सूरह अस-सजदा سورة السجدة
मक्की 30 आयतें
नाम का मतलब
सजदा (सूरह में सजदे की आयत की वजह से)
पृष्ठभूमि
सूरह अस-सजदा में इंसान की तख्लीक, कुरआन की सच्चाई और नेक-बद लोगों के फर्क का ज़िक्र है। इसमें एक सजदे की आयत है जो तिलावत के दौरान सजदा करने की ताकीद करती है।
फ़ज़ीलत / सार
कहा जाता है कि नबी ﷺ जुमे की फज्र की नमाज़ में यह सूरह पढ़ते थे, इसकी तिलावत में खास बरकत मानी जाती है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ الٓمٓ
الٓمٓ
ا ل م
अलिफ़॰ लाम॰ मीम॰
तफ़्सीर:
(अलिफ़, लाम, मीम) सूरतुल-बक़रा की शुरुआत में इस प्रकार के अक्षरों के बारे में बात गुज़र चुकी है।
आयत 2
تَنزِيلُ ٱلْكِتَـٰبِ لَا رَيْبَ فِيهِ مِن رَّبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
تَنزِيلُ
नाज़िल करना है
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब का
لَا
(there is) no
رَيْبَ
नहीं कोई शक
فِيهِ
इसमें
مِن
from
رَّبِّ
रब की तरफ़ से है
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों के
इस किताब का अवतरण - इसमें सन्देह नहीं - सारे संसार के रब की ओर से है
तफ़्सीर:
यह क़ुरआन, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लेकर आए हैं, आपपर सर्व संसार के पालनहार की ओर से उतारा गया है, इसमें कोई संदेह नहीं है।
आयत 3
أَمْ يَقُولُونَ ٱفْتَرَىٰهُ ۚ بَلْ هُوَ ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّكَ لِتُنذِرَ قَوْمًۭا مَّآ أَتَىٰهُم مِّن نَّذِيرٍۢ مِّن قَبْلِكَ لَعَلَّهُمْ يَهْتَدُونَ
أَمْ
क्या
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
ٱفْتَرَىٰهُ ۚ
उसने घड़ लिया उसे
بَلْ
बल्कि
هُوَ
वो
ٱلْحَقُّ
हक़ है
مِن
from
رَّبِّكَ
आपके रब की तरफ़ से
لِتُنذِرَ
ताकि आप डराऐं
قَوْمًۭا
उस क़ौम को
مَّآ
नहीं
أَتَىٰهُم
आया उनके पास
مِّن
any
نَّذِيرٍۢ
कोई डराने वाला
مِّن
before you
قَبْلِكَ
आप से पहले
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَهْتَدُونَ
वो हिदायत पा जाऐं
(क्या वे इसपर विश्वास नहीं रखते) या वे कहते है कि "इस व्यक्ति ने इसे स्वयं ही घड़ लिया है?" नहीं, बल्कि वह सत्य है तेरे रब की ओर से, ताकि तू उन लोगों को सावधान कर दे जिनके पास तुझसे पहले कोई सावधान करनेवाला नहीं आया। कदाचित वे मार्ग पाएँ
तफ़्सीर:
ये काफ़िर लोग कहते हैं : मुहम्मद ने इसे अपने पालनहार पर गढ़ लिया है। मामला ऐसा नहीं है जैसा उन्होंने कहा है। बल्कि वह सत्य है, जिसमें कोई संदेह नहीं है, वह (ऐ रसूल) आपके ऊपर आपके पालनहार की ओर से उतारा गया है, ताकि आप उन लोगों को डराएँ, जिनके पास आपसे पहले कोई रसूल नहीं आया, जो उन्हें अल्लाह की यातना से डराता। ताकि वे सत्य के मार्ग पर जाएँ, और उसका पालन करें और उसके अनुसार कार्य करें।
आयत 4
ٱللَّهُ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا فِى سِتَّةِ أَيَّامٍۢ ثُمَّ ٱسْتَوَىٰ عَلَى ٱلْعَرْشِ ۖ مَا لَكُم مِّن دُونِهِۦ مِن وَلِىٍّۢ وَلَا شَفِيعٍ ۚ أَفَلَا تَتَذَكَّرُونَ
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّذِى
वो जिसने
خَلَقَ
पैदा किया
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
وَمَا
और जो कुछ
بَيْنَهُمَا
दर्मियान है इन दोनों के
فِى
in
سِتَّةِ
six
أَيَّامٍۢ
छ: दिनों में
ثُمَّ
फिर
ٱسْتَوَىٰ
वो बुलन्द हुआ
عَلَى
on
ٱلْعَرْشِ ۖ
अर्श पर
مَا
नहीं
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّن
besides Him
دُونِهِۦ
उसके सिवा
مِن
any
وَلِىٍّۢ
कोई दोस्त
وَلَا
और ना
شَفِيعٍ ۚ
कोई सिफ़ारिशी
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
تَتَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ते
अल्लाह ही है जिसने आकाशों और धरती को और जो कुछ दोनों के बीच है छह दिनों में पैदा किया। फिर सिंहासन पर विराजमान हुआ। उससे हटकर न तो तुम्हारा कोई संरक्षक मित्र है और न उसके मुक़ाबले में कोई सिफ़ारिस करनेवाला। फिर क्या तुम होश में न आओगे?
तफ़्सीर:
अल्लाह वह है, जिसने आकाशों की रचना, धरती की रचना और उन दोनों के बीच की सभी चीज़ों की रचना छः दिनों में की। जबकि वह पलक झपकने से कम समय में भी उन्हें पैदा करने में सक्षम है। फिर वह अपनी महिमा के योग्य अर्श (सिंहासन) पर बुलंद हुआ। (ऐ लोगो!) उसके सिवा तुम्हारा कोई संरक्षक नहीं है, जो तुम्हारे मामले का प्रभार ले, और न कोई सिफ़ारिशी है, जो तुम्हारे पालनहार के पास तुम्हारे लिए सिफ़ारिश करे। तो क्या तुम सोच-विचार नहीं करते, और उस अल्लाह की इबादत करते, जिसने तुम्हें पैदा किया और उसके साथ उसके अलावा की इबादत न करते?!
आयत 5
يُدَبِّرُ ٱلْأَمْرَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ إِلَى ٱلْأَرْضِ ثُمَّ يَعْرُجُ إِلَيْهِ فِى يَوْمٍۢ كَانَ مِقْدَارُهُۥٓ أَلْفَ سَنَةٍۢ مِّمَّا تَعُدُّونَ
يُدَبِّرُ
वो तदबीर करता है
ٱلْأَمْرَ
हर मामले की
مِنَ
of
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
إِلَى
to
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन तक
ثُمَّ
फिर
يَعْرُجُ
वो चढ़ता है
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
فِى
in
يَوْمٍۢ
एक दिन में
كَانَ
है
مِقْدَارُهُۥٓ
हिसाब/अंदाज़ा उसका
أَلْفَ
हज़ार
سَنَةٍۢ
साल
مِّمَّا
उसमें से जो
تَعُدُّونَ
तुम शुमार करते हो
वह कार्य की व्यवस्था करता है आकाश से धरती तक - फिर सारे मामले उसी की तरफ़ लौटते है - एक दिन में, जिसकी माप तुम्हारी गणना के अनुसार एक हज़ार वर्ष है
तफ़्सीर:
सर्वशक्तिमान अल्लाह आकाशों और धरती के सभी प्राणियों के मामले का प्रबंध करता है, फिर वह मामला उसकी ओर एक ऐसे दिन में ऊपर जाता है, जो दुनिया के तुम्हारे हिसाब के अनुसार एक हज़ार दिन के बराबर है।
आयत 6
ذَٰلِكَ عَـٰلِمُ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَـٰدَةِ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ
ذَٰلِكَ
ये है
عَـٰلِمُ
जानने वाला
ٱلْغَيْبِ
ग़ैब
وَٱلشَّهَـٰدَةِ
और हाज़िर का
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला
वही है परोक्ष और प्रत्यक्ष का जाननेवाला अत्यन्त प्रभुत्वशाली, दयावान है
तफ़्सीर:
वह (अल्लाह) जो इन सब का प्रबंधन करता है, वही जानने वाला है जो कुछ अनुपस्थित है और जो कुछ मौजूद है। आकाशों और धरती की कोई चीज़ उससे छिपी नहीं है। (वह) प्रभुत्वशाली है, जिसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता, जो अपने दुश्मनों से बदला लेता है, (और) अपने मोमिन बंदों पर दया करने वाला है।
आयत 7
ٱلَّذِىٓ أَحْسَنَ كُلَّ شَىْءٍ خَلَقَهُۥ ۖ وَبَدَأَ خَلْقَ ٱلْإِنسَـٰنِ مِن طِينٍۢ
ٱلَّذِىٓ
वो जिसने
أَحْسَنَ
अच्छा बनाया
كُلَّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ को
خَلَقَهُۥ ۖ
उसने पैदा किया जिसे
وَبَدَأَ
और उसने इब्तिदा की
خَلْقَ
(the) creation
ٱلْإِنسَـٰنِ
इन्सान की तख़लीक़ की
مِن
from
طِينٍۢ
मिट्टी से
जिसने हरेक चीज़, जो बनाई ख़ूब ही बनाई और उसने मनुष्य की संरचना का आरम्भ गारे से किया
तफ़्सीर:
जिसने अपनी पैदा की हुई हर चीज़ को अच्छा बनाया और किसी पूर्व उदाहरण के बिना आदम की रचना की शुरुआत मिट्टी से की।
आयत 8
ثُمَّ جَعَلَ نَسْلَهُۥ مِن سُلَـٰلَةٍۢ مِّن مَّآءٍۢ مَّهِينٍۢ
ثُمَّ
फिर
جَعَلَ
उसने बनाई
نَسْلَهُۥ
नस्ल उसकी
مِن
from
سُلَـٰلَةٍۢ
ख़ुलासे से
مِّن
of
مَّآءٍۢ
पानी की
مَّهِينٍۢ
हक़ीर
फिर उसकी सन्तति एक तुच्छ पानी के सत से चलाई
तफ़्सीर:
फिर उसके बाद उसकी संतान को उस पानी से पैदा किया, जो उसके शरीर से निकला, जिससे वीर्य निकला।
आयत 9
ثُمَّ سَوَّىٰهُ وَنَفَخَ فِيهِ مِن رُّوحِهِۦ ۖ وَجَعَلَ لَكُمُ ٱلسَّمْعَ وَٱلْأَبْصَـٰرَ وَٱلْأَفْـِٔدَةَ ۚ قَلِيلًۭا مَّا تَشْكُرُونَ
ثُمَّ
फिर
سَوَّىٰهُ
उसने दुरुस्त किया उसे
وَنَفَخَ
और उसने फूँक दिया
فِيهِ
उसमें
مِن
from
رُّوحِهِۦ ۖ
अपनी रूह से
وَجَعَلَ
और उसने बनाए
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلسَّمْعَ
कान
وَٱلْأَبْصَـٰرَ
और आँखें
وَٱلْأَفْـِٔدَةَ ۚ
और दिल
قَلِيلًۭا
little
مَّا
कितना कम
تَشْكُرُونَ
तुम शुक्र अदा करते हो
फिर उसे ठीक-ठीक किया और उसमें अपनी रूह (आत्मा) फूँकी। और तुम्हें कान और आँखें और दिल दिए। तुम आभारी थोड़े ही होते हो
तफ़्सीर:
फिर ठीक-ठाक करके इनसान की रचना पूरी की और प्राण फूँकने के कार्य पर नियुक्त फ़रिश्ते को आदेश देकर उसके अंदर अपना प्राण फूँक दिया। और उसने (ऐ लोगो) तुम्हें सुनने के लिए कान दिए, और देखने के लिए आँखें दीं, और समझने के लिए दिल दिए। तुम इन नेमतों का बहुत ही कम शुक्रिया अदा करते हो, जो अल्लाह ने तुम्हें दी हैं।
आयत 10
وَقَالُوٓا۟ أَءِذَا ضَلَلْنَا فِى ٱلْأَرْضِ أَءِنَّا لَفِى خَلْقٍۢ جَدِيدٍۭ ۚ بَلْ هُم بِلِقَآءِ رَبِّهِمْ كَـٰفِرُونَ
وَقَالُوٓا۟
और उन्होंने कहा
أَءِذَا
क्या जब
ضَلَلْنَا
गुम हो जाऐंगे हम
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
أَءِنَّا
क्या बेशक हम
لَفِى
certainly be in
خَلْقٍۢ
अलबत्ता पैदाइश में (होंगे)
جَدِيدٍۭ ۚ
नई
بَلْ
बल्कि
هُم
वो
بِلِقَآءِ
मुलाक़ात से
رَبِّهِمْ
अपने रब की
كَـٰفِرُونَ
इन्कारी हैं
और उन्होंने कहा, "जब हम धरती में रल-मिल जाएँगे तो फिर क्या हम वास्तब में नवीन काय में जीवित होंगे?" नहीं, बल्कि उन्हें अपने रब से मिलने का इनकार है
तफ़्सीर:
और मरणोपरांत दोबारा जीवित होकर उठने का इनकार करने वाले बहुदेववादियों ने कहा : जब हम मर जाएँगे और धरती में गायब हो जाएँगे, और हमारे शरीर मिट्टी हो जाएँगे, तो क्या हम नए सिरे से जीवित करके उठाए जाएँगे?! यह बात समझ से परे है। बल्कि वास्तव में वे मरणोपरांत दोबारा जीवित होकर उठने का इनकार करने वाले हैं और इस पर विश्वास नहीं करते।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन की सच्चाई और इंसान की तख्लीक का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कुरआन पर शक करने की बजाय गौर करना चाहिए, यह हक से पूरा भरा हुआ है।
आयत 11
۞ قُلْ يَتَوَفَّىٰكُم مَّلَكُ ٱلْمَوْتِ ٱلَّذِى وُكِّلَ بِكُمْ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّكُمْ تُرْجَعُونَ
۞ قُلْ
कह दीजिए
يَتَوَفَّىٰكُم
फ़ौत करेगा तुम्हें
مَّلَكُ
फ़रिश्ता
ٱلْمَوْتِ
मौत का
ٱلَّذِى
वो जो
وُكِّلَ
मुक़र्रर किया गया
بِكُمْ
तुम पर
ثُمَّ
फिर
إِلَىٰ
to
رَبِّكُمْ
तरफ़ अपने रब के
تُرْجَعُونَ
तुम लौटाए जाओगे
कहो, "मृत्यु का फ़रिश्ता जो तुमपर नियुक्त है, वह तुम्हें पूर्ण रूप से अपने क़ब्जे में ले लेता है। फिर तुम अपने रब की ओर वापस होंगे।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) मरणोपरांत दोबारा जीवित होकर उठने का इनकार करने वाले इन बहुदेववादियों से कह दें : तुम्हें मौत का फरिश्ता मौत देगा, जिसे अल्लाह ने तुम्हारे प्राण निकालने के लिए अधिकृत किया है। फिर क़ियामत के दिन तुम अकेले हमारे ही पास हिसाब और बदला के लिए लौटाए जाओगे।
आयत 12
وَلَوْ تَرَىٰٓ إِذِ ٱلْمُجْرِمُونَ نَاكِسُوا۟ رُءُوسِهِمْ عِندَ رَبِّهِمْ رَبَّنَآ أَبْصَرْنَا وَسَمِعْنَا فَٱرْجِعْنَا نَعْمَلْ صَـٰلِحًا إِنَّا مُوقِنُونَ
وَلَوْ
और काश
تَرَىٰٓ
आप देखें
إِذِ
जब
ٱلْمُجْرِمُونَ
मुजरिम
نَاكِسُوا۟
झुकाए हुए होंगे
رُءُوسِهِمْ
अपने सरों को
عِندَ
before
رَبِّهِمْ
अपने रब के पास (कहेंगे)
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
أَبْصَرْنَا
देख लिया हमनें
وَسَمِعْنَا
और सुन लिया हमनें
فَٱرْجِعْنَا
पस लौटा दे हमें
نَعْمَلْ
हम अमल करेंगे
صَـٰلِحًا
नेक
إِنَّا
बेशक हम
مُوقِنُونَ
यक़ीन करने वाले हैं
और यदि कहीं तुम देखते जब वे अपराधी अपने रब के सामने अपने सिर झुकाए होंगे कि "हमारे रब! हमने देख लिया और सुन लिया। अब हमें वापस भेज दे, ताकि हम अच्छे कर्म करें। निस्संदेह अब हमें विश्वास हो गया।"
तफ़्सीर:
क़ियामत के दिन अपराधी अपमानित दिखाई देंगे, मरणोपरांत दोबारा जीवित होने का इनकार करने के कारण अपने सिर झुकाए हुए होंगे और शर्म महसूस करेंगे और कहेंगे : ऐ हमारे पालनहार! जिस पुनर्जीवन को हम झुठलाते थे, उसे हमने देख लिया, और रसूल तेरे पास से जो कुछ लाए थे, उसकी सच्चाई सुन ली। इसलिए अब हमें सांसारिक जीवन में वापस लौटा दे कि हम ऐसे अच्छे कार्य करें, जो तुझे हमसे प्रसन्न कर दें। अब हमें मरणोपरांत पुनर्जीवन और रसूलों की लाई हुई बातों की सच्चाई का विश्वास हो गया। अगर आप अपराधियों को उस स्थिति में देखेंगे, तो आपको एक भयानक मामला (भयावह स्थिति) दिखाई देगा।
आयत 13
وَلَوْ شِئْنَا لَـَٔاتَيْنَا كُلَّ نَفْسٍ هُدَىٰهَا وَلَـٰكِنْ حَقَّ ٱلْقَوْلُ مِنِّى لَأَمْلَأَنَّ جَهَنَّمَ مِنَ ٱلْجِنَّةِ وَٱلنَّاسِ أَجْمَعِينَ
وَلَوْ
और अगर
شِئْنَا
चाहते हम
لَـَٔاتَيْنَا
अलबत्ता दे देते हम
كُلَّ
हर
نَفْسٍ
नफ़्स को
هُدَىٰهَا
हिदायत उसकी
وَلَـٰكِنْ
और लेकिन
حَقَّ
सच होगई
ٱلْقَوْلُ
बात
مِنِّى
मेरी तरफ़ से
لَأَمْلَأَنَّ
अलबत्ता मैं ज़रूर भर दूँगा
جَهَنَّمَ
जहन्नम को
مِنَ
with
ٱلْجِنَّةِ
जिन्नों से
وَٱلنَّاسِ
और इन्सानों से
أَجْمَعِينَ
सब के सब से
यदि हम चाहते तो प्रत्येक व्यक्ति को उसका अपना संमार्ग दिखा देते, तिन्तु मेरी ओर से बात सत्यापित हो चुकी है कि "मैं जहन्नम को जिन्नों और मनुष्यों, सबसे भरकर रहूँगा।"
तफ़्सीर:
और अगर हम हर व्यक्ति को मार्गदर्शन देना चाहते तो निश्चित रूप से हम उसे इसपर आमादा कर देते। लेकिन मेरी ओर से हिकमत और न्याय के तौर पर यह बात अनिवार्य हो चुकी है कि : मैं क़ियामत के दिन जिन्न और मानव जाति में से कुफ़्र की राह पर चलने वालों से जहन्नम को अवश्य भर दूँगा, क्योंकि उन्होंने ईमान और धर्म-परायणनता के रास्ते को छोड़कर कुफ़्र और गुमराही का रास्ता चुन लिया।
आयत 14
فَذُوقُوا۟ بِمَا نَسِيتُمْ لِقَآءَ يَوْمِكُمْ هَـٰذَآ إِنَّا نَسِينَـٰكُمْ ۖ وَذُوقُوا۟ عَذَابَ ٱلْخُلْدِ بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
فَذُوقُوا۟
तो चखो
بِمَا
बवजह उसके जो
نَسِيتُمْ
भूल गए तुम
لِقَآءَ
मुलाक़ात को
يَوْمِكُمْ
(of) this Day of yours
هَـٰذَآ
अपने इस दिन की
إِنَّا
बेशक हमने
نَسِينَـٰكُمْ ۖ
भुला दिया हमने तुम्हें
وَذُوقُوا۟
और चखो
عَذَابَ
अज़ाब
ٱلْخُلْدِ
हमेशगी का
بِمَا
बवजह उसके जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते
अतः अब चखो मज़ा, इसका कि तुमने अपने इस दिन के मिलन को भुलाए रखा। तो हमने भी तुम्हें भुला दिया। शाश्वत यातना का रसास्वादन करो, उसके बदले में जो तुम करते रहे हो
तफ़्सीर:
क़ियामत के दिन उन्हें डाँटते और फटकारते हुए कहा जाएगा : (अब) अपने हिसाब के लिए क़ियामत के दिन अल्लाह से मिलने से सांसारिक जीवन में अपनी लापरवाही के कारण यातना का स्वाद चखो। हमने तुम्हें यातना में छोड़ दिया है, उससे जो तुम पीड़ा झेल रहे हो उसकी हमें कोई परवाह नहीं है। तथा दुनिया में तुम जो पाप किया करते थे, उसके कारण आग की निरंतर यातना चखो, जो कभी समाप्त नहीं होगी।
आयत 15
إِنَّمَا يُؤْمِنُ بِـَٔايَـٰتِنَا ٱلَّذِينَ إِذَا ذُكِّرُوا۟ بِهَا خَرُّوا۟ سُجَّدًۭا وَسَبَّحُوا۟ بِحَمْدِ رَبِّهِمْ وَهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ ۩
إِنَّمَا
बेशक
يُؤْمِنُ
ईमान लाते हैं
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात पर
ٱلَّذِينَ
वो लोग
إِذَا
जब
ذُكِّرُوا۟
वो नसीहत किए जाते हैं
بِهَا
साथ उनके
خَرُّوا۟
वो गिर पड़ते हैं
سُجَّدًۭا
सजदा करते हुए
وَسَبَّحُوا۟
और वो तस्बीह करते हैं
بِحَمْدِ
साथ हम्द के
رَبِّهِمْ
अपने रब की
وَهُمْ
और वो
لَا
are not arrogant
يَسْتَكْبِرُونَ ۩
नहीं वो तकब्बुर करते
हमारी आयतों पर जो बस वही लोग ईमान लाते है, जिन्हें उनके द्वारा जब याद दिलाया जाता है तो सजदे में गिर पड़ते है और अपने रब का गुणगान करते है और घमंड नहीं करते
तफ़्सीर:
हमारे रसूल पर उतारी गई हमारी आयतों पर, वही लोग ईमान लाते हैं, जिन्हें जब उनके द्वारा उपदेश दिया जाता है, तो अल्लाह की प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता का गान करते हुए सजदे में गिर जाते हैं, और वे किसी भी हाल में अल्लाह की इबादत करने या उसके आगे सजदा करने से अभिमान नहीं करते हैं।
आयत 16
تَتَجَافَىٰ جُنُوبُهُمْ عَنِ ٱلْمَضَاجِعِ يَدْعُونَ رَبَّهُمْ خَوْفًۭا وَطَمَعًۭا وَمِمَّا رَزَقْنَـٰهُمْ يُنفِقُونَ
تَتَجَافَىٰ
अलग रहते हैं
جُنُوبُهُمْ
पहलू उनके
عَنِ
from
ٱلْمَضَاجِعِ
बिस्तरों से
يَدْعُونَ
वो पुकारते हैं
رَبَّهُمْ
अपने रब को
خَوْفًۭا
ख़ौफ़
وَطَمَعًۭا
और उम्मीद से
وَمِمَّا
और उसमें से जो
رَزَقْنَـٰهُمْ
रिज़्क़ दिया हमने उन्हें
يُنفِقُونَ
वो ख़र्च करते हैं
उनके पहलू बिस्तरों से अलग रहते है कि वे अपने रब को भय और लालसा के साथ पुकारते है, और जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसमें से ख़र्च करते है
तफ़्सीर:
उनके पहलू उनके उन बिस्तरों से अलग रहते हैं, जहाँ वे सोते समय हुआ करते हैं। वे उन्हें छोड़ देते हैं और अल्लाह की ओर ध्यान केंद्रित कर लेते हैं। वे अल्लाह को अपनी नमाज़ में तथा अन्य हालतों में, उसकी यातना के भय से और उसकी दया के लालच में पुकारते हैं। और हमने उन्हें जो धन दिए हैं, उन्हें अल्लाह के मार्ग में खर्च करते हैं।
आयत 17
فَلَا تَعْلَمُ نَفْسٌۭ مَّآ أُخْفِىَ لَهُم مِّن قُرَّةِ أَعْيُنٍۢ جَزَآءًۢ بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
فَلَا
पस नहीं
تَعْلَمُ
जानता
نَفْسٌۭ
कोई नफ़्स
مَّآ
जो कुछ
أُخْفِىَ
छुपाया गया है
لَهُم
उनके लिए
مِّن
of
قُرَّةِ
ठंडक से
أَعْيُنٍۢ
आँखों की
جَزَآءًۢ
बदला है
بِمَا
उसका जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
फिर कोई प्राणी नहीं जानता आँखों की जो ठंडक उसके लिए छिपा रखी गई है उसके बदले में देने के ध्येय से जो वे करते रहे होंगे
तफ़्सीर:
कोई व्यक्ति यह नहीं जानता कि अल्लाह ने उनके लिए, उन नेक कामों के बदले के रूप में, जो वे दुनिया में किया करते थे, उनकी आँखों की ठंढक के लिए क्या कुछ तैयार कर रखा है। क्योंकि यह इतना बड़ा बदला है कि अल्लाह के सिवा कोई भी उसे अपने ज्ञान के घेरे में नहीं ला सकता।
आयत 18
أَفَمَن كَانَ مُؤْمِنًۭا كَمَن كَانَ فَاسِقًۭا ۚ لَّا يَسْتَوُۥنَ
أَفَمَن
क्या भला वो जो
كَانَ
है
مُؤْمِنًۭا
मोमिन
كَمَن
मानिन्द उसके
كَانَ
हो सकता है
فَاسِقًۭا ۚ
जो फ़ासिक़ है
لَّا
Not
يَسْتَوُۥنَ
नहीं वो बराबर हो सकते
भला जो व्यक्ति ईमानवाला हो वह उस व्यक्ति जैसा हो सकता है जो अवज्ञाकारी हो? वे बराबर नहीं हो सकते
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति अल्लाह पर ईमान रखता है, उसके आदेशों का पालन करता है, उसके निषेधों से बचता है, वह उस व्यक्ति की तरह नहीं है जो उसकी आज्ञाकारिता से बाहर है। अल्लाह के यहाँ बदले में दोनों समूह बराबर नहीं हो सकते।
आयत 19
أَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ فَلَهُمْ جَنَّـٰتُ ٱلْمَأْوَىٰ نُزُلًۢا بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
أَمَّا
रहे
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
فَلَهُمْ
तो उनके लिए
جَنَّـٰتُ
बाग़ात हैं
ٱلْمَأْوَىٰ
रहने के
نُزُلًۢا
महमानी होगी
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
रहे वे लोग जा ईमान लाए और उन्हें अच्छे कर्म किए, उनके लिए जो कर्म वे करते रहे उसके बदले में आतिथ्य स्वरूप रहने के बाग़ है
तफ़्सीर:
जहाँ तक उन लोगों की बात है, जो अल्लाह पर ईमान लाए और अच्छे कार्य किए, तो उनके लिए तैयार किया गया उनका बदला, ऐसे बाग़ हैं, जिसमें वे अल्लाह की ओर से प्राप्त सम्मान के साथ रहेंगे। यह उनके उन नेक कामों का बदला है, जो वे दुनिया में किया करते थे।
आयत 20
وَأَمَّا ٱلَّذِينَ فَسَقُوا۟ فَمَأْوَىٰهُمُ ٱلنَّارُ ۖ كُلَّمَآ أَرَادُوٓا۟ أَن يَخْرُجُوا۟ مِنْهَآ أُعِيدُوا۟ فِيهَا وَقِيلَ لَهُمْ ذُوقُوا۟ عَذَابَ ٱلنَّارِ ٱلَّذِى كُنتُم بِهِۦ تُكَذِّبُونَ
وَأَمَّا
और रहे वो
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
فَسَقُوا۟
नाफ़रमानी की
فَمَأْوَىٰهُمُ
पस ठिकाना उनका
ٱلنَّارُ ۖ
आग है
كُلَّمَآ
जब कभी
أَرَادُوٓا۟
वो इरादा करेंगे
أَن
कि
يَخْرُجُوا۟
वो निकल आऐं
مِنْهَآ
उससे
أُعِيدُوا۟
वो लौटा दिए जाऐंगे
فِيهَا
उसी में
وَقِيلَ
और कह दिया जाएगा
لَهُمْ
उन्हें
ذُوقُوا۟
चखो
عَذَابَ
अज़ाब
ٱلنَّارِ
आग का
ٱلَّذِى
वो जो
كُنتُم
थे तुम
بِهِۦ
जिसे
تُكَذِّبُونَ
तुम झुटलाते
रहे वे लोग जिन्होंने सीमा का उल्लंघन किया, उनका ठिकाना आग है। जब कभी भी वे चाहेंगे कि उससे निकल जाएँ तो उसी में लौटा दिए जाएँगे और उनसे कहा जाएगा, "चखो उस आग की यातना का मज़ा, जिसे तुम झूठ समझते थे।"
तफ़्सीर:
और जहाँ तक उन लोगों की बात है, जो कुफ़्र और गुनाहों में पड़कर अल्लाह के आज्ञापालन से निकल गए, तो उनका ठिकाना, जो क़ियामत के दिन उनके लिए तैयार किया गया है, जहन्नम है, जिसमें वे हमेशा रहेंगे। जब भी वे उससे बाहर निकलना चाहेंगे, उसी में लौटा दिए जाएँगे। और उन्हें फटकारते हुए कहा जाएगा : उस आग की यातना चखो, जिसे तुम दुनिया में झुठलाया करते थे, जब तुम्हारे रसूल तुम्हें उससे डराया करते थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
रात को उठकर इबादत करने वालों की तारीफ का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि रात के सुकून भरे लम्हों में अल्लाह की इबादत करना ईमान की मज़बूती की निशानी है।
आयत 21
وَلَنُذِيقَنَّهُم مِّنَ ٱلْعَذَابِ ٱلْأَدْنَىٰ دُونَ ٱلْعَذَابِ ٱلْأَكْبَرِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
وَلَنُذِيقَنَّهُم
और अलबत्ता हम ज़रूर चखाऐंगे उन्हें
مِّنَ
of
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब में से
ٱلْأَدْنَىٰ
कमतर/हल्का
دُونَ
अलावा
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब
ٱلْأَكْبَرِ
बड़े के
لَعَلَّهُمْ
शायद कि वो
يَرْجِعُونَ
वो लौट आऐं
हम बड़ी यातना से इतर उन्हें छोटी यातना का मज़ा चखाएँगे, कदाचित वे पलट आएँ
तफ़्सीर:
निश्चय हम इन झुठलाने वालों और अपने पालनहार की आज्ञा की अवहेलना करने वालों को, अगर वे तौबा न करें, तो आख़िरत में उनके लिए जो सबसे बड़ी यातना तैयार की गई है, उससे पहले इस दुनिया ही में कठिनाइयों और विपत्तियों का स्वाद अवश्य चखाएँगे, ताकि वे अपने पालनहार के आज्ञापालन की ओर लौट आएँ।
आयत 22
وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن ذُكِّرَ بِـَٔايَـٰتِ رَبِّهِۦ ثُمَّ أَعْرَضَ عَنْهَآ ۚ إِنَّا مِنَ ٱلْمُجْرِمِينَ مُنتَقِمُونَ
وَمَنْ
और कौन
أَظْلَمُ
बड़ा ज़ालिम है
مِمَّن
उससे जो
ذُكِّرَ
नसीहत किया गया
بِـَٔايَـٰتِ
साथ आयात के
رَبِّهِۦ
अपने रब की
ثُمَّ
फिर
أَعْرَضَ
उसने मुँह मोड़ लिया
عَنْهَآ ۚ
उनसे
إِنَّا
बेशक हम
مِنَ
from
ٱلْمُجْرِمِينَ
मुजरिमों से
مُنتَقِمُونَ
इन्तिक़ाम लेने वाले हैं
और उस व्यक्ति से बढकर अत्याचारी कौन होगा जिसे उसके रब की आयतों के द्वारा याद दिलाया जाए,फिर वह उनसे मुँह फेर ले? निश्चय ही हम अपराधियों से बदला लेकर रहेंगे
तफ़्सीर:
और उससे बड़ा अत्याचारी कोई नहीं है, जिसे अल्लाह की आयतों के साथ उपदेश दिया गया, परंतु उसने उनसे उपदेश ग्रहण नहीं किया और उनकी परवाह किए बिना उनसे मुँह मोड़ लिया। निश्चय हम इन अपराधियों से (जो कुफ़्र और पाप करने वाले तथा अल्लाह की आयतों से मुँह फेरने वाले हैं) अनिवार्य रूप से बदला लेने वाले हैं।
आयत 23
وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ فَلَا تَكُن فِى مِرْيَةٍۢ مِّن لِّقَآئِهِۦ ۖ وَجَعَلْنَـٰهُ هُدًۭى لِّبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
ءَاتَيْنَا
दी हमने
مُوسَى
मूसा को
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
فَلَا
पस ना
تَكُن
आप हों
فِى
in
مِرْيَةٍۢ
शक में
مِّن
about
لِّقَآئِهِۦ ۖ
उसकी मुलाक़ात से
وَجَعَلْنَـٰهُ
और बनाया हमने उसे
هُدًۭى
हिदायत
لِّبَنِىٓ
for the Children of Israel
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल के लिए
हमने मूसा को किताब प्रदान की थी - अतः उसके मिलने के प्रति तुम किसी सन्देह में न रहना और हमने इसराईल की सन्तान के लिए उस (किताब) को मार्गदर्शन बनाया था
तफ़्सीर:
और हमने मूसा को तौरात प्रदान की। तो (ऐ रसूल) आप इसरा और मेराज की रात मूसा से मिलने के बारे में किसी संदेह में न रहें। और हमने मूसा पर उतारी गई पुस्तक को बनी इसराईल के लिए गुमराही से मार्गदर्शक बनाया है।
आयत 24
وَجَعَلْنَا مِنْهُمْ أَئِمَّةًۭ يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا لَمَّا صَبَرُوا۟ ۖ وَكَانُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا يُوقِنُونَ
وَجَعَلْنَا
और बनाए हमने
مِنْهُمْ
उनमें
أَئِمَّةًۭ
इमाम
يَهْدُونَ
जो रहनुमाई करते थे
بِأَمْرِنَا
हमारे हुक्म से
لَمَّا
जब
صَبَرُوا۟ ۖ
उन्होंने सब्र किया
وَكَانُوا۟
और थे वो
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात पर
يُوقِنُونَ
वो यक़ीन रखते
और जब वे जमे रहे और उन्हें हमारी आयतों पर विश्वास था, तो हमने उनमें ऐसे नायक बनाए जो हमारे आदेश से मार्ग दिखाते थे
तफ़्सीर:
और हमने इसराईल की संतान में से कुछ अग्रणी (इमाम) बनाए, जिनका लोग सत्य के मामले में अनुसरण करते थे। वे सत्य का रास्ता दिखाते थे; क्योंकि हमने उन्हें ऐसा करने की अनुमति दी और उसके लिए उन्हें सशक्त किया। उन्हें यह स्थान इस कारण मिला कि उन्होंने अल्लाह के आदेशों का पालन करने और उसके निषेधों से बचने, तथा अल्लाह के धर्म की ओर आमंत्रित करने के मार्ग में आने वाली तकलीफ़ पर धैर्य से काम लिया। तथा वे अपने रसूल पर उतरने वाली अल्लाह की आयतों पर दृढ़ता से विश्वास करते थे।
आयत 25
إِنَّ رَبَّكَ هُوَ يَفْصِلُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ فِيمَا كَانُوا۟ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
هُوَ
वो ही
يَفْصِلُ
वो फ़ैसला करेगा
بَيْنَهُمْ
दर्मियान उनके
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
فِيمَا
उसमें जो
كَانُوا۟
थे वो
فِيهِ
जिसमें
يَخْتَلِفُونَ
वो इख़्तिलाफ़ करते
निश्चय ही तेरा रब ही क़ियामत के दिन उनके बीच उन बातों का फ़ैसला करेगा, जिनमें वे मतभेद करते रहे है
तफ़्सीर:
निश्चय (ऐ रसूल) आपका पालनहार ही क़ियामत के दिन उनके बीच उस मामले में फैसला करेगा, जिसमें वे दुनिया में मतभेद किया करते थे। चुनाँचे वह स्पष्ट कर देगा कि कौन सत्यवादी है और कौन असत्यवादी और हर एक को वह बदला देगा जिसका वह हक़दार है।
आयत 26
أَوَلَمْ يَهْدِ لَهُمْ كَمْ أَهْلَكْنَا مِن قَبْلِهِم مِّنَ ٱلْقُرُونِ يَمْشُونَ فِى مَسَـٰكِنِهِمْ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍ ۖ أَفَلَا يَسْمَعُونَ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَهْدِ
रहनुमाई की
لَهُمْ
उनकी कि
كَمْ
कितनी ही
أَهْلَكْنَا
हलाक कीं हमने
مِن
before them
قَبْلِهِم
उनसे पहले
مِّنَ
of
ٱلْقُرُونِ
उम्मतें
يَمْشُونَ
वो चलते फिरते हैं
فِى
in
مَسَـٰكِنِهِمْ ۚ
उनके घरों में
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَـٰتٍ ۖ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
أَفَلَا
क्या भला नहीं
يَسْمَعُونَ
वो सुनते हैं
क्या उनके लिए यह चीज़ भी मार्गदर्शक सिद्ध नहीं हुई कि उनसे पहले कितनी ही नस्लों को हम विनष्ट कर चुके है, जिनके रहने-बसने की जगहों में वे चलते-फिरते है? निस्संदेह इसमें बहुत-सी निशानियाँ है। फिर क्या वे सुनने नहीं?
तफ़्सीर:
क्या ये लोग अंधे हो गए हैं कि उनके लिए यह स्पष्ट नहीं हुआ कि हमने इनसे पहले कितने समुदायों को विनष्ट कर दिया?! चुनाँचे अब ये उनके रहने-सहने के उन स्थानों में चल-फिर रहें हैं, जहाँ वे अपने विनाश से पहले रहते थे।लेकिन इन्होंने उनकी स्थिति से उपदेश नहीं लिया। निश्चित रूप से, उन समुदायों को, उनके कुफ़्र और पापों के कारण जिस विनाश का सामना करना पड़ा, उसमें कई पाठ हैं, जिनसे उन नबियों के सच्चे होने का सबूत मिलता है, जो उनके पास अल्लाह की ओर से आए थे। तो क्या अल्लाह की आयतों का इनकार करने वाले ये लोग स्वीकार करने और उपदेश ग्रहण करने के उद्देश्य से नहीं सुनते?!
आयत 27
أَوَلَمْ يَرَوْا۟ أَنَّا نَسُوقُ ٱلْمَآءَ إِلَى ٱلْأَرْضِ ٱلْجُرُزِ فَنُخْرِجُ بِهِۦ زَرْعًۭا تَأْكُلُ مِنْهُ أَنْعَـٰمُهُمْ وَأَنفُسُهُمْ ۖ أَفَلَا يُبْصِرُونَ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَرَوْا۟
उन्होंने देखा
أَنَّا
बेशक हम
نَسُوقُ
चलाते हैं हम
ٱلْمَآءَ
पानी को
إِلَى
to
ٱلْأَرْضِ
तरफ़ ज़मीन
ٱلْجُرُزِ
बंजर के
فَنُخْرِجُ
फिर हम निकालते हैं
بِهِۦ
साथ उसके
زَرْعًۭا
खेती को
تَأْكُلُ
खाते हैं
مِنْهُ
उससे
أَنْعَـٰمُهُمْ
उनके मवेशी
وَأَنفُسُهُمْ ۖ
और वो ख़ुद भी
أَفَلَا
क्या भला नहीं
يُبْصِرُونَ
वो देखते
क्या उन्होंने देखा नहीं कि हम सूखी पड़ी भूमि की ओर पानी ले जाते है। फिर उससे खेती उगाते है, जिसमें से उनके चौपाए भी खाते है और वे स्वयं भी? तो क्या उन्हें सूझता नहीं?
तफ़्सीर:
क्या मरणोपरांत पुनर्जीवित होने का इनकार करने वाले इन लोगों ने नहीं देखा कि हम बारिश के पानी को शुष्क भूमि में भेजते हैं, जहाँ कोई पौधा नहीं होता है। फिर हम उस पानी से फसलों को उगाते हैं, जिनसे उनके ऊँट, गाय और बकरियाँ खाती हैं और वे खुद भी उनसे खाते हैं?! तो क्या वे इन बातों को नहीं देखते और इस बात का एहसास नहीं करते कि जो हस्ती बंजर भूमि को अंकुरित कर सकती है, वह मरे हुए लोगों को भी पुनर्जीवित करने में सक्षम है?!
आयत 28
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَـٰذَا ٱلْفَتْحُ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
مَتَىٰ
कब होगा
هَـٰذَا
ये
ٱلْفَتْحُ
फ़ैसला
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
वे कहते है कि "यह फ़ैसला कब होगा, यदि तुम सच्चे हो?"
तफ़्सीर:
और मरणोपरांत पुनर्जीवित होने का इनकार करने वाले यातना की जल्दी मचाते हुए कहते हैं : यह निर्णय कब होगा, जिसके बारे में तुम्हारा दावा है कि वह हमारे और तुम्हारे बीच क़ियामत के दिन फैसला कर देगा, फिर हमें आग में जाना पड़ेगा और तुम्हारा ठिकाना जन्नत होगा?!
आयत 29
قُلْ يَوْمَ ٱلْفَتْحِ لَا يَنفَعُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ إِيمَـٰنُهُمْ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ
قُلْ
कह दीजिए
يَوْمَ
दिन
ٱلْفَتْحِ
फ़ैसले के
لَا
not
يَنفَعُ
ना नफ़ा देगा
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
إِيمَـٰنُهُمْ
ईमान लाना उनका
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يُنظَرُونَ
वो मोहलत दिए जाऐंगे
कह दो कि "फ़ैसले के दिन इनकार करनेवालों का ईमान उनके लिए कुछ लाभदायक न होगा और न उन्हें ठील ही दी जाएगी।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) उनसे कह दें : यह वादा, क़ियामत का दिन है। वही बंदों के बीच निर्णय का दिन है, जब इस दुनिया में अल्लाह का इनकार करने वालों को, क़ियामत के दिन को अपनी आँखों से देख लेने के बाद, उनका विश्वास करना कोई लाभ नहीं देगा। और न ही उन्हें मोहलत दी जाएगी कि वे अपने पालनहार से तौबा कर लें ओर उसकी ओर लौट आएँ।
आयत 30
فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ وَٱنتَظِرْ إِنَّهُم مُّنتَظِرُونَ
فَأَعْرِضْ
पस ऐराज़ कीजिए
عَنْهُمْ
उनसे
وَٱنتَظِرْ
और इन्तिज़ार कीजिए
إِنَّهُم
बेशक वो (भी)
مُّنتَظِرُونَ
इन्तिज़ार करने वाले हैं
अच्छा, उन्हें उनके हाल पर छोड़ दो और प्रतीक्षा करो। वे भी परीक्षारत है
तफ़्सीर:
तो (ऐ रसूल) आप इनके अपनी पथभ्रष्टता में बने रहने के बाद इनसे मुँह फेर लें और उनके साथ जो होता है उसकी प्रतीक्षा करें। ये लोग भी उस यातना की प्रतीक्षा कर रहे हैं जिसका आप उनसे वादा कर रहे हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मुत्तकीन और नाफरमानों के फर्क और कयामत के यकीन के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि नेक और बद दोनों को बराबर नहीं समझा जा सकता, हर एक का अंजाम उसके अमल के मुताबिक होगा।
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