सूरह सबा سورة سبأ
मक्की 54 आयतें
नाम का मतलब
सबा (यमन की एक मशहूर कौम, मलिका-ए-सबा के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह सबा में दाऊद-सुलेमान अलैहिस्सलाम की नेमतों और सबा कौम की नाशुक्री का ज़िक्र है, जिनकी खुशहाली नाशुक्री की वजह से तबाह हो गई।
फ़ज़ीलत / सार
सबा कौम का वाकिया नेमतों की नाशुक्री के अंजाम की एक बड़ी नसीहत आमेज़ मिसाल मानी जाती है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِى لَهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ وَلَهُ ٱلْحَمْدُ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ وَهُوَ ٱلْحَكِيمُ ٱلْخَبِيرُ
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए है
ٱلَّذِى
वो जो
لَهُۥ
उसी के लिए है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में है
وَلَهُ
और उसी के लिए है
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
فِى
in
ٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ
आख़िरत में
وَهُوَ
और वो
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिकमत वाला है
ٱلْخَبِيرُ
ख़ूब बाख़बर है
प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है जिसका वह सब कुछ है जो आकाशों और धरती में है। और आख़िरत में भी उसी के लिए प्रशंसा है। और वही तत्वदर्शी, ख़बर रखनेवाला है
तफ़्सीर:
हर प्रकार की प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जिसके अधिकार में आकाशों और धरती की सभी चीज़ें हैं, रचना करने, मालिक होने और प्रबंधन एवं उपाय करने के एतिबार से। और उसी सर्वशक्तिमान (अल्लाह) के लिए आखिरत में भी प्रशंसा है। वह अपनी रचना और प्रबंधन में हिकमत वाला और अपने बंदों की स्थितियों को भली-भाँति जानने वाला है। उससे उनमें से कोई भी चीज़ छिपी नहीं है।
आयत 2
يَعْلَمُ مَا يَلِجُ فِى ٱلْأَرْضِ وَمَا يَخْرُجُ مِنْهَا وَمَا يَنزِلُ مِنَ ٱلسَّمَآءِ وَمَا يَعْرُجُ فِيهَا ۚ وَهُوَ ٱلرَّحِيمُ ٱلْغَفُورُ
يَعْلَمُ
वो जानता है
مَا
जो कुछ
يَلِجُ
दाख़िल होता है
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَمَا
और जो कुछ
يَخْرُجُ
निकलता है
مِنْهَا
उससे
وَمَا
और जो कुछ
يَنزِلُ
उतरता है
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
وَمَا
और जो कुछ
يَعْرُجُ
चढ़ता है
فِيهَا ۚ
उसमें
وَهُوَ
और वो
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला है
ٱلْغَفُورُ
बहुत बख़्शने वाला है
वह जानता है जो कुछ धरती में प्रविष्ट होता है और जो कुथ उससे निकलता है और जो कुछ आकाश से उतरता है और जो कुछ उसमें चढ़ता है। और वही अत्यन्त दयावान, क्षमाशील है
तफ़्सीर:
वह जानता है जो कुछ धरती में प्रवेश करता है, जैसे पानी और वनस्पतियाँ, और वह जानता जो कुछ पौधे आदि उससे निकलते हैं, और वह जानता है जो कुछ आकाश से बारिश, फ़रिश्ते और आजीविका उतरती है, और वह जानता है जो कुछ आकाश की ओर फ़रिश्ते, बंदों के कर्म तथा उनकी आत्माएँ चढ़ती हैं। और वह अपने ईमान वाले बंदों पर बड़ा दयालु, और जो उससे तौबा करते हैं उनके पापों को क्षमा करने वाला है।
आयत 3
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لَا تَأْتِينَا ٱلسَّاعَةُ ۖ قُلْ بَلَىٰ وَرَبِّى لَتَأْتِيَنَّكُمْ عَـٰلِمِ ٱلْغَيْبِ ۖ لَا يَعْزُبُ عَنْهُ مِثْقَالُ ذَرَّةٍۢ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَلَا فِى ٱلْأَرْضِ وَلَآ أَصْغَرُ مِن ذَٰلِكَ وَلَآ أَكْبَرُ إِلَّا فِى كِتَـٰبٍۢ مُّبِينٍۢ
وَقَالَ
और कहा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لَا
Not
تَأْتِينَا
नहीं आएगी हम पर
ٱلسَّاعَةُ ۖ
क़यामत
قُلْ
कह दीजिए
بَلَىٰ
क्यों नहीं
وَرَبِّى
क़सम है मेरे रब की
لَتَأْتِيَنَّكُمْ
अलबत्ता वो ज़रूर आएगी तुम्हारे पास
عَـٰلِمِ
जानने वाला है
ٱلْغَيْبِ ۖ
ग़ैब का
لَا
Not
يَعْزُبُ
नहीं छुपा हुआ
عَنْهُ
उससे
مِثْقَالُ
बराबर
ذَرَّةٍۢ
एक ज़र्रे के
فِى
in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَلَا
और ना
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَلَآ
और ना
أَصْغَرُ
छोटा
مِن
than
ذَٰلِكَ
उससे
وَلَآ
और ना
أَكْبَرُ
बड़ा
إِلَّا
मगर
فِى
(is) in
كِتَـٰبٍۢ
a Record
مُّبِينٍۢ
एक वाज़ेह किताब में है
जिन लोगों ने इनकार किया उनका कहना है कि "हमपर क़ियामत की घड़ी नहीं आएगी।" कह दो, "क्यों नहीं, मेरे परोक्ष ज्ञाता रब की क़सम! वह तो तुमपर आकर रहेगी - उससे कणभर भी कोई चीज़ न तो आकाशों में ओझल है और न धरती में, और न इससे छोटी कोई चीज़ और न बड़ी। किन्तु वह एक स्पष्ट किताब में अंकित है। -
तफ़्सीर:
अल्लाह का इनकार करने वालों ने कहा : हमपर क़ियामत कभी नहीं आएगी। (ऐ रसूल) आप उन्हें कह दीजिए : क्यों नहीं? अल्लाह की क़सम, वह क़ियामत तुमपर अवश्य आएगी, जिसे तुम झुठला रहे हो। लेकिन उसका समय अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता। क्योंकि वह सर्वशक्तिमान (अल्लाह) छिपी हुई बातों जैसे क़ियामत आदि का ज्ञान रखने वाला है। उसके ज्ञान से आकाशों तथा धरती में छोटी से छोटी चींटी के बराबर भी कोई चीज़ ओझल नहीं है। बल्कि उससे भी छोटी या बड़ी कोई चीज़ नहीं है, परंतु वह एक स्पष्ट पुस्तक में अंकित है, और वह 'लौहे महफ़ूज़' (सुरक्षित पट्टिका) है, जिसमें क़ियामत तक होने वाली हर चीज़ लिखी हुई है।
आयत 4
لِّيَجْزِىَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُم مَّغْفِرَةٌۭ وَرِزْقٌۭ كَرِيمٌۭ
لِّيَجْزِىَ
ताकि वो बदला दे
ٱلَّذِينَ
उनको जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ ۚ
नेक
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
لَهُم
उनके लिए
مَّغْفِرَةٌۭ
बख़्शिश
وَرِزْقٌۭ
और रिज़्क़ है
كَرِيمٌۭ
इज़्ज़त वाला
"ताकि वह उन लोगों को बदला दे, जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए। वहीं है जिनके लिए क्षमा और प्रतिष्ठामय आजीविका है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने 'लौहे महफूज़' में जो कुछ लिख रखा है, उसका उद्देश्य यह है कि वह ईमान लाने वालों तथा अच्छे कर्म करने वालों को उनका भरपूर बदला दे। उक्त गुणों से विशिष्ट इन लोगों के लिए अल्लाह की ओर से उनके गुनाहों की माफ़ी है, चुनाँचे वह उन गुनाहों पर उनकी पकड़ नहीं करेगा। तथा उनके लिए अच्छी जीविका है, जो कि क़ियामत के दिन अल्लाह की जन्नत है।
आयत 5
وَٱلَّذِينَ سَعَوْ فِىٓ ءَايَـٰتِنَا مُعَـٰجِزِينَ أُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمْ عَذَابٌۭ مِّن رِّجْزٍ أَلِيمٌۭ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
سَعَوْ
कोशिश की
فِىٓ
against
ءَايَـٰتِنَا
हमारी आयात में
مُعَـٰجِزِينَ
इस हाल में कि आजिज़ करने वाले हैं
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابٌۭ
अज़ाब है
مِّن
of
رِّجْزٍ
सख़्ती का
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
"रहे वे लोग जिन्होंने हमारी आयतों को मात करने का प्रयास किया, वह है जिनके लिए बहुत ही बुरे प्रकार की दुखद यातना है।"
तफ़्सीर:
तथा जिन लोगों ने अल्लाह की उतारी हुई आयतों को ग़लत ठहराने के लिए कड़ी मेहनत की। चुनाँचे उन्होंने उसके बारे में कहा कि वह जादू है, तथा हमारे रसूल को काहिन (भविष्यवक्ता), जादूगर और कवि कहा। उन गुणों से विशिष्ट ये लोग क़ियामत के दिन सबसे बुरी और सबसे कठोर सज़ा भुगतेंगे।
आयत 6
وَيَرَى ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْعِلْمَ ٱلَّذِىٓ أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ هُوَ ٱلْحَقَّ وَيَهْدِىٓ إِلَىٰ صِرَٰطِ ٱلْعَزِيزِ ٱلْحَمِيدِ
وَيَرَى
और देखते हैं
ٱلَّذِينَ
वो जो
أُوتُوا۟
दिए गए
ٱلْعِلْمَ
इल्म
ٱلَّذِىٓ
कि जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
إِلَيْكَ
आपकी तरफ़
مِن
from
رَّبِّكَ
आपके रब की तरफ़ से
هُوَ
वो ही
ٱلْحَقَّ
हक़ है
وَيَهْدِىٓ
और वो रहनुमाई करता है
إِلَىٰ
to
صِرَٰطِ
तरफ़ रास्ते के
ٱلْعَزِيزِ
बहुत ज़बरदस्त
ٱلْحَمِيدِ
ख़ूब तारीफ़ वाले के
जिन लोगों को ज्ञान प्राप्त हुआ है वे स्वयं देखते है कि जो कुछ तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारी ओर अवतरित हुआ है वही सत्य है, और वह उसका मार्ग दिखाता है जो प्रभुत्वशाली, प्रशंसा का अधिकारी है
तफ़्सीर:
सहाबा में से ज्ञानी लोग तथा अह्ले किताब के विद्वानों में से ईमान लाने वाले इस बात की गवाही देते हैं की अल्लाह ने आपकी ओर जो वह़्य उतारी है, वह सत्य है जिसमें कोई संदेह नहीं है। तथा वह उस प्रभुत्वशाली (पालनहार) के मार्ग की ओर ले जाती है, जिसपर कोई आधिपत्य प्राप्त नहीं कर सकता और वह दुनिया एवं आखिरत में प्रशंसनीय व सराहनीय है।
आयत 7
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ هَلْ نَدُلُّكُمْ عَلَىٰ رَجُلٍۢ يُنَبِّئُكُمْ إِذَا مُزِّقْتُمْ كُلَّ مُمَزَّقٍ إِنَّكُمْ لَفِى خَلْقٍۢ جَدِيدٍ
وَقَالَ
और कहा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
هَلْ
क्या
نَدُلُّكُمْ
हम बताऐं तुम्हें
عَلَىٰ
to
رَجُلٍۢ
ऐसा शख़्स
يُنَبِّئُكُمْ
जो ख़बर देता है तुम्हें
إِذَا
जब
مُزِّقْتُمْ
रेज़ह-रेज़ह कर दिए जाओगे तुम
كُلَّ
पूरी तरह
مُمَزَّقٍ
रेज़ह-रेज़ह किया जाना
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
لَفِى
surely (will be) in
خَلْقٍۢ
अलबत्ता पैदाइश में होगे
جَدِيدٍ
नई
जिन लोगों ने इनकार किया वे कहते है कि "क्या हम तुम्हें एक ऐसा आदमी बताएँ जो तुम्हें ख़बर देता है कि जब तुम बिलकुल चूर्ण-विचूर्ण हो जाओगे तो तुम नवीन काय में जीवित होगे?"
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने अल्लाह का इनकार किया, वे रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की लाई हुई बातों पर आश्चर्यचकित होकर और उसका उपहास करते हुए, अपने में से कुछ लोगों से कहते हैं : क्या हम तुम्हें एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताएँ, जो तुम्हें यह सूचना देता है कि जब तुम मर जाओगे और टुकड़े-टुकड़े हो जाओगे, तो तुम मौत के पश्चात पुनः जीवित किए जाओगे?!
आयत 8
أَفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا أَم بِهِۦ جِنَّةٌۢ ۗ بَلِ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ فِى ٱلْعَذَابِ وَٱلضَّلَـٰلِ ٱلْبَعِيدِ
أَفْتَرَىٰ
क्या उसने गढ़ लिया
عَلَى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
كَذِبًا
झूठ
أَم
या
بِهِۦ
उसे
جِنَّةٌۢ ۗ
कोई जुनून है
بَلِ
बल्कि
ٱلَّذِينَ
वो जो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाते
بِٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत पर
فِى
(will be) in
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब में
وَٱلضَّلَـٰلِ
और गुमराही में हैं
ٱلْبَعِيدِ
दूर की
क्या उसने अल्लाह पर झूठ घड़कर थोपा है, या उसे कुछ उन्माद है? नहीं, बल्कि जो लोग आख़िरत पर ईमान नहीं रखते वे यातना और परले दरजे की गुमराही में हैं
तफ़्सीर:
तथा उन्होंने कहा : क्या इस व्यक्ति ने अल्लाह पर कोई झूठ गढ़ लिया है, जिसके कारण वह हमारी मृत्यु के पश्चात हमारे पुनर्जीवित किए जाने का दावा कर रहा है, या वह पागल हो गया है, जो ऐसी बात कह रहा है जिसकी कोई सच्चाई नहीं है? बात ऐसी नहीं है, जैसा कि इन्होंने दावा किया है, बल्कि बात यह है कि जो लोग आख़िरत पर विश्वास नहीं रखते, वे क़ियामत के दिन सख्त यातना में होंगे तथा दुनिया में वे सत्य से बहुत दूर की गुमराही में हैं।
आयत 9
أَفَلَمْ يَرَوْا۟ إِلَىٰ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ وَٱلْأَرْضِ ۚ إِن نَّشَأْ نَخْسِفْ بِهِمُ ٱلْأَرْضَ أَوْ نُسْقِطْ عَلَيْهِمْ كِسَفًۭا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَةًۭ لِّكُلِّ عَبْدٍۢ مُّنِيبٍۢ
أَفَلَمْ
क्या भला नहीं
يَرَوْا۟
उन्होंने देखा
إِلَىٰ
towards
مَا
उसकी तरफ़ जो
بَيْنَ
(is) before them
أَيْدِيهِمْ
उनके सामने है
وَمَا
और जो
خَلْفَهُم
उनके पीछे है
مِّنَ
of
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
وَٱلْأَرْضِ ۚ
और ज़मीन से
إِن
अगर
نَّشَأْ
हम चाहें
نَخْسِفْ
हम धँसा दें
بِهِمُ
उन्हें
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन में
أَوْ
या
نُسْقِطْ
हम गिरा दें
عَلَيْهِمْ
उन पर
كِسَفًۭا
कुछ टुकड़े
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ ۚ
आसमान से
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكَ
उसमें
لَـَٔايَةًۭ
अलबत्ता एक निशानी है
لِّكُلِّ
वास्ते हर
عَبْدٍۢ
बन्दे
مُّنِيبٍۢ
रुजूअ करने वाले के
क्या उन्होंने आकाश और धरती को नहीं देखा, जो उनके आगे भी है और उनके पीछे भी? यदि हम चाहें तो उन्हें धरती में धँसा दें या उनपर आकाश से कुछ टुकड़े गिरा दें। निश्चय ही इसमें एक निशानी है हर उस बन्दे के लिए जो रुजू करनेवाला हो
तफ़्सीर:
क्या मरणोपरांत पुनर्जीवन को झुठलाने वाले ये लोग, अपने आगे धरती को तथा अपने पीछे आकाश को नहीं देखते? यदि हम उनके पैरों के नीचे से धरती को धँसाना चाहें, तो हम उसे धंँसा सकते हैं। और यदि हम उनपर आकाश के टुकड़े गिराना चाहें, तो हम उनपर उन्हें गिरा सकते हैं। निःसंदेह इसमें हर उस बंदे के लिए, जो अपने पालनहार की आज्ञाकारिता की ओर बहुलता से लौटने वाला है, एक निश्चित संकेत है, जिससे वह अल्लाह की शक्ति का प्रमाण ग्रहण करता है। क्योंकि जो ऐसा करने में सक्षम है, वह तुम्हारी मृत्यु तथा तुम्हारे शरीर के टुकड़े-टुकड़े हो जाने के पश्चात्, तुम्हें पुनर्जीवित करने में भी सक्षम है।
आयत 10
۞ وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا دَاوُۥدَ مِنَّا فَضْلًۭا ۖ يَـٰجِبَالُ أَوِّبِى مَعَهُۥ وَٱلطَّيْرَ ۖ وَأَلَنَّا لَهُ ٱلْحَدِيدَ
۞ وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
ءَاتَيْنَا
दिया हमने
دَاوُۥدَ
दाऊद को
مِنَّا
अपने पास से
فَضْلًۭا ۖ
फ़ज़ल
يَـٰجِبَالُ
ऐ पहाड़ो
أَوِّبِى
तस्बीह(दोहराओ)
مَعَهُۥ
साथ उसके
وَٱلطَّيْرَ ۖ
और परिन्दों को(भी)
وَأَلَنَّا
और नर्म किया हमने
لَهُ
उसके लिए
ٱلْحَدِيدَ
लोहा
हमने दाऊद को अपनी ओर से श्रेष्ठ ता प्रदान की, "ऐ पर्वतों! उसके साथ तसबीह को प्रतिध्वनित करो, और पक्षियों तुम भी!" और हमने उसके लिए लोहे को नर्म कर दिया
तफ़्सीर:
हमने दाऊद अलैहिस्सलाम को अपनी ओर से नुबुव्वत और राज्य प्रदान किया, तथा हमने पर्वतों से कहा : ऐ पर्वतो! तुम दाऊद के साथ अल्लाह की पवित्रता का गान करो। इसी प्रकार हमने पक्षियों से (भी) कहा। और हमने उनके लिए लोहे को नरम कर दिया, ताकि वह उससे जो उपकरण चाहें, बनाएँ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह की तारीफ और दाऊद-सुलेमान अलैहिस्सलाम की नेमतों का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि नेमत मिलने पर घमंड की बजाय उसे अल्लाह की राह में इस्तेमाल करना चाहिए, जैसे दाऊद अलैहिस्सलाम ने किया।
आयत 11
أَنِ ٱعْمَلْ سَـٰبِغَـٰتٍۢ وَقَدِّرْ فِى ٱلسَّرْدِ ۖ وَٱعْمَلُوا۟ صَـٰلِحًا ۖ إِنِّى بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌۭ
أَنِ
कि
ٱعْمَلْ
बनाओ
سَـٰبِغَـٰتٍۢ
कुशादह ज़रहें
وَقَدِّرْ
और अंदाज़े पर रखो
فِى
[of]
ٱلسَّرْدِ ۖ
हल्क़े में
وَٱعْمَلُوا۟
और अमल करो
صَـٰلِحًا ۖ
नेक
إِنِّى
बेशक मैं
بِمَا
उसे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
بَصِيرٌۭ
ख़ूब देखने वाला हूँ
कि "पूरी कवचें बना और कड़ियों को ठीक अंदाज़ें से जोड।" - और तुम अच्छा कर्म करो। निस्संदेह जो कुछ तुम करते हो उसे मैं देखता हूँ
तफ़्सीर:
(ऐ दाऊद) तुम विस्तृत कवचें बनाओ, जो तुम्हारे सेनानियों को उनके दुश्मन की वार से बचा सकें। और कीलों को कड़ियों के अनुकूल बनाओ। उन्हें इतनी पतली न बनाओ कि कड़ियों के अंदर रुक न पाएँँ और न ही वे इतनी मोटी हों कि उनके अंदर घुस न सकें। तथा सत्कर्म करते रहो। मैं तुम्हारे कर्मों को भली-भाँति देख रहा हूँ। तुम्हारे कर्मों में से कुछ भी मुझसे छिपा नहीं है, और मैं तुम्हें उनका बदला दूँगा।
आयत 12
وَلِسُلَيْمَـٰنَ ٱلرِّيحَ غُدُوُّهَا شَهْرٌۭ وَرَوَاحُهَا شَهْرٌۭ ۖ وَأَسَلْنَا لَهُۥ عَيْنَ ٱلْقِطْرِ ۖ وَمِنَ ٱلْجِنِّ مَن يَعْمَلُ بَيْنَ يَدَيْهِ بِإِذْنِ رَبِّهِۦ ۖ وَمَن يَزِغْ مِنْهُمْ عَنْ أَمْرِنَا نُذِقْهُ مِنْ عَذَابِ ٱلسَّعِيرِ
وَلِسُلَيْمَـٰنَ
और सुलैमान के लिए
ٱلرِّيحَ
हवा को(मुसख़्खर किया)
غُدُوُّهَا
सुबह का चलना उसका
شَهْرٌۭ
एक माह का
وَرَوَاحُهَا
और शाम का चलना उसका
شَهْرٌۭ ۖ
एक माह का
وَأَسَلْنَا
और बहा दिया हमने
لَهُۥ
उसके लिए
عَيْنَ
चश्मा
ٱلْقِطْرِ ۖ
पिघले हुए ताँबे का
وَمِنَ
And [of]
ٱلْجِنِّ
और जिन्नों में से
مَن
जो
يَعْمَلُ
काम करते थे
بَيْنَ
before him
يَدَيْهِ
उसके सामने
بِإِذْنِ
इज़्न से
رَبِّهِۦ ۖ
उसके रब के
وَمَن
और जो
يَزِغْ
सरकशी करता
مِنْهُمْ
उनमें से
عَنْ
from
أَمْرِنَا
हमारे हुक्म से
نُذِقْهُ
हम चखाते उसे
مِنْ
of
عَذَابِ
अज़ाब से
ٱلسَّعِيرِ
भड़कती हुई आग के
और सुलैमान के लिए वायु को वशीभुत कर दिया था। प्रातः समय उसका चलना एक महीने की राह तक और सायंकाल को उसका चलना एक महीने की राह तक - और हमने उसके लिए पिघले हुए ताँबे का स्रोत बहा दिया - और जिन्नों में से भी कुछ को (उसके वशीभूत कर दिया था,) जो अपने रब की अनुज्ञा से उसके आगे काम करते थे। (हमारा आदेशा था,) "उनमें से जो हमारे हुक्म से फिरेगा उसे हम भडकती आग का मज़ा चखाएँगे।"
तफ़्सीर:
तथा हमने सुलैमान बिन दाऊद अलैहिमस्सलाम के लिए हवा को वशीभूत कर दिया। वह प्रातः काल एक महीने की दूरी तय करती थी और सायंकाल एक महीने की दूरी तय करती थी। और हमने उनके लिए ताँबे का स्रोत बहा दिया, ताकि वह ताँबे से जो चाहें, बनाएँ। और हमने कुछ जिन्नों को भी उनके वश में कर दिया, जो अपने पालनहार के आदेश से उनके आगे काम करते थे। और जिन्नों में से जो भी मेरे आदेश से मुँह फेरेगा, उसे हम दहकती आग की यातना चखाएँगे।
आयत 13
يَعْمَلُونَ لَهُۥ مَا يَشَآءُ مِن مَّحَـٰرِيبَ وَتَمَـٰثِيلَ وَجِفَانٍۢ كَٱلْجَوَابِ وَقُدُورٍۢ رَّاسِيَـٰتٍ ۚ ٱعْمَلُوٓا۟ ءَالَ دَاوُۥدَ شُكْرًۭا ۚ وَقَلِيلٌۭ مِّنْ عِبَادِىَ ٱلشَّكُورُ
يَعْمَلُونَ
वो बनाते
لَهُۥ
उसके लिए
مَا
जो
يَشَآءُ
वो चाहता
مِن
of
مَّحَـٰرِيبَ
बड़ी-बड़ी इमारतें
وَتَمَـٰثِيلَ
और मुजस्समे
وَجِفَانٍۢ
और लगन
كَٱلْجَوَابِ
हौज़ की तरह
وَقُدُورٍۢ
और देगें
رَّاسِيَـٰتٍ ۚ
गड़ी हुईं
ٱعْمَلُوٓا۟
अमल करो
ءَالَ
O family
دَاوُۥدَ
ऐ आले दाऊद
شُكْرًۭا ۚ
शुक्र करने के लिए
وَقَلِيلٌۭ
और कम ही हैं
مِّنْ
of
عِبَادِىَ
मेरे बन्दों में से
ٱلشَّكُورُ
शुक्र गुज़ार
वे उसके लिए बनाते, जो कुछ वह चाहता - बड़े-बड़े भवन, प्रतिमाएँ, बड़े हौज़ जैसे थाल और जमी रहनेवाली देगें - "ऐ दाऊद के लोगों! कर्म करो, कृतज्ञता दिखाने रूप में। मेरे बन्दों में कृतज्ञ थोड़े ही हैं।"
तफ़्सीर:
ये जिन्न सुलैमान अलैहिस्लाम के लिए वह सब कुछ बनाते थे, जो वह चाहते थे। जैसे नमाज़ के लिए मस्जिदें, महलें, प्रतिमाएँ, पानी के बड़े-बड़े हौज़ों के समान लगन (टब) और एक ही जगह जमी हुई खाना बनाने की देगें, जो बड़ी होने के कारण अपनी जगह से हटाई नहीं जा सकती थीं। और हमने उनसे कहा : (ऐ दाऊद के घर वालो) तुम लोग अल्लाह की प्रदान की हुई नेमतों के लिए धन्यवाद करते हुए अच्छे कार्य करो। और मेरे बंदों में से कम ही लोग मेरी नेमतों के प्रति मेरे कृतज्ञ होते हैं।
आयत 14
فَلَمَّا قَضَيْنَا عَلَيْهِ ٱلْمَوْتَ مَا دَلَّهُمْ عَلَىٰ مَوْتِهِۦٓ إِلَّا دَآبَّةُ ٱلْأَرْضِ تَأْكُلُ مِنسَأَتَهُۥ ۖ فَلَمَّا خَرَّ تَبَيَّنَتِ ٱلْجِنُّ أَن لَّوْ كَانُوا۟ يَعْلَمُونَ ٱلْغَيْبَ مَا لَبِثُوا۟ فِى ٱلْعَذَابِ ٱلْمُهِينِ
فَلَمَّا
फिर जब
قَضَيْنَا
मुक़र्रर किया हमने
عَلَيْهِ
उस पर
ٱلْمَوْتَ
मौत को
مَا
ना
دَلَّهُمْ
ख़बर दी उनको
عَلَىٰ
[on]
مَوْتِهِۦٓ
उसकी मौत की
إِلَّا
मगर
دَآبَّةُ
कीड़े ने
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन के
تَأْكُلُ
वो खाता रहा
مِنسَأَتَهُۥ ۖ
उसका असा
فَلَمَّا
फिर जब
خَرَّ
वो गिर पड़ा
تَبَيَّنَتِ
वाज़ेह हो गया
ٱلْجِنُّ
जिन्नों पर
أَن
कि
لَّوْ
अगर
كَانُوا۟
होते वो
يَعْلَمُونَ
वो इल्म रखते
ٱلْغَيْبَ
ग़ैब का
مَا
ना
لَبِثُوا۟
वो रहते
فِى
in
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब में
ٱلْمُهِينِ
रुस्वाकुन
फिर जब हमने उसके लिए मौत का फ़ैसला लागू किया तो फिर उन जिन्नों को उसकी मौत का पता बस भूमि के उस कीड़े ने दिया जो उसकी लाठी को खा रहा था। फिर जब वह गिर पड़ा, तब जिन्नों पर प्रकट हुआ कि यदि वे परोक्ष के जाननेवाले होते तो इस अपमानजनक यातना में पड़े न रहते
तफ़्सीर:
फिर जब हमने सुलैमान अलैहिस्सलाम पर मौत का निर्णय कर दिया, तो जिन्नों को इस बात की सूचना कि वह मर चुके हैं केवल उस घुन के माध्यम से मिली, जो उनकी उस लाठी को खा रहा था, जिसपर सुलैमान अलैहिस्सलाम टेक लगाए हुए थे। फिर जब वह गिर गए, तो जिन्नों के सामने यह स्पष्ट हो गया कि उनके पास गैब (परोक्ष) की जानकारी नहीं है; क्योंकि यदि वे गैब की बात जानते, तो उस अपमानजनक यातना में न रहते। इससे अभिप्राय वे कठिन काम हैं जो वे सुलैमान अलैहिस्सलाम के लिए करते रहे, यह सोचकर कि वह जीवित हैं और उन्हें देख रहे हैं।
आयत 15
لَقَدْ كَانَ لِسَبَإٍۢ فِى مَسْكَنِهِمْ ءَايَةٌۭ ۖ جَنَّتَانِ عَن يَمِينٍۢ وَشِمَالٍۢ ۖ كُلُوا۟ مِن رِّزْقِ رَبِّكُمْ وَٱشْكُرُوا۟ لَهُۥ ۚ بَلْدَةٌۭ طَيِّبَةٌۭ وَرَبٌّ غَفُورٌۭ
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
كَانَ
थी
لِسَبَإٍۢ
सबा के लिए
فِى
in
مَسْكَنِهِمْ
उनके घरों में
ءَايَةٌۭ ۖ
एक निशानी
جَنَّتَانِ
दो बाग़
عَن
on
يَمِينٍۢ
दाऐं तरफ़
وَشِمَالٍۢ ۖ
और बाऐं तरफ़
كُلُوا۟
खाओ
مِن
from
رِّزْقِ
रिज़्क़ में से
رَبِّكُمْ
अपने रब के
وَٱشْكُرُوا۟
और शुक्र करो
لَهُۥ ۚ
उसका
بَلْدَةٌۭ
शहर है
طَيِّبَةٌۭ
पाकीज़ा
وَرَبٌّ
और रब है
غَفُورٌۭ
ख़ूब बख़्शने वाला
सबा के लिए उनके निवास-स्थान ही में एक निशानी थी - दाएँ और बाएँ दो बाग, "खाओ अपने रब की रोज़ी, और उसके प्रति आभार प्रकट करो। भूमि भी अच्छी-सी और रब भी क्षमाशील।"
तफ़्सीर:
सबा जाति के लोगों के लिए उनके उस निवास-स्थान में जिसमें वे रहते थे, अल्लाह की शक्ति और उनपर उसके अनुग्रह की एक स्पष्ट निशानी थी। वह निशानी दो बाग़ थे : उनमें से एक उसके दाईं ओर था और दूसरा उसके बाईं ओर। तथा हमने उनसे कहा था : तुम अपने पालनहार की रोज़ी में से खाओ और उसकी नेमतों पर उसका शुक्रिया अदा करो। यह एक अच्छा नगर है और यह अल्लाह अति क्षमाशील पालनहार है, जो तौबा करने वाले लोगों के पापों को माफ़ कर देता है।
आयत 16
فَأَعْرَضُوا۟ فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ سَيْلَ ٱلْعَرِمِ وَبَدَّلْنَـٰهُم بِجَنَّتَيْهِمْ جَنَّتَيْنِ ذَوَاتَىْ أُكُلٍ خَمْطٍۢ وَأَثْلٍۢ وَشَىْءٍۢ مِّن سِدْرٍۢ قَلِيلٍۢ
فَأَعْرَضُوا۟
फिर वो मुँह मोड़ गए
فَأَرْسَلْنَا
तो भेजा हमने
عَلَيْهِمْ
उन पर
سَيْلَ
सैलाब
ٱلْعَرِمِ
बँद तोड़
وَبَدَّلْنَـٰهُم
और बदल कर दिए हमने उन्हें
بِجَنَّتَيْهِمْ
बदले उनके दो बाग़ों के
جَنَّتَيْنِ
दो बाग़
ذَوَاتَىْ
producing fruit
أُكُلٍ
producing fruit
خَمْطٍۢ
बदमज़ह फलों वाले
وَأَثْلٍۢ
और झाओ के दरख़्त
وَشَىْءٍۢ
और कुछ
مِّن
of
سِدْرٍۢ
बेरी के दरख़्त
قَلِيلٍۢ
थोड़े से
किन्तु वे ध्यान में न लाए तो हमने उनपर बँध-तोड़ बाढ़ भेज दी और उनके दोनों बाग़ों के बदले में उन्हें दो दूसरे बाग़ दिए, जिनमें कड़वे-कसैले फल और झाड़ थे, और कुछ थोड़ी-सी झड़-बेरियाँ
तफ़्सीर:
फिर उन्होंने अल्लाह का शुक्रिया अदा करने और उसके रसूलों पर ईमान लाने से मुँह फेर लिया। अतः हमने उनकी नेमतों को यातना में बदलकर उन्हें दंडित किया, और उनपर एक भयंकर बाढ़ भेज दी, जिसने उनके बाँध को नष्ट कर दिया और उनके खेतों को डुबो दिया। तथा उनके दोनों बाग़ों को ऐसे दो बाग़ों से बदल दिया जो कड़वे फल देने वाले थे और उनके अंदर झाऊ के फलहीन पेड़ तथा कुछ थोड़े-से बेर थे।
आयत 17
ذَٰلِكَ جَزَيْنَـٰهُم بِمَا كَفَرُوا۟ ۖ وَهَلْ نُجَـٰزِىٓ إِلَّا ٱلْكَفُورَ
ذَٰلِكَ
ये
جَزَيْنَـٰهُم
बदला दिया हमने उन्हें
بِمَا
बवजह उसके जो
كَفَرُوا۟ ۖ
उन्होंने नाशुक्री की
وَهَلْ
और नहीं
نُجَـٰزِىٓ
हम बदला/सज़ा देते
إِلَّا
मगर
ٱلْكَفُورَ
सख़्त नाशुक्रे को
यह बदला हमने उन्हें इसलिए दिया कि उन्होंने कृतध्नता दिखाई। ऐसा बदला तो हम कृतध्न लोगों को ही देते है
तफ़्सीर:
यह परिवर्तन (जो उन्हें प्राप्त नेमतों में हुआ) उनके कुफ़्र के कारण तथा उनके नेमतों के प्रति आभार प्रकट करने से उपेक्षा करने के कारण है। और हम यह कठोर दंड केवल उसी को देते हैं जो अल्लाह की नेमतों का इनकार करने वाला तथा महिमावान अल्लाह के प्रति बहुत कृतघ्न हो।
आयत 18
وَجَعَلْنَا بَيْنَهُمْ وَبَيْنَ ٱلْقُرَى ٱلَّتِى بَـٰرَكْنَا فِيهَا قُرًۭى ظَـٰهِرَةًۭ وَقَدَّرْنَا فِيهَا ٱلسَّيْرَ ۖ سِيرُوا۟ فِيهَا لَيَالِىَ وَأَيَّامًا ءَامِنِينَ
وَجَعَلْنَا
और बनाईं थीं हमने
بَيْنَهُمْ
दर्मियान उनके
وَبَيْنَ
और दर्मियान
ٱلْقُرَى
उन बस्तियों के
ٱلَّتِى
वो जो
بَـٰرَكْنَا
बरकत दी हमने
فِيهَا
जिन में
قُرًۭى
बस्तियाँ
ظَـٰهِرَةًۭ
ज़ाहिर/नुमायाँ
وَقَدَّرْنَا
और अंदाज़े पर रखी हमने
فِيهَا
उनमें
ٱلسَّيْرَ ۖ
मसाफ़त
سِيرُوا۟
चले फिरो
فِيهَا
उसमें
لَيَالِىَ
रातों को
وَأَيَّامًا
और दिनों को
ءَامِنِينَ
अमन से रहने वाले
और हमने उनके और उन बस्तियों के बीच जिनमें हमने बरकत रखी थी प्रत्यक्ष बस्तियाँ बसाई और उनमें सफ़र की मंज़िलें ख़ास अंदाज़े पर रखीं, "उनमें रात-दिन निश्चिन्त होकर चलो फिरो!"
तफ़्सीर:
और हमने यमन में सबा वालों के बीच और शाम की उन बस्तियों के बीच, जिनमें हमने बरकत रखी थी, पास-पास कुछ और बस्तियाँ बना दी थीं। और हमने उनमें यात्रा के पड़ाव इस प्रकार निर्धारित किए थे कि वे एक बस्ती से दूसरी बस्ती तक बिना किसी कष्ट के यात्रा करते थे यहाँ तक कि वे शाम पहुँच जाते थे। और हमने उनसे कहा था : तुम दुश्मन, भूख और प्यास से सुरक्षित होकर, रात या दिन में जितना चाहो चलो।
आयत 19
فَقَالُوا۟ رَبَّنَا بَـٰعِدْ بَيْنَ أَسْفَارِنَا وَظَلَمُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ فَجَعَلْنَـٰهُمْ أَحَادِيثَ وَمَزَّقْنَـٰهُمْ كُلَّ مُمَزَّقٍ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّكُلِّ صَبَّارٍۢ شَكُورٍۢ
فَقَالُوا۟
तो उन्होंने कहा
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
بَـٰعِدْ
दूरी पैदा कर दे
بَيْنَ
दर्मियान
أَسْفَارِنَا
हमारे सफ़रों के
وَظَلَمُوٓا۟
और उन्होंने ज़ुल्म किया
أَنفُسَهُمْ
अपनी जानों पर
فَجَعَلْنَـٰهُمْ
तो बना दिया हमने उन्हें
أَحَادِيثَ
बातें/अफ़साने
وَمَزَّقْنَـٰهُمْ
और रेज़ा-रेज़ा कर दिया हमने उन्हें
كُلَّ
हर तरह
مُمَزَّقٍ ۚ
रेज़ा-रेज़ा करना
إِنَّ
यक़ीनन
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
لِّكُلِّ
वास्ते हर
صَبَّارٍۢ
बहुत सब्र करने वाले
شَكُورٍۢ
शुक्र गुज़ार के
किन्तु उन्होंने कहा, "ऐ हमारे रब! हमारी यात्राओं में दूरी कर दे।" उन्होंने स्वयं अपने ही ऊपर ज़ुल्म किया। अन्ततः हम उन्हें (अतीत की) कहानियाँ बनाकर रहे, औऱ उन्हें बिल्कुल छिन्न-भिन्न कर डाला। निश्चय ही इसमें निशानियाँ है प्रत्येक बड़े धैर्यवान, कृतज्ञ के लिए
तफ़्सीर:
उन्होंने यात्रा के दौरान दूरियों को कम करने की अपने ऊपर अल्लाह की नेमत को ठुकरा दिया और कहने लगे : ऐ हमारे पालनहार! इन बस्तियों को हटाकर हमारी यात्राओं के बीच दूरी पैदा कर दे; ताकि हम यात्राओं की थकान का स्वाद ले सकें और हमारी सवारियों की विशिष्टता प्रकट हो सके। उन्होंने अल्लाह की नेमत को ठुकराकर, उसके प्रति आभार प्रकट करने से मुँह फेरकर और अपने बीच गरीबों से ईर्ष्या करके स्वयं पर अत्याचार किया। अतः हमने उन्हें क़िस्से-कहानियाँ बनाकर छोड़ दिया कि बाद में आने वाले उनके बारे में बातें करें। और हमने उन्हें विभिन्न देशों में इस तरह विभाजित कर दिया कि वे एक दूसरे के साथ संवाद न कर सकें। निःसंदेह उपर्युक्त कहानी (सबा वालों को नेमत प्रदान करने और फिर उनकी कृतघ्नता और अहंकार के कारण उनसे प्रतिशोध लेने) में हर उस व्यक्ति के लिए शिक्षा (इबरत) है, जो अल्लाह की आज्ञाकारिता करने पर, उसकी अवज्ञा से बचने में तथा विपत्ति पर बहुत धैर्य से काम लेने वाला तथा अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों के प्रति बहुत कृतज्ञ है।
आयत 20
وَلَقَدْ صَدَّقَ عَلَيْهِمْ إِبْلِيسُ ظَنَّهُۥ فَٱتَّبَعُوهُ إِلَّا فَرِيقًۭا مِّنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक
صَدَّقَ
सच कर दिखाया
عَلَيْهِمْ
उन पर
إِبْلِيسُ
इब्लीस ने
ظَنَّهُۥ
गुमान अपना
فَٱتَّبَعُوهُ
तो उन्होंने पैरवी की उसकी
إِلَّا
सिवाए
فَرِيقًۭا
एक गिरोह के
مِّنَ
of
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों में से
इबलीस ने उनके विषय में अपना गुमान सत्य पाया और ईमानवालो के एक गिरोह के सिवा उन्होंने उसी का अनुसरण किया
तफ़्सीर:
इबलीस ने जो गुमान व्यक्त किया था कि वह उन्हें बहका सकता है और उन्हें सत्य से गुमराह कर सकता है, वह उसने सच कर दिखया। चुनाँचे वे कुफ़्र और गुमराही में उसके पीछे चलने लगे, सिवाय ईमान वालों के एक समूह के। क्योंकि उन्होंने उसका पालन न करके उसे निराश कर दिया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सबा कौम की खुशहाली और नाशुक्री का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि खुशहाली में नाशुक्री करना उसे छीन लेने का सबब बन सकता है।
आयत 21
وَمَا كَانَ لَهُۥ عَلَيْهِم مِّن سُلْطَـٰنٍ إِلَّا لِنَعْلَمَ مَن يُؤْمِنُ بِٱلْـَٔاخِرَةِ مِمَّنْ هُوَ مِنْهَا فِى شَكٍّۢ ۗ وَرَبُّكَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ حَفِيظٌۭ
وَمَا
और ना
كَانَ
था
لَهُۥ
उसका
عَلَيْهِم
उन पर
مِّن
any
سُلْطَـٰنٍ
कोई ज़ोर
إِلَّا
मगर
لِنَعْلَمَ
ताकि हम जान लें
مَن
कौन
يُؤْمِنُ
ईमान लाता है
بِٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत पर
مِمَّنْ
उससे जो
هُوَ
वो है
مِنْهَا
उसके बारे में
فِى
(is) in
شَكٍّۢ ۗ
शक में
وَرَبُّكَ
और रब आपका
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ के
حَفِيظٌۭ
ख़ूब निगहबान है
यद्यपि उसको उनपर कोई ज़ोर और अधिकार प्राप्त न था, किन्तु यह इसलिए कि हम उन लोगों को जो आख़िरत पर ईमान रखते है उन लोगों से अलग जान ले जो उसकी ओर से किसी सन्देह में पड़े हुए है। तुम्हारा रब हर चीज़ का अभिरक्षक है
तफ़्सीर:
इबलीस के पास उन पर कोई शक्ति नहीं थी जिससे वह उन्हें गुमराह होने पर विवश कर सके। वह तो केवल उनके लिए (गुमराही को) सुशोभित कर रहा था और उन्हें बहका रहा था। परंतु हमने उसे उन लोगों को बहकाने की अनुमति दी, ताकि उस व्यक्ति की बात ज़ाहिर हो जाए जो आख़िरत तथा उसमें मिलने वाले बदले पर ईमान रखता है और जो उसके बारे में संदेह में पड़ा है। तथा (ऐ रसूल!) आपका पालनहार प्रत्येक चीज़ का संरक्षक है। वह अपने बंदों के कामों को सुरक्षित रखता है और उन्हें उनका बदला देता है।
आयत 22
قُلِ ٱدْعُوا۟ ٱلَّذِينَ زَعَمْتُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ ۖ لَا يَمْلِكُونَ مِثْقَالَ ذَرَّةٍۢ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَلَا فِى ٱلْأَرْضِ وَمَا لَهُمْ فِيهِمَا مِن شِرْكٍۢ وَمَا لَهُۥ مِنْهُم مِّن ظَهِيرٍۢ
قُلِ
कह दीजिए
ٱدْعُوا۟
पुकारो
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्हें
زَعَمْتُم
समझते हो तुम (माबूद)
مِّن
besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के
لَا
Not
يَمْلِكُونَ
नहीं वो मालिक हो सकते
مِثْقَالَ
बराबर
ذَرَّةٍۢ
ज़र्रे के
فِى
in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَلَا
और ना
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَمَا
और नहीं
لَهُمْ
उनके लिए
فِيهِمَا
इन दोनों में
مِن
any
شِرْكٍۢ
कोई हिस्सा
وَمَا
और नहीं
لَهُۥ
उसके लिए
مِنْهُم
उन में
مِّن
any
ظَهِيرٍۢ
कोई मददगार
कह दो, "अल्लाह को छोड़कर जिनका तुम्हें (उपास्य होने का) दावा है, उन्हें पुकार कर देखो। वे न अल्लाह में कणभर चीज़ के मालिक है और न धरती में और न उन दोनों में उनका कोई साझी है और न उनमें से कोई उसका सहायक है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) इन बहुदेववादियों से कह दीजिए : जिन्हें तुमने अल्लाह के सिवा अपना पूज्य समझ रखा है, उन्हें पुकारो, ताकि वे तुम्हें लाभ पहुँचाएँ या तुमसे हानि को दूर करें। क्योंकि वे आकाशों तथा धरती में एक कण के बराबर भी अधिकार नहीं रखते। तथा उनमें अल्लाह के साथ उनकी कोई भागीदारी भी नहीं है। और न ही अल्लाह का कोई सहायक है, जो उसकी मदद करे। क्योंकि वह साझेदारों से तथा सहायकों से बेनियाज़ है।
आयत 23
وَلَا تَنفَعُ ٱلشَّفَـٰعَةُ عِندَهُۥٓ إِلَّا لِمَنْ أَذِنَ لَهُۥ ۚ حَتَّىٰٓ إِذَا فُزِّعَ عَن قُلُوبِهِمْ قَالُوا۟ مَاذَا قَالَ رَبُّكُمْ ۖ قَالُوا۟ ٱلْحَقَّ ۖ وَهُوَ ٱلْعَلِىُّ ٱلْكَبِيرُ
وَلَا
और ना
تَنفَعُ
फ़ायदा देगी
ٱلشَّفَـٰعَةُ
सिफ़ारिश
عِندَهُۥٓ
उसके पास
إِلَّا
मगर
لِمَنْ
जिसके लिए
أَذِنَ
वो इजाज़त दे
لَهُۥ ۚ
उसे
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
فُزِّعَ
घबराहट दूर की जाएगी
عَن
on
قُلُوبِهِمْ
उनके दिलों से
قَالُوا۟
वो कहेंगे
مَاذَا
क्या कुछ
قَالَ
फ़रमाया
رَبُّكُمْ ۖ
तुम्हारे रब ने
قَالُوا۟
वो कहेंगे
ٱلْحَقَّ ۖ
हक़
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلْعَلِىُّ
बहुत बुलन्द
ٱلْكَبِيرُ
बहुत बड़ा
और उसके यहाँ कोई सिफ़ारिश काम नहीं आएगी, किन्तु उसी की जिसे उसने (सिफ़ारिश करने की) अनुमति दी हो। यहाँ तक कि जब उनके दिलों से घबराहट दूर हो जाएगी, तो वे कहेंगे, "तुम्हारे रब ने क्या कहा?" वे कहेंगे, "सर्वथा सत्य। और वह अत्यन्त उच्च, महान है।"
तफ़्सीर:
और महिमावान अल्लाह के पास सिफारिश केवल उस व्यक्ति के लिए लाभदायक होगी, जिसे अल्लाह सिफारिश की अनुमति प्रदान कर दे। और अल्लाह अपनी महानता के कारण, केवल उसी को सिफारिश की अनुमति देगा, जिसे वह पसंद करे। और उसकी महानता का एक दृश्य यह है कि जब वह आकाश में बात करता है, तो फ़रिश्ते उसके फरमान के आगे विनम्रता अपनाते हुए अपने परों को फड़फड़ाने लगते हैं। यहाँ तक कि जब उनके दिलों से घबराहट दूर कर दी जाती है, तो फ़रिश्ते जिबरील से पूछते हैं : तुम्हारे पालनहार ने क्या कहा? जबरील कहते हैं : उसने सत्य कहा है और वह अपने अस्तित्व और प्रभुता में सबसे ऊँचा, और बहुत महान है जिसके सामने हर चीज़ हीन (छोटी) है।
आयत 24
۞ قُلْ مَن يَرْزُقُكُم مِّنَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ قُلِ ٱللَّهُ ۖ وَإِنَّآ أَوْ إِيَّاكُمْ لَعَلَىٰ هُدًى أَوْ فِى ضَلَـٰلٍۢ مُّبِينٍۢ
۞ قُلْ
कह दीजिए
مَن
कौन
يَرْزُقُكُم
रिज़्क़ देता है तुम्हें
مِّنَ
from
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों से
وَٱلْأَرْضِ ۖ
और ज़मीन से
قُلِ
कह दीजिए
ٱللَّهُ ۖ
अल्लाह
وَإِنَّآ
और बेशक हम
أَوْ
या
إِيَّاكُمْ
तुम
لَعَلَىٰ
(are) surely upon
هُدًى
अलबत्ता हिदायत पर हैं
أَوْ
या
فِى
in
ضَلَـٰلٍۢ
गुमराही में हैं
مُّبِينٍۢ
खुली-खुली
कहो, "कौन तुम्हें आकाशों और धरती में रोज़ी देता है?" कहो, "अल्लाह!" अब अवश्य ही हम है या तुम ही हो मार्ग पर, या खुली गुमराही में
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन मुश्रिकों से कह दें : तुम्हें आकाशों से बारिश उतारकर और धरती से फल, फसलें, मेवे और अन्य चीज़ें उगाकर रोज़ी कौन देता है? आप कह दें : अल्लाह ही है, जो तुम्हें इनसे जीविका प्रदान करता है। और निश्चय हम या (ऐ मुश्रिको!) तुम लोग अवश्य सन्मार्ग पर हैं अथवा खुली गुमराही में हैं। हम में से कोई एक अनिवार्य रूप से ऐसा है। और इसमें कोई संदेह नहीं कि हिदायत वाले लोग ईमान वाले ही हैं, और गुमराही वाले लोग बहुदेववादी ही हैं।
आयत 25
قُل لَّا تُسْـَٔلُونَ عَمَّآ أَجْرَمْنَا وَلَا نُسْـَٔلُ عَمَّا تَعْمَلُونَ
قُل
कह दीजिए
لَّا
Not
تُسْـَٔلُونَ
नहीं तुम पूछे जाओगे
عَمَّآ
उसके बारे में जो
أَجْرَمْنَا
जुर्म किए हमने
وَلَا
और ना
نُسْـَٔلُ
हम पूछे जाऐंगे
عَمَّا
उसके बारे में जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
कहो, "जो अपराध हमने किए, उसकी पूछ तुमसे न होगी और न उसकी पूछ हमसे होगी जो तुम कर रहे हो।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप उनसे कह दें : हमने जो पाप किए हैं, उनके बारे में क़ियामत के दिन तुमसे नहीं पूछा जाएगा, और जो कुछ तुम कर रहे थे, उसके बारे में हमसे नहीं पूछा जाएगा।
आयत 26
قُلْ يَجْمَعُ بَيْنَنَا رَبُّنَا ثُمَّ يَفْتَحُ بَيْنَنَا بِٱلْحَقِّ وَهُوَ ٱلْفَتَّاحُ ٱلْعَلِيمُ
قُلْ
कह दीजिए
يَجْمَعُ
जमा करेगा
بَيْنَنَا
हमारे दर्मियान
رَبُّنَا
रब हमारा
ثُمَّ
फिर
يَفْتَحُ
वो फ़ैसला करेगा
بَيْنَنَا
हमारे दर्मियान
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
وَهُوَ
और वो
ٱلْفَتَّاحُ
ज़बरदस्त फ़ैसला करने वाला है
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब जानने वाला है
कह दो, "हमारा रब हम सबको इकट्ठा करेगा। फिर हमारे बीच ठीक-ठीक फ़ैसला कर देगा। वही ख़ूब फ़ैसला करनेवाला, अत्यन्त ज्ञानवान है।"
तफ़्सीर:
आप उनसे कह दें : अल्लाह क़ियामत के दिन हमें और तुम्हें एकत्रित करेगा। फिर हमारे और तुम्हारे बीच न्याय के साथ निर्णय करेगा। चुनाँचे जो सत्य पर है, उसे उस व्यक्ति से अलग कर देगा जो असत्य पर है। वह ऐसा निर्णयकारी है, जो न्याय के साथ निर्णय करता है और वह जो कुछ निर्णय करता है, उसे भली-भाँति जानने वाला है।
आयत 27
قُلْ أَرُونِىَ ٱلَّذِينَ أَلْحَقْتُم بِهِۦ شُرَكَآءَ ۖ كَلَّا ۚ بَلْ هُوَ ٱللَّهُ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
قُلْ
कह दीजिए
أَرُونِىَ
दिखाओ मुझे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्हें
أَلْحَقْتُم
मिला दिया तुमने
بِهِۦ
साथ उसके
شُرَكَآءَ ۖ
शरीक (बना कर)
كَلَّا ۚ
हरगिज़ नहीं
بَلْ
बल्कि
هُوَ
वो ही है
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिकमत वाला
कहो, "मुझे उनको दिखाओ तो, जिनको तुमने साझीदार बनाकर उसके साथ जोड रखा है। कुछ नहीं, बल्कि बही अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप उनसे कह दें : मुझे वो लोग दिखाओ, जिन्हें तुमने अल्लाह का साझी बना लिया है, जिनको तुम अल्लाह के साथ इबादत में साझेदार बनाते हो। कदापि नहीं, मामला वैसा नहीं है जैसा कि तुमने कल्पना की है कि उसके साझेदार हैं। बल्कि वह अल्लाह अत्यंत प्रभुत्वशाली है, जिसे कोई पराजित नहीं कर सकता, तथा वह अपनी रचना, अपने निर्णय और अपने प्रबंधन में हिकमत वाला है।
आयत 28
وَمَآ أَرْسَلْنَـٰكَ إِلَّا كَآفَّةًۭ لِّلنَّاسِ بَشِيرًۭا وَنَذِيرًۭا وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
وَمَآ
और नहीं
أَرْسَلْنَـٰكَ
भेजा हमने आपको
إِلَّا
मगर
كَآفَّةًۭ
तमाम
لِّلنَّاسِ
इन्सानों के लिए
بَشِيرًۭا
ख़ुशख़बरी देने वाला
وَنَذِيرًۭا
और डराने वाला बनाकर
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَ
अक्सर
ٱلنَّاسِ
लोग
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
हमने तो तुम्हें सारे ही मनुष्यों को शुभ-सूचना देनेवाला और सावधान करनेवाला बनाकर भेजा, किन्तु अधिकतर लोग जानते नहीं
तफ़्सीर:
और हमने आपको (ऐ रसूल) सर्व मानव जाति के लिए भेजा है, (आप) धर्मपरायण लोगों को यह शुभ सूचना देने वाले हैं कि उनके लिए जन्नत है, तथा काफिरों और दुराचारियों को जहन्नम से डराने वाले हैं। लेकिन अधिकतर लोग यह नहीं जानते हैं। अगर उन्हें यह पता होता, तो वे आपको नहीं झुठलाते।
आयत 29
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَـٰذَا ٱلْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
مَتَىٰ
कब होगा
هَـٰذَا
ये
ٱلْوَعْدُ
वादा
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
वे कहते है, "यह वादा कब पूरा होगा, यदि तुम सच्चे हो?"
तफ़्सीर:
तथा बहुदेववादी लोग उस यातना के लिए, जिससे उन्हें डराया जाता है, जल्दी मचाते हुए आपसे कहते हैं : यातना का यह वादा कब पूरा होगा, यदि तुम अपने इस दावे में सच्चे हो कि वह सत्य है?
आयत 30
قُل لَّكُم مِّيعَادُ يَوْمٍۢ لَّا تَسْتَـْٔخِرُونَ عَنْهُ سَاعَةًۭ وَلَا تَسْتَقْدِمُونَ
قُل
कह दीजिए
لَّكُم
तुम्हारे लिए
مِّيعَادُ
वादा है
يَوْمٍۢ
एक दिन का
لَّا
not
تَسْتَـْٔخِرُونَ
ना तुम पीछे हो सकते हो
عَنْهُ
उससे
سَاعَةًۭ
एक घड़ी भी
وَلَا
और ना
تَسْتَقْدِمُونَ
तुम आगे बढ़ सकते हो
कह दो, "तुम्हारे लिए एक विशेष दिन की अवधि नियत है, जिससे न एक घड़ी भर पीछे हटोगे और न आगे बढ़ोगे।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप यातना के लिए जल्दी मचाने वाले इन लोगों से कह दीजिए : तुम्हारे लिए एक विशिष्ट दिन का वादा है; उससे न एक घड़ी पीछे रह सकते हो और न उससे एक घड़ी आगे बढ़ सकते हो। और यह दिन क़ियामत का दिन है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सबा कौम की तबाही और मुशरिकों के ऐतराज़ात का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि नेमतों का शुक्र अदा न करना आखिरकार बरबादी की तरफ ले जाता है।
आयत 31
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لَن نُّؤْمِنَ بِهَـٰذَا ٱلْقُرْءَانِ وَلَا بِٱلَّذِى بَيْنَ يَدَيْهِ ۗ وَلَوْ تَرَىٰٓ إِذِ ٱلظَّـٰلِمُونَ مَوْقُوفُونَ عِندَ رَبِّهِمْ يَرْجِعُ بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ ٱلْقَوْلَ يَقُولُ ٱلَّذِينَ ٱسْتُضْعِفُوا۟ لِلَّذِينَ ٱسْتَكْبَرُوا۟ لَوْلَآ أَنتُمْ لَكُنَّا مُؤْمِنِينَ
وَقَالَ
और कहा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لَن
हरगिज़ नहीं
نُّؤْمِنَ
हम ईमान लाऐंगे
بِهَـٰذَا
साथ उस
ٱلْقُرْءَانِ
क़ुरआन के
وَلَا
और ना
بِٱلَّذِى
उसके जो
بَيْنَ
(was) before it
يَدَيْهِ ۗ
पहले है उससे
وَلَوْ
और काश
تَرَىٰٓ
आप देखें
إِذِ
जब
ٱلظَّـٰلِمُونَ
ज़ालिम लोग
مَوْقُوفُونَ
खड़े हुए होंगे
عِندَ
सामने
رَبِّهِمْ
अपने रब के
يَرْجِعُ
लौटाएगा
بَعْضُهُمْ
बाज़ उनका
إِلَىٰ
to
بَعْضٍ
तरफ़ बाज़ के
ٱلْقَوْلَ
बात को
يَقُولُ
कहेंगे
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ٱسْتُضْعِفُوا۟
कमज़ोर समझे गए थे
لِلَّذِينَ
उनसे जिन्होंने
ٱسْتَكْبَرُوا۟
तकब्बुर किया
لَوْلَآ
अगर ना होते
أَنتُمْ
तुम
لَكُنَّا
अलबत्ता होते हम
مُؤْمِنِينَ
मोमिन
जिन लोगों ने इनकार किया वे कहते है, "हम इस क़ुरआन को कदापि न मानेंगे और न उसको जो इसके आगे है।" और यदि तुम देख पाते जब ज़ालिम अपने रब के सामने खड़े कर दिए जाएँगे। वे आपस में एक-दूसरे पर इल्ज़ाम डाल रहे होंगे। जो लोग कमज़ोर समझे गए वे उन लोगों से जो बड़े बनते थे कहेंगे, "यदि तुम न होते तो हम अवश्य ही ईमानवाले होते।"
तफ़्सीर:
और अल्लाह के साथ कुफ़्र करने वालों ने कहा : हम इस क़ुरआन पर कदापि ईमान नहीं लाएँगे, जिसके बारे में मुहम्मद का दावा है कि वह उसपर अवतरित हुआ है। इसी तरह हम पिछली आसमानी पुस्तकों पर भी ईमान नहीं लाएँगे। और (ऐ रसूल) यदि आप देखें, जब क़ियामत के दिन अत्याचारियों को उनके पालनहार के पास हिसाब के लिए रोक लिया जाएगा, वे आपस में एक-दूसरे की बात का उत्तर दे रहे होंगे, उनमें से प्रत्येक व्यक्ति दूसरे को ज़िम्मेदार ठहरा रहा होगा और उसे दोष दे रहा होगा। अनुयायी लोग जो कमज़ोर समझ लिए गए थे अपने उन आकाओं से जिन्होंने उन्हें दुनिया में कमज़ोर बनाकर रखा था, कहेंगे : यदि तुम लोगों ने हमें गुमराह न किया होता, तो हम अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाने वाले होते।
आयत 32
قَالَ ٱلَّذِينَ ٱسْتَكْبَرُوا۟ لِلَّذِينَ ٱسْتُضْعِفُوٓا۟ أَنَحْنُ صَدَدْنَـٰكُمْ عَنِ ٱلْهُدَىٰ بَعْدَ إِذْ جَآءَكُم ۖ بَلْ كُنتُم مُّجْرِمِينَ
قَالَ
कहेंगे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
ٱسْتَكْبَرُوا۟
तकब्बुर किया
لِلَّذِينَ
उनसे जो
ٱسْتُضْعِفُوٓا۟
कमज़ोर समझे गए
أَنَحْنُ
क्या हमने
صَدَدْنَـٰكُمْ
रोका था हमने तुम्हें
عَنِ
from
ٱلْهُدَىٰ
हिदायत से
بَعْدَ
बाद इसके कि
إِذْ
जब
جَآءَكُم ۖ
वो आगई तुम्हारे पास
بَلْ
बल्कि
كُنتُم
थे तुम ही
مُّجْرِمِينَ
मुजरिम
वे लोग जो बड़े बनते थे उन लोगों से जो कमज़ोर समझे गए थे, कहेंगे, "क्या हमने तुम्हे उस मार्गदर्शन से रोका था, वह तुम्हारे पास आया था? नहीं, बल्कि तुम स्वयं ही अपराधी हो।"
तफ़्सीर:
जिन अनुसरण किए गए लोगों ने अभिमान के कारण सत्य को अस्वीकार कर दिया था, वे उन अनुसरणकारियों से कहेंगे, जिन्हें उन्होंने कमज़ोर समझ रखा था : क्या हमने तुम्हें उस मार्गदर्शन से रोका था जो मुहम्मद तुम्हारे पास लेकर आए थे?! नहीं, बल्कि तुम स्वयं अत्याचारी, भ्रष्ट और बिगाड़ पैदा करने वाले लोग थे।
आयत 33
وَقَالَ ٱلَّذِينَ ٱسْتُضْعِفُوا۟ لِلَّذِينَ ٱسْتَكْبَرُوا۟ بَلْ مَكْرُ ٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ إِذْ تَأْمُرُونَنَآ أَن نَّكْفُرَ بِٱللَّهِ وَنَجْعَلَ لَهُۥٓ أَندَادًۭا ۚ وَأَسَرُّوا۟ ٱلنَّدَامَةَ لَمَّا رَأَوُا۟ ٱلْعَذَابَ وَجَعَلْنَا ٱلْأَغْلَـٰلَ فِىٓ أَعْنَاقِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ ۚ هَلْ يُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
وَقَالَ
और कहेंगे
ٱلَّذِينَ
वो जो
ٱسْتُضْعِفُوا۟
कमज़ोर समझे गए
لِلَّذِينَ
उनसे जिन्होंने
ٱسْتَكْبَرُوا۟
तकब्बुर किया
بَلْ
बल्कि
مَكْرُ
चाल थी
ٱلَّيْلِ
रात
وَٱلنَّهَارِ
और दिन की
إِذْ
जब
تَأْمُرُونَنَآ
तुम हुक्म देते थे हमें
أَن
कि
نَّكْفُرَ
हम कुफ़्र करें
بِٱللَّهِ
साथ अल्लाह के
وَنَجْعَلَ
और हम बनाऐं
لَهُۥٓ
उसके लिए
أَندَادًۭا ۚ
कुछ शरीक
وَأَسَرُّوا۟
और वो छुपाऐंगे
ٱلنَّدَامَةَ
निदामत
لَمَّا
जब
رَأَوُا۟
वो देखेंगे
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब को
وَجَعَلْنَا
और हम डाल देंगे
ٱلْأَغْلَـٰلَ
तौक़
فِىٓ
on
أَعْنَاقِ
गर्दनों में
ٱلَّذِينَ
उनकी जिन्होंने
كَفَرُوا۟ ۚ
कुफ़्र किया
هَلْ
नहीं
يُجْزَوْنَ
वो बदला दिए जाऐंगे
إِلَّا
मगर
مَا
उसका जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
वे लोग कमज़ोर समझे गए थे बड़े बननेवालों से कहेंगे, "नहीं, बल्कि रात-दिन की मक्कारी थी जब तुम हमसे कहते थे कि हम अल्लाह के साथ कुफ़्र करें और दूसरों को उसका समकक्ष ठहराएँ।" जब वे यातना देखेंगे तो मन ही मन पछताएँगे और हम उन लोगों की गरदनों में जिन्होंने कुफ़्र की नीति अपनाई, तौक़ डाल देंगे। वे वही तो बदले में पाएँगे, जो वे करते रहे थे?
तफ़्सीर:
वे अनुयायी, जिन्हें उनके आक़ाओं ने कमज़ोर समझ रखा था, अपने उन प्रमुखों से जिन्होंने सत्य स्वीकारने से अभिमान किया, कहेंगे : बल्कि तुम्हारी हमारे साथ रात और दिन की चालों ही ने हमें मार्गदर्शन से रोका था, जब तुम हमें अल्लाह के साथ कुफ़्र करने और उसके सिवा दूसरे मखलूक़ों की इबादत का आदेश देते थे। और जब वे खुद अपनी आँखों से सज़ा देख लेंगे और मालूम हो जाएगा कि अब उन्हें सज़ा होने वाली है, तो वे दुनिया में जो कुफ़्र किया करते थे, उसपर अपने दिल में पछतावा छिपाएँगे। और हम काफिरों के गले में तौक़ डाल देंगे। यह सज़ा उन्हें उनके उन कर्मों के बदले दी जाएगी, जो वे दुनिया में किया करते थे, जैसे अल्लाह के अलावा अन्य की पूजा करना और पाप करना।
आयत 34
وَمَآ أَرْسَلْنَا فِى قَرْيَةٍۢ مِّن نَّذِيرٍ إِلَّا قَالَ مُتْرَفُوهَآ إِنَّا بِمَآ أُرْسِلْتُم بِهِۦ كَـٰفِرُونَ
وَمَآ
और नहीं
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
فِى
to
قَرْيَةٍۢ
किसी बस्ती में
مِّن
any
نَّذِيرٍ
कोई डराने वाला
إِلَّا
मगर
قَالَ
कहा
مُتْرَفُوهَآ
उसके ख़ुशहाल लोगों ने
إِنَّا
बेशक हम
بِمَآ
उसका जो
أُرْسِلْتُم
भेजे गए तुम
بِهِۦ
साथ उसके
كَـٰفِرُونَ
इन्कार करने वाले हैं
हमने जिस बस्ती में भी कोई सचेतकर्ता भेजा तो वहाँ के सम्पन्न लोगों ने यही कहा कि "जो कुछ देकर तुम्हें भेजा गया है, हम तो उसको नहीं मानते।"
तफ़्सीर:
तथा हमने जिस बस्ती में भी कोई रसूल भेजा, जो उन्हें अल्लाह की सज़ा से डराता था, तो उसके सत्ता, प्रतिष्ठा और धन से संपन्न लोगों ने कहा : (ऐ रसूलो) तुम जिस चीज़ के साथ भेजे गए हो, हम उसका इनकार करते हैं।
आयत 35
وَقَالُوا۟ نَحْنُ أَكْثَرُ أَمْوَٰلًۭا وَأَوْلَـٰدًۭا وَمَا نَحْنُ بِمُعَذَّبِينَ
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
نَحْنُ
हम
أَكْثَرُ
ज़्यादा हैं
أَمْوَٰلًۭا
माल में
وَأَوْلَـٰدًۭا
और औलाद में
وَمَا
और नहीं
نَحْنُ
हम
بِمُعَذَّبِينَ
अज़ाब दिए जाने वाले
उन्होंने यह भी कहा कि "हम तो धन और संतान में तुमसे बढ़कर है और हम यातनाग्रस्त होनेवाले नहीं।"
तफ़्सीर:
इन प्रतिष्ठा वाले लोगों ने इतराते और गर्व करते हुए कहा : हम अधिक धन वाले और अधिक संतान वाले हैं। और तुम जो यह दावा करते हो कि हम यातना से पीड़ित किए जाने वाले है, वह झूठ है। हम न तो दुनिया में यातना से पीड़ित किए जाएँगे और न आखिरत में।
आयत 36
قُلْ إِنَّ رَبِّى يَبْسُطُ ٱلرِّزْقَ لِمَن يَشَآءُ وَيَقْدِرُ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّ
बेशक
رَبِّى
रब मेरा
يَبْسُطُ
वो फैलाता है
ٱلرِّزْقَ
रिज़्क़ को
لِمَن
जिसके लिए
يَشَآءُ
वो चाहता है
وَيَقْدِرُ
और वो तंग कर देता है
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَ
अक्सर
ٱلنَّاسِ
लोग
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो जानते
कहो, "निस्संदेह मेरा रब जिसके लिए चाहता है रोज़ी कुशादा कर देता है और जिसे चाहता है नपी-तुली देता है। किन्तु अधिकांश लोग जानते नहीं।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप इन लोगों से कह दें, जो अल्लाह की ओर से प्राप्त नेमतों के धोखे में पड़े हैं : मेरा सर्वशक्तिमान व महिमावान पालनहार जिसके लिए चाहता है, जीविका विस्तृत कर देता है उसका परीक्षण करने के लिए कि वह शुक्रिया अदा करता है या नाशुक्री करता है, तथा वह जिसके लिए चाहता है, रोज़ी तंग कर देता है यह जाँचने के लिए कि वह सब्र करता है या क्रोध प्रकट करता है? लेकिन ज़्यादातर लोग नहीं जानते कि अल्लाह हिकमत वाला है। वह किसी मामले का निर्णय एक व्यापक हिकमत के तहत ही करता है, जिसे कुछ लोग जानते हैं, तो कुछ लोग उससे अनभिज्ञ होते हैं।
आयत 37
وَمَآ أَمْوَٰلُكُمْ وَلَآ أَوْلَـٰدُكُم بِٱلَّتِى تُقَرِّبُكُمْ عِندَنَا زُلْفَىٰٓ إِلَّا مَنْ ءَامَنَ وَعَمِلَ صَـٰلِحًۭا فَأُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمْ جَزَآءُ ٱلضِّعْفِ بِمَا عَمِلُوا۟ وَهُمْ فِى ٱلْغُرُفَـٰتِ ءَامِنُونَ
وَمَآ
और नहीं
أَمْوَٰلُكُمْ
माल तुम्हारे
وَلَآ
और ना
أَوْلَـٰدُكُم
औलाद तुम्हारी
بِٱلَّتِى
सबब उस चीज़ का जो
تُقَرِّبُكُمْ
क़रीब करे तुम्हें
عِندَنَا
हम से
زُلْفَىٰٓ
दर्जे में
إِلَّا
मगर
مَنْ
जो कोई
ءَامَنَ
ईमान लाया
وَعَمِلَ
और उसने अमल किए
صَـٰلِحًۭا
नेक
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लेग हैं
لَهُمْ
उनके लिए
جَزَآءُ
बदला है
ٱلضِّعْفِ
दोगुना
بِمَا
बवजह उसके जो
عَمِلُوا۟
उन्होंने अमल किए
وَهُمْ
और वो
فِى
(will be) in
ٱلْغُرُفَـٰتِ
बालाखानों में
ءَامِنُونَ
अमन में होंगे
वह चीज़ न तुम्हारे धन है और न तुम्हारी सन्तान, जो तुम्हें हमसे निकट कर दे। अलबता, जो कोई ईमान लाया और उसने अच्छा कर्म किया, तो ऐसे ही लोग है जिनके लिए उसका कई गुना बदला है, जो उन्होंने किया। और वे ऊपरी मंजिल के कक्षों में निश्चिन्तता-पूर्वक रहेंगे
तफ़्सीर:
तुम्हारे धन और तुम्हारी संतान जिनपर तुम गर्व करते हो, तुम्हें अल्लाह की प्रसन्नता का रास्ता नहीं दिखा सकते। परन्तु जो व्यक्ति ईमान लाया और अच्छा कर्म किया, उसे दोहरा बदला मिलेगा। चुनाँचे धन को अल्लाह के रास्ते में खर्च करने से और संतान के उसके लिए दुआ करने से, उसे अल्लाह की निकटता प्राप्त होती है। अतः उन सत्कर्म करने वाले मोमिनों के लिए, उनके किए हुए अच्छे कामों का दोहरा प्रतिफल है। और वे जन्नत के ऊँचे घरों में यातना, मृत्यु और नेमतों की समाप्ति आदि के भय से निश्चिंत होकर रहेंगे।
आयत 38
وَٱلَّذِينَ يَسْعَوْنَ فِىٓ ءَايَـٰتِنَا مُعَـٰجِزِينَ أُو۟لَـٰٓئِكَ فِى ٱلْعَذَابِ مُحْضَرُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
يَسْعَوْنَ
कोशिश करते हैं
فِىٓ
against
ءَايَـٰتِنَا
हमारी आयात में
مُعَـٰجِزِينَ
इस हाल में कि आजिज़ करने वाले हैं
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
فِى
into
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब में
مُحْضَرُونَ
हाज़िर किए गए
रहे वे लोग जो हमारी आयतों को मात करने के लिए प्रयासरत है, वे लाकर यातनाग्रस्त किए जाएँगे
तफ़्सीर:
तथा जो काफ़िर, लोगों को हमारी आयतों से फेरने का अथक प्रयास करते हैं और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने की कोशिश में लगे रहते हैं, वे दुनिया में घाटा उठाने वाले हैं तथा आखिरत में यातना से ग्रस्त किए जाएँगे।
आयत 39
قُلْ إِنَّ رَبِّى يَبْسُطُ ٱلرِّزْقَ لِمَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦ وَيَقْدِرُ لَهُۥ ۚ وَمَآ أَنفَقْتُم مِّن شَىْءٍۢ فَهُوَ يُخْلِفُهُۥ ۖ وَهُوَ خَيْرُ ٱلرَّٰزِقِينَ
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّ
बेशक
رَبِّى
रब मेरा
يَبْسُطُ
वो फैलाता है
ٱلرِّزْقَ
रिज़्क़
لِمَن
जिसके लिए
يَشَآءُ
वो चाहता है
مِنْ
of
عِبَادِهِۦ
अपने बन्दों में से
وَيَقْدِرُ
और वो तंग कर देता है
لَهُۥ ۚ
उसके लिए
وَمَآ
और जो
أَنفَقْتُم
तुम ख़र्च करते हो
مِّن
of
شَىْءٍۢ
कुछ भी
فَهُوَ
तो वो
يُخْلِفُهُۥ ۖ
वो बदला देता है उसका
وَهُوَ
और वो
خَيْرُ
बेहतर है
ٱلرَّٰزِقِينَ
सब रिज़्क़ देने वालों में
कह दो, "मेरा रब ही है जो अपने बन्दों में से जिसके लिए चाहता है रोज़ी कुशादा कर देता है और जिसके लिए चाहता है नपी-तुली कर देता है। और जो कुछ भी तुमने ख़र्च किया, उसकी जगह वह तुम्हें और देगा। वह सबसे अच्छा रोज़ी देनेवाला है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप कह दीजिए : निःसंदेह मेरा पालनहार अपने बंदों में से जिसके लिए चाहता है, जीविका विस्तृत कर देता है और जिसके लिए चाहता है, उसे तंग कर देता है। और तुम अल्लाह के मार्ग में जो चीज़ भी खर्च करोगे, अल्लाह उसके बदले दुनिया में तुम्हें उससे बेहतर चीज़ प्रदान करेगा तथा आखिरत में भरपूर सवाब देगा। और अल्लाह ही सबसे उत्तम जीविका प्रदान करने वाला है। अतः जिसे जीविका चाहिए, वह महिमावान अल्लाह का सहारा ले।
आयत 40
وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ جَمِيعًۭا ثُمَّ يَقُولُ لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ أَهَـٰٓؤُلَآءِ إِيَّاكُمْ كَانُوا۟ يَعْبُدُونَ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يَحْشُرُهُمْ
वो इकट्ठा करेगा उन्हें
جَمِيعًۭا
सब के सब को
ثُمَّ
फिर
يَقُولُ
वो फ़रमाएगा
لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ
फ़रिश्तों से
أَهَـٰٓؤُلَآءِ
क्या ये लोग
إِيَّاكُمْ
सिर्फ़ तुम्हारी ही
كَانُوا۟
थे वो
يَعْبُدُونَ
वो ईबादत करते
याद करो जिस दिन वह उन सबको इकट्ठा करेगा, फिर फ़रिश्तों से कहेगा, "क्या तुम्ही को ये पूजते रहे है?"
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) याद करें, जिस दिन अल्लाह उन सभी को एकत्रित करेगा। फिर वह महिमावान अल्लाह बहुदेववादियों को फटकारने और डांटने के तौर पर, फरिश्तों से कहेगा : क्या यही लोग दुनिया में अल्लाह को छोड़कर तुम्हारी पूजा किया करते थे?
आज की ज़िंदगी में सबक़
दुनिया के माल-ओ-औलाद पर घमंड करने वालों की मज़म्मत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि माली कामयाबी को अल्लाह की खुशनूदी का सबूत समझना गलत है।
आयत 41
قَالُوا۟ سُبْحَـٰنَكَ أَنتَ وَلِيُّنَا مِن دُونِهِم ۖ بَلْ كَانُوا۟ يَعْبُدُونَ ٱلْجِنَّ ۖ أَكْثَرُهُم بِهِم مُّؤْمِنُونَ
قَالُوا۟
वो कहेंगे
سُبْحَـٰنَكَ
पाक है तू
أَنتَ
तू ही
وَلِيُّنَا
दोस्त है हमारा
مِن
not them
دُونِهِم ۖ
उनके सिवा
بَلْ
बल्कि
كَانُوا۟
थे वो
يَعْبُدُونَ
वो ईबादत करते
ٱلْجِنَّ ۖ
जिन्नों कि
أَكْثَرُهُم
अक्सर उनके
بِهِم
उन्हीं पर
مُّؤْمِنُونَ
ईमान लाने वाले थे
वे कहेंगे, "महान है तू, हमारा निकटता का मधुर सम्बन्ध तो तुझी से है, उनसे नहीं; बल्कि बात यह है कि वे जिन्नों को पूजते थे। उनमें से अधिकतर उन्हीं पर ईमान रखते थे।"
तफ़्सीर:
फ़रिश्ते कहेंगे : तू पाक और पवित्र है! तू ही उनके सिवा हमारा संरक्षक है। हमारे और उनके बीच कोई दोस्ती नहीं है। बल्कि ये बहुदेववादी शैतानों की पूजा करते थे। शैतान उनके सामने फरिश्तों के रूप में आते थे, तो ये अल्लाह को छोड़कर उनकी पूजा करते थे। उनमें से अधिकतर लोग उनपर ईमान रखने वाले थे।
आयत 42
فَٱلْيَوْمَ لَا يَمْلِكُ بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍۢ نَّفْعًۭا وَلَا ضَرًّۭا وَنَقُولُ لِلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ ذُوقُوا۟ عَذَابَ ٱلنَّارِ ٱلَّتِى كُنتُم بِهَا تُكَذِّبُونَ
فَٱلْيَوْمَ
तो आज के दिन
لَا
not
يَمْلِكُ
ना मालिक होगा
بَعْضُكُمْ
बाज़ तुम्हारा
لِبَعْضٍۢ
बाज़ के लिए
نَّفْعًۭا
किसी नफ़ा का
وَلَا
और ना
ضَرًّۭا
किसी नुक़्सान का
وَنَقُولُ
और हम कहेंगे
لِلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
ذُوقُوا۟
चखो
عَذَابَ
अज़ाब
ٱلنَّارِ
आग का
ٱلَّتِى
वो जो
كُنتُم
थे तुम
بِهَا
जिसे
تُكَذِّبُونَ
तुम झुठलाया करते
"अतः आज न तो तुम परस्पर एक-दूसरे के लाभ का अधिकार रखते हो और न हानि का।" और हम उन ज़ालिमों से कहेंगे, "अब उस आग की यातना का मज़ा चखो, जिसे तुम झुठलाते रहे हो।"
तफ़्सीर:
हश्र और हिसाब के दिन, उपास्यों के पास उन लोगों के लिए जो दुनिया में अल्लाह को छोड़कर उनकी उपासना किया करते थे, किसी लाभ और हानि का कोई अधिकार नहीं होगा। तथा हम उन लोगों से, जिन्होंने कुफ़्र तथा गुनाहों के द्वारा अपने ऊपर अत्याचार किया, कहेंगे : उस आग की यातना चखो, जिसे तुम दुनिया में झुठलाया करते थे।
आयत 43
وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ ءَايَـٰتُنَا بَيِّنَـٰتٍۢ قَالُوا۟ مَا هَـٰذَآ إِلَّا رَجُلٌۭ يُرِيدُ أَن يَصُدَّكُمْ عَمَّا كَانَ يَعْبُدُ ءَابَآؤُكُمْ وَقَالُوا۟ مَا هَـٰذَآ إِلَّآ إِفْكٌۭ مُّفْتَرًۭى ۚ وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لِلْحَقِّ لَمَّا جَآءَهُمْ إِنْ هَـٰذَآ إِلَّا سِحْرٌۭ مُّبِينٌۭ
وَإِذَا
और जब
تُتْلَىٰ
पढ़ी जाती हैं
عَلَيْهِمْ
उन पर
ءَايَـٰتُنَا
आयात हमारी
بَيِّنَـٰتٍۢ
वाज़ेह
قَالُوا۟
वो कहते हैं
مَا
नहीं
هَـٰذَآ
ये
إِلَّا
मगर
رَجُلٌۭ
एक शख़्स
يُرِيدُ
वो चाहता है
أَن
कि
يَصُدَّكُمْ
वो रोक दे तुम्हें
عَمَّا
उनसे जिनकी
كَانَ
थे
يَعْبُدُ
इबादत करते
ءَابَآؤُكُمْ
आबा ओ अजदाद तुम्हारे
وَقَالُوا۟
और वो कहते हैं
مَا
नहीं
هَـٰذَآ
ये
إِلَّآ
मगर
إِفْكٌۭ
एक झूठ
مُّفْتَرًۭى ۚ
गढ़ा हुआ
وَقَالَ
और कहा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لِلْحَقِّ
हक़ के बारे में
لَمَّا
जब
جَآءَهُمْ
वो आ गया उनके पास
إِنْ
नहीं
هَـٰذَآ
ये
إِلَّا
मगर
سِحْرٌۭ
जादू
مُّبِينٌۭ
वाज़ेह
उन्हें जब हमारी स्पष्ट़ आयतें पढ़कर सुनाई जाती है तो वे कहते है, "यह तो बस ऐसा व्यक्ति है जो चाहता है कि तुम्हें उनसे रोक दें जिनको तुम्हारे बाप-दादा पूजते रहे है।" और कहते है, "यह तो एक घड़ा हुआ झूठ है।" जिन लोगों ने इनकार किया उन्होंने सत्य के विषय में, जबकि वह उनके पास आया, कह दिया, "यह तो बस एक प्रत्यक्ष जादू है।"
तफ़्सीर:
और जब इन झुठलाने वाले बहुदेववादियों के सामने, हमारे रसूल पर उतरने वाली स्पष्ट आयतें पढ़ी जाती हैं, जिनमें कोई अस्पष्टता नहीं होती है, तो वे कहते हैं : यह व्यक्ति जो इसे लेकर आया है, एक ऐसा व्यक्ति है जो तुम्हें केवल तुम्हारे बाप-दादा के धर्म से हटाना चाहता है। उन्होंने यह भी कहा : यह क़ुरआन मात्र एक झूठ है, जो इसने अल्लाह पर मढ़ दिया है। तथा काफिरों के पास जब अल्लाह के पास से क़ुरआन आया, तो उन्होंने उसके बारे में कहा : यह तो स्पष्ट जादू है; क्योंकि यह पति-पत्नि और बाप-बेटे के बीच जुदाई डाल देता है।
आयत 44
وَمَآ ءَاتَيْنَـٰهُم مِّن كُتُبٍۢ يَدْرُسُونَهَا ۖ وَمَآ أَرْسَلْنَآ إِلَيْهِمْ قَبْلَكَ مِن نَّذِيرٍۢ
وَمَآ
और नहीं
ءَاتَيْنَـٰهُم
दीं हमने उन्हें
مِّن
any
كُتُبٍۢ
कुछ किताबें
يَدْرُسُونَهَا ۖ
वो पढ़ते हों उन्हें
وَمَآ
और नहीं
أَرْسَلْنَآ
भेजा हमने
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
قَبْلَكَ
आपसे पहले
مِن
any
نَّذِيرٍۢ
कोई डराने वाला
हमने उन्हें न तो किताबे दी थीं, जिनको वे पढ़ते हों और न तुमसे पहले उनकी ओर कोई सावधान करनेवाला ही भेजा था
तफ़्सीर:
और हमने उन्हें पुस्तकें नहीं दी हैं, जिन्हें ये लोग पढ़ते हों, जो उन्हें यह बताएँ कि यह क़ुरआन झूठ है, जिसे मुहम्मद ने गढ़ लिया है। तथा (ऐ रसूल) आपको भेजने से पहले हमने उनकी ओर कोई रसूल नहीं भेजा है, जो उन्हें अल्लाह के अज़ाब से डराता।
आयत 45
وَكَذَّبَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ وَمَا بَلَغُوا۟ مِعْشَارَ مَآ ءَاتَيْنَـٰهُمْ فَكَذَّبُوا۟ رُسُلِى ۖ فَكَيْفَ كَانَ نَكِيرِ
وَكَذَّبَ
और झुठलाया
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जो
مِن
(were) before them
قَبْلِهِمْ
उनसे पहले थे
وَمَا
और नहीं
بَلَغُوا۟
वो पहुँचे
مِعْشَارَ
दसवें हिस्से को(भी)
مَآ
जो
ءَاتَيْنَـٰهُمْ
दिया था हमने उन्हें
فَكَذَّبُوا۟
तो उन्होंने झुठलाया था
رُسُلِى ۖ
मेरे रसूलों को
فَكَيْفَ
तो कैसा
كَانَ
था
نَكِيرِ
अज़ाब मेरा
और झूठलाया उन लोगों ने भी जो उनसे पहले थे। और जो कुछ हमने उन्हें दिया था ये तो उसके दसवें भाग को भी नहीं पहुँचे है। तो उन्होंने मेरे रसूलों को झुठलाया। तो फिर कैसी रही मेरी यातना!
तफ़्सीर:
तथा पिछले समुदायों जैसे आद, समूद और लूत अलैहिस्सलाम की जाति ने भी झुठलाया था। जबकि आपकी जाति के बहुदेववादी लोग, शक्ति, अजेयता, धन और संख्या बल में पिछले समुदायों के दसवें भाग तक भी नहीं पहुँचे हैं। चुनाँचे उनमें से प्रत्येक जाति ने अपने रसूल को झुठलाया, तो उनके धन, शक्ति और संख्या ने उन्हें कोई लाभ नहीं दिया और अंततः उनपर मेरा अज़ाब आकर रहा। तो (ऐ रसूल!) देखो कि मेरा उनका खंडन करना कैसा रहा और मेरा उन्हें दंडित करना कैसा रहा।
आयत 46
۞ قُلْ إِنَّمَآ أَعِظُكُم بِوَٰحِدَةٍ ۖ أَن تَقُومُوا۟ لِلَّهِ مَثْنَىٰ وَفُرَٰدَىٰ ثُمَّ تَتَفَكَّرُوا۟ ۚ مَا بِصَاحِبِكُم مِّن جِنَّةٍ ۚ إِنْ هُوَ إِلَّا نَذِيرٌۭ لَّكُم بَيْنَ يَدَىْ عَذَابٍۢ شَدِيدٍۢ
۞ قُلْ
कह दीजिए
إِنَّمَآ
बेशक
أَعِظُكُم
मैं नसीहत करता हूँ तुम्हें
بِوَٰحِدَةٍ ۖ
एक (बात) की
أَن
कि
تَقُومُوا۟
तुम खड़े हो जाओ
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
مَثْنَىٰ
दो-दो
وَفُرَٰدَىٰ
और अकेले-अकेले
ثُمَّ
फिर
تَتَفَكَّرُوا۟ ۚ
तुम ग़ौरो फ़िक्र करो
مَا
नहीं
بِصَاحِبِكُم
तुम्हारे साथी को
مِّن
any
جِنَّةٍ ۚ
कोई जुनून
إِنْ
नहीं
هُوَ
वो
إِلَّا
मगर
نَذِيرٌۭ
डराने वाला
لَّكُم
तुम्हें
بَيْنَ
before
يَدَىْ
पहले
عَذَابٍۢ
एक अज़ाब
شَدِيدٍۢ
सख़्त से
कहो, "मैं तुम्हें बस एक बात की नसीहत करता हूँ कि अल्लाह के लिए दो-दो औऱ एक-एक करके उठ रखे हो; फिर विचार करो। तुम्हारे साथी को कोई उन्माद नहीं है। वह तो एक कठोर यातना से पहले तुम्हें सचेत करनेवाला ही है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन मुश्रिकों से कह दीजिए : मैं तुम्हें एक बात की सलाह और मशवरा देता हूँ; यह कि तुम अपनी इच्छाओं से अलग होकर अल्लाह के लिए दो-दो करके या अकेले-अकेले खड़े हो जाओ। फिर अपने साथी की जीवनी के बारे में, तथा तुम्हें उसके विवेक, सच्चाई और अमानतदारी के बारे में जो कुछ पता है उसमें मनन चिंतन करो; ताकि तुम्हें स्पष्ट रूप से पता चल जाए कि तुम्हारे साथी में कोई पागलपन नहीं है। वह तो केवल तुम्हें एक कठोर यातना के आने से पहले डराने वाला है, यदि तुमने अल्लाह के साथ शिर्क करने से तौबा नहीं किया।
आयत 47
قُلْ مَا سَأَلْتُكُم مِّنْ أَجْرٍۢ فَهُوَ لَكُمْ ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَى ٱللَّهِ ۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ شَهِيدٌۭ
قُلْ
कह दीजिए
مَا
जो भी
سَأَلْتُكُم
माँगा है मैं ने तुमसे
مِّنْ
for
أَجْرٍۢ
कोई अजर
فَهُوَ
तो वो
لَكُمْ ۖ
तुम्हारे लिए है
إِنْ
नहीं
أَجْرِىَ
अजर मेरा
إِلَّا
मगर
عَلَى
from
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह पर
وَهُوَ
और वो
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
شَهِيدٌۭ
ख़ूब गवाह है
कहो, "मैं तुमसे कोई बदला नहीं माँगता वह तुम्हें ही मुबारक हो। मेरा बदला तो बस अल्लाह के ज़िम्मे है और वह हर चीज का साक्षी है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप इन झुठलाने वाले मुश्रिकों से कह दीजिए : मैं तुम्हारे पास जो मार्गदर्शन और भलाई लेकर आया हूँ, उसपर मैंने तुमसे जो बदला या पारिश्रमिक माँगा है (यदि मान लिया जाए कि कुछ माँगा है), तो वह तुम्हारे लिए है। मेरा प्रतिफल तो केवल अल्लाह पर है। वह प्रत्येक वस्तु का गवाह है। वह गवाही देगा कि मैंने तुम्हें संदेश पहुँचा दिया है। तथा वह तुम्हारे कर्मों का भी साक्षी है। अतः वह तुम्हें उनका पूरा-पूरा बदला देगा।
आयत 48
قُلْ إِنَّ رَبِّى يَقْذِفُ بِٱلْحَقِّ عَلَّـٰمُ ٱلْغُيُوبِ
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّ
बेशक
رَبِّى
रब मेरा
يَقْذِفُ
वो डालता है
بِٱلْحَقِّ
हक़ को
عَلَّـٰمُ
ख़ूब जानने वाला है
ٱلْغُيُوبِ
ग़ैबों को
कहो, "निश्चय ही मेरा रब सत्य को असत्य पर ग़ालिब करता है। वह परोक्ष की बातें भली-भाँथि जानता है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप कह दीजिए कि वास्तव में मेरा पालनहार सत्य को असत्य पर हावी करके उसे नष्ट कर देता है और वह परोक्ष को खूब जानने वाला है। आकाशों तथा धरती में उससे कुछ भी छिपा नहीं है, और न ही उससे उसके बंदों के कार्य छिपे हैं।
आयत 49
قُلْ جَآءَ ٱلْحَقُّ وَمَا يُبْدِئُ ٱلْبَـٰطِلُ وَمَا يُعِيدُ
قُلْ
कह दीजिए
جَآءَ
आ गया
ٱلْحَقُّ
हक़
وَمَا
और ना
يُبْدِئُ
इब्तिदा करता है
ٱلْبَـٰطِلُ
बातिल
وَمَا
और ना
يُعِيدُ
वो एआदा करेगा
कह दो, "सत्य आ गया (असत्य मिट गया) और असत्य न तो आरम्भ करता है और न पुनरावृत्ति ही।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप इन झुठलाने वाले मुश्रिकों से कह दें : सत्य अर्थात इस्लाम आ गया और असत्य (झूठ) जिसका कोई प्रभाव या शक्ति दिखाई नहीं देती, वह मिट गया और वह कभी अपने प्रभाव में वापस नहीं आएगा।
आयत 50
قُلْ إِن ضَلَلْتُ فَإِنَّمَآ أَضِلُّ عَلَىٰ نَفْسِى ۖ وَإِنِ ٱهْتَدَيْتُ فَبِمَا يُوحِىٓ إِلَىَّ رَبِّىٓ ۚ إِنَّهُۥ سَمِيعٌۭ قَرِيبٌۭ
قُلْ
कह दीजिए
إِن
अगर
ضَلَلْتُ
मैं भटक गया
فَإِنَّمَآ
तो बेशक
أَضِلُّ
मैं भटकता हूँ
عَلَىٰ
against
نَفْسِى ۖ
अपनी जान पर
وَإِنِ
और अगर
ٱهْتَدَيْتُ
हिदायत पा गया मैं
فَبِمَا
तो बवजह उसके जो
يُوحِىٓ
वही की
إِلَىَّ
मेरी तरफ़
رَبِّىٓ ۚ
मेरे रब ने
إِنَّهُۥ
बेशक वो
سَمِيعٌۭ
बहुत सुनने वाला है
قَرِيبٌۭ
बहुत क़रीब है
कहो, "यदि मैं पथभ्रष्ट॥ हो जाऊँ तो पथभ्रष्ट होकर मैं अपना ही बुरा करूँगा, और यदि मैं सीधे मार्ग पर हूँ, तो इसका कारण वह प्रकाशना है जो मेरा रब मेरी ओर करता है। निस्संदेह वह सब कुछ सुनता है, निकट है।"
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) आप इन झुठलाने वाले मुश्रिकों से कह दें : यदि मैं तुम्हें जो संदेश पहुँचा रहा हूँ, उसमें सत्य मार्ग से भटका हुआ हूँ, तो मेरे भटकने का नुकसान मेरे तक ही सीमित है, उससे तुम्हें कोई हानि नहीं पहुँचेगी। और यदि मैं सीधे मार्ग पर हूँ, तो इसका कारण वह वह़्य है, जो मेरा पालनहार मेरी ओर उतारता है। वह अपने बंदों की बातों को सुनने वाला और इतना निकट है कि मेरी बात सुनना उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन शैतान और उसके पैरोकारों के मुकालमे का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि शैतान कयामत के दिन अपने पैरोकारों से भी बरी हो जाएगा, इसलिए उसकी पैरवी करना खुद को नुकसान पहुंचाना है।
आयत 51
وَلَوْ تَرَىٰٓ إِذْ فَزِعُوا۟ فَلَا فَوْتَ وَأُخِذُوا۟ مِن مَّكَانٍۢ قَرِيبٍۢ
وَلَوْ
और काश
تَرَىٰٓ
आप देखते
إِذْ
जब
فَزِعُوا۟
वो घबरा जाऐंगे
فَلَا
तो ना
فَوْتَ
बचना होगा(उनके लिए)
وَأُخِذُوا۟
और पकड़ लिए जाऐंगे
مِن
from
مَّكَانٍۢ
जगह से
قَرِيبٍۢ
क़रीब की
और यदि तुम देख लेते जब वे घबराए हुए होंगे; फिर बचकर भाग न सकेंगे और निकट स्थान ही से पकड़ लिए जाएँगे
तफ़्सीर:
और यदि (ऐ रसूल) आप देखें, जब ये झुठलाने वाले क़ियामत के दिन यातना को अपने सामने देखकर घबराए हुए होंगे, तो उनके लिए भागने और शरण लेने का कोई स्थान नहीं होगा और वे पहली बार ही में एक नज़दीकी आसान जगह से पकड़ लिए जाएँगे। यदि आप इस स्थिति को देखें, तो आपको एक अद्भुत चीज़ नज़र आएगी।
आयत 52
وَقَالُوٓا۟ ءَامَنَّا بِهِۦ وَأَنَّىٰ لَهُمُ ٱلتَّنَاوُشُ مِن مَّكَانٍۭ بَعِيدٍۢ
وَقَالُوٓا۟
और वो कहेंगे
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
بِهِۦ
उस पर
وَأَنَّىٰ
और कहाँ से होगा
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلتَّنَاوُشُ
हासिल करना(ईमान का)
مِن
from
مَّكَانٍۭ
जगह से
بَعِيدٍۢ
दूर की
और कहेंगे, "हम उसपर ईमान ले आए।" हालाँकि उनके लिए कहाँ सम्भव है कि इतने दूरस्थ स्थान से उसको पास सकें
तफ़्सीर:
और जब वे अपना परिणाम देख लेंगे, तो कहेंगे : हम क़ियामत के दिन पर ईमान लाए। भला अब उनके लिए ईमान ग्रहण करना कैसे संभव है, जबकि ईमान की स्वीकृति का स्थान उनसे बहुत दूर हो गया है?! क्योंकि वे दुनिया के घर से, जो केवल कार्य करने का स्थान है, बदले का नहीं, (उससे) निकलकर आखिरत के घर में प्रवेश कर चुके हैं, जो केवल बदला दिए जाने का घर है, कार्य करने का नहीं।
आयत 53
وَقَدْ كَفَرُوا۟ بِهِۦ مِن قَبْلُ ۖ وَيَقْذِفُونَ بِٱلْغَيْبِ مِن مَّكَانٍۭ بَعِيدٍۢ
وَقَدْ
और तहक़ीक़
كَفَرُوا۟
उन्होंने इन्कार किया था
بِهِۦ
उसका
مِن
before
قَبْلُ ۖ
इससे पहले
وَيَقْذِفُونَ
और वो फ़ेंकते रहे
بِٱلْغَيْبِ
बिन देखे
مِن
from
مَّكَانٍۭ
जगह से
بَعِيدٍۢ
दूर की
इससे पहले तो उन्होंने उसका इनकार किया और दूरस्थ स्थान से बिन देखे तीर-तूक्के चलाते रहे
तफ़्सीर:
और अब उनका ईमान लाना कैसे सही हो सकता तथा उसे कैसे स्वीकार किया जा सकता है, जबकि वे सांसारिक जीवन में इसका इनकार कर चुके हैं, और सत्य को पहुँचने से दूर गुमान के आधार पर अटकल बातें करते रहे हैं, जैसा कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में उनका यह कहना कि : वह जादूगर, काहिन और कवि हैं?!
आयत 54
وَحِيلَ بَيْنَهُمْ وَبَيْنَ مَا يَشْتَهُونَ كَمَا فُعِلَ بِأَشْيَاعِهِم مِّن قَبْلُ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ فِى شَكٍّۢ مُّرِيبٍۭ
وَحِيلَ
और रुकावट डाल दी जाएगी
بَيْنَهُمْ
दर्मियान उनके
وَبَيْنَ
और दर्मियान
مَا
उसके जो
يَشْتَهُونَ
वो ख़्वाहिश करेंगे
كَمَا
जैसे
فُعِلَ
किया गया
بِأَشْيَاعِهِم
साथ उनके साथियों के
مِّن
before
قَبْلُ ۚ
इससे पहले
إِنَّهُمْ
बेशक वो
كَانُوا۟
थे वो
فِى
in
شَكٍّۢ
एक शक में
مُّرِيبٍۭ
बेचैन करने वाले
उनके और उनकी चाहतों के बीच रोक लगा दी जाएगी; जिस प्रकार इससे पहले उनके सहमार्गी लोगों के साथ मामला किया गया। निश्चय ही वे डाँवाडोल कर देनेवाले संदेह में पड़े रहे हैं
तफ़्सीर:
और इन झुठलाने वालों को इनकी इच्छाओं की प्राप्ति, जैसे जीवन के सुखों, कुफ़्र से तौबा, आग से मुक्ति और सांसारिक जीवन में वापसी, से रोक दिया जाएगा, जैसा कि इनसे पहले झुठलाने वाले समुदायों में से इन जैसे लोगों के साथ किया जा चुका है। वे रसूलों की लाई हुई बातों, जैसे एकेश्वरवाद और मरणोपरांत पुनर्जीवन पर ईमान के संबंध में संदेह में पड़े हुए थे, एक ऐसा संदेह जो कुफ़्र का कारण बन गया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन ईमान लाने की पेशकश में बहुत देर हो जाने के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि तौबा और ईमान का सही वक्त दुनिया की ज़िंदगी है, आखिरत में मौका नहीं मिलेगा।
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