नाम का मतलब
आले इमरान का अर्थ है 'इमरान का परिवार'। इमरान हज़रत मरियम (अलैहिस्सलाम) के पिता थे, और इसी सूरह में उनके परिवार, हज़रत मरियम तथा हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) के जन्म व जीवन का ज़िक्र मिलता है, इसी कारण इसका नाम यह रखा गया।
पृष्ठभूमि
यह सूरह मदीना में उस दौर में उतरी जब मुसलमानों का सामना अहले किताब (यहूदियों और ईसाइयों) तथा मुनाफ़िक़ों से हो रहा था। इसका एक बड़ा हिस्सा नज्रान के ईसाई प्रतिनिधिमंडल के साथ हुए संवाद और हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) की हक़ीक़त स्पष्ट करने के सिलसिले में उतरा। इसमें ग़ज़वा-ए-उहुद की घटनाओं, उसमें हुई ग़लतियों और उनसे सीख लेने का ज़िक्र भी विस्तार से आया है। यह सूरह-ए-बक़रा के तुरंत बाद, मदनी दौर के शुरुआती वर्षों में अवतरित हुई मानी जाती है।
फ़ज़ीलत / सार
सूरह बक़रा और आले इमरान दोनों को 'ज़हरावैन' (दो रोशन सूरतें) कहा गया है, और इनकी फ़ज़ीलत में आया है कि क़यामत के दिन ये अपने पढ़ने वालों के लिए सिफ़ारिश करेंगी। इस सूरह में तौहीद, अल्लाह की किताबों पर ईमान, सब्र व स्थिरता तथा सच्चे मोमिन के गुणों पर गहरी शिक्षा दी गई है। यह सूरह ईमान को परखने, कठिन परिस्थितियों में डटे रहने और अल्लाह पर भरोसा रखने का सबक़ सिखाती है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ الٓمٓ
الٓمٓ
अलिफ़ लाम मीम
अलीफ़॰ लाम॰ मीम॰
तफ़्सीर:
{अलिफ़, लाम, मीम} इन्हें 'ह़ुरूफ़े मुक़त्तआत' कहा जाता है। इनके समान अक्षर सूरतुल-बक़रा के शुरू में भी आए हैं। ये इस प्रकार का क़ुरआन लाने में अरबों की अक्षमता को इंगित करते हैं, हालाँकि पूरा क़ुरआन उन्हीं जैसे अक्षरों से बना है, जो इस सूरत के आरंभ में आए हैं और जिनसे वे अपने शब्दों का निर्माण करते हैं।
आयत 2
ٱللَّهُ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلْحَىُّ ٱلْقَيُّومُ
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ
वो ही
ٱلْحَىُّ
ज़िन्दा है
ٱلْقَيُّومُ
क़ायम रखने वाला है
अल्लाह ही पूज्य हैं, उसके सिवा कोई पूज्य नहीं। वह जीवन्त हैं, सबको सँम्भालने और क़ायम रखनेवाला
तफ़्सीर:
अल्लाह वह है जिस अकेले के सिवा कोई भी वास्तविक रूप से इबादत के लायक़ नहीं है। वह जीवित है, एक पूर्ण जीवन वाला है जिसमें कोई मृत्यु या कमी नहीं है। हर चीज़ को सँभालने वाला है, जो स्वयं क़ायम है, अतः वह अपनी सारी सृष्टि से बेनियाज़ है। जबकि सभी प्राणी उसी के द्वारा क़ायम हैं, इसलिए वे अपनी सभी स्थितियों में उससे बेनियाज़ नहीं हो सकते।
आयत 3
نَزَّلَ عَلَيْكَ ٱلْكِتَـٰبَ بِٱلْحَقِّ مُصَدِّقًۭا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ وَأَنزَلَ ٱلتَّوْرَىٰةَ وَٱلْإِنجِيلَ
نَزَّلَ
उसने नाज़िल की
عَلَيْكَ
आप पर
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
مُصَدِّقًۭا
तसदीक़ करने वाली है
لِّمَا
उनकी जो
بَيْنَ
(was)
يَدَيْهِ
इससे पहले थीं
وَأَنزَلَ
और उसने नाज़िल की
ٱلتَّوْرَىٰةَ
तौरात
وَٱلْإِنجِيلَ
और इन्जील
उसने तुमपर हक़ के साथ किताब उतारी जो पहले की (किताबों की) पुष्टि करती हैं, और उसने तौरात और इंजील उतारी
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) उसने आपपर सच्चे समाचारों और न्यायपूर्ण नियमों के साथ क़ुरआन उतारा, जो इससे पहले की ईश्वरीय पुस्तकों के अनुकूल है। अतः उनके बीच कोई विरोधाभास नहीं है। उसने आपपर क़ुरआन उतारने से पहले मूसा अलैहिस्सलाम पर तौरात और ईसा अलैहिस्सलाम पर इंजील उतारी। ये सभी ईश्वरीय पुस्तकें लोगों के लिए उस चीज़ की ओर मार्गदर्शन के स्रोत हैं, जिसमें उनके धर्म और उनकी दुनिया की भलाई है। और उसने फुरक़ान (सत्य और असत्य में अंतर करने वाला मानदंड) उतारा, जिसके द्वारा सत्य को झूठ से और मार्गदर्शन को पथभ्रष्टता से पहचाना जाता है। और जिन लोगों ने अल्लाह की उन आयतों का इनकार किया जो उसने आपपर उतारी हैं, उनके लिए बहुत कठोर यातना है। तथा अल्लाह सब पर प्रभुत्वशाली है, उसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता। वह उससे बदला लेने वाला है, जिसने उसके रसूलों को झुठलाया और उसके आदेश का उल्लंघन किया।
आयत 4
مِن قَبْلُ هُدًۭى لِّلنَّاسِ وَأَنزَلَ ٱلْفُرْقَانَ ۗ إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ لَهُمْ عَذَابٌۭ شَدِيدٌۭ ۗ وَٱللَّهُ عَزِيزٌۭ ذُو ٱنتِقَامٍ
مِن
From
قَبْلُ
इससे पहले
هُدًۭى
हिदायत
لِّلنَّاسِ
लोगों के लिए
وَأَنزَلَ
और उसने नाज़िल किया
ٱلْفُرْقَانَ ۗ
फ़ुरक़ान
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
जिन्होंने कुफ़्र किया
بِـَٔايَـٰتِ
साथ आयात के
ٱللَّهِ
अल्लाह की
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابٌۭ
अज़ाब है
شَدِيدٌۭ ۗ
सख़्त
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَزِيزٌۭ
बहुत ज़बरदस्त है
ذُو
All-Able
ٱنتِقَامٍ
इन्तिक़ाम लेने वाला है
इससे पहले लोगों के मार्गदर्शन के लिए और उसने कसौटी भी उतारी। निस्संदेह जिन लोगों ने अल्लाह की आयतों का इनकार किया उनके लिए कठोर यातना हैं और अल्लाह प्रभुत्वशाली भी हैं और (बुराई का) बदला लेनेवाला भी
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) उसने आपपर सच्चे समाचारों और न्यायपूर्ण नियमों के साथ क़ुरआन उतारा, जो इससे पहले की ईश्वरीय पुस्तकों के अनुकूल है। अतः उनके बीच कोई विरोधाभास नहीं है। उसने आपपर क़ुरआन उतारने से पहले मूसा अलैहिस्सलाम पर तौरात और ईसा अलैहिस्सलाम पर इंजील उतारी। ये सभी ईश्वरीय पुस्तकें लोगों के लिए उस चीज़ की ओर मार्गदर्शन के स्रोत हैं, जिसमें उनके धर्म और उनकी दुनिया की भलाई है। और उसने फुरक़ान (सत्य और असत्य में अंतर करने वाला मानदंड) उतारा, जिसके द्वारा सत्य को झूठ से और मार्गदर्शन को पथभ्रष्टता से पहचाना जाता है। और जिन लोगों ने अल्लाह की उन आयतों का इनकार किया जो उसने आपपर उतारी हैं, उनके लिए बहुत कठोर यातना है। तथा अल्लाह सब पर प्रभुत्वशाली है, उसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता। वह उससे बदला लेने वाला है, जिसने उसके रसूलों को झुठलाया और उसके आदेश का उल्लंघन किया।
आयत 5
إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَخْفَىٰ عَلَيْهِ شَىْءٌۭ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا فِى ٱلسَّمَآءِ
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
not
يَخْفَىٰ
नहीं छुपती
عَلَيْهِ
उस पर
شَىْءٌۭ
कोई चीज़
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَلَا
और ना
فِى
in
ٱلسَّمَآءِ
आसमान में
निस्संदेह अल्लाह से कोई चीज़ न धरती में छिपी हैं और न आकाश में
तफ़्सीर:
अल्लाह से धरती पर या आकाश में कोई चीज़ छिपी नहीं है। उसके ज्ञान ने बाहरी और आंतरिक सभी चीज़ों को घेर रखा है।
आयत 6
هُوَ ٱلَّذِى يُصَوِّرُكُمْ فِى ٱلْأَرْحَامِ كَيْفَ يَشَآءُ ۚ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِى
जो
يُصَوِّرُكُمْ
सूरत बनाता है तुम्हारी
فِى
in
ٱلْأَرْحَامِ
रहमों में
كَيْفَ
जिस तरह
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता है
لَآ
नहीं है
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ
वो ही
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त है
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिकमत वाला है
वही हैं जो गर्भाशयों में, जैसा चाहता हैं, तुम्हारा रूप देता हैं। उस प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी के अतिरिक्त कोई पूज्य-प्रभु नहीं
तफ़्सीर:
वही है जो तुम्हें तुम्हारी माताओं के पेटों में विभिन्न रूपों में पैदा करता है, जैसा वह चाहता है, चाहे पुरुष हो या महिला, अच्छा हो या बुरा, गोरा हो या काला। उसके सिवा कोई सत्य पूज्य (सच्चा मा'बूद) नहीं। वह सब पर प्रभुत्वशाली है, उसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता। वह अपनी रचना, प्रबंधन और विधान में हिकमत वाला है।
आयत 7
هُوَ ٱلَّذِىٓ أَنزَلَ عَلَيْكَ ٱلْكِتَـٰبَ مِنْهُ ءَايَـٰتٌۭ مُّحْكَمَـٰتٌ هُنَّ أُمُّ ٱلْكِتَـٰبِ وَأُخَرُ مُتَشَـٰبِهَـٰتٌۭ ۖ فَأَمَّا ٱلَّذِينَ فِى قُلُوبِهِمْ زَيْغٌۭ فَيَتَّبِعُونَ مَا تَشَـٰبَهَ مِنْهُ ٱبْتِغَآءَ ٱلْفِتْنَةِ وَٱبْتِغَآءَ تَأْوِيلِهِۦ ۗ وَمَا يَعْلَمُ تَأْوِيلَهُۥٓ إِلَّا ٱللَّهُ ۗ وَٱلرَّٰسِخُونَ فِى ٱلْعِلْمِ يَقُولُونَ ءَامَنَّا بِهِۦ كُلٌّۭ مِّنْ عِندِ رَبِّنَا ۗ وَمَا يَذَّكَّرُ إِلَّآ أُو۟لُوا۟ ٱلْأَلْبَـٰبِ
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِىٓ
जिसने
أَنزَلَ
नाज़िल की
عَلَيْكَ
आप पर
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
مِنْهُ
उसमें से
ءَايَـٰتٌۭ
कुछ आयात
مُّحْكَمَـٰتٌ
मोहकम हैं
هُنَّ
वो
أُمُّ
असल हैं
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब की
وَأُخَرُ
और दूसरी
مُتَشَـٰبِهَـٰتٌۭ ۖ
मुताशाबह/बाहम मिलती जुलती हैं
فَأَمَّا
तो रहे
ٱلَّذِينَ
वो लोग
فِى
in
قُلُوبِهِمْ
दिलों में जिनके
زَيْغٌۭ
टेढ़ है
فَيَتَّبِعُونَ
पस वो पैरवी करते हैं
مَا
उसकी जो
تَشَـٰبَهَ
मुताशाबह है
مِنْهُ
उसमें से
ٱبْتِغَآءَ
चाहने को
ٱلْفِتْنَةِ
फ़ितना
وَٱبْتِغَآءَ
और चाहने को
تَأْوِيلِهِۦ ۗ
मतलब उसका
وَمَا
और नहीं
يَعْلَمُ
जानता
تَأْوِيلَهُۥٓ
मतलब उसका
إِلَّا
मगर
ٱللَّهُ ۗ
अल्लाह
وَٱلرَّٰسِخُونَ
और जो पुख़्ताकार हैं
فِى
in
ٱلْعِلْمِ
इल्म में
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
بِهِۦ
उस पर
كُلٌّۭ
सब कुछ
مِّنْ
(is)
عِندِ
पास से
رَبِّنَا ۗ
हमारे रब के
وَمَا
और नहीं
يَذَّكَّرُ
नसीहत पकड़ते
إِلَّآ
मगर
أُو۟لُوا۟
men
ٱلْأَلْبَـٰبِ
अक़्ल वाले
वही हैं जिसने तुमपर अपनी ओर से किताब उतारी, वे सुदृढ़ आयतें हैं जो किताब का मूल और सारगर्भित रूप हैं और दूसरी उपलक्षित, तो जिन लोगों के दिलों में टेढ़ हैं वे फ़ितना (गुमराही) का तलाश और उसके आशय और परिणाम की चाह में उसका अनुसरण करते हैं जो उपलक्षित हैं। जबकि उनका परिणाम बस अल्लाह ही जानता हैं, और वे जो ज्ञान में पक्के हैं, वे कहते हैं, "हम उसपर ईमान लाए, जो हर एक हमारे रब ही की ओर से हैं।" और चेतते तो केवल वही हैं जो बुद्धि और समझ रखते हैं
तफ़्सीर:
वही अल्लाह है, जिसने (ऐ नबी!) आपपर क़ुरआन उतारा। उसमें से कुछ आयतें ऐसी हैं जिनके अर्थ स्पष्ट हैं, उनमें कोई संदेह नहीं है। यही किताब का मूल और उसका अधिकांश भाग हैं और यही मतभेद के समय संदर्भ हैं। जबकि उसमें से कुछ दूसरी आयतें ऐसी हैं, जिनके एक से अधिक अर्थ हो सकते हैं, उनका अर्थ अधिकांश लोगों के लिए अस्पष्ट (संदिग्ध) होता है। फिर जिनके दिलों में सत्य से विचलन है, वे मोहकम (स्पष्ट अर्थ वाली) आयतों को छोड़कर मुतशाबेह (एक से अधिक अर्थ वाली) आयतों का पालन करते हैं; इसके द्वारा वे संदेह को भड़काने और लोगों को गुमराह करने की कोशिश करते हैं, तथा इसके द्वारा वे अपने भ्रष्ट सिद्धांतों के अनुरूप अपनी इच्छा के अनुसार इसकी व्याख्या करना चाहते हैं। हालाँकि इन आयतों के अर्थों की वास्तविकता और उनके परिणाम को अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता। जो लोग ज्ञान में दृढ़ हैं और उस पर पकड़ रखते हैं, कहते हैं : हम पूरे क़ुरआन पर ईमान रखते हैं; क्योंकि यह पूरा का पूरा हमारे पालनहार की ओर से है और वे मुतशाबेह आयतों की व्याख्या मोहकम आयतों के अनुसार करते हैं। तथा शुद्ध (स्वस्थ) बुद्धि वाले लोग ही नसीहत हासिल करते और उपदेश ग्रहण करते हैं।
आयत 8
رَبَّنَا لَا تُزِغْ قُلُوبَنَا بَعْدَ إِذْ هَدَيْتَنَا وَهَبْ لَنَا مِن لَّدُنكَ رَحْمَةً ۚ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْوَهَّابُ
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
لَا
(Do) not
تُزِغْ
ना तू टेढ़ा कर
قُلُوبَنَا
हमारे दिलों को
بَعْدَ
बाद उसके
إِذْ
जब
هَدَيْتَنَا
हिदायत दी तूने हमें
وَهَبْ
और अता कर
لَنَا
हमारे लिए
مِن
from
لَّدُنكَ
अपने पास से
رَحْمَةً ۚ
रहमत
إِنَّكَ
बेशक तू
أَنتَ
तू ही है
ٱلْوَهَّابُ
बहुत अता करने वाला
हमारे रब! जब तू हमें सीधे मार्ग पर लगा चुका है तो इसके पश्चात हमारे दिलों में टेढ़ न पैदा कर और हमें अपने पास से दयालुता प्रदान कर। निश्चय ही तू बड़ा दाता है
तफ़्सीर:
ये ज्ञान में दृढ़ लोग कहते हैं : ऐ हमारे पालनहार! हमारे दिलों को सत्य से न फेर, इसके बाद कि तूने हमारा उसकी ओर मार्गदर्शन किया। तथा हमें सत्य से भटकने वाले पथभ्रष्टों के परिणाम से सुरक्षित रख। और हमें अपनी ओर से एक व्यापक दया प्रदान कर, जिसके द्वारा तू हमारे दिलों का मार्गदर्शन कर और उसके द्वारा तू हमें पथभ्रष्ट होने से बचा ले। निःसंदेह - ऐ हमारे पालनहार! - तू महान दाता है।
आयत 9
رَبَّنَآ إِنَّكَ جَامِعُ ٱلنَّاسِ لِيَوْمٍۢ لَّا رَيْبَ فِيهِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُخْلِفُ ٱلْمِيعَادَ
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
إِنَّكَ
बेशक तू
جَامِعُ
जमा करने वाला है
ٱلنَّاسِ
लोगों को
لِيَوْمٍۢ
एक दिन के लिए
لَّا
(there is) no
رَيْبَ
नहीं कोई शक
فِيهِ ۚ
जिसमें
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يُخْلِفُ
नहीं ख़िलाफ़ करता
ٱلْمِيعَادَ
वादे के
हमारे रब! तू लोगों को एक दिन इकट्ठा करने वाला है, जिसमें कोई संदेह नही। निस्सन्देह अल्लाह अपने वचन के विरुद्ध जाने वाला नही है
तफ़्सीर:
ऐ हमारे पालनहार! तू सभी लोगों को हिसाब के लिए अपने पास एक ऐसे दिन एकत्रित करेगा, जिसमें कोई संदेह नहीं। क्योंकि वह अनिवार्य रूप से आने वाला है। निःसंदेह - ऐ हमारे पालनहार! - तू वादाखिलाफ़ी नहीं करता।
आयत 10
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لَن تُغْنِىَ عَنْهُمْ أَمْوَٰلُهُمْ وَلَآ أَوْلَـٰدُهُم مِّنَ ٱللَّهِ شَيْـًۭٔا ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمْ وَقُودُ ٱلنَّارِ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لَن
हरगिज़ ना
تُغْنِىَ
काम आऐंगे
عَنْهُمْ
उन्हें
أَمْوَٰلُهُمْ
माल उनके
وَلَآ
और ना
أَوْلَـٰدُهُم
औलाद उनकी
مِّنَ
against
ٱللَّهِ
अल्लाह से
شَيْـًۭٔا ۖ
कुछ भी
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग
هُمْ
वो
وَقُودُ
ईंधन हैं
ٱلنَّارِ
आग का
जिन लोगों ने इनकार की नीति अपनाई है अल्लाह के मुकाबले में तो न उसके माल उनके कुछ काम आएँगे और न उनकी संतान ही। और वही हैं जो आग (जहन्नम) का ईधन बनकर रहेंगे
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूलों का इनकार किया, उनके धन और उनकी औलाद उनसे अल्लाह की यातना को हरगिज़ नहीं रोक सकते, न दुनिया में और न ही आख़िरत में। वे लोग जिनकी ये विशेषताएँ हैं, वही जहन्नम के ईंधन हैं, जिसके द्वारा उसे क़ियामत के दिन भड़काया जाएगा।
आयत 11
كَدَأْبِ ءَالِ فِرْعَوْنَ وَٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا فَأَخَذَهُمُ ٱللَّهُ بِذُنُوبِهِمْ ۗ وَٱللَّهُ شَدِيدُ ٱلْعِقَابِ
كَدَأْبِ
मानिन्द हालत
ءَالِ
(of the) people
فِرْعَوْنَ
आले फ़िरऔन की
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
مِن
(were) from
قَبْلِهِمْ ۚ
उनसे पहले थे
كَذَّبُوا۟
उन्होंने झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात को
فَأَخَذَهُمُ
तो पकड़ लिया उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
بِذُنُوبِهِمْ ۗ
बवजह उनके गुनाहों के
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
شَدِيدُ
सख़्त
ٱلْعِقَابِ
सज़ा वाला है
जैसे फ़िरऔन के लोगों और उनसे पहले के लोगों का हाल हुआ। उन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया तो अल्लाह ने उन्हें उनके गुनाहों पर पकड़ लिया। और अल्लाह कठोर दंड देनेवाला है
तफ़्सीर:
इन काफिरों की स्थिति फ़िरऔन के लोगों और उनसे पहले के लोगों की तरह है, जिन्होंने अल्लाह का इनकार किया और उसकी आयतों (निशानियों) को झुठलाया था। तो अल्लाह ने उन्हें उनके पापों के कारण दंडित किया और उनके धन और उनकी औलाद ने उन्हें कोई लाभ नहीं पहुँचाया। और अल्लाह उसे कठोर सज़ा देने वाला है, जिसने उसका इनकार किया और उसकी आयतों (निशानियों) को झुठलाया।
आयत 12
قُل لِّلَّذِينَ كَفَرُوا۟ سَتُغْلَبُونَ وَتُحْشَرُونَ إِلَىٰ جَهَنَّمَ ۚ وَبِئْسَ ٱلْمِهَادُ
قُل
कह दीजिए
لِّلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
سَتُغْلَبُونَ
अनक़रीब तुम मग़लूब किए जाओगे
وَتُحْشَرُونَ
और तुम इकट्ठे किए जाओगे
إِلَىٰ
to
جَهَنَّمَ ۚ
तरफ़ जहन्नम के
وَبِئْسَ
और कितना बुरा है
ٱلْمِهَادُ
ठिकाना
इनकार करनेवालों से कह दो, "शीघ्र ही तुम पराभूत होगे और जहन्नम की ओर हाँके जाओगं। और वह क्या ही बुरा ठिकाना है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) विभिन्न धर्मों के मानने वाले काफ़िरों से कह दें : ईमान वाले शीघ्र ही तुम्हें पराजित कर देंगे और तुम कुफ़्र की हालत में मरोगे तथा अल्लाह तुम्हें जहन्नम की आग में इकट्ठा करेगा। और वह तुम्हारे लिए बहुत बुरा ठिकाना है।
आयत 13
قَدْ كَانَ لَكُمْ ءَايَةٌۭ فِى فِئَتَيْنِ ٱلْتَقَتَا ۖ فِئَةٌۭ تُقَـٰتِلُ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَأُخْرَىٰ كَافِرَةٌۭ يَرَوْنَهُم مِّثْلَيْهِمْ رَأْىَ ٱلْعَيْنِ ۚ وَٱللَّهُ يُؤَيِّدُ بِنَصْرِهِۦ مَن يَشَآءُ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَعِبْرَةًۭ لِّأُو۟لِى ٱلْأَبْصَـٰرِ
قَدْ
तहक़ीक़
كَانَ
है
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
ءَايَةٌۭ
एक निशानी
فِى
in
فِئَتَيْنِ
दो गिरोहों में
ٱلْتَقَتَا ۖ
जो आमने सामने हुए
فِئَةٌۭ
एक गिरोह
تُقَـٰتِلُ
वो लड़ रहा था
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
وَأُخْرَىٰ
और दूसरा
كَافِرَةٌۭ
काफ़िर था
يَرَوْنَهُم
वो देख रहे थे उन्हें
مِّثْلَيْهِمْ
दोगुना अपने से
رَأْىَ
देखना
ٱلْعَيْنِ ۚ
आँख का
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يُؤَيِّدُ
ताईद करता है
بِنَصْرِهِۦ
अपनी मदद से
مَن
जिसकी
يَشَآءُ ۗ
वो चाहता है
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
उसमें
لَعِبْرَةًۭ
अलबत्ता इबरत है
لِّأُو۟لِى
for the owners
ٱلْأَبْصَـٰرِ
अहले बसीरत के लिए
तुम्हारे लिए उन दोनों गिरोहों में एक निशानी है जो (बद्र की) लड़ाई में एक-दूसरे के मुक़ाबिल हुए। एक गिरोह अल्लाह के मार्ग में लड़ रहा था, जबकि दूसरा विधर्मी था। ये अपनी आँखों देख रहे थे कि वे उनसे दुगने है। अल्लाह अपनी सहायता से जिसे चाहता है, शक्ति प्रदान करता है। दृष्टिवान लोगों के लिए इसमें बड़ी शिक्षा-सामग्री है
तफ़्सीर:
तुम्हारे लिए उन दो दलों में एक संकेत और सीख थी, जो बद्र के दिन लड़ने के लिए आपस में मिले थे। उनमें से एक दल ईमान वालों का था और वह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके साथियों का दल था। वे अल्लाह के रास्ते में इस उद्देश्य से युद्ध कर रहे थे ताकि अल्लाह की बात सर्वोच्च हो और काफ़िरों की बात नीची हो। और दूसरा दल काफ़िरों का था और वे मक्का के काफ़िर थे, जो गर्व, दिखावा और धार्मिक पक्षपात के तौर पर निकले थे। ईमान वाले उनको अपनी आँखों से वास्तविकता में दोगुना देख रहे थे। तो अल्लाह ने अपने दोस्तों को विजय प्रदान की और अल्लाह जिसे चाहता है अपने विजय के साथ उसका समर्थन करता है। निःसंदेह इसमें इबरत और उपदेश है समझ-बूझ रखने वालों के लिए, ताकि उन्हें मालूम हो जाए कि विजय ईमान वालों के लिए है, अगरचे उनकी संख्या कम हो, और यह कि पराजय असत्यवादियों के लिए है, भले ही उनकी संख्या अधिक हो।
आयत 14
زُيِّنَ لِلنَّاسِ حُبُّ ٱلشَّهَوَٰتِ مِنَ ٱلنِّسَآءِ وَٱلْبَنِينَ وَٱلْقَنَـٰطِيرِ ٱلْمُقَنطَرَةِ مِنَ ٱلذَّهَبِ وَٱلْفِضَّةِ وَٱلْخَيْلِ ٱلْمُسَوَّمَةِ وَٱلْأَنْعَـٰمِ وَٱلْحَرْثِ ۗ ذَٰلِكَ مَتَـٰعُ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۖ وَٱللَّهُ عِندَهُۥ حُسْنُ ٱلْمَـَٔابِ
زُيِّنَ
मुज़य्यन कर दी गई
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
حُبُّ
मोहब्बत
ٱلشَّهَوَٰتِ
ख़्वाहिशात की
مِنَ
of
ٱلنِّسَآءِ
औरतों से
وَٱلْبَنِينَ
और बेटों से
وَٱلْقَنَـٰطِيرِ
और ख़जानों से
ٱلْمُقَنطَرَةِ
जो इकट्ठे किए गए
مِنَ
of
ٱلذَّهَبِ
सोने से
وَٱلْفِضَّةِ
और चाँदी से
وَٱلْخَيْلِ
और घोड़े
ٱلْمُسَوَّمَةِ
निशान लगे हुए हैं
وَٱلْأَنْعَـٰمِ
और मवेशी जानवर
وَٱلْحَرْثِ ۗ
और खेती से
ذَٰلِكَ
ये
مَتَـٰعُ
सामान है
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी का
ٱلدُّنْيَا ۖ
दुनिया की
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عِندَهُۥ
पास उसके
حُسْنُ
अच्छा
ٱلْمَـَٔابِ
ठिकाना है
मनुष्यों को चाहत की चीजों से प्रेम शोभायमान प्रतीत होता है कि वे स्त्रिमयाँ, बेटे, सोने-चाँदी के ढेर और निशान लगे (चुने हुए) घोड़े हैं और चौपाए और खेती। यह सब सांसारिक जीवन की सामग्री है और अल्लाह के पास ही अच्छा ठिकाना है
तफ़्सीर:
अल्लाह सूचित कर रहा है कि उसने लोगों के लिए - उनकी परीक्षा लेने के लिए - सांसारिक इच्छाओं का प्रेम सुसज्जित कर दिया है, जैसे कि महिलाएँ, बेटे, सोने और चाँदी के एकत्रित ख़ज़ाने, निशान लगाए हुए अच्छे नस्ल के घोड़े, ऊँट, गाय और भेड़ जैसे मवेशी और भूमि की खेती। यह सांसारिक जीवन का सामान है, जिससे कुछ समय के लिए लाभ उठाया जाता है, फिर वह ख़त्म हो जाता है। इसलिए मोमिन को इससे चिपकना नहीं चाहिए। और अल्लाह के पास ही उत्तम ठिकाना है और वह जन्नत है, जिसकी चौड़ाई आकाशों एवं धरती के बराबर है।
आयत 15
۞ قُلْ أَؤُنَبِّئُكُم بِخَيْرٍۢ مِّن ذَٰلِكُمْ ۚ لِلَّذِينَ ٱتَّقَوْا۟ عِندَ رَبِّهِمْ جَنَّـٰتٌۭ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَا وَأَزْوَٰجٌۭ مُّطَهَّرَةٌۭ وَرِضْوَٰنٌۭ مِّنَ ٱللَّهِ ۗ وَٱللَّهُ بَصِيرٌۢ بِٱلْعِبَادِ
۞ قُلْ
कह दीजिए
أَؤُنَبِّئُكُم
क्या मैं ख़बर दूँ तुम्हें
بِخَيْرٍۢ
बेहतर की
مِّن
than
ذَٰلِكُمْ ۚ
इससे
لِلَّذِينَ
उनके लिए जिन्होंने
ٱتَّقَوْا۟
तक़वा किया
عِندَ
with
رَبِّهِمْ
उनके रब के पास
جَنَّـٰتٌۭ
बाग़ात हैं
تَجْرِى
बहती हैं
مِن
from
تَحْتِهَا
उसके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَا
उनमें
وَأَزْوَٰجٌۭ
और बीवियाँ
مُّطَهَّرَةٌۭ
पाकीज़ा
وَرِضْوَٰنٌۭ
और रज़ामन्दी
مِّنَ
from
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह की तरफ़ से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بَصِيرٌۢ
ख़ूब देखने वाला है
بِٱلْعِبَادِ
बन्दों को
कहो, "क्या मैं तुम्हें इनसे उत्तम चीज का पता दूँ?" जो लोग अल्लाह का डर रखेंगे उनके लिए उनके रब के पास बाग़ है, जिनके नीचे नहरें बह रहीं होगी। उनमें वे सदैव रहेंगे। वहाँ पाक-साफ़ जोड़े होंगे और अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त होगी। और अल्लाह अपने बन्दों पर नज़र रखता है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) कह दीजिए : क्या मैं तुम्हें इन इच्छाओं से बेहतर चीज़ के बारे में बताऊँ? जो लोग अल्लाह की आज्ञाकारिता करके और उसकी अवज्ञा को त्यागकर उससे डरते हैं, उनके लिए ऐसे बाग़ हैं, जिनके महलों और पेड़ों के नीचे से नहरें बहती हैं, जिनमें वे हमेशा रहने वाले हैं, न उन्हें मौत आएगी और न उनका विनाश होगा। उनके लिए उसमें ऐसी पत्नियाँ होंगी जो अपनी संरचना और आचरण में सभी बुराइयों से शुद्ध होंगी। इसके बावजूद, उनपर अल्लाह की ओर से प्रसन्नता उतरेगी, फिर वह उनसे कभी नाराज़ नहीं होगा। और अल्लाह अपने बंदों के हालात से अवगत है, उससे कुछ भी छिपा नहीं है, और वह उन्हें उनपर बदला देगा।
आयत 16
ٱلَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَآ إِنَّنَآ ءَامَنَّا فَٱغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَقِنَا عَذَابَ ٱلنَّارِ
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَقُولُونَ
कहते हैं
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
إِنَّنَآ
बेशक हम
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
فَٱغْفِرْ
so forgive
لَنَا
पस बख़्श दे
ذُنُوبَنَا
हमारे गुनाहों को
وَقِنَا
और बचा हमें
عَذَابَ
अज़ाब से
ٱلنَّارِ
आग के
ये वे लोग है जो कहते है, "हमारे रब हम ईमान लाए है। अतः हमारे गुनाहों को क्षमा कर दे और हमें आग (जहन्नम) की यातना से बचा ले।"
तफ़्सीर:
ये जन्नत वाले ही हैं जो अपने पालनहार से दुआ करते हुए कहते हैं : ऐ हमारे पालनहार! हम तुझपर ईमान लाए और उसपर भी जो कुछ तूने अपने रसूलों पर उतारा है, तथा हमने तेरी शरीयत का पालन किया। अतः तू हमारे द्वारा किए गए पापों को क्षमा कर दे और हमें आग की यातना से बचा।
आयत 17
ٱلصَّـٰبِرِينَ وَٱلصَّـٰدِقِينَ وَٱلْقَـٰنِتِينَ وَٱلْمُنفِقِينَ وَٱلْمُسْتَغْفِرِينَ بِٱلْأَسْحَارِ
ٱلصَّـٰبِرِينَ
सब्र करने वाले
وَٱلصَّـٰدِقِينَ
और सच्चे
وَٱلْقَـٰنِتِينَ
और इताअत गुज़ार
وَٱلْمُنفِقِينَ
और ख़र्च करने वाले
وَٱلْمُسْتَغْفِرِينَ
और इस्तग़फ़ार करने वाले
بِٱلْأَسْحَارِ
सहरी के वक़्त
ये लोग धैर्य से काम लेनेवाले, सत्यवान और अत्यन्त आज्ञाकारी है, ये ((अल्लाह के मार्ग में) खर्च करते और रात की अंतिम घड़ियों में क्षमा की प्रार्थनाएँ करते हैं
तफ़्सीर:
जो आज्ञाकारिता के काम करने और बुरे कामों को त्यागने, तथा उनपर आने वाली विपत्तियों पर धैर्य रखने वाले हैं, तथा वे अपने कथनों और कार्यों में सच्चे हैं, और वे पूरी तरह से अल्लाह के आज्ञाकारी हैं, और वे अल्लाह की राह में अपना धन खर्च करने वाले हैं, तथा वे रात की अंतिम घड़ियों में अल्लाह से क्षमा माँगने वाले हैं। क्योंकि उस समय दुआ स्वीकार होने की संभावना अधिक होती है और दिल व्यस्तताओं से खाली होता है।
आयत 18
شَهِدَ ٱللَّهُ أَنَّهُۥ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ وَأُو۟لُوا۟ ٱلْعِلْمِ قَآئِمًۢا بِٱلْقِسْطِ ۚ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
شَهِدَ
गवाही दी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
أَنَّهُۥ
कि बेशक वो
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ
वो ही
وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
और फ़रिश्तों ने
وَأُو۟لُوا۟
and owners
ٱلْعِلْمِ
और इल्म वालों ने
قَآئِمًۢا
क़ायम है (इस हाल में कि वो)
بِٱلْقِسْطِ ۚ
इन्साफ़ पर
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ
वो ही
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त है
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिकमत वाला है
अल्लाह ने गवाही दी कि उसके सिवा कोई पूज्य नहीं; और फ़रिश्तों ने और उन लोगों ने भी जो न्याय और संतुलन स्थापित करनेवाली एक सत्ता को जानते है। उस प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी के सिवा कोई पूज्य नहीं
तफ़्सीर:
अल्लाह ने गवाही दी कि निःसंदेह वही वास्तव में इबादत के योग्य पूज्य है। उसके सिवा कोई उपासना के योग्य नहीं। ऐसा उसने शरई और ब्रह्मांडीय आयतों (निशानियों) को स्थापित करके किया है, जो उसके एकमात्र पूज्य होने को दर्शाती हैं। तथा फरिश्तों ने भी इसकी गवाही दी, और ज्ञान वाले लोगों ने तौहीद (एकेश्वरवाद) को लोगों के लिए स्पष्ट करने और उन्हें उसकी ओर आमंत्रित करने के द्वारा इसकी गवाही दी। उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े तथ्य अर्थात् इस बात की गवाही दी कि अल्लाह ही एकमात्र पूज्य है और वह अपनी सृष्टि और शरीयत में न्याय स्थापित करने वाला है। उसके सिवा कोई पूज्य नहीं, वह सब पर प्रभुत्वशाली है, उसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता, अपनी रचना, प्रबंधन और शरीयतसाज़ी में पूर्ण हिकमत वाला है।
आयत 19
إِنَّ ٱلدِّينَ عِندَ ٱللَّهِ ٱلْإِسْلَـٰمُ ۗ وَمَا ٱخْتَلَفَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ إِلَّا مِنۢ بَعْدِ مَا جَآءَهُمُ ٱلْعِلْمُ بَغْيًۢا بَيْنَهُمْ ۗ وَمَن يَكْفُرْ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ فَإِنَّ ٱللَّهَ سَرِيعُ ٱلْحِسَابِ
إِنَّ
बेशक
ٱلدِّينَ
दीन
عِندَ
near
ٱللَّهِ
अल्लाह के नज़दीक
ٱلْإِسْلَـٰمُ ۗ
इस्लाम है
وَمَا
और नहीं
ٱخْتَلَفَ
इख़्तिलाफ़ किया
ٱلَّذِينَ
उन्होंने जो
أُوتُوا۟
दिए गए
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
إِلَّا
मगर
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद उसके
مَا
जो
جَآءَهُمُ
आ गया उनके पास
ٱلْعِلْمُ
इल्म
بَغْيًۢا
बवजह ज़िद के
بَيْنَهُمْ ۗ
आपस में
وَمَن
और जो कोई
يَكْفُرْ
कुफ़्र करे
بِـَٔايَـٰتِ
साथ आयात के
ٱللَّهِ
अल्लाह की
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
سَرِيعُ
जल्द लेने वाला है
ٱلْحِسَابِ
हिसाब
दीन (धर्म) तो अल्लाह की स्पष्ट में इस्लाम ही है। जिन्हें किताब दी गई थी, उन्होंने तो इसमें इसके पश्चात विभेद किया कि ज्ञान उनके पास आ चुका था। ऐसा उन्होंने परस्पर दुराग्रह के कारण किया। जो अल्लाह की आयतों का इनकार करेगा तो अल्लाह भी जल्द हिसाब लेनेवाला है
तफ़्सीर:
नि:संदेह अल्लाह के निकट स्वीकार्य धर्म इस्लाम है। इस्लाम का मतलब है आज्ञाकारिता के साथ अकेले अल्लाह के प्रति अधीनता और उपासना (बंदगी) के साथ उसके प्रति समर्पण; तथा सभी रसूलों पर उनकी अंतिम कड़ी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तक ईमान लाना, जिनपर अल्लाह ने रसूलों का सिलसिला समाप्त कर दिया। अतः अल्लाह आपकी शरीयत के अलावा कुछ भी स्वीकार नहीं करेगा। यहूदियों और ईसाइयों ने अपने धर्म के बारे में जो भी मतभेद किया और विभिन्न समूहों और दलों में विभाजित हो गए, वह उनके पास ज्ञान आने के साथ उनपर तर्क स्थापित होने के बाद, ईर्ष्या और दुनिया की लालच के कारण था। तथा जो अल्लाह की उसके रसूल पर अवतरित आयतों का इनकार करे, तो निःसंदेह अल्लाह उससे बहुत जल्द हिसाब लेने वाला है, जिसने उसका इनकार किया और उसके रसूलों को झुठलाया।
आयत 20
فَإِنْ حَآجُّوكَ فَقُلْ أَسْلَمْتُ وَجْهِىَ لِلَّهِ وَمَنِ ٱتَّبَعَنِ ۗ وَقُل لِّلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْأُمِّيِّـۧنَ ءَأَسْلَمْتُمْ ۚ فَإِنْ أَسْلَمُوا۟ فَقَدِ ٱهْتَدَوا۟ ۖ وَّإِن تَوَلَّوْا۟ فَإِنَّمَا عَلَيْكَ ٱلْبَلَـٰغُ ۗ وَٱللَّهُ بَصِيرٌۢ بِٱلْعِبَادِ
فَإِنْ
फिर अगर
حَآجُّوكَ
वो झगड़ा करें आपसे
فَقُلْ
तो कह दीजिए
أَسْلَمْتُ
मैंने सुपुर्द कर दिया
وَجْهِىَ
चेहरा अपना
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
وَمَنِ
और जिसने
ٱتَّبَعَنِ ۗ
इत्तिबा किया मेरा
وَقُل
और कह दीजिए
لِّلَّذِينَ
उनको जो
أُوتُوا۟
दिए गए
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
وَٱلْأُمِّيِّـۧنَ
और उम्मियों/अनपढ़ों को
ءَأَسْلَمْتُمْ ۚ
क्या इस्लाम लाए तुम
فَإِنْ
फिर अगर
أَسْلَمُوا۟
वो इस्लाम ले आऐं
فَقَدِ
तो तहक़ीक़
ٱهْتَدَوا۟ ۖ
वो हिदायत पा गए
وَّإِن
और अगर
تَوَلَّوْا۟
वो मुँह मोड़ जाऐं
فَإِنَّمَا
तो बेशक
عَلَيْكَ
आप पर है
ٱلْبَلَـٰغُ ۗ
पहुँचा देना
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بَصِيرٌۢ
ख़ूब देखने वाला है
بِٱلْعِبَادِ
बन्दों को
अब यदि वे तुमसे झगड़े तो कह दो, "मैंने और मेरे अनुयायियों ने तो अपने आपको अल्लाह के हवाले कर दिया हैं।" और जिन्हें किताब मिली थी और जिनके पास किताब नहीं है, उनसे कहो, "क्या तुम भी इस्लाम को अपनाते हो?" यदि वे इस्लाम को अंगीकार कर लें तो सीधा मार्ग पर गए। और यदि मुँह मोड़े तो तुमपर केवल (संदेश) पहुँचा देने की ज़िम्मेदारी है। और अल्लाह स्वयं बन्दों को देख रहा है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) अगर वे आपसे उस सत्य के संबंध में झगड़ें, जो आपपर अल्लाह की ओर से उतरा है, तो उन्हें उत्तर देते हुए कह दीजिए : मैं और ईमान वालों में से मेरा अनुसरण करने वाले अल्लाह को समर्पित हो गए। और (ऐ रसूल!) किताब वालों और मुश्रिकों से पूछिए : क्या तुम लोग अल्लाह के प्रति, उसके लिए विशुद्ध होकर और जो मैं लाया हूँ उसका अनुसरण करते हुए, समर्पित हो गए? यदि वे अल्लाह के प्रति समर्पित हो जाएँ और आपकी शरीयत का अनुसरण करें, तो निःसंदेह उन्होंने हिदायत का मार्ग अपना लिया। और अगर वे इस्लाम से मुँह फेर लें, तो आपका काम केवल अपनी बात उन तक पहुँचा देना है और उनका मामला अल्लाह के हवाले है। क्योंकि वह अपने बंदों को ख़ूब देखने वाला है, और वह प्रत्येक कार्यकर्ता को उसके कार्य का बदला देगा।
आयत 21
إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكْفُرُونَ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ وَيَقْتُلُونَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ بِغَيْرِ حَقٍّۢ وَيَقْتُلُونَ ٱلَّذِينَ يَأْمُرُونَ بِٱلْقِسْطِ مِنَ ٱلنَّاسِ فَبَشِّرْهُم بِعَذَابٍ أَلِيمٍ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَكْفُرُونَ
कुफ़्र करते हैं
بِـَٔايَـٰتِ
साथ आयात के
ٱللَّهِ
अल्लाह की
وَيَقْتُلُونَ
और वो क़त्ल करते हैं
ٱلنَّبِيِّـۧنَ
नबियों को
بِغَيْرِ
बग़ैर
حَقٍّۢ
हक़ के
وَيَقْتُلُونَ
और वो क़त्ल करते हैं
ٱلَّذِينَ
उनको जो
يَأْمُرُونَ
हुक्म देते हैं
بِٱلْقِسْطِ
इन्साफ़ का
مِنَ
among
ٱلنَّاسِ
लोगों में से
فَبَشِّرْهُم
तो ख़ुशख़बरी दे दीजिए उन्हें
بِعَذَابٍ
अज़ाब
أَلِيمٍ
दर्दनाक की
जो लोग अल्लाह की आयतों का इनकार करें और नबियों को नाहक क़त्ल करे और उन लोगों का क़ल्त करें जो न्याय के पालन करने को कहें, उनको दुखद यातना की मंगल सूचना दे दो
तफ़्सीर:
जो लोग अल्लाह के उन तर्कों का इनकार करते हैं जो उसने उनपर उतारे हैं, तथा उसके नबियों को बिना अधिकार के अन्याय व आक्रामकता के साथ क़त्ल करते हैं और उन लोगों को क़त्ल करते हैं, जो लोगों में से न्याय करने का आदेश देते हैं और वे अच्छी बात का आदेश देने वाले और बुराई से रोकने वाले लोग हैं, तो इन काफ़िर हत्यारों को एक दर्दनाक यातना की शुभ सूचना दे दें।
आयत 22
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ حَبِطَتْ أَعْمَـٰلُهُمْ فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ وَمَا لَهُم مِّن نَّـٰصِرِينَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
ٱلَّذِينَ
वो जो
حَبِطَتْ
ज़ाया हो गए
أَعْمَـٰلُهُمْ
आमाल उनके
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
وَٱلْـَٔاخِرَةِ
और आख़िरत में
وَمَا
और नहीं
لَهُم
उनके लिए
مِّن
any
نَّـٰصِرِينَ
मददगारों में से कोई
यही लोग हैं, जिनके कर्म दुनिया और आख़िरत में अकारथ गए और उनका सहायक कोई भी नहीं
तफ़्सीर:
जो लोग इन गुणों से विशेषित हैं, उनके कर्म बर्बाद हो गए। अतः उन्हें इस दुनिया में या आख़िरत में उनसे कोई लाभ नहीं होगा। क्योंकि वे अल्लाह पर ईमान नहीं रखते हैं। तथा उनके लिए कोई सहायक नहीं होंगे, जो उनसे अज़ाब को टाल सकें।
आयत 23
أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ نَصِيبًۭا مِّنَ ٱلْكِتَـٰبِ يُدْعَوْنَ إِلَىٰ كِتَـٰبِ ٱللَّهِ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ ثُمَّ يَتَوَلَّىٰ فَرِيقٌۭ مِّنْهُمْ وَهُم مُّعْرِضُونَ
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
إِلَى
[to]
ٱلَّذِينَ
तरफ़ उनके जो
أُوتُوا۟
दिए गए
نَصِيبًۭا
एक हिस्सा
مِّنَ
of
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में से
يُدْعَوْنَ
वो बुलाए जाते हैं
إِلَىٰ
तरफ़
كِتَـٰبِ
(the) Book
ٱللَّهِ
अल्लाह की किताब के
لِيَحْكُمَ
ताकि वो फ़ैसला करें
بَيْنَهُمْ
दर्मियान उनके
ثُمَّ
फिर
يَتَوَلَّىٰ
मुँह फेर लेता है
فَرِيقٌۭ
एक गिरोह
مِّنْهُمْ
उनमें से
وَهُم
और वो
مُّعْرِضُونَ
ऐराज़ करने वाले हैं
क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जिन्हें ईश-ग्रंथ का एक हिस्सा प्रदान हुआ। उन्हें अल्लाह की किताब की ओर बुलाया जाता है कि वह उनके बीच निर्णय करे, फिर भी उनका एक गिरोह (उसकी) उपेक्षा करते हुए मुँह फेर लेता है?
तफ़्सीर:
ऐ नबी! क्या आपने उन यहूदियों का हाल नहीं देखा, जिन्हें अल्लाह ने तौरात तथा उसमें मौजूद आपकी नुबुव्वत (ईश्दूतत्व) की निशानियों के ज्ञान का एक हिस्सा दिया। उन्हें अल्लाह की पुस्तक तौरात की ओर बुलाया जाता है, ताकि वह उनके बीच उनके विवादों का निर्णय करे। परंतु उनके विद्वानों और प्रमुख लोगों का एक समूह मुँह फेर लेता है, इस हाल में कि वे उसके आदेश से उपेक्षा करने वाले होते हैं क्योंकि वह उनकी इच्छाओं के अनुकूल नहीं है। हालाँकि उनके लिए बेहतर यह था - जबकि वे तौरात का अनुसरण करने का दावा करते हैं - कि उससे फैसला कराने में सबसे आगे रहते।
आयत 24
ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَالُوا۟ لَن تَمَسَّنَا ٱلنَّارُ إِلَّآ أَيَّامًۭا مَّعْدُودَٰتٍۢ ۖ وَغَرَّهُمْ فِى دِينِهِم مَّا كَانُوا۟ يَفْتَرُونَ
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّهُمْ
बवजह इसके कि वो
قَالُوا۟
कहते हैं
لَن
हरगिज़ ना
تَمَسَّنَا
छुएगी हमें
ٱلنَّارُ
आग
إِلَّآ
मगर
أَيَّامًۭا
दिन
مَّعْدُودَٰتٍۢ ۖ
गिने चुने
وَغَرَّهُمْ
और धोखे में डाल देता है उन्हें
فِى
in
دِينِهِم
उनके दीन (के बारे) में
مَّا
जो
كَانُوا۟
थे वो
يَفْتَرُونَ
वो गढ़ते
यह इसलिए कि वे कहते, "आग हमें नहीं छू सकती। हाँ, कुछ गिने-चुने दिनों (के कष्टों) की बात और है।" उनकी मनघड़ंत बातों ने, जो वे घड़ते रहे हैं, उन्हें धोखे में डाल रखा है
तफ़्सीर:
यह सत्य से मुँह फेरना और उससे उपेक्षा करना इस कारण है, क्योंकि वे दावा करते थे कि क़ियामत के दिन दोज़ख की आग उन्हें केवल कुछ दिनों के लिए ही छुएगी, फिर वे जन्नत में प्रवेश करेंगे। उनके इस गढ़े हुए झूठे और असत्य भ्रम ने उन्हें धोखे में डाल दिया और उन्होंने अल्लाह और उसके धर्म की अवहेलना करने का साहस किया।
आयत 25
فَكَيْفَ إِذَا جَمَعْنَـٰهُمْ لِيَوْمٍۢ لَّا رَيْبَ فِيهِ وَوُفِّيَتْ كُلُّ نَفْسٍۢ مَّا كَسَبَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
فَكَيْفَ
तो कैसा (होगा हाल)
إِذَا
जब
جَمَعْنَـٰهُمْ
जमा करेंगे हम उन्हें
لِيَوْمٍۢ
उस दिन के लिए
لَّا
no
رَيْبَ
नहीं कोई शक
فِيهِ
उसमें
وَوُفِّيَتْ
और पूरी पूरी दे दी जाएगी
كُلُّ
हर
نَفْسٍۢ
नफ़्स को
مَّا
जो
كَسَبَتْ
उसने कमाई की
وَهُمْ
और वो
لَا
(will) not
يُظْلَمُونَ
ना वो ज़ुल्म किए जाऐंगे
फिर क्या हाल होगा, जब हम उन्हें उस दिन इकट्ठा करेंगे, जिसके आने में कोई संदेह नहीं और प्रत्येक व्यक्ति को, जो कुछ उसने कमाया होगा, पूरा-पूरा मिल जाएगा; और उनके साथ अन्याय न होगा
तफ़्सीर:
(उस समय) उनका हाल और उनका पछताना कैसा होगा?! निश्चय वह बहुत बुरा होगा जब हम उन्हें हिसाब के लिए एक ऐसे दिन में एकत्र करेंगे, जिसमें कोई संदेह नहीं और वह क़ियामत का दिन है। और हर प्राणी को उसके किए हुए कार्यों का उसके योग्य बदला दिया जाएगा। उसकी नेकियों को घटाकर या उसकी बुराइयों को बढ़ाकर उसपर अत्याचार नहीं किया जाएगा।
आयत 26
قُلِ ٱللَّهُمَّ مَـٰلِكَ ٱلْمُلْكِ تُؤْتِى ٱلْمُلْكَ مَن تَشَآءُ وَتَنزِعُ ٱلْمُلْكَ مِمَّن تَشَآءُ وَتُعِزُّ مَن تَشَآءُ وَتُذِلُّ مَن تَشَآءُ ۖ بِيَدِكَ ٱلْخَيْرُ ۖ إِنَّكَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ
قُلِ
कह दीजिए
ٱللَّهُمَّ
ऐ अल्लाह
مَـٰلِكَ
ऐ मालिक
ٱلْمُلْكِ
बादशाहत के
تُؤْتِى
तू देता है
ٱلْمُلْكَ
बादशाहत
مَن
जिसे
تَشَآءُ
तू चाहता है
وَتَنزِعُ
और तू छीन लेता है
ٱلْمُلْكَ
बादशाहत
مِمَّن
जिससे
تَشَآءُ
तू चाहता है
وَتُعِزُّ
और तू इज़्ज़त देता है
مَن
जिसे
تَشَآءُ
तू चाहता है
وَتُذِلُّ
और तू ज़िल्लत देता है
مَن
जिसे
تَشَآءُ ۖ
तू चाहता है
بِيَدِكَ
तेरे ही हाथ में
ٱلْخَيْرُ ۖ
भलाई है
إِنَّكَ
बेशक तू
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌۭ
बहुत क़ादिर है
कहो, "ऐ अल्लाह, राज्य के स्वामी! तू जिसे चाहे राज्य दे और जिससे चाहे राज्य छीन ले, और जिसे चाहे इज़्ज़त (प्रभुत्व) प्रदान करे और जिसको चाहे अपमानित कर दे। तेरे ही हाथ में भलाई है। निस्संदेह तुझे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
ऐ रसूल! आप अपने पालनहार की प्रशंसा और उसकी महिमा करते हुए कह दें : ऐ अल्लाह! तू ही दुनिया और आख़िरत में सारे राज्य का मालिक है। तू अपनी सृष्टि में से जिसे चाहता है, उसे राज्य प्रदान करता है और जिससे चाहता है, उसे छीन लेता है। तथा उनमें से जिसे तू चाहता है, सम्मान देता है और जिसे तू चाहता है, उसे अपमानित करता है। यह सब तेरी हिकमत और न्याय से होता है। केवल तेरे ही हाथ में सारी भलाई है और तू सब कुछ करने में सक्षम हैं।
आयत 27
تُولِجُ ٱلَّيْلَ فِى ٱلنَّهَارِ وَتُولِجُ ٱلنَّهَارَ فِى ٱلَّيْلِ ۖ وَتُخْرِجُ ٱلْحَىَّ مِنَ ٱلْمَيِّتِ وَتُخْرِجُ ٱلْمَيِّتَ مِنَ ٱلْحَىِّ ۖ وَتَرْزُقُ مَن تَشَآءُ بِغَيْرِ حِسَابٍۢ
تُولِجُ
तू दाख़िल करता है
ٱلَّيْلَ
रात को
فِى
in
ٱلنَّهَارِ
दिन में
وَتُولِجُ
और तू दाख़िल करता है
ٱلنَّهَارَ
दिन को
فِى
in
ٱلَّيْلِ ۖ
रात में
وَتُخْرِجُ
और तू निकालता है
ٱلْحَىَّ
ज़िन्दा को
مِنَ
from
ٱلْمَيِّتِ
मुर्दा से
وَتُخْرِجُ
और तू निकालता है
ٱلْمَيِّتَ
मुर्दा को
مِنَ
from
ٱلْحَىِّ ۖ
ज़िन्दा से
وَتَرْزُقُ
और तू रिज़्क़ देता है
مَن
जिसे
تَشَآءُ
तू चाहता है
بِغَيْرِ
बग़ैर
حِسَابٍۢ
हिसाब के
"तू रात को दिन में पिरोता है और दिन को रात में पिरोता है। तू निर्जीव से सजीव को निकालता है और सजीव से निर्जीव को निकालता है, बेहिसाब देता है।"
तफ़्सीर:
तेरी शक्ति की निशानियों में से एक यह है कि तू रात को दिन में दाख़िल करता है, तो दिन का समय लंबा हो जाता है और तू दिन को रात में दाखिल करता है, तो रात का समय लंबा हो जाता है, तथा तू जीवित को मृत से निकालता है; जैसे मोमिन को काफ़िर से और खेती को दाने से। तथा तू मृत को जीवित से निकालता है; जैसे काफ़िर को मोमिन से और अंडे को मुर्गी से। और तू जिसे चाहे बिना हिसाब और गिनती के विस्तृत जीविका प्रदान करता है।
आयत 28
لَّا يَتَّخِذِ ٱلْمُؤْمِنُونَ ٱلْكَـٰفِرِينَ أَوْلِيَآءَ مِن دُونِ ٱلْمُؤْمِنِينَ ۖ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ فَلَيْسَ مِنَ ٱللَّهِ فِى شَىْءٍ إِلَّآ أَن تَتَّقُوا۟ مِنْهُمْ تُقَىٰةًۭ ۗ وَيُحَذِّرُكُمُ ٱللَّهُ نَفْسَهُۥ ۗ وَإِلَى ٱللَّهِ ٱلْمَصِيرُ
لَّا
(Let) not
يَتَّخِذِ
ना बनाऐं
ٱلْمُؤْمِنُونَ
मोमिन
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों को
أَوْلِيَآءَ
दोस्त
مِن
from
دُونِ
सिवाय
ٱلْمُؤْمِنِينَ ۖ
मोमिनों के
وَمَن
और जो कोई
يَفْعَلْ
करेगा
ذَٰلِكَ
ऐसा
فَلَيْسَ
तो नहीं वो
مِنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह से
فِى
in
شَىْءٍ
किसी चीज़ में
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
تَتَّقُوا۟
तुम बचो
مِنْهُمْ
उनसे
تُقَىٰةًۭ ۗ
बचना
وَيُحَذِّرُكُمُ
और डराता है तुम्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
نَفْسَهُۥ ۗ
अपनी ज़ात से
وَإِلَى
and to
ٱللَّهِ
और तरफ़ अल्लाह ही के
ٱلْمَصِيرُ
पलटना है
ईमानवालों को चाहिए कि वे ईमानवालों से हटकर इनकारवालों को अपना मित्र (राज़दार) न बनाएँ, और जो ऐसा करेगा, उसका अल्लाह से कोई सम्बन्ध नहीं, क्योंकि उससे सम्बद्ध यही बात है कि तुम उनसे बचो, जिस प्रकार वे तुमसे बचते है। और अल्लाह तुम्हें अपने आपसे डराता है, और अल्लाह ही की ओर लौटना है
तफ़्सीर:
ऐ ईमान वालो! तुम काफ़िरों को मित्र (सहयोगी) न बनाओ कि मोमिनों को छोड़कर उनसे प्रेम करो और उनका समर्थन करो। और जो ऐसा करेगा, वह अल्लाह से बरी हो गया और अल्लाह उससे बरी हो गया। परंतु अगर तुम उनके प्रभुत्व में हो और तुम्हें उनसे अपने आपपर डर महसूस हो, तो ऐसी परिस्थिति में उनके प्रति (दिल में) शत्रुता रखते हुए बातचीत में कोमलता और कार्यों में दया दिखाकर, उनके कष्ट से बचाव करने में कुछ भी गलत नहीं है, तथा अल्लाह तुम्हें अपने आपसे डराता है, इसलिए उससे डरो, और अवज्ञा करके उसके क्रोध का शिकार न बनो। तथा क़ियामत के दिन सभी बंदों को अकेले अल्लाह ही की ओर लौटना है, ताकि उन्हें उनके कामों का बदला मिले।
आयत 29
قُلْ إِن تُخْفُوا۟ مَا فِى صُدُورِكُمْ أَوْ تُبْدُوهُ يَعْلَمْهُ ٱللَّهُ ۗ وَيَعْلَمُ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۗ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ
قُلْ
कह दीजिए
إِن
अगर
تُخْفُوا۟
तुम छुपाओ
مَا
जो
فِى
(is) in
صُدُورِكُمْ
तुम्हारे सीनों में है
أَوْ
या
تُبْدُوهُ
तुम ज़ाहिर करो उसे
يَعْلَمْهُ
जानता है उसे
ٱللَّهُ ۗ
अल्लाह
وَيَعْلَمُ
और वो जानता है
مَا
जो
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ ۗ
ज़मीन में है
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌۭ
बहुत क़ुदरत रखने वाला है
कह दो, "यदि तुम अपने दिलों की बात छिपाओ या उसे प्रकट करो, प्रत्येक दशा में अल्लाह उसे जान लेगा। और वह उसे भी जानता है, जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है। और अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है।"
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) आप कह दें : यदि तुम उस चीज़ को अपने सीनों में छिपाओ जिससे अल्लाह ने तुम्हें मना किया है, जैसे काफिरों से दोस्ती करना, या उसे ज़ाहिर करो, अल्लाह उसे जनता है और उसमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है। वह आकाशों और धरती की सारी चीज़ों को जानता है। और अल्लाह हर चीज़ को करने में सक्षम है, उसे कोई चीज़ विवश नहीं कर सकती।
आयत 30
يَوْمَ تَجِدُ كُلُّ نَفْسٍۢ مَّا عَمِلَتْ مِنْ خَيْرٍۢ مُّحْضَرًۭا وَمَا عَمِلَتْ مِن سُوٓءٍۢ تَوَدُّ لَوْ أَنَّ بَيْنَهَا وَبَيْنَهُۥٓ أَمَدًۢا بَعِيدًۭا ۗ وَيُحَذِّرُكُمُ ٱللَّهُ نَفْسَهُۥ ۗ وَٱللَّهُ رَءُوفٌۢ بِٱلْعِبَادِ
يَوْمَ
जिस दिन
تَجِدُ
पा लेगा
كُلُّ
हर
نَفْسٍۢ
नफ़्स
مَّا
जो
عَمِلَتْ
उसने अमल किया
مِنْ
of
خَيْرٍۢ
नेकी में से
مُّحْضَرًۭا
हाज़िर किया हुआ
وَمَا
और जो
عَمِلَتْ
उसने अमल किया
مِن
of
سُوٓءٍۢ
बुराई में से
تَوَدُّ
वो चाहेगा
لَوْ
काश
أَنَّ
बेशक
بَيْنَهَا
दर्मियान उसके
وَبَيْنَهُۥٓ
और दर्मियान उसकी (बुराई) के
أَمَدًۢا
फ़ासला होता
بَعِيدًۭا ۗ
दूर का
وَيُحَذِّرُكُمُ
और डराता है तुम्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
نَفْسَهُۥ ۗ
अपनी ज़ात से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
رَءُوفٌۢ
बहुत शफ़ीक़ है
بِٱلْعِبَادِ
बन्दों पर
जिस दिन प्रत्येक व्यक्ति अपनी की हुई भलाई और अपनी की हुई बुराई को सामने मौजूद पाएगा, वह कामना करेगा कि काश! उसके और उस दिन के बीच बहुत दूर का फ़ासला होता। और अल्लाह तुम्हें अपना भय दिलाता है, और वह अपने बन्दों के लिए अत्यन्त करुणामय है
तफ़्सीर:
क़ियामत के दिन प्रत्येक प्राणी अपने अच्छे कार्य को बिना किसी कमी के सामने हाज़िर पाएगा तथा जिसने बुरा कार्य किया होगा, वह कामना करेगा कि उसके तथा उसके बुरे कर्मों के बीच एक लंबा समय होता। लेकिन उसकी कामना कैसे पूरी हो सकती है! और अल्लाह तुम्हें अपने आपसे डराता है। अतः पाप करके अपने आपको उसके क्रोध से पीड़ित न करो। अल्लाह अपने बंदों के प्रति अत्यंत करुणामय है। इसीलिए उन्हें चेतावनी देता है और उन्हें डराता है।
आयत 31
قُلْ إِن كُنتُمْ تُحِبُّونَ ٱللَّهَ فَٱتَّبِعُونِى يُحْبِبْكُمُ ٱللَّهُ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ ۗ وَٱللَّهُ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
قُلْ
कह दीजिए
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
تُحِبُّونَ
तुम मोहब्बत करते
ٱللَّهَ
अल्लाह से
فَٱتَّبِعُونِى
तो पैरवी करो मेरी
يُحْبِبْكُمُ
मोहब्बत करेगा तुम से
ٱللَّهُ
अल्लाह
وَيَغْفِرْ
और वो बख़्श देगा
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
ذُنُوبَكُمْ ۗ
तुम्हारे गुनाहों को
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
कह दो, "यदि तुम अल्लाह से प्रेम करते हो तो मेरा अनुसरण करो, अल्लाह भी तुमसे प्रेम करेगा और तुम्हारे गुनाहों को क्षमा कर देगा। अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : यदि तुम वास्तव में अल्लाह से प्रेम करते हो, तो जो कुछ मैं लेकर आया हूँ उसका प्रोक्ष एवं प्रत्यक्ष रूप से पालन करो, तुम्हें अल्लाह का प्रेम प्राप्त होगा और वह तुम्हारे पापों को क्षमा कर देगा। और अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को बहुत क्षमा करने वाला, उनपर अत्यंत दयावान् है।
आयत 32
قُلْ أَطِيعُوا۟ ٱللَّهَ وَٱلرَّسُولَ ۖ فَإِن تَوَلَّوْا۟ فَإِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ ٱلْكَـٰفِرِينَ
قُلْ
कह दीजिए
أَطِيعُوا۟
इताअत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَٱلرَّسُولَ ۖ
और रसूल की
فَإِن
फिर अगर
تَوَلَّوْا۟
वो मुँह फेर जाऐं
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يُحِبُّ
नहीं वो मोहब्बत करता
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों से
कह दो, "अल्लाह और रसूल का आज्ञापालन करो।" फिर यदि वे मुँह मोड़े तो अल्लाह भी इनकार करनेवालों से प्रेम नहीं करता
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दें : आदेशों को क्रियान्वित करके और निषेधों से बचकर अल्लाह की आज्ञा का पालन करो और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो। यदि वे इससे मुँह फेर लें, तो निःसंदेह अल्लाह उन काफ़िरों को पसंद नहीं करता जो उसकी आज्ञा और उसके रसूल के आदेश का विरोध करने वाले हैं।
आयत 33
۞ إِنَّ ٱللَّهَ ٱصْطَفَىٰٓ ءَادَمَ وَنُوحًۭا وَءَالَ إِبْرَٰهِيمَ وَءَالَ عِمْرَٰنَ عَلَى ٱلْعَـٰلَمِينَ
۞ إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
ٱصْطَفَىٰٓ
चुन लिया
ءَادَمَ
आदम
وَنُوحًۭا
और नूह
وَءَالَ
and (the) family
إِبْرَٰهِيمَ
और आले इब्राहीम
وَءَالَ
and (the) family
عِمْرَٰنَ
और आले इमरान को
عَلَى
over
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों पर
अल्लाह ने आदम, नूह, इबराहीम की सन्तान और इमरान की सन्तान को सारे संसार की अपेक्षा प्राथमिकता देकर चुना
तफ़्सीर:
नि:संदेह अल्लाह ने आदम अलैहिस्सलाम को चुन लिया और उनके आगे अपने फरिश्तों से सजदा करवाया। और नूह अलैहिस्सलाम को चुना और उन्हें धरती वालों की ओर प्रथम रसूल बनाया। तथा इबराहीम अलैहिस्सलाम के घराने को चुना और उनके वंश में नुबुव्वत (ईश्दूतत्व) को बाक़ी रखा। और इमरान के घराने को चुना; अल्लाह ने इन सभी को चुना और उन्हें अपने समय के लोगों पर श्रेष्ठता प्रदान की।
आयत 34
ذُرِّيَّةًۢ بَعْضُهَا مِنۢ بَعْضٍۢ ۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
ذُرِّيَّةًۢ
औलाद हैं
بَعْضُهَا
बाज़ उनके
مِنۢ
from
بَعْضٍۢ ۗ
बाज़ की
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
سَمِيعٌ
ख़ूब सुनने वाला है
عَلِيمٌ
ख़ूब जानने वाला है
एक नस्त के रूप में, उसमें से एक पीढ़ी, दूसरी पीढ़ी से पैदा हुई। अल्लाह सब कुछ सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
ये पूर्वोक्त नबीगण और उनकी संतानें जो उनके मार्ग का अनुसरण करने वाली हैं, वे एक ऐसा वंश हैं जो अल्लाह की तौह़ीद (एकेश्वरवाद) और अच्छे कर्म करने में एक दूसरे से संबंधित हैं, वे एक दूसरे से अच्छे स्वभाव और गुणों के वारिस होते हैं। और अल्लाह अपने बंदों की बातें सुनने वाला, उनके कार्यों को जानने वाला है; इसीलिए वह उनमें से जिसे चाहता है, पसंद कर लेता है और जिसे चाहता है, चुन लेता है।
आयत 35
إِذْ قَالَتِ ٱمْرَأَتُ عِمْرَٰنَ رَبِّ إِنِّى نَذَرْتُ لَكَ مَا فِى بَطْنِى مُحَرَّرًۭا فَتَقَبَّلْ مِنِّىٓ ۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ
إِذْ
जब
قَالَتِ
कहने लगी
ٱمْرَأَتُ
बीवी
عِمْرَٰنَ
इमरान की
رَبِّ
ऐ मेरे रब
إِنِّى
बेशक मैं
نَذَرْتُ
नज़र किया मैंने
لَكَ
तेरे लिए
مَا
जो
فِى
(is) in
بَطْنِى
मेरे पेट में है
مُحَرَّرًۭا
आज़ाद
فَتَقَبَّلْ
पस तू क़ुबूल कर ले
مِنِّىٓ ۖ
मुझ से
إِنَّكَ
बेशक तू
أَنتَ
तू ही है
ٱلسَّمِيعُ
ख़ूब सुनने वाला है
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब जानने वाला है
याद करो जब इमरान की स्त्री ने कहा, "मेरे रब! जो बच्चा मेरे पेट में है उसे मैंने हर चीज़ से छुड़ाकर भेट स्वरूप तुझे अर्पित किया। अतः तू उसे मेरी ओर से स्वीकार कर। निस्संदेह तू सब कुछ सुनता, जानता है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) उस समय को याद करें, जब मरयम अलैहस्सलाम की माँ इमरान की पत्नी ने कहा : ऐ मेरे पालनहार! मैंने अपने लिए यह अनिवार्य कर लिया है कि मेरे पेट में जो गर्भ है, उसे विशुद्ध रूप से तेरे लिए विशिष्ट कर दूँ, जो तेरी और तेरे घर की सेवा करने के लिए हर चीज़ से आज़ाद किया हुआ हो। इसलिए उसे मुझसे स्वीकार कर ले। नि:संदेह तू ही मेरी दुआ सुनने वाला और मेरा इरादा जानने वाला है।
आयत 36
فَلَمَّا وَضَعَتْهَا قَالَتْ رَبِّ إِنِّى وَضَعْتُهَآ أُنثَىٰ وَٱللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا وَضَعَتْ وَلَيْسَ ٱلذَّكَرُ كَٱلْأُنثَىٰ ۖ وَإِنِّى سَمَّيْتُهَا مَرْيَمَ وَإِنِّىٓ أُعِيذُهَا بِكَ وَذُرِّيَّتَهَا مِنَ ٱلشَّيْطَـٰنِ ٱلرَّجِيمِ
فَلَمَّا
फिर जब
وَضَعَتْهَا
उसने जन्म दिया उसे
قَالَتْ
कहने लगी
رَبِّ
ऐ मेरे रब
إِنِّى
बेशक मैं
وَضَعْتُهَآ
जन्म दिया है मैंने इसे
أُنثَىٰ
लड़की
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِمَا
उसे जो
وَضَعَتْ
उसने जन्म दिया
وَلَيْسَ
और नहीं है
ٱلذَّكَرُ
लड़का
كَٱلْأُنثَىٰ ۖ
लड़की की तरह
وَإِنِّى
और बेशक मैं
سَمَّيْتُهَا
नाम रखा है मैंने उसका
مَرْيَمَ
मरियम
وَإِنِّىٓ
और बेशक मैं
أُعِيذُهَا
मैं पनाह में देती हूँ उसे
بِكَ
तेरी
وَذُرِّيَّتَهَا
और उसकी औलाद को
مِنَ
from
ٱلشَّيْطَـٰنِ
शैतान से
ٱلرَّجِيمِ
जो मरदूद है
फिर जब उसके यहाँ बच्ची पैदा हुई तो उसने कहा, "मेरे रब! मेरे यहाँ तो लड़की पैदा हुई है।" - अल्लाह तो जानता ही था जो कुछ उसके यहाँ पैदा हुआ था। और वह लड़का उस लडकी की तरह नहीं हो सकता - "और मैंने उसका नाम मरयम रखा है और मैं उसे और उसकी सन्तान को तिरस्कृत शैतान (के उपद्रव) से सुरक्षित रखने के लिए तेरी शरण में देती हूँ।"
तफ़्सीर:
फिर जब उनका गर्भ पूरा हो गया, तो उन्होंने उसे जन दिया जो उनके पेट में था और (वह उम्मीद कर रही थीं कि गर्भ पुरुष होगा, इसलिए) क्षमा चाहते हुए कहा : ऐ मेरे पालनहार! यह तो मैंने बच्ची जनी है! और अल्लाह ज़्यादा जानने वाला है जो उन्होंने जना, और वह लड़का जिसकी वह आशा कर रही थीं, शक्ति और संरचना में उस लड़की के समान नहीं, जो उन्हें दी गई थी। तथा मैंने उसका नाम मरयम रखा है और मैंने उसे और उसकी संतान को तेरी दया से निष्कासित शैतान से तेरे संरक्षण में दे दिया है।
आयत 37
فَتَقَبَّلَهَا رَبُّهَا بِقَبُولٍ حَسَنٍۢ وَأَنۢبَتَهَا نَبَاتًا حَسَنًۭا وَكَفَّلَهَا زَكَرِيَّا ۖ كُلَّمَا دَخَلَ عَلَيْهَا زَكَرِيَّا ٱلْمِحْرَابَ وَجَدَ عِندَهَا رِزْقًۭا ۖ قَالَ يَـٰمَرْيَمُ أَنَّىٰ لَكِ هَـٰذَا ۖ قَالَتْ هُوَ مِنْ عِندِ ٱللَّهِ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ يَرْزُقُ مَن يَشَآءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ
فَتَقَبَّلَهَا
तो क़ुबूल कर लिया उसे
رَبُّهَا
उसके रब ने
بِقَبُولٍ
क़ुबूल करना
حَسَنٍۢ
अच्छा
وَأَنۢبَتَهَا
और परवरिश की उसकी
نَبَاتًا
परवरिश
حَسَنًۭا
अच्छी
وَكَفَّلَهَا
और कफ़ील बनाया उसका
زَكَرِيَّا ۖ
ज़करिया को
كُلَّمَا
जब कभी
دَخَلَ
दाख़िल होता
عَلَيْهَا
उस पर
زَكَرِيَّا
ज़करिया
ٱلْمِحْرَابَ
मेहराब में
وَجَدَ
वो पाता
عِندَهَا
पास उसके
رِزْقًۭا ۖ
कोई रिज़्क़
قَالَ
वो कहता
يَـٰمَرْيَمُ
ऐ मरियम
أَنَّىٰ
कहाँ से है
لَكِ
तेरे लिए
هَـٰذَا ۖ
ये
قَالَتْ
वो कहती
هُوَ
वो
مِنْ
(is)
عِندِ
from
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के पास से है
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَرْزُقُ
रिज़्क़ देता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
بِغَيْرِ
बग़ैर
حِسَابٍ
हिसाब के
अतः उसके रब ने उसका अच्छी स्वीकृति के साथ स्वागत किया और उत्तम रूप में उसे परवान चढ़ाया; और ज़करिया को उसका संरक्षक बनाया। जब कभी ज़करिया उसके पास मेहराब (इबादतगाह) में जाता, तो उसके पास कुछ रोज़ी पाता। उसने कहा, "ऐ मरयम! ये चीज़े तुझे कहाँ से मिलती है?" उसने कहा, "यह अल्लाह के पास से है।" निस्संदेह अल्लाह जिसे चाहता है, बेहिसाब देता है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उनकी मन्नत को अच्छी तरह स्वीकार किया, और उन (मरयम) का अच्छी तरह पालन-पोषण किया, और अपने नेक बंदों के दिलों में उनके प्रति सहानुभूति पैदा कर दी और उनका अभिभावक ज़करिय्या अलैहिस्सलाम को बना दिया। जब भी ज़करिय्या अलैहिस्सलाम उनके पास उपासना स्थल में प्रवेश करते, उनके पास अच्छी-अच्छी खाने की चीज़ें पाते। यह देखकर ज़करिय्या अलैहिस्सलाम को आश्चर्य हुआ और मरयम को संबोधित करते हुए कहा : ऐ मरयम! तुम्हें यह जीविका कहाँ से मिली? उन्होंने उत्तर देते हुए कहा : यह जीविका अल्लाह की ओर से है। नि:संदेह अल्लाह जिसे चाहता है किसी हिसाब के बिना विस्तृत रोज़ी प्रदान करता है।
आयत 38
هُنَالِكَ دَعَا زَكَرِيَّا رَبَّهُۥ ۖ قَالَ رَبِّ هَبْ لِى مِن لَّدُنكَ ذُرِّيَّةًۭ طَيِّبَةً ۖ إِنَّكَ سَمِيعُ ٱلدُّعَآءِ
هُنَالِكَ
उसी जगह/वक़्त
دَعَا
दुआ माँगी
زَكَرِيَّا
ज़करिया ने
رَبَّهُۥ ۖ
अपने रब से
قَالَ
कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
هَبْ
अता कर
لِى
मुझे
مِن
from
لَّدُنكَ
अपने पास से
ذُرِّيَّةًۭ
औलाद
طَيِّبَةً ۖ
पाकीज़ा
إِنَّكَ
बेशक तू
سَمِيعُ
ख़ूब सुनने वाला है
ٱلدُّعَآءِ
दुआ का
वही ज़करिया ने अपने रब को पुकारा, कहा, "मेरे रब! मुझे तू अपने पास से अच्छी सन्तान (अनुयायी) प्रदान कर। तू ही प्रार्थना का सुननेवाला है।"
तफ़्सीर:
उसी समय, जब ज़करिय्या ने मरयम बिन्त इमरान के पास जीविका में अल्लाह के सामान्य नियम के विपरीत अल्लाह की जीविका देखी, तो उनके अंदर यह आशा पैदा हुई कि उनकी वृद्धावस्था और उनकी पत्नी के बाँझपन की स्थिति के बावजूद अल्लाह उन्हें संतान दे सकता है। चुनाँचे उन्होंने प्रार्थना की : ऐ मेरे पालनहार! मुझे एक अच्छी संतान प्रदान कर। निःसंदेह तू प्रार्थना करने वाले की प्रार्थना सुनने वाला और उसे क़बूल करने वाला है।
आयत 39
فَنَادَتْهُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ وَهُوَ قَآئِمٌۭ يُصَلِّى فِى ٱلْمِحْرَابِ أَنَّ ٱللَّهَ يُبَشِّرُكَ بِيَحْيَىٰ مُصَدِّقًۢا بِكَلِمَةٍۢ مِّنَ ٱللَّهِ وَسَيِّدًۭا وَحَصُورًۭا وَنَبِيًّۭا مِّنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ
فَنَادَتْهُ
पस पुकारा उसे
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्तों ने
وَهُوَ
जब कि वो
قَآئِمٌۭ
खड़ा
يُصَلِّى
नमाज़ पढ़ रहा था
فِى
in
ٱلْمِحْرَابِ
मेहराब में
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يُبَشِّرُكَ
ख़ुशख़बरी देता है तुझे
بِيَحْيَىٰ
यहया की
مُصَدِّقًۢا
तसदीक़ करने वाला है
بِكَلِمَةٍۢ
एक कलमे की
مِّنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
وَسَيِّدًۭا
और सरदार
وَحَصُورًۭا
और पाक बाज़
وَنَبِيًّۭا
और नबी होगा
مِّنَ
among
ٱلصَّـٰلِحِينَ
नेक लोगों में से
तो फ़रिश्तों ने उसे आवाज़ दी, जबकि वह मेहराब में खड़ा नमाज़ पढ़ रहा था, "अल्लाह, तुझे यह्याि की शुभ-सूचना देता है, जो अल्लाह के एक कलिमें की पुष्टि करनेवाला, सरदार, अत्यन्त संयमी और अच्छे लोगो में से एक नबी होगा।"
तफ़्सीर:
फ़रिश्तों ने उन्हें संबोधित करते हुए, जबकि वह अपने उपासना स्थल में नमाज़ पढ़ रहे थे, आवाज़ देकर कहा : अल्लाह तुम्हें एक पुत्र की शुभ सूचना देता है जो आपके हाँ पैदा होगा, जिसका नाम 'यह़या' होगा। उसकी विशेषता यह होगी कि वह 'अल्लाह के शब्द' अर्थात् मरयम के पुत्र ईसा की पुष्टि करने वाला होगा। (ईसा को 'अल्लाह का शब्द' इसलिए कहा गया क्योंकि वह एक विशेष तरीक़े से अल्लाह के एक शब्द ('कुन' यानी 'हो जा') से पैदा हुए थे) और यह लड़का ज्ञान तथा इबादत में अपने समुदाय का सरदार होगा, खुद को इच्छाओं से रोकने वाला होगा, जिनमें महिलाओं के निकट जाना भी शामिल है, अपने पालनहार की इबादत के लिए पूर्ण रूप से समर्पित होगा। तथा वह सदाचारियों में से एक नबी - भी - होगा।
आयत 40
قَالَ رَبِّ أَنَّىٰ يَكُونُ لِى غُلَـٰمٌۭ وَقَدْ بَلَغَنِىَ ٱلْكِبَرُ وَٱمْرَأَتِى عَاقِرٌۭ ۖ قَالَ كَذَٰلِكَ ٱللَّهُ يَفْعَلُ مَا يَشَآءُ
قَالَ
उसने कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
أَنَّىٰ
कैसे
يَكُونُ
होगा
لِى
मेरे लिए
غُلَـٰمٌۭ
लड़का
وَقَدْ
हालाँकि तहक़ीक़
بَلَغَنِىَ
पहुँचा मुझे
ٱلْكِبَرُ
बुढ़ापा
وَٱمْرَأَتِى
और बीवी मेरी
عَاقِرٌۭ ۖ
बाँझ है
قَالَ
उसने कहा
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
ٱللَّهُ
अल्लाह
يَفْعَلُ
करता है
مَا
जो
يَشَآءُ
वो चाहता है
उसने कहा, "मेरे रब! मेरे यहाँ लड़का कैसे पैदा होगा, जबकि मुझे बुढापा आ गया है और मेरी पत्ऩी बाँझ है?" कहा, "इसी प्रकार अल्लाह जो चाहता है, करता है।"
तफ़्सीर:
जब फरिश्तों ने ज़करिय्या को यह़्या की ख़ुशख़बरी दी, तो उन्होंने कहा : ऐ मेरे पालनहार! मेरे हाँ लड़का कैसे हो सकता है, जबकि मैं बूढ़ा हो चुका हूँ और मेरी पत्नी बाँझ है, उसके बच्चे नहीं होते?! तो अल्लाह ने उसे उत्तर देते हुए फरमाया : तुम्हारे बुढ़ापे और तुम्हारी पत्नी के बाँझपन के बावजूद, यह़या को पैदा करने का उदाहरण; अल्लाह के सामान्य नियम के विपरीत अन्य चीज़ों को पैदा करने की तरह है। क्योंकि अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है। वह अपनी हिकमत तथा ज्ञान के अनुसार जो चाहता है, करता है।
आयत 41
قَالَ رَبِّ ٱجْعَل لِّىٓ ءَايَةًۭ ۖ قَالَ ءَايَتُكَ أَلَّا تُكَلِّمَ ٱلنَّاسَ ثَلَـٰثَةَ أَيَّامٍ إِلَّا رَمْزًۭا ۗ وَٱذْكُر رَّبَّكَ كَثِيرًۭا وَسَبِّحْ بِٱلْعَشِىِّ وَٱلْإِبْكَـٰرِ
قَالَ
उसने कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
ٱجْعَل
बना
لِّىٓ
मेरे लिए
ءَايَةًۭ ۖ
कोई निशानी
قَالَ
कहा
ءَايَتُكَ
निशानी तेरी
أَلَّا
ये है कि नहीं
تُكَلِّمَ
तुम कलाम करोगे
ٱلنَّاسَ
लोगों से
ثَلَـٰثَةَ
तीन
أَيَّامٍ
दिन
إِلَّا
मगर
رَمْزًۭا ۗ
इशारे से
وَٱذْكُر
और तुम याद करो
رَّبَّكَ
अपने रब को
كَثِيرًۭا
बहुत ज़्यादा
وَسَبِّحْ
और तस्बीह करो
بِٱلْعَشِىِّ
शाम के वक़्त
وَٱلْإِبْكَـٰرِ
और सुबह के वक़्त
उसने कहा, "मेरे रब! मेरे लिए कोई आदेश निश्चित कर दे।" कहा, "तुम्हारे लिए आदेश यह है कि तुम लोगों से तीन दिन तक संकेत के सिवा कोई बातचीत न करो। अपने रब को बहुत अधिक याद करो और सायंकाल और प्रातः समय उसकी तसबीह (महिमागान) करते रहो।"
तफ़्सीर:
ज़करिय्या ने कहा : ऐ मेरे पालनहार! मेरे लिए इस बात की कोई निशानी बना दे कि मेरी पत्नी मुझसे गर्भवती है। अल्लाह ने कहा : तुमने जो निशानी माँगी है, वह यह है कि : तुम तीन दिन और तीन रात लोगों से बात नहीं कर सकते, सिवाय इशारा इत्यादि करके, जबकि तुम किसी दोष से पीड़ित नहीं होगे। अतः तुम दिन के अंत और उसकी शुरुआत में अधिक से अधिक अल्लाह को याद करो और उसकी पवित्रता का वर्णन करो।
आयत 42
وَإِذْ قَالَتِ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ يَـٰمَرْيَمُ إِنَّ ٱللَّهَ ٱصْطَفَىٰكِ وَطَهَّرَكِ وَٱصْطَفَىٰكِ عَلَىٰ نِسَآءِ ٱلْعَـٰلَمِينَ
وَإِذْ
और जब
قَالَتِ
कहा
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्तों ने
يَـٰمَرْيَمُ
ऐ मरियम
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
ٱصْطَفَىٰكِ
चुन लिया तुझे
وَطَهَّرَكِ
और पाक किया तुझे
وَٱصْطَفَىٰكِ
और चुन लिया तुझे
عَلَىٰ
over
نِسَآءِ
औरतों पर
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान की
और जब फ़रिश्तों ने कहा, "ऐ मरयम! अल्लाह ने तुझे चुन लिया और तुझे पवित्रता प्रदान की और तुझे संसार की स्त्रियों के मुक़ाबले मं चुन लिया
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) उस समय को याद करें, जब फ़रिश्तों ने मरयम अलैहस्सलाम से कहा : अल्लाह ने तुम्हें तुम्हारे प्रशंसनीय गुणों के कारण चुन लिया है, तुम्हें कमियों से शुद्ध किया है तथा तुम्हें तुम्हारे समय में सारी दुनिया की महिलाओं के ऊपर चुन लिया है।
आयत 43
يَـٰمَرْيَمُ ٱقْنُتِى لِرَبِّكِ وَٱسْجُدِى وَٱرْكَعِى مَعَ ٱلرَّٰكِعِينَ
يَـٰمَرْيَمُ
ऐ मरियम
ٱقْنُتِى
हमेशा इताअत कर
لِرَبِّكِ
अपने रब की
وَٱسْجُدِى
और सजदा कर
وَٱرْكَعِى
और रुकू कर
مَعَ
with
ٱلرَّٰكِعِينَ
साथ रुकू करने वालों के
"ऐ मरयम! पूरी निष्ठा के साथ अपने रब की आज्ञा का पालन करती रह, और सजदा कर और झुकनेवालों के साथ तू भी झूकती रह।"
तफ़्सीर:
ऐ मरयम! नमाज़ में लंबे समय तक खड़ी रहो, अपने पालनहार को सजदा करो और उसके रुकू करने वाले नेक बंदों के साथ रुकू करो।
आयत 44
ذَٰلِكَ مِنْ أَنۢبَآءِ ٱلْغَيْبِ نُوحِيهِ إِلَيْكَ ۚ وَمَا كُنتَ لَدَيْهِمْ إِذْ يُلْقُونَ أَقْلَـٰمَهُمْ أَيُّهُمْ يَكْفُلُ مَرْيَمَ وَمَا كُنتَ لَدَيْهِمْ إِذْ يَخْتَصِمُونَ
ذَٰلِكَ
ये
مِنْ
(is) from
أَنۢبَآءِ
कुछ ख़बरें हैं
ٱلْغَيْبِ
ग़ैब की
نُوحِيهِ
हम वही करते हैं उसे
إِلَيْكَ ۚ
तरफ़ आपके
وَمَا
और ना
كُنتَ
थे आप
لَدَيْهِمْ
पास उनके
إِذْ
जब
يُلْقُونَ
वो डाल रहे थे
أَقْلَـٰمَهُمْ
क़लमें अपनी
أَيُّهُمْ
कौन उनमें से
يَكْفُلُ
किफ़ालत करेगा
مَرْيَمَ
मरियम की
وَمَا
और ना
كُنتَ
थे आप
لَدَيْهِمْ
पास उनके
إِذْ
जब
يَخْتَصِمُونَ
वो झगड़ रहे थे
यह परोक्ष की सूचनाओं में से है, जिसकी वह्य हम तुम्हारी ओर कर रहे है। तुम तो उस समय उनके पास नहीं थे, जब वे अपनी क़लमों को फेंक रहे थ कि उनमें कौन मरयम का संरक्षक बने और न उनके समय थे, जब वे आपस में झगड़ रहे थे
तफ़्सीर:
ज़करिय्या और मरयम अलैहिमस्सलाम के बारे में उपर्युक्त बातें परोक्ष (ग़ैब) की खबरों में से हैं, जो हम (ऐ रसूल!) आपकी ओर वह़्य करते हैं। और आप उन विद्वानों और नेक लोगों के पास उस समय उपस्थित नहीं थे, जब उन्होंने इस बारे में झगड़ा किया था कि मरयम के पालन-पोषण का अधिक योग्य कौन है, यहाँ तक कि उन्हें क़ुर'आ-अंदाज़ी का सहारा लेना पड़ा। चुनाँचे उन्होंने अपनी क़लमों को डाला, तो ज़करिय्या अलैहिस्सलाम की क़लम जीत गई।
आयत 45
إِذْ قَالَتِ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ يَـٰمَرْيَمُ إِنَّ ٱللَّهَ يُبَشِّرُكِ بِكَلِمَةٍۢ مِّنْهُ ٱسْمُهُ ٱلْمَسِيحُ عِيسَى ٱبْنُ مَرْيَمَ وَجِيهًۭا فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ وَمِنَ ٱلْمُقَرَّبِينَ
إِذْ
जब
قَالَتِ
कहा
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्तों ने
يَـٰمَرْيَمُ
ऐ मरियम
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يُبَشِّرُكِ
ख़ुशख़बरी देता है तुझे
بِكَلِمَةٍۢ
एक कलमे की
مِّنْهُ
अपनी तरफ़ से
ٱسْمُهُ
नाम उसका होगा
ٱلْمَسِيحُ
मसीह
عِيسَى
Isa
ٱبْنُ
son
مَرْيَمَ
ईसा इब्ने मरियम
وَجِيهًۭا
बहुत मर्तबे वाला
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
وَٱلْـَٔاخِرَةِ
और आख़िरत में
وَمِنَ
and of
ٱلْمُقَرَّبِينَ
और मुक़र्रब बन्दों में से होगा
ओर याद करो जब फ़रिश्तों ने कहा, "ऐ मरयम! अल्लाह तुझे अपने एक कलिमे (बात) की शुभ-सूचना देता है, जिसका नाम मसीह, मरयम का बेटा, ईसा होगा। वह दुनिया और आख़िरत मे आबरूवाला होगा और अल्लाह के निकटवर्ती लोगों में से होगा
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) उस समय को याद करें, जब फ़रिश्तों ने कहा : ऐ मरयम! अल्लाह तुम्हें एक ऐसे लड़के की ख़ुशख़बरी देता है, जिसकी रचना बिना पिता के होगी। उसकी रचना अल्लाह के एक शब्द से होगी, इस प्रकार कि वह कहेगा : "कुन" (हो जा) तो वह अल्लाह की आज्ञा से एक पुत्र हो जाएगा। उस बच्चे का नाम : 'मसीह ईसा बिन मरयम' है। उसका दुनिया और आख़िरत में एक महान स्थान होगा और वह अल्लाह के निकटवर्तियों में से होगा।
आयत 46
وَيُكَلِّمُ ٱلنَّاسَ فِى ٱلْمَهْدِ وَكَهْلًۭا وَمِنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ
وَيُكَلِّمُ
और वो कलाम करेगा
ٱلنَّاسَ
लोगों से
فِى
in
ٱلْمَهْدِ
पँघोड़े में
وَكَهْلًۭا
और पुख़्ता उम्र में
وَمِنَ
and (he will be) of
ٱلصَّـٰلِحِينَ
और सालेह लोगों में से होगा
वह लोगों से पालने में भी बात करेगा और बड़ी आयु को पहुँचकर भी। और वह नेक व्यक्ति होगा। -
तफ़्सीर:
वह बात करने की आयु से पहले, शैशवावस्था ही में लोगों से बात करेगा और उस समय भी बात करेगा जब वह बड़ा हो जाएगा, उसकी शक्ति और उसका पुरुषत्व परिपूर्ण हो जाएगा। वह उन्हें ऐसी बातों के साथ संबोधित करेगा जिनमें उनके धार्मिक और सांसारिक मामलों की भलाई होगी। तथा वह अपने कथनों एवं कार्यों में सदाचारी लोगों में से होगा।
आयत 47
قَالَتْ رَبِّ أَنَّىٰ يَكُونُ لِى وَلَدٌۭ وَلَمْ يَمْسَسْنِى بَشَرٌۭ ۖ قَالَ كَذَٰلِكِ ٱللَّهُ يَخْلُقُ مَا يَشَآءُ ۚ إِذَا قَضَىٰٓ أَمْرًۭا فَإِنَّمَا يَقُولُ لَهُۥ كُن فَيَكُونُ
قَالَتْ
उसने कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
أَنَّىٰ
किस तरह
يَكُونُ
होगा
لِى
मेरे लिए
وَلَدٌۭ
कोई बच्चा
وَلَمْ
हालाँकि नहीं
يَمْسَسْنِى
छुआ मुझे
بَشَرٌۭ ۖ
किसी इन्सान ने
قَالَ
फ़रमाया
كَذَٰلِكِ
इसी तरह
ٱللَّهُ
अल्लाह
يَخْلُقُ
पैदा करता है
مَا
जो
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता है
إِذَا
जब
قَضَىٰٓ
वो फ़ैसला कर लेता है
أَمْرًۭا
किसी काम का
فَإِنَّمَا
तो बेशक
يَقُولُ
वो कहता है
لَهُۥ
उसे
كُن
हो जा
فَيَكُونُ
तो वो हो जाता है
वह बोली, "मेरे रब! मेरे यहाँ लड़का कहाँ से होगा, जबकि मुझे किसी आदमी ने छुआ तक नहीं?" कहा, "ऐसा ही होगा, अल्लाह जो चाहता है, पैदा करता है। जब वह किसी कार्य का निर्णय करता है तो उसको बस यही कहता है 'हो जा' तो वह हो जाता है
तफ़्सीर:
मरयम ने इस बात से आश्चर्यचकित होकर कि उनके हाँ बिना पति के एक बेटा होगा, कहा : मेरे हाँ पुत्र कैसे होगा, जबकि कोई मनुष्य वैध अथवा अवैध तरीक़े से मेरे पास नहीं आया?! फ़रिश्ते ने उनसे कहा : जिस तरह अल्लाह तुम्हारे हाँ बिना बाप के लड़का पैदा करेगा, उसी तरह वह जो चाहता है, सामान्य नियम के विपरीत पैदा करता है। इसलिए जब वह किसी काम का इरादा कर लेता है, तो उससे कहता है : "हो जा" तो वह हो जाता है। अतः उसे कोई चीज़ विवश नहीं कर सकती।
आयत 48
وَيُعَلِّمُهُ ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْحِكْمَةَ وَٱلتَّوْرَىٰةَ وَٱلْإِنجِيلَ
وَيُعَلِّمُهُ
और वो तालीम देगा उसे
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
وَٱلْحِكْمَةَ
और हिकमत
وَٱلتَّوْرَىٰةَ
और तौरात
وَٱلْإِنجِيلَ
और इन्जील की
"और उसको किताब, हिकमत, तौरात और इंजील का भी ज्ञान देगा
तफ़्सीर:
अल्लाह उन्हें लिखना तथा कथन एवं कार्य में शुद्धता सिखाएगा, तथा उन्हें वह तौरात सिखाएगा, जिसे उसने मूसा अलैहिस्सलाम पर उतारा, और उन्हें उस इंजील की शिक्षा देगा, जो वह उनपर अवतरित करेगा।
आयत 49
وَرَسُولًا إِلَىٰ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ أَنِّى قَدْ جِئْتُكُم بِـَٔايَةٍۢ مِّن رَّبِّكُمْ ۖ أَنِّىٓ أَخْلُقُ لَكُم مِّنَ ٱلطِّينِ كَهَيْـَٔةِ ٱلطَّيْرِ فَأَنفُخُ فِيهِ فَيَكُونُ طَيْرًۢا بِإِذْنِ ٱللَّهِ ۖ وَأُبْرِئُ ٱلْأَكْمَهَ وَٱلْأَبْرَصَ وَأُحْىِ ٱلْمَوْتَىٰ بِإِذْنِ ٱللَّهِ ۖ وَأُنَبِّئُكُم بِمَا تَأْكُلُونَ وَمَا تَدَّخِرُونَ فِى بُيُوتِكُمْ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ لَّكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
وَرَسُولًا
और रसूल होगा
إِلَىٰ
तरफ़
بَنِىٓ
(the) Children
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल के
أَنِّى
बेशक मैं
قَدْ
तहक़ीक़
جِئْتُكُم
मैं लाया हूँ तुम्हारे पास
بِـَٔايَةٍۢ
एक निशानी
مِّن
from
رَّبِّكُمْ ۖ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
أَنِّىٓ
बेशक मैं
أَخْلُقُ
मैं बना देता हूँ
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنَ
from
ٱلطِّينِ
मिट्टी से
كَهَيْـَٔةِ
मानिन्द शक्ल
ٱلطَّيْرِ
परिन्दे की
فَأَنفُخُ
फिर मैं फूँख मारता हूँ
فِيهِ
उस में
فَيَكُونُ
तो वो हो जाता है
طَيْرًۢا
एक परिन्दा
بِإِذْنِ
by (the) permission
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के इज़्न से
وَأُبْرِئُ
और मैं अच्छा कर देता हूँ
ٱلْأَكْمَهَ
पैदाइशी अन्धे को
وَٱلْأَبْرَصَ
और बरस वाले को
وَأُحْىِ
और मैं ज़िन्दा कर देता हूँ
ٱلْمَوْتَىٰ
मुर्दों को
بِإِذْنِ
by (the) permission
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के इज़्न से
وَأُنَبِّئُكُم
और मैं ख़बर देता हूँ तुम्हें
بِمَا
उसकी जो
تَأْكُلُونَ
तुम खाते हो
وَمَا
और जो
تَدَّخِرُونَ
तुम ज़ख़ीरा करते हो
فِى
in
بُيُوتِكُمْ ۚ
अपने घरों में
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَةًۭ
अलबत्ता एक निशानी है
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
إِن
अगर
كُنتُم
हो तुम
مُّؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
"और उसे इसराईल की संतान की ओर रसूल बनाकर भेजेगा। (वह कहेगा) कि मैं तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से एक निशाली लेकर आया हूँ कि मैं तुम्हारे लिए मिट्टी से पक्षी के रूप जैसी आकृति बनाता हूँ, फिर उसमें फूँक मारता हूँ, तो वह अल्लाह के आदेश से उड़ने लगती है। और मैं अल्लाह के आदेश से अंधे और कोढ़ी को अच्छा कर देता हूँ और मुर्दे को जीवित कर देता हूँ। और मैं तुम्हें बता देता हूँ जो कुछ तुम खाते हो और जो कुछ अपने घरों में इकट्ठा करके रखते हो। निस्संदेह इसमें तुम्हारे लिए एक निशानी है, यदि तुम माननेवाले हो
तफ़्सीर:
और (इसी प्रकार) अल्लाह उन्हें बनी इसराईल की ओर रसूल बनाकर भेजेगा। वह उनसे कहेंगे : मैं तुम्हारी ओर अल्लाह का भेजा हुआ रसूल हूँ। मैं तुम्हारे पास ऐसी निशानी लाया हूँ, जो मेरी नुबुव्वत की सत्यता को प्रमाणित करने वाली है। जो यह है कि : मैं तुम्हारे लिए मिट्टी से पक्षी के रूप का एक आकार बनाता हूँ, फिर उसमें फूँक मारता हूँ, तो वह अल्लाह की अनुमति से जीवित पक्षी बन जाता है। और मैं चंगा कर देता हूँ उस व्यक्ति को जो जन्मजात अंधा है, तो वह देखने लगता है और उस व्यक्ति को जो कोढ़ से पीड़ित है, तो उसकी त्वचा ठीक हो जाती है। और मैं मुर्दों को ज़िंदा कर देता हूँ। और यह सब अल्लाह की अनुमति से होता है। और मैं तुम्हें उसके बारे में भी बता देता हूँ, जो तुम अपने घरों में खाते हो और जो संग्रह करते और छिपाकर रखते हो। निःसंदेह इन महान चीज़ों में जिनका मैंने तुमसे उल्लेख किया है, जो मनुष्य नहीं कर सकते; निश्चय इस बात की स्पष्ट निशानी है कि मैं तुम्हारी ओर अल्लाह का भेजा हुआ रसूल हूँ, यदि तुम ईमान लाना चाहते हो और और प्रमाणों को सच्चा मानते हो।
आयत 50
وَمُصَدِّقًۭا لِّمَا بَيْنَ يَدَىَّ مِنَ ٱلتَّوْرَىٰةِ وَلِأُحِلَّ لَكُم بَعْضَ ٱلَّذِى حُرِّمَ عَلَيْكُمْ ۚ وَجِئْتُكُم بِـَٔايَةٍۢ مِّن رَّبِّكُمْ فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
وَمُصَدِّقًۭا
और तसदीक़ करने वाला हूँ
لِّمَا
उसकी जो
بَيْنَ
(was)
يَدَىَّ
मेरे सामने है
مِنَ
of
ٱلتَّوْرَىٰةِ
तौरात में से
وَلِأُحِلَّ
और ताकि मैं हलाल कर दूँ
لَكُم
तुम्हारे लिए
بَعْضَ
बाज़
ٱلَّذِى
वो चीज़ जो
حُرِّمَ
हराम की गई
عَلَيْكُمْ ۚ
तुम पर
وَجِئْتُكُم
और लाया हूँ मैं तुम्हारे पास
بِـَٔايَةٍۢ
एक निशानी
مِّن
from
رَّبِّكُمْ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
فَٱتَّقُوا۟
पस डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَأَطِيعُونِ
और इताअत करो मेरी
"और मैं तौरात की, जो मेरे आगे है, पुष्टि करता हूँ और इसलिए आया हूँ कि तुम्हारे लिए कुछ उन चीज़ों को हलाल कर दूँ जो तुम्हारे लिए हराम थी। और मैं तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से एक निशानी लेकर आया हूँ। अतः अल्लाह का डर रखो और मेरी आज्ञा का पालन करो
तफ़्सीर:
इसी प्रकार, मैं तुम्हारे पास अपने से पूर्व उतरी हुई पुस्तक तौरात की पुष्टि करने वाला बनकर आया हूँ। तथा मैं इसलिए आया हूँ, ताकि तुम्हारे लिए सुगम और आसान बनाने के लिए तुम्हारे लिए कुछ ऐसी चीज़ों को वैध कर दूँ, जो पहले तुमपर हराम की गई थीं। तथा जो कुछ मैंने तुमसे कहा है, उसकी सत्यता पर मैं तुम्हारे पास एक स्पष्ट तर्क लेकर आया हूँ। अतः अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, उससे डरो और मैं जिस बात की ओर तुम्हें बुलाता हूँ, उसमें मेरी आज्ञा का पालन करो।
आयत 51
إِنَّ ٱللَّهَ رَبِّى وَرَبُّكُمْ فَٱعْبُدُوهُ ۗ هَـٰذَا صِرَٰطٌۭ مُّسْتَقِيمٌۭ
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
رَبِّى
रब है मेरा
وَرَبُّكُمْ
और रब तुम्हारा
فَٱعْبُدُوهُ ۗ
पस इबादत करो उसकी
هَـٰذَا
ये
صِرَٰطٌۭ
रास्ता है
مُّسْتَقِيمٌۭ
सीधा
"निस्संदेह अल्लाह मेरी भी रब है और तुम्हारा रब भी, अतः तुम उसी की बन्दगी करो। यही सीधा मार्ग है।"
तफ़्सीर:
ऐसा इसलिए है क्योंकि अल्लाह ही मेरा पालनहार और तुम्हारा पालनहार है। चुनाँचे वही अकेली आज्ञा मानने और डरने के योग्य है। अतः तुम अकेले उसी की इबादत करो। यह जो मैंने तुम्हें अल्लाह की इबादत करने और उससे डरने का आदेश दिया है, यही सीधा मार्ग है, जिसमें कोई टेढ़ नहीं।
आयत 52
۞ فَلَمَّآ أَحَسَّ عِيسَىٰ مِنْهُمُ ٱلْكُفْرَ قَالَ مَنْ أَنصَارِىٓ إِلَى ٱللَّهِ ۖ قَالَ ٱلْحَوَارِيُّونَ نَحْنُ أَنصَارُ ٱللَّهِ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَٱشْهَدْ بِأَنَّا مُسْلِمُونَ
۞ فَلَمَّآ
फिर जब
أَحَسَّ
महसूस किया
عِيسَىٰ
ईसा ने
مِنْهُمُ
उनसे
ٱلْكُفْرَ
कुफ़्र को
قَالَ
कहा
مَنْ
कौन हैं
أَنصَارِىٓ
मददगार मेरे
إِلَى
to
ٱللَّهِ ۖ
तरफ़ अल्लाह के
قَالَ
कहा
ٱلْحَوَارِيُّونَ
हवारियों ने
نَحْنُ
हम हैं
أَنصَارُ
मददगार
ٱللَّهِ
अल्लाह के
ءَامَنَّا
हम ईमान लाए
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَٱشْهَدْ
और गवाह रह
بِأَنَّا
बेशक हम
مُسْلِمُونَ
मुसलमान हैं
फिर जब ईसा को उनके अविश्वास और इनकार का आभास हुआ तो उसने कहा, "कौन अल्लाह की ओर बढ़ने में मेरा सहायक होता है?" हवारियों (साथियों) ने कहा, "हम अल्लाह के सहायक हैं। हम अल्लाह पर ईमान लाए और गवाह रहिए कि हम मुस्लिम है
तफ़्सीर:
जब ईसा अलैहिस्सलाम को उनके कुफ़्र पर आग्रह का आभास हुआ, तो उन्होंने बनी इसराईल को संबोधित करते हुए कहा : अल्लाह की ओर बुलाने में मेरी सहायता कौन करेगा? उनके अनुयायियों में से चुनिंदा लोगों ने कहा : हम अल्लाह के धर्म के समर्थक हैं। हम अल्लाह पर ईमान लाए और हमने आपका अनुसरण किया। और - ऐ ईसा! - आप गवाह रहें कि हम अल्लाह को एकमात्र पूज्य मानते हुए और उसकी आज्ञाकारिता के साथ उसके अधीन हैं।
आयत 53
رَبَّنَآ ءَامَنَّا بِمَآ أَنزَلْتَ وَٱتَّبَعْنَا ٱلرَّسُولَ فَٱكْتُبْنَا مَعَ ٱلشَّـٰهِدِينَ
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
بِمَآ
उस पर जो
أَنزَلْتَ
नाज़िल किया तूने
وَٱتَّبَعْنَا
और पैरवी की हमने
ٱلرَّسُولَ
रसूल की
فَٱكْتُبْنَا
पस लिख ले हमें
مَعَ
साथ
ٱلشَّـٰهِدِينَ
गवाहों के
"हमारे रब! तूने जो कुछ उतारा है, हम उसपर ईमान लाए और इस रसूल का अनुसरण स्वीकार किया। अतः तू हमें गवाही देनेवालों में लिख ले।"
तफ़्सीर:
ह़वारियों ने यह भी कहा : ऐ हमारे पालनहार! हम उस इंजील पर ईमान लाए जो तूने उतारा तथा हमने ईसा अलैहिस्सलाम का अनुसरण किया। अतः तू हमें उन सत्य की गवाही देने वालों में शामिल कर ले, जो तुझपर और तेरे रसूलों पर ईमान लाए।
आयत 54
وَمَكَرُوا۟ وَمَكَرَ ٱللَّهُ ۖ وَٱللَّهُ خَيْرُ ٱلْمَـٰكِرِينَ
وَمَكَرُوا۟
और उन्होंने चाल चली
وَمَكَرَ
और ख़ुफ़िया तदबीर की
ٱللَّهُ ۖ
अल्लाह ने
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
خَيْرُ
बेहतरीन है
ٱلْمَـٰكِرِينَ
ख़ुफ़िया तदबीर करने वालों में
और वे चाल चले तो अल्लाह ने भी उसका तोड़ किया और अल्लाह उत्तम तोड़ करनेवाला है
तफ़्सीर:
बनी इसराईल के काफिरों ने साजिश रची और उन्होंने ईसा अलैहिस्सलाम की हत्या करने का प्रयास किया। तो अल्लाह ने उनके खिलाफ गुप्त योजना बनाई। इसलिए उसने उन्हें उनकी गुमराही में छोड़ दिया और एक अन्य व्यक्ति को ईसा अलैहिस्सलाम से मिलता जुलता रूप-रंग प्रदान कर दिया। और अल्लाह योजना बनाने वालों में सबसे अच्छा है। क्योंकि अल्लाह अपने दुश्मनों के विरूद्ध जो योजना बनाता है, उससे बढ़कर किसी की योजना नहीं हो सकती।
आयत 55
إِذْ قَالَ ٱللَّهُ يَـٰعِيسَىٰٓ إِنِّى مُتَوَفِّيكَ وَرَافِعُكَ إِلَىَّ وَمُطَهِّرُكَ مِنَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَجَاعِلُ ٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُوكَ فَوْقَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ إِلَىٰ يَوْمِ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۖ ثُمَّ إِلَىَّ مَرْجِعُكُمْ فَأَحْكُمُ بَيْنَكُمْ فِيمَا كُنتُمْ فِيهِ تَخْتَلِفُونَ
إِذْ
जब
قَالَ
फ़रमाया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
يَـٰعِيسَىٰٓ
ऐ ईसा
إِنِّى
बेशक मैं
مُتَوَفِّيكَ
पूरा पूरा लेने वाला हूँ तुझे
وَرَافِعُكَ
और उठा लेने वाला हूँ तुझे
إِلَىَّ
तरफ़ अपने
وَمُطَهِّرُكَ
और पाक करने वाला हूँ तुझे
مِنَ
from
ٱلَّذِينَ
उनसे जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
وَجَاعِلُ
और बनाने वाला हूँ
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
ٱتَّبَعُوكَ
पैरवी की तेरी
فَوْقَ
ऊपर
ٱلَّذِينَ
उनके जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
إِلَىٰ
on
يَوْمِ
(the) Day
ٱلْقِيَـٰمَةِ ۖ
क़यामत के दिन तक
ثُمَّ
फिर
إِلَىَّ
तरफ़ मेरे ही
مَرْجِعُكُمْ
लौटना है तुम्हारा
فَأَحْكُمُ
तो मैं फ़ैसला करुँगा
بَيْنَكُمْ
दर्मियान तुम्हारे
فِيمَا
उसमें जो
كُنتُمْ
थे तुम
فِيهِ
जिसमें
تَخْتَلِفُونَ
तुम इख़्तिलाफ़ करते
जब अल्लाह ने कहा, "ऐ ईसा! मैं तुझे अपने क़ब्जे में ले लूँगा और तुझे अपनी ओर उठा लूँगा और अविश्वासियों (की कुचेष्टाओं) से तुझे पाक कर दूँगा और तेरे अनुयायियों को क़ियामत के दिन तक लोगों के ऊपर रखूँगा, जिन्होंने इनकार किया। फिर मेरी ओर तुम्हें लौटना है। फिर मैं तुम्हारे बीच उन चीज़ों का फ़ैसला कर दूँगा, जिनके विषय में तुम विभेद करते रहे हो
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उनके विरुद्ध उस समय भी योजना बनाई, जब उसने ईसा अलैहिस्सलाम को संबोधित करते हुए कहा : ऐ ईसा! मैं तुम्हें मृत्यु के बिना क़ब्ज़ कर लूँगा, और तुम्हारे शरीर और आत्मा को अपने पास उठा लूँगा, तथा तुम्हें उन लोगों की गंदगी से शुद्ध और उनसे दूर कर दूँगा, जिन्होंने तुम्हारे साथ कुफ़्र किया और उन लोगों को जिन्होंने सच्चे धर्म पर तुम्हारा अनुसरण किया - जिसमें मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर ईमान लाना भी शामिल है - प्रमाण और प्रभुत्व एवं गौरव के साथ क़ियामत के दिन तक उन लोगों के ऊपर कर दूँगा, जिन्होंने तुम्हारा इनकार किया। फिर तुम्हें क़ियामत के दिन मेरी ही ओर लौटकर आना है। तो मैं तुम्हारे बीच सच्चाई के साथ उस चीज़ के बारे में फैसला करूँगा, जिसमें तुम मतभेद किया करते थे।
आयत 56
فَأَمَّا ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ فَأُعَذِّبُهُمْ عَذَابًۭا شَدِيدًۭا فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ وَمَا لَهُم مِّن نَّـٰصِرِينَ
فَأَمَّا
तो रहे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
فَأُعَذِّبُهُمْ
तो मैं अज़ाब दूँगा उन्हें
عَذَابًۭا
अज़ाब
شَدِيدًۭا
सख़्त
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
وَٱلْـَٔاخِرَةِ
और आख़िरत में
وَمَا
और नहीं होगा
لَهُم
उनके लिए
مِّن
any
نَّـٰصِرِينَ
मददगारों में से कोई
"तो जिन लोगों ने इनकार की नीति अपनाई, उन्हें दुनिया और आख़िरत में कड़ी यातना दूँगा। उनका कोई सहायक न होगा।"
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने आपका और उस सत्य का इनकार किया जो आप उनके पास लेकर आए, तो मैं उन्हें दुनिया में क़त्ल, क़ैद तथा अपमान आदि के द्वारा, तथा आख़िरत में आग की यातना के द्वारा कठोर दंड दूँगा। और उनके पास कोई सहायक न होंगे, जो उनसे यातना दूर कर सकें।
आयत 57
وَأَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ فَيُوَفِّيهِمْ أُجُورَهُمْ ۗ وَٱللَّهُ لَا يُحِبُّ ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَأَمَّا
और रहे
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
فَيُوَفِّيهِمْ
तो वो पूरे पूरे देगा उन्हें
أُجُورَهُمْ ۗ
अजर उनके
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
لَا
(does) not
يُحِبُّ
नहीं वो मोहब्बत रखता
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों से
रहे वे लोग जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उन्हें वह उनका पूरा-पूरा बदला देगा। अल्लाह अत्याचारियों से प्रेम नहीं करता
तफ़्सीर:
और जो लोग आपपर और उस सत्य पर ईमान लाए जो आप उनके पास लेकर आए, और नमाज़, ज़कात, रोज़ा और रिश्तेदारों के साथ सद्व्यवहार इत्यादि जैसे अच्छे कर्म किए; अल्लाह उन्हें उनके कर्मों का पूरा बदला देगा, उसमें कुछ कमी नहीं करेगा। यह बात मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ईश्दूतत्व से पहले मसीह के अनुयायियों के बारे में है, जिनकी स्वयं मसीह ने शुभ सूचना दी थी। और अल्लाह अत्याचारियों से प्रेम नहीं करता। और सबसे बड़ा अत्याचार अल्लाह के साथ किसी को साझी बनाना तथा उसके रसूलों को झुठलाना है।
आयत 58
ذَٰلِكَ نَتْلُوهُ عَلَيْكَ مِنَ ٱلْـَٔايَـٰتِ وَٱلذِّكْرِ ٱلْحَكِيمِ
ذَٰلِكَ
ये
نَتْلُوهُ
हम तिलावत कर रहे हैं उसे
عَلَيْكَ
आप पर
مِنَ
of
ٱلْـَٔايَـٰتِ
आयात में से
وَٱلذِّكْرِ
और ज़िक्र
ٱلْحَكِيمِ
बहुत हिकमत वाले से
ये आयतें है और हिकमत (तत्वज्ञान) से परिपूर्ण अनुस्मारक, जो हम तुम्हें सुना रहे हैं
तफ़्सीर:
यह जो हम आपको ईसा अलैहिस्सलाम का समाचार पढ़कर सुना रहे हैं, इस बात को प्रमाणित करने वाली स्पष्ट निशानियों में से है कि आपकी ओर जो कुछ उतारा गया है वह सत्य है। तथा वह डरने वालों के लिए दृढ़ उपदेश है, जिसमें बातिल (असत्य) का समावेश नहीं हो सकता।
आयत 59
إِنَّ مَثَلَ عِيسَىٰ عِندَ ٱللَّهِ كَمَثَلِ ءَادَمَ ۖ خَلَقَهُۥ مِن تُرَابٍۢ ثُمَّ قَالَ لَهُۥ كُن فَيَكُونُ
إِنَّ
बेशक
مَثَلَ
मिसाल
عِيسَىٰ
ईसा की
عِندَ
near
ٱللَّهِ
अल्लाह के नज़दीक
كَمَثَلِ
मानिन्द मिसाल
ءَادَمَ ۖ
आदम के है
خَلَقَهُۥ
उसने पैदा किया उसे
مِن
from
تُرَابٍۢ
मिट्टी से
ثُمَّ
फिर
قَالَ
फ़रमाया
لَهُۥ
उसे
كُن
हो जा
فَيَكُونُ
तो वो हो गया
निस्संदेह अल्लाह की दृष्टि में ईसा की मिसाल आदम जैसी है कि उसे मिट्टी से बनाया, फिर उससे कहा, "हो जा", तो वह हो जाता है
तफ़्सीर:
निःसंदहे अल्लाह के निकट ईसा अलैहिस्सलाम को पैदा करने का उदाहरण, आदम अलैहिस्सलाम को, बिना पिता और माता के, थोड़ी-सी मिट्टी से पैदा करन की तरह है। केवल अल्लाह ने उससे कहा : "मानव बन जा" तो वह वैसा ही हो गया, जैसा अल्लाह ने चाहा था। फिर ये लोग कैसे दावा करते हैं कि ईसा अलैहिस्सलाम पूज्य हैं, यह तर्क देते हुए कि वह बिना पिता के पैदा किए गए थे? हालाँकि वे स्वीकार करते हैं कि आदम अलैहिस्सलाम मानव हैं, जबकि वह बिना पिता और माता के पैदा किए गए थे?!
आयत 60
ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّكَ فَلَا تَكُن مِّنَ ٱلْمُمْتَرِينَ
ٱلْحَقُّ
हक़
مِن
(is) from
رَّبِّكَ
आपके रब की तरफ़ से है
فَلَا
तो ना
تَكُن
आप हों
مِّنَ
among
ٱلْمُمْتَرِينَ
शक करने वालों में से
यह हक़ तुम्हारे रब की ओर से हैं, तो तुम संदेह में न पड़ना
तफ़्सीर:
ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में जिस सच्चाई में कोई संदेह नहीं, वह वही है जो आपपर आपके पालनहार की ओर से उतरी है। अतः आप संदेह एवं संकोच करने वालों में से न बनें, बल्कि आपको उस सत्य पर दृढ़ रहना चाहिए जिस पर आप क़ायम हैं।
आयत 61
فَمَنْ حَآجَّكَ فِيهِ مِنۢ بَعْدِ مَا جَآءَكَ مِنَ ٱلْعِلْمِ فَقُلْ تَعَالَوْا۟ نَدْعُ أَبْنَآءَنَا وَأَبْنَآءَكُمْ وَنِسَآءَنَا وَنِسَآءَكُمْ وَأَنفُسَنَا وَأَنفُسَكُمْ ثُمَّ نَبْتَهِلْ فَنَجْعَل لَّعْنَتَ ٱللَّهِ عَلَى ٱلْكَـٰذِبِينَ
فَمَنْ
तो जो कोई
حَآجَّكَ
झगड़ा करे आपसे
فِيهِ
उसमें
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद उसके
مَا
जो
جَآءَكَ
आ गया आपके पास
مِنَ
of
ٱلْعِلْمِ
इल्म में से
فَقُلْ
तो कह दीजिए
تَعَالَوْا۟
आओ
نَدْعُ
हम बुलाते हैं
أَبْنَآءَنَا
अपने बेटों को
وَأَبْنَآءَكُمْ
और तुम्हारे बेटों को
وَنِسَآءَنَا
और अपनी औरतों को
وَنِسَآءَكُمْ
और तुम्हारी औरतों को
وَأَنفُسَنَا
और हम ख़ुद
وَأَنفُسَكُمْ
और तुम ख़ुद
ثُمَّ
फिर
نَبْتَهِلْ
हम गिड़-गिड़ा कर दुआ करें
فَنَجْعَل
फिर हम करें
لَّعْنَتَ
लानत
ٱللَّهِ
अल्लाह की
عَلَى
on
ٱلْكَـٰذِبِينَ
झूठों पर
अब इसके पश्चात कि तुम्हारे पास ज्ञान आ चुका है, कोई तुमसे इस विषय में कुतर्क करे तो कह दो, "आओ, हम अपने बेटों को बुला लें और तुम भी अपने बेटों को बुला लो, और हम अपनी स्त्रियों को बुला लें और तुम भी अपनी स्त्रियों को बुला लो, और हम अपने को और तुम अपने को ले आओ, फिर मिलकर प्रार्थना करें और झूठों पर अल्लाह की लानत भेजे।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आपसे नजरान के ईसाइयों में से जो भी ईसा अलैहिस्सलाम के मामले में बहस करे, यह दावा करते हुए कि वह अल्लाह के बंदे नहीं हैं, इसके पश्चात कि उनके बारे में आपके पास सही ज्ञान आ चुका; तो उनसे कह दें : आओ, हम अपने पुत्रों और तुम्हारे पुत्रों, अपनी स्त्रियों और तुम्हारी स्त्रियों को बुला लें और अपने आपको और तुम्हें भी, और हम सब इकट्ठे हो जाएँ, और फिर अल्लाह से गिड़गिड़ाकर विनती करें कि वह हमारे और तुम्हारे बीच झूठ बोलने वालों पर अपना श्राप (ला'नत) भेजे।
आयत 62
إِنَّ هَـٰذَا لَهُوَ ٱلْقَصَصُ ٱلْحَقُّ ۚ وَمَا مِنْ إِلَـٰهٍ إِلَّا ٱللَّهُ ۚ وَإِنَّ ٱللَّهَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
إِنَّ
बेशक
هَـٰذَا
ये
لَهُوَ
अलबत्ता वो
ٱلْقَصَصُ
क़िस्से हैं
ٱلْحَقُّ ۚ
जो सच्चे हैं
وَمَا
और नहीं
مِنْ
(of)
إِلَـٰهٍ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
सिवाय
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह के
وَإِنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَهُوَ
अलबत्ता वो
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त है
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिकमत वाला है
निस्संदेह यही सच्चा बयान है और अल्लाह के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं। और अल्लाह ही प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
यह जो हमने आपको ईसा अलैहिस्सलाम के विषय में बताया, निश्चय वही सच्ची ख़बर है जिसमें कोई झूठ या संदेह नहीं है। तथा अकेले अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। निःसंदेह अल्लाह अपने राज्य में शक्तिशाली, तथा अपने प्रबंधन, आदेश और रचना में हिकमत वाला है।
आयत 63
فَإِن تَوَلَّوْا۟ فَإِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌۢ بِٱلْمُفْسِدِينَ
فَإِن
फिर अगर
تَوَلَّوْا۟
वो मुँह फेर जाऐं
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِٱلْمُفْسِدِينَ
फ़साद करने वालों को
फिर यदि वे लोग मुँह मोड़े तो अल्लाह फ़सादियों को भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
यदि वे उससे फिर जाएँ, जो आप लेकर आए हैं और वे आपके पीछे न चलें; तो यह उनकी भ्रष्टता (बिगाड़) के कारण है, और अल्लाह धरती पर बिगाड़ करने वालों को खूब जानने वाला है और वह उन्हें उसका बदला देगा।
आयत 64
قُلْ يَـٰٓأَهْلَ ٱلْكِتَـٰبِ تَعَالَوْا۟ إِلَىٰ كَلِمَةٍۢ سَوَآءٍۭ بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمْ أَلَّا نَعْبُدَ إِلَّا ٱللَّهَ وَلَا نُشْرِكَ بِهِۦ شَيْـًۭٔا وَلَا يَتَّخِذَ بَعْضُنَا بَعْضًا أَرْبَابًۭا مِّن دُونِ ٱللَّهِ ۚ فَإِن تَوَلَّوْا۟ فَقُولُوا۟ ٱشْهَدُوا۟ بِأَنَّا مُسْلِمُونَ
قُلْ
कह दीजिए
يَـٰٓأَهْلَ
O People
ٱلْكِتَـٰبِ
ऐ अहले किताब
تَعَالَوْا۟
आओ
إِلَىٰ
to
كَلِمَةٍۢ
तरफ़ एक कलमा के
سَوَآءٍۭ
जो बराबर है
بَيْنَنَا
हमारे दर्मियान
وَبَيْنَكُمْ
और तुम्हारे दर्मियान
أَلَّا
कि ना
نَعْبُدَ
हम इबादत करें
إِلَّا
मगर
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَلَا
और ना
نُشْرِكَ
हम शरीक करें
بِهِۦ
साथ उसके
شَيْـًۭٔا
किसी चीज़ को
وَلَا
और ना
يَتَّخِذَ
बनाए
بَعْضُنَا
बाज़ तुम्हारा
بَعْضًا
बाज़ को
أَرْبَابًۭا
रब (मुख़्तलिफ़)
مِّن
from
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के
فَإِن
फिर अगर
تَوَلَّوْا۟
वो मुँह फेर जाऐं
فَقُولُوا۟
तो कह दो
ٱشْهَدُوا۟
गवाह रहो
بِأَنَّا
कि बेशक हम तो
مُسْلِمُونَ
फ़रमाबरदार हैं
कहो, "ऐ किताबवालो! आओ एक ऐसी बात की ओर जिसे हमारे और तुम्हारे बीच समान मान्यता प्राप्त है; यह कि हम अल्लाह के अतिरिक्त किसी की बन्दगी न करें और न उसके साथ किसी चीज़ को साझी ठहराएँ और न परस्पर हममें से कोई एक-दूसरे को अल्लाह से हटकर रब बनाए।" फिर यदि वे मुँह मोड़े तो कह दो, "गवाह रहो, हम तो मुस्लिम (आज्ञाकारी) है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दें : ऐ किताब वाले यहूदियो और ईसाइयो! आओ, हम न्याय की एक ऐसी बात पर एकजुट हों, जिसमें हम सभी समान हैं : कि हम अकेले अल्लाह की इबादत करें। इसलिए हम उसके साथ उसके अलावा किसी और की इबादत न करें, चाहे उसका पद कितना ही बड़ा और उसका स्थान कितना ही ऊँचा हो। और हम एक दूसरे को रब न बनाएँ, जिनकी अल्लाह के सिवा पूजा की जाए और उनका आज्ञापालन किया जाए। यदि वे सत्य और न्याय की उस बात से मुँह मोड़ लें, जिसकी ओर आप उन्हें बुलाते हैं, तो (ऐ ईमान वालो!) तुम उनसे कह दो : तुम लोग गवाह रहो की हम अल्लाह के प्रति समर्पित और उसकी आज्ञा का पालन करने वाले हैं।
आयत 65
يَـٰٓأَهْلَ ٱلْكِتَـٰبِ لِمَ تُحَآجُّونَ فِىٓ إِبْرَٰهِيمَ وَمَآ أُنزِلَتِ ٱلتَّوْرَىٰةُ وَٱلْإِنجِيلُ إِلَّا مِنۢ بَعْدِهِۦٓ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
يَـٰٓأَهْلَ
O People
ٱلْكِتَـٰبِ
ऐ अहले किताब
لِمَ
क्यों
تُحَآجُّونَ
तुम झगड़ा करते हो
فِىٓ
concerning
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम के बारे में
وَمَآ
हालाँकि नहीं
أُنزِلَتِ
उतारी गई
ٱلتَّوْرَىٰةُ
तौरात
وَٱلْإِنجِيلُ
और इन्जील
إِلَّا
मगर
مِنۢ
from
بَعْدِهِۦٓ ۚ
बाद उसके
أَفَلَا
क्या भला नहीं
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल रखते
"ऐ किताबवालो! तुम इबराहीम के विषय में हमसे क्यों झगड़ते हो? जबकि तौरात और इंजील तो उसके पश्चात उतारी गई है, तो क्या तुम समझ से काम नहीं लेते?
तफ़्सीर:
ऐ किताब वालो! तुम लोग इबराहीम अलैहिस्सलाम के धर्म के विषय में बहस क्यों करते हो? चुनाँचे यहूदी दावा करता है कि इबराहीम अलैहिस्सलाम यहूदी थे और ईसाई दावा करता है कि वह ईसाई थे। हालाँकि तुम जानते हो कि यहूदी और ईसाई धर्म उनकी मृत्यु के एक लंबे समय के बाद प्रकट हुए। क्या तुम अपनी बुद्धियों से अपने कथन के मिथ्यात्व और अपने दावे की त्रुटि का बोध नहीं करते?!
आयत 66
هَـٰٓأَنتُمْ هَـٰٓؤُلَآءِ حَـٰجَجْتُمْ فِيمَا لَكُم بِهِۦ عِلْمٌۭ فَلِمَ تُحَآجُّونَ فِيمَا لَيْسَ لَكُم بِهِۦ عِلْمٌۭ ۚ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
هَـٰٓأَنتُمْ
हाँ तुम
هَـٰٓؤُلَآءِ
वो लोग हो
حَـٰجَجْتُمْ
झगड़ा किया तुमने
فِيمَا
उस मामले में जो है
لَكُم
तुम्हारे लिए
بِهِۦ
जिसका
عِلْمٌۭ
कुछ इल्म
فَلِمَ
तो क्यों
تُحَآجُّونَ
तुम झगड़ते हो
فِيمَا
उस मामले में जो
لَيْسَ
नहीं है
لَكُم
तुम्हारे लिए
بِهِۦ
जिसका
عِلْمٌۭ ۚ
कोई इल्म
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَعْلَمُ
जानता है
وَأَنتُمْ
और तुम
لَا
(do) not
تَعْلَمُونَ
नहीं तुम जानते
"ये तुम लोग हो कि उसके विषय में वाद-विवाद कर चुके जिसका तुम्हें कुछ ज्ञान था। अब उसके विषय में क्यों वाद-विवाद करते हो, जिसके विषय में तुम्हें कुछ भी ज्ञान नहीं? अल्लाह जानता है, तुम नहीं जानते"
तफ़्सीर:
ऐ किताब वालो! तुमने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अपने धर्म के मामले में तथा अपने ऊपर उतरी हुई पुस्तक के बारे में बहस किया, जिसका तुम्हें ज्ञान था, परंतु तुम इबराहीम अलैहिस्सलाम और उनके धर्म के संबंध में क्यों बहस करते हो, जिसका तुम्हें कोई ज्ञान नहीं है, जो न तो तुम्हारी पुस्तकों में है, और न तुम्हारे नबियों द्वारा लाया गया है?! वास्तव में, अल्लाह ही मामलों के तथ्यों और उनकी आंतरिक बातों को जानता है और तुम नहीं जानते।
आयत 67
مَا كَانَ إِبْرَٰهِيمُ يَهُودِيًّۭا وَلَا نَصْرَانِيًّۭا وَلَـٰكِن كَانَ حَنِيفًۭا مُّسْلِمًۭا وَمَا كَانَ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ
مَا
ना
كَانَ
था
إِبْرَٰهِيمُ
इब्राहीम
يَهُودِيًّۭا
यहूदी
وَلَا
और ना
نَصْرَانِيًّۭا
नस्रानी
وَلَـٰكِن
और लेकिन
كَانَ
था वो
حَنِيفًۭا
यकसू
مُّسْلِمًۭا
मुसलमान
وَمَا
और ना
كَانَ
था वो
مِنَ
from
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकों में से
इबराहीम न यहूदी था और न ईसाई, बल्कि वह तो एक ओर को होकर रहनेवाला मुस्लिम (आज्ञाकारी) था। वह कदापि मुशरिकों में से न था
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम न यहूदी धर्म पर थे और न ही ईसाई धर्म पर। बल्कि वह असत्य धर्मों से विमुख होकर अल्लाह के आज्ञाकारी और उसे ही एकमात्र पूज्य मानने वाले थे। तथा वह उन लोगों में से कदापि नहीं थे, जो अल्लाह का साझी बनाते हैं, जैसा कि अरब के बहुदेववादियों का दावा है कि वे लोग उन्हीं के धर्म पर हैं।
आयत 68
إِنَّ أَوْلَى ٱلنَّاسِ بِإِبْرَٰهِيمَ لَلَّذِينَ ٱتَّبَعُوهُ وَهَـٰذَا ٱلنَّبِىُّ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ۗ وَٱللَّهُ وَلِىُّ ٱلْمُؤْمِنِينَ
إِنَّ
बेशक
أَوْلَى
क़रीबतर
ٱلنَّاسِ
लोगों में से
بِإِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम के
لَلَّذِينَ
अलबत्ता वो हैं जिन्होंने
ٱتَّبَعُوهُ
पैरवी की उसकी
وَهَـٰذَا
और ये
ٱلنَّبِىُّ
नबी
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوا۟ ۗ
ईमान लाए
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
وَلِىُّ
दोस्त है
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों का
निस्संदेह इबराहीम से सबसे अधिक निकटता का सम्बन्ध रखनेवाले वे लोग है जिन्होंने उसका अनुसरण किया, और यह नबी और ईमानवाले लोग। और अल्लाह ईमानवालों को समर्थक एवं सहायक है
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम से निस्बत (संबंध) रखने का सबसे योग्य, वे लोग हैं जिन्होंने उसका अनुसरण किया, जो वह अपने समय में लाए थे। इसी तरह लोगों में इसके सबसे योग्य यह नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और वे लोग हैं जो इस उम्मत में से आपपर ईमान लाए। और अल्लाह ईमान वालों का समर्थक और संरक्षक है।
आयत 69
وَدَّت طَّآئِفَةٌۭ مِّنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ لَوْ يُضِلُّونَكُمْ وَمَا يُضِلُّونَ إِلَّآ أَنفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ
وَدَّت
चाहा
طَّآئِفَةٌۭ
एक गिरोह ने
مِّنْ
from
أَهْلِ
(the) People
ٱلْكِتَـٰبِ
अहले किताब में से
لَوْ
काश
يُضِلُّونَكُمْ
वो गुमराह कर दें तुम्हें
وَمَا
और नहीं
يُضِلُّونَ
वो गुमराह करते
إِلَّآ
मगर
أَنفُسَهُمْ
अपने नफ़्सों को
وَمَا
और नहीं
يَشْعُرُونَ
वो शऊर रखते
किताबवालों में से एक गिरोह के लोगों की कामना है कि काश! वे तुम्हें पथभ्रष्ट कर सकें, जबकि वे केवल अपने-आपकों पथभ्रष्ट कर रहे है! किन्तु उन्हें इसका एहसास नहीं
तफ़्सीर:
ऐ ईमान वालो! अह्ले किताब यानी यहूदियों और ईसाइयों के धर्मगुरु चाहते हैं कि - ऐ ईमान वालो - तुम्हें उस सच्चाई से भटका दें जिसकी अल्लाह ने तुम्हें हिदायत दी है, हालाँकि वे केवल अपने-आप ही को गुमराह कर रहे हैं। क्योंकि उनका ईमान वालों को पथभ्रष्ट करने का प्रयास, स्वयं उन्हीं की गुमराही में वृद्धि करता है और वे अपने कार्यों के परिणामों को नहीं जानते।
आयत 70
يَـٰٓأَهْلَ ٱلْكِتَـٰبِ لِمَ تَكْفُرُونَ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ وَأَنتُمْ تَشْهَدُونَ
يَـٰٓأَهْلَ
O People
ٱلْكِتَـٰبِ
ऐ अहले किताब
لِمَ
क्यों
تَكْفُرُونَ
तुम कुफ़्र करते हो
بِـَٔايَـٰتِ
[in] the Signs
ٱللَّهِ
अल्लाह की आयात का
وَأَنتُمْ
हालाँकि तुम
تَشْهَدُونَ
तुम गवाह हो
ऐ किताबवालों! तुम अल्लाह की आयतों का इनकार क्यों करते हो, जबकि तुम स्वयं गवाह हो?
तफ़्सीर:
ऐ किताब वाले यहूदियो और ईसाइयो! तुम अल्लाह की उन आयतों का इनकार क्यों करते हो, जो तुमपर उतारी गई हैं और जो उनमें मुहम्मद - सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम - की नुबुव्वत का सबूत है, जबकि तुम इस बात के गवाह हो कि वह (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का ईश्दूत होना) सत्य है, जिसका तुम्हारी किताबों में प्रमाण है?!
आयत 71
يَـٰٓأَهْلَ ٱلْكِتَـٰبِ لِمَ تَلْبِسُونَ ٱلْحَقَّ بِٱلْبَـٰطِلِ وَتَكْتُمُونَ ٱلْحَقَّ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ
يَـٰٓأَهْلَ
O People
ٱلْكِتَـٰبِ
ऐ अहले किताब
لِمَ
क्यों
تَلْبِسُونَ
तुम गुड-मुड करते हो
ٱلْحَقَّ
हक़ को
بِٱلْبَـٰطِلِ
बातिल से
وَتَكْتُمُونَ
और तुम छुपाते हो
ٱلْحَقَّ
हक़ को
وَأَنتُمْ
हालाँकि तुम
تَعْلَمُونَ
तुम जानते हो
ऐ किताबवालो! सत्य को असत्य के साथ क्यों गड्ड-मड्ड करते और जानते-बूझते हुए सत्य को छिपाते हो?
तफ़्सीर:
ऐ किताब वालो! तुम अपनी किताबों में उतारी गई सच्चाई को अपने पास से झूठ के साथ क्यों गड्डमड्ड करते हो, तथा जो कुछ उनमें सच्चाई और मार्गदर्शन है उन्हें छिपाते हो, जिनमें मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सच्चे नबी होने की बात भी शामिल है, जबकि तुम सत्य को असत्य से और मार्गदर्शन को पथभ्रष्टता से जानते हो?!
आयत 72
وَقَالَت طَّآئِفَةٌۭ مِّنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ ءَامِنُوا۟ بِٱلَّذِىٓ أُنزِلَ عَلَى ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَجْهَ ٱلنَّهَارِ وَٱكْفُرُوٓا۟ ءَاخِرَهُۥ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
وَقَالَت
और कहा
طَّآئِفَةٌۭ
एक गिरोह ने
مِّنْ
of
أَهْلِ
(the) People
ٱلْكِتَـٰبِ
अहले किताब में से
ءَامِنُوا۟
ईमान ले आओ
بِٱلَّذِىٓ
उस चीज़ पर जो
أُنزِلَ
नाज़िल की गई
عَلَى
on
ٱلَّذِينَ
उन पर जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَجْهَ
अव्वल (वक़्त)
ٱلنَّهَارِ
दिन के
وَٱكْفُرُوٓا۟
और इन्कार कर दो
ءَاخِرَهُۥ
उसके आख़िर में
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَرْجِعُونَ
वो लौट आऐं
किताबवालों में से एक गिरोह कहता है, "ईमानवालो पर जो कुछ उतरा है, उस पर प्रातःकाल ईमान लाओ और संध्या समय उसका इनकार कर दो, ताकि वे फिर जाएँ
तफ़्सीर:
यहूदी विद्वानों के एक समूह ने कहा : तुम बाहरी रूप से दिन की शुरुआत में उस क़ुरआन पर ईमान लाओ जो मोमिनों पर उतारा गया है और उसके अंत में उसका इनकार कर दो। हो सकता है कि वे तुम्हारे ईमान लाने के पश्चात उसका इनकार करने के कारण अपने धर्म पर संदेह करने लगें, फिर यह कहते हुए उससे वापस लौट आएँ : वे लोग अल्लाह की पुस्तकों के बारे में हमसे अधिक जानकार हैं, और वे उससे पलट गए हैं।
आयत 73
وَلَا تُؤْمِنُوٓا۟ إِلَّا لِمَن تَبِعَ دِينَكُمْ قُلْ إِنَّ ٱلْهُدَىٰ هُدَى ٱللَّهِ أَن يُؤْتَىٰٓ أَحَدٌۭ مِّثْلَ مَآ أُوتِيتُمْ أَوْ يُحَآجُّوكُمْ عِندَ رَبِّكُمْ ۗ قُلْ إِنَّ ٱلْفَضْلَ بِيَدِ ٱللَّهِ يُؤْتِيهِ مَن يَشَآءُ ۗ وَٱللَّهُ وَٰسِعٌ عَلِيمٌۭ
وَلَا
और ना
تُؤْمِنُوٓا۟
तुम मानो
إِلَّا
मगर
لِمَن
उसकी जो
تَبِعَ
पैरवी करे
دِينَكُمْ
तुम्हारे दीन की
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّ
बेशक
ٱلْهُدَىٰ
हिदायत
هُدَى
हिदायत है
ٱللَّهِ
अल्लाह की
أَن
कि
يُؤْتَىٰٓ
दिया जाए
أَحَدٌۭ
कोई एक
مِّثْلَ
मानिन्द
مَآ
उसके जो
أُوتِيتُمْ
दिए गए तुम
أَوْ
या (ये कि)
يُحَآجُّوكُمْ
वो झगड़ा करेंगे तुमसे
عِندَ
पास
رَبِّكُمْ ۗ
तुम्हारे रब के
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّ
बेशक
ٱلْفَضْلَ
फ़ज़ल
بِيَدِ
हाथ में है
ٱللَّهِ
अल्लाह के
يُؤْتِيهِ
वो देता है उसे
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۗ
वो चाहता है
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
وَٰسِعٌ
वुसअत वाला है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब इल्म वाला है
"और तुम अपने धर्म के अनुयायियों के अतिरिक्त किसी पर विश्वास न करो। कह दो, वास्तविक मार्गदर्शन तो अल्लाह का मार्गदर्शन है - कि कहीं जो चीज़ तुम्हें प्राप्त हो जाए, या वे तुम्हारे रब के सामने तुम्हारे ख़िलाफ़ हुज्जत कर सकें।" कह दो, "बढ़-चढ़कर प्रदान करना तो अल्लाह के हाथ में है, जिसे चाहता है प्रदान करता है। और अल्लाह बड़ी समाईवाला, सब कुछ जाननेवाला है
तफ़्सीर:
उन्होंने यह भी कहा : तुम केवल उसी को सत्य मानो, जो तुम्हारे धर्म का अनुयायी है। (ऐ रसूल!) आप कह दें : सत्य की ओर मार्गदर्शन तो केवल अल्लाह का मार्गदर्शन है। न कि तुम्हारे इनकार और हठ का रास्ता। इस डर से कि किसी को उतना अनुग्रह प्राप्त हो जाए जितना कि तुम्हें दिया गया है, या इस डर से कि वे तुम्हारे पालनहार के पास तुमसे बहस करेंगे यदि तुमने उसको स्वीकार कर लिया जो उनपर उतारा गया है। (ऐ रसूल!) आप कह दें : नि:संदेह सब अनुग्रह अल्लाह के हाथ में है, वह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, उसे प्रदान करता है। उसका अनुग्रह एक समुदाय को छोड़कर किसी दूसरे समुदाय तक सीमित नहीं है। और अल्लाह बहुत विशाल अनुग्रह वाला है और जानता है कि कौन इसके योग्य है।
आयत 74
يَخْتَصُّ بِرَحْمَتِهِۦ مَن يَشَآءُ ۗ وَٱللَّهُ ذُو ٱلْفَضْلِ ٱلْعَظِيمِ
يَخْتَصُّ
वो ख़ास कर लेता है
بِرَحْمَتِهِۦ
साथ अपनी रहमत के
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۗ
वो चाहता है
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
ذُو
(is) the Possessor
ٱلْفَضْلِ
फ़ज़ल वाला है
ٱلْعَظِيمِ
बहुत बड़े
"वह जिसे चाहता है अपनी रहमत (दयालुता) के लिए ख़ास कर लेता है। और अल्लाह बड़ी उदारता दर्शानेवाला है।"
तफ़्सीर:
वह अपनी सृष्टि में से जिसे चाहता है, अपनी दया के लिए विशिष्ट कर लेता है और उसे मार्गदर्शन, नुबुव्वत (ईश्दूतत्व) और अनेक प्रकार के उपहारों से सम्मानित करता है। और अल्लाह महान अनुग्रह वाला है जिसकी कोई सीमा नहीं है।
आयत 75
۞ وَمِنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ مَنْ إِن تَأْمَنْهُ بِقِنطَارٍۢ يُؤَدِّهِۦٓ إِلَيْكَ وَمِنْهُم مَّنْ إِن تَأْمَنْهُ بِدِينَارٍۢ لَّا يُؤَدِّهِۦٓ إِلَيْكَ إِلَّا مَا دُمْتَ عَلَيْهِ قَآئِمًۭا ۗ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَالُوا۟ لَيْسَ عَلَيْنَا فِى ٱلْأُمِّيِّـۧنَ سَبِيلٌۭ وَيَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلْكَذِبَ وَهُمْ يَعْلَمُونَ
۞ وَمِنْ
And from
أَهْلِ
(the) People
ٱلْكِتَـٰبِ
और अहले किताब में से कोई है
مَنْ
जो
إِن
अगर
تَأْمَنْهُ
आप अमानत दें उसे
بِقِنطَارٍۢ
एक ख़ज़ाना
يُؤَدِّهِۦٓ
वो अदा कर देगा उसे
إِلَيْكَ
तरफ़ आप के
وَمِنْهُم
और कोई वो है
مَّنْ
जो
إِن
अगर
تَأْمَنْهُ
आप अमानत दें उसे
بِدِينَارٍۢ
एक दीनार
لَّا
not
يُؤَدِّهِۦٓ
नहीं वो अदा करेगा उसे
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
إِلَّا
मगर
مَا
that
دُمْتَ
जब तक आप रहें
عَلَيْهِ
उस पर
قَآئِمًۭا ۗ
क़ायम/खड़े
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّهُمْ
बवजह उसके कि वो
قَالُوا۟
वो कहते हैं
لَيْسَ
नहीं है
عَلَيْنَا
हम पर
فِى
concerning
ٱلْأُمِّيِّـۧنَ
उम्मियों के बारे में
سَبِيلٌۭ
कोई रास्ता (मुआख़ज़ा)
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
عَلَى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
ٱلْكَذِبَ
झूठ
وَهُمْ
हालाँकि वो
يَعْلَمُونَ
वो जानते हैं
और किताबवालों में कोई तो ऐसा है कि यदि तुम उसके पास धन-दौलच का एक ढेर भी अमानत रख दो तो वह उसे तुम्हें लौटा देगा। और उनमें कोई ऐसा है कि यदि तुम एक दीनार भी उसकी अमानत में रखों, तो जब तक कि तुम उसके सिर पर सवार न हो, वह उसे तुम्हें अदा नहीं करेगा। यह इसलिए कि वे कहते है, "उन लोगों के विषय में जो किताबवाले नहीं हैं हमारी कोई पकड़ नहीं।" और वे जानते-बूझते अल्लाह पर झूठ मढ़ते है
तफ़्सीर:
और किताब वालों में ऐसा व्यक्ति भी मौजूद है कि यदि तुम उसके पास ढेर सारा धन अमानत रख दो, तो वह तुम्हें वह अमानत लौटा देगा। और उनमें ऐसा आदमी भी मौजूद है कि यदि तुम उसके पास थोड़ा-सा माल भी अमानत रख दो, वह तुम्हें वह अमानत वापस नहीं करेगा, जब तक कि तुम उससे निरंतर आग्रह और तक़ाज़ा न करते रहो। इसका कारण उनका यह कहना और उनका भ्रष्ट विश्वास है कि : अरबों के विषय में और उनका माल खाने में हमपर कोई पाप नहीं है; क्योंकि अल्लाह ने हमारे लिए उसे वैध किया है।" वे यह झूठ बोलते हैं, जबकि उन्हें मालूम है कि वे अल्लाह पर झूठा आरोप लगा रहे हैं।
आयत 76
بَلَىٰ مَنْ أَوْفَىٰ بِعَهْدِهِۦ وَٱتَّقَىٰ فَإِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُتَّقِينَ
بَلَىٰ
क्यों नहीं
مَنْ
जिसने
أَوْفَىٰ
पूरा किया
بِعَهْدِهِۦ
अपने अहद को
وَٱتَّقَىٰ
और तक़वा किया
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يُحِبُّ
मोहब्बत रखता है
ٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों से
क्यों नहीं, जो कोई अपनी प्रतिज्ञा पूरी करेगा और डर रखेगा, तो अल्लाह भी डर रखनेवालों से प्रेम करता है
तफ़्सीर:
मामला वैसा नहीं है, जैसा उन लोगों का दावा है, बल्कि उन्हें गुनाह होगा। लेकिन जो व्यक्ति अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाने के अपने वादे को पूरा करे तथा लोगों के साथ अपने वादे को पूरा करे और अमानत अदा कर दे तथा अल्लाह से उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर डरे; तो निश्चय अल्लाह डरने वालों से प्रेम करता है और उन्हें इसका सबसे अच्छा प्रतिफल देगा।
आयत 77
إِنَّ ٱلَّذِينَ يَشْتَرُونَ بِعَهْدِ ٱللَّهِ وَأَيْمَـٰنِهِمْ ثَمَنًۭا قَلِيلًا أُو۟لَـٰٓئِكَ لَا خَلَـٰقَ لَهُمْ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ وَلَا يُكَلِّمُهُمُ ٱللَّهُ وَلَا يَنظُرُ إِلَيْهِمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ وَلَا يُزَكِّيهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يَشْتَرُونَ
लेते हैं
بِعَهْدِ
(the) Covenant
ٱللَّهِ
बदले अल्लाह के अहद के
وَأَيْمَـٰنِهِمْ
और अपनी क़समों के
ثَمَنًۭا
क़ीमत
قَلِيلًا
थोड़ी
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
لَا
no
خَلَـٰقَ
नहीं कोई हिस्सा
لَهُمْ
उनके लिए
فِى
in
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत में
وَلَا
और ना
يُكَلِّمُهُمُ
कलाम करेगा उनसे
ٱللَّهُ
अल्लाह
وَلَا
और ना
يَنظُرُ
वो देखेगा
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
وَلَا
और ना
يُزَكِّيهِمْ
वो पाक करेगा उन्हें
وَلَهُمْ
और उनके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
रहे वे लोग जो अल्लाह की प्रतिज्ञा और अपनी क़समों का थोड़े मूल्य पर सौदा करते हैं, उनका आख़िरत में कोई हिस्सा नहीं। अल्लाह न तो उनसे बात करेगा और न क़ियामत के दिन उनकी ओर देखेगा, और न ही उन्हें निखारेगा। उनके लिए तो दुखद यातना है
तफ़्सीर:
जो लोग अल्लाह की, अपनी पुस्तक में उतारी हुई और अपने रसूलों के साथ भेजी हुई शिक्षाओं का पालन करने की वसीयत को तथा अपनी उन क़समों को जो उन्होंने अल्लाह की प्रतिज्ञा को पूरा करने की खाई हैं, बदल देते हैं और उनके बदले थोड़ी मात्रा में सांसारिक वस्तुएँ ले लेते हैं; उनके लिए आख़िरत के सवाब (प्रतिफल) से कोई हिस्सा नहीं। तथा अल्लाह क़ियामत के दिन उनसे ऐसी बात नहीं करेगा जिससे उन्हें प्रसन्नता हो, उनकी ओर दया की दृष्टि से नहीं देखेगा और उन्हें उनके पापों और कुफ़्र की अशुद्धता से पाक नहीं करेगा। तथा उनके लिए दर्दनाक यातना है।
आयत 78
وَإِنَّ مِنْهُمْ لَفَرِيقًۭا يَلْوُۥنَ أَلْسِنَتَهُم بِٱلْكِتَـٰبِ لِتَحْسَبُوهُ مِنَ ٱلْكِتَـٰبِ وَمَا هُوَ مِنَ ٱلْكِتَـٰبِ وَيَقُولُونَ هُوَ مِنْ عِندِ ٱللَّهِ وَمَا هُوَ مِنْ عِندِ ٱللَّهِ وَيَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلْكَذِبَ وَهُمْ يَعْلَمُونَ
وَإِنَّ
और बेशक
مِنْهُمْ
उनमें से
لَفَرِيقًۭا
अलबत्ता एक गिरोह (के लोग) हैं
يَلْوُۥنَ
जो मोड़ते हैं
أَلْسِنَتَهُم
अपनी ज़बानों को
بِٱلْكِتَـٰبِ
साथ किताब के
لِتَحْسَبُوهُ
ताकि तुम समझो उसे
مِنَ
(is) from
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में से
وَمَا
हालाँकि नहीं
هُوَ
वो
مِنَ
(is) from
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में से
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
هُوَ
वो
مِنْ
(is)
عِندِ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह के पास से है
وَمَا
हालाँकि नहीं
هُوَ
वो
مِنْ
(is)
عِندِ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह के पास से
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
عَلَى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
ٱلْكَذِبَ
झूठ
وَهُمْ
हालाँकि वो
يَعْلَمُونَ
वो जानते हैं
उनमें कुछ लोग ऐसे है जो किताब पढ़ते हुए अपनी ज़बानों का इस प्रकार उलट-फेर करते है कि तुम समझों कि वह किताब ही में से है, जबकि वह किताब में से नहीं होता। और वे कहते है, "यह अल्लाह की ओर से है।" जबकि वह अल्लाह की ओर से नहीं होता। और वे जानते-बूझते झूठ गढ़कर अल्लाह पर थोपते है
तफ़्सीर:
यहूदियों में से कुछ लोग ऐसे हैं, जो ऐसी बात का उल्लेख करते हुए जो अल्लाह की ओर से उतारी हुई तौरात में से नहीं है, अपनी ज़बान को मरोड़ते हैं, ताकि तुम्हें लगे कि वे तौरात पढ़ रहे हैं। हालाँकि वह तौरात का अंश नहीं, बल्कि उनके झूठ और अल्लाह पर मिथ्यारोपण से है। और वे कहते हैं : हम जो कुछ पढ़ रहे हैं, वह अल्लाह की ओर से उतारा हुआ है। हालाँकि वह अल्लाह की ओर से नहीं है। तथा वे अल्लाह के बारे में झूठ कहते हैं, जबकि वे अल्लाह और उसके रसूलों के बारे में अपने झूठ को जानते हैं।
आयत 79
مَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن يُؤْتِيَهُ ٱللَّهُ ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْحُكْمَ وَٱلنُّبُوَّةَ ثُمَّ يَقُولَ لِلنَّاسِ كُونُوا۟ عِبَادًۭا لِّى مِن دُونِ ٱللَّهِ وَلَـٰكِن كُونُوا۟ رَبَّـٰنِيِّـۧنَ بِمَا كُنتُمْ تُعَلِّمُونَ ٱلْكِتَـٰبَ وَبِمَا كُنتُمْ تَدْرُسُونَ
مَا
नहीं
كَانَ
है
لِبَشَرٍ
किसी बशर के लिए
أَن
कि
يُؤْتِيَهُ
दे उसे
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
وَٱلْحُكْمَ
और हिकमत
وَٱلنُّبُوَّةَ
और नबुव्वत
ثُمَّ
फिर
يَقُولَ
वो कहे
لِلنَّاسِ
लोगों से
كُونُوا۟
हो जाओ
عِبَادًۭا
बन्दे
لِّى
मेरे
مِن
from
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَلَـٰكِن
और लेकिन
كُونُوا۟
हो जाओ
رَبَّـٰنِيِّـۧنَ
रब वाले
بِمَا
बवजह उसके जो
كُنتُمْ
हो तुम
تُعَلِّمُونَ
तुम तालीम देते
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब की
وَبِمَا
और बवजह उसके जो
كُنتُمْ
हो तुम
تَدْرُسُونَ
तुम पढ़ते
किसी मनुष्य के लिए यह सम्भव न था कि अल्लाह उसे किताब और हिकमत (तत्वदर्शिता) और पैग़म्बरी प्रदान करे और वह लोगों से कहने लगे, "तुम अल्लाह को छोड़कर मेरे उपासक बनो।" बल्कि वह तो यही कहेगा कि, "तुम रबवाले बनो, इसलिए कि तुम किताब की शिक्षा देते हो और इसलिए कि तुम स्वयं भी पढ़ते हो।"
तफ़्सीर:
किसी मनुष्य के लिए यह उचित नहीं कि अल्लाह उसे अपनी ओर से उतारी हुई एक पुस्तक दे, उसे ज्ञान और समझ प्रदान करे और उसे नबी के रूप में चुन ले; फिर वह लोगों से कहे : तुम अल्लाह को छोड़कर मेरे बंदे बन जाओ। परंतु वह उनसे यह कहता है : तुम सत्कर्म करने वाले, लोगों का प्रशिक्षण करने वाले, उनके मामलों का सुधार करने वाले विद्वान बनो। क्योंकि तुम लोगों को अल्लाह की उतारी हुई किताब की शिक्षा देते हो, तथा इस कारण कि तुम उसे पढ़कर याद करते और समझते हो।
आयत 80
وَلَا يَأْمُرَكُمْ أَن تَتَّخِذُوا۟ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ وَٱلنَّبِيِّـۧنَ أَرْبَابًا ۗ أَيَأْمُرُكُم بِٱلْكُفْرِ بَعْدَ إِذْ أَنتُم مُّسْلِمُونَ
وَلَا
और नहीं
يَأْمُرَكُمْ
वो हुक्म देता तुम्हें
أَن
कि
تَتَّخِذُوا۟
तुम बना लो
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ
फ़रिश्तों को
وَٱلنَّبِيِّـۧنَ
और नबियों को
أَرْبَابًا ۗ
रब (मुख़्तलिफ़)
أَيَأْمُرُكُم
क्या वो हुक्म देगा तुम्हें
بِٱلْكُفْرِ
कुफ़्र का
بَعْدَ
बाद उसके
إِذْ
जब
أَنتُم
तुम
مُّسْلِمُونَ
मुसलमान हो
और न वह तुम्हें इस बात का हुक्म देगा कि तुम फ़रिश्तों और नबियों को अपना रब बना लो। क्या वह तुम्हें अधर्म का हुक्म देगा, जबकि तुम (उसके) आज्ञाकारी हो?
तफ़्सीर:
(इसी प्रकार) उसके लिए यह भी उचित नहीं है कि वह तुम्हें आदेश दे कि फ़रिश्तों और नबियों को रब बना लो, जिनकी अल्लाह को छोड़कर उपासना करो। क्या उसके लिए यह जायज़ है कि वह तुम्हें अल्लाह के साथ कुफ़्र करने का आदेश दे, जबकि तुम उसके अधीन हो गए और उसके सामने समर्पित (आज्ञाकारी) हो गए?!
आयत 81
وَإِذْ أَخَذَ ٱللَّهُ مِيثَـٰقَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ لَمَآ ءَاتَيْتُكُم مِّن كِتَـٰبٍۢ وَحِكْمَةٍۢ ثُمَّ جَآءَكُمْ رَسُولٌۭ مُّصَدِّقٌۭ لِّمَا مَعَكُمْ لَتُؤْمِنُنَّ بِهِۦ وَلَتَنصُرُنَّهُۥ ۚ قَالَ ءَأَقْرَرْتُمْ وَأَخَذْتُمْ عَلَىٰ ذَٰلِكُمْ إِصْرِى ۖ قَالُوٓا۟ أَقْرَرْنَا ۚ قَالَ فَٱشْهَدُوا۟ وَأَنَا۠ مَعَكُم مِّنَ ٱلشَّـٰهِدِينَ
وَإِذْ
और जब
أَخَذَ
लिया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِيثَـٰقَ
पुख़्ता अहद
ٱلنَّبِيِّـۧنَ
नबियों से
لَمَآ
अलबत्ता जो
ءَاتَيْتُكُم
दूँ मैं तुम्हें
مِّن
of
كِتَـٰبٍۢ
किताब में से
وَحِكْمَةٍۢ
और हिकमत में से
ثُمَّ
फिर
جَآءَكُمْ
आ जाए तुम्हारे पास
رَسُولٌۭ
एक रसूल
مُّصَدِّقٌۭ
तसदीक़ करने वाला
لِّمَا
उसकी जो
مَعَكُمْ
तुम्हारे पास है
لَتُؤْمِنُنَّ
अल्बत्ता तुम ज़रूर ईमान लाओगे
بِهِۦ
उस पर
وَلَتَنصُرُنَّهُۥ ۚ
और अलबत्ता तुम ज़रूर मदद करोगे उसकी
قَالَ
फ़रमाया
ءَأَقْرَرْتُمْ
क्या तुम इक़रार किया तुमने
وَأَخَذْتُمْ
और लिया तुमने
عَلَىٰ
on
ذَٰلِكُمْ
उस पर
إِصْرِى ۖ
अहद मेरा
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَقْرَرْنَا ۚ
इक़रार किया हमने
قَالَ
फ़रमाया
فَٱشْهَدُوا۟
पस गवाह रहो
وَأَنَا۠
और मैं हूँ
مَعَكُم
साथ तुम्हारे
مِّنَ
among
ٱلشَّـٰهِدِينَ
गवाहों में से
और याद करो जब अल्लाह ने नबियों के सम्बन्ध में वचन लिया था, "मैंने तुम्हें जो कुछ किताब और हिकमत प्रदान की, इसके पश्चात तुम्हारे पास कोई रसूल उसकी पुष्टि करता हुआ आए जो तुम्हारे पास मौजूद है, तो तुम अवश्य उस पर ईमान लाओगे और निश्चय ही उसकी सहायता करोगे।" कहा, "क्या तुमने इक़रार किया? और इसपर मेरी ओर से डाली हुई जिम्मेदारी को बोझ उठाया?" उन्होंने कहा, "हमने इक़रार किया।" कहा, "अच्छा तो गवाह किया और मैं भी तुम्हारे साथ गवाह हूँ।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) उस समय को याद करें, जब अल्लाह ने सभी नबियों से यह कहते हुए दृढ़ वचन लिया कि मैं तुम्हें जो भी पुस्तक दूँ, तथा तुम्हें जो भी हिकमत सिखाऊँ और तुममें से कोई जिस भी स्थान और पद पर पहुँच जाए, फिर तुम्हारे पास मेरी ओर से एक नबी आए (और वह मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं) जो तुम्हारे पास मौजूद किताब और हिकमत की पुष्टि करता हो; तो तुम उसकी लाई हुई बात पर अवश्य ईमान लाओगे और उसका अनुसरण करते हुए अवश्य उसकी मदद करोगे। तो क्या - ऐ नबियो! - तुमने इसका इक़रार कर लिया और उसपर मेरा दृढ़ वचन क़बूल कर लिया? तो उन लोगों ने उत्तर देते हुए कहा : हमने इसका इक़रार किया। अल्लाह ने फरमाया : तुम लोग अपने आपपर और अपने समुदायों पर गवाह रहो, और मैं भी तुम्हारे साथ तुमपर और उनपर गवाहों में से हूँ।
आयत 82
فَمَن تَوَلَّىٰ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْفَـٰسِقُونَ
فَمَن
तो जो कोई
تَوَلَّىٰ
मुँह मोड़ जाए
بَعْدَ
बाद
ذَٰلِكَ
उसके
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْفَـٰسِقُونَ
जो फ़ासिक़ हैं
फिर इसके बाद जो फिर गए, तो ऐसे ही लोग अवज्ञाकारी है
तफ़्सीर:
फिर जो इस वचन के बाद जिसकी अल्लाह और उसके रसूल की गवाही द्वारा पुष्टि की गई है, मुकर जाए; तो ऐसे ही लोग अल्लाह के धर्म और उसकी आज्ञाकारिता से निकल जाने वाले हैं।
आयत 83
أَفَغَيْرَ دِينِ ٱللَّهِ يَبْغُونَ وَلَهُۥٓ أَسْلَمَ مَن فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ طَوْعًۭا وَكَرْهًۭا وَإِلَيْهِ يُرْجَعُونَ
أَفَغَيْرَ
क्या भला अलावा
دِينِ
(the) religion
ٱللَّهِ
अल्लाह के दीन के
يَبْغُونَ
वो (कुछ और) तलाश करते हैं
وَلَهُۥٓ
हालाँकि उसी के लिए
أَسْلَمَ
फ़रमाबरदार हुआ
مَن
जो कोई
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन में है
طَوْعًۭا
ख़ुशी से
وَكَرْهًۭا
और नाख़ुशी से
وَإِلَيْهِ
और तरफ़ उसी के
يُرْجَعُونَ
वो लौटाए जाऐंगे
अब क्या इन लोगों को अल्लाह के दीन (धर्म) के सिवा किसी और दीन की तलब है, हालाँकि आकाशों और धरती में जो कोई भी है, स्वेच्छापूर्वक या विवश होकर उसी के आगे झुका हुआ है। और उसी की ओर सबको लौटना है?
तफ़्सीर:
क्या अल्लाह के धर्म और उसकी आज्ञाकारिता से निकल जाने वाले ये लोग अल्लाह के उस धर्म के अलावा जिसे अल्लाह ने अपने बंदो के लिए चुन लिया है - जो कि इस्लाम है - कोई अन्य धर्म तलाश करते हैं?! हालाँकि आकाशों और धरती के सभी प्राणियों ने उसके सामने आत्मसमर्पण कर दिया और उसके आज्ञाकारी हो गए, चाहे मोमिनों की तरह स्वेच्छा से हो, और चाहे काफ़िरों की तरह अनिच्छा से हो। फिर क़ियामत के दिन सभी प्राणियों को हिसाब और बदले के लिए अल्लाह ही की ओर लौटकर जाना है।
आयत 84
قُلْ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَمَآ أُنزِلَ عَلَيْنَا وَمَآ أُنزِلَ عَلَىٰٓ إِبْرَٰهِيمَ وَإِسْمَـٰعِيلَ وَإِسْحَـٰقَ وَيَعْقُوبَ وَٱلْأَسْبَاطِ وَمَآ أُوتِىَ مُوسَىٰ وَعِيسَىٰ وَٱلنَّبِيُّونَ مِن رَّبِّهِمْ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍۢ مِّنْهُمْ وَنَحْنُ لَهُۥ مُسْلِمُونَ
قُلْ
कह दीजिए
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَمَآ
और जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
عَلَيْنَا
हम पर
وَمَآ
और जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
عَلَىٰٓ
on
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम पर
وَإِسْمَـٰعِيلَ
और इस्माईल
وَإِسْحَـٰقَ
और इसहाक़
وَيَعْقُوبَ
और याक़ूब
وَٱلْأَسْبَاطِ
और औलादे याक़ूब पर
وَمَآ
और जो
أُوتِىَ
दिए गए
مُوسَىٰ
मूसा
وَعِيسَىٰ
और ईसा
وَٱلنَّبِيُّونَ
और तमाम अम्बिया
مِن
from
رَّبِّهِمْ
अपने रब की तरफ़ से
لَا
Not
نُفَرِّقُ
नहीं हम फ़र्क़ करते
بَيْنَ
दर्मियान
أَحَدٍۢ
किसी एक के
مِّنْهُمْ
उनमें से
وَنَحْنُ
और हम
لَهُۥ
उसी के
مُسْلِمُونَ
फ़रमाबरदार हैं
कहो, "हम तो अल्लाह पर और उस चीज़ पर ईमान लाए जो हम पर उतरी है, और जो इबराहीम, इसमाईल, इसहाक़ और याकूब़ और उनकी सन्तान पर उतरी उसपर भी, और जो मूसा और ईसा और दूसरे नबियो को उनके रब की ओर से प्रदान हुई (उसपर भी हम ईमान रखते है) । हम उनमें से किसी को उस ओर से प्रदान हुई (उसपर भी हम ईमान रखते है) । हम उनमें से किसी को उस सम्बन्ध से अलग नहीं करते जो उनके बीच पाया जाता है, और हम उसी के आज्ञाकारी (मुस्लिम) है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दें : हम अल्लाह पर उसे मा'बूद (पूज्य) मानते हुए ईमान लाए तथा उसने हमें जो कुछ आदेश दिया, हमने उसका पालन किया, और हम उस वह़्य पर ईमान लाए, जो उसने हमपर उतारी, और उसपर जो उसने इबराहीम, इसमाईल, इसहाक़ और या'क़ूब पर उतारा, तथा उसपर जो उसने याक़ूब अलैहिस्सलाम की संतान में से होने वाले नबियों पर उतारा, तथा उसपर जो मूसा, ईसा और सारे नबियों को उनके पालनहार की ओर से पुस्तकें और निशानियाँ दी गईं। हम उनके बीच अंतर (भेदभाव) नहीं करते, कि हम कुछ पर ईमान लाएँ और कुछ का इनकार कर दें। तथा हम अकेले अल्लाह ही के आज्ञाकारी और उसी के सामने झुकने वाले हैं।
आयत 85
وَمَن يَبْتَغِ غَيْرَ ٱلْإِسْلَـٰمِ دِينًۭا فَلَن يُقْبَلَ مِنْهُ وَهُوَ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ مِنَ ٱلْخَـٰسِرِينَ
وَمَن
और जो कोई
يَبْتَغِ
चाहेगा
غَيْرَ
सिवाय
ٱلْإِسْلَـٰمِ
इस्लाम के
دِينًۭا
कोई दीन
فَلَن
तो हरगिज़ नहीं
يُقْبَلَ
वो क़ुबूल किया जाएगा
مِنْهُ
उससे
وَهُوَ
और वो
فِى
in
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत में
مِنَ
(will be) from
ٱلْخَـٰسِرِينَ
ख़सारा पाने वालों में से होगा
जो इस्लाम के अतिरिक्त कोई और दीन (धर्म) तलब करेगा तो उसकी ओर से कुछ भी स्वीकार न किया जाएगा। और आख़िरत में वह घाटा उठानेवालों में से होगा
तफ़्सीर:
और जो कोई उस धर्म के अलावा कोई अन्य धर्म तलाश करे, जिसे अल्लाह ने पसंद किया है और वह इस्लाम धर्म है; तो अल्लाह उससे उसे कदापि स्वीकार नहीं करेगा, और वह आख़िरत में आग में प्रवेश करके अपना ही घाटा करने वालों में से होगा।
आयत 86
كَيْفَ يَهْدِى ٱللَّهُ قَوْمًۭا كَفَرُوا۟ بَعْدَ إِيمَـٰنِهِمْ وَشَهِدُوٓا۟ أَنَّ ٱلرَّسُولَ حَقٌّۭ وَجَآءَهُمُ ٱلْبَيِّنَـٰتُ ۚ وَٱللَّهُ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلظَّـٰلِمِينَ
كَيْفَ
किस तरह
يَهْدِى
हिदायत देगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
قَوْمًۭا
उस क़ौम को
كَفَرُوا۟
जिन्होंने कुफ़्र किया
بَعْدَ
बाद
إِيمَـٰنِهِمْ
अपने ईमान लाने के
وَشَهِدُوٓا۟
और उन्होंने गवाही दी
أَنَّ
कि बेशक
ٱلرَّسُولَ
रसूल
حَقٌّۭ
बरहक़ हैं
وَجَآءَهُمُ
और आईं उनके पास
ٱلْبَيِّنَـٰتُ ۚ
वाज़ेह निशानियाँ
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
لَا
(does) not
يَهْدِى
नहीं वो हिदायत देता
ٱلْقَوْمَ
उन लोगों को
ٱلظَّـٰلِمِينَ
जो ज़ालिम हैं
अल्लाह उन लोगों को कैसे मार्ग दिखाएगा, जिन्होंने अपने ईमान के पश्चात अधर्म और इनकार की नीति अपनाई, जबकि वे स्वयं इस बात की गवाही दे चुके हैं कि यह रसूल सच्चा है और उनके पास स्पष्ट निशानियाँ भी आ चुकी हैं? अल्लाह अत्याचारी लोगों को मार्ग नहीं दिखाया करता
तफ़्सीर:
अल्लाह अपने आपपर और अपने रसूल पर ईमान लाने की तौफीक़ उन लोगों को कैसे प्रदान करेगा, जिन्होंने अल्लाह पर ईमान लाने तथा रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लाए हुए धर्म के सत्य होने की गवाही देने के बाद कुफ़्र किया, तथा उनके पास उसके सत्य होने के स्पष्ट प्रमाण आ चुके?! अल्लाह ऐसे अत्याचारी लोगों को ईमान की तौफीक़ नहीं देता, जिन्होंने मार्गदर्शन के स्थान पर पथभ्रष्टता को चुना।
आयत 87
أُو۟لَـٰٓئِكَ جَزَآؤُهُمْ أَنَّ عَلَيْهِمْ لَعْنَةَ ٱللَّهِ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ وَٱلنَّاسِ أَجْمَعِينَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
جَزَآؤُهُمْ
बदला उनका
أَنَّ
कि बेशक
عَلَيْهِمْ
उन पर
لَعْنَةَ
लानत है
ٱللَّهِ
अल्लाह की
وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ
और फ़रिश्तों की
وَٱلنَّاسِ
और लोगों की
أَجْمَعِينَ
सब के सब की
उन लोगों का बदला यही है कि उनपर अल्लाह और फ़रिश्तों और सारे मनुष्यों की लानत है
तफ़्सीर:
असत्य को चुनने वाले ऐसे अत्याचारियों का बदला यह है कि उनपर अल्लाह की, फरिश्तों की और सभी लोगों की ला'नत (धिक्कार) है। चुनाँचे वे अल्लाह की दया से दूर और निष्कासित कर दिए गए हैं।
आयत 88
خَـٰلِدِينَ فِيهَا لَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ ٱلْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَا
उसमें
لَا
Not
يُخَفَّفُ
ना हलका किया जाएगा
عَنْهُمُ
उनसे
ٱلْعَذَابُ
अज़ाब
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يُنظَرُونَ
वो मोहलत दिए जाऐंगे
इसी दशा में वे सदैव रहेंगे, न उनकी यातना हल्की होगी और न उन्हें मुहलत ही दी जाएगी
तफ़्सीर:
वे सदा आग में रहेंगे, उन्हें उससे निकाला नहीं जाएगा, और न ही उनसे उसके अज़ाब को हल्का किया जाएगा, और न ही उन्हें पश्चाताप करने और माफ़ी माँगने की मोहलत दी जाएगी।
आयत 89
إِلَّا ٱلَّذِينَ تَابُوا۟ مِنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ وَأَصْلَحُوا۟ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌ
إِلَّا
मगर
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
تَابُوا۟
तौबा की
مِنۢ
from
بَعْدِ
after
ذَٰلِكَ
बाद उसके
وَأَصْلَحُوا۟
और इस्लाह की
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌ
निहायत रहम करने वाला है
हाँ, जिन लोगों ने इसके पश्चात तौबा कर ली और अपनी नीति को सुधार लिया तो निस्संदेह अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
परंतु जो लोग अपने कुफ़्र और अत्याचार के बाद अल्लाह की ओर लौट आए और अपने कर्मों को सुधार लिया; तो निश्चय अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों के लिए अति क्षमाशील, उनपर अत्यंत दया करने वाला है।
आयत 90
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بَعْدَ إِيمَـٰنِهِمْ ثُمَّ ٱزْدَادُوا۟ كُفْرًۭا لَّن تُقْبَلَ تَوْبَتُهُمْ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلضَّآلُّونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
بَعْدَ
बाद
إِيمَـٰنِهِمْ
अपने ईमान के
ثُمَّ
फिर
ٱزْدَادُوا۟
वो बढ़ते गए
كُفْرًۭا
कुफ़्र में
لَّن
हरगिज़ ना
تُقْبَلَ
क़ुबूल की जाएगी
تَوْبَتُهُمْ
तौबा उनकी
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلضَّآلُّونَ
जो गुमराह हैं
रहे वे लोग जिन्होंने अपने ईमान के पश्चात इनकार किया और अपने इनकार में बढ़ते ही गए, उनकी तौबा कदापि स्वीकार न होगी। वास्तव में वही पथभ्रष्ट हैं
तफ़्सीर:
निःसंदेह जिन लोगों ने अपने ईमान के बाद कुफ़्र किया और अपने कुफ़्र पर बने रहे यहाँ तक कि उन्होंने मृत्यु को देख लिया; तो मृत्यु के उपस्थित होने के समय उनसे तौबा हरगिज़ क़बूल नहीं की जाएगी क्योंकि उसका समय बीत चुका। और यही लोग हैं जो अल्लाह की ओर ले जाने वाले सीधे मार्ग से भटके हुए हैं।
आयत 91
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَمَاتُوا۟ وَهُمْ كُفَّارٌۭ فَلَن يُقْبَلَ مِنْ أَحَدِهِم مِّلْءُ ٱلْأَرْضِ ذَهَبًۭا وَلَوِ ٱفْتَدَىٰ بِهِۦٓ ۗ أُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ وَمَا لَهُم مِّن نَّـٰصِرِينَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
وَمَاتُوا۟
और मर गए
وَهُمْ
इस हाल में कि वो
كُفَّارٌۭ
काफ़िर थे
فَلَن
तो हरगिज़ ना
يُقْبَلَ
क़ुबूल किया जाएगा
مِنْ
from
أَحَدِهِم
उनमें से किसी एक से
مِّلْءُ
full
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन भर
ذَهَبًۭا
सोना
وَلَوِ
और अगरचे
ٱفْتَدَىٰ
वो फ़िदया दे
بِهِۦٓ ۗ
उसका
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
وَمَا
और नहीं
لَهُم
उनके लिए
مِّن
any
نَّـٰصِرِينَ
मददगारों में से कोई
निस्संदेह जिन लोगों ने इनकार किया और इनकार ही की दशा में मरे, तो उनमें किसी से धरती के बराबर सोना भी, यदि उसने प्राण-मुक्ति के लिए दिया हो, कदापि स्वीकार नहीं किया जाएगा। ऐसे लोगों के लिए दुखद यातना है और उनका कोई सहायक न होगा
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने कुफ़्र किया और अपने कुफ़्र पर मर गए; तो उनमें से किसी एक से धरती के वज़न के बराबर सोना भी स्वीकार नहीं किया जाएगा, भले ही वह उसे आग से छूटने के बदले में दे दे। वही लोग हैं जिनके लिए दर्दनाक अज़ाब है और उनके लिए क़ियामत के दिन कोई सहायक न होंगे जो उनसे अज़ाब को दूर कर सकें।
आयत 92
لَن تَنَالُوا۟ ٱلْبِرَّ حَتَّىٰ تُنفِقُوا۟ مِمَّا تُحِبُّونَ ۚ وَمَا تُنفِقُوا۟ مِن شَىْءٍۢ فَإِنَّ ٱللَّهَ بِهِۦ عَلِيمٌۭ
لَن
हरगिज़ नहीं
تَنَالُوا۟
तुम पा सकते
ٱلْبِرَّ
नेकी को
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
تُنفِقُوا۟
तुम ख़र्च करो
مِمَّا
उसमें से जो
تُحِبُّونَ ۚ
तुम पसंद करते हो
وَمَا
और जो
تُنفِقُوا۟
तुम ख़र्च करोगे
مِن
of
شَىْءٍۢ
कोई चीज़
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
بِهِۦ
उसे
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
तुम नेकी और वफ़ादारी के दर्जे को नहीं पहुँच सकते, जब तक कि उन चीज़ो को (अल्लाह के मार्ग में) ख़र्च न करो, जो तुम्हें प्रिय है। और जो चीज़ भी तुम ख़र्च करोगे, निश्चय ही अल्लाह को उसका ज्ञान होगा
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो!) तुम नेक लोगों का पुण्य और उनका स्थान हरगिज़ नहीं प्राप्त कर सकते, जब तक तुम अपने प्रिय धन से अल्लाह के मार्ग में खर्च न करो। और तुम जो कुछ भी खर्च करोगे, चाहे कम हो या अधिक, अल्लाह तुम्हारे इरादों और कामों को भली-भाँति जानता है, और वह हर एक को उसके कार्य का बदला देगा।
आयत 93
۞ كُلُّ ٱلطَّعَامِ كَانَ حِلًّۭا لِّبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ إِلَّا مَا حَرَّمَ إِسْرَٰٓءِيلُ عَلَىٰ نَفْسِهِۦ مِن قَبْلِ أَن تُنَزَّلَ ٱلتَّوْرَىٰةُ ۗ قُلْ فَأْتُوا۟ بِٱلتَّوْرَىٰةِ فَٱتْلُوهَآ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
۞ كُلُّ
हर
ٱلطَّعَامِ
खाना
كَانَ
था
حِلًّۭا
हलाल
لِّبَنِىٓ
for (the) Children
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल के लिए
إِلَّا
मगर
مَا
जो
حَرَّمَ
हराम किया
إِسْرَٰٓءِيلُ
इस्राईल ने
عَلَىٰ
upon
نَفْسِهِۦ
अपने नफ़्स पर
مِن
from
قَبْلِ
इससे पहले
أَن
कि
تُنَزَّلَ
नाज़िल की जाती
ٱلتَّوْرَىٰةُ ۗ
तौरात
قُلْ
कह दीजिए
فَأْتُوا۟
पस ले आओ
بِٱلتَّوْرَىٰةِ
तौरात को
فَٱتْلُوهَآ
फिर पढ़ो उसे
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
खाने की सारी चीज़े इसराईल की संतान के लिए हलाल थी, सिवाय उन चीज़ों के जिन्हें तौरात के उतरने से पहले इसराईल ने स्वयं अपने हराम कर लिया था। कहो, "यदि तुम सच्चे हो तो तौरात लाओ और उसे पढ़ो।"
तफ़्सीर:
सभी शुद्ध खाद्य पदार्थ बनी इसराईल के लिए हलाल थे। और उनमें से कुछ भी उनपर हराम नहीं किया गया था, सिवाय उसके जिसे याक़ूब (अलैहिस्सलाम) ने तौरात उतरने से पहले खुद ही अपने ऊपर हराम कर लिया था। वास्तविकता वह नहीं है, जो यहूदी दावा करते हैं कि यह निषेध तौरात में था। (ऐ नबी!) आप उनसे कह दीजिए : तुम तौरात ले आओ और उसे पढ़कर सुनाओ, यदि तुम अपने इस दावे में सच्चे हो। इसपर वे स्तब्ध हो गए और तौरात नहीं लाए। यह एक उदाहरण है, जो यहूदियों के तौरात पर मिथ्यारोपण करने और उसके विषय को विकृत करने को दर्शाता है।
आयत 94
فَمَنِ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ ٱلْكَذِبَ مِنۢ بَعْدِ ذَٰلِكَ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ
فَمَنِ
तो जो कोई
ٱفْتَرَىٰ
गढ़ ले
عَلَى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
ٱلْكَذِبَ
झूठ
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद
ذَٰلِكَ
इसके
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلظَّـٰلِمُونَ
जो ज़ालिम हैं
अब इसके पश्चात भी जो व्यक्ति झूठी बातें अल्लाह से जोड़े, तो ऐसे ही लोग अत्याचारी है
तफ़्सीर:
फिर जो व्यक्ति इस प्रमाण के प्रकट हो जाने के बाद भी अल्लाह पर झूठा आरोप लगाए; कि याक़ूब अलैहिस्सलाम ने जो कुछ हराम ठहराया था, वह अल्लाह के हराम किए हुए बिना उन्हों ने खुद ही अपने ऊपर हराम कर लिया था, तो ऐसे ही लोग प्रमाण प्रकट हो जाने के बाद भी सत्य को छोड़कर अपने ऊपर अत्याचार करने वाले हैं।
आयत 95
قُلْ صَدَقَ ٱللَّهُ ۗ فَٱتَّبِعُوا۟ مِلَّةَ إِبْرَٰهِيمَ حَنِيفًۭا وَمَا كَانَ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ
قُلْ
कह दीजिए
صَدَقَ
सच फ़रमाया
ٱللَّهُ ۗ
अल्लाह ने
فَٱتَّبِعُوا۟
तो पैरवी करो
مِلَّةَ
मिल्लते
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम की
حَنِيفًۭا
जो यकसू था
وَمَا
और ना
كَانَ
था वो
مِنَ
of
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकीन में से
कहो, "अल्लाह ने सच कहा है; अतः इबराहीम के तरीक़े का अनुसरण करो, जो हर ओर से कटकर एक का हो गया था और मुशरिकों में से न था
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) आप कह दीजिए : अल्लाह ने याक़ूब अलैहिस्सलाम के संबंध में जो कुछ बताया है तथा जो कुछ उसने आदेश उतारे हैं और जो कुछ नियम व क़ानून निर्धारित किए हैं, उन सब में वह सच्चा है। इसलिए इबराहीम अलैहिस्सलाम के धर्म का अनुसरण करो। क्योंकि वह सभी धर्मों से विमुख होकर इस्लाम धर्म की ओर एकाग्र थे। और उन्होंने कभी अल्लाह के साथ किसी को साझी नहीं बनाया।
आयत 96
إِنَّ أَوَّلَ بَيْتٍۢ وُضِعَ لِلنَّاسِ لَلَّذِى بِبَكَّةَ مُبَارَكًۭا وَهُدًۭى لِّلْعَـٰلَمِينَ
إِنَّ
बेशक
أَوَّلَ
पहला
بَيْتٍۢ
घर
وُضِعَ
जो बनाया गया
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
لَلَّذِى
यकीनन वही है जो
بِبَكَّةَ
मक्का में है
مُبَارَكًۭا
मुबारक/बाबरकत
وَهُدًۭى
और हिदायत है
لِّلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों के लिए
"निस्ंसदेह इबादत के लिए पहला घर जो 'मानव के लिए' बनाया गया वहीं है जो मक्का में है, बरकतवाला और सर्वथा मार्गदर्शन, संसारवालों के लिए
तफ़्सीर:
धरती पर सबसे प्रथम घर, जो सभी लोगों के लिए अल्लाह की उपासना के उद्देश्य से बनाया गया, वह अल्लाह का वही सम्मानित घर है, जो मक्का में है। वह बहुत से धार्मिक और सांसारिक लाभों वाला एक मुबारक (बरकत वाला) घर है। और उसमें समस्त संसार के लोगों के लिए मार्गदर्शन है।
आयत 97
فِيهِ ءَايَـٰتٌۢ بَيِّنَـٰتٌۭ مَّقَامُ إِبْرَٰهِيمَ ۖ وَمَن دَخَلَهُۥ كَانَ ءَامِنًۭا ۗ وَلِلَّهِ عَلَى ٱلنَّاسِ حِجُّ ٱلْبَيْتِ مَنِ ٱسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًۭا ۚ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَنِىٌّ عَنِ ٱلْعَـٰلَمِينَ
فِيهِ
उसमें
ءَايَـٰتٌۢ
निशानियाँ हैं
بَيِّنَـٰتٌۭ
वाज़ेह
مَّقَامُ
मक़ामे
إِبْرَٰهِيمَ ۖ
इब्राहीम है
وَمَن
और जो कोई
دَخَلَهُۥ
दाख़िल हुआ उसमें
كَانَ
वो हो गया
ءَامِنًۭا ۗ
अमन वाला
وَلِلَّهِ
और अल्लाह ही के लिए
عَلَى
ऊपर
ٱلنَّاسِ
लोगों के
حِجُّ
हज करना है
ٱلْبَيْتِ
बैतुल्लाह का
مَنِ
जो कोई
ٱسْتَطَاعَ
इस्तिताअत रखता हो
إِلَيْهِ
तरफ इसके
سَبِيلًۭا ۚ
रास्ते की
وَمَن
और जो कोई
كَفَرَ
कुफ़्र करे
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَنِىٌّ
बहुत बेनियाज़ है
عَنِ
of
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों से
"उसमें स्पष्ट निशानियाँ है, वह इबराहीम का स्थल है। और जिसने उसमें प्रवेश किया, वह निश्चिन्त हो गया। लोगों पर अल्लाह का हक़ है कि जिसको वहाँ तक पहुँचने की सामर्थ्य प्राप्त हो, वह इस घर का हज करे, और जिसने इनकार किया तो (इस इनकार से अल्लाह का कुछ नहीं बिगड़ता) अल्लाह तो सारे संसार से निरपेक्ष है।"
तफ़्सीर:
इस घर के अंदर उसके सम्मान एवं प्रतिष्ठा की स्पष्ट निशानियाँ हैं, जैसे हज्ज के कार्य और उसके निर्धारित स्थान। इन निशानियों में से एक वह पत्थर भी है, जिसपर इबराहीम अलैहिस्सलाम उस समय खड़े हुए थे जब उन्होंने काबा की दीवार को उठाना चाहा था। तथा एक निशानी यह भी है कि जो इसमें प्रवेश कर जाए, उससे भय दूर हो जाएगा और उसे कोई नुकसान नहीं पहुँचेगा। तथा अल्लाह के लिए लोगों पर हज्ज के अनुष्ठानों को पूरा करने के लिए इस घर को जाना अनिवार्य है। यह आदेश उनमें से उसके लिए है जो वहाँ तक पहुँचने में सक्षम है। और जिसने हज्ज के अनिवार्य होने का इनकार किया, तो (याद रखो कि) अल्लाह ऐसे काफ़िर से तथा समस्त संसार वालों से निस्पृह है।
आयत 98
قُلْ يَـٰٓأَهْلَ ٱلْكِتَـٰبِ لِمَ تَكْفُرُونَ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ وَٱللَّهُ شَهِيدٌ عَلَىٰ مَا تَعْمَلُونَ
قُلْ
कह दीजिए
يَـٰٓأَهْلَ
O People
ٱلْكِتَـٰبِ
ऐ अहले किताब
لِمَ
क्यों
تَكْفُرُونَ
तुम कुफ़्र करते हो
بِـَٔايَـٰتِ
in (the) Verses
ٱللَّهِ
अल्लाह की आयात का
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
شَهِيدٌ
ख़ूब गवाह है
عَلَىٰ
उस पर
مَا
जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
कहो, "ऐ किताबवालों! तुम अल्लाह की आयतों का इनकार क्यों करते हो, जबकि जो कुछ तुम कर रहे हो, अल्लाह की दृष्टिअ में है?"
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) आप कह दीजिए : ऐ किताब वाले यहूदियो और ईसाइयो! तुम नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सच्चे नबी होने के प्रमाणों का इनकार क्यों करते हो, जबकि उनमें से कुछ प्रमाण ऐसे हैं जो स्वयं तौरात और इंजील में वर्णित हैंॽ! अल्लाह तुम्हारे इस कार्य से अवगत और उसपर साक्षी है, और वह तुम्हें इसका बदला देगा।
आयत 99
قُلْ يَـٰٓأَهْلَ ٱلْكِتَـٰبِ لِمَ تَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ مَنْ ءَامَنَ تَبْغُونَهَا عِوَجًۭا وَأَنتُمْ شُهَدَآءُ ۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ
قُلْ
कह दीजिए
يَـٰٓأَهْلَ
O People
ٱلْكِتَـٰبِ
ऐ अहले किताब
لِمَ
क्यों
تَصُدُّونَ
तुम रोकते /फेरते हो
عَن
from
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते से
مَنْ
उसे जो
ءَامَنَ
ईमान लाया
تَبْغُونَهَا
तुम तलाश करते हो उसमें
عِوَجًۭا
टेढ़ापन/कजी
وَأَنتُمْ
हालाँकि तुम
شُهَدَآءُ ۗ
गवाह हो
وَمَا
और नहीं है
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِغَـٰفِلٍ
ग़ाफ़िल
عَمَّا
उससे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
कहो, "ऐ किताबवालो! तुम ईमान लानेवालों को अल्लाह के मार्ग से क्यो रोकते हो, तुम्हें उसमें किसी टेढ़ की तलाश रहती है, जबकि तुम भली-भाँति वास्तविकता से अवगत हो और जो कुछ तुम कर रहे हो, अल्लाह उससे बेख़बर नहीं है।"
तफ़्सीर:
(ऐ नबी!) आप कह दीजिए : ऐ किताब वाले यहूदियो और ईसाइयो! तुम उन लोगों को अल्लाह के धर्म से क्यों रोकते हो जो उसपर ईमान लाए हैंॽ! तुम चाहते हो कि अल्लाह का धर्म सत्य से असत्य की ओर और ईमान वाले मार्गदर्शन से पथभ्रष्टता की ओर मुड़ जाएँ। हालाँकि तुम इस बात के साक्षी हो कि यही धर्म ही सत्य है, उस चीज़ की पुष्टि करने वाला है जो तुम्हारी पुस्तकों में हैॽ! और अल्लाह उससे अनभिज्ञ नहीं है जो तुम उसके साथ कुफ़्र करते हो और उसके मार्ग से लोगों को रोकते हो, और वह तुम्हें इसका बदला देगा।
आयत 100
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِن تُطِيعُوا۟ فَرِيقًۭا مِّنَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ يَرُدُّوكُم بَعْدَ إِيمَـٰنِكُمْ كَـٰفِرِينَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوٓا۟
जो ईमान लाए हो
إِن
अगर
تُطِيعُوا۟
तुम इताअत करोगे
فَرِيقًۭا
एक गिरोह की
مِّنَ
from
ٱلَّذِينَ
उनमें से जो
أُوتُوا۟
दिए गए
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
يَرُدُّوكُم
वो फेर देंगे तुम्हें
بَعْدَ
बाद
إِيمَـٰنِكُمْ
तुम्हारे ईमान के
كَـٰفِرِينَ
काफ़िर (बनाकर)
ऐ ईमान लानेवालो! यदि तुमने उनके किसी गिरोह की बात माल ली, जिन्हें किताब मिली थी, तो वे तुम्हारे ईमान लाने के पश्चात फिर तुम्हें अधर्मी बना देंगे
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! यदि तुम किताब वाले यहूदियों और ईसाइयों के किसी समूह का उनकी बातों में पालन करोगे और उनकी राय को स्वीकार करोगे जो वे दावा करते हैं; तो वे अपनी ईर्ष्या और मार्गदर्शन से पथभ्रष्टता के कारण, तुम्हें ईमान (विश्वास) के बाद कुफ़्र (अविश्वास) की ओर लौटा देंगे।
आयत 101
وَكَيْفَ تَكْفُرُونَ وَأَنتُمْ تُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ ءَايَـٰتُ ٱللَّهِ وَفِيكُمْ رَسُولُهُۥ ۗ وَمَن يَعْتَصِم بِٱللَّهِ فَقَدْ هُدِىَ إِلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ
وَكَيْفَ
और कैसे
تَكْفُرُونَ
तुम कुफ़्र करते हो
وَأَنتُمْ
हालाँकि तुम
تُتْلَىٰ
पढ़ी जाती हैं
عَلَيْكُمْ
तुम पर
ءَايَـٰتُ
आयात
ٱللَّهِ
अल्लाह की
وَفِيكُمْ
और तुम में है
رَسُولُهُۥ ۗ
रसूल उसका
وَمَن
और जो
يَعْتَصِم
थाम ले
بِٱللَّهِ
अल्लाह को
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
هُدِىَ
वो हिदायत दे दिया गया
إِلَىٰ
to
صِرَٰطٍۢ
तरफ़ रास्ते
مُّسْتَقِيمٍۢ
सीधे के
अब तुम इनकार कैसे कर सकते हो, जबकि तुम्हें अल्लाह की आयतें पढ़कर सुनाई जा रही है और उसका रसूल तुम्हारे बीच मौजूद है? जो कोई अल्लाह को मज़बूती से पकड़ ले, वह सीधे मार्ग पर आ गया
तफ़्सीर:
तुम ईमान लाने के बाद अल्लाह का इनकार कैसे करोगे, जबकि तुम्हारे पास ईमान (विश्वास) पर दृढ़ता का सबसे बड़ा कारण मौजूद है! चुनाँचे तुम्हारे सामने अल्लाह की आयतें पढ़ी जाती हैं और स्वयं अल्लाह के रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तुम्हारे लिए उनका स्पष्टीकरण करते हैं। और जो व्यक्ति अल्लाह की पुस्तक तथा उसके रसूल की सुन्नत को थाम ले, तो वास्तव में अल्लाह ने उसे सीधे रास्ते की तौफीक़ प्रदान कर दी जिसमें कोई टेढ़ापन (कुटिलता) नहीं है।
आयत 102
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ حَقَّ تُقَاتِهِۦ وَلَا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَأَنتُم مُّسْلِمُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
ٱتَّقُوا۟
डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
حَقَّ
हक़ है (जैसे)
تُقَاتِهِۦ
उससे डरने का
وَلَا
and (do) not
تَمُوتُنَّ
और हरगिज़ ना तुम मरना
إِلَّا
मगर
وَأَنتُم
इस हाल में कि तुम
مُّسْلِمُونَ
मुसलमान हो
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह का डर रखो, जैसाकि उसका डर रखने का हक़ है। और तुम्हारी मृत्यु बस इस दशा में आए कि तुम मुस्लिम (आज्ञाकारी) हो
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! अपने पालनहार से वैसे ही डरो, जैसे उससे डरना चाहिए। और वह इस प्रकार कि उसके आदेशों का पालन करो, उसकी मना की हुई चीज़ों से दूर रहो है और उसकी नेमतों का शुक्र अदा करो। तथा अपने धर्म को मज़बूती से पकड़े रहो, यहाँ तक कि तुम्हारी मौत आए तो तुम इसी स्थिति में रहो।
आयत 103
وَٱعْتَصِمُوا۟ بِحَبْلِ ٱللَّهِ جَمِيعًۭا وَلَا تَفَرَّقُوا۟ ۚ وَٱذْكُرُوا۟ نِعْمَتَ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ إِذْ كُنتُمْ أَعْدَآءًۭ فَأَلَّفَ بَيْنَ قُلُوبِكُمْ فَأَصْبَحْتُم بِنِعْمَتِهِۦٓ إِخْوَٰنًۭا وَكُنتُمْ عَلَىٰ شَفَا حُفْرَةٍۢ مِّنَ ٱلنَّارِ فَأَنقَذَكُم مِّنْهَا ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمْ ءَايَـٰتِهِۦ لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ
وَٱعْتَصِمُوا۟
और मज़बूती से पकड़ लो
بِحَبْلِ
to (the) rope
ٱللَّهِ
अल्लाह की रस्सी को
جَمِيعًۭا
सबके सब
وَلَا
और ना
تَفَرَّقُوا۟ ۚ
तुम फ़िरक़ा-फ़िरका बनो
وَٱذْكُرُوا۟
और याद करो
نِعْمَتَ
नेअमत को
ٱللَّهِ
अल्लाह की
عَلَيْكُمْ
अपने ऊपर
إِذْ
जब
كُنتُمْ
थे तुम
أَعْدَآءًۭ
दुश्मन
فَأَلَّفَ
तो उसने उल्फ़त डाल दी
بَيْنَ
दर्मियान
قُلُوبِكُمْ
तुम्हारे दिलों के
فَأَصْبَحْتُم
तो हो गए तुम
بِنِعْمَتِهِۦٓ
उसकी नेअमत से
إِخْوَٰنًۭا
भाई-भाई
وَكُنتُمْ
और थे तुम
عَلَىٰ
on
شَفَا
किनारे पर
حُفْرَةٍۢ
गढ़े के
مِّنَ
of
ٱلنَّارِ
आग के
فَأَنقَذَكُم
तो उसने बचा लिया तुम्हें
مِّنْهَا ۗ
उससे
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يُبَيِّنُ
वाज़ेह करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
ءَايَـٰتِهِۦ
आयात अपनी
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَهْتَدُونَ
तुम हिदायत पाओ
और सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़ लो और विभेद में न पड़ो। और अल्लाह की उस कृपा को याद करो जो तुमपर हुई। जब तुम आपस में एक-दूसरे के शत्रु थे तो उसने तुम्हारे दिलों को परस्पर जोड़ दिया और तुम उसकी कृपा से भाई-भाई बन गए। तुम आग के एक गड्ढे के किनारे खड़े थे, तो अल्लाह ने उससे तुम्हें बचा लिया। इस प्रकार अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयते खोल-खोलकर बयान करता है, ताकि तुम मार्ग पा लो
तफ़्सीर:
((ऐ ईमान वालो) किताब और सुन्नत को मज़बूती से पकड़े रहो और ऐसा कार्य न करो जिससे मतभेद में पड़ जाओ। और तुम अपने ऊपर अल्लाह की उस कृपा को याद करो, जब तुम इस्लाम से पूर्व एक-दूसरे के शत्रु थे, छोटी से छोटी बात पर आपस में लड़ते थे। फिर उसने इस्लाम के द्वारा तुम्हारे दिलों को जोड़ दिया। चुनांचे तुम उसकी कृपा से एक दूसरे पर दया करने वाले तथा एक दूसरे की भलाई चाहने वाले धार्मिक भाई बन गए। हालाँकि इससे पूर्व तुम कुफ्र के कारण आग में प्रवेश करने के कगार पर थे। फिर अल्लाह ने तुम्हें इस्लाम के द्वारा उससे बचा लिया और तुम्हें ईमान के लिए मार्गदर्शन किया। जिस तरह अल्लाह ने तुम्हारे लिए इसे बयान किया है, उसी तरह वह तुम्हारे लिए वे सारी बातें बयान करता है, जो दुनिया एवं आख़िरत में तुम्हारी स्थितियों को सुधारने वाली हैं। ताकि तुम सीधा मार्ग पा सको और धार्मिकता के पथ पर चल सको।
आयत 104
وَلْتَكُن مِّنكُمْ أُمَّةٌۭ يَدْعُونَ إِلَى ٱلْخَيْرِ وَيَأْمُرُونَ بِٱلْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ ٱلْمُنكَرِ ۚ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ
وَلْتَكُن
और ज़रूर हो
مِّنكُمْ
तुम में से
أُمَّةٌۭ
एक गिरोह (के लोग)
يَدْعُونَ
जो दावत दें
إِلَى
to
ٱلْخَيْرِ
तरफ़ ख़ैर के
وَيَأْمُرُونَ
और जो हुक्म दें
بِٱلْمَعْرُوفِ
नेकी का
وَيَنْهَوْنَ
और जो रोकें
عَنِ
from
ٱلْمُنكَرِ ۚ
बुराई से
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْمُفْلِحُونَ
जो फ़लाह पाने वाले हैं
और तुम्हें एक ऐसे समुदाय का रूप धारण कर लेना चाहिए जो नेकी की ओर बुलाए और भलाई का आदेश दे और बुराई से रोके। यही सफलता प्राप्त करनेवाले लोग है
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो) तुम्हारे अंदर एक समूह ऐसा होना चाहिए जो हर उस भलाई की ओर बुलाए जो अल्लाह को पसंद है, वह उस नेकी का आदेश दे जो शरीयत से प्रमाणित है और शुद्ध बुद्धि उसे अच्छा समझती है, तथा उस बुराई से रोके जिससे शरीयत ने रोका है और शुद्ध बुद्धि उसे बुरा समझती है। तथा इस गुण से सुसज्जित लोग ही दुनिया एवं आख़िरत में सफलता प्राप्त करने वाले हैं।
आयत 105
وَلَا تَكُونُوا۟ كَٱلَّذِينَ تَفَرَّقُوا۟ وَٱخْتَلَفُوا۟ مِنۢ بَعْدِ مَا جَآءَهُمُ ٱلْبَيِّنَـٰتُ ۚ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌۭ
وَلَا
और ना
تَكُونُوا۟
तुम हो जाना
كَٱلَّذِينَ
उनकी तरह जो
تَفَرَّقُوا۟
फ़िरक़ा-फ़िरक़ा बन गए
وَٱخْتَلَفُوا۟
और उन्होंने इख़्तिलाफ़ किया
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद इसके
مَا
जो
جَآءَهُمُ
आ गईं उनके पास
ٱلْبَيِّنَـٰتُ ۚ
वाज़ेह निशानियाँ
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
عَظِيمٌۭ
बहुत बड़ा
तुम उन लोगों की तरह न हो जाना जो विभेद में पड़ गए, और इसके पश्चात कि उनके पास खुली निशानियाँ आ चुकी थी, वे विभेद में पड़ गए। ये वही लोग है, जिनके लिए बड़ी (घोर) यातना है। (यह यातना उस दिन होगी)
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो) तुम उन किताब वालों की तरह न हो जाओ, जो विभेद करके गिरोहों तथा दलों में बट गए। उन्होंने अल्लाह की ओर से उनके पास स्पष्ट निशानियाँ आ जाने के बाद अपने धर्म के बारे में मतभेद किया। और इन उक्त लोगों के लिए अल्लाह की ओर से बड़ी यातना है।
आयत 106
يَوْمَ تَبْيَضُّ وُجُوهٌۭ وَتَسْوَدُّ وُجُوهٌۭ ۚ فَأَمَّا ٱلَّذِينَ ٱسْوَدَّتْ وُجُوهُهُمْ أَكَفَرْتُم بَعْدَ إِيمَـٰنِكُمْ فَذُوقُوا۟ ٱلْعَذَابَ بِمَا كُنتُمْ تَكْفُرُونَ
يَوْمَ
जिस दिन
تَبْيَضُّ
रोशन होंगे
وُجُوهٌۭ
कुछ चेहरे
وَتَسْوَدُّ
और स्याह होंगे
وُجُوهٌۭ ۚ
कुछ चेहरे
فَأَمَّا
तो रहे
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ٱسْوَدَّتْ
स्याह होंगे
وُجُوهُهُمْ
चेहरे जिनके
أَكَفَرْتُم
क्या कुफ़्र किया तुमने
بَعْدَ
बाद
إِيمَـٰنِكُمْ
अपने ईमान के
فَذُوقُوا۟
पस चखो
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब को
بِمَا
बवजह उसके जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَكْفُرُونَ
तुम कुफ़्र करते
जिस दिन कितने ही चेहरे उज्ज्वल होंगे और कितने ही चेहरे काले पड़ जाएँगे, तो जिनके चेहेर काले पड़ गए होंगे (वे सदा यातना में ग्रस्त रहेंगे। खुली निशानियाँ आने का बाद जिन्होंने विभेद किया) उनसे कहा जाएगा, "क्या तुमने ईमान के पश्चात इनकार की नीति अपनाई? तो लो अब उस इनकार के बदले में जो तुम करते रहे हो, यातना का मज़ा चखो।"
तफ़्सीर:
यह बड़ा अज़ाब उनपर प्रलय के दिन उतरेगा, जब ईमान वालों के चेहरे खुशी और प्रसन्नता से चमक रहे होंगे और काफ़िरों के चेहरे दु:ख और उदासी से काले पड़ जाएंगे। चुनांचे उस महान दिन पर जिन लोगों के चेहरे काले पड़ गए होंगे, उन्हें डाँटते हुए कहा जाएगा : क्या तुमने, अपनी पुष्टि और स्वीकृति के बाद, अल्लाह के एकेश्वरवाद और उसके उस वचन का इनकार कर दिया, जो उसने तुमसे लिया था कि तुम उसके साथ किसी भी चीज़ को साझी नहीं ठहराओगेॽ! अतः तुम अल्लाह के उस अज़ाब का स्वाद चखो जो उसने तुम्हारे लिए तुम्हारे कुफ्र के कारण तैयार कर रखा है।
आयत 107
وَأَمَّا ٱلَّذِينَ ٱبْيَضَّتْ وُجُوهُهُمْ فَفِى رَحْمَةِ ٱللَّهِ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ
وَأَمَّا
और रहे
ٱلَّذِينَ
वो जो
ٱبْيَضَّتْ
सफ़ेद होंगे
وُجُوهُهُمْ
चेहरे जिनके
فَفِى
then (they will be) in
رَحْمَةِ
तो रहमत में होंगे
ٱللَّهِ
अल्लाह की
هُمْ
वो
فِيهَا
उसमें
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
रहे वे लोग जिनके चेहरे उज्ज्वल होंगे, वे अल्लाह की दयालुता की छाया में होंगे। वे उसी में सदैव रहेंगे
तफ़्सीर:
और जिनके चेहरे चमक रहे होंगे, उनका ठिकाना नेमतों वाली जन्नतों में होगा, जिनमें वे हमेशा रहेंगे। वे ऐसी नेमतों में होंगे, जो न कभी खत्म होंगी और न कभी बदलेंगी।
आयत 108
تِلْكَ ءَايَـٰتُ ٱللَّهِ نَتْلُوهَا عَلَيْكَ بِٱلْحَقِّ ۗ وَمَا ٱللَّهُ يُرِيدُ ظُلْمًۭا لِّلْعَـٰلَمِينَ
تِلْكَ
ये
ءَايَـٰتُ
आयात हैं
ٱللَّهِ
अल्लाह की
نَتْلُوهَا
हम पढ़ रहे हैं उन्हें
عَلَيْكَ
आप पर
بِٱلْحَقِّ ۗ
साथ हक़ के
وَمَا
और नहीं
ٱللَّهُ
अल्लाह
يُرِيدُ
इरादा रखता
ظُلْمًۭا
किसी ज़ुल्म का
لِّلْعَـٰلَمِينَ
जहान वालों के लिए
ये अल्लाह की आयतें है, जिन्हें हम हक़ के साथ तुम्हें सुना रहे है। अल्लाह संसारवालों पर किसी प्रकार का अत्याचार नहीं करना चाहता
तफ़्सीर:
(ऐ नबी) हम आपको अल्लाह के वचन एवं चेतावनी पर आधारित ये आयतें, समाचार में सच्चाई और प्रावधानों में न्याय के साथ पढ़कर सुनाते हैं। और अल्लाह संसार वालों में से किसी पर भी अत्याचार नहीं करना चाहता, बल्कि वह किसी को उसके हाथों की कमाई के कारण ही दंडित करता है।
आयत 109
وَلِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۚ وَإِلَى ٱللَّهِ تُرْجَعُ ٱلْأُمُورُ
وَلِلَّهِ
और अल्लाह ही के लिए है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ ۚ
ज़मीन में है
وَإِلَى
And to
ٱللَّهِ
और तरफ़ अल्लाह ही के
تُرْجَعُ
लौटाए जाते हैं
ٱلْأُمُورُ
सब काम
आकाशों और धरती मे जो कुछ है अल्लाह ही का है, और सारे मामले अल्लाह ही की ओर लौटाए जाते है
तफ़्सीर:
जो कुछ आकाशों में और जो कुछ धरती में है सबका स्वामी (राजा) अल्लाह सर्वशक्तिमान है, रचना की दृष्टि से भी और प्रबंधन की दृष्टि से भी, और उसकी सारी सृष्टि का मामला अंततः उसी सर्वशक्तिमान की ओर लौटना है। फिर वह उनमें से हर एक को उसकी पात्रता के अनुसार बदला देगा।
आयत 110
كُنتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ تَأْمُرُونَ بِٱلْمَعْرُوفِ وَتَنْهَوْنَ عَنِ ٱلْمُنكَرِ وَتُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ ۗ وَلَوْ ءَامَنَ أَهْلُ ٱلْكِتَـٰبِ لَكَانَ خَيْرًۭا لَّهُم ۚ مِّنْهُمُ ٱلْمُؤْمِنُونَ وَأَكْثَرُهُمُ ٱلْفَـٰسِقُونَ
كُنتُمْ
हो तुम
خَيْرَ
बेहतरीन
أُمَّةٍ
उम्मत
أُخْرِجَتْ
निकाली गई हो
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
تَأْمُرُونَ
तुम हुक्म देते हो
بِٱلْمَعْرُوفِ
मारूफ़/अच्छाई का
وَتَنْهَوْنَ
और तुम रोकते हो
عَنِ
[from]
ٱلْمُنكَرِ
मुन्कर/बुराई से
وَتُؤْمِنُونَ
और तुम ईमान लाते हो
بِٱللَّهِ ۗ
अल्लाह पर
وَلَوْ
और अगर
ءَامَنَ
ईमान लाते
أَهْلُ
(the) People
ٱلْكِتَـٰبِ
अहले किताब
لَكَانَ
अलबत्ता होता
خَيْرًۭا
बेहतर
لَّهُم ۚ
उनके लिए
مِّنْهُمُ
बाज़ उनके
ٱلْمُؤْمِنُونَ
मोमिन हैं
وَأَكْثَرُهُمُ
और अक्सर उनके
ٱلْفَـٰسِقُونَ
फ़ासिक़ है
तुम एक उत्तम समुदाय हो, जो लोगों के समक्ष लाया गया है। तुम नेकी का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो। और यदि किताबवाले भी ईमान लाते तो उनके लिए यह अच्छा होता। उनमें ईमानवाले भी हैं, किन्तु उनमें अधिकतर लोग अवज्ञाकारी ही हैं
तफ़्सीर:
(ऐ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उम्मत के लोगो!) तुम अपने ईमान एवं कर्म में सबसे अच्छी उम्मत हो, जिसे अल्लाह ने लोगों के लिए प्रकट किया है, और तुम लोगों के लिए सबसे अधिक लाभकारी लोग हो, तुम उस अच्छी बात का आदेश देते हो जो शरीयत से प्रमाणित है और शुद्ध बुद्धि उसे अच्छा समझती है, और उस बुराई से रोकते हो जिससे शरीयत ने रोका है और शुद्ध बुद्धि उसे बुरा समझती है। और तुम अल्लाह पर दृढ़ विश्वास रखते हो, जिसकी तुम्हारे कार्य से पुष्टि होती है। और यदि किताब वाले यहूदी और ईसाई मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर ईमान लाते, तो यह उनके लिए दुनिया एवं आख़़िरत दोनों में बेहतर होता। किताब वालों में से बहुत कम लोग हैं, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की लाई हुई शरीयत पर विश्वास रखते हैं, जबकि उनमें से अधिकांश लोग अल्लाह के धर्म और उसकी शरीयत से बाहर हैं।
आयत 111
لَن يَضُرُّوكُمْ إِلَّآ أَذًۭى ۖ وَإِن يُقَـٰتِلُوكُمْ يُوَلُّوكُمُ ٱلْأَدْبَارَ ثُمَّ لَا يُنصَرُونَ
لَن
हरगिज़ नहीं
يَضُرُّوكُمْ
वो नुक़सान देंगे तुम्हें
إِلَّآ
सिवाय
أَذًۭى ۖ
अज़ियत के
وَإِن
और अगर
يُقَـٰتِلُوكُمْ
वो जंग करेंगे तुमसे
يُوَلُّوكُمُ
वो फेर दें तुमसे
ٱلْأَدْبَارَ
पुश्तें
ثُمَّ
फिर
لَا
not
يُنصَرُونَ
ना वो मदद किए जाऐंगे
थोड़ा दुख पहुँचाने के अतिरिक्त वे तुम्हारा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते। और यदि वे तुमसे लड़ेंगे, तो तुम्हें पीठ दिखा जाएँगे, फिर उन्हें कोई सहायता भी न मिलेगी
तफ़्सीर:
वे चाहे जितनी भी दुश्मनी कर लें, वे तुम्हें - ऐ ईमान वालो - तुम्हारे धर्म तथा तुम्हारी जानों के संबंध में कोई हानि नहीं पहुँचा सकते। वे केवल अपनी ज़बान से धर्म पर दोषारोपण करके तथा तुम्हारा मज़ाक उड़ाकर, तुम्हें कष्ट दे सकते हैं। यदि वे तुम्हारे साथ युद्ध करें, तो तुम्हारे सामने पराजित होकर भाग खड़े होंगे और तुम्हारे विरुद्ध उनकी कभी भी सहायता नहीं की जाएगी।
आयत 112
ضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ ٱلذِّلَّةُ أَيْنَ مَا ثُقِفُوٓا۟ إِلَّا بِحَبْلٍۢ مِّنَ ٱللَّهِ وَحَبْلٍۢ مِّنَ ٱلنَّاسِ وَبَآءُو بِغَضَبٍۢ مِّنَ ٱللَّهِ وَضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ ٱلْمَسْكَنَةُ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَانُوا۟ يَكْفُرُونَ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ وَيَقْتُلُونَ ٱلْأَنۢبِيَآءَ بِغَيْرِ حَقٍّۢ ۚ ذَٰلِكَ بِمَا عَصَوا۟ وَّكَانُوا۟ يَعْتَدُونَ
ضُرِبَتْ
मार दी गई
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلذِّلَّةُ
ज़िल्लत
أَيْنَ
wherever
مَا
जहाँ कहीं
ثُقِفُوٓا۟
वो पाए गए
إِلَّا
मगर
بِحَبْلٍۢ
साथ रस्सी (ताल्लुक़) के
مِّنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह की
وَحَبْلٍۢ
और रस्सी (ताल्लुक़) के
مِّنَ
from
ٱلنَّاسِ
लोगों की
وَبَآءُو
और वो लौटे
بِغَضَبٍۢ
साथ ग़ज़ब के
مِّنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
وَضُرِبَتْ
और मार दी गई
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلْمَسْكَنَةُ ۚ
मोहताजी
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّهُمْ
बवजह उसके कि वो
كَانُوا۟
थे वो
يَكْفُرُونَ
वो कुफ़्र करते
بِـَٔايَـٰتِ
in (the) Verses
ٱللَّهِ
अल्लाह की आयात का
وَيَقْتُلُونَ
और वो क़त्ल करते
ٱلْأَنۢبِيَآءَ
नबियों को
بِغَيْرِ
बग़ैर
حَقٍّۢ ۚ
हक़ के
ذَٰلِكَ
ये
بِمَا
बवजह उसके जो
عَصَوا۟
उन्होंने नाफ़रमानी की
وَّكَانُوا۟
और थे वो
يَعْتَدُونَ
वो हद से बढ़ जाते
वे जहाँ कहीं भी पाए गए उनपर ज़िल्लत (अपमान) थोप दी गई। किन्तु अल्लाह की रस्सी थामें या लोगों का रस्सी, तो और बात है। वे ल्लाह के प्रकोप के पात्र हुए और उनपर दशाहीनता थोप दी गई। यह इसलिए कि वे अल्लाह की आयतों का इनकार और नबियों को नाहक़ क़त्ल करते रहे है। और यह इसलिए कि उन्होंने अवज्ञा की और सीमोल्लंघन करते रहे
तफ़्सीर:
यहूदी जहाँ भी रहें, अपमान और तिरस्कार उन्हें घेरे हुए और उनपर हावी है। अतः वे उसी समय सुरक्षित रह सकते हैं, जब उन्हें सर्वशक्तिमान अल्लाह की ओर से या लोगों की ओर से वचन अथवा शरण (सुरक्षा) मिल जाए। तथा वे अल्लाह के प्रकोप व क्रोध के पात्र बन गए हैं और ज़रूरत और दरिद्रता उनपर चारों ओर से घेर दी गई है। और यह सब इस कारण हुआ कि वे अल्लाह की निशानियों का इनकार करते और अल्लाह के नबियों की अन्यायपूर्वक हत्या करते थे। और ऐसा इसलिए - भी - हुआ कि वे अवज्ञा करते और अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करते थे।
आयत 113
۞ لَيْسُوا۟ سَوَآءًۭ ۗ مِّنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ أُمَّةٌۭ قَآئِمَةٌۭ يَتْلُونَ ءَايَـٰتِ ٱللَّهِ ءَانَآءَ ٱلَّيْلِ وَهُمْ يَسْجُدُونَ
۞ لَيْسُوا۟
नहीं हैं वो सब
سَوَآءًۭ ۗ
यकसाँ/बराबर
مِّنْ
among
أَهْلِ
(the) People
ٱلْكِتَـٰبِ
अहले किताब में से
أُمَّةٌۭ
एक जमाअत है
قَآئِمَةٌۭ
जो क़ायम (हक़ पर)
يَتْلُونَ
वो तिलावत करते हैं
ءَايَـٰتِ
(the) Verses
ٱللَّهِ
अल्लाह की आयात की
ءَانَآءَ
घड़ियों में
ٱلَّيْلِ
रात की
وَهُمْ
और वो
يَسْجُدُونَ
वो सजदा करते हैं
ये सब एक जैसे नहीं है। किताबवालों में से कुछ ऐसे लोग भी है जो सीधे मार्ग पर है और रात की घड़ियों में अल्लाह की आयतें पढ़ते है और वे सजदा करते रहनेवाले है
तफ़्सीर:
किताब वाले अपनी स्थिति में समान नहीं हैं। बल्कि उनमें से एक समूह अल्लाह के धर्म पर सुदृढ़ है और अल्लाह के आदेश व निषेध का पालन करता हैं। वे रात की घड़ियों में अल्लाह की आयतों का पाठ करते हैं जबकि वे अल्लाह के लिए नमाज़ पढ़ रहे होते हैं। यह समूह पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नबी बनाए जाने से पहले था और उनमें से जिसे नुबुव्वत का समय काल मिला, उसने इस्लाम ग्रहण कर लिया।
आयत 114
يُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ وَيَأْمُرُونَ بِٱلْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ ٱلْمُنكَرِ وَيُسَـٰرِعُونَ فِى ٱلْخَيْرَٰتِ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ مِنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ
يُؤْمِنُونَ
वो ईमान रखते हैं
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَٱلْيَوْمِ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرِ
और आख़िरी दिन पर
وَيَأْمُرُونَ
और वो हुक्म देते हैं
بِٱلْمَعْرُوفِ
नेकी का
وَيَنْهَوْنَ
और वो रोकते हैं
عَنِ
[from]
ٱلْمُنكَرِ
बुराई से
وَيُسَـٰرِعُونَ
और वो एक दूसरे से जल्दी करते हैं
فِى
in
ٱلْخَيْرَٰتِ
नेकियों में
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
مِنَ
(are) from
ٱلصَّـٰلِحِينَ
सालेहीन में से
वे अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखते है और नेकी का हुक्म देते और बुराई से रोकते है और नेक कामों में अग्रसर रहते है, और वे अच्छे लोगों में से है
तफ़्सीर:
वे अल्लाह तथा अंतिम दिन पर दृढ़ विश्वास रखते हैं, और अच्छी बातों और भलाई का आदेश देते हैं, तथा घृणित बातों और बुराई से रोकते हैं, और अच्छे कार्यों में जल्दी करते हैं, तथा नेकियों के अवसरों का लाभ उठाते हैं। और इन गुणों से विशिष्ट लोग ही अल्लाह के ऐसे बंदे हैं, जिनके इरादे और कार्य अच्छे हैं।
आयत 115
وَمَا يَفْعَلُوا۟ مِنْ خَيْرٍۢ فَلَن يُكْفَرُوهُ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌۢ بِٱلْمُتَّقِينَ
وَمَا
और जो भी
يَفْعَلُوا۟
वो करेंगे
مِنْ
of
خَيْرٍۢ
भलाई में से
فَلَن
तो हरगिज़ नहीं
يُكْفَرُوهُ ۗ
वो नाक़द्री किए जाऐंगे उसकी
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों को
जो नेकी भी वे करेंगे, उसकी अवमानना न होगी। अल्लाह का डर रखनेवालो से भली-भाँति परिचित है
तफ़्सीर:
ये लोग जो भी थोड़ा या बहुत अच्छा कार्य करेंगे, उसका पुण्य कदापि अकारथ नहीं जाएगा और उसके प्रतिफल में कमी नहीं की जाएगी। और अल्लाह उन परहेज़गार लोगों को भली-भाँति जानता है, जो उसके आदेशों का पालन करते तथा उसकी मना की हुई चीज़ों से बचते हैं। उनके कार्यों में से कुछ भी उससे छिपा नहीं है और वह उन्हें उनका बदला देगा।
आयत 116
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لَن تُغْنِىَ عَنْهُمْ أَمْوَٰلُهُمْ وَلَآ أَوْلَـٰدُهُم مِّنَ ٱللَّهِ شَيْـًۭٔا ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ ۚ هُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لَن
हरगिज़ नहीं
تُغْنِىَ
काम आऐंगे
عَنْهُمْ
उन्हें
أَمْوَٰلُهُمْ
माल उनके
وَلَآ
और ना
أَوْلَـٰدُهُم
औलाद उनकी
مِّنَ
against
ٱللَّهِ
अल्लाह से
شَيْـًۭٔا ۖ
कुछ भी
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
أَصْحَـٰبُ
साथी
ٱلنَّارِ ۚ
आग के
هُمْ
वो
فِيهَا
उसमें
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हैं
रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया, तो अल्लाह के मुक़ाबले में न उनके माल कुछ काम आ सकेंगे और न उनकी सन्तान ही। वे तो आग में जानेवाले लोग है, उसी में वे सदैव रहेंगे
तफ़्सीर:
निःसंदेह जिन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल का इनकार किया, उनके धन और उनकी संतान अल्लाह के मुक़ाबले में उनके कुछ भी काम नहीं आएंगे। वे न उनसे उसके अज़ाब को दूर करेंगे और न उनके लिए उसकी दया को लाएंगे। बल्कि उनकी पीड़ा और खेद में वृद्धि कर देंगे। तथा वही लोग नरक वाले हैं जो उसमें हमेशा रहेंगे।
आयत 117
مَثَلُ مَا يُنفِقُونَ فِى هَـٰذِهِ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا كَمَثَلِ رِيحٍۢ فِيهَا صِرٌّ أَصَابَتْ حَرْثَ قَوْمٍۢ ظَلَمُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ فَأَهْلَكَتْهُ ۚ وَمَا ظَلَمَهُمُ ٱللَّهُ وَلَـٰكِنْ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ
مَثَلُ
मिसाल
مَا
उसकी जो
يُنفِقُونَ
वो ख़र्च करते हैं
فِى
in
هَـٰذِهِ
this
ٱلْحَيَوٰةِ
इस ज़िन्दगी में
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
كَمَثَلِ
मानिन्द मिसाल
رِيحٍۢ
हवा के है
فِيهَا
जिस में
صِرٌّ
सख़्त सर्दी हो
أَصَابَتْ
वो पहुँचे
حَرْثَ
खेती को
قَوْمٍۢ
एक क़ौम की
ظَلَمُوٓا۟
जिन्होंने ज़ुल्म किया
أَنفُسَهُمْ
अपने नफ़्सों पर
فَأَهْلَكَتْهُ ۚ
तो उसने हलाक कर दिया उसे
وَمَا
और नहीं
ظَلَمَهُمُ
ज़ुल्म किया उन पर
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
وَلَـٰكِنْ
और लेकिन
أَنفُسَهُمْ
अपने ही नफ़्सों पर
يَظْلِمُونَ
वो ज़ुल्म करते थे
इस सांसारिक जीवन के लिए जो कुछ भी वे ख़र्च करते है, उसकी मिसाल उस वायु जैसी है जिसमें पाला हो और वह उन लोगों की खेती पर चल जाए, जिन्होंने अपने ऊपर अत्याचार नहीं किया, अपितु वे तो स्वयं अपने ऊपर अत्याचार कर रहे है
तफ़्सीर:
ये काफ़िर (नास्तिक) लोग पुण्य के रास्तों में जो कुछ खर्च करते हैं और वे उसके प्रतिफल की जो प्रतीक्षा करते हैं, उसका उदाहरण उस हवा की तरह है जिसमें अत्यधिक ठंड हो, जो किसी ऐसी क़ौम की खेती को लग जाए जिन्होंने पापों आदि के द्वारा अपने आप पर अत्याचार किया हो, और वह उसे बर्बाद कर दे, हालाँकि उन्हें उससे अच्छी पैदावार की आशा थी। तो जिस तरह इस हवा ने खेती को नष्ट कर दिया और उससे लाभ नहीं उठाया जा सका, उसी प्रकार कुफ्र उनके उन कार्यों के प्रतिफल को व्यर्थ (अमान्य) कर देगा जिसकी वे आशा रखते हैं। अल्लाह ने उनपर अत्याचार नहीं किया - अल्लाह ऐसा करने से सर्वोच्च है -, बल्कि उन्होंने अल्लाह का इनकार करके तथा उसके रसूलों को झुठलाकर स्वयं अपने आप पर अत्याचार किया।
आयत 118
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَتَّخِذُوا۟ بِطَانَةًۭ مِّن دُونِكُمْ لَا يَأْلُونَكُمْ خَبَالًۭا وَدُّوا۟ مَا عَنِتُّمْ قَدْ بَدَتِ ٱلْبَغْضَآءُ مِنْ أَفْوَٰهِهِمْ وَمَا تُخْفِى صُدُورُهُمْ أَكْبَرُ ۚ قَدْ بَيَّنَّا لَكُمُ ٱلْـَٔايَـٰتِ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْقِلُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Do) not
تَتَّخِذُوا۟
ना तुम बनाओ
بِطَانَةًۭ
दिली दोस्त/राज़दान
مِّن
from
دُونِكُمْ
अपने इलावा को
لَا
not
يَأْلُونَكُمْ
ना वो कमी करेंगे तुमसे
خَبَالًۭا
किसी ख़राबी की
وَدُّوا۟
वो दिल से चाहते हैं
مَا
what
عَنِتُّمْ
कि मुश्किल में पड़ो तुम
قَدْ
तहक़ीक़
بَدَتِ
ज़ाहिर हो गया
ٱلْبَغْضَآءُ
बुग़्ज़
مِنْ
from
أَفْوَٰهِهِمْ
उनके मुँहों से
وَمَا
और जो
تُخْفِى
छुपाते है
صُدُورُهُمْ
सीने उनके
أَكْبَرُ ۚ
ज़्यादा बड़ा है
قَدْ
तहक़ीक़
بَيَّنَّا
वाज़ेह कर दीं हमने
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْـَٔايَـٰتِ ۖ
निशानियाँ
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल रखते
ऐ ईमान लानेवालो! अपनों को छोड़कर दूसरों को अपना अंतरंग मित्र न बनाओ, वे तुम्हें नुक़सान पहुँचाने में कोई कमी नहीं करते। जितनी भी तुम कठिनाई में पड़ो, वही उनको प्रिय है। उनका द्वेष तो उनके मुँह से व्यक्त हो चुका है और जो कुछ उनके सीने छिपाए हुए है, वह तो इससे भी बढ़कर है। यदि तुम बुद्धि से काम लो, तो हमने तुम्हारे लिए निशानियाँ खोलकर बयान कर दी हैं
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! तुम ईमान वालों को छोड़कर दूसरों को अपना जिगरी दोस्त और अंतरंग मित्र न बनाओ, जिन्हें तुम अपने भेदों और विशिष्ट स्थितियों की जानकारी दो। क्योंकि वे तुम्हारी स्थिति बिगाड़ने और तुम्हें नुकसान पहुँचाने में कोई कमी नहीं करते हैं। उनकी इच्छा है कि तुम्हें हानि और कष्ट पहुँचे। तुम्हारे धर्म पर आरोप लगाकर, तुम्हारे बीच फूट डालकर और तुम्हारे भेदों को प्रकट करके उन्होंने अपने मुँह से घृणा और दुश्मनी को प्रकट कर दिया है। और जो नफ़रत वे अपने ह्रदय में छिपाए बैठे हैं, वह इससे कहीं बढ़कर है। (ऐ मोमिनो) हमने तुम्हारे सामने उस चीज़ के स्पष्ट प्रमाण रख दिए हैं, जिसमें तुम्हारे लोक और परलेक के हित निहित हैं, यदि तुम अपने पालनहार की ओर उतारी गई आयतों को समझ सकते हो।
आयत 119
هَـٰٓأَنتُمْ أُو۟لَآءِ تُحِبُّونَهُمْ وَلَا يُحِبُّونَكُمْ وَتُؤْمِنُونَ بِٱلْكِتَـٰبِ كُلِّهِۦ وَإِذَا لَقُوكُمْ قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا وَإِذَا خَلَوْا۟ عَضُّوا۟ عَلَيْكُمُ ٱلْأَنَامِلَ مِنَ ٱلْغَيْظِ ۚ قُلْ مُوتُوا۟ بِغَيْظِكُمْ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ
هَـٰٓأَنتُمْ
ख़बरदार तुम
أُو۟لَآءِ
वो लोग हो
تُحِبُّونَهُمْ
तुम मोहब्बत रखते हो उनसे
وَلَا
और नहीं
يُحِبُّونَكُمْ
वो मोहब्बत रखते तुम से
وَتُؤْمِنُونَ
और तुम ईमान रखते हो
بِٱلْكِتَـٰبِ
किताब पर
كُلِّهِۦ
सारी की सारी
وَإِذَا
और जब
لَقُوكُمْ
वो मुलाक़ात करते हैं तुमसे
قَالُوٓا۟
वो कहते हैं
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
وَإِذَا
और जब
خَلَوْا۟
वो तन्हा होते हैं
عَضُّوا۟
वो काटते हैं
عَلَيْكُمُ
तुम पर
ٱلْأَنَامِلَ
उँगलियाँ
مِنَ
(out) of
ٱلْغَيْظِ ۚ
ग़ुस्से से
قُلْ
कह दीजिए
مُوتُوا۟
मर जाओ
بِغَيْظِكُمْ ۗ
साथ अपने ग़ुस्से के
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِذَاتِ
of what
ٱلصُّدُورِ
सीनों वाले (भेद)
ये चो तुम हो जो उनसे प्रेम करते हो और वे तुमसे प्रेम नहीं करते, जबकि तुम समस्त किताबों पर ईमान रखते हो। और वे जब तुमसे मिलते है तो कहने को तो कहते है कि "हम ईमान लाए है।" किन्तु जब वे अलग होते है तो तुमपर क्रोध के मारे दाँतों से उँगलियाँ काटने लगते है। कह दो, "तुम अपने क्रोध में आप मरो। निस्संदेह अल्लाह दिलों के भेद को जानता है।"
तफ़्सीर:
देखो (ऐ ईमान वालो!) तुम उन लोगों से प्रेम करते हो और उनके लिए अच्छाई की आशा करते हो, जबकि वे तुमसे प्रेम नहीं करते और न तुम्हारे लिए अच्छाई की कामना करते हैं, बल्कि इसके विपरीत वे तुमसे द्वेष रखते हैं। तथा तुम सभी पुस्तकों पर विश्वास रखते हो, जिनमें उनकी पुस्तकें भी शामिल हैं। परंतु वे उस पुस्तक पर ईमान नहीं रखते जो अल्लाह ने तुम्हारे नबी पर उतारी है। जब वे तुमसे मिलते हैं, तो अपनी ज़बान से कहते हैं कि हमने सत्य को मान लिया, परंतु जब वे अकेले में होते हैं, तो तुम्हारी एकता, अखंडता और इस्लाम की गरिमा तथा अपना अपमान देखकर शोक और क्रोध में अपनी उँगलियों के पोरों को काटते हैं। (ऐ नबी!) आप उन लोगों से कह दीजिए : तुम इसी हाल में रहो यहाँ तक कि शोक और क्रोध में मर जाओ। निःसंदेह अल्लाह दिलों में पाए जाने वाले ईमान और कुफ़्र तथा अच्छाई और बुराई को जानता है।
आयत 120
إِن تَمْسَسْكُمْ حَسَنَةٌۭ تَسُؤْهُمْ وَإِن تُصِبْكُمْ سَيِّئَةٌۭ يَفْرَحُوا۟ بِهَا ۖ وَإِن تَصْبِرُوا۟ وَتَتَّقُوا۟ لَا يَضُرُّكُمْ كَيْدُهُمْ شَيْـًٔا ۗ إِنَّ ٱللَّهَ بِمَا يَعْمَلُونَ مُحِيطٌۭ
إِن
अगर
تَمْسَسْكُمْ
पहुँचे तुम्हें
حَسَنَةٌۭ
कोई भलाई
تَسُؤْهُمْ
वो बुरी लगती है उन्हें
وَإِن
और अगर
تُصِبْكُمْ
पहुँचती है तुम्हें
سَيِّئَةٌۭ
कोई बुराई
يَفْرَحُوا۟
वो ख़ुश होते हैं
بِهَا ۖ
उस पर
وَإِن
और अगर
تَصْبِرُوا۟
तुम सब्र करो
وَتَتَّقُوا۟
और तुम तक़वा करो
لَا
not
يَضُرُّكُمْ
ना नुक़सान देगी तुम्हें
كَيْدُهُمْ
चाल उनकी
شَيْـًٔا ۗ
कुछ भी
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
بِمَا
उसको जो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते हैं
مُحِيطٌۭ
घेरने वाला है
यदि तुम्हारा कोई भला होता है तो उन्हें बुरा लगता है। परन्तु यदि तुम्हें कोई अप्रिय बात पेश आती है तो उससे वे प्रसन्न हो जाते है। यदि तुमने धैर्य से काम लिया और (अल्लाह का) डर रखा, तो उनकी कोई चाल तुम्हें नुक़सान नहीं पहुँचा सकती। जो कुछ वे कर रहे है, अल्लाह ने उसे अपने धेरे में ले रखा है
तफ़्सीर:
यदि (ऐ ईमान वालो!) तुम्हें कोई नेमत मिल जाए, जैसे शत्रुओं पर विजय अथवा धन और संतान में वृद्धि; तो उन्हें दु:ख और चिंता घेर लेती है, और यदि तुम्हें कोई विपत्ति पहुँचे, जैसे दुश्मनों की जीत अथवा धन एवं संतान में कमी, तो इससे वे प्रसन्न होते हैं और तुम्हारी विपदा पर खुश होते हैं। लेकिन यदि तुम अल्लाह के आदेशों तथा उसके निर्धारित भाग्यों पर धैर्य से काम लो और अपने ऊपर उसके क्रोध से बचते रहो; तो उनके छल करने और कष्ट देने से तुम्हें कोई नुकसान नहीं होगा। नि:संदेह अल्लाह उनकी चालबाज़ियों से अवगत है और वह उन्हें निराश लौटाएगा।
आयत 121
وَإِذْ غَدَوْتَ مِنْ أَهْلِكَ تُبَوِّئُ ٱلْمُؤْمِنِينَ مَقَـٰعِدَ لِلْقِتَالِ ۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
وَإِذْ
और जब
غَدَوْتَ
सुबह सवेरे निकले आप
مِنْ
from
أَهْلِكَ
अपने घर वालों से
تُبَوِّئُ
आप मुतय्यन (तैनात) कर रहे थे
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों को
مَقَـٰعِدَ
ठिकानों/मोर्चों पर
لِلْقِتَالِ ۗ
जंग के लिए
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
سَمِيعٌ
ख़ूब सुनने वाला है
عَلِيمٌ
ख़ूब जानने वाला है
याद करो जब तुम सवेरे अपने घर से निकलकर ईमानवालों को युद्ध के मोर्चों पर लगा रहे थे। - अल्लाह तो सब कुछ सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
तथा (ऐ नबी) आप उस समय को याद कीजिए, जब आप मदीना से, उहुद के मैदान में, मुश्रिकों से युद्ध के लिए निकल पड़े, जहाँ आपने ईमान वालों को उनके युद्ध के स्थानों पर नियुक्त करना आरंभ किया। चुनांचे आपने प्रत्येक व्यक्ति को उसका स्थान बताया। और अल्लाह तुम्हारी बातों को सुनने वाला, तुम्हारे कामों को जानने वाला है।
आयत 122
إِذْ هَمَّت طَّآئِفَتَانِ مِنكُمْ أَن تَفْشَلَا وَٱللَّهُ وَلِيُّهُمَا ۗ وَعَلَى ٱللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ ٱلْمُؤْمِنُونَ
إِذْ
जब
هَمَّت
इरादा किया
طَّآئِفَتَانِ
दो गिरोहों ने
مِنكُمْ
तुम में से
أَن
कि
تَفْشَلَا
वो दोनों बुज़दिली दिखाऐं
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
وَلِيُّهُمَا ۗ
मददगार था उन दोनों का
وَعَلَى
And on
ٱللَّهِ
और अल्लाह ही पर
فَلْيَتَوَكَّلِ
पस चाहिए कि तवक्कल करें
ٱلْمُؤْمِنُونَ
ईमान वाले
जब तुम्हारे दो गिरोहों ने साहस छोड़ देना चाहा, जबकि अल्लाह उनका संरक्षक मौजूद था - और ईमानवालों को तो अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए
तफ़्सीर:
(ऐ नबी) याद कीजिए जो कुछ विश्वासियों के दो समूहों बनू सलिमा और बनू हारिसा के साथ घटित हुआ, जिस समय वे साहसहीन हो गए और मुनाफिक़ों (पाखंडियों) के वापस आने पर वापसी का इरादा कर लिया, हालाँकि अल्लाह उन्हें लड़ाई पर सुदृढ़ रखकर तथा उन्हें उनके उस इरादे से फेरकर उनकी सहायता करने वाला है। और मोमिनों को अपनी सभी स्थितियों में अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए।
आयत 123
وَلَقَدْ نَصَرَكُمُ ٱللَّهُ بِبَدْرٍۢ وَأَنتُمْ أَذِلَّةٌۭ ۖ فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
نَصَرَكُمُ
मदद की तुम्हारी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
بِبَدْرٍۢ
बदर में
وَأَنتُمْ
हालाँकि तुम
أَذِلَّةٌۭ ۖ
कमज़ोर थे
فَٱتَّقُوا۟
पस डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَشْكُرُونَ
तुम शुक्र अदा करो
और बद्र में अल्लाह तुम्हारी सहायता कर भी चुका था, जबकि तुम बहुत कमज़ोर हालत में थे। अतः अल्लाह ही का डर रखो, ताकि तुम कृतज्ञ बनो
तफ़्सीर:
और अल्लाह बद्र के युद्ध में बहुदेववादियों के विरुद्ध तुम्हारी सहायता कर चुका है, जबकि तुम अपनी संख्या और उपकरणों की कमी के कारण कमज़ोर थे। अतः अल्लाह से डरो, ताकि तुम अपने ऊपर उसकी नेमतों के लिए आभारी हो सको।
आयत 124
إِذْ تَقُولُ لِلْمُؤْمِنِينَ أَلَن يَكْفِيَكُمْ أَن يُمِدَّكُمْ رَبُّكُم بِثَلَـٰثَةِ ءَالَـٰفٍۢ مِّنَ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ مُنزَلِينَ
إِذْ
जब
تَقُولُ
आप कह रहे थे
لِلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों को
أَلَن
क्या नहीं
يَكْفِيَكُمْ
काफ़ी होगा तुम्हें
أَن
कि
يُمِدَّكُمْ
मदद करे तुम्हारी
رَبُّكُم
रब तुम्हारा
بِثَلَـٰثَةِ
साथ तीन
ءَالَـٰفٍۢ
हज़ार
مِّنَ
[of]
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ
फ़रिश्तों के
مُنزَلِينَ
उतारे हुए
जब तुम ईमानवालों से कह रहे थे, "क्या यह तुम्हारे लिए काफ़ी नही हैं कि तुम्हारा रब तीन हज़ार फ़रिश्ते उतारकर तुम्हारी सहायता करे?"
तफ़्सीर:
(ऐ नबी) उस समय को याद कीजिए, जब विश्वासियों के बहुदेववादियों के लिए आने वाली सहायता के बारे में सुनने के बाद आपने उन्हें बद्र की लड़ाई में साहस दिलाते हुए उनसे कहा : क्या तुम्हारे लिए यह पर्याप्त नहीं होगा कि अल्लाह तुम्हें लड़ाई में मजबूत करने के लिए अपनी ओर से उतारे हुऐ तीन हज़ार फरिश्तों के द्वारा तुम्हारी सहायता करे?!
आयत 125
بَلَىٰٓ ۚ إِن تَصْبِرُوا۟ وَتَتَّقُوا۟ وَيَأْتُوكُم مِّن فَوْرِهِمْ هَـٰذَا يُمْدِدْكُمْ رَبُّكُم بِخَمْسَةِ ءَالَـٰفٍۢ مِّنَ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ مُسَوِّمِينَ
بَلَىٰٓ ۚ
क्यों नहीं/बल्कि
إِن
अगर
تَصْبِرُوا۟
तुम सब्र करोगे
وَتَتَّقُوا۟
और तुम तक़वा करोगे
وَيَأْتُوكُم
और वो आऐं तुम्हारे पास
مِّن
[of]
فَوْرِهِمْ
अपने जोश से
هَـٰذَا
इस तरह
يُمْدِدْكُمْ
मदद करेगा तुम्हारी
رَبُّكُم
रब तुम्हारा
بِخَمْسَةِ
साथ पाँच
ءَالَـٰفٍۢ
हज़ार
مِّنَ
[of]
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ
फ़रिश्तों के
مُسَوِّمِينَ
निशान लगाने वाले
हाँ, क्यों नहीं। यदि तुम धैर्य से काम लो और डर रखो, फिर शत्रु सहसा तुमपर चढ़ आएँ, उसी क्षण तुम्हारा रब पाँच हज़ार विध्वंशकारी फ़रिश्तों से तुम्हारी सहायता करेगा
तफ़्सीर:
हाँ (क्यों नहीं), तुम्हारे लिए इतना ही काफी है। जबकि तुम्हारे लिए अल्लाह की ओर से एक अन्य मदद की शुभ सूचना है : यदि तुम लड़ाई में धैर्य से काम लो और अल्लाह से डरते रहो, और तुम्हारे दुश्मनों को त्वरित मदद मिल जाए और वे तुमपर चढ़ दौड़ें, यदि ऐसा होता है, तो तुम्हरा पालनहार पाँच हज़ार फरिश्तों के द्वारा तुम्हारी सहायता करेगा, जो स्वयं को और अपने घोड़ों को स्पष्ट निशान के साथ चिह्नित किए होंगे।
आयत 126
وَمَا جَعَلَهُ ٱللَّهُ إِلَّا بُشْرَىٰ لَكُمْ وَلِتَطْمَئِنَّ قُلُوبُكُم بِهِۦ ۗ وَمَا ٱلنَّصْرُ إِلَّا مِنْ عِندِ ٱللَّهِ ٱلْعَزِيزِ ٱلْحَكِيمِ
وَمَا
और नहीं
جَعَلَهُ
बनाया उसे
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
إِلَّا
मगर
بُشْرَىٰ
ख़ुशख़बरी
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
وَلِتَطْمَئِنَّ
और ताकि मुत्मईन हो जाऐं
قُلُوبُكُم
दिल तुम्हारे
بِهِۦ ۗ
साथ इसके
وَمَا
और नहीं
ٱلنَّصْرُ
मदद
إِلَّا
मगर
مِنْ
from
عِندِ
[near]
ٱللَّهِ
अल्लाह के पास से
ٱلْعَزِيزِ
जो बहुत ज़बरदस्त है
ٱلْحَكِيمِ
बहुत हिकमत वाला है
अल्लाह ने तो इसे तुम्हारे लिए बस एक शुभ-सूचना बनाया और इसलिए कि तुम्हारे दिल सन्तुष्ट हो जाएँ - सहायता तो बस अल्लाह ही के यहाँ से आती है जो अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने फरिश्तों के द्वारा इस सहायता और इस आपूर्ति को केवल तुम्हारे लिए एक शुभ सूचना बनाया है, जिससे तुम्हारे दिलों को आश्वासन हो जाए। अन्यथा, वास्तव में सहायता मात्र इन ज़ाहिरी कारणों से नहीं होती, बल्कि वास्तविक सहायता उस प्रभुत्वशाली अल्लाह की ओर से आती है, जिसे कोई पराजित नहीं कर सकता, और जो अपने आकलन व अनुमान और अपने विधान में हिकमत वाला (तत्वदर्शी) है।
आयत 127
لِيَقْطَعَ طَرَفًۭا مِّنَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ أَوْ يَكْبِتَهُمْ فَيَنقَلِبُوا۟ خَآئِبِينَ
لِيَقْطَعَ
ताकि वो काट दे
طَرَفًۭا
एक हिस्सा
مِّنَ
of
ٱلَّذِينَ
उनका जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
أَوْ
या
يَكْبِتَهُمْ
वो ज़लील कर दे उन्हें
فَيَنقَلِبُوا۟
तो वो लौट जाऐं
خَآئِبِينَ
नामुराद (हो कर)
ताकि इनकार करनेवालों के एक हिस्से को काट डाले या उन्हें बुरी पराजित और अपमानित कर दे कि वे असफल होकर लौटें
तफ़्सीर:
यह मदद (जीत) जो तुम्हें बद्र की लड़ाई में प्राप्त हुई है, उससे अल्लाह का उद्देश्य यह था कि काफ़िरों के एक समूह को हत्या कर नष्ट कर दे और दूसरे समूह को अपमानित कर दे तथा उनकी पराजय से उन्हें क्रोधित कर दे, फिर वे विफलता और अपमान के साथ लौटें।
आयत 128
لَيْسَ لَكَ مِنَ ٱلْأَمْرِ شَىْءٌ أَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ أَوْ يُعَذِّبَهُمْ فَإِنَّهُمْ ظَـٰلِمُونَ
لَيْسَ
नहीं है
لَكَ
आपके लिए
مِنَ
of
ٱلْأَمْرِ
मामला में से
شَىْءٌ
कुछ भी
أَوْ
ख़्वाह
يَتُوبَ
वो मेहरबान हो जाए
عَلَيْهِمْ
उन पर
أَوْ
या
يُعَذِّبَهُمْ
वो अज़ाब दे उन्हें
فَإِنَّهُمْ
तो बेशक वो
ظَـٰلِمُونَ
ज़ालिम हैं
तुम्हें इस मामले में कोई अधिकार नहीं - चाहे वह उसकी तौबा क़बूल करे या उन्हें यातना दे, क्योंकि वे अत्याचारी है
तफ़्सीर:
उहुद की लड़ाई में बहुदेववादियों की ओर से जो कुछ अत्याचार हुआ उसके बाद जब रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें विनाश का शाप दिया, तो अल्लाह ने आपसे फरमाया : उनके मामले में आपको कोई अधिकार नहीं, बल्कि सारा मामला अल्लाह के हाथ में है। अतः आप धैर्य रखें यहाँ तक कि अल्लाह तुम्हारे बीच फैसला कर दे, या उन्हें तौबा की तौफ़ीक प्रदान कर दे और वे इस्लाम ग्रहण करलें, या वे निरंतर अपने कुफ्र (अविश्वास) ही पर बने रहें तो अल्लाह उन्हें यातना से पीड़ित करे, क्योंकि वे यातना के पात्र हैं।
आयत 129
وَلِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۚ يَغْفِرُ لِمَن يَشَآءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَآءُ ۚ وَٱللَّهُ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
وَلِلَّهِ
और अल्लाह ही के लिए है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ ۚ
ज़मीन में है
يَغْفِرُ
वो बख़्श देता है
لِمَن
जिसके लिए
يَشَآءُ
वो चाहता है
وَيُعَذِّبُ
और वो अज़ाब देता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता है
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
आकाशों और धरती में जो कुछ भी है, अल्लाह ही का है। वह जिसे चाहे क्षमा कर दे और जिसे चाहे यातना दे। और अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
जो कुछ आकाशों में और जो कुछ धरती में है, सब अल्लाह का है, रचना की दृष्टि से भी और प्रबंधन की दृष्टि से भी है। वह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, अपनी दया से क्षमा कर देता है, और जिसे चाहता है अपने न्याय से सज़ा देता है। और अल्लाह अपने तौबा (पश्चाताप) करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 130
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَأْكُلُوا۟ ٱلرِّبَوٰٓا۟ أَضْعَـٰفًۭا مُّضَـٰعَفَةًۭ ۖ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Do) not
تَأْكُلُوا۟
ना तुम खाओ
ٱلرِّبَوٰٓا۟
सूद
أَضْعَـٰفًۭا
कई गुना
مُّضَـٰعَفَةًۭ ۖ
बढ़ा चढ़ा कर
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تُفْلِحُونَ
तुम फ़लाह पा जाओ
ऐ ईमान लानेवालो! बढ़ोत्तरी के ध्येय से ब्याज न खाओ, जो कई गुना अधिक हो सकता है। और अल्लाह का डर रखो, ताकि तुम्हें सफलता प्राप्त हो
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! अपने मूल धन जो तुमने उधार दिए थे, उस पर कई गुणा बढ़ाकर ब्याज लेने से बचो, जैसा कि जाहिलियत (अज्ञानता) काल के लोग किया करते थे। और अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई बातों से बचकर उससे डरो, ताकि तुम दुनिया और आख़िरत की जो भलाई चाहते हो, उसे प्राप्त कर सको।
आयत 131
وَٱتَّقُوا۟ ٱلنَّارَ ٱلَّتِىٓ أُعِدَّتْ لِلْكَـٰفِرِينَ
وَٱتَّقُوا۟
और बचो/डरो
ٱلنَّارَ
आग से
ٱلَّتِىٓ
वो जो
أُعِدَّتْ
तैयार की गई है
لِلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के लिए
और उस आग से बचो जो इनकार करनेवालों के लिए तैयार है
तफ़्सीर:
और तुम अच्छे कार्य करके और वर्जनाओं को छोड़कर, अपने और उस आग के बीच जिसे अल्लाह ने काफिरों के लिए तैयार कर रखी है, बचाव या संरक्षण का साधन अपनाओ।
आयत 132
وَأَطِيعُوا۟ ٱللَّهَ وَٱلرَّسُولَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
وَأَطِيعُوا۟
और इताअत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَٱلرَّسُولَ
और रसूल की
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تُرْحَمُونَ
तुम रहम किए जाओ
और अल्लाह और रसूल के आज्ञाकारी बनो, ताकि तुमपर दया की जाए
तफ़्सीर:
तथा तुम आदेशों का पालन कर और वर्जनाओं को त्याग कर अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो। ताकि तुम दुनिय एवं आख़िरत में उसकी दया प्राप्त कर सको।
आयत 133
۞ وَسَارِعُوٓا۟ إِلَىٰ مَغْفِرَةٍۢ مِّن رَّبِّكُمْ وَجَنَّةٍ عَرْضُهَا ٱلسَّمَـٰوَٰتُ وَٱلْأَرْضُ أُعِدَّتْ لِلْمُتَّقِينَ
۞ وَسَارِعُوٓا۟
और एक दूसरे से जल्दी करो
إِلَىٰ
to
مَغْفِرَةٍۢ
तरफ़ बख़्शिश के
مِّن
from
رَّبِّكُمْ
अपने रब की तरफ़ से
وَجَنَّةٍ
और जन्नत के
عَرْضُهَا
चौड़ाई है जिसकी
ٱلسَّمَـٰوَٰتُ
आसमान
وَٱلْأَرْضُ
और ज़मीन
أُعِدَّتْ
वो तैयार की गई है
لِلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के लिए
और अपने रब की क्षमा और उस जन्नत की ओर बढ़ो, जिसका विस्तार आकाशों और धरती जैसा है। वह उन लोगों के लिए तैयार है जो डर रखते है
तफ़्सीर:
अच्छे काम करने और विभिन्न प्रकार के नेकी के कामों के द्वारा अल्लाह की निकटता प्राप्त करने में जल्दी और पहल करो, ताकि तुम्हें अल्लाह की महान क्षमा मिल सके और तुम ऐसी जन्नत में प्रवेश कर सको, जिसकी चौड़ाई आकाशों और धरती के बराबर है, जिसे अल्लाह ने अपने डरने वाले बंदों के लिए तैयार किया है।
आयत 134
ٱلَّذِينَ يُنفِقُونَ فِى ٱلسَّرَّآءِ وَٱلضَّرَّآءِ وَٱلْكَـٰظِمِينَ ٱلْغَيْظَ وَٱلْعَافِينَ عَنِ ٱلنَّاسِ ۗ وَٱللَّهُ يُحِبُّ ٱلْمُحْسِنِينَ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يُنفِقُونَ
ख़र्च करते हैं
فِى
in
ٱلسَّرَّآءِ
ख़ुशी में
وَٱلضَّرَّآءِ
और तकलीफ़ में
وَٱلْكَـٰظِمِينَ
और ज़ब्त करने वाले हैं
ٱلْغَيْظَ
सख़्त ग़ुस्से को
وَٱلْعَافِينَ
और दरगुज़र करने वाले हैं
عَنِ
[from]
ٱلنَّاسِ ۗ
लोगों से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يُحِبُّ
मोहब्बत रखता है
ٱلْمُحْسِنِينَ
एहसान करने वालों से
वे लोग जो ख़ुशहाली और तंगी की प्रत्येक अवस्था में ख़र्च करते रहते है और क्रोध को रोकते है और लोगों को क्षमा करते है - और अल्लाह को भी ऐसे लोग प्रिय है, जो अच्छे से अच्छा कर्म करते है
तफ़्सीर:
अल्लाह से डरने वाले (तक़्वा वाले) वे लोग हैं, जो कठिनाई एवं आसानी की स्थिति में अपना धन अल्लाह के मार्ग में खर्च करते हैं, तथा बदला लेने की क्षमता होने के उपरांत भी अपने क्रोध को रोकने वाले और जिसने उनके साथ अन्याय किया है उसे क्षमा कर देने वाले हैं। और अल्लाह ऐसी नैतिकता से सुसज्जित परोपकारी लोगों से प्यार करता है।
आयत 135
وَٱلَّذِينَ إِذَا فَعَلُوا۟ فَـٰحِشَةً أَوْ ظَلَمُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ ذَكَرُوا۟ ٱللَّهَ فَٱسْتَغْفَرُوا۟ لِذُنُوبِهِمْ وَمَن يَغْفِرُ ٱلذُّنُوبَ إِلَّا ٱللَّهُ وَلَمْ يُصِرُّوا۟ عَلَىٰ مَا فَعَلُوا۟ وَهُمْ يَعْلَمُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो लोग जो
إِذَا
जब
فَعَلُوا۟
करते हैं
فَـٰحِشَةً
कोई बेहयाई
أَوْ
या
ظَلَمُوٓا۟
वो ज़ुल्म करते हैं
أَنفُسَهُمْ
अपने नफ़्सों पर
ذَكَرُوا۟
वो याद करते हैं
ٱللَّهَ
अल्लाह को
فَٱسْتَغْفَرُوا۟
पस माफ़ी माँगते हैं
لِذُنُوبِهِمْ
अपने गुनाहों के लिए
وَمَن
और कौन है जो
يَغْفِرُ
बख़्श दे
ٱلذُّنُوبَ
गुनाहों को
إِلَّا
सिवाय
ٱللَّهُ
अल्लाह के
وَلَمْ
और नहीं
يُصِرُّوا۟
वो इसरार करते
عَلَىٰ
ऊपर उसके
مَا
जो
فَعَلُوا۟
उन्होंने किया
وَهُمْ
जब कि वो
يَعْلَمُونَ
वो जानते हैं
और जिनका हाल यह है कि जब वे कोई खुला गुनाह कर बैठते है या अपने आप पर ज़ुल्म करते है तौ तत्काल अल्लाह उन्हें याद आ जाता है और वे अपने गुनाहों की क्षमा चाहने लगते हैं - और अल्लाह के अतिरिक्त कौन है, जो गुनाहों को क्षमा कर सके? और जानते-बूझते वे अपने किए पर अड़े नहीं रहते
तफ़्सीर:
और वे ऐसे लोग हैं कि जब वे कोई बड़ा गुनाह कर बैठते हैं या छोटे गुनाह में पड़कर अपना भाग कम कर लेते हैं, तो अल्लाह को याद करते हैं, तथा अवज्ञाकारियों के लिए उसकी धमकी और आज्ञाकारियों के लिए उसके वचन को याद करते हैं, फिर वे अपने पालनहार से पश्चातापी (लज्जित) होकर अपने गुनाहों को छिपाने और उनपर पकड़ न करने की याचना करते हैं। क्योंकि गुनाहों को केवल अल्लाह ही क्षमा कर सकता है। और वे अपने गुनाहों पर अडिग नहीं रहते हैं, जबकि वे जानते हैं कि वे दोषी हैं और यह कि अल्लाह सभी गुनाहों को क्षमा कर देता है।
आयत 136
أُو۟لَـٰٓئِكَ جَزَآؤُهُم مَّغْفِرَةٌۭ مِّن رَّبِّهِمْ وَجَنَّـٰتٌۭ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۚ وَنِعْمَ أَجْرُ ٱلْعَـٰمِلِينَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
جَزَآؤُهُم
बदला उनका
مَّغْفِرَةٌۭ
बख़्शिश है
مِّن
from
رَّبِّهِمْ
उनके रब की तरफ़ से
وَجَنَّـٰتٌۭ
और बाग़ात हैं
تَجْرِى
बहती हैं
مِن
from
تَحْتِهَا
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَا ۚ
उनमें
وَنِعْمَ
और कितना अच्छा है
أَجْرُ
अजर
ٱلْعَـٰمِلِينَ
अमल करने वालों का
उनका बदला उनके रब की ओर से क्षमादान है और ऐसे बाग़ है जिनके नीचे नहरें बहती होंगी। उनमें वे सदैव रहेंगे। और क्या ही अच्छा बदला है अच्छे कर्म करनेवालों का
तफ़्सीर:
इन अच्छे गुणों और गौरवशाली विशेषताओं से सुसज्जित लोगों का बदला यह है कि अल्लाह उनके गुनाहों पर पर्दा डाल देगा और उन्हें क्षमा कर देगा। तथा उनके लिए आख़िरत में ऐसे बाग़ हैं, जिनके महलों के नीचे नहरें बहती होंगी, जिनमें वे हमेशा रहेंगे। और अल्लाह का आज्ञापालन करने वालों के लिए यह बदला क्या ही अच्छा है।
आयत 137
قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِكُمْ سُنَنٌۭ فَسِيرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ فَٱنظُرُوا۟ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلْمُكَذِّبِينَ
قَدْ
तहक़ीक़
خَلَتْ
गुज़र चुके
مِن
from
قَبْلِكُمْ
तुम से पहले
سُنَنٌۭ
कई तरीक़े
فَسِيرُوا۟
तो चलो फिरो
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
فَٱنظُرُوا۟
फिर देखो
كَيْفَ
किस तरह
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अन्जाम
ٱلْمُكَذِّبِينَ
झुठलाने वालों का
तुमसे पहले (धर्मविरोधियों के साथ अल्लाह की) रीति के कितने ही नमूने गुज़र चुके है, तो तुम धरती में चल-फिरकर देखो कि झुठलानेवालों का परिणाम हुआ है
तफ़्सीर:
जब उहुद के दिन मोमिनों को उनपर उतरने वाली विपदा के द्वारा आज़माया गया, तो अल्लाह ने उन्हें सांत्वना देते हुए फ़रमाया : तुमसे पूर्व भी काफिरों के विनाश किए जाने तथा मोमिनों की परीक्षा के पश्चात उन का अंत सुमंगल होने के कई ईश्वरीय परंपराएं गुज़र चुकी हैं। अतः तुम धरती में चलो-फिरो और सीख प्राप्त करते हुए देखो कि अल्लाह और उसके रसूल को झुठलाने वालों का अंत कैसे हुआ। उनके घर उजड़ गए और उनका राज्य समाप्त हो गया।
आयत 138
هَـٰذَا بَيَانٌۭ لِّلنَّاسِ وَهُدًۭى وَمَوْعِظَةٌۭ لِّلْمُتَّقِينَ
هَـٰذَا
ये
بَيَانٌۭ
एक बयान है
لِّلنَّاسِ
लोगों के लिए
وَهُدًۭى
और हिदायत
وَمَوْعِظَةٌۭ
और नसीहत है
لِّلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के लिए
यह लोगों के लिए स्पष्ट बयान और डर रखनेवालों के लिए मार्गदर्शन और उपदेश है
तफ़्सीर:
यह क़ुरआन सभी लोगों के लिए सत्य का वर्णन और असत्य से चेतावनी है, तथा वह अल्लाह से डरने वालों (धर्मियों) के लिए मार्गदर्शन का संकेत और (बुराई का) प्रतिरोधक है। क्योंकि यही लोग उसके मार्गदर्शन और निर्देश से लाभ उठाने वाले हैं।
आयत 139
وَلَا تَهِنُوا۟ وَلَا تَحْزَنُوا۟ وَأَنتُمُ ٱلْأَعْلَوْنَ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
وَلَا
और ना
تَهِنُوا۟
तुम कमज़ोर पड़ो
وَلَا
और ना
تَحْزَنُوا۟
तुम ग़म करो
وَأَنتُمُ
और तुम ही
ٱلْأَعْلَوْنَ
बुलन्द हो
إِن
अगर
كُنتُم
हो तुम
مُّؤْمِنِينَ
मोमिन
हताश न हो और दुखी न हो, यदि तुम ईमानवाले हो, तो तुम्हीं प्रभावी रहोगे
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो) तुम कमज़ोर न पड़ो और न ही उहुद के दिन पहुँचने वाली तक्लीफ पर शोक करो, और न ही तुम्हारे लिए ऐसा करना उचित है। क्योंकि अपने ईमान के कारण तुम ही सर्वोच्च हो, तथा अल्लाह की सहायता और उसकी मदद की आशा रखने के कारण तुम ही बुलंद हो, यदि तुम अल्लाह और उसके अपने सदाचारी बंदों से किए हुए वादे पर विश्वास रखने वाले हो।
आयत 140
إِن يَمْسَسْكُمْ قَرْحٌۭ فَقَدْ مَسَّ ٱلْقَوْمَ قَرْحٌۭ مِّثْلُهُۥ ۚ وَتِلْكَ ٱلْأَيَّامُ نُدَاوِلُهَا بَيْنَ ٱلنَّاسِ وَلِيَعْلَمَ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَيَتَّخِذَ مِنكُمْ شُهَدَآءَ ۗ وَٱللَّهُ لَا يُحِبُّ ٱلظَّـٰلِمِينَ
إِن
अगर
يَمْسَسْكُمْ
पहुँचा तुम्हें
قَرْحٌۭ
कोई ज़ख़्म
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
مَسَّ
पहुँच चुका है
ٱلْقَوْمَ
उस क़ौम को
قَرْحٌۭ
ज़ख़्म
مِّثْلُهُۥ ۚ
मानिन्द उसी के
وَتِلْكَ
और ये
ٱلْأَيَّامُ
दिन
نُدَاوِلُهَا
हम फेरते रहते हैं उन्हें
بَيْنَ
दर्मियान
ٱلنَّاسِ
लोगों के
وَلِيَعْلَمَ
और ताकि जान ले
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّذِينَ
उनको जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَيَتَّخِذَ
और वो बना ले
مِنكُمْ
तुम में से
شُهَدَآءَ ۗ
गवाह/शहीद
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
لَا
(does) not
يُحِبُّ
नहीं वो मोहब्बत रखता
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों से
यदि तुम्हें आघात पहुँचे तो उन लोगों को भी ऐसा ही आघात पहुँच चुका है। ये युद्ध के दिन हैं, जिन्हें हम लोगों के बीच डालते ही रहते है और ऐसा इसलिए हुआ कि अल्लाह ईमानवालों को जान ले और तुममें से कुछ लोगों को गवाह बनाए - और अत्याचारी अल्लाह को प्रिय नहीं है
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो) यदि उहुद के दिन तुम्हें घाव लगे हैं और तुम में से कुछ लोग शहीद हुए हैं, तो इसी प्रकार काफिरों को भी घाव लगे हैं और उनके भी लोग मारे गए हैं। और अल्लाह दिनों को मोमिनों और काफ़िरों के बीच जैसे चाहता है, विजय और पराजय के साथ फेरता (बदलता) रहता है; जिसके पीछे व्यापक हिकमतें हैं, जिनमें से एक यह है कि : सच्चे ईमान वाले, मुनाफ़िक़ों (पाखंडियों) से स्पष्ट हो जाएँ। तथा एक हिकमत यह भी है कि : अल्लाह जिसे चाहे अपने रास्ते में शहादत से सम्मानित करे। और अल्लाह अपने रास्ते में जिहाद को छोड़कर खुद पर अत्याचार करने वालों से प्यार नहीं करता।
आयत 141
وَلِيُمَحِّصَ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَيَمْحَقَ ٱلْكَـٰفِرِينَ
وَلِيُمَحِّصَ
और ताकि ख़ालिस कर ले
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّذِينَ
उन्हें जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَيَمْحَقَ
और मिटा दे
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों को
और ताकि अल्लाह ईमानवालों को निखार दे और इनकार करनेवालों को मिटा दे
तफ़्सीर:
इन हिकमतों में से एक हिकमत, ईमान वालों को पापों से शुद्ध करना और उनके पक्ष को मुनाफिकों (पाखंडियों) से पवित्र करना है, और ताकि अल्लाह काफिरों का विनाश कर दे और उन्हें मिटा दे।
आयत 142
أَمْ حَسِبْتُمْ أَن تَدْخُلُوا۟ ٱلْجَنَّةَ وَلَمَّا يَعْلَمِ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ جَـٰهَدُوا۟ مِنكُمْ وَيَعْلَمَ ٱلصَّـٰبِرِينَ
أَمْ
क्या
حَسِبْتُمْ
गुमान किया तुमने
أَن
कि
تَدْخُلُوا۟
तुम दाख़िल हो जाओगे
ٱلْجَنَّةَ
जन्नत में
وَلَمَّا
हालाँकि अभी तक नहीं
يَعْلَمِ
जाना
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلَّذِينَ
उन्हें जिन्होंने
جَـٰهَدُوا۟
जिहाद किया
مِنكُمْ
तुम में से
وَيَعْلَمَ
और (ताकि) वो जान ले
ٱلصَّـٰبِرِينَ
सब्र करने वालों को
क्या तुमने यह समझ रखा है कि जन्नत में यूँ ही प्रवेश करोगे, जबकि अल्लाह ने अभी उन्हें परखा ही नहीं जो तुममें जिहाद (सत्य-मार्ग में जानतोड़ कोशिश) करनेवाले है। - और दृढ़तापूर्वक जमें रहनेवाले है
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो) क्या तुमने समझ रखा है कि बिना किसी ऐसी परीक्षण और धैर्य के जन्नत में प्रवेश कर जाओगे, जिससे अल्लाह के रास्ते में सच्चे दिल से जिहाद करने वालों और इस रास्ते में आने वाली मुसीबतों के समय सब्र करने वालों की पहचान हो जाए?!
आयत 143
وَلَقَدْ كُنتُمْ تَمَنَّوْنَ ٱلْمَوْتَ مِن قَبْلِ أَن تَلْقَوْهُ فَقَدْ رَأَيْتُمُوهُ وَأَنتُمْ تَنظُرُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
كُنتُمْ
थे तुम
تَمَنَّوْنَ
तुम तमन्ना करते
ٱلْمَوْتَ
मौत की
مِن
from
قَبْلِ
इससे पहले
أَن
कि
تَلْقَوْهُ
तुम मिलो उसे
فَقَدْ
पस तहक़ीक़
رَأَيْتُمُوهُ
देख लिया तुमने उसे
وَأَنتُمْ
और तुम
تَنظُرُونَ
तुम देख रहे थे
और तुम तो मृत्यु की कामनाएँ कर रहे थे, जब तक कि वह तुम्हारे सामने नहीं आई थी। लो, अब तो वह तुम्हारे सामने आ गई और तुमने उसे अपनी आँखों से देख लिया
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो) तुम तो मौत और उसकी कठिनाइयों का सामना करने से पहले, काफिरों से मुठभेड़ की कामना किया करते थे, ताकि तुम्हें भी अल्लाह के रास्ते में शहीद होने का सौभाग्य प्राप्त हो जाए, जिस तरह कि बद्र की लड़ाई में तुम्हारे भाइयों को उसका सौभाग्य प्राप्त हुआ था। लो, अब तुमने उहुद की लड़ाई के दिन वह भी देख लिया, जिसकी तुमने कामना की थी, और अब तुम उसे खुली आँखों से देख रहे हो।
आयत 144
وَمَا مُحَمَّدٌ إِلَّا رَسُولٌۭ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهِ ٱلرُّسُلُ ۚ أَفَإِي۟ن مَّاتَ أَوْ قُتِلَ ٱنقَلَبْتُمْ عَلَىٰٓ أَعْقَـٰبِكُمْ ۚ وَمَن يَنقَلِبْ عَلَىٰ عَقِبَيْهِ فَلَن يَضُرَّ ٱللَّهَ شَيْـًۭٔا ۗ وَسَيَجْزِى ٱللَّهُ ٱلشَّـٰكِرِينَ
وَمَا
और नहीं हैं
مُحَمَّدٌ
मोहम्मद
إِلَّا
मगर
رَسُولٌۭ
एक रसूल
قَدْ
तहक़ीक़
خَلَتْ
गुज़र चुके
مِن
from
قَبْلِهِ
उनसे पहले
ٱلرُّسُلُ ۚ
कई रसूल
أَفَإِي۟ن
क्या फिर अगर
مَّاتَ
वो मर जाऐं
أَوْ
or
قُتِلَ
या वो क़त्ल कर दिए जाऐं
ٱنقَلَبْتُمْ
पलट जाओगे तुम
عَلَىٰٓ
on
أَعْقَـٰبِكُمْ ۚ
अपनी एड़ियों पर
وَمَن
और जो कोई
يَنقَلِبْ
पलट जाएगा
عَلَىٰ
on
عَقِبَيْهِ
अपनी दोनों एड़ियों पर
فَلَن
तो हरगिज़ नहीं
يَضُرَّ
वो नुक़सान देगा
ٱللَّهَ
अल्लाह को
شَيْـًۭٔا ۗ
कुछ भी
وَسَيَجْزِى
और अनक़रीब बदला देगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلشَّـٰكِرِينَ
शुक्र करने वालों को
मुहम्मद तो बस एक रसूल है। उनसे पहले भी रसूल गुज़र चुके है। तो क्या यदि उनकी मृत्यु हो जाए या उनकी हत्या कर दी जाए तो तुम उल्टे पाँव फिर जाओगे? जो कोई उल्टे पाँव फिरेगा, वह अल्लाह का कुछ नहीं बिगाडेगा। और कृतज्ञ लोगों को अल्लाह बदला देगा
तफ़्सीर:
और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम भी अपने पूर्ववर्ती अल्लाह के रसूलों की जाति के एक रसूल हैं, जो मर गए या मार दिए गए। तो क्या यदि वह मर जाएँ अथवा मार दिए जाएँ, तो तुम अपने धर्म से पलट जाओगे और जिहाद छोड़ दोगे?! और तुम में से जो भी अपने धर्म से फिर जाएगा, वह अल्लाह को कुछ भी नुकसान नहीं पहुंचाएगा; क्योंकि वह बड़ा शक्तिवान, प्रभुत्वशाली है। बल्कि धर्मत्यागी खुद को नुकसान पहुँचाएगा, क्योंकि इस प्रकार वह अपने आपको दुनिया और आख़िरत दोनों जगहों के घाटे में डाल देगा। और अल्लाह अपने कृतज्ञों को, उनके उसके धर्म पर जमे रहने और उसके रास्ते में जिहाद करने के कारण, सबसे अच्छा बदला प्रदान करेगा।
आयत 145
وَمَا كَانَ لِنَفْسٍ أَن تَمُوتَ إِلَّا بِإِذْنِ ٱللَّهِ كِتَـٰبًۭا مُّؤَجَّلًۭا ۗ وَمَن يُرِدْ ثَوَابَ ٱلدُّنْيَا نُؤْتِهِۦ مِنْهَا وَمَن يُرِدْ ثَوَابَ ٱلْـَٔاخِرَةِ نُؤْتِهِۦ مِنْهَا ۚ وَسَنَجْزِى ٱلشَّـٰكِرِينَ
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
لِنَفْسٍ
किसी नफ़्स के लिए
أَن
कि
تَمُوتَ
वो मरे
إِلَّا
मगर
بِإِذْنِ
by (the) permission
ٱللَّهِ
अल्लाह के इज़्न से
كِتَـٰبًۭا
लिखा हुआ है
مُّؤَجَّلًۭا ۗ
मुक़र्रर वक़्त
وَمَن
और जो कोई
يُرِدْ
चाहता है
ثَوَابَ
बदला
ٱلدُّنْيَا
दुनिया का
نُؤْتِهِۦ
हम दे देते हैं उसे
مِنْهَا
उसमें से
وَمَن
और जो कोई
يُرِدْ
चाहता है
ثَوَابَ
सवाब
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत का
نُؤْتِهِۦ
हम दे देंगे उसे
مِنْهَا ۚ
उसमें से
وَسَنَجْزِى
और अनक़रीब हम बदला देंगे
ٱلشَّـٰكِرِينَ
शुक्र करने वालों को
और अल्लाह की अनुज्ञा के बिना कोई व्यक्ति मर नहीं सकता। हर व्यक्ति एक लिखित निश्चित समय का अनुपालन कर रहा है। और जो कोई दुनिया का बदला चाहेगा, उसे हम इस दुनिया में से देंगे, जो आख़िरत का बदला चाहेगा, उसे हम उसमें से देंगे और जो कृतज्ञता दिखलाएँगे, उन्हें तो हम बदला देंगे ही
तफ़्सीर:
और कोई भी प्राणी अल्लाह के फैसले ही से मरता है, जब वह उस अवधि को पूरा कर लेता है जिसे अल्लाह ने लिखी थी और उसे उसका अंत बना दिया था, न वह उससे आगे बढ़ सकता है, न पीछे रह सकता। और जो अपने कर्म से दुनिया का बदला चाहता है, हम उसे उतना ही देते हैं जितना उसके नसीब में होता है, और आख़िरत में उसका कोई हिस्सा नहीं होगा। और जो व्यक्ति अपने कर्म से आख़िरत में अल्लाह का बदला चाहता है, हम उसे उसका बदला देंगे। और हम शीघ्र ही उन लोगों को बड़ा बदला देंगे, जो अपने पालनहार के आभारी हैं।
आयत 146
وَكَأَيِّن مِّن نَّبِىٍّۢ قَـٰتَلَ مَعَهُۥ رِبِّيُّونَ كَثِيرٌۭ فَمَا وَهَنُوا۟ لِمَآ أَصَابَهُمْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَمَا ضَعُفُوا۟ وَمَا ٱسْتَكَانُوا۟ ۗ وَٱللَّهُ يُحِبُّ ٱلصَّـٰبِرِينَ
وَكَأَيِّن
और कितने ही
مِّن
from
نَّبِىٍّۢ
नबियों में से
قَـٰتَلَ
जंग की
مَعَهُۥ
उनके हमराह
رِبِّيُّونَ
रब वालों ने
كَثِيرٌۭ
बहुत से
فَمَا
तो ना
وَهَنُوا۟
उन्होंने सुस्ती दिखाई
لِمَآ
उसके लिए जो
أَصَابَهُمْ
पहुँचा उन्हें
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
وَمَا
और ना
ضَعُفُوا۟
वो कमज़ोर पड़े
وَمَا
और ना
ٱسْتَكَانُوا۟ ۗ
वो दबे
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يُحِبُّ
मोहब्बत रखता है
ٱلصَّـٰبِرِينَ
सब्र करने वालों से
कितने ही नबी ऐसे गुज़रे है जिनके साथ होकर बहुत-से ईशभक्तों ने युद्ध किया, तो अल्लाह के मार्ग में जो मुसीबत उन्हें पहुँची उससे वे न तो हताश हुए और न उन्होंने कमज़ोरी दिखाई और न ऐसा हुआ कि वे दबे हो। और अल्लाह दृढ़तापूर्वक जमे रहनेवालों से प्रेम करता है
तफ़्सीर:
और अल्लाह के नबियों में से कितने ही नबी ऐसे हैं, जिनके साथ मिलकर उनके अनुयायियों में से अनेक समूहों ने लड़ाई लड़ी। तो वे अल्लाह के रास्ते में पहुँचने वाली हत्या और घाव के कारण जिहाद से कायर नहीं हुए और न वे दुश्मन से लड़ने में कमज़ोर पड़े और न उनके सामने घुटने टेके। बल्कि उन्होंने धैर्य से काम लिया और डटे रहे। और अल्लाह अपने रास्ते में कष्टों और कठिनाइयों पर धैर्य से काम लेने वालों से प्रेम करता है।
आयत 147
وَمَا كَانَ قَوْلَهُمْ إِلَّآ أَن قَالُوا۟ رَبَّنَا ٱغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَإِسْرَافَنَا فِىٓ أَمْرِنَا وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا وَٱنصُرْنَا عَلَى ٱلْقَوْمِ ٱلْكَـٰفِرِينَ
وَمَا
और ना
كَانَ
थी
قَوْلَهُمْ
बात उनकी
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
ٱغْفِرْ
forgive
لَنَا
बख़्श दे हमारे लिए
ذُنُوبَنَا
गुनाह हमारे
وَإِسْرَافَنَا
और ज़्यादतियाँ हमारी
فِىٓ
in
أَمْرِنَا
हमारे मामले में
وَثَبِّتْ
और जमा दे
أَقْدَامَنَا
हमारे क़दमों को
وَٱنصُرْنَا
और मदद फ़रमा हमारी
عَلَى
over
ٱلْقَوْمِ
ऊपर उन लोगों के
ٱلْكَـٰفِرِينَ
जो काफ़िर हैं
उन्होंने कुछ नहीं कहा सिवाय इसके कि "ऐ हमारे रब! तू हमारे गुनाहों को और हमारे अपने मामले में जो ज़्यादती हमसे हो गई हो, उसे क्षमा कर दे और हमारे क़दम जमाए रख, और इनकार करनेवाले लोगों के मुक़ाबले में हमारी सहायता कर।"
तफ़्सीर:
जब इन धैर्य से काम लेने वालों पर यह विपत्ति आई, तो उनका केवल यह कहना था कि : ऐ हमारे पालनहार! हमारे पापों और हमारे अपने मामले में सीमाओं के उल्लंघन को माफ़ कर दे, और हमारे दुश्मन से मुठभेड़ के समय हमारे पैर जमाए रख और अपने साथ कुफ़्र करने वालों पर हमें विजय प्रदान कर।
आयत 148
فَـَٔاتَىٰهُمُ ٱللَّهُ ثَوَابَ ٱلدُّنْيَا وَحُسْنَ ثَوَابِ ٱلْـَٔاخِرَةِ ۗ وَٱللَّهُ يُحِبُّ ٱلْمُحْسِنِينَ
فَـَٔاتَىٰهُمُ
तो अता किया उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ثَوَابَ
सवाब
ٱلدُّنْيَا
दुनिया का
وَحُسْنَ
और अच्छा
ثَوَابِ
सवाब
ٱلْـَٔاخِرَةِ ۗ
आख़िरत का
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يُحِبُّ
मोहब्बत रखता है
ٱلْمُحْسِنِينَ
एहसान करने वालों से
अतः अल्लाह ने उन्हें दुनिया का भी बदला दिया और आख़िरत का अच्छा बदला भी। और सत्कर्मी लोगों से अल्लाह प्रेम करता है
तफ़्सीर:
तो अल्लाह ने उन्हें विजय और सशक्तीकरण प्रदान कर दुनिया का बदला दिया, और आखिरत में अच्छा बदला इस तरह दिया कि उनसे प्रसन्न हो गया तथा नेमतों वाली जन्नतों में हमेशा बाकी रहने वाली नेमतें प्रदान कीं। और अल्लाह अच्छी तरह इबादत और अच्छा व्यवहार करने वाले लोगों से प्रेम करता है।
आयत 149
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِن تُطِيعُوا۟ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ يَرُدُّوكُمْ عَلَىٰٓ أَعْقَـٰبِكُمْ فَتَنقَلِبُوا۟ خَـٰسِرِينَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
إِن
अगर
تُطِيعُوا۟
तुम इताअत करोगे
ٱلَّذِينَ
उनकी जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
يَرُدُّوكُمْ
वो फेर देंगे तुम्हें
عَلَىٰٓ
on
أَعْقَـٰبِكُمْ
तुम्हारी एड़ियों पर
فَتَنقَلِبُوا۟
वरना पलट जाओगे तुम
خَـٰسِرِينَ
ख़सारा पाने वाले (होकर)
ऐ ईमान लानेवालो! यदि तुम उन लोगों के कहने पर चलोगे जिन्होंने इनकार का मार्ग अपनाया है, तो वे तुम्हें उल्टे पाँव फेर ले जाएँगे। फिर तुम घाटे में पड़ जाओगे
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! यदि तुम यहूदियों, ईसाइयों और बहुदेववादियों में से काफिरों के सीधे रास्ते से हटाने वाले आदेशों को मानने लगो गे, तो वे तुम्हें तुम्हारे ईमान लाने के बाद तुम्हारी पुरानी अवस्था अर्थात कुफ्र की ओर लौटा देंगे, फिर तुम दुनिया एवं आख़िरत का घाटा उठाने वाले बन जाओगे।
आयत 150
بَلِ ٱللَّهُ مَوْلَىٰكُمْ ۖ وَهُوَ خَيْرُ ٱلنَّـٰصِرِينَ
بَلِ
बल्कि
ٱللَّهُ
अल्लाह
مَوْلَىٰكُمْ ۖ
मददगार है तुम्हारा
وَهُوَ
और वो
خَيْرُ
बेहतरीन है
ٱلنَّـٰصِرِينَ
मदद करने वालों में
बल्कि अल्लाह ही तुम्हारा संरक्षक है; और वह सबसे अच्छा सहायक है
तफ़्सीर:
यदि तुम इन काफ़िरों का पालन करोगे, तो ये कभी तुम्हारी सहायता नहीं करेंगे। बल्कि अल्लाह ही तुम्हारे शत्रुओं के विरुद्ध तुम्हारा सहायक है। अतः तुम उसी की आज्ञा का पालन करो। वह सर्वशक्तिमान सबसे अच्छा सहायक है। इसलिए तुम्हें उसके बाद किसी की भी आवश्यकता नहीं है।
आयत 151
سَنُلْقِى فِى قُلُوبِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ ٱلرُّعْبَ بِمَآ أَشْرَكُوا۟ بِٱللَّهِ مَا لَمْ يُنَزِّلْ بِهِۦ سُلْطَـٰنًۭا ۖ وَمَأْوَىٰهُمُ ٱلنَّارُ ۚ وَبِئْسَ مَثْوَى ٱلظَّـٰلِمِينَ
سَنُلْقِى
अनक़रीब हम डाल देंगे
فِى
in
قُلُوبِ
दिलों में
ٱلَّذِينَ
उनके जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
ٱلرُّعْبَ
रौब को
بِمَآ
बवजह उसके जो
أَشْرَكُوا۟
उन्होंने शरीक ठहराया
بِٱللَّهِ
साथ अल्लाह के
مَا
उसको जो
لَمْ
नहीं
يُنَزِّلْ
उसने नाज़िल की
بِهِۦ
जिसकी
سُلْطَـٰنًۭا ۖ
कोई दलील
وَمَأْوَىٰهُمُ
और ठिकाना उनका
ٱلنَّارُ ۚ
आग है
وَبِئْسَ
और कितना बुरा है
مَثْوَى
ठिकाना
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों का
हम शीघ्र ही इनकार करनेवालों के दिलों में धाक बिठा देंगे, इसलिए कि उन्होंने ऐसी चीज़ो को अल्लाह का साक्षी ठहराया है जिनसे साथ उसने कोई सनद नहीं उतारी, और उनका ठिकाना आग (जहन्नम) है। और अत्याचारियों का क्या ही बुरा ठिकाना है
तफ़्सीर:
हम अल्लाह का इनकार करने वाले लोगों के दिलों में अत्यधिक भय डाल देंगे, ताकि वे तुम्हारे सामने युद्ध में ठहर न पाएँ। ऐसा इस कारण होगा कि उन्होंने अल्लाह के ऐसे साझी ठहरा लिए हैं, जिनकी वे अपनी इच्छाओं के अनुसार पूजा करते हैं, जिसके लिए अल्लाह ने उनपर कोई तर्क नहीं उतारा। उनका ठिकाना जिसकी ओर वे आख़िरत में लौटेंगे, वह आग है, और आग अत्याचारियों का क्या ही बुरा ठिकाना है।
आयत 152
وَلَقَدْ صَدَقَكُمُ ٱللَّهُ وَعْدَهُۥٓ إِذْ تَحُسُّونَهُم بِإِذْنِهِۦ ۖ حَتَّىٰٓ إِذَا فَشِلْتُمْ وَتَنَـٰزَعْتُمْ فِى ٱلْأَمْرِ وَعَصَيْتُم مِّنۢ بَعْدِ مَآ أَرَىٰكُم مَّا تُحِبُّونَ ۚ مِنكُم مَّن يُرِيدُ ٱلدُّنْيَا وَمِنكُم مَّن يُرِيدُ ٱلْـَٔاخِرَةَ ۚ ثُمَّ صَرَفَكُمْ عَنْهُمْ لِيَبْتَلِيَكُمْ ۖ وَلَقَدْ عَفَا عَنكُمْ ۗ وَٱللَّهُ ذُو فَضْلٍ عَلَى ٱلْمُؤْمِنِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
صَدَقَكُمُ
सच्चा कर दिखाया तुमसे
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
وَعْدَهُۥٓ
वादा अपना
إِذْ
जब
تَحُسُّونَهُم
तुम क़त्ल कर रहे थे उन्हें
بِإِذْنِهِۦ ۖ
उसके इज़्न से
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
فَشِلْتُمْ
बुज़दिली दिखाई तुमने
وَتَنَـٰزَعْتُمْ
और झगड़ा किया तुमने
فِى
concerning
ٱلْأَمْرِ
हुक्म के बारे में (रसूल के)
وَعَصَيْتُم
और नाफ़रमानी की तुमने
مِّنۢ
from
بَعْدِ
बाद उसके
مَآ
जो
أَرَىٰكُم
उसने दिखाया तुम्हें
مَّا
वो जो
تُحِبُّونَ ۚ
तुम पसंद करते हो
مِنكُم
तुम में से कोई है
مَّن
जो
يُرِيدُ
चाहता है
ٱلدُّنْيَا
दुनिया को
وَمِنكُم
और तुम में से कोई है
مَّن
जो
يُرِيدُ
चाहता है
ٱلْـَٔاخِرَةَ ۚ
आख़िरत को
ثُمَّ
फिर
صَرَفَكُمْ
उसने फेर दिया तुम्हें
عَنْهُمْ
उनसे
لِيَبْتَلِيَكُمْ ۖ
ताकि वो आज़माए तुम्हें
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
عَفَا
उसने दरगुज़र किया
عَنكُمْ ۗ
तुमसे
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
ذُو
(is the) Possessor
فَضْلٍ
फ़ज़ल वाला है
عَلَى
for
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों पर
और अल्लाह ने तो तुम्हें अपना वादा सच्चा कर दिखाया, जबकि तुम उसकी अनुज्ञा से उन्हें क़त्ल कर रहे थे। यहाँ तक कि जब तुम स्वयं ढीले पड़ गए और काम में झगड़ा डाल दिया और अवज्ञा की, जबकि अल्लाह ने तुम्हें वह चीज़ दिखा दी थी जिसकी तुम्हें चाह थी। तुममें कुछ लोग दुनिया चाहते थे और कुछ आख़िरत के इच्छुक थे। फिर अल्लाह ने तुम्हें उनके मुक़ाबले से हटा दिया, ताकि वह तुम्हारी परीक्षा ले। फिर भी उसने तुम्हें क्षमा कर दिया, क्योंकि अल्लाह ईमानवालों के लिए बड़ा अनुग्राही है
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने उहुद के दिन तुम्हारे दुश्मनों के विरुद्ध मदद का अपना वादा पूरा कर दिखाया, जब तुम उसकी अनुमति से उन्हें गंभीर रूप से मार रहे थे, यहाँ तक कि जब तुमने कायरता दिखाई और रसूल के आदेश पर जमे रहने से कमज़ोर पड़ गए और इस बात में मतभेद करने लगे कि अपने-अपने स्थानों पर बने रहें या अपना स्थान छोड़कर ग़नीमत का माल जमा करने लग जाएँ, और तुमने हर हाल में अपने स्थानों पर बने रहने से संबंधित रसूल के आदेश की अवहेलना की। तुमसे यह मामला इसके बाद घटित हुआ कि अल्लाह ने तुम्हें तुम्हारे दुश्मनों पर विजय के दृश्य दिखा दिए, जिसे तुम पसंद करते थे। तुममें से कुछ लोग दुनिया का लाभ चाहते थे और ये वे लोग थे जिन्होंने अपना स्थान छोड़ दिया। तथा तुम में से कुछ लोग आख़िरत का बदला चाहते थे और ये वही लोग थे, जो अल्लाह के रसूल के आदेश का पालने करते हुए अपने स्थानों पर बने रहे। फिर अल्लाह ने तुम्हें उनसे फेर दिया और तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए उन्हें तुम पर प्रभुत्व प्रदान कर दिया, ताकि विपत्ति पर धैर्य रखने वाला मोमिन उस व्यक्ति से प्रकट हो जाए जिसका पैर फिसल गया और उसकी आत्मा कमजोर हो गई। अल्लाह ने तुम्हारे उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेश का उल्लंघन करने को क्षमा कर दिया है। अल्लाह मोमिनों पर बड़ा अनुग्रह करने वाला है कि उसने उन्हें ईमान का मार्ग दिखाया, उनके पापों को क्षमा कर दिया और उन्हें उनकी मुसीबतों पर बदला दिया।
आयत 153
۞ إِذْ تُصْعِدُونَ وَلَا تَلْوُۥنَ عَلَىٰٓ أَحَدٍۢ وَٱلرَّسُولُ يَدْعُوكُمْ فِىٓ أُخْرَىٰكُمْ فَأَثَـٰبَكُمْ غَمًّۢا بِغَمٍّۢ لِّكَيْلَا تَحْزَنُوا۟ عَلَىٰ مَا فَاتَكُمْ وَلَا مَآ أَصَـٰبَكُمْ ۗ وَٱللَّهُ خَبِيرٌۢ بِمَا تَعْمَلُونَ
۞ إِذْ
जब
تُصْعِدُونَ
तुम चढ़े जा रहे थे
وَلَا
और ना
تَلْوُۥنَ
तुम मुड़कर देखते थे
عَلَىٰٓ
on
أَحَدٍۢ
किसी एक को
وَٱلرَّسُولُ
और रसूल
يَدْعُوكُمْ
बुला रहे थे तुम्हें
فِىٓ
[in]
أُخْرَىٰكُمْ
तुम्हारे पीछे से
فَأَثَـٰبَكُمْ
तो उसने दिया तुम्हें
غَمًّۢا
ग़म
بِغَمٍّۢ
साथ ग़म के
لِّكَيْلَا
ताकि ना
تَحْزَنُوا۟
तुम रंज करो
عَلَىٰ
उस पर
مَا
जो
فَاتَكُمْ
छिन गया तुम से
وَلَا
और ना
مَآ
जो
أَصَـٰبَكُمْ ۗ
पहुँचा तुम्हें
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
خَبِيرٌۢ
ख़ूब ख़बर रखने वाला है
بِمَا
उसकी जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
जब तुम लोग दूर भागे चले जा रहे थे और किसी को मुड़कर देखते तक न थे और रसूल तुम्हें पुकार रहा था, जबकि वह तुम्हारी दूसरी टुकड़ी के साथ था (जो भागी नहीं), तो अल्लाह ने तुम्हें शोक पर शोक दिया, ताकि तुम्हारे हाथ से कोई चीज़ निकल जाए या तुमपर कोई मुसीबत आए तो तुम शोकाकुल न हो। और जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उसकी भली-भाँति ख़बर रखता है
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो!) उस समय को याद करो जब उहुद के युद्ध के दिन, रसूल के आदेश का उल्लंघन करने के कारण विफलता का सामना करने पर, तुम पृथ्वी में तेज़ी से भागे जा रहे थे, और तुममें से कोई भी किसी को मुड़कर नहीं देख रहा था। जबकि रसूल तुम्हारे और बहुदेववादियों के बीच खड़े तुम्हारे पीछे से तुम्हें यह कहते हुए बुला रहे थे : अल्लाह के बंदो! मेरी ओर आओ, अल्लाह के बंदो! मेरी ओर आओ। अतः अल्लाह ने इसपर तुम्हें बदले में दर्द और संकट से पीड़ित किया क्योंकि तुम विजय और ग़नीमत के धन से वंचित हो गए, जिसके बाद एक और दर्द और संकट था, क्योंकि तुम्हारे बीच नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हत्या की ख़बर फैला दी गई। और अल्लाह ने तुम्हें इस आपदा से इसलिए पीड़ित किया, ताकि तुम विजय और ग़नीमत के धन से वंचित होने पर, तथा हत्या और घाव से पीड़ित होने पर दुखी न हो। क्योंकि जब तुम्हें यह पता चल गया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हत्या नहीं हुई है, तो तुम्हारे लिए हर मुसीबत और तकलीफ़ आसान हो गई। अल्लाह तुम्हारे कार्यों से अवगत है, तुम्हारे दिलों की स्थितियों तथा तुम्हारे शारीरिक अंगों के कार्यों में से कुछ भी उससे छिपा नहीं है।
आयत 154
ثُمَّ أَنزَلَ عَلَيْكُم مِّنۢ بَعْدِ ٱلْغَمِّ أَمَنَةًۭ نُّعَاسًۭا يَغْشَىٰ طَآئِفَةًۭ مِّنكُمْ ۖ وَطَآئِفَةٌۭ قَدْ أَهَمَّتْهُمْ أَنفُسُهُمْ يَظُنُّونَ بِٱللَّهِ غَيْرَ ٱلْحَقِّ ظَنَّ ٱلْجَـٰهِلِيَّةِ ۖ يَقُولُونَ هَل لَّنَا مِنَ ٱلْأَمْرِ مِن شَىْءٍۢ ۗ قُلْ إِنَّ ٱلْأَمْرَ كُلَّهُۥ لِلَّهِ ۗ يُخْفُونَ فِىٓ أَنفُسِهِم مَّا لَا يُبْدُونَ لَكَ ۖ يَقُولُونَ لَوْ كَانَ لَنَا مِنَ ٱلْأَمْرِ شَىْءٌۭ مَّا قُتِلْنَا هَـٰهُنَا ۗ قُل لَّوْ كُنتُمْ فِى بُيُوتِكُمْ لَبَرَزَ ٱلَّذِينَ كُتِبَ عَلَيْهِمُ ٱلْقَتْلُ إِلَىٰ مَضَاجِعِهِمْ ۖ وَلِيَبْتَلِىَ ٱللَّهُ مَا فِى صُدُورِكُمْ وَلِيُمَحِّصَ مَا فِى قُلُوبِكُمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ
ثُمَّ
फिर
أَنزَلَ
उसने उतारा
عَلَيْكُم
तुम पर
مِّنۢ
from
بَعْدِ
बाद
ٱلْغَمِّ
ग़म के
أَمَنَةًۭ
अमन
نُّعَاسًۭا
एक ऊँघ
يَغْشَىٰ
ढाँप लिया उसने
طَآئِفَةًۭ
एक गिरोह को
مِّنكُمْ ۖ
तुम में से
وَطَآئِفَةٌۭ
और एक गिरोह
قَدْ
तहक़ीक़
أَهَمَّتْهُمْ
फ़िक्र में डाला उन्हें
أَنفُسُهُمْ
उनके नफ़्सों ने
يَظُنُّونَ
वो गुमान कर रहे थे
بِٱللَّهِ
अल्लाह के बारे में
غَيْرَ
other than
ٱلْحَقِّ
नाहक़
ظَنَّ
गुमान करना
ٱلْجَـٰهِلِيَّةِ ۖ
जाहिलियत का
يَقُولُونَ
वो कह रहे थे
هَل
क्या है
لَّنَا
हमारे लिए
مِنَ
from
ٱلْأَمْرِ
मामले में से
مِن
any
شَىْءٍۢ ۗ
कोई चीज़
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّ
बेशक
ٱلْأَمْرَ
मामला
كُلَّهُۥ
सब का सब
لِلَّهِ ۗ
अल्लाह ही के लिए है
يُخْفُونَ
वो छुपा रहे थे
فِىٓ
in
أَنفُسِهِم
अपने नफ़्सों में
مَّا
जो
لَا
not
يُبْدُونَ
नहीं वो ज़ाहिर कर रहे थे
لَكَ ۖ
आपके लिए
يَقُولُونَ
वो कह रहे थे
لَوْ
अगर
كَانَ
होता
لَنَا
हमारे लिए
مِنَ
from
ٱلْأَمْرِ
मामले में से
شَىْءٌۭ
कुछ भी
مَّا
ना
قُتِلْنَا
क़त्ल किए जाते हम
هَـٰهُنَا ۗ
उस जगह
قُل
कह दीजिए
لَّوْ
अगर
كُنتُمْ
होते तुम
فِى
in
بُيُوتِكُمْ
अपने घरों में
لَبَرَزَ
अलबत्ता निकल पड़ते
ٱلَّذِينَ
वो जो
كُتِبَ
लिख दिया गया था
عَلَيْهِمُ
जिन पर
ٱلْقَتْلُ
क़त्ल होना
إِلَىٰ
तरफ़
مَضَاجِعِهِمْ ۖ
अपने (सोने) मौत के मक़ामात के
وَلِيَبْتَلِىَ
और ताकि आज़मा ले
ٱللَّهُ
अल्लाह
مَا
उसको जो
فِى
(is) in
صُدُورِكُمْ
तुम्हारे सीनों में है
وَلِيُمَحِّصَ
और ताकि वो ख़ालिस कर दे
مَا
उसको जो
فِى
(is) in
قُلُوبِكُمْ ۗ
तुम्हारे दिलों में है
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِذَاتِ
of what
ٱلصُّدُورِ
सीनों वाले (भेद)
फिर इस शोक के पश्चात उसने तुमपर एक शान्ति उतारी - एक निद्रा, जो तुममें से कुछ लोगों को घेर रही थी और कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें अपने प्राणों की चिन्ता थी। वे अल्लाह के विषय में ऐसा ख़याल कर रहे थे, जो सत्य के सर्वथा प्रतिकूल, अज्ञान (काल) का ख़याल था। वे कहते थे, "इन मामलों में क्या हमारा भी कुछ अधिकार है?" कह दो, "मामले तो सबके सब अल्लाह के (हाथ में) हैं।" वे जो कुछ अपने दिलों में छिपाए रखते है, तुमपर ज़ाहिर नहीं करते। कहते है, "यदि इस मामले में हमारा भी कुछ अधिकार होता तो हम यहाँ मारे न जाते।" कह दो, "यदि तुम अपने घरों में भी होते, तो भी जिन लोगों का क़त्ल होना तय था, वे निकलकर अपने अन्तिम शयन-स्थलों कर पहुँचकर रहते।" और यह इसलिए भी था कि जो कुछ तुम्हारे सीनों में है, अल्लाह उसे परख ले और जो कुछ तुम्हारे दिलों में है उसे साफ़ कर दे। और अल्लाह दिलों का हाल भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
फिर उसने दर्द और संकट के बाद तुमपर संतुष्टि और विश्वास उतार दिया। तुममें से एक समूह (जिन्हें अल्लाह के वचन पर भरोसा था) को उनके दिलों की शांति एवं स्थिरता के कारण ऊँघ आने लगी। जबकि दूसरा समूह ऐसा था, जो इस शांति और ऊँघ से वंचित था। ये मुनाफ़िक़ लेग थे, जिन्हें केवल खुद की सुरक्षा की चिंता थी। चुनाँचे वे चिंतित और भयभीत थे, वे अल्लाह के बारे में बुरा सोच रहे थे कि अल्लाह अपने रसूल की मदद नहीं करेगा और अपने बंदों का समर्थन नहीं करेगा। जिस तरह कि अज्ञानता काल के उन लोगों की सोच थी, जिन्होंने अल्लाह की हैसियत के समान उस का सम्मान नहीं किया। ये मुनाफ़िक़ लोग अल्लाह से अनभिज्ञ होने के कारण कहते हैं : युद्ध में निकलने के संबंध में हमसे राय नहीं ली गई। यदि हमसे राय और मशवरा लिया गया होता, तो हम युद्ध के लिए बाहर न निकलते। (ऐ नबी) इसका उत्तर देते हुए कह दें : "निःसंदेह सभी मामले का अधिकार केवल अल्लाह के हाथ में है। वह जो चाहता है, भाग्य निर्धारित करता है और जो चाहता है फैसला करता है। और उसी ने तुम्हारे भाग्य में निकलना लिख रखा था। ये मुनाफ़िक़ लोग अपने दिलों में संदेह और बुरी सोच (दुर्भावना) छिपाए हुए हैं, जो आपके सामने ज़ाहिर नहीं करते। वे कहते हैं : यदि लड़ाई के लिए निकलने के संबंध में हमारी बात मानी गई होती, तो हम इस स्थान पर न मारे जाते। (ऐ नबी) आप उनका खंडन करते हुए कह दीजिए : यदि तुम हत्या और मृत्यु के स्थानों से दूर अपने घरों में भी होते; तब भी अल्लाह ने तुममें से जिनका मरना लिख दिया है, वे अवश्य अपने मरने के स्थानों की ओर निकल आते। अल्लाह ने यह सब इसलिए अनिवार्य किया है, ताकि वह तुम्हारे दिलों के इरादों और उद्देश्यों का परीक्षण करे और उनमें जो विश्वास और पाखंड है उसे अलग कर दे। अल्लाह उस चीज़ को भली-भाँति जानने वाला है जो उसके बंदों के सीनों में है, उससे कुछ भी छिपा नहीं है।
आयत 155
إِنَّ ٱلَّذِينَ تَوَلَّوْا۟ مِنكُمْ يَوْمَ ٱلْتَقَى ٱلْجَمْعَانِ إِنَّمَا ٱسْتَزَلَّهُمُ ٱلشَّيْطَـٰنُ بِبَعْضِ مَا كَسَبُوا۟ ۖ وَلَقَدْ عَفَا ٱللَّهُ عَنْهُمْ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ حَلِيمٌۭ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
تَوَلَّوْا۟
फिर गए
مِنكُمْ
तुम में से
يَوْمَ
जिस दिन
ٱلْتَقَى
आमने सामने हुईं
ٱلْجَمْعَانِ
दो जमाअतें
إِنَّمَا
बेशक
ٱسْتَزَلَّهُمُ
फुसलाया था उन्हें
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान ने
بِبَعْضِ
बवजह बाज़ (आमाल) के
مَا
जो
كَسَبُوا۟ ۖ
उन्होंने कमाए
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
عَفَا
दरगुज़र किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَنْهُمْ ۗ
उनसे
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌ
बहुत बख़्शने वाला है
حَلِيمٌۭ
बहुत बुर्दबार है
तुममें से जो लोग दोनों गिरोहों की मुठभेड़ के दिन पीठ दिखा गए, उन्हें तो शैतान ही ने उनकी कुछ कमाई (कर्म) का कारण विचलित कर दिया था। और अल्लाह तो उन्हें क्षमा कर चुका है। निस्संदेह अल्लाह बड़ा क्षमा करनेवाला, सहनशील है
तफ़्सीर:
(ऐ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथियो!) जिस दिन उहुद के मैदान में, मुश्रिकों के एक गिरोह की भिड़ंत मुसलमानों के एक समूह से हुई, उस दिन जो लोग पराजित हुए, उन्हें शैतान ने उनके कुछ अपने ही किए हुए पापों के कारण, ग़लती करने पर उभारा। और अल्लाह ने अपनी ओर से कृपा एवं दया करते हुए उन्हें क्षमा कर दिया और उनकी पकड़ नहीं की। वास्तव में अल्लाह तौबा करने वालों को क्षमा करने वाला और सहनशील है जो जल्दी सज़ा नहीं देता।
आयत 156
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَكُونُوا۟ كَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَقَالُوا۟ لِإِخْوَٰنِهِمْ إِذَا ضَرَبُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ أَوْ كَانُوا۟ غُزًّۭى لَّوْ كَانُوا۟ عِندَنَا مَا مَاتُوا۟ وَمَا قُتِلُوا۟ لِيَجْعَلَ ٱللَّهُ ذَٰلِكَ حَسْرَةًۭ فِى قُلُوبِهِمْ ۗ وَٱللَّهُ يُحْىِۦ وَيُمِيتُ ۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌۭ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Do) not
تَكُونُوا۟
ना तुम हो जाओ
كَٱلَّذِينَ
उनकी तरह
كَفَرُوا۟
जिन्होंने कुफ़्र किया
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
لِإِخْوَٰنِهِمْ
अपने भाईंयों को
إِذَا
जब
ضَرَبُوا۟
वो चले फिरे
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
أَوْ
या
كَانُوا۟
थे वो
غُزًّۭى
ग़ाज़ी/लड़ने वाले
لَّوْ
अगर
كَانُوا۟
होते वो
عِندَنَا
पास हमारे
مَا
ना
مَاتُوا۟
वो मरते
وَمَا
और ना
قُتِلُوا۟
वो क़त्ल किए जाते
لِيَجْعَلَ
ताकि बना दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
ذَٰلِكَ
उसको
حَسْرَةًۭ
हसरत का सबब
فِى
in
قُلُوبِهِمْ ۗ
उनके दिलों में
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يُحْىِۦ
ज़िन्दा करता है
وَيُمِيتُ ۗ
और वो मौत देता है
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بِمَا
उसे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
بَصِيرٌۭ
ख़ूब देखने वाला है
ऐ ईमान लानेवालो! उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने इनकार किया और अपने भाईयों के विषय में, जबकि वे सफ़र में गए हों या युद्ध में हो (और उनकी वहाँ मृत्यु हो जाए तो) कहते है, "यदि वे हमारे पास होते तो न मरते और न क़त्ल होते।" (ऐसी बातें तो इसलिए होती है) ताकि अल्लाह उनको उनके दिलों में घर करनेवाला पछतावा और सन्ताप बना दे। अल्लाह ही जीवन प्रदान करने और मृत्यु देनेवाला है। और तुम जो कुछ भी कर रहे हो वह अल्लाह की स्पष्ट में है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! तुम लोग मुनाफ़िक़ों में से उन काफ़िरों के समान न हो जाओ, जो अपने रिश्तेदारों से कहते हैं जब वे आजीविका की तलाश में यात्रा करते हैं, या युद्ध में निकलते हैं, फिर मर जाते हैं या क़त्ल कर दिए जाते हैं, कि : "यदि वे हमारे पास होते और बाहर न निकलते और युद्ध में न गए होते, तो न वे मरते और न क़त्ल किए जाते।" अल्लाह ने उनके दिलों में यह विचार इसलिए डाला ताकि उन्हें अपने दिलों में अधिक से अधिक पछतावा (अफ़सोस) और दुःख हो। तथा अकेला अल्लाह ही है जो अपनी इच्छा से जीवन और मृत्यु देता है। न तो बैठे रहने से उसका निर्धारित निर्णय रुक सकता है और न निकलने से वह जल्दी आ सकता है। और अल्लाह तुम्हारे सब कार्यों को देख रहा है। तुम्हारे कर्म उससे छिपे नहीं हैं और वह तुम्हें उनका बदला देगा।
आयत 157
وَلَئِن قُتِلْتُمْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ أَوْ مُتُّمْ لَمَغْفِرَةٌۭ مِّنَ ٱللَّهِ وَرَحْمَةٌ خَيْرٌۭ مِّمَّا يَجْمَعُونَ
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
قُتِلْتُمْ
क़त्ल किए जाओ तुम
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
أَوْ
या
مُتُّمْ
मर जाओ तुम
لَمَغْفِرَةٌۭ
अलबत्ता बख़्शिश
مِّنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
وَرَحْمَةٌ
और रहमत
خَيْرٌۭ
बहुत बेहतर है
مِّمَّا
उससे जो
يَجْمَعُونَ
वो जमा कर रहे हैं
और यदि तुम अल्लाह के मार्ग में मारे गए या मर गए, तो अल्लाह का क्षमादान और उसकी दयालुता तो उससे कहीं उत्तम है, जिसके बटोरने में वे लगे हुए है
तफ़्सीर:
और यदि (ऐ ईमान वालो) तुम अल्लाह के रास्ते में मार दिए जाओ या मर जाओ, तो अल्लाह अवश्य तुम्हें महान क्षमा प्रदान करेगा और अपनी ओर से तुमपर ऐसी दया करेगा, जो तुम्हारे लिए इस दुनिया से तथा इसमें दुनिया वाले जो कुछ उसकी नश्वर नेमतें इकट्ठा कर रहे हैं, उससे कहीं बेहतर है।
आयत 158
وَلَئِن مُّتُّمْ أَوْ قُتِلْتُمْ لَإِلَى ٱللَّهِ تُحْشَرُونَ
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
مُّتُّمْ
मर जाओ तुम
أَوْ
या
قُتِلْتُمْ
क़त्ल किए जाओ तुम
لَإِلَى
अलबत्ता तरफ़
ٱللَّهِ
अल्लाह के
تُحْشَرُونَ
तुम इकट्ठे किए जाओगे
हाँ, यदि तुम मर गए या मारे गए, तो प्रत्येक दशा में तुम अल्लाह ही के पास इकट्ठा किए जाओगे
तफ़्सीर:
यदि तुम मर जाओ चाहे किसी भी स्थिति में तुम्हारी मृत्यु हो, या तुम मार दिए जाओ; तो तुम सब अल्लाह ही की ओर लौटाए जाओगे; ताकि वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों का बदला दे।
आयत 159
فَبِمَا رَحْمَةٍۢ مِّنَ ٱللَّهِ لِنتَ لَهُمْ ۖ وَلَوْ كُنتَ فَظًّا غَلِيظَ ٱلْقَلْبِ لَٱنفَضُّوا۟ مِنْ حَوْلِكَ ۖ فَٱعْفُ عَنْهُمْ وَٱسْتَغْفِرْ لَهُمْ وَشَاوِرْهُمْ فِى ٱلْأَمْرِ ۖ فَإِذَا عَزَمْتَ فَتَوَكَّلْ عَلَى ٱللَّهِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُتَوَكِّلِينَ
فَبِمَا
फिर बवजह
رَحْمَةٍۢ
रहमत के
مِّنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
لِنتَ
नर्म हो गए आप
لَهُمْ ۖ
उनके लिए
وَلَوْ
और अगर
كُنتَ
होते आप
فَظًّا
तुन्दख़ू
غَلِيظَ
सख़्त
ٱلْقَلْبِ
दिल
لَٱنفَضُّوا۟
अलबत्ता वो मुन्तशिर हो जाते
مِنْ
from
حَوْلِكَ ۖ
आपके आस पास से
فَٱعْفُ
पस दरगुज़र कीजिए
عَنْهُمْ
उनसे
وَٱسْتَغْفِرْ
और बख़्शिश माँगिए
لَهُمْ
उनके लिए
وَشَاوِرْهُمْ
और मशवरा कीजिए उनसे
فِى
in
ٱلْأَمْرِ ۖ
मामले में
فَإِذَا
फिर जब
عَزَمْتَ
पुख़्ता इरादा करें आप
فَتَوَكَّلْ
तो तवक्कल कीजिए
عَلَى
on
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह पर
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يُحِبُّ
मोहब्बत रखता है
ٱلْمُتَوَكِّلِينَ
तवक्कल करने वालों से
(तुमने तो अपनी दयालुता से उन्हें क्षमा कर दिया) तो अल्लाह की ओर से ही बड़ी दयालुता है जिसके कारण तुम उनके लिए नर्म रहे हो, यदि कहीं तुम स्वभाव के क्रूर और कठोर हृदय होते तो ये सब तुम्हारे पास से छँट जाते। अतः उन्हें क्षमा कर दो और उनके लिए क्षमा की प्रार्थना करो। और मामलों में उनसे परामर्श कर लिया करो। फिर जब तुम्हारे संकल्प किसी सम्मति पर सुदृढ़ हो जाएँ तो अल्लाह पर भरोसा करो। निस्संदेह अल्लाह को वे लोग प्रिय है जो उसपर भरोसा करते है
तफ़्सीर:
अल्लाह की महान दया के कारण - ऐ नबी - आपका व्यवहार अपने साथियों के साथ विनम्र था। यदि आप अपने कथन एवं कर्म में सख्त तथा कठोर दिल वाले होते, तो वे आपके पास से हट जाते। अतः आप अपने संबंध में उनकी कोताहियों को क्षमा करें और उनके लिए क्षमा की याचना करें। और जिन मामलों में परामर्श की आवश्यकता हो, उन मामलों में उनकी राय लें। फिर जब परामर्श के बाद किसी बात का पक्का इरादा कर लें, तो उसे कर गुजरें और अल्लाह पर भरोसा करें। निःसंदेह अल्लाह उन लोगों को पसंद करता है जो उसपर भरोसा करते हैं। चुनाँचे वह उन्हें तौफ़ीक प्रदान करता है और उनका समर्थन करता है।
आयत 160
إِن يَنصُرْكُمُ ٱللَّهُ فَلَا غَالِبَ لَكُمْ ۖ وَإِن يَخْذُلْكُمْ فَمَن ذَا ٱلَّذِى يَنصُرُكُم مِّنۢ بَعْدِهِۦ ۗ وَعَلَى ٱللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ ٱلْمُؤْمِنُونَ
إِن
अगर
يَنصُرْكُمُ
मदद करे तुम्हारी
ٱللَّهُ
अल्लाह
فَلَا
तो नहीं
غَالِبَ
कोई ग़ालिब आने वाला
لَكُمْ ۖ
तुम पर
وَإِن
और अगर
يَخْذُلْكُمْ
वो छोड़ दे तुम्हें
فَمَن
तो कौन है
ذَا
(is)
ٱلَّذِى
वो जो
يَنصُرُكُم
मदद करेगा तुम्हारी
مِّنۢ
from
بَعْدِهِۦ ۗ
बाद उसके
وَعَلَى
And on
ٱللَّهِ
और अल्लाह ही पर
فَلْيَتَوَكَّلِ
पस चाहिए कि तवक्कल किया करें
ٱلْمُؤْمِنُونَ
ईमान वाले
यदि अल्लाह तुम्हारी सहायता करे, तो कोई तुमपर प्रभावी नहीं हो सकता। और यदि वह तुम्हें छोड़ दे, तो फिर कौन हो जो उसके पश्चात तुम्हारी सहायता कर सके। अतः ईमानवालों को अल्लाह ही पर भरोसा रखना चाहिए
तफ़्सीर:
यदि अल्लाह अपनी सहायता और सहयोग से तुम्हारा समर्थन करे, तो कोई तुम्हें पराजित नहीं कर सकता, भले ही पृथ्वी के लोग तुम्हारे विरुद्ध इकट्ठे हो जाएँ। और यदि वह तुम्हारी सहायता छोड़ दे और तुम्हें स्वयं तुम्हारे हवाले कर दे, तो फिर उसके बाद कोई भी तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता। अतः विजय केवल उसी (अल्लाह) के हाथ में है, और ईमान वालों को केवल अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिए, किसी और पर नहीं।
आयत 161
وَمَا كَانَ لِنَبِىٍّ أَن يَغُلَّ ۚ وَمَن يَغْلُلْ يَأْتِ بِمَا غَلَّ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۚ ثُمَّ تُوَفَّىٰ كُلُّ نَفْسٍۢ مَّا كَسَبَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
لِنَبِىٍّ
किसी नबी के लिए
أَن
कि
يَغُلَّ ۚ
वो ख़यानत करे
وَمَن
और जो कोई
يَغْلُلْ
ख़यानत करेगा
يَأْتِ
वो ले आएगा
بِمَا
उसको जो
غَلَّ
उसने ख़यानत की
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ ۚ
क़यामत के
ثُمَّ
फिर
تُوَفَّىٰ
पूरा पूरा दिया जाएगा
كُلُّ
हर
نَفْسٍۢ
नफ़्स को
مَّا
जो
كَسَبَتْ
उसने कमाया
وَهُمْ
और वो
لَا
(will) not
يُظْلَمُونَ
ना वो ज़ुल्म किए जाऐंगे
यह किसी नबी के लिए सम्भब नहीं कि वह दिल में कीना-कपट रखे, और जो कोई कीना-कपट रखेगा तो वह क़ियामत के दिन अपने द्वेष समेत हाज़िर होगा। और प्रत्येक व्यक्ति को उसकी कमाई का पूरा-पूरा बदला दे दिया जाएँगा और उनपर कुछ भी ज़ुल्म न होगा
तफ़्सीर:
किसी नबी के लिए यह संभव नहीं है कि अल्लाह ने उसके लिए जो कुछ विशिष्ट कर दिया है उसके अलावा ग़नीमत के धन में से कुछ लेकर ख़यानत करे। और तुम में से जो कोई ग़नीमत के धन में से कुछ लेकर ख़यानत करेगा, उसे क़ियामत के दिन अपमानित करके दंडित किया जाएगा। चुनाँचे वह ख़यानत की हुई चीज़ को उठाए हुए सभी लोगों के सामने आएगा। फिर प्रत्येक प्राणी को उसके किए हुए का बिना कमी के पूरा-पूरा बदला दिया जाएगा। तथा उनके बुरे कर्मों को बढ़ाकर, या उनके अच्छे कामों को कम करके उनपर अत्याचार नहीं किया जाएगा।
आयत 162
أَفَمَنِ ٱتَّبَعَ رِضْوَٰنَ ٱللَّهِ كَمَنۢ بَآءَ بِسَخَطٍۢ مِّنَ ٱللَّهِ وَمَأْوَىٰهُ جَهَنَّمُ ۚ وَبِئْسَ ٱلْمَصِيرُ
أَفَمَنِ
क्या भला वो जो
ٱتَّبَعَ
पैरवी करे
رِضْوَٰنَ
(the) pleasure
ٱللَّهِ
अल्लाह की रज़ा की
كَمَنۢ
उसकी तरह हो सकता है जो
بَآءَ
पलटे
بِسَخَطٍۢ
साथ नाराज़गी के
مِّنَ
of
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
وَمَأْوَىٰهُ
और ठिकाना उसका
جَهَنَّمُ ۚ
जहन्नम हो
وَبِئْسَ
और कितनी बुरी है
ٱلْمَصِيرُ
लौटने की जगह
भला क्या जो व्यक्ति अल्लाह की इच्छा पर चले वह उस जैसा हो सकता है जो अल्लाह के प्रकोप का भागी हो चुका हो और जिसका ठिकाना जहन्नम है? और वह क्या ही बुरा ठिकाना है
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने वाली चीज़ों यानी ईमान और अच्छे कर्म का पालन करे, वह अल्लाह के निकट उस व्यक्ति के समान नहीं है, जिसने अल्लाह का इनकार किया और बुरे कार्य किए। जिसके कारण वह अल्लाह का सख्त क्रोध लेकर लौटा और उसका ठिकाना जहन्नम है। और यह बहुत बुरा ठिकाना है।
आयत 163
هُمْ دَرَجَـٰتٌ عِندَ ٱللَّهِ ۗ وَٱللَّهُ بَصِيرٌۢ بِمَا يَعْمَلُونَ
هُمْ
वो
دَرَجَـٰتٌ
दर्जों में हैं (मुख़्तलिफ़)
عِندَ
near
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह के नज़दीक
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بَصِيرٌۢ
ख़ूब देखने वाला है
بِمَا
उसको जो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते हैं
अल्लाह के यहाँ उनके विभिन्न दर्जे है और जो कुछ वे कर रहे है, अल्लाह की स्पष्ट में है
तफ़्सीर:
अल्लाह के निकट दुनिया और आखिरत में उनके स्थान अलग-अलग हैं। और वे जो कुछ करते हैं अल्लाह उसे देख रहा है। उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है और वह हर एक को उसके कर्म का बदला देगा।
आयत 164
لَقَدْ مَنَّ ٱللَّهُ عَلَى ٱلْمُؤْمِنِينَ إِذْ بَعَثَ فِيهِمْ رَسُولًۭا مِّنْ أَنفُسِهِمْ يَتْلُوا۟ عَلَيْهِمْ ءَايَـٰتِهِۦ وَيُزَكِّيهِمْ وَيُعَلِّمُهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْحِكْمَةَ وَإِن كَانُوا۟ مِن قَبْلُ لَفِى ضَلَـٰلٍۢ مُّبِينٍ
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
مَنَّ
एहसान किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَى
upon
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों पर
إِذْ
जब
بَعَثَ
उसने भेजा
فِيهِمْ
उन्ही में
رَسُولًۭا
एक रसूल
مِّنْ
from
أَنفُسِهِمْ
उनके नफ़्सों में से
يَتْلُوا۟
वो तिलावत करता है
عَلَيْهِمْ
उन पर
ءَايَـٰتِهِۦ
आयात उसकी
وَيُزَكِّيهِمْ
और वो पाक करता है उन्हें
وَيُعَلِّمُهُمُ
और वो सिखाता है उन्हें
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
وَٱلْحِكْمَةَ
और हिकमत
وَإِن
और बेशक
كَانُوا۟
थे वो
مِن
from
قَبْلُ
इससे पहले
لَفِى
certainly in
ضَلَـٰلٍۢ
अलबत्ता गुमराही में
مُّبِينٍ
खुली/वाज़ेह
निस्संदेह अल्लाह ने ईमानवालों पर बड़ा उपकार किया, जबकि स्वयं उन्हीं में से एक ऐसा रसूल उठाया जो उन्हें आयतें सुनाता है और उन्हें निखारता है, और उन्हें किताब और हिक़मत (तत्वदर्शिता) का शिक्षा देता है, अन्यथा इससे पहले वे लोग खुली गुमराही में पड़े हुए थे
तफ़्सीर:
वस्तुतः अल्लाह ने मोमिनों को अनुग्रह प्रदान किया और उन पर बड़ा उपकार किया है कि उनके अंदर उन्हीं में से एक रसूल भेजा, जो उन्हें क़ुरआन पढ़कर सुनाता है और उन्हें शिर्क (बहुदेववाद) और दुष्ट नैतिकता (दुराचार) से शुद्ध करता है, तथा उन्हें क़ुरआन और सुन्नत की शिक्षा देता है, हालाँकि वे इस रसूल के अवतरण से पूर्व संमार्ग से दूर खुली गुमराही में पड़े थे।
आयत 165
أَوَلَمَّآ أَصَـٰبَتْكُم مُّصِيبَةٌۭ قَدْ أَصَبْتُم مِّثْلَيْهَا قُلْتُمْ أَنَّىٰ هَـٰذَا ۖ قُلْ هُوَ مِنْ عِندِ أَنفُسِكُمْ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ
أَوَلَمَّآ
क्या भला जब
أَصَـٰبَتْكُم
पहुँची तुम्हें
مُّصِيبَةٌۭ
एक मुसीबत
قَدْ
तहक़ीक़
أَصَبْتُم
पहुँचाई तुमने
مِّثْلَيْهَا
उससे दोगुनी
قُلْتُمْ
कहा तुमने
أَنَّىٰ
कहाँ से (आई)
هَـٰذَا ۖ
ये
قُلْ
कह दीजिए
هُوَ
वो
مِنْ
(is)
عِندِ
from
أَنفُسِكُمْ ۗ
तुम्हारे नफ़्सों की जानिब से है
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌۭ
ख़ूब क़ुदरत रखने वाला है
यह क्या कि जब तुम्हें एक मुसीबत पहुँची, जिसकी दोगुनी तुमने पहुँचाए, तो तुम कहने लगे कि, "यह कहाँ से आ गई?" कह दो, "यह तो तुम्हारी अपनी ओर से है, अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है।"
तफ़्सीर:
क्या (ऐ ईमान वालो) जब तुम्हें उहुद के दिन पराजित होने के समय एक विपत्ति का सामना करना पड़ा और तुममें से कुछ लोग शहीद हो गए, जबकि तुमने बद्र के युद्ध में अपने शत्रुओं के इसके दोगुना लोगों को क़त्ल किया था और बंदी बनाया था, तो तुम कहने लगे : हमें यह विपत्ति कहाँ से पहुँच गई, जबकि हम ईमान वाले हैं और अल्लाह के नबी हमारे बीच उपस्थित हैं? (ऐ नबी) आप कह दीजिए : यह विपत्ति जो तुम्हें पहुँची है, वह तुम्हारे ही कारण से आई है जब तुमने आपस में विवाद किया और रसूल की अवज्ञा की। निःसंदेह अल्लाह हर चीज़ पर शक्तिमान है। अतः वह जिसकी चाहे सहायता करे और जिसे चाहे असहाय छोड़ दे।
आयत 166
وَمَآ أَصَـٰبَكُمْ يَوْمَ ٱلْتَقَى ٱلْجَمْعَانِ فَبِإِذْنِ ٱللَّهِ وَلِيَعْلَمَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
وَمَآ
और जो कुछ
أَصَـٰبَكُمْ
पहुँचा तुम्हें
يَوْمَ
जिस दिन
ٱلْتَقَى
आमने सामने हुईं
ٱلْجَمْعَانِ
दो जमाअतें
فَبِإِذْنِ
(was) by (the) permission
ٱللَّهِ
पस अल्लाह के इज़्न से था
وَلِيَعْلَمَ
और ताकि वो जान ले
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों को
और दोनों गिरोह की मुठभेड़ के दिन जो कुछ तुम्हारे सामने आया वह अल्लाह ही की अनुज्ञा से आया और इसलिए कि वह जान ले कि ईमानवाले कौन है
तफ़्सीर:
और उहुद के दिन तुम्हारे गिरोह और मुश्रिकों के गिरोह के बीच मुठभेड़ के समय तुम्हें जिस पराजय का सामना करना पड़ा, और तुममें से कुछ लोग घायल और कुछ लोग शहीद कर दिए गए, यह सब अल्लाह की अनुमति और उसके फ़ैसले (क़ज़ा व क़दर) के अनुसार था; जिसमें एक बड़ी हिकमत यह निहित थी कि सच्चे ईमान वाले प्रत्यक्ष हो जाएँ।
आयत 167
وَلِيَعْلَمَ ٱلَّذِينَ نَافَقُوا۟ ۚ وَقِيلَ لَهُمْ تَعَالَوْا۟ قَـٰتِلُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ أَوِ ٱدْفَعُوا۟ ۖ قَالُوا۟ لَوْ نَعْلَمُ قِتَالًۭا لَّٱتَّبَعْنَـٰكُمْ ۗ هُمْ لِلْكُفْرِ يَوْمَئِذٍ أَقْرَبُ مِنْهُمْ لِلْإِيمَـٰنِ ۚ يَقُولُونَ بِأَفْوَٰهِهِم مَّا لَيْسَ فِى قُلُوبِهِمْ ۗ وَٱللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا يَكْتُمُونَ
وَلِيَعْلَمَ
और ताकि वो जान ले
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
نَافَقُوا۟ ۚ
मुनाफ़िक़त की
وَقِيلَ
और कहा गया
لَهُمْ
उन्हें
تَعَالَوْا۟
आओ
قَـٰتِلُوا۟
जंग करो
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
أَوِ
या
ٱدْفَعُوا۟ ۖ
दिफ़ा करो
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لَوْ
अगर
نَعْلَمُ
हम जानते होते
قِتَالًۭا
जंग करना
لَّٱتَّبَعْنَـٰكُمْ ۗ
ज़रूर पैरवी करते हम तुम्हारी
هُمْ
वो
لِلْكُفْرِ
कुफ़्र के
يَوْمَئِذٍ
उस दिन
أَقْرَبُ
ज़्यादा क़रीब थे
مِنْهُمْ
उनसे
لِلْإِيمَـٰنِ ۚ
बनिस्बत ईमान के
يَقُولُونَ
वो कह रहे थे
بِأَفْوَٰهِهِم
अपने मुँहों से
مَّا
वो जो
لَيْسَ
नहीं था
فِى
in
قُلُوبِهِمْ ۗ
उनके दिलों में
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِمَا
उसको जो
يَكْتُمُونَ
वो छुपाते थे
और इसलिए कि वह कपटाचारियों को भी जान ले जिनसे कहा गया कि "आओ, अल्लाह के मार्ग में युद्ध करो या दुश्मनों को हटाओ।" उन्होंने कहा, "यदि हम जानते कि लड़ाई होगी तो हम अवश्य तुम्हारे साथ हो लेते।" उस दिन वे ईमान की अपेक्षा अधर्म के अधिक निकट थे। वे अपने मुँह से वे बातें कहते है, जो उनके दिलों में नहीं होती। और जो कुछ वे छिपाते है, अल्लाह उसे भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
और ताकि उन मुनाफ़िक़ों की (भी) पहचान हो जाए, जिनसे जब कहा गया कि : अल्लाह के रास्ते में युद्ध करो, या मुसलमानों का संख्याबल बढ़ाकर प्रतिरक्षा करो, तो उन्होंने उत्तर दिया : "यदि हम जानते कि युद्ध होगा, तो अवश्य तुम्हारा साथ देते। लेकिन हम यह नहीं देखते हैं कि तुम्हारे और उन लोगों के बीच कोई युद्ध होने वाला है।" वे उस समय उस स्थिति की अपेक्षा जो उनके विश्वास को इंगित करती थी, उस स्थिति के अधिक निकट थे जो उनके अविश्वास (कुफ़्र) को इंगित करती थी। वे अपने मुँह से ऐसी बात कह रहे थे जो उनके दिल में नहीं थी। और अल्लाह उनके दिलों के भेदों को ख़ूब जनता है और शीघ्र ही वह उन्हें इसकी सज़ा देगा।
आयत 168
ٱلَّذِينَ قَالُوا۟ لِإِخْوَٰنِهِمْ وَقَعَدُوا۟ لَوْ أَطَاعُونَا مَا قُتِلُوا۟ ۗ قُلْ فَٱدْرَءُوا۟ عَنْ أَنفُسِكُمُ ٱلْمَوْتَ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
قَالُوا۟
कहा
لِإِخْوَٰنِهِمْ
अपने भाईंयों को
وَقَعَدُوا۟
और वो ख़ुद बैठ गए
لَوْ
अगर
أَطَاعُونَا
वो इताअत करते हमारी
مَا
ना
قُتِلُوا۟ ۗ
वो क़त्ल किए जाते
قُلْ
कह दीजिए
فَٱدْرَءُوا۟
पस दूर करो
عَنْ
from
أَنفُسِكُمُ
अपने नफ़्सों से
ٱلْمَوْتَ
मौत को
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
ये वही लोग है जो स्वयं तो बैठे रहे और अपने भाइयों के विषय में कहने लगे, "यदि वे हमारी बात मान लेते तो मारे न जाते।" कह तो, "अच्छा, यदि तुम सच्चे हो, तो अब तुम अपने ऊपर से मृत्यु को टाल देना।"
तफ़्सीर:
ये वही लोग हैं जो युद्ध से पीछे रहे और अपने उन रिश्तेदारों के बारे में, जो उहुद के दिन शहीद हो गए, कहने लगे : "यदि वे हमारी बात मान लेते और युद्ध के लिए न निकलते, तो वे मारे नहीं जाते।" ऐ नबी! आप उन्हें उत्तर देते हुए कह दीजिए कि : तो तुम अपने आप से मौत को टालकर दिखाओ, यदि तुम अपने इस दावे में सच्चे हो कि अगर वे तुम्हारी बात मान लेते, तो मारे न जाते, और यह कि तुम्हारे मृत्यु से बच जाने का कारण अल्लाह के रास्ते में जिहाद से पीछे बैठ रहना था।
आयत 169
وَلَا تَحْسَبَنَّ ٱلَّذِينَ قُتِلُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ أَمْوَٰتًۢا ۚ بَلْ أَحْيَآءٌ عِندَ رَبِّهِمْ يُرْزَقُونَ
وَلَا
और ना
تَحْسَبَنَّ
आप हरगिज़ गुमान करें
ٱلَّذِينَ
उनको जो
قُتِلُوا۟
क़त्ल कर दिए गए
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
أَمْوَٰتًۢا ۚ
मुर्दे
بَلْ
बल्कि
أَحْيَآءٌ
ज़िन्दा हैं
عِندَ
पास
رَبِّهِمْ
अपने रब के
يُرْزَقُونَ
वो रिज़्क दिए जाते हैं
तुम उन लोगों को जो अल्लाह के मार्ग में मारे गए है, मुर्दा न समझो, बल्कि वे अपने रब के पास जीवित हैं, रोज़ी पा रहे हैं
तफ़्सीर:
(ऐ नबी) आप यह मत समझें कि जो लोग अल्लाह की खातिर जिहाद में मारे गए थे, वे मर चुके हैं। बल्कि वे अपने पालनहार के पास उसके सम्मान के घर में एक विशेष जीवन जी रहे हैं, उन्हें विभिन्न प्रकार की ऐसी रोज़ी मिलती रहती है, जिसका ज्ञान केवल अल्लाह को है।
आयत 170
فَرِحِينَ بِمَآ ءَاتَىٰهُمُ ٱللَّهُ مِن فَضْلِهِۦ وَيَسْتَبْشِرُونَ بِٱلَّذِينَ لَمْ يَلْحَقُوا۟ بِهِم مِّنْ خَلْفِهِمْ أَلَّا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
فَرِحِينَ
ख़ुश हैं
بِمَآ
उस पर जो
ءَاتَىٰهُمُ
अता किया उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِن
of
فَضْلِهِۦ
अपने फ़ज़ल से
وَيَسْتَبْشِرُونَ
और वो ख़ुश होते हैं
بِٱلَّذِينَ
उनके बारे में
لَمْ
नहीं
يَلْحَقُوا۟
वो मिले
بِهِم
उन्हें
مِّنْ
[from]
خَلْفِهِمْ
उनके पीछे से
أَلَّا
कि ना
خَوْفٌ
कोई ख़ौफ़ होगा
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يَحْزَنُونَ
वो ग़मगीन होंगे
अल्लाह ने अपनी उदार कृपा से जो कुछ उन्हें प्रदान किया है, वे उसपर बहुत प्रसन्न है और उन लोगों के लिए भी ख़ुश हो रहे है जो उनके पीछे रह गए है, अभी उनसे मिले नहीं है कि उन्हें भी न कोई भय होगा और न वे दुखी होंगे
तफ़्सीर:
अल्लाह ने अपनी कृपा से जो कुछ उन्हें प्रदान किया है उस पर वे खुशी और आनंद से अभिभूत हैं। वे इस आशा और प्रतीक्षा में हैं कि उनके वे भाई जो दुनिया में रह गए हैं, उनसे आ मिलेंगे, और वे भी अगर अल्लाह के रास्ते में युद्ध करते हुए मारे जाएँगे, तो उन्हें भी उन्हीं की तरह अल्लाह का अनुग्रह प्राप्त होगा। तथा उन्हें न अपने सामने आख़िरत का भय होगा और न वे दुनिया की सुख-सामग्री के छूटने पर दुखी होंगे।
आयत 171
۞ يَسْتَبْشِرُونَ بِنِعْمَةٍۢ مِّنَ ٱللَّهِ وَفَضْلٍۢ وَأَنَّ ٱللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجْرَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
۞ يَسْتَبْشِرُونَ
वो ख़ुश होते हैं
بِنِعْمَةٍۢ
नेअमत पर
مِّنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
وَفَضْلٍۢ
और फ़ज़ल पर
وَأَنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يُضِيعُ
नहीं वो ज़ाया करता
أَجْرَ
अजर
ٱلْمُؤْمِنِينَ
ईमान वालों का
वे अल्लाह के अनुग्रह और उसकी उदार कृपा से प्रसन्न हो रहे है और इससे कि अल्लाह ईमानवालों का बदला नष्ट नहीं करता
तफ़्सीर:
इसके साथ ही, वे अल्लाह की ओर से उनकी प्रतीक्षा कर रहे महान प्रतिफल, और उस प्रतिफल में महान वृद्धि से प्रसन्न हो रहे हैं, और इससे भी (प्रसन्न हैं) कि सर्वशक्तिमान अल्लाह विश्वासियों के प्रतिफल को विनष्ट नहीं करता, बल्कि उन्हें उनका पूरा-पूरा बदला देता है और उन्हें उसपर बढ़ाकर देता है।
आयत 172
ٱلَّذِينَ ٱسْتَجَابُوا۟ لِلَّهِ وَٱلرَّسُولِ مِنۢ بَعْدِ مَآ أَصَابَهُمُ ٱلْقَرْحُ ۚ لِلَّذِينَ أَحْسَنُوا۟ مِنْهُمْ وَٱتَّقَوْا۟ أَجْرٌ عَظِيمٌ
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
ٱسْتَجَابُوا۟
हुक्म माना
لِلَّهِ
अल्लाह का
وَٱلرَّسُولِ
और रसूल का
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद इसके
مَآ
जो
أَصَابَهُمُ
पहुँचा उन्हें
ٱلْقَرْحُ ۚ
ज़ख़्म
لِلَّذِينَ
उनके लिए जिन्होंने
أَحْسَنُوا۟
एहसान किया
مِنْهُمْ
उनमें से
وَٱتَّقَوْا۟
और तक़वा किया
أَجْرٌ
अजर है
عَظِيمٌ
बहुत बड़ा
जिन लोगों ने अल्लाह और रसूल की पुकार को स्वीकार किया, इसके पश्चात कि उन्हें आघात पहुँच चुका था। इन सत्कर्मी और (अल्लाह का) डर रखनेवालों के लिए बड़ा प्रतिदान है
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल के आदेश को स्वीकार किया जब उन्हें अल्लाह के रास्ते में लड़ने के लिए बाहर निकलने और “हमराउल-असद” के युद्ध में बहुदेववादियों से मुठभेड़ करने के लिए बुलाया गया, जो कि उहुद के युद्ध के बाद घटित हुआ था, जिसमें मुसलामन ज़ख़्मों से चूर और निढाल हो गए थे। परंतु उनके घावों ने उन्हें अल्लाह और उसके रसूल की पुकार का जवाब देने से नहीं रोका। उनमें से जिन लोगों ने अच्छे कार्य किए तथा अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई बातों से बचकर उससे डरते रहे, उनके लिए बहुत बड़ा बदला है और वह जन्नत है।
आयत 173
ٱلَّذِينَ قَالَ لَهُمُ ٱلنَّاسُ إِنَّ ٱلنَّاسَ قَدْ جَمَعُوا۟ لَكُمْ فَٱخْشَوْهُمْ فَزَادَهُمْ إِيمَـٰنًۭا وَقَالُوا۟ حَسْبُنَا ٱللَّهُ وَنِعْمَ ٱلْوَكِيلُ
ٱلَّذِينَ
वो जो
قَالَ
कहा
لَهُمُ
उन्हें
ٱلنَّاسُ
लोगों ने
إِنَّ
बेशक
ٱلنَّاسَ
लोग
قَدْ
तहक़ीक़
جَمَعُوا۟
जमा हो गए हैं
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
فَٱخْشَوْهُمْ
पस डरो उनसे
فَزَادَهُمْ
पस उसने बढ़ा दिया उन्हें
إِيمَـٰنًۭا
ईमान में
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
حَسْبُنَا
काफ़ी है हमें
ٱللَّهُ
अल्लाह
وَنِعْمَ
और कितना अच्छा है
ٱلْوَكِيلُ
कारसाज़
ये वही लोग है जिनसे लोगों ने कहा, "तुम्हारे विरुद्ध लोग इकट्ठा हो गए है, अतः उनसे डरो।" तो इस चीज़ ने उनके ईमान को और बढ़ा दिया। और उन्होंने कहा, "हमारे लिए तो बस अल्लाह काफ़ी है और वही सबसे अच्छा कार्य-साधक है।"
तफ़्सीर:
ये वही लोग हैं जिनसे कुछ मुश्रिकों ने कहा : कुरैश ने अबू सुफ़यान के नेतृत्व में तुमसे लड़ने और तुम्हें विनष्ट करने के लिए बहुत बड़ी सेना इकट्ठा कर ली है। अतः उनसे डरो और उनसे मुठभेड़ करने से बचो। तो उनकी इस बात और इस भय दिलाने से उनका अल्लाह पर विश्वास और उसके वादे पर भरोसा और बढ़ गया। चुनाँचे वे यह कहते हुए मुश्रिकों से मुठभेड़ करने के लिए निकल पड़े कि : अल्लाह हमारे लिए काफी है। और वह सबसे अच्छा है जिसे हम अपना मामला सौंपते हैं।
आयत 174
فَٱنقَلَبُوا۟ بِنِعْمَةٍۢ مِّنَ ٱللَّهِ وَفَضْلٍۢ لَّمْ يَمْسَسْهُمْ سُوٓءٌۭ وَٱتَّبَعُوا۟ رِضْوَٰنَ ٱللَّهِ ۗ وَٱللَّهُ ذُو فَضْلٍ عَظِيمٍ
فَٱنقَلَبُوا۟
पस वो पलट आए
بِنِعْمَةٍۢ
साथ नेअमत के
مِّنَ
of
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
وَفَضْلٍۢ
और फ़ज़ल के
لَّمْ
नहीं
يَمْسَسْهُمْ
छुआ उन्हें
سُوٓءٌۭ
किसी बुराई (तकलीफ़) ने
وَٱتَّبَعُوا۟
और उन्होंने पैरवी की
رِضْوَٰنَ
(the) pleasure
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह की रज़ा की
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
ذُو
(is) Possessor
فَضْلٍ
फ़ज़ल वाला है
عَظِيمٍ
बहुत बड़े
तो वे अल्लाह को ओर से प्राप्त होनेवाली नेमत और उदार कृपा के साथ लौटे। उन्हें कोई तकलीफ़ छू भी नहीं सकी और वे अल्लाह की इच्छा पर चले भी, और अल्लाह बड़ी ही उदार कृपावाला है
तफ़्सीर:
फिर वे “हमराउल असद” की ओर निकलने के बाद अल्लाह की ओर से महान प्रतिफल, अपने पदों में वृद्धि और अपने शत्रुओं से सुरक्षा के साथ लौटे, चुनांचे वे न मारे गए और न ही घायल हुए। तथा उन्होंने ऐसी बातों का अनुसरण किया, जिनसे अल्लाह प्रसन्न होता है, जैसे उसकी आज्ञाकारिता पर प्रतिबद्ध रहना और उसकी अवज्ञा से दूर रहना। और अल्लाह अपने मोमिन बंदों पर बड़े अनुग्रह वाला है।
आयत 175
إِنَّمَا ذَٰلِكُمُ ٱلشَّيْطَـٰنُ يُخَوِّفُ أَوْلِيَآءَهُۥ فَلَا تَخَافُوهُمْ وَخَافُونِ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
إِنَّمَا
बेशक
ذَٰلِكُمُ
ये
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान है
يُخَوِّفُ
जो डराता है
أَوْلِيَآءَهُۥ
अपने दोस्तों को
فَلَا
तो ना
تَخَافُوهُمْ
तुम डरो उनसे
وَخَافُونِ
और डरो मुझसे
إِن
अगर
كُنتُم
हो तुम
مُّؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
वह तो शैतान है जो अपने मित्रों को डराता है। अतः तुम उनसे न डरो, बल्कि मुझी से डरो, यदि तुम ईमानवाले हो
तफ़्सीर:
तुम्हें डराने वाला शैतान ही है। वह अपने समर्थकों और सहायकों के द्वारा तुम्हें भयभीत करता है। अतः तुम उनके सामने कायरता मत दिखाओ। क्योंकि उनके पास कोई शक्ति और सामर्थ्य नहीं है। और अल्लाह की आज्ञाकारिता पर प्रतिबद्धता के साथ केवल उसी से डरो, यदि तुम वास्तव में उस पर विश्वास रखने वाले हो।
आयत 176
وَلَا يَحْزُنكَ ٱلَّذِينَ يُسَـٰرِعُونَ فِى ٱلْكُفْرِ ۚ إِنَّهُمْ لَن يَضُرُّوا۟ ٱللَّهَ شَيْـًۭٔا ۗ يُرِيدُ ٱللَّهُ أَلَّا يَجْعَلَ لَهُمْ حَظًّۭا فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ
وَلَا
और ना
يَحْزُنكَ
ग़मगीन करें आपको
ٱلَّذِينَ
वो जो
يُسَـٰرِعُونَ
जल्दी करते हैं
فِى
in(to)
ٱلْكُفْرِ ۚ
कुफ़्र में
إِنَّهُمْ
बेशक वो
لَن
हरगिज़ नहीं
يَضُرُّوا۟
वो नुक़सान दे सकते
ٱللَّهَ
अल्लाह को
شَيْـًۭٔا ۗ
कुछ भी
يُرِيدُ
चाहता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَلَّا
कि ना
يَجْعَلَ
वो रखे
لَهُمْ
उनके लिए
حَظًّۭا
कोई हिस्सा
فِى
in
ٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ
आख़िरत में
وَلَهُمْ
और उनके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
عَظِيمٌ
बहुत बड़ा
जो लोग अधर्म और इनकार में जल्दी दिखाते है, उनके कारण तुम दुखी न हो। वे अल्लाह का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। अल्लाह चाहता है कि उनके लिए आख़िरत में कोई हिस्सा न रखे, उनके लिए तो बड़ी यातना है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) मुनाफिक़ो में से जो लोग अपनी एड़ियों के बल पलटते हुए कुफ़्र (अविश्वास) में जल्दी कर रहे हैं, आप उनसे दुःखी न हों। क्योंकि वे अल्लाह को कोई हानि नहीं पहुँचा सकते। बल्कि वे अल्लाह पर ईमान और उसके आज्ञापालन से दूर होकर स्वयं को नुकसान पहुँचा रहे हैं। अल्लाह उन्हें असहाय छोड़कर और उन्हें तौफ़ीक़ न देकर यह चाहता है कि उनके लिए आख़िरत की नेमतों में से कोई हिस्सा न रह जाए। और उनके लिए वहाँ जहन्नम में बहुत बड़ी यातना है।
आयत 177
إِنَّ ٱلَّذِينَ ٱشْتَرَوُا۟ ٱلْكُفْرَ بِٱلْإِيمَـٰنِ لَن يَضُرُّوا۟ ٱللَّهَ شَيْـًۭٔا وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
ٱشْتَرَوُا۟
ख़रीद लिया
ٱلْكُفْرَ
कुफ़्र को
بِٱلْإِيمَـٰنِ
बदले ईमान के
لَن
हरगिज़ नहीं
يَضُرُّوا۟
वो नुक़सान दे सकते
ٱللَّهَ
अल्लाह को
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
وَلَهُمْ
और उनके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
जो लोग ईमान की क़ीमत पर इनकार और अधर्म के ग्राहक हुए, वे अल्लाह का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते, उनके लिए तो दुखद यातना है
तफ़्सीर:
वास्तव में, जिन लोगों ने ईमान के बदले कुफ्र का सौदा किया, वे अल्लाह को कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचा सकते। बल्कि वे खुद को नुकसान पहुँचाएंगे। और आख़िरत में उनके लिए दर्दनाक यातना है।
आयत 178
وَلَا يَحْسَبَنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ أَنَّمَا نُمْلِى لَهُمْ خَيْرٌۭ لِّأَنفُسِهِمْ ۚ إِنَّمَا نُمْلِى لَهُمْ لِيَزْدَادُوٓا۟ إِثْمًۭا ۚ وَلَهُمْ عَذَابٌۭ مُّهِينٌۭ
وَلَا
और ना
يَحْسَبَنَّ
हरगिज़ गुमान करें
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
أَنَّمَا
बेशक जो
نُمْلِى
हम ढील दे रहे हैं
لَهُمْ
उन्हें
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لِّأَنفُسِهِمْ ۚ
उनके नफ़्सों के लिए
إِنَّمَا
बेशक
نُمْلِى
हम ढील दे रहे हैं
لَهُمْ
उन्हें
لِيَزْدَادُوٓا۟
ताकि वो बढ़ जाऐं
إِثْمًۭا ۚ
गुनाह में
وَلَهُمْ
और उनके लिए
عَذَابٌۭ
अज़ाब है
مُّهِينٌۭ
रुस्वा करने वाला
और यह ढ़ील जो हम उन्हें दिए जाते है, इसे अधर्मी लोग अपने लिए अच्छा न समझे। यह ढील तो हम उन्हें सिर्फ़ इसलिए दे रहे है कि वे गुनाहों में और अधिक बढ़ जाएँ, और उनके लिए तो अत्यन्त अपमानजनक यातना है
तफ़्सीर:
अपने पालनहार का इनकार करने वाले और उसकी शरीयत का विरोध करने वाले, हरगिज़ यह न समझें कि उनके कुफ्र के बावजूद उन्हें ढील देना और उनकी आयु लंबी करना, उनके लिए अच्छा है। मामला वैसा नहीं है, जैसा वे समझते हैं। वास्तव में, हम उन्हें ढील इसलिए दे रहे हैं ताकि अधिक से अधिक गुनाह करके अपने पाप का घड़ा भर लें। और उनके लिए अपमानजनक यातना है।
आयत 179
مَّا كَانَ ٱللَّهُ لِيَذَرَ ٱلْمُؤْمِنِينَ عَلَىٰ مَآ أَنتُمْ عَلَيْهِ حَتَّىٰ يَمِيزَ ٱلْخَبِيثَ مِنَ ٱلطَّيِّبِ ۗ وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيُطْلِعَكُمْ عَلَى ٱلْغَيْبِ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ يَجْتَبِى مِن رُّسُلِهِۦ مَن يَشَآءُ ۖ فَـَٔامِنُوا۟ بِٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦ ۚ وَإِن تُؤْمِنُوا۟ وَتَتَّقُوا۟ فَلَكُمْ أَجْرٌ عَظِيمٌۭ
مَّا
नहीं
كَانَ
है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِيَذَرَ
कि वो छोड़ दे
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों को
عَلَىٰ
ऊपर उसके
مَآ
जो हो
أَنتُمْ
तुम
عَلَيْهِ
जिस पर
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَمِيزَ
वो छाँट दे
ٱلْخَبِيثَ
नापाक को
مِنَ
from
ٱلطَّيِّبِ ۗ
पाक से
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِيُطْلِعَكُمْ
कि वो आगाह करे तुम्हें
عَلَى
about
ٱلْغَيْبِ
ग़ैब पर
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَجْتَبِى
चुन लेता है
مِن
from
رُّسُلِهِۦ
अपने रसूलों में से
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۖ
वो चाहता है
فَـَٔامِنُوا۟
पस ईमान लाओ
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَرُسُلِهِۦ ۚ
और उसके रसूलों पर
وَإِن
और अगर
تُؤْمِنُوا۟
तुम ईमान लाओगे
وَتَتَّقُوا۟
और तुम तक़वा करोगे
فَلَكُمْ
तो तुम्हारे लिए
أَجْرٌ
अजर है
عَظِيمٌۭ
बहुत बड़ा
अल्लाह ईमानवालों को इस दशा में नहीं रहने देगा, जिसमें तुम हो। यह तो उस समय तक की बात है जबतक कि वह अपवित्र को पवित्र से पृथक नहीं कर देता। और अल्लाह ऐसा नहीं है कि वह तुम्हें परोक्ष की सूचना दे दे। किन्तु अल्लाह इस काम के लिए जिसको चाहता है चुन लेता है, और वे उसके रसूल होते है। अतः अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ। और यदि तुम ईमान लाओगे और (अल्लाह का) डर रखोगे तो तुमको बड़ा प्रतिदान मिलेगा
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो!) अल्लाह की हिकमत यह नहीं है कि वह तुम्हें तुम्हारे मुनाफिक़ों (पाखंडियों) के साथ मिश्रण (घुलने-मिलने), तुम्हारे बीच अंतर न होने और सच्चे विश्वासियों के स्पष्ट न होने की स्थिति में छोड़ दे, जब तक कि वह तुम्हें विभिन्न प्रकार की ज़िम्मेदारियों और परीक्षणों के द्वारा उत्कृष्ट न कर दे। ताकि अच्छा मोमिन, दुष्ट मुनाफ़िक़ से विदित होकर सामने आ जाए। तथा अल्लाह की हिकमत यह भी नहीं है कि वह तुम्हें परोक्ष (ग़ैब की बातों) से सूचित कर दे, तो तुम मोमिन और मुनाफ़िक़ के बीच अंतर करने लगो। लेकिन अल्लाह अपने रसूलों में से जिसे चाहता है, चुन लेता है और उसे कुछ ग़ैब की बातों की सूचना देता है, जैसा कि उसने अपने नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को मुनाफिक़ों की स्थिति के बारे में सूचित किया। अतः तुम अल्लाह और उसके रसूल पर अपने ईमान को मज़बूत कर लो। यदि तुम सच्चे ईमान वाले बन जाओ और अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके एवं उसकी मना की हुई चीज़ों से बचकर, डरने लगो, तो तुम्हारे लिए अल्लाह के निकट बड़ा प्रतिफल है।
आयत 180
وَلَا يَحْسَبَنَّ ٱلَّذِينَ يَبْخَلُونَ بِمَآ ءَاتَىٰهُمُ ٱللَّهُ مِن فَضْلِهِۦ هُوَ خَيْرًۭا لَّهُم ۖ بَلْ هُوَ شَرٌّۭ لَّهُمْ ۖ سَيُطَوَّقُونَ مَا بَخِلُوا۟ بِهِۦ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ وَلِلَّهِ مِيرَٰثُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۗ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌۭ
وَلَا
और ना
يَحْسَبَنَّ
हरगिज़ गुमान करें
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَبْخَلُونَ
बुख़्ल करते हैं
بِمَآ
साथ उसके जो
ءَاتَىٰهُمُ
अता किया उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِن
of
فَضْلِهِۦ
अपने फ़ज़ल से
هُوَ
वो
خَيْرًۭا
बेहतर है
لَّهُم ۖ
उनके लिए
بَلْ
बल्कि
هُوَ
वो
شَرٌّۭ
बुरा है
لَّهُمْ ۖ
उनके लिए
سَيُطَوَّقُونَ
अनक़रीब वो तौक़ पहनाए जाऐंगे
مَا
उसका जो
بَخِلُوا۟
उन्होंने बुख़्ल किया
بِهِۦ
जिसका
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ
क़यामत के
وَلِلَّهِ
और अल्लाह ही के लिए है
مِيرَٰثُ
मीरास
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों की
وَٱلْأَرْضِ ۗ
और ज़मीन की
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بِمَا
उससे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
خَبِيرٌۭ
ख़ूब बाख़बर है
जो लोग उस चीज़ में कृपणता से काम लेते है, जो अल्लाह ने अपनी उदार कृपा से उन्हें प्रदान की है, वे यह न समझे कि यह उनके हित में अच्छा है, बल्कि यह उनके लिए बुरा है। जिस चीज़ में उन्होंने कृपणता से काम लिया होगा, वही आगे कियामत के दिन उनके गले का तौक़ बन जाएगा। और ये आकाश और धरती अंत में अल्लाह ही के लिए रह जाएँगे। तुम जो कुछ भी करते हो, अल्लाह उसकी ख़बर रखता है
तफ़्सीर:
जो लोग उन नेमतों में कंजूसी करते हैं, जो अल्लाह ने अपनी कृपा से उन्हें प्रदान किए हैं। चुनाँचे वे उनमें अल्लाह के अधिकार को रोक लेते हैं, वे यह मत सोचें कि यह व्यवहार उनके लिए अच्छा है, बल्कि यह उनके लिए बुरा है। क्योंकि उन्होंने जिस धन में कंजूसी की है, वह तौक़ (पट्टा) बन जाएगा, जिसे क़ियामत के दिन उनकी गर्दनों में डालकर उन्हें यातना दी जाएगी। तथा आकाश और धरती की सभी चीज़ों को अकेले अल्लाह ही की ओर लौटना है। और वही अपनी समस्त रचनाओं के नाश हो जाने के बाद जीवित रहेगा। और जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उसके सूक्ष्म से सूक्ष्म विवरण से अवगत है और वह तुम्हें उसका बदला देगा।
आयत 181
لَّقَدْ سَمِعَ ٱللَّهُ قَوْلَ ٱلَّذِينَ قَالُوٓا۟ إِنَّ ٱللَّهَ فَقِيرٌۭ وَنَحْنُ أَغْنِيَآءُ ۘ سَنَكْتُبُ مَا قَالُوا۟ وَقَتْلَهُمُ ٱلْأَنۢبِيَآءَ بِغَيْرِ حَقٍّۢ وَنَقُولُ ذُوقُوا۟ عَذَابَ ٱلْحَرِيقِ
لَّقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
سَمِعَ
सुन ली
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
قَوْلَ
बात
ٱلَّذِينَ
उनकी जिन्होंने
قَالُوٓا۟
कहा
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
فَقِيرٌۭ
फ़क़ीर है
وَنَحْنُ
और हम
أَغْنِيَآءُ ۘ
ग़नी हैं
سَنَكْتُبُ
ज़रूर हम लिख लेंगे
مَا
जो
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
وَقَتْلَهُمُ
और क़त्ल करना उनका
ٱلْأَنۢبِيَآءَ
अम्बिया को
بِغَيْرِ
बग़ैर
حَقٍّۢ
हक़ के
وَنَقُولُ
और हम कहेंगे
ذُوقُوا۟
चखो
عَذَابَ
अज़ाब
ٱلْحَرِيقِ
जलने का
अल्लाह उन लोगों की बात सुन चुका है जिनका कहना है कि "अल्लाह तो निर्धन है और हम धनवान है।" उनकी बात हम लिख लेंगे और नबियों को जो वे नाहक क़त्ल करते रहे है उसे भी। और हम कहेंगे, "लो, (अब) जलने की यातना का मज़ा चखो।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने यहूदियों के कथन को सुना जब उन्होंने कहा : “अल्लाह गरीब है क्योंकि उसने हमसे ऋण मांगा है, और हमारे पास जो धन है उससे हम समृद्ध हैं।” उन्होंने अपने पालनहार पर जो मिथ्यारोपण किया है, हम उसे तथा उनके अनाधिकार अपने नबियों की हत्या करने को भी अवश्य लिख लेंगे। और हम उनसे कहेंगे : लो, आग में जला देने वाली यातना का मज़ा चखो।
आयत 182
ذَٰلِكَ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيكُمْ وَأَنَّ ٱللَّهَ لَيْسَ بِظَلَّامٍۢ لِّلْعَبِيدِ
ذَٰلِكَ
ये
بِمَا
बवजह उसके जो
قَدَّمَتْ
आगे भेजा
أَيْدِيكُمْ
तुम्हारे हाथों ने
وَأَنَّ
और बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَيْسَ
नहीं
بِظَلَّامٍۢ
ज़ुल्म करने वाला
لِّلْعَبِيدِ
बन्दों पर
यह उसका बदला है जो तुम्हारे हाथों ने आगे भेजा। अल्लाह अपने बन्दों पर तनिक भी ज़ुल्म नहीं करता
तफ़्सीर:
यह यातना उन गुनाहों और कुकर्मों के कारण है जो (ऐ यहूदियो) तुम्हारे हाथ आगे भेजते रहे हैं। और अल्लाह तो अपने बंदों में से किसी पर भी अत्याचार नहीं करता है।
आयत 183
ٱلَّذِينَ قَالُوٓا۟ إِنَّ ٱللَّهَ عَهِدَ إِلَيْنَآ أَلَّا نُؤْمِنَ لِرَسُولٍ حَتَّىٰ يَأْتِيَنَا بِقُرْبَانٍۢ تَأْكُلُهُ ٱلنَّارُ ۗ قُلْ قَدْ جَآءَكُمْ رُسُلٌۭ مِّن قَبْلِى بِٱلْبَيِّنَـٰتِ وَبِٱلَّذِى قُلْتُمْ فَلِمَ قَتَلْتُمُوهُمْ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
قَالُوٓا۟
कहा
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
عَهِدَ
अहद ले रखा है
إِلَيْنَآ
हम से
أَلَّا
कि ना
نُؤْمِنَ
हम मानें
لِرَسُولٍ
किसी रसूल को
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَأْتِيَنَا
वो लाए हमारे पास
بِقُرْبَانٍۢ
एक क़ुर्बानी
تَأْكُلُهُ
खा जाए उसे
ٱلنَّارُ ۗ
आग
قُلْ
कह दीजिए
قَدْ
तहक़ीक़
جَآءَكُمْ
आए थे तुम्हारे पास
رُسُلٌۭ
कई रसूल
مِّن
from
قَبْلِى
मुझसे पहले
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ
साथ वाज़ेह दलाइल के
وَبِٱلَّذِى
और साथ उस चीज़ के जो
قُلْتُمْ
कही तुमने
فَلِمَ
तो क्यों
قَتَلْتُمُوهُمْ
क़त्ल किया तुमने उन्हें
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
ये वही लोग है जिनका कहना है कि "अल्लाह ने हमें ताकीद की है कि हम किसी रसूल पर ईमान न लाएँ, जबतक कि वह हमारे सामने ऐसी क़ुरबानी न पेश करे जिसे आग खा जाए।" कहो, "तुम्हारे पास मुझसे पहले कितने ही रसूल खुली निशानियाँ लेकर आ चुके है, और वे वह चीज़ भी लाए थे जिसके लिए तुम कह रहे हो। फिर यदि तुम सच्चे हो तो तुमने उन्हें क़त्ल क्यों किया?"
तफ़्सीर:
ये वही लोग हैं जिन्होंने - झूठ बोलते और आरोप लगाते हुए - कहा : "अल्लाह ने हमें अपनी पुस्तकों में तथा अपने नबियों की ज़ुबानी वसीयत की है कि हम किसी रसूल पर उस समय तक ईमान न लाएँ, जब तक वह अपनी सच्चाई साबित करने के लिए कोई चमत्कार न लाए। और इसका तरीक़ा यह है कि अल्लाह की निकटता प्राप्त करने के लिए वह दान करे, जिसे आकाश से उतरने वाली आग जला दे।" दरअसल, उन लोगों ने अल्लाह की ओर वसीयत की निसबत करने और रसूलों की सच्चाई के प्रमाणों को उपर्युक्त चीज़ में सीमित करने के बारे में अल्लाह पर झूठ गढ़ा है। इसीलिए अल्लाह ने अपने नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को आदेश दिया कि आप उनसे कहें : मुझसे पहले कई रसूल तुम्हारे पास अपनी सच्चाई के स्पष्ट प्रमाण लेकर आए, और वह क़ुर्बानी भी लाए जो तुमने कहा था जिसे आकाश से उतरने वाली आग ने जलाना था, तो फिर तुमने उन्हें क्यों झुठलाया और उनकी हत्या क्यों की, यदि तुम अपनी बात में सच्चे हो?
आयत 184
فَإِن كَذَّبُوكَ فَقَدْ كُذِّبَ رُسُلٌۭ مِّن قَبْلِكَ جَآءُو بِٱلْبَيِّنَـٰتِ وَٱلزُّبُرِ وَٱلْكِتَـٰبِ ٱلْمُنِيرِ
فَإِن
फिर अगर
كَذَّبُوكَ
वो झुठलाऐं आपको
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
كُذِّبَ
झुठलाए गए
رُسُلٌۭ
कई रसूल
مِّن
from
قَبْلِكَ
आपसे पहले
جَآءُو
वो लाए
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ
वाज़ेह दलाइल
وَٱلزُّبُرِ
और सहीफ़े
وَٱلْكِتَـٰبِ
और किताबे
ٱلْمُنِيرِ
रोशन
फिर यदि वे तुम्हें झुठलाते ही रहें, तो तुमसे पहले भी कितने ही रसूल झुठलाए जा चुके है, जो खुली निशानियाँ, 'ज़बूरें' और प्रकाशमान किताब लेकर आए थे
तफ़्सीर:
(ऐ नबी) यदि उन्होंने आपको झुठलाया है, तो इससे आप दु:खी न हों। क्योंकि यह तो काफिरों की आदत है। चुनाँचे आपसे पूर्व भी बहुत सारे रसूल झुठलाए गए हैं, जो स्पष्ट प्रमाणों, नसीहतों और दिलों को विनम्र करने वाली बातों पर आधारित पुस्तकों, तथा प्रावधानों एवं नियमों पर आधारित मार्गदर्शक किताब लेकर आए।
आयत 185
كُلُّ نَفْسٍۢ ذَآئِقَةُ ٱلْمَوْتِ ۗ وَإِنَّمَا تُوَفَّوْنَ أُجُورَكُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۖ فَمَن زُحْزِحَ عَنِ ٱلنَّارِ وَأُدْخِلَ ٱلْجَنَّةَ فَقَدْ فَازَ ۗ وَمَا ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَآ إِلَّا مَتَـٰعُ ٱلْغُرُورِ
كُلُّ
हर
نَفْسٍۢ
नफ़्स
ذَآئِقَةُ
चखने वाला है
ٱلْمَوْتِ ۗ
मौत को
وَإِنَّمَا
और बेशक
تُوَفَّوْنَ
तुम पूरे-पूरे दिए जाओगे
أُجُورَكُمْ
अजर अपने
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ ۖ
क़यामत के
فَمَن
तो जो कोई
زُحْزِحَ
दूर किया गया
عَنِ
from
ٱلنَّارِ
आग से
وَأُدْخِلَ
और वो दाख़िल कर दिया गया
ٱلْجَنَّةَ
जन्नत में
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
فَازَ ۗ
वो कामयाब हुआ
وَمَا
और नहीं
ٱلْحَيَوٰةُ
ज़िन्दगी
ٱلدُّنْيَآ
दुनिया की
إِلَّا
मगर
مَتَـٰعُ
सामान
ٱلْغُرُورِ
धोखे का
प्रत्येक जीव मृत्यु का मज़ा चखनेवाला है, और तुम्हें तो क़ियामत के दिन पूरा-पूरा बदला दे दिया जाएगा। अतः जिसे आग (जहन्नम) से हटाकर जन्नत में दाख़िल कर दिया गया, वह सफल रहा। रहा सांसारिक जीवन, तो वह माया-सामग्री के सिवा कुछ भी नहीं
तफ़्सीर:
प्रत्येक प्राणी को, चाहे वह कोई भी हो, मौत का स्वाद ज़रूर चखना है। अतः कोई मखलूक़ इस दुनिया से धोखा न खाए। और क़यामत के दिन तुम्हें अपने कर्मों का पूरा-पूरा बदला बिना कमी के दिया जाएगा। फिर जिसे अल्लाह आग से दूर रखे और जन्नत में प्रवेश दे दे, तो वास्तव में उसे वह भलाई मिल गई जिसकी उसे आशा थी, और वह उस बुराई से मुक्ति पा गया जिसका उसे डर था। और इस दुनिया का जीवन तो केवल एक क्षणभंगुर सामग्री है, और उससे कोई धोखा खाया हुआ व्यक्ति ही चिमट सकता है।
आयत 186
۞ لَتُبْلَوُنَّ فِىٓ أَمْوَٰلِكُمْ وَأَنفُسِكُمْ وَلَتَسْمَعُنَّ مِنَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ مِن قَبْلِكُمْ وَمِنَ ٱلَّذِينَ أَشْرَكُوٓا۟ أَذًۭى كَثِيرًۭا ۚ وَإِن تَصْبِرُوا۟ وَتَتَّقُوا۟ فَإِنَّ ذَٰلِكَ مِنْ عَزْمِ ٱلْأُمُورِ
۞ لَتُبْلَوُنَّ
अलबत्ता तुम ज़रूर आज़माए जाओगे
فِىٓ
in
أَمْوَٰلِكُمْ
अपने मालों में
وَأَنفُسِكُمْ
और अपने नफ़्सों में
وَلَتَسْمَعُنَّ
और अलबत्ता तुम ज़रूर सुनोगे
مِنَ
from
ٱلَّذِينَ
उनसे जो
أُوتُوا۟
दिए गए
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
مِن
from
قَبْلِكُمْ
तुमसे पहले
وَمِنَ
and from
ٱلَّذِينَ
और उनसे जिन्होंने
أَشْرَكُوٓا۟
शिर्क किया
أَذًۭى
अज़ियत
كَثِيرًۭا ۚ
बहुत सी
وَإِن
और अगर
تَصْبِرُوا۟
तुम सब्र करो
وَتَتَّقُوا۟
और तुम तक़वा करो
فَإِنَّ
तो बेशक
ذَٰلِكَ
ये
مِنْ
(is) of
عَزْمِ
the matters
ٱلْأُمُورِ
हिम्मत/अज़्म के कामों में से है
तुम्हारें माल और तुम्हारे प्राण में तुम्हारी परीक्षा होकर रहेगी और तुम्हें उन लोगों से जिन्हें तुमसे पहले किताब प्रदान की गई थी और उन लोगों से जिन्होंने 'शिर्क' किया, बहुत-सी कष्टप्रद बातें सुननी पड़ेगी। परन्तु यदि तुम जमें रहे और (अल्लाह का) डर रखा, तो यह उन कर्मों में से है जो आवश्यक ठहरा दिया गया है
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो) तुम्हारा अपने धनों के बारे में, उनमें अनिवार्य अधिकारों की अदायगी तथा उनपर उतरने वाली आपदाओं के द्वारा परीक्षण किया जाएगा। इसी तरह तुम्हारा अपने प्राणों के बारे में, शरीयत के आदेशों के पालन एवं विभिन्न प्रकार की विपत्तियों के द्वारा, ज़रूर परीक्षण किया जाएगा। साथ ही तुम्हें उन लोगों की तरफ़ से जो तुमसे पहले किताब दिए गए तथा उन लोगों की तरफ़ से जिन्होंने शिर्क किया तुम्हारे बारे में तथा तुम्हारे धर्म के संबंध में बहुत-सी दु:खदायी बातें सुनने को मिलेंगी। यदि तुम इन पहुँचने वाली विपत्तियों और परीक्षणों पर धैर्य से काम लो और अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई चीज़ों से बचकर, डरते रहो, तो यह ऐसे कामों में से है, जिसके लिए दृढ़ संकल्प की ज़रूरत होती है, और प्रतिस्पर्धा करने वाले इसमें परस्पर प्रतिस्पर्धा करते हैं।
आयत 187
وَإِذْ أَخَذَ ٱللَّهُ مِيثَـٰقَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ لَتُبَيِّنُنَّهُۥ لِلنَّاسِ وَلَا تَكْتُمُونَهُۥ فَنَبَذُوهُ وَرَآءَ ظُهُورِهِمْ وَٱشْتَرَوْا۟ بِهِۦ ثَمَنًۭا قَلِيلًۭا ۖ فَبِئْسَ مَا يَشْتَرُونَ
وَإِذْ
और जब
أَخَذَ
लिया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِيثَـٰقَ
पुख़्ता अहद
ٱلَّذِينَ
उनसे जो
أُوتُوا۟
दिए गए
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
لَتُبَيِّنُنَّهُۥ
अलबत्ता तुम ज़रूर बयान करोगे उसे
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
وَلَا
और ना
تَكْتُمُونَهُۥ
तुम छुपाओगे उसे
فَنَبَذُوهُ
फिर उन्होंने फेंक दिया उसे
وَرَآءَ
पीछे
ظُهُورِهِمْ
अपनी पुश्तों के
وَٱشْتَرَوْا۟
और उन्होंने बेच डाला
بِهِۦ
उसे
ثَمَنًۭا
क़ीमत
قَلِيلًۭا ۖ
थोड़ी में
فَبِئْسَ
तो कितना बुरा है
مَا
जो
يَشْتَرُونَ
वो ख़रीदो फ़रोख़्त करते हैं
याद करो जब अल्लाह ने उन लोगों से, जिन्हें किताब प्रदान की गई थी, वचन लिया था कि "उसे लोगों के सामने भली-भाँति स्पट् करोगे, उसे छिपाओगे नहीं।" किन्तु उन्होंने उसे पीठ पीछे डाल दिया और तुच्छ मूल्य पर उसका सौदा किया। कितना बुरा सौदा है जो ये कर रहे है
तफ़्सीर:
और (ऐ नबी!) आप उस समय को याद कीजिए जब अल्लाह ने यहूदियों और ईसाइयों के विद्वानों से पक्का वचन लिया था कि तुम अल्लाह की पुस्तक को लोगों के समक्ष बयान करते रहोगे और उसमें जो मार्गदर्शन, तथा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नुबुव्वत (ईश्दूतत्व) की निशानियाँ हैं, उन्हें नहीं छिपाओगे। परंतु उन्होंने इस वचन को पीछे डाल दिया और उस पर ध्यान नहीं दिया। चुनाँचे उन्होंने सत्य को छिपाया और असत्य को प्रकट किया। और उन्होंने अल्लाह के वचन के बदले थोड़ा सा मूल्य ले लिया, जैसे प्रतिष्ठा और धन जो उन्हें प्राप्त हो सकता था। तो यह कितना ही बुरा मूल्य है, जो वे अल्लाह के वचन के बदले में ले रहे हैं।
आयत 188
لَا تَحْسَبَنَّ ٱلَّذِينَ يَفْرَحُونَ بِمَآ أَتَوا۟ وَّيُحِبُّونَ أَن يُحْمَدُوا۟ بِمَا لَمْ يَفْعَلُوا۟ فَلَا تَحْسَبَنَّهُم بِمَفَازَةٍۢ مِّنَ ٱلْعَذَابِ ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
لَا
(Do) not
تَحْسَبَنَّ
ना आप हरगिज़ समझें
ٱلَّذِينَ
उन्हें जो
يَفْرَحُونَ
ख़ुश हो रहे हैं
بِمَآ
उस पर जो
أَتَوا۟
उन्होंने किया
وَّيُحِبُّونَ
और वो पसंद करते हैं
أَن
कि
يُحْمَدُوا۟
वो तारीफ़ किए जाऐं
بِمَا
उस पर जो
لَمْ
नहीं
يَفْعَلُوا۟
उन्होंने किया
فَلَا
तो ना
تَحْسَبَنَّهُم
आप हरगिज़ समझें उन्हें
بِمَفَازَةٍۢ
निजात (पाने वाला)
مِّنَ
from
ٱلْعَذَابِ ۖ
अज़ाब से
وَلَهُمْ
और उनके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
तुम उन्हें कदापि यह न समझना, जो अपने किए पर ख़ुश हो रहे है और जो काम उन्होंने नहीं किए, चाहते है कि उनपर भी उनकी प्रशंसा की जाए - तो तुम उन्हें यह न समझाना कि वे यातना से बच जाएँगे, उनके लिए तो दुखद यातना है
तफ़्सीर:
(ऐ नबी) आप बिलकुल यह न समझें कि जो लोग बुराई करके प्रसन्न होते हैं तथा चाहते हैं कि जो अच्छे कार्य उन्होंने नहीं किए हैं, उनपर (भी) लोग उनकी प्रशंसा करें, आप कभी उन्हें यातना से सुरक्षित और मुक्त न समझें। बल्कि उनका ठिकाना जहन्नम है और उसमें उनके लिए दर्दनाक यातना है।
आयत 189
وَلِلَّهِ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۗ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌ
وَلِلَّهِ
और अल्लाह ही के लिए है
مُلْكُ
बादशाहत है
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ ۗ
और ज़मीन की
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌ
बहुत क़ादिर है
आकाशों और धरती का राज्य अल्लाह ही का है, और अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
आकाशों एवं धरती तथा जो कुछ उनमें उपस्थित है, सबका राज्याधिकार, रचना एवं प्रबंधन की दृष्टि से, केवल अल्लाह का है, और अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है।
आयत 190
إِنَّ فِى خَلْقِ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَٱخْتِلَـٰفِ ٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّأُو۟لِى ٱلْأَلْبَـٰبِ
إِنَّ
बेशक
فِى
in
خَلْقِ
तख़्लीक़ में
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन की
وَٱخْتِلَـٰفِ
और इख़्तिलाफ़ में
ٱلَّيْلِ
रात
وَٱلنَّهَارِ
और दिन के
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
لِّأُو۟لِى
for men
ٱلْأَلْبَـٰبِ
अक़्ल वालों के लिए
निस्सदेह आकाशों और धरती की रचना में और रात और दिन के आगे पीछे बारी-बारी आने में उन बुद्धिमानों के लिए निशानियाँ है
तफ़्सीर:
निःसंदेह आकाशों तथा धरती को बिना किसी पूर्व नमूने के अनस्तित्व से अस्तित्व में लाने में तथा रात और दिन के एक दूसरे के पीछे आने-जाने और उन दोनों के लंबे और छोटे होने के एतिबार से एक दूसरे से भिन्न होने में; शुद्ध बुद्धि वालों के लिए स्पष्ट निशानियाँ हैं, जो उन्हें ब्रह्मांड के निर्माता का संकेत देती हैं, जो अकेले इबादत का अधिकार रखता है।
आयत 191
ٱلَّذِينَ يَذْكُرُونَ ٱللَّهَ قِيَـٰمًۭا وَقُعُودًۭا وَعَلَىٰ جُنُوبِهِمْ وَيَتَفَكَّرُونَ فِى خَلْقِ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ رَبَّنَا مَا خَلَقْتَ هَـٰذَا بَـٰطِلًۭا سُبْحَـٰنَكَ فَقِنَا عَذَابَ ٱلنَّارِ
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَذْكُرُونَ
याद करते हैं
ٱللَّهَ
अल्लाह को
قِيَـٰمًۭا
खड़े
وَقُعُودًۭا
और बैठे
وَعَلَىٰ
and on
جُنُوبِهِمْ
और अपने पहलुओं पर
وَيَتَفَكَّرُونَ
और वो ग़ौरो फ़िक्र करते हैं
فِى
on
خَلْقِ
तख़्लीक़ में
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन की
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
مَا
नहीं
خَلَقْتَ
पैदा किया तूने
هَـٰذَا
ये (सब)
بَـٰطِلًۭا
बेमक़सद
سُبْحَـٰنَكَ
पाक है तू
فَقِنَا
पस बचा हमें
عَذَابَ
अज़ाब से
ٱلنَّارِ
आग के
जो खड़े, बैठे और अपने पहलुओं पर लेटे अल्लाह को याद करते है और आकाशों और धरती की रचना में सोच-विचार करते है। (वे पुकार उठते है,) "हमारे रब! तूने यह सब व्यर्थ नहीं बनाया है। महान है तू, अतः हमें आग की यातना से बचा ले
तफ़्सीर:
ये वही लोग हैं जो खड़े, बैठे और लेटे, हर स्थिति में अल्लाह को याद करते हैं तथा आकाश और धरती की रचना में चिंतन करते हैं और कहते हैं : ऐ हमारे पालनहार! तूने इतनी बड़ी सृष्टि को व्यर्थ नहीं बनाया है। तू बिना उद्देश्य कार्य करने से पवित्र है। अतः तू हमें नेकियों की तौफ़ीक़ देकर और बुराइयों से सुरक्षितकर आग के अज़ाब से बचा ले।
आयत 192
رَبَّنَآ إِنَّكَ مَن تُدْخِلِ ٱلنَّارَ فَقَدْ أَخْزَيْتَهُۥ ۖ وَمَا لِلظَّـٰلِمِينَ مِنْ أَنصَارٍۢ
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
إِنَّكَ
बेशक तू
مَن
जिसे
تُدْخِلِ
तू दाख़िल करेगा
ٱلنَّارَ
आग में
فَقَدْ
पस तहक़ीक़
أَخْزَيْتَهُۥ ۖ
रुस्वा कर दिया तूने उसे
وَمَا
और नहीं
لِلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों के लिए
مِنْ
(are) any
أَنصَارٍۢ
कोई मददगार
"हमारे रब, तूने जिसे आग में डाला, उसे रुसवा कर दिया। और ऐसे ज़ालिमों का कोई सहायक न होगा
तफ़्सीर:
(ऐ हमारे पालनहार) तूने अपनी सृष्टि में से जिसे जहन्नम में डाल दिया, तो वास्तव में उसे तूने अपमानित किया। और क़यामत के दिन अत्याचारियों का कोई सहायक न होगा, जो उनसे अल्लाह के अज़ाब और उसकी सज़ा को टाल सके।
आयत 193
رَّبَّنَآ إِنَّنَا سَمِعْنَا مُنَادِيًۭا يُنَادِى لِلْإِيمَـٰنِ أَنْ ءَامِنُوا۟ بِرَبِّكُمْ فَـَٔامَنَّا ۚ رَبَّنَا فَٱغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَكَفِّرْ عَنَّا سَيِّـَٔاتِنَا وَتَوَفَّنَا مَعَ ٱلْأَبْرَارِ
رَّبَّنَآ
ऐ हमारे रब
إِنَّنَا
बेशक हम
سَمِعْنَا
सुना हमने
مُنَادِيًۭا
एक पुकारने वाले को
يُنَادِى
वो पुकार रहा था
لِلْإِيمَـٰنِ
ईमान के लिए
أَنْ
कि
ءَامِنُوا۟
ईमान ले आओ
بِرَبِّكُمْ
अपने रब पर
فَـَٔامَنَّا ۚ
तो ईमान ले आए हम
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
فَٱغْفِرْ
so forgive
لَنَا
पस बख़्श दे हमारे लिए
ذُنُوبَنَا
हमारे गुनाहों को
وَكَفِّرْ
और दूर कर दे
عَنَّا
हमसे
سَيِّـَٔاتِنَا
हमारी बुराइयों को
وَتَوَفَّنَا
और फ़ौत कर हमें
مَعَ
साथ
ٱلْأَبْرَارِ
नेक लोगों के
"हमारे रब! हमने एक पुकारनेवाले को ईमान की ओर बुलाते सुना कि अपने रब पर ईमान लाओ। तो हम ईमान ले आए। हमारे रब! तो अब तू हमारे गुनाहों को क्षमा कर दे और हमारी बुराइयों को हमसे दूर कर दे और हमें नेक और वफ़़ादार लोगों के साथ (दुनिया से) उठा
तफ़्सीर:
ऐ हमारे पालनहार! हमने एक ईमान की ओर बुलाने वाले को सुना – और वह तेरे पैग़ंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं - जो यह कहकर बुला रहे थे : (लोगो,) तुम अपने पालनहार अल्लाह पर ईमान लाओ, जो कि एकमात्र पूज्य है। तो हम उसपर ईमान ले आए जिसकी ओर वह बुला रहे थे और उनकी शरीयत का पालन किया। अतः तू हमारे पापों को छिपाए रख और हमें बेनकाब न कर, तथा हमारी बुराइयों को क्षमा कर दे और उनपर हमारी पकड़ न कर, और हमें अच्छे कार्यों के करने और बुराइयों को छोड़ने की तौफीक़ देकर हमें सदाचारी लोगों के साथ मृत्यु दे।
आयत 194
رَبَّنَا وَءَاتِنَا مَا وَعَدتَّنَا عَلَىٰ رُسُلِكَ وَلَا تُخْزِنَا يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ إِنَّكَ لَا تُخْلِفُ ٱلْمِيعَادَ
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
وَءَاتِنَا
और दे हमें
مَا
जो
وَعَدتَّنَا
वादा किया तूने हमसे
عَلَىٰ
through
رُسُلِكَ
अपने रसूलों के (ज़रिए)
وَلَا
और ना
تُخْزِنَا
तू रुस्वा कर हमें
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ
क़यामत के
إِنَّكَ
बेशक तू
لَا
(do) not
تُخْلِفُ
नहीं तू ख़िलाफ़ करेगा
ٱلْمِيعَادَ
वादे के
"हमारे रब! जिस चीज़ का वादा तूने अपने रसूलों के द्वारा किया वह हमें प्रदान कर और क़ियामत के दिन हमें रुसवा न करना। निस्संदेह तू अपने वादे के विरुद्ध जानेवाला नहीं है।"
तफ़्सीर:
ऐ हमारे पालनहार! तूने अपने रसूलों की ज़बानी इस दुनिया में जिस मार्गदर्शन और मदद व विजय का हम से वादा किया था, वह हमें प्रदान कर और क़यामत के दिन जहन्नम में डालकर हमें अपमानित न कर। ऐ हमारे पालनहार! वास्तव में तू बड़ा उदार है, अपना वचन नहीं तोड़ता।
आयत 195
فَٱسْتَجَابَ لَهُمْ رَبُّهُمْ أَنِّى لَآ أُضِيعُ عَمَلَ عَـٰمِلٍۢ مِّنكُم مِّن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَىٰ ۖ بَعْضُكُم مِّنۢ بَعْضٍۢ ۖ فَٱلَّذِينَ هَاجَرُوا۟ وَأُخْرِجُوا۟ مِن دِيَـٰرِهِمْ وَأُوذُوا۟ فِى سَبِيلِى وَقَـٰتَلُوا۟ وَقُتِلُوا۟ لَأُكَفِّرَنَّ عَنْهُمْ سَيِّـَٔاتِهِمْ وَلَأُدْخِلَنَّهُمْ جَنَّـٰتٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ ثَوَابًۭا مِّنْ عِندِ ٱللَّهِ ۗ وَٱللَّهُ عِندَهُۥ حُسْنُ ٱلثَّوَابِ
فَٱسْتَجَابَ
तो (दुआ) क़ुबूल कर ली
لَهُمْ
उनके लिए
رَبُّهُمْ
उनके रब ने
أَنِّى
कि बेशक मैं
لَآ
(will) not
أُضِيعُ
नहीं मैं ज़ाया करुँगा
عَمَلَ
अमल
عَـٰمِلٍۢ
किसी अमल करने वाले का
مِّنكُم
तुम में से
مِّن
[from]
ذَكَرٍ
ख़्वाह मर्द हो
أَوْ
या
أُنثَىٰ ۖ
औरत
بَعْضُكُم
बाज़ तुम्हारे
مِّنۢ
from
بَعْضٍۢ ۖ
बाज़ से हैं
فَٱلَّذِينَ
तो वो जिन्होंने
هَاجَرُوا۟
हिजरत की
وَأُخْرِجُوا۟
और वो निकाले गए
مِن
from
دِيَـٰرِهِمْ
अपने घरों से
وَأُوذُوا۟
और वो अज़ियत दिए गए
فِى
in
سَبِيلِى
मेरे रास्ते में
وَقَـٰتَلُوا۟
और उन्होंने जंग की
وَقُتِلُوا۟
और वो मारे गए
لَأُكَفِّرَنَّ
अलबत्ता मैं ज़रूर दूर कर दूँगा
عَنْهُمْ
उनसे
سَيِّـَٔاتِهِمْ
बुराइयाँ उनकी
وَلَأُدْخِلَنَّهُمْ
और अलबत्ता मैं ज़रूर दाख़िल करुँगा उन्हें
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात में
تَجْرِى
बहती हैं
مِن
from
تَحْتِهَا
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
ثَوَابًۭا
सवाब/बदला है
مِّنْ
from
عِندِ
[near]
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह के पास से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عِندَهُۥ
उसके पास
حُسْنُ
अच्छा
ٱلثَّوَابِ
सवाब/बदला है
तो उनके रब ने उनकी पुकार सुन ली कि "मैं तुममें से किसी कर्म करनेवाले के कर्म को अकारथ नहीं करूँगा, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री। तुम सब आपस में एक-दूसरे से हो। अतः जिन लोगों ने (अल्लाह के मार्ग में) घरबार छोड़ा और अपने घरों से निकाले गए और मेरे मार्ग में सताए गए, और लड़े और मारे गए, मैं उनसे उनकी बुराइयाँ दूर कर दूँगा और उन्हें ऐसे बाग़ों में प्रवेश कराऊँगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी।" यह अल्लाह के पास से उनका बदला होगा और सबसे अच्छा बदला अल्लाह ही के पास है
तफ़्सीर:
उनके पालनहार ने उनकी प्रार्थना का उत्तर दिया : मैं तुम्हारे कर्मों का बदला बर्बाद नहीं करता, चाहे वह कम हो या ज़्यादा और कार्य करने वाला पुरुष हो या महिला। क्योंकि इस धर्म में तुम सब लोगों का हुक्म एक है। न तो किसी पुरुष की नेकी में वृद्धि की जाएगी और न तो किसी महिला की नेकी में कमी की जाएगी। अतः जिन लोगों ने अल्लाह के रास्ते में हिजरत की, और काफ़िरों ने उन्हें उनके घरों से निकाल दिया, और उन्हें अपने पालनहार के आज्ञापालन के कारण कष्ट दिया गया, और उन्होंने अल्लाह के रास्ते में लड़ाई की और अल्लाह के शब्द (वचन) को सर्वोच्च करने के लिए शहीद कर दिए गए, तो मैं क़यामत के दिन अवश्य उनकी बुराइयों को क्षमा कर दूँगा और उन्हें नज़रंदाज़ कर दूँगा, और उन्हें अवश्य ऐसी जन्नतों में दाख़िल करूँगा, जिनके महलों के नीचे से नहरें बहती हैं। यह अल्लाह की ओर से बदला होगा। और अल्लाह के पास ऐसा उत्तम बदला है जिसका कोई उदाहरण नहीं।
आयत 196
لَا يَغُرَّنَّكَ تَقَلُّبُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ فِى ٱلْبِلَـٰدِ
لَا
(Let) not
يَغُرَّنَّكَ
हरगिज़ ना धोखे में डाले आपको
تَقَلُّبُ
चलना फिरना
ٱلَّذِينَ
उनका जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
فِى
in
ٱلْبِلَـٰدِ
शहरों में
बस्तियों में इनकार करनेवालों की चलत-फिरत तुम्हें किसी धोखे में न डाले
तफ़्सीर:
(ऐ नबी) शहर में काफिरों का चलना-फिरना और उसमें उनका आधिपत्य, तथा उनके व्यापार और आजीविका का विस्तार आपको धोखे में न डाल दे कि उनकी स्थिति को देखकर आप शोक और चिंता से ग्रस्त हो जाएँ।
आयत 197
مَتَـٰعٌۭ قَلِيلٌۭ ثُمَّ مَأْوَىٰهُمْ جَهَنَّمُ ۚ وَبِئْسَ ٱلْمِهَادُ
مَتَـٰعٌۭ
फ़ायदा उठाना है
قَلِيلٌۭ
थोड़ा सा
ثُمَّ
फिर
مَأْوَىٰهُمْ
ठिकाना उनका
جَهَنَّمُ ۚ
जहन्नम है
وَبِئْسَ
और कितना बुरा है
ٱلْمِهَادُ
ठिकाना
यह तो थोड़ी सुख-सामग्री है फिर तो उनका ठिकाना जहन्नम है, और वह बहुत ही बुरा ठिकाना है
तफ़्सीर:
यह दुनिया दरअसल थोड़ी सी सुख-सामग्री है, जिसे स्थायित्व प्राप्त नहीं है। फिर उसके बाद उनका ठिकाना जहाँ वे क़यामत के दिन लौटकर जाएँगे : जहन्नम है। और आग उनके लिए बहुत बुरा ठिकाना है।
आयत 198
لَـٰكِنِ ٱلَّذِينَ ٱتَّقَوْا۟ رَبَّهُمْ لَهُمْ جَنَّـٰتٌۭ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَا نُزُلًۭا مِّنْ عِندِ ٱللَّهِ ۗ وَمَا عِندَ ٱللَّهِ خَيْرٌۭ لِّلْأَبْرَارِ
لَـٰكِنِ
लेकिन
ٱلَّذِينَ
वो जो
ٱتَّقَوْا۟
डरे
رَبَّهُمْ
अपने रब से
لَهُمْ
उनके लिए
جَنَّـٰتٌۭ
बाग़ात हैं
تَجْرِى
बहती हैं
مِن
from
تَحْتِهَا
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَا
उनमें
نُزُلًۭا
मेहमानी है
مِّنْ
from
عِندِ
[near]
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह के पास से
وَمَا
और जो
عِندَ
(is) with
ٱللَّهِ
पास है अल्लाह के
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لِّلْأَبْرَارِ
नेकोकारों के लिए
किन्तु जो लोग अपने रब से डरते रहे उनके लिए ऐसे बाग़ होंगे जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। वे उसमें सदैव रहेंगे। यह अल्लाह की ओर से पहला आतिथ्य-सत्कार होगा और जो कुछ अल्लाह के पास है वह नेक और वफ़ादार लोगों के लिए सबसे अच्छा है
तफ़्सीर:
परन्तु जो लोग अल्लाह के आदेशों का पालन करके तथा उसके निषेधों से बचकर उससे डरते रहे, उनके लिए ऐसी जन्नतें हैं, जिनके महलों के नीचे से नहरें बह रही हैं, जिनमें वे सदैव रहेंगे। यह अल्लाह के पास से तैयार किया हुआ बदला है। और अल्लाह ने अपने सदाचारी बंदों के लिए जो कुछ तैयार कर रखा है, वह दुनिया की उन सुख-सामग्रियों से उत्तम और श्रेष्ठ है, जिनका काफ़िर लोग आनंद ले रहे हैं।
आयत 199
وَإِنَّ مِنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ لَمَن يُؤْمِنُ بِٱللَّهِ وَمَآ أُنزِلَ إِلَيْكُمْ وَمَآ أُنزِلَ إِلَيْهِمْ خَـٰشِعِينَ لِلَّهِ لَا يَشْتَرُونَ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ ثَمَنًۭا قَلِيلًا ۗ أُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ سَرِيعُ ٱلْحِسَابِ
وَإِنَّ
और बेशक
مِنْ
among
أَهْلِ
(the) People
ٱلْكِتَـٰبِ
अहले किताब में से
لَمَن
अलबत्ता जो
يُؤْمِنُ
ईमान रखते हैं
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَمَآ
और जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
إِلَيْكُمْ
तरफ़ आपके
وَمَآ
और जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
خَـٰشِعِينَ
ख़ुशू करने वाले हैं
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
لَا
Not
يَشْتَرُونَ
नहीं वो बेचते
بِـَٔايَـٰتِ
आयात को
ٱللَّهِ
अल्लाह की
ثَمَنًۭا
क़ीमत
قَلِيلًا ۗ
थोड़ी में
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
لَهُمْ
उनके लिए है
أَجْرُهُمْ
अजर उनका
عِندَ
(is) with
رَبِّهِمْ ۗ
पास उनके रब के
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
سَرِيعُ
जल्द लेने वाला है
ٱلْحِسَابِ
हिसाब
और किताबवालों में से कुछ ऐसे भी है, जो इस हाल में कि उनके दिल अल्लाह के आगे झुके हुए होते है, अल्लाह पर ईमान रखते है और उस चीज़ पर भी जो तुम्हारी ओर उतारी गई है, और उस चीज़ पर भी जो स्वयं उनकी ओर उतरी। वे अल्लाह की आयतों का 'तुच्छ मूल्य पर सौदा' नहीं करते, उनके लिए उनके रब के पास उनका प्रतिदान है। अल्लाह हिसाब भी जल्द ही कर देगा
तफ़्सीर:
सभी अह्ले किताब एक समान नहीं हैं। उनमें से एक गिरोह ऐसा भी है, जो अल्लाह पर और तुम्हारी ओर उतारी गई हिदायत एवं सत्य पर ईमान रखते हैं, तथा उस पर भी ईमान रखते हैं जो कुछ उनकी पुस्तकों में उतारा गया है। वे अल्लाह के रसूलों के बीच कोई अंतर नहीं करते हैं। वे अल्लाह के आगे, उसके पास जो कुछ (प्रतिफल) है उसकी इच्छा में, समर्पित और विनम्र रहते हैं। वे अल्लाह की आयतों के बदले इस दुनिया की सामग्री का थोड़ा-सा मूल्य नहीं लेते हैं। इन गुणों से विशिष्ट इन लोगों के लिए उनके पालनहार के पास बहुत बड़ा बदला है। निःसंदेह अल्लाह कर्मों का शीघ्र हिसाब लेने वाला और उनपर शीघ्र बदला देने वाला है।
आयत 200
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱصْبِرُوا۟ وَصَابِرُوا۟ وَرَابِطُوا۟ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
ٱصْبِرُوا۟
सब्र करो
وَصَابِرُوا۟
और मुक़ाबले में मज़बूत रहो
وَرَابِطُوا۟
और तैयार रहो
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تُفْلِحُونَ
तुम फ़लाह पा जाओ
ऐ ईमान लानेवालो! धैर्य से काम लो और (मुक़ाबले में) बढ़-चढ़कर धैर्य दिखाओ और जुटे और डटे रहो और अल्लाह से डरते रहो, ताकि तुम सफल हो सको
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! तुम शरीयत के आदेशों की पाबंदी करने पर तथा अपने ऊपर आनेवाली दुनिया की आपदाओं पर धैर्य से काम लो, तथा धैर्य के मामले में काफिरों से आगे रहो, चुनाँचे वे तुमसे अधिक धैर्य रखने वाले न होने पाएँ, और अल्लाह के रास्ते में जिहाद पर डटे रहो, और अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर उससे डरते रहो, ताकि तुम्हें आग से मुक्ति और जन्नत में प्रवेश के द्वारा अपना उद्देश्य प्राप्त हो जाए।
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