नाम का मतलब
रोमी लोग (रोमन सल्तनत की शिकस्त और बाद में फतह की पेशिनगोई से)
पृष्ठभूमि
सूरह अर-रूम में एक अहम पेशिनगोई है कि रोमी (ईसाई) सल्तनत, फारस से हारने के कुछ साल बाद दोबारा ग़ालिब आएगी, जो बाद में हूबहू सच साबित हुई। यह सूरह अल्लाह की कुदरत की निशानियों पर भी गुफ्तगू करती है।
फ़ज़ीलत / सार
इस सूरह की पेशिनगोई कुरआन की सच्चाई के सबसे बड़े ऐतबार वाले सुबूतों में से एक मानी जाती है, क्योंकि यह ऐन उसी तरह पूरी हुई जैसी बताई गई थी।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ الٓمٓ
الٓمٓ
ا ل م
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰
तफ़्सीर:
(अलिफ़, लाम, मीम) सूरतुल-बक़रा की शुरुआत में इस प्रकार के अक्षरों के बारे में बात गुज़र चुकी है।
आयत 2
غُلِبَتِ ٱلرُّومُ
غُلِبَتِ
मग़लूब हो गए
ٱلرُّومُ
रूमी
रूमी निकटवर्ती क्षेत्र में पराभूत हो गए हैं।
तफ़्सीर:
फारस वालों ने रूमियों को पराजित कर दिया।
आयत 3
فِىٓ أَدْنَى ٱلْأَرْضِ وَهُم مِّنۢ بَعْدِ غَلَبِهِمْ سَيَغْلِبُونَ
فِىٓ
In
أَدْنَى
(the) nearest
ٱلْأَرْضِ
क़रीब की ज़मीन में
وَهُم
और वो
مِّنۢ
after
بَعْدِ
बाद
غَلَبِهِمْ
अपने मग़लूब होने के
سَيَغْلِبُونَ
अनक़रीब वो ग़ालिब आ जाऐंगे
और वे अपने पराभव के पश्चात शीघ्र ही कुछ वर्षों में प्रभावी हो जाएँगे।
तफ़्सीर:
शाम (लेवांत) के उस क्षेत्र में जो फारस के लिए निकटतम है। और रूमी फारस वालों से हारने के बाद जल्द ही उनपर विजय प्राप्त कर लेंगे।
आयत 4
فِى بِضْعِ سِنِينَ ۗ لِلَّهِ ٱلْأَمْرُ مِن قَبْلُ وَمِنۢ بَعْدُ ۚ وَيَوْمَئِذٍۢ يَفْرَحُ ٱلْمُؤْمِنُونَ
فِى
Within
بِضْعِ
a few
سِنِينَ ۗ
चंद सालों में
لِلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
ٱلْأَمْرُ
हुक्म
مِن
before
قَبْلُ
इससे पहले
وَمِنۢ
and after
بَعْدُ ۚ
और इसके बाद
وَيَوْمَئِذٍۢ
और उस दिन
يَفْرَحُ
ख़ुश हो जाऐंगे
ٱلْمُؤْمِنُونَ
मोमिन
हुक्म तो अल्लाह ही का है पहले भी और उसके बाद भी। और उस दिन ईमानवाले अल्लाह की सहायता से प्रसन्न होंगे।
तफ़्सीर:
कुछ ही समय में, जो तीन साल से कम और दस साल से अधिक नहीं होगा। रूमियों के जीतने से पहले और उसके बाद, सारा मामला अल्लाह के अधिकार में है। और जिस दिन रूमी फारस पर विजयी होंगे, उस दिन ईमान वालों को खुशी होगी।
आयत 5
بِنَصْرِ ٱللَّهِ ۚ يَنصُرُ مَن يَشَآءُ ۖ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ
بِنَصْرِ
मदद से
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह की
يَنصُرُ
वो मदद करता है
مَن
जिसकी
يَشَآءُ ۖ
वो चाहता है
وَهُوَ
और वो
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त है
ٱلرَّحِيمُ
बहुत रहम करने वाला है
वह जिसकी चाहता है, सहायता करता है। वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, दयावान है
तफ़्सीर:
वे अल्लाह के रूमियों की सहायता करने पर खुश होंगे, क्योंकि वे पुस्तक वाले लोग हैं।अल्लाह जिसकी चाहता है जिसके विरुद्ध चाहता है, मदद करता है। वह प्रभुत्वशाली है, जिसे परास्त नहीं किया जा सकता, जो अपने ईमान वाले बंदों पर अत्यंत दयालु है।
आयत 6
وَعْدَ ٱللَّهِ ۖ لَا يُخْلِفُ ٱللَّهُ وَعْدَهُۥ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
وَعْدَ
वादा है
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह का
لَا
(Does) not
يُخْلِفُ
नहीं ख़िलाफ़ करता
ٱللَّهُ
अल्लाह
وَعْدَهُۥ
वादा अपना
وَلَـٰكِنَّ
लेकिन
أَكْثَرَ
अक्सर
ٱلنَّاسِ
लोग
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो जानते
यह अल्लाह का वादा है! अल्लाह अपने वादे का उल्लंघन नहीं करता। किन्तु अधिकतर लोग जानते नहीं
तफ़्सीर:
यह सहायता (जीत) सर्वशक्तिमान अल्लाह की ओर से एक वादा था। अल्लाह अपना वादा नहीं तोड़ता है, और इसके पूरा होने से ईमान वालों का अल्लाह की सहायता के वादे पर विश्वास बढ़ जाता है। लेकिन अधिकतर लोग अपने कुफ़्र (अविश्वास) के कारण इसे नहीं समझते हैं।
आयत 7
يَعْلَمُونَ ظَـٰهِرًۭا مِّنَ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا وَهُمْ عَنِ ٱلْـَٔاخِرَةِ هُمْ غَـٰفِلُونَ
يَعْلَمُونَ
वो जानते हैं
ظَـٰهِرًۭا
ज़ाहिर को
مِّنَ
of
ٱلْحَيَوٰةِ
the life
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की ज़िन्दगी के
وَهُمْ
और वो
عَنِ
about
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत से
هُمْ
वो
غَـٰفِلُونَ
ग़ाफ़िल हैं
वे सांसारिक जीवन के केवल वाह्य रूप को जानते है। किन्तु आख़िरत की ओर से वे बिलकुल असावधान है
तफ़्सीर:
वे ईमान और शरीयत के नियमों से अनभिज्ञ हैं। वे केवल सांसारिक जीवन के कुछ बाहरी स्वरूप को जानते हैं, जो जीविका कमाने और भौतिक सभ्यता के निर्माण से संबंधित है। जबकि वे आख़िरत से, जो वास्तविक जीवन का घर है, मुँह फेरे हुए हैं, उसपर कोई ध्यान नहीं देते हैं।
आयत 8
أَوَلَمْ يَتَفَكَّرُوا۟ فِىٓ أَنفُسِهِم ۗ مَّا خَلَقَ ٱللَّهُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَآ إِلَّا بِٱلْحَقِّ وَأَجَلٍۢ مُّسَمًّۭى ۗ وَإِنَّ كَثِيرًۭا مِّنَ ٱلنَّاسِ بِلِقَآئِ رَبِّهِمْ لَكَـٰفِرُونَ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَتَفَكَّرُوا۟
उन्होंने ग़ौरो फ़िक्र किया
فِىٓ
within
أَنفُسِهِم ۗ
अपने नफ़्सों में
مَّا
नहीं
خَلَقَ
पैदा किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
وَمَا
और जो कुछ
بَيْنَهُمَآ
दर्मियान है इन दोनों के
إِلَّا
मगर
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
وَأَجَلٍۢ
और वक़्त
مُّسَمًّۭى ۗ
मुक़र्रर के
وَإِنَّ
और बेशक
كَثِيرًۭا
बहुत से
مِّنَ
of
ٱلنَّاسِ
लोगों में से
بِلِقَآئِ
मुलाक़ात का
رَبِّهِمْ
अपने रब की
لَكَـٰفِرُونَ
अलबत्ता इन्कार करने वाले हैं
क्या उन्होंने अपने आप में सोच-विचार नहीं किया? अल्लाह ने आकाशों और धरती को और जो कुछ उनके बीच है सत्य के साथ और एक नियत अवधि ही के लिए पैदा किया है। किन्तु बहुत-से लोग अपने प्रभु के मिलन का इनकार करते है
तफ़्सीर:
क्या इन झुठलाने वाले मुश्रिकों ने अपने बारे में सोच-विचार नहीं किया कि अल्लाह ने उन्हें कैसे पैदा किया और ठीक-ठाक बनाया? अल्लाह ने आकाशों और धरती को और जो कुछ उनके बीच है सत्य के साथ ही पैदा किया है। उसने उन्हें व्यर्थ पैदा नहीं किया। तथा उनके लिए दुनिया में बने रहने के लिए एक निश्चित समय सीमा निर्धारित की। निश्चित रूप से बहुत-से लोग क़ियामत के दिन अपने रब से मिलने का इनकार करते हैं। इसलिए वे अपने पालनहार के निकट पसंदीदा नेक कार्य करके पुनर्जीवन के लिए तैयारी नहीं करते हैं।
आयत 9
أَوَلَمْ يَسِيرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ فَيَنظُرُوا۟ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ كَانُوٓا۟ أَشَدَّ مِنْهُمْ قُوَّةًۭ وَأَثَارُوا۟ ٱلْأَرْضَ وَعَمَرُوهَآ أَكْثَرَ مِمَّا عَمَرُوهَا وَجَآءَتْهُمْ رُسُلُهُم بِٱلْبَيِّنَـٰتِ ۖ فَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيَظْلِمَهُمْ وَلَـٰكِن كَانُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَسِيرُوا۟
वो चले फिरे
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
فَيَنظُرُوا۟
तो वो देखते
كَيْفَ
कैसा
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अंजाम
ٱلَّذِينَ
उनका जो
مِن
before them
قَبْلِهِمْ ۚ
उनसे पहले थे
كَانُوٓا۟
थे वो
أَشَدَّ
ज़्यादा शदीद
مِنْهُمْ
उनसे
قُوَّةًۭ
क़ुव्वत में
وَأَثَارُوا۟
और उन्होंने उधेड़ा था
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
وَعَمَرُوهَآ
और उन्होंने आबाद किया था उसे
أَكْثَرَ
ज़्यादा
مِمَّا
उससे जो
عَمَرُوهَا
उन्होंने आबाद किया है उसे
وَجَآءَتْهُمْ
और आए उनके पास
رُسُلُهُم
रसूल उनके
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ ۖ
साथ वाज़ेह दलाइल के
فَمَا
तो ना
كَانَ
था
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِيَظْلِمَهُمْ
कि वो ज़ुल्म करता उन पर
وَلَـٰكِن
और लेकिन
كَانُوٓا۟
थे वो
أَنفُسَهُمْ
अपनी जानों पर
يَظْلِمُونَ
वो ज़ुल्म करते
क्या वे धरती में चले-फिरे नहीं कि देखते कि उन लोगों का कैसा परिणाम हुआ जो उनसे पहले थे? वे शक्ति में उनसे अधिक बलवान थे और उन्होंने धरती को उपजाया और उससे कहीं अधिक उसे आबाद किया जितना उन्होंने आबाद किया था। और उनके पास उनके रसूल प्रत्यक्ष प्रमाण लेकर आए। फिर अल्लाह ऐसा न था कि उनपर ज़ुल्म करता। किन्तु वे स्वयं ही अपने आप पर ज़ुल्म करते थे
तफ़्सीर:
क्या ये लोग धरती में नहीं चले-फिरे कि सोच-विचार करते कि उनसे पूर्व झुठलाने वाले समुदायों का अंत कैसा हुआ। ये समुदाय इनसे अधिक शक्तिशाली थे, तथा उन्होंने धरती को खेती और निर्माण के लिए उलटा-पलटा और उसे आबाद किया उससे कहीं अधिक जितना इन लोगों ने आबाद किया। और उनके पास उनके रसूल अल्लाह के एकेश्वरवाद के स्पष्ट प्रमाणों और तर्कों के साथ आए, परंतु उन्होंने झुठला दिया। तो अल्लाह ने उन्हें विनष्ट करके उनपर ज़ुल्म नहीं किया, लेकिन वे अपने कुफ़्र के कारण खुद को विनाश से पीड़ित करके अपने ऊपर अत्याचार करते थे।
आयत 10
ثُمَّ كَانَ عَـٰقِبَةَ ٱلَّذِينَ أَسَـٰٓـُٔوا۟ ٱلسُّوٓأَىٰٓ أَن كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ وَكَانُوا۟ بِهَا يَسْتَهْزِءُونَ
ثُمَّ
फिर
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةَ
अंजाम
ٱلَّذِينَ
उनका जिन्होंने
أَسَـٰٓـُٔوا۟
बुराई की
ٱلسُّوٓأَىٰٓ
बहुत बुरा
أَن
कि
كَذَّبُوا۟
उन्होंने झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِ
(the) Signs
ٱللَّهِ
अल्लाह की आयात को
وَكَانُوا۟
और थे वो
بِهَا
उनका
يَسْتَهْزِءُونَ
वो मज़ाक़ उड़ाते
फिर जिन लोगों ने बुरा किया था उनका परिणाम बुरा हुआ, क्योंकि उन्होंने अल्लाह की आयतों को झुठलाया और उनका उपहास करते रहे
तफ़्सीर:
फिर उन लोगों का परिणाम, जिनके कर्म अल्लाह के साथ शिर्क और बुरे कामों के करने के कारण बुरे थे, बहुत ही बुरा हुआ। क्योंकि उन्होंने अल्लाह की आयतों को झुठलाया तथा वे उनका मज़ाक और हँसी उड़ाया करते थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
रोमियों की शिकस्त और आइंदा फतह की पेशिनगोई का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह की मदद कभी-कभी देर से आती है, मगर सब्र करने वालों के लिए यह ज़रूर आती है।
आयत 11
ٱللَّهُ يَبْدَؤُا۟ ٱلْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُۥ ثُمَّ إِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
ٱللَّهُ
अल्लाह
يَبْدَؤُا۟
वो इब्तिदा करता है
ٱلْخَلْقَ
तख़लीक़ की
ثُمَّ
फिर
يُعِيدُهُۥ
वो एआदा करेगा उसका
ثُمَّ
फिर
إِلَيْهِ
तरफ़ उसीके
تُرْجَعُونَ
तुम लौटाए जाओगे
अल्लाह की सृष्टि का आरम्भ करता है। फिर वही उसकी पुनरावृति करता है। फिर उसी की ओर तुम पलटोगे
तफ़्सीर:
अल्लाह ही बिना किसी पूर्व उदाहरण के सृष्टि का आरंभ करता है। फिर उसे नष्ट कर देगा। फिर उसे वापस लौटाएगा। फिर तुम क़ियामत के दिन हिसाब और बदले के लिए उसी अकेले की ओर लौटाए जाओगे।
आयत 12
وَيَوْمَ تَقُومُ ٱلسَّاعَةُ يُبْلِسُ ٱلْمُجْرِمُونَ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
تَقُومُ
क़ायम होगी
ٱلسَّاعَةُ
क़यामत
يُبْلِسُ
नाउम्मीद हो जाऐंगे
ٱلْمُجْرِمُونَ
मुजरिम
जिस दिन वह घड़ी आ खड़ी होगी, उस दिन अपराधी एकदम निराश होकर रह जाएँगे
तफ़्सीर:
और जिस दिन क़ियामत क़ायम होगी, अपराधी लोग अल्लाह की दया से निराश हो जाएँगे और उसके बारे में उनकी आशा समाप्त हो जाएगी। क्योंकि उनके पास अल्लाह के साथ कुफ़्र करने का कोई तर्क नहीं रह जाएगा।
आयत 13
وَلَمْ يَكُن لَّهُم مِّن شُرَكَآئِهِمْ شُفَعَـٰٓؤُا۟ وَكَانُوا۟ بِشُرَكَآئِهِمْ كَـٰفِرِينَ
وَلَمْ
और ना
يَكُن
होंगे
لَّهُم
उनके लिए
مِّن
among
شُرَكَآئِهِمْ
उनके शरीकों में से
شُفَعَـٰٓؤُا۟
कोई सिफ़ारिशी
وَكَانُوا۟
और वो हो जाऐंगे
بِشُرَكَآئِهِمْ
अपने शरीकों का
كَـٰفِرِينَ
इन्कार करने वाले
उनके ठहराए हुए साझीदारों में से कोई उनका सिफ़ारिश करनेवाला न होगा और वे स्वयं भी अपने साझीदारों का इनकार करेंगे
तफ़्सीर:
और उनके लिए उनके साझियों में से (जिनकी वे दुनिया में पूजा करते थे) उन्हें यातना से बचाने के लिए सिफ़ारिश करने वाले नहीं होंगे। और वे अपने साझियों का इनकार कर बैठेंगे। क्योंकि उन्होंने ज़रूरत पड़ने पर उन्हें छोड़ दिया। इसलिए कि वे सभी तबाही में बराबर हैं।
आयत 14
وَيَوْمَ تَقُومُ ٱلسَّاعَةُ يَوْمَئِذٍۢ يَتَفَرَّقُونَ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
تَقُومُ
क़ायम होगी
ٱلسَّاعَةُ
क़यामत
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
يَتَفَرَّقُونَ
वो मुतफ़र्रिक़ हो जाऐंगे
और जिस दिन वह घड़ी आ खड़ी होगी, उस दिन वे सब अलग-अलग हो जाएँगे
तफ़्सीर:
जिस दिन क़ियामत क़ायम होगी, उस दिन लोग, दुनिया में अपने कर्मों के अनुसार प्रतिफल में अलग-अलग होंगे। कोई सबसे ऊँचे भाग में होगा, तो कोई सबसे निचले भाग में धकेल दिया जाएगा।
आयत 15
فَأَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ فَهُمْ فِى رَوْضَةٍۢ يُحْبَرُونَ
فَأَمَّا
तो रहे
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
فَهُمْ
तो वो
فِى
in
رَوْضَةٍۢ
एक बाग़ में
يُحْبَرُونَ
वो ख़ुश कर दिए जाऐंगे
अतः जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, वे एक बाग़ में प्रसन्नतापूर्वक रखे जाएँगे
तफ़्सीर:
जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए और उन्होंने अल्लाह के निकट पसंदीदा अच्छे कार्य किए, वे जन्नत में उसमें प्राप्त होने वाली स्थायी नेमतों से खुश रखे जाएँगे, जो कभी भी समाप्त नहीं होंगी।
आयत 16
وَأَمَّا ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَكَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا وَلِقَآئِ ٱلْـَٔاخِرَةِ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ فِى ٱلْعَذَابِ مُحْضَرُونَ
وَأَمَّا
और रहे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
وَكَذَّبُوا۟
और झुटलाया
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात को
وَلِقَآئِ
और मुलाक़ात को
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत की
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग
فِى
in
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब में
مُحْضَرُونَ
हाज़िर रखे जाने वाले हैं
किन्तु जिन लोगों ने इनकार किया और हमारी आयतों और आख़िरत की मुलाक़ात को झुठलाया, वे लाकर यातनाग्रस्त किए जाएँगे
तफ़्सीर:
और जिन लोगों ने अल्लाह का इनकार किया और हमारे रसलू पर उतारी गई हमारी आयतों को झुठलाया, और मरणोपरांत दोबारा जीवित किए जाने और हिसाब को झुठलाया, तो वे यातना के लिए प्रस्तुत किए जाएँगे और सदा यातना ही में पड़े होंगे।
आयत 17
فَسُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ حِينَ تُمْسُونَ وَحِينَ تُصْبِحُونَ
فَسُبْحَـٰنَ
पस तस्बीह है
ٱللَّهِ
अल्लाह की
حِينَ
जब
تُمْسُونَ
तुम शाम करते हो
وَحِينَ
और जब
تُصْبِحُونَ
तुम सुबह करते हो
अतः अब अल्लाह की तसबीह करो, जबकि तुम शाम करो और जब सुबह करो।
तफ़्सीर:
अतः तुम संध्या के समय में प्रवेश करने पर अल्लाह की पवित्रता बयान करो; जो कि मग़रिब और इशा की नमाज़ का समय है, तथा सुबह के समय में प्रवेश करने पर उसकी पवित्रता बयान करो; जो कि फ़ज्र की नमाज़ का समय है।
आयत 18
وَلَهُ ٱلْحَمْدُ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَعَشِيًّۭا وَحِينَ تُظْهِرُونَ
وَلَهُ
और उसी के लिए है
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
فِى
in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन में
وَعَشِيًّۭا
और तीसरे पहर
وَحِينَ
और जिस वक़्त
تُظْهِرُونَ
तुम ज़ोहर करते हो
- और उसी के लिए प्रशंसा है आकाशों और धरती में - और पिछले पहर और जब तुमपर दोपहर हो
तफ़्सीर:
केवल उसी महिमावान के लिए सब प्रशंसा है; आकाशों में उसके फ़रिश्ते उसकी प्रशंसा करते हैं, और धरती पर उसकी मखलूक़ात उसकी प्रशंसा करती हैं। और तुम उसकी पवित्रता बयान करो, जब तुम शाम में प्रवेश करते हो, जो कि अस्र की नमाज़ का समय है, तथा उसकी पवित्रता बयान करो, जब तुम ज़ुहर के समय में प्रवेश करते हो।
आयत 19
يُخْرِجُ ٱلْحَىَّ مِنَ ٱلْمَيِّتِ وَيُخْرِجُ ٱلْمَيِّتَ مِنَ ٱلْحَىِّ وَيُحْىِ ٱلْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا ۚ وَكَذَٰلِكَ تُخْرَجُونَ
يُخْرِجُ
वो निकालता है
ٱلْحَىَّ
ज़िन्दा को
مِنَ
from
ٱلْمَيِّتِ
मुर्दा से
وَيُخْرِجُ
और वो निकालता है
ٱلْمَيِّتَ
मुर्दा को
مِنَ
from
ٱلْحَىِّ
ज़िन्दा से
وَيُحْىِ
और वो ज़िन्दा करता है
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
بَعْدَ
बाद
مَوْتِهَا ۚ
उसकी मौत के
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
تُخْرَجُونَ
तुम निकाले जाओगे
वह जीवित को मृत से निकालता है और मृत को जीवित से, और धरती को उसकी मृत्यु के पश्चात जीवन प्रदान करता है। इसी प्रकार तुम भी निकाले जाओगे
तफ़्सीर:
वह जीवित को मृत से निकालता है, जैसे इनसान को नुत्फ़ा (शुक्राणु) से निकालता है और चूज़े को अंडे से निकालता है। और मृत को जीवित से निकालता है, जैसे नुत्फ़ा (शुक्राणु) को इनसान से और अंडे को मुर्गी से निकालता है। और धरती को उसके सूखने के बाद बारिश उतारकर और उसे अंकुरित करके पुनर्जीवित करता है। तथा धरती को उसे अंकुरित करके पुनर्जीवित करने की तरह, तुम अपनी क़ब्रों से हिसाब और बदले के लिए निकाले जाओगे।
आयत 20
وَمِنْ ءَايَـٰتِهِۦٓ أَنْ خَلَقَكُم مِّن تُرَابٍۢ ثُمَّ إِذَآ أَنتُم بَشَرٌۭ تَنتَشِرُونَ
وَمِنْ
And among
ءَايَـٰتِهِۦٓ
और उसकी निशानियों में से है
أَنْ
कि
خَلَقَكُم
उसने पैदा किया तुम्हें
مِّن
from
تُرَابٍۢ
मिट्टी से
ثُمَّ
फिर
إِذَآ
यकायक
أَنتُم
तुम
بَشَرٌۭ
इन्सान हो
تَنتَشِرُونَ
तुम फैलते चले जारहे हो
और यह उसकी निशानियों में से है कि उसने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया। फिर क्या देखते है कि तुम मानव हो, फैलते जा रहे हो
तफ़्सीर:
अल्लाह की शक्ति और एकता को दर्शाने वाली उसकी महान निशानियों में से यह है कि : उसने (ऐ लोगो!) तुम्हें मिट्टी से पैदा किया, जब उसने तुम्हारे पिता (आदम) को मिट्टी से बनाया, फिर अचानक तुम मनुष्य हो, जो प्रजनन के माध्यम से बढ़ रहे हो और धरती के पूर्व और पश्चिम में फैल रहे हो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के यकीन और अल्लाह की निशानियों (सुकून भरी नींद, जीवनसाथी) का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि रोज़मर्रा की छोटी नेमतें भी अल्लाह की बड़ी निशानियां हैं, इनकी कद्र करनी चाहिए।
आयत 21
وَمِنْ ءَايَـٰتِهِۦٓ أَنْ خَلَقَ لَكُم مِّنْ أَنفُسِكُمْ أَزْوَٰجًۭا لِّتَسْكُنُوٓا۟ إِلَيْهَا وَجَعَلَ بَيْنَكُم مَّوَدَّةًۭ وَرَحْمَةً ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّقَوْمٍۢ يَتَفَكَّرُونَ
وَمِنْ
And among
ءَايَـٰتِهِۦٓ
और उसकी निशानियों में से है
أَنْ
कि
خَلَقَ
उसने पैदा किए
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنْ
from
أَنفُسِكُمْ
तुम्हारे नफ़्सों से
أَزْوَٰجًۭا
जोड़े
لِّتَسْكُنُوٓا۟
ताकि तुम सुकून पाओ
إِلَيْهَا
उनकी तरफ़
وَجَعَلَ
और उसने डाल दी
بَيْنَكُم
दर्मियान तुम्हारे
مَّوَدَّةًۭ
मुहब्बत
وَرَحْمَةً ۚ
और रहमत
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَتَفَكَّرُونَ
जो ग़ौरो फ़िक्र करते हैं
और यह भी उसकी निशानियों में से है कि उसने तुम्हारी ही सहजाति से तुम्हारे लिए जोड़े पैदा किए, ताकि तुम उसके पास शान्ति प्राप्त करो। और उसने तुम्हारे बीच प्रेंम और दयालुता पैदा की। और निश्चय ही इसमें बहुत-सी निशानियाँ है उन लोगों के लिए जो सोच-विचार करते है
तफ़्सीर:
इसी तरह उसकी शक्ति और एकता को दर्शाने वाली उसकी महान निशानियों में से यह भी है कि (ऐ पुरुषो) उसने तुम्हारे लिए तुम्हारे ही वर्ग से पत्नियाँ पैदा कीं, ताकि तुम्हारे बीच सामंजस्य के कारण उनके पास तुम्हें राहत व आराम मिले। और उनके और तुम्हारे बीच प्रेम और करुणा रख दी। निश्चय ही इसमें उन लोगों के लिए स्पष्ट सबूत और संकेत हैं, जो सोच-विचार करते हैं, क्योंकि वही लोग अपने विवेक का प्रयोग करके लाभ उठाते हैं।
आयत 22
وَمِنْ ءَايَـٰتِهِۦ خَلْقُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَٱخْتِلَـٰفُ أَلْسِنَتِكُمْ وَأَلْوَٰنِكُمْ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّلْعَـٰلِمِينَ
وَمِنْ
And among
ءَايَـٰتِهِۦ
और उसकी निशानियों में से हैं
خَلْقُ
पैदाइश
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन की
وَٱخْتِلَـٰفُ
और इख़्तिलाफ़
أَلْسِنَتِكُمْ
तुम्हारी ज़बानों का
وَأَلْوَٰنِكُمْ ۚ
और तुम्हारे रंगों का
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इस में
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
لِّلْعَـٰلِمِينَ
इल्म वालों के लिए
और उसकी निशानियों में से आकाशों और धरती का सृजन और तुम्हारी भाषाओं और तुम्हारे रंगों की विविधता भी है। निस्संदेह इसमें ज्ञानवानों के लिए बहुत-सी निशानियाँ है
तफ़्सीर:
उसकी शक्ति और एकता को दर्शाने वाली उसकी महान निशानियों में से : आकाशों का निर्माण तथा पृथ्वी का निर्माण है। तथा उन्हीं में से तुम्हारी भाषाओं की विविधता और तुम्हारे रंगों का अलग-अलग होना है। निश्चय यह जो कुछ उल्लेख हुआ है, उसमें ज्ञान और अंतर्दृष्टि रखने वाले लोगों के लिए प्रमाण और संकेत हैं।
आयत 23
وَمِنْ ءَايَـٰتِهِۦ مَنَامُكُم بِٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ وَٱبْتِغَآؤُكُم مِّن فَضْلِهِۦٓ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّقَوْمٍۢ يَسْمَعُونَ
وَمِنْ
And among
ءَايَـٰتِهِۦ
और उसकी निशानियों में से है
مَنَامُكُم
सोना तुम्हारा
بِٱلَّيْلِ
रात
وَٱلنَّهَارِ
और दिन को
وَٱبْتِغَآؤُكُم
और तलाश करना तुम्हारा
مِّن
of
فَضْلِهِۦٓ ۚ
उसके फ़ज़ल से
إِنَّ
यक़ीनन
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَسْمَعُونَ
जो सुनते हैं
और उसकी निशानियों में से तुम्हारा रात और दिन का सोना और तुम्हारा उसके अनुग्रह की तलाश करना भी है। निश्चय ही इसमें निशानियाँ है उन लोगों के लिए जो सुनते है
तफ़्सीर:
और उसकी शक्ति और एकता को दर्शाने वाली उसकी महान निशानियों में से : तुम्हारा रात में सोना तथा तुम्हारा दिन के समय सोना है, ताकि तुम अपने काम की थकान से आराम हासिल करो। तथा उसकी निशानियों में से एक यह है कि उसने तुम्हारे लिए दिन बनाया, ताकि तुम उसमें अपने पालनहार की रोज़ी तलाश करते हुए फैल जाओ। निश्चित रूप से यह जो कुछ उल्लेख हुआ है, उसमें उन लोगों के लिए बहुत-से प्रमाण और संकेत हैं, जो चिंतन करने और स्वीकार करने के इरादे से सुनते हैं।
आयत 24
وَمِنْ ءَايَـٰتِهِۦ يُرِيكُمُ ٱلْبَرْقَ خَوْفًۭا وَطَمَعًۭا وَيُنَزِّلُ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ فَيُحْىِۦ بِهِ ٱلْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَآ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّقَوْمٍۢ يَعْقِلُونَ
وَمِنْ
And among
ءَايَـٰتِهِۦ
और उसकी निशानियों में से है
يُرِيكُمُ
कि वो दिखाता है तुम्हें
ٱلْبَرْقَ
बिजली
خَوْفًۭا
ख़ौफ़
وَطَمَعًۭا
और उम्मीद से
وَيُنَزِّلُ
और वो उतारता है
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مَآءًۭ
पानी
فَيُحْىِۦ
फिर वो ज़िन्दा करता है
بِهِ
साथ इसके
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
بَعْدَ
बाद
مَوْتِهَآ ۚ
उसकी मौत के
إِنَّ
यक़ीनन
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَعْقِلُونَ
जो अक़्ल रखते हैं
और उसकी निशानियों में से यह भी है कि वह तुम्हें बिजली की चमक भय और आशा उत्पन्न करने के लिए दिखाता है। और वह आकाश से पानी बरसाता है। फिर उसके द्वारा धरती को उसके निर्जीव हो जाने के पश्चात जीवन प्रदान करता है। निस्संदेह इसमें बहुत-सी निशानियाँ है उन लोगों के लिए जो बुद्धि से काम लेते है
तफ़्सीर:
और उसकी शक्ति और एकता को दर्शाने वाली उसकी महान निशानियों में से : यह भी है कि वह तुम्हें आसमान में बिजली (की चमक) दिखाता है, और तुम्हारे लिए उसमें बिजली का भय और बारिश की लालच एकत्र कर देता है। और तुम्हारे लिए आसमान से बारिश का पानी उतारता है, फिर उसके द्वारा सूखी धरती को, उसमें पौधे उगाकर जीवित कर देता है। निश्चय ही इसमें उन लोगों के लिए स्पष्ट प्रमाण और संकेत हैं, जो समझ-बूझ रखते हैं। चुनाँचे वे इनसे मौत के बाद हिसाब और बदला के लिए पुनर्जीवित किए जाने का प्रमाण ग्रहण करते हैं।
आयत 25
وَمِنْ ءَايَـٰتِهِۦٓ أَن تَقُومَ ٱلسَّمَآءُ وَٱلْأَرْضُ بِأَمْرِهِۦ ۚ ثُمَّ إِذَا دَعَاكُمْ دَعْوَةًۭ مِّنَ ٱلْأَرْضِ إِذَآ أَنتُمْ تَخْرُجُونَ
وَمِنْ
And among
ءَايَـٰتِهِۦٓ
और उसकी निशानियों में से है
أَن
कि
تَقُومَ
क़ायम हैं
ٱلسَّمَآءُ
आसमान
وَٱلْأَرْضُ
और ज़मीन
بِأَمْرِهِۦ ۚ
उसके हुक्म से
ثُمَّ
फिर
إِذَا
जब
دَعَاكُمْ
वो पुकारेगा तुम्हें
دَعْوَةًۭ
एक ही बार पुकारना
مِّنَ
from
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन से
إِذَآ
यकायक
أَنتُمْ
तुम
تَخْرُجُونَ
तुम निकल आओगे
और उसकी निशानियों में से यह भी है कि आकाश और धरती उसके आदेश से क़ायम है। फिर जब वह तुम्हे एक बार पुकारकर धरती में से बुलाएगा, तो क्या देखेंगे कि सहसा तुम निकल पड़े
तफ़्सीर:
और अल्लाह की उसकी शक्ति और एकता को दर्शाने वाली निशानियों में से आकाश का बिने गिरे और धरती का बिना ध्वस्त हुए; उस महिमावान के आदेश से स्थापित होना है। फिर जब वह तुम्हें फ़रिश्ते के सूर में फूँकने के द्वारा धरती से बुलाएगा, तो अचानक तुम हिसाब और बदले के लिए अपनी क़ब्रों से निकल पड़ोगे।
आयत 26
وَلَهُۥ مَن فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ كُلٌّۭ لَّهُۥ قَـٰنِتُونَ
وَلَهُۥ
और उसी के लिए है
مَن
जो कोई
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ ۖ
और ज़मीन में है
كُلٌّۭ
सब
لَّهُۥ
उसी के लिए
قَـٰنِتُونَ
फ़रमाबरदार हैं
आकाशों और धरती में जो कोई भी उसी का है। प्रत्येक उसी के निष्ठावान आज्ञाकारी है
तफ़्सीर:
जो कोई भी आकाशों में है, सब अकेले उसी का है और जो कोई भी धरती में है, सब उसी का है, वही सबका मालिक, पैदा करने वाला और भाग्य-विधाता है। आकाशों और धरती की उसकी पैदा की हुई सारी चीज़ें उसकी आज्ञा के अधीन और उसके आदेश के प्रति समर्पित हैं।
आयत 27
وَهُوَ ٱلَّذِى يَبْدَؤُا۟ ٱلْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُۥ وَهُوَ أَهْوَنُ عَلَيْهِ ۚ وَلَهُ ٱلْمَثَلُ ٱلْأَعْلَىٰ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जो
يَبْدَؤُا۟
इब्तिदा करता है
ٱلْخَلْقَ
तख़लीक़ की
ثُمَّ
फिर
يُعِيدُهُۥ
वो एआदा करेगा उसका
وَهُوَ
और वो
أَهْوَنُ
ज़्यादा आसान है
عَلَيْهِ ۚ
उस पर
وَلَهُ
और उसी के लिए है
ٱلْمَثَلُ
मिसाल
ٱلْأَعْلَىٰ
आला
فِى
in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ ۚ
और ज़मीन में
وَهُوَ
और वो
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त है
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिकमत वाला है
वही है जो सृष्टि का आरम्भ करता है। फिर वही उसकी पुनरावृत्ति करेगा। और यह उसके लिए अधिक सरल है। आकाशों और धरती में उसी मिसाल (गुण) सर्वोच्च है। और वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी हैं
तफ़्सीर:
वही महिमावान है, जो बिना किसी पूर्व उदाहरण के सृष्टि का आरंभ करता है। फिर उसको नष्ट करने के बाद उसे दोबारा पैदा करेगा। और दोबारा पैदा करना पहली बार पैदा करने की तुलना में अधिक आसान है। हालाँकि उसके लिए दोनों ही आसान हैं। क्योंकि वह जब किसी चीज़ को पैदा करना चाहता है, तो उससे कहता है : ''हो जा'', तो वह चीज़ हो जाती है। तथा अल्लाह अपनी महिमा और पूर्णता के सभी गुणों में सबसे उच्च गुण वाला है। वही वह प्रभुत्वशाली है, जिसे परास्त नहीं किया जा सकता। वह अपनी रचना और प्रबंधन में हिकमत वाला है।
आयत 28
ضَرَبَ لَكُم مَّثَلًۭا مِّنْ أَنفُسِكُمْ ۖ هَل لَّكُم مِّن مَّا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُكُم مِّن شُرَكَآءَ فِى مَا رَزَقْنَـٰكُمْ فَأَنتُمْ فِيهِ سَوَآءٌۭ تَخَافُونَهُمْ كَخِيفَتِكُمْ أَنفُسَكُمْ ۚ كَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ ٱلْـَٔايَـٰتِ لِقَوْمٍۢ يَعْقِلُونَ
ضَرَبَ
उसने बयान की
لَكُم
तुम्हारे लिए
مَّثَلًۭا
एक मिसाल
مِّنْ
from
أَنفُسِكُمْ ۖ
तुम्हारे नफ़्सों में से
هَل
क्या हैं
لَّكُم
तुम्हारे लिए
مِّن
among
مَّا
उसमें से जो
مَلَكَتْ
मालिक हैं
أَيْمَـٰنُكُم
दाऐं हाथ तुम्हारे
مِّن
any
شُرَكَآءَ
कुछ शरीक
فِى
in
مَا
उसमें जो
رَزَقْنَـٰكُمْ
रिज़्क़ दिया हमने तुम्हें
فَأَنتُمْ
तो तुम
فِيهِ
उसमें
سَوَآءٌۭ
बराबर हो
تَخَافُونَهُمْ
तुम डरते हो उनसे
كَخِيفَتِكُمْ
जैसे डरना तुम्हारा
أَنفُسَكُمْ ۚ
अपने नफ़्सों (जैसों) से
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نُفَصِّلُ
हम खोलकर बयान करते हैं
ٱلْـَٔايَـٰتِ
आयात
لِقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَعْقِلُونَ
जो अक़्ल रखते हैं
उसने तुम्हारे लिए स्वयं तुम्हीं में से एक मिसाल पेश की है। क्या जो रोज़ी हमने तुम्हें दी है, उसमें तुम्हारे अधीनस्थों में से, कुछ तुम्हारे साझीदार है कि तुम सब उसमें बराबर के हो, तुम उनका ऐसा डर रखते हो जैसा अपने लोगों का डर रखते हो? - इसप्रकार हम उन लोगों के लिए आयतें खोल-खोलकर प्रस्तुत करते है जो बुद्धि से काम लेते है। -
तफ़्सीर:
(ऐ मुश्रिको!) अल्लाह ने तुम्हारे लिए तुम्हीं से लिया गया एक उदाहरण प्रस्तुत किया है : क्या तुम्हारे गुलामों और दासों में से कोई तुम्हारा साझी है, जो तुम्हारे धन में बराबर का हिस्सेदार है, कि तुम डरते हो कि वह तुम्हारे साथ तुम्हारे धन को विभाजित कर लेगा, जिस तरह कि तुममें से कुछ अपने आज़ाद साथी से डरते हैं कि वह उसके साथ धन बांट लेगा? क्या तुम अपने लिए अपने गुलामों की इस साझेदारी को पसंद करोगे? निःसंदेह तुम ऐसा पसंद नहीं करोगे। तो फिर अल्लाह इस बात का सबसे अधिक हक़दार है कि उसके प्राणियों और दासों में से कोई उसके राज्य में उसका साझेदार न हो। इसी तरह उदाहरण प्रस्तुत करने आदि के द्वारा, हम उन लोगों के लिए विविध प्रकार के तर्क और प्रमाण पेश करते हैं, जो समझ-बूझ रखते हैं। क्योंकि वही लोग इससे लाभान्वित होते हैं।
आयत 29
بَلِ ٱتَّبَعَ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓا۟ أَهْوَآءَهُم بِغَيْرِ عِلْمٍۢ ۖ فَمَن يَهْدِى مَنْ أَضَلَّ ٱللَّهُ ۖ وَمَا لَهُم مِّن نَّـٰصِرِينَ
بَلِ
बल्कि
ٱتَّبَعَ
पैरवी की
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
ظَلَمُوٓا۟
ज़ुल्म किया
أَهْوَآءَهُم
अपनी ख़्वाहिशात की
بِغَيْرِ
बग़ैर
عِلْمٍۢ ۖ
इल्म के
فَمَن
तो कौन
يَهْدِى
हिदायत दे सकता है
مَنْ
उसको जिसे
أَضَلَّ
गुमराह कर दे
ٱللَّهُ ۖ
अल्लाह
وَمَا
और नहीं
لَهُم
उनके लिए
مِّن
any
نَّـٰصِرِينَ
मददगारों में से कोई
नहीं, बल्कि ये ज़ालिम तो बिना ज्ञान के अपनी इच्छाओं के पीछे चल पड़े। तो अब कौन उसे मार्ग दिखाएगा जिसे अल्लाह ने भटका दिया हो? ऐसे लोगो का तो कोई सहायक नहीं
तफ़्सीर:
उनकी गुमराही का कारण प्रमाणों में किसी प्रकार की कमी नहीं है और न ही उनकी व्याख्या में कमी है। बल्कि उसका कारण, अपने ऊपर अल्लाह के अधिकार की अज्ञानता की वजह से, इच्छाओं का पालन करना और अपने बाप-दादाओं का अनुकरण करना है। तो भला उसे कौन हिदायत की तौफ़ीक़ दे सकता है, जिसे अल्लाह ने गुमराह कर दिया है?! कोई भी उसे तौफ़ीक़ नहीं दे सकता। और उनके पास कोई सहायक नहीं हैं जो उनसे अल्लाह की यातना को दूर कर सकें।
आयत 30
فَأَقِمْ وَجْهَكَ لِلدِّينِ حَنِيفًۭا ۚ فِطْرَتَ ٱللَّهِ ٱلَّتِى فَطَرَ ٱلنَّاسَ عَلَيْهَا ۚ لَا تَبْدِيلَ لِخَلْقِ ٱللَّهِ ۚ ذَٰلِكَ ٱلدِّينُ ٱلْقَيِّمُ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
فَأَقِمْ
पस क़ायम रखिए
وَجْهَكَ
अपने चेहरे को
لِلدِّينِ
दीन के लिए
حَنِيفًۭا ۚ
यक्सू हो कर
فِطْرَتَ
फ़ितरत
ٱللَّهِ
अल्लाह की
ٱلَّتِى
वो जो
فَطَرَ
उसने पैदा किया
ٱلنَّاسَ
लोगों को
عَلَيْهَا ۚ
उस पर
لَا
No
تَبْدِيلَ
नहीं (जाइज़) कोई तब्दीली
لِخَلْقِ
ख़ल्क़ के लिए
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह की
ذَٰلِكَ
यही है
ٱلدِّينُ
दीन
ٱلْقَيِّمُ
दुरुस्त
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَ
अक्सर
ٱلنَّاسِ
लोग
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
अतः एक ओर का होकर अपने रुख़ को 'दीन' (धर्म) की ओर जमा दो, अल्लाह की उस प्रकृति का अनुसरण करो जिसपर उसने लोगों को पैदा किया। अल्लाह की बनाई हुई संरचना बदली नहीं जा सकती। यही सीधा और ठीक धर्म है, किन्तु अधिकतर लोग जानते नहीं।
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप और आपके साथी उस धर्म की ओर उन्मुख हो जाएँ, जिसकी ओर अल्लाह ने आपको निर्देशित किया है; सभी धर्मों से उपेक्षाकर उसी की ओर एकाग्र होकर। वह इस्लाम धर्म है, जिसपर अल्लाह ने लोगों को पैदा किया है। अल्लाह की रचना में कोई बदलाव नहीं हो सकता। यही सीधा धर्म है, जिसमें कोई टेढ़ापन नहीं है। लेकिन अधिकतर लोगों को नहीं पता है कि सच्चा धर्म यही (इस्लाम) धर्म है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
फितरत-ए-इस्लाम पर कायम रहने की ताकीद का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि इंसान की फितरत खुद तौहीद की तरफ मायल है, इसलिए दिल की आवाज़ सुनकर हक की तरफ लौटना चाहिए।
आयत 31
۞ مُنِيبِينَ إِلَيْهِ وَٱتَّقُوهُ وَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَلَا تَكُونُوا۟ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ
۞ مُنِيبِينَ
रुजूअ करने वाले (बनो)
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
وَٱتَّقُوهُ
और डरो उससे
وَأَقِيمُوا۟
और क़ायम करो
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَلَا
और ना
تَكُونُوا۟
तुम हो जाओ
مِنَ
of
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकों में से
उसकी ओर रुजू करनेवाले (प्रवृत्त होनेवाले) रहो। और उसका डर रखो और नमाज़ का आयोजन करो और (अल्लाह का) साझी ठहरानेवालों में से न होना,
तफ़्सीर:
अपने गुनाहों से तौबा करके उसी महिमावान अल्लाह की ओर लौट आओ। तथा उसके आदेशों का पालन करके और निषेधों से दूर रहकर उससे डरते रहो। और संपूर्ण तरीक़े से नमाज़ पढ़ो। और उन मुश्रिकों में से न हो जाओ, जो सहज प्रकृति का विरोध करते हैं। इसलिए वे अपनी इबादत में अल्लाह के साथ दूसरों को साझी ठहराते हैं।
आयत 32
مِنَ ٱلَّذِينَ فَرَّقُوا۟ دِينَهُمْ وَكَانُوا۟ شِيَعًۭا ۖ كُلُّ حِزْبٍۭ بِمَا لَدَيْهِمْ فَرِحُونَ
مِنَ
Of
ٱلَّذِينَ
उन लोगों में से जिन्होंने
فَرَّقُوا۟
फ़िरक़ा-फ़िरक़ा कर दिया
دِينَهُمْ
अपने दीन को
وَكَانُوا۟
और हो गए वो
شِيَعًۭا ۖ
गिरोह-गिरोह
كُلُّ
हर
حِزْبٍۭ
गिरोह (के लोग)
بِمَا
उस पर जो
لَدَيْهِمْ
उनके पास है
فَرِحُونَ
ख़ुश हैं
उन लोगों में से जिन्होंने अपनी दीन (धर्म) को टुकड़े-टुकड़े कर डाला और गिरोहों में बँट गए। हर गिरोह के पास जो कुछ है, उसी में मग्न है
तफ़्सीर:
उन मुश्रिकों में से न हो जाओ, जिन्होंने अपने धर्म को बदल दिया और उसके कुछ भाग पर ईमान लाए और कुछ का इनकार किया और वे कई समूहों और दलों में बँट गए। उनमें से प्रत्येक दल, उसके पास जो असत्य है, उसी पर खुश है। वे समझते हैं कि वही अकेले सत्य पर हैं और उनके सिवा अन्य लोग असत्य पर हैं।
आयत 33
وَإِذَا مَسَّ ٱلنَّاسَ ضُرٌّۭ دَعَوْا۟ رَبَّهُم مُّنِيبِينَ إِلَيْهِ ثُمَّ إِذَآ أَذَاقَهُم مِّنْهُ رَحْمَةً إِذَا فَرِيقٌۭ مِّنْهُم بِرَبِّهِمْ يُشْرِكُونَ
وَإِذَا
और जब
مَسَّ
पहुँचती है
ٱلنَّاسَ
लोगों को
ضُرٌّۭ
कोई तक्लीफ़
دَعَوْا۟
वो पुकारते हैं
رَبَّهُم
अपने रब को
مُّنِيبِينَ
रुजूअ करने वाले बन कर
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
ثُمَّ
फिर
إِذَآ
जब
أَذَاقَهُم
वो चखाता है उन्हें
مِّنْهُ
अपनी तरफ़ से
رَحْمَةً
रहमत
إِذَا
यकायक
فَرِيقٌۭ
एक गिरोह (के लोग)
مِّنْهُم
उनमें से
بِرَبِّهِمْ
अपने रब के साथ
يُشْرِكُونَ
वो शरीक ठहराते हैं
और जब लोगों को कोई तकलीफ़ पहुँचती है तो वे अपने रब को, उसकी ओर रुजू (प्रवृत) होकर पुकारते है। फिर जब वह उन्हें अपनी दयालुता का रसास्वादन करा देता है, तो क्या देखते है कि उनमें से कुछ लोग अपने रब का साझी ठहराने लगे;
तफ़्सीर:
जब मुश्रिकों को बीमारी या गरीबी या सूखे की गंभीरता का सामना करना पड़ता है, तो वे केवल अपने महिमावान पालनहार ही को पुकारते हैं, विलाप और इस विनती के साथ उसकी ओर लौटते हुए कि वह उनकी विपत्ति को उनसे टाल दे। फिर जब वह उनकी विपत्ति को टालकर उनपर दया करता है, तो सहसा उनमें से एक समूह दुआ में अल्लाह के साथ उसके अलावा को साझी ठहराने की ओर लौट आता है।
आयत 34
لِيَكْفُرُوا۟ بِمَآ ءَاتَيْنَـٰهُمْ ۚ فَتَمَتَّعُوا۟ فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ
لِيَكْفُرُوا۟
ताकि वो नाशुक्री करें
بِمَآ
उसकी जो
ءَاتَيْنَـٰهُمْ ۚ
अता किया हमने उन्हें
فَتَمَتَّعُوا۟
तो फ़ायदा उठा लो
فَسَوْفَ
पस अनक़रीब
تَعْلَمُونَ
तुम जान लोगे
ताकि इस प्रकार वे उसके प्रति अकृतज्ञता दिखलाएँ जो कुछ हमने उन्हें दिया है। "अच्छा तो मज़े उड़ा लो, शीघ्र ही तुम जान लोगे।"
तफ़्सीर:
यदि वे अल्लाह की नेमतों (जिनमें विपत्ति को दूर करने की नेमत भी शामिल है) की कृतघ्नता करते हैं, और इस जीवन में उनके हाथों में जो कुछ है, उसका आनंद लेते हैं, तो वे क़ियामत के दिन अपनी आँखों से देख लेंगे कि वे खुली गुमराही में थे।
आयत 35
أَمْ أَنزَلْنَا عَلَيْهِمْ سُلْطَـٰنًۭا فَهُوَ يَتَكَلَّمُ بِمَا كَانُوا۟ بِهِۦ يُشْرِكُونَ
أَمْ
या
أَنزَلْنَا
उतारी हमने
عَلَيْهِمْ
उन पर
سُلْطَـٰنًۭا
कोई दलील
فَهُوَ
तो वो
يَتَكَلَّمُ
वो बताती है
بِمَا
उनको वो जो
كَانُوا۟
हैं वो
بِهِۦ
साथ जिसके
يُشْرِكُونَ
वो शरीक ठहराते
(क्या उनके देवताओं ने उनकी सहायता की थी) या हमने उनपर ऐसा कोई प्रमाण उतारा है कि वह उसके हक़ में बोलता हो, जो वे उसके साथ साझी ठहराते है
तफ़्सीर:
उन्हें अल्लाह के साथ शिर्क करने के लिए किस चीज़ ने आमंत्रित किया, जबकि उनके पास कोई प्रमाण नहीं है?! चुनाँचे हमने उनपर प्रमाण के रूप में कोई किताब नहीं उतारी है, जिससे वे अपने अल्लाह के साथ शिर्क करने पर प्रमाण ग्रहण कर सकें। तथा उनके पास कोई किताब भी नहीं है, जो उनके शिर्क की बात करती हो और उनके लिए उनके कुफ़्र के सही होने को प्रमाणित करती हो।
आयत 36
وَإِذَآ أَذَقْنَا ٱلنَّاسَ رَحْمَةًۭ فَرِحُوا۟ بِهَا ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌۢ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ إِذَا هُمْ يَقْنَطُونَ
وَإِذَآ
और जब
أَذَقْنَا
चखाते हैं हम
ٱلنَّاسَ
लोगों को
رَحْمَةًۭ
कोई रहमत
فَرِحُوا۟
वो ख़ुश होते हैं
بِهَا ۖ
उस पर
وَإِن
और अगर
تُصِبْهُمْ
पहुँचती है उन्हें
سَيِّئَةٌۢ
कोई बुराई
بِمَا
बवजह उसके जो
قَدَّمَتْ
आगे भेजा
أَيْدِيهِمْ
उनके हाथों ने
إِذَا
यकायक
هُمْ
वो
يَقْنَطُونَ
वो मायूस हो जाते हैं
और जब हम लोगों को दयालुता का रसास्वादन कराते है तो वे उसपर इतराने लगते है; परन्तु जो कुछ उनके हाथों ने आगे भेजा है यदि उसके कारण उनपर कोई विपत्ति आ जाए, तो क्या देखते है कि वे निराश हो रहे है
तफ़्सीर:
जब हम लोगों को अपनी नेमतों में से कोई नेमत चखाते हैं, जैसे कि स्वास्थ्य और धन, तो वे उसपर इतराने और अभिमान करने लगते हैं। और अगर उनके गुनाहों के कारण, उन्हें कोई बुराई पहुँचती है, जैसे बीमारी और गरीबी आदि, तो वे एकाएक अल्लाह की दया से निराश हो जाते हैं और उन्हें जो बुराई पहुँची है उसके दूर होने से आशाहीन हो जाते हैं।
आयत 37
أَوَلَمْ يَرَوْا۟ أَنَّ ٱللَّهَ يَبْسُطُ ٱلرِّزْقَ لِمَن يَشَآءُ وَيَقْدِرُ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّقَوْمٍۢ يُؤْمِنُونَ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَرَوْا۟
उन्होंने देखा
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَبْسُطُ
वो फैलाता है
ٱلرِّزْقَ
रिज़्क़
لِمَن
जिसके लिए
يَشَآءُ
वो चाहता है
وَيَقْدِرُ ۚ
और वो तंग करता है
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يُؤْمِنُونَ
जो ईमान लाते हैं
क्या उन्होंने विचार नहीं किया कि अल्लाह जिसके लिए चाहता है रोज़ी कुशादा कर देता है और जिसके लिए चाहता है नपी-तुली कर देता है? निस्संदेह इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ है, जो ईमान लाएँ
तफ़्सीर:
क्या उन्होंने यह नहीं देखा कि अल्लाह अपने बंदों में से जिसके लिए चाहता है, उसकी रोज़ी का विस्तार कर देता है, उसके लिए एक परीक्षण के रूप में कि वह आभार प्रकट करता है या कृतघ्नता दिखाता है? तथा उनमें से जिसके लिए चाहता है, उसकी रोज़ी तंग कर देता है, उसके लिए एक परीक्षण के तौर पर कि वह सब्र करता है या क्रुद्ध होता है?! निश्चित रूप से कुछ के लिए आजीविका का विस्तार करने और कुछ के लिए रोज़ी को तंग करने में, ईमान वालों के लिए अल्लाह की दया और करुणा के बहुत-से संकेत हैं।
आयत 38
فَـَٔاتِ ذَا ٱلْقُرْبَىٰ حَقَّهُۥ وَٱلْمِسْكِينَ وَٱبْنَ ٱلسَّبِيلِ ۚ ذَٰلِكَ خَيْرٌۭ لِّلَّذِينَ يُرِيدُونَ وَجْهَ ٱللَّهِ ۖ وَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ
فَـَٔاتِ
पस आप दीजिए
ذَا
the relative
ٱلْقُرْبَىٰ
क़राबतदार को
حَقَّهُۥ
हक़ उसका
وَٱلْمِسْكِينَ
और मिसकीन
وَٱبْنَ
and the wayfarer
ٱلسَّبِيلِ ۚ
और मुसाफ़िर को
ذَٰلِكَ
ये
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لِّلَّذِينَ
उनके लिए जो
يُرِيدُونَ
चाहते हैं
وَجْهَ
चेहरा
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह का
وَأُو۟لَـٰٓئِكَ
और यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْمُفْلِحُونَ
जो फ़लाह पाने वाले हैं
अतः नातेदार को उसका हक़ दो और मुहताज और मुसाफ़िर को भी। यह अच्छा है उनके लिए जो अल्लाह की प्रसन्नता के इच्छुक हों और वही सफल है
तफ़्सीर:
अतः (ऐ मुसलमान!) तुम रिश्तेदार के साथ भलाई और एहसान का वह मामला करो, जिसका वह हक़दार है, तथा ज़रूरतमंद को इतना दो, जिससे उसकी आवश्यकता पूरी हो सके, तथा उस यात्री को भी दो, जिसका अपने देश से रास्ता कट गया है। इन भलाई के कार्यों में खर्च करना उन लोगों के लिए बेहतर है, जो उससे अल्लाह का चेहरा (प्रसन्नता) चाहते हैं। जो लोग इस सहायता और अधिकारों का निष्पादन करते हैं, वही लोग उस जन्नत को प्राप्त कर, जिसे वे तलब करते हैं, तथा उस यातना से सुरक्षित रहकर, जिससे वे डर रहे हैं, सफल होने वाले हैं।
आयत 39
وَمَآ ءَاتَيْتُم مِّن رِّبًۭا لِّيَرْبُوَا۟ فِىٓ أَمْوَٰلِ ٱلنَّاسِ فَلَا يَرْبُوا۟ عِندَ ٱللَّهِ ۖ وَمَآ ءَاتَيْتُم مِّن زَكَوٰةٍۢ تُرِيدُونَ وَجْهَ ٱللَّهِ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُضْعِفُونَ
وَمَآ
और जो कुछ
ءَاتَيْتُم
देते हो तुम
مِّن
for
رِّبًۭا
सूद में से
لِّيَرْبُوَا۟
ताकि वो बढ़ जाए
فِىٓ
in
أَمْوَٰلِ
मालों में
ٱلنَّاسِ
लोगों के
فَلَا
पस नहीं
يَرْبُوا۟
वो बढ़ता
عِندَ
with
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के यहाँ
وَمَآ
और जो कुछ
ءَاتَيْتُم
देते हो तुम
مِّن
of
زَكَوٰةٍۢ
ज़कात में से
تُرِيدُونَ
तुम चाहते हो
وَجْهَ
चेहरा
ٱللَّهِ
अल्लाह का
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْمُضْعِفُونَ
जो दो गुना करने वाले हैं
तुम जो कुछ ब्याज पर देते हो, ताकि वह लोगों के मालों में सम्मिलित होकर बढ़ जाए, तो वह अल्लाह के यहाँ नहीं बढ़ता। किन्तु जो ज़कात तुमने अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए दी, तो ऐसे ही लोग (अल्लाह के यहाँ) अपना माल बढ़ाते है
तफ़्सीर:
जो धन तुम किसी आदमी को इस उद्देश्य से देते हो कि वह तुम्हें उसमें कुछ वृद्धि के साथ वापस करे, तो उसका सवाब अल्लाह के यहाँ नहीं बढ़ेगा। और जो कुछ तुम अपने माल में से किसी ऐसे व्यक्ति को देते हो, जो उससे अपनी ज़रूरत पूरी करता है, जिससे तुम अल्लाह का चेहरा चाहते हो, तुम्हारा इरादा कोई पद (सामाजिक स्थिति) या लोगों से प्रतिफल प्राप्त करना नहीं है, तो ऐसे ही लोग हैं जिनके प्रतिफल को अल्लाह के यहाँ कई गुना कर दिया जाएगा।
आयत 40
ٱللَّهُ ٱلَّذِى خَلَقَكُمْ ثُمَّ رَزَقَكُمْ ثُمَّ يُمِيتُكُمْ ثُمَّ يُحْيِيكُمْ ۖ هَلْ مِن شُرَكَآئِكُم مَّن يَفْعَلُ مِن ذَٰلِكُم مِّن شَىْءٍۢ ۚ سُبْحَـٰنَهُۥ وَتَعَـٰلَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّذِى
वो है जिसने
خَلَقَكُمْ
पैदा किया तुम्हें
ثُمَّ
फिर
رَزَقَكُمْ
उसने रिज़्क़ दिया तुम्हें
ثُمَّ
फिर
يُمِيتُكُمْ
वो मौत देगा तुम्हें
ثُمَّ
फिर
يُحْيِيكُمْ ۖ
वो ज़िन्दा करेगा तुम्हें
هَلْ
क्या है
مِن
any
شُرَكَآئِكُم
तुम्हारे शरीकों में से कोई
مَّن
जो
يَفْعَلُ
करे
مِن
of
ذَٰلِكُم
इसमें से
مِّن
any
شَىْءٍۢ ۚ
कोई चीज़
سُبْحَـٰنَهُۥ
पाक है वो
وَتَعَـٰلَىٰ
और वो बुलन्दतर है
عَمَّا
उससे जो
يُشْرِكُونَ
वो शरीक ठहराते हैं
अल्लाह ही है जिसने तुम्हें पैदा किया, फिर तुम्हें रोज़ी दी; फिर वह तुम्हें मृत्यु देता है; फिर तुम्हें जीवित करेगा। क्या तुम्हारे ठहराए हुए साझीदारों में भी कोई है, जो इन कामों में से कुछ कर सके? महान और उच्च है वह उसमें जो साझी वे ठहराते है
तफ़्सीर:
केवल अल्लाह ही वह हस्ती है, जो तुम्हें पैदा करने, फिर तुम्हें रोज़ी देने, फिर तुम्हें मारने, फिर तुम्हें क़ियामत के दिन के लिए जीवित करने में अकेला है। क्या तुम्हारी उन मूर्तियाँ में से, जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो, कोई ऐसा है, जो इनमें से कोई काम कर सके?! अल्लाह की हस्ती उससे बहुत पवित्र और सर्वोच्च है, जो मुश्रिक लोग कहते और विश्वास रखते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
शिर्क से बचने और रिश्तेदारों का हक अदा करने की ताकीद का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि रिश्तेदारों, मिस्कीनों और मुसाफिरों का हक अदा करना अल्लाह की खुशनूदी का ज़रिया है।
आयत 41
ظَهَرَ ٱلْفَسَادُ فِى ٱلْبَرِّ وَٱلْبَحْرِ بِمَا كَسَبَتْ أَيْدِى ٱلنَّاسِ لِيُذِيقَهُم بَعْضَ ٱلَّذِى عَمِلُوا۟ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
ظَهَرَ
ज़ाहिर हो गया
ٱلْفَسَادُ
फ़साद
فِى
in
ٱلْبَرِّ
ख़ुश्की में
وَٱلْبَحْرِ
और समुन्दर में
بِمَا
बवजह उसके जो
كَسَبَتْ
कमाई की
أَيْدِى
हाथों ने
ٱلنَّاسِ
लोगों के
لِيُذِيقَهُم
ताकि वो चखाए उन्हें
بَعْضَ
बाज़ उसका
ٱلَّذِى
वो जो
عَمِلُوا۟
उन्होंने अमल किए
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَرْجِعُونَ
वो लौट आऐं
थल और जल में बिगाड़ फैल गया स्वयं लोगों ही के हाथों की कमाई के कारण, ताकि वह उन्हें उनकी कुछ करतूतों का मज़ा चखाए, कदाचित वे बाज़ आ जाएँ
तफ़्सीर:
लोगों के किए हुए पापों के कारण, जल और थल में बिगाड़ फैल गया, जैसे सूखा, वर्षा की कमी, तथा बीमारियों और महामारियों की बहुतायत। ऐसा इसलिए प्रकट हुआ ताकि अल्लाह उन्हें उनके कुछ बुरे कर्मों का बदला दुनिया के जीवन ही में चखा दे, इस आशा में कि वे तौबा करके अल्लाह की ओर लौट आएँ।
आयत 42
قُلْ سِيرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ فَٱنظُرُوا۟ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلُ ۚ كَانَ أَكْثَرُهُم مُّشْرِكِينَ
قُلْ
कह दीजिए
سِيرُوا۟
चलो फिरो
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
فَٱنظُرُوا۟
फिर देखो
كَيْفَ
कैसा
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अंजाम
ٱلَّذِينَ
उनका जो
مِن
(were) before
قَبْلُ ۚ
(इनसे) पहले थे
كَانَ
थे
أَكْثَرُهُم
अक्सर उनके
مُّشْرِكِينَ
मुशरिक
कहो, "धरती में चल-फिरकर देखो कि उन लोगों का कैसा परिणाम हुआ जो पहले गुज़रे है। उनमें अधिकतर बहुदेववादी ही थे।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप इन मुश्रिकों से कह दें : धरती में चलो-फिरो, फिर विचार करो कि तुमसे पहले के झुठलाने वाले समुदायों का अंत कैसे हुआ? वास्तव में वह एक बुरा परिणाम था। उनमें से अधिकांश लोग अल्लाह का साझी बनाने वाले थे, उसके साथ अन्य को पूजते थे। चुनाँचे वे अल्लाह के साथ शिर्क करने के कारण नष्ट कर दिए गए।
आयत 43
فَأَقِمْ وَجْهَكَ لِلدِّينِ ٱلْقَيِّمِ مِن قَبْلِ أَن يَأْتِىَ يَوْمٌۭ لَّا مَرَدَّ لَهُۥ مِنَ ٱللَّهِ ۖ يَوْمَئِذٍۢ يَصَّدَّعُونَ
فَأَقِمْ
तो क़ायम रखिए
وَجْهَكَ
चेहरा अपना
لِلدِّينِ
to the religion
ٱلْقَيِّمِ
दुरुस्त दीन के लिए
مِن
before
قَبْلِ
इससे पहले
أَن
कि
يَأْتِىَ
आ जाए
يَوْمٌۭ
वो दिन
لَّا
not
مَرَدَّ
नहीं कोई टलना
لَهُۥ
उसके लिए
مِنَ
from
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह की तरफ़ से
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
يَصَّدَّعُونَ
वो जुदा-जुदा हो जाऐंगे
अतः तुम अपना रुख़ सीधे व ठीक धर्म की ओर जमा दो, इससे पहले कि अल्लाह की ओर से वह दिन आ जाए जिसके लिए वापसी नहीं। उस दिन लोग अलग-अलग हो जाएँगे
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप अपना चेहरा सीधे घर्म इस्लाम पर स्थापित रखें, जिसमें कोई टेढ़ापन नहीं है, इससे पहले कि क़ियामत का दिन आ जाए, जिसके आ जाने पर, उसे कोई टालने वाला नहीं होगा। उस दिन लोग अलग-अलग समूहों में होंगे : एक समूह जन्नत के अंदर नेमतों में होगा, और एक समूह जहन्नम के अंदर अज़ाब में ग्रस्त होगा।
आयत 44
مَن كَفَرَ فَعَلَيْهِ كُفْرُهُۥ ۖ وَمَنْ عَمِلَ صَـٰلِحًۭا فَلِأَنفُسِهِمْ يَمْهَدُونَ
مَن
जिसने
كَفَرَ
कुफ़्र किया
فَعَلَيْهِ
तोउसी पर है
كُفْرُهُۥ ۖ
कुफ़्र उसका
وَمَنْ
और जिसने
عَمِلَ
अमल किया
صَـٰلِحًۭا
नेक
فَلِأَنفُسِهِمْ
तो अपने ही नफ़्सों के लिए
يَمْهَدُونَ
वो राह हमवार कर रहे हैं
जिस किसी ने इनकार किया तो उसका इनकार उसी के लिए घातक सिद्ध होगा, और जिन लोगों ने अच्छा कर्म किया वे अपने ही लिए आराम का साधन जुटा रहे है
तफ़्सीर:
जिसने अल्लाह का इनकार किया, तो उसके इनकार का नुक़सान - जो कि हमेशा के लिए नरक में रहना है - उसी पर लौटने वाला है, और जिसने अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए अच्छा कार्य किया, तो ऐसे लोग अपने ही लिए जन्नत में दाखिल होने और उसकी नेमतों का आनंद लेने के लिए रास्ता हमवार कर रहे हैं। जिसमें वे हमेशा के लिए रहने वाले हैं।
आयत 45
لِيَجْزِىَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ مِن فَضْلِهِۦٓ ۚ إِنَّهُۥ لَا يُحِبُّ ٱلْكَـٰفِرِينَ
لِيَجْزِىَ
ताकि वो बदला दे
ٱلَّذِينَ
उनको जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
مِن
(out) of
فَضْلِهِۦٓ ۚ
अपने फ़ज़ल से
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَا
(does) not
يُحِبُّ
नहीं वो पसंद करता
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों को
ताकि वह अपने उदार अनुग्रह से उन लोगों को बदला दे जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए। निश्चय ही वह इनकार करनेवालों को पसन्द नहीं करता। -
तफ़्सीर:
ताकि अल्लाह अपने अनुग्रह और उपकार से उन लोगों को बदला दे, जो अल्लाह पर ईमान लाए और ऐसे अच्छे कार्य किए जो अल्लाह को पसंद हैं। अल्लाह उन लोगों से प्रेम नहीं करता, जो उसका और उसके रसूलों का इनकार करने वाले हैं। बल्कि उनसे सख़्त नाराज़ होता है और उन्हें क़ियामत के दिन यातना देगा।
आयत 46
وَمِنْ ءَايَـٰتِهِۦٓ أَن يُرْسِلَ ٱلرِّيَاحَ مُبَشِّرَٰتٍۢ وَلِيُذِيقَكُم مِّن رَّحْمَتِهِۦ وَلِتَجْرِىَ ٱلْفُلْكُ بِأَمْرِهِۦ وَلِتَبْتَغُوا۟ مِن فَضْلِهِۦ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
وَمِنْ
And among
ءَايَـٰتِهِۦٓ
और उसकी निशानियों में से है
أَن
कि
يُرْسِلَ
वो भेजता है
ٱلرِّيَاحَ
हवाऐं
مُبَشِّرَٰتٍۢ
ख़ुशख़बरी देने वालियाँ
وَلِيُذِيقَكُم
और ताकि वो चखाए तुम्हें
مِّن
of
رَّحْمَتِهِۦ
अपनी रहमत से
وَلِتَجْرِىَ
और ताकि चलें
ٱلْفُلْكُ
कश्तियाँ
بِأَمْرِهِۦ
उसके हुक्म से
وَلِتَبْتَغُوا۟
और ताकि तुम तलाश करो
مِن
of
فَضْلِهِۦ
उसके फ़ज़ल में से
وَلَعَلَّكُمْ
और ताकि तुम
تَشْكُرُونَ
तुम शुक्र अदा करो
और उसकी निशानियों में से यह भी है कि शुभ सूचना देनेवाली हवाएँ भेजता है (ताकि उनके द्वारा तुम्हें वर्षा की शुभ सूचना मिले) और ताकि वह तुम्हें अपनी दयालुता का रसास्वादन कराए और ताकि उसके आदेश से नौकाएँ चलें और ताकि तुम उसका अनुग्रह (रोज़ी) तलाश करो और कदाचित तुम कृतज्ञता दिखलाओ
तफ़्सीर:
तथा अल्लाह की शक्ति और एकता का संकेत देने वाली उसकी महान निशानियों में से एक यह है कि वह हवाओं को भेजता है, जो बंदों को बारिश उतरने के निकट होने की शुभ सूचना देती हैं, और ताकि वह तुम्हें (ऐ लोगो) बारिश के बाद होने वाली उर्वरता और समृद्धि के रूप में अपनी दया का स्वाद चखाए, और ताकि उसकी इच्छा से समुद्र में नावें चलें, और ताकि तुम समुद्र में व्यापार करके उसका अनुग्रह तलाश करो और ताकि तुम अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों का शुक्रिया अदा करो, तो वह तुम्हें और अधिक नेमतें प्रदान करे।
आयत 47
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ رُسُلًا إِلَىٰ قَوْمِهِمْ فَجَآءُوهُم بِٱلْبَيِّنَـٰتِ فَٱنتَقَمْنَا مِنَ ٱلَّذِينَ أَجْرَمُوا۟ ۖ وَكَانَ حَقًّا عَلَيْنَا نَصْرُ ٱلْمُؤْمِنِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
مِن
before you
قَبْلِكَ
आपसे पहले
رُسُلًا
कई रसूलों क
إِلَىٰ
to
قَوْمِهِمْ
तरफ़ उनकी क़ौम के
فَجَآءُوهُم
तो वो लाए उनके पास
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ
वाज़ेह निशानियाँ
فَٱنتَقَمْنَا
तो इन्तिक़ाम लिया हमने
مِنَ
from
ٱلَّذِينَ
उनसे जिन्होंने
أَجْرَمُوا۟ ۖ
जुर्म किया
وَكَانَ
और है
حَقًّا
हक़
عَلَيْنَا
हम पर
نَصْرُ
मदद करना
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों की
हम तुमसे पहले कितने ही रसूलों को उनकी क़ौम की ओर भेज चुके है और वे उनके पास खुली निशानियाँ लेकर आए। फिर हम उन लोगों से बदला लेकर रहे जिन्होंने अपराध किया, और ईमानवालों की सहायता करना तो हमपर एक हक़ है
तफ़्सीर:
निश्चित रूप से हमने (ऐ रसूल) आपसे पहले कई रसूल उनकी जातियों की ओर भेजे।चुनाँचे वे उनके पास अपनी सच्चाई को दर्शाने वाले प्रमाणों और तर्कों के साथ आए। परंतु उन्होंने उसको झुठला दिया जो उनके रसूल उनके पाल लेकर आए थे। इसलिए हमने बुराई करने वालों से बदला लिया और उन्हें अपनी यातना से विनष्ट कर दिया, जबकि हमने रसूलों और उनपर विश्वास रखने वालों को विनाश से बचा लिया। मोमिनों को बचाना और उनकी मदद करना, एक अधिकार है जो हमने अपने ऊपर अनिवार्य कर लिया है।
आयत 48
ٱللَّهُ ٱلَّذِى يُرْسِلُ ٱلرِّيَـٰحَ فَتُثِيرُ سَحَابًۭا فَيَبْسُطُهُۥ فِى ٱلسَّمَآءِ كَيْفَ يَشَآءُ وَيَجْعَلُهُۥ كِسَفًۭا فَتَرَى ٱلْوَدْقَ يَخْرُجُ مِنْ خِلَـٰلِهِۦ ۖ فَإِذَآ أَصَابَ بِهِۦ مَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦٓ إِذَا هُمْ يَسْتَبْشِرُونَ
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّذِى
वो है जो
يُرْسِلُ
भेजता है
ٱلرِّيَـٰحَ
हवाओं को
فَتُثِيرُ
तो वो उठाती हैं
سَحَابًۭا
बादल
فَيَبْسُطُهُۥ
फिर वो फैला देता है उसे
فِى
in
ٱلسَّمَآءِ
आसमान में
كَيْفَ
जिस तरह
يَشَآءُ
वो चाहता है
وَيَجْعَلُهُۥ
और वो कर देता है उसे
كِسَفًۭا
टुकड़ियों में
فَتَرَى
तो आप देखते हैं
ٱلْوَدْقَ
बारिश को
يَخْرُجُ
वो निकलती है
مِنْ
from
خِلَـٰلِهِۦ ۖ
उसके अन्दर से
فَإِذَآ
फिर जब
أَصَابَ
वो पहुँचाता है
بِهِۦ
उसे
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
مِنْ
of
عِبَادِهِۦٓ
अपने बन्दों में से
إِذَا
यकायक
هُمْ
वो
يَسْتَبْشِرُونَ
वो ख़ुश हो जाते हैं
अल्लाह ही है जो हवाओं को भेजता है। फिर वे बादलों को उठाती हैं; फिर जिस तरह चाहता है उन्हें आकाश में फैला देता है और उन्हें परतों और टुकड़ियों का रूप दे देता है। फिर तुम देखते हो कि उनके बीच से वर्षा की बूँदें टपकी चली आती है। फिर जब वह अपने बन्दों में से जिनपर चाहता है, उसे बरसाता है। तो क्या देखते है कि वे हर्षित हो उठे
तफ़्सीर:
महिमावान अल्लाह ही है, जो हवाओं को चलाता और भेजता है। फिर वे हवाएँ बादलों को उठाती और उन्हें स्थानांतरित करती हैं। फिर अल्लाह बादलों को आसमान में, कम या अधिक जैसे चाहता है, फैला देता है और उन्हें टुकड़े-टुकड़े बना देता है। फिर तुम (ऐ देखने वाले!) उन बादलों के बीच से बारिश को निकलते हुए देखते हो। फिर जब अल्लाह अपने बंदों में से जिसपर चाहता है, वर्षा बरसाता है, तो वे अपने ऊपर अल्लाह की उस बारिश बरसाने की दया से खुश हो जाते हैं, जिसके बाद धरती उनके और उनके जानवरों के लिए आवश्यक चीज़ें उगाती है।
आयत 49
وَإِن كَانُوا۟ مِن قَبْلِ أَن يُنَزَّلَ عَلَيْهِم مِّن قَبْلِهِۦ لَمُبْلِسِينَ
وَإِن
और बेशक
كَانُوا۟
थे वो
مِن
before
قَبْلِ
इससे पहले
أَن
कि
يُنَزَّلَ
वो बरसाई जाए
عَلَيْهِم
उन पर
مِّن
[before it]
قَبْلِهِۦ
इससे पहले ही
لَمُبْلِسِينَ
यक़ीनन मायूस होने वाले
जबकि इससे पूर्व, इससे पहले कि वह उनपर उतरे, वे बिलकुल निराश थे
तफ़्सीर:
जबकि वे अल्लाह के उनपर वर्षा बरसाने से पहले निश्चित रूप से उसके उतरने से निराश हो चुके थे।
आयत 50
فَٱنظُرْ إِلَىٰٓ ءَاثَـٰرِ رَحْمَتِ ٱللَّهِ كَيْفَ يُحْىِ ٱلْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَآ ۚ إِنَّ ذَٰلِكَ لَمُحْىِ ٱلْمَوْتَىٰ ۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ
فَٱنظُرْ
तो देखो
إِلَىٰٓ
at
ءَاثَـٰرِ
तरफ़ आसार के
رَحْمَتِ
(of the) Mercy
ٱللَّهِ
अल्लाह की रहमत के
كَيْفَ
किस तरह
يُحْىِ
वो ज़िन्दा करता है
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
بَعْدَ
बाद
مَوْتِهَآ ۚ
उसकी मौत के
إِنَّ
बेशक
ذَٰلِكَ
वो ही
لَمُحْىِ
अलबत्ता ज़िन्दा करने वाला है
ٱلْمَوْتَىٰ ۖ
मुर्दों को
وَهُوَ
और वो
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌۭ
ख़ूब क़ुदरत रखने वाला है
अतः देखों अल्लाह की दयालुता के चिन्ह! वह किस प्रकार धरती को उसके मृत हो जाने के पश्चात जीवन प्रदान करता है। निश्चय ही वह मुर्दों को जीवत करनेवाला है, और उसे हर चीज़ का सामर्थ्य प्राप्ती है
तफ़्सीर:
अतः (ऐ रसूल) आप उस बारिश के प्रभावों को देखें, जिसे अल्लाह अपने बंदों के लिए दया के रूप में उतारता है कि अल्लाह किस तरह धरती को, उसके सूख जाने के बाद उसपर तरह-तरह के पौधे उगाकर, पुनर्जीवित कर देता है। निःसंदेह जिसने उस सूखी भूमि को पुनर्जीवित कर दिया, निश्चय वही मरे हुए लोगों को जीवित करके उठाने वाला है। और वह सब कुछ करने में सक्षम है, कोई चीज़ उसे विवश नहीं कर सकती।
आज की ज़िंदगी में सबक़
ज़मीन-समुंदर में फसाद फैलने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि इंसान के अपने हाथों की गलतियां फसाद का सबब बनती हैं, इसलिए ज़िम्मेदारी से काम लेना चाहिए।
आयत 51
وَلَئِنْ أَرْسَلْنَا رِيحًۭا فَرَأَوْهُ مُصْفَرًّۭا لَّظَلُّوا۟ مِنۢ بَعْدِهِۦ يَكْفُرُونَ
وَلَئِنْ
और अलबत्ता अगर
أَرْسَلْنَا
भेजें हम
رِيحًۭا
हवा को
فَرَأَوْهُ
फिर वो देखें उस (खेती) को
مُصْفَرًّۭا
ज़र्द पड़ी हुई
لَّظَلُّوا۟
अलबत्ता लगें वो
مِنۢ
after it
بَعْدِهِۦ
बाद इसके
يَكْفُرُونَ
वो नाशुक्री करने
किन्तु यदि हम एक दूसरी हवा भेज दें, जिसके प्रभाव से वे उस (खेती) को पीली पड़ी हुई देखें तो इसके पश्चात वे कुफ़्र करने लग जाएँ
तफ़्सीर:
और अगर हम उनकी फसलों और पौधों पर कोई ऐसी हवा भेज दें, जो उन्हें बर्बाद कर दे, फिर वे अपनी हरी-भरी फसलों को पीली पड़ी हुई देखें, तो वे उन्हें देखने के बाद अल्लाह की पिछली नेमतों की, उनकी बहुतायत के बावजूद, नाशुक्री करने लगेंगे।
आयत 52
فَإِنَّكَ لَا تُسْمِعُ ٱلْمَوْتَىٰ وَلَا تُسْمِعُ ٱلصُّمَّ ٱلدُّعَآءَ إِذَا وَلَّوْا۟ مُدْبِرِينَ
فَإِنَّكَ
पस बेशक आप
لَا
(can) not
تُسْمِعُ
नहीं आप सुना सकते
ٱلْمَوْتَىٰ
मुर्दों को
وَلَا
और ना
تُسْمِعُ
आप सुना सकते हैं
ٱلصُّمَّ
बहरों क
ٱلدُّعَآءَ
पुकार
إِذَا
जब
وَلَّوْا۟
वो मुँह मोड़ जाऐं
مُدْبِرِينَ
पीठ फेरते हुए
अतः तुम मुर्दों को नहीं सुना सकते और न बहरों को अपनी पुकार सुना सकते हो, जबकि वे पीठ फेरे चले जो रहे हों
तफ़्सीर:
जिस तरह आप मरे हुए लोगों को नहीं सुना सकते और न ही बहरों को सुना सकते हैं, जबकि वे आपसे यह सुनिश्चित करने के लिए दूर चले गए हैं कि उन्हें सुनाई न दे, तो उसी तरह आप उन लोगों का मार्गदर्शन नहीं कर सकते, जो मुँह फेरने और लाभ न उठाने के कारण, इन लोगों के समान हैं।
आयत 53
وَمَآ أَنتَ بِهَـٰدِ ٱلْعُمْىِ عَن ضَلَـٰلَتِهِمْ ۖ إِن تُسْمِعُ إِلَّا مَن يُؤْمِنُ بِـَٔايَـٰتِنَا فَهُم مُّسْلِمُونَ
وَمَآ
और नहीं
أَنتَ
आप
بِهَـٰدِ
हिदायत देने वाले
ٱلْعُمْىِ
अँधों को
عَن
from
ضَلَـٰلَتِهِمْ ۖ
उनकी गुमराही से
إِن
नहीं
تُسْمِعُ
आप सुन सकते हैं
إِلَّا
मगर
مَن
उसे जो
يُؤْمِنُ
ईमान रखता हो
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात पर
فَهُم
फिर वो
مُّسْلِمُونَ
फ़रमाबरदार हों
और न तुम अंधों को उनकी गुमराही से फेरकर मार्ग पर ला सकते हो। तुम तो केवल उन्हीं को सुना सकते हो जो हमारी आयतों पर ईमान लाएँ। तो वही आज्ञाकारी हैं
तफ़्सीर:
आप सीधे रास्ते से भटके हुए को सत्य के मार्ग पर चलने की तौफ़ीक़ (सामर्थ्य) नहीं दे सकते। आप लाभ उठाए जाने के तौर पर केवल उसी को सुना सकते हैं, जो हमारी आयतों पर ईमान रखता है; क्योंकि वही आपकी बातों से लाभान्वित होता है। तो वही हमारे आदेश का पालन करने वाले और उसके अधीन हैं।
आयत 54
۞ ٱللَّهُ ٱلَّذِى خَلَقَكُم مِّن ضَعْفٍۢ ثُمَّ جَعَلَ مِنۢ بَعْدِ ضَعْفٍۢ قُوَّةًۭ ثُمَّ جَعَلَ مِنۢ بَعْدِ قُوَّةٍۢ ضَعْفًۭا وَشَيْبَةًۭ ۚ يَخْلُقُ مَا يَشَآءُ ۖ وَهُوَ ٱلْعَلِيمُ ٱلْقَدِيرُ
۞ ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّذِى
वो है जिसने
خَلَقَكُم
पैदा किया तुम्हें
مِّن
from
ضَعْفٍۢ
कमज़ोरी से
ثُمَّ
फिर
جَعَلَ
उसने बनाई
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद
ضَعْفٍۢ
कमज़ोरी के
قُوَّةًۭ
क़ुव्वत
ثُمَّ
फिर
جَعَلَ
उसने बनाई
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद
قُوَّةٍۢ
क़ुव्वत के
ضَعْفًۭا
कमज़ोरी
وَشَيْبَةًۭ ۚ
और बुढ़ापा
يَخْلُقُ
वो पैदा करता है
مَا
जो
يَشَآءُ ۖ
वो चाहता है
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब जानने वाला
ٱلْقَدِيرُ
बहुत क़ुदरत रखने वाला
अल्लाह ही है जिसनें तुम्हें निर्बल पैदा किया, फिर निर्बलता के पश्चात शक्ति प्रदान की; फिर शक्ति के पश्चात निर्बलता औऱ बुढापा दिया। वह जो कुछ चाहता है पैदा करता है। वह जाननेवाला, सामर्थ्यवान है
तफ़्सीर:
अल्लाह वह है, जिसने (ऐ लोगो!) तुम्हें एक तुच्छ पानी (नुत्फ़े) से पैदा किया। फिर उसने तुम्हारी बचपन की कमज़ोरी के बाद जवानी की शक्ति बनाई, फिर जवानी की शक्ति के बाद पुढ़ापे की कमज़ोरी बनाई। अल्लाह जो भी कमज़ोरी और शक्ति चाहता है, पैदा करता है। और वह हर चीज़ को जानता है, उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है। वह सर्वशक्तिमान है, जिसे कोई चीज़ विवश नहीं कर सकती।
आयत 55
وَيَوْمَ تَقُومُ ٱلسَّاعَةُ يُقْسِمُ ٱلْمُجْرِمُونَ مَا لَبِثُوا۟ غَيْرَ سَاعَةٍۢ ۚ كَذَٰلِكَ كَانُوا۟ يُؤْفَكُونَ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
تَقُومُ
क़ायम होगी
ٱلسَّاعَةُ
क़यामत
يُقْسِمُ
क़समें खाऐंगे
ٱلْمُجْرِمُونَ
मुजरिम
مَا
नहीं
لَبِثُوا۟
वो ठहरे
غَيْرَ
सिवाए
سَاعَةٍۢ ۚ
एक घड़ी के
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
كَانُوا۟
थे वो
يُؤْفَكُونَ
वो फेरे जाते
जिस दिन वह घड़ी आ खड़ी होगी अपराधी क़सम खाएँगे कि वे घड़ी भर से अधिक नहीं ठहरें। इसी प्रकार वे उलटे फिरे चले जाते थे
तफ़्सीर:
क़ियामत के दिन अपराधी कसमें खाकर कहेंगे कि वे अपनी कब्रों में एक घड़ी से अधिक नहीं ठहरे। जिस तरह वे यह जानने से विचलित कर दिए गए कि वे अपनी क़ब्रों में कितना ठहरे, उसी तरह वे दुनिया में सत्य से फेर दिए जाते थे।
आयत 56
وَقَالَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْعِلْمَ وَٱلْإِيمَـٰنَ لَقَدْ لَبِثْتُمْ فِى كِتَـٰبِ ٱللَّهِ إِلَىٰ يَوْمِ ٱلْبَعْثِ ۖ فَهَـٰذَا يَوْمُ ٱلْبَعْثِ وَلَـٰكِنَّكُمْ كُنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
وَقَالَ
और कहेंगे
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
أُوتُوا۟
दिए गए
ٱلْعِلْمَ
इल्म
وَٱلْإِيمَـٰنَ
और ईमान
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
لَبِثْتُمْ
ठहरे रहे तुम
فِى
by
كِتَـٰبِ
(the) Decree
ٱللَّهِ
अल्लाह की किताब में
إِلَىٰ
until
يَوْمِ
(the) Day
ٱلْبَعْثِ ۖ
दोबारा उठने के दिन तक
فَهَـٰذَا
तो ये है
يَوْمُ
दिन
ٱلْبَعْثِ
दोबारा उठने का
وَلَـٰكِنَّكُمْ
और लेकिन तुम
كُنتُمْ
थे तुम
لَا
not
تَعْلَمُونَ
ना तुम जानते
किन्तु जिन लोगों को ज्ञान और ईमान प्रदान हुआ, वे कहते, "अल्लाह के लेख में तो तुम जीवित होकर उठने के दिन ठहरे रहे हो। तो यही जीवित हो उठाने का दिन है। किन्तु तुम जानते न थे।"
तफ़्सीर:
जिन लोगों को अल्लाह ने ज्ञान और ईमान दिया जैसे अंबिया और फ़रिश्ते, वे कहेंगे : अल्लाह ने अपने पूर्व ज्ञान में जो लिखा था, उसके अनुसार तुम अपने सृजन के दिन से लेकर अपने पुनर्जीवन के इस दिन तक ठहरे हो, जिसे तुमने अस्वीकार कर दिया था। तो यह लोगों के अपनी कब्रों से उठाए जाने का दिन है। लेकिन तुम नहीं जानते थे कि दोबारा जीवित होकर उठना एक वास्तविकता है, इसलिए तुमने उसपर विश्वास नहीं किया।
आयत 57
فَيَوْمَئِذٍۢ لَّا يَنفَعُ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ مَعْذِرَتُهُمْ وَلَا هُمْ يُسْتَعْتَبُونَ
فَيَوْمَئِذٍۢ
तो उस दिन
لَّا
not
يَنفَعُ
ना नफ़ा देगी
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
مَعْذِرَتُهُمْ
मअज़रत उनकी
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يُسْتَعْتَبُونَ
वो तौबा तलब किए जाऐंगे
अतः उस दिन ज़ुल्म करनेवालों को उनका कोई उज़्र (सफाई पेश करना) काम न आएगा और न उनसे यह चाहा जाएगा कि वे किसी यत्न से (अल्लाह के) प्रकोप को टाल सकें
तफ़्सीर:
जिस दिन अल्लाह प्राणियों को हिसाब और बदला देने के लिए उठाएगा, उस दिन ज़ालिमों को उनके बनाए गए बहानों से लाभ नहीं होगा और न ही उनसे तौबा और अल्लाह की ओर एकाग्रता के द्वारा अल्लाह को प्रसन्न करने के लिए कहा जाएगा। क्योंकि इसका समय बीत चुका होगा।
आयत 58
وَلَقَدْ ضَرَبْنَا لِلنَّاسِ فِى هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانِ مِن كُلِّ مَثَلٍۢ ۚ وَلَئِن جِئْتَهُم بِـَٔايَةٍۢ لَّيَقُولَنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ إِنْ أَنتُمْ إِلَّا مُبْطِلُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
ضَرَبْنَا
बयान की हमने
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
فِى
in
هَـٰذَا
this
ٱلْقُرْءَانِ
इल क़ुरआन में
مِن
of
كُلِّ
हर तरह की
مَثَلٍۢ ۚ
मिसाल
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
جِئْتَهُم
लाऐं आप उनके पास
بِـَٔايَةٍۢ
कोई निशानी
لَّيَقُولَنَّ
अलबत्ता ज़रूर कहेंगे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
إِنْ
नहीं
أَنتُمْ
हो तुम
إِلَّا
मगर
مُبْطِلُونَ
बातिल परस्त
हमने इस क़ुरआन में लोगों के लिए प्रत्येक मिसाल पेश कर दी है। यदि तुम कोई भी निशानी उनके पास ले आओ, जिन लोगों ने इनकार किया है, वे तो यही कहेंगे, "तुम तो बस झूठ घड़ते हो।"
तफ़्सीर:
हमने लोगों के लिए (उनका ध्यान रखते हुए) इस क़ुरआन में हर तरह के उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। ताकि उनके लिए असत्य से सत्य स्पष्ट हो जाए। और (ऐ रसूल) अगर आप उनके पास अपने सच्चे रसूल होने का कोई प्रमाण भी लेकर आएँ, तो अल्लाह का इनकार करने वाले अवश्य कहेंगे : तुम जो कुछ लेकर आए हो, उसमें तुम झूठे हो।
आयत 59
كَذَٰلِكَ يَطْبَعُ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِ ٱلَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يَطْبَعُ
मोहर लगा देता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَىٰ
[on]
قُلُوبِ
दिलों पर
ٱلَّذِينَ
उन लोगों के जो
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
इस प्रकार अल्लाह उन लोगों के दिलों पर ठप्पा लगा देता है जो अज्ञानी है
तफ़्सीर:
जिस तरह इन लोगों के दिलों पर मुहर लगा दिया है, जिनके पास यदि आप कोई निशानी लाएँ, तो वे उसपर विश्वास नहीं करते हैं, उसी तरह अल्लाह उन सभी लोगों के दिलों पर मुहर लगा देता है, जो यह नहीं जानते कि आप जो कुछ लेकर आए हैं, वह सत्य है।
आयत 60
فَٱصْبِرْ إِنَّ وَعْدَ ٱللَّهِ حَقٌّۭ ۖ وَلَا يَسْتَخِفَّنَّكَ ٱلَّذِينَ لَا يُوقِنُونَ
فَٱصْبِرْ
पस सब्र कीजिए
إِنَّ
बेशक
وَعْدَ
वादा
ٱللَّهِ
अल्लाह का
حَقٌّۭ ۖ
सच्चा है
وَلَا
And (let) not
يَسْتَخِفَّنَّكَ
और हरगिज़ ना हल्का पाऐं आपको
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
لَا
(are) not
يُوقِنُونَ
नहीं वो यक़ीन रखते
अतः धैर्य से काम लो निश्चय ही अल्लाह का वादा सच्चा है और जिन्हें विश्वास नहीं, वे तुम्हें कदापि हल्का न पाएँ
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप अपनी जाति के आपको झुठलाने पर सब्र से काम लें। निश्चित रूप से अल्लाह ने आपसे जो सहायता और प्रभुत्व प्रदान करने का वादा किया है, वह सच्चा है, उसमें कोई संदेह नहीं है। और वे लोग जो दोबारा जीवित कर उठाए जाने पर विश्वास नहीं रखते हैं, आपको जल्दी करने और सब्र छोड़ने पर न उभारें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सब्र और अल्लाह के वादे पर यकीन रखने की ताकीद के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि यकीन न रखने वालों की बातों से मुतास्सिर होने की बजाय सब्र के साथ अल्लाह के वादे पर भरोसा रखना चाहिए।
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