सूरह फ़ातिर سورة فاطر
मक्की 45 आयतें
नाम का मतलब
पैदा करने वाला (अल्लाह की सिफत, आसमानों-ज़मीन का पैदा करने वाला)
पृष्ठभूमि
सूरह फातिर में अल्लाह की कुदरत, फरिश्तों की सिफात और कुरआन को अपनाने वालों-न अपनाने वालों के फर्क का ज़िक्र है। इसे सूरह अल-मलाइका (फरिश्तों की सूरह) भी कहा जाता है।
फ़ज़ीलत / सार
इस सूरह में फरिश्तों की सिफात और अल्लाह की तख्लीक की अज़मत का खास ज़िक्र है, जो तौहीद को मज़बूत करता है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ فَاطِرِ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ جَاعِلِ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ رُسُلًا أُو۟لِىٓ أَجْنِحَةٍۢ مَّثْنَىٰ وَثُلَـٰثَ وَرُبَـٰعَ ۚ يَزِيدُ فِى ٱلْخَلْقِ مَا يَشَآءُ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए है
فَاطِرِ
पैदा करने वाला है
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन का
جَاعِلِ
बनाने वाला है
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةِ
फ़रिश्तों को
رُسُلًا
पैग़ामबर
أُو۟لِىٓ
having wings
أَجْنِحَةٍۢ
परों वाले
مَّثْنَىٰ
दो-दो
وَثُلَـٰثَ
और तीन-तीन
وَرُبَـٰعَ ۚ
और चार- चार
يَزِيدُ
वो इज़ाफ़ा करता है
فِى
in
ٱلْخَلْقِ
तख़लीक़ में
مَا
जो
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता है
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌۭ
ख़ूब क़ुदरत रखने वाला है
सब प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जो आकाशों और धरती का पैदा करनेवाला है। दो-दो, तीन-तीन और चार-चार फ़रिश्तों को बाज़ुओंवालों सन्देशवाहक बनाकर नियुक्त करता है। वह संरचना में जैसी चाहता है, अभिवृद्धि करता है। निश्चय ही अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
सब प्रशंसा आकाशों तथा धरती को बिना किसी पूर्व उदाहरण के पैदा करने वाले अल्लाह के लिए है, जिसने फ़रिश्तों में से संदेशवाहक बनाए, जो उसके नियत किए हुए आदेशों को लागू करते हैं और उन्हीं में से कुछ फ़रिश्ते नबियों तक वह़्य पहुँचाने का काम करते हैं। अल्लाह ने उन्हें उनको सौंपी हुई ज़िम्मेदारियों को निभाने की शक्ति प्रदान की है। चुनाँचे उनमें से कुछ दो पंख वाले हैं, कुछ तीन और कुछ चार पंख वाले। वे उनके सहारे अल्लाह का आदेश लागू करने के लिए उड़ते हैं। अल्लाह अपनी सृष्टि में जिस किसी अंग, या सौंदर्य या आवाज की चाहता है, वृद्धि करता है। निश्चय अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है, उसे कोई चीज़ विवश नहीं कर सकती।
आयत 2
مَّا يَفْتَحِ ٱللَّهُ لِلنَّاسِ مِن رَّحْمَةٍۢ فَلَا مُمْسِكَ لَهَا ۖ وَمَا يُمْسِكْ فَلَا مُرْسِلَ لَهُۥ مِنۢ بَعْدِهِۦ ۚ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
مَّا
जो
يَفْتَحِ
खोल दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
مِن
of
رَّحْمَةٍۢ
कोई रहमत
فَلَا
तो नहीं
مُمْسِكَ
कोई बन्द करने वाला
لَهَا ۖ
उसे
وَمَا
और जो
يُمْسِكْ
वो बन्द कर दे
فَلَا
तो नहीं
مُرْسِلَ
कोई भेजने वाला
لَهُۥ
उसे
مِنۢ
thereafter
بَعْدِهِۦ ۚ
बाद उसके
وَهُوَ
और वो
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त है
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिकमत वाला है
अल्लाह जो दयालुता लोगों के लिए खोल दे उसे कोई रोकनेवाला नहीं और जिसे वह रोक ले तो उसके बाद उसे कोई जारी करनेवाला भी नहीं। वह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
निःसंदेह हर चीज़ की कुंजी अल्लाह के हाथ में है। अतः वह लोगों के लिए जीविका, मार्गदर्शन, खुशी और अन्य नेमतों के जो द्वार खोल दे, तो कोई भी उसे रोक नहीं सकता। तथा उनमें से जिसे वह रोक ले, तो उसके रोकने के पश्चात कोई भी उसे नहीं भेज सकता। और वह प्रभुत्वशाली है, जिसे कोई पराजित नहीं कर सकता। वह अपनी रचना, तक़दीर (नियति) और प्रबंध में पूर्ण हिकमत वाला है।
आयत 3
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ ٱذْكُرُوا۟ نِعْمَتَ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ ۚ هَلْ مِنْ خَـٰلِقٍ غَيْرُ ٱللَّهِ يَرْزُقُكُم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ وَٱلْأَرْضِ ۚ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ فَأَنَّىٰ تُؤْفَكُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O
ٱلنَّاسُ
ऐ लोगो
ٱذْكُرُوا۟
याद करो
نِعْمَتَ
नेअमत को
ٱللَّهِ
अल्लाह की
عَلَيْكُمْ ۚ
जो तुम पर है
هَلْ
क्या है
مِنْ
(there) any
خَـٰلِقٍ
कोई पैदा करने वाला
غَيْرُ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
يَرْزُقُكُم
जो रिज़्क़ देता हो तुम्हें
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
وَٱلْأَرْضِ ۚ
और ज़मीन से
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह(बरहक़ )
إِلَّا
मगर
هُوَ ۖ
वो ही
فَأَنَّىٰ
तो कहाँ से
تُؤْفَكُونَ
तुम फेरे जाते हो
ऐ लोगो! अल्लाह की तुमपर जो अनुकम्पा है, उसे याद करो। क्या अल्लाह के सिवा कोई और पैदा करनेवाला है, जो तुम्हें आकाश और धरती से रोज़ी देता हो? उसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं। तो तुम कहाँ से उलटे भटके चले जा रहे हो?
तफ़्सीर:
ऐ लोगो! तुम अपने ऊपर अल्लाह की नेमत को, अपने दिलों और ज़बानों से तथा अपने अंगों से कार्य के द्वारा, याद करो। क्या अल्लाह के अलावा तुम्हारा और कोई पैदा करने वाला है, जो तुम्हें आकाश से वर्षा उतारकर और धरती से फलों एवं फसलों और अन्य चीज़ों को उगाकर जीविका प्रदान करता है? उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। फिर इसके पश्चात तुम इस सत्य से कैसे फिर जाते हो और अल्लाह पर मिथ्यारोपण करते हो और यह दावा करते हो कि अल्लाह के कुछ साझीदार हैं। हालाँकि उसी ने तुम्हें पैदा किया और तुम्हें जीविका प्रदान की?!
आयत 4
وَإِن يُكَذِّبُوكَ فَقَدْ كُذِّبَتْ رُسُلٌۭ مِّن قَبْلِكَ ۚ وَإِلَى ٱللَّهِ تُرْجَعُ ٱلْأُمُورُ
وَإِن
और अगर
يُكَذِّبُوكَ
वो झुठलाते हैं आपको
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
كُذِّبَتْ
झुठलाए गए
رُسُلٌۭ
कई रसूल
مِّن
before you
قَبْلِكَ ۚ
आपसे पहले
وَإِلَى
And to
ٱللَّهِ
और तरफ़ अल्लाह ही के
تُرْجَعُ
लौटाए जाते हैं
ٱلْأُمُورُ
सब काम
और यदि वे तुम्हें झुठलाते तो तुमसे पहले भी कितने ही रसूल झुठलाए जा चुके है। सारे मामले अल्लाह ही की ओर पलटते हैं
तफ़्सीर:
और यदि (ऐ रसूल!) आपकी जाति के लोग आपको झुठलाते हैं, तो आप धैर्य से काम लें। क्योंकि आप पहले रसूल नहीं हैं, जिसे उसकी जाति के लोगों ने झुठलाया है। बल्कि आपसे पूर्व समुदायों ने भी अपने रसूलों को झुठलाया था, जैसे आद, समूद और लूत अलैहिस्सलाम की जाति। तथा सभी मामले अकेले अल्लाह ही की ओर लौटाए जाएँगे। फिर वह झुठलाने वालों को विनष्ट कर देगा तथा अपने रसूलों और ईमान वालों की सहायता करेगा।
आयत 5
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِنَّ وَعْدَ ٱللَّهِ حَقٌّۭ ۖ فَلَا تَغُرَّنَّكُمُ ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَا ۖ وَلَا يَغُرَّنَّكُم بِٱللَّهِ ٱلْغَرُورُ
يَـٰٓأَيُّهَا
O
ٱلنَّاسُ
ऐ लोगो
إِنَّ
बेशक
وَعْدَ
वादा
ٱللَّهِ
अल्लाह का
حَقٌّۭ ۖ
सच्चा है
فَلَا
तो ना
تَغُرَّنَّكُمُ
हरगिज़ धोके में डाले तुम्हें
ٱلْحَيَوٰةُ
ज़िन्दगी
ٱلدُّنْيَا ۖ
दुनिया की
وَلَا
और ना
يَغُرَّنَّكُم
हरगिज़ धोके में डाले तुम्हें
بِٱللَّهِ
अल्लाह के बारे में
ٱلْغَرُورُ
बड़ा धोकेबाज़
ऐ लोगों! निश्चय ही अल्लाह का वादा सच्चा है। अतः सांसारिक जीवन तुम्हें धोखे में न डाले और न वह धोखेबाज़ अल्लाह के विषय में तुम्हें धोखा दे
तफ़्सीर:
ऐ लोगो! अल्लाह ने (क़ियामत के दिन मरणोपरांत पुनर्जीवन और बदले का) जो वादा किया है, वह सत्य है, जिसमें कोई संदेह नहीं है। अतः सांसारिक जीवन की सुख-सुविधाएँ और उसकी इच्छाएँ तुम्हें अच्छे कार्य के द्वारा उस दिन की तैयारी करने से धोखे में न रखें, तथा शैतान असत्य और सांसारिक जीवन में लिप्त रहने को सुशोभित करके तुम्हें धोखे में न डाले।
आयत 6
إِنَّ ٱلشَّيْطَـٰنَ لَكُمْ عَدُوٌّۭ فَٱتَّخِذُوهُ عَدُوًّا ۚ إِنَّمَا يَدْعُوا۟ حِزْبَهُۥ لِيَكُونُوا۟ مِنْ أَصْحَـٰبِ ٱلسَّعِيرِ
إِنَّ
बिलाशुबह
ٱلشَّيْطَـٰنَ
शैतान
لَكُمْ
तुम्हारा
عَدُوٌّۭ
दुश्मन है
فَٱتَّخِذُوهُ
तो बनाओ उसे
عَدُوًّا ۚ
दुश्मन
إِنَّمَا
बेशक
يَدْعُوا۟
वो बुलाता है
حِزْبَهُۥ
अपने गिरोह को
لِيَكُونُوا۟
ताकि वो हो जाऐं
مِنْ
among
أَصْحَـٰبِ
साथियों में से
ٱلسَّعِيرِ
भड़कती आग के
निश्चय ही शैतान तुम्हारा शत्रु है। अतः तुम उसे शत्रु ही समझो। वह तो अपने गिरोह को केवल इसी लिए बुला रहा है कि वे दहकती आगवालों में सम्मिलित हो जाएँ
तफ़्सीर:
निःसंदेह शैतान (ऐ लोगो) तुम्हारा हमेशा का शत्रु है। अतः निरंतर उससे लड़ने की प्रतिबद्धता के साथ उसे अपना शत्रु समझो। वास्तव में, शैतान अपने अनुयायियों को अल्लाह के इनकार की ओर बुलाता है। ताकि उनका परिणाम क़ियामत के दिन दहकती आग में प्रवेश करना हो।
आयत 7
ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لَهُمْ عَذَابٌۭ شَدِيدٌۭ ۖ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ لَهُم مَّغْفِرَةٌۭ وَأَجْرٌۭ كَبِيرٌ
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابٌۭ
अज़ाब है
شَدِيدٌۭ ۖ
सख़्त
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
لَهُم
उनके लिए
مَّغْفِرَةٌۭ
बख़्शिश है
وَأَجْرٌۭ
और अजर है
كَبِيرٌ
बहुत बड़ा
वे लोग है कि जिन्होंने इनकार किया उनके लिए कठोर यातना है। किन्तु जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उनके लिए क्षमा और बड़ा प्रतिदान है
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने शैतान का अनुसरण करते हुए अल्लाह के साथ कुफ़्र किया, उनके लिए कठोर यातना है। और जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए और अच्छे कर्म किए, उनके लिए अल्लाह की ओर से उनके पापों की क्षमा है, तथा उनके लिए उसकी ओर से एक महान प्रतिफल है और वह जन्नत है।
आयत 8
أَفَمَن زُيِّنَ لَهُۥ سُوٓءُ عَمَلِهِۦ فَرَءَاهُ حَسَنًۭا ۖ فَإِنَّ ٱللَّهَ يُضِلُّ مَن يَشَآءُ وَيَهْدِى مَن يَشَآءُ ۖ فَلَا تَذْهَبْ نَفْسُكَ عَلَيْهِمْ حَسَرَٰتٍ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌۢ بِمَا يَصْنَعُونَ
أَفَمَن
क्या भला वो जो
زُيِّنَ
मुज़य्यन कर दिया गया
لَهُۥ
उसके लिए
سُوٓءُ
बुरा
عَمَلِهِۦ
अमल उसका
فَرَءَاهُ
फिर वो देखे उसे
حَسَنًۭا ۖ
ख़ूबसूरत
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يُضِلُّ
वो गुमराह करता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
وَيَهْدِى
और वो हिदायत देता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۖ
वो चाहता है
فَلَا
पस ना
تَذْهَبْ
जाती रहे
نَفْسُكَ
आपकी जान
عَلَيْهِمْ
उन पर
حَسَرَٰتٍ ۚ
हसरतें करके
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِمَا
जो कुछ
يَصْنَعُونَ
वो करते हैं
फिर क्या वह व्यक्ति जिसके लिए उसका बुरा कर्म सुहाना बना दिया गया हो और वह उसे अच्छा दिख रहा हो (तो क्या वह बुराई को छोड़ेगा)? निश्चय ही अल्लाह जिसे चाहता है मार्ग से वंचित रखता है और जिसे चाहता है सीधा मार्ग दिखाता है। अतः उनपर अफ़सोस करते-करते तुम्हारी जान न जाती रहे। अल्लाह भली-भाँति जानता है जो कुछ वे रच रहे है
तफ़्सीर:
जिस व्यक्ति के लिए शैतान ने उसके बुरे कार्य को सुंदर बना दिया, तो वह उसे अच्छा समझने लगा, वह उस व्यक्ति के समान नहीं है, जिसके लिए अल्लाह ने सत्य को सुशोभित कर दिया है, तो वह उसे सत्य समझता है। क्योंकि अल्लाह जिसे चाहे, गुमराह कर देता है और जिसे चाहे, मार्गदर्शन प्रदान करता है, उसे कोई मजबूर करने वाला नहीं है। अतः (ऐ रसूल) आप इन गुमराहों की गुमराही पर शोक करते हुए अपने आपको हलकान न करें। निःसंदेह अल्लाह उनकी करतूतों को जानता है, उनके कार्यों में से कुछ भी उससे छिपा नहीं है।
आयत 9
وَٱللَّهُ ٱلَّذِىٓ أَرْسَلَ ٱلرِّيَـٰحَ فَتُثِيرُ سَحَابًۭا فَسُقْنَـٰهُ إِلَىٰ بَلَدٍۢ مَّيِّتٍۢ فَأَحْيَيْنَا بِهِ ٱلْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا ۚ كَذَٰلِكَ ٱلنُّشُورُ
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
ٱلَّذِىٓ
वो है जिसने
أَرْسَلَ
भेजा
ٱلرِّيَـٰحَ
हवाओं को
فَتُثِيرُ
तो वो उठाती हैं
سَحَابًۭا
बादल
فَسُقْنَـٰهُ
फिर चलाते हैं हम उसे
إِلَىٰ
to
بَلَدٍۢ
तरफ़ शहर
مَّيِّتٍۢ
मुर्दा के
فَأَحْيَيْنَا
फिर ज़िन्दा करते हैं हम
بِهِ
साथ उसके
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
بَعْدَ
बाद
مَوْتِهَا ۚ
उसकी मौत के
كَذَٰلِكَ
इसी तरह होगा
ٱلنُّشُورُ
उठाया जाना
अल्लाह ही तो है जिसने हवाएँ चलाई फिर वह बादलों को उभारती है, फिर हम उसे किसी शुष्क और निर्जीव भूभाग की ओर ले गए, और उसके द्वारा हमने धरती को उसके मुर्दा हो जाने के पश्चात जीवित कर दिया। इसी प्रकार (लोगों का नए सिरे से) जीवित होकर उठना भी है
तफ़्सीर:
तथा वह अल्लाह ही है, जो हवाओं को भेजता है। तो ये हवाएँ बादल को चलाती हैं। फिर हम बादल को ऐसे नगर की ओर ले जाते हैं, जहाँ कोई पौधा नहीं होता। फिर हम उसके पानी से भूमि को उसके सूखने के बाद, उसमें पौधे उगाकर, पुनर्जीवित कर देते हैं। तो जैसे हमने इस भूमि को उसके मरने के बाद, उसमें पौधे उगाकर, पुनर्जीवित किया है, उसी तरह क़ियामत के दिन मृतकों को फिर से जीवित किया जाएगा।
आयत 10
مَن كَانَ يُرِيدُ ٱلْعِزَّةَ فَلِلَّهِ ٱلْعِزَّةُ جَمِيعًا ۚ إِلَيْهِ يَصْعَدُ ٱلْكَلِمُ ٱلطَّيِّبُ وَٱلْعَمَلُ ٱلصَّـٰلِحُ يَرْفَعُهُۥ ۚ وَٱلَّذِينَ يَمْكُرُونَ ٱلسَّيِّـَٔاتِ لَهُمْ عَذَابٌۭ شَدِيدٌۭ ۖ وَمَكْرُ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُوَ يَبُورُ
مَن
जो कोई
كَانَ
है
يُرِيدُ
चाहता
ٱلْعِزَّةَ
इज़्ज़त
فَلِلَّهِ
तो अल्लाह ही के लिए है
ٱلْعِزَّةُ
इज़्ज़त
جَمِيعًا ۚ
सारी की सारी
إِلَيْهِ
तरफ़ उसी के
يَصْعَدُ
चढ़ते हैं
ٱلْكَلِمُ
कलमात
ٱلطَّيِّبُ
पाकीज़ा
وَٱلْعَمَلُ
और अमल
ٱلصَّـٰلِحُ
सालेह
يَرْفَعُهُۥ ۚ
बुलन्द करता है उसे
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
يَمْكُرُونَ
मकर करते हैं
ٱلسَّيِّـَٔاتِ
बुरे
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابٌۭ
अज़ाब है
شَدِيدٌۭ ۖ
सख़्त
وَمَكْرُ
और मकर
أُو۟لَـٰٓئِكَ
उन लोगों का
هُوَ
वो
يَبُورُ
वो तबाह हो जाएगा
जो कोई प्रभुत्व चाहता हो तो प्रभुत्व तो सारा का सारा अल्लाह के लिए है। उसी की ओर अच्छा-पवित्र बोल चढ़ता है और अच्छा कर्म उसे ऊँचा उठाता है। रहे वे लोग जो बुरी चालें चलते है, उनके लिए कठोर यातना है और उनकी चालबाज़ी मटियामेट होकर रहेगी
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति दुनिया अथवा आखिरत में सम्मान चाहता है, वह उसे अल्लाह के सिवाय किसी और से न माँगे। क्योंकि उन दोनों स्थानों में सम्मान केवल अल्लाह ही के लिए है। उसका (बंदों के द्वारा) पवित्र स्मरण उसी की ओर चढ़ता है और बंदों का अच्छा कर्म उसे अल्लाह की ओर ऊपर उठाता है। और जो लोग बुरी साज़िशें रचते हैं (जैसे कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हत्या करने का प्रयास) उनके लिए कठोर यातना है और इन काफ़िरों की साज़िश विफल होकर रहेगी और उन्हें कोई लक्ष्य प्राप्त नहीं होगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
फरिश्तों की सिफात और अल्लाह की तख्लीक का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह की नेमतों को शुमार करना नामुमकिन है, इसलिए हमेशा शुक्रगुज़ार रहना चाहिए।
आयत 11
وَٱللَّهُ خَلَقَكُم مِّن تُرَابٍۢ ثُمَّ مِن نُّطْفَةٍۢ ثُمَّ جَعَلَكُمْ أَزْوَٰجًۭا ۚ وَمَا تَحْمِلُ مِنْ أُنثَىٰ وَلَا تَضَعُ إِلَّا بِعِلْمِهِۦ ۚ وَمَا يُعَمَّرُ مِن مُّعَمَّرٍۢ وَلَا يُنقَصُ مِنْ عُمُرِهِۦٓ إِلَّا فِى كِتَـٰبٍ ۚ إِنَّ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرٌۭ
وَٱللَّهُ
और अल्लाह ने
خَلَقَكُم
पैदा किया तुम्हें
مِّن
from
تُرَابٍۢ
मिट्टी से
ثُمَّ
फिर
مِن
from
نُّطْفَةٍۢ
नुत्फ़े से
ثُمَّ
फिर
جَعَلَكُمْ
बनाया तुम्हें
أَزْوَٰجًۭا ۚ
जोड़े
وَمَا
और नहीं
تَحْمِلُ
उठाती
مِنْ
any
أُنثَىٰ
कोई मादा
وَلَا
और नहीं
تَضَعُ
वो जन्म देती है
إِلَّا
मगर
بِعِلْمِهِۦ ۚ
साथ उसके इल्म के
وَمَا
और नहीं
يُعَمَّرُ
उमर दिया जाता
مِن
any
مُّعَمَّرٍۢ
कोई उमर दिया हुआ
وَلَا
और ना
يُنقَصُ
कमी की जाती
مِنْ
from
عُمُرِهِۦٓ
उसकी उमर में से कुछ
إِلَّا
मगर
فِى
(is) in
كِتَـٰبٍ ۚ
एक किताब में है
إِنَّ
बेशक
ذَٰلِكَ
ये
عَلَى
for
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
يَسِيرٌۭ
बहुत आसान है
अल्लाह ने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया, फिर वीर्य से, फिर तुम्हें जोड़े-जोड़े बनाया। उसके ज्ञान के बिना न कोई स्त्री गर्भवती होती है और न जन्म देती है। और जो कोई आयु को प्राप्ति करनेवाला आयु को प्राप्त करता है और जो कुछ उसकी आयु में कमी होती है। अनिवार्यतः यह सब एक किताब में लिखा होता है। निश्चय ही यह सब अल्लाह के लिए अत्यन्त सरल है
तफ़्सीर:
अल्लाह ही है जिसने तुम्हारे पिता आदम को मिट्टी से पैदा किया, फिर उसने तुम्हें वीर्य से पैदा किया। फिर तुम्हें पुरुष एवं महिला बनाया, ताकि तुम आपस में विवाह करो। तथा जो भी महिला कोई गर्भ धारण करती है तथा वह अपने बच्चे को जन्म देती है, तो वह उस महिमावान के ज्ञान में होता है। उसमें से कोई भी चीज़ उससे लुप्त नहीं होती है। और उसकी सृष्टि में से किसी की आयु में जो भी वृद्धि या कमी की जाती है, तो वह 'लौहे महफ़ूज़' में अंकित है। निःसंदेह ये उल्लिखित चीज़ें (अर्थात् तुम्हें मिट्टी से पैदा करना और तुम्हें विभिन्न चरणों में पैदा करना तथा तुम्हारी आयु को 'लौहे महफ़ूज़' में लिखना) अल्लाह पर बहुत आसान है।
आयत 12
وَمَا يَسْتَوِى ٱلْبَحْرَانِ هَـٰذَا عَذْبٌۭ فُرَاتٌۭ سَآئِغٌۭ شَرَابُهُۥ وَهَـٰذَا مِلْحٌ أُجَاجٌۭ ۖ وَمِن كُلٍّۢ تَأْكُلُونَ لَحْمًۭا طَرِيًّۭا وَتَسْتَخْرِجُونَ حِلْيَةًۭ تَلْبَسُونَهَا ۖ وَتَرَى ٱلْفُلْكَ فِيهِ مَوَاخِرَ لِتَبْتَغُوا۟ مِن فَضْلِهِۦ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
وَمَا
और नहीं
يَسْتَوِى
बराबर हो सकते
ٱلْبَحْرَانِ
दो समुन्दर
هَـٰذَا
ये
عَذْبٌۭ
मीठा है
فُرَاتٌۭ
प्यास बुझाने वाला
سَآئِغٌۭ
ख़ुशगवार है
شَرَابُهُۥ
पानी उसका
وَهَـٰذَا
और ये
مِلْحٌ
खारी है
أُجَاجٌۭ ۖ
निहायत तल्ख़
وَمِن
And from
كُلٍّۢ
और हर एक से
تَأْكُلُونَ
तुम खाते हो
لَحْمًۭا
गोश्त
طَرِيًّۭا
तरो ताज़ा
وَتَسْتَخْرِجُونَ
और तुम निकाल लेते हो
حِلْيَةًۭ
ज़ेवर
تَلْبَسُونَهَا ۖ
तुम पहनते हो उसे
وَتَرَى
और आप देखते हैं
ٱلْفُلْكَ
कश्तियों को
فِيهِ
उसमें
مَوَاخِرَ
फाड़ने वाली हैं
لِتَبْتَغُوا۟
ताकि तुम तलाश करो
مِن
of
فَضْلِهِۦ
उसके फ़ज़ल से
وَلَعَلَّكُمْ
और ताकि तुम
تَشْكُرُونَ
तुम शुक्र अदा करो
दोनों सागर समान नहीं, यह मीठा सुस्वाद है जिससे प्यास जाती रहे, पीने में रुचिकर। और यह खारा-कडुवा है। और तुम प्रत्येक में से तरोताज़ा माँस खाते हो और आभूषण निकालते हो, जिसे तुम पहनते हो। और तुम नौकाओं को देखते हो कि चीरती हुई उसमें चली जा रही हैं, ताकि तुम उसका उदार अनुग्रह तलाश करो और कदाचित तुम आभारी बनो
तफ़्सीर:
और दोनों सागर समान नहीं हो सकते। उनमें से एक बहुत मीठा है और मीठा होने के कारण उसका पानी पीने में रुचिकर है। जबकि दूसरा कड़वा और खारा है, जिसे उसके सख्त खारेपन के कारण पीना संभव नहीं है। उन दोनों सागरों से तुम ताज़ा माँस अर्थात मछली खाते हो तथा उनसे मोती और मूंगे निकालते हो, जिन्हें तुम अलंकरण के रूप में पहनते हो। और (ऐ देखने वाला) तू नावों को देखता है कि वे आती-जाती हुई सागर को चीरती हुई चलती हैं, ताकि तुम व्यापार करके अल्लाह का अनुग्रह तलाश करो और ताकि तुम अल्लाह की दी हुई अपार नेमतों पर, उसका शुक्रिया अदा करो।
आयत 13
يُولِجُ ٱلَّيْلَ فِى ٱلنَّهَارِ وَيُولِجُ ٱلنَّهَارَ فِى ٱلَّيْلِ وَسَخَّرَ ٱلشَّمْسَ وَٱلْقَمَرَ كُلٌّۭ يَجْرِى لِأَجَلٍۢ مُّسَمًّۭى ۚ ذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ رَبُّكُمْ لَهُ ٱلْمُلْكُ ۚ وَٱلَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِهِۦ مَا يَمْلِكُونَ مِن قِطْمِيرٍ
يُولِجُ
वो दाख़िल करता है
ٱلَّيْلَ
रात को
فِى
in (to)
ٱلنَّهَارِ
दिन में
وَيُولِجُ
और वो दाख़िल करता है
ٱلنَّهَارَ
दिन को
فِى
in (to)
ٱلَّيْلِ
रात में
وَسَخَّرَ
और उसने मुसख़्खर किया
ٱلشَّمْسَ
सूरज
وَٱلْقَمَرَ
और चाँद को
كُلٌّۭ
हर एक
يَجْرِى
चल रहा है
لِأَجَلٍۢ
एक वक़्त तक
مُّسَمًّۭى ۚ
जो मुक़र्रर है
ذَٰلِكُمُ
ये है
ٱللَّهُ
अल्लाह
رَبُّكُمْ
रब तुम्हारा
لَهُ
उसी के लिए है
ٱلْمُلْكُ ۚ
बादशाहत
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्हें
تَدْعُونَ
तुम पुकारते हो
مِن
besides Him
دُونِهِۦ
उस के सिवा
مَا
नहीं
يَمْلِكُونَ
वो मालिक हो सकते
مِن
even
قِطْمِيرٍ
खजूर की गुठली के छिल्के के भी
वह रात को दिन में प्रविष्ट करता है और दिन को रात में प्रविष्ट करता हैं। उसने सूर्य और चन्द्रमा को काम में लगा रखा है। प्रत्येक एक नियत समय पूरी करने के लिए चल रहा है। वही अल्लाह तुम्हारा रब है। उसी की बादशाही है। उससे हटकर जिनको तुम पुकारते हो वे एक तिनके के भी मालिक नहीं
तफ़्सीर:
अल्लाह रात को दिन में दाखिल करके दिन को लंबा कर देता है और दिन को रात में दाखिल करके रात को लंबाई में बढ़ा देता है। और अल्लाह ने सूर्य एवं चाँद को उनके काम में लगा रखा है। उनमें से प्रत्येक एक निर्धारित समय के लिए चल रहा है, जिसे अल्लाह जानता है और वह क़ियामत का दिन है। ये सब चीज़ें जो निर्धारित करता और चलाता है, वह तुम्हारा पालनहार अल्लाह है; केवल उसी के लिए राज्य (बादशाही) है। जबकि तुम उसके सिवाय जिन मूर्तियों की पूजा करते हो, वे खजूर की गुठली के ऊपर पाए जाने वाले पतले छिलके के बराबर भी अधिकार नहीं रखती हैं। तो फिर तुम मुझे छोड़कर उनहें कैसे पूजते हो?!
आयत 14
إِن تَدْعُوهُمْ لَا يَسْمَعُوا۟ دُعَآءَكُمْ وَلَوْ سَمِعُوا۟ مَا ٱسْتَجَابُوا۟ لَكُمْ ۖ وَيَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ يَكْفُرُونَ بِشِرْكِكُمْ ۚ وَلَا يُنَبِّئُكَ مِثْلُ خَبِيرٍۢ
إِن
अगर
تَدْعُوهُمْ
तुम पुकारो उन्हें
لَا
not
يَسْمَعُوا۟
नहीं वो सुनेंगे
دُعَآءَكُمْ
पुकार तुम्हारी
وَلَوْ
और अगर
سَمِعُوا۟
वो सुने लें
مَا
नहीं
ٱسْتَجَابُوا۟
वो जवाब देंगे
لَكُمْ ۖ
तुम्हें
وَيَوْمَ
और दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
يَكْفُرُونَ
वो इन्कार कर देंगे
بِشِرْكِكُمْ ۚ
तुम्हारे शिर्क का
وَلَا
और नहीं
يُنَبِّئُكَ
ख़बर दे सकता आपको
مِثْلُ
मानिन्द
خَبِيرٍۢ
ख़ूब ख़बर रखने वाले के
यदि तुम उन्हें पुकारो तो वे तुम्हारी पुकार सुनेगे नहीं। और यदि वे सुनते तो भी तुम्हारी याचना स्वीकार न कर सकते और क़ियामत के दिन वे तुम्हारे साझी ठहराने का इनकार कर देंगे। पूरी ख़बर रखनेवाला (अल्लाह) की तरह तुम्हें कोई न बताएगा
तफ़्सीर:
यदि तुम अपने पूज्यों को पुकारो, तो वे तुम्हारी पुकार नहीं सुनेंगे। क्योंकि वे निर्जीव वस्तुएँ हैं, जिनमें न जीवन है और न सुनने की शक्ति। और यदि (मान लिया जाए कि) वे तुम्हारी पुकार सुन ही लें, तो वे तुम्हारी पुकार का जवाब नहीं दे सकते। और क़ियामत के दिन वे तुम्हारे शिर्क एवं उपासना से पल्ला झाड़ लेंगे। अतः (ऐ रसूल!) आपको अल्लाह से अधिक सच्ची सूचना कोई नहीं दे सकता।
आयत 15
۞ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ أَنتُمُ ٱلْفُقَرَآءُ إِلَى ٱللَّهِ ۖ وَٱللَّهُ هُوَ ٱلْغَنِىُّ ٱلْحَمِيدُ
۞ يَـٰٓأَيُّهَا
ٱلنَّاسُ
लोगो
أَنتُمُ
तुम
ٱلْفُقَرَآءُ
मोहताज हो
إِلَى
तरफ़
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
هُوَ
वो ही है
ٱلْغَنِىُّ
बहुत बेनियाज़
ٱلْحَمِيدُ
ख़ूब तारीफ़ वाला
ऐ लोगों! तुम्ही अल्लाह के मुहताज हो और अल्लाह तो निस्पृह, स्वप्रशंसित है
तफ़्सीर:
ऐ लोगो! तुम अपने सभी मामलों में और सभी स्थितियों में अल्लाह के ज़रूरतमंद हो। और अल्लाह बेनियाज़ है। उसे किसी भी चीज़ में तुम्हारी आवश्यकता नहीं है। वह अपने बंदो के लिए जो निर्णय लेता है, उसपर वह दुनिया एवं आखिरत में प्रशंसित है।
आयत 16
إِن يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ وَيَأْتِ بِخَلْقٍۢ جَدِيدٍۢ
إِن
अगर
يَشَأْ
वो चाहे
يُذْهِبْكُمْ
वो ले जाए तुम्हें
وَيَأْتِ
और वो ले आए
بِخَلْقٍۢ
एक मख़लूक़
جَدِيدٍۢ
नई
यदि वह चाहे तो तुम्हें हटा दे और एक नई संसृति ले आए
तफ़्सीर:
यदि वह सर्वशक्तिमान तुम्हारा विनाशकर तुम्हें हटाना चाहे, तो वह तुम्हें हटा दे और तुम्हारे स्थान पर एक नई मख़लूक़ ले आए, जो केवल उसी की इबादत करने वाली हो, उसके साथ किसी भी चीज़ को साझी न ठहराने वाली हो।
आयत 17
وَمَا ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ بِعَزِيزٍۢ
وَمَا
और नहीं
ذَٰلِكَ
ये
عَلَى
(is) on
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
بِعَزِيزٍۢ
कुछ मुश्किल
और यह अल्लाह के लिए कुछ भी कठिन नहीं
तफ़्सीर:
और तुम्हारा विनाशकर तुम्हें हटाना और तुम्हारे स्थान पर दूसरी मख़लूक़ लाना, सर्वशक्तिमान अल्लाह के लिए असंभव नहीं है।
आयत 18
وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌۭ وِزْرَ أُخْرَىٰ ۚ وَإِن تَدْعُ مُثْقَلَةٌ إِلَىٰ حِمْلِهَا لَا يُحْمَلْ مِنْهُ شَىْءٌۭ وَلَوْ كَانَ ذَا قُرْبَىٰٓ ۗ إِنَّمَا تُنذِرُ ٱلَّذِينَ يَخْشَوْنَ رَبَّهُم بِٱلْغَيْبِ وَأَقَامُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ ۚ وَمَن تَزَكَّىٰ فَإِنَّمَا يَتَزَكَّىٰ لِنَفْسِهِۦ ۚ وَإِلَى ٱللَّهِ ٱلْمَصِيرُ
وَلَا
और ना
تَزِرُ
बोझ उठाएगी
وَازِرَةٌۭ
कोई बोझ उठाने वाली
وِزْرَ
बोझ
أُخْرَىٰ ۚ
दूसरी का
وَإِن
और अगर
تَدْعُ
पुकारेगी
مُثْقَلَةٌ
कोई बोझ से लदी हुई
إِلَىٰ
to
حِمْلِهَا
तरफ़ अपने बोझ के
لَا
not
يُحْمَلْ
ना उठाया जाएगा
مِنْهُ
उससे
شَىْءٌۭ
कुछ भी
وَلَوْ
और अगरचे
كَانَ
हो
ذَا
near of kin
قُرْبَىٰٓ ۗ
क़राबत दार
إِنَّمَا
बेशक
تُنذِرُ
आप तो डरा सकते हैं
ٱلَّذِينَ
उन्हें जो
يَخْشَوْنَ
डरते हैं
رَبَّهُم
अपने रब से
بِٱلْغَيْبِ
ग़ायबाना तौर पर
وَأَقَامُوا۟
और वो क़ायम करते हैं
ٱلصَّلَوٰةَ ۚ
नमाज़
وَمَن
और जिसने
تَزَكَّىٰ
पाकीज़गी इख़्तियार की
فَإِنَّمَا
तो बेशक
يَتَزَكَّىٰ
वो पाकीज़गी इख़्तियार करता है
لِنَفْسِهِۦ ۚ
अपने नफ़्स के लिए
وَإِلَى
And to
ٱللَّهِ
और तरफ़ अल्लाह ही के
ٱلْمَصِيرُ
लौटना है
कोई बोझ उठानेवाला किसी दूसरे का बोझ न उठाएगा। और यदि कोई कोई से दबा हुआ व्यक्ति अपना बोझ उठाने के लिए पुकारे तो उसमें से कुछ भी न उठाया, यद्यपि वह निकट का सम्बन्धी ही क्यों न हो। तुम तो केवल सावधान कर रहे हो। जो परोक्ष में रहते हुए अपने रब से डरते हैं और नमाज़ के पाबन्द हो चुके है (उनकी आत्मा का विकास हो गया) । और जिसने स्वयं को विकसित किया वह अपने ही भले के लिए अपने आपको विकसित करेगा। और पलटकर जाना तो अल्लाह ही की ओर है
तफ़्सीर:
कोई पापी व्यक्ति, दूसरे पापी के गुनाह का बोझ नहीं उठाएगा। बल्कि हर पापी व्यक्ति को अपने गुनाह का बोझ खुद उठाना पड़ेगा। और यदि कोई अपने पापों के बोझ को उठाने से बोझिल व्यक्ति किसी और को अपने कुछ पापों को वहन करने के लिए पुकारेगा, तो कोई भी उसका बोझ उठाने के लिए तैयार नहीं होगा, भले ही वह आमंत्रित व्यक्ति उसका कोई रिश्तेदार हो। आप तो (ऐ रसूल) केवल उन लोगों को अल्लाह की यातना से डराने वाले हैं, जो बिन देखे अपने पालनहार से डरते हैं और पूर्ण रूप से नमाज़ अदा करते हैं। क्योंकि यही लोग आपके डराने से लाभान्वित होते हैं। और जो व्यक्ति खुद को पापों से शुद्ध करता है - जिसमें से सबसे बड़ा बहुदेववाद है - तो वह अपने लिए ही शुद्धता अपनाता है। क्योंकि उसका लाभ उसी को मिलने वाला है। क्योंकि अल्लाह उसकी आज्ञाकारिता से बेनियाज़ है। और क़ियामत के दिन (सब को) हिसाब और बदले के लिए अल्लाह ही की ओर लौटकर जाना है।
आयत 19
وَمَا يَسْتَوِى ٱلْأَعْمَىٰ وَٱلْبَصِيرُ
وَمَا
और नहीं
يَسْتَوِى
बराबर हो सकता
ٱلْأَعْمَىٰ
अँधा
وَٱلْبَصِيرُ
और देखने वाला
अंधा और आँखोंवाला बराबर नहीं,
तफ़्सीर:
काफ़िर और मोमिन स्थान में समान नहीं हैं, जैसे अंधा और देखने वाला समान नहीं हैं।
आयत 20
وَلَا ٱلظُّلُمَـٰتُ وَلَا ٱلنُّورُ
وَلَا
और ना
ٱلظُّلُمَـٰتُ
अँधेरे
وَلَا
और ना
ٱلنُّورُ
नूर
और न अँधेरे और प्रकाश,
तफ़्सीर:
तथा कुफ़्र और ईमान समान नहीं हो सकते, जैसे अंधकार और प्रकाश समान नहीं हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह की कुदरत की निशानियों (मीठा-खारा पानी, दिन-रात) का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि कायनात की हर तब्दीली अल्लाह की कुदरत की निशानी है, इस पर गौर करना चाहिए।
आयत 21
وَلَا ٱلظِّلُّ وَلَا ٱلْحَرُورُ
وَلَا
और ना
ٱلظِّلُّ
साया
وَلَا
और ना
ٱلْحَرُورُ
धूप
और न छाया और धूप
तफ़्सीर:
तथा जन्नत और जहन्नम अपने प्रभावों में समान नहीं हो सकते, जैसे छाया तथा गर्म हवा समान नहीं हैं।
आयत 22
وَمَا يَسْتَوِى ٱلْأَحْيَآءُ وَلَا ٱلْأَمْوَٰتُ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُسْمِعُ مَن يَشَآءُ ۖ وَمَآ أَنتَ بِمُسْمِعٍۢ مَّن فِى ٱلْقُبُورِ
وَمَا
और नहीं
يَسْتَوِى
बराबर हो सकते
ٱلْأَحْيَآءُ
ज़िन्दा
وَلَا
और ना
ٱلْأَمْوَٰتُ ۚ
मुर्दे
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يُسْمِعُ
वो सुनाता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۖ
वो चाहता है
وَمَآ
और नहीं
أَنتَ
आप
بِمُسْمِعٍۢ
सुनाने वाले
مَّن
उन्हें जो
فِى
(are) in
ٱلْقُبُورِ
क़ब्रों में हैं
और न जीवित और मृत बराबर है। निश्चय ही अल्लाह जिसे चाहता है सुनाता है। तुम उन लोगों को नहीं सुना सकते, जो क़ब्रों में हो।
तफ़्सीर:
ईमान वाले तथा काफ़िर समान नहीं हो सकते, जैसे जीवित तथा मृत समान नहीं हो सकते। निःसंदेह अल्लाह जिसे सीधा रास्ता दिखाना चाहता है, उसे सुना देता है। और आप (ऐ रसूल) उन काफिरों को नहीं सुना सकते, जो क़ब्रों में पड़े मुर्दों की तरह हैं।
आयत 23
إِنْ أَنتَ إِلَّا نَذِيرٌ
إِنْ
नहीं हैं
أَنتَ
आप
إِلَّا
मगर
نَذِيرٌ
डराने वाले
तुम तो बस एक सचेतकर्ता हो
तफ़्सीर:
आप तो केवल उन्हें अल्लाह की यातना से डराने वाले हैं।
आयत 24
إِنَّآ أَرْسَلْنَـٰكَ بِٱلْحَقِّ بَشِيرًۭا وَنَذِيرًۭا ۚ وَإِن مِّنْ أُمَّةٍ إِلَّا خَلَا فِيهَا نَذِيرٌۭ
إِنَّآ
बेशक हम
أَرْسَلْنَـٰكَ
भेजा हमने आपको
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
بَشِيرًۭا
ख़ुशख़बरी देने वाला
وَنَذِيرًۭا ۚ
और डराने वाला(बना कर)
وَإِن
और नहीं
مِّنْ
(was) any
أُمَّةٍ
कोई भी उम्मत
إِلَّا
मगर
خَلَا
गुज़रा है
فِيهَا
उसमें
نَذِيرٌۭ
एक डराने वाला
हमने तुम्हें सत्य के साथ भेजा है, शुभ-सूचना देनेवाला और सचेतकर्ता बनाकर। और जो भी समुदाय गुज़रा है, उसमें अनिवार्यतः एक सचेतकर्ता हुआ है
तफ़्सीर:
निःसंदेह हमने आपको (ऐ रसूल!) उस सत्य के साथ भेजा है, जिसमें कोई संदेह नहीं। आप ईमान वालों को उस अच्छे बदले की शुभ सूचना देने वाले हैं, जो अल्लाह ने उनके लिए तैयार कर रखा है, तथा काफ़िरों को उस दर्दनाक यातना से डराने वाले हैं, जो अल्लाह ने उनके लिए तैयार कर रखी है। तथा पिछले समुदायों में से प्रत्येक समुदाय में अल्लाह की ओर से एक रसूल गुज़रा है, जो उन्हें उसकी यातना से डराता था।
आयत 25
وَإِن يُكَذِّبُوكَ فَقَدْ كَذَّبَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ جَآءَتْهُمْ رُسُلُهُم بِٱلْبَيِّنَـٰتِ وَبِٱلزُّبُرِ وَبِٱلْكِتَـٰبِ ٱلْمُنِيرِ
وَإِن
और अगर
يُكَذِّبُوكَ
वो झुठलाते हैं आपको
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
كَذَّبَ
झुठलाया
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जो
مِن
(were) before them
قَبْلِهِمْ
उनसे पहले थे
جَآءَتْهُمْ
आए उनके पास
رُسُلُهُم
रसूल उनके
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ
साथ वाज़ेह निशानियों के
وَبِٱلزُّبُرِ
और साथ सहीफ़ों के
وَبِٱلْكِتَـٰبِ
और साथ किताबे
ٱلْمُنِيرِ
रौशन के
यदि वे तुम्हें झुठलाते है तो जो उनसे पहले थे वे भी झुठला चुके है। उनके रसूल उनके पास स्पष्ट और ज़बूरें और प्रकाशमान किताब लेकर आए थे
तफ़्सीर:
और यदि (ऐ रसूल!) आपकी जाति के लोग आपको झुठलाते हैं, तो आप धैर्य से काम लें। क्योंकि आप पहले रसूल नहीं हैं, जिसे उसकी जाति के लोगों ने झुठलाया है। इनसे पूर्व समुदायों ने भी अपने रसूलों को झुठलाया था, जैसे आद, समूद और लूत अलैहिस्सलाम की जाति। उनके रसूल उनके पास अल्लाह की ओर से स्पष्ट प्रमाण लेकर आए थे, जो उनके सच्चे रसूल होने को इंगित करते थे। तथा उनके रसूल उनके पास ग्रंथों और ज्योतिमान करने वाली पुस्तक भी लेकर आए थे, उसके लिए जो उसपर चिंतन और मनन करने वाला हो।
आयत 26
ثُمَّ أَخَذْتُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ ۖ فَكَيْفَ كَانَ نَكِيرِ
ثُمَّ
फिर
أَخَذْتُ
मैं ने पकड़ लिया
ٱلَّذِينَ
उन्हें जिन्होंने
كَفَرُوا۟ ۖ
कुफ़्र किया
فَكَيْفَ
तो किस तरह
كَانَ
हुई
نَكِيرِ
सज़ा मेरी
फिर मैं उन लोगों को, जिन्होंने इनकार किया, पकड़ लिया (तो फिर कैसा रहा मेरा इनकार!)
तफ़्सीर:
इसके बावजूद उन्होंने अल्लाह और उसके रसूलों का इनकार किया और वे अल्लाह के पास से जो कुछ लेकर आए थे, उसमें उनपर विश्वास नहीं किया। परिणामस्वरूप, मैंने कुफ़्र करने वालों को विनष्ट कर दिया। अतः (ऐ रसूल) आप सोचें कि मैंने उनकी किस तरह पकड़ की, कि उन्हें विनष्ट कर दिया।
आयत 27
أَلَمْ تَرَ أَنَّ ٱللَّهَ أَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ فَأَخْرَجْنَا بِهِۦ ثَمَرَٰتٍۢ مُّخْتَلِفًا أَلْوَٰنُهَا ۚ وَمِنَ ٱلْجِبَالِ جُدَدٌۢ بِيضٌۭ وَحُمْرٌۭ مُّخْتَلِفٌ أَلْوَٰنُهَا وَغَرَابِيبُ سُودٌۭ
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
أَنزَلَ
उतारा
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مَآءًۭ
पानी
فَأَخْرَجْنَا
फिर निकाला हमने
بِهِۦ
साथ उसके
ثَمَرَٰتٍۢ
फल
مُّخْتَلِفًا
मुख़्तलिफ़ हैं
أَلْوَٰنُهَا ۚ
रंग उनके
وَمِنَ
And in
ٱلْجِبَالِ
और पहाड़ों में से
جُدَدٌۢ
टुकड़े हैं
بِيضٌۭ
कुछ सफ़ेद
وَحُمْرٌۭ
और कुछ सुर्ख़
مُّخْتَلِفٌ
मुख़्तलिफ़ हैं
أَلْوَٰنُهَا
रंग उनके
وَغَرَابِيبُ
और कुछ काले
سُودٌۭ
सयाह
क्या तुमने नहीं देखा कि अल्लाह ने आकाश से पानी बरसाया, फिर उसके द्वारा हमने फल निकाले, जिनके रंग विभिन्न प्रकार के होते है? और पहाड़ो में भी श्वेत और लाल विभिन्न रंगों की धारियाँ पाई जाती है, और भुजंग काली भी
तफ़्सीर:
क्या (ऐ रसूल) आपने नहीं देखा कि अल्लाह ने आकाश से बारिश का पानी बरसाया। फिर हमने उस पानी से पेड़ों को सींचकर विभिन्न रंगों के फल पैदा किए, जिनमें लाल, हरे, पीले और अन्य रंगों के फल हैं। और पहाड़ों में सफेद रास्ते, लाल रास्ते और गहरे काले रास्ते (और धारियाँ) हैं।
आयत 28
وَمِنَ ٱلنَّاسِ وَٱلدَّوَآبِّ وَٱلْأَنْعَـٰمِ مُخْتَلِفٌ أَلْوَٰنُهُۥ كَذَٰلِكَ ۗ إِنَّمَا يَخْشَى ٱللَّهَ مِنْ عِبَادِهِ ٱلْعُلَمَـٰٓؤُا۟ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ غَفُورٌ
وَمِنَ
And among
ٱلنَّاسِ
और इन्सानों में से
وَٱلدَّوَآبِّ
और जानवरों
وَٱلْأَنْعَـٰمِ
और मवेशियों में से
مُخْتَلِفٌ
मुख़्तलिफ़ हैं
أَلْوَٰنُهُۥ
रंग उनके
كَذَٰلِكَ ۗ
इसी तरह
إِنَّمَا
बेशक
يَخْشَى
डरते हैं
ٱللَّهَ
अल्लाह से
مِنْ
among
عِبَادِهِ
उसके बन्दों में से
ٱلْعُلَمَـٰٓؤُا۟ ۗ
उलेमा ही
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَزِيزٌ
बहुत ज़बरदस्त है
غَفُورٌ
बहुत बख़श्ने वाला है
और मनुष्यों और जानवरों और चौपायों के रंग भी इसी प्रकार भिन्न हैं। अल्लाह से डरते तो उसके वही बन्दे हैं, जो बाख़बर है। निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, क्षमाशील है
तफ़्सीर:
उपर्युक्त चीज़ों की तरह मनुष्यों, जानवरों तथा मवेशियों (ऊँट, गाय, भेड़-बकरी) में से भी ऐसे हैं जिनके रंग अलग-अलग होते हैं। वास्तव में सर्वशक्तिमान अल्लाह के वैभव का सम्मान करने वाले और उससे डरने वाले वही लोग हैं, जो उस सर्वशक्तिमान का ज्ञान रखने वाले हैं; क्योंकि वे उसके गुणों, उसकी शरीयत और उसकी शक्ति के प्रमाणों को जानते हैं। निःसंदेह अल्लाह अत्यंत प्रभुत्वशाली है, जिसे कोई पराजित नहीं कर सकता, तथा अपने तौबा करने वाले बंदों के पापों को क्षमा करने वाला है।
आयत 29
إِنَّ ٱلَّذِينَ يَتْلُونَ كِتَـٰبَ ٱللَّهِ وَأَقَامُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَأَنفَقُوا۟ مِمَّا رَزَقْنَـٰهُمْ سِرًّۭا وَعَلَانِيَةًۭ يَرْجُونَ تِجَـٰرَةًۭ لَّن تَبُورَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَتْلُونَ
पढ़ते हैं
كِتَـٰبَ
किताब
ٱللَّهِ
अल्लाह की
وَأَقَامُوا۟
और वो क़ायम करते हैं
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَأَنفَقُوا۟
और वो ख़र्च करते हैं
مِمَّا
उसमें से जो
رَزَقْنَـٰهُمْ
रिज़्क़ दिया हमने उन्हें
سِرًّۭا
पोशीदा
وَعَلَانِيَةًۭ
और अलानिया
يَرْجُونَ
वो उम्मीद रखते हैं
تِجَـٰرَةًۭ
ऐसी तिजारत की
لَّن
हरगिज़ ना
تَبُورَ
वो तबाह होगी
निश्चय ही जो लोग अल्लाह की किताब पढ़ते हैं, इस हाल मे कि नमाज़ के पाबन्द हैं, और जो कुछ हमने उन्हें दिया है, उसमें से छिपे और खुले ख़र्च किया है, वे एक ऐसे व्यापार की आशा रखते है जो कभी तबाह न होगा
तफ़्सीर:
निःसंदेह जो लोग अल्लाह की उस पुस्तक का पाठ करते हैं, जिसे हमने अपने रसूल पर उतारा है और उसकी शिक्षाओं का पालन करते हैं, और नमाज़ को सर्वोत्तम तरीक़े से पूरा करते हैं, तथा हमने उन्हें जो कुछ प्रदान किया है, उसमें से ज़कात के रूप में एवं अन्य तरीकों से छिपे और खुले खर्च करते हैं, वे इन कार्यों से अल्लाह के निकट ऐसे व्यापार की आशा रखते हैं, जिसमें कभी घाटा नहीं होगा।
आयत 30
لِيُوَفِّيَهُمْ أُجُورَهُمْ وَيَزِيدَهُم مِّن فَضْلِهِۦٓ ۚ إِنَّهُۥ غَفُورٌۭ شَكُورٌۭ
لِيُوَفِّيَهُمْ
ताकि वो पूरे-पूरे दे उन्हें
أُجُورَهُمْ
अजर उनके
وَيَزِيدَهُم
और ज़्यादा दे उन्हें
مِّن
of
فَضْلِهِۦٓ ۚ
अपने फ़ज़ल से
إِنَّهُۥ
बेशक वो
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
شَكُورٌۭ
निहायत क़द्रदान है
परिणामस्वरूप वह उन्हें उनके प्रतिदान पूरे-पूरे दे और अपने उदार अनुग्रह से उन्हें और अधिक भी प्रदान करे। निस्संदेह वह बहुत क्षमाशील, अत्यन्त गुणग्राहक है
तफ़्सीर:
ताकि अल्लाह उन्हें उनके कर्मों का पूर्ण प्रतिफल प्रदान करे, तथा अपनी कृपा से उन्हें अधिक प्रदान करे; क्योंकि वह इसका योग्य है। निःसंदेह अल्लाह इन गुणों से सुसज्जित बंदों के गुनाहों को माफ़ करने वाला और उनके अच्छे कर्मों का क़द्रदान (गुणग्राही) है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नेक-बद और ज़िंदा-मुर्दा की मिसाल, कुरआन पढ़ने वालों की फ़ज़ीलत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कुरआन की तिलावत और उस पर अमल करने वाले हमेशा फायदे में रहते हैं।
आयत 31
وَٱلَّذِىٓ أَوْحَيْنَآ إِلَيْكَ مِنَ ٱلْكِتَـٰبِ هُوَ ٱلْحَقُّ مُصَدِّقًۭا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ بِعِبَادِهِۦ لَخَبِيرٌۢ بَصِيرٌۭ
وَٱلَّذِىٓ
और जो
أَوْحَيْنَآ
वही की हमने
إِلَيْكَ
आपकी तरफ़
مِنَ
of
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में से
هُوَ
वो ही
ٱلْحَقُّ
हक़ है
مُصَدِّقًۭا
तस्दीक़ करने वाली
لِّمَا
उसकी जो
بَيْنَ
before it
يَدَيْهِ ۗ
उससे पहले है
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
بِعِبَادِهِۦ
अपने बन्दों के बारे में
لَخَبِيرٌۢ
अलबत्ता पूरी तरह बाख़बर है
بَصِيرٌۭ
ख़ूब देखने वाला है
जो किताब हमने तुम्हारी ओर प्रकाशना द्वारा भेजी है, वही सत्य है। अपने से पहले (की किताबों) की पुष्टि में है। निश्चय ही अल्लाह अपने बन्दों की ख़बर पूरी रखनेवाला, देखनेवाला है
तफ़्सीर:
और हमने जो पुस्तक (ऐ रसूल) आपकी ओर उतारी है, वही सत्य है जो संदेह से परे है। जिसे अल्लाह ने पिछली पुस्तकों की सत्यता प्रकट करने के लिए उतारी है। निःसंदेह अल्लाह अपने बंदों को भली-भाँति जानने और देखने वाला है। अतः वह हर समुदाय के रसूल की ओर उस चीज़ की प्रकाशना (वह़्य) करता है, जिसकी उसे अपने समय में आवश्यकता होती है।
आयत 32
ثُمَّ أَوْرَثْنَا ٱلْكِتَـٰبَ ٱلَّذِينَ ٱصْطَفَيْنَا مِنْ عِبَادِنَا ۖ فَمِنْهُمْ ظَالِمٌۭ لِّنَفْسِهِۦ وَمِنْهُم مُّقْتَصِدٌۭ وَمِنْهُمْ سَابِقٌۢ بِٱلْخَيْرَٰتِ بِإِذْنِ ٱللَّهِ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ ٱلْفَضْلُ ٱلْكَبِيرُ
ثُمَّ
फिर
أَوْرَثْنَا
वारिस बनाया हम ने
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब का
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्हें
ٱصْطَفَيْنَا
चुन लिया हम ने
مِنْ
of
عِبَادِنَا ۖ
अपने बन्दों में से
فَمِنْهُمْ
तो उनमें से कोई
ظَالِمٌۭ
ज़ुल्म करने वाला है
لِّنَفْسِهِۦ
अपनी जान पर
وَمِنْهُم
और उनमें से कोई
مُّقْتَصِدٌۭ
मयाना रू है
وَمِنْهُمْ
और उनमें से कोई
سَابِقٌۢ
सबक़त ले जाने वाला है
بِٱلْخَيْرَٰتِ
नेकियों में
بِإِذْنِ
by permission
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के इज़्न
ذَٰلِكَ
यही है
هُوَ
वो
ٱلْفَضْلُ
फ़ज़ल
ٱلْكَبِيرُ
बहुत बड़ा
फिर हमने इस किताब का उत्तराधिकारी उन लोगों को बनाया, जिन्हें हमने अपने बन्दो में से चुन लिया है। अब कोई तो उनमें से अपने आप पर ज़ुल्म करता है और कोई उनमें से मध्य श्रेणी का है और कोई उनमें से अल्लाह के कृपायोग से भलाइयों में अग्रसर है। यही है बड़ी श्रेष्ठता। -
तफ़्सीर:
फिर हमने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उम्मत को, जिसे हमने दूसरी उम्मतों पर चुन लिया है, क़ुरआन प्रदान किया। चुनाँचे उनमें से कुछ लोग निषिद्ध कार्यों को करके और कर्तव्यों को छोड़कर खुद पर अत्याचार करने वाले हैं। तथा उनमें से कुछ लोग बीच का रास्ता अपनाने वाले हैं अर्थात् जो कर्तव्यों को करते और निषिद्ध चीजों को त्यागते हैं, लेकिन साथ ही कुछ वांछनीय चीजों को छोड़ देते हैं और कुछ नापसंद (मकरूह) चीज़ों को कर डालते हैं। जबकि उनमें से कुछ लोग अल्लाह की अनुमति से नेकी के कामों में पहल करने वाले हैं, इस प्रकार कि वे कर्तव्यों और वांछनीय कामों को करते हैं और निषिद्ध तथा नापसंद चीज़ों को त्याग कर देते हैं। यह जिसका उल्लेख किया गया है - अर्थात इस उम्मत को चुनना और इसे क़ुरआन प्रदान करना - ही वह महान अनुग्रह है, जिसकी तुलना किसी अन्य अनुग्रह के साथ नहीं की जा सकती।
आयत 33
جَنَّـٰتُ عَدْنٍۢ يَدْخُلُونَهَا يُحَلَّوْنَ فِيهَا مِنْ أَسَاوِرَ مِن ذَهَبٍۢ وَلُؤْلُؤًۭا ۖ وَلِبَاسُهُمْ فِيهَا حَرِيرٌۭ
جَنَّـٰتُ
बाग़ात हैं
عَدْنٍۢ
हमेशगी के
يَدْخُلُونَهَا
वो दाख़िल होंगे उनमें
يُحَلَّوْنَ
वो पहनाए जाऐंगे
فِيهَا
उनमें
مِنْ
with
أَسَاوِرَ
कंगनों में से
مِن
of
ذَهَبٍۢ
सोने के
وَلُؤْلُؤًۭا ۖ
और मोती
وَلِبَاسُهُمْ
और लिबास उनका
فِيهَا
उनमें
حَرِيرٌۭ
रेशम होगा
सदैव रहने के बाग है, जिनमें वे प्रवेश करेंगे। वहाँ उन्हें सोने के कंगनों और मोती से आभूषित किया जाएगा। और वहाँ उनका वस्त्र रेशम होगा
तफ़्सीर:
सदा रहने के बाग़ हैं, जिनमें ये चुने हुए लोग प्रवेश करेंगे। जिनमें वे मोती तथा सोने के कंगन पहनेंगे और उनमें उनके वस्त्र रेशम के होंगे।
आयत 34
وَقَالُوا۟ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِىٓ أَذْهَبَ عَنَّا ٱلْحَزَنَ ۖ إِنَّ رَبَّنَا لَغَفُورٌۭ شَكُورٌ
وَقَالُوا۟
और वो कहेंगे
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
لِلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
ٱلَّذِىٓ
जो
أَذْهَبَ
ले गया
عَنَّا
हम से
ٱلْحَزَنَ ۖ
ग़म
إِنَّ
बेशक
رَبَّنَا
रब हमारा
لَغَفُورٌۭ
अलबत्ता बख़शने वाला है
شَكُورٌ
निहायत क़द्रदान है
और वे कहेंगे, "सब प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने हमसे ग़म दूर कर दिया। निश्चय ही हमारा रब अत्यन्त क्षमाशील, बड़ा गुणग्राहक है
तफ़्सीर:
वे जन्नत में प्रवेश करने के बाद कहेंगे : सारी प्रशंसा उस अल्लाह के लिए है, जिसने हमसे उस ग़म को दूर कर दिया जो हमें जहन्नम में जाने के डर के कारण होता था। निःसंदेह हमारा पालनहार अपने तौबा करने वाले बंदों के पापों को क्षमा करने वाला तथा उनकी आज्ञाकारिता पर उनका गुणग्राही है।
आयत 35
ٱلَّذِىٓ أَحَلَّنَا دَارَ ٱلْمُقَامَةِ مِن فَضْلِهِۦ لَا يَمَسُّنَا فِيهَا نَصَبٌۭ وَلَا يَمَسُّنَا فِيهَا لُغُوبٌۭ
ٱلَّذِىٓ
वो जिसने
أَحَلَّنَا
ला उतारा हमें
دَارَ
घर में
ٱلْمُقَامَةِ
दाइमी क़याम के
مِن
(out) of
فَضْلِهِۦ
अपने फ़ज़ल से
لَا
Not
يَمَسُّنَا
नहीं पहुँचती हमें
فِيهَا
इसमें
نَصَبٌۭ
कोई मशक़्क़त
وَلَا
और नहीं
يَمَسُّنَا
पहुँचती हमें
فِيهَا
इसमें
لُغُوبٌۭ
कोई थकावट
जिसने हमें अपने उदार अनुग्रह से रहने के ऐसे घर में उतारा जहाँ न हमें कोई मशक़्क़त उठानी पड़ती है और न हमें कोई थकान ही आती है।"
तफ़्सीर:
जिसने हमें सदैव रहने के स्थान में - जिसके बाद कोई स्थानान्तरण नहीं है - मात्र अपनी कृपा से उतारा, हमारी ताकत या शक्ति से नहीं। यहाँ हमें कोई थकान या परेशानी नहीं होती है।
आयत 36
وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لَهُمْ نَارُ جَهَنَّمَ لَا يُقْضَىٰ عَلَيْهِمْ فَيَمُوتُوا۟ وَلَا يُخَفَّفُ عَنْهُم مِّنْ عَذَابِهَا ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِى كُلَّ كَفُورٍۢ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لَهُمْ
उनके लिए
نَارُ
आग है
جَهَنَّمَ
जहन्नम की
لَا
Not
يُقْضَىٰ
ना काम तमाम किया जाएगा
عَلَيْهِمْ
उनका
فَيَمُوتُوا۟
कि वो मर जाऐं
وَلَا
और ना
يُخَفَّفُ
हल्का किया जाएगा
عَنْهُم
उनसे
مِّنْ
of
عَذَابِهَا ۚ
उसके अज़ाब में से
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نَجْزِى
हम बदला देते हैं
كُلَّ
हर
كَفُورٍۢ
नाशुक्रे को
रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया, उनके लिए जहन्नम की आग है, न उनका काम तमाम किया जाएगा कि मर जाएँ और न उनसे उसकी यातना ही कुछ हल्की की जाएगी। हम ऐसा ही बदला प्रत्येक अकृतज्ञ को देते है
तफ़्सीर:
और जिन लोगों ने अल्लाह के साथ कुफ़्र किया, उनके लिए जहन्नम की आग है, जिसमें वे हमेशा रहेंगे। न उनपर मृत्यु का फैसला किया जाएगा कि वे मर जाएँ और यातना से आराम पा जाएँ, और न उनसे जहन्नम का अज़ाब ही कुछ हल्का किया जाएगा। इस प्रकार का बदला हम क़ियामत के दिन हर उस व्यक्ति को देंगे, जो अपने पालनहार की नेमतों का इनकार करने वाला है।
आयत 37
وَهُمْ يَصْطَرِخُونَ فِيهَا رَبَّنَآ أَخْرِجْنَا نَعْمَلْ صَـٰلِحًا غَيْرَ ٱلَّذِى كُنَّا نَعْمَلُ ۚ أَوَلَمْ نُعَمِّرْكُم مَّا يَتَذَكَّرُ فِيهِ مَن تَذَكَّرَ وَجَآءَكُمُ ٱلنَّذِيرُ ۖ فَذُوقُوا۟ فَمَا لِلظَّـٰلِمِينَ مِن نَّصِيرٍ
وَهُمْ
और वो
يَصْطَرِخُونَ
वो चिल्लाऐंगे
فِيهَا
उसमें
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
أَخْرِجْنَا
निकाल हमें
نَعْمَلْ
हम अमल करें
صَـٰلِحًا
नेक
غَيْرَ
अलावा
ٱلَّذِى
उसके जो
كُنَّا
थे हम
نَعْمَلُ ۚ
हम अमल करते
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
نُعَمِّرْكُم
हमने उमर दी तुम्हें
مَّا
कि
يَتَذَكَّرُ
नसीहत पकड़ता
فِيهِ
उसमें
مَن
जो
تَذَكَّرَ
नसीहत पकड़ता
وَجَآءَكُمُ
और आ गया तुम्हारे पास
ٱلنَّذِيرُ ۖ
डराने वाला
فَذُوقُوا۟
पस चखो
فَمَا
तो नहीं
لِلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों के लिए
مِن
any
نَّصِيرٍ
कोई मददगार
वे वहाँ चिल्लाएँगे कि "ऐ हमारे रब! हमें निकाल ले। हम अच्छा कर्म करेंगे, उससे भिन्न जो हम करते रहे।" "क्या हमने तुम्हें इतनी आयु नहीं दी कि जिसमें कोई होश में आना चाहता तो होश में आ जाता? और तुम्हारे पास सचेतकर्ता भी आया था, तो अब मज़ा चखते रहो! ज़ालिमोंं को कोई सहायक नहीं!"
तफ़्सीर:
वे उसमें ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाएँगे और फ़रियाद करते हुए कहेंगे : ऐ हमारे पालनहार! हमें इस आग से निकाल ले, हम दुनिया में जो कुछ किया करते थे, उसके विपरीत अच्छे कार्य करेंगे, ताकि तेरी प्रसन्नता प्राप्त कर सकें और तेरी यातना से बच सकें। इसपर अल्लाह उन्हें उत्तर देगा : क्या हमने तुम्हें इतनी आयु नहीं दी, जिसमें शिक्षा ग्रहण करने वाला चाहता, तो शिक्षा ग्रहण कर लेता। चुनाँचे वह अल्लाह से तौबा करता और अच्छे कार्य करता। तथा तुम्हारे पास तुम्हें अल्लाह की यातना से सचेत करने वाला रसूल भी आया था?! इसलिए इन सब के बाद तुम्हारे लिए कोई तर्क और बहाना नहीं है। अतः तुम आग की सज़ा चखो। क्योंकि कुफ़्र तथा पापों के द्वारा अपने ऊपर अत्याचार करने वालों का कोई सहायक नहींं है, जो उन्हें अल्लाह के अज़ाब से बचा सके या उनके लिए उसमें कुछ कमी कर सके।
आयत 38
إِنَّ ٱللَّهَ عَـٰلِمُ غَيْبِ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ إِنَّهُۥ عَلِيمٌۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَـٰلِمُ
जानने वाला है
غَيْبِ
ग़ैब
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ ۚ
और ज़मीन का
إِنَّهُۥ
बेशक वो
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِذَاتِ
of what (is) in the breasts
ٱلصُّدُورِ
सीनों वाले(भेद)
निस्संदेह अल्लाह आकाशों और धरती की छिपी बात को जानता है। वह तो सीनो तक की बात जानता है
तफ़्सीर:
निःसंदेह अल्लाह आकाशों तथा धरती के परोक्ष अर्थात लोगों की दृष्टि से ओझल और छिपी हुई चीज़ों को जानने वाला है। उसमें से कोई भी चीज़ उससे छूटती नहीं है। निःसंदेह वह उसे भी जानता है जो उसके बंदे अपने सीनों में अच्छी और बुरी बातें छिपाए होते हैं।
आयत 39
هُوَ ٱلَّذِى جَعَلَكُمْ خَلَـٰٓئِفَ فِى ٱلْأَرْضِ ۚ فَمَن كَفَرَ فَعَلَيْهِ كُفْرُهُۥ ۖ وَلَا يَزِيدُ ٱلْكَـٰفِرِينَ كُفْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ إِلَّا مَقْتًۭا ۖ وَلَا يَزِيدُ ٱلْكَـٰفِرِينَ كُفْرُهُمْ إِلَّا خَسَارًۭا
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
جَعَلَكُمْ
बनाया तुम्हें
خَلَـٰٓئِفَ
जानशीन
فِى
in
ٱلْأَرْضِ ۚ
ज़मीन में
فَمَن
पस जिसने
كَفَرَ
कुफ़्र किया
فَعَلَيْهِ
तो उसी पर है
كُفْرُهُۥ ۖ
कुफ़्र उसका
وَلَا
और नहीं
يَزِيدُ
ज़्यादा करता
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों को
كُفْرُهُمْ
कुफ़्र उनका
عِندَ
नज़दीक
رَبِّهِمْ
उनके रब के
إِلَّا
मगर
مَقْتًۭا ۖ
नाराज़गी में
وَلَا
और नहीं
يَزِيدُ
ज़्यादा करता
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों को
كُفْرُهُمْ
कुफ़्र उनका
إِلَّا
मगर
خَسَارًۭا
ख़सारे में
वही तो है जिसने तुम्हे धरती में ख़लीफ़ा बनाया। अब तो कोई इनकार करेगा, उसके इनकार का वबाल उसी पर है। इनकार करनेवालों का इनकार उनके रब के यहाँ केवल प्रकोप ही को बढ़ाता है, और इनकार करनेवालों का इनकार केवल घाटे में ही अभिवृद्धि करता है
तफ़्सीर:
वही (अल्लाह) है जिसने तुम्हें (ऐ लोगो) धरती पर एक-दूसरे का उत्तराधिकारी बनाया है, ताकि वह तुम्हारा परीक्षण करे कि तुम कैसे कार्य करते हो। फिर जिसने अल्लाह के साथ और रसूलों के लाए हुए संदेश के साथ कुफ़्र किया, तो उसके कुफ़्र का पाप और उसकी सज़ा उसी को भुगतनी होगी। उसके कुफ़्र से उसके पालनहार को कोई हानि नहीं पहुँचेगी। और काफिरों को उनका कुफ़्र उनके पालनहार के निकट सख्त घृणा और नाराज़गी ही में बढ़ाएगा। तथा काफिरों को उनका कुफ़्र उनके घाटे ही में वृद्धि करेगा। क्योंकि उनके ईमान लाने की स्थिति में अल्लाह ने उनके लिए जो कुछ जन्नत में तैयार किया था, उसे वे खो देंगे।
आयत 40
قُلْ أَرَءَيْتُمْ شُرَكَآءَكُمُ ٱلَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ أَرُونِى مَاذَا خَلَقُوا۟ مِنَ ٱلْأَرْضِ أَمْ لَهُمْ شِرْكٌۭ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ أَمْ ءَاتَيْنَـٰهُمْ كِتَـٰبًۭا فَهُمْ عَلَىٰ بَيِّنَتٍۢ مِّنْهُ ۚ بَلْ إِن يَعِدُ ٱلظَّـٰلِمُونَ بَعْضُهُم بَعْضًا إِلَّا غُرُورًا
قُلْ
कह दीजिए
أَرَءَيْتُمْ
क्या देखा तुमने
شُرَكَآءَكُمُ
अपने शरीकों को
ٱلَّذِينَ
वो जिन्हें
تَدْعُونَ
तुम पुकारते हो
مِن
besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
أَرُونِى
दिखाओ मुझे
مَاذَا
क्या कुछ
خَلَقُوا۟
उन्होंने पैदा किया है
مِنَ
from
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में से
أَمْ
या
لَهُمْ
उनके लिए है
شِرْكٌۭ
कोई शिर्कत
فِى
in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
أَمْ
या
ءَاتَيْنَـٰهُمْ
दी हमने उन्हें
كِتَـٰبًۭا
कोई किताब
فَهُمْ
तो वो
عَلَىٰ
(are) on
بَيِّنَتٍۢ
एक वाज़ेह दलील पर हों
مِّنْهُ ۚ
उससे
بَلْ
बल्कि
إِن
नहीं
يَعِدُ
वादा करते
ٱلظَّـٰلِمُونَ
ज़ालिम
بَعْضُهُم
बाज़ उनके
بَعْضًا
बाज़ से
إِلَّا
मगर
غُرُورًا
धोके का
कहो, "क्या तुमने अपने ठहराए हुए साझीदारो का अवलोकन भी किया, जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते हो? मुझे दिखाओ उन्होंने धरती का कौन-सा भाग पैदा किया है या आकाशों में उनकी कोई भागीदारी है?" या हमने उन्हें कोई किताब ही है कि उसका कोई स्पष्ट प्रमाण उनके पक्ष में हो? नहीं, बल्कि वे ज़ालिम आपस में एक-दूसरे से केवल धोखे का वादा कर रहे है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप इन मुश्रिकों से कह दें : तुम मुझे अपने उन साझियों के संबंध में बताओ, जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो, उन्होंने धरती की कौन-सी चीज़ पैदा की है? क्या उन्होंने उसके पहाड़ बनाए? क्या उन्होंने उसकी नदियाँ बनाईं? क्या उन्होंने उसके जानवर बनाए? या वे आकाशों की रचना में अल्लाह के साथ भागीदार हैं? या हमने उन्हें कोई पुस्तक प्रदान की है, जिसमें उनके अपने साझियों की पूजा की वैधता के लिए कोई तर्क है? इनमें से कुछ भी नहीं है। बल्कि सच्चाई यह है कि कुफ़्र एवं पापों के द्वारा स्वयं पर अत्याचार करने वाले, एक-दुसरे को केवल धोखे की बातों का वादा देते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जन्नत की नेमतों और कुफ्फार के लिए मोहलत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह मोहलत देता है ताकि इंसान सुधर जाए, इस मोहलत को ज़ाया नहीं करना चाहिए।
आयत 41
۞ إِنَّ ٱللَّهَ يُمْسِكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ أَن تَزُولَا ۚ وَلَئِن زَالَتَآ إِنْ أَمْسَكَهُمَا مِنْ أَحَدٍۢ مِّنۢ بَعْدِهِۦٓ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ حَلِيمًا غَفُورًۭا
۞ إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يُمْسِكُ
वो थामे रखता है
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
أَن
कि
تَزُولَا ۚ
(ना) वो दोनों टल जाऐं
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
زَالَتَآ
वो दोनों टल जाऐं
إِنْ
नहीं
أَمْسَكَهُمَا
उन दोनों को थाम सकेगा
مِنْ
any
أَحَدٍۢ
कोई एक
مِّنۢ
after Him
بَعْدِهِۦٓ ۚ
बाद उसके
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
है
حَلِيمًا
बहुत हिल्म वाला
غَفُورًۭا
बहुत बख़शने वाला
अल्लाह ही आकाशों और धरती को थामे हुए है कि वे टल न जाएँ और यदि वे टल जाएँ तो उसके पश्चात कोई भी नहीं जो उन्हें थाम सके। निस्संदेह, वह बहुत सहनशील, क्षमा करनेवाला है
तफ़्सीर:
निःसंदेह अल्लाह सर्वशक्तिमान ही ने आकाशों तथा धरती को थामे हुए उन्हें हटने से रोकने वाला है। और यदि वे दोनों (मान लिया जाए कि) हट जाएँ, तो उस महिमावान के पश्चात कोई भी उन्हें हटने से नहीं रोक सकता। निःसंदेह वह अत्यंत सहनशील है, जो जल्दी किसी को सज़ा नहीं देता। अपने बंदों में से तौबा करने वालों के पापों को बड़ा क्षमा करने वाला है।
आयत 42
وَأَقْسَمُوا۟ بِٱللَّهِ جَهْدَ أَيْمَـٰنِهِمْ لَئِن جَآءَهُمْ نَذِيرٌۭ لَّيَكُونُنَّ أَهْدَىٰ مِنْ إِحْدَى ٱلْأُمَمِ ۖ فَلَمَّا جَآءَهُمْ نَذِيرٌۭ مَّا زَادَهُمْ إِلَّا نُفُورًا
وَأَقْسَمُوا۟
और उन्होंने क़समें खाईं
بِٱللَّهِ
अल्लाह की
جَهْدَ
पक्की
أَيْمَـٰنِهِمْ
क़समें अपनी
لَئِن
अलबत्ता अगर
جَآءَهُمْ
आया उनके पास
نَذِيرٌۭ
कोई डराने वाला
لَّيَكُونُنَّ
अलबत्ता वो ज़रूर होंगे
أَهْدَىٰ
ज़्यादा हिदायत याफ़्ता
مِنْ
than
إِحْدَى
किसी एक से
ٱلْأُمَمِ ۖ
उम्मतों में
فَلَمَّا
फिर जब
جَآءَهُمْ
आ गया उनके पास
نَذِيرٌۭ
कोई डराने वाला
مَّا
ना
زَادَهُمْ
उसने ज़्यादा किया उनको
إِلَّا
मगर
نُفُورًا
नफ़रत में
उन्होंने अल्लाह की कड़ी-कड़ी क़समें खाई थी कि यदि उनके पास कोई सचेतकर्ता आए तो वे समुदायों में से प्रत्येक से बढ़कर सीधे मार्ग पर होंगे। किन्तु जब उनके पास एक सचेतकर्ता आ गया तो इस चीज़ ने धरती में उनके घमंड और बुरी चालों के कारण उनकी नफ़रत ही में अभिवृद्धि की,
तफ़्सीर:
और इन झुठलाने वाले काफ़िरों ने दृढ़ और पक्की सौगंध खाई कि : यदि उनके पास अल्लाह की ओर से कोई सचेतकर्ता, उन्हें अल्लाह की यातना से डराने के लिए आया, तो वे यहूदियों, ईसाइयों और अन्य लोगों की तुलना में अधिक सीधे मार्ग पर जमे रहने और सत्य का पालन करने वाले हो जाएँगे। फिर जब मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उनके पास अपने पालनहार की ओर से रसूल बनकर, उन्हें अल्लाह की यातना से डराने के लिए आ गए, तो उनके आने से वे और भी सत्य से दूर हो गए और असत्य से चिमट गए। चुनाँचे उन्होंने जिस बात की पक्की क़समें खाई थीं कि वे अपने से पहले गुज़रे हुए लोगों से अधिक सीधे रास्ते पर चलने वाले हो जाएँगे, उसे पूरा नहीं किया।
आयत 43
ٱسْتِكْبَارًۭا فِى ٱلْأَرْضِ وَمَكْرَ ٱلسَّيِّئِ ۚ وَلَا يَحِيقُ ٱلْمَكْرُ ٱلسَّيِّئُ إِلَّا بِأَهْلِهِۦ ۚ فَهَلْ يَنظُرُونَ إِلَّا سُنَّتَ ٱلْأَوَّلِينَ ۚ فَلَن تَجِدَ لِسُنَّتِ ٱللَّهِ تَبْدِيلًۭا ۖ وَلَن تَجِدَ لِسُنَّتِ ٱللَّهِ تَحْوِيلًا
ٱسْتِكْبَارًۭا
तकब्बुर की वजह से
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَمَكْرَ
और चाल
ٱلسَّيِّئِ ۚ
बुरी (की वजह से)
وَلَا
और नहीं
يَحِيقُ
घेरती
ٱلْمَكْرُ
चाल
ٱلسَّيِّئُ
बुरी
إِلَّا
मगर
بِأَهْلِهِۦ ۚ
उसके चलने वाले को
فَهَلْ
तो नही
يَنظُرُونَ
वो इन्तिज़ार करते
إِلَّا
मगर
سُنَّتَ
तरीक़े का
ٱلْأَوَّلِينَ ۚ
पहलों का
فَلَن
तो हरगिज़ ना
تَجِدَ
आप पाऐंगे
لِسُنَّتِ
तरीक़े को
ٱللَّهِ
अल्लाह के
تَبْدِيلًۭا ۖ
बदलने वाला
وَلَن
और हरगिज़ ना
تَجِدَ
आप पाऐंगे
لِسُنَّتِ
तरीक़े को
ٱللَّهِ
अल्लाह के
تَحْوِيلًا
फिरने वाला
हालाँकि बुरी चाल अपने ही लोगों को घेर लेती है। तो अब क्या जो रीति अगलों के सिलसिले में रही है वे बस उसी रीति की प्रतिक्षा कर रहे है? तो तुम अल्लाह की रीति में कदापि कोई परिवर्तन न पाओगे और न तुम अल्लाह की रीति को कभी टलते ही पाओगे
तफ़्सीर:
उनका अल्लाह की क़सम खाकर वह बात कहना, जो उन्होंने कही थी, अच्छे इरादे और सही उद्देश्य से नहीं था। बल्कि धरती में अभिमान करने और लोगों को धोखा देने के लिए था। और सच्चाई यह है कि बुरी चाल, स्वयं चाल चलने वाले ही को घेरती है। तो क्या ये बुरी चाल चलने वाले अभिमानी लोग अल्लाह की अटल (नियमित) परंपरा की प्रतीक्षा कर रहे हैं; और वह यह कि उन्हें भी उसी तरह विनष्ट कर दिया जाए, जिस तरह उनके पूर्वजों को विनष्ट कर दिया गया था?! क्योंकि आप घमंडियों को विनष्ट करने की अल्लाह की परंपरा में कभी इस तरह का बदलाव नहीं पाएँगे कि वह विनाश उनपर न उतरे, तथा न तो इस प्रकार का परिवर्तन (कभी पाएँगे) कि वह विनाश उनके अलावा किसी अन्य पर उतर जाए। इसलिए कि यह अल्लाह की एक अटल (नियमित) परंपरा है।
आयत 44
أَوَلَمْ يَسِيرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ فَيَنظُرُوا۟ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ وَكَانُوٓا۟ أَشَدَّ مِنْهُمْ قُوَّةًۭ ۚ وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيُعْجِزَهُۥ مِن شَىْءٍۢ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَلَا فِى ٱلْأَرْضِ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ عَلِيمًۭا قَدِيرًۭا
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَسِيرُوا۟
वो चलते फिरते
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
فَيَنظُرُوا۟
फिर वो देखते
كَيْفَ
किस तरह
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अंजाम
ٱلَّذِينَ
उनका जो
مِن
(were) before them
قَبْلِهِمْ
उनसे पहले थे
وَكَانُوٓا۟
और थे वो
أَشَدَّ
ज़्यादा सख़्त
مِنْهُمْ
उनसे
قُوَّةًۭ ۚ
क़ुव्वत में
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِيُعْجِزَهُۥ
कि आजिज़ कर सके उसे
مِن
any
شَىْءٍۢ
कोई चीज़
فِى
in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَلَا
और ना
فِى
in
ٱلْأَرْضِ ۚ
ज़मीन में
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
है
عَلِيمًۭا
ख़ूब जानने वाला
قَدِيرًۭا
बहुत क़ुदरत वाला
क्या वे धरती में चले-फिरे नहीं कि देखते कि उन लोगों का कैसा परिणाम हुआ है जो उनसे पहले गुज़रे हैं? हालाँकि वे शक्ति में उनसे कही बढ़-चढ़कर थे। अल्लाह ऐसा नहीं कि आकाशों में कोई चीज़ उसे मात कर सके और न धरती ही में। निस्संदेह वह सर्वज्ञ, सामर्थ्यमान है
तफ़्सीर:
क्या क़ुरैश में से आपको झुठलाने वाले लोग, धरती में नहीं चले-फिरे कि वे इस बात पर चिंतन करते कि उनसे पहले के समुदायों में से (रसूलों को) झुठलाने वालों का अंत कैसा रहा? क्या उनका अंत बहुत बुरा नहीं हुआ था क्योंकि अल्लाह ने उन्हें विनष्ट कर दिया था, हालाँकि वे क़ुरैश से अधिक शक्तिशाली थे?! आकाशों तथा धरती की कोई चीज़ अल्लाह की पहुँच से बाहर नहीं है। वह इन झुठलाने वालों की करतूतों से भली-भाँति अवगत है। उनके कार्यों में से कोई चीज़ न उससे ओझल होती है और न छूटती है। वह जब चाहे, उन्हें विनष्ट करने में सामर्थ्यवान है।
आयत 45
وَلَوْ يُؤَاخِذُ ٱللَّهُ ٱلنَّاسَ بِمَا كَسَبُوا۟ مَا تَرَكَ عَلَىٰ ظَهْرِهَا مِن دَآبَّةٍۢ وَلَـٰكِن يُؤَخِّرُهُمْ إِلَىٰٓ أَجَلٍۢ مُّسَمًّۭى ۖ فَإِذَا جَآءَ أَجَلُهُمْ فَإِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِعِبَادِهِۦ بَصِيرًۢا
وَلَوْ
और अगर
يُؤَاخِذُ
पकड़ लेता
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلنَّاسَ
लोगों को
بِمَا
बवजह उसके जो
كَسَبُوا۟
उन्होंने कमाई की
مَا
ना
تَرَكَ
वो छोड़ता
عَلَىٰ
on
ظَهْرِهَا
इस (ज़मीन )की पुश्त पर
مِن
any
دَآبَّةٍۢ
कोई जानदार
وَلَـٰكِن
और लेकिन
يُؤَخِّرُهُمْ
वो मोहलत देता है उन्हें
إِلَىٰٓ
till
أَجَلٍۢ
एक वक़्त तक
مُّسَمًّۭى ۖ
मुक़र्रर
فَإِذَا
फिर जब
جَآءَ
आ जाएगा
أَجَلُهُمْ
वक़्त उनका
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
بِعِبَادِهِۦ
अपने बन्दों को
بَصِيرًۢا
ख़ूब देखने वाला
यदि अल्लाह लोगों को उनकी कमाई के कारण पकड़ने पर आ जाए तो इस धरती की पीठ पर किसी जीवधारी को भी न छोड़े। किन्तु वह उन्हें एक नियत समय तक ढील देता है, फिर जब उनका नियत समय आ जाता है तो निश्चय ही अल्लाह तो अपने बन्दों को देख ही रहा है
तफ़्सीर:
और यदि अल्लाह लोगों को उनके द्वारा किए गए पापों और अवज्ञाओं के कारण जल्दी सज़ा देने लगे, तो धरती के सभी लोगों तथा उनके धन एवं पशुओं को तुरंत ही विनष्ट कर दे। परन्तु अल्लाह उन्हें अपने ज्ञान में निर्धारित एक विशिष्ट समय तक ढील दे रहा है और वह क़ियामत का दिन है। फिर जब क़ियामत का दिन आ जाएगा, तो अल्लाह अपने बंदों को खूब देखने वाला है, उनकी कोई चीज़ उससे छिपी नहीं है। अतः वह उनके कर्मों के अनुसार उन्हें बदला देगा; यदि अच्छा कर्म है, तो अच्छा बदला और यदि बुरा कर्म है, तो बुरा बदला।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह के आसमान-ज़मीन को थामे रखने के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि कायनात का पूरा निज़ाम अल्लाह की कुदरत से चल रहा है, इस पर यकीन रखते हुए तवाज़ो अपनानी चाहिए।
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