नाम का मतलब
गिरोह / जत्थे (ग़ज़वा-ए-अहज़ाब यानी खंदक की जंग में मुत्तहिद दुश्मन गिरोहों की तरफ इशारा)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-अहज़ाब ग़ज़वा-ए-खंदक के दौर में नाज़िल हुई, जब कई कबीले मुत्तहिद होकर मदीने पर हमलावर हुए थे। इसमें नबी ﷺ के घरवालों के हुकूक, पर्दे के अहकाम और मुनाफिकों के रवैये का ज़िक्र है।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह मुश्किल हालात में सब्र, इत्तेहाद और अल्लाह पर भरोसे की तालीम के लिए खास मानी जाती है, क्योंकि खंदक की जंग एक बड़ा इम्तिहान थी।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ ٱتَّقِ ٱللَّهَ وَلَا تُطِعِ ٱلْكَـٰفِرِينَ وَٱلْمُنَـٰفِقِينَ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلِيمًا حَكِيمًۭا
يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلنَّبِىُّ
नबी
ٱتَّقِ
डरिए
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَلَا
और ना
تُطِعِ
आप इताअत कीजिए
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों
وَٱلْمُنَـٰفِقِينَ ۗ
मुनाफ़िक़ों की
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
عَلِيمًا
बहुत इल्म वाला
حَكِيمًۭا
ख़ूब हिकमत वाला
ऐ नबी! अल्लाह का डर रखना और इनकार करनेवालों और कपटाचारियों का कहना न मानना। वास्तब में अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
ऐ नबी! आप और आपके साथी, अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से दूर रहकर अल्लाह के तक़्वा पर जमे रहें और अकेले उसी से डरें, तथा काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों का उनकी इच्छाओं में पालन न करें। निश्चित रूप से अल्लाह काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों की चालों की ख़बर रखने वाला है, अपनी रचना और प्रबंधन में हिकमत वाला है।
आयत 2
وَٱتَّبِعْ مَا يُوحَىٰٓ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًۭا
وَٱتَّبِعْ
और पैरवी कीजिए
مَا
उसकी जो
يُوحَىٰٓ
वही की जाती
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
مِن
from
رَّبِّكَ ۚ
आपके रब की तरफ़ से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
بِمَا
उसकी जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
خَبِيرًۭا
ख़ूब ख़बर रखने वाला
और अनुकरण करना उस चीज़ का जो तुम्हारे रब की ओर से तुम्हें प्रकाशना की जा रही है। निश्चय ही अल्लाह उसकी ख़बर रखता है जो तुम करते हो
तफ़्सीर:
आप उस वह़्य (प्रकाशना) का अनुसरण करें, जो आपका पालनहार आपपर अवतरित करता है। निश्चय अल्लाह तुम्हारे कर्मों से पूरी तरह अवगत है, उनमें से कुछ भी उससे नहीं छूटता। और वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों का बदला देगा।
आयत 3
وَتَوَكَّلْ عَلَى ٱللَّهِ ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ وَكِيلًۭا
وَتَوَكَّلْ
और तवकक्कल कीजिए
عَلَى
in
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह पर
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِٱللَّهِ
अल्लाह
وَكِيلًۭا
कारसाज़
और अल्लाह पर भरोसा रखो। और अल्लाह भरोसे के लिए काफी है
तफ़्सीर:
अपने सभी मामलों में अकेले अल्लाह पर भरोसा करें। तथा अल्लाह अपने बंदों में से उस व्यक्ति के लिए संरक्षक के रूप में काफ़ी है, जो उसपर भरोसा करता है।
आयत 4
مَّا جَعَلَ ٱللَّهُ لِرَجُلٍۢ مِّن قَلْبَيْنِ فِى جَوْفِهِۦ ۚ وَمَا جَعَلَ أَزْوَٰجَكُمُ ٱلَّـٰٓـِٔى تُظَـٰهِرُونَ مِنْهُنَّ أُمَّهَـٰتِكُمْ ۚ وَمَا جَعَلَ أَدْعِيَآءَكُمْ أَبْنَآءَكُمْ ۚ ذَٰلِكُمْ قَوْلُكُم بِأَفْوَٰهِكُمْ ۖ وَٱللَّهُ يَقُولُ ٱلْحَقَّ وَهُوَ يَهْدِى ٱلسَّبِيلَ
مَّا
नहीं
جَعَلَ
बनाए
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
لِرَجُلٍۢ
किसी शख़्स के लिए
مِّن
[of]
قَلْبَيْنِ
दो दिल
فِى
in
جَوْفِهِۦ ۚ
उसके सीने में
وَمَا
और नहीं
جَعَلَ
उसने बनाया
أَزْوَٰجَكُمُ
तुम्हारी बीवियों को
ٱلَّـٰٓـِٔى
वो जो
تُظَـٰهِرُونَ
तुम ज़िहार करते हो
مِنْهُنَّ
जिनसे
أُمَّهَـٰتِكُمْ ۚ
माँऐं तुम्हारी
وَمَا
और नहीं
جَعَلَ
उसने बनाया
أَدْعِيَآءَكُمْ
तुम्हारे मुँह बोले बेटों को
أَبْنَآءَكُمْ ۚ
बेटे तुम्हारे
ذَٰلِكُمْ
ये
قَوْلُكُم
बात है तुम्हारी
بِأَفْوَٰهِكُمْ ۖ
तुम्हारे मुँहों से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَقُولُ
फ़रमाता है
ٱلْحَقَّ
हक़
وَهُوَ
और वो ही
يَهْدِى
वो रहनुमाई करता है
ٱلسَّبِيلَ
रास्ते की
अल्लाह ने किसी व्यक्ति के सीने में दो दिल नहीं रखे। और न उसने तुम्हारी उन पत्ऩियों को जिनसे तुम ज़िहार कर बैठते हो, वास्तव में तुम्हारी माँ बनाया, और न उसने तुम्हारे मुँह बोले बेटों को तुम्हारे वास्तविक बेटे बनाए। ये तो तुम्हारे मुँह की बातें है। किन्तु अल्लाह सच्ची बात कहता है और वही मार्ग दिखाता है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने एक आदमी के सीने में दो दिल नहीं बनाए, न ही उसने पत्नियों को निषेध (हराम होने) में माताओं के समान बनाया, और न ही उसने मुँह बोले बेटों (गोद लिए हुए पुत्रों) को सगे बेटों के समान बनाया। क्योंकि "ज़िहार" (अर्थात् किसी व्यक्ति का अपनी पत्नी को अपने ऊपर अपनी माँ और बहन के समान हराम कर लेना) और इसी तरह "मुँह बोला बेटा बनाना" (गोद लेना) : पूर्व-इस्लामिक रीति-रिवाजों में से हैं, जिन्हें इस्लाम ने अमान्य कर दिया है। यह 'ज़िहार' और 'मुँह बोला बेटा बनाना' एक कथन है, जिसे तुम अपने मुँह से दोहराते हो, इसमें कोई सच्चाई नहीं है। क्योंकि पत्नी न तो माँ है, और न ही मुँह बोला बेटा उस व्यक्ति का बेटा है, जिसने उसे बेटा बनाया है। अल्लाह तआला सत्य कहता है, ताकि उसके बंदे उस पर अमल करें, और वही सत्य के मार्ग की ओर रहनुमाई करता है।
आयत 5
ٱدْعُوهُمْ لِـَٔابَآئِهِمْ هُوَ أَقْسَطُ عِندَ ٱللَّهِ ۚ فَإِن لَّمْ تَعْلَمُوٓا۟ ءَابَآءَهُمْ فَإِخْوَٰنُكُمْ فِى ٱلدِّينِ وَمَوَٰلِيكُمْ ۚ وَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌۭ فِيمَآ أَخْطَأْتُم بِهِۦ وَلَـٰكِن مَّا تَعَمَّدَتْ قُلُوبُكُمْ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًۭا رَّحِيمًا
ٱدْعُوهُمْ
पुकारो उन्हें
لِـَٔابَآئِهِمْ
उनके बापों के (नाम) से
هُوَ
वो
أَقْسَطُ
ज़्यादा इन्साफ़ वाला है
عِندَ
नज़दीक
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के
فَإِن
फिर अगर
لَّمْ
नहीं
تَعْلَمُوٓا۟
तुम जानते
ءَابَآءَهُمْ
उनके बापों को
فَإِخْوَٰنُكُمْ
तो भाई हैं तुम्हारे
فِى
in
ٱلدِّينِ
दीन में
وَمَوَٰلِيكُمْ ۚ
और दोस्त हैं तुम्हारे
وَلَيْسَ
और नहीं
عَلَيْكُمْ
तुम पर
جُنَاحٌۭ
कोई गुनाह
فِيمَآ
इस मामले में जो
أَخْطَأْتُم
ख़ता की तुमने
بِهِۦ
उसमें
وَلَـٰكِن
और लेकिन
مَّا
जो
تَعَمَّدَتْ
इरादा करें
قُلُوبُكُمْ ۚ
दिल तुम्हारे
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
غَفُورًۭا
बहुत बख़्शने वाला
رَّحِيمًا
निहायत रहम करने वाला
उन्हें उनके बापों का बेटा करकर पुकारो। अल्लाह के यहाँ यही अधिक न्यायसंगत बात है। और यदि तुम उनके बापों को न जानते हो, तो धर्म में वे तुम्हारे भाई तो है ही और तुम्हारे सहचर भी। इस सिलसिले में तुमसे जो ग़लती हुई हो उसमें तुमपर कोई गुनाह नहीं, किन्तु जिसका संकल्प तुम्हारे दिलों ने कर लिया, उसकी बात और है। वास्तव में अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
जिन्हें तुम अपना बेटा होने का दावा करते हो, उन्हें उनके असली बापों की ओर मनसूब करो। क्योंकि उन्हें उनकी ओर मनसूब करना ही अल्लाह के निकट न्यायसंगत है। यदि तुम्हें उनके पिता मालूम न हों, जिनकी ओर उन्हें मनसूब करो, तो वे तुम्हारे धार्मिक भाई और तुम्हारे गुलामी से आज़ाद किए हुए लोग हैं। तो उन्हें 'ऐ मेरे भाई' और 'ऐ मेरे भतीजे' कहकर पुकारो। यदि कोई व्यक्ति भूल से किसी मुँह बोले बेटे को उसके मुँह बोले बाप की ओर मनसूब करके बुला ले, तो कोई गुनाह नहीं है। बल्कि गुनाह उस समय है, जब जान-बूझकर बोला जाए। और अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को माफ़ करने वाला, उनपर दया करने वाला है कि भूल-चूक पर उनकी पकड़ नहीं करता।
आयत 6
ٱلنَّبِىُّ أَوْلَىٰ بِٱلْمُؤْمِنِينَ مِنْ أَنفُسِهِمْ ۖ وَأَزْوَٰجُهُۥٓ أُمَّهَـٰتُهُمْ ۗ وَأُو۟لُوا۟ ٱلْأَرْحَامِ بَعْضُهُمْ أَوْلَىٰ بِبَعْضٍۢ فِى كِتَـٰبِ ٱللَّهِ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُهَـٰجِرِينَ إِلَّآ أَن تَفْعَلُوٓا۟ إِلَىٰٓ أَوْلِيَآئِكُم مَّعْرُوفًۭا ۚ كَانَ ذَٰلِكَ فِى ٱلْكِتَـٰبِ مَسْطُورًۭا
ٱلنَّبِىُّ
नबी
أَوْلَىٰ
क़रीबतर है
بِٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों के
مِنْ
than
أَنفُسِهِمْ ۖ
उनके नफ़्सों से
وَأَزْوَٰجُهُۥٓ
और बीवियाँ उसकी
أُمَّهَـٰتُهُمْ ۗ
माँऐं हैं उनकी
وَأُو۟لُوا۟
And possessors
ٱلْأَرْحَامِ
और रहम वाले (रिश्तेदार)
بَعْضُهُمْ
बाज़ उनके
أَوْلَىٰ
नज़दीकतर हैं
بِبَعْضٍۢ
बाज़ के
فِى
in
كِتَـٰبِ
किताब में
ٱللَّهِ
अल्लाह की
مِنَ
than
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों में से
وَٱلْمُهَـٰجِرِينَ
और मोहाजिरीन में से
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
تَفْعَلُوٓا۟
तुम करे
إِلَىٰٓ
to
أَوْلِيَآئِكُم
तरफ़ अपने दोस्तों के
مَّعْرُوفًۭا ۚ
कोई भलाई
كَانَ
है
ذَٰلِكَ
ये
فِى
in
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में
مَسْطُورًۭا
लिखा हुआ
नबी का हक़ ईमानवालों पर स्वयं उनके अपने प्राणों से बढ़कर है। और उसकी पत्नियों उनकी माएँ है। और अल्लाह के विधान के अनुसार सामान्य मोमिनों और मुहाजिरों की अपेक्षा नातेदार आपस में एक-दूसरे से अधिक निकट है। यह और बात है कि तुम अपने साथियों के साथ कोई भलाई करो। यह बात किताब में लिखी हुई है
तफ़्सीर:
पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, हर उस चीज़ के मामले में जिसकी ओर वह ईमान वालों को बुलाएँ, उन पर स्वयं उनके अपने प्राणों से भी अधिक हक़ रखने वाले हैं, भले ही उनके दिल दूसरों के प्रति झुकाव रखते हों। और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पत्नियाँ सभी ईमान वालों की माताओं के दर्जे में हैं। इसलिए किसी भी मोमिन के लिए आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मृत्यु के बाद उनमें से किसी से शादी करना हराम (निषिद्ध) है। और रिश्तेदार, अल्लाह के आदेश के अनुसार, विरासत के मामले में अन्य ईमान वालों और मुहाजिरों से आपस में एक-दूसरे पर अधिक हक़ रखने वाले हैं, जो इस्लाम की शुरुआत में आपस में एक-दूसरे का वारिस हुआ करते थे, फिर इस तरह से आपस में वारिस होने के नियम को निरस्त कर दिया गया। परंतु (ऐ ईमान वालो!) अगर तुम वारिसों के अलावा अपने अन्य दोस्तों के लिए कुछ धन की वसीयत करना तथा उनपर उपकार करना चाहो, तो तुम ऐसा कर सकते हो। यह आदेश लौह़े मह़फूज़ में अंकित है। इसलिए इसपर अमल करना ज़रूरी है।
आयत 7
وَإِذْ أَخَذْنَا مِنَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ مِيثَـٰقَهُمْ وَمِنكَ وَمِن نُّوحٍۢ وَإِبْرَٰهِيمَ وَمُوسَىٰ وَعِيسَى ٱبْنِ مَرْيَمَ ۖ وَأَخَذْنَا مِنْهُم مِّيثَـٰقًا غَلِيظًۭا
وَإِذْ
और जब
أَخَذْنَا
लिया हमने
مِنَ
from
ٱلنَّبِيِّـۧنَ
नबियों से
مِيثَـٰقَهُمْ
पुख़्ता अहद उनका
وَمِنكَ
और आपसे
وَمِن
and from
نُّوحٍۢ
और नूह
وَإِبْرَٰهِيمَ
और इब्राहीम
وَمُوسَىٰ
और मूसा
وَعِيسَى
and Isa
ٱبْنِ
son
مَرْيَمَ ۖ
और ईसा इब्ने मरयम से
وَأَخَذْنَا
और लिया हमने
مِنْهُم
उनसे
مِّيثَـٰقًا
अहद
غَلِيظًۭا
पुख़्ता /पक्का
और याद करो जब हमने नबियों से वचन लिया, तुमसे भी और नूह और इबराहीम और मूसा और मरयम के बेटे ईसा से भी। इन सबसे हमने ढृढ़ वचन लिया,
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आप उस समय को याद करें, जब हमने नबियों से केवल एक अल्लाह की इबादत करने, उसके साथ किसी को साझी न बनाने और उनकी ओर जो वह़्य (प्रकाशना) की गई है, उसे लोगों तक पहुँचाने का दृढ़ वचन लिया। तथा हमने विशेष रूप से आपसे और नूह, इबराहीम, मूसा और ईसा बिन मरयम से वचन लिया। तथा हमने उनसे दृढ़ संकल्प लिया कि जो कुछ उन्हें अल्लाह का संदेश पहुँचाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है, उसे पूरा करेंगे।
आयत 8
لِّيَسْـَٔلَ ٱلصَّـٰدِقِينَ عَن صِدْقِهِمْ ۚ وَأَعَدَّ لِلْكَـٰفِرِينَ عَذَابًا أَلِيمًۭا
لِّيَسْـَٔلَ
ताकि वो सवाल करे
ٱلصَّـٰدِقِينَ
सच्चों से
عَن
about
صِدْقِهِمْ ۚ
उनके सच के बारे में
وَأَعَدَّ
और उसने तैयार कर रखा है
لِلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के लिए
عَذَابًا
अज़ाब
أَلِيمًۭا
दर्दनाक
ताकि वह सच्चे लोगों से उनकी सच्चाई के बारे में पूछे। और इनकार करनेवालों के लिए तो उसने दुखद यातना तैयार कर रखी है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने नबियों से यह दृढ़ प्रतिज्ञा ली, ताकि काफ़िरों की भर्त्सना करते हुए सच्चे रसूलों से उनकी सच्चाई के बारे में पूछे, और अल्लाह ने अपने तथा अपने रसूलों का इनकार करने वालों के लिए क़ियामत के दिन दर्दनाक यातना तैयार कर रखी है, जो जहन्नम की आग है।
आयत 9
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱذْكُرُوا۟ نِعْمَةَ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ إِذْ جَآءَتْكُمْ جُنُودٌۭ فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ رِيحًۭا وَجُنُودًۭا لَّمْ تَرَوْهَا ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرًا
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
ٱذْكُرُوا۟
याद करो
نِعْمَةَ
नेअमत
ٱللَّهِ
अल्लाह की
عَلَيْكُمْ
अपने ऊपर
إِذْ
जब
جَآءَتْكُمْ
आए तुम्हारे पास
جُنُودٌۭ
कई लश्कर
فَأَرْسَلْنَا
तो भेजी हमने
عَلَيْهِمْ
उन पर
رِيحًۭا
एक आँधी
وَجُنُودًۭا
और कुछ लश्कर
لَّمْ
नहीं
تَرَوْهَا ۚ
तुम ने देखा उन्हें
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِمَا
उसे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
بَصِيرًا
ख़ूब देखने वाला
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह की उस अनुकम्पा को याद करो जो तुमपर हुई; जबकि सेनाएँ तुमपर चढ़ आई तो हमने उनपर एक हवा भेज दी और ऐसी सेनाएँ भी, जिनको तुमने देखा नहीं। और अल्लाह वह सब कुछ देखता है जो तुम करते हो
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने वालो और उसकी शरीयत का पालन करने वालो! तुम अपने ऊपर अल्लाह के उस उपकार को याद करो, जब काफ़िरों की सेनाएँ तुमसे लड़ने के लिए जत्थाबंद होकर मदीना पर चढ़ आईं, तथा मुनाफ़िक़ों एवं यहूदियों ने उनका समर्थन किया। तो हमने उनपर पूर्वी हवा भेज दी, जिसके द्वारा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मदद की गई, तथा हमने फ़रिश्तों की सेनाएँ भेजीं, जिन्हें तुमने नहीं देखा। अतः काफ़िर भाग खड़े हुए, वे कुछ भी करने में सक्षम नहीं थे। और जो कुछ तुम कर रहे थे, अल्लाह उसे खूब देखने वाला था, उसमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है। और वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों का बदला देगा।
आयत 10
إِذْ جَآءُوكُم مِّن فَوْقِكُمْ وَمِنْ أَسْفَلَ مِنكُمْ وَإِذْ زَاغَتِ ٱلْأَبْصَـٰرُ وَبَلَغَتِ ٱلْقُلُوبُ ٱلْحَنَاجِرَ وَتَظُنُّونَ بِٱللَّهِ ٱلظُّنُونَا۠
إِذْ
जब
جَآءُوكُم
वो आए तुम पर
مِّن
from
فَوْقِكُمْ
तुम्हारे ऊपर से
وَمِنْ
and from
أَسْفَلَ
और नीचे से
مِنكُمْ
तुम्हारे
وَإِذْ
और जब
زَاغَتِ
फिर गईं
ٱلْأَبْصَـٰرُ
निगाहें
وَبَلَغَتِ
और पहुँच गए
ٱلْقُلُوبُ
दिल
ٱلْحَنَاجِرَ
गलों तक
وَتَظُنُّونَ
और तुम गुमान कर रहे थे
بِٱللَّهِ
अल्लाह के बारे में
ٱلظُّنُونَا۠
बहुत से गुमान
याद करो जब वे तुम्हारे ऊपर की ओर से और तुम्हारे नीचे की ओर से भी तुमपर चढ़ आए, और जब निगाहें टेढ़ी-तिरछी हो गई और उर (हृदय) कंठ को आ लगे। और तुम अल्लाह के बारे में तरह-तरह के गुमान करने लगे थे
तफ़्सीर:
और यह उस समय हुआ जब काफ़िर घाटी के ऊपर से और उसके नीचे से पूर्व और पश्चिम की दिशा से तुमपर चढ़ आए, उस समय निगाहें सारी चीज़ों से हटकर केवल दुश्मनों पर टिक गईं और गहन भय के कारण कलेजे मुँह को आने लगे और तुम अल्लाह के बारे में तरह-तरह के गुमान करने लगे; चुनाँचे कभी तुम जीत के बारे में सोचते, और कभी उससे निराशा का गुमान करने लगते।
आज की ज़िंदगी में सबक़
खंदक की जंग और मुत्तहिद दुश्मन गिरोहों का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि मुश्किल और खौफ के हालात में भी अल्लाह पर भरोसा रखने वाले ही डटे रहते हैं।
आयत 11
هُنَالِكَ ٱبْتُلِىَ ٱلْمُؤْمِنُونَ وَزُلْزِلُوا۟ زِلْزَالًۭا شَدِيدًۭا
هُنَالِكَ
उस वक़्त
ٱبْتُلِىَ
आज़माए गए
ٱلْمُؤْمِنُونَ
सब मोमिन
وَزُلْزِلُوا۟
और वो हिला मारे गए
زِلْزَالًۭا
हिला मारा जाना
شَدِيدًۭا
शिद्दत का
उस समय ईमानवाले आज़माए गए और पूरी तरह हिला दिए गए
तफ़्सीर:
खंदक़ की लड़ाई के दौरान उस अवसर पर, ईमान वालों का इस तरह परीक्षण किया गया कि उनके दुश्मन उनपर टूट पड़े और वे डर की तीव्रता से बुरी तरह हिला दिए गए। और इस परीक्षण से यह स्पष्ट हो गया कि कौन मोमिन है और कौन मुनाफ़िक़।
आयत 12
وَإِذْ يَقُولُ ٱلْمُنَـٰفِقُونَ وَٱلَّذِينَ فِى قُلُوبِهِم مَّرَضٌۭ مَّا وَعَدَنَا ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥٓ إِلَّا غُرُورًۭا
وَإِذْ
और जब
يَقُولُ
कह रहे थे
ٱلْمُنَـٰفِقُونَ
मुनाफ़िक़
وَٱلَّذِينَ
और वो लोग
فِى
in
قُلُوبِهِم
जिनके दिलों में
مَّرَضٌۭ
मर्ज़ है
مَّا
नहीं
وَعَدَنَا
वादा किया हमसे
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
وَرَسُولُهُۥٓ
और उसके रसूल ने
إِلَّا
मगर
غُرُورًۭا
धोके का
और जब कपटाचारी और वे लोग जिनके दिलों में रोग है कहने लगे, "अल्लाह और उसके रसूल ने हमसे जो वादा किया था वह तो धोखा मात्र था।"
तफ़्सीर:
उस दिन मुनाफ़िकों और कमज़ोर ईमान वाले लोगों ने, जिनके दिलों में संदेह है, कहा : अल्लाह और उसके रसूल ने हमसे हमारे दुश्मन पर विजय और धरती में हमें प्रभुत्व प्रदान करने का जो वादा किया था, वह असत्य और निराधार था।
आयत 13
وَإِذْ قَالَت طَّآئِفَةٌۭ مِّنْهُمْ يَـٰٓأَهْلَ يَثْرِبَ لَا مُقَامَ لَكُمْ فَٱرْجِعُوا۟ ۚ وَيَسْتَـْٔذِنُ فَرِيقٌۭ مِّنْهُمُ ٱلنَّبِىَّ يَقُولُونَ إِنَّ بُيُوتَنَا عَوْرَةٌۭ وَمَا هِىَ بِعَوْرَةٍ ۖ إِن يُرِيدُونَ إِلَّا فِرَارًۭا
وَإِذْ
और जब
قَالَت
कहा
طَّآئِفَةٌۭ
एक गिरोह ने
مِّنْهُمْ
उनमें से
يَـٰٓأَهْلَ
ऐ अहले
يَثْرِبَ
यसरब
لَا
No
مُقَامَ
नहीं कोई जगह ठहरने की
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
فَٱرْجِعُوا۟ ۚ
पस लौट चलो
وَيَسْتَـْٔذِنُ
और इजाज़त माँग रहा था
فَرِيقٌۭ
एक गिरोह
مِّنْهُمُ
उनमें से
ٱلنَّبِىَّ
नबी से
يَقُولُونَ
वो कह रहे थे
إِنَّ
बेशक
بُيُوتَنَا
हमारे घर तो
عَوْرَةٌۭ
ग़ैर महफ़ूज़ हैं
وَمَا
हालाँकि नहीं थे
هِىَ
वो
بِعَوْرَةٍ ۖ
ग़ैर महफ़ूज़
إِن
नहीं
يُرِيدُونَ
वो चाहते थे
إِلَّا
मगर
فِرَارًۭا
फ़रार होना
और जबकि उनमें से एक गिरोह ने कहा, "ऐ यसरिबवालो, तुम्हारे लिए ठहरने का कोई मौक़ा नहीं। अतः लौट चलो।" और उनका एक गिरोह नबी से यह कहकर (वापस जाने की) अनुमति चाह रहा था कि "हमारे घर असुरक्षित है।" यद्यपि वे असुरक्षित न थे। वे तो बस भागना चाहते थे
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) उस समय को याद करें, जब मुनाफ़िक़ों के एक समूह ने मदीना के लोगों से कहा : ऐ यसरिब (इस्लाम से पहले मदीना का नाम) वालो! तुम्हारे लिए ख़ंदक़ के पास, 'सल्अ' पहाड़ी के दामन में ठहरने का कोई स्थान नहीं है। इसलिए अपने घरों को लौट चलो। और उनमें से एक समूह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से घर वापसी की अनुमित माँग रहा था। उनका दावा था कि उनके घर दुश्मन की ज़द में हैं, जबकि मामला ऐसा नहीं है जैसा कि उन्होंने दावा किया है। बल्कि वे इस झूठे बहाने के द्वारा दुश्मन से भागना चाहते हैं।
आयत 14
وَلَوْ دُخِلَتْ عَلَيْهِم مِّنْ أَقْطَارِهَا ثُمَّ سُئِلُوا۟ ٱلْفِتْنَةَ لَـَٔاتَوْهَا وَمَا تَلَبَّثُوا۟ بِهَآ إِلَّا يَسِيرًۭا
وَلَوْ
और अगर
دُخِلَتْ
दाख़िल किए जाते
عَلَيْهِم
उन पर (लश्कर)
مِّنْ
from
أَقْطَارِهَا
उनके अतराफ़ से
ثُمَّ
फिर
سُئِلُوا۟
वो सवाल किए जाते
ٱلْفِتْنَةَ
फ़ितना बरपा करने का
لَـَٔاتَوْهَا
अलबत्ता वो आते उसे
وَمَا
और ना
تَلَبَّثُوا۟
वो इन्तिज़ार करते
بِهَآ
उसका
إِلَّا
मगर
يَسِيرًۭا
बहुत थोड़ा
और यदि उसके चतुर्दिक से उनपर हमला हो जाता, फिर उस समय उनसे उपद्रव के लिए कहा जाता, तो वे ऐसा कर डालते और इसमें विलम्ब थोड़े ही करते!
तफ़्सीर:
और अगर दुश्मन उनपर मदीना में उसकी सभी दिशाओं से प्रवेश कर जाता, और उनसे अल्लाह का इनकार करने और उसके साथ साझी ठहराने की ओर लौटने के लिए कहता, तो निश्चय वे अपने दुश्मन की यह बात मान लेते, और वे इस्लाम धर्म त्यागने और कुफ़्र की ओर पलटने में केवल थोड़ी ही देर संकोच करते।
आयत 15
وَلَقَدْ كَانُوا۟ عَـٰهَدُوا۟ ٱللَّهَ مِن قَبْلُ لَا يُوَلُّونَ ٱلْأَدْبَـٰرَ ۚ وَكَانَ عَهْدُ ٱللَّهِ مَسْـُٔولًۭا
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
كَانُوا۟
थे वो
عَـٰهَدُوا۟
वो अहद कर चुके
ٱللَّهَ
अल्लाह से
مِن
before
قَبْلُ
इससे पहले
لَا
not
يُوَلُّونَ
कि नहीं वो फेरेंगे
ٱلْأَدْبَـٰرَ ۚ
पुश्तें
وَكَانَ
और है
عَهْدُ
अहद
ٱللَّهِ
अल्लाह का
مَسْـُٔولًۭا
पूछा जाने वाला
यद्यपि वे इससे पहले अल्लाह को वचन दे चुके थे कि वे पीठ न फेरेंगे, और अल्लाह से की गई प्रतिज्ञा के विषय में तो पूछा जाना ही है
तफ़्सीर:
जबकि इन मुनाफ़िक़ों (पाखंडियों) ने उहुद के दिन युद्ध से भागने के बाद अल्लाह से प्रतिज्ञा की थी कि अगर अल्लाह ने उन्हें किसी और लड़ाई में शामिल होने का अवसर दिया, तो वे अपने दुश्मन से ज़रूर लड़ाई करेंगे और उनके डर से नहीं भागेंगे। लेकिन उन्होंने वादा तोड़ दिया। हालाँकि बंदे ने अल्लाह से जो वादा किया है, उसके प्रति वह ज़िम्मेदार है और उससे उसका हिसाब लिया जाएगा।
आयत 16
قُل لَّن يَنفَعَكُمُ ٱلْفِرَارُ إِن فَرَرْتُم مِّنَ ٱلْمَوْتِ أَوِ ٱلْقَتْلِ وَإِذًۭا لَّا تُمَتَّعُونَ إِلَّا قَلِيلًۭا
قُل
कह दीजिए
لَّن
हरगिज़ नहीं
يَنفَعَكُمُ
फ़ायदा देगा तुम्हें
ٱلْفِرَارُ
भागना
إِن
अगर
فَرَرْتُم
भागे तुम
مِّنَ
from
ٱلْمَوْتِ
मौत से
أَوِ
या
ٱلْقَتْلِ
क़त्ल से
وَإِذًۭا
और तब
لَّا
not
تُمَتَّعُونَ
ना तुम फ़ायदा दिए जाओगे
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا
बहुत थोड़ा
कह दो, "यदि तुम मृत्यु और मारे जाने से भागो भी तो यह भागना तुम्हारे लिए कदापि लाभप्रद न होगा। और इस हालत में भी तुम सुख थोड़े ही प्राप्त कर सकोगे।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप इन लोगों से कह दें : यदि तुम मरने या क़त्ल होने के भय से लड़ाई से भागते हो, तो (यह) भागना तुम्हें हरगिज़ लाभ नहीं देगा। क्योंकि मौत का समय निर्धारित है। और अगर तुम भागते हो और तुम्हारी मौत का समय नहीं आया है, तब भी तुम जीवन में केवल थोड़े समय का आनंद ले सकोगे।
आयत 17
قُلْ مَن ذَا ٱلَّذِى يَعْصِمُكُم مِّنَ ٱللَّهِ إِنْ أَرَادَ بِكُمْ سُوٓءًا أَوْ أَرَادَ بِكُمْ رَحْمَةًۭ ۚ وَلَا يَجِدُونَ لَهُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ وَلِيًّۭا وَلَا نَصِيرًۭا
قُلْ
कह दीजिए
مَن
कौन है
ذَا
(is) it that
ٱلَّذِى
वो जो
يَعْصِمُكُم
बचाएगा तुम्हें
مِّنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह से
إِنْ
अगर
أَرَادَ
उसने इरादा किया
بِكُمْ
तुम्हारे साथ
سُوٓءًا
बुराई का
أَوْ
या
أَرَادَ
उसने इरादा किया
بِكُمْ
तुम्हारे साथ
رَحْمَةًۭ ۚ
रहमत का
وَلَا
और नहीं
يَجِدُونَ
वो पाऐंगे
لَهُم
अपने लिए
مِّن
besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَلِيًّۭا
कोई दोस्त
وَلَا
और ना
نَصِيرًۭا
कोई मददगार
कहो, "कहो है जो तुम्हें अल्लाह से बचा सकता है, यदि वह तुम्हारी कोई बुराई चाहे या वह तुम्हारे प्रति दयालुता का इरादा करे (तो कौन है जो उसकी दयालुता को रोक सके)?" वे अल्लाह के अल्लाह के अलावा न अपना कोई निकटवर्ती समर्थक पाएँगे और न (दूर का) सहायक
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप उनसे कह दें : अगर अल्लाह तुम्हारे साथ उसी मौत और क़त्ल का इरादा करे, जिस तुम नापसंद करते हो, या तुम्हारे साथ सलामती और भलाई का इरादा करे, जिसकी तुम आशा करते हो, तो वह कौन है जो तुम्हें अल्लाह से बचा सकता है?! कोई भी तुम्हें इससे बचा नहीं सकता। और ये मुनाफ़िक़ लोग अपने लिए अल्लाह के सिवा कोई संरक्षक नहीं पाएँगे, जो उनके मामले की देखभाल करे और न ही कोई सहायक पाएँगे, जो उन्हें अल्लाह की सज़ा से बचा सके।
आयत 18
۞ قَدْ يَعْلَمُ ٱللَّهُ ٱلْمُعَوِّقِينَ مِنكُمْ وَٱلْقَآئِلِينَ لِإِخْوَٰنِهِمْ هَلُمَّ إِلَيْنَا ۖ وَلَا يَأْتُونَ ٱلْبَأْسَ إِلَّا قَلِيلًا
۞ قَدْ
तहक़ीक़
يَعْلَمُ
जानता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْمُعَوِّقِينَ
रोकने वालों को
مِنكُمْ
तुम में से
وَٱلْقَآئِلِينَ
और कहने वालों को
لِإِخْوَٰنِهِمْ
अपने भाईयों से
هَلُمَّ
आओ
إِلَيْنَا ۖ
तरफ़ हमारे
وَلَا
और नहीं
يَأْتُونَ
वो आते
ٱلْبَأْسَ
लड़ाई को
إِلَّا
मगर
قَلِيلًا
बहुत थोड़े
अल्लाह तुममें से उन लोगों को भली-भाँति जानता है जो (युद्ध से) रोकते है और अपने भाइयों से कहते है, "हमारे पास आ जाओ।" और वे लड़ाई में थोड़े ही आते है, (क्योंकि वे)
तफ़्सीर:
अल्लाह तुम में से उन लोगों को जानता है, जो दूसरे लोगों को अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ मिलकर लड़ने से हतोत्साहित करते हैं, और जो अपने भाइयों से कहते हैं : हमारे पास आओ और उनके साथ युद्ध में शामिल न हो ताकि तुम मारे न जाओ। क्योंकि हमें तुम्हारे मारे जाने का भय है। और ये हतोत्साहित करने वाले युद्ध में नहीं आते हैं और शायद ही कभी उसमें भाग लेते हैं; ताकि अपने आप से अपमान को दूर कर सकें, इसलिए नहीं कि वे अल्लाह और उसके रसूल की मदद करें।
आयत 19
أَشِحَّةً عَلَيْكُمْ ۖ فَإِذَا جَآءَ ٱلْخَوْفُ رَأَيْتَهُمْ يَنظُرُونَ إِلَيْكَ تَدُورُ أَعْيُنُهُمْ كَٱلَّذِى يُغْشَىٰ عَلَيْهِ مِنَ ٱلْمَوْتِ ۖ فَإِذَا ذَهَبَ ٱلْخَوْفُ سَلَقُوكُم بِأَلْسِنَةٍ حِدَادٍ أَشِحَّةً عَلَى ٱلْخَيْرِ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ لَمْ يُؤْمِنُوا۟ فَأَحْبَطَ ٱللَّهُ أَعْمَـٰلَهُمْ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرًۭا
أَشِحَّةً
बख़ील हैं
عَلَيْكُمْ ۖ
तुम पर
فَإِذَا
फिर जब
جَآءَ
आता है
ٱلْخَوْفُ
ख़ौफ़
رَأَيْتَهُمْ
देखते हैं आप उन्हें
يَنظُرُونَ
वो देखते हैं
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
تَدُورُ
घूमती हैं
أَعْيُنُهُمْ
आँखें उनकी
كَٱلَّذِى
उस शख़्स की तरह
يُغْشَىٰ
ग़शी तारी की जा रही हो
عَلَيْهِ
जिस पर
مِنَ
from
ٱلْمَوْتِ ۖ
मौत की
فَإِذَا
फिर जब
ذَهَبَ
चला जाता है
ٱلْخَوْفُ
ख़ौफ़
سَلَقُوكُم
बदज़बानी करते हैं आपसे
بِأَلْسِنَةٍ
साथ ज़बानों के
حِدَادٍ
तेज़
أَشِحَّةً
हिर्स/बुख़्ल करते हुए
عَلَى
towards
ٱلْخَيْرِ ۚ
माल पर
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
لَمْ
नहीं
يُؤْمِنُوا۟
वो ईमान लाए
فَأَحْبَطَ
तो ज़ाया कर दिया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
أَعْمَـٰلَهُمْ ۚ
उनके अमाल को
وَكَانَ
और है
ذَٰلِكَ
ये
عَلَى
for
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
يَسِيرًۭا
बहुत आसान
तुम्हारे साथ कृपणता से काम लेते है। अतः जब भय का समय आ जाता है, तो तुम उन्हें देखते हो कि वे तुम्हारी ओर इस प्रकार ताक रहे कि उनकी आँखें चक्कर खा रही है, जैसे किसी व्यक्ति पर मौत की बेहोशी छा रही हो। किन्तु जब भय जाता रहता है तो वे माल के लोभ में तेज़ ज़बाने तुमपर चलाते है। ऐसे लोग ईमान लाए ही नहीं। अतः अल्लाह ने उनके कर्म उनकी जान को लागू कर दिए। और यह अल्लाह के लिए बहुत सरल है
तफ़्सीर:
वे तुमपर (ऐ ईमान वालो) अपने धन के साथ बड़े कंजूस हैं, इसलिए वे उसे खर्च करके तुम्हारी मदद नहीं करते हैं। तथा वे अपनी जानों के संबंध में भी कंजूस हैं, इसलिए वे तुम्हारे साथ लड़ाई नहीं करते। तथा वे अपनी दोस्ती के संबंध में भी कंजूस हैं, इसलिए वे तुमसे मित्रता नहीं करते। चुनाँचे जब दुश्मन से मुठभेड़ के समय भय का सामना होता है, तो आप उन्हें देखेंगे कि वे (ऐ रसूल) आपकी ओर ऐसे देखते हैं कि उनकी आँखें कायरता के कारण उस आदमी की आँखों के घूमने की तरह घूम रही हैं, जो मौत की पीड़ा से जूझ रहा हो। फिर जब उनका भय जाता रहता है और वे निश्चिंत हो जाते हैं, तो वे अपनी तेज़ ज़बानों के साथ तुम्हें कष्ट पहुँचाते हैं। वे ग़नीमत के माल के बड़े लोभी होते हैं और उसकी ताक में रहते हैं। ये लोग जो इन विशेषताओं से विशिष्ट हैं, वास्तव में ईमान ही नहीं लाए हैं। इसलिए अल्लाह ने इनके कर्मों के सवाब को व्यर्थ कर दिया। और यह व्यर्थ करना अल्लाह के लिए अति सरल है।
आयत 20
يَحْسَبُونَ ٱلْأَحْزَابَ لَمْ يَذْهَبُوا۟ ۖ وَإِن يَأْتِ ٱلْأَحْزَابُ يَوَدُّوا۟ لَوْ أَنَّهُم بَادُونَ فِى ٱلْأَعْرَابِ يَسْـَٔلُونَ عَنْ أَنۢبَآئِكُمْ ۖ وَلَوْ كَانُوا۟ فِيكُم مَّا قَـٰتَلُوٓا۟ إِلَّا قَلِيلًۭا
يَحْسَبُونَ
वो समझते हैं
ٱلْأَحْزَابَ
गिरोहों /लश्करों को
لَمْ
कि नहीं
يَذْهَبُوا۟ ۖ
वो गए
وَإِن
और अगर
يَأْتِ
आ जाऐं
ٱلْأَحْزَابُ
गिरोह/लश्कर
يَوَدُّوا۟
वो चाहेंगे
لَوْ
काश
أَنَّهُم
ये कि वो
بَادُونَ
बाहर रहने वाले होते
فِى
among
ٱلْأَعْرَابِ
बद्दुओं /एराबियों में
يَسْـَٔلُونَ
वो पूछ लिया करते
عَنْ
about
أَنۢبَآئِكُمْ ۖ
ख़बरें तुम्हारी
وَلَوْ
और अगर
كَانُوا۟
वो होते
فِيكُم
तुम में
مَّا
ना
قَـٰتَلُوٓا۟
वो जंग करते
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا
बहुत कम
वे समझ रहे है कि (शत्रु के) सैन्य दल अभी गए नहीं हैं, और यदि वे गिरोह फिर आ जाएँ तो वे चाहेंगे कि किसी प्रकार बाहर (मरुस्थल में) बद्दु ओं के साथ हो रहें और वहीं से तुम्हारे बारे में समाचार पूछते रहे। और यदि वे तुम्हारे साथ होते भी तो लड़ाई में हिस्सा थोड़े ही लेते
तफ़्सीर:
ये कायर लोग समझते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और ईमान वालों से लड़ाई के लिए एकजुट होने वाली सेनाएँ मुसलमानों का सफ़ाया किए बिना कभी वापस नहीं जाएँगी। और अगर ऐसा हो कि ये सेनाएँ दोबारा आ जाएँ, तो ये मुनाफ़िक़ लोग पसंद करेंगे कि वे देहातियों के साथ मदीना के बाहर निकल जाते, जहाँ से वे तुम्हारी खबर के बारे में पूछते कि : तुम्हारे दुश्मन के तुमसे लड़ने के बाद तुम्हारे साथ क्या हुआ? और अगर वे (ऐ मोमिनो!) तुम्हारे बीच में होते, तो वे तुम्हारे साथ बहुत कम ही लड़ते। इसलिए उनकी परवाह न करो और न ही उनपर अफ़सोस करो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मुनाफिकों के बहानों और डर के मौके पर पीछे हटने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि मुश्किल वक्त ही असली ईमान की पहचान कराता है, जब मुनाफिक पीछे हट जाते हैं और सच्चे ईमान वाले डटे रहते हैं।
आयत 21
لَّقَدْ كَانَ لَكُمْ فِى رَسُولِ ٱللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌۭ لِّمَن كَانَ يَرْجُوا۟ ٱللَّهَ وَٱلْيَوْمَ ٱلْـَٔاخِرَ وَذَكَرَ ٱللَّهَ كَثِيرًۭا
لَّقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
كَانَ
है
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
فِى
in
رَسُولِ
(the) Messenger
ٱللَّهِ
अल्लाह के रसूल में
أُسْوَةٌ
नमूना
حَسَنَةٌۭ
अच्छा
لِّمَن
उसके लिए जो
كَانَ
हो
يَرْجُوا۟
उम्मीद रखता
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَٱلْيَوْمَ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرَ
और आख़िरी दिन की
وَذَكَرَ
और वो याद करे
ٱللَّهَ
अल्लाह को
كَثِيرًۭا
कसरत से
निस्संदेह तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में एक उत्तम आदर्श है अर्थात उस व्यक्ति के लिए जो अल्लाह और अन्तिम दिन की आशा रखता हो और अल्लाह को अधिक याद करे
तफ़्सीर:
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जो कुछ कहा, जो कुछ अंजाम दिया और जो कुछ किया, उसमें तुम्हारे लिए उत्तम आदर्श है। चुनाँचे आप स्वंय उपस्थित हुए और युद्ध किया, तो फिर तुम उसके बाद आपकी जान से बेपरवाह होकर अपनी जानों को निछावर करने में कंजूसी करते हो? और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदर्श को वही अपनाएगा, जो अल्लाह के प्रतिफल और दया की आशा रखता हो और आख़िरत के दिन की आशा रखता हो, और उसके लिए कार्य करता हो और अल्लाह को बहुत ज़्यादा याद करता हो। लेकिन जो व्यक्ति आख़िरत के दिन की आशा नहीं रखता है और अल्लाह को बहुत ज़्यादा याद नहीं करता है, तो वह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदर्श को नहीं अपनाएगा।
आयत 22
وَلَمَّا رَءَا ٱلْمُؤْمِنُونَ ٱلْأَحْزَابَ قَالُوا۟ هَـٰذَا مَا وَعَدَنَا ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥ وَصَدَقَ ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥ ۚ وَمَا زَادَهُمْ إِلَّآ إِيمَـٰنًۭا وَتَسْلِيمًۭا
وَلَمَّا
और जब
رَءَا
देखा
ٱلْمُؤْمِنُونَ
मोमिनों ने
ٱلْأَحْزَابَ
गिरोहों को
قَالُوا۟
वो कहने लगे
هَـٰذَا
ये है
مَا
वो ही जो
وَعَدَنَا
वादा किया हमसे
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
وَرَسُولُهُۥ
और उसके रसूल ने
وَصَدَقَ
और सच फ़रमाया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
وَرَسُولُهُۥ ۚ
और उसके रसूल ने
وَمَا
और नहीं
زَادَهُمْ
उसने ज़्यादा किया उन्हें
إِلَّآ
मगर
إِيمَـٰنًۭا
ईमान
وَتَسْلِيمًۭا
और सुपुर्दगी में
और जब ईमानवालों ने सैन्य दलों को देखा तो वे पुकार उठे, "यह तो वही चीज़ है, जिसका अल्लाह और उसके रसूल ने हमसे वादा किया था। और अल्लाह और उसके रसूल ने सच कहा था।" इस चीज़ ने उनके ईमान और आज्ञाकारिता ही को बढ़ाया
तफ़्सीर:
और जब ईमान वालों ने उनसे लड़ने के लिए एकत्रित सेनाओं को अपनी आँखों से देख लिया तो कहा : यही वह परीक्षण, विपत्ति और मदद (विजय) है, जिसका अल्लाह और उसके रसूल ने हमसे वादा किया था और अल्लाह और उसके रसूल इसमें सच्चे थे, चुनाँचे वह पूरा हो गया। तथा सेनाओं को देखने से उनका अल्लाह पर ईमान और उसके प्रति समर्पण और बढ़ गया।
आयत 23
مِّنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ رِجَالٌۭ صَدَقُوا۟ مَا عَـٰهَدُوا۟ ٱللَّهَ عَلَيْهِ ۖ فَمِنْهُم مَّن قَضَىٰ نَحْبَهُۥ وَمِنْهُم مَّن يَنتَظِرُ ۖ وَمَا بَدَّلُوا۟ تَبْدِيلًۭا
مِّنَ
Among
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों में से
رِجَالٌۭ
कुछ मर्द हैं
صَدَقُوا۟
जिन्होंने सच्चा कर दिया
مَا
जो
عَـٰهَدُوا۟
उन्होंने अहद किया था
ٱللَّهَ
अल्लाह से
عَلَيْهِ ۖ
जिस पर
فَمِنْهُم
तो उनमें से वो है
مَّن
जो
قَضَىٰ
पूरी कर चुका
نَحْبَهُۥ
नज़र अपनी
وَمِنْهُم
और उनमें से कोई है
مَّن
जो
يَنتَظِرُ ۖ
मुन्तज़िर है
وَمَا
और नहीं
بَدَّلُوا۟
उन्होंने तब्दीली की
تَبْدِيلًۭا
तब्दीली करना
ईमानवालों के रूप में ऐसे पुरुष मौजूद है कि जो प्रतिज्ञा उन्होंने अल्लाह से की थी उसे उन्होंने सच्चा कर दिखाया। फिर उनमें से कुछ तो अपना प्रण पूरा कर चुके और उनमें से कुछ प्रतीक्षा में है। और उन्होंने अपनी बात तनिक भी नहीं बदली
तफ़्सीर:
ईमान वालों में से कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्होंने अल्लाह से किया हुआ वादा सच कर दिखाया। चुनाँचे उन्होंने अल्लाह के रास्ते में जिहाद में दृढ़ता और धैर्य का जो वादा किया था, उसे पूरा किया। तो उनमें से कुछ लोग मर गए या अल्लाह की राह में शहीद हो गए और कुछ लोग असके रास्ते में शहीद होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। और इन ईमान वालों ने अल्लाह से कि हुए अपने वादे को नहीं बदला, जैसा कि मुनाफ़िक़ों ने अपने वादों के साथ किया।
आयत 24
لِّيَجْزِىَ ٱللَّهُ ٱلصَّـٰدِقِينَ بِصِدْقِهِمْ وَيُعَذِّبَ ٱلْمُنَـٰفِقِينَ إِن شَآءَ أَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا
لِّيَجْزِىَ
ताकि बदला दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلصَّـٰدِقِينَ
सच्चों को
بِصِدْقِهِمْ
उनकी सच्चाई का
وَيُعَذِّبَ
और वो अज़ाब दे
ٱلْمُنَـٰفِقِينَ
मुनाफ़िक़ों को
إِن
अगर
شَآءَ
वो चाहे
أَوْ
या
يَتُوبَ
वो मेहरबान होजाए
عَلَيْهِمْ ۚ
उन पर
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
غَفُورًۭا
बहुत बख़्शने वाला
رَّحِيمًۭا
निहायत रहम करने वाला
ताकि इसके परिणामस्वरूप अल्लाह सच्चों को उनकी सच्चाई का बदला दे और कपटाचारियों को चाहे तो यातना दे या उनकी तौबा क़बूल करे। निश्चय ही अल्लाह बड़ी क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
ताकि अल्लाह उन सच्चे लोगों को, जिन्होंने अल्लाह से किए हुए वादे को पूरा किया, उनकी सच्चाई और वादा निभाने का बदला दे, और प्रतिज्ञा को तोड़ने वाले मुनाफ़िक़ों को यदि चाहे तो यातना दे, इस प्रकार कि उन्हें उनके कुफ़्र से तौबा करने से पहले ही मौत दे दे, या उनकी तौबा क़बूल करते हुए उन्हें तौबा करने की तौफ़ीक़ प्रदान कर दे। और अल्लाह अपने गुनाहों से तौबा करने वाले को क्षमा करने वाला, उसपर दया करने वाला है।
आयत 25
وَرَدَّ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِغَيْظِهِمْ لَمْ يَنَالُوا۟ خَيْرًۭا ۚ وَكَفَى ٱللَّهُ ٱلْمُؤْمِنِينَ ٱلْقِتَالَ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ قَوِيًّا عَزِيزًۭا
وَرَدَّ
और फेर दिया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
بِغَيْظِهِمْ
साथ उनके ग़ुस्से के
لَمْ
नहीं
يَنَالُوا۟
उन्होंने पाई
خَيْرًۭا ۚ
कोई भलाई
وَكَفَى
और काफ़ी हो गया
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों को
ٱلْقِتَالَ ۚ
जंग में
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
قَوِيًّا
बहुत क़ुव्वत वाला
عَزِيزًۭا
बहुत ज़बरदस्त
अल्लाह ने इनकार करनेवालों को उनके अपने क्रोध के साथ फेर दिया। वे कोई भलाई प्राप्त न कर सके। अल्लाह ने मोमिनों को युद्ध करने से बचा लिया। अल्लाह तो है ही बड़ा शक्तिवान, प्रभुत्वशाली
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने क़ुरैश, ग़तफ़ान और उन लोगों को जो उनके साथ थे, उनकी उम्मीदों पर पानी फिर जाने के कारण उनकी पीड़ा और शोक के साथ लौटा दिया, वे मुसलमानों का सफाया करने के इरादे में कामयाब न हुए। और अल्लाह आँधी भेजकर और फ़रिश्तों को उतारकर उनसे युद्ध करने के लिए ईमान वालों को काफी हो गया। और अल्लाह बड़ा शक्तिशाली, अत्यंत प्रभुत्वशाली है, जो भी उससे मुक़ाबला करने की कोशिश करेगा, वह उसे पराजित और असहाय कर देगा।
आयत 26
وَأَنزَلَ ٱلَّذِينَ ظَـٰهَرُوهُم مِّنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ مِن صَيَاصِيهِمْ وَقَذَفَ فِى قُلُوبِهِمُ ٱلرُّعْبَ فَرِيقًۭا تَقْتُلُونَ وَتَأْسِرُونَ فَرِيقًۭا
وَأَنزَلَ
और उसने उतारा
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
ظَـٰهَرُوهُم
मदद की उनकी
مِّنْ
among
أَهْلِ
(the) People
ٱلْكِتَـٰبِ
अहले किताब में से
مِن
from
صَيَاصِيهِمْ
उनके क़िलों से
وَقَذَفَ
और उसने डाल दिया
فِى
into
قُلُوبِهِمُ
उनके दिलों में
ٱلرُّعْبَ
रोब
فَرِيقًۭا
एक गिरोह को
تَقْتُلُونَ
तुम क़त्ल कर रहे थे
وَتَأْسِرُونَ
और तुम क़ैद कर रहे थे
فَرِيقًۭا
एक गिरोह को
और किताबवालों में सो जिन लोगों ने उसकी सहायता की थी, उन्हें उनकी गढ़ियों से उतार लाया। और उनके दिलों में धाक बिठा दी कि तुम एक गिरोह को जान से मारने लगे और एक गिरोह को बन्दी बनाने लगे
तफ़्सीर:
अल्लाह ने यहूदियों में से उन लोगों को, जिन्होंने काफ़िरों की सहायता की थी, उनके उन क़िलों से उतार दिया, जहाँ वे अपने दुश्मनों से बचने के लिए शरण लेते थे। और उनके दिलों में भय डाल दिया। चुनाँचे तुम (ऐ ईमान वालो) उनके एक गिरोह को क़त्ल कर रहे थे और एक गिरोह को बंदी बना रहे थे।
आयत 27
وَأَوْرَثَكُمْ أَرْضَهُمْ وَدِيَـٰرَهُمْ وَأَمْوَٰلَهُمْ وَأَرْضًۭا لَّمْ تَطَـُٔوهَا ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرًۭا
وَأَوْرَثَكُمْ
और उसने वारिस बनादिया तुम्हें
أَرْضَهُمْ
उनकी ज़मीन का
وَدِيَـٰرَهُمْ
और उनके घरों का
وَأَمْوَٰلَهُمْ
और उनके मालों का
وَأَرْضًۭا
और ज़मीन का
لَّمْ
नहीं
تَطَـُٔوهَا ۚ
तुम ने पामाला किया जिसे
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرًۭا
ख़ूब क़ुदरत रखने वाला
और उसने तुम्हें उनके भू-भाग और उनके घरों और उनके मालों का वारिस बना दिया और उस भू-भाग का भी जिसे तुमने पददलित नहीं किया। वास्तव में अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने उनके विनाश के बाद, उनकी भूमि को खेतियों और ख़जूर के बाग़ों समेत तुम्हारे क़ब्ज़े में कर दिया। तथा तुम्हें उनके घरों और उनके अन्य धनों का मालिक बना दिया। और तुम्हें ख़ैबर की भूमि का मालिक बना दिया, जिसपर तुमने अभी तक अपने पाँव भी नहीं रखे थे। लेकिन अब उस पर तुम्हारे क़दम पड़ेंगे। यह ईमान वालों के लिए एक वादा और खुशख़बरी है। और अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है, उसे कोई चीज़ विवश नहीं कर सकती।
आयत 28
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ قُل لِّأَزْوَٰجِكَ إِن كُنتُنَّ تُرِدْنَ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا وَزِينَتَهَا فَتَعَالَيْنَ أُمَتِّعْكُنَّ وَأُسَرِّحْكُنَّ سَرَاحًۭا جَمِيلًۭا
يَـٰٓأَيُّهَا
O Prophet
ٱلنَّبِىُّ
ऐ नबी
قُل
कह दीजिए
لِّأَزْوَٰجِكَ
अपनी बीवियों से
إِن
अगर
كُنتُنَّ
हो तुम
تُرِدْنَ
तुम चाहती
ٱلْحَيَوٰةَ
ज़िन्दगी
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
وَزِينَتَهَا
और ज़ीनत उसकी
فَتَعَالَيْنَ
तो आओ
أُمَتِّعْكُنَّ
मैं कुछ सामान दे दूँ तुम्हें
وَأُسَرِّحْكُنَّ
और मैं रुख़्सत कर दूँ तुम्हें
سَرَاحًۭا
रुख़्सत करना
جَمِيلًۭا
अच्छे तरीक़े से
ऐ नबी! अपनी पत्नि यों से कह दो कि "यदि तुम सांसारिक जीवन और उसकी शोभा चाहती हो तो आओ, मैं तुम्हें कुछ दे-दिलाकर भली रीति से विदा कर दूँ
तफ़्सीर:
ऐ नबी! अपनी पत्नियों से कह दें, जबकि उन्होंने आपसे नफ़क़ा (भरण-पोषण) में विस्तार करने की माँग की है और आपके पास उन पर विस्तार करने के लिए कुछ भी नहीं है : अगर तुम दुनिया का जीवन और उसकी शोभा चाहती हो, तो मेरे पास आओ, मैं तुम्हें कुछ सामान दे दूँ, जो तलाक़शुदा महिलाओं को दिया जाता है और तुम्हें बिना कोई नुक़सान पहुँचाए या कष्ट दिए तलाक़ दे दूँ।
आयत 29
وَإِن كُنتُنَّ تُرِدْنَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ وَٱلدَّارَ ٱلْـَٔاخِرَةَ فَإِنَّ ٱللَّهَ أَعَدَّ لِلْمُحْسِنَـٰتِ مِنكُنَّ أَجْرًا عَظِيمًۭا
وَإِن
और अगर
كُنتُنَّ
हो तुम
تُرِدْنَ
तुम चाहती
ٱللَّهَ
अल्लाह को
وَرَسُولَهُۥ
और उसके रसूल को
وَٱلدَّارَ
और घर को
ٱلْـَٔاخِرَةَ
आख़िरत के
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
أَعَدَّ
तैयार कर रखा है
لِلْمُحْسِنَـٰتِ
नेकी करने वालों के लिए
مِنكُنَّ
तुम में से
أَجْرًا
अजर
عَظِيمًۭا
बहुत बड़ा
"किन्तु यदि तुम अल्लाह और उसके रसूल और आख़िरत के घर को चाहती हो तो निश्चय ही अल्लाह ने तुममे से उत्तमकार स्त्रियों के लिए बड़ा प्रतिदान रख छोड़ा है।"
तफ़्सीर:
और अगर तुम अल्लाह की प्रसन्नता और उसके रसूल की प्रसन्नता चाहती हो, और आखिरत के घर में जन्नत चाहती हो, तो अपनी हालत पर सब्र करो। क्योंकि तुममें से जो सब्र और अच्छे रहन-सहन के साथ जीवन यापन करेगी, उसके लिए अल्लाह ने बहुत बड़ा बदला तैयार कर रखा है।
आयत 30
يَـٰنِسَآءَ ٱلنَّبِىِّ مَن يَأْتِ مِنكُنَّ بِفَـٰحِشَةٍۢ مُّبَيِّنَةٍۢ يُضَـٰعَفْ لَهَا ٱلْعَذَابُ ضِعْفَيْنِ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرًۭا
يَـٰنِسَآءَ
O wives
ٱلنَّبِىِّ
ऐ नबी की बीवियो
مَن
जो कोई
يَأْتِ
आएगी
مِنكُنَّ
तुम में से
بِفَـٰحِشَةٍۢ
बेहयाई को
مُّبَيِّنَةٍۢ
खुली
يُضَـٰعَفْ
बढ़ा दिया जाएगा
لَهَا
उसके लिए
ٱلْعَذَابُ
अज़ाब
ضِعْفَيْنِ ۚ
दोगुना
وَكَانَ
और है
ذَٰلِكَ
ये
عَلَى
for
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
يَسِيرًۭا
बहुत आसान
ऐ नबी की स्त्रियों! तुममें से जो कोई प्रत्यक्ष अनुचित कर्म करे तो उसके लिए दोहरी यातना होगी। और यह अल्लाह के लिए बहुत सरल है
तफ़्सीर:
ऐ नबी की स्त्रियो! तुममें से जो भी कोई स्पष्ट पाप करेगी, क़ियामत के दिन उसकी यातना दोगुनी कर दी जाएगी। ऐसा उसकी स्थिति और पद के कारण तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मान-सम्मान की रक्षा के लिए होगा। और यह दोगुनी यातना देना अल्लाह के लिए बहुत आसान है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सहाबा की कुर्बानी की मिसाल और नबी ﷺ के बेहतरीन नमूना होने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि नबी ﷺ की ज़िंदगी हर मुश्किल में हमारे लिए बेहतरीन नमूना है, उसी को अपनाना चाहिए।
आयत 31
۞ وَمَن يَقْنُتْ مِنكُنَّ لِلَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَتَعْمَلْ صَـٰلِحًۭا نُّؤْتِهَآ أَجْرَهَا مَرَّتَيْنِ وَأَعْتَدْنَا لَهَا رِزْقًۭا كَرِيمًۭا
۞ وَمَن
और जो कोई
يَقْنُتْ
इताअत करेगी
مِنكُنَّ
तुम में से
لِلَّهِ
अल्लाह की
وَرَسُولِهِۦ
और उसके रसूल की
وَتَعْمَلْ
और वो अमल करेगी
صَـٰلِحًۭا
नेक
نُّؤْتِهَآ
हम देंगे उसे
أَجْرَهَا
अजर उसका
مَرَّتَيْنِ
दो बार
وَأَعْتَدْنَا
और तैयार कर रखा है हमने
لَهَا
उसके लिए
رِزْقًۭا
रिज़्क़
كَرِيمًۭا
बाइज़्ज़त /उमदा
किन्तु तुममें से जो अल्लाह और उसके रसूल के प्रति निष्ठापूर्वक आज्ञाकारिता की नीति अपनाए और अच्छा कर्म करे, उसे हम दोहरा प्रतिदान प्रदान करेंगे और उसके लिए हमने सम्मानपूर्ण आजीविका तैयार कर रखी है
तफ़्सीर:
और तुममें से जो कोई निरंतर अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करे और अल्लाह के निकट पसंदीदा नेक कार्य करे, हम उसे दूसरी महिलाओं की तुलना में दोगुना सवाब देंगे। तथा हमने उसके लिए आखिरत में उत्तम (सम्मानजनक) बदला तैयार कर रखा है, जो कि जन्नत है।
आयत 32
يَـٰنِسَآءَ ٱلنَّبِىِّ لَسْتُنَّ كَأَحَدٍۢ مِّنَ ٱلنِّسَآءِ ۚ إِنِ ٱتَّقَيْتُنَّ فَلَا تَخْضَعْنَ بِٱلْقَوْلِ فَيَطْمَعَ ٱلَّذِى فِى قَلْبِهِۦ مَرَضٌۭ وَقُلْنَ قَوْلًۭا مَّعْرُوفًۭا
يَـٰنِسَآءَ
O wives
ٱلنَّبِىِّ
ऐ नबी की बीवियो
لَسْتُنَّ
नहीं हो तुम
كَأَحَدٍۢ
किसी एक की तरह
مِّنَ
among
ٱلنِّسَآءِ ۚ
औरतों में से
إِنِ
अगर
ٱتَّقَيْتُنَّ
तुम तक़वा इख़्तियार करो
فَلَا
तो ना
تَخْضَعْنَ
तुम लोच पैदा करना
بِٱلْقَوْلِ
बात में
فَيَطْمَعَ
वरना तमअ करेगा
ٱلَّذِى
वो शख़्स
فِى
in
قَلْبِهِۦ
जिसके दिल में
مَرَضٌۭ
मर्ज़ है
وَقُلْنَ
और कहो
قَوْلًۭا
बात
مَّعْرُوفًۭا
भली/मारूफ़
ऐ नबी की स्त्रियों! तुम सामान्य स्त्रियों में से किसी की तरह नहीं हो, यदि तुम अल्लाह का डर रखो। अतः तुम्हारी बातों में लोच न हो कि वह व्यक्ति जिसके दिल में रोग है, वह लालच में पड़ जाए। तुम सामान्य रूप से बात करो
तफ़्सीर:
ऐ नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पत्नियो! तुम प्रतिष्ठा और सम्मान में अन्य स्त्रियों के समान नहीं हो। बल्कि तुम प्रतिष्ठा एवं सम्मान में उस स्थान पर विराजमान हो, जहाँ तुम्हारे अलावा अन्य महिलाएँ नहीं पहुँच सकतीं, यदि तुम अल्लाह के आदेशों का पालन करती रहो और उसकी मना की हुई चीज़ों से बचती रहो। अतः जब तुम गैर-मह्रम पुरुषों से बात करो, तो बात को लचकदार और आवाज़ को कोमल न रखो कि जिसके दिल में निफ़ाक़ का रोग और हराम की वासना है, वह इसके कारण लालच कर बैठे। तथा संदेह से परे बात करो इस प्रकार कि वह ज़रूरत भर एक गंभीर बात हो, उपहास व मज़ाक न हो।
आयत 33
وَقَرْنَ فِى بُيُوتِكُنَّ وَلَا تَبَرَّجْنَ تَبَرُّجَ ٱلْجَـٰهِلِيَّةِ ٱلْأُولَىٰ ۖ وَأَقِمْنَ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتِينَ ٱلزَّكَوٰةَ وَأَطِعْنَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥٓ ۚ إِنَّمَا يُرِيدُ ٱللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنكُمُ ٱلرِّجْسَ أَهْلَ ٱلْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًۭا
وَقَرْنَ
और क़रार पकड़ो
فِى
in
بُيُوتِكُنَّ
अपने घरों में
وَلَا
और ना
تَبَرَّجْنَ
तुम इज़हारे ज़ीनत करो
تَبَرُّجَ
इज़हारे ज़ीनत
ٱلْجَـٰهِلِيَّةِ
जाहिलियत
ٱلْأُولَىٰ ۖ
पहली का
وَأَقِمْنَ
और क़ायम करो
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَءَاتِينَ
और अदा करो
ٱلزَّكَوٰةَ
ज़कात
وَأَطِعْنَ
और इताअत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَرَسُولَهُۥٓ ۚ
और उसके रसूल की
إِنَّمَا
बेशक
يُرِيدُ
चाहता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِيُذْهِبَ
कि वो ले जाए
عَنكُمُ
तुम से
ٱلرِّجْسَ
नापाकी को
أَهْلَ
(O) People
ٱلْبَيْتِ
ऐ अहले बैत
وَيُطَهِّرَكُمْ
और वो पाक कर दे तुम्हें
تَطْهِيرًۭا
ख़ूब पाक करना
अपने घरों में टिककर रहो और विगत अज्ञानकाल की-सी सज-धज न दिखाती फिरना। नमाज़ का आयोजन करो और ज़कात दो। और अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो। अल्लाह तो बस यही चाहता है कि ऐ नबी के घरवालो, तुमसे गन्दगी को दूर रखे और तुम्हें तरह पाक-साफ़ रखे
तफ़्सीर:
और तुम अपने घरों में ठहरी रहो। इसलिए ज़रूरत के बिना घर से बाहर न निकलो और इस्लाम से पूर्व की महिलाओं की तरह अपने सौन्दर्य का प्रदर्शन न करो, जो पुरुषों को रिझाने के लिए अपने सौन्दर्य का प्रदर्शन किया करती थीं। और नमाज़ को सबसे पूर्ण रूप से अदा करो और अपने धन की ज़कात दो और अल्लाह तथा उसके रसूल का आज्ञापालन करो। ऐ अल्लाह के रसूल की पत्नियो और ऐ आपके घर वालो, अल्लाह तो चाहता है कि तुमसे कष्ट और बुराई दूर कर दे। तथा वह चाहता है कि तुम्हारी आत्माओं को; शिष्टाचार से सुसज्जित एवं दुष्ट आचरण से रहित कर, इस तरह पूर्ण रूप से शुद्ध व पवित्र कर दे कि उसके पश्चात कोई गंदगी बाकी न रहे।
आयत 34
وَٱذْكُرْنَ مَا يُتْلَىٰ فِى بُيُوتِكُنَّ مِنْ ءَايَـٰتِ ٱللَّهِ وَٱلْحِكْمَةِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ لَطِيفًا خَبِيرًا
وَٱذْكُرْنَ
और याद रखो
مَا
उसको जो
يُتْلَىٰ
पढ़ा जाता है
فِى
in
بُيُوتِكُنَّ
तुम्हारे घरों में
مِنْ
of
ءَايَـٰتِ
आयात में से
ٱللَّهِ
अल्लाह की
وَٱلْحِكْمَةِ ۚ
और हिकमत में से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
لَطِيفًا
बहुत बारीक बीन
خَبِيرًا
ख़ूब बाख़बर
तुम्हारे घरों में अल्लाह की जो आयतें और तत्वदर्शिता की बातें सुनाई जाती है उनकी चर्चा करती रहो। निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त सूक्ष्मदर्शी, खबर रखनेवाला है
तफ़्सीर:
तुम्हारे घरों में जो अल्लाह के रसूल पर उतरने वाली आयतें और उसके रसूल की पवित्र सुन्नत पढ़ी जाती हैं, उन्हें याद रखो। निश्चय ही अल्लाह तुमपर बड़ा कृपालु है जब उसने तुमपर यह उपकार किया कि तुम्हें अपने रसूल के घरों में रखा, तथा वह तुमसे पूरी तरह अवगत है जब उसने तुम्हें अपने रसूल के लिए पत्नियों के रूप में चयन किया और तुम्हें आपकी उम्मत के समस्त मोमिनों की माओं के रूप में चुन लिया।
आयत 35
إِنَّ ٱلْمُسْلِمِينَ وَٱلْمُسْلِمَـٰتِ وَٱلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ وَٱلْقَـٰنِتِينَ وَٱلْقَـٰنِتَـٰتِ وَٱلصَّـٰدِقِينَ وَٱلصَّـٰدِقَـٰتِ وَٱلصَّـٰبِرِينَ وَٱلصَّـٰبِرَٰتِ وَٱلْخَـٰشِعِينَ وَٱلْخَـٰشِعَـٰتِ وَٱلْمُتَصَدِّقِينَ وَٱلْمُتَصَدِّقَـٰتِ وَٱلصَّـٰٓئِمِينَ وَٱلصَّـٰٓئِمَـٰتِ وَٱلْحَـٰفِظِينَ فُرُوجَهُمْ وَٱلْحَـٰفِظَـٰتِ وَٱلذَّٰكِرِينَ ٱللَّهَ كَثِيرًۭا وَٱلذَّٰكِرَٰتِ أَعَدَّ ٱللَّهُ لَهُم مَّغْفِرَةًۭ وَأَجْرًا عَظِيمًۭا
إِنَّ
बेशक
ٱلْمُسْلِمِينَ
मुसलमान मर्द
وَٱلْمُسْلِمَـٰتِ
और मुसलमान औरतें
وَٱلْمُؤْمِنِينَ
और मोमिन मर्द
وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ
और मोमिन औरतें
وَٱلْقَـٰنِتِينَ
और फ़रमाबरदार मर्द
وَٱلْقَـٰنِتَـٰتِ
और फ़रमाबरदार औरतें
وَٱلصَّـٰدِقِينَ
और सच्चे मर्द
وَٱلصَّـٰدِقَـٰتِ
और सच्ची औरतें
وَٱلصَّـٰبِرِينَ
और सब्र करने वाले मर्द
وَٱلصَّـٰبِرَٰتِ
और सब्र करने वाली औरतें
وَٱلْخَـٰشِعِينَ
और ख़ुशूअ करने वाले मर्द
وَٱلْخَـٰشِعَـٰتِ
और ख़ुशूअ करने वाली औरतें
وَٱلْمُتَصَدِّقِينَ
और सदक़ा देने वाले मर्द
وَٱلْمُتَصَدِّقَـٰتِ
और सदक़ा देने वाली औरतें
وَٱلصَّـٰٓئِمِينَ
और रोज़ा रखने वाले मर्द
وَٱلصَّـٰٓئِمَـٰتِ
और रोज़ा रखने वाली औरतें
وَٱلْحَـٰفِظِينَ
और हिफ़ाज़त करने वाले मर्द
فُرُوجَهُمْ
अपनी शर्म गाहों की
وَٱلْحَـٰفِظَـٰتِ
और हिफ़ाज़त करने वाली औरतें
وَٱلذَّٰكِرِينَ
और ज़िक्र करने वाले मर्द
ٱللَّهَ
अल्लाह का
كَثِيرًۭا
बहुत ज़्यादा
وَٱلذَّٰكِرَٰتِ
और ज़िक्र करने वाली औरतें
أَعَدَّ
तैयार कर रखी है
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
لَهُم
उनके लिए
مَّغْفِرَةًۭ
मग़फ़िरत
وَأَجْرًا
और अजर
عَظِيمًۭا
बहुत बड़ा
मुस्लिम पुरुष और मुस्लिम स्त्रियाँ, ईमानवाले पुरुष और ईमानवाली स्त्रियाँ, निष्ठा्पूर्वक आज्ञापालन करनेवाले पुरुष और निष्ठापूर्वक आज्ञापालन करनेवाली स्त्रियाँ, सत्यवादी पुरुष और सत्यवादी स्त्रियाँ, धैर्यवान पुरुष और धैर्य रखनेवाली स्त्रियाँ, विनम्रता दिखानेवाले पुरुष और विनम्रता दिखानेवाली स्त्रियाँ, सदक़ा (दान) देनेवाले पुरुष और सदक़ा देनेवाली स्त्रियाँ, रोज़ा रखनेवाले पुरुष और रोज़ा रखनेवाली स्त्रियाँ, अपने गुप्तांगों की रक्षा करनेवाले पुरुष और रक्षा करनेवाली स्त्रियाँ और अल्लाह को अधिक याद करनेवाले पुरुष और याद करनेवाली स्त्रियाँ - इनके लिए अल्लाह ने क्षमा और बड़ा प्रतिदान तैयार कर रखा है
तफ़्सीर:
आज्ञाकारिता के साथ अल्लाह के अधीन होने वाले पुरुष और अधीन होने वाली स्त्रियाँ, अल्लाह को सच्चा मानने वाले पुरुष और सच्चा मानने वाली स्त्रियाँ, अल्लाह का आज्ञापालन करने वाले पुरुष और आज्ञापालन करने वाली स्त्रियाँ, अपने ईमान और कथन में सच्चे पुरुष और सच्ची स्त्रियाँ, आज्ञाकारिता के कामों पर और गुनाहों से दूर रहने में और विपत्ति पर धैर्य से काम लेने वाले पुरुष और धैर्य से काम लेने वाली स्त्रियाँ, अनिवार्य और स्वैच्छिक दान करने वाले पुरुष और दान करने वाली स्त्रियाँ, अल्लाह के लिए अनिवार्य और स्वैच्छिक रोज़ा रखने वाले पुरुष और रोज़ा रखने वाली स्त्रियाँ, अपने गुप्तांगों की रक्षा करने वाले पुरुष और अपने गुप्तांगों की रक्षा करने वाली स्त्रियाँ; उन्हें ऐसे व्यक्ति के सामने प्रकट करने से ढककर, जिसके लिए उन्हें देखना जायज़ नहीं है तथा व्यभिचार के दुष्कर्म और उसकी प्रारंभिक चीज़ों से दूर रहकर, तथा अपने दिलों और अपनी ज़बानों से गुप्त और खुले तौर पर अल्लाह को बहुत अधिक याद करने वाले पुरुष और याद करने वाली स्त्रियाँ - अल्लाह ने उनके लिए अपनी ओर से उनके पापों के लिए क्षमा, तथा क़ियामत के दिन उनके लिए बहुत बड़ा बदला तैयार कर रखा है और वह जन्नत है।
आयत 36
وَمَا كَانَ لِمُؤْمِنٍۢ وَلَا مُؤْمِنَةٍ إِذَا قَضَى ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥٓ أَمْرًا أَن يَكُونَ لَهُمُ ٱلْخِيَرَةُ مِنْ أَمْرِهِمْ ۗ وَمَن يَعْصِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَـٰلًۭا مُّبِينًۭا
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
لِمُؤْمِنٍۢ
किसी मोमिन मर्द के लिए
وَلَا
और ना
مُؤْمِنَةٍ
किसी मोमिन औरत के लिए
إِذَا
जब
قَضَى
फ़ैसला कर दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
وَرَسُولُهُۥٓ
और उसका रसूल
أَمْرًا
किसी मामले का
أَن
कि
يَكُونَ
हो
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلْخِيَرَةُ
कोई इख़्तियार
مِنْ
about
أَمْرِهِمْ ۗ
अपने मामले में से
وَمَن
और जो कोई
يَعْصِ
नाफ़रमानी करेगा
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَرَسُولَهُۥ
और उसके रसूल की
فَقَدْ
तो तहक़ीक
ضَلَّ
वो भटक गया
ضَلَـٰلًۭا
भटकना
مُّبِينًۭا
खुल्लम-खुल्ला
न किसी ईमानवाले पुरुष और न किसी ईमानवाली स्त्री को यह अधिकार है कि जब अल्लाह और उसका रसूल किसी मामले का फ़ैसला कर दें, तो फिर उन्हें अपने मामले में कोई अधिकार शेष रहे। जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करे तो वह खुली गुमराही में पड़ गया
तफ़्सीर:
किसी ईमान वाले पुरुष और ईमान वाली स्त्री के लिए यह ठीक नहीं है कि जब अल्लाह और उसका रसूल किसी बात का निर्णय कर दें, तो उनके लिए उसे स्वीकार करने या अस्वीकार करने का विकल्प बाक़ी रहे। और जो अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करे, तो वह स्पष्ट रूप से सीधे रास्ते से भटक गया।
आयत 37
وَإِذْ تَقُولُ لِلَّذِىٓ أَنْعَمَ ٱللَّهُ عَلَيْهِ وَأَنْعَمْتَ عَلَيْهِ أَمْسِكْ عَلَيْكَ زَوْجَكَ وَٱتَّقِ ٱللَّهَ وَتُخْفِى فِى نَفْسِكَ مَا ٱللَّهُ مُبْدِيهِ وَتَخْشَى ٱلنَّاسَ وَٱللَّهُ أَحَقُّ أَن تَخْشَىٰهُ ۖ فَلَمَّا قَضَىٰ زَيْدٌۭ مِّنْهَا وَطَرًۭا زَوَّجْنَـٰكَهَا لِكَىْ لَا يَكُونَ عَلَى ٱلْمُؤْمِنِينَ حَرَجٌۭ فِىٓ أَزْوَٰجِ أَدْعِيَآئِهِمْ إِذَا قَضَوْا۟ مِنْهُنَّ وَطَرًۭا ۚ وَكَانَ أَمْرُ ٱللَّهِ مَفْعُولًۭا
وَإِذْ
और जब
تَقُولُ
आप कह रहे थे
لِلَّذِىٓ
उस शख़्स से
أَنْعَمَ
इनाम किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَيْهِ
जिस पर
وَأَنْعَمْتَ
और इनाम किया आपने
عَلَيْهِ
जिस पर
أَمْسِكْ
रोक रख
عَلَيْكَ
अपने पास
زَوْجَكَ
अपनी बीवी को
وَٱتَّقِ
और डर
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَتُخْفِى
और आप छुपाते थे
فِى
within
نَفْسِكَ
अपने दिल में
مَا
वो जो
ٱللَّهُ
अल्लाह
مُبْدِيهِ
ज़ाहिर करने वाला था उसे
وَتَخْشَى
और आप डर रहे थे
ٱلنَّاسَ
लोगों से
وَٱللَّهُ
हालाँकि अल्लाह
أَحَقُّ
ज़्यादा हक़दार है
أَن
कि
تَخْشَىٰهُ ۖ
आप डरें उससे
فَلَمَّا
फिर जब
قَضَىٰ
पूरी कर चुका
زَيْدٌۭ
ज़ैद
مِّنْهَا
उससे
وَطَرًۭا
हाजत
زَوَّجْنَـٰكَهَا
निकाह कर दिया हमने आपका उससे
لِكَىْ
so that
لَا
ताकि ना
يَكُونَ
हो
عَلَى
on
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों पर
حَرَجٌۭ
कोई तंगी
فِىٓ
concerning
أَزْوَٰجِ
बीवियों के मामले में
أَدْعِيَآئِهِمْ
अपने मुँह बोले बेटों की
إِذَا
जब
قَضَوْا۟
वो पूरा कर चुकें
مِنْهُنَّ
उनसे
وَطَرًۭا ۚ
हाजत
وَكَانَ
और है
أَمْرُ
हुक्म
ٱللَّهِ
अल्लाह का
مَفْعُولًۭا
होकर रहने वाला
याद करो (ऐ नबी), जबकि तुम उस व्यक्ति से कह रहे थे जिसपर अल्लाह ने अनुकम्पा की, और तुमने भी जिसपर अनुकम्पा की कि "अपनी पत्नी को अपने पास रोक रखो और अल्लाह का डर रखो, और तुम अपने जी में उस बात को छिपा रहे हो जिसको अल्लाह प्रकट करनेवाला है। तुम लोगों से डरते हो, जबकि अल्लाह इसका ज़्यादा हक़ रखता है कि तुम उससे डरो।" अतः जब ज़ैद उससे अपनी ज़रूरत पूरी कर चुका तो हमने उसका तुमसे विवाह कर दिया, ताकि ईमानवालों पर अपने मुँह बोले बेटों की पत्नियों के मामले में कोई तंगी न रहे जबकि वे उनसे अपनी ज़रूरत पूरी कर लें। अल्लाह का फ़ैसला तो पूरा होकर ही रहता है
तफ़्सीर:
और जब आप (ऐ रसूल) उस व्यक्ति से, जिसपर अल्लाह ने इस्लाम के द्वारा उपकार किया और आपने उसे आज़ाद करके उसपर उपकार किया - इससे अभिप्राय ज़ैद बिन हारिसा रज़ियल्लाहु अन्हुमा हैं, जब वह आपके पास अपनी पत्नी ज़ैनब बिन्ते जहश को तलाक़ देने के संबंध में परामर्श करने आए - आप उससे कह रहे थे : अपनी पत्नी को अपने पास रोके रखो और उसे तलाक़ न दो। और अल्लाह के आदेशों का पालन करके एवं उसके निषेधों से बचकर उससे डरो। तथा (ऐ रसूल) आप अपने दिल में ज़ैनब से अपनी शादी की बात, जिसकी अल्लाह ने आपकी ओर वह़्य उतारी थी, लोगों के भय से छिपा रहे थे। जबकि अल्लाह ज़ैद के उसे तलाक़ देने फिर आपके उससे विवाह का मामला प्रकट करने वाला था। हालाँकि अल्लाह इस बात का अधिक योग्य है कि आप इस मामले में उससे डरें। फिर जब ज़ैद का मन ज़ैनब से अलग होने पर संतुष्ट हो गया और उसे तलाक़ दे दी, तो हमने आपका उससे विवाह कर दिया, ताकि ईमान वालों पर अपने मुँह बोले बेटों की पत्नियों से विवाह करने में कोई पाप न रहे, यदि वे उन्हें तलाक दे दें और उनकी इद्दत समाप्त हो जाए। और अल्लाह का आदेश पूरा होकर ही रहता है, उसे कोई रोकने वाला और उसके आगे कोई बाधक नहीं है।
आयत 38
مَّا كَانَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ مِنْ حَرَجٍۢ فِيمَا فَرَضَ ٱللَّهُ لَهُۥ ۖ سُنَّةَ ٱللَّهِ فِى ٱلَّذِينَ خَلَوْا۟ مِن قَبْلُ ۚ وَكَانَ أَمْرُ ٱللَّهِ قَدَرًۭا مَّقْدُورًا
مَّا
नहीं
كَانَ
है
عَلَى
upon
ٱلنَّبِىِّ
नबी पर
مِنْ
any
حَرَجٍۢ
कोई तंगी
فِيمَا
उसमें जो
فَرَضَ
मुक़र्रर किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
لَهُۥ ۖ
उसके लिए
سُنَّةَ
तरीक़ा है
ٱللَّهِ
अल्लाह का
فِى
concerning
ٱلَّذِينَ
उन लोगों में जो
خَلَوْا۟
गुज़र चुके
مِن
before
قَبْلُ ۚ
इससे पहले
وَكَانَ
और है
أَمْرُ
हुक्म
ٱللَّهِ
अल्लाह का
قَدَرًۭا
एक अंदाज़ा
مَّقْدُورًا
मुक़र्रर किया हुआ
नबी पर उस काम में कोई तंगी नहीं जो अल्लाह ने उसके लिए ठहराया हो। यही अल्लाह का दस्तूर उन लोगों के मामले में भी रहा है जो पहले गुज़र चुके है - और अल्लाह का काम तो जँचा-तुला होता है। -
तफ़्सीर:
नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उस चीज़ में कोई गुनाह या तंगी नहीं है, जो अल्लाह ने उनके लिए अपने दत्तक पुत्र की पत्नी से विवाह करना वैध कर दिया है। वह इस विषय में अपने पूर्व नबियों की सुन्नत (तरीक़े) का पालन कर रहे हैं। इसलिए वह इस मामले में कोई अनोखे रसूल नहीं हैं। तथा अल्लाह जो निर्णय कर देता है (जैसे कि इस शादी के पूरा होने और गोद लेने की प्रथा को अमान्य घोषित करने और इसमें नबी की कोई राय या पसंद न होने का) वह पूरा होकर रहता है, उसे कोई टाल नहीं सकता।
आयत 39
ٱلَّذِينَ يُبَلِّغُونَ رِسَـٰلَـٰتِ ٱللَّهِ وَيَخْشَوْنَهُۥ وَلَا يَخْشَوْنَ أَحَدًا إِلَّا ٱللَّهَ ۗ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ حَسِيبًۭا
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يُبَلِّغُونَ
पहुँचाते हैं
رِسَـٰلَـٰتِ
पैग़ामात
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَيَخْشَوْنَهُۥ
और वो डरते हैं उससे
وَلَا
और नहीं
يَخْشَوْنَ
वो डरते
أَحَدًا
किसी एक से भी
إِلَّا
सिवाए
ٱللَّهَ ۗ
अल्लाह के
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِٱللَّهِ
अल्लाह
حَسِيبًۭا
हिसाब लेने वाला
जो अल्लाह के सन्देश पहुँचाते थे और उसी से डरते थे और अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरते थे। और हिसाब लेने के लिए अल्लाह काफ़ी है। -
तफ़्सीर:
ये नबीगण, जो अपने ऊपर उतरने वाले अल्लाह के संदेशों को अपने समुदायों तक पहुँचाते हैं, और सर्वशक्तिमान व महिमावान अल्लाह के अलावा किसी से भी नहीं डरते।इसलिए वे इस बात पर ध्यान नहीं देते कि दूसरे क्या कहते हैं जब वे उस चीज़ को करते हैं जिसकी अल्लाह ने उन्हें अनुमति दी है। और अल्लाह अपने बंदों के कृत्यों को संरक्षित रखने के लिए पर्याप्त है, ताकि उनका हिसाब ले और उन्हें उनका बदला दे; अच्छे कर्म का अच्छा बदला और बुरे कर्म का बुरा बदला।
आयत 40
مَّا كَانَ مُحَمَّدٌ أَبَآ أَحَدٍۢ مِّن رِّجَالِكُمْ وَلَـٰكِن رَّسُولَ ٱللَّهِ وَخَاتَمَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمًۭا
مَّا
नहीं
كَانَ
हैं
مُحَمَّدٌ
मुहम्मद
أَبَآ
बाप
أَحَدٍۢ
किसी एक के
مِّن
of
رِّجَالِكُمْ
तुम्हारे मर्दों में से
وَلَـٰكِن
और लेकिन
رَّسُولَ
रसूल हैं
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَخَاتَمَ
and Seal
ٱلنَّبِيِّـۧنَ ۗ
और ख़ात्म अन नबिय्यीन हैं
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ को
عَلِيمًۭا
ख़ूब जानने वाला
मुहम्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के बाप नहीं है, बल्कि वे अल्लाह के रसूल और नबियों के समापक है। अल्लाह को हर चीज़ का पूरा ज्ञान है
तफ़्सीर:
मुहम्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के पिता नहीं हैं। अतः वह ज़ैद के भी पिता नहीं हैं कि उनपर ज़ैद की तलाक़ दी हुई पत्नी से विवाह करना हराम (वर्जित) हो। बल्कि वह लोगों की ओर अल्लाह के भेजे हुए रसूल हैं और नबियों की श्रृंखला को समाप्त करने वाले हैं।इसलिए उनके बाद कोई और नबी नहीं है। और अल्लाह हर चीज़ का पूर्ण ज्ञान रखने वाला है, उसके बंदों की कोई चीज़ उससे छिपी नहीं है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नबी ﷺ के घरवालों के हुकूक और ज़िम्मेदारियों का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि जिसे ज़्यादा नेमत मिली हो, उससे ज़्यादा ज़िम्मेदारी की उम्मीद की जाती है।
आयत 41
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ ذِكْرًۭا كَثِيرًۭا
يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
जो ईमान लाए हो
ٱذْكُرُوا۟
ज़िक्र करो
ٱللَّهَ
अल्लाह का
ذِكْرًۭا
ज़िक्र करना
كَثِيرًۭا
कसरत से
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह को अधिक याद करो
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो, तुम अपने दिलों, ज़ुबानों और शारीरिक अंगों से अल्लाह को बहुत याद करते रहो।
आयत 42
وَسَبِّحُوهُ بُكْرَةًۭ وَأَصِيلًا
وَسَبِّحُوهُ
और तस्बीह करो उसकी
بُكْرَةًۭ
सुबह
وَأَصِيلًا
और शाम
और प्रातःकाल और सन्ध्या समय उसकी तसबीह करते रहो -
तफ़्सीर:
तथा दिन की शुरुआत और उसके अंत में 'तस्बीह' (सुब्हानल्लाह) और 'तहलील' (ला इलाहा इल्लल्लाह) के द्वारा उसकी पवित्रता बयान करते रहो, क्योंकि ये दोनों प्रतिष्ठा वाले समय हैं।
आयत 43
هُوَ ٱلَّذِى يُصَلِّى عَلَيْكُمْ وَمَلَـٰٓئِكَتُهُۥ لِيُخْرِجَكُم مِّنَ ٱلظُّلُمَـٰتِ إِلَى ٱلنُّورِ ۚ وَكَانَ بِٱلْمُؤْمِنِينَ رَحِيمًۭا
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِى
जो
يُصَلِّى
रहमत भेजता है
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَمَلَـٰٓئِكَتُهُۥ
और उसके फ़रिश्ते(दुआ करते हैं)
لِيُخْرِجَكُم
ताकि वो निकाले तुम्हें
مِّنَ
from
ٱلظُّلُمَـٰتِ
अंधेरों से
إِلَى
to
ٱلنُّورِ ۚ
तरफ़ रौशनी के
وَكَانَ
और है वो
بِٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों पर
رَحِيمًۭا
ख़ूब रहम फ़रमाने वाला
वही है जो तुमपर रहमत भेजता है और उसके फ़रिश्ते भी (दुआएँ करते है) - ताकि वह तुम्हें अँधरों से प्रकाश की ओर निकाल लाए। वास्तव में, वह ईमानवालों पर बहुत दयालु है
तफ़्सीर:
वही है, जो तुमपर दया करता है और तुम्हारी प्रशंसा करता है, तथा उसके फ़रिश्ते भी तुम्हारे लिए दुआ करते हैं, ताकि वह तुम्हें कुफ़्र के अँधेरों से निकाल कर ईमान के प्रकाश की ओर लाए। और वह ईमान वालों पर बहुत दयालु है। अतः यदि वे उसकी बात मानते हुए, उसके आदेश का पालन करें और उसके निषेध से बचें, तो वह उन्हें यातना नहीं देता है।
आयत 44
تَحِيَّتُهُمْ يَوْمَ يَلْقَوْنَهُۥ سَلَـٰمٌۭ ۚ وَأَعَدَّ لَهُمْ أَجْرًۭا كَرِيمًۭا
تَحِيَّتُهُمْ
उनकी दुआ होगी
يَوْمَ
जिस दिन
يَلْقَوْنَهُۥ
वो मिलेंगे उससे
سَلَـٰمٌۭ ۚ
सलाम
وَأَعَدَّ
और उसने तैयार कर रखा है
لَهُمْ
उनके लिए
أَجْرًۭا
अजर
كَرِيمًۭا
उम्दा/बाइज़्ज़त
जिस दिन वे उससे मिलेंगे उनका अभिवादन होगा, सलाम और उनके लिए प्रतिष्ठामय प्रदान तैयार कर रखा है
तफ़्सीर:
ईमान वाले जिस दिन अपने पालनहार से मिलेंगे, उस दिन उनका अभिवादन सलाम (शांति) और हर प्रकार की बुराई से सुरक्षा होगी। और अल्लाह ने उनके लिए सम्मानजनक (व उदार) बदला - अपना स्वर्ग - तैयार कर रखा है। यह उनके उसका आज्ञापालन करने और उसकी अवज्ञा से दूर रहने का बदला है।
आयत 45
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ إِنَّآ أَرْسَلْنَـٰكَ شَـٰهِدًۭا وَمُبَشِّرًۭا وَنَذِيرًۭا
يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلنَّبِىُّ
नबी
إِنَّآ
बेशक हम
أَرْسَلْنَـٰكَ
भेजा हमने आपको
شَـٰهِدًۭا
गवाही देने वाला
وَمُبَشِّرًۭا
और ख़ुशख़बरी देने वाला
وَنَذِيرًۭا
और डराने वाला (बना कर)
ऐ नबी! हमने तुमको साक्षी और शुभ सूचना देनेवाला और सचेल करनेवाला बनाकर भेजा है;
तफ़्सीर:
ऐ नबी! हमने आपको लोगों की ओर, उनपर इस बात का गवाह बनाकर भेजा है कि आपने उन्हें वह संदेश पहुँचा दिया जिसके साथ आप उनकी ओर भेजे गए थे, तथा उनमें से ईमान वालों को उस जन्नत की शुभ सूचना देने वाला जो अल्लाह ने उनके लिए तैयार कर रखी है तथा काफिरों को उसकी यातना से डराने वाला बनाकर भेजा है।
आयत 46
وَدَاعِيًا إِلَى ٱللَّهِ بِإِذْنِهِۦ وَسِرَاجًۭا مُّنِيرًۭا
وَدَاعِيًا
और दावत देने वाला
إِلَى
to
ٱللَّهِ
तरफ़ अल्लाह के
بِإِذْنِهِۦ
उसके इज़न से
وَسِرَاجًۭا
और चिराग़
مُّنِيرًۭا
रौशन
और अल्लाह की अनुज्ञा से उसकी ओर बुलानेवाला और प्रकाशमान प्रदीप बनाकर
तफ़्सीर:
हमने आपको अल्लाह के आदेश से उसके एकेश्वरवाद और उसकी आज्ञाकारिता की ओर बुलाने वाला बनाकर भेजा है। तथा हमने आपको एक प्रकाशमान् दीप बनाकर भेजा है, जिससे हर मार्गदर्शन चाहने वाला प्रकाश प्राप्त करता है।
आयत 47
وَبَشِّرِ ٱلْمُؤْمِنِينَ بِأَنَّ لَهُم مِّنَ ٱللَّهِ فَضْلًۭا كَبِيرًۭا
وَبَشِّرِ
और ख़ुशख़बरी दे दीजिए
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों को
بِأَنَّ
कि बेशक
لَهُم
उनके लिए
مِّنَ
(is) from
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से है
فَضْلًۭا
फ़ज़ल
كَبِيرًۭا
बहुत बड़ा
ईमानवालों को शुभ सूचना दे दो कि उनके लिए अल्लाह को ओर से बहुत बड़ा उदार अनुग्रह है
तफ़्सीर:
तथा आप अल्लाह पर ईमान रखने वाले उन लोगों को, जो उसकी शरीयत पर अमल करते हैं, शुभ सूचना दे दें कि उनके लिए अल्लाह की ओर से बहुत बड़ा अनुग्रह है, जिसमें इस दुनिया में उनकी मदद तथा आखिरत में जन्नत में प्रवेश करने की सफलता शामिल है।
आयत 48
وَلَا تُطِعِ ٱلْكَـٰفِرِينَ وَٱلْمُنَـٰفِقِينَ وَدَعْ أَذَىٰهُمْ وَتَوَكَّلْ عَلَى ٱللَّهِ ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ وَكِيلًۭا
وَلَا
और ना
تُطِعِ
आप इताअत कीजिए
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों की
وَٱلْمُنَـٰفِقِينَ
और मुनाफ़िक़ों की
وَدَعْ
और नज़र अंदाज़ कर दीजिए
أَذَىٰهُمْ
उनकी अज़ियत रसानी को
وَتَوَكَّلْ
और तवक्कल कीजिए
عَلَى
in
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह पर
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِٱللَّهِ
अल्लाह
وَكِيلًۭا
कारसाज़
और इनकार करनेवालों और कपटाचारियों के कहने में न आना। उनकी पहुँचाई हुई तकलीफ़ का ख़याल न करो। और अल्लाह पर भरोसा रखो। अल्लाह इसके लिए काफ़ी है कि अपने मामले में उसपर भरोसा किया जाए
तफ़्सीर:
आप काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों का उस चीज़ में पालन न करें, जो वे अल्लाह के धर्म से रोकने की ओर बुलाते हैं। तथा उनसे उपेक्षा करें। शायद यह इस बात का अधिक प्रेरक हो कि वे उस चीज़ पर ईमान ले आएँ जिसे लेकर आप उनके पास आए हैं। आप अपने सभी मामलों में अल्लाह पर भरोसा करें; जिनमें अपने दुश्मनों पर जीत भी शामिल है। तथा अल्लाह कारसाज़ (काम बनानेवाले) के रूप में पर्याप्त है, जिसपर बंदे अपने दुनिया और आख़िरत के सभी मामलों में भरोसा करते हैं।
आयत 49
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِذَا نَكَحْتُمُ ٱلْمُؤْمِنَـٰتِ ثُمَّ طَلَّقْتُمُوهُنَّ مِن قَبْلِ أَن تَمَسُّوهُنَّ فَمَا لَكُمْ عَلَيْهِنَّ مِنْ عِدَّةٍۢ تَعْتَدُّونَهَا ۖ فَمَتِّعُوهُنَّ وَسَرِّحُوهُنَّ سَرَاحًۭا جَمِيلًۭا
يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
إِذَا
जब
نَكَحْتُمُ
निकाह करो तुम
ٱلْمُؤْمِنَـٰتِ
मोमिन औरतों से
ثُمَّ
फिर
طَلَّقْتُمُوهُنَّ
तलाक़ दे दो तुम उन्हें
مِن
before
قَبْلِ
इससे पहले
أَن
कि
تَمَسُّوهُنَّ
तुम छुओ उन्हें
فَمَا
तो नहीं
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
عَلَيْهِنَّ
उन पर
مِنْ
any
عِدَّةٍۢ
कोई इद्दत
تَعْتَدُّونَهَا ۖ
तुम शुमार करो उसे
فَمَتِّعُوهُنَّ
तो कुछ फ़ायदा दो उन्हें
وَسَرِّحُوهُنَّ
और रुख़्सत करो उन्हें
سَرَاحًۭا
रुख़्सत करना
جَمِيلًۭا
भले तरीक़े से
ऐ ईमान लानेवालो! जब तुम ईमान लानेवाली स्त्रियों से विवाह करो और फिर उन्हें हाथ लगाने से पहले तलाक़ दे दो तो तुम्हारे लिए उनपर कोई इद्दत नहीं, जिसकी तुम गिनती करो। अतः उन्हें कुछ सामान दे दो और भली रीति से विदा कर दो
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो! जब ईमान वाली महिलाओं से विवाह करो, फिर उनके साथ सहवास करने से पूर्व ही उन्हें तलाक़ दे दो, तो ऐसे में तुम्हारे लिए उनपर 'इद्दत' नहीं है, चाहे वह मासिक धर्म के द्वारा हो या महीनों के द्वारा। क्योंकि उनके साथ सहवास न होने के कारण यह ज्ञात है कि उनका गर्भ खाली है। तथा तलाक़ के कारण उनके टूटे हुए दिलों की सांत्वना के लिए, अपनी क्षमता के अनुसार उन्हें कुछ धन दे दो। और उन्हें कष्ट पहुँचाए बिना, भलाई के साथ उनका रास्ता छोड़ दो।
आयत 50
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ إِنَّآ أَحْلَلْنَا لَكَ أَزْوَٰجَكَ ٱلَّـٰتِىٓ ءَاتَيْتَ أُجُورَهُنَّ وَمَا مَلَكَتْ يَمِينُكَ مِمَّآ أَفَآءَ ٱللَّهُ عَلَيْكَ وَبَنَاتِ عَمِّكَ وَبَنَاتِ عَمَّـٰتِكَ وَبَنَاتِ خَالِكَ وَبَنَاتِ خَـٰلَـٰتِكَ ٱلَّـٰتِى هَاجَرْنَ مَعَكَ وَٱمْرَأَةًۭ مُّؤْمِنَةً إِن وَهَبَتْ نَفْسَهَا لِلنَّبِىِّ إِنْ أَرَادَ ٱلنَّبِىُّ أَن يَسْتَنكِحَهَا خَالِصَةًۭ لَّكَ مِن دُونِ ٱلْمُؤْمِنِينَ ۗ قَدْ عَلِمْنَا مَا فَرَضْنَا عَلَيْهِمْ فِىٓ أَزْوَٰجِهِمْ وَمَا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُهُمْ لِكَيْلَا يَكُونَ عَلَيْكَ حَرَجٌۭ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا
يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلنَّبِىُّ
नबी
إِنَّآ
बेशक हम
أَحْلَلْنَا
हलाल कर दीं हमने
لَكَ
आपके लिए
أَزْوَٰجَكَ
बीवियाँ आपकी
ٱلَّـٰتِىٓ
वो जिन्हें
ءَاتَيْتَ
दिए आपने
أُجُورَهُنَّ
महर उनके
وَمَا
और जिनका
مَلَكَتْ
मालिक है
يَمِينُكَ
दायाँ हाथ आपका
مِمَّآ
उसमें से जो
أَفَآءَ
लौटाया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَيْكَ
आप पर
وَبَنَاتِ
और बेटियाँ
عَمِّكَ
आपके चचा की
وَبَنَاتِ
और बेटियाँ
عَمَّـٰتِكَ
आपकी फ़ूफ़ीयों की
وَبَنَاتِ
और बेटियाँ
خَالِكَ
आपके मामूं की
وَبَنَاتِ
और बेटियाँ
خَـٰلَـٰتِكَ
आपकी ख़ालाओं की
ٱلَّـٰتِى
वो जिन्होंने
هَاجَرْنَ
हिजरत की
مَعَكَ
आपके साथ
وَٱمْرَأَةًۭ
और कोई औरत
مُّؤْمِنَةً
मोमिना
إِن
अगर
وَهَبَتْ
वो हिबा कर दे
نَفْسَهَا
अपने नफ़्स को
لِلنَّبِىِّ
नबी के लिए
إِنْ
अगर
أَرَادَ
इरादा करें
ٱلنَّبِىُّ
नबी
أَن
कि
يَسْتَنكِحَهَا
वो निकाह करें उससे
خَالِصَةًۭ
ख़ास है
لَّكَ
आपके लिए
مِن
excluding
دُونِ
सिवाए
ٱلْمُؤْمِنِينَ ۗ
मोमिनें के
قَدْ
तहक़ीक़
عَلِمْنَا
जान लिया हमने
مَا
जो
فَرَضْنَا
फ़र्ज़ किया हमने
عَلَيْهِمْ
उन पर
فِىٓ
concerning
أَزْوَٰجِهِمْ
उनकी बीवियों के मामले में
وَمَا
और जिनके
مَلَكَتْ
मालिक हैं
أَيْمَـٰنُهُمْ
दाऐं हाथ उनके
لِكَيْلَا
ताकि ना
يَكُونَ
हो
عَلَيْكَ
आप पर
حَرَجٌۭ ۗ
कोई तंगी
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
غَفُورًۭا
बहुत बख़्शने वाला
رَّحِيمًۭا
निहायत रहम करने वाला
ऐ नबी! हमने तुम्हारे लिए तुम्हारी वे पत्नियों वैध कर दी है जिनके मह्रक तुम दे चुके हो, और उन स्त्रियों को भी जो तुम्हारी मिल्कियत में आई, जिन्हें अल्लाह ने ग़नीमत के रूप में तुम्हें दी और तुम्हारी चचा की बेटियाँ और तुम्हारी फूफियों की बेटियाँ और तुम्हारे मामुओं की बेटियाँ और तुम्हारी ख़ालाओं की बेटियाँ जिन्होंने तुम्हारे साथ हिजरत की है और वह ईमानवाली स्त्री जो अपने आपको नबी के लिए दे दे, यदि नबी उससे विवाह करना चाहे। ईमानवालों से हटकर यह केवल तुम्हारे ही लिए है, हमें मालूम है जो कुछ हमने उनकी पत्ऩियों और उनकी लौड़ियों के बारे में उनपर अनिवार्य किया है - ताकि तुमपर कोई तंगी न रहे। अल्लाह बहुत क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
ऐ नबी! हमने आपके लिए आपकी उन पत्नियों को वैध कर दिया है, जिन्हें आपने उनका महर चुका दिया है। तथा हमने आपके लिए उन दासियों को भी हलाल किया है, जो आपके स्वामित्व में हैं, जो अल्लाह ने आपको बंदी औरतों में से प्रदान की हैं। और हमने आपके लिए हलाल किया है आपके चाचा की बेटियों के साथ विवाह, आपकी फूफियों की बेटियों के साथ विवाह, आपके मामा की बेटियों के साथ विवाह और आपकी मौसियों की बेटियों के साथ विवाह, जो आपके साथ मक्का से मदीना की ओर हिजरत करके आई हैं। तथा हमने आपके लिए उस ईमान वाली महिला से भी विवाह करना हलाल किया है जो बिना महर के स्वयं को आपको भेंट कर दे, यदि आप उससे निकाह करना चाहें। और हिबा (अनुदान) का विवाह केवल आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लिए विशिष्ट है, आपके अलावा उम्मत के किसी अन्य व्यक्ति के लिए जायज़ नहीं है। हमें जानते हैं जो कुछ हमने ईमान वालों पर उनकी पत्नियों के संबंध में अनिवार्य किया है कि उनके लिए चार स्त्रियों की सीमा पार करना वैध नहीं है। तथा हम वह भी जानते हैं जो हमने उनकी दासियों के संबंध में उनके लिए धर्मसंगत किया है कि उनके लिए किसी संख्या के प्रतिबंध के बिना उनमें से जितनी से चाहें, लाभ उठाने का अधिकार हैं। हमने उल्लिखित चीज़ों में से आपके लिए जो कुछ वैध किया है, जो हमने आपके अलावा के लिए अनुमेय नहीं किया; यह इसलिए है ताकि आपपर कोई तंगी और कष्ट न रहे। और अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को बहुत क्षमा करने वाला, उनपर अत्यंत दयालु है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह की याद (ज़िक्र) की ताकीद का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि सुबह-शाम अल्लाह को याद करना दिल को मज़बूती और सुकून देता है।
आयत 51
۞ تُرْجِى مَن تَشَآءُ مِنْهُنَّ وَتُـْٔوِىٓ إِلَيْكَ مَن تَشَآءُ ۖ وَمَنِ ٱبْتَغَيْتَ مِمَّنْ عَزَلْتَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكَ ۚ ذَٰلِكَ أَدْنَىٰٓ أَن تَقَرَّ أَعْيُنُهُنَّ وَلَا يَحْزَنَّ وَيَرْضَيْنَ بِمَآ ءَاتَيْتَهُنَّ كُلُّهُنَّ ۚ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ مَا فِى قُلُوبِكُمْ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلِيمًا حَلِيمًۭا
۞ تُرْجِى
आप दूर रखें
مَن
जिसे
تَشَآءُ
आप चाहें
مِنْهُنَّ
उनमें से
وَتُـْٔوِىٓ
और आप जगह दें
إِلَيْكَ
अपने पास
مَن
जिसे
تَشَآءُ ۖ
आप चाहें
وَمَنِ
और जिसे
ٱبْتَغَيْتَ
तलब करें आप
مِمَّنْ
उनमें से जिसे
عَزَلْتَ
अलग कर दिया हो आपने
فَلَا
तो नहीं
جُنَاحَ
कोई गुनाह
عَلَيْكَ ۚ
आप पर
ذَٰلِكَ
ये
أَدْنَىٰٓ
क़रीबतर है
أَن
कि
تَقَرَّ
ठंडी हों
أَعْيُنُهُنَّ
आँखें उनकी
وَلَا
और ना
يَحْزَنَّ
वो ग़मगीन हों
وَيَرْضَيْنَ
और वो राज़ी रहें
بِمَآ
उस पर जो
ءَاتَيْتَهُنَّ
दें आप उन्हें
كُلُّهُنَّ ۚ
सब की सब
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَعْلَمُ
वो जानता है
مَا
जो
فِى
(is) in
قُلُوبِكُمْ ۚ
तुम्हारे दिलों में है
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلِيمًا
बहुत इल्म वाला
حَلِيمًۭا
ख़ूब हिल्म वाला
तुम उनमें से जिसे चाहो अपने से अलग रखो और जिसे चाहो अपने पास रखो, और जिनको तुमने अलग रखा हो, उनमें से किसी के इच्छुक हो तो इसमें तुमपर कोई दोष नहीं, इससे इस बात की अधिक सम्भावना है कि उनकी आँखें ठंड़ी रहें और वे शोकाकुल न हों और जो कुछ तुम उन्हें दो उसपर वे राज़ी रहें। अल्लाह जानता है जो कुछ तुम्हारे दिलों में है। अल्लाह सर्वज्ञ, बहुत सहनशील है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप अपनी पत्नियों में से जिसकी बारी विलंबित करना चाहें, विलंबित कर दें और उसके साथ रात न गुजारें। तथा उनमे से जिसे चाहें, अपने पास रखें और उसके साथ रात बिताएँ। और जिनकी बारी को आपने विलंबित कर दिया है, उनमें से किसी को (फिर से) अपने साथ रखना चाहें, तो इसमें आपपर कोई गुनाह नहीं है। आपके लिए यह विकल्प और विस्तार इस बात के अधिक निकट है कि इससे आपकी स्त्रियों की आँखें ठंडी रहें और यह कि आपने उन्हें जो कुछ दिया है, उससे वे संतुष्ट रहें। क्योंकि उन्हें मालूम है कि आपने कोई कर्तव्य नहीं छोड़ा है और न किसी हक़ की अदायगी में कंजूसी की है। और (ऐ पुरुषो!) तुम्हारे दिलों में जो कुछ स्त्रियों को छोड़कर कुछ की ओर झुकाव पाया जाता है, अल्लाह उससे अवगत है। अल्लाह अपने बंदों के कार्यों को भली-भाँति जानने वाला है, उससे उनमें से कुछ भी छिपा नहीं है, तथा वह सहनशील है, उन्हें सज़ा देने में जल्दी नहीं करता, ताकि वे तौबा कर लें।
आयत 52
لَّا يَحِلُّ لَكَ ٱلنِّسَآءُ مِنۢ بَعْدُ وَلَآ أَن تَبَدَّلَ بِهِنَّ مِنْ أَزْوَٰجٍۢ وَلَوْ أَعْجَبَكَ حُسْنُهُنَّ إِلَّا مَا مَلَكَتْ يَمِينُكَ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ رَّقِيبًۭا
لَّا
(It is) not
يَحِلُّ
नहीं हलाल
لَكَ
आपके लिए
ٱلنِّسَآءُ
औरतें
مِنۢ
after (this)
بَعْدُ
बाद उसके
وَلَآ
और ना
أَن
कि
تَبَدَّلَ
आप बदल लें
بِهِنَّ
उनके बदले
مِنْ
for
أَزْوَٰجٍۢ
कोई और बीवियाँ
وَلَوْ
और अगरचे
أَعْجَبَكَ
पसंद आए आपको
حُسْنُهُنَّ
हुसन उनका
إِلَّا
मगर
مَا
जिनका
مَلَكَتْ
मालिक है
يَمِينُكَ ۗ
दायाँ हाथ आपका
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
رَّقِيبًۭا
ख़ूब निगरान
इसके पश्चात तुम्हारे लिए दूसरी स्त्रियाँ वैध नहीं और न यह कि तुम उनकी जगह दूसरी पत्नियों ले आओ, यद्यपि उनका सौन्दर्य तुम्हें कितना ही भाए। उनकी बात औऱ है जो तुम्हारी लौंडियाँ हो। वास्तव में अल्लाह की स्पष्ट हर चीज़ पर है
तफ़्सीर:
आपके लिए (ऐ रसूल) अपनी उन पत्नियों के अलावा जो आपके निकाह में हैं, अन्य महिलाओं से शादी करना जायज़ नहीं है। तथा आपके लिए उन्हें तलाक़ देना, या उनमें से कुछ को तलाक़ देना वैध नहीं है ताकि उनके अलावा अन्य महिलाओं को ले आएँ, यद्यपि उनके अलावा जिन महिलाओं से आप शादी करना चाहते हैं, उनका सौंदर्य आपको कितना ही अच्छा क्यों न लगे। लेकिन आपके लिए उन दासियों से, जो आपके स्वामित्व में हैं, किसी विशिष्ट संख्या की सीमा के बिना लाभ उठाना जायज़ है। और अल्लाह प्रत्येक वस्तु का संरक्षक है। यह आदेश मोमिनों की माताओं (रसूल की पत्नियों) की प्रतिष्ठा को इंगित करता है। क्योंकि उन्हें तलाक़ देने और उनके रहते अन्य स्त्रियों से विवाह करने से मना किया गया है।
आयत 53
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَدْخُلُوا۟ بُيُوتَ ٱلنَّبِىِّ إِلَّآ أَن يُؤْذَنَ لَكُمْ إِلَىٰ طَعَامٍ غَيْرَ نَـٰظِرِينَ إِنَىٰهُ وَلَـٰكِنْ إِذَا دُعِيتُمْ فَٱدْخُلُوا۟ فَإِذَا طَعِمْتُمْ فَٱنتَشِرُوا۟ وَلَا مُسْتَـْٔنِسِينَ لِحَدِيثٍ ۚ إِنَّ ذَٰلِكُمْ كَانَ يُؤْذِى ٱلنَّبِىَّ فَيَسْتَحْىِۦ مِنكُمْ ۖ وَٱللَّهُ لَا يَسْتَحْىِۦ مِنَ ٱلْحَقِّ ۚ وَإِذَا سَأَلْتُمُوهُنَّ مَتَـٰعًۭا فَسْـَٔلُوهُنَّ مِن وَرَآءِ حِجَابٍۢ ۚ ذَٰلِكُمْ أَطْهَرُ لِقُلُوبِكُمْ وَقُلُوبِهِنَّ ۚ وَمَا كَانَ لَكُمْ أَن تُؤْذُوا۟ رَسُولَ ٱللَّهِ وَلَآ أَن تَنكِحُوٓا۟ أَزْوَٰجَهُۥ مِنۢ بَعْدِهِۦٓ أَبَدًا ۚ إِنَّ ذَٰلِكُمْ كَانَ عِندَ ٱللَّهِ عَظِيمًا
يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Do) not
تَدْخُلُوا۟
ना तुम दाख़िल हो
بُيُوتَ
घरों में
ٱلنَّبِىِّ
नबी के
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
يُؤْذَنَ
इजाज़त दी जाए
لَكُمْ
तुम्हें
إِلَىٰ
for
طَعَامٍ
तरफ़ खाने के
غَيْرَ
ना
نَـٰظِرِينَ
इन्तिज़ार करने वाले हो
إِنَىٰهُ
उसकी तैयारी का
وَلَـٰكِنْ
और लेकिन
إِذَا
जब
دُعِيتُمْ
बुलाए जाओ तुम
فَٱدْخُلُوا۟
तो दाख़िल हो जाओ
فَإِذَا
फिर जब
طَعِمْتُمْ
खाना खालो तुम
فَٱنتَشِرُوا۟
तो मुन्तशिर हो जाओ
وَلَا
और ना हो
مُسْتَـْٔنِسِينَ
दिल लगाने वाले
لِحَدِيثٍ ۚ
बातों के लिए
إِنَّ
बेशक
ذَٰلِكُمْ
ये
كَانَ
है
يُؤْذِى
ईज़ा देता
ٱلنَّبِىَّ
नबी को
فَيَسْتَحْىِۦ
तो वो शर्माते हैं
مِنكُمْ ۖ
तुम से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
لَا
is not shy
يَسْتَحْىِۦ
नहीं शर्माता
مِنَ
of
ٱلْحَقِّ ۚ
हक़ से
وَإِذَا
और जब
سَأَلْتُمُوهُنَّ
सवाल करो तुम उनसे
مَتَـٰعًۭا
किसी चीज़ का
فَسْـَٔلُوهُنَّ
तो सवाल करो उनसे
مِن
from
وَرَآءِ
पीछे से
حِجَابٍۢ ۚ
पर्दे के
ذَٰلِكُمْ
ये बात
أَطْهَرُ
ज़्यादा पाकीज़ा है
لِقُلُوبِكُمْ
तुम्हारे दिलों के लिए
وَقُلُوبِهِنَّ ۚ
और उनके दिलों के लिए
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है (मुनासिब)
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
أَن
कि
تُؤْذُوا۟
तुम ईज़ा दो
رَسُولَ
(the) Messenger
ٱللَّهِ
अल्लाह के रसूल को
وَلَآ
और ना
أَن
ये कि
تَنكِحُوٓا۟
तुम निकाह करो
أَزْوَٰجَهُۥ
उनकी बीवियों से
مِنۢ
after him
بَعْدِهِۦٓ
बाद इसके
أَبَدًا ۚ
कभी भी
إِنَّ
बेशक
ذَٰلِكُمْ
ये (बात)
كَانَ
है
عِندَ
नज़दीक
ٱللَّهِ
अल्लाह के
عَظِيمًا
बहुत बड़ी
ऐ ईमान लानेवालो! नबी के घरों में प्रवेश न करो, सिवाय इसके कि कभी तुम्हें खाने पर आने की अनुमति दी जाए। वह भी इस तरह कि उसकी (खाना पकने की) तैयारी की प्रतिक्षा में न रहो। अलबत्ता जब तुम्हें बुलाया जाए तो अन्दर जाओ, और जब तुम खा चुको तो उठकर चले जाओ, बातों में लगे न रहो। निश्चय ही यह हरकत नबी को तकलीफ़ देती है। किन्तु उन्हें तुमसे लज्जा आती है। किन्तु अल्लाह सच्ची बात कहने से लज्जा नहीं करता। और जब तुम उनसे कुछ माँगों तो उनसे परदे के पीछे से माँगो। यह अधिक शुद्धता की बात है तुम्हारे दिलों के लिए और उनके दिलों के लिए भी। तुम्हारे लिए वैध नहीं कि तुम अल्लाह के रसूल को तकलीफ़ पहुँचाओ और न यह कि उसके बाद कभी उसकी पत्नियों से विवाह करो। निश्चय ही अल्लाह की दृष्टि में यह बड़ी गम्भीर बात है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो! नबी के घरों में प्रवेश न करो, सिवाय इसके कि उन्होंने तुम्हें भोजन करने के लिए आमंत्रित करके अंदर आने की अनुमति प्रदान कर दी हो। लेकिन (वहाँ जाकर) खाना पकने की प्रतीक्षा में देर तक न बैठे रहो। बल्कि जब तुम्हें भोजन करने के लिए बुलाया जाए तो प्रवेश करो। फिर जब खाना खा चुको, तो उठकर चले जाओ। खाने के बाद आपस में बात करते हुए बैठे न रहो। तुम्हारा इस तरह ठहरना नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कष्ट देता है, लेकिन उन्हें तुम्हें उठकर जाने के लिए कहने में शर्म आती है। परंतु अल्लाह सत्य बात का आदेश देने से नहीं शरमाता। इसलिए उसने तुम्हें वहाँ से उठकर चले जाने का आदेश दिया है, ताकि तुम वहाँ ठहरकर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कष्ट न पहुँचाओ। इसी तरह जब तुम नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पत्नियों से ज़रूरत का कोई सामान, जैसे बर्तन आदि माँगो, तो उसे पर्दे के पीछे से माँगो। तुम उसे उनके सामने होकर न माँगो ताकि उनपर तुम्हारी नज़र न पड़े। यह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की स्थिति को ध्यान में रखते हुए आपकी पत्नियों की सुरक्षा के लिए है। साथ ही तुम्हारा पर्दे के पीछे से माँगना तुम्हारे दिलों तथा उनके दिलों के लिए अधिक पवित्रता व शुद्धता की बात है। ताकि शैतान तुम्हारे दिलों तथा उनके दिलों में वसवसा (भ्रम) न डाले और बुराई को शोभित न करे। तथा (ऐ ईमान वालो!) तुम्हारे लिए उचित नहीं है कि तुम (खाना खाने के बाद) बात करने के लिए ठहरकर अल्लाह के रसूल को कष्ट पहुँचाओ। और न यह कि तुम आपकी मृत्यु के बाद आपकी पत्नियों से शादी करो। क्योंकि वे मोमिनों की माएँ हैं और किसी के लिए वैध नहीं कि अपनी माँ से विवाह करे। तुम्हारा इस तरह कष्ट पहुँचाना - जिसका एक रूप आपकी मृत्यु के बाद आपकी पत्नियों से विवाह करना है - हराम (निषिद्ध) है और अल्लाह के निकट एक बहुत बड़ा पाप माना जाता है।
आयत 54
إِن تُبْدُوا۟ شَيْـًٔا أَوْ تُخْفُوهُ فَإِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمًۭا
إِن
अगर
تُبْدُوا۟
तुम ज़ाहिर करोगे
شَيْـًٔا
कोई चीज़
أَوْ
या
تُخْفُوهُ
तुम छुपाओगे उसे
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ को
عَلِيمًۭا
ख़ूब जानने वाला
तुम चाहे किसी चीज़ को व्यक्त करो या उसे छिपाओ, अल्लाह को तो हर चीज़ का ज्ञान है
तफ़्सीर:
तुम अपने किसी कार्य को प्रकट करो या उसे अपने मन में छिपाकर रखो, वह अल्लाह से हरगिज़ नहीं छिप सकता। निःसंदेह अल्लाह प्रत्येक वस्तु का ज्ञान रखता है। उससे तुम्हारा कोई काम या कोई अन्य चीज़ छिपी नहीं रह सकती। और वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों का बदला देगा; यदि अच्छा कर्म है तो अच्छा बदला और यदि बुरा कर्म है तो बुरा बदला।
आयत 55
لَّا جُنَاحَ عَلَيْهِنَّ فِىٓ ءَابَآئِهِنَّ وَلَآ أَبْنَآئِهِنَّ وَلَآ إِخْوَٰنِهِنَّ وَلَآ أَبْنَآءِ إِخْوَٰنِهِنَّ وَلَآ أَبْنَآءِ أَخَوَٰتِهِنَّ وَلَا نِسَآئِهِنَّ وَلَا مَا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُهُنَّ ۗ وَٱتَّقِينَ ٱللَّهَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ شَهِيدًا
لَّا
(There is) no
جُنَاحَ
नहीं कोई गुनाह
عَلَيْهِنَّ
उन(औरतों)पर
فِىٓ
concerning
ءَابَآئِهِنَّ
अपने बापों(के सामने आने)में
وَلَآ
और ना
أَبْنَآئِهِنَّ
अपने बेटों के
وَلَآ
और ना
إِخْوَٰنِهِنَّ
अपने भाईयों के
وَلَآ
और ना
أَبْنَآءِ
बेटों के
إِخْوَٰنِهِنَّ
अपने भाईयों के
وَلَآ
और ना
أَبْنَآءِ
बेटों के
أَخَوَٰتِهِنَّ
अपनी बहनों के
وَلَا
और ना
نِسَآئِهِنَّ
अपनी औरतों के
وَلَا
और ना
مَا
उनके जो
مَلَكَتْ
मालिक हैं
أَيْمَـٰنُهُنَّ ۗ
दाऐं हाथ उनके
وَٱتَّقِينَ
और डरती रहो
ٱللَّهَ ۚ
अल्लाह से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
شَهِيدًا
ख़ूब गवाह
न उनके लिए अपने बापों के सामने होने में कोई दोष है और न अपने बेटों, न अपने भाइयों, न अपने भतीजों, न अपने भांजो, न अपने मेल की स्त्रियों और न जिनपर उन्हें स्वामित्व का अधिकार प्राप्त हो उनके सामने होने में। अल्लाह का डर रखो, निश्चय ही अल्लाह हर चीज़ का साक्षी है
तफ़्सीर:
महिलाओं पर इसमें कोई गुनाह नहीं है कि उनके पिता, उनके बच्चे, उनके भाई, उनके भतीजे और उनके भांजे, चाहे वे वंश से हों या स्तनपान से, उन्हें देखें और बिना पर्दे के उनसे बात करें। तथा उनपर इसमें कोई पाप नहीं है कि मोमिन स्त्रियाँ और उनके दास एवं दासी उनसे बिना पर्दे के बात करें। और (ऐ मोमिन स्त्रियो) अल्लाह के आदेशों और निषेधों के बारे में अल्लाह से डरती रहो। क्योंकि वह तुम्हारे सभी कथनों और कर्मों को देखने वाला है।
आयत 56
إِنَّ ٱللَّهَ وَمَلَـٰٓئِكَتَهُۥ يُصَلُّونَ عَلَى ٱلنَّبِىِّ ۚ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ صَلُّوا۟ عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًا
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
وَمَلَـٰٓئِكَتَهُۥ
और उसके फ़रिश्ते
يُصَلُّونَ
सलात/दरूद भेजते हैं
عَلَى
upon
ٱلنَّبِىِّ ۚ
नबी पर
يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
صَلُّوا۟
सलात/दरूद भेजो
عَلَيْهِ
आप पर
وَسَلِّمُوا۟
और सलाम भेजो
تَسْلِيمًا
ख़ूब सलाम भेजना
निस्संदेह अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर रहमत भेजते है। ऐ ईमान लानेवालो, तुम भी उसपर रहमत भेजो और ख़ूब सलाम भेजो
तफ़्सीर:
निःसंदेह अल्लाह अपने फरिश्तों के निकट रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की प्रशंसा करता है और फ़रिश्ते उनके लिए दुआ करते हैं। ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसकी अपने बंदों के लिए निर्धारित की हुई शरीयत पर अमल करने वालो! तुम (भी) रसूल पर दुरूद और खूब सलाम भेजो।
आयत 57
إِنَّ ٱلَّذِينَ يُؤْذُونَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ لَعَنَهُمُ ٱللَّهُ فِى ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ وَأَعَدَّ لَهُمْ عَذَابًۭا مُّهِينًۭا
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
يُؤْذُونَ
ईज़ा देते हैं
ٱللَّهَ
अल्लाह को
وَرَسُولَهُۥ
और उसके रसूल को
لَعَنَهُمُ
लानत की उन पर
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
وَٱلْـَٔاخِرَةِ
और आख़िरत में
وَأَعَدَّ
और उसने तैयार कर रखा है
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابًۭا
अज़ाब
مُّهِينًۭا
रुसवा करने वाला
जो लोग अल्लाह और उसके रसूल को दुख पहुँचाते है, अल्लाह ने उनपर दुनिया और आख़िरत में लानत की है और उनके लिए अपमानजनक यातना तैयार कर रखी है
तफ़्सीर:
निःसंदेह जो लोग अल्लाह और उसके रसूल को अपने शब्द या कर्म से कष्ट पहुँचाते हैं, अल्लाह ने उन्हें लोक एवं परलोक में अपनी दया की विशालता से निष्कासित कर दिया है और उनके अपने रसूल को कष्ट पहुँचाने की सज़ा के तौर पर आख़िरत में उनके लिए अपमानजनक यातना तैयार कर रखी है।
आयत 58
وَٱلَّذِينَ يُؤْذُونَ ٱلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ بِغَيْرِ مَا ٱكْتَسَبُوا۟ فَقَدِ ٱحْتَمَلُوا۟ بُهْتَـٰنًۭا وَإِثْمًۭا مُّبِينًۭا
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
يُؤْذُونَ
ईज़ा देते हैं
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिन मर्दों को
وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ
और मोमिन औरतों को
بِغَيْرِ
बग़ैर( किसी गुनाह के)
مَا
जो
ٱكْتَسَبُوا۟
उन्होंने कमाया
فَقَدِ
तो तहक़ीक़
ٱحْتَمَلُوا۟
उन्होंने उठा लिया
بُهْتَـٰنًۭا
बोहतान
وَإِثْمًۭا
और गुनाह
مُّبِينًۭا
खुला
और जो लोग ईमानवाले पुरुषों और ईमानवाली स्त्रियों को, बिना इसके कि उन्होंने कुछ किया हो (आरोप लगाकर), दुख पहुँचाते है, उन्होंने तो बड़े मिथ्यारोपण और प्रत्यक्ष गुनाह का बोझ अपने ऊपर उठा लिया
तफ़्सीर:
जो लोग अपने शब्द या कर्म से ईमान वाले पुरुषों और ईमान वाली स्त्रियों को कष्ट पहुँचाते हैं, बिना किसी पाप के जो उन्होंने कोई अपराध करके कमाया हो जो उस कष्ट के पहुँचाने का कारण हो, तो उन्होंने अपने ऊपर झूठ और स्पष्ट गुनाह का बोझ उठाया।
आयत 59
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ قُل لِّأَزْوَٰجِكَ وَبَنَاتِكَ وَنِسَآءِ ٱلْمُؤْمِنِينَ يُدْنِينَ عَلَيْهِنَّ مِن جَلَـٰبِيبِهِنَّ ۚ ذَٰلِكَ أَدْنَىٰٓ أَن يُعْرَفْنَ فَلَا يُؤْذَيْنَ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا
يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلنَّبِىُّ
नबी
قُل
कह दीजिए
لِّأَزْوَٰجِكَ
अपनी बीवियों से
وَبَنَاتِكَ
और अपनी बेटियों से
وَنِسَآءِ
और औरतों से
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों की
يُدْنِينَ
कि वो लटका लें
عَلَيْهِنَّ
अपने ऊपर
مِن
[of]
جَلَـٰبِيبِهِنَّ ۚ
अपनी चादरों में से
ذَٰلِكَ
ये
أَدْنَىٰٓ
क़रीबतर है
أَن
कि
يُعْرَفْنَ
वो पहचान ली जाऐं
فَلَا
फिर ना
يُؤْذَيْنَ ۗ
वो ईज़ा दी जाऐं
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
غَفُورًۭا
बहुत बख़्शने वाला
رَّحِيمًۭا
निहायत रहम करने वाला
ऐ नबी! अपनी पत्नि यों और अपनी बेटियों और ईमानवाली स्त्रियों से कह दो कि वे अपने ऊपर अपनी चादरों का कुछ हिस्सा लटका लिया करें। इससे इस बात की अधिक सम्भावना है कि वे पहचान ली जाएँ और सताई न जाएँ। अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
ऐ नबी! आप अपनी पत्नियों से कह दें, तथा अपनी बेटियों से कह दें और ईमान वालों की स्त्रियों से कह दें कि : वे अपने ऊपर उन चादरों का कुछ हिस्सा डाल लिया करें जो वे पहनती हैं, ताकि पराए (ग़ैर मह़-रम) पुरुषों के सामने उनके शरीर का कोई अंग खुलने न पाए। यह इसके अधिक निकट है कि उन्हें पहचान लिया जाएगा कि वे आज़ाद (व शरीफ़) औरतें हैं, तो कोई उन्हें कष्ट नहीं पहुँचाएगा, जिस तरह कि वह दासियों के साथ छेड़छाड़ करता है। और अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदे के पापों को क्षमा करने वाला, उसपर दयालु है।
आयत 60
۞ لَّئِن لَّمْ يَنتَهِ ٱلْمُنَـٰفِقُونَ وَٱلَّذِينَ فِى قُلُوبِهِم مَّرَضٌۭ وَٱلْمُرْجِفُونَ فِى ٱلْمَدِينَةِ لَنُغْرِيَنَّكَ بِهِمْ ثُمَّ لَا يُجَاوِرُونَكَ فِيهَآ إِلَّا قَلِيلًۭا
۞ لَّئِن
अलबत्ता अगर
لَّمْ
ना
يَنتَهِ
बाज़ आए
ٱلْمُنَـٰفِقُونَ
मुनाफ़िक़
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
فِى
in
قُلُوبِهِم
दिलों में उनके
مَّرَضٌۭ
मर्ज़ है
وَٱلْمُرْجِفُونَ
और झूठी ख़बरें उड़ाने वाले
فِى
in
ٱلْمَدِينَةِ
मदीने में
لَنُغْرِيَنَّكَ
अलबत्ता हम ज़रूर मुसल्लत कर देंगे आपको
بِهِمْ
उन पर
ثُمَّ
फिर
لَا
not
يُجَاوِرُونَكَ
ना वो हमसाए रहेंगे आपके
فِيهَآ
उसमें
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا
बहुत थोड़ा
यदि कपटाचारी और वे लोग जिनके दिलों में रोग है और मदीना में खलबली पैदा करनेवाली अफ़वाहें फैलाने से बाज़ न आएँ तो हम तुम्हें उनके विरुद्ध उभार खड़ा करेंगे। फिर वे उसमें तुम्हारे साथ थोड़ा ही रहने पाएँगे,
तफ़्सीर:
यदि मुनाफ़िक़ों (पाखंडियों) ने दिल में कुफ़्र छिपाकर और इस्लाम का ढोंग करके अपने पाखंड को समाप्त नहीं किया, तथा वे लोग जिनके दिलों में अपनी वासनाओं के प्रति लगाव का रोग है और वे लोग जो मदीना में मोमिनों के बीच फूट डालने के उद्देश्य से झूठी खबरें फैलाते रहते हैं, (यदि ये लोग अपनी करतूतों से बाज़ नहीं आए) - तो हम आपको (ऐ रसूल!) उन्हें दंडित करने के लिए आदेश दे देंगे और आपको उनपर हावी कर देंगे। फिर वे आपके साथ मदीना में थोड़े ही समय के लिए रह सकेंगे। क्योंकि उनके ज़मीन पर भ्रष्टाचार करने के कारण, उन्हें नष्ट कर दिया जाएगा या मदीना से निष्कासित कर दिया जाएगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
पर्दे के अहकाम का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि पर्दा औरतों की इज़्ज़त और हिफाज़त के लिए एक बेहतरीन इंतज़ाम है।
आयत 61
مَّلْعُونِينَ ۖ أَيْنَمَا ثُقِفُوٓا۟ أُخِذُوا۟ وَقُتِّلُوا۟ تَقْتِيلًۭا
مَّلْعُونِينَ ۖ
लानत किए गए
أَيْنَمَا
जहाँ कहीं
ثُقِفُوٓا۟
वो पाऐ जाऐं
أُخِذُوا۟
वो पकड़ लिए जाऐं
وَقُتِّلُوا۟
और क़त्ल कर दिए जाऐं
تَقْتِيلًۭا
बुरी तरह क़त्ल किया जाना
फिटकारे हुए होंगे। जहाँ कही पाए गए पकड़े जाएँगे और बुरी तरह जान से मारे जाएँगे
तफ़्सीर:
वे अल्लाह की दया से निष्कासित हैं। वे जहाँ भी मिलें, पकड़े जाएँगे और अपने पाखंड और धरती पर भ्रष्टाचार फैलाने के कारण बुरी तरह वध कर दिए जाएँगे।
आयत 62
سُنَّةَ ٱللَّهِ فِى ٱلَّذِينَ خَلَوْا۟ مِن قَبْلُ ۖ وَلَن تَجِدَ لِسُنَّةِ ٱللَّهِ تَبْدِيلًۭا
سُنَّةَ
तरीक़ा है
ٱللَّهِ
अल्लाह का
فِى
with
ٱلَّذِينَ
उनके बारे में जो
خَلَوْا۟
गुज़र चुके
مِن
before
قَبْلُ ۖ
उससे पहले
وَلَن
और हरगिज़ ना
تَجِدَ
आप पाऐंगे
لِسُنَّةِ
तरीक़े में
ٱللَّهِ
अल्लाह के
تَبْدِيلًۭا
कोई तब्दीली
यही अल्लाह की रीति रही है उन लोगों के विषय में भी जो पहले गुज़र चुके हैं। और तुम अल्लाह की रीति में कदापि परिवर्तन न पाओगे
तफ़्सीर:
यही मुनाफिक़ों (पाखंडियों) के बारे में अल्लाह का निरंतर चलने वाला नियम है, यदि वे पाखंड दिखाते हैं। और अल्लाह का नियम अटल है, उसमें आपको कदापि कोई बदलाव नहीं मिलेगा।
आयत 63
يَسْـَٔلُكَ ٱلنَّاسُ عَنِ ٱلسَّاعَةِ ۖ قُلْ إِنَّمَا عِلْمُهَا عِندَ ٱللَّهِ ۚ وَمَا يُدْرِيكَ لَعَلَّ ٱلسَّاعَةَ تَكُونُ قَرِيبًا
يَسْـَٔلُكَ
सवाल करते हैं आप से
ٱلنَّاسُ
लोग
عَنِ
about
ٱلسَّاعَةِ ۖ
क़यामत के बारे में
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّمَا
बेशक
عِلْمُهَا
इल्म उसका
عِندَ
पास है
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के
وَمَا
और क्या चीज़
يُدْرِيكَ
बताए आपको
لَعَلَّ
शायद कि
ٱلسَّاعَةَ
क़यामत
تَكُونُ
हो वो
قَرِيبًا
क़रीब ही
लोग तुमसे क़ियामत की घड़ी के बारे में पूछते है। कह दो, "उसका ज्ञान तो बस अल्लाह ही के पास है। तुम्हें क्या मालूम? कदाचित वह घड़ी निकट ही हो।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) मुश्रिक लोग आपसे इनकार करने और झुठलाने के तौर पर, तथा यहूदी भी आपसे क़ियामत के बारे में पूछते हैं कि : उसका समय कब है? आप इन लोगों से कह दें : क़ियामत का ज्ञान अल्लाह के पास है, मेरे पास उसकी कोई जानकारी नहीं है। और (ऐ रसूल!) आपको क्या पता शायद क़ियामत निकट ही हो?
आयत 64
إِنَّ ٱللَّهَ لَعَنَ ٱلْكَـٰفِرِينَ وَأَعَدَّ لَهُمْ سَعِيرًا
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
لَعَنَ
लानत की है
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों पर
وَأَعَدَّ
और उसने तैयार कर रखा है
لَهُمْ
उनके लिए
سَعِيرًا
भड़कती आग को
निश्चय ही अल्लाह ने इनकार करनेवालों पर लानत की है और उनके लिए भड़कती आग तैयार कर रखी है,
तफ़्सीर:
निःसंदेह महिमावान अल्लाह ने काफिरों को अपनी दया से निष्कासित कर दिया है और उनके लिए क़ियामत के दिन धधकती आग तैयार कर रखी है, जो उनकी प्रतीक्षा कर रही है।
आयत 65
خَـٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدًۭا ۖ لَّا يَجِدُونَ وَلِيًّۭا وَلَا نَصِيرًۭا
خَـٰلِدِينَ
हमेश रहने वाले हैं
فِيهَآ
उसमें
أَبَدًۭا ۖ
हमेशा-हमेशा
لَّا
not
يَجِدُونَ
ना वो पाऐंगे
وَلِيًّۭا
कोई दोस्त
وَلَا
और ना
نَصِيرًۭا
कोई मददगार
जिसमें वे सदैव रहेंगे। न वे कोई निकटवर्ती समर्थक पाएँगे और न (दूर का) सहायक
तफ़्सीर:
वे उस आग की यातना में जो उनके लिए तैयार की गई है सदैव रहेंगे। जिसमें उन्हें न कोई दोस्त मिलेगा, जो उन्हें लाभ पहुँचा सके और न कोई सहायक मिलेगा, जो उनसे यातना को दूर कर सके।
आयत 66
يَوْمَ تُقَلَّبُ وُجُوهُهُمْ فِى ٱلنَّارِ يَقُولُونَ يَـٰلَيْتَنَآ أَطَعْنَا ٱللَّهَ وَأَطَعْنَا ٱلرَّسُولَا۠
يَوْمَ
जिस दिन
تُقَلَّبُ
उलट-पलट किए जाऐंगे
وُجُوهُهُمْ
चेहरे उनके
فِى
in
ٱلنَّارِ
आग में
يَقُولُونَ
वो कहेंगे
يَـٰلَيْتَنَآ
ऐ काश कि हम
أَطَعْنَا
इताअत करते हम
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَأَطَعْنَا
और इताअत करते हम
ٱلرَّسُولَا۠
रसूल की
जिस दिन उनके चहेरे आग में उलटे-पलटे जाएँगे, वे कहेंगे, "क्या ही अच्छा होता कि हमने अल्लाह का आज्ञापालन किया होता और रसूल का आज्ञापालन किया होता!"
तफ़्सीर:
क़ियामत के दिन उनके चेहरे जहन्नम की आग में उलटे-पलटे जाएँगे। वे अफ़सोस और पछतावा की तीव्रता से कहेंगे : ऐ काश! हमने अपने दुनिया के जीवन में अल्लाह का आज्ञापालन किया होता उस चीज़ का पालन करके जिसका उसने हमें आदेश दिया था और उस चीज़ से बचकर जिससे उसने हमें रोका था। तथा हमने उस चीज़ में रसूल का आज्ञापालन किया होता जो कुछ वह अपने पालनहार की ओर ओर से लाए थे।
आयत 67
وَقَالُوا۟ رَبَّنَآ إِنَّآ أَطَعْنَا سَادَتَنَا وَكُبَرَآءَنَا فَأَضَلُّونَا ٱلسَّبِيلَا۠
وَقَالُوا۟
और वो कहेंगे
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
إِنَّآ
बेशक हम
أَطَعْنَا
इताअत की हमने
سَادَتَنَا
अपने सरदारों की
وَكُبَرَآءَنَا
और अपने बड़ों की
فَأَضَلُّونَا
तो उन्होंने भटका दिया हमें
ٱلسَّبِيلَا۠
रास्ते से
वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! वास्तव में हमने अपने सरदारों और अपने बड़ो का आज्ञा का पालन किया और उन्होंने हमें मार्ग से भटका दिया।
तफ़्सीर:
वे एक अनर्गल और झूठा तर्क प्रस्तुत करेंगे। चुनाँचे वे कहेंगे : ऐ हमारे पालनहार, हमने अपने सरदारों और अपनी जाति के बड़े लोगों का कहा माना, तो उन्होंने हमें सीधे मार्ग से भटका दिया।
आयत 68
رَبَّنَآ ءَاتِهِمْ ضِعْفَيْنِ مِنَ ٱلْعَذَابِ وَٱلْعَنْهُمْ لَعْنًۭا كَبِيرًۭا
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
ءَاتِهِمْ
दे उन्हें
ضِعْفَيْنِ
दोगुना
مِنَ
[of]
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब में से
وَٱلْعَنْهُمْ
और लानत फ़रमा उन पर
لَعْنًۭا
लानत
كَبِيرًۭا
बहुत बड़ी
"ऐ हमारे रब! उन्हें दोहरी यातना दे और उनपर बड़ी लानत कर!"
तफ़्सीर:
ऐ हमारे पालनहार! इन सरदारों और बड़े लोगों को, जिन्होंने हमें सीधे मार्ग से भटका दिया, उसका दोगुना अज़ाब दे, जितना तूने हमें दिया है। क्योंकि इन्होंने हमें गुमराह किया था। और इन्हें अपनी दया से बहुत दूर कर दे।
आयत 69
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَكُونُوا۟ كَٱلَّذِينَ ءَاذَوْا۟ مُوسَىٰ فَبَرَّأَهُ ٱللَّهُ مِمَّا قَالُوا۟ ۚ وَكَانَ عِندَ ٱللَّهِ وَجِيهًۭا
يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Do) not
تَكُونُوا۟
ना तुम हो जाओ
كَٱلَّذِينَ
उनकी तरह जिन्होंने
ءَاذَوْا۟
अज़ीयतें दीं
مُوسَىٰ
मूसा को
فَبَرَّأَهُ
तो बरी कर दिया उसे
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِمَّا
उससे जो
قَالُوا۟ ۚ
उन्होंने कहा था
وَكَانَ
और था वो
عِندَ
नज़दीक
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَجِيهًۭا
बहुत बाइज़्ज़त
ऐ ईमान लानेवालो! उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने मूसा को दुख पहुँचाया, तो अल्लाह ने उससे जो कुछ उन्होंने कहा था उसे बरी कर दिया। वह अल्लाह के यहाँ बड़ा गरिमावान था
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो! तुम अपने रसूल को कष्ट न पहुँचाओ। अन्यथा, तुम उन लोगों के समान हो जाओगे, जिन्होंने मूसा अलैहिस्सलाम को कष्ट पहुँचाया था, जैसे कि उन्होंने उनके शरीर में दोष होने का आरोप लगाया था, परंतु अल्लाह ने उन्हें उनके मिथ्यारोप से बरी कर दिया। चुनाँचे उन लोगों के लिए यह स्पष्ट हो गया कि मूसा अलैहिस्सलाम उस दोष से पवित्र हैं जो उन्होंने उनके बारे में मढ़ा था। दरअसल, मूसा अलैहिस्सलाम अल्लाह के निकट बड़े प्रतिष्ठावान थे, जिसका अनुरोध अस्वीकार नहीं किया जाता, और उसका प्रयास विफल नहीं होता।
आयत 70
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَقُولُوا۟ قَوْلًۭا سَدِيدًۭا
يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
ٱتَّقُوا۟
डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَقُولُوا۟
और कहो
قَوْلًۭا
बात
سَدِيدًۭا
सीधी
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह का डर रखो और बात कहो ठीक सधी हुई
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो! अल्लाह से डरो, उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई बातों से बचकर। तथा ठीक और सच्ची बात कहो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मुनाफिकों और झूठी बात फैलाने वालों की मज़म्मत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि बगैर तहकीक के कोई बात आगे बढ़ाना बड़े फसाद का सबब बन सकता है।
आयत 71
يُصْلِحْ لَكُمْ أَعْمَـٰلَكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ ۗ وَمَن يُطِعِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ فَقَدْ فَازَ فَوْزًا عَظِيمًا
يُصْلِحْ
वो इस्लाह कर देगा
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
أَعْمَـٰلَكُمْ
तुम्हारे आमाल की
وَيَغْفِرْ
और वो बख़्श देगा
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
ذُنُوبَكُمْ ۗ
तुम्हारे गुनाहों को
وَمَن
और जो कोई
يُطِعِ
इताअत करेगा
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَرَسُولَهُۥ
और उसके रसूल की
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
فَازَ
वो कामयाब हुआ
فَوْزًا
कामयाब होना
عَظِيمًا
बहुत बड़ा
वह तुम्हारे कर्मों को सँवार देगा और तुम्हारे गुनाहों को क्षमा कर देगा। और जो अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करे, उसने बड़ी सफलता प्राप्त॥ कर ली है
तफ़्सीर:
यदि तुम अल्लाह से डरते रहे तथा ठीक और सच्ची बात करते रहे, तो वह तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्मों को सुधार देगा, उन्हें तुमसे स्वीकार कर लेगा तथा तुम्हारे गुनाहों को इस तरह मिटा देगा कि उनपर तुम्हारी पकड़ नहीं करेगा। और जो अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करे, उसने बहुत बड़ी सफलता प्राप्त कर ली, जिसके समान कोई अन्य सफलता नहीं है और वह अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति और जन्नत में प्रवेश है।
आयत 72
إِنَّا عَرَضْنَا ٱلْأَمَانَةَ عَلَى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَٱلْجِبَالِ فَأَبَيْنَ أَن يَحْمِلْنَهَا وَأَشْفَقْنَ مِنْهَا وَحَمَلَهَا ٱلْإِنسَـٰنُ ۖ إِنَّهُۥ كَانَ ظَلُومًۭا جَهُولًۭا
إِنَّا
बेशक हम
عَرَضْنَا
पेश किया हमने
ٱلْأَمَانَةَ
अमानत को
عَلَى
to
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों पर
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन पर
وَٱلْجِبَالِ
और पहाड़ों पर
فَأَبَيْنَ
तो उन्होंने इन्कार कर दिया
أَن
कि
يَحْمِلْنَهَا
वो उठाऐं उसे
وَأَشْفَقْنَ
और वो डर गए
مِنْهَا
उससे
وَحَمَلَهَا
और उठा लिया उसे
ٱلْإِنسَـٰنُ ۖ
इन्सान ने
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
है
ظَلُومًۭا
बहुत ज़ालिम
جَهُولًۭا
बहुत जाहिल
हमने अमानत को आकाशों और धरती और पर्वतों के समक्ष प्रस्तुत किया, किन्तु उन्होंने उसके उठाने से इनकार कर दिया और उससे डर गए। लेकिन मनुष्य ने उसे उठा लिया। निश्चय ही वह बड़ी ज़ालिम, आवेश के वशीभूत हो जानेवाला है
तफ़्सीर:
हमने शरई जिम्मेदारियों और संरक्षित किए जाने वाले धनों और रहस्यों को आकाशों पर, धरती पर तथा पर्वतों पर पेश किए, तो उन्होंने उसे उठाने से इनकार कर दिया और उसके परिणाम से डर गए। परंतु इनसान ने उसे उठा लिया। निश्चय ही वह स्वंय पर अत्याचार करने वाला और उसे उठाने के परिणाम से अनभिज्ञ है।
आयत 73
لِّيُعَذِّبَ ٱللَّهُ ٱلْمُنَـٰفِقِينَ وَٱلْمُنَـٰفِقَـٰتِ وَٱلْمُشْرِكِينَ وَٱلْمُشْرِكَـٰتِ وَيَتُوبَ ٱللَّهُ عَلَى ٱلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًۭا رَّحِيمًۢا
لِّيُعَذِّبَ
ताकि अज़ाब दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْمُنَـٰفِقِينَ
मुनाफ़िक़ मर्दों
وَٱلْمُنَـٰفِقَـٰتِ
और मुनाफ़िक़ औरतों को
وَٱلْمُشْرِكِينَ
और मुशरिक मर्दों को
وَٱلْمُشْرِكَـٰتِ
और मुशरिक औरतों को
وَيَتُوبَ
और मेहरबान हो जाए
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَى
to
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिन मर्दों पर
وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ ۗ
और मोमिन औरतों पर
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
غَفُورًۭا
बहुत बख़्शने वाला
رَّحِيمًۢا
निहायत रहम करने वाला
ताकि अल्लाह कपटाचारी पुरुषों और कपटाचारी स्त्रियों और बहुदेववादी पुरुषों और बहुदेववादी स्त्रियों को यातना दे, और ईमानवाले पुरुषों और ईमानवाली स्त्रियों पर अल्लाह कृपा-स्पष्ट करे। वास्तव में अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
मनुष्य ने अल्लाह की निर्धारित तक़दीर के अनुसार उस अमानत को उठा लिया; ताकि अल्लाह मुनाफ़िक़ (पाखंडी) पुरुषों और मुनाफ़िक़ (पाखंडी) स्त्रियों तथा मुश्रिक (अनेकेश्वरवादी) पुरुषों और मुश्रिक (अनेकेश्वरवादी) स्त्रियों को उनके निफ़ाक़ (पाखंड) और अल्लाह के साथ शिर्क (यानी उसका साझी बनाने) की सज़ा दे। और ताकि अल्लाह ऐसे मोमिन पुरुषों और मोमिन स्त्रियों की तौबा स्वीकार करे, जिन्होंने शरई ज़िम्मेदारियों की अमानत अच्छे ढंग से उठाई। और अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा प्रदान करनेवाला और उनपर दया करनेवाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इंसान द्वारा अमानत (इख्तियार) उठाए जाने के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह ने इंसान को अमानत दी है, इसे सही तरीके से निभाना हर इंसान की ज़िम्मेदारी है।
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