सूरह अश-शुआरा سورة الشعراء
मक्की 227 आयतें
नाम का मतलब
शायर लोग (सूरह के आखिर में शायरों के रवैये का ज़िक्र)
पृष्ठभूमि
सूरह अश-शुअरा में मूसा, इब्राहीम, नूह, हूद, सालेह, लूत और शुऐब अलैहिस्सलाम के वाकियात एक ही अंदाज़ में दोहराए गए हैं, हर वाकिये के आखिर में यह जुमला दोहराया जाता है कि बेशक तेरा रब ही ग़ालिब और रहम करने वाला है। इसका नाम आखिरी आयतों में शायरों के ज़िक्र से लिया गया है, जो बगैर अमल के बड़ी-बड़ी बातें करते हैं।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह कई नबियों की दावत और उनकी कौमों के एक जैसे इनकार को एक ही तर्ज़ में बयान करके तसल्ली और नसीहत का सामान मुहैया करती है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ طسٓمٓ
طسٓمٓ
ط س م
ता॰ सीन॰ मीम॰
तफ़्सीर:
(ता, सीन, मीम) सूरतुल-बक़रा की शुरुआत में इस प्रकार के अक्षरों के बारे में बात गुज़र चुकी है।
आयत 2
تِلْكَ ءَايَـٰتُ ٱلْكِتَـٰبِ ٱلْمُبِينِ
تِلْكَ
ये
ءَايَـٰتُ
आयात हैं
ٱلْكِتَـٰبِ
(of) the Book
ٱلْمُبِينِ
वाज़ेह किताब की
ये स्पष्ट किताब की आयतें है
तफ़्सीर:
यह उस क़ुरआन की आयतें हैं, जो असत्य से सत्य को स्पष्ट करने वाला है।
आयत 3
لَعَلَّكَ بَـٰخِعٌۭ نَّفْسَكَ أَلَّا يَكُونُوا۟ مُؤْمِنِينَ
لَعَلَّكَ
शायद कि आप
بَـٰخِعٌۭ
हलाक करने वाले हैं
نَّفْسَكَ
अपनी जान को
أَلَّا
कि नहीं
يَكُونُوا۟
हैं वो
مُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
शायद इसपर कि वे ईमान नहीं लाते, तुम अपने प्राण ही खो बैठोगे
तफ़्सीर:
शायद (ऐ रसूल!) आप उनकी हिदायत की तीव्र उत्सुकता के कारण, उनकी हिदायत की चिंता और ग़म में अपने आपको हलाक कर लेंगे।
आयत 4
إِن نَّشَأْ نُنَزِّلْ عَلَيْهِم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ ءَايَةًۭ فَظَلَّتْ أَعْنَـٰقُهُمْ لَهَا خَـٰضِعِينَ
إِن
अगर
نَّشَأْ
हम चाहें
نُنَزِّلْ
हम उतार दें
عَلَيْهِم
उन पर
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
ءَايَةًۭ
कोई निशानी
فَظَلَّتْ
तो हो जाऐं
أَعْنَـٰقُهُمْ
गर्दनें उनकी
لَهَا
उसके लिए
خَـٰضِعِينَ
झुकने वाली
यदि हम चाहें तो उनपर आकाश से एक निशानी उतार दें। फिर उनकी गर्दनें उसके आगे झुकी रह जाएँ
तफ़्सीर:
यदि हम उनपर आकाश से कोई निशानी उतारना चाहें, तो उसे उनपर उतार दें, फिर उनकी गर्दनें उसके आगे झुकी रह जाएँ। किंतु हमने उनकी परीक्षा लेने के उद्देश्य से ऐसा नहीं चाहा कि : क्या वे ग़ैब (परोक्ष) पर ईमान लाते हैं?
आयत 5
وَمَا يَأْتِيهِم مِّن ذِكْرٍۢ مِّنَ ٱلرَّحْمَـٰنِ مُحْدَثٍ إِلَّا كَانُوا۟ عَنْهُ مُعْرِضِينَ
وَمَا
और नहीं
يَأْتِيهِم
आती उनके पास
مِّن
any
ذِكْرٍۢ
कोई नसीहत
مِّنَ
from
ٱلرَّحْمَـٰنِ
रहमान की तरफ़ से
مُحْدَثٍ
नई
إِلَّا
मगर
كَانُوا۟
वो होते हैं
عَنْهُ
उससे
مُعْرِضِينَ
ऐराज़ करने वाले
उनके पास रहमान की ओर से जो नवीन अनुस्मृति भी आती है, वे उससे मुँह फेर ही लेते है
तफ़्सीर:
जब भी इन मुश्रिकों के पास 'रहमान' की ओर से कोई नई नसीहत आती है, जो उसके एकेश्वरवाद और उसके नबी की सच्चाई को इंगित करने वाले प्रमाणों पर आधारित होती है, तो वे उसे सुनने तथा उसे सच्चा मानने से मुँह फेर लेते हैं।
आयत 6
فَقَدْ كَذَّبُوا۟ فَسَيَأْتِيهِمْ أَنۢبَـٰٓؤُا۟ مَا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ
فَقَدْ
पस तहक़ीक़
كَذَّبُوا۟
उन्होंने झुठला दिया
فَسَيَأْتِيهِمْ
तो अनक़रीब आऐंगी उनके पास
أَنۢبَـٰٓؤُا۟
ख़बरें
مَا
उसकी जो
كَانُوا۟
थे वो
بِهِۦ
उसका
يَسْتَهْزِءُونَ
वो मज़ाक़ उड़ाते
अब जबकि वे झुठला चुके है, तो शीघ्र ही उन्हें उसकी हक़ीकत मालूम हो जाएगी, जिसका वे मज़ाक़ उड़ाते रहे है
तफ़्सीर:
जो कुछ उनके रसूल उनके पास लाए थे, उन्होंने उसे झुठला दिया। इसलिए अब शीघ्र ही उनके पास उन समाचारों की पुष्टि आ जाएगी, जिनका वे मज़ाक़ उड़ाया करते थे तथा उनपर यातना उतरेगी।
आयत 7
أَوَلَمْ يَرَوْا۟ إِلَى ٱلْأَرْضِ كَمْ أَنۢبَتْنَا فِيهَا مِن كُلِّ زَوْجٍۢ كَرِيمٍ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَرَوْا۟
उन्होंने देखा
إِلَى
at
ٱلْأَرْضِ
तरफ़ ज़मीन के
كَمْ
कितने ही
أَنۢبَتْنَا
उगाए हमने
فِيهَا
उसमें
مِن
of
كُلِّ
हर क़िस्म के
زَوْجٍۢ
जोड़े
كَرِيمٍ
उमदा
क्या उन्होंने धरती को नहीं देखा कि हमने उसमें कितने ही प्रकार की उमदा चीज़ें पैदा की है?
तफ़्सीर:
क्या ये मुश्रिक अभी भी अपने कुफ्र पर अड़े हुए हैं, इसलिए उन्होंने धरती की ओर नहीं देखा कि हमने उसमें कितने प्रकार के पौधे उगाए हैं, जो अच्छे दिखने वाले और बहुत-से फायदे वाले हैं?!
आयत 8
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَةًۭ ۖ
अलबत्ता एक निशानी है
وَمَا
और नहीं
كَانَ
हैं
أَكْثَرُهُم
अक्सर उनके
مُّؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
निश्चय ही इसमें एक बड़ी निशानी है, इसपर भी उनमें से अधिकतर माननेवाले नहीं
तफ़्सीर:
निःसंदेह धरती पर विभिन्न प्रकार के पौधे उगाने में निश्चय इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि उन्हें उगाने वाला, मुर्दों को पुनः जीवित करने में सक्षम है। परंतु इसके बावजूद उनमें से अधिकतर लोग ईमान लाने वाले नहीं हैं।
आयत 9
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ
وَإِنَّ
और बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
لَهُوَ
अलबत्ता वो
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त है
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला है
और निश्चय ही तुम्हारा रब ही है जो बड़ा प्रभुत्वशाली, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
और ऐ रसूल! आपका पालनहार ही सब पर प्रभुत्वशाली है जिसे कोई परास्त नहीं कर सकता, अपने बंदों पर अत्यंत दयालु है।
आयत 10
وَإِذْ نَادَىٰ رَبُّكَ مُوسَىٰٓ أَنِ ٱئْتِ ٱلْقَوْمَ ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَإِذْ
और जब
نَادَىٰ
पुकारा
رَبُّكَ
आपके रब ने
مُوسَىٰٓ
मूसा को
أَنِ
कि
ٱئْتِ
आओ
ٱلْقَوْمَ
उन लोगों की तरफ़
ٱلظَّـٰلِمِينَ
जो ज़ालिम हैं
और जबकि तुम्हारे रह ने मूसा को पुकारा कि "ज़ालिम लोगों के पास जा -
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) उस समय को याद करें, जब आपके रब ने मूसा को आदेश देते हुए कहा कि वह उस अत्याचारी क़ौम के पास जाएँ, जिसने अल्लाह का इनकार किया है और मूसा (अलैहिस्सलाम) की क़ौम को ग़ुलाम बना रखा है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सूरह की शुरुआत नबी ﷺ की मोहब्बत भरी फिक्रमंदी से होती है कि लोग ईमान क्यों नहीं लाते, और मूसा अलैहिस्सलाम की दावत का ज़िक्र शुरू होता है। यह हमें सिखाता है कि दूसरों की हिदायत की फिक्र करना नेकी है, मगर किसी को ज़बरदस्ती मनवाना हमारे बस में नहीं।
आयत 11
قَوْمَ فِرْعَوْنَ ۚ أَلَا يَتَّقُونَ
قَوْمَ
क़ौमे
فِرْعَوْنَ ۚ
फ़िरऔन के
أَلَا
क्या नहीं
يَتَّقُونَ
वो डरते
फ़िरऔन की क़ौम के पास - क्या वे डर नहीं रखते?"
तफ़्सीर:
उस क़ौम से अभिप्राय फ़िरऔन की क़ौम है। वहाँ जाकर उन्हें नरमी के साथ अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, डरने का आदेश दें।
आयत 12
قَالَ رَبِّ إِنِّىٓ أَخَافُ أَن يُكَذِّبُونِ
قَالَ
कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَخَافُ
मैं डरता हूँ
أَن
कि
يُكَذِّبُونِ
वो झुठला देंगे मुझे
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! मुझे डर है कि वे मुझे झुठला देंगे,
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा : मुझे इस बात का डर है कि जो कुछ मैं उन्हें तेरे विषय में बताऊँगा, वे मुझे झुठला देंगे।
आयत 13
وَيَضِيقُ صَدْرِى وَلَا يَنطَلِقُ لِسَانِى فَأَرْسِلْ إِلَىٰ هَـٰرُونَ
وَيَضِيقُ
और घुटता है
صَدْرِى
सीना मेरा
وَلَا
और नहीं
يَنطَلِقُ
चलती
لِسَانِى
ज़बान मेरी
فَأَرْسِلْ
तो भेज (नुबूव्वत)
إِلَىٰ
for
هَـٰرُونَ
तरफ़ हारून के
और मेरा सीना घुटता है और मेरी ज़बान नहीं चलती। इसलिए हारून की ओर भी संदेश भेज दे
तफ़्सीर:
मेरा सीना इस भय से संकुचित हो रहा है कि कहीं वे मुझे झुठला न दें और मेरी ज़बान बोलने से रुक रही है। अतः जिबरील द्वारा मेरे भाई हारून के पास संदेश भेज कि वह मेरा सहायक बन जाए।
आयत 14
وَلَهُمْ عَلَىَّ ذَنۢبٌۭ فَأَخَافُ أَن يَقْتُلُونِ
وَلَهُمْ
और उनके लिए है
عَلَىَّ
मुझ पर
ذَنۢبٌۭ
एक गुनाह
فَأَخَافُ
तो मैं डरता हूँ
أَن
कि
يَقْتُلُونِ
वो क़त्ल कर देंगे मुझे
और मुझपर उनके यहाँ के एक गुनाह का बोझ भी है। इसलिए मैं डरता हूँ कि वे मुझे मार डालेंगे।"
तफ़्सीर:
तथा मेरे एक क़िबती को मारने के कारण, उनका मेरे खिलाफ एक जुर्म का आरोप है। इसलिए मुझे डर है कि वे मुझे मार डालेंगे।
आयत 15
قَالَ كَلَّا ۖ فَٱذْهَبَا بِـَٔايَـٰتِنَآ ۖ إِنَّا مَعَكُم مُّسْتَمِعُونَ
قَالَ
फ़रमाया
كَلَّا ۖ
हरगिज़ नहीं
فَٱذْهَبَا
पस तुम दोनों जाओ
بِـَٔايَـٰتِنَآ ۖ
साथ हमारी निशानियों के
إِنَّا
बेशक हम
مَعَكُم
तुम्हारे साथ
مُّسْتَمِعُونَ
ख़ूब सुनने वाले हैं
कहा, "कदापि नहीं, तुम दोनों हमारी निशानियाँ लेकर जाओ। हम तुम्हारे साथ है, सुनने को मौजूद है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम से कहा : हरगिज़ ऐसा नहीं होगा। वे कदापि तुम्हें क़त्ल नहीं कर सकते। अतः तुम अपने भाई हारून के साथ हमारी निशानियाँ लेकर जाओ, जो तुम दोनों की सत्यता की पुष्टि करने वाली हैं। क्योंकि हम अपनी सहायता एवं समर्थन के साथ तुम्हारे साथ हैं, तुम उनसे तथा वे तुमसे जो कुछ कहेंगे हम सब कुछ सुनने वाले हैं। हमसे कोई भी चीज़ छूट नहीं सकती।
आयत 16
فَأْتِيَا فِرْعَوْنَ فَقُولَآ إِنَّا رَسُولُ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
فَأْتِيَا
फिर दोनों जाओ
فِرْعَوْنَ
फ़िरऔन के पास
فَقُولَآ
तो दोनों कहो
إِنَّا
बेशक हम
رَسُولُ
रसूल हैं
رَبِّ
रब्बुल
ٱلْعَـٰلَمِينَ
आलमीन के
अतः तुम दोनो फ़िरऔन को पास जाओ और कहो कि हम सारे संसार के रब के भेजे हुए है
तफ़्सीर:
अतः तुम दोनों फ़िरऔन के पास जाओ और उससे कहो : हम दोनों सारी सृष्टि के पालनहार की ओर से तेरे पास संदेश लेकर आए हैं।
आयत 17
أَنْ أَرْسِلْ مَعَنَا بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ
أَنْ
ये कि
أَرْسِلْ
भेज दो
مَعَنَا
हमारे साथ
بَنِىٓ
(the) Children of Israel.'
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल को
कि तू इसराईल की सन्तान को हमारे साथ जाने दे।"
तफ़्सीर:
कि तू बनी-इसराईल को हमारे साथ भेज दे।
आयत 18
قَالَ أَلَمْ نُرَبِّكَ فِينَا وَلِيدًۭا وَلَبِثْتَ فِينَا مِنْ عُمُرِكَ سِنِينَ
قَالَ
उसने कहा
أَلَمْ
क्या नहीं
نُرَبِّكَ
हमने पाला तुझे
فِينَا
अपने दर्मियान
وَلِيدًۭا
बच्चा सा
وَلَبِثْتَ
और ठहरा तू
فِينَا
हमारे दर्मियान
مِنْ
of
عُمُرِكَ
अपनी उम्र में से
سِنِينَ
कई साल
(फ़िरऔन ने) कहा, "क्या हमने तुझे जबकि तू बच्चा था, अपने यहाँ पाला नहीं था? और तू अपनी अवस्था के कई वर्षों तक हमारे साथ रहा,
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने मूसा अलैहिस्सलाम से कहा : क्या हमने तुझे बचपन में अपने यहाँ पाला नहीं था? और तूने हमारे बीच अपनी आयु के कई वर्ष गुज़ारे। फिर किस बात ने तुझे नुबुव्वत (पैग़ंबरी) का दावा करने के लिए प्रेरित किया?
आयत 19
وَفَعَلْتَ فَعْلَتَكَ ٱلَّتِى فَعَلْتَ وَأَنتَ مِنَ ٱلْكَـٰفِرِينَ
وَفَعَلْتَ
और किया तू ने
فَعْلَتَكَ
काम अपना
ٱلَّتِى
वो जो
فَعَلْتَ
किया तू ने
وَأَنتَ
और तू
مِنَ
(were) of
ٱلْكَـٰفِرِينَ
नाशुक्रों में से है
और तूने अपना वह काम किया, जो किया। तू बड़ा ही कृतघ्न है।"
तफ़्सीर:
और तूने अपनी जाति के एक व्यक्ति के समर्थन में एक क़िबती को क़त्ल करके बहुत बड़ा अपराध किया है, तथा तू अपने ऊपर मेरे उपकारों को न मानने वालों में से है।
आयत 20
قَالَ فَعَلْتُهَآ إِذًۭا وَأَنَا۠ مِنَ ٱلضَّآلِّينَ
قَالَ
उसने कहा
فَعَلْتُهَآ
किया मैं ने उसे
إِذًۭا
तब
وَأَنَا۠
जबकि मैं
مِنَ
(was) of
ٱلضَّآلِّينَ
राह भूले हुए लोगों में से था
कहा, ऐसा तो मुझसे उस समय हुआ जबकि मैं चूक गया था
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने अपने कार्य को स्वीकारते हुए कहा : मैंने उस व्यक्ति को उस समय क़त्ल किया, जब मैं अज्ञानियों में से था और मेरे पास वह़्य नहीं आई थी।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मूसा अलैहिस्सलाम और फिरऔन के मुकालमे का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि सच्चाई कहने में डर महसूस होना फितरी है, मगर अल्लाह पर भरोसा रखकर हिम्मत से बात कहनी चाहिए।
आयत 21
فَفَرَرْتُ مِنكُمْ لَمَّا خِفْتُكُمْ فَوَهَبَ لِى رَبِّى حُكْمًۭا وَجَعَلَنِى مِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ
فَفَرَرْتُ
फिर भाग गया मैं
مِنكُمْ
तुम से
لَمَّا
जब
خِفْتُكُمْ
डरा मैं तुम से
فَوَهَبَ
तो अता किया
لِى
मुझे
رَبِّى
मेरे रब ने
حُكْمًۭا
हुक्म
وَجَعَلَنِى
और उसने बनाया मुझे
مِنَ
of
ٱلْمُرْسَلِينَ
रसूलों में से
फिर जब मुझे तुम्हारा भय हुआ तो मैं तुम्हारे यहाँ से भाग गया। फिर मेरे रब ने मुझे निर्णय-शक्ति प्रदान की और मुझे रसूलों में सम्मिलित किया
तफ़्सीर:
फिर जब मुझे भय हुआ कि क़त्ल के अपराध में तुम मेरा वध कर दोगे, तो मैं मदयन गांव की ओर भाग गया। जहाँ मेरे पालनहार ने मुझे ज्ञान प्रदान किया और मुझे उन रसूलों में से बना दिया, जिन्हें वह लोगों के पास भेजता है।
आयत 22
وَتِلْكَ نِعْمَةٌۭ تَمُنُّهَا عَلَىَّ أَنْ عَبَّدتَّ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ
وَتِلْكَ
और यही है
نِعْمَةٌۭ
वो एहसान
تَمُنُّهَا
तुम जतला रहे हो जिसे
عَلَىَّ
मुझ पर
أَنْ
कि
عَبَّدتَّ
ग़ुलाम बना रखा है तुमने
بَنِىٓ
(the) Children of Israel
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल को
यही वह उदार अनुग्रह है जिसका रहमान तू मुझपर जताता है कि तूने इसराईल की सन्तान को ग़ुलाम बना रखा है।"
तफ़्सीर:
तेरा बनी इसराईल को दास बनाने के साथ मुझे गुलाम बनाए बिना मेरा पालन-पोषण करना, एक ऐसा उपकार है जो तू मुझपर उचित रूप से जतला रहा है। लेकिन यह मुझे तुमको एक अल्लाह की ओर बुलाने से नहीं रोकता है।
आयत 23
قَالَ فِرْعَوْنُ وَمَا رَبُّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
قَالَ
कहा
فِرْعَوْنُ
फ़िरऔन ने
وَمَا
और क्या है
رَبُّ
रब्बुल
ٱلْعَـٰلَمِينَ
आलमीन
फ़िरऔन ने कहा, "और यह सारे संसार का रब क्या होता है?"
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने मूसा अलैहिस्सलाम से कहा : सारे प्राणियों का रब क्या है, जिसका तूने रसूल होने का दावा किया है?!
आयत 24
قَالَ رَبُّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَآ ۖ إِن كُنتُم مُّوقِنِينَ
قَالَ
उसने कहा
رَبُّ
रब है
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन का
وَمَا
और जो कुछ
بَيْنَهُمَآ ۖ
दर्मियान है उन दोनों के
إِن
अगर
كُنتُم
हो तुम
مُّوقِنِينَ
यक़ीन करने वाले
उसने कहा, "आकाशों और धरती का रब और जो कुछ इन दोनों का मध्य है उसका भी, यदि तुम्हें यकीन हो।"
तफ़्सीर:
मूसा ने फ़िरऔन को उत्तर देते हुए कहा : सारे प्राणियों का रब वह है, जो आकाशों तथा धरती और उन दोनों के बीच मौजूद सारी चीज़ों का रब है। यदि तुम विश्वास रखने वाले हो कि वही उन सब का रब है, तो केवल उसी की इबादत करो।
आयत 25
قَالَ لِمَنْ حَوْلَهُۥٓ أَلَا تَسْتَمِعُونَ
قَالَ
उसने कहा
لِمَنْ
उनको जो
حَوْلَهُۥٓ
उसके इर्द-गिर्द थे
أَلَا
क्या नहीं
تَسْتَمِعُونَ
तुम ग़ौर से सुनते
उसने अपने आस-पासवालों से कहा, "क्या तुम सुनते नहीं हो?"
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने वहाँ उपस्थित अपनी क़ौम के प्रमुखों से कहा : क्या तुम मूसा का उत्तर और उसका झूठा दावा नहीं सुन रहे हो?!
आयत 26
قَالَ رَبُّكُمْ وَرَبُّ ءَابَآئِكُمُ ٱلْأَوَّلِينَ
قَالَ
उसने कहा
رَبُّكُمْ
रब तुम्हारा
وَرَبُّ
और रब
ءَابَآئِكُمُ
तुम्हारे आबा ओ अजदाद का
ٱلْأَوَّلِينَ
जो पहले थे
कहा, "तुम्हारा रब और तुम्हारे अगले बाप-दादा का रब।"
तफ़्सीर:
मूसा ने उनसे कहा : अल्लाह तुम्हारा तथा तुम्हारे पूर्व बाप-दादों का भी रब है।
आयत 27
قَالَ إِنَّ رَسُولَكُمُ ٱلَّذِىٓ أُرْسِلَ إِلَيْكُمْ لَمَجْنُونٌۭ
قَالَ
उसने कहा
إِنَّ
बेशक
رَسُولَكُمُ
रसूल तुम्हारा
ٱلَّذِىٓ
वो जो
أُرْسِلَ
भेजा गया
إِلَيْكُمْ
तरफ़ तुम्हारे
لَمَجْنُونٌۭ
अलबत्ता मजनून है
बोला, "निश्चय ही तुम्हारा यह रसूल, जो तुम्हारी ओर भेजा गया है, बिलकुल ही पागल है।"
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने कहा : यह व्यक्ति जो तुम्हारी ओर रसूल बनाकर भेजे जाने का दावा करता है, अवश्य पागल है। वह जवाब देना नहीं जानता और ऐसी बात कहता है जो समझ में नहीं आती।
आयत 28
قَالَ رَبُّ ٱلْمَشْرِقِ وَٱلْمَغْرِبِ وَمَا بَيْنَهُمَآ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْقِلُونَ
قَالَ
उसने कहा
رَبُّ
रब
ٱلْمَشْرِقِ
मशरिक़
وَٱلْمَغْرِبِ
और मग़रिब का
وَمَا
और जो
بَيْنَهُمَآ ۖ
उन दोनों के दर्मियान है
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल रखते
उसने कहा, "पूर्व और पश्चिम का रब और जो कुछ उनके बीच है उसका भी, यदि तुम कुछ बुद्धि रखते हो।"
तफ़्सीर:
मूसा ने कहा : जिस अल्लाह की ओर मैं तुम्हें बुला रहा हूँ, वह पूर्व और पश्चिम तथा उन दोनों के बीच मौजूद सारी चीज़ों का रब है, यदि तुम्हारे पास समझने के लिए बुद्धि है।
आयत 29
قَالَ لَئِنِ ٱتَّخَذْتَ إِلَـٰهًا غَيْرِى لَأَجْعَلَنَّكَ مِنَ ٱلْمَسْجُونِينَ
قَالَ
कहा
لَئِنِ
अलबत्ता अगर
ٱتَّخَذْتَ
बनाया तू ने
إِلَـٰهًا
कोई इलाह
غَيْرِى
मेरे सिवा
لَأَجْعَلَنَّكَ
अलबत्ता मैं ज़रूर कर दूँगा तुझे
مِنَ
among
ٱلْمَسْجُونِينَ
क़ैदियों में से
बोला, "यदि तूने मेरे सिवा किसी और को पूज्य एवं प्रभु बनाया, तो मैं तुझे बन्दी बनाकर रहूँगा।"
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने मूसा अलैहिस्सलाम से, उनके साथ बहस करने में असमर्थ होने के बाद, कहा : यदि तूने मेरे अलावा किसी अन्य को पूज्य बनाया, तो मैं तुझे अवश्य ही बंदी बनाए हुए लोगों में शामिल कर दूँगा।
आयत 30
قَالَ أَوَلَوْ جِئْتُكَ بِشَىْءٍۢ مُّبِينٍۢ
قَالَ
उसने कहा
أَوَلَوْ
क्या भला अगर
جِئْتُكَ
लाऊँ मैं तेरे पास
بِشَىْءٍۢ
कोई चीज़ (दलील)
مُّبِينٍۢ
वाज़ेह
उसने कहा, "क्या यदि मैं तेरे पास एक स्पष्ट चीज़ ले आऊँ तब भी?"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़िरऔन से कहा : क्या यदि मैं तेरे पास ऐसी चीज़ ले आऊँ, जो मेरे अल्लाह की ओर सच्चे रसूल होने की पुष्टि करती हो, फिर भी तू मुझे बंदी बनाए हुए लोगों में शामिल कर देगा?
आज की ज़िंदगी में सबक़
मूसा अलैहिस्सलाम का पुराने वाकिये पर सफाई देने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि गुज़री गलती की सफाई ईमानदारी से देना बेहतर है बजाय उसे छुपाने के।
आयत 31
قَالَ فَأْتِ بِهِۦٓ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ
قَالَ
उसने कहा
فَأْتِ
तो ले आ
بِهِۦٓ
उसे
إِن
अगर
كُنتَ
है तू
مِنَ
of
ٱلصَّـٰدِقِينَ
सच्चों में से
बोलाः “अच्छा वह ले आ; यदि तू सच्चा है” ।
तफ़्सीर:
उसने कहा : तो उसे ले आ जो तूने कहा है कि वह तेरी सच्चाई को दर्शाता है, यदि तू अपने दावे में सच्चा है।
आयत 32
فَأَلْقَىٰ عَصَاهُ فَإِذَا هِىَ ثُعْبَانٌۭ مُّبِينٌۭ
فَأَلْقَىٰ
फिर उसने डाला
عَصَاهُ
असा अपना
فَإِذَا
तो अचानक
هِىَ
वो
ثُعْبَانٌۭ
अज़दहा था
مُّبِينٌۭ
सरीह
फिर उसने अपनी लाठी डाल दी, तो अचानक क्या देखते है कि वह एक प्रत्यक्ष अज़गर है
तफ़्सीर:
मूसा ने अपनी लाठी ज़मीन पर फेंकी, और वह अचानक एक स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाले अजगर में बदल गई।
आयत 33
وَنَزَعَ يَدَهُۥ فَإِذَا هِىَ بَيْضَآءُ لِلنَّـٰظِرِينَ
وَنَزَعَ
और उसने खींच लिया
يَدَهُۥ
हाथ अपना
فَإِذَا
तो अचानक
هِىَ
वो
بَيْضَآءُ
सफ़ेद /चमकता हुआ था
لِلنَّـٰظِرِينَ
देखने वालों के लिए
और उसने अपना हाथ बाहर खींचा तो फिर क्या देखते है कि वह देखनेवालों के सामने चमक रहा है
तफ़्सीर:
और उन्होंने अपना हाथ अपने गिरेबान में डाला, जबकि वह सफेद नहीं था, फिर उसे इस हालत में निकाला कि वह सफ़ेद और चमकदार था, पर बरस की सफ़ेदी की तरह नहीं, देखने वाले उसे ऐसा ही देख रहे थे।
आयत 34
قَالَ لِلْمَلَإِ حَوْلَهُۥٓ إِنَّ هَـٰذَا لَسَـٰحِرٌ عَلِيمٌۭ
قَالَ
कहा
لِلْمَلَإِ
सरदारों से
حَوْلَهُۥٓ
जो उसके इर्द-गिर्द थे
إِنَّ
बेशक
هَـٰذَا
ये
لَسَـٰحِرٌ
अलबत्ता एक जादूगर है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला/माहिर
उसने अपने आस-पास के सरदारों से कहा, "निश्चय ही यह एक बड़ा ही प्रवीण जादूगर है
तफ़्सीर:
फिरऔन ने अपने आस-पास उपस्थित सरदारों से कहा : निश्चय यह व्यक्ति तो एक कुशल जादूगर है।
आयत 35
يُرِيدُ أَن يُخْرِجَكُم مِّنْ أَرْضِكُم بِسِحْرِهِۦ فَمَاذَا تَأْمُرُونَ
يُرِيدُ
वो चाहता है
أَن
कि
يُخْرِجَكُم
वो निकाल दे तुम्हें
مِّنْ
from
أَرْضِكُم
तुम्हारी ज़मीन से
بِسِحْرِهِۦ
साथ अपने जादू के
فَمَاذَا
तो क्या
تَأْمُرُونَ
तुम हुक्म देते है
चाहता है कि अपने जादू से तुम्हें तुम्हारी अपनी भूमि से निकाल बाहर करें; तो अब तुम क्या कहते हो?"
तफ़्सीर:
यह चाहता है कि अपने जादू से तुम्हें तुम्हारी भूमि से निकाल दे, तो तुम्हारी क्या राय है, इसके बारे में हमें क्या कार्रवाई करनी चाहिए कि?
आयत 36
قَالُوٓا۟ أَرْجِهْ وَأَخَاهُ وَٱبْعَثْ فِى ٱلْمَدَآئِنِ حَـٰشِرِينَ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَرْجِهْ
मोहलत दो उसे
وَأَخَاهُ
और उसके भाई को
وَٱبْعَثْ
और भेज दो
فِى
in
ٱلْمَدَآئِنِ
शहरों में
حَـٰشِرِينَ
इकट्ठा करने वाले
उन्होंने कहा, "इसे और इसके भाई को अभी टाले रखिए, और एकत्र करनेवालों को नगरों में भेज दीजिए
तफ़्सीर:
उनहोंने उससे कहा : इसे और इसके भाई के मामले को अभी टाले रखो और इन दोनों को दंड देने में जल्दी न करो, तथा मिस्र के नगरों में जादूगरों को इकट्ठा करने वालों को भेज दो।
आयत 37
يَأْتُوكَ بِكُلِّ سَحَّارٍ عَلِيمٍۢ
يَأْتُوكَ
वो ले आऐंगे तेरे पास
بِكُلِّ
तमाम
سَحَّارٍ
बड़े जादूगर
عَلِيمٍۢ
ख़ूब जानने वाले
कि वे प्रत्येक प्रवीण जादूगर को आपके पास ले आएँ।"
तफ़्सीर:
कि वे तुम्हारे पास हर बड़ा जादूगर ले आएँ, जो जादू में प्रवीण और कुशल हो।
आयत 38
فَجُمِعَ ٱلسَّحَرَةُ لِمِيقَـٰتِ يَوْمٍۢ مَّعْلُومٍۢ
فَجُمِعَ
तो जमा किए गए
ٱلسَّحَرَةُ
जादूगर
لِمِيقَـٰتِ
मुक़र्रर वक़्त के लिए
يَوْمٍۢ
एक दिन
مَّعْلُومٍۢ
मालूम के
अतएव एक निश्चित दिन के नियत समय पर जादूगर एकत्र कर लिए गए
तफ़्सीर:
तो फ़िरऔन ने अपने जादूगरों को मूसा से मुक़ाबले के लिए एक विशिष्ट स्थान और समय पर इकट्ठा किया।
आयत 39
وَقِيلَ لِلنَّاسِ هَلْ أَنتُم مُّجْتَمِعُونَ
وَقِيلَ
और कहा गया
لِلنَّاسِ
लोगों से
هَلْ
क्या
أَنتُم
तुम
مُّجْتَمِعُونَ
जमा होने वाले हो
और लोगों से कहा गया, "क्या तुम भी एकत्र होते हो?"
तफ़्सीर:
तथा लोगों से कहा गया : क्या तुम यह देखने के लिए एकत्र होने वाले हो कि विजयी मूसा होते हैं या जादूगर?
आयत 40
لَعَلَّنَا نَتَّبِعُ ٱلسَّحَرَةَ إِن كَانُوا۟ هُمُ ٱلْغَـٰلِبِينَ
لَعَلَّنَا
ताकि हम
نَتَّبِعُ
हम पैरवी करें
ٱلسَّحَرَةَ
जादूगरों की
إِن
अगर
كَانُوا۟
हों वो
هُمُ
वो ही
ٱلْغَـٰلِبِينَ
ग़ालिब आने वाले
कदाचित हम जादूगरों ही के अनुयायी रह जाएँ, यदि वे विजयी हुए
तफ़्सीर:
इस आशा के साथ कि यदि जादूगर मूसा को पराजित कर देते हैं, तो हम उनके धर्म के अनुयायी बन जाएँगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
फिरऔन का जादूगरों को बुलाने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि बातिल हमेशा अपनी ताकत जमा करके हक का मुकाबला करने की कोशिश करता है, मगर आखिरकार नाकाम रहता है।
आयत 41
فَلَمَّا جَآءَ ٱلسَّحَرَةُ قَالُوا۟ لِفِرْعَوْنَ أَئِنَّ لَنَا لَأَجْرًا إِن كُنَّا نَحْنُ ٱلْغَـٰلِبِينَ
فَلَمَّا
तो जब
جَآءَ
आए
ٱلسَّحَرَةُ
जादूगर
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لِفِرْعَوْنَ
फ़िरऔन से
أَئِنَّ
क्या बेशक
لَنَا
हमारे लिए
لَأَجْرًا
वाक़ई कोई सिला है
إِن
अगर
كُنَّا
हों हम
نَحْنُ
हम ही
ٱلْغَـٰلِبِينَ
ग़ालिब आने वाले
फिर जब जादूगर आए तो उन्होंने फ़िरऔन से कहा, "क्या हमारे लिए कोई प्रतिदान भी है, यदि हम प्रभावी रहे?"
तफ़्सीर:
जब जादूगर मूसा का मुक़ाबला करने के लिए फ़िरऔन के पास आए, तो उन्होंने उससे कहा : यदि हम मूसा पर विजय प्राप्त कर लेते हैं, तो क्या हमें कोई आर्थिक या नैतिक इनाम मिलेगा?
आयत 42
قَالَ نَعَمْ وَإِنَّكُمْ إِذًۭا لَّمِنَ ٱلْمُقَرَّبِينَ
قَالَ
उसने कहा
نَعَمْ
हाँ
وَإِنَّكُمْ
और बेशक तुम
إِذًۭا
तब
لَّمِنَ
surely (will be) of
ٱلْمُقَرَّبِينَ
अलबत्ता मुक़र्रबीन में से होगे
उसने कहा, "हाँ, और निश्चित ही तुम तो उस समय निकटतम लोगों में से हो जाओगे।"
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने उनसे कहा : हाँ, तुम्हें बदला मिलेगा, तथा यदि तुम उसपर विजयी हो जाते हो, तो तुम उच्च पद प्राप्त कर मेरे क़रीबी लोगों में से हो जाओगे।
आयत 43
قَالَ لَهُم مُّوسَىٰٓ أَلْقُوا۟ مَآ أَنتُم مُّلْقُونَ
قَالَ
कहा
لَهُم
उनसे
مُّوسَىٰٓ
मूसा ने
أَلْقُوا۟
डालो
مَآ
जो
أَنتُم
तुम
مُّلْقُونَ
डालने वाले हो
मूसा ने उनसे कहा, "डालो, जो कुछ तुम्हें डालना है।"
तफ़्सीर:
मूसा ने अल्लाह की मदद से आश्वस्त और यह स्पष्ट करते हुए कि उनके पास जो कुछ है वह जादू नहीं है, कहा : तुम अपनी रस्सियाँ और लाठियाँ, जो फेंकना चाहते हो, फेंको।
आयत 44
فَأَلْقَوْا۟ حِبَالَهُمْ وَعِصِيَّهُمْ وَقَالُوا۟ بِعِزَّةِ فِرْعَوْنَ إِنَّا لَنَحْنُ ٱلْغَـٰلِبُونَ
فَأَلْقَوْا۟
तो उन्होंने डालीं
حِبَالَهُمْ
रस्सियाँ अपनी
وَعِصِيَّهُمْ
और लाठियाँ अपनी
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
بِعِزَّةِ
क़सम है इज़्ज़ते
فِرْعَوْنَ
फ़िरऔन की
إِنَّا
बेशक हम
لَنَحْنُ
अलबत्ता हम ही
ٱلْغَـٰلِبُونَ
ग़ालिब आने वाले हैं
तब उन्होंने अपनी रस्सियाँ और लाठियाँ डाल दी और बोले, "फ़िरऔन के प्रताप से हम ही विजयी रहेंगे।"
तफ़्सीर:
अतः उन्होंने अपनी रस्सियाँ और लाठियाँ फेंकीं और उन्हें फेंकते हुए कहा : फ़िरऔन के प्रभुत्व की सौगंध! निश्चय हम ही विजयी रहेंगे और मूसा को पराजित होना पड़ेगा।
आयत 45
فَأَلْقَىٰ مُوسَىٰ عَصَاهُ فَإِذَا هِىَ تَلْقَفُ مَا يَأْفِكُونَ
فَأَلْقَىٰ
तो डाली
مُوسَىٰ
मूसा ने
عَصَاهُ
लाठी अपनी
فَإِذَا
तो अचानक
هِىَ
वो
تَلْقَفُ
निगल रही थी
مَا
उसको जो
يَأْفِكُونَ
वो गढ़ रहे थे
फिर मूसा ने अपनी लाठी फेकी तो क्या देखते है कि वह उसे स्वाँग को, जो वे रचाते है, निगलती जा रही है
तफ़्सीर:
फिर मूसा ने अपनी लाठी फेंकी और वह एक अजगर बन गई, जिसने अचानक उस जादू को निगलना शुरू कर दिया, जो वे लोगों पर छलावा कर रहे थे।
आयत 46
فَأُلْقِىَ ٱلسَّحَرَةُ سَـٰجِدِينَ
فَأُلْقِىَ
तो डाल दिए गए
ٱلسَّحَرَةُ
जादूगर
سَـٰجِدِينَ
सजदा करते हुए
इसपर जादूगर सजदे में गिर पड़े
तफ़्सीर:
जब जादूगरों ने देखा कि मूसा की लाठी उनके फेंके हुए जादू को निगल रही है, तो वे सजदे में गिर गए।
आयत 47
قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا بِرَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
بِرَبِّ
साथ रब्बुल
ٱلْعَـٰلَمِينَ
आलमीन के
वे बोल उठे, "हम सारे संसार के रब पर ईमान ले आए -
तफ़्सीर:
वे बोल पड़े : हम सारे संसार के पालनहार पर ईमान ले आए।
आयत 48
رَبِّ مُوسَىٰ وَهَـٰرُونَ
رَبِّ
रब
مُوسَىٰ
मूसा
وَهَـٰرُونَ
और हारून के
मूसा और हारून के रब पर!"
तफ़्सीर:
मूसा और हारून अलैहिमस्सलाम के रब पर।
आयत 49
قَالَ ءَامَنتُمْ لَهُۥ قَبْلَ أَنْ ءَاذَنَ لَكُمْ ۖ إِنَّهُۥ لَكَبِيرُكُمُ ٱلَّذِى عَلَّمَكُمُ ٱلسِّحْرَ فَلَسَوْفَ تَعْلَمُونَ ۚ لَأُقَطِّعَنَّ أَيْدِيَكُمْ وَأَرْجُلَكُم مِّنْ خِلَـٰفٍۢ وَلَأُصَلِّبَنَّكُمْ أَجْمَعِينَ
قَالَ
कहा
ءَامَنتُمْ
ईमान लाए तुम
لَهُۥ
उस पर
قَبْلَ
इससे पहले
أَنْ
कि
ءَاذَنَ
मैं इजाज़त देता
لَكُمْ ۖ
तुम्हें
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَكَبِيرُكُمُ
अलबत्ता बड़ा है तुम्हारा
ٱلَّذِى
जिसने
عَلَّمَكُمُ
सिखाया तुम्हें
ٱلسِّحْرَ
जादू
فَلَسَوْفَ
पस अलबत्ता ज़रूर
تَعْلَمُونَ ۚ
तुम जान लोगे
لَأُقَطِّعَنَّ
अलबत्ता मैं ज़रूर काट दूँगा
أَيْدِيَكُمْ
तुम्हारे हाथों को
وَأَرْجُلَكُم
और तुम्हारे पाँवों को
مِّنْ
of
خِلَـٰفٍۢ
मुख़ालिफ़ सिम्त से
وَلَأُصَلِّبَنَّكُمْ
और अलबत्ता मैं ज़रूर सूली पर चढ़ाऊँगा तुम्हें
أَجْمَعِينَ
सब के सब को
उसने कहा, "तुमने उसको मान लिया, इससे पहले कि मैं तुम्हें अनुमति देता। निश्चय ही वह तुम सबका प्रमुख है, जिसने तुमको जादू सिखाया है। अच्छा, शीघ्र ही तुम्हें मालूम हुआ जाता है! मैं तुम्हारे हाथ और पाँव विपरीत दिशाओं से कटवा दूँगा और तुम सभी को सूली पर चढ़ा दूँगा।"
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने जादूगरों के ईमान को अस्वीकार करते हुए कहा : क्या तुम मूसा पर ईमान ले आए, इससे पहले कि मैं तुम्हें ऐसा करने की अनुमति देता? निःसंदेह मूसा अवश्य तुम्हारा प्रमुख है, जिसने तुम्हें जादू सिखाया है, तथा तुम सब ने मिलकर मिस्र के वासियों को उनकी भूमि से निकालने की साज़िश रची है। अतः शीघ्र ही तुम जान लोगे कि मैं तुम्हें क्या दण्ड देता हूँ। मैं अवश्य ही हर एक का पैर और उसका हाथ विपरीत दिशा से काट दूँगा, यानी दाहिने पैर को बाएँ हाथ के साथ या उसके विपरीत बाएँ पैर को दाहिने हाथ के साथ। तथा तुम सभी को खजूर के तनों पर सूली पर चढ़ा दूँगा, तुममें से किसी को भी जीवित नहीं छोड़ूँगा।
आयत 50
قَالُوا۟ لَا ضَيْرَ ۖ إِنَّآ إِلَىٰ رَبِّنَا مُنقَلِبُونَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لَا
No
ضَيْرَ ۖ
नहीं कोई नुक़्सान
إِنَّآ
बेशक हम
إِلَىٰ
to
رَبِّنَا
तरफ़ अपने रब के
مُنقَلِبُونَ
पलटने वाले हैं
उन्होंने कहा, "कुछ हरज नहीं; हम तो अपने रब ही की ओर पलटकर जानेवाले है
तफ़्सीर:
जादूगरों ने फ़िरऔन से कहा : इस संसार में हाथ-पैर काटने तथा सूली पर चढ़ाने की जो तू हमें धमकी दे रहा है, उसमें कोई नुक़सान नहीं। क्योंकि तेरी यातना बीत जाएगी और हम अपने रब ही की ओर पलटने वाले हैं, और वह हमें अपनी शाश्वत दया में प्रवेश करेगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जादूगरों के मुकाबले की तैयारी का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि दुनियावी इनाम के लालच में आकर बातिल का साथ देना आखिरकार नुकसानदेह साबित होता है।
आयत 51
إِنَّا نَطْمَعُ أَن يَغْفِرَ لَنَا رَبُّنَا خَطَـٰيَـٰنَآ أَن كُنَّآ أَوَّلَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
إِنَّا
बेशक हम
نَطْمَعُ
हम उम्मीद रखते हैं
أَن
कि
يَغْفِرَ
बख़्श देगा
لَنَا
हमारे लिए
رَبُّنَا
हमारा रब
خَطَـٰيَـٰنَآ
ख़ताऐं हमारी
أَن
कि
كُنَّآ
हैं हम
أَوَّلَ
सबसे पहले
ٱلْمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
हमें तो इसी की लालसा है कि हमारा रब हमारी ख़ताओं को क्षमा कर दें, क्योंकि हम सबसे पहले ईमान लाए।"
तफ़्सीर:
हम आशा करते हैं कि अल्लाह हमारे उन पिछले पापों को मिटा देगा जो हमने किए थे क्योंकि हम मूसा पर सबसे पहले ईमान लाने वाले और उनको सच्चा मानने वाले बने हैं।
आयत 52
۞ وَأَوْحَيْنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰٓ أَنْ أَسْرِ بِعِبَادِىٓ إِنَّكُم مُّتَّبَعُونَ
۞ وَأَوْحَيْنَآ
और वही की हमने
إِلَىٰ
to
مُوسَىٰٓ
तरफ़ मूसा के
أَنْ
ये कि
أَسْرِ
रात को ले चल
بِعِبَادِىٓ
मेरे बन्दों को
إِنَّكُم
बेशक तुम
مُّتَّبَعُونَ
पीछा किए जाने वाले हो
हमने मूसा की ओर प्रकाशना की, "मेरे बन्दों को लेकर रातों-रात निकल जा। निश्चय ही तुम्हारा पीछा किया जाएगा।"
तफ़्सीर:
और हमने मूसा की ओर उन्हें यह आदेश देते हुए वह़्य की कि बनी इसराईल को लेकर रातों-रात निकल जाओ। क्योंकि फ़िरऔन अपने साथियों के साथ उन्हें वापस ले जाने के लिए पीछा करेगा।
आयत 53
فَأَرْسَلَ فِرْعَوْنُ فِى ٱلْمَدَآئِنِ حَـٰشِرِينَ
فَأَرْسَلَ
तो भेजा
فِرْعَوْنُ
फ़िरऔन ने
فِى
in
ٱلْمَدَآئِنِ
शहरों में
حَـٰشِرِينَ
इकट्ठा करने वालों को
इसपर फ़िरऔन ने एकत्र करनेवालों को नगर में भेजा
तफ़्सीर:
जब फ़िरऔन को पता चला कि बनी इसराईल मिस्र से भाग निकले हैं, तो उसने अपने कुछ सिपाहियों को नगरों में सेना एकत्र करने के लिए भेज दिए, ताकि वे बनी इसराईल को वापस ला सकें।
आयत 54
إِنَّ هَـٰٓؤُلَآءِ لَشِرْذِمَةٌۭ قَلِيلُونَ
إِنَّ
बेशक
هَـٰٓؤُلَآءِ
ये लोग
لَشِرْذِمَةٌۭ
अलबत्ता एक जमाअत है
قَلِيلُونَ
कम
कि "यह गिरे-पड़े थोड़े लोगों का एक गिरोह है,
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने बनी इसराईल के महत्व को घटाने के लिए कहा : निःसंदेह ये लोग तो एक छोटा-सा समूह हैं।
आयत 55
وَإِنَّهُمْ لَنَا لَغَآئِظُونَ
وَإِنَّهُمْ
और बेशक वो
لَنَا
हमें
لَغَآئِظُونَ
अलबत्ता ग़ुस्सा दिलाने वाले हैं
और ये हमें क्रुद्ध कर रहे है।
तफ़्सीर:
और ये ऐसा काम करने वाले हैं, जो हमें इनपर क्रोधित करता है।
आयत 56
وَإِنَّا لَجَمِيعٌ حَـٰذِرُونَ
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَجَمِيعٌ
अलबत्ता सब
حَـٰذِرُونَ
मोहतात/होशियार हैं
और हम चौकन्ना रहनेवाले लोग है।"
तफ़्सीर:
हम उनके लिए तैयार और सतर्क रहने वाले हैं।
आयत 57
فَأَخْرَجْنَـٰهُم مِّن جَنَّـٰتٍۢ وَعُيُونٍۢ
فَأَخْرَجْنَـٰهُم
तो निकाल दिया हमने उन्हें
مِّن
from
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात से
وَعُيُونٍۢ
और चश्मों
इस प्रकार हम उन्हें बाग़ों और स्रोतों
तफ़्सीर:
इस प्रकार हमने फ़िरऔन तथा उसकी जाति को हरे-भरे बगीचों और जल से बहने वाले सोतों वाली मिस्र की भूमि से निकाल दिया।
आयत 58
وَكُنُوزٍۢ وَمَقَامٍۢ كَرِيمٍۢ
وَكُنُوزٍۢ
और ख़ज़ानों
وَمَقَامٍۢ
and a place
كَرِيمٍۢ
और उमदा/नफ़ीस ठिकाने से
और ख़जानों और अच्छे स्थान से निकाल लाए
तफ़्सीर:
तथा पैसे के खज़ानों और अच्छे आवासों वाली भूमि से।
आयत 59
كَذَٰلِكَ وَأَوْرَثْنَـٰهَا بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
وَأَوْرَثْنَـٰهَا
और वारिस बना दिया हमने उनका
بَنِىٓ
(the) Children of Israel
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल को
ऐसा ही हम करते है और इनका वारिस हमने इसराईल की सन्तान को बना दिया
तफ़्सीर:
जिस तरह हमने फ़िरऔन तथा उसकी जाति को इन नेमतों से बाहर निकाला, वैसे ही हमने उनके बाद इसी प्रकार की नेमतें बनी इसराईल को शाम के देश (लेवांत) में प्रदान कीं।
आयत 60
فَأَتْبَعُوهُم مُّشْرِقِينَ
فَأَتْبَعُوهُم
तो उन्होंने पीछा किया उनका
مُّشْرِقِينَ
सूरज तुलूअ होते वक़्त
सुबह-तड़के उन्होंने उनका पीछा किया
तफ़्सीर:
सो फ़िरऔन और उसकी जाति के लोगों ने सूर्योदय के समय बनी इसराईल का पीछा किया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जादूगरों के ईमान लाने और बनी इस्राईल की रवानगी का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि सच्चाई सामने आते ही उसे कबूल करने की हिम्मत रखनी चाहिए, चाहे कल तक हम उसके मुखालिफ रहे हों।
आयत 61
فَلَمَّا تَرَٰٓءَا ٱلْجَمْعَانِ قَالَ أَصْحَـٰبُ مُوسَىٰٓ إِنَّا لَمُدْرَكُونَ
فَلَمَّا
फिर जब
تَرَٰٓءَا
आमने सामने हुईं
ٱلْجَمْعَانِ
दो जमाअतें
قَالَ
कहने लगे
أَصْحَـٰبُ
साथी
مُوسَىٰٓ
मूसा के
إِنَّا
बेशक हम
لَمُدْرَكُونَ
अलबत्ता पा लिए जाने वाले हैं
फिर जब दोनों गिरोहों ने एक-दूसरे को देख लिया तो मूसा के साथियों ने कहा, "हम तो पकड़े गए!"
तफ़्सीर:
फिर जब फ़िरऔन और उसकी जाति के लोग मूसा और उनकी जाति के लोगों से मिले, इस प्रकार कि दोनों दल एक-दूसरे को देखने लगे, तो मूसा के साथियों ने कहा : निश्चय फ़िरऔन और उसकी जाति के लोग हमें पकड़ लेंगे, और हमारे पास उनसे निपटने की शक्ति नहीं है।
आयत 62
قَالَ كَلَّآ ۖ إِنَّ مَعِىَ رَبِّى سَيَهْدِينِ
قَالَ
उसने कहा
كَلَّآ ۖ
हरगिज़ नहीं
إِنَّ
बेशक
مَعِىَ
मेरे साथ
رَبِّى
मेरा रब है
سَيَهْدِينِ
वो ज़रूर रहनुमाई करेगा मेरी
उसने कहा, "कदापि नहीं, मेरे साथ मेरा रब है। वह अवश्य मेरा मार्गदर्शन करेगा।"
तफ़्सीर:
मूसा ने अपने साथियों से कहा : ऐसा कदापि नहीं होगा, जैसा तुम सोच रहे हो। क्योंकि मेरा रब समर्थन और मदद के साथ मेरे संग है। वह अवश्य मेरा मार्गदर्शन करेगा और मुझे मोक्ष के मार्ग पर ले जाएगा।
आयत 63
فَأَوْحَيْنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰٓ أَنِ ٱضْرِب بِّعَصَاكَ ٱلْبَحْرَ ۖ فَٱنفَلَقَ فَكَانَ كُلُّ فِرْقٍۢ كَٱلطَّوْدِ ٱلْعَظِيمِ
فَأَوْحَيْنَآ
तो वही की हमने
إِلَىٰ
to
مُوسَىٰٓ
तरफ़ मूसा के
أَنِ
कि
ٱضْرِب
मारो
بِّعَصَاكَ
अपने असा को
ٱلْبَحْرَ ۖ
समुन्दर पर
فَٱنفَلَقَ
तो वो फट गया
فَكَانَ
फिर हो गया
كُلُّ
हर
فِرْقٍۢ
हिस्सा
كَٱلطَّوْدِ
जैसे पहाड़
ٱلْعَظِيمِ
बहुत बड़ा
तब हमने मूसा की ओर प्रकाशना की, "अपनी लाठी सागर पर मार।"
तफ़्सीर:
हमने यह आदेश देते हुए मूसा की ओर वह़्य की कि अपनी लाठी को सागर पर मारो। अतः उन्होंने उसपर मारा, जिससे सागर फट गया और बनी-इसराईल के गोत्रों की संख्या के बराबर बारह मार्ग बन गए। समुद्र से फटकर अलग हुआ हर टुकड़ा बड़े पहाड़ की तरह इतना बड़ा और दृढ़ था कि उसमें से कुछ भी पानी नहीं बह सकता था।
आयत 64
وَأَزْلَفْنَا ثَمَّ ٱلْـَٔاخَرِينَ
وَأَزْلَفْنَا
और क़रीब कर दिया हमने
ثَمَّ
उस जगह
ٱلْـَٔاخَرِينَ
दूसरों को
और हम दूसरों को भी निकट ले आए
तफ़्सीर:
फिर हम फ़िरऔन तथा उसकी जाति को निकट ले आए, यहाँ तक कि वे समुद्र में प्रवेश कर गए, यह सोचकर कि रास्ता चलने योग्य है।
आयत 65
وَأَنجَيْنَا مُوسَىٰ وَمَن مَّعَهُۥٓ أَجْمَعِينَ
وَأَنجَيْنَا
और निजात दी हमने
مُوسَىٰ
मूसा को
وَمَن
और जो
مَّعَهُۥٓ
उसके साथ थे
أَجْمَعِينَ
सब के सब को
हमने मूसा को और उन सबको जो उसके साथ थे, बचा लिया
तफ़्सीर:
हमने मूसा तथा उनके साथ मौजूद बनी इसराईल को बचा लिया और उनमें से कोई भी नाश न हुआ।
आयत 66
ثُمَّ أَغْرَقْنَا ٱلْـَٔاخَرِينَ
ثُمَّ
फिर
أَغْرَقْنَا
ग़र्क़ कर दिया हमने
ٱلْـَٔاخَرِينَ
दूसरों को
और दूसरों को डूबो दिया
तफ़्सीर:
फिर हमने फ़िरऔन तथा उसकी जाति को समुद्र में डुबाकर नाश कर दिया।
आयत 67
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
उसमें
لَـَٔايَةًۭ ۖ
अलबत्ता एक निशानी है
وَمَا
और ना
كَانَ
थे
أَكْثَرُهُم
अक्सर उनके
مُّؤْمِنِينَ
ईमान लान वाले
निस्संदेह इसमें एक बड़ी निशानी है। इसपर भी उनमें से अधिकतर माननेवाले नहीं
तफ़्सीर:
मूसा के लिए समुद्र के फटने, उनके बच निकलने तथा फिरऔन और उसकी जाति के विनाश में, निश्चय मूसा अलैहिस्सलाम की सच्चाई को दर्शाने वाली एक बड़ी निशानी है। और फ़िरऔन के साथ मौजूद अकसर लोग ईमान लाने वाले नहीं थे।
आयत 68
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ
وَإِنَّ
और बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
لَهُوَ
अलबत्ता वो ही है
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करन वाला
और निश्चय ही तुम्हारा रब ही है जो बड़ा प्रभुत्वशाली, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
और निःसंदेह (ऐ रसूल!) आपका पालनहार ही वह प्रभुत्वशाली है, जो अपने दुश्मनों से बदला लेता है, तथा उनमें से तौबा करने वालों पर बहुत दयालु है।
आयत 69
وَٱتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ إِبْرَٰهِيمَ
وَٱتْلُ
और पढ़ सुनाइए
عَلَيْهِمْ
उन्हें
نَبَأَ
ख़बर
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम की
और उन्हें इबराहीम का वृत्तान्त सुनाओ,
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आप उन्हें इबराहीम की कहानी सुनाएँ।
आयत 70
إِذْ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِۦ مَا تَعْبُدُونَ
إِذْ
जब
قَالَ
उसने कहा
لِأَبِيهِ
अपने बाप से
وَقَوْمِهِۦ
और अपनी क़ौम से
مَا
किस की
تَعْبُدُونَ
तुम इबादत करते हो
जबकि उसने अपने बाप और अपनी क़ौंम के लोगों से कहा, "तुम क्या पूजते हो?"
तफ़्सीर:
जिस समय उन्होंने अपने पिता आज़र तथा अपनी जाति के लोगों से कहा : आप लोग अल्लाह के सिवा किसकी पूजा करते हैं?
आज की ज़िंदगी में सबक़
समुंदर के फटने और फिरऔन के डूबने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि जब हालात बेहद तंग नज़र आएं तब भी अल्लाह पर भरोसा रखने वाले के लिए रास्ता खुल सकता है।
आयत 71
قَالُوا۟ نَعْبُدُ أَصْنَامًۭا فَنَظَلُّ لَهَا عَـٰكِفِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
نَعْبُدُ
हम इबादत करते हैं
أَصْنَامًۭا
बुतों की
فَنَظَلُّ
तो हम हमेशा रहेंगे
لَهَا
उनके लिए
عَـٰكِفِينَ
जम कर बैठने वाले
उन्होंने कहा, "हम बुतों की पूजा करते है, हम तो उन्हीं की सेवा में लगे रहेंगे।"
तफ़्सीर:
तो उनकी जाति के लोगों ने उनसे कहा : हम मूर्तियों की पूजा करते हैं और उनकी पूजा पर अडिग रहते हैं।
आयत 72
قَالَ هَلْ يَسْمَعُونَكُمْ إِذْ تَدْعُونَ
قَالَ
उसने कहा
هَلْ
क्या
يَسْمَعُونَكُمْ
वो सुनते हैं तुम्हें
إِذْ
जब
تَدْعُونَ
तुम पुकारते हो
उसने कहा, "क्या ये तुम्हारी सुनते है, जब तुम पुकारते हो,
तफ़्सीर:
उनसे इबराहीम ने पूछा : क्या ये मूर्तियाँ तुम्हारी पुकार सुनती हैं, जब तुम उन्हें पुकारते हो?
आयत 73
أَوْ يَنفَعُونَكُمْ أَوْ يَضُرُّونَ
أَوْ
या
يَنفَعُونَكُمْ
वो नफ़ा देते हैं तुम्हें
أَوْ
या
يَضُرُّونَ
वो नुक़्सान देते हैं
या ये तुम्हें कुछ लाभ या हानि पहुँचाते है?"
तफ़्सीर:
या वे तुम्हें लाभ पहुँचाती हैं, यदि तुम उनकी बात मानते हो, या वे तुम्हें हानि पहुँचाती हैं, यदि तुम उनकी अवज्ञा करते हो?
आयत 74
قَالُوا۟ بَلْ وَجَدْنَآ ءَابَآءَنَا كَذَٰلِكَ يَفْعَلُونَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
بَلْ
बल्कि
وَجَدْنَآ
पाया हमने
ءَابَآءَنَا
अपने आबा ओ अजदाद को
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يَفْعَلُونَ
वो करते थे
उन्होंने कहा, "नहीं, बल्कि हमने तो अपने बाप-दादा को ऐसा ही करते पाया है।"
तफ़्सीर:
उन्होंने उत्तर दिया : यदि हम इन मूर्तियों को पुकारते हैं, तो वे हमारी पुकार नहीं सुनतीं, और यदि हम उनकी आज्ञा मानते हैं, तो वे हमें लाभ नहीं पहुँचातीं, और यदि हम उनकी अवज्ञा करते हैं, तो वे हमें हानि नहीं पहुँचातीं। बल्कि, असल बात यह है कि हमने अपने बाप-दादा को ऐसा ही करते हुए पाया है, इसलिए हम उनका अनुकरण करते हैं।
आयत 75
قَالَ أَفَرَءَيْتُم مَّا كُنتُمْ تَعْبُدُونَ
قَالَ
कहा
أَفَرَءَيْتُم
क्या फिर देखा तुमने
مَّا
जिनकी
كُنتُمْ
हो तुम
تَعْبُدُونَ
तुम इबादत करते
उसने कहा, "क्या तुमने उनपर विचार भी किया कि जिन्हें तुम पूजते हो,
तफ़्सीर:
इबराहीम ने कहा : क्या तुमने उन मूर्तियों के विषय में ग़ौर किया और देखा, जिनकी तुम अल्लाह के सिवा पूजा करते हो?
आयत 76
أَنتُمْ وَءَابَآؤُكُمُ ٱلْأَقْدَمُونَ
أَنتُمْ
तुम
وَءَابَآؤُكُمُ
और तुम्हारे आबा ओ अजदाद
ٱلْأَقْدَمُونَ
पहले
तुम और तुम्हारे पहले के बाप-दादा?
तफ़्सीर:
और जिनकी तुम्हारे पहले के बाप-दादा पूजा करते थे?
आयत 77
فَإِنَّهُمْ عَدُوٌّۭ لِّىٓ إِلَّا رَبَّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
فَإِنَّهُمْ
तो बेशक वो
عَدُوٌّۭ
दुश्मन हैं
لِّىٓ
मेरे
إِلَّا
सिवाए
رَبَّ
रब्बुल
ٱلْعَـٰلَمِينَ
आलमीन के
वे सब तो मेरे शत्रु है, सिवाय सारे संसार के रब के,
तफ़्सीर:
निःसंदेह ! वे सब मेरे शत्रु हैं; क्योंकि वे झूठे हैं, सिवाय सभी प्राणियों के पालनहार अल्लाह के।
आयत 78
ٱلَّذِى خَلَقَنِى فَهُوَ يَهْدِينِ
ٱلَّذِى
वो जिसने
خَلَقَنِى
पैदा किया मुझे
فَهُوَ
पस वो
يَهْدِينِ
हिदायत देता है मुझे
जिसने मुझे पैदा किया और फिर वही मेरा मार्गदर्शन करता है
तफ़्सीर:
जिसने मुझे पैदा किया, फिर वही दुनिया और आख़िरत की भलाई की ओर मेरा मार्गदर्शन करता है।
आयत 79
وَٱلَّذِى هُوَ يُطْعِمُنِى وَيَسْقِينِ
وَٱلَّذِى
और वो जो
هُوَ
वो ही
يُطْعِمُنِى
वो खिलाता है मुझे
وَيَسْقِينِ
और वो पिलाता है मुझे
और वही है जो मुझे खिलाता और पिलाता है
तफ़्सीर:
और वही अकेला है जो जब मैं भूखा होता हूँ, तो मुझे खिलाता है और जब मैं प्यासा होता हूँ, तो मुझे पिलाता है।
आयत 80
وَإِذَا مَرِضْتُ فَهُوَ يَشْفِينِ
وَإِذَا
और जब
مَرِضْتُ
बीमार होता हूँ मैं
فَهُوَ
तो वो ही
يَشْفِينِ
वो शिफ़ा देता है मुझे
और जब मैं बीमार होता हूँ, तो वही मुझे अच्छा करता है
तफ़्सीर:
और जब मैं बीमार होता हूँ, तो वही अकेला मुझे बीमारी से अच्छा करता है, उसके सिवा कोई मुझे स्वास्थ्य देने वाला नहीं है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इब्राहीम अलैहिस्सलाम की तौहीद की दावत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि जिन चीज़ों की हम पूजा या पैरवी करते हैं, उन पर सोच-समझकर गौर करना चाहिए कि क्या वह वाकई हमारी मदद कर सकती हैं।
आयत 81
وَٱلَّذِى يُمِيتُنِى ثُمَّ يُحْيِينِ
وَٱلَّذِى
और वो जो
يُمِيتُنِى
मौत देगा मुझे
ثُمَّ
फिर
يُحْيِينِ
वो ज़िन्दा करेगा मुझे
और वही है जो मुझे मारेगा, फिर मुझे जीवित करेगा
तफ़्सीर:
तथा केवल वही है, जो मुझे मृत्यु देगा जब मेरी जीवन-अवधि समाप्त होगी, फिर मेरे मरने के पश्चात मुझे जीवित करेगा।
आयत 82
وَٱلَّذِىٓ أَطْمَعُ أَن يَغْفِرَ لِى خَطِيٓـَٔتِى يَوْمَ ٱلدِّينِ
وَٱلَّذِىٓ
और वो जिससे
أَطْمَعُ
मैं उम्मीद रखता हूँ
أَن
कि
يَغْفِرَ
वो बख़्श देगा
لِى
मेरे लिए
خَطِيٓـَٔتِى
ख़ता मेरी
يَوْمَ
दिन
ٱلدِّينِ
बदले के
और वही है जिससे मुझे इसकी आकांक्षा है कि बदला दिए जाने के दिन वह मेरी ख़ता माफ़ कर देगा
तफ़्सीर:
तथा वही अकेला है जिससे मैं आशा रखता हूँ कि वह बदले के दिन मेरे लिए मेरे पापों को क्षमा कर देगा।
आयत 83
رَبِّ هَبْ لِى حُكْمًۭا وَأَلْحِقْنِى بِٱلصَّـٰلِحِينَ
رَبِّ
ऐ मेरे रब
هَبْ
अता कर
لِى
मुझे
حُكْمًۭا
हुक्म/ हिकमत
وَأَلْحِقْنِى
और मिला दे मुझे
بِٱلصَّـٰلِحِينَ
साथ नेक लोगों के
ऐ मेरे रब! मुझे निर्णय-शक्ति प्रदान कर और मुझे योग्य लोगों के साथ मिला।
तफ़्सीर:
इबराहीम ने अपने रब से दुआ करते हुए कहा : ऐ मेरे रब! मुझे धर्म की समझ प्रदान कर तथा मुझे मुझसे पहले के सदाचारी नबियों से मिला दे, इस प्रकार कि मुझे उनके साथ जन्नत में प्रवेश प्रदान कर।
आयत 84
وَٱجْعَل لِّى لِسَانَ صِدْقٍۢ فِى ٱلْـَٔاخِرِينَ
وَٱجْعَل
और बना दे
لِّى
मेरे लिए
لِسَانَ
ज़बान/ नामवरी
صِدْقٍۢ
सच्चाई की
فِى
among
ٱلْـَٔاخِرِينَ
बाद वालों में
और बाद के आनेवालों में से मुझे सच्ची ख़्याति प्रदान कर
तफ़्सीर:
तथा मेरे बाद आने वाली नसलों के अंदर मेरी शुभ-चर्चा और अच्छी प्रशंसा जारी रख।
आयत 85
وَٱجْعَلْنِى مِن وَرَثَةِ جَنَّةِ ٱلنَّعِيمِ
وَٱجْعَلْنِى
और बना दे मुझे
مِن
of
وَرَثَةِ
वारिसों में से
جَنَّةِ
जन्नत के
ٱلنَّعِيمِ
नेअमत भरी
और मुझे नेमत भरी जन्नत के वारिसों में सम्मिलित कर
तफ़्सीर:
और मुझे उन लोगों में से बना दे, जो स्वर्ग के उन घरों के वारिस होंगे जिनमें तेरे मोमिन बंदे आनंद लेंगे, तथा मुझे उनका निवासी बना दे।
आयत 86
وَٱغْفِرْ لِأَبِىٓ إِنَّهُۥ كَانَ مِنَ ٱلضَّآلِّينَ
وَٱغْفِرْ
और बख़्श दे
لِأَبِىٓ
मेरे बाप को
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
है वो
مِنَ
of
ٱلضَّآلِّينَ
गुमराहों में से
और मेरे बाप को क्षमा कर दे। निश्चय ही वह पथभ्रष्ट लोगों में से है
तफ़्सीर:
तथा मेरे बाप को क्षमा कर दे, वह शिर्क के कारण सत्य मार्ग से भटके हुए लोगों में से था। इबराहीम अलैहिस्सलाम ने अपने बाप के लिए दुआ यह स्पष्ट होने से पहले की थी कि वह नरक के वासियों में से है। चुनाँचे जब उनके लिए यह स्पष्ट हो गया, तो उससे अलग होने का एलान कर दिया और (फिर) उसके लिए दुआ नहीं की।
आयत 87
وَلَا تُخْزِنِى يَوْمَ يُبْعَثُونَ
وَلَا
और ना
تُخْزِنِى
तू रुस्वा कर मुझे
يَوْمَ
जिस दिन
يُبْعَثُونَ
वो उठाए जाऐंगे
और मुझे उस दिन रुसवा न कर, जब लोग जीवित करके उठाए जाएँगे।
तफ़्सीर:
और मुझे उस दिन यातना देकर रुसवा न करना, जिस दिन लोग हिसाब के लिए पुनः जीवित किए जाएँगे।
आयत 88
يَوْمَ لَا يَنفَعُ مَالٌۭ وَلَا بَنُونَ
يَوْمَ
जिस दिन
لَا
not
يَنفَعُ
ना फ़ायदा देगा
مَالٌۭ
माल
وَلَا
और ना
بَنُونَ
बेटे
जिस दिन न माल काम आएगा और न औलाद,
तफ़्सीर:
जिस दिन न माल काम आएगा, जिसे इनसान ने संसार में एकत्र किया होगा और न संतान जिनकी मदद वह दुनिया में लिया करता था।
आयत 89
إِلَّا مَنْ أَتَى ٱللَّهَ بِقَلْبٍۢ سَلِيمٍۢ
إِلَّا
मगर
مَنْ
जो
أَتَى
आए
ٱللَّهَ
अल्लाह के पास
بِقَلْبٍۢ
साथ दिल
سَلِيمٍۢ
सलामत के
सिवाय इसके कि कोई भला-चंगा दिल लिए हुए अल्लाह के पास आया हो।"
तफ़्सीर:
सिवाय उस व्यक्ति के, जो अल्लाह के पास पाक-साफ़ दिल लेकर आया, जिसमें कोई शिर्क, कोई निफ़ाक़, कोई दिखावा तथा कोई अहंकार (दंभ) नहीं। तो ऐसा व्यक्ति अपने उस धन से लाभान्वित होगा, जिसे अल्लाह के मार्ग में खर्च किया, तथा अपनी उन बच्चों से भी जो उसके लिए दुआ करते हैं।
आयत 90
وَأُزْلِفَتِ ٱلْجَنَّةُ لِلْمُتَّقِينَ
وَأُزْلِفَتِ
और क़रीब लाई जाएगी
ٱلْجَنَّةُ
जन्नत
لِلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के लिए
और डर रखनेवालों के लिए जन्नत निकट लाई जाएगी
तफ़्सीर:
और जन्नत उन लोगों के निकट लाई जाएगी, जो अपने रब से डरने वाले हैं; उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं और उनके निषेधों से बचते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इब्राहीम अलैहिस्सलाम की दुआओं का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि हमें हमेशा अपनी इज़्ज़त और आखिरत की सलामती की दुआ मांगते रहना चाहिए।
आयत 91
وَبُرِّزَتِ ٱلْجَحِيمُ لِلْغَاوِينَ
وَبُرِّزَتِ
और ज़ाहिर कर दी जाएगी
ٱلْجَحِيمُ
जहन्नम
لِلْغَاوِينَ
गुमराहों के लिए
और भडकती आग पथभ्रष्टि लोगों के लिए प्रकट कर दी जाएगी
तफ़्सीर:
तथा सत्य-धर्म से भटके हुए पथभ्रष्ट लोगों के लिए 'मह़शर' (एकत्र होने का स्थान) में जहन्नम ज़ाहिर कर दी जाएगी।
आयत 92
وَقِيلَ لَهُمْ أَيْنَ مَا كُنتُمْ تَعْبُدُونَ
وَقِيلَ
और कहा जाएगा
لَهُمْ
उन्हें
أَيْنَ
Where
مَا
कहाँ हैं जिनकी
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْبُدُونَ
तुम इबादत करते
और उनसे कहा जाएगा, "कहाँ है वे जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते रहे हो?
तफ़्सीर:
उन्हें डाँटते हुए कहा जाएगा : कहाँ हैं वे मूर्तियाँ जिन्हें तुम पूजते थे?
आयत 93
مِن دُونِ ٱللَّهِ هَلْ يَنصُرُونَكُمْ أَوْ يَنتَصِرُونَ
مِن
Besides Allah
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
هَلْ
क्या
يَنصُرُونَكُمْ
वो मदद कर सकते हैं तुम्हारी
أَوْ
या
يَنتَصِرُونَ
वो बदला ले सकते हैं
क्या वे तुम्हारी कुछ सहायता कर रहे है या अपना ही बचाव कर सकते है?"
तफ़्सीर:
जिनकी तुम अल्लाह को छोड़कर पूजा करते थे? क्या वे तुम्हें अल्लाह की यातना से बचाकर तुम्हारी सहायता करती हैं, अथवा स्वयं अपनी ही सहायता करती हैं?
आयत 94
فَكُبْكِبُوا۟ فِيهَا هُمْ وَٱلْغَاوُۥنَ
فَكُبْكِبُوا۟
तो वो औंधे मुँह गिराए जाऐंगे
فِيهَا
उसमें
هُمْ
वो
وَٱلْغَاوُۥنَ
और बहके हुए लोग
फिर वे उसमें औंधे झोक दिए जाएँगे, वे और बहके हुए लोग
तफ़्सीर:
अतः उन्हें एक-दूसरे के ऊपर नरक में फेंक दिया जाएगा तथा उनको भी जिन्होंने उन्हें गुमराह किया था।
आयत 95
وَجُنُودُ إِبْلِيسَ أَجْمَعُونَ
وَجُنُودُ
और लश्कर
إِبْلِيسَ
इब्लीस के
أَجْمَعُونَ
सब के सब
और इबलीस की सेनाएँ, सबके सब।
तफ़्सीर:
तथा शैतानों में से इबलीस के सभी सहयोगियों को, उनमें से किसी एक को भी छोड़ा नहीं जाएगा।
आयत 96
قَالُوا۟ وَهُمْ فِيهَا يَخْتَصِمُونَ
قَالُوا۟
वो कहेंगे
وَهُمْ
जबकि वो
فِيهَا
उसमें
يَخْتَصِمُونَ
वो झगड़ रहे होंगे
वे वहाँ आपस में झगड़ते हुए कहेंगे,
तफ़्सीर:
अल्लाह के अलावा दूसरों की पूजा करने वाले तथा उन्हें अल्लाह का साझी बनाने वाले मुश्रिक अपने उन पूज्यों से झगड़ते हुए कहेंगे, जिन्हें वे अल्लाह को छोड़ पूजते थे :
आयत 97
تَٱللَّهِ إِن كُنَّا لَفِى ضَلَـٰلٍۢ مُّبِينٍ
تَٱللَّهِ
क़सम अल्लाह की
إِن
बेशक
كُنَّا
थे हम
لَفِى
surely in
ضَلَـٰلٍۢ
अलबत्ता गुमराही में
مُّبِينٍ
खुली-खुली
"अल्लाह की क़सम! निश्चय ही हम खुली गुमराही में थे
तफ़्सीर:
अल्लाह की क़सम! निश्चय हम स्पष्ट रूप से सत्य से भटक गए थे।
आयत 98
إِذْ نُسَوِّيكُم بِرَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
إِذْ
जब
نُسَوِّيكُم
हम बराबर ठहरा रहे थे तुम्हें
بِرَبِّ
साथ रब्बुल
ٱلْعَـٰلَمِينَ
आलमीन के
जबकि हम तुम्हें सारे संसार के रब के बराबर ठहरा रहे थे
तफ़्सीर:
जब हम तुम्हें सारी सृष्टि के पालनहार के समान बनाते थे, चुनाँचे हम उसकी पूजा करने की तरह तुम्हारी पूजा करते थे।
आयत 99
وَمَآ أَضَلَّنَآ إِلَّا ٱلْمُجْرِمُونَ
وَمَآ
और नहीं
أَضَلَّنَآ
गुमराह किया हमें
إِلَّا
मगर
ٱلْمُجْرِمُونَ
मुजरिमों ने
और हमें तो बस उन अपराधियों ने ही पथभ्रष्ट किया
तफ़्सीर:
हमें सत्य के मार्ग से केवल उन अपराधियों ने भटकाया, जिन्होंने हमें अल्लाह के सिवा दूसरों की इबादत की ओर बुलाया।
आयत 100
فَمَا لَنَا مِن شَـٰفِعِينَ
فَمَا
तो नहीं
لَنَا
हमारे लिए
مِن
any
شَـٰفِعِينَ
कोई सिफ़ारिशियों में से
अब न हमारा कोई सिफ़ारिशी है,
तफ़्सीर:
अब न तो हमारे लिए कोई सिफ़ारिश करने वाले हैं, जो हमारे लिए अल्लाह के पास सिफ़ारिश कर सकें कि वह हमें अपनी यातना से बचा ले।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन बुतों (झूठे मआबूदों) की बेबसी का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि दुनिया में जिन चीज़ों पर हम भरोसा करते हैं, आखिरत में वह हमारे कुछ काम नहीं आएंगी अगर वह अल्लाह के सिवा हों।
आयत 101
وَلَا صَدِيقٍ حَمِيمٍۢ
وَلَا
और ना
صَدِيقٍ
कोई दोस्त
حَمِيمٍۢ
गहरा
और न घनिष्ट मित्र
तफ़्सीर:
और न हमारा कोई सच्चा मित्र है, जो हमारा बचाव करे और हमारे लिए सिफ़ारिश करे।
आयत 102
فَلَوْ أَنَّ لَنَا كَرَّةًۭ فَنَكُونَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
فَلَوْ
पस काश
أَنَّ
ये कि (होता)
لَنَا
हमारे लिए
كَرَّةًۭ
एक बार पलटना
فَنَكُونَ
तो हम होते
مِنَ
of
ٱلْمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वालों में से
क्या ही अच्छा होता कि हमें एक बार फिर पलटना होता, तो हम मोमिनों में से हो जाते!"
तफ़्सीर:
काश हमें एक बार दुनिया के जीवन में लौटने का अवसर मिल जाता, तो हम अल्लाह पर ईमान रखने वालों में से हो जाते।
आयत 103
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
إِنَّ
यक़ीनन
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَةًۭ ۖ
अलबत्ता एक निशानी है
وَمَا
और ना
كَانَ
थे
أَكْثَرُهُم
अक्सर उनके
مُّؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
निश्चय ही इसमें एक बड़ी निशानी है। इसपर भी उनमें से अधिकरतर माननेवाले नहीं
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम की इस कहानी तथा झुठलाने वालों के अंजाम में सीख लेने वालों के लिए निश्चय सीख ग्रहण करने का महान अवसर है। और उनमें से अधिकांश लोग ईमान लाने वाले नहीं थे।
आयत 104
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ
وَإِنَّ
और बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
لَهُوَ
अलबत्ता वो
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त है
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला है
और निस्संदेह तुम्हारा रब ही है जो बड़ा प्रभुत्वशाली, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
और निःसंदेह (ऐ रसूल!) आपका पालनहार ही वह प्रभुत्वशाली है, जो अपने दुश्मनों से बदला लेता है, तथा उनमें से तौबा करने वालों पर बहुत दयालु है।
आयत 105
كَذَّبَتْ قَوْمُ نُوحٍ ٱلْمُرْسَلِينَ
كَذَّبَتْ
झुठलाया
قَوْمُ
क़ौमे
نُوحٍ
नूह ने
ٱلْمُرْسَلِينَ
रसूलों को
नूह की क़ौम ने रसूलों को झुठलाया;
तफ़्सीर:
नूह के समुदाय ने (भी) रसूलों को झुठलाया, जब उन्होंने नूह अलैहिस्सलाम को झुठला दिया।
आयत 106
إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ نُوحٌ أَلَا تَتَّقُونَ
إِذْ
जब
قَالَ
कहा
لَهُمْ
उन्हें
أَخُوهُمْ
उनके भाई
نُوحٌ
नूह ने
أَلَا
क्या नहीं
تَتَّقُونَ
तुम डरते
जबकि उनसे उनके भाई नूह ने कहा, "क्या तुम डर नहीं रखते?
तफ़्सीर:
जब उनके वंश के भाई नूह ने उनसे कहा : क्या तुम अल्लाह से डरते नहीं कि उसके भय के कारण उसके अलावा की उपासना छोड़ दो?!
आयत 107
إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ
إِنِّى
बेशक मैं
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
رَسُولٌ
रसूल हूँ
أَمِينٌۭ
अमानतदार
निस्संदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ
तफ़्सीर:
निःसंदेह मैं तुम्हारा रसूल हूँ, अल्लाह ने मुझे तुम्हारी ओर भेजा है। (मैं) अमानतदार हूँ, अल्लाह ने मेरी ओर जो वह़्य की है, उसमें कोई कमी-बेशी नहीं करता।
आयत 108
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
فَٱتَّقُوا۟
पस डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَأَطِيعُونِ
और इताअत करो मेरी
अतः अल्लाह का डर रखो और मेरा कहा मानो
तफ़्सीर:
अतः तुम अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर उससे डरो, तथा जिसका मैं तुम्हें आदेश देता हूँ और जिससे मैं तुम्हें मना करता हूँ, उसमें मेरा कहा मानो।
आयत 109
وَمَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
وَمَآ
और नहीं
أَسْـَٔلُكُمْ
मैं सवाल करता तुमसे
عَلَيْهِ
इस पर
مِنْ
any
أَجْرٍ ۖ
किसी अजर का
إِنْ
नहीं
أَجْرِىَ
अजर मेरा
إِلَّا
मगर
عَلَىٰ
ऊपर
رَبِّ
रब्बुल
ٱلْعَـٰلَمِينَ
आलमीन के
मैं इस काम के बदले तुमसे कोई बदला नहीं माँगता। मेरा बदला तो बस सारे संसार के रब के ज़िम्मे है
तफ़्सीर:
और जो कुछ मैं अपने रब की ओर से तुम्हें संदेश पहुँचाता हूँ, मैं तुमसे उसका बदला नहीं माँगता। मेरा बदला तो केवल सारी सृष्टि के रब अल्लाह के ज़िम्मे है, किसी अन्य के नहीं।
आयत 110
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
فَٱتَّقُوا۟
पस डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَأَطِيعُونِ
और इताअत करो मेरी
अतः अल्लाह का डर रखो और मेरी आज्ञा का पालन करो।"
तफ़्सीर:
अतः तुम अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर उससे डरो, तथा जिसका मैं तुम्हें आदेश देता हूँ और जिससे मैं तुम्हें मना करता हूँ, उसमें मेरा कहा मानो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नूह अलैहिस्सलाम की दावत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि दावत देने वाले को अपनी मेहनत का सिला लोगों से नहीं, अल्लाह से मांगना चाहिए।
आयत 111
۞ قَالُوٓا۟ أَنُؤْمِنُ لَكَ وَٱتَّبَعَكَ ٱلْأَرْذَلُونَ
۞ قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَنُؤْمِنُ
क्या हम ईमान लाऐं
لَكَ
तुझ पर
وَٱتَّبَعَكَ
जबकि पैरवी की है तेरी
ٱلْأَرْذَلُونَ
रज़ील / हक़ीर लोगों ने
उन्होंने कहा, "क्या हम तेरी बात मान लें, जबकि तेरे पीछे तो अत्यन्त नीच लोग चल रहे है?"
तफ़्सीर:
उनकी जाति के लोगों ने उनसे कहा : ऐ नूह! क्या हम तुझपर ईमान ले आएँ तथा जो कुछ तू लेकर आया है उसका पालन करें और उसपर अमल करने लगें, जबकि स्थिति यह है कि तुम्हारे अनुयायी सबसे हीन एवं कम हैसियत लोग हैं। उनमें श्रेष्ठ जन और अशराफिया लोग नहीं पाए जाते?!
आयत 112
قَالَ وَمَا عِلْمِى بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
قَالَ
उसने कहा
وَمَا
और क्या है
عِلْمِى
इल्म मेरा
بِمَا
इसके बारे में जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते रहते
उसने कहा, "मुझे क्या मालूम कि वे क्या करते रहे है?
तफ़्सीर:
नूह अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा : मुझे क्या पता कि ये ईमान वाले क्या कार्य करते रहे हैं? क्योंकि मैं उनका निरीक्षक नहीं हूँ कि उनके कामों की गिनती करूँ।
आयत 113
إِنْ حِسَابُهُمْ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّى ۖ لَوْ تَشْعُرُونَ
إِنْ
नहीं
حِسَابُهُمْ
हिसाब उनका
إِلَّا
मगर
عَلَىٰ
upon
رَبِّى ۖ
मेरे रब के ज़िम्मे
لَوْ
काश
تَشْعُرُونَ
तुम शऊर रखते
उनका हिसाब तो बस मेरे रब के ज़िम्मे है। क्या ही अच्छा होता कि तुममें चेतना होती।
तफ़्सीर:
उनका हिसाब तो अल्लाह ही के ज़िम्मे है, जो उनकी छिपी और खुली (सारी) बातोंं को जानता है, मेरे ज़िम्मे नहीं है। अगर तुम समझते, तो वह बात न कहते जो तुमने कही है।
आयत 114
وَمَآ أَنَا۠ بِطَارِدِ ٱلْمُؤْمِنِينَ
وَمَآ
और नहीं हूँ
أَنَا۠
मैं
بِطَارِدِ
धुतकारने वाला
ٱلْمُؤْمِنِينَ
ईमान वालों को
और मैं ईमानवालों को धुत्कारनेवाला नहीं हूँ।
तफ़्सीर:
और मैं तुम्हारी माँग को स्वीकार करते हुए ईमान वालों को अपनी सभा से निकालने वाला नहीं हूँ, ताकि तुम ईमान ले आओ।
आयत 115
إِنْ أَنَا۠ إِلَّا نَذِيرٌۭ مُّبِينٌۭ
إِنْ
नहीं हूँ
أَنَا۠
मैं
إِلَّا
मगर
نَذِيرٌۭ
डराने वाला
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
मैं तो बस स्पष्ट रूप से एक सावधान करनेवाला हूँ।"
तफ़्सीर:
मैं तो केवल स्पष्ट रूप से डराने वाला हूँ। तुम्हें अल्लाह की यातना से सावधान करता हूँ।
आयत 116
قَالُوا۟ لَئِن لَّمْ تَنتَهِ يَـٰنُوحُ لَتَكُونَنَّ مِنَ ٱلْمَرْجُومِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لَئِن
अलबत्ता अगर
لَّمْ
ना
تَنتَهِ
तू बाज़ आया
يَـٰنُوحُ
ऐ नूह
لَتَكُونَنَّ
अलबत्ता तू ज़रूर होगा
مِنَ
of
ٱلْمَرْجُومِينَ
संगसार किए जाने वालों में से
उन्होंने कहा, "यदि तू बाज़ न आया ऐ नूह, तो तू संगसार होकर रहेगा।"
तफ़्सीर:
उनके समुदाय के लोगों ने उनसे कहा : यदि तुम हमें जिस बात की ओर बुलाते हो उससे बाज़ नहीं आए, तो निश्चय तुम अपशब्द सहोगे और पथराव करके मार डाले जाओगे।
आयत 117
قَالَ رَبِّ إِنَّ قَوْمِى كَذَّبُونِ
قَالَ
कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
إِنَّ
बेशक
قَوْمِى
मेरी क़ौम ने
كَذَّبُونِ
झुठलाया है मुझे
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! मेरी क़ौम के लोगों ने तो मुझे झुठला दिया
तफ़्सीर:
नूह ने अपने पालनहार से दुआ करते हुए कहा : ऐ मेरे पालनहार! मेरे समुदाय के लोगों ने मुझे झुठला दिया और मैं तेरे पास से जो कुछ लाया हूँ उसके प्रति मुझपर विश्वास नहीं किया।
आयत 118
فَٱفْتَحْ بَيْنِى وَبَيْنَهُمْ فَتْحًۭا وَنَجِّنِى وَمَن مَّعِىَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
فَٱفْتَحْ
पस फ़ैसला कर दे
بَيْنِى
दर्मियान मेरे
وَبَيْنَهُمْ
और दर्मियान उनके
فَتْحًۭا
(हतमी)फ़ैसला
وَنَجِّنِى
और निजात दे मुझे
وَمَن
और उनको जो
مَّعِىَ
मेरे साथ हैं
مِنَ
of
ٱلْمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वालों में से
अब मेरे और उनके बीच दो टूक फ़ैसला कर दे और मुझे और जो ईमानवाले मेरे साथ है, उन्हें बचा ले!"
तफ़्सीर:
अतः मेरे और उनके बीच ऐसा फ़ैसला कर दे, जो उन्हें उनके असत्य पर अड़े रहने के कारण विनष्ट कर दे, तथा मुझे और मेरे साथ जो ईमान वाले हैं, उन्हें उससे बचा ले जिसके द्वारा तू मेरे समुदाय के काफ़िरों को नष्ट करने वाला है।
आयत 119
فَأَنجَيْنَـٰهُ وَمَن مَّعَهُۥ فِى ٱلْفُلْكِ ٱلْمَشْحُونِ
فَأَنجَيْنَـٰهُ
तो निजात दी हमने उसे
وَمَن
और उनको जो
مَّعَهُۥ
उसके साथ थे
فِى
in
ٱلْفُلْكِ
कश्ती में
ٱلْمَشْحُونِ
जो भरी हुई थी
अतः हमने उसे और जो उसके साथ भरी हुई नौका में थे बचा लिया
तफ़्सीर:
अतः हमने उनकी दुआ को स्वीकार कर लिया तथा उन्हें और उनके साथ, लोगों और जानवरों से भरी हुई नौका में सवार, ईमान वालों को बचा लिया।
आयत 120
ثُمَّ أَغْرَقْنَا بَعْدُ ٱلْبَاقِينَ
ثُمَّ
फिर
أَغْرَقْنَا
ग़र्क़ कर दिया हमने
بَعْدُ
उसके बाद
ٱلْبَاقِينَ
बाक़ी रहने वालों को
और उसके पश्चात शेष लोगों को डूबो दिया
तफ़्सीर:
फिर हमने उनके बाद नूह़ के समुदाय के बाक़ी लोगों को डुबो दिया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नूह अलैहिस्सलाम की कौम के इनकार और तूफान का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि कमज़ोर मानने वालों को ठुकराना गलत है, हक की दावत हर तबके के लिए बराबर है।
आयत 121
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَةًۭ ۖ
अलबत्ता एक निशानी है
وَمَا
और ना
كَانَ
थे
أَكْثَرُهُم
अक्सर उनके
مُّؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
निश्चय ही इसमें एक बड़ी निशानी है। इसपर भी उनमें से अधिकतर माननेवाले नहीं
तफ़्सीर:
उपर्युक्त नूह और उनके समुदाय की कहानी तथा नूह एवं उनके मोमिन साथियों के बच निकलने और उनके समुदाय के काफ़िरों के विनाश में निश्चय सीख ग्रहण करने वालों के लिए बड़ी सीख है। तथा उनमें से अधिकांश लोग ईमान लाने वाले नहीं थे।
आयत 122
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ
وَإِنَّ
और बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
لَهُوَ
अलबत्ता वो
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त है
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला है
और निस्संदेह तुम्हारा रब ही है जो बड़ा प्रभुत्वशाली, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
और निःसंदेह (ऐ रसूल!) आपका पालनहार ही वह प्रभुत्वशाली है, जो अपने दुश्मनों से बदला लेता है, तथा उनमें से तौबा करने वालों पर बहुत दयालु है।
आयत 123
كَذَّبَتْ عَادٌ ٱلْمُرْسَلِينَ
كَذَّبَتْ
झुठलाया
عَادٌ
आद ने
ٱلْمُرْسَلِينَ
रसूलों को
आद ने रसूलों को झूठलाया
तफ़्सीर:
आद जाति ने (भी) रसूलों को झुठलाया, जिस समय उन्होंने अपने रसूल हूद अलैहिस्सलाम को झुठला दिया।
आयत 124
إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ هُودٌ أَلَا تَتَّقُونَ
إِذْ
जब
قَالَ
कहा था
لَهُمْ
उनसे
أَخُوهُمْ
उनके भाई
هُودٌ
हूद ने
أَلَا
क्या नहीं
تَتَّقُونَ
तुम डरते
जबकि उनके भाई हूद ने उनसे कहा, "क्या तुम डर नहीं रखते?
तफ़्सीर:
(उस समय को) याद करो जब उनके वंश के भाई हूद ने उनसे कहा : क्या तुम अल्लाह से डरते नहीं कि उसके भय के कारण उसके अलावा की उपासना छोड़ दो?!
आयत 125
إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ
إِنِّى
बेशक मैं
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
رَسُولٌ
एक रसूल हूँ
أَمِينٌۭ
अमानतदार
मैं तो तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ
तफ़्सीर:
निःसंदेह मैं तुम्हारा रसूल हूँ, अल्लाह ने मुझे तुम्हारी ओर भेजा है। (मैं) अमानतदार हूँ, जो कुछ अल्लाह ने मुझे पहुँचाने का आदेश दिया है, उसमें कोई कमी-बेशी नहीं करता।
आयत 126
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
فَٱتَّقُوا۟
पस डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَأَطِيعُونِ
और इताअत करो मेरी
अतः तुम अल्लाह का डर रखो और मेरी आज्ञा मानो
तफ़्सीर:
अतः तुम अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर उससे डरो, तथा जिसका मैं तुम्हें आदेश देता हूँ और जिससे मैं तुम्हें मना करता हूँ, उसमें मेरा कहा मानो।
आयत 127
وَمَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
وَمَآ
और नहीं
أَسْـَٔلُكُمْ
मैं सवाल करता तुम से
عَلَيْهِ
इस पर
مِنْ
any
أَجْرٍ ۖ
किसी अजर का
إِنْ
नहीं
أَجْرِىَ
अजर मेरा
إِلَّا
मगर
عَلَىٰ
ऊपर
رَبِّ
रब्बुल
ٱلْعَـٰلَمِينَ
आलमीन के
मैं इस काम पर तुमसे कोई प्रतिदान नहीं माँगता। मेरा प्रतिदान तो बस सारे संसार के रब के ज़ि्म्मे है।
तफ़्सीर:
और जो कुछ मैं अपने रब की ओर से तुम्हें संदेश पहुँचाता हूँ, मैं तुमसे उसका बदला नहीं माँगता। मेरा बदला तो केवल सारी सृष्टि के रब अल्लाह के ज़िम्मे है, किसी अन्य के नहीं।
आयत 128
أَتَبْنُونَ بِكُلِّ رِيعٍ ءَايَةًۭ تَعْبَثُونَ
أَتَبْنُونَ
क्या तुम बनाते हो
بِكُلِّ
हर
رِيعٍ
ऊँची जगह पर
ءَايَةًۭ
एक निशानी (यादगार)
تَعْبَثُونَ
अबस/ बेकार काम करते हुए
क्या तुम प्रत्येक उच्च स्थान पर व्यर्थ एक स्मारक का निर्माण करते रहोगे?
तफ़्सीर:
क्या तुम प्रत्येक ऊँचे स्थान पर व्यर्थ में स्मारक भवन का निर्माण करते हो, जबकि उसका इस दुनिया या आख़िरत में तुम्हें कोई फ़ायदा नहीं होता?!
आयत 129
وَتَتَّخِذُونَ مَصَانِعَ لَعَلَّكُمْ تَخْلُدُونَ
وَتَتَّخِذُونَ
और तुम बनाते हो
مَصَانِعَ
महल्लात
لَعَلَّكُمْ
शायद कि तुम
تَخْلُدُونَ
तुम हमेशा रहोगे
और भव्य महल बनाते रहोगे, मानो तुम्हें सदैव रहना है?
तफ़्सीर:
और तुम क़िले और महलें बनाते हो, मानो तुम इस दुनिया में हमेशा के लिए रहने वाले हो और यहाँ से तुम्हें जाना नहीं है।
आयत 130
وَإِذَا بَطَشْتُم بَطَشْتُمْ جَبَّارِينَ
وَإِذَا
और जब
بَطَشْتُم
पकड़ते हो तुम
بَطَشْتُمْ
पकड़ते हो तुम
جَبَّارِينَ
सरकश हो कर
और जब किसी पर हाथ डालते हो तो बिलकुल निर्दय अत्याचारी बनकर हाथ डालते हो!
तफ़्सीर:
और जब तुम क़त्ल करने अथवा मारने के लिए किसी पर हमला करते हो, तो निर्दय और बे-रहम होकर हमला करते हो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
हूद अलैहिस्सलाम और आद कौम के वाकिये का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि बड़ी-बड़ी इमारतें और ताकत बनाना ही कामयाबी नहीं, असली कामयाबी अल्लाह की इताअत में है।
आयत 131
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
فَٱتَّقُوا۟
पस डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَأَطِيعُونِ
और इताअत करो मेरी
अतः अल्लाह का डर रखो और मेरी आज्ञा का पालन करो
तफ़्सीर:
अतः तुम अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर उससे डरो, तथा जिसका मैं तुम्हें आदेश देता हूँ और जिससे मैं तुम्हें मना करता हूँ, उसमें मेरा कहा मानो।
आयत 132
وَٱتَّقُوا۟ ٱلَّذِىٓ أَمَدَّكُم بِمَا تَعْلَمُونَ
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱلَّذِىٓ
उससे जिस ने
أَمَدَّكُم
मदद की तुम्हारी
بِمَا
साथ उसके जो
تَعْلَمُونَ
तुम जानते हो
उसका डर रखो जिसने तुम्हें वे चीज़े पहुँचाई जिनको तुम जानते हो
तफ़्सीर:
और तुम अल्लाह के प्रकोप से डरो, जिसने तुम्हें अपनी नेमतों में से वे चीज़ें प्रदान कीं, जिन्हें तुम जानते हो।
आयत 133
أَمَدَّكُم بِأَنْعَـٰمٍۢ وَبَنِينَ
أَمَدَّكُم
उसने मदद की तुम्हारी
بِأَنْعَـٰمٍۢ
साथ मवेशियों
وَبَنِينَ
और बेटों के
उसने तुम्हारी सहायता की चौपायों और बेटों से,
तफ़्सीर:
उसने तुम्हें मवेशी दिए, तथा तुम्हें बच्चे प्रदान किए।
आयत 134
وَجَنَّـٰتٍۢ وَعُيُونٍ
وَجَنَّـٰتٍۢ
और बाग़ों
وَعُيُونٍ
और चश्मों के
और बाग़ो और स्रोतो से
तफ़्सीर:
तथा उसने तुम्हें बाग़ और बहते जल स्रोत प्रदान किए।
आयत 135
إِنِّىٓ أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍۢ
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَخَافُ
मैं डरता हूँ
عَلَيْكُمْ
तुम पर
عَذَابَ
अज़ाब से
يَوْمٍ
(of) a Day
عَظِيمٍۢ
बड़े दिन के
निश्चय ही मुझे तुम्हारे बारे में एक बड़े दिन की यातना का भय है।"
तफ़्सीर:
निश्चय मैं (ऐ मेरी जाति के लोगो!) तुमपर एक महान दिन की यातना से डरता हूँ, जो कि क़ियामत का दिन है।
आयत 136
قَالُوا۟ سَوَآءٌ عَلَيْنَآ أَوَعَظْتَ أَمْ لَمْ تَكُن مِّنَ ٱلْوَٰعِظِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
سَوَآءٌ
बराबर है
عَلَيْنَآ
हम पर
أَوَعَظْتَ
ख़्वाह नसीहत करे तू
أَمْ
या
لَمْ
ना
تَكُن
तू हो
مِّنَ
of
ٱلْوَٰعِظِينَ
नसीहत करने वालों में से
उन्होंने कहा, "हमारे लिए बराबर है चाहे तुम नसीहत करो या नसीहत करने वाले न बनो।
तफ़्सीर:
उनकी जाति के लोगों ने उनसे कहा : तुम्हारा हमें सदुपदेश देना और न देना दोनों बराबर है। क्योंकि हम तुमपर कदापि ईमान नहीं लाएँगे और जिसपर हम क़ायम हैं, उससे हरगिज़ पीछे नहीं हटेंगे।
आयत 137
إِنْ هَـٰذَآ إِلَّا خُلُقُ ٱلْأَوَّلِينَ
إِنْ
नहीं है
هَـٰذَآ
ये
إِلَّا
मगर
خُلُقُ
आदत
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों की
यह तो बस पहले लोगों की पुरानी आदत है
तफ़्सीर:
यह तो पहले ही लोगों का धर्म, उनके रीति-रिवाज और आचरण हैं।
आयत 138
وَمَا نَحْنُ بِمُعَذَّبِينَ
وَمَا
और नहीं हैं
نَحْنُ
हम
بِمُعَذَّبِينَ
अज़ाब दिए जाने वाले
और हमें कदापि यातना न दी जाएगी।"
तफ़्सीर:
और हम कदापि यातना दिए जाने वाले नहीं हैं।
आयत 139
فَكَذَّبُوهُ فَأَهْلَكْنَـٰهُمْ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
فَكَذَّبُوهُ
तो उन्होंने झुठलाया उसे
فَأَهْلَكْنَـٰهُمْ ۗ
फिर हलाक कर दिया हमने उन्हें
إِنَّ
यक़ीनन
فِى
in
ذَٰلِكَ
इस में
لَـَٔايَةًۭ ۖ
अलबत्ता एक निशानी है
وَمَا
और ना
كَانَ
थे
أَكْثَرُهُم
अक्सर उनके
مُّؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
अन्ततः उन्होंने उन्हें झुठला दिया जो हमने उनको विनष्ट कर दिया। बेशक इसमें एक बड़ी निशानी है। इसपर भी उनमें से अधिकतर माननेवाले नहीं
तफ़्सीर:
उन्होंने अपने नबी हूद अलैहिस्सलाम को झुठलाना जारी रखा, इसलिए हमने उनके झुठलाने के कारण उन्हें तेज़ आँधी से नष्ट कर दिया। इस विनाश में पाठ ग्रहण करने वालों के लिए निश्चय महान पाठ है। परंतु उनमें से अधिकांश लोग ईमान लाने वाले नहीं थे।
आयत 140
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ
وَإِنَّ
और बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
لَهُوَ
अलबत्ता वो
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त है
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला है
और बेशक तुम्हारा रब ही है, जो बड़ा प्रभुत्वशाली, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
और निःसंदेह (ऐ रसूल!) आपका पालनहार ही वह प्रभुत्वशाली है, जो अपने दुश्मनों से बदला लेता है, तथा उनमें से तौबा करने वालों पर बहुत दयालु है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
आद कौम की तबाही का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि नसीहत करने वालों की बात न मानने वाली कौमें आखिरकार खुद अपने नुकसान में पड़ती हैं।
आयत 141
كَذَّبَتْ ثَمُودُ ٱلْمُرْسَلِينَ
كَذَّبَتْ
झुठलाया
ثَمُودُ
समूद ने
ٱلْمُرْسَلِينَ
रसूलों को
समूद ने रसूलों को झुठलाया,
तफ़्सीर:
समूद ने (भी) अपने नबी सालेह अलैहिस्सलाम को झुठलाकर समस्त रसूलों को झुठला दिया।
आयत 142
إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ صَـٰلِحٌ أَلَا تَتَّقُونَ
إِذْ
जब
قَالَ
कहा था
لَهُمْ
उनसे
أَخُوهُمْ
उनके भाई
صَـٰلِحٌ
सालेह ने
أَلَا
क्या नहीं
تَتَّقُونَ
तुम डरते
जबकि उसके भाई सालेह ने उससे कहा, "क्या तुम डर नहीं रखते?
तफ़्सीर:
जब उनके वंश के भाई सालेह ने उनसे कहा : क्या तुम अल्लाह से डरते नहीं कि उसके भय के कारण उसके अलावा की उपासना छोड़ दो?!
आयत 143
إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ
إِنِّى
बेशक मैं
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
رَسُولٌ
रसूल हूँ
أَمِينٌۭ
अमानतदार
निस्संदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ
तफ़्सीर:
निःसंदेह मैं तुम्हारा रसूल हूँ, अल्लाह ने मुझे तुम्हारी ओर भेजा है। (मैं) अल्लाह का संदेश पहुँचाने के कार्य में अमानतदार हूँ, उसमें कोई कमी-बेशी नहीं करता।
आयत 144
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
فَٱتَّقُوا۟
पस डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَأَطِيعُونِ
और इताअत करो मेरी
अतः तुम अल्लाह का डर रखो और मेरी बात मानो
तफ़्सीर:
अतः तुम अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर उससे डरो, तथा जो मैंने तुम्हें आदेश दिया है और जो तुम्हें करने से मना किया है, उसमें मेरा कहा मानो।
आयत 145
وَمَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
وَمَآ
और नहीं
أَسْـَٔلُكُمْ
मैं सवाल करता तुम से
عَلَيْهِ
इस पर
مِنْ
any
أَجْرٍ ۖ
किसी अजर का
إِنْ
नहीं
أَجْرِىَ
अजर मेरा
إِلَّا
मगर
عَلَىٰ
ऊपर
رَبِّ
रब्बुल
ٱلْعَـٰلَمِينَ
आलमीन के
मैं इस काम पर तुमसे कोई बदला नहीं माँगता। मेरा बदला तो बस सारे संसार के रब के ज़िम्मे है
तफ़्सीर:
और जो कुछ मैं अपने रब की ओर से तुम्हें संदेश पहुँचाता हूँ, मैं तुमसे उसका बदला नहीं माँगता। मेरा बदला तो केवल सारी सृष्टि के रब अल्लाह के ज़िम्मे है, किसी अन्य के नहीं।
आयत 146
أَتُتْرَكُونَ فِى مَا هَـٰهُنَآ ءَامِنِينَ
أَتُتْرَكُونَ
क्या तुम छोड़ दिए जाओगे
فِى
in
مَا
उनमें जो
هَـٰهُنَآ
यहाँ हैं
ءَامِنِينَ
अमन से रहने वाले
क्या तुम यहाँ जो कुछ है उसके बीच, निश्चिन्त छोड़ दिए जाओगे,
तफ़्सीर:
क्या तुम यह इच्छा रखते हो कि यहाँ की सुख-सुविधाओं और नेमतों में निश्चिंत छोड़ दिए जाओगे, तुम डर से पीड़ित नहीं होगे?!
आयत 147
فِى جَنَّـٰتٍۢ وَعُيُونٍۢ
فِى
In
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ों में
وَعُيُونٍۢ
और चश्मों
बाग़ों और स्रोतों
तफ़्सीर:
बाग़ों तथा बहते जल स्राेतों में।
आयत 148
وَزُرُوعٍۢ وَنَخْلٍۢ طَلْعُهَا هَضِيمٌۭ
وَزُرُوعٍۢ
और खेतों में
وَنَخْلٍۢ
और खजूर के दरख़्त
طَلْعُهَا
ख़ोशे उनके
هَضِيمٌۭ
नर्म व नाज़ुक
और खेतों और उन खजूरों में जिनके गुच्छे तरो ताज़ा और गुँथे हुए है?
तफ़्सीर:
तथा खेतों और खजूर के बागों में, जिनके फल मुलायम और पके हुए हैं।
आयत 149
وَتَنْحِتُونَ مِنَ ٱلْجِبَالِ بُيُوتًۭا فَـٰرِهِينَ
وَتَنْحِتُونَ
और तुम तराश्ते हो
مِنَ
of
ٱلْجِبَالِ
पहाड़ों में से
بُيُوتًۭا
घरों को
فَـٰرِهِينَ
ख़ूब माहिर बनकर
तुम पहाड़ों को काट-काटकर इतराते हुए घर बनाते हो?
तफ़्सीर:
और तुम पर्वतों को काटकर रहने के लिए घर बनाते हो और तुम उनको तराशने में कुशल हो।
आयत 150
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
فَٱتَّقُوا۟
पस डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَأَطِيعُونِ
और इताअत करो मेरी
अतः अल्लाह का डर रखो और मेरी आज्ञा का पालन करो
तफ़्सीर:
अतः तुम अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर उससे डरो, तथा जो मैंने तुम्हें आदेश दिया है और जो तुम्हें करने से मना किया है, उसमें मेरा कहा मानो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सालेह अलैहिस्सलाम और समूद कौम के वाकिये का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अमन और सहूलतों में रहते हुए भी नाशुक्री करना कौम को गुमराही की तरफ ले जाता है।
आयत 151
وَلَا تُطِيعُوٓا۟ أَمْرَ ٱلْمُسْرِفِينَ
وَلَا
और ना
تُطِيعُوٓا۟
तुम इताअत करो
أَمْرَ
हुक्म की
ٱلْمُسْرِفِينَ
हद से बढ़ने वालों के
और उन हद से गुज़र जानेवालों की आज्ञा का पालन न करो,
तफ़्सीर:
तथा उन लोगों के आदेश का पालन न करो, जो पाप करके अपने ऊपर अत्याचार करने वाले हैं।
आयत 152
ٱلَّذِينَ يُفْسِدُونَ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا يُصْلِحُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जो
يُفْسِدُونَ
फ़साद करते हैं
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَلَا
और नहीं
يُصْلِحُونَ
वो इस्लाह करते
जो धरती में बिगाड़ पैदा करते है, और सुधार का काम नहीं करते।"
तफ़्सीर:
जो पाप फैलाकर धरती में बिगाड़ पैदा करते हैं और अल्लाह का आज्ञापालन करके अपने आपको सुधारने का काम नहीं करते हैं।
आयत 153
قَالُوٓا۟ إِنَّمَآ أَنتَ مِنَ ٱلْمُسَحَّرِينَ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
إِنَّمَآ
बेशक
أَنتَ
तू
مِنَ
(are) of
ٱلْمُسَحَّرِينَ
सहरज़दा लोगों में से है
उन्होंने कहा, "तू तो बस जादू का मारा हुआ है।
तफ़्सीर:
उसकी जाति के लोगों ने कहा : तू तो उन लोगों में से है, जिनपर बार-बार जादू किया गया है। यहाँ तक कि जादू उनके दिमाग पर हावी हो गया है और उसे निष्क्रिय कर दिया है।
आयत 154
مَآ أَنتَ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُنَا فَأْتِ بِـَٔايَةٍ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ
مَآ
नहीं
أَنتَ
तू
إِلَّا
मगर
بَشَرٌۭ
एक इन्सान
مِّثْلُنَا
हमारे जैसा
فَأْتِ
तो ले आ
بِـَٔايَةٍ
कोई निशानी
إِن
अगर
كُنتَ
है तू
مِنَ
(are) of
ٱلصَّـٰدِقِينَ
सच्चों में से
तू बस हमारे ही जैसा एक आदमी है। यदि तू सच्चा है, तो कोई निशानी ले आ।"
तफ़्सीर:
तू केवल हमारे ही जैसा एक मनुष्य है। इसलिए तुझे हमारे ऊपर कोई विशेषता हासिल नहीं है कि तू रसूल बन सके। अतः यदि तुम अपने रसूल होने के दावे में सच्चे हो, तो कोई ऐसी निशानी ले आओ, जो प्रमाणित करे कि तुम रसूल हो।
आयत 155
قَالَ هَـٰذِهِۦ نَاقَةٌۭ لَّهَا شِرْبٌۭ وَلَكُمْ شِرْبُ يَوْمٍۢ مَّعْلُومٍۢ
قَالَ
उसने कहा
هَـٰذِهِۦ
ये है
نَاقَةٌۭ
एक ऊँटनी
لَّهَا
उसके लिए है
شِرْبٌۭ
पानी पीने की बारी
وَلَكُمْ
और तुम्हारे लिए है
شِرْبُ
पानी पीने की बारी
يَوْمٍۢ
दिन
مَّعْلُومٍۢ
मालूम के
उसने कहा, "यह ऊँटनी है। एक दिन पानी पीने की बारी इसकी है और एक नियत दिन की बारी पानी लेने की तुम्हारी है
तफ़्सीर:
सालेह अलैहिस्सलाम ने (जिन्हें अल्लाह ने एक निशानी दी थी, जो एक ऊँटनी थी जिसे अल्लाह ने चट्टान से निकाला था) उनसे कहा : यह ऊँटनी है जिसे देखा और छुआ जा सकता है। इसके लिए पानी का एक हिस्सा है, और तुम्हारे लिए भी एक ज्ञात हिस्सा है। यह उस दिन पानी नहीं पिएगी, जिस दिन तुम्हारा हिस्सा है और जिस दिन उसका हिस्सा है, उस दिन तुम पानी नही पिओगे।
आयत 156
وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُوٓءٍۢ فَيَأْخُذَكُمْ عَذَابُ يَوْمٍ عَظِيمٍۢ
وَلَا
और ना
تَمَسُّوهَا
तुम छूना उसे
بِسُوٓءٍۢ
बुराई से
فَيَأْخُذَكُمْ
वरना पकड़ लेगा तुम्हें
عَذَابُ
अज़ाब
يَوْمٍ
(of) a Day
عَظِيمٍۢ
बड़े दिन का
तकलीफ़ पहुँचाने के लिए इसे हाथ न लगाना, अन्यथा एक बड़े दिन की यातना तुम्हें आ लेगी।"
तफ़्सीर:
तथा तुम इसे हानि पहुँचाने जैसे कि हत्या करने या मारने-पीटने की नीयत से हाथ न लगाना, अन्यथा इसके कारण तुम्हें अल्लाह की ओर से ऐसी यातना आ पकड़ेगी जो तुम्हें नष्ट कर देगी एक ऐसे दिन में, जो उसमें तुमपर उतरने वाली विपत्ति के कारण बहुत भयानक होगा।
आयत 157
فَعَقَرُوهَا فَأَصْبَحُوا۟ نَـٰدِمِينَ
فَعَقَرُوهَا
तो उन्होंने कूँचें काट डालीं उसकी
فَأَصْبَحُوا۟
तो वो हो गए
نَـٰدِمِينَ
नादिम
किन्तु उन्होंने उसकी कूचें काट दी। फिर पछताते रह गए
तफ़्सीर:
सो वे उसकी हत्या करने पर सहमत हो गए और उनमें से सबसे अभागे व्यक्ति ने उसे मार डाला। फिर वे अपने किए पर पछताने लगे, जब उन्हें पता चला कि यातना अनिवार्य रूप से उनपर आने वाली है। लेकिन यातना देख लेने के समय पछताने से कोई लाभ नहीं होता।
आयत 158
فَأَخَذَهُمُ ٱلْعَذَابُ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
فَأَخَذَهُمُ
फिर पकड़ लिया उन्हें
ٱلْعَذَابُ ۗ
अज़ाब ने
إِنَّ
यक़ीनन
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَةًۭ ۖ
अलबत्ता एक निशानी है
وَمَا
और ना
كَانَ
थे
أَكْثَرُهُم
अक्सर उनके
مُّؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
अन्ततः यातना ने उन्हें आ दबोचा। निश्चय ही इसमें एक बड़ी निशानी है। इसपर भी उनमें से अधिकतर माननेवाले नहीं
तफ़्सीर:
अंततः उन्हें उस यातना ने पकड़ लिया, जिसका उन्हें वादा किया गया था, जो भूकंप और तेज़ चीख थी। सालेह तथा उसकी जाति की इस कहानी में सीख ग्रहण करने वालों के लिए निश्चय बड़ी सीख है। तथा उनमें से अधिकतर ईमान लाने वाले नहीं थे।
आयत 159
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ
وَإِنَّ
और बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
لَهُوَ
अलबत्ता वो
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त है
ٱلرَّحِيمُ
बहुत रहम फ़रमाने वाला है
और निस्संदेह तुम्हारा रब ही है जो बड़ा प्रभुत्वशाली, अत्यन्त दयाशील है
तफ़्सीर:
और निःसंदेह (ऐ रसूल!) आपका पालनहार ही वह प्रभुत्वशाली है, जो अपने दुश्मनों से बदला लेता है, तथा उनमें से तौबा करने वालों पर बहुत दयालु है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
समूद कौम की तबाही का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि हद से बढ़ने वालों की बात मानने की बजाय हक की तरफ बुलाने वालों की सुननी चाहिए।
आयत 160
كَذَّبَتْ قَوْمُ لُوطٍ ٱلْمُرْسَلِينَ
كَذَّبَتْ
झुठलाया
قَوْمُ
क़ौमे
لُوطٍ
लूत ने
ٱلْمُرْسَلِينَ
रसूलों को
लूत की क़ौम के लोगों ने रसूलों को झुठलाया;
तफ़्सीर:
लूत अलैहिस्सलाम की जाति ने (भी) अपने नबी लूत अलैहिस्सलाम को झुठलाकर समस्त रसूलों को झुठला दिया।
आयत 161
إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ لُوطٌ أَلَا تَتَّقُونَ
إِذْ
जब
قَالَ
कहा
لَهُمْ
उन्हें
أَخُوهُمْ
उनके भाई
لُوطٌ
लूत ने
أَلَا
क्या नहीं
تَتَّقُونَ
तुम डरते
जबकि उनके भाई लूत ने उनसे कहा, "क्या तुम डर नहीं रखते?
तफ़्सीर:
जब उनके वंश के भाई लूत ने उनसे कहा : क्या तुम अल्लाह से डरते नहीं कि उसके भय के कारण उसके साथ किसी को साझी ठहराना छोड़ दो?!
आयत 162
إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ
إِنِّى
बेशक मैं
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
رَسُولٌ
एक रसूल हूँ
أَمِينٌۭ
अमानतदार
मैं तो तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ
तफ़्सीर:
निःसंदेह मैं तुम्हारा रसूल हूँ, अल्लाह ने मुझे तुम्हारी ओर भेजा है। (मैं) अल्लाह का संदेश पहुँचाने के कार्य में अमानतदार हूँ, उसमें कोई कमी-बेशी नहीं करता।
आयत 163
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
فَٱتَّقُوا۟
पस डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَأَطِيعُونِ
और इताअत करो मेरी
अतः अल्लाह का डर रखो और मेरी आज्ञा का पालन करो
तफ़्सीर:
अतः तुम अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर उससे डरो, तथा जिसका मैं तुम्हें आदेश देता हूँ और जिससे मैं तुम्हें मना करता हूँ, उसमें मेरा कहा मानो।
आयत 164
وَمَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
وَمَآ
और नहीं
أَسْـَٔلُكُمْ
मैं सवाल करता तुम से
عَلَيْهِ
इस पर
مِنْ
any
أَجْرٍ ۖ
किसी अजर का
إِنْ
नहीं
أَجْرِىَ
अजर मेरा
إِلَّا
मगर
عَلَىٰ
ऊपर
رَبِّ
रब्बुल
ٱلْعَـٰلَمِينَ
आलमीन के
मैं इस काम पर तुमसे कोई प्रतिदान नहीं माँगता, मेरा प्रतिदान तो बस सारे संसार के रब के ज़िम्मे है
तफ़्सीर:
और जो कुछ मैं अपने रब की ओर से तुम्हें संदेश पहुँचाता हूँ, मैं तुमसे उसका बदला नहीं माँगता। मेरा बदला तो केवल सारी सृष्टि के रब अल्लाह के ज़िम्मे है, किसी अन्य के नहीं।
आयत 165
أَتَأْتُونَ ٱلذُّكْرَانَ مِنَ ٱلْعَـٰلَمِينَ
أَتَأْتُونَ
क्या तुम आते हो
ٱلذُّكْرَانَ
मर्दों के पास
مِنَ
among
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों में से
क्या सारे संसारवालों में से तुम ही ऐसे हो जो पुरुषों के पास जाते हो,
तफ़्सीर:
क्या तुम लोगों में से पुरुषों के साथ गुदा संभोग करते हाे?!
आयत 166
وَتَذَرُونَ مَا خَلَقَ لَكُمْ رَبُّكُم مِّنْ أَزْوَٰجِكُم ۚ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌ عَادُونَ
وَتَذَرُونَ
और तुम छोड़ देते हो
مَا
जो
خَلَقَ
पैदा किया
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
رَبُّكُم
तुम्हारे रब ने
مِّنْ
of
أَزْوَٰجِكُم ۚ
तुम्हारी बीवियों में से
بَلْ
बल्कि
أَنتُمْ
तुम
قَوْمٌ
लोग हो
عَادُونَ
हद से गुज़रने वाले
और अपनी पत्नियों को, जिन्हें तुम्हारे रब ने तुम्हारे लिए पैदा किया, छोड़ देते हो? इतना ही नहीं, बल्कि तुम हद से आगे बढ़े हुए लोग हो।"
तफ़्सीर:
और तुम अपनी पत्नियों की अगली शर्मगाहों में संभोग करना छोड़ देते हो, जिन्हें अल्लाह ने इसलिए बनाया है ताकि तुम उनसे अपनी वासनाओं को पूरा करो?! बल्कि इस घृणित विकृति से तुम अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करने वाले हो।
आयत 167
قَالُوا۟ لَئِن لَّمْ تَنتَهِ يَـٰلُوطُ لَتَكُونَنَّ مِنَ ٱلْمُخْرَجِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لَئِن
अलबत्ता अगर
لَّمْ
ना
تَنتَهِ
तू बाज़ आया
يَـٰلُوطُ
ऐ लूत
لَتَكُونَنَّ
अलबत्ता तू ज़रूर हो जाएगा
مِنَ
of
ٱلْمُخْرَجِينَ
निकाले जाने वालों में से
उन्होंने कहा, "यदि तू बाज़ न आया, ऐ लतू! तो तू अवश्य ही निकाल बाहर किया जाएगा।"
तफ़्सीर:
उनकी जाति के लोगों ने उनसे कहा : ऐ लूत! यदि तुम हमें इस कार्य से मना करने और इसपर हमारी निंदा करने से बाज़ नहीं आए, तो तुम्हें तथा तुम्हारे संगियों को हमारे गाँव से निकाल दिया जाएगा।
आयत 168
قَالَ إِنِّى لِعَمَلِكُم مِّنَ ٱلْقَالِينَ
قَالَ
उसने कहा
إِنِّى
बेशक मैं
لِعَمَلِكُم
तुम्हारे अमल से
مِّنَ
of
ٱلْقَالِينَ
बेज़ार होने वालों में से हूँ
उसने कहा, "मैं तुम्हारे कर्म से अत्यन्त विरक्त हूँ।
तफ़्सीर:
लूत अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा : मैं तुम्हारे इस कार्य से जिसे तुम करते हो, सख़्त नफ़रत और घृणा करने वालों में से हूँ।
आयत 169
رَبِّ نَجِّنِى وَأَهْلِى مِمَّا يَعْمَلُونَ
رَبِّ
ऐ मेरे रब
نَجِّنِى
निजात दे मुझे
وَأَهْلِى
और मेरे घर वालों को
مِمَّا
उससे जो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते हैं
ऐ मेरे रब! मुझे और मेरे लोगों को, जो कुछ ये करते है उसके परिणाम से, बचा ले।"
तफ़्सीर:
उन्होंने अपने पालनहार से दुआ करते हुए कहा : ऐ मेरे पालनहार! तू मुझे और मेरे परिवार को उस यातना से बचा ले, जो इन लोगों पर इनके द्वारा किए जाने वाले घिनौने कार्य के कारण आने वाली है।
आयत 170
فَنَجَّيْنَـٰهُ وَأَهْلَهُۥٓ أَجْمَعِينَ
فَنَجَّيْنَـٰهُ
तो निजात दी हमने उसे
وَأَهْلَهُۥٓ
और उसके घर वालों को
أَجْمَعِينَ
सब के सबको
अन्ततः हमने उसे और उसके सारे लोगों को बचा लिया;
तफ़्सीर:
तो हमने उनकी दुआ स्वीकार कर ली तथा उन्हें और उनके पूरे परिवार को बचा लिया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
लूत अलैहिस्सलाम की कौम के वाकिये का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि समाज में फैली बेहयाई के खिलाफ आवाज़ उठाना ज़रूरी है, चाहे अकेले ही क्यों न उठानी पड़े।
आयत 171
إِلَّا عَجُوزًۭا فِى ٱلْغَـٰبِرِينَ
إِلَّا
सिवाए
عَجُوزًۭا
एक बुढ़िया के
فِى
(was) among
ٱلْغَـٰبِرِينَ
जो पीछे रह जाने वालों में थी
सिवाय एक बुढ़िया के जो पीछे रह जानेवालों में थी
तफ़्सीर:
उनकी पत्नी को छोड़कर। क्योंकि वह काफ़िर थी। अतः वह भी नष्ट होने वालों में से थी।
आयत 172
ثُمَّ دَمَّرْنَا ٱلْـَٔاخَرِينَ
ثُمَّ
फिर
دَمَّرْنَا
तबाह कर दिया हमने
ٱلْـَٔاخَرِينَ
दूसरों को
फिर शेष दूसरे लोगों को हमने विनष्ट कर दिया।
तफ़्सीर:
फिर जब लूत और उनके परिवार ने (सदूम) गाँव छोड़ दिया, तो हमने उनके बाद उनके शेष रह जाने वाले लोगों को बुरी तरह से नष्ट कर दिया।
आयत 173
وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِم مَّطَرًۭا ۖ فَسَآءَ مَطَرُ ٱلْمُنذَرِينَ
وَأَمْطَرْنَا
और बरसाई हमने
عَلَيْهِم
उन पर
مَّطَرًۭا ۖ
एक बारिश
فَسَآءَ
तो बहुत बुरी थी
مَطَرُ
बारिश
ٱلْمُنذَرِينَ
डराए जाने वालों की
और हमने उनपर एक बरसात बरसाई। और यह चेताए हुए लोगों की बहुत ही बुरी वर्षा थी
तफ़्सीर:
और हमने उनपर बारिश बरसाने की तरह आकाश से पत्थर बरसाए। तो उन लोगों की बारिश बहुत बुरी थी, जिन्हें लूत अलैहिस्सलाम डराते थे और उन्हें चेतावनी देते थे कि अगर वे अपने बुरे कामों में लगे रहे, तो उन्हें अल्लाह की सज़ा भुगतनी पड़ेगी।
आयत 174
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
إِنَّ
यक़ीनन
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَةًۭ ۖ
अलबत्ता एक निशानी है
وَمَا
और ना
كَانَ
थे
أَكْثَرُهُم
अक्सर उनके
مُّؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
निश्चय ही इसमें एक बड़ी निशानी है। इसपर भी उनमें से अधिकतर माननेवाले नहीं
तफ़्सीर:
कुकर्म के कारण लूत की जाति पर उतरने वाले उपर्युक्त अज़ाब में, सीख ग्रहण करने वालों के लिए निश्चय बड़ी सीख है। और उनमें से अधिकांश लोग ईमान लाने वाले नहीं थे।
आयत 175
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ
وَإِنَّ
और बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
لَهُوَ
अलबत्ता वो
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त है
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला है
और निश्चय ही तुम्हारा रब बड़ा प्रभुत्वशाली, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
और निःसंदेह (ऐ रसूल!) आपका पालनहार ही वह प्रभुत्वशाली है, जो अपने दुश्मनों से बदला लेता है, तथा उनमें से तौबा करने वालों पर बहुत दयालु है।
आयत 176
كَذَّبَ أَصْحَـٰبُ لْـَٔيْكَةِ ٱلْمُرْسَلِينَ
كَذَّبَ
झुठलाया
أَصْحَـٰبُ
(the) companions
لْـَٔيْكَةِ
ऐका (जंगल) वालों ने
ٱلْمُرْسَلِينَ
रसूलों को
अल-ऐकावालों ने रसूलों को झुठलाया
तफ़्सीर:
घने-पेड़ वाली बस्ती के लोगों ने रसूलों को झुठलाया, जब उन्होंने अपने रसूल शुऐब अलैहिस्सलाम को झुठला दिया।
आयत 177
إِذْ قَالَ لَهُمْ شُعَيْبٌ أَلَا تَتَّقُونَ
إِذْ
जब
قَالَ
कहा
لَهُمْ
उन्हें
شُعَيْبٌ
शुऐब ने
أَلَا
क्या नहीं
تَتَّقُونَ
तुम डरते
जबकि शुऐब ने उनसे कहा, "क्या तुम डर नहीं रखते?
तफ़्सीर:
जब उनके नबी शुऐब ने उनसे कहा : क्या तुम अल्लाह से डरते नहीं कि उसके भय से किसी को उसका साझी बनाना छोड़ दो?!
आयत 178
إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ
إِنِّى
बेशक मैं
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
رَسُولٌ
एक रसूल हूँ
أَمِينٌۭ
अमानतदार
मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ
तफ़्सीर:
निःसंदेह मैं तुम्हारा रसूल हूँ, अल्लाह ने मुझे तुम्हारी ओर भेजा है। (मैं) अल्लाह का संदेश पहुँचाने के कार्य में अमानतदार हूँ। जो कुछ उसने मुझे पहुँचाने का आदेश दिया है, उसमें कोई कमी-बेशी नहीं करता।
आयत 179
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
فَٱتَّقُوا۟
पस डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَأَطِيعُونِ
और इताअत करो मेरी
अतः अल्लाह का डर रखो और मेरी आज्ञा का पालन करो
तफ़्सीर:
अतः तुम अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर उससे डरो, तथा जो मैंने तुम्हें आदेश दिया है और जो तुम्हें करने से मना किया है, उसमें मेरा कहा मानो।
आयत 180
وَمَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
وَمَآ
और नहीं
أَسْـَٔلُكُمْ
मैं सवाल करता तुम से
عَلَيْهِ
इस पर
مِنْ
any
أَجْرٍ ۖ
किसी अजर का
إِنْ
नहीं
أَجْرِىَ
अजर मेरा
إِلَّا
मगर
عَلَىٰ
ऊपर
رَبِّ
रब्बुल
ٱلْعَـٰلَمِينَ
आलमीन के
मैं इस काम पर तुमसे कोई प्रतिदान नहीं माँगता। मेरा प्रतिदान तो बस सारे संसार के रब के ज़िम्मे है
तफ़्सीर:
और जो कुछ मैं अपने रब की ओर से तुम्हें संदेश पहुँचाता हूँ, मैं तुमसे उसका बदला नहीं माँगता। मेरा बदला तो केवल सारी सृष्टि के रब अल्लाह के ज़िम्मे है, किसी अन्य के नहीं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
लूत की कौम की तबाही और शुऐब अलैहिस्सलाम की दावत की शुरुआत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि गुनाह में डूबी कौम पर अल्लाह की मोहलत हमेशा बरकरार नहीं रहती।
आयत 181
۞ أَوْفُوا۟ ٱلْكَيْلَ وَلَا تَكُونُوا۟ مِنَ ٱلْمُخْسِرِينَ
۞ أَوْفُوا۟
पूरा करो
ٱلْكَيْلَ
नाप को
وَلَا
और ना
تَكُونُوا۟
तुम हो जाओ
مِنَ
of
ٱلْمُخْسِرِينَ
नुक़्सान देने वालों में से
तुम पूरा-पूरा पैमाना भरो और घाटा न दो
तफ़्सीर:
जब तुम लोगों से कुछ बेचो तो उन्हें पूरा-पूरा नाप कर दो तथा उन लोगों में से न हो जाओ, जो लोगों से कुछ बेचते हैं तो कम नाप कर देते हैं।
आयत 182
وَزِنُوا۟ بِٱلْقِسْطَاسِ ٱلْمُسْتَقِيمِ
وَزِنُوا۟
और वज़न करो
بِٱلْقِسْطَاسِ
साथ तराज़ू
ٱلْمُسْتَقِيمِ
सीधी के
और ठीक तराज़ू से तौलो
तफ़्सीर:
तथा जब तुम दूसरों को तौलकर दो तो सीधी तराज़ू से तौला करो।
आयत 183
وَلَا تَبْخَسُوا۟ ٱلنَّاسَ أَشْيَآءَهُمْ وَلَا تَعْثَوْا۟ فِى ٱلْأَرْضِ مُفْسِدِينَ
وَلَا
और ना
تَبْخَسُوا۟
तुम कम कर के दो
ٱلنَّاسَ
लोगों को
أَشْيَآءَهُمْ
चीज़ें उनकी
وَلَا
और ना
تَعْثَوْا۟
तुम फ़साद करो
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
مُفْسِدِينَ
मुफ़सिद बनकर
और लोगों को उनकी चीज़ों में घाटा न दो और धरती में बिगाड़ और फ़साद मचाते मत फिरो
तफ़्सीर:
लोगों को उनके अधिकार कम न दो और पाप करके धरती में बिगाड़ न बढ़ाओ।
आयत 184
وَٱتَّقُوا۟ ٱلَّذِى خَلَقَكُمْ وَٱلْجِبِلَّةَ ٱلْأَوَّلِينَ
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱلَّذِى
उससे जिस ने
خَلَقَكُمْ
पैदा किया तुम्हें
وَٱلْجِبِلَّةَ
और मख़्लूक़
ٱلْأَوَّلِينَ
पहली को
उसका डर रखो जिसने तुम्हें और पिछली नस्लों को पैदा किया हैं।"
तफ़्सीर:
तथा उस अस्तित्व से भय खाते हुए तक़वा धारण करो, जिसने तुमको तथा पहले के समुदायों को पैदा किया है कि कहीं वह तुमपर अपनी यातना न भेज दे।
आयत 185
قَالُوٓا۟ إِنَّمَآ أَنتَ مِنَ ٱلْمُسَحَّرِينَ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
إِنَّمَآ
बेशक
أَنتَ
तू
مِنَ
(are) of
ٱلْمُسَحَّرِينَ
सहरज़दा लोगों में से है
उन्होंने कहा, "तू तो बस जादू का मारा हुआ है
तफ़्सीर:
शुऐब की जाति ने शुऐब अलैहिस्सलाम से कहा : तुम तो बस उन लोगों में से हो जिनपर बार-बार जादू किया गया है, यहाँ तक कि जादू तुम्हारे दिमाग पर हावी हो गया है तथा उसे गायब (निष्क्रिय) कर दिया है।
आयत 186
وَمَآ أَنتَ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُنَا وَإِن نَّظُنُّكَ لَمِنَ ٱلْكَـٰذِبِينَ
وَمَآ
और नहीं
أَنتَ
तू
إِلَّا
मगर
بَشَرٌۭ
एक इन्सान
مِّثْلُنَا
हम जैसा
وَإِن
और बेशक
نَّظُنُّكَ
हम गुमान करते हैं तुझे
لَمِنَ
surely (are) of
ٱلْكَـٰذِبِينَ
अलबत्ता झूठों में से
और तू बस हमारे ही जैसा एक आदमी है और हम तो तुझे झूठा समझते है
तफ़्सीर:
तथा तू तो हमारे ही जैसा एक साधारण इनसान है। इसलिए तुझे हमपर कोइ श्रेष्ठता प्राप्त नहीं है। फिर तू रसूल कैसे हो सकता है? और तू जो यह रसूल होने का दावा कर रहा है, इसमें हम तुझे झूठा समझते हैं।
आयत 187
فَأَسْقِطْ عَلَيْنَا كِسَفًۭا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ
فَأَسْقِطْ
पस तू गिरा दे
عَلَيْنَا
हम पर
كِسَفًۭا
एक टुकड़ा
مِّنَ
of
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
إِن
अगर
كُنتَ
है तू
مِنَ
of
ٱلصَّـٰدِقِينَ
सच्चों में से
फिर तू हमपर आकाश को कोई टुकड़ा गिरा दे, यदि तू सच्चा है।"
तफ़्सीर:
यदि तू अपने दावे में सच्चा है, तो हमपर आसमान से कोई टुकड़ा गिरा दे।
आयत 188
قَالَ رَبِّىٓ أَعْلَمُ بِمَا تَعْمَلُونَ
قَالَ
उसने कहा
رَبِّىٓ
मेरा रब
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِمَا
उसे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
उसने कहा, " मेरा रब भली-भाँति जानता है जो कुछ तुम कर रहे हो।"
तफ़्सीर:
शुऐब ने उनसे कहा : मेरा रब अधिक जानने वाला है, जो कुछ तुम शिर्क और पाप कर रहे हो, उससे तुम्हारे कर्मों में से कुछ भी छिपा नहीं है।
आयत 189
فَكَذَّبُوهُ فَأَخَذَهُمْ عَذَابُ يَوْمِ ٱلظُّلَّةِ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ
فَكَذَّبُوهُ
तो उन्होंने झुठला दिया उसे
فَأَخَذَهُمْ
तो पकड़ लिया उन्हें
عَذَابُ
अज़ाब ने
يَوْمِ
दिन
ٱلظُّلَّةِ ۚ
सायबान के
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
था
عَذَابَ
अज़ाब
يَوْمٍ
(of) a Day
عَظِيمٍ
बड़े दिन का
किन्तु उन्होंने उसे झुठला दिया। फिर छायावाले दिन की यातना ने आ लिया। निश्चय ही वह एक बड़े दिन की यातना थी
तफ़्सीर:
चुनाँचे वे शुऐब अलैहिस्सलाम को झुठलाते रहे, तो उनपर एक बड़ी यातना आ पड़ी।एक भीषण गरमी वाले दिन के बाद, उनपर बादल छा गया, फिर उनपर आग बरसाकर उन्हें जला दिया। निश्चय उनके विनाश का दिन बड़े भय का दिन था।
आयत 190
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَةًۭ ۖ
अलबत्ता एक निशानी है
وَمَا
और ना
كَانَ
थे
أَكْثَرُهُم
अक्सर उनके
مُّؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
निस्संदेह इसमें एक बड़ी निशानी है। इसपर भी उनमें से अधिकतर माननेवाले नहीं
तफ़्सीर:
निश्चय शुऐब अलैहिस्सलाम की जाति के उपर्युक्त विनाश में सीख ग्रहण करने वालों के लिए बड़ी सीख है। और उनमें से अधिकांश लोग ईमान वाले नहीं थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
शुऐब अलैहिस्सलाम की कौम और नाप-तोल में कमी की मज़म्मत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कारोबार में धोखा देना अल्लाह की नाराज़गी का सबब बनता है।
आयत 191
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ
وَإِنَّ
और बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
لَهُوَ
अलबत्ता वो
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त है
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला है
और निश्चय ही तुम्हारा रब ही है, जो बड़ा प्रभुत्वशाली, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
और निःसंदेह (ऐ रसूल!) आपका पालनहार ही वह प्रभुत्वशाली है, जो अपने दुश्मनों से बदला लेता है, तथा उनमें से तौबा करने वालों पर बहुत दयालु है।
आयत 192
وَإِنَّهُۥ لَتَنزِيلُ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
لَتَنزِيلُ
अलबत्ता नाज़िल करदा है
رَبِّ
(of the) Lord
ٱلْعَـٰلَمِينَ
रब्बुल आलमीन की तरफ़ से
निश्चय ही यह (क़ुरआन) सारे संसार के रब की अवतरित की हुई चीज़ है
तफ़्सीर:
निःसंदेह मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतरने वाला यह क़ुरआन सारी सृष्टि के पालनहार की ओर से उतारा गया है।
आयत 193
نَزَلَ بِهِ ٱلرُّوحُ ٱلْأَمِينُ
نَزَلَ
उतरा
بِهِ
उसे लेकर
ٱلرُّوحُ
the Spirit
ٱلْأَمِينُ
रूहुल अमीन
इसको लेकर तुम्हारे हृदय पर एक विश्वसनीय आत्मा उतरी है,
तफ़्सीर:
इसे लेकर जिबरील अमीन अलैहिस्सलाम उतरे हैं।
आयत 194
عَلَىٰ قَلْبِكَ لِتَكُونَ مِنَ ٱلْمُنذِرِينَ
عَلَىٰ
Upon
قَلْبِكَ
ऊपर आपके दिल के
لِتَكُونَ
ताकि आप हों
مِنَ
of
ٱلْمُنذِرِينَ
डराने वालों में से
ताकि तुम सावधान करनेवाले हो
तफ़्सीर:
वह इसे लेकर (ऐ रसूल!) आपके दिल पर उतरे हैं, ताकि आप उन रसूलों में से हो जाएँ, जो लोगों को चेतावनी देते हैं और उन्हें अल्लाह की यातना से डराते हैं।
आयत 195
بِلِسَانٍ عَرَبِىٍّۢ مُّبِينٍۢ
بِلِسَانٍ
साथ ज़बान
عَرَبِىٍّۢ
अरबी
مُّبِينٍۢ
वाज़ेह के
स्पष्ट अरबी भाषा में
तफ़्सीर:
वह इसे शुद्ध एवं स्पष्ट अरबी भाषा में लेकर उतरे हैं।
आयत 196
وَإِنَّهُۥ لَفِى زُبُرِ ٱلْأَوَّلِينَ
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
لَفِى
surely, (is) in
زُبُرِ
अलबत्ता सहीफ़ों में है
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों के
और निस्संदेह यह पिछले लोगों की किताबों में भी मौजूद है
तफ़्सीर:
और इस क़ुरआन का वर्णन पिछले लोगों की किताबों में भी आया है। चुनाँचे इसकी ख़ुशख़बरी पिछली आसमानी किताबों में भी दी गई है।
आयत 197
أَوَلَمْ يَكُن لَّهُمْ ءَايَةً أَن يَعْلَمَهُۥ عُلَمَـٰٓؤُا۟ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَكُن
है
لَّهُمْ
उनके लिए
ءَايَةً
कोई निशानी
أَن
कि
يَعْلَمَهُۥ
जानते हों उसे
عُلَمَـٰٓؤُا۟
उलेमा
بَنِىٓ
(of the) Children
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल के
क्या यह उनके लिए कोई निशानी नहीं है कि इसे बनी इसराईल के विद्वान जानते है?
तफ़्सीर:
क्या आपको झुठलाने वाले इन लोगों के लिए यह तथ्य आपकी सच्चाई की निशानी नहीं है कि आपपर उतरने वाली किताब की सच्चाई को बनी इसराईल के विद्वान जैसे अब्दुल्लाह बिन सलाम (भी) जानते हैं?
आयत 198
وَلَوْ نَزَّلْنَـٰهُ عَلَىٰ بَعْضِ ٱلْأَعْجَمِينَ
وَلَوْ
और अगर
نَزَّلْنَـٰهُ
नाज़िल करते हम उसे
عَلَىٰ
to
بَعْضِ
किसी पर
ٱلْأَعْجَمِينَ
अजमियों में से
यदि हम इसे ग़ैर अरबी भाषी पर भी उतारते,
तफ़्सीर:
और यदि हम यह क़ुरआन किसी अजमी (ग़ैर अरब) पर उतार देते, जो अरबी भाषा नहीं बोलता।
आयत 199
فَقَرَأَهُۥ عَلَيْهِم مَّا كَانُوا۟ بِهِۦ مُؤْمِنِينَ
فَقَرَأَهُۥ
फिर वो पढ़ता उसे
عَلَيْهِم
उन पर
مَّا
ना
كَانُوا۟
होते वो
بِهِۦ
उस पर
مُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
और वह इसे उन्हें पढ़कर सुनाता तब भी वे इसे माननेवाले न होते
तफ़्सीर:
फिर वह इसे उनके सामने पढ़ता, तो भी ये लोग उसपर ईमान लाने वाले न होते; क्योंकि वे कहते : हम इसे नहीं समझते हैं। इसलिए उन्हें अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए की यह (क़ुरआन) उनकी भाषा (अरबी) में उतरा है।
आयत 200
كَذَٰلِكَ سَلَكْنَـٰهُ فِى قُلُوبِ ٱلْمُجْرِمِينَ
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
سَلَكْنَـٰهُ
गुज़ारा हमने उसे
فِى
into
قُلُوبِ
दिलों से
ٱلْمُجْرِمِينَ
मुजरिमों के
इसी प्रकार हमने इसे अपराधियों के दिलों में पैठाया है
तफ़्सीर:
इसी प्रकार हमने झुठलाने तथा इनकार की प्रवृति को अपराधियों के दिलों में डाल दिया है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन की सच्चाई और अमीन (भरोसेमंद) रूह (जिब्रील) के ज़रिए वही आने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि कुरआन एक भरोसेमंद ज़रिए से पहुंचा हुआ पैगाम है, इसमें कोई शक नहीं करना चाहिए।
आयत 201
لَا يُؤْمِنُونَ بِهِۦ حَتَّىٰ يَرَوُا۟ ٱلْعَذَابَ ٱلْأَلِيمَ
لَا
Not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाऐंगे
بِهِۦ
उस पर
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَرَوُا۟
वो देख लें
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब
ٱلْأَلِيمَ
दर्दनाक
वे इसपर ईमान लाने को नहीं, जब तक कि दुखद यातना न देख लें
तफ़्सीर:
वे अपने कुफ़्र से टस से मस नहीं होंगे और ईमान नहीं लाएँगे, यहाँ तक कि वे दर्दनाक यातना देख लें।
आयत 202
فَيَأْتِيَهُم بَغْتَةًۭ وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
فَيَأْتِيَهُم
तो वो आ जाएगा उन पर
بَغْتَةًۭ
अचानक
وَهُمْ
और वो
لَا
(do) not
يَشْعُرُونَ
ना वो शऊर रखते होंगे
फिर जब वह अचानक उनपर आ जाएगी और उन्हें ख़बर भी न होगी,
तफ़्सीर:
सो यह यातना उनपर अचानक आ पड़े, और वे इसके आने से वाक़िफ़ न हों यहाँ तक कि यह अचानक उन्हें धर ले।
आयत 203
فَيَقُولُوا۟ هَلْ نَحْنُ مُنظَرُونَ
فَيَقُولُوا۟
फिर वो कहेंगे
هَلْ
क्या
نَحْنُ
हम
مُنظَرُونَ
मोहलत दिए जाने वाले हैं
तब वे कहेंगे, "क्या हमें कुछ मुहलत मिल सकती है?"
तफ़्सीर:
फिर वे, जब उनपर अचानक यातना आ जाए, अफ़सोस करते हुए कहें : क्या हम मोहलत दिए जाने वाले हैं ताकि हम अल्लाह के समक्ष तौबा करें?!
आयत 204
أَفَبِعَذَابِنَا يَسْتَعْجِلُونَ
أَفَبِعَذَابِنَا
क्या फिर हमारे अज़ाब को
يَسْتَعْجِلُونَ
वो जल्दी माँगते हैं
तो क्या वे लोग हमारी यातना के लिए जल्दी मचा रहे है?
तफ़्सीर:
तो क्या ये काफिर लोग हमारी यातना के लिए जल्दी मचा रहे हैं, यह कहते हुए कि : हम तुझपर कदापि ईमान नहीं लाएँगे, जब तक तू अपने दावे के अनुसार हमपर आसमान का कोई टुकड़ा न गिरा दे।
आयत 205
أَفَرَءَيْتَ إِن مَّتَّعْنَـٰهُمْ سِنِينَ
أَفَرَءَيْتَ
क्या भला देखा आपने
إِن
अगर
مَّتَّعْنَـٰهُمْ
फ़ायदा दें हम उन्हें
سِنِينَ
कई साल
क्या तुमने कुछ विचार किया? यदि हम उन्हें कुछ वर्षों तक सुख भोगने दें;
तफ़्सीर:
तो (ऐ रसूल!) आप मुझे बताएँ कि यदि हम इन काफिरों को, जो उसपर ईमान लाने से मुँह फेरने वाले हैं जो आप लेकर आए हैं, एक लंबी अवधि के लिए नेमतों से लाभ उठाने का अवसर प्रदान कर दें।
आयत 206
ثُمَّ جَآءَهُم مَّا كَانُوا۟ يُوعَدُونَ
ثُمَّ
फिर
جَآءَهُم
आ जाए उनके पास
مَّا
जिसका
كَانُوا۟
थे वो
يُوعَدُونَ
वो वादा दिए जाते
फिर उनपर वह चीज़ आ जाए, जिससे उन्हें डराया जाता रहा है;
तफ़्सीर:
फिर उस अवधि के बाद जिसमें उन्होंने उन नेमतों का लाभ उठाया, वह यातना आ जाए, जिसकी उन्हें धमकी दी जा रही थी।
आयत 207
مَآ أَغْنَىٰ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يُمَتَّعُونَ
مَآ
ना
أَغْنَىٰ
काम आएगा
عَنْهُم
उन्हें
مَّا
जो
كَانُوا۟
थे वो
يُمَتَّعُونَ
वो फ़ायदा दिए जाते
तो जो सुख उन्हें मिला होगा वह उनके कुछ काम न आएगा
तफ़्सीर:
तो इस दुनिया में उनके पास जो नेमतें थी, उनके क्या काम आएँगी?! क्योंकि वे सारी नेमतें समाप्त हो गईं और कुछ लाभ न दे सकीं।
आयत 208
وَمَآ أَهْلَكْنَا مِن قَرْيَةٍ إِلَّا لَهَا مُنذِرُونَ
وَمَآ
और नहीं
أَهْلَكْنَا
हलाक किया हमने
مِن
any
قَرْيَةٍ
किसी बस्ती को
إِلَّا
मगर
لَهَا
उसके लिए
مُنذِرُونَ
डराने वाले थे
हमने किसी बस्ती को भी इसके बिना विनष्ट नहीं किया कि उसके लिए सचेत करनेवाले याददिहानी के लिए मौजूद रहे हैं।
तफ़्सीर:
हमने (पिछले समुदायों में से) किसी भी समुदाय को विनष्ट नहीं किया, परंतु इसके बाद कि रसूलों को भेजकर और किताबें उतारकर उनके लिए बहाना का रास्ता बंद कर दिया।
आयत 209
ذِكْرَىٰ وَمَا كُنَّا ظَـٰلِمِينَ
ذِكْرَىٰ
नसीहत के तौर पर
وَمَا
और ना
كُنَّا
थे हम
ظَـٰلِمِينَ
ज़ालिम
हम कोई ज़ालिम नहीं है
तफ़्सीर:
उन्हें नसीहत करने और याद दिलाने के लिए। तथा रसूलों को भेजकर और किताबें उतारकर उनके लिए बहाना का रास्ता बंद करने के बाद, हम उन्हें यातना देकर अन्याय नहीं कर रहे थे।
आयत 210
وَمَا تَنَزَّلَتْ بِهِ ٱلشَّيَـٰطِينُ
وَمَا
और नहीं
تَنَزَّلَتْ
उतरे
بِهِ
उसे लेकर
ٱلشَّيَـٰطِينُ
शयातीन
इसे शैतान लेकर नहीं उतरे हैं।
तफ़्सीर:
इस क़ुरआन को रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दिल पर, शैतान लेकर नहीं उतरे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुफ्फार की मोहलत की हकीकत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि मोहलत मिलना माफी नहीं, इसलिए इसे ग़नीमत समझकर सुधरने में लगा देना चाहिए।
आयत 211
وَمَا يَنۢبَغِى لَهُمْ وَمَا يَسْتَطِيعُونَ
وَمَا
और नहीं
يَنۢبَغِى
लायक़
لَهُمْ
उनके
وَمَا
और नहीं
يَسْتَطِيعُونَ
वो इस्तिताअत रखते
न यह उन्हें फबता ही है और न ये उनके बस का ही है
तफ़्सीर:
और इसे लेकर आपके दिल पर उतरना उनके योग्य नहीं है, और न वे ऐसा कर सकते हैं।
आयत 212
إِنَّهُمْ عَنِ ٱلسَّمْعِ لَمَعْزُولُونَ
إِنَّهُمْ
बेशक वो
عَنِ
from
ٱلسَّمْعِ
सुनने से
لَمَعْزُولُونَ
अलबत्ता अलग किए हुए हैं
वे तो इसके सुनने से भी दूर रखे गए है
तफ़्सीर:
वे ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि वे आकाश में उसके स्थान से अलग कर दिए गए हैं, तो वे उस तक कैसे पहुँच सकते हैं और उसे लेकर कैसे उतर सकते हैं?!
आयत 213
فَلَا تَدْعُ مَعَ ٱللَّهِ إِلَـٰهًا ءَاخَرَ فَتَكُونَ مِنَ ٱلْمُعَذَّبِينَ
فَلَا
पस ना
تَدْعُ
आप पुकारिए
مَعَ
साथ
ٱللَّهِ
अल्लाह के
إِلَـٰهًا
इलाह
ءَاخَرَ
दूसरा
فَتَكُونَ
वरना आप हो जाऐंगे
مِنَ
of
ٱلْمُعَذَّبِينَ
अज़ाब दिए जाने वालों में से
अतः अल्लाह के साथ दूसरे इष्ट-पूज्य को न पुकारना, अन्यथा तुम्हें भी यातना दी जाएगी
तफ़्सीर:
अतः आप अल्लाह के साथ किसी अन्य पूज्य की इबादत न करें जिसे आप उसके साथ साझी बना लें। नहीं तो उसके कारण, आप भी यातना दिए जाने वालों में से हो जाएँगे।
आयत 214
وَأَنذِرْ عَشِيرَتَكَ ٱلْأَقْرَبِينَ
وَأَنذِرْ
और डराइए
عَشِيرَتَكَ
अपने रिश्तेदारों को
ٱلْأَقْرَبِينَ
जो क़रीबी हैं
और अपने निकटतम नातेदारों को सचेत करो
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आप अपने समुदाय में से निकटतम फिर निकटतर लोगों को सावधान करें, ताकि अगर वे शिर्क पर क़ायम रहें तो अल्लाह की यातना से पीड़ित न हों।
आयत 215
وَٱخْفِضْ جَنَاحَكَ لِمَنِ ٱتَّبَعَكَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
وَٱخْفِضْ
और झुका दीजिए
جَنَاحَكَ
अपना बाज़ू
لِمَنِ
वास्ते उसके जो
ٱتَّبَعَكَ
पैरवी करे आपकी
مِنَ
of
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों में से
और जो ईमानवाले तुम्हारे अनुयायी हो गए है, उनके लिए अपनी भुजाएँ बिछाए रखो
तफ़्सीर:
तथा ईमान वालों में से जो आपका अनुसरण करें, उनपर दया एवं नरमी करते हुए उनके साथ विनम्रता का व्यवहार करें।
आयत 216
فَإِنْ عَصَوْكَ فَقُلْ إِنِّى بَرِىٓءٌۭ مِّمَّا تَعْمَلُونَ
فَإِنْ
फिर अगर
عَصَوْكَ
वो नाफ़रमानी करें आपकी
فَقُلْ
तो कह दीजिए
إِنِّى
बेशक मैं
بَرِىٓءٌۭ
बरी उज़-ज़िम्मा हूँ
مِّمَّا
उससे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल कर रहे हो
किन्तु यदि वे तुम्हारी अवज्ञा करें तो कह दो, "जो कुछ तुम करते हो, उसकी ज़िम्मेदारी से मं1 बरी हूँ।"
तफ़्सीर:
फिर यदि वे आपकी अवज्ञा करें और उसको न मानें जो आपने उन्हें अल्लाह को एकमात्र पूज्य मानने और उसकी आज्ञा का पालन करने का आदेश दिया है, तो आप उनसे कह दें : तुम जो शिर्क और पाप करते हो, मैं उससे बिलकुल अलग-थलग हूँ।
आयत 217
وَتَوَكَّلْ عَلَى ٱلْعَزِيزِ ٱلرَّحِيمِ
وَتَوَكَّلْ
और तवक्कल कीजिए
عَلَى
in
ٱلْعَزِيزِ
ऊपर बहुत ज़बरदस्त
ٱلرَّحِيمِ
निहायत रहम करने वाले के
और उस प्रभुत्वशाली और दया करनेवाले पर भरोसा रखो
तफ़्सीर:
तथा आप अपने सभी मामलों में उस प्रभुत्वशाली पर भरोसा करें, जो अपने दुश्मनों से बदला लेता है, तथा वह उनमें से तौबा करने वाले पर बहुत दया करने वाला है।
आयत 218
ٱلَّذِى يَرَىٰكَ حِينَ تَقُومُ
ٱلَّذِى
वो जो
يَرَىٰكَ
देखता है आपको
حِينَ
जिस वक़्त
تَقُومُ
आप खड़े होते हैं
जो तुम्हें देख रहा होता है, जब तुम खड़े होते हो
तफ़्सीर:
जो पवित्र अल्लाह आपको उस समय देखता है, जब आप नमाज़ के लिए खड़े होते हैं।
आयत 219
وَتَقَلُّبَكَ فِى ٱلسَّـٰجِدِينَ
وَتَقَلُّبَكَ
और नक़्ल व हरकत आपकी
فِى
among
ٱلسَّـٰجِدِينَ
सजदा करने वालों में
और सजदा करनेवालों में तुम्हारे चलत-फिरत को भी वह देखता है
तफ़्सीर:
तथा वह पवित्र अल्लाह नमाज़ियों में आपके एक हाल से दूसरे हाल में जाने को भी देखता है। उससे आपका तथा आपके सिवा अन्य लोगों का कोई काम छिपा नहीं है।
आयत 220
إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ
إِنَّهُۥ
बेशक वो
هُوَ
वो ही है
ٱلسَّمِيعُ
ख़ूब सुनने वाला
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब जानने वाला
निस्संदेह वह भली-भाँति सुनता-जानता है
तफ़्सीर:
आप अपनी नमाज़ में जो क़ुरआन और दुआएँ पढ़ते हैं, वह उसे सुनने वाला और आपकी नीयत को भली-भाँति जानने वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
यह वाज़ेह किया गया है कि शैतान कुरआन जैसी वही नहीं ला सकते। यह सबक हमें सिखाता है कि कुरआन की जैसी कलाम कोई इंसान या शैतान पेश नहीं कर सकता, यह इसकी सच्चाई का सुबूत है।
आयत 221
هَلْ أُنَبِّئُكُمْ عَلَىٰ مَن تَنَزَّلُ ٱلشَّيَـٰطِينُ
هَلْ
क्या
أُنَبِّئُكُمْ
मैं बताऊँ
عَلَىٰ
upon
مَن
किस पर
تَنَزَّلُ
उतरते हैं
ٱلشَّيَـٰطِينُ
शयातीन
क्या मैं तुम्हें बताऊँ कि शैतान किसपर उतरते है?
तफ़्सीर:
क्या मैं तुम्हें बताऊँ कि शैतान, जिनके बारे में तुम्हारा दावा है कि इस क़ुरआन को लेकर उतरे हैं, किस पर उतरते हैं?
आयत 222
تَنَزَّلُ عَلَىٰ كُلِّ أَفَّاكٍ أَثِيمٍۢ
تَنَزَّلُ
उतरते हैं
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
أَفَّاكٍ
बहुत झूठे
أَثِيمٍۢ
सख़्त गुनाहगार के
वे प्रत्येक ढोंग रचनेवाले गुनाहगार पर उतरते है
तफ़्सीर:
शैतान हर झूठ बोलने वाले, बहुत पाप और अवज्ञा करने वाले काहिन पर उतरते हैं।
आयत 223
يُلْقُونَ ٱلسَّمْعَ وَأَكْثَرُهُمْ كَـٰذِبُونَ
يُلْقُونَ
वो डालते हैं
ٱلسَّمْعَ
कानों में (सुनी सुनाई बात)
وَأَكْثَرُهُمْ
और अक्सर उनके
كَـٰذِبُونَ
झूठे हैं
वे कान लगाते है और उनमें से अधिकतर झूठे होते है
तफ़्सीर:
शैतान चोरी से फ़रिश्तों की बातें सुन लेते हैं, फिर अपने काहिन मित्रों तक उन्हें पहुँचा देते हैं। और अधिकांश काहिन झूठे होते हैं। यदि उनकी कोई एक बात सत्य होती है, तो उसके साथ सौ झूठ मिला देते हैं।
आयत 224
وَٱلشُّعَرَآءُ يَتَّبِعُهُمُ ٱلْغَاوُۥنَ
وَٱلشُّعَرَآءُ
और शुअरा
يَتَّبِعُهُمُ
पैरवी करते हैं उनकी
ٱلْغَاوُۥنَ
बहके हुए लोग
रहे कवि, तो उनके पीछे बहके हुए लोग ही चला करते है।-
तफ़्सीर:
और कवि लोग जिनके बारे में तुम्हारा दावा है कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उन्हीं में से हैं, उनका अनुसरण तो केवल वे लोग करते हैं जो मार्गदर्शन और धार्मिकता के मार्ग से भटके हुए हैं, जो उनके कहे हुए काव्य का वर्णन करते हैं।
आयत 225
أَلَمْ تَرَ أَنَّهُمْ فِى كُلِّ وَادٍۢ يَهِيمُونَ
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
أَنَّهُمْ
कि बेशक वो
فِى
in
كُلِّ
every
وَادٍۢ
हर वादी में
يَهِيمُونَ
वो सरगर्दां फिरते हैं
क्या तुमने देखा नहीं कि वे हर घाटी में बहके फिरते हैं,
तफ़्सीर:
और क्या (ऐ रसूल!) आपने नहीं देखा कि उनकी गुमराही की निशानियों में से एक यह है कि वे हर वादी में भटकते फिरते हैं। कभी प्रशंसा की वादी में सिर मारते हैं, तो कभी निंदा की वादी में, और कभी इन दोनों के अलावा किसी और वादी में।
आयत 226
وَأَنَّهُمْ يَقُولُونَ مَا لَا يَفْعَلُونَ
وَأَنَّهُمْ
और बेशक वो
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
مَا
वो जो
لَا
not
يَفْعَلُونَ
नहीं वो करते
और कहते वह है जो करते नहीं? -
तफ़्सीर:
और यह कि वे झूठ बोलते हैं। चुनाँचे वे कहते हैं : हमने यह किया है, जबकि उन्होंने उसे नहीं किया होता है।
आयत 227
إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَذَكَرُوا۟ ٱللَّهَ كَثِيرًۭا وَٱنتَصَرُوا۟ مِنۢ بَعْدِ مَا ظُلِمُوا۟ ۗ وَسَيَعْلَمُ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓا۟ أَىَّ مُنقَلَبٍۢ يَنقَلِبُونَ
إِلَّا
सिवाए
ٱلَّذِينَ
उनके जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
وَذَكَرُوا۟
और उन्होंने याद किया
ٱللَّهَ
अल्लाह को
كَثِيرًۭا
बकसरत
وَٱنتَصَرُوا۟
और उन्होंने बदला लिया
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद उसके
مَا
जो
ظُلِمُوا۟ ۗ
वो ज़ुल्म किए गए
وَسَيَعْلَمُ
और अनक़रीब जान लेंगे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
ظَلَمُوٓا۟
ज़ुल्म किया
أَىَّ
कौन सी
مُنقَلَبٍۢ
लौटने की जगह
يَنقَلِبُونَ
वो लौटेंगे
वे नहीं जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए और अल्लाह को अधिक .याद किया। औऱ इसके बाद कि उनपर ज़ुल्म किया गया तो उन्होंने उसका प्रतिकार किया और जिन लोगों ने ज़ुल्म किया, उन्हें जल्द ही मालूम हो जाएगा कि वे किस जगह पलटते हैं
तफ़्सीर:
सिवाय उन कवियों के, जो ईमान लाए और नेक कर्म किए, और अल्लाह को बहुत याद किया, तथा अपने शत्रुओं से उनके अत्याचार से पीड़ित होने के बाद बदला लिया, जैसे हस्सान बिन साबित रज़ियल्लाहु अन्हु l और शीघ्र ही वे लोग जान लेंगे, जिन्होंने अल्लाह के साथ शिर्क करके तथा उसके बंदों पर ज़्यादती करके अत्याचार किया, कि वे लौटने की कौन-सी जगह लौटकर जाएँगे। वे एक विकट स्थिति और सटीक हिसाब-किताब की ओर पलटकर जाएँगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
शायरों (कवियों) के रवैये का ज़िक्र और सच्चे नेक अमल करने वाले शायरों की छूट के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि सिर्फ खूबसूरत बातें कहना काफी नहीं, अगर उन पर अमल न हो तो वह खोखली रह जाती हैं।
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