नाम का मतलब
किस्से / वाकियात (मूसा अलैहिस्सलाम की पूरी ज़िंदगी के किस्से के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-कसस में मूसा अलैहिस्सलाम की पैदाइश से लेकर नबुव्वत मिलने तक का सफर तफ्सील से बयान हुआ है, साथ ही कारून के वाकिये का भी ज़िक्र है। यह सूरह मक्का के मुश्किल दौर में नाज़िल हुई जब मुसलमानों पर सख्तियां हो रही थीं।
फ़ज़ीलत / सार
मूसा अलैहिस्सलाम की मुश्किल परवरिश और आखिरकार नबुव्वत तक पहुंचने का सफर मुश्किल हालात में उम्मीद की बड़ी मिसाल है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ طسٓمٓ
طسٓمٓ
ط س م
ता॰ सीन॰ मीम॰
तफ़्सीर:
(ता, सीन, मीम) सूरतुल-बक़रा की शुरुआत में इस प्रकार के अक्षरों के बारे में बात गुज़र चुकी है।
आयत 2
تِلْكَ ءَايَـٰتُ ٱلْكِتَـٰبِ ٱلْمُبِينِ
تِلْكَ
ये
ءَايَـٰتُ
आयात हैं
ٱلْكِتَـٰبِ
(of) the Book
ٱلْمُبِينِ
वाज़ेह किताब की
(जो आयतें अवतरित हो रही है) वे स्पष्ट। किताब की आयतें हैं
तफ़्सीर:
ये स्पष्ट क़ुरआन की आयतें हैं l
आयत 3
نَتْلُوا۟ عَلَيْكَ مِن نَّبَإِ مُوسَىٰ وَفِرْعَوْنَ بِٱلْحَقِّ لِقَوْمٍۢ يُؤْمِنُونَ
نَتْلُوا۟
हम पढ़ते हैं
عَلَيْكَ
आप पर
مِن
from
نَّبَإِ
कुछ ख़बर
مُوسَىٰ
मूसा की
وَفِرْعَوْنَ
और फ़िरऔन की
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
لِقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يُؤْمِنُونَ
जो ईमान लाते हैं
हम उन्हें मूसा और फ़िरऔन का कुछ वृत्तान्त ठीक-ठीक सुनाते है, उन लोगों के लिए जो ईमान लाना चाहें
तफ़्सीर:
हम संदेह-रहित सच्चाई के साथ आपके सामने मूसा एवं फ़िरऔन के कुछ समाचार पढ़ते हैं, उन लोगों के लिए जो ईमान रखते हैं; क्योंकि केवल वही लोग इससे लाभ उठाते हैं।
आयत 4
إِنَّ فِرْعَوْنَ عَلَا فِى ٱلْأَرْضِ وَجَعَلَ أَهْلَهَا شِيَعًۭا يَسْتَضْعِفُ طَآئِفَةًۭ مِّنْهُمْ يُذَبِّحُ أَبْنَآءَهُمْ وَيَسْتَحْىِۦ نِسَآءَهُمْ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ مِنَ ٱلْمُفْسِدِينَ
إِنَّ
बेशक
فِرْعَوْنَ
फ़िरऔन ने
عَلَا
सरकशी की
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَجَعَلَ
और उसने कर दिया
أَهْلَهَا
उसके रहने वालों को
شِيَعًۭا
कई गिरोह
يَسْتَضْعِفُ
उसने कमज़ोर कर रखा था
طَآئِفَةًۭ
एक गिरोह को
مِّنْهُمْ
उनमें से
يُذَبِّحُ
वो ज़िबह करता था
أَبْنَآءَهُمْ
उनके बेटों को
وَيَسْتَحْىِۦ
और वो ज़िन्दा छोड़ देता था
نِسَآءَهُمْ ۚ
उनकी औरतों को
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
था वो
مِنَ
of
ٱلْمُفْسِدِينَ
फ़साद करने वालों में से
निस्संदेह फ़िरऔन ने धरती में सरकशी की और उसके निवासियों को विभिन्न गिरोहों में विभक्त कर दिया। उनमें से एक गिरोह को कमज़ोर कर रखा था। वह उनके बेटों की हत्या करता और उनकी स्त्रियों को जीवित रहने देता। निश्चय ही वह बिगाड़ पैदा करनेवालों में से था
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने मिस्र की धरती में सरकशी की और उसपर अधिकार जमा लिया, तथा उसके निवासियों को अलग-अलग गुटों में कर दिया। वह उनमें से एक गुट अर्थात् बनी इसराईल को कमज़ोर कर रखा था। उनके पुरुषों को मार देता और उन्हें और अधिक अपमानित करने के लिए उनकी महिलाओं को सेवा में रखने के लिए जीवित छोड़ देता था। निःसंदेह वह अत्याचार, सरकशी तथा अहंकार के साथ धरती पर बिगाड़ पैदा करने वालों में से था।
आयत 5
وَنُرِيدُ أَن نَّمُنَّ عَلَى ٱلَّذِينَ ٱسْتُضْعِفُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ وَنَجْعَلَهُمْ أَئِمَّةًۭ وَنَجْعَلَهُمُ ٱلْوَٰرِثِينَ
وَنُرِيدُ
और हम चाहते थे
أَن
कि
نَّمُنَّ
हम एहसान करें
عَلَى
upon
ٱلَّذِينَ
उन पर जो
ٱسْتُضْعِفُوا۟
कमज़ोर बनाए गए थे
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَنَجْعَلَهُمْ
और हम बनाऐं उन्हें
أَئِمَّةًۭ
इमाम /पेशवा
وَنَجْعَلَهُمُ
और हम बनाऐं उन्हें
ٱلْوَٰرِثِينَ
वारिस
और हम यह चाहते थे कि उन लोगों पर उपकार करें, जो धरती में कमज़ोर पड़े थे और उन्हें नायक बनाएँ और उन्हीं को वारिस बनाएँ
तफ़्सीर:
और हम चाहते थे कि बनी इसराईल पर, जिन्हें फ़िरऔन ने मिस्र की धरती में कमज़ोर बना दिया था, उनके दुश्मन को नष्ट करके और उनकी निर्बलता को दूर करके उपकार करें, तथा उन्हें पेशवा बना दें जिनका सच्चाई में अनुकरण किया जाए और उन्हें फ़िरऔन के विनाश के बाद शाम की मुबारक (धन्य) भूमि का वारिस बनादें, जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया : "وَأَوْرَثْنَا الْقَوْمَ الَّذِينَ كَانُوا يُسْتَضْعَفُونَ مَشَارِقَ الأَرْضِ وَمَغَارِبَهَا الَّتِي بَارَكْنَا فِيهَاۖ" "हमने उस जाति (बनी इसराईल) को, जो निर्बल समझे जा रहे थे धरती के पूरब के हिस्सों और पश्चिम के हिस्सों का उत्तराधिकारी बना दिया, जिसमें हमने बरकत दी थी...)
आयत 6
وَنُمَكِّنَ لَهُمْ فِى ٱلْأَرْضِ وَنُرِىَ فِرْعَوْنَ وَهَـٰمَـٰنَ وَجُنُودَهُمَا مِنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَحْذَرُونَ
وَنُمَكِّنَ
और हम इक़तिदार बख़्शें
لَهُمْ
उन्हें
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَنُرِىَ
और हम दिखा दें
فِرْعَوْنَ
फ़िरऔन को
وَهَـٰمَـٰنَ
और हामान को
وَجُنُودَهُمَا
और उन दोनों के लश्करों को
مِنْهُم
उनसे
مَّا
(वो चीज़) जिससे
كَانُوا۟
थे वो
يَحْذَرُونَ
वो डरते
और धरती में उन्हें सत्ताधिकार प्रदान करें और उनकी ओर से फ़िरऔन और हामान और उनकी सेनाओं को वह कुछ दिखाएँ, जिसकी उन्हें आशंका थी
तफ़्सीर:
और हम चाहते थे कि उन्हें राजपाट देकर धरती में सत्ता प्रदान करें तथा फिरऔन और राज में उसके सबसे बड़े समर्थक हामान और उनके सैनिकों को, जो उनकी हुकूमत में उनकी मदद करने वाले थे, वह चीज़ दिखाएँ जिससे वे डरते थे कि बनी इसराईल के एक बच्चे के हाथ से उनके राज्य की समाप्ति हो जाएगी।
आयत 7
وَأَوْحَيْنَآ إِلَىٰٓ أُمِّ مُوسَىٰٓ أَنْ أَرْضِعِيهِ ۖ فَإِذَا خِفْتِ عَلَيْهِ فَأَلْقِيهِ فِى ٱلْيَمِّ وَلَا تَخَافِى وَلَا تَحْزَنِىٓ ۖ إِنَّا رَآدُّوهُ إِلَيْكِ وَجَاعِلُوهُ مِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ
وَأَوْحَيْنَآ
और वही की हमने
إِلَىٰٓ
तरफ़
أُمِّ
(the) mother
مُوسَىٰٓ
मूसा की माँ के
أَنْ
कि
أَرْضِعِيهِ ۖ
दूध पिलाओ उसे
فَإِذَا
फिर जब
خِفْتِ
ख़ौफ़ हो तुम्हें
عَلَيْهِ
उस पर
فَأَلْقِيهِ
तो फिर डाल दो उसे
فِى
in(to)
ٱلْيَمِّ
दरया में
وَلَا
और ना
تَخَافِى
तुम डरो
وَلَا
और ना
تَحْزَنِىٓ ۖ
तुम ग़म करो
إِنَّا
बेशक हम
رَآدُّوهُ
लौटा देने वाले हैं उसे
إِلَيْكِ
तरफ़ तेरे
وَجَاعِلُوهُ
और बनाने वाले हैं उसे
مِنَ
of
ٱلْمُرْسَلِينَ
रसूलों में से
हमने मूसा की माँ को संकेत किया कि "उसे दूध पिला फिर जब तुझे उसके विषय में भय हो, तो उसे दरिया में डाल दे और न तुझे कोई भय हो और न तू शोकाकुल हो। हम उसे तेरे पास लौटा लाएँगे और उसे रसूल बनाएँगे।"
तफ़्सीर:
और हमने मूसा अलैहिस्सलाम की माता के हृदय में यह बात डाल दी कि तुम उन्हें दूध पिलाती रहो, यहाँ तक कि जब तुम्हें फ़िरऔन तथा उसकी जाति की ओर से भय हो कि वे उन्हें मार डालेंगे, तो उन्हें संदूक़ में रखकर नील नदी में डाल दो और उसके डूबने का तथा फ़िरऔन की ओर से कोई कष्ट पहुँचने का भय न करो। तथा उनकी जुदाई के कारण शोक मत करो। हम उन्हें तुम्हारे पास जीवित लौटाने वाले हैं तथा उन्हें अपने उन रसूलों में से बनाने वाले हैं, जिन्हें अल्लाह अपने बंदों की ओर भेजता है।
आयत 8
فَٱلْتَقَطَهُۥٓ ءَالُ فِرْعَوْنَ لِيَكُونَ لَهُمْ عَدُوًّۭا وَحَزَنًا ۗ إِنَّ فِرْعَوْنَ وَهَـٰمَـٰنَ وَجُنُودَهُمَا كَانُوا۟ خَـٰطِـِٔينَ
فَٱلْتَقَطَهُۥٓ
पस उठा लिया उसे
ءَالُ
(the) family
فِرْعَوْنَ
आले फ़िरऔन ने
لِيَكُونَ
ताकि वो हो
لَهُمْ
उनके लिए
عَدُوًّۭا
दुश्मन
وَحَزَنًا ۗ
और ग़म को (मोजिब)
إِنَّ
बेशक
فِرْعَوْنَ
फ़िरऔन
وَهَـٰمَـٰنَ
और हामान
وَجُنُودَهُمَا
और उन दोनों के लश्कर
كَانُوا۟
थे वो
خَـٰطِـِٔينَ
ख़ताकार
अन्ततः फ़िरऔन के लोगों ने उसे उठा लिया, ताकि परिणामस्वरूप वह उनका शत्रु और उनके लिए दुख बने। निश्चय ही फ़िरऔन और हामान और उनकी सेनाओं से बड़ी चूक हुई
तफ़्सीर:
जब उन्होंने उसका पालन किया जो हमने उन्हें एक संदूक़ में रखकर नदी में डालने के लिए प्रेरित किया था, तो फ़िरऔन के घर वालों ने उसे पाया और उठा लिया, ताकि वह पूरा हो जाए जो अल्लाह चाहता था कि मूसा शीघ्र ही फ़िरऔन का शत्रु होगा, जिनके हाथ से अल्लाह उसके राज्य को विनष्ट कर देगा, जो उन लोगों के शोक का कारण होगा l निःसंदेह फ़िरऔन तथा उसका मंत्री हामान और उनके सहयोगी अपने कुफ़्र, सरकशी तथा धरती में उपद्रव मचाने के कारण पापी थे।
आयत 9
وَقَالَتِ ٱمْرَأَتُ فِرْعَوْنَ قُرَّتُ عَيْنٍۢ لِّى وَلَكَ ۖ لَا تَقْتُلُوهُ عَسَىٰٓ أَن يَنفَعَنَآ أَوْ نَتَّخِذَهُۥ وَلَدًۭا وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
وَقَالَتِ
और कहने लगी
ٱمْرَأَتُ
बीवी
فِرْعَوْنَ
फ़िरऔन की
قُرَّتُ
ठंडक
عَيْنٍۢ
आँखों की
لِّى
मेरे लिए
وَلَكَ ۖ
और तेरे लिए
لَا
(Do) not
تَقْتُلُوهُ
ना तुम क़त्ल करो इसे
عَسَىٰٓ
उम्मीद है
أَن
कि
يَنفَعَنَآ
वो नफ़ा देगा हमें
أَوْ
या
نَتَّخِذَهُۥ
हम बना लेंगे उसे
وَلَدًۭا
बेटा
وَهُمْ
और वो
لَا
(did) not
يَشْعُرُونَ
नहीं वो शऊर रखते थे
फ़िरऔन की स्त्री ने कहा, "यह मेरी और तुम्हारी आँखों की ठंडक है। इसकी हत्या न करो, कदाचित यह हमें लाभ पहुँचाए या हम इसे अपना बेटा ही बना लें।" और वे (परिणाम से) बेख़बर थे
तफ़्सीर:
जब फ़िरऔन ने उसे मार डालना चाहा, तो उसकी पत्नी ने उससे कहा : यह शिशु मेरे और तुम्हारे लिए आनंद का कारण है। इसे मत मारो, हो सकता है कि यह हमें सेवा से लाभ पहुँचाए, या हम इसे दत्तक पुत्र बना लें। और वे नहीं जानते थे कि उसके हाथ से उनके राज्य का परिणाम क्या होगा।
आयत 10
وَأَصْبَحَ فُؤَادُ أُمِّ مُوسَىٰ فَـٰرِغًا ۖ إِن كَادَتْ لَتُبْدِى بِهِۦ لَوْلَآ أَن رَّبَطْنَا عَلَىٰ قَلْبِهَا لِتَكُونَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
وَأَصْبَحَ
और हो गया
فُؤَادُ
दिल
أُمِّ
(of the) mother
مُوسَىٰ
मूसा की माँ का
فَـٰرِغًا ۖ
ख़ाली
إِن
बेशक
كَادَتْ
क़रीब था
لَتُبْدِى
कि वो ज़ाहिर कर देती
بِهِۦ
उसे
لَوْلَآ
अगर ना होता
أَن
ये कि
رَّبَطْنَا
मज़बूत कर दिया हमने
عَلَىٰ
[over]
قَلْبِهَا
उसके दिल को
لِتَكُونَ
ताकि वो हो
مِنَ
of
ٱلْمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वालों में से
और मूसा की माँ का हृदय विचलित हो गया। निकट था कि वह उसको प्रकट कर देती, यदि हम उसके दिल को इस ध्येय से न सँभालते कि वह मोमिनों में से हो
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम की माता का दिल मूसा के मामले के सिवा किसी भी प्रकार की सांसारिक वस्तु से रहित हो गया। वह अब धीरज नहीं रख पा रही थीं, यहाँ तक कि उसके साथ उनके गहरे लगाव के कारण वह इस बात के क़रीब थीं कि यह प्रकट कर देतीं कि वह उनका बेटा है, यदि ऐसा न होता कि हमने उनके दिल को मज़बूत करके उसका ढारस बँधा दिया तथा उन्हें सब्र प्रदान किया। ताकि वह उन ईमान वालों में शामिल हो जाएँ, जो अपने रब पर भरोसा रखते हैं और उसके फ़ैसले पर सब्र करते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
फिरऔन के ज़ुल्म, मूसा अलैहिस्सलाम की पैदाइश और दरिया में डाले जाने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि मुश्किल हालात में भी अल्लाह की तदबीर इंसान की सोच से बेहतर होती है।
आयत 11
وَقَالَتْ لِأُخْتِهِۦ قُصِّيهِ ۖ فَبَصُرَتْ بِهِۦ عَن جُنُبٍۢ وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
وَقَالَتْ
और वो कहने लगी
لِأُخْتِهِۦ
उसकी बहन से
قُصِّيهِ ۖ
पीछे जा उसके
فَبَصُرَتْ
फिर वो देखती रही
بِهِۦ
उसे
عَن
from
جُنُبٍۢ
दूर से
وَهُمْ
और वो
لَا
(did) not
يَشْعُرُونَ
वो शऊर ना रखते थे
उसने उसकी बहन से कहा, "तू उसके पीछे-पीछे जा।" अतएव वह उसे दूर ही दूर से देखती रही और वे महसूस नहीं कर रहे थे
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम की माता ने उन्हें नदी में डालने के बाद उनकी बहन से कहा : उसके पीछे-पीछे जाओ, ताकि जान सको कि उसके साथ क्या किया जाता है। अतः वह उन्हें दूर ही दूर से देखती रही, ताकि उसका मामला प्रकट न होने पाए। जबकि फ़िरऔन और उसकी जाति के लोगों को पता नहीं था कि यह उनकी बहन है और उनकी सूचना प्राप्त कर रही है।
आयत 12
۞ وَحَرَّمْنَا عَلَيْهِ ٱلْمَرَاضِعَ مِن قَبْلُ فَقَالَتْ هَلْ أَدُلُّكُمْ عَلَىٰٓ أَهْلِ بَيْتٍۢ يَكْفُلُونَهُۥ لَكُمْ وَهُمْ لَهُۥ نَـٰصِحُونَ
۞ وَحَرَّمْنَا
और हराम कर दीं हमने
عَلَيْهِ
उस पर
ٱلْمَرَاضِعَ
दूध पिलाने वालियाँ
مِن
before
قَبْلُ
उससे पहले
فَقَالَتْ
तो वो कहने लगी
هَلْ
क्या
أَدُلُّكُمْ
मैं बताऊँ तुम्हें
عَلَىٰٓ
to
أَهْلِ
(the) people
بَيْتٍۢ
ऐसे घर वाले
يَكْفُلُونَهُۥ
जो किफ़ालत करेंगे इसकी
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
وَهُمْ
और वो
لَهُۥ
उसके लिए
نَـٰصِحُونَ
ख़ैर ख़्वाह हों
हमने पहले ही से दूध पिलानेवालियों को उसपर हराम कर दिया। अतः उसने (मूसा की बहन से) कहा कि "क्या मैं तुम्हें ऐसे घरवालों का पता बताऊँ जो तुम्हारे लिए इसके पालन-पोषण का ज़िम्मा लें और इसके शुभ-चिंतक हों?"
तफ़्सीर:
इससे पहले कि हम मूसा को उनकी माँ के पास लौटाएँ, उन्होंने अल्लाह की योजना के अनुसार किसी भी स्त्री का दूध पीने से इनकार कर दिया। अतः जब मूसा की बहन ने उन लोगों को देखा कि वे उसे दूध पिलाने के लिए उत्सुक हैं, तो उसने उनसे कहा : क्या मैं तुम्हें ऐसे घरवाले बताऊँ, जो इसे दूध पिलाएँ और इसकी देखभाल करें और वे इसके शुभचिंतक हों?
आयत 13
فَرَدَدْنَـٰهُ إِلَىٰٓ أُمِّهِۦ كَىْ تَقَرَّ عَيْنُهَا وَلَا تَحْزَنَ وَلِتَعْلَمَ أَنَّ وَعْدَ ٱللَّهِ حَقٌّۭ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
فَرَدَدْنَـٰهُ
तो लौटा दिया हमने उसे
إِلَىٰٓ
to
أُمِّهِۦ
तरफ़ उसकी माँ के
كَىْ
ताकि
تَقَرَّ
ठंडी हों
عَيْنُهَا
आँखें उसकी
وَلَا
और ना
تَحْزَنَ
वो ग़मगीन हो
وَلِتَعْلَمَ
और ताकि वो जान ले
أَنَّ
यक़ीनन
وَعْدَ
वादा
ٱللَّهِ
अल्लाह का
حَقٌّۭ
सच्चा है
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَهُمْ
अक्सर उनके
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो जानते
इस प्रकार हम उसे उसकी माँ के पास लौटा लाए, ताकि उसकी आँख ठंड़ी हो और वह शोकाकुल न हो और ताकि वह जान ले कि अल्लाह का वादा सच्चा है, किन्तु उनमें से अधिकतर लोग जानते नहीं
तफ़्सीर:
इस प्रकार हमने मूसा को उनकी माँ के पास लौटा दिया, ताकि उसकी आँखें उन्हें क़रीब से देखकर ठंडी रहें तथा उनकी जुदाई के कारण शोक न करें, और ताकि वह जान लें कि मूसा को उनके पास वापस लाने का अल्लाह का वादा सत्य है, जिसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन उनमें से अधिकांश लोग इस वादे के बारे में नहीं जानते, और न ही कोई यह जानता कि वह उनकी माता हैं।
आयत 14
وَلَمَّا بَلَغَ أَشُدَّهُۥ وَٱسْتَوَىٰٓ ءَاتَيْنَـٰهُ حُكْمًۭا وَعِلْمًۭا ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ
وَلَمَّا
और जब
بَلَغَ
वो पहुँचा
أَشُدَّهُۥ
अपनी जवानी को
وَٱسْتَوَىٰٓ
और वो तवाना हो गया
ءَاتَيْنَـٰهُ
अता की हमने उसे
حُكْمًۭا
हिकमत
وَعِلْمًۭا ۚ
और इल्म
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
نَجْزِى
हम बदला देते हैं
ٱلْمُحْسِنِينَ
एहसान करने वालों को
और जब वह अपनी जवानी को पहुँचा और भरपूर हो गया, तो हमने उसे निर्णय-शक्ति और ज्ञान प्रदान किया। और सुकर्मी लोगों को हम इसी प्रकार बदला देते है
तफ़्सीर:
और जब वह शरीर के मज़बूत होने की आयु को पहुँचे तथा अपनी ताकत में दृढ़ हो गए, तो हमने उन्हें पैग़ंबरी प्रदान करने से पूर्व बनी इसराईल के धर्म की समझ तथा ज्ञान दिया। और जिस प्रकार हमने मूसा को उनकी आज्ञाकारिता का प्रतिफल दिया, उसी तरह हम हर समय और स्थान में सदाचारियों को प्रतिफल देते हैं।
आयत 15
وَدَخَلَ ٱلْمَدِينَةَ عَلَىٰ حِينِ غَفْلَةٍۢ مِّنْ أَهْلِهَا فَوَجَدَ فِيهَا رَجُلَيْنِ يَقْتَتِلَانِ هَـٰذَا مِن شِيعَتِهِۦ وَهَـٰذَا مِنْ عَدُوِّهِۦ ۖ فَٱسْتَغَـٰثَهُ ٱلَّذِى مِن شِيعَتِهِۦ عَلَى ٱلَّذِى مِنْ عَدُوِّهِۦ فَوَكَزَهُۥ مُوسَىٰ فَقَضَىٰ عَلَيْهِ ۖ قَالَ هَـٰذَا مِنْ عَمَلِ ٱلشَّيْطَـٰنِ ۖ إِنَّهُۥ عَدُوٌّۭ مُّضِلٌّۭ مُّبِينٌۭ
وَدَخَلَ
और वो दाख़िल हुआ
ٱلْمَدِينَةَ
शहर में
عَلَىٰ
at
حِينِ
a time
غَفْلَةٍۢ
ग़फ़्लत के वक़्त
مِّنْ
of
أَهْلِهَا
उसके रहने वालों की
فَوَجَدَ
तो उस ने पाया
فِيهَا
उस में
رَجُلَيْنِ
दो मर्दों को
يَقْتَتِلَانِ
वो दोनों लड़ रहे थे
هَـٰذَا
ये
مِن
of
شِيعَتِهِۦ
उसके गिरोह में से था
وَهَـٰذَا
और ये(दूसरा)
مِنْ
of
عَدُوِّهِۦ ۖ
उसके दुश्मनों में से था
فَٱسْتَغَـٰثَهُ
पस मदद तलब की उससे
ٱلَّذِى
उसने जो
مِن
(was) from
شِيعَتِهِۦ
उसके गिरोह में से था
عَلَى
against
ٱلَّذِى
उसके ख़िलाफ़
مِنْ
(was) from
عَدُوِّهِۦ
जो उसके दुश्मनों में से था
فَوَكَزَهُۥ
तो घूँसा मारा उसे
مُوسَىٰ
मूसा ने
فَقَضَىٰ
तो पूरी कर दी
عَلَيْهِ ۖ
उस पर (ज़िन्दगी)
قَالَ
बोला
هَـٰذَا
ये
مِنْ
of
عَمَلِ
काम में से है
ٱلشَّيْطَـٰنِ ۖ
शैतान के
إِنَّهُۥ
यक़ीनन वो
عَدُوٌّۭ
दुश्मन है
مُّضِلٌّۭ
गुमराह करने वाला है
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
उसने नगर में ऐसे समय प्रवेश किया जबकि वहाँ के लोग बेख़बर थे। उसने वहाँ दो आदमियों को लड़ते पाया। यह उसके अपने गिरोह का था और यह उसके शत्रुओं में से था। जो उसके गिरोह में से था उसने उसके मुक़ाबले में, जो उसके शत्रुओं में से था, सहायता के लिए उसे पुकारा। मूसा ने उसे घूँसा मारा और उसका काम तमाम कर दिया। कहा, "यह शैतान की कार्यवाई है। निश्चय ही वह खुला पथभ्रष्ट करनेवाला शत्रु है।"
तफ़्सीर:
(एक दिन) मूसा अलैहिस्सलाम उस समय नगर में आए, जब लोग अपने घरों में विश्राम कर रहे थे। उन्होंने वहाँ दो आदमियों को वाद-विवाद करते और आपस में झगड़ते हुए पाया। उनमें से एक मूसा अलैहिस्सलाम की जाति बनी इसराईल से और दूसरा क़िब्तियों में से अर्थात् मूसा के दुश्मन फिरऔन की जाति से था। अतः जो व्यक्ति उनकी जाति से था, उसने मूसा से अपने शत्रु क़िब्ती के विरुद्ध सहायता की गुहार लगाई। चुनाँचे मूसा ने क़िब्ती को एक घूँसा मारा, जिसकी ताक़त से वह तुरंत मर गया। यह देखकर मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा : यह शैतान के (गलत कार्यों को) सुंदर बनाकर पेश करने और उसके प्रलोभन से है। निःसंदेह शैतान एक दुश्मन है जो अपने पीछे चलने वालों को गुमराह करने वाला है, जिसकी दुश्मनी स्पष्ट है। अतः जो कुछ मुझसे हुआ, वह उसकी दुश्मनी के कारण हुआ, और इस कारण कि वह एक गुमराह करने वाला है, जो मुझे गुमराह करना चाहता है।
आयत 16
قَالَ رَبِّ إِنِّى ظَلَمْتُ نَفْسِى فَٱغْفِرْ لِى فَغَفَرَ لَهُۥٓ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْغَفُورُ ٱلرَّحِيمُ
قَالَ
कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
إِنِّى
बेशक मैं
ظَلَمْتُ
ज़ुल्म किया मैं ने
نَفْسِى
अपनी जान पर
فَٱغْفِرْ
so forgive
لِى
पस बख़्श दे मुझे
فَغَفَرَ
तो उसने बख़्श दिया
لَهُۥٓ ۚ
उसे
إِنَّهُۥ
बेशक वो
هُوَ
वो ही
ٱلْغَفُورُ
बहुत बख़्शने वाला
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला
उसने कहा, "ऐ मेरे रब, मैंने अपने आपपर ज़ुल्म किया। अतः तू मुझे क्षमा कर दे।" अतएव उसने उसे क्षमा कर दिया। निश्चय ही वही बड़ी क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने अपने रब से प्रार्थना करते हुए और जो कुछ उनसे हुआ उसे स्वीकारते हुए कहा : ऐ मेरे रब! मैंने इस क़िब्ती को मारकर अपने आप पर अत्याचार किया है। अतः तू मेरे पाप को क्षमा कर दे। तो अल्लाह ने हमें मूसा के लिए अपनी क्षमा स्पष्ट कर दी। निःसंदेह वह अपने क्षमा याचना करने वाले बंदों के लिए क्षमाशील तथा उनपर अत्यंत दयावान् है।
आयत 17
قَالَ رَبِّ بِمَآ أَنْعَمْتَ عَلَىَّ فَلَنْ أَكُونَ ظَهِيرًۭا لِّلْمُجْرِمِينَ
قَالَ
कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
بِمَآ
बवजह उसके जो
أَنْعَمْتَ
इनआम किया तू ने
عَلَىَّ
मुझ पर
فَلَنْ
तो हरगिज़ नहीं
أَكُونَ
मैं हूँगा
ظَهِيرًۭا
मददगार
لِّلْمُجْرِمِينَ
मुजरिमों के लिए
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! जैसे तूने मुझपर अनुकम्पा दर्शाई है, अब मैं भी कभी अपराधियों का सहायक नहीं बनूँगा।"
तफ़्सीर:
फिर उसने मूसा की उस दुआ के बारे में सूचना दी, जिसमें उन्होंने कहा : ऐ मेरे रब! तूने मुझे जो शक्ति, हिकमत और ज्ञान प्रदान किया है, उसके कारण अब मैं अपराधियों का उनके अपराधों के लिए कभी सहायक नहीं बनूँगा।
आयत 18
فَأَصْبَحَ فِى ٱلْمَدِينَةِ خَآئِفًۭا يَتَرَقَّبُ فَإِذَا ٱلَّذِى ٱسْتَنصَرَهُۥ بِٱلْأَمْسِ يَسْتَصْرِخُهُۥ ۚ قَالَ لَهُۥ مُوسَىٰٓ إِنَّكَ لَغَوِىٌّۭ مُّبِينٌۭ
فَأَصْبَحَ
तो उसने सुबह की
فِى
in
ٱلْمَدِينَةِ
शहर में
خَآئِفًۭا
डरते हुए
يَتَرَقَّبُ
ख़ुफ़िया टोह लगाते हुए
فَإِذَا
फिर अचानक
ٱلَّذِى
वो शख़्स
ٱسْتَنصَرَهُۥ
जिसने मदद माँगी थी उससे
بِٱلْأَمْسِ
कल
يَسْتَصْرِخُهُۥ ۚ
वो फ़रियाद कर रहा था उससे
قَالَ
कहा
لَهُۥ
उसे
مُوسَىٰٓ
मूसा ने
إِنَّكَ
बेशक तू
لَغَوِىٌّۭ
अलबत्ता बहका हुआ है
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
फिर दूसरे दिन वह नगर में डरता, टोह लेता हुआ प्रविष्ट हुआ। इतने में अचानक क्या देखता है कि वही व्यक्ति जिसने कल उससे सहायता चाही थी, उसे पुकार रहा है। मूसा ने उससे कहा, "तू तो प्रत्यक्ष बहका हुआ व्यक्ति है।"
तफ़्सीर:
जब उनसे एक क़िब्ती का क़त्ल हो गया, तो उन्होंने नगर में डरते हुए सुबह की, इस इंतज़ार में कि अब क्या होगा। अचानक क्या देखते हैं कि वही व्यक्ति जिसने कल उनसे अपने क़िब्ती दुश्मन के विरुद्ध सहायता माँगी थी, आज एक अन्य क़िब्ती के ख़िलाफ़ उनसे मदद माँग रहा है। मूसा ने उससे कहा : निश्चय तू एक स्पष्ट और खुला गुमराह है।
आयत 19
فَلَمَّآ أَنْ أَرَادَ أَن يَبْطِشَ بِٱلَّذِى هُوَ عَدُوٌّۭ لَّهُمَا قَالَ يَـٰمُوسَىٰٓ أَتُرِيدُ أَن تَقْتُلَنِى كَمَا قَتَلْتَ نَفْسًۢا بِٱلْأَمْسِ ۖ إِن تُرِيدُ إِلَّآ أَن تَكُونَ جَبَّارًۭا فِى ٱلْأَرْضِ وَمَا تُرِيدُ أَن تَكُونَ مِنَ ٱلْمُصْلِحِينَ
فَلَمَّآ
तो जब
أَنْ
कि
أَرَادَ
उसने इरादा किया
أَن
कि
يَبْطِشَ
वो पकड़ ले
بِٱلَّذِى
उसे जो
هُوَ
वो
عَدُوٌّۭ
दुश्मन था
لَّهُمَا
उन दोनों का
قَالَ
उसने कहा
يَـٰمُوسَىٰٓ
ऐ मूसा
أَتُرِيدُ
क्या तू चाहता है
أَن
कि
تَقْتُلَنِى
तू क़त्ल कर दे मुझे
كَمَا
जैसा कि
قَتَلْتَ
क़त्ल किया तू ने
نَفْسًۢا
एक नफ़्स को
بِٱلْأَمْسِ ۖ
कल
إِن
नहीं
تُرِيدُ
तू चाहता
إِلَّآ
मगर
أَن
कि
تَكُونَ
तू हो
جَبَّارًۭا
ज़बरदस्ती करने वाला
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَمَا
और नहीं
تُرِيدُ
तू चाहता
أَن
कि
تَكُونَ
तू हो
مِنَ
of
ٱلْمُصْلِحِينَ
इस्लाह करने वालों में से
फिर जब उसने वादा किया कि उस व्यक्ति को पकड़े, जो उन लोगों का शत्रु था, तो वह बोल उठा, "ऐ मूसा, क्या तू चाहता है कि मुझे मार डाले, जिस प्रकार तूने कल एक व्यक्ति को मार डाला? धरती में बस तू निर्दय अत्याचारी बनकर रहना चाहता है और यह नहीं चाहता कि सुधार करनेवाला हो।"
तफ़्सीर:
फिर जब मूसा अलैहिस्सलाम ने क़िब्ती को पकड़ना चाहा, जो उनका तथा उस इसराईली का शत्रु था, तो इसराईली ने सोचा कि मूसा उसे पकड़ना चाहते हैं क्योंकि उसने उन्हें यह कहते हुए सुना था कि : "निश्चय तू खुला गुमराह है।", इसलिए उसने मूसा से कहा : क्या तुम मुझे भी मार डालना चाहते हो, जैसे तुमने कल एक व्यक्ति को मार डाला था? तुम तो केवल यह चाहते हो कि धरती पर अत्याचारी बन जाओ, लोगों को मारो और उनपर अत्याचार करो। तुम झगड़ने वाले लोगों के बीच सुलह कराने वालों में से नहीं होना चाहते हो।
आयत 20
وَجَآءَ رَجُلٌۭ مِّنْ أَقْصَا ٱلْمَدِينَةِ يَسْعَىٰ قَالَ يَـٰمُوسَىٰٓ إِنَّ ٱلْمَلَأَ يَأْتَمِرُونَ بِكَ لِيَقْتُلُوكَ فَٱخْرُجْ إِنِّى لَكَ مِنَ ٱلنَّـٰصِحِينَ
وَجَآءَ
और आया
رَجُلٌۭ
एक शख़्स
مِّنْ
from
أَقْصَا
आख़िरी किनारे से
ٱلْمَدِينَةِ
शहर के
يَسْعَىٰ
दौड़ता हुआ
قَالَ
कहा
يَـٰمُوسَىٰٓ
ऐ मूसा
إِنَّ
बेशक
ٱلْمَلَأَ
सरदार
يَأْتَمِرُونَ
वो मशवरा कर रहे हैं
بِكَ
तेरे बारे में
لِيَقْتُلُوكَ
कि वो क़त्ल कर दें तुझे
فَٱخْرُجْ
पस निकल जा
إِنِّى
बेशक मैं
لَكَ
तेरे लिए
مِنَ
of
ٱلنَّـٰصِحِينَ
ख़ैर ख़्वाहों में से हूँ
इसके पश्चात एक आदमी नगर के परले सिरे से दौड़ता हुआ आया। उसने कहा, "ऐ मूसा, सरदार तेरे विषय में परामर्श कर रहे हैं कि तुझे मार डालें। अतः तू निकल जा! मैं तेरा हितैषी हूँ।"
तफ़्सीर:
और जब यह समाचार फैल गया और नगर के सबसे दूर किनारे से एक व्यक्ति कार्रवाई के डर से मूसा पर तरस खाकर दौड़ता हुआ आया, और उसने कहा : ऐ मूसा! फ़िरऔन की जाति के प्रमुख लोग आपको मार डालने का परामर्श कर रहे हैं। इसलिए आप नगर से निकल जाएँ। मैं आपका शुभचिंतक हूँ। मुझे भय है कि कहीं वे आपको पकड़कर मार न डालें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मूसा अलैहिस्सलाम की परवरिश और मिस्र में एक कत्ल के वाकिये का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि गुस्से में उठाया गया कदम बड़े नतीजे ला सकता है, इसलिए गुस्से पर काबू रखना ज़रूरी है।
आयत 21
فَخَرَجَ مِنْهَا خَآئِفًۭا يَتَرَقَّبُ ۖ قَالَ رَبِّ نَجِّنِى مِنَ ٱلْقَوْمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ
فَخَرَجَ
तो वो निकला
مِنْهَا
उससे
خَآئِفًۭا
डरते हुए
يَتَرَقَّبُ ۖ
ख़ुफ़िया टोह लगाते हुए
قَالَ
कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
نَجِّنِى
निजात दे मुझे
مِنَ
from
ٱلْقَوْمِ
उन लोगों से
ٱلظَّـٰلِمِينَ
जो ज़ालिम हैं
फिर वह वहाँ से डरता और ख़तरा भाँपता हुआ निकल खड़ा हुआ। उसने कहा, "ऐ मेरे रब! मुझे ज़ालिम लोगों से छुटकारा दे।"
तफ़्सीर:
चुनाँचे मूसा ने उस शुभचिंतक व्यक्ति की बात मान ली और डरते हुए उस शहर से निकल पड़े, इंतज़ार कर रहे थे कि अब उनके साथ क्या होता है। उन्होंने अपने रब से विनती करते हुए कहा : ऐ मेरे रब! मुझे इन अत्याचारियों से बचा ले, कि वे मुझे कोई हानि न पहुँचा सकें।
आयत 22
وَلَمَّا تَوَجَّهَ تِلْقَآءَ مَدْيَنَ قَالَ عَسَىٰ رَبِّىٓ أَن يَهْدِيَنِى سَوَآءَ ٱلسَّبِيلِ
وَلَمَّا
और जब
تَوَجَّهَ
उसने रुख़ किया
تِلْقَآءَ
जानिब
مَدْيَنَ
मदयन के
قَالَ
कहा
عَسَىٰ
उम्मीद है
رَبِّىٓ
मेरा रब
أَن
कि
يَهْدِيَنِى
वो दिखाएगा मुझे
سَوَآءَ
सीधा
ٱلسَّبِيلِ
रास्ता
जब उसने मदयन का रुख़ किया तो कहा, "आशा है, मेरा रब मुझे ठीक रास्ते पर डाल देगा।"
तफ़्सीर:
और जब वह मदयन की ओर मुँह करके चले, तो उन्होंने कहा : आशा है कि मेरा रब मुझे सबसे अच्छे रास्ते पर ले जाए, ताकि मैं उससे न भटकूँ।
आयत 23
وَلَمَّا وَرَدَ مَآءَ مَدْيَنَ وَجَدَ عَلَيْهِ أُمَّةًۭ مِّنَ ٱلنَّاسِ يَسْقُونَ وَوَجَدَ مِن دُونِهِمُ ٱمْرَأَتَيْنِ تَذُودَانِ ۖ قَالَ مَا خَطْبُكُمَا ۖ قَالَتَا لَا نَسْقِى حَتَّىٰ يُصْدِرَ ٱلرِّعَآءُ ۖ وَأَبُونَا شَيْخٌۭ كَبِيرٌۭ
وَلَمَّا
और जब
وَرَدَ
वो वारिद हुआ/ पहुँचा
مَآءَ
पानी पर
مَدْيَنَ
मदयन के
وَجَدَ
उसने पाया
عَلَيْهِ
उस पर
أُمَّةًۭ
एक गिरोह को
مِّنَ
of
ٱلنَّاسِ
लोगों में से
يَسْقُونَ
वो पानी पिला रहे थे
وَوَجَدَ
और उसने पाया
مِن
besides them
دُونِهِمُ
उनके अलावा
ٱمْرَأَتَيْنِ
दो औरतों को
تَذُودَانِ ۖ
वो दोनों हटाती थीं(मवेशी)
قَالَ
कहा
مَا
क्या
خَطْبُكُمَا ۖ
मामला है तुम दोनों का
قَالَتَا
वो दोनों कहने लगीं
لَا
We cannot water
نَسْقِى
नहीं हम पानी पिलातीं
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يُصْدِرَ
वापस ले जाऐं
ٱلرِّعَآءُ ۖ
चरवाहे (अपने मवेशी)
وَأَبُونَا
और बाप हमारा
شَيْخٌۭ
बूढ़ा
كَبِيرٌۭ
बड़ी उम्र का है
और जब वह मदयन के पानी पर पहुँचा तो उसने उसपर पानी पिलाते लोगों को एक गिरोह पाया। और उनसे हटकर एक ओर दो स्त्रियों को पाया, जो अपन जानवरों को रोक रही थीं। उसने कहा, "तुम्हारा क्या मामला है?" उन्होंने कहा, "हम उस समय तक पानी नहीं पिला सकते, जब तक ये चरवाहे अपने जानवर निकाल न ले जाएँ, और हमारे बाप बहुत ही बूढ़े है।"
तफ़्सीर:
जब वह मदयन के पानी पर पहुँचे, जिससे वे लोग पानी पीते थे, तो लोगों के एक दल को अपने पशुओं को पानी पिलाते हुए पाया। उनके अतिरिक्त, दो स्त्रियों को पाया जो अपनी भेड़-बकरियों को पानी से रोक रही थीं यहाँ तक कि लोग पानी पिला लें। मूसा अलैहिस्सलाम ने उन दोनों से पूछा : तुम्हारा क्या मामला है, तुम लोगों के साथ पानी क्यों नहीं पिलातीं? उन्होंने कहा : हमारी आदत है कि जब तक चरवाहे न चले जाएँ, तब तक हम रुके रहते हैं और पानी नहीं पिलाते; ताकि उनके साथ मिश्रण से बच सकें। और हमारे पिता एक बूढ़े आदमी हैं, जो पानी नहीं पिला सकते, इसलिए हमें अपनी बकरियों को पानी पिलाना पड़ता है।
आयत 24
فَسَقَىٰ لَهُمَا ثُمَّ تَوَلَّىٰٓ إِلَى ٱلظِّلِّ فَقَالَ رَبِّ إِنِّى لِمَآ أَنزَلْتَ إِلَىَّ مِنْ خَيْرٍۢ فَقِيرٌۭ
فَسَقَىٰ
तो उसने पानी पिलाया
لَهُمَا
उन दोनों के लिए
ثُمَّ
फिर
تَوَلَّىٰٓ
वो पलट गया
إِلَى
to
ٱلظِّلِّ
तरफ़ साय के
فَقَالَ
फिर वो कहने लगा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
إِنِّى
बेशक मैं
لِمَآ
उसके लिए जो
أَنزَلْتَ
नाज़िल करे तू
إِلَىَّ
मेरी तरफ़
مِنْ
of
خَيْرٍۢ
भलाई में से
فَقِيرٌۭ
मोहताज हूँ
तब उसने उन दोनों के लिए पानी पिला दिया। फिर छाया की ओर पलट गया और कहा, "ऐ मेरे रब, जो भलाई भी तू मेरी उतार दे, मैं उसका ज़रूरतमंद हूँ।"
तफ़्सीर:
चुनाँचे मूसा अलैहिस्सलाम को उनपर दया आ गई और उनकी बकरियों को पानी पिला दिया। फिर छाया में जाकर विश्राम करने लगे और वहाँ अपने रब के सामने अपनी ज़रूरत को रखते हुए दुआ की : ऐ मेरे रब! तू जो भी भलाई मुझपर उतारे, मैं उसका ज़रूरतमंद हूँ।
आयत 25
فَجَآءَتْهُ إِحْدَىٰهُمَا تَمْشِى عَلَى ٱسْتِحْيَآءٍۢ قَالَتْ إِنَّ أَبِى يَدْعُوكَ لِيَجْزِيَكَ أَجْرَ مَا سَقَيْتَ لَنَا ۚ فَلَمَّا جَآءَهُۥ وَقَصَّ عَلَيْهِ ٱلْقَصَصَ قَالَ لَا تَخَفْ ۖ نَجَوْتَ مِنَ ٱلْقَوْمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ
فَجَآءَتْهُ
तो आई उसके पास
إِحْدَىٰهُمَا
उन दोनों में से एक
تَمْشِى
चलती हुई
عَلَى
with
ٱسْتِحْيَآءٍۢ
साथ हया के
قَالَتْ
वो कहने लगी
إِنَّ
बेशक
أَبِى
मेरे वालिद
يَدْعُوكَ
बुला रहे हैं तुम्हें
لِيَجْزِيَكَ
ताकि वो बदले में दें तुम्हें
أَجْرَ
उज्रत
مَا
उसकी जो
سَقَيْتَ
पानी पिलाया तू ने
لَنَا ۚ
हमारे लिए
فَلَمَّا
तो जब
جَآءَهُۥ
वो आ गया उसके पास
وَقَصَّ
और उसने बयान किया
عَلَيْهِ
उस पर
ٱلْقَصَصَ
क़िस्सा
قَالَ
उसने कहा
لَا
(Do) not
تَخَفْ ۖ
ना तुम डरो
نَجَوْتَ
निजात पा गए हो तुम
مِنَ
from
ٱلْقَوْمِ
उन लोगों से
ٱلظَّـٰلِمِينَ
जो ज़ालिम हैं
फिर उन दोनों में से एक लजाती हुई उसके पास आई। उसने कहा, "मेरे बाप आपको बुला रहे है, ताकि आपने हमारे लिए (जानवरों को) जो पानी पिलाया है, उसका बदला आपको दें।" फिर जब वह उसके पास पहुँचा और उसे अपने सारे वृत्तान्त सुनाए तो उसने कहा, "कुछ भय न करो। तुम ज़ालिम लोगों से छुटकारा पा गए हो।"
तफ़्सीर:
जब वे दोनों घर गईं, तो अपने पिता को उनके बारे में बताया। उनके पिता ने उन दोनों में से एक को उन्हें बुलाने के लिए भेजा। वह उनके पास लजाते हुए आई और बोली : मेरे पिता आपको बुला रहे हैं, ताकि वह आपको हमारे लिए पानी पिलाने का बदला दें। जब मूसा उन दोनों के पिता के पास आए और उन्हें अपना समाचार सुनाया, तो उन्होंने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा : भय न करो। तुम अत्याचारी लोगों फ़िरऔन तथा उसके प्रमुखों से नजात पा चुके। क्योंकि मदयन पर उनका अधिकार नहीं है। इसलिए वे तुम्हें कोई हानि नहीं पहुँचा सकते।
आयत 26
قَالَتْ إِحْدَىٰهُمَا يَـٰٓأَبَتِ ٱسْتَـْٔجِرْهُ ۖ إِنَّ خَيْرَ مَنِ ٱسْتَـْٔجَرْتَ ٱلْقَوِىُّ ٱلْأَمِينُ
قَالَتْ
कहा
إِحْدَىٰهُمَا
उन दोनों में से एक ने
يَـٰٓأَبَتِ
ऐ मेरे अब्बाजान
ٱسْتَـْٔجِرْهُ ۖ
उज्रत पर रख लीजिए उसे
إِنَّ
बेशक
خَيْرَ
बेहतरीन
مَنِ
वो जिसे
ٱسْتَـْٔجَرْتَ
उज्रत पर रखें आप
ٱلْقَوِىُّ
जो मज़बूत है
ٱلْأَمِينُ
अमानतदार है
उन दोनों स्त्रियों में से एक ने कहा, "ऐ मेरे बाप! इसको मज़दूरी पर रख लीजिए। अच्छा व्यक्ति, जिसे आप मज़दूरी पर रखें, वही है जो बलवान, अमानतदार हो।"
तफ़्सीर:
उनकी एक बेटी ने कहा : ऐ पिता जी! आप इन्हें हमारी बकरियाँ चराने के लिए मज़दूरी पर रख लें। क्योंकि वह बलवान और अमानतदार होने के कारण मज़दूरी पर रखे जाने के योग्य हैं। वह बल द्वारा अपनी ज़िम्मेदारियाँ अदा करेंगे और अमानतदारी के कारण उस अमानत का संरक्षण करेंगे जो उन्हें सौंपी जाएगी।
आयत 27
قَالَ إِنِّىٓ أُرِيدُ أَنْ أُنكِحَكَ إِحْدَى ٱبْنَتَىَّ هَـٰتَيْنِ عَلَىٰٓ أَن تَأْجُرَنِى ثَمَـٰنِىَ حِجَجٍۢ ۖ فَإِنْ أَتْمَمْتَ عَشْرًۭا فَمِنْ عِندِكَ ۖ وَمَآ أُرِيدُ أَنْ أَشُقَّ عَلَيْكَ ۚ سَتَجِدُنِىٓ إِن شَآءَ ٱللَّهُ مِنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ
قَالَ
उसने कहा
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أُرِيدُ
मैं चाहता हूँ
أَنْ
कि
أُنكِحَكَ
मैं निकाह कर दूँ तुम से
إِحْدَى
एक का
ٱبْنَتَىَّ
अपनी दोनों बेटियों में से
هَـٰتَيْنِ
इन दो
عَلَىٰٓ
इस (शर्त) पर
أَن
कि
تَأْجُرَنِى
तुम मज़दूरी करो मेरी
ثَمَـٰنِىَ
आठ
حِجَجٍۢ ۖ
साल
فَإِنْ
फिर अगर
أَتْمَمْتَ
पूरे कर दो तुम
عَشْرًۭا
दस(साल)
فَمِنْ
then from
عِندِكَ ۖ
तो तुम्हारी तरफ़ से है
وَمَآ
और नहीं
أُرِيدُ
मैं चाहता
أَنْ
कि
أَشُقَّ
मैं मशक़्क़त डालूँ
عَلَيْكَ ۚ
तुम पर
سَتَجِدُنِىٓ
यक़ीनन तुम पाओगे मुझे
إِن
अगर
شَآءَ
चाहा
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِنَ
of
ٱلصَّـٰلِحِينَ
नेक लोगों में से
उसने कहा, "मैं चाहता हूँ कि अपनी इन दोनों बेटियों में से एक का विवाह तुम्हारे साथ इस शर्त पर कर दूँ कि तुम आठ वर्ष तक मेरे यहाँ नौकरी करो। और यदि तुम दस वर्ष पूरे कर दो, तो यह तुम्हारी ओर से होगा। मैं तुम्हें कठिनाई में डालना नहीं चाहता। यदि अल्लाह ने चाहा तो तुम मुझे नेक पाओगे।"
तफ़्सीर:
उन दोनों के पिता ने मूसा अलैहिस्सलाम को संबोधित करते हुए कहा : मैं चाहता हूँ कि अपनी इन दोनों बेटियों में से एक की तुमसे शादी कर दूँ, इस शर्त पर कि इसका महर यह रहे कि तुम आठ वर्ष तक हमारी बकरियाँ चराओ, और यदि दस वर्ष पूरा कर दो, तो यह तुम्हारी कृपा होगी, तुम इसके बाध्य नहीं हो। क्योंकि अनुबंध केवल आठ साल के लिए है। अतः जो उससे अधिक है वह स्वैच्छिक है, और मैं तुम्हें ऐसी चीज़ के लिए बाध्य नहीं करना चाहता, जिसमें तुम्हारे लिए कठिनाई हो। तुम (इन शा अल्लाह) मुझे सदाचारियों में से पाओगे, जो अनुबंधों को पूरा करते हैं और प्रतिज्ञाओं को नहीं तोड़ते।
आयत 28
قَالَ ذَٰلِكَ بَيْنِى وَبَيْنَكَ ۖ أَيَّمَا ٱلْأَجَلَيْنِ قَضَيْتُ فَلَا عُدْوَٰنَ عَلَىَّ ۖ وَٱللَّهُ عَلَىٰ مَا نَقُولُ وَكِيلٌۭ
قَالَ
उसने कहा
ذَٰلِكَ
ये(बात तय) है
بَيْنِى
दर्मियान मेरे
وَبَيْنَكَ ۖ
और दर्मियान तुम्हारे
أَيَّمَا
जो भी
ٱلْأَجَلَيْنِ
दो मुद्दतों में से
قَضَيْتُ
मैं पूरी कर दूँ
فَلَا
तो ना होगी
عُدْوَٰنَ
कोई ज़्यादती
عَلَىَّ ۖ
मुझ पर
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
مَا
उसके जो
نَقُولُ
हम कह रहे हैं
وَكِيلٌۭ
निगरान है
कहा, "यह मेरे और आपके बीच निश्चय हो चुका। इन दोनों अवधियों में से जो भी मैं पूरी कर दूँ, तो तुझपर कोई ज़्यादती नहीं होगी। और जो कुछ हम कह रहे है, उसके विषय में अल्लाह पर भरोसा काफ़ी है।"
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा : यह बात मेरे और तुम्हारे बीच तय हो चुकी, जैसा कि हमने अनुबंध किया है। अतः मैं तुम्हारे लिए दोनों अवधियों में से जिसके लिए भी काम करूँ : आठ साल हो या दस साल, मैं अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा करने वाला समझा जाऊँगा। अतः तुम मुझसे इसे बढ़ाने के लिए मत कहना। और हमने जो अनुबंध किया है, उसपर अल्लाह गवाह तथा निरीक्षक है।
आयत 29
۞ فَلَمَّا قَضَىٰ مُوسَى ٱلْأَجَلَ وَسَارَ بِأَهْلِهِۦٓ ءَانَسَ مِن جَانِبِ ٱلطُّورِ نَارًۭا قَالَ لِأَهْلِهِ ٱمْكُثُوٓا۟ إِنِّىٓ ءَانَسْتُ نَارًۭا لَّعَلِّىٓ ءَاتِيكُم مِّنْهَا بِخَبَرٍ أَوْ جَذْوَةٍۢ مِّنَ ٱلنَّارِ لَعَلَّكُمْ تَصْطَلُونَ
۞ فَلَمَّا
तो जब
قَضَىٰ
पूरी की
مُوسَى
मूसा ने
ٱلْأَجَلَ
मुक़र्रर मुद्दत
وَسَارَ
और वो ले चला
بِأَهْلِهِۦٓ
अपने घर वालों को
ءَانَسَ
उसने देखी
مِن
in
جَانِبِ
(the) direction
ٱلطُّورِ
तूर की जानिब से
نَارًۭا
एक आग
قَالَ
कहा
لِأَهْلِهِ
अपने घर वालों से
ٱمْكُثُوٓا۟
ठहर जाओ
إِنِّىٓ
बेशक मैं
ءَانَسْتُ
देखी है मैं ने
نَارًۭا
एक आग
لَّعَلِّىٓ
शायद कि मैं
ءَاتِيكُم
मैं लाऊँ तुम्हारे पास
مِّنْهَا
उसमें से
بِخَبَرٍ
कोई ख़बर
أَوْ
या
جَذْوَةٍۢ
कोई अँगारा
مِّنَ
from
ٱلنَّارِ
आग से
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَصْطَلُونَ
तुम ताप सको
फिर जब मूसा ने अवधि पूरी कर दी और अपने घरवालों को लेकर चला तो तूर की ओर उसने एक आग-सी देखी। उसने अपने घरवालों से कहा, "ठहरो, मैंने एक आग का अवलोकन किया है। कदाचित मैं वहाँ से तुम्हारे पास कोई ख़बर ले आऊँ या उस आग से कोई अंगारा ही, ताकि तुम ताप सको।"
तफ़्सीर:
जब मूसा अलैहिस्सलाम अधिकतम अवधि अर्थात् दस वर्ष पूरा करके अपने परिवार को लेकर मदयन से मिस्र की ओर चल पड़े, तो उन्हें तूर पर्वत की दिशा में एक आग दिखाई दी। उन्होंने अपने परिवार से कहा : यहाँ ठहरो, मुझे एक आग दिखाई दी है। शायद मैं वहाँ से तुम्हारे लिए कोई सूचना लाऊँ, अथवा आग का कोई अंगारा ले आऊँ, जिससे तुम आग जलाओ; ताकि तुम ठंड से गर्म हो सको।
आयत 30
فَلَمَّآ أَتَىٰهَا نُودِىَ مِن شَـٰطِئِ ٱلْوَادِ ٱلْأَيْمَنِ فِى ٱلْبُقْعَةِ ٱلْمُبَـٰرَكَةِ مِنَ ٱلشَّجَرَةِ أَن يَـٰمُوسَىٰٓ إِنِّىٓ أَنَا ٱللَّهُ رَبُّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
فَلَمَّآ
तो जब
أَتَىٰهَا
वो आया उसके पास
نُودِىَ
वो पुकारा गया
مِن
from
شَـٰطِئِ
किनारे से
ٱلْوَادِ
वादी के
ٱلْأَيْمَنِ
दाईं जानिब की
فِى
in
ٱلْبُقْعَةِ
जगह में
ٱلْمُبَـٰرَكَةِ
बरकत वाली
مِنَ
from
ٱلشَّجَرَةِ
दरख़्त में से
أَن
कि
يَـٰمُوسَىٰٓ
ऐ मूसा
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَنَا
मैं ही
ٱللَّهُ
अल्लाह हूँ
رَبُّ
रब
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों का
फिर जब वह वहाँ पहुँचा तो दाहिनी घाटी के किनारे से शुभ क्षेत्र में वृक्ष से आवाज़ आई, "ऐ मूसा! मैं ही अल्लाह हूँ, सारे संसार का रब!"
तफ़्सीर:
फिर जब मूसा अलैहिस्सलाम उस आग के पास पहुँचे, जो उन्हें दिखाई दी थी, तो उनके महिमावान एवं सर्वशक्तिमान रब ने घाटी की दाहिनी ओर से, उस स्थान में जिसे अल्लाह ने मूसा से बात करके बरकत वाला बनाया था, एक पेड़ से पुकार कर कहा : ऐ मूसा! निःसंदेह मैं ही अल्लाह हूँ, जो सारी सृष्टियाों का पालनहार है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मूसा अलैहिस्सलाम के मदयन की तरफ सफर और शुऐब अलैहिस्सलाम की बेटी की मदद का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि मुसीबत के वक्त अजनबी की मदद करना और नेकी का बदला नेकी से देना अच्छे किरदार की निशानी है।
आयत 31
وَأَنْ أَلْقِ عَصَاكَ ۖ فَلَمَّا رَءَاهَا تَهْتَزُّ كَأَنَّهَا جَآنٌّۭ وَلَّىٰ مُدْبِرًۭا وَلَمْ يُعَقِّبْ ۚ يَـٰمُوسَىٰٓ أَقْبِلْ وَلَا تَخَفْ ۖ إِنَّكَ مِنَ ٱلْـَٔامِنِينَ
وَأَنْ
और ये कि
أَلْقِ
तू डाल दे
عَصَاكَ ۖ
लाठी अपनी
فَلَمَّا
तो जब
رَءَاهَا
उसने देखा उसे
تَهْتَزُّ
कि व हिलती है
كَأَنَّهَا
गोया कि वो
جَآنٌّۭ
साँप है
وَلَّىٰ
वो फिर गया
مُدْبِرًۭا
पीठ फेर कर
وَلَمْ
और ना
يُعَقِّبْ ۚ
वो पलटा
يَـٰمُوسَىٰٓ
ऐ मूसा
أَقْبِلْ
आगे बढ़
وَلَا
और ना
تَخَفْ ۖ
तू डर
إِنَّكَ
बेशक तू
مِنَ
(are) of
ٱلْـَٔامِنِينَ
अमन पाने वालों में से है
और यह कि "डाल दे अपनी लाठी।" फिर जब उसने देखा कि वह बल खा रही है जैसे कोई साँप हो तो वह पीठ फेरकर भागा और पीछे मुड़कर भी न देखा। "ऐ मूसा! आगे आ और भय न कर। निस्संदेह तेरे लिए कोई भय की बात नहीं
तफ़्सीर:
और यह कि अपनी लाठी को फेंक दो। तो मूसा ने अपने रब के आदेश का पालन करते हुए उसे फेंक दिया। पर जब उसे एक साँप की तरह तेज़ी से हिलते और लहराते देखा, तो उसके डर से पीठ फेरकर चल पड़े और पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। इस पर उनके रब ने उन्हें आवाज़ दी : ऐ मूसा! आगे आओ और उससे मत डरो। क्योंकि आप उससे तथा उसके अलावा जिससे भी आप डरते हैं, उन सब से सुरक्षित कर दिए गए हैं।
आयत 32
ٱسْلُكْ يَدَكَ فِى جَيْبِكَ تَخْرُجْ بَيْضَآءَ مِنْ غَيْرِ سُوٓءٍۢ وَٱضْمُمْ إِلَيْكَ جَنَاحَكَ مِنَ ٱلرَّهْبِ ۖ فَذَٰنِكَ بُرْهَـٰنَانِ مِن رَّبِّكَ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَإِي۟هِۦٓ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَوْمًۭا فَـٰسِقِينَ
ٱسْلُكْ
दाख़िल कर
يَدَكَ
हाथ अपना
فِى
in
جَيْبِكَ
अपने गिरेबान में
تَخْرُجْ
वो निकलेगा
بَيْضَآءَ
सफ़ेद /चमकता हुआ
مِنْ
without
غَيْرِ
बग़ैर किसी
سُوٓءٍۢ
मर्ज़ /तक्लीफ़ के
وَٱضْمُمْ
और मिला ले
إِلَيْكَ
अपनी तरफ़
جَنَاحَكَ
बाज़ू अपना
مِنَ
against
ٱلرَّهْبِ ۖ
ख़ौफ़ से(बचने के लिए)
فَذَٰنِكَ
तो ये दोनों
بُرْهَـٰنَانِ
दो निशानियाँ हैं
مِن
from
رَّبِّكَ
तेरे रब की तरफ़ से
إِلَىٰ
to
فِرْعَوْنَ
तरफ़ फ़िरऔन
وَمَلَإِي۟هِۦٓ ۚ
और उसके सरदारों के
إِنَّهُمْ
बेशक वो
كَانُوا۟
हैं वो
قَوْمًۭا
लोग
فَـٰسِقِينَ
फ़ासिक़
अपना हाथ अपने गिरेबान में डाल। बिना किसी ख़राबी के चमकता हुआ निकलेगा। और भय के समय अपनी भुजा को अपने से मिलाए रख। ये दो निशानियाँ है तेरे रब की ओर से फ़िरऔन और उसके दरबारियों के पास लेकर जाने के लिए। निश्चय ही वे बड़े अवज्ञाकारी लोग है।"
तफ़्सीर:
अपना दाहिना हाथ अपने गिरेबान में डालो, वह बरस (कुष्ठरोग) के बिना सफ़ेद (चमकता हुआ) निकलेगा। अतः मूसा ने हाथ गिरेबान में डाला, तो वह बर्फ के समान सफेद (चमकदार) निकला। तथा अपने डर को शांत करने के लिए अपना हाथ अपने (पहलू) से मिला लो। तब मूसा ने उसे मिला लिया, तो उनका भय दूर हो गया l ये दोनों निशानियाँ (लाठी और हाथ) आपके पालनहार की ओर से फ़िरऔन तथा उसकी जाति के प्रमुखों की ओर भेजे जाने वाले दो प्रमाण हैं। निःसंदेह वे कुफ़्र और पाप करके अल्लाह के आज्ञापालन से निकल जाने वाले लोग हैं।
आयत 33
قَالَ رَبِّ إِنِّى قَتَلْتُ مِنْهُمْ نَفْسًۭا فَأَخَافُ أَن يَقْتُلُونِ
قَالَ
कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
إِنِّى
बेशक मैं
قَتَلْتُ
क़त्ल किया मैं ने
مِنْهُمْ
उनमें से
نَفْسًۭا
एक शख़्स को
فَأَخَافُ
तो मैं डरता हूँ
أَن
कि
يَقْتُلُونِ
वो क़त्ल कर डालेंगे मुझे
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! मुझसे उनके एक आदमी की जान गई है। इसलिए मैं डरता हूँ कि वे मुझे मार डालेंगे
तफ़्सीर:
मूसा अलैहिस्सलाम ने अपने रब से प्रार्थना करते हुए कहा : मैंने उनमें से एक व्यक्ति को मार डाला था। इसलिए मुझे डर है कि अगर मैं उनके पास उन्हें वह संदेश पहुँचाने के लिए गया, जिसे देकर मुझे भेजा गया है, तो वे मुझे मार डालेंगे।
आयत 34
وَأَخِى هَـٰرُونُ هُوَ أَفْصَحُ مِنِّى لِسَانًۭا فَأَرْسِلْهُ مَعِىَ رِدْءًۭا يُصَدِّقُنِىٓ ۖ إِنِّىٓ أَخَافُ أَن يُكَذِّبُونِ
وَأَخِى
और मेरा भाई
هَـٰرُونُ
हारून
هُوَ
वो
أَفْصَحُ
ज़्यादा फ़सीह है
مِنِّى
मुझसे
لِسَانًۭا
ज़बान में
فَأَرْسِلْهُ
तो भेज दे उसे
مَعِىَ
मेरे साथ
رِدْءًۭا
मददगार के तौर पर
يُصَدِّقُنِىٓ ۖ
वो तस्दीक़ करे मेरी
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَخَافُ
मैं डरता हूँ
أَن
कि
يُكَذِّبُونِ
वो झुठला देंगे मुझे
मेरे भाई हारून की ज़बान मुझसे बढ़कर धाराप्रवाह है। अतः उसे मेरे साथ सहायक के रूप में भेज कि वह मेरी पुष्टि करे। मुझे भय है कि वे मुझे झुठलाएँगे।"
तफ़्सीर:
और मेरा भाई हारून बोलने में मुझसे अधिक स्पष्ट है। इसलिए उसे मेरे साथ मेरा सहायक बनाकर भेज कि वह मेरी बात में मेरा समर्थन करे, यदि फ़िरऔन और उसकी जाति वाले मुझे झुठला दें। मुझे भय है कि वे मुझे झुठला देंगे, जिस तरह कि उन समुदायों की रीति रही है जिनके पास मुझसे पहले रसूल भेजे गए, तो उन्होंने उन रसूलों को झुठला दिया।
आयत 35
قَالَ سَنَشُدُّ عَضُدَكَ بِأَخِيكَ وَنَجْعَلُ لَكُمَا سُلْطَـٰنًۭا فَلَا يَصِلُونَ إِلَيْكُمَا ۚ بِـَٔايَـٰتِنَآ أَنتُمَا وَمَنِ ٱتَّبَعَكُمَا ٱلْغَـٰلِبُونَ
قَالَ
फ़रमाया
سَنَشُدُّ
अनक़रीब हम मज़बूत करेंगे
عَضُدَكَ
बाज़ू तेरा
بِأَخِيكَ
साथ तेरे भाई के
وَنَجْعَلُ
और हम बना देंगे
لَكُمَا
तुम दोनों के लिए
سُلْطَـٰنًۭا
ग़ल्बा
فَلَا
तो नहीं
يَصِلُونَ
वो पहुँचेंगे
إِلَيْكُمَا ۚ
तरफ़ तुम दोनों के
بِـَٔايَـٰتِنَآ
साथ हमारी निशानियों के
أَنتُمَا
तुम दोनों
وَمَنِ
और जो
ٱتَّبَعَكُمَا
पैरवी करे तुम दोनों की
ٱلْغَـٰلِبُونَ
ग़ालिब आने वाले हो
कहा, "हम तेरे भाई के द्वारा तेरी भुजा मज़बूत करेंगे, और तुम दोनों को एक ओज प्रदान करेंगे कि वे फिर तुम तक न पहुँच सकेंगे। हमारी निशानियों के कारण तुम दोनों और जो तुम्हारे अनुयायी होंगे वे ही प्रभावी होंगे।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम की प्रार्थना स्वीकार करते हुए कहा : (ऐ मूसा!) हम अवश्य तुम्हें शक्ति देंगे तुम्हारे साथ तुम्हारे भाई हारून को सहायक रसूल बनाकर। तथा हम तुम दोनों को तर्क एवं समर्थन प्रदान करेंगे। अतः वे तुम दोनों तक उस बुराई के साथ नहीं पहुँच सकेंगे जिसे तुम नापसंद करते हो। हमारी उन निशानियों के कारण जिनके साथ हमने तुम दोनों को भेजा है, तुम दोनों और तुम्हारा अनुसरण करने वाले ईमान वाले लोग ही विजयी रहेंगे।
आयत 36
فَلَمَّا جَآءَهُم مُّوسَىٰ بِـَٔايَـٰتِنَا بَيِّنَـٰتٍۢ قَالُوا۟ مَا هَـٰذَآ إِلَّا سِحْرٌۭ مُّفْتَرًۭى وَمَا سَمِعْنَا بِهَـٰذَا فِىٓ ءَابَآئِنَا ٱلْأَوَّلِينَ
فَلَمَّا
फिर जब
جَآءَهُم
आया उनके पास
مُّوسَىٰ
मूसा
بِـَٔايَـٰتِنَا
साथ हमारी निशानियों के
بَيِّنَـٰتٍۢ
खुली-खुली
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
مَا
नहीं
هَـٰذَآ
ये
إِلَّا
मगर
سِحْرٌۭ
एक जादू है
مُّفْتَرًۭى
बनावटी/गढ़ा हुआ
وَمَا
और नहीं
سَمِعْنَا
सुना हमने
بِهَـٰذَا
इसके बारे में
فِىٓ
among
ءَابَآئِنَا
अपने आबा ओ अजदाद में
ٱلْأَوَّلِينَ
जो पहले(गुज़रे)
फिर जब मूसा उनके पास हमारी खुली-खुली निशानियाँ लेकर आया तो उन्होंने कहा, "यह तो बस घड़ा हुआ जादू है। हमने तो यह बात अपने अगले बाप-दादा में कभी सुनी ही नहीं।"
तफ़्सीर:
फिर जब मूसा अलैहिस्सलाम उनके पास हमारी स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए, तो उन लोगों ने कहा : यह तो केवल एक गढ़ा हुआ झूठ है, जिसे मूसा ने गढ़ लिया है। और हमने अपने पूर्वजों के बीच इसके बारे में कभी नहीं सुना।
आयत 37
وَقَالَ مُوسَىٰ رَبِّىٓ أَعْلَمُ بِمَن جَآءَ بِٱلْهُدَىٰ مِنْ عِندِهِۦ وَمَن تَكُونُ لَهُۥ عَـٰقِبَةُ ٱلدَّارِ ۖ إِنَّهُۥ لَا يُفْلِحُ ٱلظَّـٰلِمُونَ
وَقَالَ
और कहा
مُوسَىٰ
मूसा ने
رَبِّىٓ
मेरा रब
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِمَن
उसे जो
جَآءَ
लाया है
بِٱلْهُدَىٰ
हिदायत
مِنْ
from Him
عِندِهِۦ
उसके पास से
وَمَن
और उसे जो
تَكُونُ
है
لَهُۥ
उसके लिए
عَـٰقِبَةُ
(अच्छा) अंजाम
ٱلدَّارِ ۖ
घर का(आख़िरत के)
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَا
not
يُفْلِحُ
नहीं वो फ़लाह पाते
ٱلظَّـٰلِمُونَ
जो ज़ालिम हैं
मूसा ने कहा, "मेरा रब उस व्यक्ति को भली-भाँति जानता है जो उसके यहाँ से मार्गदर्शन लेकर आया है, और उसको भी जिसके लिए अंतिम घर है। निश्चय ही ज़ालिम सफल नहीं होते।"
तफ़्सीर:
तथा मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़िरऔन को संबोधित करते हुए कहा : मेरा रब उस सत्यवान् को भली-भाँति जनता है, जो उस महिमावान के पास से मार्गदर्शन लेकर आया है, तथा वह उसे भी जनता है जिसका आख़िरत में परिणाम सराहनीय होगा।निःसंदेह अत्याचारी लोग उस चीज़ की प्राप्ति में सफल नहीं होते, जो वे चाहते हैं और न उस चीज़ से बच पाते हैं, जिससे वे डरते हैं।
आयत 38
وَقَالَ فِرْعَوْنُ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلْمَلَأُ مَا عَلِمْتُ لَكُم مِّنْ إِلَـٰهٍ غَيْرِى فَأَوْقِدْ لِى يَـٰهَـٰمَـٰنُ عَلَى ٱلطِّينِ فَٱجْعَل لِّى صَرْحًۭا لَّعَلِّىٓ أَطَّلِعُ إِلَىٰٓ إِلَـٰهِ مُوسَىٰ وَإِنِّى لَأَظُنُّهُۥ مِنَ ٱلْكَـٰذِبِينَ
وَقَالَ
और कहा
فِرْعَوْنُ
फ़िरऔन ने
يَـٰٓأَيُّهَا
O chiefs
ٱلْمَلَأُ
ऐ अहले दरबार
مَا
नहीं
عَلِمْتُ
जानता मैं
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنْ
any
إِلَـٰهٍ
कोई इलाह
غَيْرِى
अपने सिवा
فَأَوْقِدْ
पस जलाओ(आग)
لِى
मेरे लिए
يَـٰهَـٰمَـٰنُ
ऐ हामान
عَلَى
Upon
ٱلطِّينِ
मिट्टी पर
فَٱجْعَل
फिर बनाओ
لِّى
मेरे लिए
صَرْحًۭا
एक बुलन्द इमारत
لَّعَلِّىٓ
शायद कि मैं
أَطَّلِعُ
मैं झाँकूँ
إِلَىٰٓ
at
إِلَـٰهِ
(the) God
مُوسَىٰ
तरफ़ मूसा के इलाह के
وَإِنِّى
और बेशक मैं
لَأَظُنُّهُۥ
अलबत्ता नैं समझता हूँ उसे
مِنَ
(is) of
ٱلْكَـٰذِبِينَ
झूठों में से
फ़िरऔन ने कहा, "ऐ दरबारवालो, मैं तो अपने सिवा तुम्हारे किसी प्रभु को नहीं जानता। अच्छा तो ऐ हामान! तू मेरे लिए ईटें आग में पकवा। फिर मेरे लिए एक ऊँचा महल बना कि मैं मूसा के प्रभु को झाँक आऊँ। मैं तो उसे झूठा समझता हूँ।"
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने अपनी जाति के प्रमुखों को संबोधित करते हुए कहा : ऐ प्रमुखो! मैं तुम्हारे लिए अपने सिवा कोई पूज्य नहीं जानता। अतः ऐ हामान! मेरे लिए मिट्टी पर आग जलाओ, यहाँ तक कि वह पक (कर ईंट बन) जाए। फिर उससे मेरे लिए एक ऊँचे भवन का निर्माण करो, ताकि मैं मूसा के पूज्य को देख सकूँ और उससे परिचित हो सकूँ। निश्चय मैं मूसा को अपने इस दावे में झूठा समझता हूँ कि वह अल्लाह की ओर से मेरी तथा मेरी जाति की ओर रसूल बनाकर भेजा गया है।
आयत 39
وَٱسْتَكْبَرَ هُوَ وَجُنُودُهُۥ فِى ٱلْأَرْضِ بِغَيْرِ ٱلْحَقِّ وَظَنُّوٓا۟ أَنَّهُمْ إِلَيْنَا لَا يُرْجَعُونَ
وَٱسْتَكْبَرَ
और तकब्बुर किया
هُوَ
उसने
وَجُنُودُهُۥ
और उसके लश्करों ने
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
بِغَيْرِ
बग़ैर
ٱلْحَقِّ
हक़ के
وَظَنُّوٓا۟
और वो समझते थे
أَنَّهُمْ
बेशक वो
إِلَيْنَا
हमारी तरफ़
لَا
not
يُرْجَعُونَ
ना वो लौटाए जाऐंगे
उसने और उसकी सेनाओं ने धरती में नाहक़ घमंड किया और समझा कि उन्हें हमारी ओर लौटना नहीं है
तफ़्सीर:
फ़िरऔन तथा उसके सैनिकों का अहंकार बढ़ गया और वे मिस्र की भूमि में बिना कारण के बड़े बन बैठे, तथा उन्होंने मृत्यु के पश्चात पुनः जीवित कर उठाए जाने का इनकार कर दिया और यह सोचा कि वे क़ियामत के दिन हिसाब-किताब और दंड के लिए हमारे पास नहीं लौटाए जाएँगे।
आयत 40
فَأَخَذْنَـٰهُ وَجُنُودَهُۥ فَنَبَذْنَـٰهُمْ فِى ٱلْيَمِّ ۖ فَٱنظُرْ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلظَّـٰلِمِينَ
فَأَخَذْنَـٰهُ
तो पकड़ लिया हमने उसे
وَجُنُودَهُۥ
और उसके लश्करों को
فَنَبَذْنَـٰهُمْ
फिर फेंक दिया हमने उन्हें
فِى
in
ٱلْيَمِّ ۖ
दरया में
فَٱنظُرْ
तो देखो
كَيْفَ
किस तरह
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अंजाम
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों का
अन्ततः हमने उसे औऱ उसकी सेनाओं को पकड़ लिया और उन्हें गहरे पानी में फेंक दिया। अब देख लो कि ज़ालिमों का कैसा परिणाम हुआ
तफ़्सीर:
तो हमने उसको और उसके सैनिकों को पकड़ लिया और उन्हें समुद्र में डूबने के लिए फेंक दिया, यहाँ तक कि वे सभी नष्ट हो गए। अतः (ऐ रसूल!) आप ग़ौर करें कि अत्याचारियों का परिणाम और उनका अंत कैसा था। निश्चय उनका परिणाम और अंत विनाश था।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मूसा अलैहिस्सलाम को नबुव्वत मिलने और फिरऔन के पास दावत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह जब किसी को ज़िम्मेदारी देता है तो उसके साथ हौसला और मदद भी अता करता है।
आयत 41
وَجَعَلْنَـٰهُمْ أَئِمَّةًۭ يَدْعُونَ إِلَى ٱلنَّارِ ۖ وَيَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ لَا يُنصَرُونَ
وَجَعَلْنَـٰهُمْ
और बनाया हमने उन्हें
أَئِمَّةًۭ
इमाम/राहनुमा
يَدْعُونَ
जो बुलाते थे
إِلَى
to
ٱلنَّارِ ۖ
तरफ़ आग के
وَيَوْمَ
और दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
لَا
not
يُنصَرُونَ
ना वो मदद दिए जाऐंगे
और हमने उन्हें आग की ओर बुलानेवाले पेशवा बना दिया और क़ियामत के दिन उन्हें कोई सहायता प्राप्त न होगी
तफ़्सीर:
और हमने उन्हें सरकश और गुमराह लोगों का अगुआ बना दिया, जो कुफ़्र और गुमराही फैलाकर लोगों को आग की ओर बुलाते हैं। क़ियामत के दिन उन्हें यातना से बचाकर उनकी सहायता नहीं की जाएगी। बल्कि बुरे कार्यों को रिवाज देने और गुमराही की ओर बुलाने के कारण, उनके लिए यातना दोगुनी कर दी जाएगी। उन्हें अपने कार्यों का बोझ और उन लोगों के कार्यों का भी बोझ उठाना पड़ेगा, जिन्होंने उन कार्यों के करने में उनका पालन किया।
आयत 42
وَأَتْبَعْنَـٰهُمْ فِى هَـٰذِهِ ٱلدُّنْيَا لَعْنَةًۭ ۖ وَيَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ هُم مِّنَ ٱلْمَقْبُوحِينَ
وَأَتْبَعْنَـٰهُمْ
और पीछे लगा दी हमने उनके
فِى
in
هَـٰذِهِ
this
ٱلدُّنْيَا
इस दुनिया में
لَعْنَةًۭ ۖ
लानत
وَيَوْمَ
और दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
هُم
वो
مِّنَ
(will be) of
ٱلْمَقْبُوحِينَ
बदहाल लोगों में से होंगे
और हमने इस दुनिया में उनके पीछे लानत लगा दी और क़ियामत दिन वही बदहाल होंगे
तफ़्सीर:
और हमने इस दुनिया में उनके दंड के अलावा उनके पीछे अपमान और तिरस्कार लगा दिया, तथा क़ियामत के दिन वे अल्लाह की दया से दूर रखे गए निंदनीय लोगों में से होंगे।
आयत 43
وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ مِنۢ بَعْدِ مَآ أَهْلَكْنَا ٱلْقُرُونَ ٱلْأُولَىٰ بَصَآئِرَ لِلنَّاسِ وَهُدًۭى وَرَحْمَةًۭ لَّعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
ءَاتَيْنَا
दी हमने
مُوسَى
मूसा को
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
مِنۢ
after [what]
بَعْدِ
इसके बाद कि
مَآ
जो
أَهْلَكْنَا
हलाक कर दिया हमने
ٱلْقُرُونَ
the generations
ٱلْأُولَىٰ
पहली उम्मतों को
بَصَآئِرَ
खुले दलाइल थे
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
وَهُدًۭى
और हिदायत
وَرَحْمَةًۭ
और रहमत थी
لَّعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَتَذَكَّرُونَ
वो नसीहत पकड़ें
और अगली नस्लों को विनष्ट कर देने के पश्चात हमने मूसा को किताब प्रदान की, लोगों के लिए अन्तर्दृष्टियों की सामग्री, मार्गदर्शन और दयालुता बनाकर, ताकि वे ध्यान दें
तफ़्सीर:
हमने मूसा अलैहिस्सलाम को तौरात प्रदान की, इसके पश्चात कि जब हमने पिछली जातियों की ओर अपने रसूल भेजे, लेकिन उन्होंने उन्हें झुठला दिया, तो हमने उन्हें झुठलाने के कारण उनका विनाश कर दिया। इसमें लोगों के लिए यह व्याख्या मौजूद है कि उनके लिए क्या लाभदायक है, कि वे उसपर अमल करें और उनके लिए क्या हानिकारक है, कि वे उसे छोड़ दें। तथा इसमें भलाई की ओर उनका मार्गदर्शन और दया है क्योंकि इसमें दुनिया एवं आख़िरत की भलाई है, ताकि वे अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों को याद करें और उसका शुक्र करें और उसपर ईमान लाएँ।
आयत 44
وَمَا كُنتَ بِجَانِبِ ٱلْغَرْبِىِّ إِذْ قَضَيْنَآ إِلَىٰ مُوسَى ٱلْأَمْرَ وَمَا كُنتَ مِنَ ٱلشَّـٰهِدِينَ
وَمَا
और ना
كُنتَ
थे आप
بِجَانِبِ
on (the) side
ٱلْغَرْبِىِّ
मग़रिबी जानिब(तूर की)
إِذْ
जब
قَضَيْنَآ
वही की हमने
إِلَىٰ
to
مُوسَى
तरफ़ मूसा के
ٱلْأَمْرَ
हुक्म की
وَمَا
और ना
كُنتَ
थे आप
مِنَ
among
ٱلشَّـٰهِدِينَ
हाज़िर होने वालों में से
तुम तो (नगर के) पश्चिमी किनारे पर नहीं थे, जब हमने मूसा को बात की निर्णित सूचना दी थी, और न तुम गवाहों में से थे
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आप मूसा अलैहिस्सलाम के हिसाब से पहाड़ के पश्चिमी किनारे पर मौजूद नहीं थे, जब हमने मूसा को फ़िरऔन तथा उसके प्रमुखों की ओर रसूल बनाकर भेजने का आदेश संपन्न किया, और न ही आप वहाँ उपस्थित होने वालों में से थे कि आप उसके समाचार से अवगत होते और उसे लोगों को बताते। इसलिए आप लोगों को जो कुछ बता रहे हैं, वह अल्लाह ने आपकी ओर वह़्य की है।
आयत 45
وَلَـٰكِنَّآ أَنشَأْنَا قُرُونًۭا فَتَطَاوَلَ عَلَيْهِمُ ٱلْعُمُرُ ۚ وَمَا كُنتَ ثَاوِيًۭا فِىٓ أَهْلِ مَدْيَنَ تَتْلُوا۟ عَلَيْهِمْ ءَايَـٰتِنَا وَلَـٰكِنَّا كُنَّا مُرْسِلِينَ
وَلَـٰكِنَّآ
और लेकिन हम
أَنشَأْنَا
उठाईं हमने
قُرُونًۭا
उम्मतें
فَتَطَاوَلَ
तो तवील हो गई
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلْعُمُرُ ۚ
मुद्दत
وَمَا
और ना
كُنتَ
थे आप
ثَاوِيًۭا
मुक़ीम
فِىٓ
among
أَهْلِ
(the) people
مَدْيَنَ
अहले मदयन में
تَتْلُوا۟
कि आप पढ़ते
عَلَيْهِمْ
उन पर
ءَايَـٰتِنَا
आयात हमारी
وَلَـٰكِنَّا
और लेकिन हम
كُنَّا
थे हम ही
مُرْسِلِينَ
भेजने वाले
लेकिन हमने बहुत-सी नस्लें उठाईं और उनपर बहुत समय बीत गया। और न तुम मदयनवालों में रहते थे कि उन्हें हमारी आयतें सुना रहे होते, किन्तु रसूलों को भेजनेवाले हम ही रहे है
तफ़्सीर:
लेकिन हमने मूसा के बाद कई समुदायों और प्राणियों को पैदा किया, फिर उनपर लंबी अवधि बीत गई, यहाँ तक कि वे अल्लाह के वचनों को भूल गए। तथा आप मदयन वालों के साथ नहीं रह रहे थे कि उनके सामने हमारी आयतें पढ़ते। किंतु हमने आपको अपने पास से रसूल बनाकर भेजा और आपकी ओर मूसा और उनके मदयन में निवास के समाचार की वह़्य की। अतः आपने लोगों को उसके बारे में बताया जो अल्लाह ने आपकी ओर वह़्य की।
आयत 46
وَمَا كُنتَ بِجَانِبِ ٱلطُّورِ إِذْ نَادَيْنَا وَلَـٰكِن رَّحْمَةًۭ مِّن رَّبِّكَ لِتُنذِرَ قَوْمًۭا مَّآ أَتَىٰهُم مِّن نَّذِيرٍۢ مِّن قَبْلِكَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ
وَمَا
और ना
كُنتَ
थे आप
بِجَانِبِ
at (the) side
ٱلطُّورِ
तूर की जानिब
إِذْ
जब
نَادَيْنَا
पुकारा हमने (मूसा को)
وَلَـٰكِن
और लेकिन
رَّحْمَةًۭ
ये रहमत है
مِّن
from
رَّبِّكَ
आपके रब की तरफ़ से
لِتُنذِرَ
ताकि आप डराऐं
قَوْمًۭا
एक क़ौम को
مَّآ
नहीं
أَتَىٰهُم
आया उनके पास
مِّن
any
نَّذِيرٍۢ
कोई डराने वाला
مِّن
before you
قَبْلِكَ
आपसे पहले
لَعَلَّهُمْ
शायद कि वो
يَتَذَكَّرُونَ
वो नसीहत पकड़ें
और तुम तूर के अंचल में भी उपस्थित न थे जब हमने पुकारा था, किन्तु यह तुम्हारे रब की दयालुता है - ताकि तुम ऐसे लोगों को सचेत कर दो जिनके पास तुमसे पहले कोई सचेत करनेवाला नहीं आया, ताकि वे ध्यान दें
तफ़्सीर:
और न ही आप उस समय तूर (पर्वत) के किनारे पर थे, जब हमने मूसा को पुकारा और उनकी ओर वह़्य की जो कुछ वह़्य की, कि आप लोगों को उस घटना के बारे में बता सकें। परंतु हमने आपको आपके पालनहार की ओर से लोगों के लिए रहमत बनाकर भेजा और आपकी ओर उसके समाचार की वह़्य की, ताकि आप उन लोगों को सावधान करें, जिनके पास आपसे पूर्व कोई सचेत करने वाला रसूल नहीं आया, ताकि वे उपदेश ग्रहण करें और आप अल्लाह के पास से जो कुछ लेकर आए हैं उसपर ईमान लाएँ।
आयत 47
وَلَوْلَآ أَن تُصِيبَهُم مُّصِيبَةٌۢ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ فَيَقُولُوا۟ رَبَّنَا لَوْلَآ أَرْسَلْتَ إِلَيْنَا رَسُولًۭا فَنَتَّبِعَ ءَايَـٰتِكَ وَنَكُونَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
وَلَوْلَآ
और अगर ना होता
أَن
ये कि
تُصِيبَهُم
पहुँचती उन्हें
مُّصِيبَةٌۢ
कोई मुसीबत
بِمَا
बवजह उसके जो
قَدَّمَتْ
आगे भेजा
أَيْدِيهِمْ
उनके दोनों हाथों ने
فَيَقُولُوا۟
तो वो कहते
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
لَوْلَآ
क्यों ना
أَرْسَلْتَ
भेजा तू ने
إِلَيْنَا
हमारी तरफ़
رَسُولًۭا
कोई रसूल
فَنَتَّبِعَ
तो हम पैरवी करते
ءَايَـٰتِكَ
तेरी आयात की
وَنَكُونَ
और हम हो जाते
مِنَ
of
ٱلْمُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वालों में से
(हम रसूल बनाकर न भेजते) यदि यह बात न होती कि जो कुछ उनके हाथ आगे भेज चुके है उसके कारण जब उनपर कोई मुसीबत आए तो वे कहने लगें, "ऐ हमारे रब, तूने क्यों न हमारी ओर कोई रसूल भेजा कि हम तेरी आयतों का (अनुसरण) करते और मोमिन होते?"
तफ़्सीर:
और यदि ऐसा न होता कि उन्हें उनके कुफ़्र एवं पाप के कारण कोई ईश्वरीय दंड पहुँचे, तो वे अपने पास रसूल न भेजे जाने को हुज्जत बनाकर कहने लगें : (ऐ हमारे पालनहार!) तूने हमारे पास कोई रसूल क्यों न भेजा कि हम तेरी आयतों का अनुसरण करते और उनपर अमल करते तथा हम उन ईमान वालों में से हो जाते, जो अपने रब के आदेश का पालन करने वाले हैं। यदि यह बात न होती तो हम शीघ्र ही उन्हें दंड देते। परंतु हमने उसे उनसे उस समय तक विलंब कर दिया जब तक कि उनके पास रसूल भेजकर उनके बहाने को समाप्त न कर दें।
आयत 48
فَلَمَّا جَآءَهُمُ ٱلْحَقُّ مِنْ عِندِنَا قَالُوا۟ لَوْلَآ أُوتِىَ مِثْلَ مَآ أُوتِىَ مُوسَىٰٓ ۚ أَوَلَمْ يَكْفُرُوا۟ بِمَآ أُوتِىَ مُوسَىٰ مِن قَبْلُ ۖ قَالُوا۟ سِحْرَانِ تَظَـٰهَرَا وَقَالُوٓا۟ إِنَّا بِكُلٍّۢ كَـٰفِرُونَ
فَلَمَّا
तो जब
جَآءَهُمُ
पास आया उनके
ٱلْحَقُّ
हक़
مِنْ
from Us
عِندِنَا
हमारे पास से
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لَوْلَآ
क्यों ना
أُوتِىَ
वो दिया गया
مِثْلَ
मानिन्द
مَآ
उसके जो
أُوتِىَ
दिए गए
مُوسَىٰٓ ۚ
मूसा
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَكْفُرُوا۟
कुफ़्र किया उन्होंने
بِمَآ
उसका जो
أُوتِىَ
दिए गए
مُوسَىٰ
मूसा
مِن
before
قَبْلُ ۖ
इससे पहले
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
سِحْرَانِ
दोनों जादू हैं
تَظَـٰهَرَا
एक दूसरे की मदद करते हैं
وَقَالُوٓا۟
और उन्होंने कहा
إِنَّا
बेशक हम
بِكُلٍّۢ
हर एक के
كَـٰفِرُونَ
इन्कारी हैं
फिर जब उनके पास हमारे यहाँ से सत्य आ गया तो वे कहने लगे कि "जो चीज़ मूसा को मिली थी उसी तरह की चीज़ इसे क्यों न मिली?" क्या वे उसका इनकार नहीं कर चुके है, जो इससे पहले मूसा को प्रदान किया गया था? उन्होंने कहा, "दोनों जादू है जो एक-दूसरे की सहायता करते है।" और कहा, "हम तो हरेक का इनकार करते है।"
तफ़्सीर:
जब मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क़ुरैश के पास अपने रब का संदेश लेकर आए, तो क़ुरैश ने आपके विषय में यहूदियों से पूछा। यहूदियों ने उन्हें यह तर्क सुझाया, तो उन्होंने कहा : मुहम्मद को मूसा की तरह ऐसी निशानियाँ क्यों न दी गईं, जो उनके रसूल होने को प्रमाणित करतीं; जैसे हाथ का चमकना और लाठी। (ऐ रसूल!) आप उन्हें उत्तर देते हुए कह दें : क्या यहूदियों ने उन निशानियों का इनकार नहीं किया जो मूसा को दी गई थीं? तथा उन्होंने तौरात और क़ुरआन दोनों के बारे में कहा : ये दोनों जादू हैं, जो एक-दूसरे का समर्थन करते हैं। तथा उन्होंने कहा : हम क़ुरआन तथा तौरात में से हर एक का इनकार करते हैं।
आयत 49
قُلْ فَأْتُوا۟ بِكِتَـٰبٍۢ مِّنْ عِندِ ٱللَّهِ هُوَ أَهْدَىٰ مِنْهُمَآ أَتَّبِعْهُ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
قُلْ
कह दीजिए
فَأْتُوا۟
पस ले आओ
بِكِتَـٰبٍۢ
कोई किताब
مِّنْ
from Allah
عِندِ
पास से
ٱللَّهِ
अल्लाह के
هُوَ
वो
أَهْدَىٰ
ज़्यादा हिदायत वाली हो
مِنْهُمَآ
इन दोनों से
أَتَّبِعْهُ
मैं पैरवी कर लूँगा उसकी
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
कहो, "अच्छा तो लाओ अल्लाह के यहाँ से कोई ऐसी किताब, जो इन दोनों से बढ़कर मार्गदर्शन करनेवाली हो कि मैं उसका अनुसरण करूँ, यदि तुम सच्चे हो?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इनसे कह दें : तुम अल्लाह की ओर से अवतरित कोई ऐसी किताब ले आओ, जो तौरात और क़ुरआन से अधिक मार्गदर्शन करने वाली हो। यदि तुम उसे ले आए, तो मैं उसका अनुसरण करूँगा, यदि तुम अपने इस दावे में सच्चे हो कि तौरात और क़ुरआन दोनों जादू हैं।
आयत 50
فَإِن لَّمْ يَسْتَجِيبُوا۟ لَكَ فَٱعْلَمْ أَنَّمَا يَتَّبِعُونَ أَهْوَآءَهُمْ ۚ وَمَنْ أَضَلُّ مِمَّنِ ٱتَّبَعَ هَوَىٰهُ بِغَيْرِ هُدًۭى مِّنَ ٱللَّهِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلظَّـٰلِمِينَ
فَإِن
फिर अगर
لَّمْ
ना
يَسْتَجِيبُوا۟
उन्होंने क़ुबूल की
لَكَ
आपकी (बात)
فَٱعْلَمْ
तो जान लीजिए
أَنَّمَا
बेशक
يَتَّبِعُونَ
वो पैरवी कर रहे हैं
أَهْوَآءَهُمْ ۚ
अपनी ख़्वाहिशात की
وَمَنْ
और कौन
أَضَلُّ
ज़्यादा गुमराह है
مِمَّنِ
उससे जो
ٱتَّبَعَ
पैरवी करे
هَوَىٰهُ
अपनी ख़्वाहिशात की
بِغَيْرِ
बग़ैर
هُدًۭى
हिदायत के
مِّنَ
from
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह की तरफ़ से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يَهْدِى
नहीं वो हिदायत देता
ٱلْقَوْمَ
उन लोगों को
ٱلظَّـٰلِمِينَ
जो ज़ालिम हैं
अब यदि वे तुम्हारी माँग पूरी न करें तो जान लो कि वे केवल अपनी इच्छाओं के पीछे चलते है। और उस व्यक्ति से बढ़कर भटका हुआ कौन होगा जो अल्लाह की ओर से किसी मार्गदर्शन के बिना अपनी इच्छा पर चले? निश्चय ही अल्लाह ज़ालिम लोगों को मार्ग नहीं दिखाता
तफ़्सीर:
फिर यदि क़ुरैश तौरात एवं क़ुरआन से अधिक मार्गदर्शन करने वाली कोई किताब लाने के मुतालबे को स्वीकार न करें, तो आप निश्चित रूप से जान लें कि उनका इन दोनों को झुठलाना सबूत पर आधारित नहीं है, बल्कि इच्छा का पालन करने के कारण है। और उससे अधिक पथभ्रष्ट कोई नहीं है जो सर्वशक्तिमान अल्लाह के मार्गदर्शन के बिना अपनी इच्छा का अनुसरण करे। निःसंदेह अल्लाह उन लोगों को मार्गदर्शन का सामर्थ्य नहीं देता, जो अल्लाह का इनकार करके अपने आपपर अत्याचार करने वाले हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
फिरऔन-हामान-कारून के इत्तेहाद और कुरआन की गवाही का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि ताकतवर लोगों का इत्तेहाद भी हक के मुकाबले में आखिरकार नाकाम रहता है।
आयत 51
۞ وَلَقَدْ وَصَّلْنَا لَهُمُ ٱلْقَوْلَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ
۞ وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
وَصَّلْنَا
पै दर पै भेजा हमने
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلْقَوْلَ
कलाम (अपना)
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَتَذَكَّرُونَ
वो नसीहत पकड़ें
और हम उनके लिए वाणी बराबर अवतरित करते रहे, शायद वे ध्यान दें
तफ़्सीर:
निःसंदेह हमने मुश्रिकों और बनी इसराईल के यहूदियों को पिछली जातियों की कहानियों और उस यातना की बात निरंतर पहुँचा दी, जो हमने उनपर उतारी जब उन्होंने हमारे रसूलों को झुठलाया; इस आशा में कि वे इससे उपदेश ग्रहण करते हुए ईमान ले आएँ। ताकि उन्हें (भी) उस यातना का सामना न करना पड़े, जो पिछले समुदायों को पहुँची थी।
आयत 52
ٱلَّذِينَ ءَاتَيْنَـٰهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ مِن قَبْلِهِۦ هُم بِهِۦ يُؤْمِنُونَ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ءَاتَيْنَـٰهُمُ
दी हमने उन्हें
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
مِن
before it
قَبْلِهِۦ
इससे पहले
هُم
वो
بِهِۦ
इस पर
يُؤْمِنُونَ
वो ईमान लाते हैं
जिन लोगों को हमने इससे पूर्व किताब दी थी, वे इसपर ईमान लाते है
तफ़्सीर:
जो लोग क़ुरआन के अवतरण से पहले तौरात पर ईमान रखने में दृढ़ थे, वे क़ुरआन पर ईमान लाते हैं। क्योंकि वे अपनी किताबों में इसकी सूचना और वर्णन पाते हैं।
आयत 53
وَإِذَا يُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا بِهِۦٓ إِنَّهُ ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّنَآ إِنَّا كُنَّا مِن قَبْلِهِۦ مُسْلِمِينَ
وَإِذَا
और जब
يُتْلَىٰ
पढ़ा जाता है
عَلَيْهِمْ
उन पर (क़ुरआन)
قَالُوٓا۟
वो कहते हैं
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
بِهِۦٓ
उस पर
إِنَّهُ
बेशक वो
ٱلْحَقُّ
हक़ है
مِن
from
رَّبِّنَآ
हमारे रब की तरफ़ से
إِنَّا
बेशक हम
كُنَّا
थे हम
مِن
before it
قَبْلِهِۦ
इससे पहले ही
مُسْلِمِينَ
फ़रमाबरदार
और जब यह उनको पढ़कर सुनाया जाता है तो वे कहते है, "हम इसपर ईमान लाए। निश्चय ही यह सत्य है हमारे रब की ओर से। हम तो इससे पहले ही से मुस्लिम (आज्ञाकारी) हैं।"
तफ़्सीर:
जब उनके सामने क़ुरआन पढ़ा जाता है, तो कहते हैं : हम इसपर ईमान लाए। निश्चय यह निर्विवाद सत्य है, जो हमारे रब की ओर से उतारा गया है। निःसंदेह इस क़ुरआन से पहले हम मुसलमान थे। क्योंकि इससे पहले रसूल जो कुछ लाए थे, हम उसपर ईमान रखते थे।
आयत 54
أُو۟لَـٰٓئِكَ يُؤْتَوْنَ أَجْرَهُم مَّرَّتَيْنِ بِمَا صَبَرُوا۟ وَيَدْرَءُونَ بِٱلْحَسَنَةِ ٱلسَّيِّئَةَ وَمِمَّا رَزَقْنَـٰهُمْ يُنفِقُونَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
يُؤْتَوْنَ
जो दिए जाऐंगे
أَجْرَهُم
अज्र अपना
مَّرَّتَيْنِ
दो बार
بِمَا
बवजह उसके जो
صَبَرُوا۟
उन्होंने सब्र किया
وَيَدْرَءُونَ
और वो दूर करते हैं
بِٱلْحَسَنَةِ
साथ भलाई के
ٱلسَّيِّئَةَ
बुराई को
وَمِمَّا
और उसमें से जो
رَزَقْنَـٰهُمْ
रिज़्क़ दिया हमने उन्हें
يُنفِقُونَ
वो ख़र्च करते हैं
ये वे लोग है जिन्हें उनका प्रतिदान दुगना दिया जाएगा, क्योंकि वे जमे रहे और भलाई के द्वारा बुराई को दूर करते है और जो कुछ रोज़ी हमने उन्हें दी हैं, उसमें से ख़र्च करते है
तफ़्सीर:
उपर्युक्त गुणों के साथ वर्णित लोगों को अल्लाह उनके कर्मों का दोहरा सवाब देगा। इस कारण कि उन्होंने अपनी किताब पर ईमान रखने में धैर्य रखा और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नबी बनाए जाने के पश्चात उनपर भी ईमान लाए। तथा वे अपने अच्छे कर्मों के साथ उन पापों को दूर करते हैं, जो उन्होंने कमाए हैं, तथा जो कुछ हमने उन्हें दिया है, उसमें से भलाई के कामों में खर्च करते हैं।
आयत 55
وَإِذَا سَمِعُوا۟ ٱللَّغْوَ أَعْرَضُوا۟ عَنْهُ وَقَالُوا۟ لَنَآ أَعْمَـٰلُنَا وَلَكُمْ أَعْمَـٰلُكُمْ سَلَـٰمٌ عَلَيْكُمْ لَا نَبْتَغِى ٱلْجَـٰهِلِينَ
وَإِذَا
और जब
سَمِعُوا۟
वो सुनते हैं
ٱللَّغْوَ
बेहूदा बात को
أَعْرَضُوا۟
वो ऐराज़ करते हैं
عَنْهُ
उससे
وَقَالُوا۟
और वो कहते हैं
لَنَآ
हमारे लिए
أَعْمَـٰلُنَا
आमाल हमारे
وَلَكُمْ
और तुम्हारे लिए
أَعْمَـٰلُكُمْ
आमाल तुम्हारे
سَلَـٰمٌ
सलाम हो
عَلَيْكُمْ
तुम पर
لَا
not
نَبْتَغِى
नहीं हम चाहते
ٱلْجَـٰهِلِينَ
जाहिलों को
और जब वे व्यर्थ की बात सुनते है तो यह कहते हुए उससे किनारा खींच लेते है कि "हमारे लिए हमारे कर्म है और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म है। तुमको सलाम है! ज़ाहिलों को हम नहीं चाहते।"
तफ़्सीर:
और जब किताब वाले लोगों में से ये ईमान वाले कोई व्यर्थ बात सुनते हैं, तो उसपर ध्यान दिए बिना उससे किनारा कर लेते हैं और अपने साथियों को संबोधित करके कहते हैं : हमारे लिए हमारे कर्मों का प्रतिफल है और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्मों का प्रतिफल। तुम हमारी ओर से अपशब्द और कष्ट से सुरक्षित हो। हम जाहिलों की संगत नहीं चाहते। क्योंकि इसमें धर्म और दुनिया की हानि और कष्ट है।
आयत 56
إِنَّكَ لَا تَهْدِى مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ يَهْدِى مَن يَشَآءُ ۚ وَهُوَ أَعْلَمُ بِٱلْمُهْتَدِينَ
إِنَّكَ
बेशक आप
لَا
(can) not
تَهْدِى
नहीं आप हिदायत दे सकते
مَنْ
जिसे
أَحْبَبْتَ
पसंद करें आप
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَهْدِى
वो हिदायत देता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता है
وَهُوَ
और वो
أَعْلَمُ
ख़ूब जानता है
بِٱلْمُهْتَدِينَ
हिदायत पाने वालों को
तुम जिसे चाहो राह पर नहीं ला सकते, किन्तु अल्लाह जिसे चाहता है राह दिखाता है, और वही राह पानेवालों को भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप जिसे चाहें, जैसे अबू तालिब आदि, उसे ईमान का सामर्थ्य प्रदान करके मार्गदर्शन पर नहीं ला सकते। लेकिन केवल अल्लाह ही है, जो जिसे चाहता है मार्गदर्शन का सामर्थ्य प्रदान करता है। तथा वह उसे सबसे अधिक जानने वाला है, जो उसके पूर्व ज्ञान के अनुसार सीधे रास्ते पर चलने वालों में से है।
आयत 57
وَقَالُوٓا۟ إِن نَّتَّبِعِ ٱلْهُدَىٰ مَعَكَ نُتَخَطَّفْ مِنْ أَرْضِنَآ ۚ أَوَلَمْ نُمَكِّن لَّهُمْ حَرَمًا ءَامِنًۭا يُجْبَىٰٓ إِلَيْهِ ثَمَرَٰتُ كُلِّ شَىْءٍۢ رِّزْقًۭا مِّن لَّدُنَّا وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
وَقَالُوٓا۟
और उन्होंने कहा
إِن
अगर
نَّتَّبِعِ
हम पैरवी करें
ٱلْهُدَىٰ
हिदायत की
مَعَكَ
आप के साथ
نُتَخَطَّفْ
हम उचक लिए जाऐंगे
مِنْ
from
أَرْضِنَآ ۚ
अपनी ज़मीन में
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
نُمَكِّن
हमने जगह दी
لَّهُمْ
उन्हें
حَرَمًا
हरम
ءَامِنًۭا
अमन वाले में
يُجْبَىٰٓ
खिंचे चले आते हैं
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
ثَمَرَٰتُ
फल
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
رِّزْقًۭا
रिज़्क़ के तौर पर
مِّن
from
لَّدُنَّا
हमारी तरफ़ से
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَهُمْ
अक्सर उनके
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
वे कहते है, "यदि हम तुम्हारे साथ इस मार्गदर्शन का अनुसरण करें तो अपने भू-भाग से उचक लिए जाएँगे।" क्या ख़तरों से सुरक्षित हरम में हमने ठिकाना नहीं दिया, जिसकी ओर हमारी ओर से रोज़ी के रूप में हर चीज़ की पैदावार खिंची चली आती है? किन्तु उनमें से अधिकतर जानते नहीं
तफ़्सीर:
मक्का के मुश्रिकों ने इस्लाम का पालन करने और उसपर ईमान लाने से बहाना करते हुए कहा : यदि हम इस इस्लाम का पालन करें जो आप लाए हैं, तो बहुत जल्द हमारे दुश्मन हमें हमारी भूमि से उठा ले जाएँगे। क्या हमने उन्हें ऐसे हरम में ठिकाना नहीं दिया, जिसमें रक्तपात और अत्याचार निषिद्ध है, जिसमें वे दूसरों के आक्रमण से सुरक्षित रहते हैं। जहाँ हर चीज़ के फल हमारी ओर से जीविका के तौर पर लाए जाते हैं?! परंतु उनमें से अधिकांश लोग अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों को जानते ही नहीं कि उनके लिए उसका आभार व्यक्त करें।
आयत 58
وَكَمْ أَهْلَكْنَا مِن قَرْيَةٍۭ بَطِرَتْ مَعِيشَتَهَا ۖ فَتِلْكَ مَسَـٰكِنُهُمْ لَمْ تُسْكَن مِّنۢ بَعْدِهِمْ إِلَّا قَلِيلًۭا ۖ وَكُنَّا نَحْنُ ٱلْوَٰرِثِينَ
وَكَمْ
और कितनी ही
أَهْلَكْنَا
हलाक कीं हमने
مِن
of
قَرْيَةٍۭ
बस्तियाँ
بَطِرَتْ
जो इतराती थीं
مَعِيشَتَهَا ۖ
अपनी मईशत पर
فَتِلْكَ
तो ये
مَسَـٰكِنُهُمْ
घर हैं उनके
لَمْ
नहीं
تُسْكَن
वो बसाय गए
مِّنۢ
after them
بَعْدِهِمْ
बाद उनके
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا ۖ
बहुत थोड़े
وَكُنَّا
और हैं हम
نَحْنُ
हम ही
ٱلْوَٰرِثِينَ
वारिस
हमने कितनी ही बस्तियों को विनष्ट कर डाला, जिन्होंने अपनी गुज़र-बसर के संसाधन पर इतराते हुए अकृतज्ञता दिखाई। तो वे है उनके घर, जो उनके बाद आबाद थोड़े ही हुए। अन्ततः हम ही वारिस हुए
तफ़्सीर:
कितनी ही बस्तियाँ ऐसी हैं, जिन्होंने अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों का इनकार किया और पापों तथा अवज्ञा में हद से बढ़ गईं। तो हमने उनपर एक अज़ाब भेजकर उसके साथ उन्हें नष्ट कर दिया। तो ये उनके घर उजड़े पड़े हैं, जहाँ से लोग गुज़रते हैं, परंतु कुछ राहगीरों को छोड़कर यहाँ उनके बाद कोई निवास नहीं किया। और अंततः हम ही वारिस हैं, जो आसमानों और ज़मीन के और उनमें रहने वालों के वारिस होते हैं।
आयत 59
وَمَا كَانَ رَبُّكَ مُهْلِكَ ٱلْقُرَىٰ حَتَّىٰ يَبْعَثَ فِىٓ أُمِّهَا رَسُولًۭا يَتْلُوا۟ عَلَيْهِمْ ءَايَـٰتِنَا ۚ وَمَا كُنَّا مُهْلِكِى ٱلْقُرَىٰٓ إِلَّا وَأَهْلُهَا ظَـٰلِمُونَ
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
رَبُّكَ
रब आपका
مُهْلِكَ
हलाक करने वाला
ٱلْقُرَىٰ
बस्तियों को
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَبْعَثَ
वो भेज दे
فِىٓ
in
أُمِّهَا
उनके मरकज़ में
رَسُولًۭا
कोई रसूल
يَتْلُوا۟
जो पढ़ता हो
عَلَيْهِمْ
उन पर
ءَايَـٰتِنَا ۚ
आयात हमारी
وَمَا
और नहीं
كُنَّا
हैं हम
مُهْلِكِى
हलाक करने वाले
ٱلْقُرَىٰٓ
बस्तियों को
إِلَّا
मगर
وَأَهْلُهَا
इस हाल में कि रहने वाले उसके
ظَـٰلِمُونَ
ज़ालिम हों
तेरा रब तो बस्तियों को विनष्ट करनेवाला नहीं जब तक कि उनकी केन्द्रीय बस्ती में कोई रसूल न भेज दे, जो हमारी आयतें सुनाए। और हम बस्तियों को विनष्ट करनेवाले नहीं सिवाय इस स्थिति के कि वहाँ के रहनेवाले ज़ालिम हों
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आपका रब बस्तियों को विनाश नहीं करता, जब तक कि उनमें से प्रमुख बस्ती में एक रसूल भेजकर उसके वासियों के बहाने को समाप्त न कर दे, जिस तरह कि उसने आपको उम्मुल-कु़रा अर्थात् मक्का में भेजा। तथा हम कभी बस्तियों के लोगों को नष्ट नहीं करते जबकि वे सत्य पर क़ायम रहने वाले हों। लेकिन यदि वे कुफ़्र और पाप करके अत्याचार करने वाले हो जाते हैं, तो हम उन्हें नष्ट कर देते हैं।
आयत 60
وَمَآ أُوتِيتُم مِّن شَىْءٍۢ فَمَتَـٰعُ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا وَزِينَتُهَا ۚ وَمَا عِندَ ٱللَّهِ خَيْرٌۭ وَأَبْقَىٰٓ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
وَمَآ
और जो भी
أُوتِيتُم
दिए गए तुम
مِّن
from
شَىْءٍۢ
कोई चीज़
فَمَتَـٰعُ
पस सामान है
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी का
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
وَزِينَتُهَا ۚ
और रौनक़ उसकी
وَمَا
और जो कुछ
عِندَ
पास है
ٱللَّهِ
अल्लाह के
خَيْرٌۭ
बेहतर है
وَأَبْقَىٰٓ ۚ
और ज़्यादा बाक़ी रहने वाला
أَفَلَا
क्या भला नहीं
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल से काम लेते
जो चीज़ भी तुम्हें प्रदान की गई है वह तो सांसारिक जीवन की सामग्री और उसकी शोभा है। और जो कुछ अल्लाह के पास है वह उत्तम और शेष रहनेवाला है, तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?
तफ़्सीर:
और तुम्हारे रब ने तुम्हें जो कुछ भी दिया है, वह ऐसी चीज़ है जिसका तुम दुनिया के जीवन में आनंद लेते और शृंगार करते हो, फिर वह समाप्त हो जाती है। किंतु परलोक में अल्लाह के पास जो महान प्रतिफल है, वह इस दुनिया के सामान और अलंकरण से बेहतर और अधिक बाक़ी रहने वाला है। क्या तुम इस बात को नहीं समझते, ताकि जो बाक़ी रहने वाला है, उसे समाप्त हो जाने वाले पर प्राथमिकता दो?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
पहले ईमान लाने वालों की तारीफ और दुनिया की चीज़ों की हकीकत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि दुनिया की चीज़ें अस्थायी लुत्फ हैं, आखिरत की नेमतें बेहतर और बाकी रहने वाली हैं।
आयत 61
أَفَمَن وَعَدْنَـٰهُ وَعْدًا حَسَنًۭا فَهُوَ لَـٰقِيهِ كَمَن مَّتَّعْنَـٰهُ مَتَـٰعَ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ثُمَّ هُوَ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ مِنَ ٱلْمُحْضَرِينَ
أَفَمَن
क्या भला वो जो
وَعَدْنَـٰهُ
वादा किया हमने उससे
وَعْدًا
वादा
حَسَنًۭا
अच्छा
فَهُوَ
फिर वो
لَـٰقِيهِ
पाने वाला है उसे
كَمَن
मानिन्द उसके हो सकता है
مَّتَّعْنَـٰهُ
सामान दिया हमने जिसे
مَتَـٰعَ
सामान
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी का
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
ثُمَّ
फिर
هُوَ
वो
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
مِنَ
(will be) among
ٱلْمُحْضَرِينَ
हाज़िर किए जाने वालों में से होगा
भला वह व्यक्ति जिससे हमने अच्छा वादा किया है और वह उसे पानेवाला भी हो, वह उस व्यक्ति की तरह हो सकता है जिसे हमने सांसारिक जीवन की सामग्री दे दी हो, फिर वह क़ियामत के दिन पकड़कर पेश किया जानेवाला हो?
तफ़्सीर:
तो क्या वह व्यक्ति जिससे हमने आख़िरत में जन्नत और उसके शाश्वत आनंद का वादा किया है, जिसकी ओर वह अनिवार्य रूप से जाने वाला है, वह उस व्यक्ति के समान हो सकता है, जिसे हमने दुनिया के जीवने में धन और अलंकरण प्रदान किया है जिसका वह आनंद लेता है। फिर वह क़ियामत के दिन जहन्नम की आग में डाले जाने वाले लोगों में होगा?!
आयत 62
وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ أَيْنَ شُرَكَآءِىَ ٱلَّذِينَ كُنتُمْ تَزْعُمُونَ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يُنَادِيهِمْ
वो पुकारेगा उन्हें
فَيَقُولُ
फिर वो फ़रमायेगा
أَيْنَ
कहाँ हैं
شُرَكَآءِىَ
शरीक मेरे
ٱلَّذِينَ
वो जिनका
كُنتُمْ
थे तुम
تَزْعُمُونَ
तुम गुमान रखते
ख़याल करो जिस दिन वह उन्हें पुकारेगा और कहेगा, "कहाँ है मेरे वे साझीदार जिनका तुम्हें दावा था?"
तफ़्सीर:
और जिस दिन उनका पवित्र एवं सर्वोच्च रब उन्हें पुकारकर कहेगा : मेरे वे साझीदार कहाँ हैं, जिनकी तुम मेरे अलावा पूजा करते थे और दावा करते थे कि वे मेरे साझी हैं?
आयत 63
قَالَ ٱلَّذِينَ حَقَّ عَلَيْهِمُ ٱلْقَوْلُ رَبَّنَا هَـٰٓؤُلَآءِ ٱلَّذِينَ أَغْوَيْنَآ أَغْوَيْنَـٰهُمْ كَمَا غَوَيْنَا ۖ تَبَرَّأْنَآ إِلَيْكَ ۖ مَا كَانُوٓا۟ إِيَّانَا يَعْبُدُونَ
قَالَ
कहेंगे
ٱلَّذِينَ
वो लोग
حَقَّ
सच होगई
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلْقَوْلُ
बात
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
هَـٰٓؤُلَآءِ
ये हैं
ٱلَّذِينَ
वो लोग जिन्हें
أَغْوَيْنَآ
गुमराह किया हमने
أَغْوَيْنَـٰهُمْ
गुमराह किया था हमने उन्हें
كَمَا
जैसा कि
غَوَيْنَا ۖ
गुमराह हुए हम
تَبَرَّأْنَآ
इज़हारे बराअत करते हैं हम(उनसे)
إِلَيْكَ ۖ
तेरे सामने
مَا
ना
كَانُوٓا۟
थे वो
إِيَّانَا
सिर्फ़ हमारी ही
يَعْبُدُونَ
वो इबादत करते
जिनपर बात पूरी हो चुकी होगी, वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! ये वे लोग है जिन्हें हमने बहका दिया था। जैसे हम स्वयं बहके थे, इन्हें भी बहकाया। हमने तेरे आगे स्पष्ट कर दिया कि इनसे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं। ये हमारी बन्दगी तो करते नहीं थे?"
तफ़्सीर:
कुफ़्र की ओर बुलाने वाले वे लोग जिन पर हमारी यातना सिद्ध हो चुकी, कहेंगे : ऐ हमारे रब! ये हैं वे लोग जिन्हें हमने गुमराह किया, हमने उन्हें उसी तरह गुमराह किया जैसे हम गुमराह हुए। हम तेरे समक्ष इनसे अलग होने की घोषणा करते हैं। ये हमारी पूजा नहीं करते थे। बल्कि ये लोग शैतान की पूजा करते थे।
आयत 64
وَقِيلَ ٱدْعُوا۟ شُرَكَآءَكُمْ فَدَعَوْهُمْ فَلَمْ يَسْتَجِيبُوا۟ لَهُمْ وَرَأَوُا۟ ٱلْعَذَابَ ۚ لَوْ أَنَّهُمْ كَانُوا۟ يَهْتَدُونَ
وَقِيلَ
और कहा जाएगा
ٱدْعُوا۟
पुकारो
شُرَكَآءَكُمْ
अपने शरीकों को
فَدَعَوْهُمْ
तो वो पुकारेंगे उन्हें
فَلَمْ
फिर ना
يَسْتَجِيبُوا۟
वो जवाब देंगे
لَهُمْ
उन्हें
وَرَأَوُا۟
और वो देख लेंगे
ٱلْعَذَابَ ۚ
अज़ाब को
لَوْ
काश
أَنَّهُمْ
कि बेशक वो
كَانُوا۟
होते वो
يَهْتَدُونَ
वो हिदायत पाते
कहा जाएगा, "पुकारो, अपने ठहराए हुए साझीदारों को!" तो वे उन्हें पुकारेंगे, किन्तु वे उनको कोई उत्तर न देंगे। और वे यातना देखकर रहेंगे। काश वे मार्ग पानेवाले होते!
तफ़्सीर:
और उनसे कहा जाएगा : अपने साझीदारों को पुकारो, कि वे तुम्हें उस अपमान से बचाएँ, जिसमें तुम हो। अतः वे अपने साझीदारों को पुकारेंगे, किंतु वे उनकी पुकार का उत्तर नहीं देंगे। तथा वे अपने लिए तैयार की गई यातना को देखेंगे, तो कामना करेंगे कि काश वे दुनिया में सत्य मार्ग पर चले होते।
आयत 65
وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ مَاذَآ أَجَبْتُمُ ٱلْمُرْسَلِينَ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يُنَادِيهِمْ
वो पुकारेगा उन्हें
فَيَقُولُ
फिर वो कहेगा
مَاذَآ
क्या कुछ
أَجَبْتُمُ
जवाब दिया तुमने
ٱلْمُرْسَلِينَ
रसूलों को
और ख़याल करो, जिस दिन वह उन्हें पुकारेगा और कहेगा, "तुमने रसूलों को क्या उत्तर दिया था?"
तफ़्सीर:
और जिस दिन उनका रब उन्हें पुकारकर कहेगा : तुमने मेरे उन रसूलों को, जिन्हें मैंने तुम्हारी ओर भेजा था, क्या उत्तर दिया?
आयत 66
فَعَمِيَتْ عَلَيْهِمُ ٱلْأَنۢبَآءُ يَوْمَئِذٍۢ فَهُمْ لَا يَتَسَآءَلُونَ
فَعَمِيَتْ
तो अँधी हो जाऐंगी
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلْأَنۢبَآءُ
ख़बरें
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
فَهُمْ
तो वो
لَا
will not ask one another
يَتَسَآءَلُونَ
ना वो आपस में सवाल करेंगे
उस दिन उन्हें बात न सूझेंगी, फिर वे आपस में भी पूछताछ न करेंगे
तफ़्सीर:
तो उनसे तर्क लुप्त हो जाएगा और वे कुछ भी जवाब नहीं देंगे, और न ही यह हो सकेगा कि एक-दूसरे से पूछ लें; क्योंकि वे यातना से ग्रस्त होने का यक़ीन हो जाने के कारण गंभीर सदमें में होंगे।
आयत 67
فَأَمَّا مَن تَابَ وَءَامَنَ وَعَمِلَ صَـٰلِحًۭا فَعَسَىٰٓ أَن يَكُونَ مِنَ ٱلْمُفْلِحِينَ
فَأَمَّا
तो रहा
مَن
वो जिसने
تَابَ
तौबा कि
وَءَامَنَ
और ईमान लाया
وَعَمِلَ
और उसने अमल किए
صَـٰلِحًۭا
नेक
فَعَسَىٰٓ
तो उम्मीद है
أَن
कि
يَكُونَ
होगा वो
مِنَ
of
ٱلْمُفْلِحِينَ
फ़लाह पाने वालों में से
अलबत्ता जिस किसी ने तौबा कर ली और वह ईमान ले आया और अच्छा कर्म किया, तो आशा है वह सफल होनेवालों में से होगा
तफ़्सीर:
परंतु इन मुश्रिकों में से जिसने अपने कुफ़्र से तौबा कर ली और अल्लाह तथा उसके रसूलों पर ईमान ले आया और अच्छा कर्म किया; तो आशा है की वह अपनी मुराद को पाने वालों और भय से मुक्ति प्राप्त करने वालों में से होगा।
आयत 68
وَرَبُّكَ يَخْلُقُ مَا يَشَآءُ وَيَخْتَارُ ۗ مَا كَانَ لَهُمُ ٱلْخِيَرَةُ ۚ سُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ وَتَعَـٰلَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ
وَرَبُّكَ
और रब आपका
يَخْلُقُ
पैदा करता है
مَا
जो
يَشَآءُ
वो चाहता है
وَيَخْتَارُ ۗ
और वो मुन्तख़िब कर लेता है
مَا
नहीं
كَانَ
है
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلْخِيَرَةُ ۚ
इख़्तियार
سُبْحَـٰنَ
पाक है
ٱللَّهِ
अल्लाह
وَتَعَـٰلَىٰ
और वो बुलन्दतर है
عَمَّا
उससे जो
يُشْرِكُونَ
वो शरीक ठहराते हैं
तेरा रब पैदा करता है जो कुछ चाहता है और ग्रहण करता है जो चाहता है। उन्हें कोई अधिकार प्राप्त नहीं। अल्लाह महान और उच्च है उस शिर्क से, जो वे करते है
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आपका पालनहार जो कुछ पैदा करना चाहता है, पैदा करता है तथा जिसे चाहता है अपनी आज्ञाकारिता और नुबुव्वत के लिए चुन लेता है। मुश्रिकों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं है कि वे अल्लाह पर आपत्ति करेंl अल्लाह पाक और पवित्र है उन साझीदारों से जिन्हें वे उसके साथ पूजते हैं।
आयत 69
وَرَبُّكَ يَعْلَمُ مَا تُكِنُّ صُدُورُهُمْ وَمَا يُعْلِنُونَ
وَرَبُّكَ
और रब आपका
يَعْلَمُ
वो जानता है
مَا
जो कुछ
تُكِنُّ
छुपाते हैं
صُدُورُهُمْ
सीने उनके
وَمَا
और जो कुछ
يُعْلِنُونَ
वो ज़ाहिर करते हैं
और तेरा रब जानता है जो कुछ उनके सीने छिपाते है और जो कुछ वे लोग व्यक्त करते है
तफ़्सीर:
और आपका रब जानता है जो कुछ उनके सीने छिपाते है और जो कुछ प्रकट करते हैं, उनमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है और वह उन्हें इसके लिए प्रतिफल देगा।
आयत 70
وَهُوَ ٱللَّهُ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ لَهُ ٱلْحَمْدُ فِى ٱلْأُولَىٰ وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ وَلَهُ ٱلْحُكْمُ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
وَهُوَ
और वो
ٱللَّهُ
अल्लाह है
لَآ
(there is) no
إِلَـٰهَ
नहीं कोई इलाह(बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ ۖ
वो ही
لَهُ
उसी के लिए है
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
فِى
in
ٱلْأُولَىٰ
दुनिया में
وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ
और आख़िरत में
وَلَهُ
और उसी का
ٱلْحُكْمُ
हुक्म है
وَإِلَيْهِ
और उसी की तरफ़
تُرْجَعُونَ
तुम लौटाए जाओगे
और वही अल्लाह है, उसके सिवा कोई इष्ट -पूज्य नहीं। सारी प्रशंसा उसी के लिए है पहले और पिछले जीवन में फ़ैसले का अधिकार उसी को है और उसी की ओर तुम लौटकर जाओगे
तफ़्सीर:
तथा वही पवित्र अल्लाह है, जिसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। केवल उसी के लिए इस दुनिया में सब प्रशंसा है, और उसी के लिए आख़िरत में सब प्रशंसा है, और उसी का निर्णय लागू होने वाला है, जिसे कोई टाल नहीं सकता। तथा तुम क़ियामत के दिन हिसाब और बदला के लिए केवल उसी (अल्लाह) की ओर लौटाए जाओगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन शरीकों से सवाल-जवाब का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कयामत के दिन हर इंसान को अपने किए का जवाब खुद देना होगा, दूसरों पर इल्ज़ाम नहीं थोप सकेगा।
आयत 71
قُلْ أَرَءَيْتُمْ إِن جَعَلَ ٱللَّهُ عَلَيْكُمُ ٱلَّيْلَ سَرْمَدًا إِلَىٰ يَوْمِ ٱلْقِيَـٰمَةِ مَنْ إِلَـٰهٌ غَيْرُ ٱللَّهِ يَأْتِيكُم بِضِيَآءٍ ۖ أَفَلَا تَسْمَعُونَ
قُلْ
कह दीजिए
أَرَءَيْتُمْ
क्या ग़ौर किया तुमने
إِن
अगर
جَعَلَ
कर दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَيْكُمُ
तुम पर
ٱلَّيْلَ
रात
سَرْمَدًا
हमेशा/दाइमी
إِلَىٰ
till
يَوْمِ
दिन तक
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
مَنْ
कौन है
إِلَـٰهٌ
इलाह
غَيْرُ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
يَأْتِيكُم
जो लाए तुम्हारे पास
بِضِيَآءٍ ۖ
कोई रौशनी
أَفَلَا
क्या भला नहीं
تَسْمَعُونَ
तुम सुनते
कहो, "क्या तुमने विचार किया कि यदि अल्लाह क़ियामत के दिन तक सदैव के लिए तुमपर रात कर दे तो अल्लाह के सिवा कौन इष्ट-प्रभु है जो तुम्हारे लिए प्रकाश लाए? तो क्या तुम देखते नहीं?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन मुश्रिकों से कह दें : मुझे बताओ कि यदि अल्लाह तुमपर हमेशा क़ियामत के दिन तक लगातार रात ही रात कर दे, तो अल्लाह के सिवा कौन पूज्य है, जो तुम्हारे पास दिन के उजाले के समान कोई प्रकाश ले आए?! क्या तुम इन तर्कों को नहीं सुनते तथा नहीं जानते कि अल्लाह के अलावा कोई पूज्य नहीं, जो तुम्हारे पास इसे ला सके?!
आयत 72
قُلْ أَرَءَيْتُمْ إِن جَعَلَ ٱللَّهُ عَلَيْكُمُ ٱلنَّهَارَ سَرْمَدًا إِلَىٰ يَوْمِ ٱلْقِيَـٰمَةِ مَنْ إِلَـٰهٌ غَيْرُ ٱللَّهِ يَأْتِيكُم بِلَيْلٍۢ تَسْكُنُونَ فِيهِ ۖ أَفَلَا تُبْصِرُونَ
قُلْ
कह दीजिए
أَرَءَيْتُمْ
क्या ग़ौर किया तुमने
إِن
अगर
جَعَلَ
कर दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَيْكُمُ
तुम पर
ٱلنَّهَارَ
दिन को
سَرْمَدًا
हमेशा/दाइमी
إِلَىٰ
till
يَوْمِ
दिन तक
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
مَنْ
कौन
إِلَـٰهٌ
इलाह है
غَيْرُ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
يَأْتِيكُم
जो लाएगा तुम्हारे पास
بِلَيْلٍۢ
रात को
تَسْكُنُونَ
तुम सुकून पा सको
فِيهِ ۖ
उसमें
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
تُبْصِرُونَ
तुम देखते
कहो, "क्या तुमने विचार किया? यदि अल्लाह क़ियामत के दिन तक सदैव के लिए तुमपर दिन कर दे तो अल्लाह के सिवा दूसरा कौन इष्ट-पूज्य है जो तुम्हारे लिए रात लाए जिसमें तुम आराम पाते हो? तो क्या तुम देखते नहीं?
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इनसे कह दें : मुझे बताओ कि यदि अल्लाह तुमपर हमेशा क़ियामत के दिन तक दिन ही दिन कर दे, तो अल्लाह के सिवा कौन पूज्य है, जो तुम्हारे पास कोई रात ले आए, जिसमें तुम दिन में काम की थकावट से राहत हासिल करने के लिए आराम कर सको?! क्या तुम इन निशानियों को नहीं देखते और यह नहीं जानते कि अल्लाह के अलावा कोई पूज्य नहीं, जो तुम्हारे पास यह सब ला सके?!
आयत 73
وَمِن رَّحْمَتِهِۦ جَعَلَ لَكُمُ ٱلَّيْلَ وَٱلنَّهَارَ لِتَسْكُنُوا۟ فِيهِ وَلِتَبْتَغُوا۟ مِن فَضْلِهِۦ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
وَمِن
And from
رَّحْمَتِهِۦ
और उसकी रहमत में से है
جَعَلَ
कि उसने बनाया
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلَّيْلَ
रात
وَٱلنَّهَارَ
और दिन को
لِتَسْكُنُوا۟
ताकि तुम सुकून पाओ
فِيهِ
उसमें
وَلِتَبْتَغُوا۟
और ताकि तुम तलाश करो
مِن
from
فَضْلِهِۦ
उसके फ़ज़ल में से
وَلَعَلَّكُمْ
और ताकि तुम
تَشْكُرُونَ
तुम शुक्र अदा करो
उसने अपनी दयालुता से तुम्हारे लिए रात और दिन बनाए, ताकि तुम उसमें (रात में) आराम पाओ और ताकि तुम (दिन में) उसका अनुग्रह (रोज़ी) तलाश करो और ताकि तुम कृतज्ञता दिखाओ।"
तफ़्सीर:
और पवित्र अल्लाह की दया ही से है कि उसने (ऐ लोगो!) तुम्हारे लिए रात को अँधेरा बनाया; ताकि तुम दिन में काम से कष्ट सहने के बाद उसमें आराम कर सको, तथा उसने तुम्हारे लिए दिन को प्रकाशमान बनाया; ताकि तुम उसमें रोज़ी की तलाश के लिए दौड़-धूप करो, और ताकि तुम अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा करो और उनकी नाशुक्री न करो।
आयत 74
وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ أَيْنَ شُرَكَآءِىَ ٱلَّذِينَ كُنتُمْ تَزْعُمُونَ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يُنَادِيهِمْ
वो पुकारेगा उन्हें
فَيَقُولُ
तो वो फ़रमाएगा
أَيْنَ
कहाँ हैं
شُرَكَآءِىَ
मेरे शरीक
ٱلَّذِينَ
वो जिनका
كُنتُمْ
थे तुम
تَزْعُمُونَ
तुम दावा करते
ख़याल करो, जिस दिन वह उन्हें पुकारेगा और कहेगा, "कहाँ है मेरे वे मेरे साझीदार, जिनका तुम्हे दावा था?"
तफ़्सीर:
और जिस दिन उनका पवित्र एवं सर्वोच्च रब उन्हें पुकारकर कहेगा : मेरे वे साझीदार कहाँ हैं, जिनकी तुम मेरे अलावा पूजा करते थे और दावा करते थे कि वे मेरे साझीदार हैं?
आयत 75
وَنَزَعْنَا مِن كُلِّ أُمَّةٍۢ شَهِيدًۭا فَقُلْنَا هَاتُوا۟ بُرْهَـٰنَكُمْ فَعَلِمُوٓا۟ أَنَّ ٱلْحَقَّ لِلَّهِ وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَفْتَرُونَ
وَنَزَعْنَا
और निकाल लाऐंगे हम
مِن
from
كُلِّ
every
أُمَّةٍۢ
हर उम्मत से
شَهِيدًۭا
एक गवाह
فَقُلْنَا
तो कहेंगे हम
هَاتُوا۟
लाओ
بُرْهَـٰنَكُمْ
दलील अपनी
فَعَلِمُوٓا۟
तो वो जान लेंगे
أَنَّ
बेशक
ٱلْحَقَّ
हक़
لِلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
وَضَلَّ
और गुम हो जाऐंगे
عَنْهُم
उनसे
مَّا
जो
كَانُوا۟
थे वो
يَفْتَرُونَ
वो गढ़ा करते
और हम प्रत्येक समुदाय में से एक गवाह निकाल लाएँगे और कहेंगे, "लाओ अपना प्रमाण।" तब वे जान लेंगे कि सत्य अल्लाह की ओर से है और जो कुछ वे घड़ते थे, वह सब उनसे गुम होकर रह जाएगा
तफ़्सीर:
और हम हर समुदाय से उसके नबी को लाएँगे, जो उसके खिलाफ उस कुफ़्र और झुठलाने (इनकार) की गवाही देगा, जिसपर वह क़ायम था। फिर हम उन समुदायों के झुठलाने वालों से कहेंगे : तुम जिस कुफ़्र और इनकार पर क़ायम थे, उसपर अपने तर्क और प्रमाण प्रस्तुत करो। तो उनके सारे तर्क समाप्त हो जाएँगे और उन्हें यक़ीन हो जाएगा कि निःसंदेह निर्विवाद सत्य केवल अल्लाह का है। और वे उस पवित्र अल्लाह के लिए जो साझीदार गढ़ा करते थे, वे सब उनसे लुप्त हो जाएँगे।
आयत 76
۞ إِنَّ قَـٰرُونَ كَانَ مِن قَوْمِ مُوسَىٰ فَبَغَىٰ عَلَيْهِمْ ۖ وَءَاتَيْنَـٰهُ مِنَ ٱلْكُنُوزِ مَآ إِنَّ مَفَاتِحَهُۥ لَتَنُوٓأُ بِٱلْعُصْبَةِ أُو۟لِى ٱلْقُوَّةِ إِذْ قَالَ لَهُۥ قَوْمُهُۥ لَا تَفْرَحْ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ ٱلْفَرِحِينَ
۞ إِنَّ
बेशक
قَـٰرُونَ
क़ारून
كَانَ
था वो
مِن
from
قَوْمِ
क़ौम से
مُوسَىٰ
मूसा की
فَبَغَىٰ
तो उसने सरकशी की
عَلَيْهِمْ ۖ
उन पर
وَءَاتَيْنَـٰهُ
और अता किया हमने उसे
مِنَ
of
ٱلْكُنُوزِ
ख़ज़ानों में से
مَآ
इस क़द्र कि
إِنَّ
बेशक
مَفَاتِحَهُۥ
कुंजियाँ उसकी
لَتَنُوٓأُ
अलबत्ता वो भारी होती थीं
بِٱلْعُصْبَةِ
एक जमात पर
أُو۟لِى
possessors of great strength
ٱلْقُوَّةِ
क़ुव्वत वाली
إِذْ
जब
قَالَ
कहा
لَهُۥ
उसे
قَوْمُهُۥ
उसकी क़ौम ने
لَا
(Do) not
تَفْرَحْ ۖ
ना तुम इतराओ
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يُحِبُّ
नहीं वो पसंद करता
ٱلْفَرِحِينَ
इतराने वालों को
निश्चय ही क़ारून मूसा की क़ौम में से था, फिर उसने उनके विरुद्ध सिर उठाया और हमने उसे इतने ख़जाने दे रखें थे कि उनकी कुंजियाँ एक बलशाली दल को भारी पड़ती थी। जब उससे उसकी क़ौम के लोगों ने कहा, "इतरा मत, अल्लाह इतरानेवालों के पसन्द नही करता
तफ़्सीर:
निःसंदेह क़ारून मूसा अलैहिस्सलाम की जाति में से था। फिर उसने उनके विरुद्ध सरकशी दिखाई। हमने उसे धनों के इतने ख़ज़ाने दिए थे कि उसके ख़ज़ानों की चाबियाँ उठाना एक बलशाली दल पर भारी पड़ता था। जब उसकी जाति के लोगों ने उससे कहा : तू खुशी से मत इतरा, निश्चय अल्लाह खुशी से इतराने वालों से प्रेम नहीं करता। बल्कि उनसे नफरत करता है और उन्हें इसके लिए यातना देता है।
आयत 77
وَٱبْتَغِ فِيمَآ ءَاتَىٰكَ ٱللَّهُ ٱلدَّارَ ٱلْـَٔاخِرَةَ ۖ وَلَا تَنسَ نَصِيبَكَ مِنَ ٱلدُّنْيَا ۖ وَأَحْسِن كَمَآ أَحْسَنَ ٱللَّهُ إِلَيْكَ ۖ وَلَا تَبْغِ ٱلْفَسَادَ فِى ٱلْأَرْضِ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ ٱلْمُفْسِدِينَ
وَٱبْتَغِ
और तलाश करो
فِيمَآ
उसमें से जो
ءَاتَىٰكَ
दिया तुम्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلدَّارَ
घर
ٱلْـَٔاخِرَةَ ۖ
आख़िरत का
وَلَا
और ना
تَنسَ
तुम भूलो
نَصِيبَكَ
हिस्सा अपना
مِنَ
of
ٱلدُّنْيَا ۖ
दुनिया में से
وَأَحْسِن
और एहसान करो
كَمَآ
जैसा कि
أَحْسَنَ
एहसान किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
إِلَيْكَ ۖ
तुम पर
وَلَا
और ना
تَبْغِ
तुम चाहो
ٱلْفَسَادَ
फ़साद
فِى
in
ٱلْأَرْضِ ۖ
ज़मीन में
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يُحِبُّ
नहीं वो पसंद करता
ٱلْمُفْسِدِينَ
फ़साद करने वालों को
जो कुछ अल्लाह ने तुझे दिया है, उसमें आख़िरत के घर का निर्माण कर और दुनिया में से अपना हिस्सा न भूल, और भलाई कर, जैसा कि अल्लाह ने तेरे साथ भलाई की है, और धरती का बिगाड़ मत चाह। निश्चय ही अल्लाह बिगाड़ पैदा करनेवालों को पसन्द नहीं करता।"
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने तुझे जो धन-संपत्ति दी है, उसे पुण्य के कार्यों में खर्च करके आख़िरत का सवाब तलब कर, तथा बिना फ़िज़ूलखर्ची और अभिमान के खाने, पीने, कपड़े और अन्य नेमतों से अपना हिस्सा मत भूल। तथा अपने पालनहार के साथ तथा उसके बंदों के साथ अच्छा व्यवहार कर, जैसे अल्लाह पाक ने तेरा भला किया है। तथा पाप करके और आज्ञाकारिता छोड़कर धरती में बिगाड़ की तलाश न कर। निःसंदेह अल्लाह ऐसा करके धरती में बिगाड़ करने वालों से प्रेम नहीं करता, बल्कि उनसे नफरत करता है।
आयत 78
قَالَ إِنَّمَآ أُوتِيتُهُۥ عَلَىٰ عِلْمٍ عِندِىٓ ۚ أَوَلَمْ يَعْلَمْ أَنَّ ٱللَّهَ قَدْ أَهْلَكَ مِن قَبْلِهِۦ مِنَ ٱلْقُرُونِ مَنْ هُوَ أَشَدُّ مِنْهُ قُوَّةًۭ وَأَكْثَرُ جَمْعًۭا ۚ وَلَا يُسْـَٔلُ عَن ذُنُوبِهِمُ ٱلْمُجْرِمُونَ
قَالَ
उसने कहा
إِنَّمَآ
बेशक
أُوتِيتُهُۥ
दिया गया हूँ मैं इसे
عَلَىٰ
on (account)
عِلْمٍ
इल्म कि बिना पर
عِندِىٓ ۚ
जो मेरे पास है
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَعْلَمْ
उसने जाना
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
قَدْ
तहक़ीक़
أَهْلَكَ
उसने हलाक कर दिया
مِن
before him
قَبْلِهِۦ
इससे पहले
مِنَ
of
ٱلْقُرُونِ
कई उम्मतों को
مَنْ
who
هُوَ
वो जो
أَشَدُّ
ज़्यादा सख़्त थीं
مِنْهُ
उससे
قُوَّةًۭ
क़ुव्वत में
وَأَكْثَرُ
और अक्सर
جَمْعًۭا ۚ
जमीअत में
وَلَا
और नहीं
يُسْـَٔلُ
पूछे जाते
عَن
about
ذُنُوبِهِمُ
अपने गुनाहों के बारे में
ٱلْمُجْرِمُونَ
मुजरिम
उसने कहा, "मुझे तो यह मेरे अपने व्यक्तिगत ज्ञान के कारण मिला है।" क्या उसने यह नहीं जाना कि अल्लाह उससे पहले कितनी ही नस्लों को विनष्ट कर चुका है जो शक्ति में उससे बढ़-चढ़कर और बाहुल्य में उससे अधिक थीं? अपराधियों से तो (उनकी तबाही के समय) उनके गुनाहों के विषय में पूछा भी नहीं जाता
तफ़्सीर:
क़ारून ने कहा : मुझे यह धन-संपत्ति मेरे ज्ञान तथा क्षमता के आधार पर दी गई है। इसलिए मैं इसके योग्य हूँ। क्या क़ारून ने यह नहीं जाना कि अल्लाह उससे पूर्व कई जातियों को विनष्ट कर चुका है, जो उससे कहीं अधिक शक्तिशाली और अधिक संपत्ति एकत्र करने वाली थीं?! परंतु उनकी शक्ति या संपत्ति ने उन्हें कोई लाभ नहीं पहुँचाया। तथा क़ियामत के दिन अपराधियों से उनके पापों के बारे में नहीं पूछा जाएगा क्योंकि अल्लाह उन्हें जानता है। इसलिए उनसे जो सवाल होगा, वह उन्हें डाँटने-फटकारने के लिए होगा।
आयत 79
فَخَرَجَ عَلَىٰ قَوْمِهِۦ فِى زِينَتِهِۦ ۖ قَالَ ٱلَّذِينَ يُرِيدُونَ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا يَـٰلَيْتَ لَنَا مِثْلَ مَآ أُوتِىَ قَـٰرُونُ إِنَّهُۥ لَذُو حَظٍّ عَظِيمٍۢ
فَخَرَجَ
तो वो निकला
عَلَىٰ
to
قَوْمِهِۦ
अपनी क़ौम पर
فِى
in
زِينَتِهِۦ ۖ
अपनी ज़ीनत में
قَالَ
कहा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जो
يُرِيدُونَ
चाहते थे
ٱلْحَيَوٰةَ
ज़िन्दगी
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
يَـٰلَيْتَ
ऐ काश कि होता
لَنَا
हमारे लिए
مِثْلَ
मानिन्द
مَآ
उसके जो
أُوتِىَ
दिया गया
قَـٰرُونُ
क़ारून
إِنَّهُۥ
यक़ीनन वो
لَذُو
(is the) owner
حَظٍّ
अलबत्ता क़िस्मत वाला है
عَظِيمٍۢ
बहुत बड़ी
फिर वह अपनी क़ौम के सामने अपने ठाठ-बाट में निकला। जो लोग सांसारिक जीवन के चाहनेवाले थे, उन्होंने कहा, "क्या ही अच्छा होता जैसा कुछ क़ारून को मिला है, हमें भी मिला होता! वह तो बड़ा ही भाग्यशाली है।"
तफ़्सीर:
क़ारून अपना वैभव (शान-शौकत) दिखाते हुए अपनी शोभा में निकला। क़ारून के लोगों में से जो सांसारिक जीवन की शोभा की आकांक्षा रखते थे, उन्होंने कहा : ऐ काश! हमें इस दुनिया की शोभा से वैसा ही दिया जाता जैसा कि क़ारून को दिया गया है। निश्चय क़ारून एक बड़े पर्याप्त नसीब वाला है।
आयत 80
وَقَالَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْعِلْمَ وَيْلَكُمْ ثَوَابُ ٱللَّهِ خَيْرٌۭ لِّمَنْ ءَامَنَ وَعَمِلَ صَـٰلِحًۭا وَلَا يُلَقَّىٰهَآ إِلَّا ٱلصَّـٰبِرُونَ
وَقَالَ
और कहा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जो
أُوتُوا۟
दिए गए थे
ٱلْعِلْمَ
इल्म
وَيْلَكُمْ
अफ़सोस तुम पर
ثَوَابُ
सवाब
ٱللَّهِ
अल्लाह का
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لِّمَنْ
उसके लिए जो
ءَامَنَ
ईमान लाया
وَعَمِلَ
और उसने अमल किया
صَـٰلِحًۭا
नेक
وَلَا
और नहीं
يُلَقَّىٰهَآ
पा सकते उसे
إِلَّا
मगर
ٱلصَّـٰبِرُونَ
सब्र करने वाले
किन्तु जिनको ज्ञान प्राप्त था, उन्होंने कहा, "अफ़सोस तुमपर! अल्लाह का प्रतिदान उत्तम है, उस व्यक्ति के लिए जो ईमान लाए और अच्छा कर्म करे, और यह बात उन्हीम के दिलों में पड़ती है जो धैर्यवान होते है।"
तफ़्सीर:
जबकि उन लोगों ने जिन्हें ज्ञान दिया गया था, जब क़ारून को उसकी शोभा में देखा तथा उसके साथियों की कामनाएँ सुनीं, तो कहा : तुम्हारा बुरा हो! आख़िरत में मिलने वाला अल्लाह का प्रतिफल और उसपर ईमान लाने और नेक अमल करने वालों के लिए तैयार की गई नेमत, दुनिया के उस ठाठ-बाट से बेहतर हैं, जो क़ारून को दिया गया है। लेकिन इस बात को कहने और इसकी अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करने का सामर्थ्य केवल उन धैर्यवानों को मिलता है, जो दुनिया के नश्वर आनंद पर अल्लाह के पास मिलने वाले बदले को वरीयता देने में धैर्य रखते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कारून के वाकिये और उसके माल पर घमंड का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि माल-दौलत पर घमंड करना और उसे अपनी काबिलियत समझना आखिरकार तबाही लाता है।
आयत 81
فَخَسَفْنَا بِهِۦ وَبِدَارِهِ ٱلْأَرْضَ فَمَا كَانَ لَهُۥ مِن فِئَةٍۢ يَنصُرُونَهُۥ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَمَا كَانَ مِنَ ٱلْمُنتَصِرِينَ
فَخَسَفْنَا
पस धँसा दिया हमने
بِهِۦ
उसे
وَبِدَارِهِ
और उसके घर को
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन में
فَمَا
तो ना
كَانَ
था
لَهُۥ
उसके लिए
مِن
any
فِئَةٍۢ
कोई गिरोह
يَنصُرُونَهُۥ
जो मदद करता उसकी
مِن
besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَمَا
और ना
كَانَ
था वो
مِنَ
(he) of
ٱلْمُنتَصِرِينَ
बदला लेने वालों में से
अन्ततः हमने उसको और उसके घर को धरती में धँसा दिया। और कोई ऐसा गिरोह न हुआ जो अल्लाह के मुक़ाबले में उसकी सहायता करता, और न वह स्वयं अपना बचाव कर सका
तफ़्सीर:
अन्ततः हमने उसकी सरकशी के प्रतिशोध में, उसे और उसके घर को, तथा उसमें मौजूद लोगों को धरती में धँसा दिया। तो उसके पास कोई ऐसा दल नहीं था जो अल्लाह के मुक़ाबले में उसकी सहायता करता और न ही वह स्वंय अपनी सहायता करने वालों में से था।
आयत 82
وَأَصْبَحَ ٱلَّذِينَ تَمَنَّوْا۟ مَكَانَهُۥ بِٱلْأَمْسِ يَقُولُونَ وَيْكَأَنَّ ٱللَّهَ يَبْسُطُ ٱلرِّزْقَ لِمَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦ وَيَقْدِرُ ۖ لَوْلَآ أَن مَّنَّ ٱللَّهُ عَلَيْنَا لَخَسَفَ بِنَا ۖ وَيْكَأَنَّهُۥ لَا يُفْلِحُ ٱلْكَـٰفِرُونَ
وَأَصْبَحَ
और सुबह की
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जो
تَمَنَّوْا۟
तमन्ना कर रहे थे
مَكَانَهُۥ
उसके मक़ाम की
بِٱلْأَمْسِ
कल तक
يَقُولُونَ
वो कह रहे थे
وَيْكَأَنَّ
अफ़सोस,बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَبْسُطُ
वो फैला देता है
ٱلرِّزْقَ
रिज़्क़
لِمَن
जिसके लिए
يَشَآءُ
वो चाहता है
مِنْ
of
عِبَادِهِۦ
अपने बन्दों में से
وَيَقْدِرُ ۖ
और वो तंग कर देता है
لَوْلَآ
अगर ना होता
أَن
ये कि
مَّنَّ
एहसान करता
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَيْنَا
हम पर
لَخَسَفَ
अलबत्ता वो धँसा देता
بِنَا ۖ
हमें (भी)
وَيْكَأَنَّهُۥ
अफ़सोस, बेशक वो
لَا
not
يُفْلِحُ
नहीं वो फ़लाह पाते
ٱلْكَـٰفِرُونَ
जो काफ़िर हैं
अब वही लोग, जो कल उसके पद की कामना कर रहे थे, कहने लगें, "अफ़सोस हम भूल गए थे कि अल्लाह अपने बन्दों में से जिसके लिए चाहता है रोज़ी कुशादा करता है और जिसे चाहता है नपी-तुली देता है। यदि अल्लाह ने हमपर उपकार न किया होता तो हमें भी धँसा देता। अफ़सोस हम भूल गए थे कि इनकार करनेवाले सफल नहीं हुआ करते।"
तफ़्सीर:
और जिन लोगों ने क़ारून के धँसने से पहले उसे प्राप्त धन और शोभा की कामना की थी, वे अफसोस और विचार करते हुए कहने लगे : क्या हम नहीं जानते थे कि अल्लाह अपने बंदों में से जिसके लिए चाहता है, रोज़ी कुशादा कर देता है और जिसके लिए चाहता है रोज़ी तंग कर देता है?! यदि हमपर अल्लाह का उपकार न होता कि उसने हमारी कही हुई बात पर हमको दंडित नहीं किया; तो वह अवश्य हमें क़ारून की तरह धँसा देता। वास्तव में काफ़िर लोग सफल नहीं होते, न दुनिया में और न आख़िरत में। बल्कि उनका अंजाम और परिणाम दोनों जगहों में नाकामी है।
आयत 83
تِلْكَ ٱلدَّارُ ٱلْـَٔاخِرَةُ نَجْعَلُهَا لِلَّذِينَ لَا يُرِيدُونَ عُلُوًّۭا فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا فَسَادًۭا ۚ وَٱلْعَـٰقِبَةُ لِلْمُتَّقِينَ
تِلْكَ
ये है
ٱلدَّارُ
घर
ٱلْـَٔاخِرَةُ
आख़िरत का
نَجْعَلُهَا
हम बनाते हैं उसे
لِلَّذِينَ
उनके लिए जो
لَا
(do) not
يُرِيدُونَ
नहीं वो चाहते
عُلُوًّۭا
बुलन्दी
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَلَا
और ना
فَسَادًۭا ۚ
फ़साद
وَٱلْعَـٰقِبَةُ
और अंजाम
لِلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के लिए है
आख़िरत का घर हम उन लोगों के लिए ख़ास कर देंगे जो न धरती में अपनी बड़ाई चाहते है और न बिगाड़। परिणाम तो अन्ततः डर रखनेवालों के पक्ष में है
तफ़्सीर:
यह आख़िरत का घर, हम उन लोगों के लिए आनंद और सम्मान का घर बनाते हैं, जो धरती में सत्य को मानने और उसका पालन करने से अभिमान का इरादा नहीं रखते और उसमें बिगाड़ नहीं चाहते। तथा प्रशंसनीय परिणाम, जो कि जन्नत की नेमत और उसमें उतरने वाली अल्लाह की प्रसन्नता है, उन लोगों के लिए है, जो अपने पालनहार से उसके आदेशों का पालन करके और उनके निषेधों से बचकर डरते हैं।
आयत 84
مَن جَآءَ بِٱلْحَسَنَةِ فَلَهُۥ خَيْرٌۭ مِّنْهَا ۖ وَمَن جَآءَ بِٱلسَّيِّئَةِ فَلَا يُجْزَى ٱلَّذِينَ عَمِلُوا۟ ٱلسَّيِّـَٔاتِ إِلَّا مَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
مَن
जो कोई
جَآءَ
लाया
بِٱلْحَسَنَةِ
भलाई
فَلَهُۥ
तो उसके लिए है
خَيْرٌۭ
बेहतर
مِّنْهَا ۖ
उससे
وَمَن
और जो कोई
جَآءَ
लाया
بِٱلسَّيِّئَةِ
बुराई
فَلَا
तो नहीं
يُجْزَى
वो बदला दिए जाऐंगे
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
عَمِلُوا۟
अमल किए
ٱلسَّيِّـَٔاتِ
बुरे
إِلَّا
मगर
مَا
उसका जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
जो कोई अच्छा आचारण लेकर आया उसे उससे उत्तम प्राप्त होगा, और जो बुरा आचरण लेकर आया तो बुराइयाँ करनेवालों को तो वस वही मिलेगा जो वे करते थे
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति क़ियामत के दिन नेक काम (जैसे नमाज़, ज़कात, रोज़ा वगैरह) लेकर आएगा, उसे उस नेक काम से अच्छा प्रतिफल मिलेगा। क्योंकि उस नेक काम को उसके लिए दस गुना बढ़ा दिया जाएगा। तथा जो व्यक्ति क़ियामत के दिन बुराई (जैसे अल्लाह का इनकार, सूदखोरी और व्यभिचार इत्यादि) लेकर आएगा, तो जिन लोगों ने बुरे कर्म किए हैं, उन्हें बिना वृद्धि के केवल उसी मात्रा में बदला दिया जाएगा जो उन्होंने किया है।
आयत 85
إِنَّ ٱلَّذِى فَرَضَ عَلَيْكَ ٱلْقُرْءَانَ لَرَآدُّكَ إِلَىٰ مَعَادٍۢ ۚ قُل رَّبِّىٓ أَعْلَمُ مَن جَآءَ بِٱلْهُدَىٰ وَمَنْ هُوَ فِى ضَلَـٰلٍۢ مُّبِينٍۢ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِى
वो जिसने
فَرَضَ
फ़र्ज़ किया
عَلَيْكَ
आप पर
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरान को
لَرَآدُّكَ
अलबत्ता फेर ले जाने वाला है आपको
إِلَىٰ
to
مَعَادٍۢ ۚ
तरफ़ लौटने की जगह के
قُل
कह दीजिए
رَّبِّىٓ
मेरा रब
أَعْلَمُ
ख़ूब जानता है
مَن
उसे जो
جَآءَ
लाया
بِٱلْهُدَىٰ
हिदायत को
وَمَنْ
और उसे जो
هُوَ
हो वो
فِى
(is) in
ضَلَـٰلٍۢ
गुमराही में
مُّبِينٍۢ
खुली
जिसने इस क़ुरआन की ज़िम्मेदारी तुमपर डाली है, वह तुम्हें उसके (अच्छे) अंजाम तक ज़रूर पहुँचाएगा। कहो, "मेरा रब उसे भली-भाँति जानता है जो मार्गदर्शन लेकर आया, और उसे भी जो खुली गुमराही में पड़ा है।"
तफ़्सीर:
निःसंदेह! जिसने आपपर क़ुरआन उतारा है तथा उसका प्रचार-प्रसार करना और उसकी शिक्षाओं पर अमल करना आपपर अनिवार्य किया है, वह अवश्य आपको एक विजेता के रूप में मक्का लौटाएगा। (ऐ रसूल!) आप मुश्रिकों से कह दें : मेरा पालनहार उसे सबसे अधिक जानने वाला है जो मार्गदर्शन लेकर आया है तथा उसे भी जो मार्गदर्शन और सत्य से स्पष्ट गुमराही में है।
आयत 86
وَمَا كُنتَ تَرْجُوٓا۟ أَن يُلْقَىٰٓ إِلَيْكَ ٱلْكِتَـٰبُ إِلَّا رَحْمَةًۭ مِّن رَّبِّكَ ۖ فَلَا تَكُونَنَّ ظَهِيرًۭا لِّلْكَـٰفِرِينَ
وَمَا
और ना
كُنتَ
थे आप
تَرْجُوٓا۟
आप उम्मीद रखते
أَن
कि
يُلْقَىٰٓ
इल्क़ा की जाएगी
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
ٱلْكِتَـٰبُ
किताब
إِلَّا
मगर
رَحْمَةًۭ
रहमत है
مِّن
from
رَّبِّكَ ۖ
आपके रब की तरफ़ से
فَلَا
So (do) not
تَكُونَنَّ
पस हरगिज़ ना हों आप
ظَهِيرًۭا
मददगार
لِّلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के
तुम तो इसकी आशा नहीं रखते थे कि तुम्हारी ओर किताब उतारी जाएगी। इसकी संभावना तो केवल तुम्हारे रब की दयालुता के कारण हुई। अतः तुम इनकार करनेवालों के पृष्ठपोषक न बनो
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आप (नुबुव्वत से पहले) यह आशा नहीं रखते थे कि आपकी ओर क़ुरआन की वह़्य की जाएगी, किंतु अल्लाह की दया के कारण उसे आपपर उतारा गया। अतः काफ़िर जिस गुमराही में पड़े हुए हैं, उसमें आप उनके सहायक न बनें।
आयत 87
وَلَا يَصُدُّنَّكَ عَنْ ءَايَـٰتِ ٱللَّهِ بَعْدَ إِذْ أُنزِلَتْ إِلَيْكَ ۖ وَٱدْعُ إِلَىٰ رَبِّكَ ۖ وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ
وَلَا
और ना
يَصُدُّنَّكَ
वो हरगिज़ रोकें आपको
عَنْ
from
ءَايَـٰتِ
आयात से
ٱللَّهِ
अल्लाह की
بَعْدَ
बाद इसके कि
إِذْ
जब
أُنزِلَتْ
वो नाज़िल की गईं
إِلَيْكَ ۖ
आपकी तरफ़
وَٱدْعُ
और दावत दीजिए
إِلَىٰ
to
رَبِّكَ ۖ
अपने रब की तरफ़
وَلَا
And (do) not
تَكُونَنَّ
और हरगिज़ ना हों आप
مِنَ
of
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकों में से
और वे तुम्हें अल्लाह की आयतों से रोक न पाएँ, इसके पश्चात कि वे तुमपर अवतरित हो चुकी है। और अपने रब की ओर बुलाओ और बहुदेववादियों में कदापि सम्मिलित न होना
तफ़्सीर:
ये बहुदेववादी लोग आपको अल्लाह की आयतों से, उनके अवतरित होने के बाद हरगिज़ न रोकने पाएँ, कि आप उनकी तिलावत करना और उनका प्रचार-प्रसार करना छोड़ दें। तथा आप लोगों को अल्लाह पर ईमान लाने, उसको एकमात्र पूज्य मानने और उसकी शरीयत पर अमल करने के लिए आमंत्रित करें। और आप उन मुश्रिकों में से हरगिज़ न हों, जो अल्लाह के साथ उसके अलावा की पूजा करते हैं।बल्कि आप उन एकेश्वरवादियों में से बनें जो केवल अल्लाह की उपासना करते हैं।
आयत 88
وَلَا تَدْعُ مَعَ ٱللَّهِ إِلَـٰهًا ءَاخَرَ ۘ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۚ كُلُّ شَىْءٍ هَالِكٌ إِلَّا وَجْهَهُۥ ۚ لَهُ ٱلْحُكْمُ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
وَلَا
और ना
تَدْعُ
आप पुकारिए
مَعَ
साथ
ٱللَّهِ
अल्लाह के
إِلَـٰهًا
कोई इलाह
ءَاخَرَ ۘ
दूसरा
لَآ
(There is) no
إِلَـٰهَ
नहीं कोई इलाह(बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ ۚ
वो ही
كُلُّ
हर
شَىْءٍ
चीज़
هَالِكٌ
हलाक होने वाली है
إِلَّا
सिवाए
وَجْهَهُۥ ۚ
उसके चेहरे के
لَهُ
उसी के लिए है
ٱلْحُكْمُ
हुक्म
وَإِلَيْهِ
और उसी की तरफ़
تُرْجَعُونَ
तुम पलटाए जाओगे
और अल्लाह के साथ किसी और इष्ट-पूज्य को न पुकारना। उसके सिवा कोई इष्ट-पूज्य नहीं। हर चीज़ नाशवान है सिवास उसके स्वरूप के। फ़ैसला और आदेश का अधिकार उसी को प्राप्त है और उसी की ओर तुम सबको लौटकर जाना है
तफ़्सीर:
तथा आप अल्लाह के साथ उसके अलावा किसी अन्य पूज्य की उपासना न करें। उसके अलावा कोई सत्य पूज्य नहीं। उस महिमावान के चेहरे के सिवा सब कुछ नाशवान है। केवल उसी का आदेश चलता है, वह जो चाहता है आदेश देता है। और केवल उसी के पास तुम क़ियामत के दिन हिसाब और बदला के लिए वापस लाए जाओगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कारून के ज़मीन में धंसने के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि दुनिया की हर चीज़ फानी है, सिर्फ अल्लाह की ज़ात बाकी रहने वाली है, इसी पर भरोसा रखना चाहिए।
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