सूरह अन-नम्ल سورة النمل
मक्की 93 आयतें
नाम का मतलब
चींटी (सुलेमान अलैहिस्सलाम की फौज के गुज़रने पर चींटी की बात से)
पृष्ठभूमि
सूरह अन-नम्ल में सुलेमान अलैहिस्सलाम, हुदहुद परिंदे और मलिका-ए-सबा (बिलक़ीस) के वाकिये का ज़िक्र है। इसका नाम उस चींटी की तरफ इशारा करता है जिसने अपनी बस्ती को सुलेमान अलैहिस्सलाम की फौज से बचने की ताकीद की।
फ़ज़ीलत / सार
इस सूरह में सुलेमान अलैहिस्सलाम की हिकमत, इंसाफ और अल्लाह की नेमतों पर शुक्रगुज़ारी की बेहतरीन मिसाल मिलती है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ طسٓ ۚ تِلْكَ ءَايَـٰتُ ٱلْقُرْءَانِ وَكِتَابٍۢ مُّبِينٍ
طسٓ ۚ
ط س
تِلْكَ
ये
ءَايَـٰتُ
आयात हैं
ٱلْقُرْءَانِ
क़ुरआन की
وَكِتَابٍۢ
and a Book
مُّبِينٍ
और वाज़ेह किताब की
ता॰ सीन॰। ये आयतें है क़ुरआन और एक स्पष्ट किताब की
तफ़्सीर:
(ता, सीन) सूरतुल-बक़रा की शुरुआत में इस प्रकार के अक्षरों के बारे में बात गुज़र चुकी है। आपपर उतरने वाली ये आयतें क़ुरआन तथा एक स्पष्ट और असंदिग्ध पुस्तक की आयतें हैं। जो कोई भी इस (पुस्तक) पर विचार करता है, वह जान लेता है कि यह अल्लाह की ओर से है।
आयत 2
هُدًۭى وَبُشْرَىٰ لِلْمُؤْمِنِينَ
هُدًۭى
हिदायत
وَبُشْرَىٰ
और ख़ुशख़बरी है
لِلْمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वालों के लिए
मार्गदर्शन है और शुभ-सूचना उन ईमानवालों के लिए,
तफ़्सीर:
ये आयतें सत्य की ओर मार्गदर्शन करने वाली, उसकी ओर ले जाने वाली तथा अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान रखने वालों को ख़ुशख़बरी सुनाने वाली हैं।
आयत 3
ٱلَّذِينَ يُقِيمُونَ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُؤْتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَهُم بِٱلْـَٔاخِرَةِ هُمْ يُوقِنُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जो
يُقِيمُونَ
क़ायम करते हैं
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَيُؤْتُونَ
और वो अदा करते हैं
ٱلزَّكَوٰةَ
ज़कात
وَهُم
और वो
بِٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत पर
هُمْ
वो
يُوقِنُونَ
वो यक़ीन रखते हैं
जो नमाज़ का आयोजन करते है और ज़कात देते है और वही है जो आख़िरत पर विश्वास रखते है
तफ़्सीर:
जो पूर्णतम तरीक़े से नमाज़ अदा करते हैं, अपने माल की ज़कात निकाल कर उसके हक़दारों को देते हैं, तथा वे आख़िरत के सवाब और सज़ा पर विश्वास रखते हैं।
आयत 4
إِنَّ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ زَيَّنَّا لَهُمْ أَعْمَـٰلَهُمْ فَهُمْ يَعْمَهُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाते
بِٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत पर
زَيَّنَّا
मुज़य्यन कर दिए हमने
لَهُمْ
उनके लिए
أَعْمَـٰلَهُمْ
आमाल उनके
فَهُمْ
तो वो
يَعْمَهُونَ
वो भटकते फिरते हैं
रहे वे लोग जो आख़िरत को नहीं मानते, उनके लिए हमने उनकी करतूतों को शोभायमान बना दिया है। अतः वे भटकते फिरते है
तफ़्सीर:
निःसंदेह जो काफ़िर आख़िरत तथा उसके सवाब और सज़ा पर ईमान नहीं रखते, हमने उनके बुरे कामों को उनके लिए सुंदर बना दिया है। चुनाँचे वे उन्हें करते रहते हैं। इसलिए वे भटकते फिर रहे हैं, उन्हें सत्य या मार्गदर्शन नहीं मिल रहा है।
आयत 5
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ لَهُمْ سُوٓءُ ٱلْعَذَابِ وَهُمْ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ هُمُ ٱلْأَخْسَرُونَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
ٱلَّذِينَ
वो जो
لَهُمْ
उनके लिए
سُوٓءُ
बुरा
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब है
وَهُمْ
और वो
فِى
in
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत में
هُمُ
वो ही
ٱلْأَخْسَرُونَ
सबसे ज़्यादा ख़सारे वाले हैं
वही लोग है, जिनके लिए बुरी यातना है और वही है जो आख़िरत में अत्यन्त घाटे में रहेंगे
तफ़्सीर:
उक्त विशेषताओं वाले ही वे लोग हैं, जिनके लिए इस दुनिया में क़त्ल एवं क़ैद की बुरी यातना है, तथा वे आख़िरत में सबसे ज़्यादा घाटा उठाने वाले होंगे। क्योंकि वे क़ियामत के दिन खुद को और अपने परिवार को, उन्हें हमेशा के लिए जहन्नम का वासी बनाकर, घाटे में डाल देंगे।
आयत 6
وَإِنَّكَ لَتُلَقَّى ٱلْقُرْءَانَ مِن لَّدُنْ حَكِيمٍ عَلِيمٍ
وَإِنَّكَ
और बेशक आप
لَتُلَقَّى
अलबत्ता आप दिए जाते हैं
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरआन
مِن
from [near]
لَّدُنْ
पास से
حَكِيمٍ
बहुत हिकमत वाले
عَلِيمٍ
बहुत इल्म वाले के
निश्चय ही तुम यह क़ुरआन एक बड़े तत्वदर्शी, ज्ञानवान (प्रभु) की ओर से पा रहे हो
तफ़्सीर:
और निःसंदेह (ऐ रसूल!) आप अपने ऊपर उतरने वाले इस क़ुरआन को एक ऐसी हस्ती की ओर से प्राप्त कर रहे हैं, जो अपनी रचना, प्रबंधन और विधान में पूर्ण हिकमत वाली है, सब कुछ जानने वाली है, उसके बंदों के हितों में से कोई भी वस्तु उससे छिपी नहीं है।
आयत 7
إِذْ قَالَ مُوسَىٰ لِأَهْلِهِۦٓ إِنِّىٓ ءَانَسْتُ نَارًۭا سَـَٔاتِيكُم مِّنْهَا بِخَبَرٍ أَوْ ءَاتِيكُم بِشِهَابٍۢ قَبَسٍۢ لَّعَلَّكُمْ تَصْطَلُونَ
إِذْ
जब
قَالَ
कहा
مُوسَىٰ
मूसा ने
لِأَهْلِهِۦٓ
अपने घर वालों से
إِنِّىٓ
बेशक मैं
ءَانَسْتُ
देखी है मैं ने
نَارًۭا
एक आग
سَـَٔاتِيكُم
अनक़रीब मैं लाऊँगा तुम्हारे पास
مِّنْهَا
उसमें से
بِخَبَرٍ
कोई ख़बर
أَوْ
या
ءَاتِيكُم
मैं लाऊँगा तुम्हारे पास
بِشِهَابٍۢ
एक अँगारा
قَبَسٍۢ
जलता हुआ
لَّعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَصْطَلُونَ
तुम ताप सको
याद करो जब मूसा ने अपने घरवालों से कहा कि "मैंने एक आग-सी देखी है। मैं अभी वहाँ से तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आता हूँ या तुम्हारे पास कोई दहकता अंगार लाता हूँ, ताकि तुम तापो।"
तफ़्सीर:
याद करो (ऐ रसूल!) जिस समय मूसा ने अपने घर वालों से कहा : निःसंदेह मैंने एक आग देखी है। मैं तुम्हारे पास उसे जलाने वाले से कोई ख़बर लाऊँगा, जिससे हमें रास्ते का पता चलेगा, अथवा तुम्हारे पास उससे आग का कोई अंगारा लेकर आऊँगा, ताकि तुम उसके द्वारा अपने आपको ठंड से गर्म कर सको।
आयत 8
فَلَمَّا جَآءَهَا نُودِىَ أَنۢ بُورِكَ مَن فِى ٱلنَّارِ وَمَنْ حَوْلَهَا وَسُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
فَلَمَّا
तो जब
جَآءَهَا
वो आया उस (आग) के पास
نُودِىَ
वो पुकारा गया
أَنۢ
कि
بُورِكَ
बरकत दिया गया
مَن
जो
فِى
(is) at
ٱلنَّارِ
आग में है
وَمَنْ
और जो
حَوْلَهَا
उसके इर्द-गिर्द है
وَسُبْحَـٰنَ
और पाक है
ٱللَّهِ
अल्लाह
رَبِّ
जो रब है
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों का
फिर जब वह उसके पास पहुँचा तो उसे आवाज़ आई कि "मुबारक है वह जो इस आग में है और जो इसके आस-पास है। महान और उच्च है अल्लाह, सारे संसार का रब!
तफ़्सीर:
जब वह उस आग के स्थान पर पहुँचे, जो उन्होंने देखी थी, तो अल्लाह ने उन्हें पुकारा : बरकत वाला है वह जो इस आग में है, तथा जो इसके आस-पास फ़रिश्ते हैं। तथा सारे संसारों का पालनहार पवित्र और पाक है उन विशेषताओं से जो उसके योग्य नहीं हैं, जिनसे पथभ्रष्ट लोग उसे विशेषित करते हैं।
आयत 9
يَـٰمُوسَىٰٓ إِنَّهُۥٓ أَنَا ٱللَّهُ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
يَـٰمُوسَىٰٓ
ऐ मूसा
إِنَّهُۥٓ
बेशक
أَنَا
मैं ही
ٱللَّهُ
इलाह हूँ
ٱلْعَزِيزُ
निहायत ज़बरदस्त
ٱلْحَكِيمُ
बहुत हिकमत वाला
ऐ मूसा! वह तो मैं अल्लाह हूँ, अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी!
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उनसे कहा : ऐ मूसा! निःसंदेह मैं ही अल्लाह हूँ। सब पर प्रभुत्वशाली हूँ, मुझे कोई पराजित नहीं कर सकता। अपनी रचना, नियति और विधान में पूर्ण हिकमत वाला हूँ।
आयत 10
وَأَلْقِ عَصَاكَ ۚ فَلَمَّا رَءَاهَا تَهْتَزُّ كَأَنَّهَا جَآنٌّۭ وَلَّىٰ مُدْبِرًۭا وَلَمْ يُعَقِّبْ ۚ يَـٰمُوسَىٰ لَا تَخَفْ إِنِّى لَا يَخَافُ لَدَىَّ ٱلْمُرْسَلُونَ
وَأَلْقِ
और डाल दे
عَصَاكَ ۚ
लाठी अपनी
فَلَمَّا
तो जब
رَءَاهَا
उसने देखा उसे
تَهْتَزُّ
कि वो हरकत करती है
كَأَنَّهَا
गोया कि वो
جَآنٌّۭ
साँप है
وَلَّىٰ
वो मुँह मोड़ गया
مُدْبِرًۭا
पीठ फेरते हुए
وَلَمْ
और ना
يُعَقِّبْ ۚ
उसने पीछे मुड़कर देखा
يَـٰمُوسَىٰ
ऐ मूसा
لَا
(Do) not
تَخَفْ
ना तुम डरो
إِنِّى
बेशक मैं
لَا
(do) not
يَخَافُ
नहीं डरा करते
لَدَىَّ
मेरे पास
ٱلْمُرْسَلُونَ
रसूल
तू अपनी लाठी डाल दे।" जब मूसा ने देखा कि वह बल खा रहा है जैसे वह कोई साँप हो, तो वह पीठ फेरकर भागा और पीछे मुड़कर न देखा। "ऐ मूसा! डर मत। निस्संदेह रसूल मेरे पास डरा नहीं करते,
तफ़्सीर:
और अपनी लाठी डाल दो। मूसा ने आदेश का पालन किया, लेकिन जब उसे साँप की तरह हिलते और रेंगते हुए देखा, तो उससे पीठ फेरकर भागे और पीछे मुड़कर नहीं देखा। तो अल्लाह ने उनसे कहा : इससे भय न खाओ l क्योंकि मेरे पास रसूल साँप या किसी और से नहीं डरते।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन की हिदायत और मूसा अलैहिस्सलाम को नबुव्वत मिलने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह की निशानियां देखने के लिए दिल का खुला और तैयार होना ज़रूरी है।
आयत 11
إِلَّا مَن ظَلَمَ ثُمَّ بَدَّلَ حُسْنًۢا بَعْدَ سُوٓءٍۢ فَإِنِّى غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
إِلَّا
मगर
مَن
जिसने
ظَلَمَ
ज़ुल्म किया
ثُمَّ
फिर
بَدَّلَ
उसने बदल दिया
حُسْنًۢا
नेकी से
بَعْدَ
बाद
سُوٓءٍۢ
बुराई के
فَإِنِّى
तो बेशक मैं
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला हूँ
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला हूँ
सिवाय उसके जिसने कोई ज़्यादती की हो। फिर बुराई के पश्चात उसे भलाई से बदल दिया, तो मैं भी बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान हूँ
तफ़्सीर:
सिवाय उसके जिसने कोई पाप करके अपने ऊपर अत्याचार किया। फिर उसके बाद तौबा कर ली, तो निःसंदेह मैं उसे बहुत क्षमा करने वाला, उसपर बेहद दयालु हूँ।
आयत 12
وَأَدْخِلْ يَدَكَ فِى جَيْبِكَ تَخْرُجْ بَيْضَآءَ مِنْ غَيْرِ سُوٓءٍۢ ۖ فِى تِسْعِ ءَايَـٰتٍ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَقَوْمِهِۦٓ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَوْمًۭا فَـٰسِقِينَ
وَأَدْخِلْ
और दाख़िल कर दे
يَدَكَ
हाथ अपना
فِى
into
جَيْبِكَ
अपने गिरेबान में
تَخْرُجْ
वो निकलेगा
بَيْضَآءَ
सफ़ेद /चमकता हुआ
مِنْ
without
غَيْرِ
बग़ैर
سُوٓءٍۢ ۖ
मर्ज़ /तक्लीफ़ के
فِى
(These are) among
تِسْعِ
nine
ءَايَـٰتٍ
नौ निशानियों में से हैं
إِلَىٰ
to
فِرْعَوْنَ
तरफ़ फ़िरऔन
وَقَوْمِهِۦٓ ۚ
और उसकी क़ौम के
إِنَّهُمْ
बेशक वो
كَانُوا۟
हैं वो
قَوْمًۭا
लोग
فَـٰسِقِينَ
नाफ़रमान
अपना हाथ गिरेबान में डाल। वह बिना किसी ख़राबी के उज्जवल चमकता निकलेगा। ये नौ निशानियों में से है फ़िरऔन और उसकी क़ौम की ओर भेजने के लिए। निश्चय ही वे अवज्ञाकारी लोग है।"
तफ़्सीर:
और अपना हाथ अपनी कमीज़ के गरीबान में डालो, उसमें डालने के बाद वह कोढ़ (बरस) के बिना बर्फ़ की तरह सफ़ेद निकलेगा। यह उन नौ निशानियों में से एक है, जो आपकी सच्चाई की गवाही देती हैं। (ये नौ निशानियाँ : हाथ का चमकना, लाठी, अकाल, फलों की कमी, तूफान (बाढ़), टिड्डी, खटमल, मेंढक और खून हैं।) इन्हें फ़िरऔन तथा उसकी क़ौम के पास ले जाओ। वे अल्लाह का इनकार करने के कारण उसकी आज्ञाकारिता से निकलने वाले लोग हैं।
आयत 13
فَلَمَّا جَآءَتْهُمْ ءَايَـٰتُنَا مُبْصِرَةًۭ قَالُوا۟ هَـٰذَا سِحْرٌۭ مُّبِينٌۭ
فَلَمَّا
तो जब
جَآءَتْهُمْ
आ गईं उनके पास
ءَايَـٰتُنَا
निशानियाँ हमारी
مُبْصِرَةًۭ
वाज़ेह
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
هَـٰذَا
ये
سِحْرٌۭ
जादू है
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
किन्तु जब आँखें खोल देनेवाली हमारी निशानियाँ उनके पास आई तो उन्होंने कहा, "यह तो खुला हुआ जादू है।"
तफ़्सीर:
फिर जब उनके पास हमारी ये निशानियाँ, जिनके साथ हमने मूसा का समर्थन किया था, स्पष्ट और साफ तौर पर आ गईं, तो उन्होंने कहा : ये निशानियाँ जिन्हें मूसा लेकर आया है, स्पष्ट जादू हैं।
आयत 14
وَجَحَدُوا۟ بِهَا وَٱسْتَيْقَنَتْهَآ أَنفُسُهُمْ ظُلْمًۭا وَعُلُوًّۭا ۚ فَٱنظُرْ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلْمُفْسِدِينَ
وَجَحَدُوا۟
और उन्होंने इन्कार किया
بِهَا
उनका
وَٱسْتَيْقَنَتْهَآ
हालाँकि यक़ीन कर लिया था उसका
أَنفُسُهُمْ
उनके दिलों ने
ظُلْمًۭا
ज़ुल्म
وَعُلُوًّۭا ۚ
और सरकशी से
فَٱنظُرْ
तो देखो
كَيْفَ
किस तरह
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अनजाम
ٱلْمُفْسِدِينَ
फ़साद करने वालों का
उन्होंने ज़ुल्म और सरकशी से उनका इनकार कर दिया, हालाँकि उनके जी को उनका विश्वास हो चुका था। अब देख लो इन बिगाड़ पैदा करनेवालों का क्या परिणाम हुआ?
तफ़्सीर:
उन्होंने इन स्पष्ट निशानियों का इनकार कर दिया और उन्हें मानने पर नहीं आए। हालाँकि उनके दिलों को इस बात का अच्छी तरह विश्वास था कि ये अल्लाह की ओर से हैं; ऐसा उन्होंने अत्याचार और सत्य से अहंकार के कारण किया। अतः (ऐ रसूल!) विचार करें कि अपने कुफ़्र और अवज्ञा के द्वारा घरती पर बिगाड़ पैदा करने वालों का परिणाम कैसा रहा! निश्चय हमने उन्हें नष्ट कर दिया और उन सबका विनाश कर दिया।
आयत 15
وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا دَاوُۥدَ وَسُلَيْمَـٰنَ عِلْمًۭا ۖ وَقَالَا ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِى فَضَّلَنَا عَلَىٰ كَثِيرٍۢ مِّنْ عِبَادِهِ ٱلْمُؤْمِنِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
ءَاتَيْنَا
दिया हमने
دَاوُۥدَ
दाऊद
وَسُلَيْمَـٰنَ
और सुलैमान को
عِلْمًۭا ۖ
इल्म
وَقَالَا
और उन दोनों ने कहा
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए है
ٱلَّذِى
जिसने
فَضَّلَنَا
फ़ज़ीलत दी हमें
عَلَىٰ
over
كَثِيرٍۢ
अक्सरियत पर
مِّنْ
of
عِبَادِهِ
अपने बन्दों में से
ٱلْمُؤْمِنِينَ
जो ईमान लाने वाले हैं
हमने दाऊद और सुलैमान को बड़ा ज्ञान प्रदान किया था, (उन्होंने उसके महत्व को जाना) और उन दोनों ने कहा, "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने हमें अपने बहुत-से ईमानवाले बन्दों के मुक़ाबले में श्रेष्ठता प्रदान की।"
तफ़्सीर:
निःसंदेह हमने दाऊद तथा उनके पुत्र सुलैमान को ज्ञान प्रदान किया। उसी में पक्षियों की बातों का ज्ञान भी शामिल है। दाऊद और सुलैमान ने प्रभुत्वशाली और महान अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए कहा : हर प्रकार की प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने हमें ज्ञान और नुबुव्वत (पैग़ंबरी) से सम्मानित करके अपने बहुत-से ईमान वाले बंदों पर श्रेष्ठता प्रदान की।
आयत 16
وَوَرِثَ سُلَيْمَـٰنُ دَاوُۥدَ ۖ وَقَالَ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ عُلِّمْنَا مَنطِقَ ٱلطَّيْرِ وَأُوتِينَا مِن كُلِّ شَىْءٍ ۖ إِنَّ هَـٰذَا لَهُوَ ٱلْفَضْلُ ٱلْمُبِينُ
وَوَرِثَ
और वारिस हुआ
سُلَيْمَـٰنُ
सुलैमान
دَاوُۥدَ ۖ
दाऊद का
وَقَالَ
और उसने कहा
يَـٰٓأَيُّهَا
ٱلنَّاسُ
लोगो
عُلِّمْنَا
सिखाए गए हम
مَنطِقَ
बोली
ٱلطَّيْرِ
परिन्दों की
وَأُوتِينَا
और दिए गए हम
مِن
from
كُلِّ
हर
شَىْءٍ ۖ
चीज़ (ज़रूरत की)
إِنَّ
बेशक
هَـٰذَا
ये
لَهُوَ
अलबत्ता वो
ٱلْفَضْلُ
फ़ज़ल है
ٱلْمُبِينُ
वाज़ेह
दाऊद का उत्तराधिकारी सुलैमान हुआ औऱ उसने कहा, "ऐ लोगों! हमें पक्षियों की बोली सिखाई गई है और हमें हर चीज़ दी गई है। निस्संदेह वह स्पष्ट बड़ाई है।"
तफ़्सीर:
और सुलैमान नुबुव्वत (पैग़ंबरी), ज्ञान तथा राजत्व में अपने पिता दाऊद के उत्तराधिकारी बने और खुद अपने तथा अपने पिता पर अल्लाह के अनुग्रह का वर्णन करते हुए कहा : ऐ लोगो! अल्लाह ने हमें पक्षियों की आवाज़ों को समझना सिखाया और हमें हर उस चीज़ में से प्रदान किया, जो उसने नबियों और बादशाहों को प्रदान किया। निःसंदेह यह जो अल्लाह ने हमें प्रदान किया, निश्चय यही स्पष्ट अनुकंपा है।
आयत 17
وَحُشِرَ لِسُلَيْمَـٰنَ جُنُودُهُۥ مِنَ ٱلْجِنِّ وَٱلْإِنسِ وَٱلطَّيْرِ فَهُمْ يُوزَعُونَ
وَحُشِرَ
और इकट्ठा किए गए
لِسُلَيْمَـٰنَ
सुलैमान के लिए
جُنُودُهُۥ
उसके लश्कर
مِنَ
of
ٱلْجِنِّ
जिन्नों में से
وَٱلْإِنسِ
और इन्सानों
وَٱلطَّيْرِ
और परिन्दों में से
فَهُمْ
तो वो
يُوزَعُونَ
वो गिरोहों में तक़सीम किए जाते हैं
सुलैमान के लिए जिन्न और मनुष्य और पक्षियों मे से उसकी सेनाएँ एकत्र कर गई फिर उनकी दर्जाबन्दी की जा रही थी
तफ़्सीर:
और सुलैमान के लिए मनुष्यों, जिन्नों और पक्षियों में से उनके सैनिक इकट्ठे किए गए, फिर वे एक व्यवस्थित तरीके से चलाए जाते थे।
आयत 18
حَتَّىٰٓ إِذَآ أَتَوْا۟ عَلَىٰ وَادِ ٱلنَّمْلِ قَالَتْ نَمْلَةٌۭ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّمْلُ ٱدْخُلُوا۟ مَسَـٰكِنَكُمْ لَا يَحْطِمَنَّكُمْ سُلَيْمَـٰنُ وَجُنُودُهُۥ وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَآ
जब
أَتَوْا۟
वो आए
عَلَىٰ
to
وَادِ
वादी पर
ٱلنَّمْلِ
चींटीयों की
قَالَتْ
कहने लगी
نَمْلَةٌۭ
एक चींटी
يَـٰٓأَيُّهَا
ٱلنَّمْلُ
चींटियों
ٱدْخُلُوا۟
दाख़िल हो जाओ
مَسَـٰكِنَكُمْ
अपने घरों में
لَا
lest not crush you
يَحْطِمَنَّكُمْ
ना कुचल डालें तुम्हें
سُلَيْمَـٰنُ
सुलैमान
وَجُنُودُهُۥ
और लश्कर उसके
وَهُمْ
और वो
لَا
(do) not perceive
يَشْعُرُونَ
वो शऊर ना रखते हों
यहाँ तक कि जब वे चींटियों की घाटी में पहुँचे तो एक चींटी ने कहा, "ऐ चींटियों! अपने घरों में प्रवेश कर जाओ। कहीं सुलैमान और उसकी सेनाएँ तुम्हें कुचल न डालें और उन्हें एहसास भी न हो।"
तफ़्सीर:
वे चलाए जाते रहे यहाँ तक कि जब वे चींटियों की एक घाटी (शाम - लेवंत - में एक जगह) में पहुँचे, तो एक चींटी ने कहा : ऐ चींटियो! अपने घरों में प्रवेश कर जाओ। ताकि सुलैमान और उसके सैनिक तुम्हें नष्ट न कर दें, जबकि उन्हें तुम्हारे बारे में पता भी न हो। क्योंकि अगर वे तुम्हारे बारे में जानते, तो वे तुम्हें नहीं रौंदते।
आयत 19
فَتَبَسَّمَ ضَاحِكًۭا مِّن قَوْلِهَا وَقَالَ رَبِّ أَوْزِعْنِىٓ أَنْ أَشْكُرَ نِعْمَتَكَ ٱلَّتِىٓ أَنْعَمْتَ عَلَىَّ وَعَلَىٰ وَٰلِدَىَّ وَأَنْ أَعْمَلَ صَـٰلِحًۭا تَرْضَىٰهُ وَأَدْخِلْنِى بِرَحْمَتِكَ فِى عِبَادِكَ ٱلصَّـٰلِحِينَ
فَتَبَسَّمَ
तो वो मुस्करा दिया
ضَاحِكًۭا
हँसते हुए
مِّن
at
قَوْلِهَا
उसकी बात से
وَقَالَ
और उसने कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
أَوْزِعْنِىٓ
तौफ़ीक़ दे मुझे
أَنْ
कि
أَشْكُرَ
मैं शुक्र अदा करूँ
نِعْمَتَكَ
तेरी नेअमत का
ٱلَّتِىٓ
वो जो
أَنْعَمْتَ
इनआम की तू ने
عَلَىَّ
मुझ पर
وَعَلَىٰ
और ऊपर
وَٰلِدَىَّ
मेरे वालिदैन के
وَأَنْ
और ये कि
أَعْمَلَ
मैं अमल करूँ
صَـٰلِحًۭا
नेक
تَرْضَىٰهُ
तू राज़ी हो जाए जिससे
وَأَدْخِلْنِى
और दाख़िल कर मुझे
بِرَحْمَتِكَ
साथ अपनी रहमत के
فِى
among
عِبَادِكَ
अपने बन्दों में
ٱلصَّـٰلِحِينَ
जो नेक हैं
तो वह उसकी बात पर प्रसन्न होकर मुस्कराया और कहा, "मेरे रब! मुझे संभाले रख कि मैं तेरी उस कृपा पर कृतज्ञता दिखाता रहूँ जो तूने मुझपर और मेरे माँ-बाप पर की है। और यह कि अच्छा कर्म करूँ जो तुझे पसन्द आए और अपनी दयालुता से मुझे अपने अच्छे बन्दों में दाखिल कर।"
तफ़्सीर:
जब सुलैमान अलैहिस्सलाम ने चींटी की बात सुनी, तो उसकी इस बात से हँसते हुए मुसकुराए और अपने पवित्र रब से प्रार्थना करते हुए कहने लगे : ऐ मेरे पालनहार! मुझे सामर्थ्य प्रदान कर और मुझे अपनी उस ने'मत के लिए आभारी होने की प्रेरणा दे, जो तूने मुझे और मेरे माता-पिता को प्रदान की है। तथा मुझे सामर्थ्य दे कि मैं नेक कार्य करूँ, जिससे तू पसंद करे। और मुझे अपनी दया से अपने सदाचारी बंदों के समूह में शामिल कर ले।
आयत 20
وَتَفَقَّدَ ٱلطَّيْرَ فَقَالَ مَا لِىَ لَآ أَرَى ٱلْهُدْهُدَ أَمْ كَانَ مِنَ ٱلْغَآئِبِينَ
وَتَفَقَّدَ
और उसने जायज़ा लिया
ٱلطَّيْرَ
परिन्दों का
فَقَالَ
फिर कहा
مَا
क्या है
لِىَ
मुझे
لَآ
not
أَرَى
नहीं मैं देखता
ٱلْهُدْهُدَ
हुदहुद को
أَمْ
या
كَانَ
है वो
مِنَ
from
ٱلْغَآئِبِينَ
ग़ायब होने वालों में से
उसने पक्षियों की जाँच-पड़ताल की तो कहा, "क्या बात है कि मैं हुदहुद को नहीं देख रहा हूँ, (वह यहीं कहीं है) या ग़ायब हो गया है?
तफ़्सीर:
और सुलैमान ने पक्षियों का निरीक्षण किया, पर हुदहुद को नहीं देखा। तो इसपर कहा : क्या बात है कि मैं हुदहुद को नहीं देख रहा हूँ? क्या किसी बाधा के कारण मैं उसे नहीं देख पा रहा हूँ अथवा वह अनुपस्थित है?
आज की ज़िंदगी में सबक़
सुलेमान अलैहिस्सलाम को मिली नेमतों और हुदहुद परिंदे का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि छोटी मखलूक की बात को भी संजीदगी से सुनना और उस पर गौर करना अक्लमंदी की निशानी है।
आयत 21
لَأُعَذِّبَنَّهُۥ عَذَابًۭا شَدِيدًا أَوْ لَأَا۟ذْبَحَنَّهُۥٓ أَوْ لَيَأْتِيَنِّى بِسُلْطَـٰنٍۢ مُّبِينٍۢ
لَأُعَذِّبَنَّهُۥ
अलबत्ता मैं ज़रूर सज़ा दूँगा उसे
عَذَابًۭا
सज़ा
شَدِيدًا
शदीद
أَوْ
या
لَأَا۟ذْبَحَنَّهُۥٓ
अलबत्ता मैं ज़रूर ज़िबह करूँगा उसे
أَوْ
या
لَيَأْتِيَنِّى
अलबत्ता वो ज़रूर लाए मेरे पास
بِسُلْطَـٰنٍۢ
कोई दलील
مُّبِينٍۢ
वाज़ेह
मैं उसे कठोर दंड दूँगा या उसे ज़बह ही कर डालूँगा या फिर वह मेरे सामने कोई स्पष्ट॥ कारण प्रस्तुत करे।"
तफ़्सीर:
जब उनके लिए उसकी अनुपस्थिति स्पष्ट हो गई, तो उन्होंने कहा : मैं उसे अनुपस्थित रहने की कड़ी सज़ा दूँगा अथवा उसे ज़बह कर डालूँगा, या फिर वह मेरे पास एक स्पष्ट तर्क लेकर आए, जो उसके अनुपस्थित होने के कारण को बयान करे।
आयत 22
فَمَكَثَ غَيْرَ بَعِيدٍۢ فَقَالَ أَحَطتُ بِمَا لَمْ تُحِطْ بِهِۦ وَجِئْتُكَ مِن سَبَإٍۭ بِنَبَإٍۢ يَقِينٍ
فَمَكَثَ
तो वो ठहरा
غَيْرَ
not
بَعِيدٍۢ
थोड़ी देर
فَقَالَ
तो कहा (हुदहुद ने)
أَحَطتُ
अहाता किया मैं ने
بِمَا
उसका जो
لَمْ
नहीं
تُحِطْ
आपने अहाता किया
بِهِۦ
जिसका
وَجِئْتُكَ
और लाया हूँ मैं आपके पास
مِن
from
سَبَإٍۭ
सबा से
بِنَبَإٍۢ
एक ख़बर
يَقِينٍ
यक़ीनी
फिर कुछ अधिक देर नहीं ठहरा कि उसने आकर कहा, "मैंने वह जानकारी प्राप्त की है जो आपको मालूम नहीं है। मैं सबा से आपके पास एक विश्वसनीय सूचना लेकर आया हूँ
तफ़्सीर:
हुदहुद लंबे समय तक अनुपस्थित नही रहा, फिर जब वह आया, तो सुलैमान अलैहिस्सलाम से कहा : मैं ऐसी बात से अवगत हुआ हूँ जिससे आप अवगत नहीं हैं। तथा मैं "सबा" वालों के विषय में एक सच्ची ख़बर लेकर आया हूँ, जिसमें कोई संदेह नहीं।
आयत 23
إِنِّى وَجَدتُّ ٱمْرَأَةًۭ تَمْلِكُهُمْ وَأُوتِيَتْ مِن كُلِّ شَىْءٍۢ وَلَهَا عَرْشٌ عَظِيمٌۭ
إِنِّى
बेशक मैं
وَجَدتُّ
पाया मैं ने
ٱمْرَأَةًۭ
एक औरत को
تَمْلِكُهُمْ
वो हुक्मरानी करती है उन पर
وَأُوتِيَتْ
और वो दी गई है
مِن
of
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ ( ज़रूरत की )
وَلَهَا
और उसके लिए
عَرْشٌ
तख़्त है
عَظِيمٌۭ
बहुत बड़ा
मैंने एक स्त्री को उनपर शासन करते पाया है। उसे हर चीज़ प्राप्त है औऱ उसका एक बड़ा सिंहासन है
तफ़्सीर:
मैंने एक स्त्री को उनपर शासन करते पाया है और उस स्त्री को शक्ति एवं शासन के सारे साधन प्राप्त हैं और उसके पास एक बड़ा सिंहासन भी है, जिसपर बैठकर वह अपने लोगों के मामलों का प्रबंधन करती है।
आयत 24
وَجَدتُّهَا وَقَوْمَهَا يَسْجُدُونَ لِلشَّمْسِ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَزَيَّنَ لَهُمُ ٱلشَّيْطَـٰنُ أَعْمَـٰلَهُمْ فَصَدَّهُمْ عَنِ ٱلسَّبِيلِ فَهُمْ لَا يَهْتَدُونَ
وَجَدتُّهَا
पाया मैं ने उसे
وَقَوْمَهَا
और उसकी क़ौम को
يَسْجُدُونَ
वो सजदा करते हैं
لِلشَّمْسِ
सूरज को
مِن
instead of Allah
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَزَيَّنَ
और मुज़य्यन कर दिए
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान ने
أَعْمَـٰلَهُمْ
आमाल उनके
فَصَدَّهُمْ
फिर उसने रोक दिया उन्हें
عَنِ
from
ٱلسَّبِيلِ
(सीधे) रास्ते से
فَهُمْ
पस वो
لَا
(are) not
يَهْتَدُونَ
नहीं वो हिदायत पाते
मैंने उसे और उसकी क़ौम के लोगों को अल्लाह से इतर सूर्य को सजदा करते हुए पाया। शैतान ने उनके कर्मों को उनके लिए शोभायमान बना दिया है और उन्हें मार्ग से रोक दिया है - अतः वे सीधा मार्ग नहीं पा रहे है। -
तफ़्सीर:
मैंने उस स्त्री तथा उसकी जाति को पाया है कि वे पवित्र एवं सर्वशक्तिमान अल्लाह को छोड़कर सूरज को सजदा करते हैं। तथा शैतान ने उनके शिर्क एवं पाप के कार्यों को उनके लिए शोभनीय बना दिया है और उन्हें सत्य के मार्ग से हटा दिया है। अतः वे उसकी ओर मार्गदर्शन नहीं पाते।
आयत 25
أَلَّا يَسْجُدُوا۟ لِلَّهِ ٱلَّذِى يُخْرِجُ ٱلْخَبْءَ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَيَعْلَمُ مَا تُخْفُونَ وَمَا تُعْلِنُونَ
أَلَّا
ये कि नहीं
يَسْجُدُوا۟
वो सजदा करते
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
ٱلَّذِى
वो जो
يُخْرِجُ
निकालता है
ٱلْخَبْءَ
छुपी चीज़ को
فِى
in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन में
وَيَعْلَمُ
और वो जानता है
مَا
जो कुछ
تُخْفُونَ
तुम छुपाते हो
وَمَا
और जो कुछ
تُعْلِنُونَ
तुम ज़ाहिर करते हो
खि अल्लाह को सजदा न करें जो आकाशों और धरती की छिपी चीज़ें निकालता है, और जानता है जो कुछ भी तुम छिपाते हो और जो कुछ प्रकट करते हो
तफ़्सीर:
शैतान ने उनके शिर्क एवं पाप के कार्यों को उनके लिए सुंदर बना दिया है; ताकि वे अकेले अल्लाह को सजदा न करें, जो आकाश में छिपी वर्षा तथा धरती में छिपे पौधों को निकालता है, तथा वह उन कार्यों को जानता है, जो तुम छिपाते हो और जो तुम ज़ाहिर तरते हो। उनमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है।
आयत 26
ٱللَّهُ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ رَبُّ ٱلْعَرْشِ ٱلْعَظِيمِ ۩
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़ )
إِلَّا
मगर
هُوَ
वो ही
رَبُّ
रब है
ٱلْعَرْشِ
अर्शे
ٱلْعَظِيمِ ۩‏
अज़ीम का
अल्लाह कि उसके सिवा कोई इष्ट -पूज्य नहीं, वह महान सिंहासन का रब है।"
तफ़्सीर:
अल्लाह वह है जिसके अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं, जो महान सिंहासन का रब है।
आयत 27
۞ قَالَ سَنَنظُرُ أَصَدَقْتَ أَمْ كُنتَ مِنَ ٱلْكَـٰذِبِينَ
۞ قَالَ
उसने कहा
سَنَنظُرُ
अनक़रीब हम देखेंगे
أَصَدَقْتَ
क्या सच कहा तू ने
أَمْ
या
كُنتَ
है तू
مِنَ
of
ٱلْكَـٰذِبِينَ
झूठों में से
उसने कहा, "अभी हम देख लेते है कि तूने सच कहा या तू झूठा है
तफ़्सीर:
सुलैमान अलैहिस्सलाम ने हुदहुद से कहा : हम देखेंगे कि तू अपने दावे में सच्चा है अथवा तू झूठों में से है?
आयत 28
ٱذْهَب بِّكِتَـٰبِى هَـٰذَا فَأَلْقِهْ إِلَيْهِمْ ثُمَّ تَوَلَّ عَنْهُمْ فَٱنظُرْ مَاذَا يَرْجِعُونَ
ٱذْهَب
ले जाओ
بِّكِتَـٰبِى
ख़त मेरा
هَـٰذَا
ये
فَأَلْقِهْ
फिर डाल दो उसे
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
ثُمَّ
फिर
تَوَلَّ
हट जाओ
عَنْهُمْ
उनसे
فَٱنظُرْ
फिर देखो
مَاذَا
क्या कुछ
يَرْجِعُونَ
वो जवाब देते हैं
मेरा यह पत्र लेकर जा, और इसे उन लोगों की ओर डाल दे। फिर उनके पास से अलग हटकर देख कि वे क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करते है।"
तफ़्सीर:
सुलैमान अलैहिस्सलाम ने एक पत्र लिखा और उसे हुदहुद के हवाले करते हुए कहा : मेरा यह पात्र लेकर जाओ और इसे "सबा" वालों को पहुँचा देना और उनसे एक तरफ हटकर सुनते रहना कि वे इसके बारे में क्या जवाब देते हैं।
आयत 29
قَالَتْ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْمَلَؤُا۟ إِنِّىٓ أُلْقِىَ إِلَىَّ كِتَـٰبٌۭ كَرِيمٌ
قَالَتْ
बोली (मलका)
يَـٰٓأَيُّهَا
ٱلْمَلَؤُا۟
सरदारो
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أُلْقِىَ
डाला गया
إِلَىَّ
मेरी तरफ़
كِتَـٰبٌۭ
एक ख़त
كَرِيمٌ
मुअज़्ज़िज़
वह बोली, "ऐ सरदारों! मेरी ओर एक प्रतिष्ठित पत्र डाला गया है
तफ़्सीर:
रानी ने पत्र प्राप्त किया और कहा : ऐ सरदारो! मेरी ओर एक बहुत प्रतिष्ठित पत्र फेंका गया है।
आयत 30
إِنَّهُۥ مِن سُلَيْمَـٰنَ وَإِنَّهُۥ بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
إِنَّهُۥ
बेशक वो
مِن
(is) from
سُلَيْمَـٰنَ
सुलैमान की तरफ़ से है
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
بِسْمِ
साथ नाम
ٱللَّهِ
अल्लाह के है
ٱلرَّحْمَـٰنِ
जो बड़ा मेहरबान है
ٱلرَّحِيمِ
निहायत रहम करने वाला है
वह सुलैमान की ओर से है और वह यह है कि अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
सुलैमान की ओर से भेजे गए और "बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम" से प्रारंभ होने वाले इस पत्र का मज़मून यह है :
आज की ज़िंदगी में सबक़
बिलक़ीस (मलिका-ए-सबा) की खबर और उसे खत भेजे जाने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि फैसले लेने से पहले तहकीक करना और जल्दबाज़ी से बचना बेहतर है।
आयत 31
أَلَّا تَعْلُوا۟ عَلَىَّ وَأْتُونِى مُسْلِمِينَ
أَلَّا
कि ना
تَعْلُوا۟
तुम सरकशी करो
عَلَىَّ
मुझ पर
وَأْتُونِى
और आ जाओ मेरे पास
مُسْلِمِينَ
फ़रमाबरदार बन कर
यह कि मेरे मुक़ाबले में सरकशी न करो और आज्ञाकारी बनकर मेरे पास आओ।"
तफ़्सीर:
यह कि तुम अभिमान न करो तथा अल्लाह को एकमात्र पूज्य मानने और उसके साथ शिर्क को परित्याग करने के मेरे आह्वान को स्वीकार करते हुए, आज्ञाकारी बनकर, मेरे पास आ जाओ। क्योंकि तुमने अल्लाह के साथ सूर्य की पूजा की है।
आयत 32
قَالَتْ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْمَلَؤُا۟ أَفْتُونِى فِىٓ أَمْرِى مَا كُنتُ قَاطِعَةً أَمْرًا حَتَّىٰ تَشْهَدُونِ
قَالَتْ
वो कहने लगी
يَـٰٓأَيُّهَا
ٱلْمَلَؤُا۟
सरदारो
أَفْتُونِى
जवाब दो मुझे
فِىٓ
in
أَمْرِى
मेरे मामले में
مَا
नहीं
كُنتُ
हूँ मैं
قَاطِعَةً
क़तई फ़ैसला करने वाली
أَمْرًا
किसी काम का
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
تَشْهَدُونِ
तुम मौजूद हो मेरे पास
उसने कहा, "ऐ सरदारों! मेरे मामलें में मुझे परामर्श दो। मैं किसी मामले का फ़ैसला नहीं करती, जब तक कि तुम मेरे पास मौजूद न हो।"
तफ़्सीर:
रानी ने कहा : ऐ प्रमुखो एवं सज्जनो! मुझे मेरे मामले में सही हल बताओ। मैं किसी मामले का फ़ैसला करने वाली नहीं, यहाँ तक तुम मेरे पास उपस्थित हो और उसके बारे में अपनी राय व्यक्त करो।
आयत 33
قَالُوا۟ نَحْنُ أُو۟لُوا۟ قُوَّةٍۢ وَأُو۟لُوا۟ بَأْسٍۢ شَدِيدٍۢ وَٱلْأَمْرُ إِلَيْكِ فَٱنظُرِى مَاذَا تَأْمُرِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
نَحْنُ
हम
أُو۟لُوا۟
(are) possessors
قُوَّةٍۢ
क़ुव्वत वाले हैं
وَأُو۟لُوا۟
and possessors
بَأْسٍۢ
और जंगजू हैं
شَدِيدٍۢ
सख़्त
وَٱلْأَمْرُ
और फ़ैसला
إِلَيْكِ
तुम्हारी तरफ़ है
فَٱنظُرِى
तो देखलो / ग़ौर कर लो
مَاذَا
क्या
تَأْمُرِينَ
तुम हुक्म देती हो
उन्होंने कहा, "हम शक्तिशाली है और हमें बड़ी युद्ध-क्षमता प्राप्त है। आगे मामले का अधिकार आपको है, अतः आप देख लें कि आपको क्या आदेश देना है।"
तफ़्सीर:
उसकी जाति के सरदारों ने उससे कहा : हम बड़ी ताकत के मालिक हैं तथा युद्ध में प्रबल शक्ति रखते हैं। और राय वही है जो आप देखती हैं। इसलिए देखें कि आप हमें क्या करने का आदेश देती हैं। क्योंकि हम उसे लागू करने में सक्षम हैं।
आयत 34
قَالَتْ إِنَّ ٱلْمُلُوكَ إِذَا دَخَلُوا۟ قَرْيَةً أَفْسَدُوهَا وَجَعَلُوٓا۟ أَعِزَّةَ أَهْلِهَآ أَذِلَّةًۭ ۖ وَكَذَٰلِكَ يَفْعَلُونَ
قَالَتْ
वो कहने लगी
إِنَّ
बेशक
ٱلْمُلُوكَ
बादशाह
إِذَا
जब
دَخَلُوا۟
वो दाख़िल होते हैं
قَرْيَةً
किसी बस्ती में
أَفْسَدُوهَا
वो तबाह कर देते हैं उसे
وَجَعَلُوٓا۟
और वो कर देते हैं
أَعِزَّةَ
(the) most honorable
أَهْلِهَآ
उसके मुअज़्ज़िज़ बाशिन्दों को
أَذِلَّةًۭ ۖ
ज़लील
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
يَفْعَلُونَ
ये करेंगे
उसने कहा, "सम्राट जब किसी बस्ती में प्रवेश करते है, तो उसे ख़राब कर देते है और वहाँ के प्रभावशाली लोगों को अपमानित करके रहते है। और वे ऐसा ही करेंगे
तफ़्सीर:
रानी ने कहा : राजा जब किसी बस्ती में प्रवेश करते हैं, तो क़त्ल तथा लूट-पाट का बाज़ार गर्म करके उसे ख़राब कर देते हैं और उसके सरदारों और अशराफिया को अपमानित करते हैं, जबकि वे पहले उसमें प्रतिष्ठा और शक्ति वाले थे। तथा राजा हमेशा ऐसा ही करते हैं, जब वे किसी बस्ती को पराजित करते हैं; ताकि लोगों के दिलों में आतंक और दहशत पैदा कर सकें।
आयत 35
وَإِنِّى مُرْسِلَةٌ إِلَيْهِم بِهَدِيَّةٍۢ فَنَاظِرَةٌۢ بِمَ يَرْجِعُ ٱلْمُرْسَلُونَ
وَإِنِّى
और बेशक मैं
مُرْسِلَةٌ
भेजने वाली हूँ
إِلَيْهِم
तरफ़ उनके
بِهَدِيَّةٍۢ
एक हदिया
فَنَاظِرَةٌۢ
फिर देखने वाली हूँ
بِمَ
साथ किस चीज़ के
يَرْجِعُ
लौटते हैं
ٱلْمُرْسَلُونَ
भेजे हुए (क़ासिद)
मैं उनके पास एक उपहार भेजती हूँ; फिर देखती हूँ कि दूत क्या उत्तर लेकर लौटते है।"
तफ़्सीर:
मैं यह पत्र भेजने वाले तथा उसके लोगों के पास एक उपहार भेजने वाली हूँ और देखती हूँ कि दूत इस उपहार को भेजने के बाद क्या उत्तर लाते हैं।
आयत 36
فَلَمَّا جَآءَ سُلَيْمَـٰنَ قَالَ أَتُمِدُّونَنِ بِمَالٍۢ فَمَآ ءَاتَىٰنِۦَ ٱللَّهُ خَيْرٌۭ مِّمَّآ ءَاتَىٰكُم بَلْ أَنتُم بِهَدِيَّتِكُمْ تَفْرَحُونَ
فَلَمَّا
तो जब
جَآءَ
वो आया
سُلَيْمَـٰنَ
सुलैमान के पास
قَالَ
उसने कहा
أَتُمِدُّونَنِ
क्या तुम मदद देते हो मुझे
بِمَالٍۢ
साथ माल के
فَمَآ
तो जो
ءَاتَىٰنِۦَ
अता किया मुझे
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
خَيْرٌۭ
बेहतर है
مِّمَّآ
उससे जो
ءَاتَىٰكُم
उसने अता किया तुम्हें
بَلْ
बल्कि
أَنتُم
तुम ही
بِهَدِيَّتِكُمْ
साथ अपने हदिये के
تَفْرَحُونَ
तुम ख़ुश होते हो
फिर जब वह सुलैमान के पास पहुँचा तो उसने (सुलैमान ने) कहा, "क्या तुम माल से मेरी सहायता करोगे, तो जो कुछ अल्लाह ने मुझे दिया है वह उससे कहीं उत्तम है, जो उसने तुम्हें दिया है? बल्कि तुम्ही लोग हो जो अपने उपहार से प्रसन्न होते हो!
तफ़्सीर:
जब रानी का दूत और उसके साथ उसके सहायक उपहार लेकर सुलैमान के पास आए, तो सुलैमान ने उनके उपहार भेजने को नकारते हुए कहा : क्या तुम धन से मेरी सहायता करते हो, ताकि मुझे अपनी ओर से फेर सको? (सुनो!) अल्लाह ने मुझे पैग़ंबरी, राजत्व तथा धन-दौलत के रूप में जो कुछ दिया है, वह उससे बेहतर है, जो उस ने तुम्हें दिया है। बल्कि, तुम ही लोग इस प्रकार के सांसारिक उपहारों के दिए जाने पर खुश होते हो।
आयत 37
ٱرْجِعْ إِلَيْهِمْ فَلَنَأْتِيَنَّهُم بِجُنُودٍۢ لَّا قِبَلَ لَهُم بِهَا وَلَنُخْرِجَنَّهُم مِّنْهَآ أَذِلَّةًۭ وَهُمْ صَـٰغِرُونَ
ٱرْجِعْ
लौट जाओ
إِلَيْهِمْ
उनकी तरफ़
فَلَنَأْتِيَنَّهُم
पस अलबत्ता हम ज़रूर लाऐंगे उनके पास
بِجُنُودٍۢ
ऐसे लश्करों को
لَّا
not
قِبَلَ
नहीं कोई मुक़ाबला
لَهُم
उनके लिए
بِهَا
उनका
وَلَنُخْرِجَنَّهُم
और अलबत्ता हम ज़रूर निकाल देंगे उन्हें
مِّنْهَآ
उससे
أَذِلَّةًۭ
ज़लील करके
وَهُمْ
इस हाल में कि वो
صَـٰغِرُونَ
ख़्वार होंगे
उनके पास वापस जाओ। हम उनपर ऐसी सेनाएँ लेकर आएँगे, जिनका मुक़ाबला वे न कर सकेंगे और हम उन्हें अपमानित करके वहाँ से निकाल देंगे कि वे पस्त होकर रहेंगे।"
तफ़्सीर:
सुलैमान अलैहिस्सलाम ने रानी के दूत से कहा : तुम जो उपहार लेकर आए हो, उसे लेकर उनके पास वापस जाओ। यदि वे आज्ञाकारी बनकर मेरे पास नहीं आए, तो हम रानी तथा उसके लोगों पर ऐसी सेनाएँ लेकर आएँगे जिनका सामना करने की उनमें कोई शक्ति नहीं और हम अवश्य उन्हें 'सबा' से इस हाल में निकालेंगे कि वे वहाँ सम्मान पूर्ण रहने के बाद अपमानित और तिरस्कृत होंगे।
आयत 38
قَالَ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْمَلَؤُا۟ أَيُّكُمْ يَأْتِينِى بِعَرْشِهَا قَبْلَ أَن يَأْتُونِى مُسْلِمِينَ
قَالَ
कहा
يَـٰٓأَيُّهَا
ٱلْمَلَؤُا۟
सरदारो
أَيُّكُمْ
कौन तुम में से
يَأْتِينِى
लाएगा मेरे पास
بِعَرْشِهَا
तख़्त उसका
قَبْلَ
इससे पहले
أَن
कि
يَأْتُونِى
वो आ जाऐं मेरे पास
مُسْلِمِينَ
फ़रमाबरदार बन कर
उसने (सुलैमान ने) कहा, "ऐ सरदारो! तुममें कौन उसका सिंहासन लेकर मेरे पास आता है, इससे पहले कि वे लोग आज्ञाकारी होकर मेरे पास आएँ?"
तफ़्सीर:
सुलैमान अलैहिस्सलाम ने अपने राज्य के प्रमुख लोगों को संबोधित करते हुए कहा : ऐ प्रमुखो! तुममें से कौन रानी का सिंहासन मेरे पास लेकर आएगा, इससे पहले कि वे आज्ञाकारी होकर मेरे पास आएँ?
आयत 39
قَالَ عِفْرِيتٌۭ مِّنَ ٱلْجِنِّ أَنَا۠ ءَاتِيكَ بِهِۦ قَبْلَ أَن تَقُومَ مِن مَّقَامِكَ ۖ وَإِنِّى عَلَيْهِ لَقَوِىٌّ أَمِينٌۭ
قَالَ
कहा
عِفْرِيتٌۭ
एक देव ने
مِّنَ
of
ٱلْجِنِّ
जिन्नों में से
أَنَا۠
मैं
ءَاتِيكَ
मैं ले आऊँगा आपके पास
بِهِۦ
उसे
قَبْلَ
इससे पहले
أَن
कि
تَقُومَ
आप खड़े हों
مِن
from
مَّقَامِكَ ۖ
अपनी जगह से
وَإِنِّى
और बेशक मैं
عَلَيْهِ
इस पर
لَقَوِىٌّ
अलबत्ता क़ुव्वत रखने वाला
أَمِينٌۭ
बहुत अमानतदार हूँ
जिन्नों में से एक बलिष्ठ निर्भीक ने कहा, "मैं उसे आपके पास ले आऊँगा। इससे पहले कि आप अपने स्थान से उठे। मुझे इसकी शक्ति प्राप्त है और मैं अमानतदार भी हूँ।"
तफ़्सीर:
एक बलवान सरकश जिन्न ने कहा : इससे पहले कि आप अपनी इस जगह से उठें, मैं उसका सिंहासन आपके पास ले आऊँगा, और निःसंदेह मैं उसके उठाने की पूरी शक्ति रखता हूँ तथा उसमें जो कुछ है, उसके प्रति अमानतदार हूँ। इसलिए मैं उसमें कोई कमियागीरी नहीं करूँगा।
आयत 40
قَالَ ٱلَّذِى عِندَهُۥ عِلْمٌۭ مِّنَ ٱلْكِتَـٰبِ أَنَا۠ ءَاتِيكَ بِهِۦ قَبْلَ أَن يَرْتَدَّ إِلَيْكَ طَرْفُكَ ۚ فَلَمَّا رَءَاهُ مُسْتَقِرًّا عِندَهُۥ قَالَ هَـٰذَا مِن فَضْلِ رَبِّى لِيَبْلُوَنِىٓ ءَأَشْكُرُ أَمْ أَكْفُرُ ۖ وَمَن شَكَرَ فَإِنَّمَا يَشْكُرُ لِنَفْسِهِۦ ۖ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ رَبِّى غَنِىٌّۭ كَرِيمٌۭ
قَالَ
कहा
ٱلَّذِى
उसने
عِندَهُۥ
जिसके पास
عِلْمٌۭ
इल्म था
مِّنَ
of
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब का
أَنَا۠
मैं
ءَاتِيكَ
मैं ले आऊँगा आपके पास
بِهِۦ
उसे
قَبْلَ
इससे पहले
أَن
कि
يَرْتَدَّ
लौटे
إِلَيْكَ
आपकी तरफ़
طَرْفُكَ ۚ
नज़र आपकी
فَلَمَّا
फिर जब
رَءَاهُ
उसने देखा उसे
مُسْتَقِرًّا
रखा हुआ
عِندَهُۥ
अपने पास
قَالَ
उसने कहा
هَـٰذَا
ये
مِن
(is) from
فَضْلِ
फ़ज़ल से है
رَبِّى
मेरे रब के
لِيَبْلُوَنِىٓ
ताकि वो आज़माए मुझे
ءَأَشْكُرُ
क्या मैं शुक्र करता हूँ
أَمْ
या
أَكْفُرُ ۖ
मैं नाशुक्री करता हूँ
وَمَن
और जिसने
شَكَرَ
शुक्र किया
فَإِنَّمَا
तो यक़ीनन
يَشْكُرُ
वो शुक्र करेगा
لِنَفْسِهِۦ ۖ
अपने ही लिए
وَمَن
और जिसने
كَفَرَ
कुफ़्र किया
فَإِنَّ
चो यक़ीनन
رَبِّى
मेरा रब
غَنِىٌّۭ
बहुत बेनियाज़ है
كَرِيمٌۭ
निहायत इज़्ज़त वाला है
जिस व्यक्ति के पास किताब का ज्ञान था, उसने कहा, "मैं आपकी पलक झपकने से पहले उसे आपके पास लाए देता हूँ।" फिर जब उसने उसे अपने पास रखा हुआ देखा तो कहा, "यह मेरे रब का उदार अनुग्रह है, ताकि वह मेरी परीक्षा करे कि मैं कृतज्ञता दिखाता हूँ या कृतघ्न बनता हूँ। जो कृतज्ञता दिखलाता है तो वह अपने लिए ही कृतज्ञता दिखलाता है और वह जिसने कृतघ्नता दिखाई, तो मेरा रब निश्चय ही निस्पृह, बड़ा उदार है।"
तफ़्सीर:
सुलैमान के पास उपस्थित एक सदाचारी ज्ञानी व्यक्ति, जिसके पास आसमानी किताबों का ज्ञान था, जिसमें अल्लाह का वह "इस्मे आज़म" (महान नाम) भी शामिल है, जिसकी विशेषता यह है कि यदि उसके द्वारा दुआ की जाए तो अल्लाह क़बूल करता है, ने कहा : मैं आपके पलक झपकाने से पहले ही उसका सिंहासन आपके पास ले आऊँगा; इस तौर पर कि मैं अल्लाह से प्रार्थना करूँगा और वह उसे यहाँ ले आएगाl अतः उसने प्रार्थना की और अल्लाह ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। जब सुलैमान ने उसके सिंहासन को अपने पास हाज़िर देखा, तो कहा : यह मेरे पालनहार की कृपा से है; ताकि वह मेरी परीक्षा ले कि मैं उसकी नेमतों का शुक्र अदा करता हूँ या उनकी नाशुक्री करता हूँ? और जो अल्लाह का शुक्र अदा करता है, तो उसकी शुक्रगुज़ारी का लाभ उसी को मिलता है। क्योंकि अल्लाह बेनियाज़ है, बंदों की शुक्रगुज़ारी उसे नहीं बढ़ाती। तथा जिसने अल्लाह की नेमतों का इनकार किया और उनपर अल्लाह का शुक्र अदा नहीं किया, तो निश्चय मेरा पालनहार उसके शुक्र से बहुत बेनियाज़, बहुत उदार है। तथा यह उसकी उदारता है कि नेमतों की नाशुक्री करने वालों को भी प्रदान करता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
बिलक़ीस का अपने दरबारियों से मशवरा करने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि ताकत दिखाने से पहले सुलह और हिकमत का रास्ता आज़माना समझदारी है।
आयत 41
قَالَ نَكِّرُوا۟ لَهَا عَرْشَهَا نَنظُرْ أَتَهْتَدِىٓ أَمْ تَكُونُ مِنَ ٱلَّذِينَ لَا يَهْتَدُونَ
قَالَ
उसने कहा
نَكِّرُوا۟
अनजाना कर दो
لَهَا
उसके लिए
عَرْشَهَا
तख़्त उसका
نَنظُرْ
हम देखते हैं
أَتَهْتَدِىٓ
क्या वो हिदायत पाती है
أَمْ
या
تَكُونُ
होती है वो
مِنَ
of
ٱلَّذِينَ
उन में से जो
لَا
are not guided
يَهْتَدُونَ
नहीं वो हिदायत पाते
उसने कहा, "उसके पास उसके सिंहासन का रूप बदल दो। देंखे वह वास्तविकता को पा लेती है या उन लोगों में से होकर रह जाती है, जो वास्तविकता को पा लेती है या उन लोगों में से होकर जाती है, जो वास्तविकता को पा लेती है या उन लोगों में से होकर रह जाती है, जो वास्तविकता को नहीं पाते।"
तफ़्सीर:
सुलैमान अलैहिस्सलाम ने कहा : उसके लिए उसके राज-सिंहासन का रूप बदल दो। ताकि हम देखें : क्या वह इस तथ्य को जान पाती है कि यह उसी का सिंहासन है, या कि वह उन लोगों में से हो जाती है जो अपनी वस्तुएँ भी नहीं पहचान पाते हैं?
आयत 42
فَلَمَّا جَآءَتْ قِيلَ أَهَـٰكَذَا عَرْشُكِ ۖ قَالَتْ كَأَنَّهُۥ هُوَ ۚ وَأُوتِينَا ٱلْعِلْمَ مِن قَبْلِهَا وَكُنَّا مُسْلِمِينَ
فَلَمَّا
तो जब
جَآءَتْ
वो आ गई
قِيلَ
कहा गया
أَهَـٰكَذَا
क्या इसी तरह का है
عَرْشُكِ ۖ
तख़्त तेरा
قَالَتْ
वो बोली
كَأَنَّهُۥ
गोया कि वो
هُوَ ۚ
वो ही है
وَأُوتِينَا
और दिए गए थे हम
ٱلْعِلْمَ
इल्म
مِن
before her
قَبْلِهَا
इससे पहले ही
وَكُنَّا
और थे हम
مُسْلِمِينَ
फ़रमाबरदार
जब वह आई तो कहा गया, "क्या तुम्हारा सिंहासन ऐसा ही है?" उसने कहा, "यह तो जैसे वही है, और हमें तो इससे पहले ही ज्ञान प्राप्त हो चुका था; और हम आज्ञाकारी हो गए थे।"
तफ़्सीर:
जब सबा की रानी सुलैमान के पास आई, तो उसकी परीक्षा करने के लिए उससे कहा गया : क्या यह तेरे सिंहासन के समान है? उसने प्रश्न के अनुसार उत्तर दिया : मानो यह वही है। तो सुलैमान ने कहा : अल्लाह ने हमें इससे पहले ही ज्ञान दे रखा था कि वह इस तरह के कार्यों को अंजाम देने की पूरी शक्ति रखता है। तथा हम अल्लाह के आदेश के अधीन थे और उसके प्रति आज्ञाकारी थे।
आयत 43
وَصَدَّهَا مَا كَانَت تَّعْبُدُ مِن دُونِ ٱللَّهِ ۖ إِنَّهَا كَانَتْ مِن قَوْمٍۢ كَـٰفِرِينَ
وَصَدَّهَا
और रोक रखा था उसे
مَا
जिसकी
كَانَت
थी वो
تَّعْبُدُ
वो इबादत करती
مِن
besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के
إِنَّهَا
बेशक वो
كَانَتْ
थी वो
مِن
from
قَوْمٍۢ
क़ौम से
كَـٰفِرِينَ
काफ़िरों की
अल्लाह से हटकर वह दूसरे को पूजती थी। इसी चीज़ ने उसे रोक रखा था। निस्संदेह वह एक इनकार करनेवाली क़ौम में से थी
तफ़्सीर:
और उसे अल्लाह की तौहीद (एकेश्वरवाद) से उस चीज़ ने रोक रखा था जो वह अपनी जाति का अनुकरण करते हुए अल्लाह के अलावा पूजती थी। निःसंदेह वह उन लोगों में से थी जो अल्लाह का इनकार करने वाले थे। इसलिए वह (भी) उनके समान काफ़िर थी।
आयत 44
قِيلَ لَهَا ٱدْخُلِى ٱلصَّرْحَ ۖ فَلَمَّا رَأَتْهُ حَسِبَتْهُ لُجَّةًۭ وَكَشَفَتْ عَن سَاقَيْهَا ۚ قَالَ إِنَّهُۥ صَرْحٌۭ مُّمَرَّدٌۭ مِّن قَوَارِيرَ ۗ قَالَتْ رَبِّ إِنِّى ظَلَمْتُ نَفْسِى وَأَسْلَمْتُ مَعَ سُلَيْمَـٰنَ لِلَّهِ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
قِيلَ
कहा गया
لَهَا
उसे
ٱدْخُلِى
दाख़िल हो जाओ
ٱلصَّرْحَ ۖ
महल में
فَلَمَّا
तो जब
رَأَتْهُ
उसने देखा उसे
حَسِبَتْهُ
वो समझी उसे
لُجَّةًۭ
गहरा पानी
وَكَشَفَتْ
और उसने खोल दीं
عَن
[on]
سَاقَيْهَا ۚ
पिंडलियाँ अपनी
قَالَ
उसने कहा
إِنَّهُۥ
बेशक वो
صَرْحٌۭ
महल है
مُّمَرَّدٌۭ
चिकना
مِّن
of
قَوَارِيرَ ۗ
(बनाया गया) शीशों से
قَالَتْ
वो कहने लगी
رَبِّ
ऐ मेरे रब
إِنِّى
बेशक मैं
ظَلَمْتُ
ज़ुल्म किया मैं ने
نَفْسِى
अपनी जान पर
وَأَسْلَمْتُ
और इस्लाम ले आई मैं
مَعَ
साथ
سُلَيْمَـٰنَ
सुलैमान के
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
رَبِّ
जो रब है
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों का
उससे कहा गया कि "महल में प्रवेश करो।" तो जब उसने उसे देखा तो उसने उसको गहरा पानी समझा और उसने अपनी दोनों पिंडलियाँ खोल दी। उसने कहा, "यह तो शीशे से निर्मित महल है।" बोली, "ऐ मेरे रब! निश्चय ही मैंने अपने आपपर ज़ुल्म किया। अब मैंने सुलैमान के साथ अपने आपको अल्लाह के समर्पित कर दिया, जो सारे संसार का रब है।"
तफ़्सीर:
उससे कहा गया कि महल में प्रवेश कर जाओ, जो एक सतह के समान था। जब उसने महल को देखा, तो उसे कोई जलाशय समझ बैठी और उसमें उतरने के लिए अपनी दोनों पिंडलियाँ खोल दीं। सुलैमान अलैहिस्सलाम ने कहा : यह एक चिकना कांच का भवन है। फिर उसे इस्लाम की ओर आमंत्रित किया। और उसने उनके आमंत्रण को स्वीकार कर लिया, यह कहते हुए : ऐ मेरे पालनहार! मैंने तेरे साथ तेरे अलावा की पूजा करके अपने ऊपर अत्याचार किया है और (अब) मैं सुलैमान अलैहिस्सलाम के साथ सभी प्राणियों के पालनहार अल्लाह की आज्ञाकारिणी हो गई।
आयत 45
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَآ إِلَىٰ ثَمُودَ أَخَاهُمْ صَـٰلِحًا أَنِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ فَإِذَا هُمْ فَرِيقَانِ يَخْتَصِمُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक
أَرْسَلْنَآ
भेजा हमने
إِلَىٰ
to
ثَمُودَ
तरफ़ समूद के
أَخَاهُمْ
उनके भाई
صَـٰلِحًا
सालेह को
أَنِ
कि
ٱعْبُدُوا۟
इबादत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
فَإِذَا
तो यकायक
هُمْ
वो
فَرِيقَانِ
दो फ़रीक़ हो कर
يَخْتَصِمُونَ
वो झगड़ रहे थे
और समूद की ओर हमने उनके भाई सालेह को भेजा कि "अल्लाह की बन्दगी करो।" तो क्या देखते है कि वे दो गिरोह होकर आपस में झगड़ने लगे
तफ़्सीर:
हमने समूद जाति की ओर उनके नसबी भाई सालेह अलैहिस्सलाम को भेजा कि तुम केवल एकमात्र अल्लाह की इबादत करो। परंतु उनके निमंत्रण के बाद वे दो समूह बन गए : एक ईमान लाने वाला समूह और दूसरा काफिर समूह, वे इस बात पर झगड़ने लगे कि उनमें से कौन सत्य पर है।
आयत 46
قَالَ يَـٰقَوْمِ لِمَ تَسْتَعْجِلُونَ بِٱلسَّيِّئَةِ قَبْلَ ٱلْحَسَنَةِ ۖ لَوْلَا تَسْتَغْفِرُونَ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
قَالَ
उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
لِمَ
क्यों
تَسْتَعْجِلُونَ
तुम जल्दी माँगते हो
بِٱلسَّيِّئَةِ
बुराई को
قَبْلَ
क़ब्ल
ٱلْحَسَنَةِ ۖ
भलाई से
لَوْلَا
क्यों नहीं
تَسْتَغْفِرُونَ
तुम बख़्शिश माँगते
ٱللَّهَ
अल्लाह से
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تُرْحَمُونَ
तुम रहम किए जाओ
उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगों, तुम भलाई से पहले बुराई के लिए क्यों जल्दी मचा रहे हो? तुम अल्लाह से क्षमा याचना क्यों नहीं करते? कदाचित तुमपर दया की जाए।"
तफ़्सीर:
सालेह अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा : तुम रहमत से पहले अज़ाब को क्यों जल्दी माँगते हो? तुम अपने पापों के लिए अल्लाह से क्षमा क्यों नहीं माँगते, इस आशा में कि वह तुमपर दया करे।
आयत 47
قَالُوا۟ ٱطَّيَّرْنَا بِكَ وَبِمَن مَّعَكَ ۚ قَالَ طَـٰٓئِرُكُمْ عِندَ ٱللَّهِ ۖ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌۭ تُفْتَنُونَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
ٱطَّيَّرْنَا
बुरा शगून लिया हमने
بِكَ
तुझसे
وَبِمَن
और उनसे जो
مَّعَكَ ۚ
साथ हैं तेरे
قَالَ
कहा
طَـٰٓئِرُكُمْ
बदशगूनी तुम्हारी
عِندَ
(is) with
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के पास है
بَلْ
बल्कि
أَنتُمْ
तुम
قَوْمٌۭ
ऐसे लोग हो
تُفْتَنُونَ
तुम आज़माए जा रहे हो
उन्होंने कहा, "हमने तुम्हें और तुम्हारे साथवालों को अपशकुन पाया है।" उसने कहा, "तुम्हारा शकुन-अपशकुन तो अल्लाह के पास है, बल्कि बात यह है कि तुम लोग आज़माए जा रहे हो।"
तफ़्सीर:
उनके समुदाय ने सत्य से हठधर्म दिखाते हुए उनसे कहा : हम तुमसे तथा तुम्हारे साथ जो मोमिन हैं उनसे अपशकुन लेते हैं। सालेह अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा : तुम अपने ऊपर आने वाली कठिनाइयों के कारण पक्षियों को उड़ाकर जो अपशकुन लेते हो, अल्लाह के पास उसका ज्ञान है, उसमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है। बल्कि तुम्हें जो बड़ी मात्रा में भलाई प्रदान की जा रही है तथा तुम जो बुराइयों से ग्रस्त होते हो, उनके द्वारा तुम आज़माए जा रहे हो।
आयत 48
وَكَانَ فِى ٱلْمَدِينَةِ تِسْعَةُ رَهْطٍۢ يُفْسِدُونَ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا يُصْلِحُونَ
وَكَانَ
और थे
فِى
in
ٱلْمَدِينَةِ
शहर में
تِسْعَةُ
नौ
رَهْطٍۢ
गिरोह
يُفْسِدُونَ
वो फ़साद करते थे
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَلَا
और ना
يُصْلِحُونَ
वो इस्लाह करते थे
नगर में नौ जत्थेदार थे जो धरती में बिगाड़ पैदा करते थे, सुधार का काम नहीं करते थे
तफ़्सीर:
और "हिज्र" शहर में नौ आदमी थे, जो कुफ़्र और पापों के द्वारा धरती में बिगाड़ पैदा करते थे, तथा ईमान और अच्छे कर्मों के द्वारा उसमें सुधार नहीं करते थे।
आयत 49
قَالُوا۟ تَقَاسَمُوا۟ بِٱللَّهِ لَنُبَيِّتَنَّهُۥ وَأَهْلَهُۥ ثُمَّ لَنَقُولَنَّ لِوَلِيِّهِۦ مَا شَهِدْنَا مَهْلِكَ أَهْلِهِۦ وَإِنَّا لَصَـٰدِقُونَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
تَقَاسَمُوا۟
आपस में क़सम खाओ
بِٱللَّهِ
अल्लाह की
لَنُبَيِّتَنَّهُۥ
अलबत्ता हम ज़रूर रात को हमला करेंगे उस पर
وَأَهْلَهُۥ
और उसके घर वालों पर
ثُمَّ
फिर
لَنَقُولَنَّ
अलबत्ता हम ज़रूर कहेंगे
لِوَلِيِّهِۦ
उसके सरपरस्त से
مَا
नहीं
شَهِدْنَا
मौजूद थे हम
مَهْلِكَ
हलाकत के वक़्त
أَهْلِهِۦ
उसके ख़ानदान की
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَصَـٰدِقُونَ
अलबत्ता सच्चे हैं
वे आपस में अल्लाह की क़समें खाकर बोले, "हम अवश्य उसपर और उसके घरवालों पर रात को छापा मारेंगे। फिर उसके वली (परिजन) से कह देंगे कि हम उसके घरवालों के विनाश के अवसर पर मौजूद न थे। और हम बिलकुल सच्चे है।"
तफ़्सीर:
उन्होंने एक-दूसरे से कहा : हममें से प्रत्येक व्यक्ति अल्लाह की क़सम खाए कि हम अवश्य ही रात में उसके घर पर हमला करेंगे, फिर हम अवश्य ही उसे और उसके परिवार को क़त्ल कर देंगे। फिर हम अवश्य ही उसके खून के उत्तराधिकारी से कह देंगे : हम सालेह और उसके परिवार की हत्या के समय उपस्थित नहीं थे और हमने जो कहा, उसमें हम बिलकुल सच्चे हैं।
आयत 50
وَمَكَرُوا۟ مَكْرًۭا وَمَكَرْنَا مَكْرًۭا وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
وَمَكَرُوا۟
और उन्होंने चाल चली
مَكْرًۭا
एक चाल
وَمَكَرْنَا
और तदबीर की हमने
مَكْرًۭا
एक तदबीर
وَهُمْ
और वो
لَا
(did) not
يَشْعُرُونَ
ना वो शऊर रखते थे
वे एक चाल चले और हमने भी एक चाल चली और उन्हें ख़बर तक न हुई
तफ़्सीर:
और उन्होंने सालेह तथा उनके ईमान वाले अनुयायियों को नष्ट करने के लिए एक छिपी हुई साजिश रची, तथा हमने भी उनकी मदद करने, उन्हें उन लोगों की साज़िश से बचाने और उनकी जाति के काफ़िरों को नष्ट करने के लिए गुप्त उपाय किया, और वे इसके बारे में नहीं जानते थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सुलेमान अलैहिस्सलाम का तख्त मंगवाना और बिलक़ीस के ईमान लाने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि सच्चाई सामने आने पर पुराने गलत अकीदे छोड़कर हक कबूल करने में देर नहीं करनी चाहिए।
आयत 51
فَٱنظُرْ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ مَكْرِهِمْ أَنَّا دَمَّرْنَـٰهُمْ وَقَوْمَهُمْ أَجْمَعِينَ
فَٱنظُرْ
पस देखिए
كَيْفَ
कैसा
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अंजाम
مَكْرِهِمْ
उनकी चाल का
أَنَّا
बेशक हम
دَمَّرْنَـٰهُمْ
तबाह कर दिया हमने उन्हें
وَقَوْمَهُمْ
और उनकी क़ौम को
أَجْمَعِينَ
सब के सबको
अब देख लो, उनकी चाल का कैसा परिणाम हुआ! हमने उन्हें और उनकी क़ौम - सबको विनष्ट करके रख दिया
तफ़्सीर:
तो (ऐ रसूल!) आप ग़ौर कीजिए कि उनकी साज़िश और चाल का परिणाम कैसा रहा? हमने उन्हें अपनी ओर से यातना देकर सबको विनष्ट कर दिया।
आयत 52
فَتِلْكَ بُيُوتُهُمْ خَاوِيَةًۢ بِمَا ظَلَمُوٓا۟ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ لِّقَوْمٍۢ يَعْلَمُونَ
فَتِلْكَ
तो ये
بُيُوتُهُمْ
उनके घर हैं
خَاوِيَةًۢ
गिरे हुए
بِمَا
बवजह उसके जो
ظَلَمُوٓا۟ ۗ
उन्होंने ज़ुल्म किया
إِنَّ
यक़ीनन
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَةًۭ
अलबत्ता एक निशानी है
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَعْلَمُونَ
जो इल्म रखते हैं
अब ये उनके घर उनके ज़ुल्म के कारण उजडें पड़े हुए है। निश्चय ही इसमें एक बड़ी निशानी है उन लोगों के लिए जो जानना चाहें
तफ़्सीर:
तो ये उनके घर हैं जिनकी दीवारें उनकी छतों समेत गिर गई हैं और अपने निवासियों से खाली हैं, ऐसा उनके अत्याचार के कारण हुआ है। इन लोगों को उनके अत्याचार के कारण जो यातना पहुँची है, उसमें उन लोगों के लिए निश्चय एक सबक़ है जो ईमान रखते हैं, क्योंकि वही लोग हैं जो निशानियों से सबक़ हासिल करते हैं।
आयत 53
وَأَنجَيْنَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَكَانُوا۟ يَتَّقُونَ
وَأَنجَيْنَا
और निजात दी हमने
ٱلَّذِينَ
उन्हें जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَكَانُوا۟
और थे वो
يَتَّقُونَ
वो डरते
और हमने उन लोगों को बचा लिया, जो ईमान लाए और डर रखते थे
तफ़्सीर:
और हमने सालेह अलैहिस्सलाम के समुदाय में से उन लोगों को बचा लिया, जो अल्लाह पर ईमान लाए तथा अल्लाह से उसकी आज्ञाओं का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर डरते थे।
आयत 54
وَلُوطًا إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِۦٓ أَتَأْتُونَ ٱلْفَـٰحِشَةَ وَأَنتُمْ تُبْصِرُونَ
وَلُوطًا
और लूत को
إِذْ
जब
قَالَ
उसने कहा
لِقَوْمِهِۦٓ
अपनी क़ौम से
أَتَأْتُونَ
क्या तुम आते हो
ٱلْفَـٰحِشَةَ
बेहयाई को
وَأَنتُمْ
हालाँकि तुम
تُبْصِرُونَ
तुम देखते हो
और लूत को भी भेजा, जब उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "क्या तुम आँखों देखते हुए अश्लील कर्म करते हो?
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) लूत अलैहिस्सलाम को याद करें, जब उन्होंने अपनी जाति से, उन्हें फटकार लगाते तथा उनकी निंदा करते हुए कहा : क्या तुम अपने क्लबों में खुले तौर पर घिनौना काम - लिवात - करते हो, जबकि तुम एक-दूसरे को देखते हो?!
आयत 55
أَئِنَّكُمْ لَتَأْتُونَ ٱلرِّجَالَ شَهْوَةًۭ مِّن دُونِ ٱلنِّسَآءِ ۚ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌۭ تَجْهَلُونَ
أَئِنَّكُمْ
क्या बेशक तुम
لَتَأْتُونَ
अलबत्ता तुम आते हो
ٱلرِّجَالَ
मर्दों के पास
شَهْوَةًۭ
शहवत के लिए
مِّن
instead of
دُونِ
अलावा
ٱلنِّسَآءِ ۚ
औरतों के
بَلْ
बल्कि
أَنتُمْ
तुम
قَوْمٌۭ
एक क़ौम हो
تَجْهَلُونَ
तुम जिहालत बरतते हो
क्या तुम स्त्रियों को छोड़कर अपनी काम-तृप्ति के लिए पुरुषों के पास जाते हो? बल्कि बात यह है कि तुम बड़े ही जाहिल लोग हो।"
तफ़्सीर:
क्या वाक़ई तुम औरतों को छोड़कर कामवासना की पूर्ति के लिए मर्दों के पास जाते हो! तुम शुद्धता या संतान नहीं चाहते, केवल एक पशु वासना की पूर्ति चाहते हो।बल्कि, तुम ऐसे लोग हो जिन्हें अपने ऊपर अनिवार्य ईमान, पवित्रता और पापों से दूरी का भी ज्ञान नहीं है।
आयत 56
۞ فَمَا كَانَ جَوَابَ قَوْمِهِۦٓ إِلَّآ أَن قَالُوٓا۟ أَخْرِجُوٓا۟ ءَالَ لُوطٍۢ مِّن قَرْيَتِكُمْ ۖ إِنَّهُمْ أُنَاسٌۭ يَتَطَهَّرُونَ
۞ فَمَا
तो ना
كَانَ
था
جَوَابَ
जवाब
قَوْمِهِۦٓ
उसकी क़ौम का
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَخْرِجُوٓا۟
निकाल दो
ءَالَ
(the) family
لُوطٍۢ
आले लूत को
مِّن
from
قَرْيَتِكُمْ ۖ
अपनी बस्ती से
إِنَّهُمْ
बेशक वो
أُنَاسٌۭ
लोग
يَتَطَهَّرُونَ
वो बहुत पाकबाज़ बनते हैं
परन्तु उसकी क़ौम के लोगों का उत्तर इसके सिवा कुछ न था कि उन्होंने कहा, "निकाल बाहर करो लूत के घरवालों को अपनी बस्ती से। ये लोग सुथराई को बहुत पसन्द करते है!"
तफ़्सीर:
उनकी जाति के पास इसके सिवा कोई उत्तर नहीं था कि उन्होंने कहा : लूत के परिवार को अपनी बस्ती से निकाल दो। ये ऐसे लोग हैं जो गंदगी और अशुद्धता से बड़े पवित्र बनते हैं। उन्होंने यह बात लूत के परिवार का मज़ाक उड़ाते हुए कही थी, जो उनके द्वारा किए जाने वाले घिनौने कामों में हिस्सा नहीं लेते थे, बल्कि उन्हें करने पर उनकी निंदा करते थे।
आयत 57
فَأَنجَيْنَـٰهُ وَأَهْلَهُۥٓ إِلَّا ٱمْرَأَتَهُۥ قَدَّرْنَـٰهَا مِنَ ٱلْغَـٰبِرِينَ
فَأَنجَيْنَـٰهُ
तो निजात दी हमने उसे
وَأَهْلَهُۥٓ
और उसके घर वालों को
إِلَّا
सिवाए
ٱمْرَأَتَهُۥ
उसकी बीवी के
قَدَّرْنَـٰهَا
मुक़द्दर कर दिया हमने उसे
مِنَ
(to be) of
ٱلْغَـٰبِرِينَ
पीछे रहने वालों में से
अन्ततः हमने उसे और उसके घरवालों को बचा लिया सिवाय उसकी स्त्री के। उसके लिए हमने नियत कर दिया था कि वह पीछे रह जानेवालों में से होगी
तफ़्सीर:
अतः हमने उन्हें और उनके घर वालों को बचा लिया, केवल उनकी पत्नी को छोड़कर। हमने उसके बारे में यह फैसला कर दिया था कि वह यातना में बाक़ी रहने वालों में से होगी, ताकि वह हलाक होने वालों में से हो जाए।
आयत 58
وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِم مَّطَرًۭا ۖ فَسَآءَ مَطَرُ ٱلْمُنذَرِينَ
وَأَمْطَرْنَا
और बरसाई हमने
عَلَيْهِم
उन पर
مَّطَرًۭا ۖ
एक बारिश
فَسَآءَ
तो बहुत बुरी थी
مَطَرُ
बारिश
ٱلْمُنذَرِينَ
डराए जाने वालों की
और हमने उनपर एक बरसात बरसाई और वह बहुत ही बुरी बरसात था उन लोगों के हक़ में, जिन्हें सचेत किया जा चुका था
तफ़्सीर:
हमने उनपर आसमान से पत्थर बरसाए, तो यह उन लोगों के लिए बहुत बुरी और विनाशकारी बारिश थी, जो यातना से डराए गए थे, परंतु वे नहीं माने।
आयत 59
قُلِ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ وَسَلَـٰمٌ عَلَىٰ عِبَادِهِ ٱلَّذِينَ ٱصْطَفَىٰٓ ۗ ءَآللَّهُ خَيْرٌ أَمَّا يُشْرِكُونَ
قُلِ
कह दीजिए
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए है
وَسَلَـٰمٌ
और सलाम है
عَلَىٰ
upon
عِبَادِهِ
उसके उन बन्दों पर
ٱلَّذِينَ
जिन्हें
ٱصْطَفَىٰٓ ۗ
उसने चुन लिया
ءَآللَّهُ
क्या अल्लाह
خَيْرٌ
बेहतर है
أَمَّا
या जिन्हें
يُشْرِكُونَ
वो शरीक ठहराते हैं
कहो, "प्रशंसा अल्लाह के लिए है और सलाम है उनके उन बन्दों पर जिन्हें उसने चुन लिया। क्या अल्लाह अच्छा है या वे जिन्हें वे साझी ठहरा रहे है?
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दें : सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है उसकी नेमतों पर, तथा उसकी ओर से नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा के लिए उसकी उस यातना से सुरक्षा (हिफ़ाज़त) है, जिसके साथ लूत और सालेह (अलैहिमस्सलाम) की जाति के लोग दंडित किए गए। क्या सत्य पूज्य अल्लाह जिसके हाथ में हर चीज़ का राज्य है, बेहतर है अथवा बहुदेववादियों द्वारा पूजे जाने वाले देवता, जो किसी लाभ और हानि के मालिक नहीं हैं?!
आयत 60
أَمَّنْ خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَأَنزَلَ لَكُم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ فَأَنۢبَتْنَا بِهِۦ حَدَآئِقَ ذَاتَ بَهْجَةٍۢ مَّا كَانَ لَكُمْ أَن تُنۢبِتُوا۟ شَجَرَهَآ ۗ أَءِلَـٰهٌۭ مَّعَ ٱللَّهِ ۚ بَلْ هُمْ قَوْمٌۭ يَعْدِلُونَ
أَمَّنْ
या कौन है जिसने
خَلَقَ
पैदा किया
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
وَأَنزَلَ
और उसने उतारा
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مَآءًۭ
पानी
فَأَنۢبَتْنَا
फिर उगाए हमने
بِهِۦ
साथ इसके
حَدَآئِقَ
बाग़ात
ذَاتَ
of beauty (and delight)
بَهْجَةٍۢ
रौनक़ वाले
مَّا
ना
كَانَ
था
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
أَن
कि
تُنۢبِتُوا۟
तुम उगा सको
شَجَرَهَآ ۗ
दरख़्त उनके
أَءِلَـٰهٌۭ
क्या है कोई इलाह
مَّعَ
साथ
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के
بَلْ
बल्कि
هُمْ
वो
قَوْمٌۭ
ऐसे लोग हैं
يَعْدِلُونَ
जो(अल्लाह के) बराबर क़रार देते हैं
(तुम्हारे पूज्य अच्छे है) या वह जिसने आकाशों और धरती को पैदा किया और तुम्हारे लिए आकाश से पानी बरसाया; उसके द्वारा हमने रमणीय उद्यान उगाए? तुम्हारे लिए सम्भव न था कि तुम उनके वृक्षों को उगाते। - क्या अल्लाह के साथ कोई और प्रभु-पूज्य है? नहीं, बल्कि वही लोग मार्ग से हटकर चले जा रहे है!
तफ़्सीर:
अथवा वह (बेहतर) है, जिसने बिना किसी पूर्व नमूने के आकाशों एवं धरती को पैदा किया तथा उसने (ऐ लोगो!) तुम्हारे लिए आकाश से बारिश का पानी उतारा, फिर हमने उससे सुंदर और भव्य बगीचे उगाए। तुम्हारे लिए संभव नहीं था कि तुम उन बागों के पेड़ों को उगाते, क्योंकि तुम ऐसा करने में अक्षम थे। अतः अल्लाह ही है जिसने उन्हें उगाया। क्या किसी अन्य पूज्य ने अल्लाह के साथ यह सब काम किया है?! नहीं! बल्कि वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से भटक जाते हैं, इसलिए अन्यायपूर्ण रूप से सृष्टिकर्ता को सृष्टि के बराबर कर देते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सालेह अलैहिस्सलाम, समूद कौम और लूत अलैहिस्सलाम का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि हक की दावत के मुकाबले में साज़िश करने वाले आखिरकार खुद तबाह होते हैं।
आयत 61
أَمَّن جَعَلَ ٱلْأَرْضَ قَرَارًۭا وَجَعَلَ خِلَـٰلَهَآ أَنْهَـٰرًۭا وَجَعَلَ لَهَا رَوَٰسِىَ وَجَعَلَ بَيْنَ ٱلْبَحْرَيْنِ حَاجِزًا ۗ أَءِلَـٰهٌۭ مَّعَ ٱللَّهِ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
أَمَّن
या कौन है जिसने
جَعَلَ
बनाया
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
قَرَارًۭا
जाए क़रार
وَجَعَلَ
और उसने बनाया
خِلَـٰلَهَآ
दर्मियान उसके
أَنْهَـٰرًۭا
नहरों को
وَجَعَلَ
और उसने बनाया
لَهَا
उसके लिए
رَوَٰسِىَ
पहाड़ों को
وَجَعَلَ
और उसने बनाया
بَيْنَ
दर्मियान
ٱلْبَحْرَيْنِ
दो समुन्दरों के
حَاجِزًا ۗ
एक परदा
أَءِلَـٰهٌۭ
क्या है कोई इलाह
مَّعَ
साथ
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के
بَلْ
बल्कि
أَكْثَرُهُمْ
अक्सर उनके
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
या वह जिसने धरती को ठहरने का स्थान बनाया और उसके बीच-बीच में नदियाँ बहाई और उसके लिए मज़बूत पहाड़ बनाए और दो समुद्रों के बीच एक रोक लगा दी। क्या अल्लाह के साथ कोई और प्रभु पूज्य है? नहीं, उनमें से अधिकतर लोग जानते ही नही!
तफ़्सीर:
अथवा वह (बेहतर) है, जिसने धरती को स्थिर बनाया, जो अपने ऊपर मौजूद चीज़ों के साथ हिलती-डुलती नहीं है, तथा उसके भीतर बहने वाली नदियों को बनाया और उसके लिए स्थिर पर्वत बनाए, तथा दो समुद्रों : खारे और मीठे के बीच एक विभाजक बनाया, जो खारे पानी को मीठे पानी के साथ मिलने से रोकता है ताकि उसका स्वाद ख़राब न हो और वह पीने के लिए उपयुक्त न रह जाए। क्या किसी (अन्य) पूज्य ने अल्लाह के साथ यह सारा काम किया है?! कदापि नहीं, बल्कि उनके अधिकांश लोग (अल्लाह की महानता को) नहीं जानते। यदि वे जानते होते तो अल्लाह की किसी सृष्टि को कभी उसका साझी नहीं बनाते।
आयत 62
أَمَّن يُجِيبُ ٱلْمُضْطَرَّ إِذَا دَعَاهُ وَيَكْشِفُ ٱلسُّوٓءَ وَيَجْعَلُكُمْ خُلَفَآءَ ٱلْأَرْضِ ۗ أَءِلَـٰهٌۭ مَّعَ ٱللَّهِ ۚ قَلِيلًۭا مَّا تَذَكَّرُونَ
أَمَّن
या कौन है जो
يُجِيبُ
दुआ क़ुबूल करता है
ٱلْمُضْطَرَّ
बेक़रार की
إِذَا
जब
دَعَاهُ
वो दुआ करता है उससे
وَيَكْشِفُ
और वो दूर करता है
ٱلسُّوٓءَ
तक्लीफ़
وَيَجْعَلُكُمْ
और वो बनाता है तुम्हें
خُلَفَآءَ
जानशीन
ٱلْأَرْضِ ۗ
ज़मीन के
أَءِلَـٰهٌۭ
क्या है कोई इलाह
مَّعَ
साथ
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के
قَلِيلًۭا
Little
مَّا
कितना कम
تَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ते हो
या वह जो व्यग्र की पुकार सुनता है, जब वह उसे पुकारे और तकलीफ़ दूर कर देता है और तुम्हें धरती में अधिकारी बनाता है? क्या अल्लाह के साथ कोई और पूज्य-प्रभु है? तुम ध्यान थोड़े ही देते हो
तफ़्सीर:
अथवा वह (बेहतर) है कि जब कोई कष्ट में पड़ा हुआ व्याकुल व्यक्ति उसे पुकारता है, तो उसकी पुकार सुनता है, तथा इनसान जब रोग और निर्धनता का शिकार होता है, तो उसे इनसे मुक्ति प्रदान करता है, और तुम्हें धरती में उत्तराधिकारी बनाता है, तुम पीढ़ी दर पीढ़ी एक-दूसरे के उत्तराधिकारी बनते हो। क्या कोई (अन्य) पूज्य है जो अल्लाह के साथ यह सारा काम करता है?! कदापि नहीं, तुम बहुत कम उपदेश और सीख ग्रहण करते हो।
आयत 63
أَمَّن يَهْدِيكُمْ فِى ظُلُمَـٰتِ ٱلْبَرِّ وَٱلْبَحْرِ وَمَن يُرْسِلُ ٱلرِّيَـٰحَ بُشْرًۢا بَيْنَ يَدَىْ رَحْمَتِهِۦٓ ۗ أَءِلَـٰهٌۭ مَّعَ ٱللَّهِ ۚ تَعَـٰلَى ٱللَّهُ عَمَّا يُشْرِكُونَ
أَمَّن
या कौन है जो
يَهْدِيكُمْ
राह दिखाता है तुम्हें
فِى
in
ظُلُمَـٰتِ
अँधेरों में
ٱلْبَرِّ
ख़ुशकी के
وَٱلْبَحْرِ
और समुन्दर के
وَمَن
और कौन है जो
يُرْسِلُ
भेजता है
ٱلرِّيَـٰحَ
हवाओं को
بُشْرًۢا
बतौरे ख़ुशख़बरी
بَيْنَ
before
يَدَىْ
आगे-आगे
رَحْمَتِهِۦٓ ۗ
अपनी रहमत के
أَءِلَـٰهٌۭ
क्या है कोई इलाह
مَّعَ
साथ
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के
تَعَـٰلَى
बुलन्दतर है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَمَّا
उससे जो
يُشْرِكُونَ
वो शरीक ठहराते हैं
या वह जो थल और जल के अँधेरों में तुम्हारा मार्गदर्शन करता है और जो अपनी दयालुता के आगे हवाओं को शुभ-सूचना बनाकर भेजता है? क्या अल्लाह के साथ कोई और प्रभु पूज्य है? उच्च है अल्लाह, उस शिर्क से जो वे करते है
तफ़्सीर:
अथवा वह (बेहतर) है, जो थल एवं जल के अँधेरों में विभिन्न स्थलचिह्नों एवं नक्षत्रों द्वारा तुम्हें मार्गदर्शन प्रदान करता है। तथा जो हवाओं को उस वर्षा से पूर्व शुभ सूचना बनाकर भेजता है, जिसके द्वारा वह अपने बंदों पर दया करता है। क्या कोई (अन्य) पूज्य है, जो अल्लाह के साथ यह सारा काम करता है?! अल्लाह उनके उसकी सृष्टियों को उसका साझी बनाने से पाक है।
आयत 64
أَمَّن يَبْدَؤُا۟ ٱلْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُۥ وَمَن يَرْزُقُكُم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ وَٱلْأَرْضِ ۗ أَءِلَـٰهٌۭ مَّعَ ٱللَّهِ ۚ قُلْ هَاتُوا۟ بُرْهَـٰنَكُمْ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
أَمَّن
या कौन है जो
يَبْدَؤُا۟
इब्तिदा करता है
ٱلْخَلْقَ
तख़्लीक़ की
ثُمَّ
फिर
يُعِيدُهُۥ
वो एआदा करेगा उसका
وَمَن
और कौन है जो
يَرْزُقُكُم
रिज़्क़ देता है तुम्हें
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
وَٱلْأَرْضِ ۗ
और ज़मीन से
أَءِلَـٰهٌۭ
क्या है कोई इलाह
مَّعَ
साथ
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के
قُلْ
कह दीजिए
هَاتُوا۟
लाओ
بُرْهَـٰنَكُمْ
दलील अपनी
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
या वह जो सृष्टि का आरम्भ करता है, फिर उसकी पुनरावृत्ति भी करता है, और जो तुमको आकाश और धरती से रोज़ी देता है? क्या अल्लाह के साथ कोई और प्रभ पूज्य है? कहो, "लाओ अपना प्रमाण, यदि तुम सच्चे हो।"
तफ़्सीर:
अथवा वह (बेहतर) है, जो गर्भ के अंदर चरण दर चरण सृष्टि की शुरुआत करता है, फिर उसे मृत्यु देने के बाद पुनः जीवित करेगा। और जो तुम्हें आकाश से उसकी ओर से उतरने वाली वर्षा के द्वारा जीविका प्रदान करता है, तथा तुम्हें धरती से उसमें पौधे उगाकर जीविका देता है? क्या कोई (अन्य) पूज्य है, जो अल्लाह के साथ यह सब करता है?! (ऐ रसूल!) आप इन मुश्रिकों से कह दें : तुम जिस शिर्क पर क़ायम हो, उसपर अपने प्रमाण प्रस्तुत करो, यदि तुम अपने इस दावे में सच्चे हो कि तुम सत्य पर हो?
आयत 65
قُل لَّا يَعْلَمُ مَن فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ٱلْغَيْبَ إِلَّا ٱللَّهُ ۚ وَمَا يَشْعُرُونَ أَيَّانَ يُبْعَثُونَ
قُل
कह दीजिए
لَّا
No (one)
يَعْلَمُ
नहीं जानता
مَن
जो कोई
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन में है
ٱلْغَيْبَ
ग़ैब को
إِلَّا
सिवाए
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह के
وَمَا
और नहीं
يَشْعُرُونَ
वो शऊर रखते
أَيَّانَ
कि कब
يُبْعَثُونَ
वो उठाए जाऐंगे
कहो, "आकाशों और धरती में जो भी है, अल्लाह के सिवा किसी को भी परोक्ष का ज्ञान नहीं है। और न उन्हें इसकी चेतना प्राप्त है कि वे कब उठाए जाएँगे।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दें कि आकाशों में मौजूद फ़रिश्ते और धरती में मौजूद इनसान ग़ैब (परोक्ष) को नहीं जानते। बल्कि एकमात्र अल्लाह ही उसे जानता है। तथा अल्लाह के सिवा आकाशों एवं धरती में मौजूद सभी प्राणी यह नहीं जानते कि वे बदले के लिए कब पुनः जीवित किए जाएँगे।
आयत 66
بَلِ ٱدَّٰرَكَ عِلْمُهُمْ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ بَلْ هُمْ فِى شَكٍّۢ مِّنْهَا ۖ بَلْ هُم مِّنْهَا عَمُونَ
بَلِ
बल्कि
ٱدَّٰرَكَ
गुम हो गया
عِلْمُهُمْ
इल्म उनका
فِى
of
ٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ
आख़िरत के बारे में
بَلْ
बल्कि
هُمْ
वो
فِى
(are) in
شَكٍّۢ
शक में हैं
مِّنْهَا ۖ
उस से
بَلْ
बल्कि
هُم
वो
مِّنْهَا
उससे
عَمُونَ
अँधे हैं
बल्कि आख़िरत के विषय में उनका ज्ञान पक्का हो गया है, बल्कि ये उसकी ओर से कुछ संदेह में है, बल्कि वे उससे अंधे है
तफ़्सीर:
अथवा क्या निरंतर उन्हें आख़िरत के बारे में ज्ञान होता रहा, तो वे इसके बारे में निश्चित हैं? नहीं! बल्कि वे आख़िरत के बारे में संदेह और विस्मय के शिकार हैं। बल्कि, उनकी अंतर्दृष्टि उससे अंधी हो गई है।
आयत 67
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ أَءِذَا كُنَّا تُرَٰبًۭا وَءَابَآؤُنَآ أَئِنَّا لَمُخْرَجُونَ
وَقَالَ
और कहा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
أَءِذَا
क्या जब
كُنَّا
हो जाऐंगे हम
تُرَٰبًۭا
मिट्टी
وَءَابَآؤُنَآ
और आबा ओ अजदाद हमारे
أَئِنَّا
क्या यक़ीनन हम
لَمُخْرَجُونَ
ज़रूर निकाले जाऐंगे
जिन लोगों ने इनकार किया वे कहते है कि "क्या जब हम मिट्टी हो जाएँगे और हमारे बाप-दादा भी, तो क्या वास्तव में हम (जीवित करके) निकाले जाएँगे?
तफ़्सीर:
तथा काफ़िरों ने इनकार करते हुए कहा : क्या जब हम (और हमारे बाप-दादा) मर जाएँगे और मिट्टी बन जाएँगे, तो क्या यह संभव है कि हमें पुनः जीवित किया जाएगा?
आयत 68
لَقَدْ وُعِدْنَا هَـٰذَا نَحْنُ وَءَابَآؤُنَا مِن قَبْلُ إِنْ هَـٰذَآ إِلَّآ أَسَـٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
وُعِدْنَا
वादा किए गए हम
هَـٰذَا
उसका
نَحْنُ
हम
وَءَابَآؤُنَا
और आबा ओ अजदाद हमारे
مِن
before
قَبْلُ
इससे क़ब्ल
إِنْ
नहीं
هَـٰذَآ
ये
إِلَّآ
मगर
أَسَـٰطِيرُ
कहानियाँ हैं
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों की
इसका वादा तो इससे पहले भी किया जा चुका है, हमसे भी और हमारे बाप-दादा से भी। ये तो बस पहले लोगो की कहानियाँ है।"
तफ़्सीर:
निश्चय हमसे वादा किया गया है और इससे पहले हमारे बाप-दादा पिता से भी वादा किया गया था कि हम सभी को पुनर्जीवित किया जाएगा, लेकिन हमने उस वादे की पूर्ति नहीं देखी। हम सब से किया गया यह वादा पहले लोगों की झूठी कथाएँ हैं, जो उन्होंने अपनी पुस्तकों में लिख रखी हैं।
आयत 69
قُلْ سِيرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ فَٱنظُرُوا۟ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلْمُجْرِمِينَ
قُلْ
कह दीजिए
سِيرُوا۟
चलो फिरो
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
فَٱنظُرُوا۟
फिर देखो
كَيْفَ
किस तरह
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अंजाम
ٱلْمُجْرِمِينَ
मुजरिमों का
कहो कि "धरती में चलो-फिरो और देखो कि अपराधियों का कैसा परिणाम हुआ।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप मरणोपरांत पुनः जीवित कर उठाए जाने का इनकार करने वालों से कह दें : धरती के किसी भी हिस्से में चलो-फिरो, फिर विचार करो कि पुनर्जीवन को झुठलाने वाले अपराधियों का परिणाम कैसा रहा? हमने इसका इनकार करने के कारण उन्हें नष्ट कर दिया।
आयत 70
وَلَا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ وَلَا تَكُن فِى ضَيْقٍۢ مِّمَّا يَمْكُرُونَ
وَلَا
और ना
تَحْزَنْ
आप ग़म कीजिए
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَلَا
और ना
تَكُن
आप हों
فِى
in
ضَيْقٍۢ
तंगी में
مِّمَّا
उससे जो
يَمْكُرُونَ
वो चालें चल रहे हैं
उनके प्रति शोकाकुल न हो और न उस चाल से दिल तंग हो, जो वे चल रहे है।
तफ़्सीर:
इन मुश्रिकों के आपके बुलावे से मुँह फेरने के कारण आप शोक न करें, और उनकी साज़िशों से आपका दिल तंग न हो। क्योंकि अल्लाह उनके विरुद्ध आपकी सहायता करेगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह की कुदरत की निशानियों का ज़िक्र है, जैसे कौन मुसीबत में दुआ सुनता है। यह हमें सिखाता है कि मुश्किल वक्त में सिर्फ अल्लाह ही असली सहारा है, इसे याद रखना चाहिए।
आयत 71
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَـٰذَا ٱلْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
مَتَىٰ
कब होगा
هَـٰذَا
ये
ٱلْوَعْدُ
वादा
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
वे कहते है, "यह वादा कब पूरा होगा, यदि तुम सच्चे हो?"
तफ़्सीर:
आपके समुदाय के मरणोपरांत पुनः जीवित कर उठाए जाने का इनकार करने वाले काफ़िर कहते हैं : तुम और ईमान वाले जिस यातना का हमसे वादा करते हो, वह कब आएगी, यदि तुम उसमें सच्चे हो, जिसका तुम दावा करते हो?
आयत 72
قُلْ عَسَىٰٓ أَن يَكُونَ رَدِفَ لَكُم بَعْضُ ٱلَّذِى تَسْتَعْجِلُونَ
قُلْ
कह दीजिए
عَسَىٰٓ
उम्मीद है
أَن
कि
يَكُونَ
हो वो
رَدِفَ
पीछे आ लगे
لَكُم
तुम्हारे
بَعْضُ
बाज़ / कुछ हिस्सा
ٱلَّذِى
वो जो
تَسْتَعْجِلُونَ
तुम जल्दी माँगते हो
कहो, "जिसकी तुम जल्दी मचा रहे हो बहुत सम्भव है कि उसका कोई हिस्सा तुम्हारे पीछे ही लगा हो।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : जिस यातना की तुम जल्दी मचा रहे हो, संभव है कि उसका कुछ हिस्सा तुम्हारे निकट आ गया हो।
आयत 73
وَإِنَّ رَبَّكَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى ٱلنَّاسِ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَشْكُرُونَ
وَإِنَّ
और बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
لَذُو
(is) full of Bounty
فَضْلٍ
अलबत्ता फ़ज़ल वाला है
عَلَى
for
ٱلنَّاسِ
लोगों पर
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَهُمْ
अक्सर उनके
لَا
(are) not
يَشْكُرُونَ
नहीं वो शुक्र करते
निश्चय ही तुम्हारा रब तो लोगों पर उदार अनुग्रह करनेवाला है, किन्तु उनमें से अधिकतर लोग कृतज्ञता नहीं दिखाते
तफ़्सीर:
और निःसंदेह (ऐ रसूल!) आपका पालनहार लोगों पर अति दयावान है कि वह लोगों के कुफ़्र और पापों के बावजूद उन्हें यातना देने में जल्दी नहीं करता। लेकिन अधिकांश लोग अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा नहीं करते।
आयत 74
وَإِنَّ رَبَّكَ لَيَعْلَمُ مَا تُكِنُّ صُدُورُهُمْ وَمَا يُعْلِنُونَ
وَإِنَّ
और बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
لَيَعْلَمُ
अलबत्ता वो जानता है
مَا
जो कुछ
تُكِنُّ
छुपाते हैं
صُدُورُهُمْ
सीने उनके
وَمَا
और जो कुछ
يُعْلِنُونَ
वो ज़ाहिर करते हैं
निश्चय ही तुम्हारा रह भली-भाँति जानता है, जो कुछ उनके सीने छिपाए हुए है और जो कुछ वे प्रकट करते है।
तफ़्सीर:
और निःसंदेह आपका पालनहार जानता है जो उसके बंदों के दिल छिपाए हुए हैं तथा वे जो कुछ प्रकट करते हैं, उनमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है, और वह उन्हें इसके लिए प्रतिफल देगा।
आयत 75
وَمَا مِنْ غَآئِبَةٍۢ فِى ٱلسَّمَآءِ وَٱلْأَرْضِ إِلَّا فِى كِتَـٰبٍۢ مُّبِينٍ
وَمَا
और नहीं
مِنْ
any (thing)
غَآئِبَةٍۢ
कोई ग़ायब होने वाली
فِى
in
ٱلسَّمَآءِ
आसमान में
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन में
إِلَّا
मगर
فِى
(is) in
كِتَـٰبٍۢ
एक किताब में है
مُّبِينٍ
वाज़ेह
आकाश और धरती में छिपी कोई भी चीज़ ऐसी नहीं जो एक स्पष्ट किताब में मौजूद न हो
तफ़्सीर:
जो भी वस्तु आकाश में लोगों से ओझल है, या धरती में लोगों से ओझल है, वह एक स्पष्ट किताब अर्थात् लौह़े-महफ़ूज़ में लिखित रूप से मौजूद है।
आयत 76
إِنَّ هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانَ يَقُصُّ عَلَىٰ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ أَكْثَرَ ٱلَّذِى هُمْ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ
إِنَّ
बेशक
هَـٰذَا
ये
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरान
يَقُصُّ
बयान करता है
عَلَىٰ
to
بَنِىٓ
(the) Children
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल पर
أَكْثَرَ
अक्सर (बातें)
ٱلَّذِى
वो जो
هُمْ
वो
فِيهِ
उनमें
يَخْتَلِفُونَ
वो इख़्तिलाफ़ करते हैं
निस्संदेह यह क़ुरआन इसराईल की सन्तान को अधिकतर ऐसी बाते खोलकर सुनाता है जिनके विषय में उनसे मतभेद है
तफ़्सीर:
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अवतरित होने वाला यह क़ुरआन बनी-इसराईल के सामने उन अधिकांश बातों का वर्णन करता है, जिनमें वे विभेद करते हैं तथा उनकी पथभ्रष्टता को उजागर करता है।
आयत 77
وَإِنَّهُۥ لَهُدًۭى وَرَحْمَةٌۭ لِّلْمُؤْمِنِينَ
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
لَهُدًۭى
अलबत्ता हिदायत है
وَرَحْمَةٌۭ
और रहमत है
لِّلْمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वालों के लिए
और निस्संदह यह तो ईमानवालों के लिए मार्गदर्शन और दयालुता है
तफ़्सीर:
और निःसंदेह यह (क़ुरआन) उन मोमिनों के लिए मार्गदर्शन और दया है जो इसकी शिक्षाओं पर अमल करने वाले हैं।
आयत 78
إِنَّ رَبَّكَ يَقْضِى بَيْنَهُم بِحُكْمِهِۦ ۚ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْعَلِيمُ
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
يَقْضِى
वो फ़ैसला करेगा
بَيْنَهُم
दर्मियान उनके
بِحُكْمِهِۦ ۚ
अपने हुक्म से
وَهُوَ
और वो
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त है
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब इल्म वाला है
निश्चय ही तुम्हारा रब उनके बीच अपने हुक्म से फ़ैसला कर देगा। वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, सर्वज्ञ है
तफ़्सीर:
निश्चय (ऐ रसूल!) आपका रब क़ियामत के दिन लोगों के बीच अर्थात् उनके ईमान वालों और उनके काफ़िरों के बीच अपने न्याय से फ़ैसला करेगा। अतः वह मोमिन पर दया करेगा और काफ़िर को यातना देगा। तथा वही सब पर प्रभुत्वशाली है जो अपने दुश्मनों से बदला लेता है और उसे कोई पराजित नहीं कर सकता, वह सब कुछ जानने वाला है, उसपर सत्यनिष्ठ और असत्यता का पालन करने वाले गड्डमड्ड नहीं हो सकते।
आयत 79
فَتَوَكَّلْ عَلَى ٱللَّهِ ۖ إِنَّكَ عَلَى ٱلْحَقِّ ٱلْمُبِينِ
فَتَوَكَّلْ
पस तवक्कल कीजिए
عَلَى
in
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह पर
إِنَّكَ
और बेशक आप
عَلَى
(are) on
ٱلْحَقِّ
हक़ पर हैं
ٱلْمُبِينِ
वाज़ेह
अतः अल्लाह पर भरोसा रखो। निश्चय ही तुम स्पष्ट सत्य पर हो
तफ़्सीर:
अतः आप अल्लाह पर भरोसा करें, तथा अपने सभी मामलों में उसी पर निर्भर रहें। निःसंदेह आप स्पष्ट सत्य पर हैं।
आयत 80
إِنَّكَ لَا تُسْمِعُ ٱلْمَوْتَىٰ وَلَا تُسْمِعُ ٱلصُّمَّ ٱلدُّعَآءَ إِذَا وَلَّوْا۟ مُدْبِرِينَ
إِنَّكَ
बेशक आप
لَا
(can) not
تُسْمِعُ
नहीं आप सुना सकते
ٱلْمَوْتَىٰ
मुर्दों को
وَلَا
और नहीं
تُسْمِعُ
आप सुना सकते
ٱلصُّمَّ
बहरों को
ٱلدُّعَآءَ
पुकार
إِذَا
जब
وَلَّوْا۟
वो फिर जाऐं
مُدْبِرِينَ
पीठ फेर कर
तुम मुर्दों को नहीं सुना सकते और न बहरों को अपनी पुकार सुना सकते हो, जबकि वे पीठ देकर फिरे भी जा रहें हो।
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उन मरे हुए लोगों को नहीं सुना सकते, जिनके दिल अल्लाह के इनकार के कारण मर चुके हैं। तथा जिनके कानों को अल्लाह ने सत्य सुनने से बहरा कर दिया है, आप उन्हें (भी) वह बात नहीं सुना सकते, जिसकी ओर आप उन्हें बुला रहे हैं, जबकि वे आपसे मुँह फेरकर पलट जाएँ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के यकीन और मुर्दों को ज़िंदा करने की कुदरत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि जिस तरह अल्लाह ज़मीन को मुर्दा से ज़िंदा करता है, उसी तरह वह कयामत में इंसानों को दोबारा ज़िंदा कर सकता है, इस पर यकीन रखना चाहिए।
आयत 81
وَمَآ أَنتَ بِهَـٰدِى ٱلْعُمْىِ عَن ضَلَـٰلَتِهِمْ ۖ إِن تُسْمِعُ إِلَّا مَن يُؤْمِنُ بِـَٔايَـٰتِنَا فَهُم مُّسْلِمُونَ
وَمَآ
और नहीं
أَنتَ
आप
بِهَـٰدِى
हिदायत देने वाले
ٱلْعُمْىِ
अँधों को
عَن
from
ضَلَـٰلَتِهِمْ ۖ
उनकी गुमराही से
إِن
नहीं
تُسْمِعُ
आप सुना सकते
إِلَّا
मगर
مَن
उनको जो
يُؤْمِنُ
ईमान लाते हैं
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात पर
فَهُم
फिर वो
مُّسْلِمُونَ
फ़रमाबरदार हैं
और न तुम अंधों को उनकी गुमराही से हटाकर राह पर ला सकते हो। तुम तो बस उन्हीं को सुना सकते हो, जो हमारी आयतों पर ईमान लाना चाहें। अतः वही आज्ञाकारी होते है
तफ़्सीर:
तथा आप उन्हें सत्य मार्ग नहीं दिखा सकते, जिनकी अंतर्दृष्टि सत्य से अंधी हो गई है। अतः आप उनके लिए शोक न करें और न अपने आप को थकाएँ। आप सत्य बात केवल उन्हीं को समझा सकते हैं, जो हमारी आयतों पर ईमान रखते हैं, सो वही अल्लाह के आदेशों का पालन करने वाले हैं।
आयत 82
۞ وَإِذَا وَقَعَ ٱلْقَوْلُ عَلَيْهِمْ أَخْرَجْنَا لَهُمْ دَآبَّةًۭ مِّنَ ٱلْأَرْضِ تُكَلِّمُهُمْ أَنَّ ٱلنَّاسَ كَانُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا لَا يُوقِنُونَ
۞ وَإِذَا
और जब
وَقَعَ
वाक़ेअ हो जाएगी
ٱلْقَوْلُ
बात
عَلَيْهِمْ
उन पर
أَخْرَجْنَا
निकालेंगे हम
لَهُمْ
उनके लिए
دَآبَّةًۭ
एक जानवर
مِّنَ
from
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन से
تُكَلِّمُهُمْ
जो कलाम करेगा उनसे
أَنَّ
कि बेशक
ٱلنَّاسَ
लोग
كَانُوا۟
थे वो
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात पर
لَا
not
يُوقِنُونَ
ना वो यक़ीन रखते
और जब उनपर बात पूरी हो जाएगी, तो हम उनके लिए धरती का प्राणी सामने लाएँगे जो उनसे बातें करेगा कि "लोग हमारी आयतों पर विश्वास नहीं करते थे"
तफ़्सीर:
जब उनके कुफ़्र एवं पापों पर अडिग रहने के कारण यातना उनपर साबित और आवश्यक हो जाएगी, तथा केवल बुरे लोग ही शेष रह जाएँगे, तो हम क़ियामत के निकट होने पर उनके लिए क़ियामत की बड़ी निशानियों में से एक निशानी निकालेंगे, और वह (निशानी) धरती का एक जानवर है, जो लोगों से इस तरह बात करेगा जो वे समझेंगे, कि लोग हमारे नबी पर उतरने वाली हमारी आयतों पर विश्वास नहीं करते थे।
आयत 83
وَيَوْمَ نَحْشُرُ مِن كُلِّ أُمَّةٍۢ فَوْجًۭا مِّمَّن يُكَذِّبُ بِـَٔايَـٰتِنَا فَهُمْ يُوزَعُونَ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
نَحْشُرُ
हम इकट्ठा करेंगे
مِن
from
كُلِّ
every
أُمَّةٍۢ
हर उम्मत में से
فَوْجًۭا
एक फ़ौज को
مِّمَّن
उनमें से जो
يُكَذِّبُ
झुठलाते हैं
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात को
فَهُمْ
तो वो
يُوزَعُونَ
वो गिरोहों में तक़सीम किए जाऐंगे
और जिस दिन हम प्रत्येक समुदाय में से एक गिरोह, ऐसे लोगों का जो हमारी आयतों को झुठलाते है, घेर लाएँगे। फिर उनकी दर्जाबन्दी की जाएगी
तफ़्सीर:
तथा (ऐ रसूल!) उस दिन को याद कीजिए, जब हम प्रत्येक समुदाय से उनके प्रमुखों का एक समूह इकट्ठा करेंगे, उन लोगों में से जो हमारी आयतों को झुठलाया करते थे। उनमें से प्रथम व्यक्ति से लेकर अंतिम तक को प्रस्तुत किया जाएगा, फिर वे हिसाब-किताब की ओर हाँककर ले जाए जाएँगे।
आयत 84
حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءُو قَالَ أَكَذَّبْتُم بِـَٔايَـٰتِى وَلَمْ تُحِيطُوا۟ بِهَا عِلْمًا أَمَّاذَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
جَآءُو
वो आजाऐंगे
قَالَ
वो फ़रमाएगा
أَكَذَّبْتُم
क्या झुठलाया तुम ने
بِـَٔايَـٰتِى
मेरी आयात को
وَلَمْ
हालाँकि नहीं
تُحِيطُوا۟
तुम ने अहाता किया था
بِهَا
उनका
عِلْمًا
इल्म के ऐतबार से
أَمَّاذَا
या क्या कुछ
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते
यहाँ तक कि जब वे आ जाएँगे तो वह कहेगा, "क्या तुमने मेरी आयतों को झुठलाया, हालाँकि अपने ज्ञान से तुम उनपर हावी न थे या फिर तुम क्या करते थे?"
तफ़्सीर:
उनको हाँका जाता रहेगा, यहाँ तक कि जब वे अपने हिसाब-किताब के स्थान पर पहुँच जाएँगे, तो अल्लाह उनको फटकारते हुए कहेगा : क्या तुमने मेरी उन आयतों को झुठलाया था जो मेरे एकेश्वरवाद को दर्शाने वाली थीं और मेरी शरीयत को सम्मिलित थीं, जबकि तुम्हें उनके असत्य होने का पूर्ण ज्ञान नहीं था कि तुम्हारे लिए उनका झुठलाना उचित होता! या तुमने उनके साथ कौन-सा रवैया अपनाया था, पुष्टि करने का या झुठलाने का?!
आयत 85
وَوَقَعَ ٱلْقَوْلُ عَلَيْهِم بِمَا ظَلَمُوا۟ فَهُمْ لَا يَنطِقُونَ
وَوَقَعَ
और वाक़ेअ हो जाएगी
ٱلْقَوْلُ
बात
عَلَيْهِم
उन पर
بِمَا
बवजह उसके जो
ظَلَمُوا۟
उन्होंने ज़ुल्म किया
فَهُمْ
तो वो
لَا
(will) not
يَنطِقُونَ
ना वो बोल सकेंगे
और बात उनपर पूरी होकर रहेगी, इसलिए कि उन्होंने ज़ुल्म किया। अतः वे कुछ बोल न सकेंगे
तफ़्सीर:
अल्लाह के इनकार तथा उसकी आयतों को झुठलाकर अत्याचार करने के कारण उनपर यातना आ पहुँचेगी। अतः वे अपने बचाव के संदर्भ में कोई बात नहीं कर सकेंगे, क्योंकि वे ऐसा करने में असमर्थ और उनके तर्क अमान्य होंगे।
आयत 86
أَلَمْ يَرَوْا۟ أَنَّا جَعَلْنَا ٱلَّيْلَ لِيَسْكُنُوا۟ فِيهِ وَٱلنَّهَارَ مُبْصِرًا ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّقَوْمٍۢ يُؤْمِنُونَ
أَلَمْ
क्या नहीं
يَرَوْا۟
उन्होंने देखा
أَنَّا
बेशक हम
جَعَلْنَا
बनाया हमने
ٱلَّيْلَ
रात को
لِيَسْكُنُوا۟
ताकि वो सुकून पाऐं
فِيهِ
उसमें
وَٱلنَّهَارَ
और दिन को
مُبْصِرًا ۚ
रौशन
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يُؤْمِنُونَ
जो ईमान लाते हैं
क्या उन्होंने देखा नहीं कि हमने रात को (अँधेरी) बनाया, ताकि वे उसमें शान्ति और चैन प्राप्त करें। और दिन को प्रकाशमान बनाया (कि उसमें काम करें)? निश्चय ही इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ है, जो ईमान ले आएँ
तफ़्सीर:
क्या मरणोपरांत पुनः जीवित किए जाने को झुठलाने वाले ये लोग नहीं देखते कि हमने रात बनाई, ताकि वे उसमें सोकर आराम कर सकें, तथा दिन को प्रकाशमान बनाया, ताकि उसमें देख सकें और अपने कामों के लिए निकल सकें। इस बार-बार होने वाली मृत्यु और उसके बाद जी उठने में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए स्पष्ट निशानियाँ हैं।
आयत 87
وَيَوْمَ يُنفَخُ فِى ٱلصُّورِ فَفَزِعَ مَن فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَن فِى ٱلْأَرْضِ إِلَّا مَن شَآءَ ٱللَّهُ ۚ وَكُلٌّ أَتَوْهُ دَٰخِرِينَ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يُنفَخُ
फूँका जाऐगा
فِى
[in]
ٱلصُّورِ
सूर में
فَفَزِعَ
तो घबरा जाऐगा
مَن
जो कोई
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَن
और जो कोई
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में है
إِلَّا
मगर
مَن
जिसे
شَآءَ
चाहे
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह
وَكُلٌّ
और सब के सब
أَتَوْهُ
आऐंगे उसके पास
دَٰخِرِينَ
ज़लील हो कर
और ख़याल करो जिस दिन सूर (नरसिंघा) में फूँक मारी जाएगी और जो आकाशों और धरती में है, घबरा उठेंगे, सिवाय उनके जिन्हें अल्लाह चाहे - और सब कान दबाए उसके समक्ष उपस्थित हो जाएँगे
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) याद करें उस दिन को, जब सूर फूँकने के कार्य पर नियुक्त फ़रिश्ता नरसिंघा में द्वितीय बार फूँकेगा, तो आकाशों एवं धरती में मौजूद सारी चीज़ें घबरा जाएँगी, सिवाय उसके जिसे अल्लाह ने अपनी कृपा से इस घबराहट से अलग कर दिया। उस दिन अल्लाह के सभी प्राणी उसके पास आज्ञाकारी एवं हीन होकर आएँगे।
आयत 88
وَتَرَى ٱلْجِبَالَ تَحْسَبُهَا جَامِدَةًۭ وَهِىَ تَمُرُّ مَرَّ ٱلسَّحَابِ ۚ صُنْعَ ٱللَّهِ ٱلَّذِىٓ أَتْقَنَ كُلَّ شَىْءٍ ۚ إِنَّهُۥ خَبِيرٌۢ بِمَا تَفْعَلُونَ
وَتَرَى
और आप देखते हैं
ٱلْجِبَالَ
पहाड़ों को
تَحْسَبُهَا
आप समझते हैं उन्हें
جَامِدَةًۭ
जामिद
وَهِىَ
हालाँकि वो
تَمُرُّ
वो चलते हैं
مَرَّ
चलना
ٱلسَّحَابِ ۚ
बादलों का
صُنْعَ
कारीगरी / सनअत है
ٱللَّهِ
अल्लाह की
ٱلَّذِىٓ
वो जिसने
أَتْقَنَ
मज़बूत बनाया
كُلَّ
हर
شَىْءٍ ۚ
चीज़ को
إِنَّهُۥ
बेशक वो
خَبِيرٌۢ
ख़ूब ख़बर रखने वाला है
بِمَا
उसकी जो
تَفْعَلُونَ
तुम करते हो
और तुम पहाड़ों को देखकर समझते हो कि वे जमे हुए है, हालाँकि वे चल रहे होंगे, जिस प्रकार बादल चलते है। यह अल्लाह की कारीगरी है, जिसने हर चीज़ को सुदृढ़ किया। निस्संदेह वह उसकी ख़बर रखता है, जो कुछ तुम करते हो
तफ़्सीर:
उस दिन तुम पहाड़ों को देखकर सोचोगे कि वे स्थिर हैं, हिल नहीं रहे हैं, जबकि वास्तव में वे बादलों की तरह तेज गति से चल रहे होंगे। यह अल्लाह की कारीगरी है, अतः वही है जो उन्हें चला रहा है। निःसंदेह वह भली-भाँति जानता है जो कुछ तुम करते हो, तुम्हारे कार्यों में से कुछ भी उससे छिपा नहीं है, और वह शीघ्र ही तुम्हें उनका बदला देगा।
आयत 89
مَن جَآءَ بِٱلْحَسَنَةِ فَلَهُۥ خَيْرٌۭ مِّنْهَا وَهُم مِّن فَزَعٍۢ يَوْمَئِذٍ ءَامِنُونَ
مَن
जो कोई
جَآءَ
लाएगा
بِٱلْحَسَنَةِ
नेकी को
فَلَهُۥ
तो उसके लिए
خَيْرٌۭ
बेहतर है
مِّنْهَا
उससे
وَهُم
और वो
مِّن
from
فَزَعٍۢ
घबराहट से
يَوْمَئِذٍ
उस दिन
ءَامِنُونَ
अमन में होंगे
जो कोई सुचरित लेकर आया उसको उससे भी अच्छा प्राप्त होगा; और ऐसे लोग घबराहट से उस दिन निश्चिन्त होंगे
तफ़्सीर:
जो कोई क़ियामत के दिन ईमान और नेक कामों के साथ आएगा, उसके लिए जन्नत होगी, और वे अल्लाह के उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के कारण क़ियामत के दिन की घबराहट से सुरक्षित होंगे।
आयत 90
وَمَن جَآءَ بِٱلسَّيِّئَةِ فَكُبَّتْ وُجُوهُهُمْ فِى ٱلنَّارِ هَلْ تُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
وَمَن
और जो कोई
جَآءَ
लाएगा
بِٱلسَّيِّئَةِ
बुराई को
فَكُبَّتْ
तो औंधे डाले जाऐंगे
وُجُوهُهُمْ
चेहरे उनके
فِى
in
ٱلنَّارِ
आग में
هَلْ
नहीं
تُجْزَوْنَ
तुम बदला दिए जाओगे
إِلَّا
मगर
مَا
उसका जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते
और जो कुचरित लेकर आया तो ऐसे लोगों के मुँह आग में औधे होंगे। (और उनसे कहा जाएगा) "क्या तुम उसके सिवा किसी और चीज़ का बदला पा रहे हो, जो तुम करते रहे हो?"
तफ़्सीर:
परंतु जो कुफ़्र और पाप के साथ आएगा, तो उनके लिए नरक है जिसमें उन्हें उनके चेहरों के बल डाला जाएगा, तथा उनसे उन्हें डाँटते और अपमानित करते हुए कहा जाएगा : क्या तुम्हें उसके सिवा किसी और चीज़ का बदला दिया जाएगा, जो तुम दुनिया में कुफ़्र और पाप किया करते थे?
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन की अलामतों और सूर फूंके जाने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कयामत की तैयारी में गफलत नहीं करनी चाहिए, यह किसी भी वक्त आ सकती है।
आयत 91
إِنَّمَآ أُمِرْتُ أَنْ أَعْبُدَ رَبَّ هَـٰذِهِ ٱلْبَلْدَةِ ٱلَّذِى حَرَّمَهَا وَلَهُۥ كُلُّ شَىْءٍۢ ۖ وَأُمِرْتُ أَنْ أَكُونَ مِنَ ٱلْمُسْلِمِينَ
إِنَّمَآ
बेशक
أُمِرْتُ
हुक्म दिया गया है मुझे
أَنْ
कि
أَعْبُدَ
मैं इबादत करूँ
رَبَّ
रब की
هَـٰذِهِ
इस
ٱلْبَلْدَةِ
शहर के
ٱلَّذِى
वो जिसने
حَرَّمَهَا
हराम ठहराया इसे
وَلَهُۥ
और उसी के लिए है
كُلُّ
हर
شَىْءٍۢ ۖ
चीज़
وَأُمِرْتُ
और हुक्म दिया गया है मुझे
أَنْ
कि
أَكُونَ
मैं हो जाऊँ
مِنَ
of
ٱلْمُسْلِمِينَ
फ़रमाबरदारों में से
मुझे तो बस यही आदेश मिला है कि इस नगर (मक्का) के रब की बन्दगी करूँ, जिसने इस आदरणीय ठहराया और उसी की हर चीज़ है। और मुझे आदेश मिला है कि मैं आज्ञाकारी बनकर रहूँ
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : मुझे तो केवल यही आदेश दिया गया है कि मैं मक्का (नगर) के पालनहार की उपासना करूँ, जिसने इसे प्रतिष्ठा एवं सम्मान प्रदान किया है। अतः इसमें रक्त नहीं बहाया जाएगा, इसमें किसी पर अत्याचार नहीं किया जाएगा, इसके शिकार को नहीं मारा जाएगा और यहाँ के पेड़ों को नहीं काटा जाएगा। वही पवित्र अल्लाह हर वस्तु का मालिक है। तथा मुझे आदेश दिया गया है कि मैं अल्लाह के आगे समर्पण करने वालों, उसके आज्ञाकारियों में से हो जाऊँ।
आयत 92
وَأَنْ أَتْلُوَا۟ ٱلْقُرْءَانَ ۖ فَمَنِ ٱهْتَدَىٰ فَإِنَّمَا يَهْتَدِى لِنَفْسِهِۦ ۖ وَمَن ضَلَّ فَقُلْ إِنَّمَآ أَنَا۠ مِنَ ٱلْمُنذِرِينَ
وَأَنْ
और ये कि
أَتْلُوَا۟
मैं तिलावत करूँ
ٱلْقُرْءَانَ ۖ
क़ुरान की
فَمَنِ
तो जो कोई
ٱهْتَدَىٰ
हिदायत पा गया
فَإِنَّمَا
तो बेशक
يَهْتَدِى
वो हिदायत पाएगा
لِنَفْسِهِۦ ۖ
अपने नफ़्स के लिए
وَمَن
और जो कोई
ضَلَّ
भटका
فَقُلْ
तो कह दीजिए
إِنَّمَآ
बेशक
أَنَا۠
मैं तो
مِنَ
of
ٱلْمُنذِرِينَ
डराने वालों में से हूँ
और यह कि क़ुरआन पढ़कर सुनाऊँ। अब जिस किसी ने संमार्ग ग्रहण किया वह अपने ही लिए संमार्ग ग्रहण करेगा। और जो पथभ्रष्टि रहा तो कह दो, "मैं तो बस एक सचेत करनेवाला ही हूँ।"
तफ़्सीर:
तथा मुझे आदेश दिया गया है कि मैं लोगों को क़ुरआन पढ़कर सुनाऊँ। फिर जो इससे मार्गदर्शन प्राप्त करे तथा इसमें जो कुछ है उसके अनुसार काम करे, तो उसके मार्गदर्शन प्राप्त करने का लाभ स्वंय उसी को होगा। परंतु जो उससे भटककर गुमराह हो जाए और उसका इनकार कर दे तथा उसमें जो कुछ है उसके अनुसार कार्य न करे, तो आप कह दें : मैं तो केवल चेतावनी देने वालों में से हूँ, मैं तुम्हें अल्लाह की यातना के बारे में चेतावनी देता हूँ, और तुम्हें सीधे रास्ते पर चलाना मेरे हाथ में नहीं है।
आयत 93
وَقُلِ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ سَيُرِيكُمْ ءَايَـٰتِهِۦ فَتَعْرِفُونَهَا ۚ وَمَا رَبُّكَ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ
وَقُلِ
और कह दीजिए
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए है
سَيُرِيكُمْ
अनक़रीब वो दिखाएगा तुम्हें
ءَايَـٰتِهِۦ
अपनी निशानियाँ
فَتَعْرِفُونَهَا ۚ
तो तुम पहचान लोगे उन्हें
وَمَا
और नहीं
رَبُّكَ
रब आपका
بِغَـٰفِلٍ
ग़ाफ़िल
عَمَّا
उससे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
और कहो, "सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है। जल्द ही वह तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखा देगा और तुम उन्हें पहचान लोगे। और तेरा रब उससे बेख़बर नहीं है, जो कुछ तुम सब कर रहे हो।"
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आप कह दें : अल्लाह की अनगिनत नेमतों के लिए हर प्रकार की प्रशंसा उसी के लिए है। शीघ्र ही अल्लाह तुम्हें स्वंय तुम्हारे अंदर, तथा आकाश एवं धरती और जीविका में अपनी निशानियाँ दिखाएगा। तो तुम उन्हें ऐसे पहचान लोगे कि वह तुम्हें सच्चाई को मानने के लिए मार्गदर्शन करेगा। तथा तुम्हारा पालनहार उससे बेख़बर नहीं है जो कुछ तुम करते हो, बल्कि वह उससे अवगत है। उससे कुछ भी छिपा नहीं है और शीघ्र ही वह तुम्हें उसका बदला देगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नबी ﷺ को सिर्फ अल्लाह की इबादत और कुरआन पढ़ने के हुक्म के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि हमें अपनी ज़िंदगी का मकसद सिर्फ अल्लाह की इबादत और उसकी किताब से जुड़ाव बनाना चाहिए।
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