसार) को मैं छोड़ आया हूँ
तफ़्सीर:
यहाँ तक कि जब इन बहुदेववादियों में से किसी के पास मौत आती है और जो कुछ उसके साथ होने वाला है, वह उसे अपनी आँखों से देख लेता है, तो अपनी बीती हुई आयु और अल्लाह के आदेश के पालन में होने वाली कोताही पर पछतावा करते हुए कहता है : ऐ मेरे पालनहार! मुझे दुनिया के जीवन की ओर लौटा दे।
आयत 100
لَعَلِّىٓ أَعْمَلُ صَـٰلِحًۭا فِيمَا تَرَكْتُ ۚ كَلَّآ ۚ إِنَّهَا كَلِمَةٌ هُوَ قَآئِلُهَا ۖ وَمِن وَرَآئِهِم بَرْزَخٌ إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ
لَعَلِّىٓ
ताकि मैं
أَعْمَلُ
मैं अमल करूँ
صَـٰلِحًۭا
नेक
فِيمَا
उसमें जो
تَرَكْتُ ۚ
छोड़ आया मैं
كَلَّآ ۚ
हरगिज़ नहीं
إِنَّهَا
बेशक वो
كَلِمَةٌ
एक बात है
هُوَ
वो
قَآئِلُهَا ۖ
कहने वाला है उसे
وَمِن
and before them
وَرَآئِهِم
और आगे उनके
بَرْزَخٌ
बरज़ख़ है
إِلَىٰ
till
يَوْمِ
उस दिन तक
يُبْعَثُونَ
वो सब उठाए जाऐंगे
उसमें अच्छा कर्म करूँ।" कुछ नहीं, यह तो बस एक (व्यर्थ) बात है जो वह कहेगा और उनके पीछे से लेकर उस दिन तक एक रोक लगी हुई है, जब वे दोबारा उठाए जाएँगे
तफ़्सीर:
ताकि मैं संसार में लौटकर कोई नेक काम कर लूँ। कदापि नहीं, मामला वैसा नहीं है, जैसा कि उसने अनुरोध किया है। यह केवल एक शब्द है जो वह कहने वाला है। अगर उसे सांसारिक जीवन में वापस भेज दिया जाए, तो वह अपना किया हुआ वादा पूरा नहीं करेगा। ये मरने वाले लोग, क़ियामत के दिन तक दुनिया और आख़िरत के बीच एक ओट में रहेंगे। इसलिए वे वहाँ से दुनिया में वापस नहीं आएँगे कि जो कुछ उनसे छूट गया है, उसकी छतिपूर्ति कर लें और जो कुछ उन्होंने बिगाड़ा है, उसे ठीक कर लें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
तौहीद की दलील और मौत के वक्त की ख्वाहिश का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि मौत के करीब हर गुनाहगार वापस जाने की तमन्ना करता है, इसलिए ज़िंदगी में ही सुधरने का मौका ग़नीमत समझना चाहिए।
आयत 101
فَإِذَا نُفِخَ فِى ٱلصُّورِ فَلَآ أَنسَابَ بَيْنَهُمْ يَوْمَئِذٍۢ وَلَا يَتَسَآءَلُونَ
فَإِذَا
फिर जब
نُفِخَ
फूँक मारी जाएगी
فِى
in
ٱلصُّورِ
सूर में
فَلَآ
तो नहीं
أَنسَابَ
रिश्तेदारियाँ
بَيْنَهُمْ
दरमियान उनके
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
وَلَا
और ना
يَتَسَآءَلُونَ
वो एक दूसरे से सवाल करेंगे
फिर जब सूर (नरसिंघा) में फूँक मारी जाएगी तो उस दिन उनके बीच रिश्ते-नाते शेष न रहेंगे, और न वे एक-दूसरे को पूछेंगे
तफ़्सीर:
फिर जब सूर (नरसिंघा) में फूँक मारने के कार्य पर नियुक्त फरिश्ता, उसमें दूसरी बार फूँक मारेगा, जो क़ियामत का ऐलान होगा, तो उनके बीच कोई रिश्ते-नाते नहीं होंगे जिनपर वे गर्व करते हैं, क्योंकि वे क़ियामत की भयावहता में व्यस्त होंगे। तथा वे अपनी-अपनी चिंताओं में व्यस्त होने के कारण एक-दूसरे को नहीं पूछेंगे।
आयत 102
فَمَن ثَقُلَتْ مَوَٰزِينُهُۥ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ
فَمَن
तो जो कोई
ثَقُلَتْ
भारी हुए
مَوَٰزِينُهُۥ
पलड़े उसके
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْمُفْلِحُونَ
जो फ़लाह पाने वाले हैं
फिर जिनके पलड़े भारी हुए तॊ वही हैं जो सफल।
तफ़्सीर:
फिर जिसके पलड़े, उसकी नेकियों के उसके गुनाहों से अधिक होने के कारण, भारी हो गए, तो वही लोग अपनी अपेक्षित चीज़ों को प्राप्त करके और अपनी अप्रिय चीज़ों से मुक्ति पाकर, सफल हैं।
आयत 103
وَمَنْ خَفَّتْ مَوَٰزِينُهُۥ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ فِى جَهَنَّمَ خَـٰلِدُونَ
وَمَنْ
और जो कोई कि
خَفَّتْ
हल्के हुए
مَوَٰزِينُهُۥ
पलड़े उसके
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
خَسِرُوٓا۟
ख़सारे में डाला
أَنفُسَهُمْ
अपने आप को
فِى
in
جَهَنَّمَ
जहन्नम में
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
रहे वे लोग जिनके पलड़े हल्के हुए, तो वही है जिन्होंने अपने आपको घाटे में डाला। वे सदैव जहन्नम में रहेंगे
तफ़्सीर:
और जिसके पलड़े, उसके गुनाहों के उसकी नेकियों से अधिक होने के कारण, भारी हो गए, तो वही लोग हैं, जिन्होंने खुद को बर्बाद कर दिया। क्योंकि उन्होंने ऐसे कार्य किए, जो उनके लिए हानिकारक हैं और ईमान तथा सत्कर्म को छोड़ दिया, जो उनके लिए लाभदायक हैं। अतः वे हमेशा जहन्नम की आग में रहने वाले हैं, उससे कभी बाहर नहीं निकलेंगे।
आयत 104
تَلْفَحُ وُجُوهَهُمُ ٱلنَّارُ وَهُمْ فِيهَا كَـٰلِحُونَ
تَلْفَحُ
झुलसा देगी
وُجُوهَهُمُ
उनके चेहरों को
ٱلنَّارُ
आग
وَهُمْ
और वो
فِيهَا
उसमें
كَـٰلِحُونَ
मुँह बिगाड़ने वाले होंगे
आग उनके चेहरों को झुलसा देगी और उसमें उनके मुँह विकृत हो रहे होंगे
तफ़्सीर:
उनके चेहरों को जहन्नम की आग जला देगी। और उसमें उनकी स्थिति यह होगी कि गंभीर रूप से त्योरी चढ़ा हुआ होने से उनके ऊपरी और निचले होंठ सिकुड़ गए होंगे और उनके दाँत बाहर निकले आए होंगे।
आयत 105
أَلَمْ تَكُنْ ءَايَـٰتِى تُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ فَكُنتُم بِهَا تُكَذِّبُونَ
أَلَمْ
क्या ना
تَكُنْ
थीं
ءَايَـٰتِى
आयात मेरी
تُتْلَىٰ
पढ़ी जातीं
عَلَيْكُمْ
तुम पर
فَكُنتُم
तो थे तुम
بِهَا
उन्हें
تُكَذِّبُونَ
तुम झुठलाते
(कहा जाएगा,) "क्या तुम्हें मेरी आयातें सुनाई नहीं जाती थी, तो तुम उन्हें झुठलाते थे?"
तफ़्सीर:
और उन्हें झिड़कते हुए कहा जाएगा : क्या दुनिया में क़ुरआन की आयतें तुम्हारे सामने पढ़ी न जाती थीं, तो तुम उन्हें झुठलाया करते थे?
आयत 106
قَالُوا۟ رَبَّنَا غَلَبَتْ عَلَيْنَا شِقْوَتُنَا وَكُنَّا قَوْمًۭا ضَآلِّينَ
قَالُوا۟
वो कहेंगे
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
غَلَبَتْ
ग़ालिब आ गई
عَلَيْنَا
हम पर
شِقْوَتُنَا
बदबख़्ती हमारी
وَكُنَّا
और थे हम
قَوْمًۭا
लोग
ضَآلِّينَ
गुमराह
वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमारा दुर्भाग्य हमपर प्रभावी हुआ और हम भटके हुए लोग थे
तफ़्सीर:
वे कहेंगे : ऐ हमारे पालनहार! हमारा दुर्भाग्य हमपर प्रभावी हो गया, जो पहले ही तेरे ज्ञान में था और हम सत्य से भटके हुए लोग थे।
आयत 107
رَبَّنَآ أَخْرِجْنَا مِنْهَا فَإِنْ عُدْنَا فَإِنَّا ظَـٰلِمُونَ
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
أَخْرِجْنَا
निकाल दे
مِنْهَا
इस से
فَإِنْ
फिर अगर
عُدْنَا
दोबारा करें हम
فَإِنَّا
तो बेशक हम
ظَـٰلِمُونَ
ज़ालिम होंगे
हमारे रब! हमें यहाँ से निकाल दे! फिर हम दोबारा ऐसा करें तो निश्चय ही हम अत्याचारी होंगे।"
तफ़्सीर:
ऐ हमारे पालनहार! हमें नरक से निकाल ले। अगर हम दोबारा अपने कुफ़्र और गुमराही की पूर्व स्थिति की ओर लौट गए, तो निश्चय हम अपने आपपर अत्याचार करने वाले होंगे। हमारा बहाना खत्म हो गया।
आयत 108
قَالَ ٱخْسَـُٔوا۟ فِيهَا وَلَا تُكَلِّمُونِ
قَالَ
वो फ़रमाए गा
ٱخْسَـُٔوا۟
पड़े रहो फिटकारे हुए
فِيهَا
उसी में
وَلَا
और ना
تُكَلِّمُونِ
तुम कलाम करो मुझसे
वह कहेगा, "फिटकारे हुए तिरस्कृत, इसी में पड़े रहो और मुझसे बात न करो
तफ़्सीर:
अल्लाह कहेगा : तुम सब जहन्नम में तिरस्कृत व अपमानित होकर पड़े रहो और मुझ से बात न करो।
आयत 109
إِنَّهُۥ كَانَ فَرِيقٌۭ مِّنْ عِبَادِى يَقُولُونَ رَبَّنَآ ءَامَنَّا فَٱغْفِرْ لَنَا وَٱرْحَمْنَا وَأَنتَ خَيْرُ ٱلرَّٰحِمِينَ
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
था वो
فَرِيقٌۭ
एक गिरोह
مِّنْ
of
عِبَادِى
मेरे बन्दों में से
يَقُولُونَ
वो कहते थे
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
فَٱغْفِرْ
पस बख़्श दे
لَنَا
हमें
وَٱرْحَمْنَا
और रहम फ़रमा हम पर
وَأَنتَ
और तू
خَيْرُ
बेहतर है
ٱلرَّٰحِمِينَ
सब रहम करने वालों में
मेरे बन्दों में कुछ लोग थे, जो कहते थे, हमारे रब! हम ईमान ले आए। अतः तू हमें क्षमा कर दे और हमपर दया कर। तू सबसे अच्छा दया करनेवाला है
तफ़्सीर:
मेरे बंदों में से कुछ लोग, जो मुझपर ईमान लाए थे, कहा करते थे : ऐ हमारे रब! हम तुझपर ईमान लाए। अतः हमारे गुनाह माफ़ कर दे और हमपर दया कर। और तू सब दया करने वालों से बेहतर है।
आयत 110
فَٱتَّخَذْتُمُوهُمْ سِخْرِيًّا حَتَّىٰٓ أَنسَوْكُمْ ذِكْرِى وَكُنتُم مِّنْهُمْ تَضْحَكُونَ
فَٱتَّخَذْتُمُوهُمْ
तो बना लिया तुमने उन्हें
سِخْرِيًّا
मज़ाक़
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
أَنسَوْكُمْ
उन्होंने भुलवा दिया तुम्हें
ذِكْرِى
ज़िक्र मेरा
وَكُنتُم
और थे तुम
مِّنْهُمْ
उनसे
تَضْحَكُونَ
तुम हँसी किया करते
तो तुमने उनका उपहास किया, यहाँ तक कि उनके कारण तुम मेरी याद को भुला बैठे और तुम उनपर हँसते रहे
तफ़्सीर:
तो तुमने अपने पालनहार को पुकारने वाले इन मोमिनों को उपहास का पात्र बना लिया, जिनका तुम मखौल और हँसी उड़ाते थे यहाँ तक कि उनका उपहास उड़ाने में व्यस्त होने के कारण तुम अल्लाह की याद को भुला बैठे। तथा तुम्हारा उनसे हँसी करना, मज़ाक़ और ठट्ठा के तौर पर था।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन आमाल के तौल का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि उस दिन सिर्फ नेक आमाल का वज़न काम आएगा, इसलिए दुनिया में नेकियां जमा करते रहना चाहिए।
आयत 111
إِنِّى جَزَيْتُهُمُ ٱلْيَوْمَ بِمَا صَبَرُوٓا۟ أَنَّهُمْ هُمُ ٱلْفَآئِزُونَ
إِنِّى
बेशक मैं
جَزَيْتُهُمُ
बदला दिया मैंने उन्हें
ٱلْيَوْمَ
आज
بِمَا
बवजह उसके जो
صَبَرُوٓا۟
उन्होंने सब्र किया
أَنَّهُمْ
बेशक वो
هُمُ
वो ही
ٱلْفَآئِزُونَ
कामयाब होने वाले हैं
आज मैंने उनके धैर्य का यह बदला प्रदान किया कि वही है जो सफलता को प्राप्त हुए।"
तफ़्सीर:
मैंने इन ईमान वालों को, अल्लाह की आज्ञाकारिता पर तथा तुम्हारी ओर से पहुँचने वाले कष्ट पर धैर्य से काम लेने के कारण, क़ियामत के दिन बदले में जन्नत की प्राप्ति में सफलता प्रदान की है।
आयत 112
قَـٰلَ كَمْ لَبِثْتُمْ فِى ٱلْأَرْضِ عَدَدَ سِنِينَ
قَـٰلَ
वो फ़रमाएगा
كَمْ
कितना
لَبِثْتُمْ
ठहरे तुम
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
عَدَدَ
गिनती में
سِنِينَ
सालों की
वह कहेगाः “तुम धरती में कितने वर्ष रहे”?
तफ़्सीर:
वह (अल्लाह उनसे) कहेगा : तुम धरती पर कितने वर्षों तक रहे? और तुमने उसमें कितना समय नष्ट किया?
आयत 113
قَالُوا۟ لَبِثْنَا يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍۢ فَسْـَٔلِ ٱلْعَآدِّينَ
قَالُوا۟
वो कहेंगे
لَبِثْنَا
ठहरे हम
يَوْمًا
एक दिन
أَوْ
या
بَعْضَ
कुछ हिस्सा
يَوْمٍۢ
दिन का
فَسْـَٔلِ
पूछ लीजिए
ٱلْعَآدِّينَ
गिनने वालों से
वॆ कहेंगेः , "एक दिन या एक दिन का कुछ भाग। गणना करनेवालों से पूछ लीजिए।?"
तफ़्सीर:
वे उत्तर देंगे : हम (वहाँ) एक दिन या दिन का कुछ भाग ही रहे हैं। अतः आप उनसे पूछ लें जो दिनों और महीनों की गणना करते हैं।
आयत 114
قَـٰلَ إِن لَّبِثْتُمْ إِلَّا قَلِيلًۭا ۖ لَّوْ أَنَّكُمْ كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
قَـٰلَ
वो फ़रमाएगा
إِن
नहीं
لَّبِثْتُمْ
ठहरे तुम
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا ۖ
बहुत थोड़ा
لَّوْ
काश
أَنَّكُمْ
कि बेशक तुम
كُنتُمْ
होते तुम
تَعْلَمُونَ
तुम जानते
वह कहेगा, "तुम ठहरे थोड़े ही, क्या अच्छा होता तुम जानते होते!
तफ़्सीर:
वह (अल्लाह) कहेगा : सचमुच तुम दुनिया में बहुत थोड़ा ठहरे हो, जिसके दौरान अल्लाह के आज्ञापालन पर सब्र करना आसान था। काश तुम (उस समय) अपने ठहरने की अवधि जानते होते।
आयत 115
أَفَحَسِبْتُمْ أَنَّمَا خَلَقْنَـٰكُمْ عَبَثًۭا وَأَنَّكُمْ إِلَيْنَا لَا تُرْجَعُونَ
أَفَحَسِبْتُمْ
क्या भला समझा था तुमने
أَنَّمَا
कि बेशक
خَلَقْنَـٰكُمْ
पैदा किया हमने तुम्हें
عَبَثًۭا
बेकार
وَأَنَّكُمْ
और बेशक तुम
إِلَيْنَا
तरफ़ हमारे
لَا
not
تُرْجَعُونَ
ना तुम लौटाए जाओगे
तो क्या तुमने यह समझा था कि हमने तुम्हें व्यर्थ पैदा किया है और यह कि तुम्हें हमारी और लौटना नहीं है?"
तफ़्सीर:
(ऐ लोगों!) क्या तुमने समझ रखा था कि हमने तुम्हें बिना किसी हिकमत के खेल-तमाशे के तौर पर पैदा किया है, और जानवरों की तरह कोई इनाम या सज़ा नहीं है, और यह कि तुम क़ियामत के दिन हिसाब और बदले के लिए हमारी ओर नहीं लौटाए जाओगे?
आयत 116
فَتَعَـٰلَى ٱللَّهُ ٱلْمَلِكُ ٱلْحَقُّ ۖ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ رَبُّ ٱلْعَرْشِ ٱلْكَرِيمِ
فَتَعَـٰلَى
तो बहुत बुलन्द है
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْمَلِكُ
बादशाह
ٱلْحَقُّ ۖ
हक़ीक़ी
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह( बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ
वो ही
رَبُّ
रब है
ٱلْعَرْشِ
अर्शे
ٱلْكَرِيمِ
करीम का
तो सर्वोच्च है अल्लाह, सच्चा सम्राट! उसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं, स्वामी है महिमाशाली सिंहासन का
तफ़्सीर:
अतः पवित्र है अल्लाह, जो बादशाह, अपनी मख़लूक में अपनी इच्छा के अनुसार व्यवहार करने वाला है। जो सत्य है, उसका वचन सत्य है और उसकी बात सत्य है। उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। वह सम्मान वाले सिंहासन का रब है, जो कि सबसे महान सृष्टि है। और जो सबसे महान सृष्टि का रब है, वह समस्त सृष्टि का रब है।
आयत 117
وَمَن يَدْعُ مَعَ ٱللَّهِ إِلَـٰهًا ءَاخَرَ لَا بُرْهَـٰنَ لَهُۥ بِهِۦ فَإِنَّمَا حِسَابُهُۥ عِندَ رَبِّهِۦٓ ۚ إِنَّهُۥ لَا يُفْلِحُ ٱلْكَـٰفِرُونَ
وَمَن
और जो
يَدْعُ
पुकारे
مَعَ
साथ
ٱللَّهِ
अल्लाह के
إِلَـٰهًا
इलाह
ءَاخَرَ
दूसरा
لَا
no
بُرْهَـٰنَ
नहीं दलील
لَهُۥ
उसके लिए
بِهِۦ
उसकी
فَإِنَّمَا
तो बेशक
حِسَابُهُۥ
हिसाब है उसका
عِندَ
पास
رَبِّهِۦٓ ۚ
उसके रब के
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَا
not
يُفْلِحُ
नहीं वो फ़लाह पाऐंगे
ٱلْكَـٰفِرُونَ
जो काफ़िर हैं
और जो कोई अल्लाह के साथ किसी दूसरे पूज्य को पुकारे, जिसके लिए उसके पास कोई प्रमाम नहीं, तो बस उसका हिसाब उसके रब के पास है। निश्चय ही इनकार करनेवाले कभी सफल नहीं होगे
तफ़्सीर:
और जो व्यक्ति अल्लाह के साथ किसी अन्य पूज्य को पुकारे, जिसके पूजा के योग्य होने का उसके पास कोई प्रमाण नहीं है (और अल्लाह के अलावा हर पूज्य का यही मामला है), तो उसके बुरे कर्म का बदला उसके पालनहार के पास है। चुनाँचे वही उसे इसपर यातना से दो चार करेगा। निश्चय काफ़िर लोग अपनी अपेक्षित चीज़ों को प्राप्त करने और अप्रिय चीज़ों से मुक्ति पाने में सफल नहीं होंगे।
आयत 118
وَقُل رَّبِّ ٱغْفِرْ وَٱرْحَمْ وَأَنتَ خَيْرُ ٱلرَّٰحِمِينَ
وَقُل
और कह दीजिए
رَّبِّ
ऐ मेरे रब
ٱغْفِرْ
बख़्श दे
وَٱرْحَمْ
और रहम फ़रमा
وَأَنتَ
और तू
خَيْرُ
बेहतर है
ٱلرَّٰحِمِينَ
सब रहम करने वालों से
और कहो, "मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे और दया कर। तू तो सबसे अच्छा दया करनेवाला है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप दुआ करें : ऐ मेरे पालनहार! मेरे पापों को क्षमा कर दे और अपनी दया से मुझपर दया कर। और तू सबसे बेहतर है, जिसने किसी पापी पर दया की और उसकी तौबा क़बूल कर ली।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दुनिया की मुख्तसर मुद्दत और दुआ की ताकीद के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि दुनिया की ज़िंदगी बहुत मुख्तसर है, इसलिए मगफिरत और रहमत की दुआ हमेशा मांगते रहना चाहिए।
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