सूरह या-सीन سورة يس
मक्की 83 आयतें
नाम का मतलब
या-सीन (मुक़त्तआत हुरूफ, जिसका पूरा मतलब मालूम नहीं)
पृष्ठभूमि
सूरह या-सीन में तौहीद, रिसालत और आखिरत के मौज़ूअ पर मुख्तसर मगर असरदार गुफ्तगू है, साथ ही एक बस्ती वालों के वाकिये का ज़िक्र भी है जिन्होंने तीन रसूलों को झुठलाया।
फ़ज़ीलत / सार
नबी ﷺ ने इस सूरह को कुरआन का दिल करार दिया है, और इसकी तिलावत को खास बरकत वाला बताया है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ يسٓ
يسٓ
ي س
या॰ सीन॰
तफ़्सीर:
(या, सीन) सूरतुल-बक़रा की शुरुआत में इन प्रकार के अक्षरों के बारे में बात गुज़र चुकी है।
आयत 2
وَٱلْقُرْءَانِ ٱلْحَكِيمِ
وَٱلْقُرْءَانِ
क़सम है क़ुरआन
ٱلْحَكِيمِ
हिकमत वाले की
गवाह है हिकमतवाला क़ुरआन
तफ़्सीर:
अल्लाह क़ुरआन की क़सम खा रहा है, जिसकी आयतें सुदृढ़ बनाई गई हैं और जिसके न आगे से असत्य आ सकता है, न उसके पीछे से।
आयत 3
إِنَّكَ لَمِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ
إِنَّكَ
बेशक आप
لَمِنَ
(are) among
ٱلْمُرْسَلِينَ
अलबत्ता रसूलों में से हैं
- कि तुम निश्चय ही रसूलों में से हो
तफ़्सीर:
निःसंदेह (ऐ रसूल) आप उन रसूलों में से हैं, जिन्हें अल्लाह ने अपने बंदों की ओर भेजा; ताकि वे उन्हें अल्लाह के एकेश्वरवाद (यानी उसे एकमात्र पूज्य मानने) और अकेले उसी की इबादत करने का आदेश दें।
आयत 4
عَلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ
عَلَىٰ
ऊपर
صِرَٰطٍۢ
रास्ते
مُّسْتَقِيمٍۢ
सीधे के
एक सीधे मार्ग पर
तफ़्सीर:
आप सीधे रास्ते और संतुलित शरीयत पर क़ायम हैं। तथा यह सीधा रास्ता और संतुलित शरीयत आपके उस प्रभुत्वशाली पालनहार की ओर से उतारी गई है, जिसपर कोई हावी नहीं हो सकता, वह अपने मोमिन बंदों पर बेहद दया करने वाला है।
आयत 5
تَنزِيلَ ٱلْعَزِيزِ ٱلرَّحِيمِ
تَنزِيلَ
नाज़िल करदा है
ٱلْعَزِيزِ
बहुत ज़बरदस्त का
ٱلرَّحِيمِ
निहायत रहम करने वाले का
- क्या ही ख़ूब है, प्रभुत्वशाली, अत्यन्त दयावाल का इसको अवतरित करना!
तफ़्सीर:
आप सीधे रास्ते और संतुलित शरीयत पर क़ायम हैं। तथा यह सीधा रास्ता और संतुलित शरीयत आपके उस प्रभुत्वशाली पालनहार की ओर से उतारी गई है, जिसपर कोई हावी नहीं हो सकता, वह अपने मोमिन बंदों पर बेहद दया करने वाला है।
आयत 6
لِتُنذِرَ قَوْمًۭا مَّآ أُنذِرَ ءَابَآؤُهُمْ فَهُمْ غَـٰفِلُونَ
لِتُنذِرَ
ताकि आप डराऐं
قَوْمًۭا
एक क़ौम को
مَّآ
नहीं
أُنذِرَ
डराए गए
ءَابَآؤُهُمْ
आबा ओ अजदाद उनके
فَهُمْ
पस वो
غَـٰفِلُونَ
ग़ाफिल हैं
ताकि तुम ऐसे लोगों को सावधान करो, जिनके बाप-दादा को सावधान नहीं किया गया; इस कारण वे गफ़लत में पड़े हुए है
तफ़्सीर:
हमने यह क़ुरआन आपकी ओर इसलिए उतारा है, ताकि आप एक ऐसी जाति अर्थात अरब के लोगों को डराएँ और सचेत करें, जिनके पास कोई रसूल डराने के लिए नहीं आया था। इसलिए वे ईमान और एकेश्वरवाद से बेपरवाह (अनभिज्ञ) हैं। यही बात हर उस समुदाय पर लागू होती है, जिसको सचेत करने का सिलसिला बंद हो गया हो, उसे याद-दहानी कराने के लिए रसूलों की आवश्यकता होती है।
आयत 7
لَقَدْ حَقَّ ٱلْقَوْلُ عَلَىٰٓ أَكْثَرِهِمْ فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
حَقَّ
सच हो गई
ٱلْقَوْلُ
बात
عَلَىٰٓ
upon
أَكْثَرِهِمْ
उनकी अक्सरियत पर
فَهُمْ
पस वो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाऐंगे
उनमें से अधिकतर लोगों पर बात सत्यापित हो चुकी है। अतः वे ईमान नहीं लाएँगे।
तफ़्सीर:
इनमें से अधिकतर लोगों के लिए अल्लाह की यातना अनिवार्य हो चुकी है, क्योंकि इनके पास अल्लाह की ओर से उसके रसूल के माध्यम से सत्य पहुँच गया, परंतु वे उसपर ईमान नहीं लाए और अपने कुफ़्र पर बने रहे। अतः अब वे अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान नहीं लाएँगे और वह इनके पास जो सत्य लेकर आए, उसपर अमल नहीं करेंगे।
आयत 8
إِنَّا جَعَلْنَا فِىٓ أَعْنَـٰقِهِمْ أَغْلَـٰلًۭا فَهِىَ إِلَى ٱلْأَذْقَانِ فَهُم مُّقْمَحُونَ
إِنَّا
बेशक हम
جَعَلْنَا
डाल दिए हमने
فِىٓ
on
أَعْنَـٰقِهِمْ
उनकी गर्दनों में
أَغْلَـٰلًۭا
तौक़
فَهِىَ
तो वो
إِلَى
(are up) to
ٱلْأَذْقَانِ
ठोड़ियों तक हैं
فَهُم
तो वो
مُّقْمَحُونَ
सर उठाए हुए हैं
हमने उनकी गर्दनों में तौक़ डाल दिए है जो उनकी ठोड़ियों से लगे है। अतः उनके सिर ऊपर को उचके हुए है
तफ़्सीर:
इस मामले में, इन लोगों का उदाहरण उन लोगों जैसा है, जिनकी गर्दनों में तौक़ पड़े हों और उनके हाथ उनकी गर्दनों के साथ उनकी ठुड्डियों के नीचे बंधे हों, जिसके कारण वे अपने सिर आकाश की ओर उठाए रखने पर मजबूर हों और उन्हें नीचे झुकाने में असमर्थ हों। तो ऐसे ही ये लोग अल्लाह पर ईमान लाने से बंधे हुए हैं। चुनाँचे वे न उसका आज्ञापालन करते हैं और न उसके लिए अपने सिर झुकाते हैं।
आयत 9
وَجَعَلْنَا مِنۢ بَيْنِ أَيْدِيهِمْ سَدًّۭا وَمِنْ خَلْفِهِمْ سَدًّۭا فَأَغْشَيْنَـٰهُمْ فَهُمْ لَا يُبْصِرُونَ
وَجَعَلْنَا
और बना दी हमने
مِنۢ
from
بَيْنِ
before/between
أَيْدِيهِمْ
उनके सामने से
سَدًّۭا
एक दीवार
وَمِنْ
and from
خَلْفِهِمْ
और उनके पीछे से
سَدًّۭا
एक दीवार
فَأَغْشَيْنَـٰهُمْ
फिर ढाँप दिया हमने उन्हें
فَهُمْ
पस वो
لَا
(do) not
يُبْصِرُونَ
नहीं वो देख पाते
और हमने उनके आगे एक दीवार खड़ी कर दी है और एक दीवार उनके पीछे भी। इस तरह हमने उन्हें ढाँक दिया है। अतः उन्हें कुछ सुझाई नहीं देता
तफ़्सीर:
और हमने उनके सामने, सत्य से रोकने वाली एक रुकावट और उनके पीछे एक रुकावट खड़ी कर दी है। इस तरह हमने उनकी आँखों को सत्य देखने से ढाँप दिया है। अतः वे ऐसी दृष्टि से नहीं देखते हैं जिससे वे लाभान्वित हो सकें। उनके साथ ऐसा तब हुआ जब कुफ़्र पर उनका आग्रह और हठ दिखाई दिया।
आयत 10
وَسَوَآءٌ عَلَيْهِمْ ءَأَنذَرْتَهُمْ أَمْ لَمْ تُنذِرْهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
وَسَوَآءٌ
और बराबर है
عَلَيْهِمْ
उन पर
ءَأَنذَرْتَهُمْ
ख़्वाह डराऐं आप उन्हें
أَمْ
या
لَمْ
ना
تُنذِرْهُمْ
आप डराऐं उन्हें
لَا
not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाऐंगे
उनके लिए बराबर है तुमने सचेत किया या उन्हें सचेत नहीं किया, वे ईमान नहीं लाएँगे
तफ़्सीर:
इन सत्य के विरोधी काफिरों के निकट बराबर है कि (ऐ मुहम्मद) आप उन्हें डराएँ या न डराएँ। क्योंकि वे उसपर ईमान नहीं लाएँगे, जो आप अल्लाह की ओर से लेकर आए हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन की कसम और नबी ﷺ की रिसालत के यकीन का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि हक की तरफ से आंखें बंद रखने वाले खुद अपनी गुमराही के ज़िम्मेदार होते हैं।
आयत 11
إِنَّمَا تُنذِرُ مَنِ ٱتَّبَعَ ٱلذِّكْرَ وَخَشِىَ ٱلرَّحْمَـٰنَ بِٱلْغَيْبِ ۖ فَبَشِّرْهُ بِمَغْفِرَةٍۢ وَأَجْرٍۢ كَرِيمٍ
إِنَّمَا
बेशक
تُنذِرُ
आप तो डरा सकते हैं
مَنِ
उसे जो
ٱتَّبَعَ
पैरवी करे
ٱلذِّكْرَ
नसीहत की
وَخَشِىَ
और वो डरता हो
ٱلرَّحْمَـٰنَ
रहमान से
بِٱلْغَيْبِ ۖ
ग़ाएबाना
فَبَشِّرْهُ
पस ख़ुशख़बरी दे दीजिए उसे
بِمَغْفِرَةٍۢ
बख़्शिश की
وَأَجْرٍۢ
और अजर की
كَرِيمٍ
इज़्ज़त वाले
तुम तो बस सावधान कर रहे हो। जो कोई अनुस्मृति का अनुसरण करे और परोक्ष में रहते हुए रहमान से डरे, अतः क्षमा और प्रतिष्ठामय बदले की शुभ सूचना दे दो
तफ़्सीर:
निश्चित रूप से आपके डराने से वास्तव में वही व्यक्ति लाभान्वित होता है, जो इस क़ुरआन पर विश्वास रखता है और जो कुछ इसमें आया है, उसका अनुसरण करता है, और अपने पालनहार से एकांत में डरता है, जहाँ अल्लाह अलावा कोई और उसे नहीं देख रहा होता है। तो इन गुणों वाले व्यक्ति को यह शुभ सूचना दे दीजिए कि अल्लाह उसके पापों को मिटा देगा और उसे क्षमा कर देगा तथा उसे एक महान बदला प्रदान करेगा, जो आख़िरत में उसकी प्रतीक्षा कर रहा है और वह जन्नत में प्रवेश है।
आयत 12
إِنَّا نَحْنُ نُحْىِ ٱلْمَوْتَىٰ وَنَكْتُبُ مَا قَدَّمُوا۟ وَءَاثَـٰرَهُمْ ۚ وَكُلَّ شَىْءٍ أَحْصَيْنَـٰهُ فِىٓ إِمَامٍۢ مُّبِينٍۢ
إِنَّا
बेशक हम
نَحْنُ
हम ही
نُحْىِ
हम ज़िन्दा करेंगे
ٱلْمَوْتَىٰ
मुर्दों को
وَنَكْتُبُ
और हम लिख रहे हैं
مَا
जो
قَدَّمُوا۟
उन्होंने आगे भेजा
وَءَاثَـٰرَهُمْ ۚ
और उनके आसार को
وَكُلَّ
और हर
شَىْءٍ
चीज़ को
أَحْصَيْنَـٰهُ
शुमार कर रखा है हमने उसे
فِىٓ
in
إِمَامٍۢ
एक किताब में
مُّبِينٍۢ
जो वाज़ेह है
निस्संदेह हम मुर्दों को जीवित करेंगे और हम लिखेंगे जो कुछ उन्होंने आगे के लिए भेजा और उनके चिन्हों को (जो पीछे रहा) । हर चीज़ हमने एक स्पष्ट किताब में गिन रखी है
तफ़्सीर:
हम क़ियामत के दिन मरे हुए लोगों को हिसाब के लिए जीवित करके उठाएँगे, और उन्होंने इस दुनिया के जीवन में जो कुछ अच्छे और बुरे कर्म करके आगे बढ़ाए, हम उन्हें लिख रहें हैं। इसी तरह हम उनकी मृत्यु के बाद उनके बाकी रहने वाले निशान को भी लिख रहे हैं, चाहे वह अच्छा हो, जैसे कि निरंतर बाकी रहने वाला सदक़ा (दान), या बुरा हो, जैसे कि कुफ़्र। और हमने हर चीज़ को एक स्पष्ट किताब अर्थात 'लौहे महफ़ूज़' में संरक्षित कर रखा है।
आयत 13
وَٱضْرِبْ لَهُم مَّثَلًا أَصْحَـٰبَ ٱلْقَرْيَةِ إِذْ جَآءَهَا ٱلْمُرْسَلُونَ
وَٱضْرِبْ
और बयान करो
لَهُم
उनके लिए
مَّثَلًا
एक मिसाल
أَصْحَـٰبَ
(of the) companions
ٱلْقَرْيَةِ
बस्ती वालों की
إِذْ
जब
جَآءَهَا
आए उनके पास
ٱلْمُرْسَلُونَ
रसूल
उनके लिए बस्तीवालों की एक मिसाल पेश करो, जबकि वहाँ भेजे हुए दूत आए
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल) आप इन झुठलाने वालों और सत्य को अस्वीकार कर देने वालों के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करें, जो उनके लिए एक सबक़ हो। और वह बस्ती वालों की कहानी है, जब उनके रसूल उनके पास आए थे।
आयत 14
إِذْ أَرْسَلْنَآ إِلَيْهِمُ ٱثْنَيْنِ فَكَذَّبُوهُمَا فَعَزَّزْنَا بِثَالِثٍۢ فَقَالُوٓا۟ إِنَّآ إِلَيْكُم مُّرْسَلُونَ
إِذْ
जब
أَرْسَلْنَآ
भेजा हमने
إِلَيْهِمُ
तरफ़ उनके
ٱثْنَيْنِ
दो को
فَكَذَّبُوهُمَا
तो उन्होंने झुठला दिया उन दोनों को
فَعَزَّزْنَا
तो क़ुव्वत दी हमने
بِثَالِثٍۢ
साथ तीसरे के
فَقَالُوٓا۟
तो उन्होंने कहा
إِنَّآ
बेशक हम
إِلَيْكُم
तरफ़ तुम्हारे
مُّرْسَلُونَ
भेजे हुए हैं
जबकि हमने उनकी ओर दो दूत भेजे, तो उन्होंने झुठला दिया। तब हमने तीसरे के द्वारा शक्ति पहुँचाई, तो उन्होंने कहा, "हम तुम्हारी ओर भेजे गए हैं।"
तफ़्सीर:
जब हमने पहले उनकी ओर दो रसूल भेजे, ताकि वे उन्हें अल्लाह की तौहीद और उसकी इबादत की ओर बुलाएँ। परन्तु जब उन्होंने उन दोनों रसूलों को झुठला दिया, तो हमने तीसरा रसूल भेजकर उन दोनों को शक्ति प्रदान की। तीनों रसूलों ने बस्ती वालों से कहा : निःसंदेह - हम तीनों - तुम्हारी ओर रसूल बनाकर भेजे गए हैं, ताकि हम तुम्हें अल्लाह को एक मानने और उसकी शरीयत का पालन करने की ओर बुलाएँ।
आयत 15
قَالُوا۟ مَآ أَنتُمْ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُنَا وَمَآ أَنزَلَ ٱلرَّحْمَـٰنُ مِن شَىْءٍ إِنْ أَنتُمْ إِلَّا تَكْذِبُونَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
مَآ
नहीं हो
أَنتُمْ
तुम
إِلَّا
मगर
بَشَرٌۭ
एक इन्सान
مِّثْلُنَا
हमारी तरह
وَمَآ
और नहीं
أَنزَلَ
नाज़िल की
ٱلرَّحْمَـٰنُ
रहमान ने
مِن
any
شَىْءٍ
कोई चीज़
إِنْ
नहीं
أَنتُمْ
तुम
إِلَّا
मगर
تَكْذِبُونَ
तुम झूठ बोलते हो
वे बोले, "तुम तो बस हमारे ही जैसे मनुष्य हो। रहमान ने तो कोई भी चीज़ अवतरित नहीं की है। तुम केवल झूठ बोलते हो।"
तफ़्सीर:
बस्ती के लोगों ने रसूलों से कहा : तुम हमारे जैसे मनुष्य ही तो हो। इसलिए तुम्हें हमपर कोई विशेषता प्राप्त नहीं है। और 'रहमान' (अत्यंत दयावान्) ने तुमपर कोई वह़्य नहीं उतारी है। तुम अपने इस दावे में केवल अल्लाह पर झूठ बोल रहे हो।
आयत 16
قَالُوا۟ رَبُّنَا يَعْلَمُ إِنَّآ إِلَيْكُمْ لَمُرْسَلُونَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
رَبُّنَا
रब हमारा
يَعْلَمُ
वो जानता है
إِنَّآ
बेशक हम
إِلَيْكُمْ
तरफ़ तुम्हारे
لَمُرْسَلُونَ
अलबत्ता भेजे हुए हैं
उन्होंने कहा, "हमारा रब जानता है कि हम निश्चय ही तुम्हारी ओर भेजे गए है
तफ़्सीर:
तीनों रसूलों ने गाँव के लोगों के इनकार के जवाब में कहा : हमारा पालनहार जानता है कि हम निश्चय ही उसकी ओर से - ऐ गाँव के लोगो - तुम्हारी तरफ़ रसूल बनाकर भेजे गए हैं। और यह हमारे लिए एक पर्याप्त तर्क है।
आयत 17
وَمَا عَلَيْنَآ إِلَّا ٱلْبَلَـٰغُ ٱلْمُبِينُ
وَمَا
और नहीं
عَلَيْنَآ
हम पर
إِلَّا
मगर
ٱلْبَلَـٰغُ
पहुँचा देना
ٱلْمُبِينُ
खुल्लम-खुल्ला
औऱ हमारी ज़िम्मेदारी तो केवल स्पष्ट रूप से संदेश पहुँचा देने की हैं।"
तफ़्सीर:
और हमारा दायित्य केवल इतना है कि उसने हमें जो संदेश पहुँचाने का आदेश दिया है, उसे स्पष्ट तौर पर पहुँचा दें। और हम तुम्हारी हिदायत के मालिक नहीं हैं।
आयत 18
قَالُوٓا۟ إِنَّا تَطَيَّرْنَا بِكُمْ ۖ لَئِن لَّمْ تَنتَهُوا۟ لَنَرْجُمَنَّكُمْ وَلَيَمَسَّنَّكُم مِّنَّا عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
إِنَّا
बेशक हम
تَطَيَّرْنَا
मनहूस समझा है हमने
بِكُمْ ۖ
तुम्हें
لَئِن
अलबत्ता अगर
لَّمْ
ना
تَنتَهُوا۟
तुम बाज़ आए
لَنَرْجُمَنَّكُمْ
अलबत्ता हम ज़रूर संगसार कर देंगे तुम्हें
وَلَيَمَسَّنَّكُم
और अलबत्ता ज़रूर छुएगा तुम्हें
مِّنَّا
हमारी तरफ़ से
عَذَابٌ
अज़ाब
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
वे बोले, "हम तो तुम्हें अपशकुन समझते है, यदि तुम बाज न आए तो हम तुम्हें पथराव करके मार डालेंगे और तुम्हें अवश्य हमारी ओर से दुखद यातना पहुँचेगी।"
तफ़्सीर:
गाँव के लोगों ने रसूलों से कहा : हम तुम्हें अशुभ (मनहूस) समझते हैं। यदि तुम हमें एकेश्वरवाद की ओर बुलाने से बाज़ नहीं आए, तो हम तुम्हें निश्चित रूप से पत्थर मारकर मौत की सज़ा देंगे। तथा तुम्हें अवश्य हमारी ओर से दर्दनाक पीड़ा पहुँचेगी।
आयत 19
قَالُوا۟ طَـٰٓئِرُكُم مَّعَكُمْ ۚ أَئِن ذُكِّرْتُم ۚ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌۭ مُّسْرِفُونَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
طَـٰٓئِرُكُم
नहूसत तुम्हारी
مَّعَكُمْ ۚ
साथ है तुम्हारे
أَئِن
क्या (इस लिए कि)
ذُكِّرْتُم ۚ
नसीहत किए गए तुम
بَلْ
बल्कि
أَنتُمْ
तुम
قَوْمٌۭ
लोग हो
مُّسْرِفُونَ
हद से बढ़े हुए
उन्होंने कहा, "तुम्हारा अवशकुन तो तुम्हारे अपने ही साथ है। क्या यदि तुम्हें याददिहानी कराई जाए (तो यह कोई क्रुद्ध होने की बात है)? नहीं, बल्कि तुम मर्यादाहीन लोग हो।"
तफ़्सीर:
रसूलों ने उनके जवाब में कहा : तुम्हारे अल्लाह के साथ कुफ़्र करने तथा उसके रसूलों का पालन न करने के कारण, तुम्हारा अपशकुन तुम्हारे ही साथ चिपका हुआ है। यदि हम तुम्हें अल्लाह की याद दिलाएँ, तो तुम अपशकुन लेते हो? बल्कि तुम कुफ़्र और पाप करने में सीमा पार कर जाने वाले लोग हो।
आयत 20
وَجَآءَ مِنْ أَقْصَا ٱلْمَدِينَةِ رَجُلٌۭ يَسْعَىٰ قَالَ يَـٰقَوْمِ ٱتَّبِعُوا۟ ٱلْمُرْسَلِينَ
وَجَآءَ
और आया
مِنْ
from
أَقْصَا
परले किनारे से
ٱلْمَدِينَةِ
शहर के
رَجُلٌۭ
एक शख़्स
يَسْعَىٰ
दौड़ता हुआ
قَالَ
बोला
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
ٱتَّبِعُوا۟
पैरवी करो
ٱلْمُرْسَلِينَ
इन रसूलों की
इतने में नगर के दूरवर्ती सिरे से एक व्यक्ति दौड़ता हुआ आया। उसने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! उनका अनुवर्तन करो, जो भेजे गए है।
तफ़्सीर:
बस्ती के एक दूर स्थान से एक व्यक्ति अपनी जाति के रसूलों को झुठलाने तथा उन्हें हत्या और कष्ट पहुँचाने की धमकी देने के भय से दौड़ता हुआ आया और कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! ये रसूलगण जो संदेश लेकर आए हैं, उसका पालन करो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
एक बस्ती वालों के वाकिये और तीन रसूलों को झुठलाए जाने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि हक की दावत देने वालों को हमेशा मुखालिफत का सामना करना पड़ा है, मगर सच्चे दाई हिम्मत नहीं हारते।
आयत 21
ٱتَّبِعُوا۟ مَن لَّا يَسْـَٔلُكُمْ أَجْرًۭا وَهُم مُّهْتَدُونَ
ٱتَّبِعُوا۟
पैरवी करो
مَن
इनकी जो
لَّا
(do) not
يَسْـَٔلُكُمْ
नहीं सवाल करते तुमसे
أَجْرًۭا
किसी अजर का
وَهُم
जब कि वो
مُّهْتَدُونَ
हिदायत याफ़्ता हैं
उसका अनुवर्तन करो जो तुमसे कोई बदला नहीं माँगते और वे सीधे मार्ग पर है
तफ़्सीर:
(ऐ मेरी जाति के लोगो) तुम उनका अनुसरण करो, जो तुमसे संदेश पहुँचाने का कोई बदला नहीं माँगते तथा वे अल्लाह की ओर से उसकी वह़्य पहुँचाने में सीधे मार्ग पर हैं। इसलिए जो कोई भी इस तरह का है, वह अनुसरण करने योग्य है।
आयत 22
وَمَا لِىَ لَآ أَعْبُدُ ٱلَّذِى فَطَرَنِى وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
وَمَا
और क्या है
لِىَ
मुझे
لَآ
(that) not
أَعْبُدُ
कि ना मैं इबादत करूँ
ٱلَّذِى
उसकी जिसने
فَطَرَنِى
पैदा किया मुझे
وَإِلَيْهِ
और तरफ़ उसी के
تُرْجَعُونَ
तुम लौटाए जाओगे
"और मुझे क्या हुआ है कि मैं उसकी बन्दगी न करूँ, जिसने मुझे पैदा किया और उसी की ओर तुम्हें लौटकर जाना है?
तफ़्सीर:
तथा उस शुभचिंतक ने कहा : मुझे उस अल्लाह की इबादत से कौन-सी चीज़ रोकती है, जिसने मुझे पैदा किया है?! और तुम्हें अपने उस पालनहार की उपासना से कौन-सी चीज़ रोकती है, जिसने तुम्हें पैदा किया है, जबकि तुम सब पुनर्जीवित कर बदले के लिए अकेले उसी की ओर लौटाए जाओगे?!
आयत 23
ءَأَتَّخِذُ مِن دُونِهِۦٓ ءَالِهَةً إِن يُرِدْنِ ٱلرَّحْمَـٰنُ بِضُرٍّۢ لَّا تُغْنِ عَنِّى شَفَـٰعَتُهُمْ شَيْـًۭٔا وَلَا يُنقِذُونِ
ءَأَتَّخِذُ
क्या मैं बना लूँ
مِن
besides Him
دُونِهِۦٓ
उसके सिवा से
ءَالِهَةً
कुछ इलाह
إِن
अगर
يُرِدْنِ
इरादा करे मेरे साथ
ٱلرَّحْمَـٰنُ
रहमान
بِضُرٍّۢ
किसी नुक़सान का
لَّا
not
تُغْنِ
ना काम आएगी
عَنِّى
मुझे
شَفَـٰعَتُهُمْ
शफ़ाअत उनकी
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
وَلَا
और ना
يُنقِذُونِ
वो बचा सकेंगे मुझे
"क्या मैं उससे इतर दूसरे उपास्य बना लूँ? यदि रहमान मुझे कोई तकलीफ़ पहुँचाना चाहे तो उनकी सिफ़ारिश मेरे कुछ काम नहीं आ सकती और न वे मुझे छुडा ही सकते है
तफ़्सीर:
क्या मैं उस अल्लाह को छोड़कर जिसने मुझे पैदा किया है, दूसरे असत्य पूज्य बना लूँ?! यदि 'रहमान' (अत्यंत दयावान् अल्लाह) मुझे कोई हानि पहुँचाना चाहे, तो इन पूज्यों की सिफ़ारिश मुझे कोई लाभ नहीं पहुँचा सकती। चुनाँचे वे मेरे लिए किसी लाभ या हानि के मालिक नहीं हैं। और न तो वे मुझे उस बुराई से बचा सकते हैं, जो अल्लाह मुझे पहुँचाना चाहे, यदि मैं कुफ़्र की हालत में मर जाऊँ।
आयत 24
إِنِّىٓ إِذًۭا لَّفِى ضَلَـٰلٍۢ مُّبِينٍ
إِنِّىٓ
बेशक मैं
إِذًۭا
तब
لَّفِى
surely would be in
ضَلَـٰلٍۢ
अलबत्ता गुमराही में हूँगा
مُّبِينٍ
खुली-खुली
"तब तो मैं अवश्य स्पष्ट गुमराही में पड़ जाऊँगा
तफ़्सीर:
यदि मैंने उन्हें अल्लाह के सिवा पूज्य बना लिया, तो निश्चय ही मैं एक स्पष्ट गलती में पड़ गया; क्योंकि मैंने उसकी पूजा की, जो पूजा के योग्य नहीं है और उसकी इबादत करना छोड़ दिया, जो उसका योग्य है।
आयत 25
إِنِّىٓ ءَامَنتُ بِرَبِّكُمْ فَٱسْمَعُونِ
إِنِّىٓ
बेशक मैं
ءَامَنتُ
ईमान लाया मैं
بِرَبِّكُمْ
तुम्हारे रब पर
فَٱسْمَعُونِ
पस सुनो मुझे
"मैं तो तुम्हारे रब पर ईमान ले आया, अतः मेरी सुनो!"
तफ़्सीर:
निःसंदेह (ऐ मेरी जाति के लोगो) मैं अपने तथा तुम्हारे पालनहार पर ईमान ले आया। अतः मेरी बात सुनो। मुझे उस क़त्ल की परवाह नहीं है, जिसकी तुम मुझे धमकी दे रहे हो। फिर क्या था, उसकी जाति ने उसे मार डाला। तो अल्लाह ने उसे जन्नत में दाखिल कर दिया।
आयत 26
قِيلَ ٱدْخُلِ ٱلْجَنَّةَ ۖ قَالَ يَـٰلَيْتَ قَوْمِى يَعْلَمُونَ
قِيلَ
कहा गया
ٱدْخُلِ
दाख़िल हो जाओ
ٱلْجَنَّةَ ۖ
जन्नत में
قَالَ
उसने कहा
يَـٰلَيْتَ
ऐ काश
قَوْمِى
मेरी क़ौम (के लोग)
يَعْلَمُونَ
वो जान लेते
कहा गया, "प्रवेश करो जन्नत में!" उसने कहा, "ऐ काश! मेरी क़ौम के लोग जानते
तफ़्सीर:
उसकी शहादत के बाद उसके सम्मान में कहा गया : जन्नत में प्रवेश कर जा। चुनाँचे जब वह उसमें प्रवेश किया और उसकी नेमतों को देखा, तो कामना करते हुए कहा : काश! मेरी जाति के लोग, जिन्होंने मुझे झुठलाया और मेरी हत्या कर दी, यह जान लेते कि मेरे पापों को क्षमा कर दिया गया और मेरे पालनहार ने मुझे सम्मान प्रदान किया; ताकि वे भी मेरी तरह ईमान ले आएँ और मेरे प्रतिफल की तरह प्रतिफल प्राप्त करें।
आयत 27
بِمَا غَفَرَ لِى رَبِّى وَجَعَلَنِى مِنَ ٱلْمُكْرَمِينَ
بِمَا
बवजह उसके जो
غَفَرَ
has forgiven
لِى
बख़्श दिया मुझे
رَبِّى
मेरे रब ने
وَجَعَلَنِى
और उसने बना दिया मुझे
مِنَ
among
ٱلْمُكْرَمِينَ
बाइज़्ज़त लोगों में से
कि मेरे रब ने मुझे क्षमा कर दिया और मुझे प्रतिष्ठित लोगों में सम्मिलित कर दिया।"
तफ़्सीर:
उसकी शहादत के बाद उसके सम्मान में कहा गया : जन्नत में प्रवेश कर जा। चुनाँचे जब वह उसमें प्रवेश किया और उसकी नेमतों को देखा, तो कामना करते हुए कहा : काश! मेरी जाति के लोग, जिन्होंने मुझे झुठलाया और मेरी हत्या कर दी, यह जान लेते कि मेरे पापों को क्षमा कर दिया गया और मेरे पालनहार ने मुझे सम्मान प्रदान किया; ताकि वे भी मेरी तरह ईमान ले आएँ और मेरे प्रतिफल की तरह प्रतिफल प्राप्त करें।
आयत 28
۞ وَمَآ أَنزَلْنَا عَلَىٰ قَوْمِهِۦ مِنۢ بَعْدِهِۦ مِن جُندٍۢ مِّنَ ٱلسَّمَآءِ وَمَا كُنَّا مُنزِلِينَ
۞ وَمَآ
और नहीं
أَنزَلْنَا
उतारा हमने
عَلَىٰ
upon
قَوْمِهِۦ
उसकी क़ौम पर
مِنۢ
after him
بَعْدِهِۦ
उसके बाद
مِن
any
جُندٍۢ
कोई लश्कर
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
وَمَا
और ना
كُنَّا
थे हम
مُنزِلِينَ
उतारने वाले
उसके पश्चात उसकी क़ौम पर हमने आकाश से कोई सेना नहीं उतारी और हम इस तरह उतारा नहीं करते
तफ़्सीर:
हमने उसकी जाति के लोगों को विनष्ट करने के लिए, जिन्होंने उसे झुठला दिया और उसे मार डाला, आसमान से फ़रिश्तों की कोई सेना नहीं उतारी, तथा जब हम किसी जाति का पूर्ण विनाश करना चाहते हैं तो फ़रिश्तों को नहीं उतारते हैं। क्योंकि उनका मामला हमारे निकट इससे कहीं आसान होता है। सो हमने यह नियत किया कि उनका विनाश आसमान से एक तेज़ आवाज़ के द्वारा हो, यातना के फ़रिश्तों को उतारकर नहीं।
आयत 29
إِن كَانَتْ إِلَّا صَيْحَةًۭ وَٰحِدَةًۭ فَإِذَا هُمْ خَـٰمِدُونَ
إِن
ना
كَانَتْ
थी वो
إِلَّا
मगर
صَيْحَةًۭ
चिंघाड़
وَٰحِدَةًۭ
एक ही
فَإِذَا
तो यकायक
هُمْ
वो
خَـٰمِدُونَ
सब बुझ कर रह गए
वह तो केवल एक प्रचंड चीत्कार थी। तो सहसा क्या देखते है कि वे बुझकर रह गए
तफ़्सीर:
उसकी जाति के विनाश की कहानी बस इतनी थी कि हमने उनपर एक तेज़ आवाज़ (चिंघाड़) भेजी। फिर एकाएक वे निष्प्राण होकर गिर गए, उनमें से कोई भी नहीं बचा। उनका उदाहरण एक आग की तरह है, जो जल रही थी, फिर अचानक बुझ गई और उसका कोई निशान नहीं बचा।
आयत 30
يَـٰحَسْرَةً عَلَى ٱلْعِبَادِ ۚ مَا يَأْتِيهِم مِّن رَّسُولٍ إِلَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ
يَـٰحَسْرَةً
हाय अफ़सोस
عَلَى
for
ٱلْعِبَادِ ۚ
बन्दों पर
مَا
नहीं
يَأْتِيهِم
आया उनके पास
مِّن
any
رَّسُولٍ
कोई रसूल
إِلَّا
मगर
كَانُوا۟
थे वो
بِهِۦ
उसका
يَسْتَهْزِءُونَ
वो मज़ाक़ उड़ाते
ऐ अफ़सोस बन्दो पर! जो रसूल भी उनके पास आया, वे उसका परिहास ही करते रहे
तफ़्सीर:
हाय क़ियामत के दिन झुठलाने वाले बंदों का पछतावा और अफ़सोस जब वे अपनी आँखों से यातना को देख लेंगे। ऐसा इसलिए होगा कि दुनिया में उनके पास अल्लाह की ओर से जो भी रसूल आता, वे उसका मज़ाक उड़ाते और उपहास किया करते थे। अतः क़ियामत के दिन उनका अंजाम पछतावा और अफ़सोस होगा, उस कोताही पर जो उन्होंने अल्लाह के हक़ में की थी।
आज की ज़िंदगी में सबक़
उस बस्ती के एक शख्स के हक की हिमायत में खड़े होने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अकेला शख्स भी सच्चाई की हिमायत में खड़ा होकर मिसाल बन सकता है।
आयत 31
أَلَمْ يَرَوْا۟ كَمْ أَهْلَكْنَا قَبْلَهُم مِّنَ ٱلْقُرُونِ أَنَّهُمْ إِلَيْهِمْ لَا يَرْجِعُونَ
أَلَمْ
क्या नहीं
يَرَوْا۟
उन्होंने देखा
كَمْ
कितने ही
أَهْلَكْنَا
हलाक कर दिए हमने
قَبْلَهُم
उनसे पहले
مِّنَ
of
ٱلْقُرُونِ
उम्मतों में से(लोग)
أَنَّهُمْ
बेशक वो
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
لَا
will not return
يَرْجِعُونَ
नहीं वो लौटेंगे
क्या उन्होंने नहीं देखा कि उनसे पहले कितनी ही नस्लों को हमने विनष्ट किया कि वे उनकी ओर पलटकर नहीं आएँगे?
तफ़्सीर:
क्या इन रसूलों को झुठलाने वाले और उनका उपहास करने वाले लोगों ने अपने से पूर्व समुदायों से शिक्षा ग्रहण नहीं किया? क्योंकि वे मर चुके हैं और फिर से दुनिया में कभी नहीं लौटेंगे, बल्कि उन कामों की ओर जा चुके हैं, जो उन्होंने (दुनिया में) करके आगे बढ़ाए थे और अल्लाह उन्हें उनका बदला देगा।
आयत 32
وَإِن كُلٌّۭ لَّمَّا جَمِيعٌۭ لَّدَيْنَا مُحْضَرُونَ
وَإِن
और नहीं
كُلٌّۭ
वो सब
لَّمَّا
मगर
جَمِيعٌۭ
सब के सब
لَّدَيْنَا
हमारे ही पास
مُحْضَرُونَ
हाज़िर किए जाऐंगे
और जितने भी है, सबके सब हमारे ही सामने उपस्थित किए जाएँगे
तफ़्सीर:
और सभी समुदाय, बिना किसी अपवाद के, क़ियामत के दिन उठाए जाने के बाद हमारे सामने उपस्थित किए जाएँगे, ताकि हम उन्हें उनके कर्मों का बदला दें।
आयत 33
وَءَايَةٌۭ لَّهُمُ ٱلْأَرْضُ ٱلْمَيْتَةُ أَحْيَيْنَـٰهَا وَأَخْرَجْنَا مِنْهَا حَبًّۭا فَمِنْهُ يَأْكُلُونَ
وَءَايَةٌۭ
और एक निशानी है
لَّهُمُ
उनके लिए
ٱلْأَرْضُ
ज़मीन
ٱلْمَيْتَةُ
मुर्दा
أَحْيَيْنَـٰهَا
ज़िन्दा किया हमने उसे
وَأَخْرَجْنَا
और निकाला हमने
مِنْهَا
उससे
حَبًّۭا
ग़ल्ला
فَمِنْهُ
तो उससे
يَأْكُلُونَ
वो खाते हैं
और एक निशानी उनके लिए मृत भूमि है। हमने उसे जीवित किया और उससे अनाज निकाला, तो वे खाते है
तफ़्सीर:
मरणोपरांत पुनर्जीवन का इनकार करने वालों के लिए पुनर्जीवन के सत्य होने की एक निशानी : यह सूखी, बंजर भूमि है, जिसपर हमने आसमान से बारिश बरसाया, फिर हमने उसमें पौधों की क़िस्मों को उगाया और लोगों के खाने के लिए अनाज की क़िस्मों को बाहर निकाला। अतः जिस (अल्लाह) ने बारिश बरसाकर और पौधे निकालकर इस धरती को फिर से जीवित कर दिया, वह मृतकों को पुनर्जीवित करने और उन्हें उठाने में सक्षम है।
आयत 34
وَجَعَلْنَا فِيهَا جَنَّـٰتٍۢ مِّن نَّخِيلٍۢ وَأَعْنَـٰبٍۢ وَفَجَّرْنَا فِيهَا مِنَ ٱلْعُيُونِ
وَجَعَلْنَا
और बनाए हमने
فِيهَا
उसमें
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात
مِّن
of
نَّخِيلٍۢ
खजूरों के
وَأَعْنَـٰبٍۢ
और अंगूरों के
وَفَجَّرْنَا
और जारी किए हमने
فِيهَا
उसमें
مِنَ
of
ٱلْعُيُونِ
चश्मे
और हमने उसमें खजूरों और अंगूरों के बाग लगाए और उसमें स्रोत प्रवाहित किए;
तफ़्सीर:
और इस भूमि में, जिसपर हमने बारिश बरसाया, खजूर और अंगूर के बाग बना दिए और उनकी सिंचाई के लिए उनमें पानी के स्रोत जारी कर दिए।
आयत 35
لِيَأْكُلُوا۟ مِن ثَمَرِهِۦ وَمَا عَمِلَتْهُ أَيْدِيهِمْ ۖ أَفَلَا يَشْكُرُونَ
لِيَأْكُلُوا۟
ताकि वो खाऐं
مِن
of
ثَمَرِهِۦ
उसके फल से
وَمَا
हालाँकि नहीं
عَمِلَتْهُ
बनाया उसे
أَيْدِيهِمْ ۖ
उनके हाथों ने
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
يَشْكُرُونَ
वो शुक्र अदा करते
ताकि वे उसके फल खाएँ - हालाँकि यह सब कुछ उनके हाथों का बनाया हुआ नहीं है। - तो क्या वे आभार नहीं प्रकट करते?
तफ़्सीर:
ताकि लोग उन बाग़ों के फल खाएँ, जो अल्लाह ने उन्हें प्रदान किया है और जिसमें उनका कोई प्रयत्न शामिल नहीं हैं। तो क्या वे केवल अल्लाह की इबादत करके और उसके रसूलों पर ईमान लाकर, इन नेमतों पर अल्लाह के लिए आभार प्रकट नहीं करते?!
आयत 36
سُبْحَـٰنَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلْأَزْوَٰجَ كُلَّهَا مِمَّا تُنۢبِتُ ٱلْأَرْضُ وَمِنْ أَنفُسِهِمْ وَمِمَّا لَا يَعْلَمُونَ
سُبْحَـٰنَ
पाक है
ٱلَّذِى
वो जिसने
خَلَقَ
पैदा किए
ٱلْأَزْوَٰجَ
जोड़े
كُلَّهَا
सब के सब
مِمَّا
उसमें से जो
تُنۢبِتُ
उगाती है
ٱلْأَرْضُ
ज़मीन
وَمِنْ
and of
أَنفُسِهِمْ
और उनके अपने नफ़्सों में से
وَمِمَّا
और उसमें से जो
لَا
not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो जानते
महिमावान है वह जिसने सबके जोड़े पैदा किए धरती जो चीजें उगाती है उनमें से भी और स्वयं उनकी अपनी जाति में से भी और उन चीज़ो में से भी जिनको वे नहीं जानते
तफ़्सीर:
पवित्र एवं उच्च है वह अल्लाह, जिसने पौधों और पेड़ों के विभिन्न प्रकार और जातियों को बनाए, और स्वयं मनुष्यों में से नर और मादा बनाए, तथा जल एवं थल आदि में अल्लाह के अन्य प्राणियों के भी विभिन्न प्रकार बनाए, जिन्हें लोग नहीं जानते।
आयत 37
وَءَايَةٌۭ لَّهُمُ ٱلَّيْلُ نَسْلَخُ مِنْهُ ٱلنَّهَارَ فَإِذَا هُم مُّظْلِمُونَ
وَءَايَةٌۭ
और एक निशानी
لَّهُمُ
उनके लिए
ٱلَّيْلُ
रात है
نَسْلَخُ
हम खींच लेते हैं
مِنْهُ
उससे
ٱلنَّهَارَ
दिन को
فَإِذَا
तो यकायक
هُم
वो
مُّظْلِمُونَ
अंधेरे में हो जाते हैं
और एक निशानी उनके लिए रात है। हम उसपर से दिन को खींच लेते है। फिर क्या देखते है कि वे अँधेरे में रह गए
तफ़्सीर:
और लोगों के लिए अल्लाह की तौहीद (एकेश्वरवाद) की एक निशानी यह है कि हम दिन के जाने और रात के आने के साथ प्रकाश को समाप्त कर देते हैं जिस समय हम उससे दिन को खींच लेते हैं और दिन के जाने के बाद हम अंधेरा ले आते हैं। फिर एकाएक लोग अंधकार में प्रवेश कर जाते हैं।
आयत 38
وَٱلشَّمْسُ تَجْرِى لِمُسْتَقَرٍّۢ لَّهَا ۚ ذَٰلِكَ تَقْدِيرُ ٱلْعَزِيزِ ٱلْعَلِيمِ
وَٱلشَّمْسُ
और सूरज
تَجْرِى
वो चल रहा है
لِمُسْتَقَرٍّۢ
ठिकाने के लिए
لَّهَا ۚ
अपने
ذَٰلِكَ
ये
تَقْدِيرُ
अंदाज़ा है
ٱلْعَزِيزِ
बहुत ज़बरदस्त का
ٱلْعَلِيمِ
ख़ूब इल्म वाले का
और सूर्य अपने नियत ठिकाने के लिए चला जा रहा है। यह बाँधा हुआ हिसाब है प्रभुत्वशाली, ज्ञानवान का
तफ़्सीर:
और उनके लिए अल्लाह के एकेश्वरवाद की एक निशानी यह सूरज है, जो एक नियत ठिकाने की ओर चला जा रहा है, जिसका अनुमान केवल अल्लाह को पता है, वह उससे आगे नहीं बढ़ सकता। यह निर्धारण उस प्रभुत्वशाली अल्लाह का निर्धारण है, जिसपर किसी का ज़ोर (आधिपत्य) नहीं चलता। वह सब कुछ जानने वाला है, जिससे उसके प्राणियों के मामले से संबंधित कोई भी चीज़ छिपी नहीं है।
आयत 39
وَٱلْقَمَرَ قَدَّرْنَـٰهُ مَنَازِلَ حَتَّىٰ عَادَ كَٱلْعُرْجُونِ ٱلْقَدِيمِ
وَٱلْقَمَرَ
और चाँद
قَدَّرْنَـٰهُ
मुक़र्रर कीं हमने उसकी
مَنَازِلَ
मंज़िलें
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
عَادَ
वो दोबारा हो जाता है
كَٱلْعُرْجُونِ
खजूर की सूखी शाख़ की तरह
ٱلْقَدِيمِ
जो पुरानी हो
और रहा चन्द्रमा, तो उसकी नियति हमने मंज़िलों के क्रम में रखी, यहाँ तक कि वह फिर खजूर की पूरानी टेढ़ी टहनी के सदृश हो जाता है
तफ़्सीर:
और उनके लिए अल्लाह की तौहीद को दर्शाने वाली एक निशानी यह चाँद है, जिसकी हमने हर रात की मंज़िलें निर्धारित कर दी हैं। शुरू में वह छोटा होता है। फिर धीरे-धीरे बड़ा होता है। फिर छोटा होना शुरू होता है यहाँ तक कि खजूर की टेढ़ी, पतली, पीली और पुरानी टहनी की तरह हो जाता है।
आयत 40
لَا ٱلشَّمْسُ يَنۢبَغِى لَهَآ أَن تُدْرِكَ ٱلْقَمَرَ وَلَا ٱلَّيْلُ سَابِقُ ٱلنَّهَارِ ۚ وَكُلٌّۭ فِى فَلَكٍۢ يَسْبَحُونَ
لَا
Not
ٱلشَّمْسُ
ना सूरज
يَنۢبَغِى
लायक़ है
لَهَآ
उसके लिए
أَن
कि
تُدْرِكَ
वो जा पकड़े
ٱلْقَمَرَ
चाँद को
وَلَا
और ना
ٱلَّيْلُ
रात
سَابِقُ
सबक़त ले जाने वाली हैं
ٱلنَّهَارِ ۚ
दिन से
وَكُلٌّۭ
और सब के सब
فِى
in
فَلَكٍۢ
एक मदार में
يَسْبَحُونَ
वो तैर रहे हैं
न सूर्य ही से हो सकता है कि चाँद को जा पकड़े और न रात दिन से आगे बढ़ सकती है। सब एक-एक कक्षा में तैर रहे हैं
तफ़्सीर:
सूरज, चाँद, रात और दिन की निशानियाँ अल्लाह की ओर से निर्धारित हैं। इसलिए वे अपने लिए निर्धारित स्थान से आगे नहीं बढ़ सकते। चुनाँचे सूरज के लिए यह संभव नहीं है कि वह चाँद को पकड़ ले और उसके पथ को बदल दे या उसके प्रकाश को समाप्त कर दे। तथा रात के लिए (भी) संभव नहीं है कि वह दिन से आगे बढ़ जाए और उसका समय समाप्त होने से पहले ही आ जाए। इन सभी नियंत्रित रचनाओं तथा अन्य ग्रहों और आकाशगंगाओं के अपने-अपने रास्ते हैं, जिन्हें अल्लाह ने निर्धारित किया है और वही उनका संरक्षण करने वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह की कुदरत की निशानियों (मुर्दा ज़मीन, सूरज-चांद) का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि कायनात का हर निज़ाम मुनज़्ज़म तरीके से चल रहा है, यह अल्लाह की कुदरत की बड़ी निशानी है।
आयत 41
وَءَايَةٌۭ لَّهُمْ أَنَّا حَمَلْنَا ذُرِّيَّتَهُمْ فِى ٱلْفُلْكِ ٱلْمَشْحُونِ
وَءَايَةٌۭ
और एक निशानी है
لَّهُمْ
उनके लिए
أَنَّا
बेशक हम
حَمَلْنَا
सवार किया हमने
ذُرِّيَّتَهُمْ
उनकी औलाद को
فِى
in
ٱلْفُلْكِ
कश्ती में
ٱلْمَشْحُونِ
भरी हुई
और एक निशानी उनके लिए यह है कि हमने उनके अनुवर्तियों को भरी हुई नौका में सवार किया
तफ़्सीर:
इसी प्रकार अल्लाह के एक होने और उसके अपने बंदों पर कृपा करने की एक निशानी यह है कि हमने नूह के समय में आदम के वंश में से तूफ़ान (बाढ़) से बचे हुए लोगों को अल्लाह के प्राणियों से भरी हुई नाव में सवार किया। क्योंकि अल्लाह ने उसमें हर वर्ग से एक-एक जोड़ा सवार किया था।
आयत 42
وَخَلَقْنَا لَهُم مِّن مِّثْلِهِۦ مَا يَرْكَبُونَ
وَخَلَقْنَا
और पैदा कीं हमने
لَهُم
उनके लिए
مِّن
from
مِّثْلِهِۦ
उस जैसी (चीज़ों ) से
مَا
जिन पर
يَرْكَبُونَ
वो सवार होते हैं
और उनके लिए उसी के सदृश और भी ऐसी चीज़े पैदा की, जिनपर वे सवार होते है
तफ़्सीर:
और उनके लिए अल्लाह की तौहीद (एकेश्वरवाद) और उसके अपने बंदों पर कृपा करने की एक निशानी यह है कि हमने उनके लिए नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती जैसी बहुत-सी सवारियाँ बनाईं।
आयत 43
وَإِن نَّشَأْ نُغْرِقْهُمْ فَلَا صَرِيخَ لَهُمْ وَلَا هُمْ يُنقَذُونَ
وَإِن
और अगर
نَّشَأْ
हम चाहें
نُغْرِقْهُمْ
हम ग़र्क़ कर दें उन्हें
فَلَا
तो नहीं
صَرِيخَ
कोई फ़रियाद रस
لَهُمْ
उनके लिए
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يُنقَذُونَ
वो बचाए जा सकेंगे
और यदि हम चाहें तो उन्हें डूबो दें। फिर न तो उनकी कोई चीख-पुकार हो और न उन्हें बचाया जा सके
तफ़्सीर:
अगर हम उन्हें डुबोना चाहें, तो डुबो दें। अगर हम उन्हें डुबोना चाहें, तो कोई फ़र्याद को पहुँचने वाला न होगा जो उनकी मदद कर सके, और न कोई बचावकर्ता होगा जो उन्हें बचा सके, यदि वे हमारे आदेश और हमारे फैसले से डूब जाएँ।
आयत 44
إِلَّا رَحْمَةًۭ مِّنَّا وَمَتَـٰعًا إِلَىٰ حِينٍۢ
إِلَّا
सिवाए
رَحْمَةًۭ
रहमत के
مِّنَّا
हमारी तरफ़ से
وَمَتَـٰعًا
और फ़ायदा देना
إِلَىٰ
for
حِينٍۢ
एक मुद्दत तक
यह तो बस हमारी दयालुता और एक नियत समय तक की सुख-सामग्री है
तफ़्सीर:
सिवाय इसके कि हम उनपर दया करते हुए उन्हें डूबने से बचा लेते हैं और उन्हें एक निश्चित अवधि तक लाभ उठाने के लिए लौटा देते हैं, जिससे वे आगे नहीं बढ़ सकते। शायद कि वे शिक्षा ग्रहण करें और ईमान ले आएँ।
आयत 45
وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ٱتَّقُوا۟ مَا بَيْنَ أَيْدِيكُمْ وَمَا خَلْفَكُمْ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
وَإِذَا
और जब
قِيلَ
कहा जाता है
لَهُمُ
उन्हें
ٱتَّقُوا۟
डरो
مَا
उससे जो
بَيْنَ
(is) before you
أَيْدِيكُمْ
तुम्हारे सामने है
وَمَا
और जो
خَلْفَكُمْ
तुम्हारे पीछे है
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تُرْحَمُونَ
तुम रहम किए जाओ
और जब उनसे कहा जाता है कि उस चीज़ का डर रखो, जो तुम्हारे आगे है और जो तुम्हारे पीछे है, ताकि तुमपर दया कि जाए! (तो चुप्पी साझ लेते है)
तफ़्सीर:
और जब ईमान से मुँह फेरने वाले इन बहुदेववादियों से कहा जाता है : जिस आख़िरत के मामले और उसकी कठिनाइयों से तुम्हारा सामना होने वाला है उससे सावधान हो जाओ, तथा पीठ फेरकर जाने वाली दुनिया से भी सावधान रहो, इस आशा में कि अल्लाह तुम्हें अपनी दया प्रदान करे; तो वे इसका अनुपालन नहीं करते हैं, बल्कि उसकी परवाह न करते हुए उससे मुँह फेर लेते हैं।
आयत 46
وَمَا تَأْتِيهِم مِّنْ ءَايَةٍۢ مِّنْ ءَايَـٰتِ رَبِّهِمْ إِلَّا كَانُوا۟ عَنْهَا مُعْرِضِينَ
وَمَا
और नहीं
تَأْتِيهِم
आती उनके पास
مِّنْ
of
ءَايَةٍۢ
कोई निशानी
مِّنْ
from
ءَايَـٰتِ
निशानियों में से
رَبِّهِمْ
उनके रब की
إِلَّا
मगर
كَانُوا۟
होते हैं वो
عَنْهَا
उससे
مُعْرِضِينَ
ऐराज़ करने वाले
उनके पास उनके रब की आयतों में से जो आयत भी आती है, वे उससे कतराते ही है
तफ़्सीर:
और जब भी इन द्वेष रखने वाले मुश्रिकों के पास अल्लाह के एकेश्वरवाद और उसके एकमात्र इबादत का हक़दार होने को दर्शाने वाली अल्लाह की आयतें आती थीं, तो वे उनसे उपदेश ग्रहण करने के बजाय उनसे मुँह फेर लेते थे।
आयत 47
وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ أَنفِقُوا۟ مِمَّا رَزَقَكُمُ ٱللَّهُ قَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لِلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَنُطْعِمُ مَن لَّوْ يَشَآءُ ٱللَّهُ أَطْعَمَهُۥٓ إِنْ أَنتُمْ إِلَّا فِى ضَلَـٰلٍۢ مُّبِينٍۢ
وَإِذَا
और जब
قِيلَ
कहा जाता है
لَهُمْ
उन्हें
أَنفِقُوا۟
ख़र्च करो
مِمَّا
उसमें से जो
رَزَقَكُمُ
रिज़्क़ दिया तुम्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
قَالَ
कहते हैं
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لِلَّذِينَ
उनसे जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए
أَنُطْعِمُ
क्या हम खिलाऐं
مَن
उसको जिसे
لَّوْ
अगर
يَشَآءُ
चाहता
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَطْعَمَهُۥٓ
वो खिला देता उसे
إِنْ
नहीं
أَنتُمْ
तुम
إِلَّا
मगर
فِى
in
ضَلَـٰلٍۢ
गुमराही में
مُّبِينٍۢ
खुली-खुली
और जब उनसे कहा जाता है कि "अल्लाह ने जो कुछ रोज़ी तुम्हें दी है उनमें से ख़र्च करो।" तो जिन लोगों ने इनकार किया है, वे उन लोगों से, जो ईमान लाए है, कहते है, "क्या हम उसको खाना खिलाएँ जिसे .दि अल्लाह चाहता तो स्वयं खिला देता? तुम तो बस खुली गुमराही में पड़े हो।"
तफ़्सीर:
और जब इन द्वेष रखने वालों से कहा जाता है : अल्लाह ने तुम्हें जो धन दिया है, उससे ग़रीबों और निर्धनों की मदद करो, तो वे इसका खंडन करते हुए ईमान वालों को जवाब देते हैं : क्या हम उसे खिलाएँ, जिसे यदि अल्लाह खिलाना चाहता, तो अवश्य खिला देता?! अतः हम उसकी इच्छा का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं। तुम तो (ऐ ईमान वालो!) स्पष्ट गलती पर और सच्चाई से बहुत दूर हो।
आयत 48
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَـٰذَا ٱلْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
مَتَىٰ
कब होगा
هَـٰذَا
ये
ٱلْوَعْدُ
वादा
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
और वे कहते है कि "यह वादा कब पूरा होगा, यदि तुम सच्चे हो?"
तफ़्सीर:
मरणोपरांत पुनः उठाए जाने का इनकार करने वाले काफ़िर उसे झुठलाते हुए और उसे खारिज करते हुए कहते हैं : (ऐ ईमान वालो!) अगर तुम अपने इस दावे में सच्चे हो कि यह घटित होकर ही रहेगा, तो बतलाओ कि यह पुनर्जीवन (प्रलय) कब होगा?!
आयत 49
مَا يَنظُرُونَ إِلَّا صَيْحَةًۭ وَٰحِدَةًۭ تَأْخُذُهُمْ وَهُمْ يَخِصِّمُونَ
مَا
नहीं
يَنظُرُونَ
वो इन्तिज़ार कर रहे
إِلَّا
मगर
صَيْحَةًۭ
चिंघाड़ का
وَٰحِدَةًۭ
एक ही
تَأْخُذُهُمْ
वो पकड़ लेगी उन्हें
وَهُمْ
जब कि वो
يَخِصِّمُونَ
वो झगड़ रहे होंगे
वे तो बस एक प्रचंड चीत्कार की प्रतीक्षा में है, जो उन्हें आ पकड़ेगी, जबकि वे झगड़ते होंगे
तफ़्सीर:
मरणोपरांत पुनः उठाए जाने को झुठलाने वाले उसे ख़ारिज कर देने वाले ये लोग, केवल प्रथम बार सूर में फूँक मारे जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जब सूर में फूँक मारी जाएगी, तो यह चिंघाड़ उन्हें एकाएक पकड़ लेगी, जबकि वे अपनी सांसारिक व्यस्तताओं जैसे कि खरीदने, बेचने, पानी देने, चराने और अन्य सांसारिक कार्यों में व्यस्त होंगे।
आयत 50
فَلَا يَسْتَطِيعُونَ تَوْصِيَةًۭ وَلَآ إِلَىٰٓ أَهْلِهِمْ يَرْجِعُونَ
فَلَا
पस ना
يَسْتَطِيعُونَ
वो इस्तिताअत रखते होंगे
تَوْصِيَةًۭ
वसीयत करने की
وَلَآ
और ना
إِلَىٰٓ
to
أَهْلِهِمْ
तरफ़ अपने घर वालों के
يَرْجِعُونَ
वो पलट सकेंगे
फिर न तो वे कोई वसीयत कर पाएँगे और न अपने घरवालों की ओर लौट ही सकेंगे
तफ़्सीर:
जब यह चिंघाडृ एकाएक उन्हें आ लेगी, तो न वे एक-दूसरे को वसीयत कर सकेंगे और न ही अपने घरों और परिवारों की ओर लौट सकेंगे, बल्कि वे अपनी इन्हीं व्यस्तताओं की हालत में मर जाएँगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कश्ती की नेमत और कयामत की अचानक आमद का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कयामत अचानक आ सकती है, इसलिए इसकी तैयारी में देर नहीं करनी चाहिए।
आयत 51
وَنُفِخَ فِى ٱلصُّورِ فَإِذَا هُم مِّنَ ٱلْأَجْدَاثِ إِلَىٰ رَبِّهِمْ يَنسِلُونَ
وَنُفِخَ
और फूँका जाएगा
فِى
[in]
ٱلصُّورِ
सूर में
فَإِذَا
तो यकायक
هُم
वो
مِّنَ
from
ٱلْأَجْدَاثِ
क़ब्रों से
إِلَىٰ
to
رَبِّهِمْ
तरफ़ अपने रब के
يَنسِلُونَ
वो तेज़ी से चल रहे होंगे
और नरसिंघा में फूँक मारी जाएगी। फिर क्या देखेंगे कि वे क़ब्रों से निकलकर अपने रब की ओर चल पड़े हैं
तफ़्सीर:
तथा पुनर्जीवन के लिए सूर (नरसिंघा) में दूसरी फूँक मारी जाएगी, तो एकाएक वे सब अपनी क़ब्रों से निकलकर हिसाब और बदले के लिए अपने पालनहार की ओर तेज़ी से चल पड़ेंगे।
आयत 52
قَالُوا۟ يَـٰوَيْلَنَا مَنۢ بَعَثَنَا مِن مَّرْقَدِنَا ۜ ۗ هَـٰذَا مَا وَعَدَ ٱلرَّحْمَـٰنُ وَصَدَقَ ٱلْمُرْسَلُونَ
قَالُوا۟
वो कहेंगे
يَـٰوَيْلَنَا
हाय अफ़सोस हम पर
مَنۢ
किसने
بَعَثَنَا
उठा दिया हमें
مِن
from
مَّرْقَدِنَا ۜ ۗ
हमारी ख़्वाबगाहों से
هَـٰذَا
ये है
مَا
वो जो
وَعَدَ
वादा किया था
ٱلرَّحْمَـٰنُ
रहमान ने
وَصَدَقَ
और सच कहा था
ٱلْمُرْسَلُونَ
रसूलों ने
कहेंगे, "ऐ अफ़सोस हम पर! किसने हमें सोते से जगा दिया? यह वही चीज़ है जिसका रहमान ने वादा किया था और रसूलों ने सच कहा था।"
तफ़्सीर:
मरणोपरांत पुनः उठाए जाने को झुठलाने वाले ये काफ़िर पछतावा प्रकट करते हुए कहेंगे : हाय हमारा नुक़सान! किसने हमें हमारी क़ब्रों से उठा दिया?! तो उन्हें उनके प्रश्न का उत्तर दिया जाएगा : यह वही है, जिसका अल्लाह ने वादा किया था। क्योंकि इसे अवश्य ही घटित होना था। और रसूलों ने इसके बारे में अल्लाह की ओर से जो कुछ पहुँचाया था, वह सच्चा था।
आयत 53
إِن كَانَتْ إِلَّا صَيْحَةًۭ وَٰحِدَةًۭ فَإِذَا هُمْ جَمِيعٌۭ لَّدَيْنَا مُحْضَرُونَ
إِن
ना
كَانَتْ
होगी वो
إِلَّا
मगर
صَيْحَةًۭ
चिंघाड़
وَٰحِدَةًۭ
एक ही
فَإِذَا
तो यकायक
هُمْ
वो
جَمِيعٌۭ
सब के सब
لَّدَيْنَا
हमारे पास
مُحْضَرُونَ
हाज़िर किए जाऐंगे
बस एक ज़ोर की चिंघाड़ होगी। फिर क्या देखेंगे कि वे सबके-सब हमारे सामने उपस्थित कर दिए गए
तफ़्सीर:
पुनर्जीवित होकर क़ब्रों से उठने का मामला तो केवल सूर में दूसरी बार फूँक मारने का प्रभाव होगा। फिर क्या देखेंगे कि सभी प्राणियों को क़ियामत के दिन हिसाब के लिए हमारे पास उपस्थित कर दिया गया होगा।
आयत 54
فَٱلْيَوْمَ لَا تُظْلَمُ نَفْسٌۭ شَيْـًۭٔا وَلَا تُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
فَٱلْيَوْمَ
तो आज के दिन
لَا
not
تُظْلَمُ
ना ज़ुल्म किया जाएगा
نَفْسٌۭ
किसी नफ़्स पर
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
وَلَا
और ना
تُجْزَوْنَ
तुम बदला दिए जाओगे
إِلَّا
मगर
مَا
जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते
अब आज किसी जीव पर कुछ भी ज़ुल्म न होगा और तुम्हें बदले में वही मिलेगा जो कुछ तुम करते रहे हो
तफ़्सीर:
उस दिन न्यायपूर्वक फैसला होगा। अतः (ऐ बंदो!) तुमपर कुछ भी अत्याचार नहीं किया जाएगा कि तुम्हारे गुनाहों को बढ़ा दिया जाए या तुम्हारी नेकियों को घटा दिया जाए। बल्कि तुम्हें उसी का बदला दिया जाएगा, जो तुम दुनिया के जीवन में किया करते थे।
आयत 55
إِنَّ أَصْحَـٰبَ ٱلْجَنَّةِ ٱلْيَوْمَ فِى شُغُلٍۢ فَـٰكِهُونَ
إِنَّ
बेशक
أَصْحَـٰبَ
(the) companions
ٱلْجَنَّةِ
जन्नत वाले
ٱلْيَوْمَ
आज के दिन
فِى
[in]
شُغُلٍۢ
मश्ग़लों में
فَـٰكِهُونَ
ख़ुश हो रहे होंगे
निश्चय ही जन्नतवाले आज किसी न किसी काम नें व्यस्त आनन्द ले रहे है
तफ़्सीर:
क़ियामत के दिन जन्नत वाले चिरस्थायी नेमत और महान सफलता को देखकर दूसरों के बारे में सोचने से बेपरवाह होंगे। चुनाँचे वे खुशी-खुशी उसका आनंद लेने में मगन होंगे।
आयत 56
هُمْ وَأَزْوَٰجُهُمْ فِى ظِلَـٰلٍ عَلَى ٱلْأَرَآئِكِ مُتَّكِـُٔونَ
هُمْ
वो
وَأَزْوَٰجُهُمْ
और बीवियाँ उनकी
فِى
in
ظِلَـٰلٍ
सायों में
عَلَى
on
ٱلْأَرَآئِكِ
तख़्तों पर
مُتَّكِـُٔونَ
तकिया लगाए हुए होंगे
वे और उनकी पत्नियों छायों में मसहरियों पर तकिया लगाए हुए है,
तफ़्सीर:
वे और उनकी पत्नियाँ जन्नत की विस्तृत छाया में मस्नदों पर बैठकर आनंद उठा रहे होंगे।
आयत 57
لَهُمْ فِيهَا فَـٰكِهَةٌۭ وَلَهُم مَّا يَدَّعُونَ
لَهُمْ
उनके लिए
فِيهَا
उसमें
فَـٰكِهَةٌۭ
फल होंगे
وَلَهُم
और उनके लिए होगा
مَّا
जो
يَدَّعُونَ
वो तलब करेंगे
उनके लिए वहाँ मेवे है। औऱ उनके लिए वह सब कुछ मौजूद है, जिसकी वे माँग करें
तफ़्सीर:
उनके लिए इस जन्नत में अंगूर, अंजीर और अनार जैसे स्वादिष्ट फलों के अनेक प्रकार होंगे। तथा उनके लिए वह सारी आनंद की चीजें और तरह-तरह की नेमतें होंगी, जिनकी वे इच्छा करेंगे। चुनाँचे वे जो कुछ भी माँगेंगे, वह उनके लिए उपस्थित होगा।
आयत 58
سَلَـٰمٌۭ قَوْلًۭا مِّن رَّبٍّۢ رَّحِيمٍۢ
سَلَـٰمٌۭ
सलाम
قَوْلًۭا
क़ौल होगा
مِّن
from
رَّبٍّۢ
रब की तरफ़ से
رَّحِيمٍۢ
जो निहायत रहम करने वाला है
(उनपर) सलाम है, दयामय रब का उच्चारित किया हुआ
तफ़्सीर:
और इन सारी नेमतों से बढ़कर उन्हें सलाम प्राप्त होगा। यह उस पालनहार की ओर से कहा जाएगा, जो उनपर अत्यंत दया करने वाला है। चुनाँचे जब वह उन्हें सलाम कहेगा, तो उन्हें हर तरह से सुरक्षा प्राप्त होगी और उन्हें वह अभिवादन (सलाम) प्राप्त होगा, जिससे बढ़कर कोई अभिवादन नहीं।
आयत 59
وَٱمْتَـٰزُوا۟ ٱلْيَوْمَ أَيُّهَا ٱلْمُجْرِمُونَ
وَٱمْتَـٰزُوا۟
और अलग हो जाओ
ٱلْيَوْمَ
आज के दिन
أَيُّهَا
ٱلْمُجْرِمُونَ
मुजरिमो
"और ऐ अपराधियों! आज तुम छँटकर अलग हो जाओ
तफ़्सीर:
और क़ियामत के दिन मुश्रिकों से कहा जाएगा : तुम मोमिनों से अलग हो जाओ। क्योंकि उनके लिए तुम्हारे साथ रहना उचित नहीं है; इसलिए कि तुम्हारा बदला उनके बदले से अलग और तुम्हारी विशेषताएँ उनकी विशेषताओं के विपरीत हैं।
आयत 60
۞ أَلَمْ أَعْهَدْ إِلَيْكُمْ يَـٰبَنِىٓ ءَادَمَ أَن لَّا تَعْبُدُوا۟ ٱلشَّيْطَـٰنَ ۖ إِنَّهُۥ لَكُمْ عَدُوٌّۭ مُّبِينٌۭ
۞ أَلَمْ
क्या नहीं
أَعْهَدْ
मैं ने ताकीद की थी
إِلَيْكُمْ
तुम्हें
يَـٰبَنِىٓ
ऐ बनी
ءَادَمَ
आदम
أَن
कि
لَّا
(do) not
تَعْبُدُوا۟
ना तुम इबादत करना
ٱلشَّيْطَـٰنَ ۖ
शैतान की
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَكُمْ
तुम्हारा
عَدُوٌّۭ
दुश्मन है
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
क्या मैंने तुम्हें ताकीद नहीं की थी, ऐ आदम के बेटो! कि शैतान की बन्दगी न करे। वास्तव में वह तुम्हारा खुला शत्रु है
तफ़्सीर:
क्या मैंने तुम्हें अपने रसूलों की ज़बानी ताकीद नहीं की थी और तुम्हें आदेश नहीं दिया था और तुमसे कहा नहीं था कि : ऐ आदम की संतान! तरह-तरह के कुफ़्र और गुनाह करके शैतान का पालन न करो। निश्चय ही शैतान तुम्हारा खुला दुश्मन है। अतः एक समझदार व्यक्ति अपने उस दुश्मन का आज्ञापालन कैसे कर सकता है, जिसकी दुश्मनी उसके लिए जगजाहिर है?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन जन्नतियों के सुकून का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि जन्नत की नेमतें सब्र और नेक अमल का इनाम हैं, इनकी उम्मीद में मेहनत करते रहना चाहिए।
आयत 61
وَأَنِ ٱعْبُدُونِى ۚ هَـٰذَا صِرَٰطٌۭ مُّسْتَقِيمٌۭ
وَأَنِ
और ये कि
ٱعْبُدُونِى ۚ
इबादत करो मेरी
هَـٰذَا
ये
صِرَٰطٌۭ
रास्ता है
مُّسْتَقِيمٌۭ
सीधा
और यह कि मेरी बन्दगी करो? यही सीधा मार्ग है
तफ़्सीर:
और (ऐ आदम की संतान!) मैंने तुम्हें आदेश दिया है कि अकेले मेरी ही इबादत करो और किसी वस्तु को मेरा साझी न बनाओ। क्योंकि अकेले मेरी इबादत और मेरी आज्ञाकारिता ही सीधा रास्ता है, जो मेरी प्रसन्नता और जन्नत में प्रवेश की ओर ले जाता है। लेकिन मैंने तुम्हें जिस चीज़ की ताकीद की थी और तुम्हें जिसका आदेश दिया था, तुमने उसका अनुपालन नहीं किया।
आयत 62
وَلَقَدْ أَضَلَّ مِنكُمْ جِبِلًّۭا كَثِيرًا ۖ أَفَلَمْ تَكُونُوا۟ تَعْقِلُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَضَلَّ
उसने गुमराह कर दिया
مِنكُمْ
तुम में से
جِبِلًّۭا
मख़्लूक़ को
كَثِيرًا ۖ
बहुत सी
أَفَلَمْ
क्या फिर नहीं
تَكُونُوا۟
थे तुम
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल से काम लेते
उसने तो तुममें से बहुत-से गिरोहों को पथभ्रष्ट कर दिया। तो क्या तुम बुद्धि नहीं रखते थे?
तफ़्सीर:
और शैतान ने तुममें से बहुत-से लोगों को गुमराह कर दिया। तो क्या तुम्हारे पास विवेक नहीं था, जो तुम्हें अपने पालनहार की आज्ञा का पालन करने और केवल उसी महिमावान की उपासना करने का आदेश देता और तुम्हें उस शैतान की बात मानने से सावधान करता जो तुम्हारा खुला दुश्मन है?!
आयत 63
هَـٰذِهِۦ جَهَنَّمُ ٱلَّتِى كُنتُمْ تُوعَدُونَ
هَـٰذِهِۦ
ये है
جَهَنَّمُ
जहन्नम
ٱلَّتِى
वो जो
كُنتُمْ
थे तुम
تُوعَدُونَ
तुम वादा किए जाते
यह वही जहन्नम है जिसकी तुम्हें धमकी दी जाती रही है
तफ़्सीर:
यही वह जहन्नम है, जिसका तुम दुनिया में अपने कुफ़्र पर वादा किए जाते थे। यह उस समय तुमसे अदृश्य था, लेकिन आज तुम उसे अपनी आँखों से देख रहे हो।
आयत 64
ٱصْلَوْهَا ٱلْيَوْمَ بِمَا كُنتُمْ تَكْفُرُونَ
ٱصْلَوْهَا
दाख़िल हो जाओ इसमें
ٱلْيَوْمَ
आज के दिन
بِمَا
बवजह उसके जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَكْفُرُونَ
तुम कुफ़्र करते
जो इनकार तुम करते रहे हो, उसके बदले में आज इसमें प्रविष्ट हो जाओ।"
तफ़्सीर:
आज उसमें प्रवेश कर जाओ और उसकी तपिश का सामना करो, क्योंकि तुम सांसारिक जीवन में अल्लाह का इनकार किया करते थे।
आयत 65
ٱلْيَوْمَ نَخْتِمُ عَلَىٰٓ أَفْوَٰهِهِمْ وَتُكَلِّمُنَآ أَيْدِيهِمْ وَتَشْهَدُ أَرْجُلُهُم بِمَا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ
ٱلْيَوْمَ
आज
نَخْتِمُ
हम मोहर लगा देंगे
عَلَىٰٓ
[on]
أَفْوَٰهِهِمْ
उनके मुँहों पर
وَتُكَلِّمُنَآ
और कलाम करेंगे हमसे
أَيْدِيهِمْ
हाथ उनके
وَتَشْهَدُ
और गवाही देंगे
أَرْجُلُهُم
पाँव उनके
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَكْسِبُونَ
वो कमाई करते
आज हम उनके मुँह पर मुहर लगा देंगे और उनके हाथ हमसे बोलेंगे और जो कुछ वे कमाते रहे है, उनके पाँव उसकी गवाही देंगे
तफ़्सीर:
आज हम उनके मुँहों पर मुहर लगा देंगे तो वे गूँगे हो जाएँगे, वे जिस कुफ़्र और पापों में पड़े हुए थे उसके इनकार के लिए मुँह खोल नहीं सकेंगे। उनके हाथ हमसे बात करेंगे कि उनसे दुनिया में क्या कुछ काम हुआ था और उनके पैर उन पापों की गवाही देंगे जो वे किया करते थे और उनकी ओर चलकर जाया करते थे।
आयत 66
وَلَوْ نَشَآءُ لَطَمَسْنَا عَلَىٰٓ أَعْيُنِهِمْ فَٱسْتَبَقُوا۟ ٱلصِّرَٰطَ فَأَنَّىٰ يُبْصِرُونَ
وَلَوْ
और अगर
نَشَآءُ
हम चाहें
لَطَمَسْنَا
अलबत्ता हम मिटा दें
عَلَىٰٓ
[over]
أَعْيُنِهِمْ
उनकी आँखों को
فَٱسْتَبَقُوا۟
पस वो दौड़ें
ٱلصِّرَٰطَ
रास्ते (की तरफ़)
فَأَنَّىٰ
तो कैसे
يُبْصِرُونَ
वो देख सकेंगे
यदि हम चाहें तो उनकी आँखें मेट दें क्योंकि वे (अपने रूढ़) मार्ग की और लपके हुए है। फिर उन्हें सुझाई कहाँ से देगा?
तफ़्सीर:
और अगर हम उनकी आँखों के प्रकाश को खत्म करना चाहें, तो निश्चय उसे खत्म कर दें और वे देख न सकें। फिर वे तेज़ी से रास्ते की ओर दौड़ें, ताकि उसे पार करके जन्नत तक पहुँच जाएँ। परंतु उसे पार करना उनके लिए असंभव है, जबकि उनकी दृष्टि चली गई।
आयत 67
وَلَوْ نَشَآءُ لَمَسَخْنَـٰهُمْ عَلَىٰ مَكَانَتِهِمْ فَمَا ٱسْتَطَـٰعُوا۟ مُضِيًّۭا وَلَا يَرْجِعُونَ
وَلَوْ
और अगर
نَشَآءُ
हम चाहें
لَمَسَخْنَـٰهُمْ
अलबत्ता मसख़ कर दें हम उन्हें
عَلَىٰ
in
مَكَانَتِهِمْ
उनकी जगहों पर
فَمَا
तो ना
ٱسْتَطَـٰعُوا۟
वो इस्तिताअत रखते होंगे
مُضِيًّۭا
चलने की
وَلَا
और ना
يَرْجِعُونَ
वो पलट सकेंगे
यदि हम चाहें तो उनकी जगह पर ही उनके रूप बिगाड़कर रख दें क्योंकि वे सत्य की ओर न चल सके और वे (गुमराही से) बाज़ नहीं आते।
तफ़्सीर:
और अगर हम उनकी रचना को बदलना और उन्हें उनके पैरों पर बैठाना चाहें, तो हम उनकी रचना को बदल दें और उन्हें उनके पैरों पर बैठा दें। फिर वे अपनी जगह से हट न सकें। न तो वे आगे जा सकेंं और न पीछे लौट सकें।
आयत 68
وَمَن نُّعَمِّرْهُ نُنَكِّسْهُ فِى ٱلْخَلْقِ ۖ أَفَلَا يَعْقِلُونَ
وَمَن
और वो जो
نُّعَمِّرْهُ
हम उमर देते हैं उसे
نُنَكِّسْهُ
हम उलटा देते हैं उसे
فِى
in
ٱلْخَلْقِ ۖ
साख़्त में
أَفَلَا
क्या भला नहीं
يَعْقِلُونَ
वो अक़्ल रखते
जिसको हम दीर्धायु देते है, उसको उसकी संरचना में उल्टा फेर देते है। तो क्या वे बुद्धि से काम नहीं लेते?
तफ़्सीर:
और हम जिस व्यक्ति की आयु को लंबी करके उसके जीवन में विस्तार कर देते हैं, उसे कमज़ोरी की अवस्था की ओर लौटा देते हैं। तो क्या वे अपनी बुद्धि से नहीं सोचते और इतनी सी बात नहीं समझ पाते कि यह घर अनश्वरता और हमेशा रहने का घर नहीं है, बल्कि बाकी रहने वाला घर तो आख़िरत का घर है।
आयत 69
وَمَا عَلَّمْنَـٰهُ ٱلشِّعْرَ وَمَا يَنۢبَغِى لَهُۥٓ ۚ إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرٌۭ وَقُرْءَانٌۭ مُّبِينٌۭ
وَمَا
और नहीं
عَلَّمْنَـٰهُ
सिखाया हमने उसे
ٱلشِّعْرَ
शेअर
وَمَا
और नहीं
يَنۢبَغِى
वो ज़ेब देता
لَهُۥٓ ۚ
उसे
إِنْ
नहीं है
هُوَ
वो
إِلَّا
मगर
ذِكْرٌۭ
एक नसीहत
وَقُرْءَانٌۭ
और क़ुरआन
مُّبِينٌۭ
वाज़ेह
हमने उस (नबी) को कविता नहीं सिखाई और न वह उसके लिए शोभनीय है। वह तो केवल अनुस्मृति और स्पष्ट क़ुरआन है;
तफ़्सीर:
हमने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को शे'र (काव्य) नहीं सिखाया और यह उनके लिए शोभनीय भी नहीं है; क्योंकि यह उनके स्वभाव में नहीं है और न तो उनकी प्रकृति इसकी अपेक्षा करती है। फिर तुम्हारा यह दावा करना कैसे सही हो सकता है कि वह शायर (कवि) हैं। हमने उन्हें जो सिखाया है, वह उन लोगों के लिए सर्वथा उपदेश और स्पष्ट क़ुरआन है जो उसपर चिंतन करने वाले हैं।
आयत 70
لِّيُنذِرَ مَن كَانَ حَيًّۭا وَيَحِقَّ ٱلْقَوْلُ عَلَى ٱلْكَـٰفِرِينَ
لِّيُنذِرَ
ताकि वो डराए
مَن
उसे जो
كَانَ
है
حَيًّۭا
ज़िन्दा
وَيَحِقَّ
और साबित हो जाए
ٱلْقَوْلُ
बात
عَلَى
against
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों पर
ताकि वह उसे सचेत कर दे जो जीवन्त हो और इनकार करनेवालों पर (यातना की) बात स्थापित हो जाए
तफ़्सीर:
ताकि वह उसे डराए जिसका दिल जीवित और अंतर्दृष्टि प्रबुद्ध हो। क्योंकि ऐसा ही व्यक्ति उस (क़ुरआन) से लाभान्वित होता है, तथा काफ़िरों पर यातना सिद्ध हो जाए। क्योंकि क़ुरआन के उतरने और उसका निमंत्रण उनके पास पहुँचने से उनपर तर्क स्थापित हो गया। अतः उनके पास कोई बहाना न रहा, जिसे वे पेश कर सकें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
शैतान की पैरवी से खबरदार करने और कुरआन की सच्चाई का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि शैतान हमारा खुला दुश्मन है, उसकी पैरवी से बचना चाहिए।
आयत 71
أَوَلَمْ يَرَوْا۟ أَنَّا خَلَقْنَا لَهُم مِّمَّا عَمِلَتْ أَيْدِينَآ أَنْعَـٰمًۭا فَهُمْ لَهَا مَـٰلِكُونَ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَرَوْا۟
उन्होंने देखा
أَنَّا
बेशक हम
خَلَقْنَا
पैदा किया हमने
لَهُم
उनके लिए
مِّمَّا
उसमें से जो
عَمِلَتْ
बनाया
أَيْدِينَآ
हमारे हाथों ने
أَنْعَـٰمًۭا
मवेशियों को
فَهُمْ
तो वो
لَهَا
उनके
مَـٰلِكُونَ
मालिक हैं
क्या उन्होंने देखा नहीं कि हमने उनके लिए अपने हाथों की बनाई हुई चीज़ों में से चौपाए पैदा किए और अब वे उनके मालिक है?
तफ़्सीर:
क्या उन्होंने नहीं देखा कि हमने उनके लिए चौपाए पैदा किए हैं, तो वे उन चौपायों के मालिक बने हुए हैं; वे उनमें अपने हितों के अनुसार व्यवहार करते हैं?
आयत 72
وَذَلَّلْنَـٰهَا لَهُمْ فَمِنْهَا رَكُوبُهُمْ وَمِنْهَا يَأْكُلُونَ
وَذَلَّلْنَـٰهَا
और मुतीअ कर दिया हमने उन्हें
لَهُمْ
उनके लिए
فَمِنْهَا
तो उनमें से कुछ
رَكُوبُهُمْ
सवारियाँ हैं उनकी
وَمِنْهَا
और उनमें से कुछ
يَأْكُلُونَ
वो खाते हैं
और उन्हें उनके बस में कर दिया कि उनमें से कुछ तो उनकी सवारियाँ हैं और उनमें से कुछ को खाते है।
तफ़्सीर:
और हमने उन मवेशियों को उनके वश में और उनके अधीन कर दिया है। अतः वे उनमें से कुछ की पीठ पर सवार होते हैं और अपना बोझ लादते हैं, तथा उनमें से कुछ (जानवरों) का वे माँस खाते हैं।
आयत 73
وَلَهُمْ فِيهَا مَنَـٰفِعُ وَمَشَارِبُ ۖ أَفَلَا يَشْكُرُونَ
وَلَهُمْ
और उनके लिए
فِيهَا
उनमें
مَنَـٰفِعُ
कई फ़ायदे हैं
وَمَشَارِبُ ۖ
और पीने की चीज़ें हैं
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
يَشْكُرُونَ
वो शुक्र करते
और उनके लिए उनमें कितने ही लाभ है और पेय भी है। तो क्या वे कृतज्ञता नहीं दिखलाते?
तफ़्सीर:
उनके लिए उन (चौपायों) में उनकी सवारी करने और उनका माँस खाने के अलावा अन्य लाभ भी हैं; जैसे उनके ऊन, उनके रोवें, उनके बाल और उनकी क़ीमतें; चुनाँचे वे उनसे बिछौने (गद्दे) और वस्त्र बनाते हैं। तथा उनके लिए उनमें पीने की चीज़ें हैं, जैसे कि वे उनका दूध पीते हैं। तो क्या वे अल्लाह का शुक्रिया अदा नहीं करते, जिसने उन्हें ये और इनके अलावा अन्य नेमतें प्रदान की हैं।
आयत 74
وَٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِ ٱللَّهِ ءَالِهَةًۭ لَّعَلَّهُمْ يُنصَرُونَ
وَٱتَّخَذُوا۟
और उन्होंने बना लिए
مِن
besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
ءَالِهَةًۭ
कई इलाह
لَّعَلَّهُمْ
ताकि वो
يُنصَرُونَ
वो मदद किए जाऐं
उन्होंने अल्लाह से इतर कितने ही उपास्य बना लिए है कि शायद उन्हें मदद पहुँचे।
तफ़्सीर:
और मुश्रिकों ने अल्लाह के अतिरिक्त अन्य पूज्य बना लिए हैं, जिनकी वे इस आशा में इबादत करते हैं कि वे (पूज्य) उनकी सहायता करें और उन्हें अल्लाह की यातना से बचाएँ।
आयत 75
لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَهُمْ وَهُمْ لَهُمْ جُندٌۭ مُّحْضَرُونَ
لَا
Not
يَسْتَطِيعُونَ
नहीं वो इस्तिताअत रखते
نَصْرَهُمْ
उनकी मदद की
وَهُمْ
बल्कि वो ख़ुद
لَهُمْ
उनके लिए
جُندٌۭ
लश्कर हैं
مُّحْضَرُونَ
हाज़िर किए गए
वे उनकी सहायता करने की सामर्थ्य नहीं रखते, हालाँकि वे (बहुदेववादियों की अपनी स्पष्ट में) उनके लिए उपस्थित सेनाएँ हैं
तफ़्सीर:
वे असत्य पूज्य जो उन्होंने ठहरा लिए हैं, वे न स्वयं अपनी मदद कर सकते हैं और न उन लोगों की मदद कर सकते हैं, जो अल्लाह को छोड़कर उनकी पूजा करते हैं। बल्कि वे और उनकी मूर्तियाँ सब के सब यातना में उपस्थित किए जाएँगे और उनमें से हर एक दूसरे से बरी होने की घोषणा करेगा।
आयत 76
فَلَا يَحْزُنكَ قَوْلُهُمْ ۘ إِنَّا نَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ
فَلَا
पस ना
يَحْزُنكَ
ग़मगीन करे आपको
قَوْلُهُمْ ۘ
बात उनकी
إِنَّا
बेशक हम
نَعْلَمُ
हम जानते हैं
مَا
जो कुछ
يُسِرُّونَ
वो छुपाते हैं
وَمَا
और जो कुछ
يُعْلِنُونَ
वो ज़ाहिर करते हैं
अतः उनकी बात तुम्हें शोकाकुल न करे। हम जानते है जो कुछ वे छिपाते और जो कुछ व्यक्त करते है
तफ़्सीर:
अतः (ऐ रसूल!) आपको उनकी यह बात शोकग्रस्त न करे कि आप भेजे हुए रसूल नहीं हैं, या आप शायर (कवि) हैं और इस तरह के उनके अन्य मिथ्यारोप। निःसंदेह हम जानते हैं जो कुछ वे इस तरह की बातों में से छिपाते हैं और जो कुछ ज़ाहिर करते हैं। इसमें से कुछ भी हमसे छिपा नहीं है, और हम उन्हें इसका बदला देंगे।
आयत 77
أَوَلَمْ يَرَ ٱلْإِنسَـٰنُ أَنَّا خَلَقْنَـٰهُ مِن نُّطْفَةٍۢ فَإِذَا هُوَ خَصِيمٌۭ مُّبِينٌۭ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَرَ
देखा
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान ने
أَنَّا
बेशक हम
خَلَقْنَـٰهُ
पैदा किया हमने उसे
مِن
from
نُّطْفَةٍۢ
नुत्फ़े से
فَإِذَا
तो यकायक
هُوَ
वो
خَصِيمٌۭ
झगड़ालू है
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
क्या (इनकार करनेवाले) मनुष्य को नहीं देखा कि हमने उसे वीर्य से पैदा किया? फिर क्या देखते है कि वह प्रत्क्षय विरोधी झगड़ालू बन गया
तफ़्सीर:
क्या उस आदमी ने, जो मरणोपरांत दोबारा जीवित किए जाने का इनकार करता है, इस बात पर सोच-विचार नहीं किया कि हमने उसे वीर्य से पैदा किया है। फिर वह कई चरणों से गुज़रता हुआ पैदा हुआ और पला-बढ़ा। फिर वह बड़ा झगड़ालू और बहस करने वाला बन गया। क्या उसने इसपर विचार नहीं किया ताकि वह उसके द्वारा मरणोपरांत पुनः जीवित होने की संभावना पर तर्क ग्रहण करता।
आयत 78
وَضَرَبَ لَنَا مَثَلًۭا وَنَسِىَ خَلْقَهُۥ ۖ قَالَ مَن يُحْىِ ٱلْعِظَـٰمَ وَهِىَ رَمِيمٌۭ
وَضَرَبَ
और उसने बयान की
لَنَا
हमारे लिए
مَثَلًۭا
मिसाल
وَنَسِىَ
और वो भूल गया
خَلْقَهُۥ ۖ
अपनी पैदाइश को
قَالَ
उसने कहा
مَن
कौन
يُحْىِ
ज़िन्दा करेगा
ٱلْعِظَـٰمَ
हड्डियों को
وَهِىَ
जबकि वो
رَمِيمٌۭ
बोसीदा हो चुकी होंगी
और उसने हमपर फबती कसी और अपनी पैदाइश को भूल गया। कहता है, "कौन हड्डियों में जान डालेगा, जबकि वे जीर्ण-शीर्ण हो चुकी होंगी?"
तफ़्सीर:
इस काफ़िर ने सड़ी-गली हड्डियों द्वारा मरणोपरांत पुनः जीवित किए जाने के असंभव होने पर तर्क ग्रहण करके लापरवाही और अज्ञानता का सबूत दिया है। चुनाँचे वह कहने लगा : उन्हें कौन दोबारा जीवित करेगा? और स्वयं उसका अनस्तित्व से अस्तित्व में आना उससे ओझल रह गया।
आयत 79
قُلْ يُحْيِيهَا ٱلَّذِىٓ أَنشَأَهَآ أَوَّلَ مَرَّةٍۢ ۖ وَهُوَ بِكُلِّ خَلْقٍ عَلِيمٌ
قُلْ
कह दीजिए
يُحْيِيهَا
ज़िन्दा करेगा उन्हें
ٱلَّذِىٓ
वो जिसने
أَنشَأَهَآ
पैदा किया उन्हें
أَوَّلَ
पहली
مَرَّةٍۢ ۖ
बार
وَهُوَ
और वो
بِكُلِّ
हर
خَلْقٍ
पैदाइश को
عَلِيمٌ
ख़ूब जानने वाला है
कह दो, "उनमें वही जाल डालेगा जिसने उनको पहली बार पैदा किया। वह तो प्रत्येक संसृति को भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
(ऐ मुहम्मद!) आप उसका उत्तर देते हुए कह दें : इन सड़ी-गली हड्डियों को वही जीवित करेगा, जिसने उन्हें प्रथम बार पैदा किया। क्योंकि जिसने उन्हें प्रथम बार पैदा किया, वह उन्हें दोबारा जीवित करने में असमर्थ नहीं हो सकता। वह महिमावान हर प्रकार की रचना को भली-भाँति जानता है, उससे कुछ भी छिपा नहीं है।
आयत 80
ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُم مِّنَ ٱلشَّجَرِ ٱلْأَخْضَرِ نَارًۭا فَإِذَآ أَنتُم مِّنْهُ تُوقِدُونَ
ٱلَّذِى
वो जिसने
جَعَلَ
बनाया
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنَ
from
ٱلشَّجَرِ
the tree
ٱلْأَخْضَرِ
सरसबज़ दरख़्त से
نَارًۭا
आग को
فَإِذَآ
तो यकायक
أَنتُم
तुम
مِّنْهُ
उससे
تُوقِدُونَ
तुम आग जलाते हो
वही है जिसने तुम्हारे लिए हरे-भरे वृक्ष से आग पैदा कर दी। तो लगे हो तुम उससे जलाने।"
तफ़्सीर:
जिसने (ऐ लोगो!) तुम्हारे लिए नम हरे पेड़ से आग पैदा की, जिसे तुम उससे निकालते हो। फिर तुम उससे आग जलाते हो। तो जिसने दो विपरीत चीज़ों (हरे पेड़ के पानी की नमी और उसमें जलती आग) को मिला दिया, वह मृत लोगों को पुनर्जीवित करने में सक्षम है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह की नेमतों (मवेशी) और इंसान की तख्लीक की मिसाल का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि जो अल्लाह इंसान को पहली बार बना सकता है, वह उसे दोबारा भी ज़िंदा कर सकता है, इस पर यकीन रखना चाहिए।
आयत 81
أَوَلَيْسَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ بِقَـٰدِرٍ عَلَىٰٓ أَن يَخْلُقَ مِثْلَهُم ۚ بَلَىٰ وَهُوَ ٱلْخَلَّـٰقُ ٱلْعَلِيمُ
أَوَلَيْسَ
क्या भला नहीं है
ٱلَّذِى
वो जिसने
خَلَقَ
पैदा किया
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
بِقَـٰدِرٍ
क़ादिर
عَلَىٰٓ
इस (बात) पर
أَن
कि
يَخْلُقَ
वो पैदा करे
مِثْلَهُم ۚ
उनकी मानिन्द
بَلَىٰ
क्यों नहीं
وَهُوَ
और वो
ٱلْخَلَّـٰقُ
सब कुछ पैदा करने वाला हैं
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब जानने वाला है
क्या जिसने आकाशों और धरती को पैदा किया उसे इसकी सामर्थ्य नहीं कि उन जैसों को पैदा कर दे? क्यों नहीं, जबकि वह महान स्रष्टा , अत्यन्त ज्ञानवान है
तफ़्सीर:
क्या जिस (अल्लाह) ने इन भव्य आकाशों और विशाल धरती को पैदा किया, वह मृतकों को उन्हें मृत्यु देने के बाद पुनर्जीवित करने में सक्षम नहीं है? क्यों नही, वह ऐसा करने में अवश्य सक्षम है। वह तो सब कुछ पैदा करने वाला है, जिसने सभी प्राणियों को पेदा किया, वह उन्हें भली-भाँति जानने वाला है। अतः उनकी कोई भी चीज़ उससे छिपी नहीं है।
आयत 82
إِنَّمَآ أَمْرُهُۥٓ إِذَآ أَرَادَ شَيْـًٔا أَن يَقُولَ لَهُۥ كُن فَيَكُونُ
إِنَّمَآ
बेशक
أَمْرُهُۥٓ
काम उसका
إِذَآ
जब
أَرَادَ
वो इरादा करता है
شَيْـًٔا
किसी चीज़ का
أَن
ये कि
يَقُولَ
वो कहता है
لَهُۥ
उसे
كُن
हो जा
فَيَكُونُ
तो वो हो जाती है
उसका मामला तो बस यह है कि जब वह किसी चीज़ (के पैदा करने) का इरादा करता है तो उससे कहता है, "हो जा!" और वह हो जाती है
तफ़्सीर:
अल्लाह सर्वशक्तिमान का मामला तो केवल यह है कि जब वह किसी चीज़ को अस्तित्व में लाने का इरादा करता है, तो उससे कहता है 'हो जा', तो वह चीज़ जिसे वह चाहता है अस्तित्व में आ जाती है। और इसी में से उसका जीवित करने, मारने और मरणोपरांत पुनर्जीवित करके उठाने आदि का इरादा करना भी है।
आयत 83
فَسُبْحَـٰنَ ٱلَّذِى بِيَدِهِۦ مَلَكُوتُ كُلِّ شَىْءٍۢ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
فَسُبْحَـٰنَ
पस पाक है
ٱلَّذِى
वो जो
بِيَدِهِۦ
हाथ में जिसके
مَلَكُوتُ
बादशाहत है
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ की
وَإِلَيْهِ
और तरफ़ उसीके
تُرْجَعُونَ
तुम लौटाए जाओगे
अतः महिमा है उसकी, जिसके हाथ में हर चीज़ का पूरा अधिकार है। और उसी की ओर तुम लौटकर जाओगे
तफ़्सीर:
अल्लाह उस विवशता से विहीन और पवित्र है, जिसकी निसबत मुश्रिक लोग उसकी ओर करते हैं। क्योंकि उसी के पास सभी चीजों का अधिकार है, वह अपनी इच्छा के अनुसार उनमें व्यवहार करता है। उसी के हाथ में हर चीज़ की चाबियाँ हैं। तथा आखिरत में तुम उसी की ओर लौटाए जाओगे, जहाँ वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों का बदला देगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह के हुक्म कुन (हो जा) की कुदरत के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह के लिए कोई भी काम मुश्किल नहीं, उसका हुक्म होते ही चीज़ें वजूद में आ जाती हैं।
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