सूरह अन-नूर سورة النور
मदनी 64 आयतें
नाम का मतलब
रोशनी (अल्लाह की मशहूर आयत-उन-नूर की वजह से)
पृष्ठभूमि
सूरह अन-नूर में पाकदामनी, इल्ज़ाम-तराशी से बचने, घरों में दाखिल होने के आदाब और पर्दे के अहकाम बयान किए गए हैं। इसमें मशहूर आयत-उन-नूर भी है, जो अल्लाह के नूर की तशबीह बयान करती है।
फ़ज़ीलत / सार
इसी सूरह की आयत-उन-नूर अल्लाह की सिफात की सबसे खूबसूरत तशबीहों में से एक मानी जाती है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ سُورَةٌ أَنزَلْنَـٰهَا وَفَرَضْنَـٰهَا وَأَنزَلْنَا فِيهَآ ءَايَـٰتٍۭ بَيِّنَـٰتٍۢ لَّعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ
سُورَةٌ
ये एक सूरत है
أَنزَلْنَـٰهَا
नाज़िल किया हमने इसे
وَفَرَضْنَـٰهَا
और फ़र्ज़ किया हमने इसे
وَأَنزَلْنَا
और नाज़िल कीं हमने
فِيهَآ
इसमें
ءَايَـٰتٍۭ
आयात
بَيِّنَـٰتٍۢ
वाज़ेह
لَّعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ो
यह एक (महत्वपूर्ण) सूरा है, जिसे हमने उतारा है। और इसे हमने अनिवार्य किया है, और इसमें हमने स्पष्ट आयतें (आदेश) अवतरित की है। कदाचित तुम शिक्षा ग्रहण करो
तफ़्सीर:
यह एक सूरत है, जिसे हमने उतारा और इसके आदेशों पर अमल करने को अनिवार्य किया तथा इसमें स्पष्ट आयतें उतारी हैं; इस आशा में कि तुम उसके आदेशों को याद रखो और उनपर अमल करो।
आयत 2
ٱلزَّانِيَةُ وَٱلزَّانِى فَٱجْلِدُوا۟ كُلَّ وَٰحِدٍۢ مِّنْهُمَا مِا۟ئَةَ جَلْدَةٍۢ ۖ وَلَا تَأْخُذْكُم بِهِمَا رَأْفَةٌۭ فِى دِينِ ٱللَّهِ إِن كُنتُمْ تُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۖ وَلْيَشْهَدْ عَذَابَهُمَا طَآئِفَةٌۭ مِّنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
ٱلزَّانِيَةُ
ज़ानिया औरत
وَٱلزَّانِى
और ज़ानी मर्द
فَٱجْلِدُوا۟
पस कोड़े मारो
كُلَّ
हर
وَٰحِدٍۢ
एक को
مِّنْهُمَا
इन दोनों में से
مِا۟ئَةَ
सौ
جَلْدَةٍۢ ۖ
कोड़े
وَلَا
और ना
تَأْخُذْكُم
पकड़े तुम्हें
بِهِمَا
इन दोनों के बारे में
رَأْفَةٌۭ
कोई तरस
فِى
concerning
دِينِ
दीन ( क़ानून) के मामले में
ٱللَّهِ
अल्लाह के
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
تُؤْمِنُونَ
तुम ईमान रखते
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَٱلْيَوْمِ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرِ ۖ
और आख़िरी दिन पर
وَلْيَشْهَدْ
और ज़रूर हाज़िर हो
عَذَابَهُمَا
इन दोनों की सज़ा पर
طَآئِفَةٌۭ
एक गिरोह
مِّنَ
of
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों में से
व्यभिचारिणी और व्यभिचारी - इन दोनों में से प्रत्येक को सौ कोड़े मारो और अल्लाह के धर्म (क़ानून) के विषय में तुम्हें उनपर तरस न आए, यदि तुम अल्लाह औऱ अन्तिम दिन को मानते हो। और उन्हें दंड देते समय मोमिनों में से कुछ लोगों को उपस्थित रहना चाहिए
तफ़्सीर:
अविवाहित व्यभिचार करने वाली महिला और व्यभिचार करने वाले पुरुष, दोनें में से प्रत्येक को सौ कोड़े लगाओ। तथा अगर तुम अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखते हो, तो उन दोनों के प्रति तुम कोई नरमी और दया न अपनाओ कि उनपर ह़द (दंड) ही लागू न करो या उसमें कमी कर दो। और उन दोनों पर ह़द (दंड) लागू करते समय ईमान वालों का एक गिरोह उपस्थित रहना चाहिए; ताकि उनकी सज़ा की खबर को खूब फैलाया जा सके और खुद उन्हें तथा अन्य लोगों को व्यभिचार से बाज़ रखा जा सके।
आयत 3
ٱلزَّانِى لَا يَنكِحُ إِلَّا زَانِيَةً أَوْ مُشْرِكَةًۭ وَٱلزَّانِيَةُ لَا يَنكِحُهَآ إِلَّا زَانٍ أَوْ مُشْرِكٌۭ ۚ وَحُرِّمَ ذَٰلِكَ عَلَى ٱلْمُؤْمِنِينَ
ٱلزَّانِى
ज़ानी मर्द
لَا
(will) not
يَنكِحُ
नहीं निकाह करता
إِلَّا
मगर
زَانِيَةً
ज़निया औरत से
أَوْ
या
مُشْرِكَةًۭ
मुशरिका औरत से
وَٱلزَّانِيَةُ
और ज़निया औरत
لَا
(will) not
يَنكِحُهَآ
नहीं निकाह करता उससे
إِلَّا
मगर
زَانٍ
ज़ानी मर्द
أَوْ
या
مُشْرِكٌۭ ۚ
मुशरिक मर्द
وَحُرِّمَ
और हराम कर दिया गया
ذَٰلِكَ
ये
عَلَى
to
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों पर
व्यभिचारी किसी व्यभिचारिणी या बहुदेववादी स्त्री से ही निकाह करता है। और (इसी प्रकार) व्यभिचारिणी, किसी व्यभिचारी या बहुदेववादी से ही निकाह करते है। और यह मोमिनों पर हराम है
तफ़्सीर:
व्यभिचार के घिनौनेपन को स्पष्ट करने के लि ए, अल्लाह ने यह उल्लेख किया है कि जो व्यक्ति व्यभिचार का आदी है, वह किसी अपनी ही जैसी व्यभिचार में लिप्त स्त्री अथवा बहुदेववादी महिला से, जो व्यभिचार से नहीं बचती, विवाह करना चाहेगा। हालाँकि बहुदेववादी महिला से निकाह करना जायज़ नहीं है। तथा जो महिला व्यभिचार की आदी है, वह अपने ही जैसे व्यभिचारी या बहुदेववादी पुरुष से, जो व्यभिचार से नहीं बचता, विवाह करना चाहेगी। जबकि बहुदेवादी पुरुष से उसका विवाह हराम (निषिद्ध) है। व्यभिचारिणी से विवाह करना और व्यभिचारी का निकाह कराना ईमान वालों के लिए हराम (निषिद्ध) कर दिया गया है।
आयत 4
وَٱلَّذِينَ يَرْمُونَ ٱلْمُحْصَنَـٰتِ ثُمَّ لَمْ يَأْتُوا۟ بِأَرْبَعَةِ شُهَدَآءَ فَٱجْلِدُوهُمْ ثَمَـٰنِينَ جَلْدَةًۭ وَلَا تَقْبَلُوا۟ لَهُمْ شَهَـٰدَةً أَبَدًۭا ۚ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْفَـٰسِقُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो लोग जो
يَرْمُونَ
तोहमत लगाऐं
ٱلْمُحْصَنَـٰتِ
पाक दामन औरतों पर
ثُمَّ
फिर
لَمْ
ना
يَأْتُوا۟
वो लाऐं
بِأَرْبَعَةِ
चार
شُهَدَآءَ
गवाह
فَٱجْلِدُوهُمْ
तो कोड़े मारो उन्हें
ثَمَـٰنِينَ
अस्सी
جَلْدَةًۭ
कोड़े
وَلَا
और ना
تَقْبَلُوا۟
तुम क़ुबूल करो
لَهُمْ
उनकी
شَهَـٰدَةً
गवाही को
أَبَدًۭا ۚ
कभी भी
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْفَـٰسِقُونَ
जो फ़ासिक़ हैं
और जो लोग शरीफ़ और पाकदामन स्त्री पर तोहमत लगाएँ, फिर चार गवाह न लाएँ, उन्हें अस्सी कोड़े मारो और उनकी गवाही कभी भी स्वीकार न करो - वही है जो अवज्ञाकारी है। -
तफ़्सीर:
और जो लोग सच्चरित्रा स्त्रियों (तथा सच्चरित्र पुरुष भी इसी हुक्म में हैं) पर व्यभिचार का आरोप लगाएँ, फिर वे अपने इस आरोप पर चार गवाह हाज़िर न करें, तो (ऐ शासको!) उन्हें अस्सी कोड़े लगाओ और उनकी कोई गवाही कभी स्वीकार न करो। और वही लोग जो सच्चरित्रा स्त्रियों पर आरोप लगाते हैं, अल्लाह की आज्ञाकारिता से बाहर निकलने वाले हैं।
आयत 5
إِلَّا ٱلَّذِينَ تَابُوا۟ مِنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ وَأَصْلَحُوا۟ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
إِلَّا
सिवाए
ٱلَّذِينَ
उनके जिन्होंने
تَابُوا۟
तौबा की
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद
ذَٰلِكَ
इसके
وَأَصْلَحُوا۟
और उन्होंने इस्लाह कर ली
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
सिवाय उन लोगों के जो इसके पश्चात तौबा कर लें और सुधार कर लें। तो निश्चय ही अल्लाह बहुत क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
परंतु जिन लोगों ने आरोप लगाने के बाद तौबा कर ली और अपने कर्म को सुधार लिया, तो निश्चय अल्लाह उनकी तौबा और उनकी गवाही को कबूल करेगा। निश्चय अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदो को क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 6
وَٱلَّذِينَ يَرْمُونَ أَزْوَٰجَهُمْ وَلَمْ يَكُن لَّهُمْ شُهَدَآءُ إِلَّآ أَنفُسُهُمْ فَشَهَـٰدَةُ أَحَدِهِمْ أَرْبَعُ شَهَـٰدَٰتٍۭ بِٱللَّهِ ۙ إِنَّهُۥ لَمِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ
وَٱلَّذِينَ
और वो लोग जो
يَرْمُونَ
तोहमत लगाते हैं
أَزْوَٰجَهُمْ
अपनी बीवियों पर
وَلَمْ
और नहीं
يَكُن
हैं
لَّهُمْ
उनके लिए
شُهَدَآءُ
कोई गवाह
إِلَّآ
मगर
أَنفُسُهُمْ
वो ख़ुद ही
فَشَهَـٰدَةُ
तो गवाही होगी
أَحَدِهِمْ
उनमें से एक की
أَرْبَعُ
चार
شَهَـٰدَٰتٍۭ
गवाहियाँ
بِٱللَّهِ ۙ
साथ अल्लाह (की क़सम) के
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَمِنَ
(is) surely of
ٱلصَّـٰدِقِينَ
अलबत्ता सच्चों में से है
औऱ जो लोग अपनी पत्नियों पर दोषारोपण करें औऱ उनके पास स्वयं के सिवा गवाह मौजूद न हों, तो उनमें से एक (अर्थात पति) चार बार अल्लाह की क़सम खाकर यह गवाही दे कि वह बिलकुल सच्चा है
तफ़्सीर:
वे पुरुष जो अपनी पत्नियों पर व्यभिचार का आरोप लगाएँ और उनके पास खुद के अलावा कोई गवाह न हों, जो उनके आरोप के सत्य होने की गवाही दें; तो उनमें से एक व्यक्ति अल्लाह की क़सम के साथ चार बार गवाही दे कि : निःसंदेह वह अपनी पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाने में निश्चय सच्चा है।
आयत 7
وَٱلْخَـٰمِسَةُ أَنَّ لَعْنَتَ ٱللَّهِ عَلَيْهِ إِن كَانَ مِنَ ٱلْكَـٰذِبِينَ
وَٱلْخَـٰمِسَةُ
और पाँचवीं बार
أَنَّ
कि बेशक
لَعْنَتَ
लानत हो
ٱللَّهِ
अल्लाह की
عَلَيْهِ
उस पर
إِن
अगर
كَانَ
है वो
مِنَ
of
ٱلْكَـٰذِبِينَ
झूठों में से
और पाँचवी बार यह गवाही दे कि यदि वह झूठा हो तो उसपर अल्लाह की फिटकार हो
तफ़्सीर:
फिर अपनी पाँचवीं गवाही में, वह खुद के अभिशाप (लानत) के योग्य होने की बददुआ करे, अगर वह उसपर आरोप लगाने में झूठा है।
आयत 8
وَيَدْرَؤُا۟ عَنْهَا ٱلْعَذَابَ أَن تَشْهَدَ أَرْبَعَ شَهَـٰدَٰتٍۭ بِٱللَّهِ ۙ إِنَّهُۥ لَمِنَ ٱلْكَـٰذِبِينَ
وَيَدْرَؤُا۟
और टाल देगी
عَنْهَا
उस (औरत) से
ٱلْعَذَابَ
सज़ा को
أَن
ये(बात) कि
تَشْهَدَ
वो गवाही दे
أَرْبَعَ
चार
شَهَـٰدَٰتٍۭ
गवाहियाँ
بِٱللَّهِ ۙ
अल्लाह की क़सम के साथ
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَمِنَ
(is) surely of
ٱلْكَـٰذِبِينَ
अलबत्ता झूठों में से है
पत्ऩी से भी सज़ा को यह बात टाल सकती है कि वह चार बार अल्लाह की क़सम खाकर गवाही दे कि वह बिलकुल झूठा है
तफ़्सीर:
इस क़सम के बाद स्त्री व्यभिचार की सज़ा की हक़दार हो जाएगी। लेकिन यह बात उसकी सज़ा को हटा देगी कि वह अल्लाह की क़सम खाकर चार बार यह गवाही दे कि : निःसंदेह उसका पति उसपर आरोप लगाने में निश्चय झूठा है।
आयत 9
وَٱلْخَـٰمِسَةَ أَنَّ غَضَبَ ٱللَّهِ عَلَيْهَآ إِن كَانَ مِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ
وَٱلْخَـٰمِسَةَ
और पाँचवीं बार
أَنَّ
कि बेशक
غَضَبَ
ग़ज़ब हो
ٱللَّهِ
अल्लाह का
عَلَيْهَآ
उस (औरत) पर
إِن
अगर
كَانَ
है वो (मर्द)
مِنَ
of
ٱلصَّـٰدِقِينَ
सच्चों में से
और पाँचवी बार यह कहें कि उसपर (उस स्त्री पर) अल्लाह का प्रकोप हो, यदि वह सच्चा हो
तफ़्सीर:
फिर अपनी पाँचवीं गवाही में, वह अपने ऊपर अल्लाह के प्रकोप की बददुआ करेगी, यदि वह (व्यक्ति) उसपर आरोप लगाने में सच्चा है।
आयत 10
وَلَوْلَا فَضْلُ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُۥ وَأَنَّ ٱللَّهَ تَوَّابٌ حَكِيمٌ
وَلَوْلَا
और अगर ना होता
فَضْلُ
फ़ज़ल
ٱللَّهِ
अल्लाह का
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَرَحْمَتُهُۥ
और रहमत उसकी
وَأَنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
تَوَّابٌ
बहुत तौबा क़ुबूल करने वाला है
حَكِيمٌ
बहुत हिकमत वाला है
यदि तुम अल्लाह की उदार कृपा और उसकी दया न होती (तो तुम संकट में पड़े जाते), और यह कि अल्लाह बड़ा तौबा क़बूल करनेवाला,अत्यन्त तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
(ऐ लोगो!) अगर तुमपर अल्लाह की कृपा और दया न होती और यह कि वह अपने तौबा करने वाले बंदों की तौबा को स्वीकार करने वाला है, तथा अपने प्रबंधन और शरीयत में पूर्ण हिकमत वाला है, तो तुम्हें जल्द ही तुम्हारे गुनाहों की सज़ा देता और तुम्हें अपमान का सामना करना पड़ता।
आज की ज़िंदगी में सबक़
तोहमत (झूठे इल्ज़ाम) की सज़ा का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि किसी पर बगैर सुबूत इल्ज़ाम लगाना बहुत बड़ा गुनाह है, इससे सख्ती से बचना चाहिए।
आयत 11
إِنَّ ٱلَّذِينَ جَآءُو بِٱلْإِفْكِ عُصْبَةٌۭ مِّنكُمْ ۚ لَا تَحْسَبُوهُ شَرًّۭا لَّكُم ۖ بَلْ هُوَ خَيْرٌۭ لَّكُمْ ۚ لِكُلِّ ٱمْرِئٍۢ مِّنْهُم مَّا ٱكْتَسَبَ مِنَ ٱلْإِثْمِ ۚ وَٱلَّذِى تَوَلَّىٰ كِبْرَهُۥ مِنْهُمْ لَهُۥ عَذَابٌ عَظِيمٌۭ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
جَآءُو
लाए हैं
بِٱلْإِفْكِ
बोहतान
عُصْبَةٌۭ
एक गिरोह हैं
مِّنكُمْ ۚ
तुम में से
لَا
(Do) not
تَحْسَبُوهُ
ना तुम समझो उसे
شَرًّۭا
बुरा
لَّكُم ۖ
अपने लिए
بَلْ
बल्कि
هُوَ
वो
خَيْرٌۭ
अच्छा है
لَّكُمْ ۚ
तुम्हारे लिए
لِكُلِّ
वास्ते हर
ٱمْرِئٍۢ
शख़्स के है
مِّنْهُم
उनमें से
مَّا
जो
ٱكْتَسَبَ
उसने कमाया
مِنَ
of
ٱلْإِثْمِ ۚ
गुनाह से
وَٱلَّذِى
और वो जिसने
تَوَلَّىٰ
उठाया
كِبْرَهُۥ
बड़ा (बोझ) उसका
مِنْهُمْ
उनमें से
لَهُۥ
उसके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
عَظِيمٌۭ
बहुत बड़ा
जो लोग तोहमत घड़ लाए है वे तुम्हारे ही भीतर की एक टोली है। तुम उसे अपने लिए बुरा मत समझो, बल्कि वह भी तुम्हारे लिए अच्छा ही है। उनमें से प्रत्येक व्यक्ति के लिए उतना ही हिस्सा है जितना गुनाह उसने कमाया, और उनमें से जिस व्यक्ति ने उसकी ज़िम्मेदारी का एक बड़ा हिस्सा अपने सिर लिया उसके लिए बड़ा यातना है
तफ़्सीर:
निश्चय जो लोग झूठा आरोप (अर्थात् ईमान वालों की माँ आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा पर व्यभिचार का आरोप) मढ़कर लाए, वे (ऐ मोमिनो!) तुमसे ही संबंध रखने वाले एक समूह हैं। यह मत सोचो कि उन्होंने जो झूठ गढ़ा है, वह तुम्हारे लिए बुरा है। बल्कि वह तुम्हारे लिए अच्छा है, क्योंकि उसमें ईमान वालों के लिए सवाब (पुण्य) और जाँच-पड़ताल है, तथा इसके साथ ही मोमिनों की माँ आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की पवित्रता (दोष-मुक्त होने) की घोषणा है। जिस किसी ने यह आरोप लगाने में भाग लिया, उसे उसके कमाए हुए पाप के अनुसार बदला मिलेगा। और जिसने इसकी शुरुआत करके इसके बड़े हिस्से का भार उठाया, उसके लिए बहुत बड़ी यातना है। इससे अभिप्राय पाखंडी लोगों का प्रमुख अब्दुल्लाह बिन उबैय इब्ने सलूल है।
आयत 12
لَّوْلَآ إِذْ سَمِعْتُمُوهُ ظَنَّ ٱلْمُؤْمِنُونَ وَٱلْمُؤْمِنَـٰتُ بِأَنفُسِهِمْ خَيْرًۭا وَقَالُوا۟ هَـٰذَآ إِفْكٌۭ مُّبِينٌۭ
لَّوْلَآ
क्यों ना
إِذْ
जब
سَمِعْتُمُوهُ
सुना तुमने उसे
ظَنَّ
गुमान किया
ٱلْمُؤْمِنُونَ
मोमिन मर्दों ने
وَٱلْمُؤْمِنَـٰتُ
और मोमिन औरतों ने
بِأَنفُسِهِمْ
अपने बारे में
خَيْرًۭا
अच्छा
وَقَالُوا۟
और कहा उन्होंने
هَـٰذَآ
ये है
إِفْكٌۭ
बोहतान
مُّبِينٌۭ
खुला
ऐसा क्यों न हुआ कि जब तुम लोगों ने उसे सुना था, तब मोमिन पुरुष और मोमिन स्त्रियाँ अपने आपसे अच्छा गुमान करते और कहते कि "यह तो खुली तोहमत है?"
तफ़्सीर:
जब मोमिन पुरुषों और मोमिन स्त्रियों ने यह भयंकर मिथ्यारोपण सुना, तो इसके निशाने पर आने वाले अपने मोमिन भाइयों के इससे सुरक्षित होने का गुमान क्यों न किया और यह क्यों न कहा : यह एक स्पष्ट झूठ है।
आयत 13
لَّوْلَا جَآءُو عَلَيْهِ بِأَرْبَعَةِ شُهَدَآءَ ۚ فَإِذْ لَمْ يَأْتُوا۟ بِٱلشُّهَدَآءِ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ عِندَ ٱللَّهِ هُمُ ٱلْكَـٰذِبُونَ
لَّوْلَا
क्यों ना
جَآءُو
वो लाए
عَلَيْهِ
उस पर
بِأَرْبَعَةِ
चार
شُهَدَآءَ ۚ
गवाह
فَإِذْ
फिर जब
لَمْ
नहीं
يَأْتُوا۟
वो लाए
بِٱلشُّهَدَآءِ
गवाहों को
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
عِندَ
near Allah
ٱللَّهِ
अल्लाह के यहाँ
هُمُ
वो
ٱلْكَـٰذِبُونَ
जो झूठे हैं
आख़िर वे इसपर चार गवाह क्यों न लाए? अब जबकि वे गवाह नहीं लाए, तो अल्लाह की स्पष्ट में वही झूठे है
तफ़्सीर:
ईमान वालों की माँ आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा पर आरोप लगाने वाले, अपने इस गंभीर झूठ पर चार गवाह क्यों नहीं लाए, जो उसके सत्य होने की गवाही देते, जिसकी उन्होंने उनकी ओर निस्बत की?! अगर वे उसपर चार गवाह नहीं लाए (और वे उन्हें हरगिज़ नहीं ला सकेंगे), तो वे अल्लाह के फैसले के अनुसार झूठे हैं।
आयत 14
وَلَوْلَا فَضْلُ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُۥ فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ لَمَسَّكُمْ فِى مَآ أَفَضْتُمْ فِيهِ عَذَابٌ عَظِيمٌ
وَلَوْلَا
और अगर ना होता
فَضْلُ
फ़ज़ल
ٱللَّهِ
अल्लाह का
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَرَحْمَتُهُۥ
और रहमत उसकी
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
وَٱلْـَٔاخِرَةِ
और आख़िरत में
لَمَسَّكُمْ
यक़ीनन पहुँचता तुम्हें
فِى
in
مَآ
उसमें से जो
أَفَضْتُمْ
पड़ गए थे तुम
فِيهِ
जिसमें
عَذَابٌ
अज़ाब
عَظِيمٌ
बहुत बड़ा
यदि तुमपर दुनिया और आख़िरत में अल्लाह की उदार कृपा और उसकी दयालुता न होती तो जिस बात में तुम पड़ गए उसके कारण तुम्हें एक बड़ी यातना आ लेती
तफ़्सीर:
अगर तुम पर (ऐ ईमान वालो!) अल्लाह का अनुग्रह और उसकी दया न होती कि उसने तुम्हें सज़ा देने में जल्दी नहीं की और तुममें से तौबा करने वालों की तौबा स्वीकार कर ली; तो निश्चय तुम्हारे ईमान वालों की माँ आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा पर झूठा आरोप मढ़ने के कारण तुमपर बहुत बड़ी यातना आ जाती।
आयत 15
إِذْ تَلَقَّوْنَهُۥ بِأَلْسِنَتِكُمْ وَتَقُولُونَ بِأَفْوَاهِكُم مَّا لَيْسَ لَكُم بِهِۦ عِلْمٌۭ وَتَحْسَبُونَهُۥ هَيِّنًۭا وَهُوَ عِندَ ٱللَّهِ عَظِيمٌۭ
إِذْ
जब
تَلَقَّوْنَهُۥ
तुम ले रहे थे उसे
بِأَلْسِنَتِكُمْ
अपनी ज़बानों से
وَتَقُولُونَ
और तुम कह रहे थे
بِأَفْوَاهِكُم
अपने मुँहों से
مَّا
वो जो
لَيْسَ
नहीं (था)
لَكُم
तुम्हें
بِهِۦ
जिसका
عِلْمٌۭ
कोई इल्म
وَتَحْسَبُونَهُۥ
और तुम समझ रहे थे उसे
هَيِّنًۭا
मामूली
وَهُوَ
हालाँकि वो
عِندَ
नज़दीक
ٱللَّهِ
अल्लाह के
عَظِيمٌۭ
बहुत बड़ा था
सोचो, जब तुम एक-दूसरे से उस (झूठ) को अपनी ज़बानों पर लेते जा रहे थे और तुम अपने मुँह से वह कुछ कहे जो रहे थे, जिसके विषय में तुम्हें कोई ज्ञान न था और तुम उसे एक साधारण बात समझ रहे थे; हालाँकि अल्लाह के निकट वह एक भारी बात थी
तफ़्सीर:
जब तुम इसे एक-दूसरे से वर्णन कर रहे थे और इसके झूठे होने के बावजूद अपने मुँह से इसे प्रसारित कर रहे थे; क्योंकि तुम्हें इसके बारे में कोई ज्ञान नहीं था। और तुम यह समझ रहे थे कि यह एक साधारण बात है। हालाँकि वह अल्लाह के यहाँ एक बहुत बड़ी बात थी। क्योंकि वह झूठ और एक निर्दोष पर आरोप लगाने पर आधारित थी।
आयत 16
وَلَوْلَآ إِذْ سَمِعْتُمُوهُ قُلْتُم مَّا يَكُونُ لَنَآ أَن نَّتَكَلَّمَ بِهَـٰذَا سُبْحَـٰنَكَ هَـٰذَا بُهْتَـٰنٌ عَظِيمٌۭ
وَلَوْلَآ
और क्यों ना
إِذْ
जब
سَمِعْتُمُوهُ
सुना था तुमने उसे
قُلْتُم
कहा तुमने
مَّا
नहीं
يَكُونُ
है
لَنَآ
हमारे लिए
أَن
कि
نَّتَكَلَّمَ
हम कलाम करें
بِهَـٰذَا
साथ इस( बात) के
سُبْحَـٰنَكَ
पाक है तू
هَـٰذَا
ये है
بُهْتَـٰنٌ
बोहतान
عَظِيمٌۭ
बहुत बड़ा
और ऐसा क्यों न हुआ कि जब तुमने उसे सुना था तो कह देते, "हमारे लिए उचित नहीं कि हम ऐसी बात ज़बान पर लाएँ। महान और उच्च है तू (अल्लाह)! यह तो एक बड़ी तोहमत है?"
तफ़्सीर:
जब तुमने यह झूठा आरोप सुना, तो क्यों नहीं कहा : हमारे लिए यह सही नहीं है कि हम इस घृणित बात को ज़बान पर लाएँ। ऐ हमारे पालनहार! हम तेरी पवित्रता बयान करते हैं। मोमिनों की माँ पर उनका लगाया हुआ यह आरोप बहुत बड़ा झूठ है।
आयत 17
يَعِظُكُمُ ٱللَّهُ أَن تَعُودُوا۟ لِمِثْلِهِۦٓ أَبَدًا إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
يَعِظُكُمُ
नसीहत करता है तुम्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَن
कि
تَعُودُوا۟
(ना) तुम दोबारा करना
لِمِثْلِهِۦٓ
इस जैसा
أَبَدًا
कभी भी
إِن
अगर
كُنتُم
हो तुम
مُّؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
अल्लाह तुम्हें नसीहत करता है कि फिर कभी ऐसा न करना, यदि तुम मोमिन हो
तफ़्सीर:
अल्लाह तुम्हें याद दिलाता और नसीहत करता है कि इस प्रकार का कार्य पुनः न करना और किसी पवित्र व्यक्ति पर व्यभिचार का आरोप न लगाना, अगर तुम अल्लाह पर ईमान रखते हो।
आयत 18
وَيُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمُ ٱلْـَٔايَـٰتِ ۚ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
وَيُبَيِّنُ
और बयान करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْـَٔايَـٰتِ ۚ
आयात को
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌ
ख़ूब इल्म वाला है
حَكِيمٌ
ख़ूब हिकमत वाला है
अल्लाह तो आयतों को तुम्हारे लिए खोल-खोलकर बयान करता है। अल्लाह तो सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
अल्लाह तुम्हारे लिए अपने आदेशों एवं उपदेशों पर आधारित आयतों को स्पष्ट करता है। तथा अल्लाह तुम्हारे कार्यों से पूरी तरह अवगत है। उससे उनमें से कुछ भी छिपा नहीं है और वह तुम्हें उनका बदला देगा। वह अपने प्रबंधन और शरीयत में हिकमत वाला है।
आयत 19
إِنَّ ٱلَّذِينَ يُحِبُّونَ أَن تَشِيعَ ٱلْفَـٰحِشَةُ فِى ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يُحِبُّونَ
पसंद करते हैं
أَن
कि
تَشِيعَ
फैले
ٱلْفَـٰحِشَةُ
बेहयाई
فِى
among
ٱلَّذِينَ
उन लोगों में जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ
और आख़िरत में
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَعْلَمُ
जानता है
وَأَنتُمْ
और तुम
لَا
(do) not
تَعْلَمُونَ
नहीं तुम जानते
जो लोग चाहते है कि उन लोगों में जो ईमान लाए है, अश्लीहलता फैले, उनके लिए दुनिया और आख़िरत (लोक-परलोक) में दुखद यातना है। और अल्लाह बड़ा करुणामय, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
जो लोग चाहते हैं कि मोमिनों के अंदर बुराइयाँ फैलें (जिनमें व्यभिचार का आरोप भी शामिल है), उनके लिए संसार में दर्दनाक यातना है, इस प्रकार कि उनपर व्यभिचार का आरोप लगाने की 'हद' लगाई जाएगी। और आख़िरत में उनके लिए आग की यातना है। अल्लाह उनके झूठ को और अपने बंदों के अंजाम को जानता है, तथा वह उनके हितों से (भी) अवगत है। और तुम इसे नहीं जानते।
आयत 20
وَلَوْلَا فَضْلُ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُۥ وَأَنَّ ٱللَّهَ رَءُوفٌۭ رَّحِيمٌۭ
وَلَوْلَا
और अगर ना होता
فَضْلُ
फ़ज़ल
ٱللَّهِ
अल्लाह का
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَرَحْمَتُهُۥ
और रहमत उसकी
وَأَنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
رَءُوفٌۭ
बहुत शफ़्क़त करने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
और यदि तुमपर अल्लाह का उदार अनुग्रह और उसकी दयालुता न होती (तॊ अवश्य ही तुमपर यातना आ जाती) और यह कि अल्लाह बड़ा करुणामय, अत्यन्त दयावान है।
तफ़्सीर:
(ऐ झूठे आरोप में पड़ने वालो!) अगर तुमपर अल्लाह का अनुग्रह और उसकी दया न होती और यह बात न होती कि अल्लाह तुमपर अत्यंत मेहरबान और बड़ा दयावान् है, तो तुम्हें जल्द ही सज़ा दे देता।
आज की ज़िंदगी में सबक़
वाकिया-ए-इफ्क (झूठी तोहमत के वाकिये) से नसीहत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि अफवाहों को फैलाने की बजाय जांचे बगैर आगे बढ़ाने से परहेज़ करना चाहिए।
आयत 21
۞ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَتَّبِعُوا۟ خُطُوَٰتِ ٱلشَّيْطَـٰنِ ۚ وَمَن يَتَّبِعْ خُطُوَٰتِ ٱلشَّيْطَـٰنِ فَإِنَّهُۥ يَأْمُرُ بِٱلْفَحْشَآءِ وَٱلْمُنكَرِ ۚ وَلَوْلَا فَضْلُ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُۥ مَا زَكَىٰ مِنكُم مِّنْ أَحَدٍ أَبَدًۭا وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ يُزَكِّى مَن يَشَآءُ ۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌۭ
۞ يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Do) not
تَتَّبِعُوا۟
ना तुम पैरवी करो
خُطُوَٰتِ
क़दमों की
ٱلشَّيْطَـٰنِ ۚ
शैतान के
وَمَن
और जो कोई
يَتَّبِعْ
पैरवी करेगा
خُطُوَٰتِ
क़दमों की
ٱلشَّيْطَـٰنِ
शैतान के
فَإِنَّهُۥ
तो बेशक वो
يَأْمُرُ
वो हुक्म देता है
بِٱلْفَحْشَآءِ
बेहयाई का
وَٱلْمُنكَرِ ۚ
और बुराई का
وَلَوْلَا
और अगर ना होता
فَضْلُ
फ़ज़ल
ٱللَّهِ
अल्लाह का
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَرَحْمَتُهُۥ
और रहमत उसकी
مَا
ना
زَكَىٰ
पाक हो सकता
مِنكُم
तुम में से
مِّنْ
anyone
أَحَدٍ
कोई एक
أَبَدًۭا
कभी भी
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
ٱللَّهَ
अल्लाह
يُزَكِّى
वो पाक करता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۗ
वो चाहता है
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
سَمِيعٌ
ख़ूब सुनने वाला है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब इल्म वाला है
ऐ ईमान लानेवालो! शैतान के पद-चिन्हों पर न चलो। जो कोई शैतान के पद-चिन्हों पर चलेगा तो वह तो उसे अश्लीलता औऱ बुराई का आदेश देगा। और यदि अल्लाह का उदार अनुग्रह और उसकी दयालुता तुमपर न होती तो तुममें से कोई भी आत्म-विश्वास को प्राप्त न कर सकता। किन्तु अल्लाह जिसे चाहता है, सँवारता-निखारता है। अल्लाह तो सब कुछ सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान लाने और उसकी शरीयत पर अमल करने वाले लोगो! असत्य को सुशोभित करने में शैतान के मार्ग का अनुसरण न करो। और जो उसके मार्ग का अनुसरण करता है, तो वह बुरे कामों और बातों तथा शरीयत विरोधी चीज़ों का आदेश देता है। और अगर (ऐ ईमान वालो!) तुमपर अल्लाह का अनुग्रह न होता, तो तुममें से कोई भी कभी तौबा करके पवित्र न होता। परंतु अल्लाह जिसे चाहता है, उसकी तौबा क़बूल करके पवित्र करता है। और अल्लाह तुम्हारी बातों को सुनने वाला, तुम्हारे कर्मों को जानने वाला है। उससे उनमें से कुछ भी छिपा नहीं रहता। और वह तुम्हें उनका बदला देगा।
आयत 22
وَلَا يَأْتَلِ أُو۟لُوا۟ ٱلْفَضْلِ مِنكُمْ وَٱلسَّعَةِ أَن يُؤْتُوٓا۟ أُو۟لِى ٱلْقُرْبَىٰ وَٱلْمَسَـٰكِينَ وَٱلْمُهَـٰجِرِينَ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ۖ وَلْيَعْفُوا۟ وَلْيَصْفَحُوٓا۟ ۗ أَلَا تُحِبُّونَ أَن يَغْفِرَ ٱللَّهُ لَكُمْ ۗ وَٱللَّهُ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌ
وَلَا
और ना
يَأْتَلِ
क़सम खाऐं
أُو۟لُوا۟
साहिबे
ٱلْفَضْلِ
फ़ज़ल
مِنكُمْ
तुम में से
وَٱلسَّعَةِ
और वुसअत वाले
أَن
कि
يُؤْتُوٓا۟
(ना) वो देंगे
أُو۟لِى
(to) the near of kin
ٱلْقُرْبَىٰ
रिश्तेदारों
وَٱلْمَسَـٰكِينَ
और मिस्कीनों
وَٱلْمُهَـٰجِرِينَ
और मुहाजिरीन को
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के रास्ते में
وَلْيَعْفُوا۟
और चाहिए कि वो माफ़ कर दें
وَلْيَصْفَحُوٓا۟ ۗ
और चाहिए कि वो दरगुज़र करें
أَلَا
क्या नहीं
تُحِبُّونَ
तुम पसंद करते
أَن
कि
يَغْفِرَ
माफ़ कर दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَكُمْ ۗ
तुम्हें
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌ
निहायत रहम करने वाला है
तुममें जो बड़ाईवाले और सामर्थ्यवान है, वे नातेदारों, मुहताजों और अल्लाह की राह में घरबार छोड़नेवालों को देने से बाज़ रहने की क़सम न खा बैठें। उन्हें चाहिए कि क्षमा कर दें और उनसे दरगुज़र करें। क्या तुम यह नहीं चाहते कि अल्लाह तुम्हें क्षमा करें? अल्लाह बहुत क्षमाशील,अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
तथा धर्म में प्रतिष्ठा और धन में विस्तार वाले लोग, अपने ज़रूरतमंद रिश्तेदारों को (जो कि गरीबी के शिकार हैं और अल्लाह की राह में हिजरत करने वालों में से हैं) उनके द्वारा किए गए पाप के कारण, आर्थिक सहायता न देने की क़सम न खाएँ। बल्कि उन्हें चाहिए कि अपने उन रिश्तेदारों को माफ़ कर दें और दरगुज़र कर जाएँ। क्या तुम यह पसंद नहीं करते हो कि अल्लाह तुम्हारे पापों को क्षमा कर दे, यदि तुम उनको माफ़ कर दो और जाने दो?! और निश्चय अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदो को क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है। इसलिए उसके बंदों को भी उसका अनुसरण करना चाहिए। यह आयत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु के बारे में उतरी, जब उन्होंने मिसतह (रज़ियल्लाहु अन्हु) के आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) पर आरोप लगाने में शामिल होने की वजह से, उनपर खर्च न करने की क़सम खा ली थी।
आयत 23
إِنَّ ٱلَّذِينَ يَرْمُونَ ٱلْمُحْصَنَـٰتِ ٱلْغَـٰفِلَـٰتِ ٱلْمُؤْمِنَـٰتِ لُعِنُوا۟ فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌۭ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَرْمُونَ
तोहमत लगाते हैं
ٱلْمُحْصَنَـٰتِ
पाकदामन
ٱلْغَـٰفِلَـٰتِ
बेख़बर/ भोली भाली
ٱلْمُؤْمِنَـٰتِ
मोमिन औरतों पर
لُعِنُوا۟
वो लानत किए गए
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
وَٱلْـَٔاخِرَةِ
और आख़िरत में
وَلَهُمْ
और उनके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
عَظِيمٌۭ
बहुत बड़ा
निस्संदेह जो लोग शरीफ़, पाकदामन, भोली-भाली बेख़बर ईमानवाली स्त्रियों पर तोहमत लगाते है उनपर दुनिया और आख़िरत में फिटकार है। और उनके लिए एक बड़ी यातना है
तफ़्सीर:
निश्चय जो लोग सच्चरित्रा तथा अश्लीलता से बेखबर भोली-भाली मोमिन स्त्रियों पर तोहमत लगाते हैं, वे दुनिया एवं आख़िरत में अल्लाह की दया से दूर कर दिए गए। और आखिरत में उनके लिए बड़ी यातना है।
आयत 24
يَوْمَ تَشْهَدُ عَلَيْهِمْ أَلْسِنَتُهُمْ وَأَيْدِيهِمْ وَأَرْجُلُهُم بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
يَوْمَ
जिस दिन
تَشْهَدُ
गवाही देंगी
عَلَيْهِمْ
उन पर
أَلْسِنَتُهُمْ
ज़बानें उनकी
وَأَيْدِيهِمْ
और हाथ उनके
وَأَرْجُلُهُم
और पाँव उनके
بِمَا
उसकी जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
जिस दिन कि उनकी ज़बानें और उनके हाथ और उनके पाँव उनके विरुद्ध उसकी गवाही देंगे, जो कुछ वे करते रहे थे,
तफ़्सीर:
यह यातना उन्हें क़ियामत के दिन दी जाएगी। जिस दिन उनकी ज़बानें, उनके विरुद्ध, उन ग़लत बातों की गवाही देंगी, जो उन्होंने बोली थीं। तथा उनके हाथ और उनके पाँव उनके विरुद्ध उसकी गवाही देंगे जो वे किया करते थे।
आयत 25
يَوْمَئِذٍۢ يُوَفِّيهِمُ ٱللَّهُ دِينَهُمُ ٱلْحَقَّ وَيَعْلَمُونَ أَنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلْحَقُّ ٱلْمُبِينُ
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
يُوَفِّيهِمُ
पूरा-पूरा देगा उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
دِينَهُمُ
बदला उनका
ٱلْحَقَّ
दुरुस्त
وَيَعْلَمُونَ
और वो जान लेंगे
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
هُوَ
वो ही
ٱلْحَقُّ
हक़ है
ٱلْمُبِينُ
ज़ाहिर करने वाला है
उस दिन अल्लाह उन्हें उनका ठीक बदला पूरी तरह दे देगा जिसके वे पात्र है। और वे जान लेंगे कि निस्संदेह अल्लाह ही सत्य है खुला हुआ, प्रकट कर देनेवाला
तफ़्सीर:
उस दिन अल्लाह उन्हें न्याय के साथ उनका पूरा-पूरा बदला देगा और वे जान लेंगे कि अल्लाह ही सत्य है। अतः उसके द्वारा जारी होने वाली हर खबर या वादा या धमकी, एक स्पष्ट सत्य है, जिसमें कोई संदेह नहीं।
आयत 26
ٱلْخَبِيثَـٰتُ لِلْخَبِيثِينَ وَٱلْخَبِيثُونَ لِلْخَبِيثَـٰتِ ۖ وَٱلطَّيِّبَـٰتُ لِلطَّيِّبِينَ وَٱلطَّيِّبُونَ لِلطَّيِّبَـٰتِ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ مُبَرَّءُونَ مِمَّا يَقُولُونَ ۖ لَهُم مَّغْفِرَةٌۭ وَرِزْقٌۭ كَرِيمٌۭ
ٱلْخَبِيثَـٰتُ
ख़बीस औरतें हैं
لِلْخَبِيثِينَ
ख़बीस मर्दों के लिए
وَٱلْخَبِيثُونَ
और ख़बीस मर्द हैं
لِلْخَبِيثَـٰتِ ۖ
ख़बीस औरतों के लिए
وَٱلطَّيِّبَـٰتُ
और पाकीज़ा औरतें हैं
لِلطَّيِّبِينَ
पाकीज़ा मर्दों के लिए
وَٱلطَّيِّبُونَ
और पाकीज़ा मर्द हैं
لِلطَّيِّبَـٰتِ ۚ
पाकीज़ा औरतों के लिए
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
مُبَرَّءُونَ
मुबर्रा/ पाक
مِمَّا
उस से जो
يَقُولُونَ ۖ
वो कहते हैं
لَهُم
उनके लिए
مَّغْفِرَةٌۭ
बख़्शिश है
وَرِزْقٌۭ
और रिज़्क़ है
كَرِيمٌۭ
इज़्ज़त वाला
गन्दी चीज़े गन्दें लोगों के लिए है और गन्दे लोग गन्दी चीज़ों के लिए, और अच्छी चीज़ें अच्छे लोगों के लिए है और अच्छे लोग अच्छी चीज़ों के लिए। वे लोग उन बातों से बरी है, जो वे कह रहे है। उनके लिए क्षमा और सम्मानित आजीविका है
तफ़्सीर:
पुरुषों, महिलाओं, कार्यों और बातों में से जो भी अपवित्र है, वह उसी के लिए उपयुक्त और अनुकूल है, जो अपवित्र है। और इनमें से जो भी पवित्र है, वह उसी के लिए उपयुक्त और अनुकूल है, जो पवित्र है। ये पवित्र पुरुष और पवित्र स्त्रियाँ उससे बरी किए गए हैं, जो उनके बारे में अपवित्र पुरुष और अपवित्र स्त्रियाँ कहती हैं। उनके लिए अल्लाह की ओर से क्षमादान है, जिससे वह उनके गुनाह माफ़ कर देगा। तथा उनके लिए सम्मान वाली जीविका है, और वह जन्नत है।
आयत 27
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَدْخُلُوا۟ بُيُوتًا غَيْرَ بُيُوتِكُمْ حَتَّىٰ تَسْتَأْنِسُوا۟ وَتُسَلِّمُوا۟ عَلَىٰٓ أَهْلِهَا ۚ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌۭ لَّكُمْ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Do) not
تَدْخُلُوا۟
ना तुम दाख़िल हो
بُيُوتًا
घरों में
غَيْرَ
सिवाए
بُيُوتِكُمْ
अपने घरों के
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
تَسْتَأْنِسُوا۟
तुम उनस हासिल कर लो
وَتُسَلِّمُوا۟
और तुम सलाम करो
عَلَىٰٓ
ऊपर
أَهْلِهَا ۚ
उसके रहने वालों के
ذَٰلِكُمْ
ये बात
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ो
ऐ ईमान लानेवालो! अपने घरों के सिवा दूसरे घऱों में प्रवेश करो, जब तक कि रज़ामन्दी हासिल न कर लो और उन घरवालों को सलाम न कर लो। यही तुम्हारे लिए उत्तम है, कदाचित तुम ध्यान रखो
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसकी शरीयत पर चलने वालो! अपने घरों के सिवा अन्य घरों में उस समय तक प्रवेश न करो, जब तक उसके निवासियों से प्रवेश की अनुमति न ले लो और उन्हें सलाम न कर लो। सलाम करते और अनुमति लेते समय इस तरह कहो : "अस्सलामु अलैकुम, क्या मै अंदर आ सकता हूँ?" यह अनुमति प्राप्त करना जिसका तुम्हें आदेश दिया गया है, अचानक प्रवेश करने से बेहतर है। ताकि तुम अनुमति लेने के इस आदेश को याद रखो और उसका पालन करो।
आयत 28
فَإِن لَّمْ تَجِدُوا۟ فِيهَآ أَحَدًۭا فَلَا تَدْخُلُوهَا حَتَّىٰ يُؤْذَنَ لَكُمْ ۖ وَإِن قِيلَ لَكُمُ ٱرْجِعُوا۟ فَٱرْجِعُوا۟ ۖ هُوَ أَزْكَىٰ لَكُمْ ۚ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌۭ
فَإِن
फिर अगर
لَّمْ
ना
تَجِدُوا۟
तुम पाओ
فِيهَآ
उनमें
أَحَدًۭا
किसी एक को
فَلَا
तो ना
تَدْخُلُوهَا
तुम दाख़िल हो उनमें
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يُؤْذَنَ
इजाज़त दे दी जाए
لَكُمْ ۖ
तुम्हें
وَإِن
और अगर
قِيلَ
कहा जाए
لَكُمُ
तुम्हें
ٱرْجِعُوا۟
वापस जाओ
فَٱرْجِعُوا۟ ۖ
तो वापस चले जाओ
هُوَ
वो
أَزْكَىٰ
ज़्यादा पाकीज़ा है
لَكُمْ ۚ
तुम्हारे लिए
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بِمَا
उसे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
फिर यदि उनमें किसी को न पाओ, तो उनमें प्रवेश न करो जब तक कि तुम्हें अनुमति प्राप्त न हो। और यदि तुमसे कहा जाए कि वापस हो जाओ तो वापस हो जाओ, यही तुम्हारे लिए अधिक अच्छी बात है। अल्लाह भली-भाँति जानता है जो कुछ तुम करते हो
तफ़्सीर:
अगर तुम उन घरों में किसी को न पाओ, तो तुम उनमें प्रवेश न करो, यहाँ तक कि जिसके पास अनुमति देने का अधिकार हो, वह तुम्हें उनमें प्रवेश करने की अनुमति दे दे। और अगर घर के मालिक तुम्हें लौट जाने को कहें, तो लौट जाओ और उसमें प्रवेश न करो। क्योंकि यह तुम्हारे लिए अल्लाह के निकट अधिक पवित्र है। और अल्लाह, तुम जो कुछ करते हो, उससे पूरी तरह अवगत है। तुम्हारा कुछ भी काम उससे छिपा नहीं है। और वह तुम्हें उसका बदला देगा।
आयत 29
لَّيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَن تَدْخُلُوا۟ بُيُوتًا غَيْرَ مَسْكُونَةٍۢ فِيهَا مَتَـٰعٌۭ لَّكُمْ ۚ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ مَا تُبْدُونَ وَمَا تَكْتُمُونَ
لَّيْسَ
नहीं है
عَلَيْكُمْ
तुम पर
جُنَاحٌ
कोई गुनाह
أَن
कि
تَدْخُلُوا۟
तुम दाख़िल हो
بُيُوتًا
घरों में
غَيْرَ
ग़ैर
مَسْكُونَةٍۢ
रिहाइशी
فِيهَا
जिन में
مَتَـٰعٌۭ
फ़ायदा है
لَّكُمْ ۚ
तुम्हारे लिए
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَعْلَمُ
वो जानता है
مَا
जो कुछ
تُبْدُونَ
तुम ज़ाहिर करते हो
وَمَا
और जो कुछ
تَكْتُمُونَ
तुम छुपाते हो
इसमें तुम्हारे लिए कोई दोष नहीं है कि तुम ऐसे घरों में प्रवेश करो जिनमें कोई न रहता हो, जिनमें तुम्हारे फ़ायदे की कोई चीज़ हो। और अल्लाह जानता है जो कुछ तुम प्रकट करते हो और जो कुछ छिपाते हो
तफ़्सीर:
ऐसे सार्वजनिक घरों में बिना अनुमति के प्रवेश करने में तुमपर कोई पाप नहीं, जो किसी व्यक्ति विशेष से संबंधित नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक उपयोग के लिए तैयार किए गए हैं, जैसे पुस्तकालयें और बाजारों में दुकानें। तथा तुम अपने कार्यों और अपनी स्थितियों में से जो छिपाते हो और जो ज़ाहिर करते हो, अल्लाह उन्हें भली-भाँति जानता है। उनमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है और वह तुम्हें उनका बदला देगा।
आयत 30
قُل لِّلْمُؤْمِنِينَ يَغُضُّوا۟ مِنْ أَبْصَـٰرِهِمْ وَيَحْفَظُوا۟ فُرُوجَهُمْ ۚ ذَٰلِكَ أَزْكَىٰ لَهُمْ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ خَبِيرٌۢ بِمَا يَصْنَعُونَ
قُل
कह दीजिए
لِّلْمُؤْمِنِينَ
मोमिन मर्दों से
يَغُضُّوا۟
वो पस्त रखें
مِنْ
their gaze
أَبْصَـٰرِهِمْ
अपनी निगाहों में से
وَيَحْفَظُوا۟
और वो हिफ़ाज़त करें
فُرُوجَهُمْ ۚ
अपनी शर्मगाहों की
ذَٰلِكَ
ये
أَزْكَىٰ
ज़्यादा पाकीज़ा है
لَهُمْ ۗ
उनके लिए
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
خَبِيرٌۢ
ख़ूब ख़बर रखने वाला है
بِمَا
उसकी जो
يَصْنَعُونَ
वो करते हैं
ईमानवाले पुरुषों से कह दो कि अपनी निगाहें बचाकर रखें और अपने गुप्तांगों की रक्षा करें। यही उनके लिए अधिक अच्छी बात है। अल्लाह को उसकी पूरी ख़बर रहती है, जो कुछ वे किया करते है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप ईमान वालों से कह दें कि वे अपनी निगाहों को उन चीज़ों की ओर देखने से रोक लें, जो उनके लिए हलाल नहीं हैं, जैसे कि (पराई) स्त्रियाँ और गुप्तांग (निजी अंग), और अपने गुप्तांगों की हराम में पड़ने से तथा उन्हें प्रकट करने से रक्षा करें। यह अल्लाह की हराम की हुई चीज़ों को देखने से बाज़ रहना और गुप्तांगों को संरक्षित करना उनके लिए अल्लाह के निकट अधिक पवित्र है। निःसंदेह अल्लाह उससे पूरी तरह अवगत है, जो वे करते हैं। उसमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है और वह उन्हें उनके कर्मों का बदला देगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
बदगुमानी से बचने की ताकीद और नज़रें नीची रखने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि निगाहों की हिफाज़त और घर में दाखिल होते वक्त इजाज़त लेना समाजी अदब का हिस्सा है।
आयत 31
وَقُل لِّلْمُؤْمِنَـٰتِ يَغْضُضْنَ مِنْ أَبْصَـٰرِهِنَّ وَيَحْفَظْنَ فُرُوجَهُنَّ وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا مَا ظَهَرَ مِنْهَا ۖ وَلْيَضْرِبْنَ بِخُمُرِهِنَّ عَلَىٰ جُيُوبِهِنَّ ۖ وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا لِبُعُولَتِهِنَّ أَوْ ءَابَآئِهِنَّ أَوْ ءَابَآءِ بُعُولَتِهِنَّ أَوْ أَبْنَآئِهِنَّ أَوْ أَبْنَآءِ بُعُولَتِهِنَّ أَوْ إِخْوَٰنِهِنَّ أَوْ بَنِىٓ إِخْوَٰنِهِنَّ أَوْ بَنِىٓ أَخَوَٰتِهِنَّ أَوْ نِسَآئِهِنَّ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُهُنَّ أَوِ ٱلتَّـٰبِعِينَ غَيْرِ أُو۟لِى ٱلْإِرْبَةِ مِنَ ٱلرِّجَالِ أَوِ ٱلطِّفْلِ ٱلَّذِينَ لَمْ يَظْهَرُوا۟ عَلَىٰ عَوْرَٰتِ ٱلنِّسَآءِ ۖ وَلَا يَضْرِبْنَ بِأَرْجُلِهِنَّ لِيُعْلَمَ مَا يُخْفِينَ مِن زِينَتِهِنَّ ۚ وَتُوبُوٓا۟ إِلَى ٱللَّهِ جَمِيعًا أَيُّهَ ٱلْمُؤْمِنُونَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ
وَقُل
और कह दीजिए
لِّلْمُؤْمِنَـٰتِ
मोमिन औरतों से
يَغْضُضْنَ
वो पस्त रखें
مِنْ
[of]
أَبْصَـٰرِهِنَّ
अपनी निगाहों में से
وَيَحْفَظْنَ
और वो हिफ़ाज़त करें
فُرُوجَهُنَّ
अपनी शर्मगाहों की
وَلَا
और ना
يُبْدِينَ
वो ज़ाहिर करें
زِينَتَهُنَّ
ज़ीनत अपनी
إِلَّا
मगर
مَا
जो
ظَهَرَ
ज़हिर हो जाए
مِنْهَا ۖ
उस में से
وَلْيَضْرِبْنَ
और वो ज़रूर डालें
بِخُمُرِهِنَّ
ओढ़नियाँ अपनी
عَلَىٰ
over
جُيُوبِهِنَّ ۖ
अपने गिरेबानों पर
وَلَا
और ना
يُبْدِينَ
वो ज़ाहिर करें
زِينَتَهُنَّ
ज़ीनत अपनी
إِلَّا
मगर
لِبُعُولَتِهِنَّ
वास्ते अपने शौहरों को
أَوْ
या
ءَابَآئِهِنَّ
अपने बापों के
أَوْ
या
ءَابَآءِ
fathers
بُعُولَتِهِنَّ
अपने शौहरों के बापों के
أَوْ
या
أَبْنَآئِهِنَّ
अपने बेटों के
أَوْ
या
أَبْنَآءِ
sons
بُعُولَتِهِنَّ
अपने शौहरों के बेटों के
أَوْ
या
إِخْوَٰنِهِنَّ
अपने भाईयों के
أَوْ
या
بَنِىٓ
sons
إِخْوَٰنِهِنَّ
अपने भाईयों के बेटों के
أَوْ
या
بَنِىٓ
sons
أَخَوَٰتِهِنَّ
अपनी बहनों के बेटों के
أَوْ
या
نِسَآئِهِنَّ
अपनी औरतों के
أَوْ
या
مَا
जिनके
مَلَكَتْ
मालिक हुए
أَيْمَـٰنُهُنَّ
उनके दाऐं हाथ
أَوِ
या
ٱلتَّـٰبِعِينَ
ज़ेरदस्त
غَيْرِ
ना
أُو۟لِى
रखने वाले
ٱلْإِرْبَةِ
हाजत/ ख़्वाहिश
مِنَ
among
ٱلرِّجَالِ
मर्दों में से
أَوِ
या
ٱلطِّفْلِ
लड़के
ٱلَّذِينَ
वो जो
لَمْ
नहीं
يَظْهَرُوا۟
वो वाक़िफ़ हुए
عَلَىٰ
of
عَوْرَٰتِ
छुपी बातों पर
ٱلنِّسَآءِ ۖ
औरतों की
وَلَا
और ना
يَضْرِبْنَ
वो मारें
بِأَرْجُلِهِنَّ
पाँव अपने
لِيُعْلَمَ
कि जान लिया जाए
مَا
जो
يُخْفِينَ
वो छुपाती हैं
مِن
of
زِينَتِهِنَّ ۚ
अपनी ज़ीनत में से
وَتُوبُوٓا۟
और तौबा करो
إِلَى
to
ٱللَّهِ
तरफ़ अल्लाह के
جَمِيعًا
सब के सब
أَيُّهَ
ٱلْمُؤْمِنُونَ
मोमिनो
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تُفْلِحُونَ
तुम फ़लाह पाओ
और ईमानवाली स्त्रियों से कह दो कि वे भी अपनी निगाहें बचाकर रखें और अपने गुप्तांगों की रक्षा करें। और अपने शृंगार प्रकट न करें, सिवाय उसके जो उनमें खुला रहता है। और अपने सीनों (वक्षस्थल) पर अपने दुपट्टे डाल रहें और अपना शृंगार किसी पर ज़ाहिर न करें सिवाय अपने पतियों के या अपने बापों के या अपने पतियों के बापों के या अपने बेटों के या अपने पतियों के बेटों के या अपने भाइयों के या अपने भतीजों के या अपने भांजों के या मेल-जोल की स्त्रियों के या जो उनकी अपनी मिल्कियत में हो उनके, या उन अधीनस्थ पुरुषों के जो उस अवस्था को पार कर चुके हों जिससें स्त्री की ज़रूरत होती है, या उन बच्चों के जो स्त्रियों के परदे की बातों से परिचित न हों। और स्त्रियाँ अपने पाँव धरती पर मारकर न चलें कि अपना जो शृंगार छिपा रखा हो, वह मालूम हो जाए। ऐ ईमानवालो! तुम सब मिलकर अल्लाह से तौबा करो, ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो
तफ़्सीर:
ईमान वाली स्त्रियों से कह दें कि जिन पर्दे की चीजों को देखना उनके लिए ह़लाल नहीं है, उनकी ओर देखने से अपनी निगाहों को बचाएँ। तथा व्यभिचार से दूर रहकर और खुद को परदे में रखकर अपने गुप्तांगों की रक्षा करें। और अपने श्रृंगार को अपरिचित व्यक्तियों के सामने ज़ाहिर न करें, सिवाय इसके कि उसमें से जो खुद से प्रकट हो जाए, जिसका छिपाना संभव न हो, जैसे कपड़े। और अपने बालों, चेहरों और गर्दनों को ढँकने के लिए अपने कपड़ों के ऊपरी हिस्से के खुले भाग पर अपनी ओढ़नियाँ (चादरें) डाल लिया करें। और अपने गुप्त श्रृंगार को किसी के सामने ज़ाहिर न करें, सिवाय अपने पतियों के, अथवा अपने पिताओं के, अथवा अपने पतियों के पिताओं के, अथवा अपने बेटों के, अथवा अपने पतियों के बेटों के, अथवा अपने भाइयों के, अथवा अपने भतीजों के, अथवा अपने भाँजों के, अथवा अपनी भरोसे के लायक़ स्त्रियों के, वह स्त्रियाँ मुसलमान हों या काफिर, अथवा उन दास-दासियों के, जिनकी वे मालिक हों, अथवा ऐसे अधीनस्थ पुरुषों के, जो स्त्रियों में किसी प्रकार की इच्छा न रखते हों, अथवा ऐसे छोटे बच्चों के, जो महिलाओं की छिपी बातों का ज्ञान न रखते हों। तथा औरतें धरती पर अपने पैर मारती हुई न चलें कि उनके छिपे हुए श्रृंगार जैसे पाज़ेब आदि का पता चल जाए। (ऐ मोमिनों!) तुम सब नज़र आदि के गुनाहों से अल्लाह के सामने तौबा करो, आशा है कि तुम अपनी अपेक्षित चीज़ को पाने में सफल हो जाओ और उस चीज़ से मुक्ति पा जाओ जिससे डरते हो।
आयत 32
وَأَنكِحُوا۟ ٱلْأَيَـٰمَىٰ مِنكُمْ وَٱلصَّـٰلِحِينَ مِنْ عِبَادِكُمْ وَإِمَآئِكُمْ ۚ إِن يَكُونُوا۟ فُقَرَآءَ يُغْنِهِمُ ٱللَّهُ مِن فَضْلِهِۦ ۗ وَٱللَّهُ وَٰسِعٌ عَلِيمٌۭ
وَأَنكِحُوا۟
और निकाह कर दो
ٱلْأَيَـٰمَىٰ
बेनिकाहों का
مِنكُمْ
तुम में से
وَٱلصَّـٰلِحِينَ
और जो नेक हों
مِنْ
among
عِبَادِكُمْ
तुम्हारे ग़ुलामों में से
وَإِمَآئِكُمْ ۚ
और तुम्हारी लौंडियों में से
إِن
अगर
يَكُونُوا۟
होंगे वो
فُقَرَآءَ
मोहताज
يُغْنِهِمُ
ग़नी कर देगा उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
مِن
from
فَضْلِهِۦ ۗ
अपने फ़ज़ल से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
وَٰسِعٌ
ख़ूब वुसअत वाला है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब इल्म वाला है
तुममें जो बेजोड़े के हों और तुम्हारे ग़ुलामों और तुम्हारी लौंडियों मे जो नेक और योग्य हों, उनका विवाह कर दो। यदि वे ग़रीब होंगे तो अल्लाह अपने उदार अनुग्रह से उन्हें समृद्ध कर देगा। अल्लाह बड़ी समाईवाला, सर्वज्ञ है
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो!) उन पुरुषों का विवाह कर दो, जिनकी पत्नियाँ नहीं हैं तथा उन आज़ाद महिलाओं का भी, जिनके पति नहीं हैं और अपने ईमान वाले दासों एवं दासियों का भी विवाह कर दो। यदि वे निर्धन हैं, तो अल्लाह अपने विशाल अनुग्रह से उन्हें धनी बना देगा। अल्लाह बड़ा जीविका दाता है। किसी को धनी बनाने से उसकी जीविका में कमी नहीं होती। वह अपने बंदों की स्थितियों से अवगत है।
आयत 33
وَلْيَسْتَعْفِفِ ٱلَّذِينَ لَا يَجِدُونَ نِكَاحًا حَتَّىٰ يُغْنِيَهُمُ ٱللَّهُ مِن فَضْلِهِۦ ۗ وَٱلَّذِينَ يَبْتَغُونَ ٱلْكِتَـٰبَ مِمَّا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُكُمْ فَكَاتِبُوهُمْ إِنْ عَلِمْتُمْ فِيهِمْ خَيْرًۭا ۖ وَءَاتُوهُم مِّن مَّالِ ٱللَّهِ ٱلَّذِىٓ ءَاتَىٰكُمْ ۚ وَلَا تُكْرِهُوا۟ فَتَيَـٰتِكُمْ عَلَى ٱلْبِغَآءِ إِنْ أَرَدْنَ تَحَصُّنًۭا لِّتَبْتَغُوا۟ عَرَضَ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۚ وَمَن يُكْرِههُّنَّ فَإِنَّ ٱللَّهَ مِنۢ بَعْدِ إِكْرَٰهِهِنَّ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
وَلْيَسْتَعْفِفِ
और ज़रूर पाकदामनी इख़्तियार करें
ٱلَّذِينَ
वो जो
لَا
(do) not
يَجِدُونَ
नहीं वो पाते(वुसअत)
نِكَاحًا
निकाह की
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يُغْنِيَهُمُ
ग़नी कर दे उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
مِن
from
فَضْلِهِۦ ۗ
अपने फ़ज़ल से
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
يَبْتَغُونَ
चाहते हों
ٱلْكِتَـٰبَ
मुकातबत/आज़ादी की तहरीर
مِمَّا
उनमें से जिनके
مَلَكَتْ
मालिक हैं
أَيْمَـٰنُكُمْ
दाऐं हाथ तुम्हारे
فَكَاتِبُوهُمْ
तो मुकातबत कर लो उनसे
إِنْ
अगर
عَلِمْتُمْ
जानो तुम
فِيهِمْ
उनमें
خَيْرًۭا ۖ
कोई भलाई
وَءَاتُوهُم
और दो उन्हें
مِّن
from
مَّالِ
माल से
ٱللَّهِ
अल्लाह के
ٱلَّذِىٓ
वो जो
ءَاتَىٰكُمْ ۚ
उसने दिया है तुम्हें
وَلَا
और ना
تُكْرِهُوا۟
तुम मजबूर करो
فَتَيَـٰتِكُمْ
अपना बाँदियों को
عَلَى
to
ٱلْبِغَآءِ
बदकारी पर
إِنْ
अगर
أَرَدْنَ
वो चाहें
تَحَصُّنًۭا
पाकदामनी
لِّتَبْتَغُوا۟
ताकि तुम तलाश करो
عَرَضَ
सामान
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी का
ٱلدُّنْيَا ۚ
दुनिया की
وَمَن
और जो कोई
يُكْرِههُّنَّ
मजबूर करेगा उन्हें
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद
إِكْرَٰهِهِنَّ
उनको मजबूर करने के
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
और जो विवाह का अवसर न पा रहे हो उन्हें चाहिए कि पाकदामनी अपनाए रहें, यहाँ तक कि अल्लाह अपने उदार अनुग्रह से उन्हें समृद्ध कर दे। और जिन लोगों पर तुम्हें स्वामित्व का अधिकार प्राप्त हो उनमें से जो लोग लिखा-पढ़ी के इच्छुक हो उनसे लिखा-पढ़ी कर लो, यदि तुम्हें मालूम हो कि उनमें भलाई है। और उन्हें अल्लाह के माल में से दो, जो उसने तुम्हें प्रदान किया है। और अपनी लौंडियों को सांसारिक जीवन-सामग्री की चाह में व्यविचार के लिए बाध्य न करो, जबकि वे पाकदामन रहना भी चाहती हों। औऱ इसके लिए जो कोई उन्हें बाध्य करेगा, तो निश्चय ही अल्लाह उनके बाध्य किए जाने के पश्चात अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
जो लोग अपनी गरीबी के कारण शादी करने में असमर्थ हैं, वे व्यभिचार से बचें, यहाँ तक कि अल्लाह उन्हें अपने विशाल अनुग्रह से समृद्ध कर दे। और जो दास अपने मालिकों से माल के बदले आज़ादी का अनुबंध करना चाहते हैं, उनके मालिकों को इसे स्वीकार कर लेना चाहिए, यदि वे उनके अनंदर अदा करने की क्षमता और धर्म में अच्छाई जानते हों। तथा उन्हें चाहिए कि अल्लाह के प्रदान किए हुए माल में से उन (दासों) को कुछ दें, इस प्रकार कि लिखा-पढ़ी के समय जो धन निर्धारित हुआ था, उसका कुछ भाग छोड़ दें। और माल की तलाश में अपने दासियों को व्यभिचार करने के लिए मजबूर न करो (जैसा कि अब्दुल्लाह बिन उबैय ने अपनी दो दासियों के साथ किया था जबकि वे पवित्रता और व्यभिचार से दूर रहना चाहती थीं), ताकि तुम उनकी योनि की कमाई खाओ। और तुम में से जो व्यक्ति उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर करेगा, तो अल्लाह उनके मजबूर किए जाने के बाद उन (दासियों) के पापों को क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है। क्योंकि वे मजबूर की गई हैं। और पाप उन्हें मजबूर करने वाले पर है।
आयत 34
وَلَقَدْ أَنزَلْنَآ إِلَيْكُمْ ءَايَـٰتٍۢ مُّبَيِّنَـٰتٍۢ وَمَثَلًۭا مِّنَ ٱلَّذِينَ خَلَوْا۟ مِن قَبْلِكُمْ وَمَوْعِظَةًۭ لِّلْمُتَّقِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَنزَلْنَآ
नाज़िल कीं हमने
إِلَيْكُمْ
तरफ़ तुम्हारे
ءَايَـٰتٍۢ
आयात
مُّبَيِّنَـٰتٍۢ
वाज़ेह
وَمَثَلًۭا
और मिसाल
مِّنَ
of
ٱلَّذِينَ
उन लोगों की जो
خَلَوْا۟
गुज़र चुके
مِن
before you
قَبْلِكُمْ
तुम से पहले
وَمَوْعِظَةًۭ
और नसीहत
لِّلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के लिए
हमने तुम्हारी ओर खुली हुई आयतें उतार दी है और उन लोगों की मिशालें भी पेश कर दी हैं, जो तुमसे पहले गुज़रे है, और डर रखनेवालों के लिए नसीहत भी
तफ़्सीर:
(ऐ लोगों!) हमने तुम्हारी ओर सच को झूठ से स्पष्ट करने वाली खुली आयतें उतारी हैं। और हमने तुम्हारे लिए तुमसे पहले गुज़रे हुए मोमिनों एवं काफिरों का उदाहरण भी प्रस्तुत किया है। तथा हमने तुमपर एक उपदेश उतारा है, जिससे वे लोग उपदेश ग्रहण करते हैं, जो अपने पालनहार से, उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई बातों से बचकर, डरते हैं।
आयत 35
۞ ٱللَّهُ نُورُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ مَثَلُ نُورِهِۦ كَمِشْكَوٰةٍۢ فِيهَا مِصْبَاحٌ ۖ ٱلْمِصْبَاحُ فِى زُجَاجَةٍ ۖ ٱلزُّجَاجَةُ كَأَنَّهَا كَوْكَبٌۭ دُرِّىٌّۭ يُوقَدُ مِن شَجَرَةٍۢ مُّبَـٰرَكَةٍۢ زَيْتُونَةٍۢ لَّا شَرْقِيَّةٍۢ وَلَا غَرْبِيَّةٍۢ يَكَادُ زَيْتُهَا يُضِىٓءُ وَلَوْ لَمْ تَمْسَسْهُ نَارٌۭ ۚ نُّورٌ عَلَىٰ نُورٍۢ ۗ يَهْدِى ٱللَّهُ لِنُورِهِۦ مَن يَشَآءُ ۚ وَيَضْرِبُ ٱللَّهُ ٱلْأَمْثَـٰلَ لِلنَّاسِ ۗ وَٱللَّهُ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌۭ
۞ ٱللَّهُ
अल्लाह
نُورُ
नूर है
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ ۚ
और ज़मीन का
مَثَلُ
मिसाल
نُورِهِۦ
उसके नूर की
كَمِشْكَوٰةٍۢ
मानिन्द ताक़ के
فِيهَا
जिसमें
مِصْبَاحٌ ۖ
एक चिराग़ है
ٱلْمِصْبَاحُ
वो चिराग़
فِى
(is) in
زُجَاجَةٍ ۖ
शीशे में है
ٱلزُّجَاجَةُ
वो शीशा
كَأَنَّهَا
गोया कि वो
كَوْكَبٌۭ
तारा है
دُرِّىٌّۭ
चमकता हुआ
يُوقَدُ
जो रौशन किया जाता है
مِن
from
شَجَرَةٍۢ
एक दरख़्त से
مُّبَـٰرَكَةٍۢ
बाबरकत
زَيْتُونَةٍۢ
ज़ैतून के
لَّا
not
شَرْقِيَّةٍۢ
ना मशरिक़ी है
وَلَا
और ना
غَرْبِيَّةٍۢ
मग़रिबी
يَكَادُ
क़रीब है कि
زَيْتُهَا
तेल उसका
يُضِىٓءُ
वो रौशन हो जाए
وَلَوْ
और अगरचे
لَمْ
ना
تَمْسَسْهُ
छुए उसे
نَارٌۭ ۚ
कोई आग
نُّورٌ
नूर है
عَلَىٰ
upon
نُورٍۢ ۗ
ऊपर नूर के
يَهْدِى
रहनुमाई करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِنُورِهِۦ
अपने नूर के लिए
مَن
जिसकी
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता है
وَيَضْرِبُ
और बयान करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْأَمْثَـٰلَ
मिसालें
لِلنَّاسِ ۗ
लोगों के लिए
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ को
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
अल्लाह आकाशों और धरती का प्रकाश है। (मोमिनों के दिल में) उसके प्रकाश की मिसाल ऐसी है जैसे एक ताक़ है, जिसमें एक चिराग़ है - वह चिराग़ एक फ़ानूस में है। वह फ़ानूस ऐसा है मानो चमकता हुआ कोई तारा है। - वह चिराग़ ज़ैतून के एक बरकतवाले वृक्ष के तेल से जलाया जाता है, जो न पूर्वी है न पश्चिमी। उसका तेल आप है आप भड़का पड़ता है, यद्यपि आग उसे न भी छुए। प्रकाश पर प्रकाश! - अल्लाह जिसे चाहता है अपने प्रकाश के प्राप्त होने का मार्ग दिखा देता है। अल्लाह लोगों के लिए मिशालें प्रस्तुत करता है। अल्लाह तो हर चीज़ जानता है।
तफ़्सीर:
अल्लाह आकाश और धरती का प्रकाश और उन दोनों में मौजूद सारी चीज़ों का मार्गदर्शन करने वाला है। मोमिन के हृदय में अल्लाह के प्रकाश की मिसाल, दीवार में एक ताक़ की तरह है, जिसमें एक चिराग़ है। वह चिराग़ एक चमकते हुए फानूस में है, जो मोती की तरह एक चमकदार तारा मालूम होता है। वह चिराग़ एक मुबारक पेड़ के तेल से जलाया जाता है, जो कि ज़ैतून का पेड़ है। उस पेड़ को सूरज से कोई चीज़ नहीं छिपाती है, न तो सुबह और न ही शाम को। उसका तेल इतना साफ़-सुथरा होता है कि मानो आग के छुए बिना ही जल उठेगा। तो फिर आग के छूने के बाद क्या हाल होगा?! चिराग़ का प्रकाश, फ़ानूस के प्रकाश पर है। यही हाल मोमिन व्यक्ति के दिल का होता है, जब उसके अंदर मार्गदर्शन का प्रकाश चमक उठे। अल्लाह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, क़ुरआन का पालन करने का सामर्थ्य प्रदान करता है। तथा अल्लाह चीज़ों को उनके समान चीज़ों के द्वारा उदाहरण देकर स्पष्ट करता है। और अल्लाह हर चीज़ को जानने वाला है। उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है।
आयत 36
فِى بُيُوتٍ أَذِنَ ٱللَّهُ أَن تُرْفَعَ وَيُذْكَرَ فِيهَا ٱسْمُهُۥ يُسَبِّحُ لَهُۥ فِيهَا بِٱلْغُدُوِّ وَٱلْـَٔاصَالِ
فِى
In
بُيُوتٍ
घरों में
أَذِنَ
हुक्म दिया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
أَن
कि
تُرْفَعَ
बुलन्द किया जाए
وَيُذْكَرَ
और ज़िक्र किया जाए
فِيهَا
उनमें
ٱسْمُهُۥ
नाम उसका
يُسَبِّحُ
वो तस्बीह करते हैं
لَهُۥ
उसकी
فِيهَا
उनमें
بِٱلْغُدُوِّ
सुबह
وَٱلْـَٔاصَالِ
और शाम
उन घरों में जिनको ऊँचा करने और जिनमें अपने नाम के याद करने का अल्लाह ने हुक्म दिया है,
तफ़्सीर:
यह चिराग़ उन मस्जिदों में जलाया जाता है, जिनके स्थान एवं भवन को अल्लाह ने उच्च रखने का आदेश दिया है। उनमें अज़ान, ज़िक्र और नमाज़ के द्वारा उसका नाम याद किया जाता है। उनके अंदर अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए दिन की शुरुआत और उसके अंत में नमाज़ पढ़ते हैं।
आयत 37
رِجَالٌۭ لَّا تُلْهِيهِمْ تِجَـٰرَةٌۭ وَلَا بَيْعٌ عَن ذِكْرِ ٱللَّهِ وَإِقَامِ ٱلصَّلَوٰةِ وَإِيتَآءِ ٱلزَّكَوٰةِ ۙ يَخَافُونَ يَوْمًۭا تَتَقَلَّبُ فِيهِ ٱلْقُلُوبُ وَٱلْأَبْصَـٰرُ
رِجَالٌۭ
वो मर्द
لَّا
not
تُلْهِيهِمْ
नहीं ग़ाफ़िल करती उन्हें
تِجَـٰرَةٌۭ
तिजारत
وَلَا
और ना
بَيْعٌ
ख़रीदो फ़रोख़्त
عَن
from
ذِكْرِ
ज़िक्र से
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَإِقَامِ
और क़ायम करने से
ٱلصَّلَوٰةِ
नमाज़ के
وَإِيتَآءِ
और अदा करने से
ٱلزَّكَوٰةِ ۙ
ज़कात के
يَخَافُونَ
वो डरते हैं
يَوْمًۭا
उस दिन से
تَتَقَلَّبُ
उलट-पलट हो जाऐंगे
فِيهِ
जिसमें
ٱلْقُلُوبُ
दिल
وَٱلْأَبْصَـٰرُ
और निगाहें
उनमें ऐसे लोग प्रभात काल और संध्या समय उसकी तसबीह करते है जिन्हें अल्लाह की याद और नमाज क़ायम करने और ज़कात देने से न तो व्यापार ग़ाफ़िल करता है और न क्रय-विक्रय। वे उस दिन से डरते रहते है जिसमें दिल और आँखें विकल हो जाएँगी
तफ़्सीर:
वे ऐसे लोग हैं, जिन्हें ख़रीद या बिक्री अल्लाह का ज़िक्र करने, संपूर्ण तरीके से नमाज़ अदा करने और ज़कात के हक़दारों को ज़कात देने से ग़ाफ़िल नहीं करती। वे क़ियामत के दिन से डरते हैं। वह दिन, जब लोगों के दिल यातना से मुक्ति की आशा और उससे भय के बीच डोल रहे होंगे और निगाहें इधर-उधर फिर रही होंगी कि उन्हें किधर जाना है।
आयत 38
لِيَجْزِيَهُمُ ٱللَّهُ أَحْسَنَ مَا عَمِلُوا۟ وَيَزِيدَهُم مِّن فَضْلِهِۦ ۗ وَٱللَّهُ يَرْزُقُ مَن يَشَآءُ بِغَيْرِ حِسَابٍۢ
لِيَجْزِيَهُمُ
ताकि बदला दे उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَحْسَنَ
बेहतरीन
مَا
उसका जो
عَمِلُوا۟
उन्होंने अमल किए
وَيَزِيدَهُم
और ज़्यादा दे उन्हें
مِّن
from
فَضْلِهِۦ ۗ
अपने फ़ज़ल से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَرْزُقُ
वो रिज़्क़ देता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
بِغَيْرِ
बग़ैर
حِسَابٍۢ
हिसाब के
ताकि अल्लाह उन्हें बदला प्रदान करे। उनके अच्छे से अच्छे कामों का, और अपने उदार अनुग्रह से उन्हें और अधिक प्रदान करें। अल्लाह जिसे चाहता है बेहिसाब देता है
तफ़्सीर:
उन्होंने ऐसे कार्य किए, ताकि अल्लाह उन्हें उनके अच्छे कामों का (उत्तम) बदला दे, तथा अपने अनुग्रह से उनके प्रतिफल में और वृद्धि कर दे। अल्लाह जिसे चाहता है, उसके कर्मों के अनुसार गिने बिना जीविका देता है। बल्कि वह उनके कर्मों से कई गुना अधिक देता है।
आयत 39
وَٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ أَعْمَـٰلُهُمْ كَسَرَابٍۭ بِقِيعَةٍۢ يَحْسَبُهُ ٱلظَّمْـَٔانُ مَآءً حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءَهُۥ لَمْ يَجِدْهُ شَيْـًۭٔا وَوَجَدَ ٱللَّهَ عِندَهُۥ فَوَفَّىٰهُ حِسَابَهُۥ ۗ وَٱللَّهُ سَرِيعُ ٱلْحِسَابِ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
أَعْمَـٰلُهُمْ
आमाल उनके
كَسَرَابٍۭ
मानिन्द सराब के हैं
بِقِيعَةٍۢ
चटियल मैदान में
يَحْسَبُهُ
समझता है उसे
ٱلظَّمْـَٔانُ
सख़्त प्यासा
مَآءً
पानी
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
جَآءَهُۥ
वो आता है उसके पास
لَمْ
नहीं
يَجِدْهُ
वो पाता उसे
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
وَوَجَدَ
और पाता है
ٱللَّهَ
अल्लाह को
عِندَهُۥ
अपने पास
فَوَفَّىٰهُ
फिर वो पूरा-पूरा देता है उसे
حِسَابَهُۥ ۗ
हिसाब उसका
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
سَرِيعُ
जल्द लेने वाला है
ٱلْحِسَابِ
हिसाब
रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया उनके कर्म चटियल मैदान में मरीचिका की तरह है कि प्यासा उसे पानी समझता है, यहाँ तक कि जब वह उसके पास पहुँचा तो उसे कुछ भी न पाया। अलबत्ता अल्लाह ही को उसके पास पाया, जिसने उसका हिसाब पूरा-पूरा चुका दिया। और अल्लाह बहुत जल्द हिसाब करता है
तफ़्सीर:
और जिन लोगों ने अल्लाह का इनकार किया, उनके किए हुए कर्मों का कोई प्रतिफल नहीं है। जिस तरह कि किसी निचली भूमि में नज़र आने वाला सराब (मरीचिका) होता है, जिसे प्यासा आदमी देखकर यह सोचता है कि वह पानी है। चुनाँचे वह उसकी ओर चल पड़ता है। यहाँ तक कि जब वहाँ आकर खड़ा होता है, तो वहाँ पानी बिलकुल नहीं पाता। इसी तरह, एक काफ़िर यह सोचता है कि उसके कर्मों से उसे लाभ होगा, यहाँ तक कि जब वह मर जाएगा और दोबारा उठाया जाएगा, तो वह उनका प्रतिफल नहीं पाएगा। और वह अपने रब को अपने समक्ष पाएगा। जो उसे उसके किए हुए कर्मों का पूरा-पूरा बदला देगा। और अल्लाह बहुत जल्द हिसाब करने वाला है।
आयत 40
أَوْ كَظُلُمَـٰتٍۢ فِى بَحْرٍۢ لُّجِّىٍّۢ يَغْشَىٰهُ مَوْجٌۭ مِّن فَوْقِهِۦ مَوْجٌۭ مِّن فَوْقِهِۦ سَحَابٌۭ ۚ ظُلُمَـٰتٌۢ بَعْضُهَا فَوْقَ بَعْضٍ إِذَآ أَخْرَجَ يَدَهُۥ لَمْ يَكَدْ يَرَىٰهَا ۗ وَمَن لَّمْ يَجْعَلِ ٱللَّهُ لَهُۥ نُورًۭا فَمَا لَهُۥ مِن نُّورٍ
أَوْ
या
كَظُلُمَـٰتٍۢ
मानिन्द अंधेरों के
فِى
in
بَحْرٍۢ
समुन्दर में
لُّجِّىٍّۢ
निहायत गहरे
يَغْشَىٰهُ
ढाँप लेती है उसे
مَوْجٌۭ
मौज
مِّن
on it
فَوْقِهِۦ
उसके ऊपर से
مَوْجٌۭ
एक( और) मौज
مِّن
on it
فَوْقِهِۦ
उसके ऊपर से
سَحَابٌۭ ۚ
बादल
ظُلُمَـٰتٌۢ
अंधेरे हैं
بَعْضُهَا
बाज़ उनके
فَوْقَ
ऊपर हैं
بَعْضٍ
बाज़ के
إِذَآ
जब
أَخْرَجَ
वो निकाले
يَدَهُۥ
हाथ अपना
لَمْ
नहीं
يَكَدْ
वो क़रीब कि
يَرَىٰهَا ۗ
वो देख सके उसे
وَمَن
और वो जो
لَّمْ
नहीं
يَجْعَلِ
बनाया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
لَهُۥ
उसके लिए
نُورًۭا
कोई नूर
فَمَا
तो नहीं
لَهُۥ
उसके लिए
مِن
(is) any
نُّورٍ
कोई नूर
या फिर जैसे एक गहरे समुद्र में अँधेरे, लहर के ऊपर लहर छा रही हैं; उसके ऊपर बादल है, अँधेरे है एक पर एक। जब वह अपना हाथ निकाले तो उसे वह सुझाई देता प्रतीत न हो। जिसे अल्लाह ही प्रकाश न दे फिर उसके लिए कोई प्रकाश नहीं
तफ़्सीर:
या उनके कर्म एक गहरे सागर में अँधेरों की तरह हैं, जिस (सागर) के ऊपर एक लहर हो, उस लहर के ऊपर एक और लहर हो, (तथा) उसके ऊपर बादल हो, जो तारों को ढाँप ले, जिनसे वह मार्ग पा सकता है। इस तरह, परत दर परत अंधेरे हों। इन अंधेरों में पड़ा हुआ इनसान अगर अपना हाथ निकाले, तो अँधेरे की तीव्रता के कारण शायद ही वह उसे देख सके। यही हाल काफ़िर का है। उसपर अज्ञानता, संदेह, भ्रम तथा हृदय पर मुहर के अँधेरे परत-दर-परत जमे हुए हैं। और जिसे अल्लाह गुमराही से निकालकर मार्गदर्शन और अपनी किताब का ज्ञान न प्रदान करे, तो उसके पास कोई मार्गदर्शन नहीं है, जिसके द्वारा वह मार्ग पा सके, और न ही कोई पुस्तक है, जिसके द्वारा वह प्रकाश प्राप्त कर सके।
आज की ज़िंदगी में सबक़
पर्दे के अहकाम और आयत-उन-नूर का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि पाकदामनी और शर्म-ओ-हया समाज की सलामती के लिए बुनियादी उसूल हैं।
आयत 41
أَلَمْ تَرَ أَنَّ ٱللَّهَ يُسَبِّحُ لَهُۥ مَن فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَٱلطَّيْرُ صَـٰٓفَّـٰتٍۢ ۖ كُلٌّۭ قَدْ عَلِمَ صَلَاتَهُۥ وَتَسْبِيحَهُۥ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌۢ بِمَا يَفْعَلُونَ
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
أَنَّ
कि बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يُسَبِّحُ
तस्बीह करता है
لَهُۥ
उसके लिए
مَن
जो कोई
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन में है
وَٱلطَّيْرُ
और परिन्दे (भी)
صَـٰٓفَّـٰتٍۢ ۖ
पर फैलाए
كُلٌّۭ
हर एक ने
قَدْ
तहक़ीक़
عَلِمَ
जान ली है
صَلَاتَهُۥ
नमाज़ अपनी
وَتَسْبِيحَهُۥ ۗ
और तस्बीह अपनी
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِمَا
उसे जो
يَفْعَلُونَ
वो कर रहे हैं
क्या तुमने नहीं देखा कि जो कोई भी आकाशों और धरती में है, अल्लाह की तसबीह (गुणगान) कर रहा है और पंख पसारे हुए पक्षी भी? हर एक अपनी नमाज़ और तसबीह से परिचित है। अल्लाह भली-भाँति जाना है जो कुछ वे करते है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) क्या आप नहीं जानते कि आकाशों और धरती में जो भी प्राणी हैं, सब अल्लाह की पवित्रता बयान करते हैं, तथा पक्षी हवा में अपने पंख फैलाए उसकी पवित्रता का गान करते हैं। इन प्राणियों में से जो नमाज़ पढ़ते हैं, जैसे इनसान, उनकी नमाज़ को तथा इनमें से जो पवित्रता का गान करते हैं, जैसे पक्षी, उनके पवित्रता गान को अल्लाह ने जान लिया है। और अल्लाह उसे पूरी तरह जानने वाला है, जो वे करते हैं। उनके कार्यों में से कुछ भी उससे छिपा नहीं है।
आयत 42
وَلِلَّهِ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ وَإِلَى ٱللَّهِ ٱلْمَصِيرُ
وَلِلَّهِ
और अल्लाह ही के लिए है
مُلْكُ
बादशाहत
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ ۖ
और ज़मीन की
وَإِلَى
And to
ٱللَّهِ
और अल्लाह ही की तरफ़
ٱلْمَصِيرُ
लौटना है
अल्लाह ही के लिए है आकाशों और धरती का राज्य। और अल्लाह ही की ओर लौटकर जाना है
तफ़्सीर:
आकाशों और धरती का राज्य अकेले अल्लाह ही के लिए है। तथा क़ियामत के दिन हिसाब और बदले के लिए अकेले उसी की ओर लौटकर जाना है।
आयत 43
أَلَمْ تَرَ أَنَّ ٱللَّهَ يُزْجِى سَحَابًۭا ثُمَّ يُؤَلِّفُ بَيْنَهُۥ ثُمَّ يَجْعَلُهُۥ رُكَامًۭا فَتَرَى ٱلْوَدْقَ يَخْرُجُ مِنْ خِلَـٰلِهِۦ وَيُنَزِّلُ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مِن جِبَالٍۢ فِيهَا مِنۢ بَرَدٍۢ فَيُصِيبُ بِهِۦ مَن يَشَآءُ وَيَصْرِفُهُۥ عَن مَّن يَشَآءُ ۖ يَكَادُ سَنَا بَرْقِهِۦ يَذْهَبُ بِٱلْأَبْصَـٰرِ
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
أَنَّ
कि बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يُزْجِى
वो चलाता है
سَحَابًۭا
बादल को
ثُمَّ
फिर
يُؤَلِّفُ
वो मिला देता है (उन्हें)
بَيْنَهُۥ
आपस में
ثُمَّ
फिर
يَجْعَلُهُۥ
वो कर देता है उसे
رُكَامًۭا
तह ब तह
فَتَرَى
तो आप देखते हैं
ٱلْوَدْقَ
बारिश
يَخْرُجُ
निकलती है
مِنْ
from
خِلَـٰلِهِۦ
उसके दर्मियान से
وَيُنَزِّلُ
और वो उतारता है
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مِن
[from]
جِبَالٍۢ
पहाड़ों से
فِيهَا
उसमें
مِنۢ
[of]
بَرَدٍۢ
कुछ ओले
فَيُصِيبُ
फिर वो पहुँचाता है
بِهِۦ
उसे
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
وَيَصْرِفُهُۥ
और वो फेर देता है उसे
عَن
from
مَّن
जिस से
يَشَآءُ ۖ
वो चाहता है
يَكَادُ
क़रीब है कि
سَنَا
चमक
بَرْقِهِۦ
उसकी बिजली की
يَذْهَبُ
वो ले जाए
بِٱلْأَبْصَـٰرِ
निगाहों को
क्या तुमने देखा नहीं कि अल्लाह बादल को चलाता है। फिर उनको परस्पर मिलाता है। फिर उसे तह पर तह कर देता है। फिर तुम देखते हो कि उसके बीच से मेह बरसता है? और आकाश से- उसमें जो पहाड़ है (बादल जो पहाड़ जैसे प्रतीत होते है उनसे) - ओले बरसाता है। फिर जिस पर चाहता है, उसे हटा देता है। ऐसा प्रतीत होता है कि बिजली की चमक निगाहों को उचक ले जाएगी
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) क्या आप नहीं जानते कि अल्लाह बादल को चलाता है। फिर उसके विभिन्न भागों को एक-दूसरे से मिला देता है। फिर उसे जमाकर तह-ब-तह कर देता है। फिर तुम देखते हो कि बारिश बादल के अंदर से निकल रही है। और वह आकाश की दिशा से, उसमें घनीभूत बादलों से जो अपनी भव्यता में पहाड़ों जैसा दिखते हैं, कंकड़ जैसे पानी के जमे हुए टुकड़े (ओले) उतारता है, फिर उस ओले को अपने बंदों में से जिसपर चाहता है, उतारता है और उनमें से जिससे चाहता है, उसे फेर देता है। बादल की बिजली की चमक इतनी तेज़ होती है कि लगता है कि आँखों को उचक ले जाएगी।
आयत 44
يُقَلِّبُ ٱللَّهُ ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَعِبْرَةًۭ لِّأُو۟لِى ٱلْأَبْصَـٰرِ
يُقَلِّبُ
उलट-पलट करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّيْلَ
रात
وَٱلنَّهَارَ ۚ
और दिन को
إِنَّ
यक़ीनन
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَعِبْرَةًۭ
अलबत्ता इब्रत है
لِّأُو۟لِى
for those who have vision
ٱلْأَبْصَـٰرِ
अहले बसीरत के लिए
अल्लाह ही रात और दिन का उलट-फेर करता है। निश्चय ही आँखें रखनेवालों के लिए इसमें एक शिक्षा है
तफ़्सीर:
अल्लाह रात और दिन को लंबे और छोटे तथा आगे और पीछे करता रहता है। निश्चय अल्लाह के पालनहार होने के प्रमाणों पर आधारित इन उल्लिखित निशानियों में उन लोगों के लिए शिक्षा (उपदेश) है, जो अल्लाह की शक्ति और उसके एकत्व की समझ-बूझ रखने वाले हैं।
आयत 45
وَٱللَّهُ خَلَقَ كُلَّ دَآبَّةٍۢ مِّن مَّآءٍۢ ۖ فَمِنْهُم مَّن يَمْشِى عَلَىٰ بَطْنِهِۦ وَمِنْهُم مَّن يَمْشِى عَلَىٰ رِجْلَيْنِ وَمِنْهُم مَّن يَمْشِى عَلَىٰٓ أَرْبَعٍۢ ۚ يَخْلُقُ ٱللَّهُ مَا يَشَآءُ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ
وَٱللَّهُ
और अल्लाह ने
خَلَقَ
पैदा किया
كُلَّ
हर
دَآبَّةٍۢ
जानदार को
مِّن
from
مَّآءٍۢ ۖ
पानी से
فَمِنْهُم
तो उनमें से कोई है
مَّن
जो
يَمْشِى
चलता है
عَلَىٰ
on
بَطْنِهِۦ
अपने पेट पर
وَمِنْهُم
और उनमें से कोई है
مَّن
जो
يَمْشِى
चलता है
عَلَىٰ
on
رِجْلَيْنِ
दो पाँव पर
وَمِنْهُم
और उनमें से कोई है
مَّن
जो
يَمْشِى
चलता है
عَلَىٰٓ
on
أَرْبَعٍۢ ۚ
चार (पाँव) पर
يَخْلُقُ
पैदा करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
مَا
जो
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता है
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌۭ
ख़ूब क़ुदरत रखने वाला है
अल्लाह ने हर जीवधारी को पानी से पैदा किया, तो उनमें से कोई अपने पेट के बल चलता है और कोई उनमें दो टाँगों पर चलता है और कोई चार (टाँगों) पर चलता है। अल्लाह जो चाहता है, पैदा करता है। निस्संदेह अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने धरती पर चलने वाले प्रत्येक जीवधारी को वीर्य से पैदा किया। चुनाँचे उनमें से कुछ अपने पेट के बल रेंगकर चलते हैं, जैसे साँप, और उनमें से कुछ दो पैरों पर चलते हैं, जैसे मनुष्य और पक्षी, तथा उनमें से कुछ चार पैरों पर चलते हैं, जैसे मवेशी। अल्लाह उनमें से जो चाहे, पैदा करता है, जो उसने उल्लेख किया है और जो उसने उल्लेख नहीं किया है। निःसंदेह अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है, उसे कोई चीज़ विवश नहीं कर सकती।
आयत 46
لَّقَدْ أَنزَلْنَآ ءَايَـٰتٍۢ مُّبَيِّنَـٰتٍۢ ۚ وَٱللَّهُ يَهْدِى مَن يَشَآءُ إِلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ
لَّقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
أَنزَلْنَآ
नाज़िल कीं हमने
ءَايَـٰتٍۢ
आयात
مُّبَيِّنَـٰتٍۢ ۚ
वाज़ेह
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَهْدِى
वो हिदायत देता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
إِلَىٰ
to
صِرَٰطٍۢ
तरफ़ रास्ते
مُّسْتَقِيمٍۢ
सीधे के
हमने सत्य को प्रकट कर देनेवाली आयतें उतार दी है। आगे अल्लाह जिसे चाहता है सीधे मार्ग की ओर लगा देता है
तफ़्सीर:
हमने मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर सत्य के मार्ग को दर्शाने वाली स्पष्ट आयतें उतारी हैं। और अल्लाह जिसको चाहता है, टेढ़ापन से रहित सीधे रास्ते पर चलने का सामर्थ्य प्रदान करता है। अंततः वह रास्ता उसे जन्नत में ले जाता है।
आयत 47
وَيَقُولُونَ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَبِٱلرَّسُولِ وَأَطَعْنَا ثُمَّ يَتَوَلَّىٰ فَرِيقٌۭ مِّنْهُم مِّنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ ۚ وَمَآ أُو۟لَـٰٓئِكَ بِٱلْمُؤْمِنِينَ
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَبِٱلرَّسُولِ
और रसूल पर
وَأَطَعْنَا
और इताअत की हमने
ثُمَّ
फिर
يَتَوَلَّىٰ
मुँह फेर लेता है
فَرِيقٌۭ
एक गिरोह
مِّنْهُم
उनमें से
مِّنۢ
after
بَعْدِ
बाद
ذَٰلِكَ ۚ
इसके
وَمَآ
और नहीं
أُو۟لَـٰٓئِكَ
ये लोग
بِٱلْمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
वे मुनाफ़िक लोग कहते है कि "हम अल्लाह और रसूल पर ईमान लाए और हमने आज्ञापालन स्वीकार किया।" फिर इसके पश्चात उनमें से एक गिरोह मुँह मोड़ जाता है। ऐसे लोग मोमिन नहीं है
तफ़्सीर:
मुनाफ़िक़ लोग कहते हैं : हम अल्लाह पर ईमान लाए और रसूल पर ईमान लाए, तथा हमने अल्लाह का आज्ञापालन किया और रसूल का आज्ञापालन किया। फिर उनमें से एक समूह मुँह फेर लेता है। चुनाँचे अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाने और उनकी बात मानने का दावा करने के बाद, वे अल्लाह के मार्ग में जिहाद करने के आदेश में अल्लाह और उसके रसूल का पालन नहीं करते हैं। और ये अल्लाह और उसके रसूल के आज्ञापालन से मुँह फेरने वाले, मोमिन नहीं हैं, भले ही वे दावा करें कि वे मोमिन हैं।
आयत 48
وَإِذَا دُعُوٓا۟ إِلَى ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ إِذَا فَرِيقٌۭ مِّنْهُم مُّعْرِضُونَ
وَإِذَا
और जब
دُعُوٓا۟
वो बुलाए जाते हैं
إِلَى
to
ٱللَّهِ
तरफ़ अल्लाह के
وَرَسُولِهِۦ
और उसके रसूल के
لِيَحْكُمَ
ताकि वो फ़ैसला करे
بَيْنَهُمْ
दर्मियान उनके
إِذَا
तब
فَرِيقٌۭ
एक गिरोह (के लोग)
مِّنْهُم
उनमें से
مُّعْرِضُونَ
ऐराज़ करने वाले होते हैं
जब उन्हें अल्लाह और उसके रसूल की ओर बुलाया जाता है, ताकि वह उनके बीच फ़ैसला करें तो क्या देखते है कि उनमें से एक गिरोह कतरा जाता है;
तफ़्सीर:
और जब इन मुनाफ़िक़ों को अल्लाह और उसके रसूल की ओर बुलाया जाता है, ताकि रसूल उनके विवाद का निर्णय कर दें, तो अचानक वे अपने निफ़ाक़ के कारण आपके निर्णय से मुँह मोड़ने वाले होते हैं।
आयत 49
وَإِن يَكُن لَّهُمُ ٱلْحَقُّ يَأْتُوٓا۟ إِلَيْهِ مُذْعِنِينَ
وَإِن
और अगर
يَكُن
हो
لَّهُمُ
उनके लिए
ٱلْحَقُّ
हक़
يَأْتُوٓا۟
वो आते हैं
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
مُذْعِنِينَ
मुतीअ हो कर
किन्तु यदि हक़ उन्हें मिलनेवाला हो तो उसकी ओर बड़े आज्ञाकारी बनकर चले आएँ
तफ़्सीर:
और अगर वे जानते हैं कि अधिकार उनका है, और यह कि रसूल उनके पक्ष में फैसला करेंगे, तो आपके पास बड़े आज्ञाकारी बनकर आते हैं।
आयत 50
أَفِى قُلُوبِهِم مَّرَضٌ أَمِ ٱرْتَابُوٓا۟ أَمْ يَخَافُونَ أَن يَحِيفَ ٱللَّهُ عَلَيْهِمْ وَرَسُولُهُۥ ۚ بَلْ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ
أَفِى
Is (there) in
قُلُوبِهِم
क्या उनके दिलों में
مَّرَضٌ
कोई बीमारी है
أَمِ
या
ٱرْتَابُوٓا۟
वो शक में पड़ गए हैं
أَمْ
या
يَخَافُونَ
वो डरते हैं
أَن
कि
يَحِيفَ
ज़ुल्म करेगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَرَسُولُهُۥ ۚ
और उसका रसूल
بَلْ
बल्कि
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلظَّـٰلِمُونَ
जो ज़ालिम हैं
क्या उनके दिलों में रोग है या वे सन्देह में पड़े हुए है या उनको यह डर है कि अल्लाह औऱ उसका रसूल उनके साथ अन्याय करेंगे? नहीं, बल्कि बात यह है कि वही लोग अत्याचारी हैं
तफ़्सीर:
क्या इन लोगों के दिलों में कोई अपरिहार्य रोग है, या उनको इसमें संदेह है कि आप अल्लाह के रसूल हैं, या उन्हें इस बात का डर है कि अल्लाह और उसके रसूल फैसले में उनपर अत्याचार करेंगे? यह उपर्युक्त में से किसी के कारण नहीं है। बल्कि, उनके आपके फ़ैसले से उपेक्षा करने और आपसे दुश्मनी के कारण, उनके दिलों ही में बीमारी की वजह से है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कायनात के अल्लाह की तस्बीह करने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि पूरी कायनात अल्लाह की तस्बीह में मशगूल है, इंसान को भी अपनी ज़िम्मेदारी समझनी चाहिए।
आयत 51
إِنَّمَا كَانَ قَوْلَ ٱلْمُؤْمِنِينَ إِذَا دُعُوٓا۟ إِلَى ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ أَن يَقُولُوا۟ سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا ۚ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ
إِنَّمَا
बेशक
كَانَ
है
قَوْلَ
क़ौल
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों का
إِذَا
जब
دُعُوٓا۟
वो बुलाए जाते हैं
إِلَى
to
ٱللَّهِ
तरफ़ अल्लाह के
وَرَسُولِهِۦ
और उसके रसूल के
لِيَحْكُمَ
कि वो फ़ैसला करे
بَيْنَهُمْ
दर्मियान उनके
أَن
कि
يَقُولُوا۟
वो कहते हैं
سَمِعْنَا
सुन लिया हमने
وَأَطَعْنَا ۚ
और इताअत की हमने
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْمُفْلِحُونَ
जो फ़लाह पाने वाले हैं
मोमिनों की बात तो बस यह होती है कि जब अल्लाह और उसके रसूल की ओर बुलाए जाएँ, ताकि वह उनके बीच फ़ैसला करे, तो वे कहें, "हमने सुना और आज्ञापालन किया।" और वही सफलता प्राप्त करनेवाले हैं
तफ़्सीर:
ईमान वालों की बात, जब वे अल्लाह की ओर और रसूल की ओर बुलाए जाएँ, ताकि वह उनके बीच निर्णय करें, केवल यह होती है कि वे कहते हैं : हमने उनकी बात सुनी और उनके आदेश का पालन किया। तथा इन गुणों से विशेषित लोग ही दुनिया और आख़िरत में सफल होने वाले हैं।
आयत 52
وَمَن يُطِعِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ وَيَخْشَ ٱللَّهَ وَيَتَّقْهِ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْفَآئِزُونَ
وَمَن
और जो कोई
يُطِعِ
इताअत करेगा
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَرَسُولَهُۥ
और उसके रसूल की
وَيَخْشَ
और वो डरेगा
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَيَتَّقْهِ
और वो तक़वा करेगा उसका
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْفَآئِزُونَ
जो कामयाब होने वाले हैं
और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञा का पालन करे और अल्लाह से डरे और उसकी सीमाओं का ख़याल रखे, तो ऐसे ही लोग सफल है
तफ़्सीर:
जो अल्लाह का और उसके रसूल का आज्ञापालन करे, तथा उनके निर्णय को मान ले, और गुनाहों के परिणाम से भय रखे, और अल्लाह के आदेश का पालन करके और उसके निषेध से बचकर, उसकी यातना से डरे, तो केवल यही लोग दुनिया और आख़िरत की भलाइयों को प्राप्त कर सफल होने वाले हैं।
आयत 53
۞ وَأَقْسَمُوا۟ بِٱللَّهِ جَهْدَ أَيْمَـٰنِهِمْ لَئِنْ أَمَرْتَهُمْ لَيَخْرُجُنَّ ۖ قُل لَّا تُقْسِمُوا۟ ۖ طَاعَةٌۭ مَّعْرُوفَةٌ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ خَبِيرٌۢ بِمَا تَعْمَلُونَ
۞ وَأَقْسَمُوا۟
और उन्होंने क़समें खाईं
بِٱللَّهِ
अल्लाह की
جَهْدَ
पक्की/पुख़्ता
أَيْمَـٰنِهِمْ
क़समें अपनी
لَئِنْ
अलबत्ता अगर
أَمَرْتَهُمْ
हुक्म दिया आपने उन्हें
لَيَخْرُجُنَّ ۖ
अलबत्ता वो ज़रूर निकलेंगे
قُل
कह दीजिए
لَّا
(Do) not
تُقْسِمُوا۟ ۖ
ना तुम क़समें खाओ
طَاعَةٌۭ
इताअत तो
مَّعْرُوفَةٌ ۚ
जानी पहचानी है
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
خَبِيرٌۢ
ख़ूब ख़बर रखने वाला है
بِمَا
उसकी जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
वे अल्लाह की कड़ी-कड़ी क़समें खाते है कि यदि तुम उन्हें हुक्म दो तो वे अवश्य निकल खड़े होंगे। कह दो, "क़समें न खाओ। सामान्य नियम के अनुसार आज्ञापालन ही वास्तकिव चीज़ है। तुम जो कुछ करते हो अल्लाह उसकी ख़बर रखता है।"
तफ़्सीर:
मुनाफ़िक़ों ने अपनी सबसे मज़बूत क़समें खाईं, जितनी वे खा सकते थे : यदि आप उनको जिहाद के लिए निकलने को कहें, तो निश्चय वे अवश्य निकलेंगे। (ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : तुम क़समें मत खाओ। क्योंकि तुम्हारे झूठ का हाल मालूम है और तुम्हारा तथाकथित आज्ञापालन सर्वज्ञात है। तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह उससे अवगत है। तुम्हारे कर्मों में से कुछ भी उससे छिपा नहीं रह सकता, चाहे तुम उन्हें कितना ही छिपा लो।
आयत 54
قُلْ أَطِيعُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُوا۟ ٱلرَّسُولَ ۖ فَإِن تَوَلَّوْا۟ فَإِنَّمَا عَلَيْهِ مَا حُمِّلَ وَعَلَيْكُم مَّا حُمِّلْتُمْ ۖ وَإِن تُطِيعُوهُ تَهْتَدُوا۟ ۚ وَمَا عَلَى ٱلرَّسُولِ إِلَّا ٱلْبَلَـٰغُ ٱلْمُبِينُ
قُلْ
कह दीजिए
أَطِيعُوا۟
इताअत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَأَطِيعُوا۟
और इताअत करो
ٱلرَّسُولَ ۖ
रसूल की
فَإِن
फिर अगर
تَوَلَّوْا۟
तुम मुँह फेरोगे
فَإِنَّمَا
तो बेशक
عَلَيْهِ
इस( रसूल) पर है
مَا
जो
حُمِّلَ
बोझ वो डाला गया
وَعَلَيْكُم
और तुम पर है
مَّا
जो
حُمِّلْتُمْ ۖ
बोझ डाले गए तुम
وَإِن
और अगर
تُطِيعُوهُ
तुम इताअत करोगे उसकी
تَهْتَدُوا۟ ۚ
तुम हिदायत पा लोगे
وَمَا
और नहीं है
عَلَى
(is) on
ٱلرَّسُولِ
रसूल पर
إِلَّا
मगर
ٱلْبَلَـٰغُ
पहुँचा देना
ٱلْمُبِينُ
खुल्लम-खुल्ला
कहो, "अल्लाह का आज्ञापालन करो और उसके रसूल का कहा मानो। परन्तु यदि तुम मुँह मोड़ते हो तो उसपर तो बस वही ज़िम्मेदारी है जिसका बोझ उसपर डाला गया है, और तुम उसके ज़िम्मेदार हो जिसका बोझ तुमपर डाला गया है। और यदि तुम आज्ञा का पालन करोगे तो मार्ग पा लोगे। और रसूल पर तो बस साफ़-साफ़ (संदेश) पहुँचा देने ही की ज़िम्मेदारी है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन मुनाफ़िक़ों से कह दें कि तुम बाहर और भीतर दोनों तरह से अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो। अगर तुम उनके आज्ञापालन से मुँह फेरोगे, जिसका तुम्हें आदेश दिया गया है, तो रसूल का दायित्व केवल उस संदेश को पहुँचा देना है, जिसकी उन्हें ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। तथा तुम्हारा दायित्व आज्ञापालन करना और रसूल के लाए हुए धर्म के अनुसार कार्य करना है। और अगर तुम उनकी बात मानकर उनके आदेशों का पालन करोगे और उनकी मना की हुई बातों से दूर रहोगे, तो सच्चा मार्ग प्राप्त कर लोगे। और रसूल का दायित्व केवल स्पष्ट रूप से पहुँचा देना है। उसका काम तुम्हें सही मार्ग पर लगा देना और उसपर मजबूर करना नहीं है।
आयत 55
وَعَدَ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مِنكُمْ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ لَيَسْتَخْلِفَنَّهُمْ فِى ٱلْأَرْضِ كَمَا ٱسْتَخْلَفَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ وَلَيُمَكِّنَنَّ لَهُمْ دِينَهُمُ ٱلَّذِى ٱرْتَضَىٰ لَهُمْ وَلَيُبَدِّلَنَّهُم مِّنۢ بَعْدِ خَوْفِهِمْ أَمْنًۭا ۚ يَعْبُدُونَنِى لَا يُشْرِكُونَ بِى شَيْـًۭٔا ۚ وَمَن كَفَرَ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْفَـٰسِقُونَ
وَعَدَ
वादा किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلَّذِينَ
उन लोगों से जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
مِنكُمْ
तुम में से
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
لَيَسْتَخْلِفَنَّهُمْ
अलबत्ता वो ज़रूर जानशीन बनाएगा उन्हें
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
كَمَا
जैसा कि
ٱسْتَخْلَفَ
उसने जानशीन बनाया था
ٱلَّذِينَ
उन्हें जो
مِن
(were) before them
قَبْلِهِمْ
उनसे पहले थे
وَلَيُمَكِّنَنَّ
और वो ज़रूर जमा देगा
لَهُمْ
उनके लिए
دِينَهُمُ
दीन उनका
ٱلَّذِى
वो जो
ٱرْتَضَىٰ
उसने पसंद किया है
لَهُمْ
उनके लिए
وَلَيُبَدِّلَنَّهُم
और अलबत्ता वो ज़रूर बदल कर देगा उन्हें
مِّنۢ
after
بَعْدِ
बाद
خَوْفِهِمْ
उनके ख़ौफ़ के
أَمْنًۭا ۚ
अमन
يَعْبُدُونَنِى
वो इबादत करेंगे मेरी
لَا
not
يُشْرِكُونَ
ना वो शरीक करेंगे
بِى
मेरे साथ
شَيْـًۭٔا ۚ
किसी चीज़ को
وَمَن
और जो कोई
كَفَرَ
कुफ़्र करे
بَعْدَ
बाद
ذَٰلِكَ
इसके
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْفَـٰسِقُونَ
जो फ़ासिक़ हैं
अल्लाह ने उन लोगों से जो तुममें से ईमान लाए और उन्होने अच्छे कर्म किए, वादा किया है कि वह उन्हें धरती में अवश्य सत्ताधिकार प्रदान करेगा, जैसे उसने उनसे पहले के लोगों को सत्ताधिकार प्रदान किया था। औऱ उनके लिए अवश्य उनके उस धर्म को जमाव प्रदान करेगा जिसे उसने उनके लिए पसन्द किया है। और निश्चय ही उनके वर्तमान भय के पश्चात उसे उनके लिए शान्ति और निश्चिन्तता में बदल देगा। वे मेरी बन्दगी करते है, मेरे साथ किसी चीज़ को साझी नहीं बनाते। और जो कोई इसके पश्चात इनकार करे, तो ऐसे ही लोग अवज्ञाकारी है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने तुममें से ईमान वालों और सुकर्म करने वालों से वादा किया है कि वह उनके शत्रुओं के खिलाफ उनकी सहायता करेगा तथा उनको धरती में ख़लीफ़ा बनाएगा, जिस तरह कि उनसे पहले के ईमान वालों को धरती में ख़लीफ़ा बनाया था। और उनसे यह वादा किया है कि उनके उस धर्म को जिसे उनके लिए पसंद किया है (और वह इस्लाम धर्म है), धरती में प्रभुत्व एवं शक्ति प्रदान कर देगा। तथा उनसे यह भी वादा किया है कि उन्हें उनके भय के पश्चात् शांति प्रदान कर देगा। वे केवल मेरी ही इबादत करेंगे, मेरे साथ किसी को साझी नहीं बनाएँगे। और जिसने इन नेमतों के बाद कुफ़्र किया, तो वही लोग अल्लाह के आज्ञापालन से निकल जाने वाले हैं।
आयत 56
وَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُوا۟ ٱلزَّكَوٰةَ وَأَطِيعُوا۟ ٱلرَّسُولَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
وَأَقِيمُوا۟
और क़ायम करो
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَءَاتُوا۟
और अदा करो
ٱلزَّكَوٰةَ
ज़कात
وَأَطِيعُوا۟
और इताअत करो
ٱلرَّسُولَ
रसूल की
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تُرْحَمُونَ
तुम रहम किए जाओ
नमाज़ का आयोजन करो और ज़कात दो और रसूल की आज्ञा का पालन करो, ताकि तुमपर दया की जाए
तफ़्सीर:
संपूर्ण तरीक़े से नमाज़ अदा करो, अपने धन की ज़कात दो, और रसूल की आज्ञा का पालन करते हुए उस चीज़ को करो, जिसका उन्होंने आदेश दिया है और उस चीज़ को त्याग कर दो, जिससे उन्होंने मना किया है; इस आशा में कि तुम्हें अल्लाह की दया प्राप्त हो।
आयत 57
لَا تَحْسَبَنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مُعْجِزِينَ فِى ٱلْأَرْضِ ۚ وَمَأْوَىٰهُمُ ٱلنَّارُ ۖ وَلَبِئْسَ ٱلْمَصِيرُ
لَا
(Do) not
تَحْسَبَنَّ
हरगिज़ ना समझिये आप
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
مُعْجِزِينَ
कि वो आजिज़ करने वाले हैं
فِى
in
ٱلْأَرْضِ ۚ
ज़मीन में
وَمَأْوَىٰهُمُ
और ठिकाना उनका
ٱلنَّارُ ۖ
आग है
وَلَبِئْسَ
और यक़ीनन कितनी बुरी है
ٱلْمَصِيرُ
लौटने की जगह
यह कदापि न समझो कि इनकार की नीति अपनानेवाले धरती में क़ाबू से बाहर निकल जानेवाले है। उनका ठिकाना आग है, और वह बहुत ही बुरा ठिकाना है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उन लोगों को जिन्होंने अल्लाह के साथ कुफ़्र किया, हरगिज़ यह न समझें कि वे मुझसे बच निकलेंगे, यदि मैं उन्हें यातना से पीड़ित करना चाहूँ। और क़ियामत के दिन उनका ठिकाना जहन्नम है। और निश्चय उन लोगों का ठिकाना बहुत बुरा है, जिनका ठिकाना जहन्नम होगा।
आयत 58
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لِيَسْتَـْٔذِنكُمُ ٱلَّذِينَ مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُكُمْ وَٱلَّذِينَ لَمْ يَبْلُغُوا۟ ٱلْحُلُمَ مِنكُمْ ثَلَـٰثَ مَرَّٰتٍۢ ۚ مِّن قَبْلِ صَلَوٰةِ ٱلْفَجْرِ وَحِينَ تَضَعُونَ ثِيَابَكُم مِّنَ ٱلظَّهِيرَةِ وَمِنۢ بَعْدِ صَلَوٰةِ ٱلْعِشَآءِ ۚ ثَلَـٰثُ عَوْرَٰتٍۢ لَّكُمْ ۚ لَيْسَ عَلَيْكُمْ وَلَا عَلَيْهِمْ جُنَاحٌۢ بَعْدَهُنَّ ۚ طَوَّٰفُونَ عَلَيْكُم بَعْضُكُمْ عَلَىٰ بَعْضٍۢ ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمُ ٱلْـَٔايَـٰتِ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌۭ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لِيَسْتَـْٔذِنكُمُ
चाहिए कि इजाज़त तलब करें तुम से
ٱلَّذِينَ
वो लोग जिनके
مَلَكَتْ
मालिक हुए
أَيْمَـٰنُكُمْ
दाऐं हाथ तुम्हारे
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
لَمْ
नहीं
يَبْلُغُوا۟
वो पहुँचे
ٱلْحُلُمَ
बुलूग़त को
مِنكُمْ
तुम में से
ثَلَـٰثَ
तीन
مَرَّٰتٍۢ ۚ
बार
مِّن
before
قَبْلِ
पहले
صَلَوٰةِ
नमाज़े
ٱلْفَجْرِ
फ़ज्र से
وَحِينَ
और जिस वक़्त
تَضَعُونَ
तुम उतार रखते हो
ثِيَابَكُم
कपड़े अपने
مِّنَ
at
ٱلظَّهِيرَةِ
दोपहर के वक़्त
وَمِنۢ
and after
بَعْدِ
और बाद
صَلَوٰةِ
नमाज़े
ٱلْعِشَآءِ ۚ
इशा के
ثَلَـٰثُ
तीन
عَوْرَٰتٍۢ
परदे के (वक़्त हैं)
لَّكُمْ ۚ
तुम्हारे लिए
لَيْسَ
नहीं
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَلَا
और ना
عَلَيْهِمْ
उन पर
جُنَاحٌۢ
कोई गुनाह
بَعْدَهُنَّ ۚ
बाद इन( औक़ात) के
طَوَّٰفُونَ
बकसरत आने जाने वाले हैं
عَلَيْكُم
तुम पर
بَعْضُكُمْ
बाज़ तुम्हारे
عَلَىٰ
among
بَعْضٍۢ ۚ
बाज़ पर
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يُبَيِّنُ
वाज़ेह करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْـَٔايَـٰتِ ۗ
आयात
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌ
ख़ूब इल्म वाला है
حَكِيمٌۭ
ख़ूब हिकमत वाला है
ऐ ईमान लानेवालो! जो तुम्हारी मिल्कियत में हो और तुममें जो अभी युवावस्था को नहीं पहुँचे है, उनको चाहिए कि तीन समयों में तुमसे अनुमति लेकर तुम्हारे पास आएँ: प्रभात काल की नमाज़ से पहले और जब दोपहर को तुम (आराम के लिए) अपने कपड़े उतार रखते हो और रात्रि की नमाज़ के पश्चात - ये तीन समय तुम्हारे लिए परदे के हैं। इनके पश्चात न तो तुमपर कोई गुनाह है और न उनपर। वे तुम्हारे पास अधिक चक्कर लगाते है। तुम्हारे ही कुछ अंश परस्पर कुछ अंश के पास आकर मिलते है। इस प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतों को स्पष्टप करता है। अल्लाह भली-भाँति जाननेवाला है, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो! तुम्हारे ग़ुलाम, तुम्हारी लौंडियाँ और आज़ाद बच्चे, जो युवावस्था को न पहुँचे हों, तुमसे तीन समयों में अनुमति माँगें; फ़ज्र की नमाज़ से पहले, जो कि सोने के कपड़ों को उतारकर जागने के कपड़े पहनने का समय होता है, और दोपहर के समय, जब क़ैलूला के लिए तुम अपने कपड़े उतारते हो, और इशा की नमाज़ के बाद; क्योंकि यह तुम्हारे सोने तथा जागने के कपड़े उतारकर सोने के कपड़े पहनने का समय है। ये तीन समय, तुम्हारे लिए पर्दे के समय हैं। इन समयों में वे तुम्हारे पास तुम्हारी अनुमति के बिना नहीं आ सकते। इनके सिवा अन्य समयों में उनके बिना अनुमति लेकर आने में, न तुमपर कोई गुनाह है और न उनपर। वे तुम्हारे पास बहुत चक्कर लगाने वाले हैं, तुम एक-दूसरे के पास आते-जाते रहते हो। इसलिए उन्हें हर समय बिना अनुमति के प्रवेश करने से नहीं रोका जा सकता है। जिस तरह अल्लाह ने तुम्हारे लिए अनुमति लेने के नियमों को खोलकर बयान किया है, उसी तरह अल्लाह तुम्हारे लिए उन आयतों को खोलकर बयान करता है, जो तुम्हारे लिए उसके निर्धारित किए हुए नियमों को दर्शाती हैं। तथा अल्लाह अपने बंदों के हितों को भली-भाँति जानता है, उनके लिए जो नियम निर्धारित करता है, उसमें पूर्ण हिकमत वाला है।
आयत 59
وَإِذَا بَلَغَ ٱلْأَطْفَـٰلُ مِنكُمُ ٱلْحُلُمَ فَلْيَسْتَـْٔذِنُوا۟ كَمَا ٱسْتَـْٔذَنَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمْ ءَايَـٰتِهِۦ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌۭ
وَإِذَا
और जब
بَلَغَ
पहुँच जाऐं
ٱلْأَطْفَـٰلُ
बच्चे
مِنكُمُ
तुम में से
ٱلْحُلُمَ
बलूग़त को
فَلْيَسْتَـْٔذِنُوا۟
पस चाहिए कि वो इजाज़त लिया करें
كَمَا
जैसा कि
ٱسْتَـْٔذَنَ
इजाज़त लेते थे
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
مِن
(were) before them
قَبْلِهِمْ ۚ
उनसे पहले थे
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يُبَيِّنُ
वाज़ेह करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
ءَايَـٰتِهِۦ ۗ
अपनी आयात को
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌ
ख़ूब इल्म वाला है
حَكِيمٌۭ
ख़ूब हिकमत वाला है
और जब तुममें से बच्चे युवावस्था को पहुँच जाएँ तो उन्हें चाहिए कि अनुमति ले लिया करें जैसे उनसे पहले लोग अनुमति लेते रहे है। इस प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतों को स्पष्ट करता है। अल्लाह भली-भाँति जाननेवाला, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
और जब तुममें से बच्चे युवावस्था को पहुँच जाएँ, तो उन्हें उन सभी समयों में घरों में प्रवेश करने के लिए अनुमति माँगनी चाहिए, जैसा कि पहले वयस्कों के बारे में बताया गया है। जिस तरह अल्लाह ने तुम्हारे लिए अनुमति लेने के प्रावधान को खोलकर बयान किया है, उसी तरह अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतों को खोलकर बयान करता है। तथा अल्लाह अपने बंदों के हितों को भली-भाँति जानने वाला, जो कुछ उनके लिए नियम निर्धारित करता है, उसमें पूर्ण हिकमत वाला है।
आयत 60
وَٱلْقَوَٰعِدُ مِنَ ٱلنِّسَآءِ ٱلَّـٰتِى لَا يَرْجُونَ نِكَاحًۭا فَلَيْسَ عَلَيْهِنَّ جُنَاحٌ أَن يَضَعْنَ ثِيَابَهُنَّ غَيْرَ مُتَبَرِّجَـٰتٍۭ بِزِينَةٍۢ ۖ وَأَن يَسْتَعْفِفْنَ خَيْرٌۭ لَّهُنَّ ۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌۭ
وَٱلْقَوَٰعِدُ
और बैठ रहने वालियाँ
مِنَ
among
ٱلنِّسَآءِ
औरतों में से
ٱلَّـٰتِى
वो जो
لَا
(do) not
يَرْجُونَ
नहीं वो उम्मीद रखतीं
نِكَاحًۭا
निकाह की
فَلَيْسَ
तो नहीं है
عَلَيْهِنَّ
उन पर
جُنَاحٌ
कोई गुनाह
أَن
कि
يَضَعْنَ
वो उतार रखें
ثِيَابَهُنَّ
कपड़े( हिजाब) अपने
غَيْرَ
ना
مُتَبَرِّجَـٰتٍۭ
ज़ाहिर करने वालियाँ
بِزِينَةٍۢ ۖ
ज़ीनत को
وَأَن
और ये कि
يَسْتَعْفِفْنَ
वो एहतियात बरतें
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لَّهُنَّ ۗ
उनके लिए
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
سَمِيعٌ
ख़ूब सुनने वाला है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
जो स्त्रियाँ युवावस्था से गुज़रकर बैठ चुकी हों, जिन्हें विवाह की आशा न रह गई हो, उनपर कोई दोष नहीं कि वे अपने कपड़े (चादरें) उतारकर रख दें जबकि वे शृंगार का प्रदर्शन करनेवाली न हों। फिर भी वे इससे बचें तो उनके लिए अधिक अच्छा है। अल्लाह भली-भाँति सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
वे वृद्ध महिलाएँ जो अपने बुढ़ापे के कारण मासिक धर्म और गर्भावस्था से रहित होकर बैठ चुकी हैं, जो कि शादी की इच्छा नहीं रखती हैं, यदि वे अपने कुछ कपड़े, जैसे चादर और चेहरे का नकाब, उतारकर रख देती हैं, तो उनपर कोई गुनाह नहीं है। लेकिन शर्त यह है कि छिपी हुई ज़ीनत को ज़ाहिर न करें, जिसे छिपाने का आदेश दिया गया है। फिर भी उन कपड़ों को उतारने से बचना ही उनके हक़ में बेहतर है, ताकि पर्दा और पाक-दामनी का अधिक ख़याल रखा जा सके। अल्लाह तुम्हारी बातों को सुनने वाला, तुम्हारे कर्मों को जानने वाला है। उससे इनमें से कोई चीज़ छिप नहीं सकती और वह तुम्हें इनका बदला देगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
रसूल की इताअत की ताकीद का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि सच्चा ईमान वाला अल्लाह और रसूल के फैसले पर बे-चूं-चरा अमल करता है।
आयत 61
لَّيْسَ عَلَى ٱلْأَعْمَىٰ حَرَجٌۭ وَلَا عَلَى ٱلْأَعْرَجِ حَرَجٌۭ وَلَا عَلَى ٱلْمَرِيضِ حَرَجٌۭ وَلَا عَلَىٰٓ أَنفُسِكُمْ أَن تَأْكُلُوا۟ مِنۢ بُيُوتِكُمْ أَوْ بُيُوتِ ءَابَآئِكُمْ أَوْ بُيُوتِ أُمَّهَـٰتِكُمْ أَوْ بُيُوتِ إِخْوَٰنِكُمْ أَوْ بُيُوتِ أَخَوَٰتِكُمْ أَوْ بُيُوتِ أَعْمَـٰمِكُمْ أَوْ بُيُوتِ عَمَّـٰتِكُمْ أَوْ بُيُوتِ أَخْوَٰلِكُمْ أَوْ بُيُوتِ خَـٰلَـٰتِكُمْ أَوْ مَا مَلَكْتُم مَّفَاتِحَهُۥٓ أَوْ صَدِيقِكُمْ ۚ لَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَن تَأْكُلُوا۟ جَمِيعًا أَوْ أَشْتَاتًۭا ۚ فَإِذَا دَخَلْتُم بُيُوتًۭا فَسَلِّمُوا۟ عَلَىٰٓ أَنفُسِكُمْ تَحِيَّةًۭ مِّنْ عِندِ ٱللَّهِ مُبَـٰرَكَةًۭ طَيِّبَةًۭ ۚ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمُ ٱلْـَٔايَـٰتِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
لَّيْسَ
नहीं है
عَلَى
on
ٱلْأَعْمَىٰ
अँधे पर
حَرَجٌۭ
कोई हर्ज / गुनाह
وَلَا
और ना
عَلَى
on
ٱلْأَعْرَجِ
लँगड़े पर
حَرَجٌۭ
कोई हर्ज/ गुनाह
وَلَا
और ना
عَلَى
on
ٱلْمَرِيضِ
मरीज़ पर
حَرَجٌۭ
कोई हर्ज /गुनाह
وَلَا
और ना
عَلَىٰٓ
on
أَنفُسِكُمْ
तुम्हारे नफ़्सों पर
أَن
कि
تَأْكُلُوا۟
तुम खाओ
مِنۢ
from
بُيُوتِكُمْ
अपने घरों से
أَوْ
या
بُيُوتِ
घरों से
ءَابَآئِكُمْ
अपने बापों के
أَوْ
या
بُيُوتِ
घरों से
أُمَّهَـٰتِكُمْ
अपनी माँओं के
أَوْ
या
بُيُوتِ
घरों से
إِخْوَٰنِكُمْ
अपने भाईयों के
أَوْ
या
بُيُوتِ
घरों से
أَخَوَٰتِكُمْ
अपनी बहनों के
أَوْ
या
بُيُوتِ
घरों से
أَعْمَـٰمِكُمْ
अपने चचाओं
أَوْ
या
بُيُوتِ
घरों से
عَمَّـٰتِكُمْ
अपनी फुफियों
أَوْ
या
بُيُوتِ
घरों से
أَخْوَٰلِكُمْ
अपने मामूओं के
أَوْ
या
بُيُوتِ
घरों से
خَـٰلَـٰتِكُمْ
अपनी ख़ालाओं के
أَوْ
या
مَا
जो
مَلَكْتُم
मालिक हुए तुम
مَّفَاتِحَهُۥٓ
उसकी कुंजियों के
أَوْ
या
صَدِيقِكُمْ ۚ
अपने दोस्त के
لَيْسَ
नहीं
عَلَيْكُمْ
तुम पर
جُنَاحٌ
कोई गुनाह
أَن
कि
تَأْكُلُوا۟
तुम खाओ
جَمِيعًا
मिल कर
أَوْ
या
أَشْتَاتًۭا ۚ
अलग-अलग
فَإِذَا
फिर जब
دَخَلْتُم
दाख़िल हो तुम
بُيُوتًۭا
घरों में
فَسَلِّمُوا۟
तो सलाम करो
عَلَىٰٓ
[on]
أَنفُسِكُمْ
अपने लोगों पर
تَحِيَّةًۭ
तोहफ़ा (दुआ) है
مِّنْ
from
عِندِ
पास से
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مُبَـٰرَكَةًۭ
बाबरकत
طَيِّبَةًۭ ۚ
पाकीज़ा
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يُبَيِّنُ
वाज़ेह करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْـَٔايَـٰتِ
आयात को
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल से काम लो
न अंधे के लिए कोई हरज है, न लँगड़े के लिए कोई हरज है और न रोगी के लिए कोई हरज है और न तुम्हारे अपने लिए इस बात में कि तुम अपने घरों में खाओ या अपने बापों के घरों से या अपनी माँओ के घरों से या अपने भाइयों के घरों से या अपनी बहनों के घरों से या अपने चाचाओं के घरों से या अपनी फूफियों (बुआओं) के घरों से या अपनी ख़ालाओं के घरों से या जिसकी कुंजियों के मालिक हुए हो या अपने मित्र के यहाँ। इसमें तुम्हारे लिए कोई हरज नहीं कि तुम मिलकर खाओ या अलग-अलग। हाँ, अलबत्ता जब घरों में जाया करो तो अपने लोगों को सलाम किया करो, अभिवादन अल्लाह की ओर से नियत किया हुए, बरकतवाला और अत्याधिक पाक। इस प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतों को स्पष्ट करता है, ताकि तुम बुद्धि से काम लो
तफ़्सीर:
उस अंधे पर कोई पाप नहीं जिसने अपनी दृष्टि खो दी हो, न तो लंगड़े पर कोई पाप है, और न बीमार ही पर कोई पाप है; अगर ये लोग कोई ऐसा शरई कार्य छोड़ दें, जिसे अंजाम देने में वे सक्षम न हों, जैसे अल्लाह के मार्ग में जिहाद करना। तथा (ऐ मोमिनो!) तुमपर अपने घरों से खाने में कोई पाप नहीं है, जिसमें तुम्हारे बच्चों के घर भी शामिल हैं। और न ही तुम्हारे पिताओं, या तुम्हारी माताओं, या तुम्हारे भाइयों, या तुम्हारी बहनों, या तुम्हारे चाचाओं, या तुम्हारी फूफियों, या तुम्हारे मामाओं, या तुम्हारी ख़ालाओं के घरों से खाने में कोई गुनाह है, या उन घरों से जिनके संरक्षण की तुम्हें ज़िम्मेदारी सौंपी गई हो, जैसे बाग़ का चौकीदार। तथा अपने दोस्त के घरों से खाने में कोई गुनाह नहीं है, क्योंकि वह आमतौर पर इससे प्रसन्न होता है। तुमपर कोई गुनाह नहीं है कि सब एक साथ मिलकर खाओ या अलग-अलग। फिर जब तुम उपर्युक्त घरों में या उनके सिवा अन्य घरों में प्रवेश करो, तो उनमें मौजूद लोगों को यह कहकर सलाम करो : السلام عليكم (तुमपर शांति हो)। अगर उनमें कोई न हो, तो अपने आप को यह कहकर सलाम करो : السلام علينا وعلى عباد الله الصالحين (हमपर और अल्लाह के सत्कर्मी बंदों पर शांति हो)। यह अल्लाह की ओर से बरकत वाला सलाम है, जिसे उसने तुम्हारे लिए निर्धारित किया है, क्योंकि यह तुम्हारे बीच प्रेम और स्नेह को फैलाता है। यह पवित्र (अच्छा) है, इससे सुनने वाले की आत्मा प्रसन्न होती है। इस सूरत में उल्लिखित इस स्पष्टीकरण ही की तरह अल्लाह आयतों को स्पष्ट करता करता है, ताकि तुम उन्हें समझो और उनमें जो कुछ है, उसके अनुसार कार्य करो।
आयत 62
إِنَّمَا ٱلْمُؤْمِنُونَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَإِذَا كَانُوا۟ مَعَهُۥ عَلَىٰٓ أَمْرٍۢ جَامِعٍۢ لَّمْ يَذْهَبُوا۟ حَتَّىٰ يَسْتَـْٔذِنُوهُ ۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ يَسْتَـْٔذِنُونَكَ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ ۚ فَإِذَا ٱسْتَـْٔذَنُوكَ لِبَعْضِ شَأْنِهِمْ فَأْذَن لِّمَن شِئْتَ مِنْهُمْ وَٱسْتَغْفِرْ لَهُمُ ٱللَّهَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
إِنَّمَا
बेशक
ٱلْمُؤْمِنُونَ
मोमिन तो
ٱلَّذِينَ
वो हैं जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَرَسُولِهِۦ
और उसके रसूल पर
وَإِذَا
और जब
كَانُوا۟
वो होते हैं
مَعَهُۥ
आपके साथ
عَلَىٰٓ
for
أَمْرٍۢ
किसी काम पर
جَامِعٍۢ
इज्तिमाई
لَّمْ
नहीं
يَذْهَبُوا۟
वो जाते
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَسْتَـْٔذِنُوهُ ۚ
वो इजाज़त ले लें उनसे
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يَسْتَـْٔذِنُونَكَ
इजाज़त माँगते हैं आप से
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही वो लोग हैं
ٱلَّذِينَ
जो
يُؤْمِنُونَ
ईमान लाए हैं
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَرَسُولِهِۦ ۚ
और उसके रसूल पर
فَإِذَا
फिर जब
ٱسْتَـْٔذَنُوكَ
वो इजाज़त माँगें आपसे
لِبَعْضِ
for some
شَأْنِهِمْ
अपने किसी काम के लिए
فَأْذَن
तो इजाज़त दे दीजिए
لِّمَن
जिसके लिए
شِئْتَ
आप चाहें
مِنْهُمْ
उनमें से
وَٱسْتَغْفِرْ
और बख़्शिश माँगिए
لَهُمُ
उनके लिए
ٱللَّهَ ۚ
अल्लाह से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
मोमिन तो बस वही है जो अल्लाह और उसके रसूल पर पक्का ईमान रखते है। और जब किसी सामूहिक मामले के लिए उसके साथ हो तो चले न जाएँ जब तक कि उससे अनुमति न प्राप्त कर लें। (ऐ नबी!) जो लोग (आवश्यकता पड़ने पर) तुमसे अनुमति ले लेते है, वही लोग अल्लाह और रसूल पर ईमान रखते है, तो जब वे किसी काम के लिए अनुमति चाहें तो उनमें से जिसको चाहो अनुमति दे दिया करो, और उन लोगों के लिए अल्लाह से क्षमा की प्रार्थना किया करो। निस्संदेह अल्लाह बहुत क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
अपने ईमान में सच्चे मोमिन वही लोग हैं, जो अल्लाह पर ईमान लाए और उसके रसूल पर ईमान लाए, और जब वे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ किसी ऐसे काम में हों, जो उन्हें मुसलमानों के हित के लिए एकजुट करता हो, तो उस समय तक वापस नहीं होते, जब तक आपसे वापसी की अनुमति न ले लें। निःसंदेह जो लोग (ऐ रसूल!) आपसे लौटते समय अनुमति माँगते हैं, वही लोग वास्तव में अल्लाह पर ईमान रखते हैं और उसके रसूल पर ईमान रखते हैं। अतः जब वे अपने हित के किसी काम के लिए आपसे अनुमति माँगें, तो आप उनमें से जिसे अनुमति देना चाहें, अनुमति दें। और उनके गुनाहों के लिए (अल्लाह से) क्षमा याचना करें। निःसंदेह अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों के पापों को क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 63
لَّا تَجْعَلُوا۟ دُعَآءَ ٱلرَّسُولِ بَيْنَكُمْ كَدُعَآءِ بَعْضِكُم بَعْضًۭا ۚ قَدْ يَعْلَمُ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ يَتَسَلَّلُونَ مِنكُمْ لِوَاذًۭا ۚ فَلْيَحْذَرِ ٱلَّذِينَ يُخَالِفُونَ عَنْ أَمْرِهِۦٓ أَن تُصِيبَهُمْ فِتْنَةٌ أَوْ يُصِيبَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
لَّا
(Do) not
تَجْعَلُوا۟
ना तुम बना लो
دُعَآءَ
बुलाना
ٱلرَّسُولِ
रसूल का
بَيْنَكُمْ
आपस में
كَدُعَآءِ
मानिन्द बुलाने के
بَعْضِكُم
तुम्हारे बाज़ के
بَعْضًۭا ۚ
बाज़ को
قَدْ
तहक़ीक़
يَعْلَمُ
जानता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّذِينَ
उनको जो
يَتَسَلَّلُونَ
खिसक जाते हैं
مِنكُمْ
तुम में से
لِوَاذًۭا ۚ
आड़ लेते हुए
فَلْيَحْذَرِ
पस चाहिए कि डरें
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يُخَالِفُونَ
मुख़ालिफ़त करते हैं
عَنْ
[from]
أَمْرِهِۦٓ
उसके हुक्म की
أَن
कि
تُصِيبَهُمْ
पहुँचे उन्हें
فِتْنَةٌ
कोई आज़माइश
أَوْ
या
يُصِيبَهُمْ
पहुँचे उन्हें
عَذَابٌ
अज़ाब
أَلِيمٌ
दर्दनाक
अपने बीच रसूल के बुलाने को तुम आपस में एक-दूसरे जैसा बुलाना न समझना। अल्लाह उन लोगों को भली-भाँति जानता है जो तुममें से ऐसे है कि (एक-दूसरे की) आड़ लेकर चुपके से खिसक जाते है। अतः उनको, जो उसके आदेश की अवहेलना करते है, डरना चाहिए कि कही ऐसा न हो कि उनपर कोई आज़माइश आ पड़े या उनपर कोई दुखद यातना आ जाए
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो!) अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सम्मान करो। इसलिए जब आपको बुलाओ, तो आपके नाम से न बुलाओ, जैसे यह न कहो : ऐ मुहम्मद! इसी तरह आपके बाप के नाम से भी न बुलाओ, जैसे यह न कहो : ऐ अब्दुल्लाह के बेटे! जैसा कि तुम आपस में एक-दूसरे के साथ करते हो। बल्कि इस तरह कहो : ऐ अल्लाह के रसूल!, ऐ अल्लाह के नबी!, और जब वह तुम्हें किसी सामान्य कार्य के लिए बुलाएँ, तो तुम उनके बुलाने को आपस में एक-दूसरे को किसी महत्वहीन काम के लिए बुलाने की तरह न समझो। बल्कि उसका जवाब देने में जल्दी करो। अल्लाह उन लोगों को अच्छी तरह जानता है, जो तुममें से बिना अनुमति के चुपके से निकल जाते हैं। अतः उन लोगों को डरना चाहिए जो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेश का उल्लंघन करते हैं कि अल्लाह उन्हें किसी विपत्ति और परीक्षण से पीड़ित न कर दे, या उन्हें दर्दनाक यातना से पीड़ित न कर दे, जिसे वे सहन न कर सकें।
आयत 64
أَلَآ إِنَّ لِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ قَدْ يَعْلَمُ مَآ أَنتُمْ عَلَيْهِ وَيَوْمَ يُرْجَعُونَ إِلَيْهِ فَيُنَبِّئُهُم بِمَا عَمِلُوا۟ ۗ وَٱللَّهُ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌۢ
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّ
बेशक
لِلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
مَا
जो
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ ۖ
और ज़मीन में है
قَدْ
तहक़ीक़
يَعْلَمُ
वो जानता है
مَآ
वो जो हो
أَنتُمْ
तुम
عَلَيْهِ
जिस पर
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يُرْجَعُونَ
वो लौटाए जाऐंगे
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
فَيُنَبِّئُهُم
तो फिर वो बता देगा उन्हें
بِمَا
वो जो
عَمِلُوا۟ ۗ
उन्होंने अमल किए
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ को
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
सुन लो! आकाशों और धरती में जो कुछ भी है, अल्लाह का है। वह जानता है तुम जिस (नीति) पर हो। और जिस दिन वे उसकी ओर पलटेंगे, तो जो कुछ उन्होंने किया होगा, वह उन्हें बता देगा। अल्लाह तो हर चीज़ को जानता है
तफ़्सीर:
सुन लो! आकाशों और धरती में जो कुछ है, सबका पैदा करने वाला, मालिक और प्रबंध करने वाला अकेला अल्लाह है। (ऐ लोगो!) वह तुम्हारी स्थितियों को जानता है, उनमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं रहता। तथा क़ियामत के दिन (जब वे मृत्यु के बाद दोबारा जीवित होकर अल्लाह के पास लौटेंगे), तो वह उन्हें दुनिया में उनके किए हुए कार्यों से सूचित कर देगा। और अल्लाह सब कुछ जानता है। आकाशों में या धरती पर कुछ भी उससे छिपा नहीं है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
घरों में इजाज़त लेने के आदाब के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि दूसरों की निजता (प्राइवेसी) का ख्याल रखना और बिना इजाज़त दखल न देना अच्छे अखलाक की निशानी है।
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