सूरह अस-साफ़्फ़ात سورة الصافات
मक्की 182 आयतें
नाम का मतलब
सफ बांधने वाले (फरिश्तों के सफ बांधकर खड़े होने के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अस-साफ्फात में फरिश्तों की सफबंदी, इब्राहीम अलैहिस्सलाम की अपने बेटे की कुर्बानी का वाकिया और कई नबियों (नूह, इब्राहीम, इस्हाक़, मूसा, हारून, इलियास, लूत, यूनुस) का ज़िक्र है।
फ़ज़ीलत / सार
इसमें इब्राहीम अलैहिस्सलाम की अल्लाह की राह में सबसे बड़ी कुर्बानी की तैयारी का ज़िक्र है, जो ईद-उल-अज़हा की बुनियाद है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلصَّـٰٓفَّـٰتِ صَفًّۭا
وَٱلصَّـٰٓفَّـٰتِ
क़सम है सफ़ बाँधने वालों की
صَفًّۭا
ख़ूब सफ़ बाँधना
गवाह है परा जमाकर पंक्तिबद्ध होनेवाले;
तफ़्सीर:
मैं उन फ़रिश्तों की क़सम खाता हूँ जो अपनी इबादत में एक दूसरे से मिलकर पंक्तिबद्ध खड़े होते हैं।
आयत 2
فَٱلزَّٰجِرَٰتِ زَجْرًۭا
فَٱلزَّٰجِرَٰتِ
फिर डाँटने वालों की
زَجْرًۭا
सख़्त डाँटना
फिर डाँटनेवाले;
तफ़्सीर:
और मैं उन फ़रिश्तों की क़सम खाता हूँ, जो बादलों को डाँटते हैं और उन्हें हाँक कर वहाँ ले जाते हैं, जहाँ अल्लाह उन्हें बरसाना चाहाता है।
आयत 3
فَٱلتَّـٰلِيَـٰتِ ذِكْرًا
فَٱلتَّـٰلِيَـٰتِ
फिर तिलावत करने वालों की
ذِكْرًا
ज़िक्र (क़ुरान) की
फिर यह ज़िक्र करनेवाले
तफ़्सीर:
तथा मैं उन फ़रिश्तों की क़सम खाता हूँ, जो अल्लाह की वाणी की तिलावत करते हैं।
आयत 4
إِنَّ إِلَـٰهَكُمْ لَوَٰحِدٌۭ
إِنَّ
बेशक
إِلَـٰهَكُمْ
इलाह तुम्हारा
لَوَٰحِدٌۭ
यक़ीनन एक ही है
कि तुम्हारा पूज्य-प्रभु अकेला है।
तफ़्सीर:
निःसंदेह (ऐ लोगो!) तुम्हारा सत्य पूज्य निश्चय एक ही है, जिसका कोई साझी नहीं और वह अल्लाह है।
आयत 5
رَّبُّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا وَرَبُّ ٱلْمَشَـٰرِقِ
رَّبُّ
रब
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन का
وَمَا
और जो
بَيْنَهُمَا
दर्मियान है उन दोनों के
وَرَبُّ
और रब
ٱلْمَشَـٰرِقِ
मशरिक़ों का
वह आकाशों और धरती और जो कुछ उनके बीच है सबका रब है और पूर्व दिशाओं का भी रब है
तफ़्सीर:
वह आकाशों का स्वामी, धरती का स्वामी और उन दोनों के बीच मौजूद सभी चीज़ों का स्वामी है, तथा सूर्य का स्वामी है उसके साल भर उदय होने और यास्त होने के स्थानों में।
आयत 6
إِنَّا زَيَّنَّا ٱلسَّمَآءَ ٱلدُّنْيَا بِزِينَةٍ ٱلْكَوَاكِبِ
إِنَّا
बेशक हम
زَيَّنَّا
मुज़य्यन किया हमने
ٱلسَّمَآءَ
आसमाने
ٱلدُّنْيَا
दुनिया को
بِزِينَةٍ
ज़ीनत से
ٱلْكَوَاكِبِ
सितारों की
हमने दुनिया के आकाश को सजावट अर्थात तारों से सुसज्जित किया, (रात में मुसाफ़िरों को मार्ग दिखाने के लिए)
तफ़्सीर:
हमने पृथ्वी के निकटतम आकाश को एक सुंदर सजावट के साथ सुशोभित किया है, जो कि वे सितारे हैं जो देखने में चमचमाते रत्नों की तरह हैं।
आयत 7
وَحِفْظًۭا مِّن كُلِّ شَيْطَـٰنٍۢ مَّارِدٍۢ
وَحِفْظًۭا
और हिफ़ाज़त के लिए
مِّن
against
كُلِّ
every
شَيْطَـٰنٍۢ
हर शैतान से
مَّارِدٍۢ
जो सरकश है
और प्रत्येक सरकश शैतान से सुरक्षित रखने के लिए
तफ़्सीर:
तथा हमने निचले आकाश को अल्लाह की आज्ञाकारिता से निकल जाने वाले हर विद्रोही शैतान से सितारों के साथ सुरक्षित किया है। चुनाँचे उसे तारों के द्वारा मारा जाता है।
आयत 8
لَّا يَسَّمَّعُونَ إِلَى ٱلْمَلَإِ ٱلْأَعْلَىٰ وَيُقْذَفُونَ مِن كُلِّ جَانِبٍۢ
لَّا
Not
يَسَّمَّعُونَ
नहीं वो कान लगाकर सुन सकते
إِلَى
to
ٱلْمَلَإِ
the assembly
ٱلْأَعْلَىٰ
तरफ़ मलाए आला/मुक़र्रिब फ़रिश्तों के
وَيُقْذَفُونَ
और वो फेंके जाते हैं
مِن
from
كُلِّ
every
جَانِبٍۢ
हर तरफ़ से
वे (शैतान) "मलए आला" की ओर कान नहीं लगा पाते और हर ओर से फेंक मारे जाते है भगाने-धुतकारने के लिए।
तफ़्सीर:
ये शैतान आसमान में मौजूद फ़रिश्तों की बात नहीं सुन सकते, जब वे उस बारे में बात करते हैं जो उनका पालनहार अपने विधान या अपनी नियति से संबंधित उनकी ओर वह़्य करता है, और उन्हें हर तरफ़ से उल्काओं (आग के दहकते हुए अंगारों) के द्वारा मारा जाता है।
आयत 9
دُحُورًۭا ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌۭ وَاصِبٌ
دُحُورًۭا ۖ
भगाने के लिए
وَلَهُمْ
और उनके लिए
عَذَابٌۭ
अज़ाब है
وَاصِبٌ
मुसलसल
और उनके लिए अनवरत यातना है
तफ़्सीर:
उन्हें फ़रिश्तों की बात सुनने से भगाने और दूर रखने के लिए। तथा उनके लिए आखिरत में दर्दनाक स्थायी यातना है, जो कभी खत्म नहीं होगी।
आयत 10
إِلَّا مَنْ خَطِفَ ٱلْخَطْفَةَ فَأَتْبَعَهُۥ شِهَابٌۭ ثَاقِبٌۭ
إِلَّا
मगर
مَنْ
जो कोई
خَطِفَ
उचक ले जाए
ٱلْخَطْفَةَ
उचक ले जाना
فَأَتْبَعَهُۥ
तो पीछा करता है उसका
شِهَابٌۭ
एक शोला
ثَاقِبٌۭ
चमकता हुआ
किन्तु यह और बात है कि कोई कुछ उचक ले, इस दशा में एक तेज़ दहकती उल्का उसका पीछा करती है
तफ़्सीर:
परंतु यह कि कोई शैतान अचानक किसी बात को उचक ले जाए। जो कि वह बात होती है, जिसके विषय में फ़रिश्ते आपस में बातचीत करते हैं और उनके बीच उसकी चर्चा होती है और उसकी जानकारी धरती के लोगों तक नहीं पहुँची होती है। तो ऐसी स्थिति में एक उज्ज्वल उल्का उसका पीछा करता है और उसे जला देता है। कभी तो वह शैतान उल्का के द्वारा जलाए जाने से पहले उस बात को अपने भाइयों तक पहुँचा देता है। फिर वह बात काहिनों तक पहुँच जाती है, जो उसमें सौ झूठ मिला देते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
फरिश्तों की सफबंदी और शैतानों से आसमान की हिफाज़त का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह की कायनात एक मुकम्मल निज़ाम और हिफाज़त के तहत चल रही है।
आयत 11
فَٱسْتَفْتِهِمْ أَهُمْ أَشَدُّ خَلْقًا أَم مَّنْ خَلَقْنَآ ۚ إِنَّا خَلَقْنَـٰهُم مِّن طِينٍۢ لَّازِبٍۭ
فَٱسْتَفْتِهِمْ
पस पूछ लीजिए उनसे
أَهُمْ
क्या वो
أَشَدُّ
ज़्यादा सख़्त हैं
خَلْقًا
पैदाइश में
أَم
या
مَّنْ
जिसे
خَلَقْنَآ ۚ
पैदा किया हमने
إِنَّا
बेशक हम
خَلَقْنَـٰهُم
पैदा किया हमने उन्हें
مِّن
from
طِينٍۢ
मिट्टी से
لَّازِبٍۭ
चिपकने वाली
अब उनके पूछो कि उनके पैदा करने का काम अधिक कठिन है या उन चीज़ों का, जो हमने पैदा कर रखी है। निस्संदेह हमने उनको लेसकर मिट्टी से पैदा किया।
तफ़्सीर:
अतः (ऐ मुहम्मद!) मरणोपरांत पुनः उठाए जाने का इनकार करने वाले इन काफ़िरों से पूछें कि क्या वे हमारी पैदा की हुई रचनाओं जैसे आकाशों, धरती और फ़रिश्तों आदि से भी अधिक कठिन रचना वाले, शक्तिशाली शरीर वाले और बड़े-बड़े अंगों वाले हैं? निःसंदेह हमने उन्हें चिपचिपी मिट्टी से पैदा किया है। तो फिर वे मरणोपरांत पुनर्जीवित किए जाने का इनकार कैसे करते हैं, जबकि वे एक कमज़ोर चीज़ अर्थात् चिपकने वाली मिट्टी से पैदा किए गए हैं?
आयत 12
بَلْ عَجِبْتَ وَيَسْخَرُونَ
بَلْ
बल्कि
عَجِبْتَ
ताअज्जुब किया आपने
وَيَسْخَرُونَ
और वो मज़ाक़ उड़ाते हैं
बल्कि तुम तो आश्चर्य में हो और वे है कि परिहास कर रहे है
तफ़्सीर:
बल्कि (ऐ मुहम्मद!) आपको अल्लाह के सामर्थ्य और उसके अपनी रचना के मामलों का प्रबंधन करने पर आश्चर्य हो रहा है, तथा आपको मुश्रिकों के मरणोपरांत पुनर्जीवित किए जाने का इनकार करने पर आश्चर्य होता है, और इन मुश्रिकों का हाल यह है कि वे मरणोपरांत पुनर्जीवित किए जाने को झुठलाने की तीव्रता से, उसके बारे में आप जो कुछ कहते हैं, उसका मज़ाक उड़ाते हैं।
आयत 13
وَإِذَا ذُكِّرُوا۟ لَا يَذْكُرُونَ
وَإِذَا
और जब
ذُكِّرُوا۟
वो नसीहत किए जाते हैं
لَا
not
يَذْكُرُونَ
नहीं वो नसीहत पकड़ते
और जब उन्हें याद दिलाया जाता है, तो वे याद नहीं करते,
तफ़्सीर:
और जब इन बहुदेववादियों को कोई उपदेश दिया जाता है, तो वे अपने दिलों की कठोरता के कारण उससे उपदेश ग्रहण नहीं करते और उससे लाभ नहीं उठाते।
आयत 14
وَإِذَا رَأَوْا۟ ءَايَةًۭ يَسْتَسْخِرُونَ
وَإِذَا
और जब
رَأَوْا۟
वो देखते हैं
ءَايَةًۭ
कोई निशानी
يَسْتَسْخِرُونَ
तो ख़ूब मज़ाक़ उड़ाते हैं
और जब कोई निशानी देखते है तो हँसी उड़ाते है
तफ़्सीर:
और जब वे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की कोई निशानी देखते हैं, जो आपके सच्चे होने को दर्शाती है, तो उसका खूब मज़ाक़ उड़ाते हैं और उस पर आश्चर्य प्रकट करते हैं।
आयत 15
وَقَالُوٓا۟ إِنْ هَـٰذَآ إِلَّا سِحْرٌۭ مُّبِينٌ
وَقَالُوٓا۟
और कहते हैं
إِنْ
नहीं है
هَـٰذَآ
ये
إِلَّا
मगर
سِحْرٌۭ
एक जादू
مُّبِينٌ
खुल्लम-खुल्ला
और कहते है, "यह तो बस एक प्रत्यक्ष जादू है
तफ़्सीर:
तथा वे कहते हैं : मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जो कुछ लेकर आए हैं, वह स्पष्ट जादू के अलावा कुछ नहीं है।
आयत 16
أَءِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًۭا وَعِظَـٰمًا أَءِنَّا لَمَبْعُوثُونَ
أَءِذَا
क्या जब
مِتْنَا
मर जाऐंगे हम
وَكُنَّا
और हो जाऐंगे हम
تُرَابًۭا
मिट्टी
وَعِظَـٰمًا
और हड्डियाँ
أَءِنَّا
क्या बेशक हम
لَمَبْعُوثُونَ
अलबत्ता दोबारा उठाए जाऐंगे
क्या जब हम मर चुके होंगे और मिट्टी और हड्डियाँ होकर रह जाएँगे, तो क्या फिर हम उठाए जाएँगे?
तफ़्सीर:
क्या जब हम मर गए और मिट्टी तथा सड़ी-गली हड्डियाँ हो गए, तो क्या उसके बाद भी हम पुनर्जीवित करके अवश्य उठाए जाएँगे?! इसकी संभावना तो नहीं है।
आयत 17
أَوَءَابَآؤُنَا ٱلْأَوَّلُونَ
أَوَءَابَآؤُنَا
क्या भला आबा ओ अजदाद हमारे
ٱلْأَوَّلُونَ
जो पहले (गुज़र चुके)
क्या और हमारे पहले के बाप-दादा भी?"
तफ़्सीर:
और क्या हमारे पहले बाप-दादा भी दोबारा उठाए जाएँगे, जो हमसे पहले मर चुके हैं?!
आयत 18
قُلْ نَعَمْ وَأَنتُمْ دَٰخِرُونَ
قُلْ
कह दीजिए
نَعَمْ
हाँ
وَأَنتُمْ
और तुम
دَٰخِرُونَ
ज़लील व ख़्वार होने वाले हो
कह दो, "हाँ! और तुम अपमानित भी होंगे।"
तफ़्सीर:
(ऐ मुहम्मद!) आप उन्हें जवाब देते हुए कह दीजिए : हाँ, तुम मिट्टी और सड़ी-गली हड्डियाँ होने के बाद भी उठाए जाओगे और तुम्हारे पहले बाप-दादा भी उठाए जाएँगे। तुम सभी को इस हाल में उठाया जाएगा कि तुम तुच्छ और अपमानित होगे।
आयत 19
فَإِنَّمَا هِىَ زَجْرَةٌۭ وَٰحِدَةٌۭ فَإِذَا هُمْ يَنظُرُونَ
فَإِنَّمَا
तो बेशक
هِىَ
वो
زَجْرَةٌۭ
डाँट होगी
وَٰحِدَةٌۭ
एक ही
فَإِذَا
तो यकायक
هُمْ
वो
يَنظُرُونَ
वो देख रहे होंगे
वह तो बस एक झिड़की होगी। फिर क्या देखेंगे कि वे ताकने लगे है
तफ़्सीर:
वह तो मात्र सूर (नरसिंघा) में मारी जाने वाली एक फूँक (दूसरी फूँक) होगी, तो अचानक वे सभी लोग क़ियामत के दिन के भयावह दृृश्यों को देख रहे होंगे और इस बात की प्रतीक्षा कर रहे होंगे कि अल्लाह उनके साथ क्या करने वाला है।
आयत 20
وَقَالُوا۟ يَـٰوَيْلَنَا هَـٰذَا يَوْمُ ٱلدِّينِ
وَقَالُوا۟
और वो कहेंगे
يَـٰوَيْلَنَا
हाय अफ़सोस हम पर
هَـٰذَا
ये है
يَوْمُ
दिन
ٱلدِّينِ
बदले का
और वे कहेंगे, "ऐ अफ़सोस हमपर! यह तो बदले का दिन है।"
तफ़्सीर:
तथा मरणोपरांत पुनर्जीवन को झुठलाने वाले अनेकेश्वरवादी कहेंगे : हाय हमारा विनाश! यह तो बदले का दिन है, जिसमें अल्लाह अपने बंदों को उनके दुनिया के जीवन में किए हुए कार्यों का बदला देगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के इनकार करने वालों को जवाब दिया गया है। यह सबक हमें सिखाता है कि कयामत का इनकार करने वालों को खुद अपनी पैदाइश पर गौर करना चाहिए, जो उनके दोबारा उठाए जाने का सुबूत है।
आयत 21
هَـٰذَا يَوْمُ ٱلْفَصْلِ ٱلَّذِى كُنتُم بِهِۦ تُكَذِّبُونَ
هَـٰذَا
ये है
يَوْمُ
दिन
ٱلْفَصْلِ
फ़ैसले का
ٱلَّذِى
वो जो
كُنتُم
थे तुम
بِهِۦ
उसे
تُكَذِّبُونَ
तुम झुठलाया करते
यह वही फ़ैसले का दिन है जिसे तुम झुठलाते रहे हो
तफ़्सीर:
तो उनसे कहा जाएगा : यह बंदों के बीच निर्णय का वही दिन है, जिसका तुम दुनिया में इनकार किया करते थे और उसे झुठलाया करते थे।
आयत 22
۞ ٱحْشُرُوا۟ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ وَأَزْوَٰجَهُمْ وَمَا كَانُوا۟ يَعْبُدُونَ
۞ ٱحْشُرُوا۟
इकट्ठा करो
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
وَأَزْوَٰجَهُمْ
और उनके साथियों को
وَمَا
और उन्हें जिनकी
كَانُوا۟
थे वो
يَعْبُدُونَ
वो इबादत करते
(कहा जाएगा) "एकत्र करो उन लोगों को जिन्होंने ज़ुल्म किया और उनके जोड़ीदारों को भी और उनको भी जिनकी अल्लाह से हटकर वे बन्दगी करते रहे है।
तफ़्सीर:
उस दिन फ़रिश्तों से कहा जाएगा : उन बहुदेववादियों को इकट्ठा करो, जो शिर्क के द्वारा अपने आप पर ज़ुल्म करने वाले हैं, उन्हें तथा उनके जैसे अन्य शिर्क करने वालों और झुठलाने में उनका साथ देने वालों को, तथा उन मूर्तियों को भी, जिनकी वे अल्लाह को छोड़कर पूजा किया करते थे। फिर उन्हें जहन्नम का रास्ता दिखा दो और उसकी ओर हाँककर ले जाओ। क्योंकि वही उनका ठिकाना है।
आयत 23
مِن دُونِ ٱللَّهِ فَٱهْدُوهُمْ إِلَىٰ صِرَٰطِ ٱلْجَحِيمِ
مِن
Besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
فَٱهْدُوهُمْ
पस राह दिखाओ उन्हें
إِلَىٰ
to
صِرَٰطِ
तरफ़ रास्ते
ٱلْجَحِيمِ
जहन्नम के
फिर उन सबको भड़कती हुई आग की राह दिखाओ!"
तफ़्सीर:
उस दिन फ़रिश्तों से कहा जाएगा : उन बहुदेववादियों को इकट्ठा करो, जो शिर्क के द्वारा अपने आप पर ज़ुल्म करने वाले हैं, उन्हें तथा उनके जैसे अन्य शिर्क करने वालों और झुठलाने में उनका साथ देने वालों को, तथा उन मूर्तियों को भी, जिनकी वे अल्लाह को छोड़कर पूजा किया करते थे। फिर उन्हें जहन्नम का रास्ता दिखा दो और उसकी ओर हाँककर ले जाओ। क्योंकि वही उनका ठिकाना है।
आयत 24
وَقِفُوهُمْ ۖ إِنَّهُم مَّسْـُٔولُونَ
وَقِفُوهُمْ ۖ
ठहराओ उन्हें
إِنَّهُم
बेशक वो
مَّسْـُٔولُونَ
सवाल किए जाने वाले हैं
और तनिक उन्हें ठहराओ, उनसे पूछना है,
तफ़्सीर:
और उन्हें जहन्नम में दाखिल करने से पहले हिसाब के लिए रोको। क्योंकि उनसे पूछताछ की जानी है। फिर उसके बाद उन्हें जहन्नम की ओर हाँककर ले जाओ।
आयत 25
مَا لَكُمْ لَا تَنَاصَرُونَ
مَا
क्या है
لَكُمْ
तुम्हें
لَا
नहीं
تَنَاصَرُونَ
तुम एक दूसरे की मदद करते
"तुम्हें क्या हो गया, जो तुम एक-दूसरे की सहायता नहीं कर रहे हो?"
तफ़्सीर:
उन्हें फटकारते हुए कहा जाएगा : तुम्हें क्या हो गया कि तुम एक-दूसरे की मदद नहीं करते, जिस तरह कि तुम दुनिया में एक-दूसरे की मदद किया करते थे और यह दावा करते थे कि तुम्हारी मूर्तियाँ तुम्हारी मदद करेंगी?!
आयत 26
بَلْ هُمُ ٱلْيَوْمَ مُسْتَسْلِمُونَ
بَلْ
बल्कि
هُمُ
वो
ٱلْيَوْمَ
आज के दिन
مُسْتَسْلِمُونَ
फ़रमाबरदार हैं
बल्कि वे तो आज बड़े आज्ञाकारी हो गए है
तफ़्सीर:
बल्कि, आज वे अल्लाह के आदेश के प्रति आज्ञाकारी और विनीत हैं। वे अपनी लाचारी और उपाय की कमी के कारण एक-दूसरे का समर्थन नहीं कर रहे हैं।
आयत 27
وَأَقْبَلَ بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍۢ يَتَسَآءَلُونَ
وَأَقْبَلَ
और मुतावज्जे होंगे
بَعْضُهُمْ
बाज़ उनके
عَلَىٰ
to
بَعْضٍۢ
बाज़ पर
يَتَسَآءَلُونَ
वो एक दूसरे से सवाल करेंगे
वे एक-दूसरे की ओर रुख़ करके पूछते हुए कहेंगे,
तफ़्सीर:
और वे एक-दूसरे को संबोधित करके आपस में बुरा-भला कहेंगे और झगड़ा करेंगे, जबकि उस दिन एक-दूसरे को बुरा-भला कहने और आपस में झगड़ा करने से कुछ लाभ नहीं होगा।
आयत 28
قَالُوٓا۟ إِنَّكُمْ كُنتُمْ تَأْتُونَنَا عَنِ ٱلْيَمِينِ
قَالُوٓا۟
वो कहेंगे
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
كُنتُمْ
थे तुम
تَأْتُونَنَا
आते तुम हमारे पास
عَنِ
from
ٱلْيَمِينِ
दाऐं जानिब से
"तुम तो हमारे पास आते थे दाहिने से (और बाएँ से)"
तफ़्सीर:
उस दिन अनुयायी उन लोगों से जिनका वे अनुसरण किया करते थे, कहेंगे : (ऐ हमारे प्रमुखो!) तुम हमारे पास धर्म और सत्य का चोला पहनकर आते थे और हमारे लिए अल्लाह के साथ कुफ़्र एवं शिर्क और पाप करने को सुंदर बनाकर पेश करते थे और हमें उस सत्य से घृणित कर देते थे, जो रसूलगण अल्लाह के पास से लाए थे।
आयत 29
قَالُوا۟ بَل لَّمْ تَكُونُوا۟ مُؤْمِنِينَ
قَالُوا۟
कहेंगे
بَل
बल्कि
لَّمْ
ना
تَكُونُوا۟
थे तुम
مُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
वे कहेंगे, "नहीं, बल्कि तुम स्वयं ही ईमानवाले न थे
तफ़्सीर:
जिन लोगों का अनुसरण किया गया था, वे अनुसरण करने वालों से कहेंगे : मामला ऐसा नहीं है - जैसा तुमने दावा किया है - सच्चाई यह है कि तुम कुफ़्र पर थे, तुम ईमान लाने वाले नहीं थे। बल्कि, तुम इनकार करने वाले थे।
आयत 30
وَمَا كَانَ لَنَا عَلَيْكُم مِّن سُلْطَـٰنٍۭ ۖ بَلْ كُنتُمْ قَوْمًۭا طَـٰغِينَ
وَمَا
और ना
كَانَ
था
لَنَا
हमारे लिए
عَلَيْكُم
तुम पर
مِّن
any
سُلْطَـٰنٍۭ ۖ
कोई ज़ोर
بَلْ
बल्कि
كُنتُمْ
थे तुम
قَوْمًۭا
एक क़ौम
طَـٰغِينَ
सरकश
और हमारा तो तुमपर कोई ज़ोर न था, बल्कि तुम स्वयं ही सरकश लोग थे
तफ़्सीर:
ऐ अनुयायियो! हमारा तुम पर कोई ज़ोर नहीं चलता था कि हम तुम्हें कुफ़्र, शिर्क और गुनाह की राह में ज़बरदस्ती डाल देते। बल्कि तुम खुद ही कुफ़्र और गुमराही में सीमा पार करने वाले थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन गुमराह करने और गुमराह होने वालों के मुकालमे का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि गलत सोहबत और गुमराह करने वालों का साथ आखिरत में एक-दूसरे को फायदा नहीं पहुंचाएगा।
आयत 31
فَحَقَّ عَلَيْنَا قَوْلُ رَبِّنَآ ۖ إِنَّا لَذَآئِقُونَ
فَحَقَّ
तो सच होगई
عَلَيْنَا
तुम पर
قَوْلُ
बात
رَبِّنَآ ۖ
हमारे रब की
إِنَّا
बेशक हम
لَذَآئِقُونَ
अलबत्ता चखने वाले हैं
अन्ततः हमपर हमारे रब की बात सत्यापित होकर रही। निस्संदेह हमें (अपनी करतूत का) मजा़ चखना ही होगा
तफ़्सीर:
तो हम पर और तुम पर अल्लाह का वह वादा सिद्ध हो गया, जो उसने अपने इस कथन में किया था : ﴾لأَمْلأَنَّ جَهَنَّمَ مِنْكَ وَمِمَّنْ تَبِعَكَ مِنْهُمْ أَجْمَعِينَ﴿ ''निश्चय मैं जहन्नम को तुझसे और उन तमाम लोगों से भर दूँगा, जो उनमें से तेरा अनुसरण करेंगे।'' [सूरत साद : 85] अतः हम - अनिवार्य रूप से - वह यातना चखनने वाले हैं, जिसका हमारे पालनहार ने वादा किया था।
आयत 32
فَأَغْوَيْنَـٰكُمْ إِنَّا كُنَّا غَـٰوِينَ
فَأَغْوَيْنَـٰكُمْ
तो बहकाया हमने तुम्हें
إِنَّا
बेशक हम
كُنَّا
थे हम ही
غَـٰوِينَ
बहके हुए
सो हमने तुम्हे बहकाया। निश्चय ही हम स्वयं बहके हुए थे।"
तफ़्सीर:
इसलिए हमने तुम्हें गुमराही और कुफ़्र की ओर बुलाया। क्योंकि हम ख़ुद हिदायत की राह से भटके हुए थे।
आयत 33
فَإِنَّهُمْ يَوْمَئِذٍۢ فِى ٱلْعَذَابِ مُشْتَرِكُونَ
فَإِنَّهُمْ
तो बेशक वो
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
فِى
in
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब में
مُشْتَرِكُونَ
बाहम शरीक होंगे
अतः वे सब उस दिन यातना में एक-दूसरे के सह-भागी होंगे
तफ़्सीर:
क़ियामत के दिन अनुसरण करने वाले और जिनका वे अनुसरण करते थे, सब के सब यातना में सहभागी होंगे।
आयत 34
إِنَّا كَذَٰلِكَ نَفْعَلُ بِٱلْمُجْرِمِينَ
إِنَّا
बेशक हम
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نَفْعَلُ
हम करेंगे
بِٱلْمُجْرِمِينَ
साथ मुजरिमों के
हम अपराधियों के साथ ऐसा ही किया करते है
तफ़्सीर:
वास्तव में, जैसा हमने इन लोगों के साथ किया है कि उन्हें यातना चखाई है, वैसे ही हम दूसरे अपराधियों के साथ भी करते हैं।
आयत 35
إِنَّهُمْ كَانُوٓا۟ إِذَا قِيلَ لَهُمْ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا ٱللَّهُ يَسْتَكْبِرُونَ
إِنَّهُمْ
बेशक वो
كَانُوٓا۟
थे वो
إِذَا
जब
قِيلَ
कहा जाता
لَهُمْ
उनसे
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़ )
إِلَّا
सिवाए
ٱللَّهُ
अल्लाह के
يَسْتَكْبِرُونَ
वो तकब्बुर करते थे
उनका हाल यह था कि जब उनसे कहा जाता कि "अल्लाह के सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं हैं।" तो वे घमंड में आ जाते थे
तफ़्सीर:
इन मुश्रिकों से जब दुनिया में कहा जाता था कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं, ताकि उसकी अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करें और उसके विपरीत चीज़ों को छोड़ दें, तो वे सत्य से अभिमान और घमंड करते हुए उसे क़बूल करने और मानने से इनकार कर देते थे।
आयत 36
وَيَقُولُونَ أَئِنَّا لَتَارِكُوٓا۟ ءَالِهَتِنَا لِشَاعِرٍۢ مَّجْنُونٍۭ
وَيَقُولُونَ
और वो कहते
أَئِنَّا
क्या बेशक हम
لَتَارِكُوٓا۟
अलबत्ता छोड़ देने वाले हैं
ءَالِهَتِنَا
अपने माबूदों को
لِشَاعِرٍۢ
वास्ते एक शायर
مَّجْنُونٍۭ
मजनून के
और कहते थे, "क्या हम एक उन्मादी कवि के लिए अपने उपास्यों को छोड़ दें?"
तफ़्सीर:
और वे अपने कुफ़्र के लिए तर्क देते हुए कहते थे : क्या हम अपने देवताओं की पूजा एक दीवाने कवि के कहने पर छोड़ दें?! ऐसा कहने से उनका तात्पर्य अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम थे।
आयत 37
بَلْ جَآءَ بِٱلْحَقِّ وَصَدَّقَ ٱلْمُرْسَلِينَ
بَلْ
बल्कि
جَآءَ
वो लाया है
بِٱلْحَقِّ
हक़ को
وَصَدَّقَ
और उसने तस्दीक़ की
ٱلْمُرْسَلِينَ
रसूलों की
"नहीं, बल्कि वह सत्य लेकर आया है और वह (पिछले) रसूलों की पुष्टि॥ में है।
तफ़्सीर:
वास्तव में, उन्होंने बहुत बड़ा झूठा आरोप लगाया है। क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दीवाने या कवि नहीं थे। बल्कि आप वह क़ुरआन लेकर आए हैं, जो अल्लाह को एक मानने (एकेश्वरवाद) और उसके रसूल का अनुसरण करने का आह्वान करता है। तथा रसूलगण अल्लाह के पास से जो तौहीद (एकेश्वरवाद) और आख़िरत का प्रमाण लेकर आए थे, उसमें उनकी पुष्टि की है और किसी भी चीज़ में उनका विरोध नहीं किया है।
आयत 38
إِنَّكُمْ لَذَآئِقُوا۟ ٱلْعَذَابِ ٱلْأَلِيمِ
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
لَذَآئِقُوا۟
अलबत्ता तुम चखने वाले हो
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब
ٱلْأَلِيمِ
दर्दनाक को
निश्चय ही तुम दुखद यातना का मज़ा चखोगे। -
तफ़्सीर:
(ऐ मुश्रिको!) तुम निश्चय अपने कुफ़्र और रसूलों को झुठलाने के कारण क़ियामत के दिन दर्दनाक यातना चखने वाले हो।
आयत 39
وَمَا تُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
وَمَا
और नहीं
تُجْزَوْنَ
तुम बदला दिए जाओगे
إِلَّا
मगर
مَا
जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते
"तुम बदला वही तो पाओगे जो तुम करते हो।"
तफ़्सीर:
(ऐ मुश्रिको!) तुम्हें केवल उसी का बदला दिया जाएगा, जो तुम दुनिया में अल्लाह के साथ कुफ़्र और गुनाह के कार्य किया करते थे।
आयत 40
إِلَّا عِبَادَ ٱللَّهِ ٱلْمُخْلَصِينَ
إِلَّا
सिवाए
عِبَادَ
बन्दे
ٱللَّهِ
अल्लाह के
ٱلْمُخْلَصِينَ
जो ख़ालिस किए हुए हैं
अलबत्ता अल्लाह के उन बन्दों की बात और है, जिनको उसने चुन लिया है
तफ़्सीर:
लेकिन अल्लाह के वे मोमिन बंदे, जिन्हें अल्लाह ने अपनी इबादत के लिए ख़ालिस (विशुद्ध) कर लिया है और उन्होंने खालिस अल्लाह की इबादत की है, वे इस यातना से छुटकारा पाने वाले हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जन्नतियों की नेमतों और आपस की गुफ्तगू का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि जन्नत में सच्चे दोस्त आपस में पुरानी यादें ताज़ा करेंगे, यह दुनिया की सच्ची दोस्ती की अहमियत को भी उजागर करता है।
आयत 41
أُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمْ رِزْقٌۭ مَّعْلُومٌۭ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
لَهُمْ
उनके लिए
رِزْقٌۭ
रिज़्क़ है
مَّعْلُومٌۭ
मालूम
वही लोग है जिनके लिए जानी-बूझी रोज़ी है,
तफ़्सीर:
उन ख़ालिस (विशुद्ध) किए हुए बंदों के लिए अल्लाह की ओर से प्रदान की हुई रोज़ी है, जिसका पाकीज़ा, अच्छा और स्थायी होना सर्वज्ञात है।
आयत 42
فَوَٰكِهُ ۖ وَهُم مُّكْرَمُونَ
فَوَٰكِهُ ۖ
फल हैं
وَهُم
और वो
مُّكْرَمُونَ
मोअज़्ज़िज़ होंगे
स्वादिष्ट फल।
तफ़्सीर:
वह जीविका विभिन्न प्रकार के फल हैं, जो उन सबसे अच्छी चीज़ों में से होंगे जो वे खाना चाहेंगे हैं और जिसकी वे इच्छा करेंगे। इससे बढ़कर, वे दर्जों की बुलंदी और अल्लाह के सम्मानित चेहरे को देखने की प्रतिष्ठा से सम्मानित किए गए होंगे।
आयत 43
فِى جَنَّـٰتِ ٱلنَّعِيمِ
فِى
In
جَنَّـٰتِ
बाग़ात में
ٱلنَّعِيمِ
नेमतों के
और वे नेमत भरी जन्नतों
तफ़्सीर:
यह सब उन्हें स्थायी एवं निरंतर नेमत के बागों में प्राप्त होगा, जो न कभी बाधित होगी और न समाप्त होगी।
आयत 44
عَلَىٰ سُرُرٍۢ مُّتَقَـٰبِلِينَ
عَلَىٰ
On
سُرُرٍۢ
तख़्तों पर
مُّتَقَـٰبِلِينَ
आमने सामने बैठने वाले
में सम्मानपूर्वक होंगे, तख़्तों पर आमने-सामने विराजमान होंगे;
तफ़्सीर:
वे तख़्तों पर आमने-सामने बैठे होंगे और एक-दूसरे को देख रहे होंगे।
आयत 45
يُطَافُ عَلَيْهِم بِكَأْسٍۢ مِّن مَّعِينٍۭ
يُطَافُ
फिराया जाएगा
عَلَيْهِم
उन पर
بِكَأْسٍۢ
भरा हुआ साग़र
مِّن
from
مَّعِينٍۭ
बहते हुए चश्मे से
उनके बीच विशुद्ध पेय का पात्र फिराया जाएगा,
तफ़्सीर:
उनपर ऐसी शराब के प्याले फिराए जाएँगे, जो बहते पानी की तरह साफ़ होगी।
आयत 46
بَيْضَآءَ لَذَّةٍۢ لِّلشَّـٰرِبِينَ
بَيْضَآءَ
सफ़ेद
لَذَّةٍۢ
लज़्जत का सबब
لِّلشَّـٰرِبِينَ
पीने वालों के लिए
बिलकुल साफ़, उज्जवल, पीनेवालों के लिए सर्वथा सुस्वादु
तफ़्सीर:
उसका रंग सफ़ेद होगा। जो उसे पिएगा, भरपूर आनंद उठाएगा।
आयत 47
لَا فِيهَا غَوْلٌۭ وَلَا هُمْ عَنْهَا يُنزَفُونَ
لَا
ना
فِيهَا
उसमें
غَوْلٌۭ
सर दर्द होगी
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
عَنْهَا
उससे
يُنزَفُونَ
वो अक़्ल ज़ाइल किए जाऐंगे
न उसमें कोई ख़ुमार होगा और न वे उससे निढाल और मदहोश होंगे।
तफ़्सीर:
वह दुनिया की शराब की तरह नहीं होगी। चुनाँचे उसमें ऐसा नशा नहीं होगा जो आदमी को मदहोश कर दे। तथा उसका सेवन करने वाले के सिर में दर्द नहीं होगा। बल्कि उसके पीने वाले का शरीर और उसकी बुद्धि सलामत रहेगी।
आयत 48
وَعِندَهُمْ قَـٰصِرَٰتُ ٱلطَّرْفِ عِينٌۭ
وَعِندَهُمْ
और उनके पास होंगी
قَـٰصِرَٰتُ
नीची रखने वालियाँ
ٱلطَّرْفِ
निगाहों को
عِينٌۭ
मोटी आँखों वालियाँ
और उनके पास निगाहें बचाए रखनेवाली, सुन्दर आँखोंवाली स्त्रियाँ होंगी,
तफ़्सीर:
और उनके पास जन्नत में पवित्र औरतें होंगी, जिनकी नज़रें उनके पतियों के सिवा किसी की ओर नहीं उठेंगी, तथा सुंदर आँखों वाली होंगी।
आयत 49
كَأَنَّهُنَّ بَيْضٌۭ مَّكْنُونٌۭ
كَأَنَّهُنَّ
गोया कि वो
بَيْضٌۭ
अंडे हैं
مَّكْنُونٌۭ
छुपा कर रखे गए
मानो वे सुरक्षित अंडे है
तफ़्सीर:
मानो वे पीलापन लिए हुए अपने रंगों की सफेदी में पक्षी का संरक्षित अंडा हों, जिसे हाथों ने न छुआ हो।
आयत 50
فَأَقْبَلَ بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍۢ يَتَسَآءَلُونَ
فَأَقْبَلَ
तो मुतावज्जे होंगे
بَعْضُهُمْ
बाज़ उनके
عَلَىٰ
to
بَعْضٍۢ
बाज़ पर
يَتَسَآءَلُونَ
वो एक दूसरे से सवाल करेंगे
फिर वे एक-दूसरे की ओर रुख़ करके आपस में पूछेंगे
तफ़्सीर:
फिर कुछ जन्नती दूसरे जन्नतियों से उनके अतीत और दुनिया में उनके साथ पेश आने वाले हालात के बारे में पूछेंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जन्नत की मज़ीद नेमतों का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि सब्र और नेक अमल का इनाम इतना बड़ा है कि दुनिया की मुश्किलें उसके सामने कुछ नहीं।
आयत 51
قَالَ قَآئِلٌۭ مِّنْهُمْ إِنِّى كَانَ لِى قَرِينٌۭ
قَالَ
कहेगा
قَآئِلٌۭ
एक कहने वाला
مِّنْهُمْ
उनमें से
إِنِّى
बेशक मैं
كَانَ
था
لِى
मेरा
قَرِينٌۭ
एक साथी
उनमें से एक कहनेवाला कहेगा, "मेरा एक साथी था;
तफ़्सीर:
इन ईमान वालों में से एक कहने वाला कहेगा : दुनिया में मेरा एक साथी था, जो दोबारा जीवित होकर उठने का इनकार करता था।
आयत 52
يَقُولُ أَءِنَّكَ لَمِنَ ٱلْمُصَدِّقِينَ
يَقُولُ
वो कहा करता था
أَءِنَّكَ
क्या बेशक तुम
لَمِنَ
surely of
ٱلْمُصَدِّقِينَ
अलबत्ता तस्दीक़ करने वालों में से हो
जो कहा करता था क्या तुम भी पुष्टि करनेवालों में से हो?
तफ़्सीर:
वह मुझसे इनकार करते हुए और व्यंग्यात्मक रूप से कहा करता था : क्या - ऐ मेरे दोस्त - तू भी उन लोगों में से है जो मृतकों के फिर से जीवित किए जाने में विश्वास करते हैं?
आयत 53
أَءِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًۭا وَعِظَـٰمًا أَءِنَّا لَمَدِينُونَ
أَءِذَا
क्या जब
مِتْنَا
मर जाऐंगे हम
وَكُنَّا
और हो जाऐंगे हम
تُرَابًۭا
मिट्टी
وَعِظَـٰمًا
और हड्डियाँ
أَءِنَّا
क्या बेशक हम
لَمَدِينُونَ
अलबत्ता बदला दिए जाने वाले हैं
क्या जब हम मर चुके होंगे और मिट्टी और हड्डियाँ होकर रह जाएँगे, तो क्या हम वास्तव में बदला पाएँगे?"
तफ़्सीर:
क्या जब हम मर गए और हम सड़ी-गली हड्डियाँ हो गए, तो क्या हम अवश्य दोबारा उठाए जाएँगे और हमें हमारे दुनिया में किए हुए कार्यों का बदला दिया जाएगा?
आयत 54
قَالَ هَلْ أَنتُم مُّطَّلِعُونَ
قَالَ
उसने कहा
هَلْ
क्या
أَنتُم
तुम
مُّطَّلِعُونَ
झाँक कर देखने वाले हो
वह कहेगा, "क्या तुम झाँककर देखोगे?"
तफ़्सीर:
उसका ईमान वाला साथी अपने जन्नती दोस्तों से कहेगा : मेरे साथ झाँको, ताकि हम उस साथी का अंजाम देखें, जो मरने के बाद दोबारा उठाए जाने का इनकार किया करता था?
आयत 55
فَٱطَّلَعَ فَرَءَاهُ فِى سَوَآءِ ٱلْجَحِيمِ
فَٱطَّلَعَ
तो वो झाँकेगा
فَرَءَاهُ
तो वो देखेगा उसे
فِى
in
سَوَآءِ
वस्त/ दर्मियान में
ٱلْجَحِيمِ
जहन्नम के
फिर वह झाँकेगा तो उसे भड़कती हुई आग के बीच में देखेगा
तफ़्सीर:
चुनाँचे वह झांककर देखेगा, तो अपने साथी को जहन्नम के बीचों-बीच देखेगा।
आयत 56
قَالَ تَٱللَّهِ إِن كِدتَّ لَتُرْدِينِ
قَالَ
वो कहेगा
تَٱللَّهِ
क़सम अल्लाह की
إِن
बेशक
كِدتَّ
क़रीब था तू
لَتُرْدِينِ
अलबत्ता तू हलाक कर देता मुझे
कहेगा, "अल्लाह की क़सम! तुम तो मुझे तबाह ही करने को थे
तफ़्सीर:
वह कहेगा : अल्लाह की क़सम! (ऐ साथी!) तू क़रीब था कि मुझे कुफ़्र और मरने के बाद दोबारा जीवित होकर उठने के इनकार की ओर बुलाकर मुझे जहन्नम में दाख़िल करके, नष्ट कर देता।
आयत 57
وَلَوْلَا نِعْمَةُ رَبِّى لَكُنتُ مِنَ ٱلْمُحْضَرِينَ
وَلَوْلَا
और अगर ना होती
نِعْمَةُ
नेअमत
رَبِّى
मेरे रब की
لَكُنتُ
अलबत्ता होता मैं
مِنَ
among
ٱلْمُحْضَرِينَ
हाज़िर किए जाने वालों में से
यदि मेरे रब की अनुकम्पा न होती तो अवश्य ही मैं भी पकड़कर हाज़िर किए गए लोगों में से होता
तफ़्सीर:
अगर अल्लाह ने ईमान के लिए मार्गदर्शन और उसका सामर्थ्य प्रदान करके मुझपर उपकार न किया होता, तो मैं भी तेरी तरह यातना में उपस्थित किए गए लोगों में शामिल होता।
आयत 58
أَفَمَا نَحْنُ بِمَيِّتِينَ
أَفَمَا
क्या भला नहीं
نَحْنُ
हम
بِمَيِّتِينَ
मरने वाले
है ना अब ऐसा कि हम मरने के नहीं।
तफ़्सीर:
तो हम (जन्नत वाले) कभी मरने वाले नहीं हैं।
आयत 59
إِلَّا مَوْتَتَنَا ٱلْأُولَىٰ وَمَا نَحْنُ بِمُعَذَّبِينَ
إِلَّا
मगर
مَوْتَتَنَا
मौत हमारी
ٱلْأُولَىٰ
पहली
وَمَا
और नहीं
نَحْنُ
हम
بِمُعَذَّبِينَ
अज़ाब दिए जाने वाले
हमें जो मृत्यु आनी थी वह बस पहले आ चुकी। और हमें कोई यातना ही दी जाएगी!"
तफ़्सीर:
दुनिया के जीवन में हमारी पहली मौत के अलावा। बल्कि हम जन्नत में हमेशा के लिए रहेंगे। तथा हमे काफ़िरों की तरह कोई यातना नहीं दी जाएगी।
आयत 60
إِنَّ هَـٰذَا لَهُوَ ٱلْفَوْزُ ٱلْعَظِيمُ
إِنَّ
बेशक
هَـٰذَا
ये
لَهُوَ
अलबत्ता वो ही
ٱلْفَوْزُ
कामयाबी है
ٱلْعَظِيمُ
बहुत बड़ी
निश्चय ही यही बड़ी सफलता है
तफ़्सीर:
यह बदला जो हमारे पालनहार ने हमें दिया है (अर्थात् जन्नत में प्रवेश करना, उसमें हमेशा के लिए रहना और नरक की आग से सुरक्षित रहना) बहुत बड़ी सफलता है, जिसके बराबर कोई सफलता नहीं हो सकती।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दोज़खी और जन्नती दोस्त के मुकालमे का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि दुनिया में जिन दोस्तों ने हमें गुमराह किया, आखिरत में वही सबसे बड़ी मायूसी का सबब बनेंगे।
आयत 61
لِمِثْلِ هَـٰذَا فَلْيَعْمَلِ ٱلْعَـٰمِلُونَ
لِمِثْلِ
मानिन्द
هَـٰذَا
उसी के
فَلْيَعْمَلِ
पस चाहिए कि अमल करें
ٱلْعَـٰمِلُونَ
अमल करने वाले
ऐसी की चीज़ के लिए कर्म करनेवालों को कर्म करना चाहिए
तफ़्सीर:
इसी जैसे बड़े बदले के लिए कार्य करने वालों को कार्य करना चाहिए। क्योंकि यही लाभदायक व्यापार है।
आयत 62
أَذَٰلِكَ خَيْرٌۭ نُّزُلًا أَمْ شَجَرَةُ ٱلزَّقُّومِ
أَذَٰلِكَ
क्या ये
خَيْرٌۭ
बेहतर
نُّزُلًا
मेहमानी है
أَمْ
या
شَجَرَةُ
दरख़्त
ٱلزَّقُّومِ
थूहर का
क्या वह आतिथ्य अच्छा है या 'ज़क़्क़ूम' का वृक्ष?
तफ़्सीर:
क्या यह उल्लेख की गई नेमत जिसे अल्लाह ने अपने उन बंदों के लिए तैयार कर रखी है, जिन्हें अपने आज्ञापालन के लिए विशिष्ट कर लिया है, अधिक अच्छी और बेहतर स्थिति एवं गरिमा वाली है, या क़ुरआन में शापित ज़क़्क़ूम (थोहड़) का पेड़, जो कि काफ़िरों का भोजन है, जो न मोटा करेगा और न भूख मिटाएगा।
आयत 63
إِنَّا جَعَلْنَـٰهَا فِتْنَةًۭ لِّلظَّـٰلِمِينَ
إِنَّا
बेशक हम
جَعَلْنَـٰهَا
बनाया हमने उसे
فِتْنَةًۭ
फ़ितना
لِّلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों क लिए
निश्चय ही हमने उस (वृक्ष) को ज़ालिमों के लिए परीक्षा बना दिया है
तफ़्सीर:
हमने इस पेड़ को एक परीक्षा बनाया है, जिसके द्वारा उन लोगों को परीक्षा में डाला जाता है, जो कुफ़्र और गुनाहों के द्वारा अत्याचार करने वाले हैं। जैसा कि उन्होंने कहा : आग पेड़ों को खा जाती है; इसलिए यह संभव नहीं है कि आग में पेड़ उगे।
आयत 64
إِنَّهَا شَجَرَةٌۭ تَخْرُجُ فِىٓ أَصْلِ ٱلْجَحِيمِ
إِنَّهَا
बेशक वो
شَجَرَةٌۭ
एक दरख़्त है
تَخْرُجُ
जो निकलता/उगता है
فِىٓ
in
أَصْلِ
तह/जड़ में
ٱلْجَحِيمِ
जहन्नम की
वह एक वृक्ष है जो भड़कती हुई आग की तह से निकलता है
तफ़्सीर:
थोहड़ का पेड़ गंदी जगह में उगने वाला पेड़ है। चुनाँचे वह जहन्नम के तल में उगता है।
आयत 65
طَلْعُهَا كَأَنَّهُۥ رُءُوسُ ٱلشَّيَـٰطِينِ
طَلْعُهَا
ख़ोशे उसके
كَأَنَّهُۥ
गोया कि वो
رُءُوسُ
सर हैं
ٱلشَّيَـٰطِينِ
शैतानों के
उसके गाभे मानो शैतानों के सिर (साँपों के फन) है
तफ़्सीर:
इसका जो फल निकलता है, वह देखने में बद्सूरत होता है, मानो वह शैतानों का सिर हो, और दृष्टि की कुरूपता अंतरमन की कुरूपता का प्रमाण है। और इसका अर्थ यह है कि इसके फल का स्वाद बहुत खराब है।
आयत 66
فَإِنَّهُمْ لَـَٔاكِلُونَ مِنْهَا فَمَالِـُٔونَ مِنْهَا ٱلْبُطُونَ
فَإِنَّهُمْ
पस बेशक वो
لَـَٔاكِلُونَ
अलबत्ता खाने वाले हैं
مِنْهَا
उससे
فَمَالِـُٔونَ
फिर भरने वाले हैं
مِنْهَا
उससे
ٱلْبُطُونَ
पेटों को
तो वे उसे खाएँगे और उसी से पेट भरेंगे
तफ़्सीर:
काफ़िर लोग निश्चय उसका कड़वा, बदसूरत फल खाएँगे और उससे अपने खाली पेट भरेंगे।
आयत 67
ثُمَّ إِنَّ لَهُمْ عَلَيْهَا لَشَوْبًۭا مِّنْ حَمِيمٍۢ
ثُمَّ
फिर
إِنَّ
बेशक
لَهُمْ
उनके लिए
عَلَيْهَا
उस पर
لَشَوْبًۭا
अलबत्ता आमेज़िश है
مِّنْ
of
حَمِيمٍۢ
खौलते पानी की
फिर उनके लिए उसपर खौलते हुए पानी का मिश्रण होगा
तफ़्सीर:
फिर उन्हें उन फलों को खाने के बाद पीने के लिए जो चीज़ दी जाएगी, वह एक बदसूरत, गर्म मिश्रण होगा।
आयत 68
ثُمَّ إِنَّ مَرْجِعَهُمْ لَإِلَى ٱلْجَحِيمِ
ثُمَّ
फिर
إِنَّ
बेशक
مَرْجِعَهُمْ
वापसी उनकी
لَإِلَى
अलबत्ता तरफ़
ٱلْجَحِيمِ
जहन्नम के है
फिर उनकी वापसी भड़कती हुई आग की ओर होगी
तफ़्सीर:
फिर उसके बाद उन्हें जहन्नम की यातना की ओर लौटाया जाएगा। चुनाँचे वे एक यातना से दूसरी यातना की ओर स्थानांतरित होते रहेंगे।
आयत 69
إِنَّهُمْ أَلْفَوْا۟ ءَابَآءَهُمْ ضَآلِّينَ
إِنَّهُمْ
बेशक वो
أَلْفَوْا۟
उन्होंने पाया
ءَابَآءَهُمْ
अपने आबा ओ अजदाद को
ضَآلِّينَ
गुमराह
निश्चय ही उन्होंने अपने बाप-दादा को पथभ्रष्ट॥ पाया।
तफ़्सीर:
इन काफ़िरों ने अपने बाप-दादा को हिदायत के रास्ते से भटका हुआ पाया, और उनकी देखा-देखी उन्हीं के रास्ते पर चल पड़े। उन्होंने प्रमाण से कोई सरोकार नहीं रखा।
आयत 70
فَهُمْ عَلَىٰٓ ءَاثَـٰرِهِمْ يُهْرَعُونَ
فَهُمْ
तो वो
عَلَىٰٓ
on
ءَاثَـٰرِهِمْ
उनके नक़्शे क़दम पर
يُهْرَعُونَ
वो दौड़ाए जाते हैं
फिर वे उन्हीं के पद-चिन्हों पर दौड़ते रहे
तफ़्सीर:
तो वे गुमराही में अपने बाप-दादों के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए दौड़े चले जा रहे हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दोज़ख़ के दरख्त (ज़क़्क़ूम) का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि दुनिया में हराम और गलत तरीकों से हासिल की गई ऐश आखिरत में तकलीफ का सबब बन सकती है।
आयत 71
وَلَقَدْ ضَلَّ قَبْلَهُمْ أَكْثَرُ ٱلْأَوَّلِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
ضَلَّ
भटक गए
قَبْلَهُمْ
उनसे क़ब्ल
أَكْثَرُ
बहुत से
ٱلْأَوَّلِينَ
पहले लोग
और उनसे पहले भी पूर्ववर्ती लोगों में अधिकांश पथभ्रष्ट हो चुके है,
तफ़्सीर:
निश्चय इनसे पहले भी अगले लोगों में से अधिकांश लोग गुमराह हुए हैं। सो (ऐ रसूल!) आपकी जाति के लोग गुमराह होने वाले पहले व्यक्ति नहीं हैं।
आयत 72
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا فِيهِم مُّنذِرِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَرْسَلْنَا
भेजे हमने
فِيهِم
उनमें
مُّنذِرِينَ
डराने वाले
हमने उनमें सचेत करनेवाले भेजे थे।
तफ़्सीर:
तथा हमने उन पहले समुदायों में भी रसूल भेजे, जो उन्हें अल्लाह की यातना से डराते थे, परंतु उन्होंने इनकार कर दिया।
आयत 73
فَٱنظُرْ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلْمُنذَرِينَ
فَٱنظُرْ
तो देखो
كَيْفَ
कैसा
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अंजाम
ٱلْمُنذَرِينَ
डराए जाने वालों का
तो अब देख लो उन लोगों का कैसा परिणाम हुआ, जिन्हे सचेत किया गया था
तफ़्सीर:
तो (ऐ रसूल!) देखो कि उन लोगों का अंत कैसे हुआ, जिन्हें उनके रसूलों ने डराया, लेकिन उन्होंने उनकी बात नहीं मानी। निःसंदेह उनका अंजाम हमेशा के लिए जहन्नम में प्रवेश करना था। यह सब उनके कुफ़्र करने और रसूलों को झुठलाने के कारण हुआ।
आयत 74
إِلَّا عِبَادَ ٱللَّهِ ٱلْمُخْلَصِينَ
إِلَّا
मगर
عِبَادَ
बन्दे
ٱللَّهِ
अल्लाह के
ٱلْمُخْلَصِينَ
जो ख़ालिस किए हुए हैं
अलबत्ता अल्लाह के बन्दों की बात और है, जिनको उसने चुन लिया है
तफ़्सीर:
परंतु जिन्हें अल्लाह ने अपने ऊपर ईमान लाने के लिए चुन लिया है, तो वे उस यातना से मुक्ति पाने वाले हैं, जो उन झुठलाने वाले काफ़िरों का परिणाम हुआ।
आयत 75
وَلَقَدْ نَادَىٰنَا نُوحٌۭ فَلَنِعْمَ ٱلْمُجِيبُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
نَادَىٰنَا
पुकारा हमें
نُوحٌۭ
नूह ने
فَلَنِعْمَ
पस अलबत्ता कितने अच्छे हैं
ٱلْمُجِيبُونَ
जवाब देने वाले
नूह ने हमको पुकारा था, तो हम कैसे अच्छे है निवेदन स्वीकार करनेवाले!
तफ़्सीर:
और हमारे नबी नूह अलैहिस्सलाम ने हमें पुकारा, जब उन्होंने अपनी झुठलाने वाली जाति के ख़िलाफ बद्दुआ की। तो निश्चय हम अच्छे दुआ स्वीकार करने वाले हैं। चुनाँचे हमने उनके विरुद्ध उनकी बद्दुआ को स्वीकार करने में जल्दी की।
आयत 76
وَنَجَّيْنَـٰهُ وَأَهْلَهُۥ مِنَ ٱلْكَرْبِ ٱلْعَظِيمِ
وَنَجَّيْنَـٰهُ
और निजात दी हमने उसे
وَأَهْلَهُۥ
और उसके घर वालों को
مِنَ
from
ٱلْكَرْبِ
मुसीबत से
ٱلْعَظِيمِ
बहुत बड़ी
हमने उसे और उसके लोगों को बड़ी घुटन और बेचैनी से छुटकारा दिया
तफ़्सीर:
हमने उसे, उसके घर वालों और उसके साथ के ईमान वालों को उसकी जाति के कष्ट से तथा उस भयानक बाढ़ में डूबने से बचा लिया, जो उसकी जाति के काफ़िरो पर भेजा गई थी।
आयत 77
وَجَعَلْنَا ذُرِّيَّتَهُۥ هُمُ ٱلْبَاقِينَ
وَجَعَلْنَا
और रखा हमने
ذُرِّيَّتَهُۥ
उसकी औलाद को
هُمُ
वो ही
ٱلْبَاقِينَ
बाक़ी रहने वाले
और हमने उसकी सतति (औलाद व अनुयायी) ही को बाक़ी रखा
तफ़्सीर:
और हमने केवल उनके घर वालों और उनके मोमिन अनुयायियों को बचाया। और उनके सिवा उनकी जाति के काफ़िर लोगों को डुबो दिया।
आयत 78
وَتَرَكْنَا عَلَيْهِ فِى ٱلْـَٔاخِرِينَ
وَتَرَكْنَا
और बाक़ी रखा हमने
عَلَيْهِ
उस पर (ज़िक्र ख़ैर )
فِى
among
ٱلْـَٔاخِرِينَ
बाद वालों में
और हमने पीछे आनेवाली नस्लों में उसका अच्छा ज़िक्र छोड़ा
तफ़्सीर:
और हमने बाद में आने वाले समुदायों में उनकी अच्छी प्रशंसा बाकी रखी, जिसके साथ लोग उनकी प्रशंसा करते रहेंगे।
आयत 79
سَلَـٰمٌ عَلَىٰ نُوحٍۢ فِى ٱلْعَـٰلَمِينَ
سَلَـٰمٌ
सलाम है
عَلَىٰ
upon
نُوحٍۢ
नूह पर
فِى
among
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों में
कि "सलाम है नूह पर सम्पूर्ण संसारवालों में!"
तफ़्सीर:
नूह़ अलैहिस्सलाम के लिए इस बात से सुरक्षा और सलामती है कि बाद में आने वाली जातियों के लोग उनके बारे में कोई बुरी बात कहें। बल्कि सदा उनके लिए प्रशंसा और अच्छा स्मरण ही बाक़ी रहेगा।
आयत 80
إِنَّا كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ
إِنَّا
बेशक हम
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نَجْزِى
हम बदला देते हैं
ٱلْمُحْسِنِينَ
एहसान करने वालों को
निस्संदेह हम उत्तमकारों को ऐसा बदला देते है
तफ़्सीर:
यह बदला जो हमने नूह अलैहिस्सलाम को दिया, इसी तरह का बदला हम उन लोगों को देते हैं, जो बेहतर तौर पर केवल अल्लाह की इबादत करते और उसका आज्ञापालन करते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नूह अलैहिस्सलाम की दुआ और नजात का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि मुश्किल हालात में अल्लाह से मदद मांगते रहना और सब्र करना आखिरकार नजात दिलाता है।
आयत 81
إِنَّهُۥ مِنْ عِبَادِنَا ٱلْمُؤْمِنِينَ
إِنَّهُۥ
बेशक वो
مِنْ
(was) of
عِبَادِنَا
हमारे बन्दों में से था
ٱلْمُؤْمِنِينَ
जो मोमिन हैं
निश्चय ही वह हमारे ईमानवाले बन्दों में से था
तफ़्सीर:
निश्चय नूह़ अलैहिस्सलाम हमारे मोमिन और अल्लाह का आज्ञापालन करने वाले बंदों में से थे।
आयत 82
ثُمَّ أَغْرَقْنَا ٱلْـَٔاخَرِينَ
ثُمَّ
फिर
أَغْرَقْنَا
ग़र्क़ किया हमने
ٱلْـَٔاخَرِينَ
दूसरों को
फिर हमने दूसरो को डूबो दिया।
तफ़्सीर:
फिर हमने बाकी लोगों को उस तूफान (बाढ़) में डुबो दिया, जिसे हमने उनपर भेजा था और परिणामस्वरूप उनमें से कोई भी बाकी नहीं बचा।
आयत 83
۞ وَإِنَّ مِن شِيعَتِهِۦ لَإِبْرَٰهِيمَ
۞ وَإِنَّ
और बेशक
مِن
among
شِيعَتِهِۦ
उसके गिरोह में से
لَإِبْرَٰهِيمَ
अलबत्ता इब्राहीम था
और इबराहीम भी उसी के सहधर्मियों में से था।
तफ़्सीर:
और इबराहीम अलैहिस्सलाम भी उन्हीं के धर्म पर चलने वाले उन लोगों में से थे, जो अल्लाह की तौह़ीद (एकेश्वरवाद) की ओर बुलाने में उनके साथ सहमत थे।
आयत 84
إِذْ جَآءَ رَبَّهُۥ بِقَلْبٍۢ سَلِيمٍ
إِذْ
जब
جَآءَ
वो आया
رَبَّهُۥ
अपने रब के पास
بِقَلْبٍۢ
साथ दिल
سَلِيمٍ
सलामत के
याद करो, जब वह अपने रब के समक्ष भला-चंगा हृदय लेकर आया;
तफ़्सीर:
उस समय को याद करें, जब वह अपने रब के पास शिर्क से पाक और अल्लाह के लिए उसकी मखलूक़ का भला चाहने वाला दिल लेकर आए।
आयत 85
إِذْ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِۦ مَاذَا تَعْبُدُونَ
إِذْ
जब
قَالَ
उसने कहा
لِأَبِيهِ
अपने बाप से
وَقَوْمِهِۦ
और अपनी क़ौम से
مَاذَا
किस की
تَعْبُدُونَ
तुम इबादत करते हो
जबकि उसने अपने बाप और अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "तुम किस चीज़ की पूजा करते हो?
तफ़्सीर:
जिस समय उन्होंने अपने पिता तथा अपनी जाति के बहुदेववादियों से उन्हें फटकार लगाते हुए कहा : तुम अल्लाह के सिवा किस चीज़ की पूजा करते हो?
आयत 86
أَئِفْكًا ءَالِهَةًۭ دُونَ ٱللَّهِ تُرِيدُونَ
أَئِفْكًا
क्या गढ़े हुए
ءَالِهَةًۭ
माबूदों को
دُونَ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
تُرِيدُونَ
तुम चाहते हो
क्या अल्लाह से हटकर मनघड़ंत उपास्यों को चाह रहे हो?
तफ़्सीर:
क्या अल्लाह को छोड़कर अपने झूठे पूज्यों की इबादत करते हो?
आयत 87
فَمَا ظَنُّكُم بِرَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
فَمَا
तो क्या है
ظَنُّكُم
गुमान तुम्हारा
بِرَبِّ
about (the) Lord
ٱلْعَـٰلَمِينَ
रब्बुल आलमीन के बारे में
आख़िर सारे संसार के रब के विषय में तुम्हारा क्या गुमान है?"
तफ़्सीर:
(ऐ मेरी जाति के लोगो!) सर्व संसार के पालनहार के विषय में तुम्हारा क्या गुमान है, जब तुम उससे उसके अलावा किसी और की पूजा करते हुए मिलोगे?! तुम ही बताओ कि वह तुम्हारे साथ क्या करेगा?!
आयत 88
فَنَظَرَ نَظْرَةًۭ فِى ٱلنُّجُومِ
فَنَظَرَ
तो उसने देखा
نَظْرَةًۭ
एक नज़र
فِى
at
ٱلنُّجُومِ
सितारों में
फिर उसने एक दृष्टि तारों पर डाली
तफ़्सीर:
तो इबराहीम (अलैहिस्सलाम) ने एक दृष्टि तारों पर डाली, जबकि वह अपनी जाति के लोगों के साथ बाहर जाने से छुटकारा पाने के लिए उपाय कर रहे थे।
आयत 89
فَقَالَ إِنِّى سَقِيمٌۭ
فَقَالَ
तो उसने कहा
إِنِّى
बेशक मैं
سَقِيمٌۭ
बीमार हूँ
और कहा, "मैं तो निढाल हूँ।"
तफ़्सीर:
तो उसने अपनी जाति के लोगों के साथ उनके त्योहार में जाने से बहाना बनाते हुए कहा : मैं बीमार हूँ।
आयत 90
فَتَوَلَّوْا۟ عَنْهُ مُدْبِرِينَ
فَتَوَلَّوْا۟
तो वो लौट गए
عَنْهُ
उससे
مُدْبِرِينَ
पीठ फेर कर
अतएव वे उसे छोड़कर चले गए पीठ फेरकर
तफ़्सीर:
तो उन्होंने उसे अपने पीछे छोड़ दिया और चले गए।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इब्राहीम अलैहिस्सलाम की तौहीद की दावत और बुत तोड़ने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि गलत रिवायतों पर सवाल उठाना और हक की तलाश करना अक्लमंदी है।
आयत 91
فَرَاغَ إِلَىٰٓ ءَالِهَتِهِمْ فَقَالَ أَلَا تَأْكُلُونَ
فَرَاغَ
तो वो चुपके से गया
إِلَىٰٓ
to
ءَالِهَتِهِمْ
तरफ़ उनके इलाहों के
فَقَالَ
फिर उसने कहा
أَلَا
क्या नहीं
تَأْكُلُونَ
तुम खाते
फिर वह आँख बचाकर उनके देवताओं की ओर गया और कहा, "क्या तुम खाते नहीं?
तफ़्सीर:
फिर वह उनके उन बुतों की ओर गए, जिनकी वे अल्लाह को छोड़कर पूजा करते थे। चुनाँचे उनके बुतों का मज़ाक़ उड़ाते हुए बोले : क्या तुम उस भोजन से नहीं खाते जो बहुदेववादी तुम्हारे लिए बनाते हैं?!
आयत 92
مَا لَكُمْ لَا تَنطِقُونَ
مَا
क्या है
لَكُمْ
तुम्हें
لَا
not
تَنطِقُونَ
नहीं तुम बोलते
तुम्हें क्या हुआ है कि तुम बोलते नहीं?"
तफ़्सीर:
तुम्हें क्या हुआ कि तुम बोलते नहीं, और जो तुमसे पूछता है उसे कोई जवाब नहीं देते ?! क्या ऐसे की अल्लाह को छोड़कर पूजा की जानी चाहिए?!
आयत 93
فَرَاغَ عَلَيْهِمْ ضَرْبًۢا بِٱلْيَمِينِ
فَرَاغَ
फिर वो जा पड़ा
عَلَيْهِمْ
उन पर
ضَرْبًۢا
ज़रब लगाते हुए
بِٱلْيَمِينِ
दाऐं हाथ से
फिर वह भरपूर हाथ मारते हुए उनपर पिल पड़ा
तफ़्सीर:
फिर इबराहीम अलैहिस्सलाम उन्हें अपने दाहिने हाथ से मारते हुए उनपर पिल पड़े, ताकि उन्हें तोड़ दें।
आयत 94
فَأَقْبَلُوٓا۟ إِلَيْهِ يَزِفُّونَ
فَأَقْبَلُوٓا۟
तो वो मुतावज्जा हुए
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
يَزِفُّونَ
तेज़ दौड़ते हुए
फिर वे लोग झपटते हुए उसकी ओर आए
तफ़्सीर:
फिर इन बुतों को पूजने वाले तेज़ी से दौड़ते हुए इबराहीम अलैहिस्सलाम के पास आए।
आयत 95
قَالَ أَتَعْبُدُونَ مَا تَنْحِتُونَ
قَالَ
कहा
أَتَعْبُدُونَ
क्या तुम इबादत करते हो
مَا
उनकी जिन्हें
تَنْحِتُونَ
तुम तराशते हो
उसने कहा, "क्या तुम उनको पूजते हो, जिन्हें स्वयं तराशते हो,
तफ़्सीर:
तो इबराहीम अलैहिस्सलाम ने स्थिरता से उनका सामना किया और उन्हें फटकारते हुए कहा : क्या तुम अल्लाह को छोड़कर ऐसे बुतों की पूजा करते हो, जिन्हें अपने हाथों से तराशते हो?!
आयत 96
وَٱللَّهُ خَلَقَكُمْ وَمَا تَعْمَلُونَ
وَٱللَّهُ
और अल्लाह ने
خَلَقَكُمْ
पैदा किया तुम्हें
وَمَا
और उसे जो
تَعْمَلُونَ
तुम करते हो
जबकि अल्लाह ने तुम्हे भी पैदा किया है और उनको भी, जिन्हें तुम बनाते हो?"
तफ़्सीर:
जबकि अल्लाह ही ने तुम्हें पैदा किया तथा तुम्हारे कार्यों को पैदा किया, और तुम्हारे कार्यों में से ये मूर्तियाँ भी हैं। अतः अल्लाह ही इस बात का हक़दार है कि एकमात्र उसी की इबादत की जाए और उसके साथ किसी दूसरे को साझी न बनाया जाए।
आयत 97
قَالُوا۟ ٱبْنُوا۟ لَهُۥ بُنْيَـٰنًۭا فَأَلْقُوهُ فِى ٱلْجَحِيمِ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
ٱبْنُوا۟
बनाओ
لَهُۥ
उसके लिए
بُنْيَـٰنًۭا
एक इमारत
فَأَلْقُوهُ
फिर डालो उसे
فِى
into
ٱلْجَحِيمِ
दहकती आग में
वे बोले, "उनके लिए एक मकान (अर्थात अग्नि-कुंड) तैयार करके उसे भड़कती आग में डाल दो!"
तफ़्सीर:
जब वे उससे वाद-विवाद करने में असमर्थ हो गए, तो उन्होंने बल प्रयोग किया। चुनाँचे उन्होंने आपस में परामर्श किया कि वे इब्राहीम के साथ क्या करें। उन्होंने कहा : इसके लिए एक इमारत बनाओ, उसे लकड़ी से भरकर आग लगाओ और जब वह खूब भड़क उठे, तो इसे उसमें फेंक दो।
आयत 98
فَأَرَادُوا۟ بِهِۦ كَيْدًۭا فَجَعَلْنَـٰهُمُ ٱلْأَسْفَلِينَ
فَأَرَادُوا۟
तो उन्होंने इरादा किया
بِهِۦ
साथ उसके
كَيْدًۭا
चाल चलने का
فَجَعَلْنَـٰهُمُ
तो कर दिया हमने उन्हें
ٱلْأَسْفَلِينَ
सबसे निचला
अतः उन्होंने उसके साथ एक चाल चलनी चाही, किन्तु हमने उन्हीं को नीचा दिखा दिया
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम की जाति के लोगों ने उनके साथ उन्हें विनष्ट करने का बुरा इरादा किया, ताकि उनसे आराम पा जाएँ, तो हमने आग को इबराहीम अलैहिस्सलाम के लिए ठंडी और सलामती वाली बनाकर उन्हीं लोगों को असफल (हानि उठाने वाला) बना दिया।
आयत 99
وَقَالَ إِنِّى ذَاهِبٌ إِلَىٰ رَبِّى سَيَهْدِينِ
وَقَالَ
और उसने कहा
إِنِّى
बेशक मैं
ذَاهِبٌ
जाने वाला हूँ
إِلَىٰ
to
رَبِّى
तरफ़ अपने रब के
سَيَهْدِينِ
अनक़रीब वो रहनुमाई करेगा मेरी
उसने कहा, "मैं अपने रब की ओर जा रहा हूँ, वह मेरा मार्गदर्शन करेगा
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम ने कहा : मैं अपनी जाति के देश को छोड़कर अपने पालनहार की ओर हिजरत करने वाला हूँ, ताकि उसकी इबादत कर सकूँ। मेरा पालनहार मुझे वह रास्ता दिखाएगा, जिसमें मेरे लिए दुनिया और आखिरत की भलाई है।
आयत 100
رَبِّ هَبْ لِى مِنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ
رَبِّ
ऐ मेरे रब
هَبْ
अता कर
لِى
मुझे
مِنَ
of
ٱلصَّـٰلِحِينَ
सालेहीन में से
ऐ मेरे रब! मुझे कोई नेक संतान प्रदान कर।"
तफ़्सीर:
ऐ मेरे पालनहार! मुझे एक नेक पुत्र प्रदान कर, जो परदेस में मेरा सहायक और मेरी जाति के लोगों का एवज़ (प्रतिकार) हो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इब्राहीम अलैहिस्सलाम की औलाद की दुआ का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि नेक औलाद की दुआ मांगना और उन्हें दीनदार बनाने की कोशिश माता-पिता की ज़िम्मेदारी है।
आयत 101
فَبَشَّرْنَـٰهُ بِغُلَـٰمٍ حَلِيمٍۢ
فَبَشَّرْنَـٰهُ
तो ख़ुशख़बरी दी हमने उसे
بِغُلَـٰمٍ
एक लड़के की
حَلِيمٍۢ
जो बुर्दबार था
तो हमने उसे एक सहनशील पुत्र की शुभ सूचना दी
तफ़्सीर:
तो हमने उनकी दुआ क़बूल की और उन्हें ऐसी सूचना दी, जिससे उनका दिल प्रसन्न हो जाए। हमने उन्हें एक लड़के की खुशख़बरी दी, जो बड़ा होकर सहनशील बनेगा। यह लड़का इसमाईल अलैहिस्सलाम हैं।
आयत 102
فَلَمَّا بَلَغَ مَعَهُ ٱلسَّعْىَ قَالَ يَـٰبُنَىَّ إِنِّىٓ أَرَىٰ فِى ٱلْمَنَامِ أَنِّىٓ أَذْبَحُكَ فَٱنظُرْ مَاذَا تَرَىٰ ۚ قَالَ يَـٰٓأَبَتِ ٱفْعَلْ مَا تُؤْمَرُ ۖ سَتَجِدُنِىٓ إِن شَآءَ ٱللَّهُ مِنَ ٱلصَّـٰبِرِينَ
فَلَمَّا
फिर जब
بَلَغَ
वो पहुँचा
مَعَهُ
साथ उसके
ٱلسَّعْىَ
दौड़ धूप को
قَالَ
कहा
يَـٰبُنَىَّ
ऐ मेरे बेटे
إِنِّىٓ
कि बेशक मैं
أَرَىٰ
मैं ने देखा है
فِى
in
ٱلْمَنَامِ
ख़्वाब में
أَنِّىٓ
कि मैं
أَذْبَحُكَ
मैं ज़िबह कर रहा हूँ तुझे
فَٱنظُرْ
तो देख
مَاذَا
क्या है
تَرَىٰ ۚ
तेरी राय
قَالَ
उसने कहा
يَـٰٓأَبَتِ
ऐ मेरे अब्बाजान
ٱفْعَلْ
आप कर डालिए
مَا
जो
تُؤْمَرُ ۖ
आप हुक्म दिए गए
سَتَجِدُنِىٓ
ज़रूर आप पाऐंगे मुझे
إِن
अगर
شَآءَ
चाहा
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِنَ
of
ٱلصَّـٰبِرِينَ
सब्र करने वालों में से
फिर जब वह उसके साथ दौड़-धूप करने की अवस्था को पहुँचा तो उसने कहा, "ऐ मेरे प्रिय बेटे! मैं स्वप्न में देखता हूँ कि तुझे क़ुरबान कर रहा हूँ। तो अब देख, तेरा क्या विचार है?" उसने कहा, "ऐ मेरे बाप! जो कुछ आपको आदेश दिया जा रहा है उसे कर डालिए। अल्लाह ने चाहा तो आप मुझे धैर्यवान पाएँगे।"
तफ़्सीर:
जब इसमाईल जवान हो गए और अपने पिता के साथ दौड़-धूप करने के योग्य हो गाए, तो उनके पिता इबराहीम अलैहिस्सलाम ने एक सपना देखा। याद रहे कि नबियों का सपना वह़्य (प्रकाशना) होता है। इबराहीम अलैहिस्सलाम ने अपने बेटे इसमाईल अलैहिस्सलाम को इस सपने के आशय के बारे में सूचित करते हुए कहा : ऐ मेरे प्यारे बेटे! मैंने सपने में देखा है कि मैं तुझे ज़बह कर रहा हूँ। तो अब देख, इस बारे में तेरा क्या खयाल है? इसमाईल अलैहिस्सलाम ने अपने पिता को उत्तर दिया : ऐ मेरे पिता! अल्लाह ने आपको मुझे ज़बह करने का जो आदेश दिया है, उसे कर डालिए। अगर अल्लाह ने चाहा तो आप मुझे धैर्यवानों और अल्लाह के निर्णय से संतुष्ट होने वालों में से पाएँगे।
आयत 103
فَلَمَّآ أَسْلَمَا وَتَلَّهُۥ لِلْجَبِينِ
فَلَمَّآ
फिर जब
أَسْلَمَا
वो दोनों मुतीअ हो गए
وَتَلَّهُۥ
और उसने लिटा दिया उसे
لِلْجَبِينِ
पेशनी के बल
अन्ततः जब दोनों ने अपने आपको (अल्लाह के आगे) झुका दिया और उसने (इबाराहीम ने) उसे कनपटी के बल लिटा दिया (तो उस समय क्या दृश्य रहा होगा, सोचो!)
तफ़्सीर:
फिर जब दोनों अल्लाह के आदेश के प्रति समर्पित हो गए और उसकी आज्ञा के पालन के लिए तैयार हो गए, तो इबराहीम अलैहिस्सलाम ने अपने बेटे को उसकी पेशानी के एक किनारे पर लिटा दिया, ताकि उसे ज़बह करने का उन्हें जो आदेश मिला था उसका पालन करें।
आयत 104
وَنَـٰدَيْنَـٰهُ أَن يَـٰٓإِبْرَٰهِيمُ
وَنَـٰدَيْنَـٰهُ
और पुकारा हमने उसे
أَن
कि
يَـٰٓإِبْرَٰهِيمُ
ऐ इब्राहीम
और हमने उसे पुकारा, "ऐ इबराहीम!
तफ़्सीर:
तथा हमने इबराहीम अलैहिस्सलाम को, जब वह अपने बेटे को ज़बह करने के अल्लाह के आदेश को लागू करने वाले थे, आवाज़ दी : ऐ इबराहीम!
आयत 105
قَدْ صَدَّقْتَ ٱلرُّءْيَآ ۚ إِنَّا كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ
قَدْ
तहक़ीक़
صَدَّقْتَ
सच कर दिखाया तूने
ٱلرُّءْيَآ ۚ
ख़्वाब को
إِنَّا
बेशक हम
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نَجْزِى
हम बदला देते हैं
ٱلْمُحْسِنِينَ
मोहसिनीन को
तूने स्वप्न को सच कर दिखाया। निस्संदेह हम उत्तमकारों को इसी प्रकार बदला देते है।"
तफ़्सीर:
आपने अपने बेटे को ज़बह करने का दृढ़ संकल्प करके उस सपने को पूरा कर दिया, जो आपने देखा था। निश्चित रूप से (जिस तरह हमने आपको इस महान परीक्षा से छुटकारा दिलाकर आपको बदला दिया है) उसी तरह हम सदाचारियों को बदला देते हैं, चुनाँचे उन्हें विपत्तियों और कठिनाइयों से छुटकारा दिलाते हैं।
आयत 106
إِنَّ هَـٰذَا لَهُوَ ٱلْبَلَـٰٓؤُا۟ ٱلْمُبِينُ
إِنَّ
बेशक
هَـٰذَا
ये
لَهُوَ
अलबत्ता वो
ٱلْبَلَـٰٓؤُا۟
आज़माइश थी
ٱلْمُبِينُ
खुली-खुली
निस्संदेह यह तो एक खुली हूई परीक्षा थी
तफ़्सीर:
निःसंदेह यही तो स्पष्ट परीक्षण है और इबराहीम अलैहिस्सलाम इसमें सफल हुए।
आयत 107
وَفَدَيْنَـٰهُ بِذِبْحٍ عَظِيمٍۢ
وَفَدَيْنَـٰهُ
और फ़िदया दिया हमने उसका
بِذِبْحٍ
साथ एक क़ुर्बानी
عَظِيمٍۢ
बहुत बड़ी के
और हमने उसे (बेटे को) एक बड़ी क़ुरबानी के बदले में छुड़ा लिया
तफ़्सीर:
और हमने इसमाईल अलैहिस्सलाम के बदले में एक महान मेढ़ा दिया कि उसे उनकी ओर से ज़बह किया जाए।
आयत 108
وَتَرَكْنَا عَلَيْهِ فِى ٱلْـَٔاخِرِينَ
وَتَرَكْنَا
और बाक़ी रखा हमने
عَلَيْهِ
उस पर (ज़िक्र ख़ैर)
فِى
among
ٱلْـَٔاخِرِينَ
बाद वालों में
और हमने पीछे आनेवाली नस्लों में उसका ज़िक्र छोड़ा,
तफ़्सीर:
और हमने बाद में आने वाले समुदायों में इबराहीम अलैहिस्सलाम की अच्छी प्रशंसा बाक़ी रखी।
आयत 109
سَلَـٰمٌ عَلَىٰٓ إِبْرَٰهِيمَ
سَلَـٰمٌ
सलाम है
عَلَىٰٓ
on
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम पर
कि "सलाम है इबराहीम पर।"
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम के लिए अल्लाह की ओर से सलाम (अभिवादन), तथा हर नुक़सान और विपत्ति से सुरक्षा की दुआ हो।
आयत 110
كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نَجْزِى
हम बदला देते हैं
ٱلْمُحْسِنِينَ
एहसान करने वालों को
उत्तमकारों को हम ऐसा ही बदला देते है
तफ़्सीर:
जिस तरह हमने इबराहीम अलैहिस्सलाम को उनके आज्ञापालन का यह बदला दिया, उसी तरह हम सदाचारियों को (भी) बदला देते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इस्माईल अलैहिस्सलाम की कुर्बानी के मशहूर वाकिये का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह के हुक्म पर सबसे प्यारी चीज़ भी कुर्बान करने को तैयार रहना असली इताअत है, यह ईद-उल-अज़हा की बुनियाद है।
आयत 111
إِنَّهُۥ مِنْ عِبَادِنَا ٱلْمُؤْمِنِينَ
إِنَّهُۥ
बेशक वो
مِنْ
of
عِبَادِنَا
हमारे बन्दों में से था
ٱلْمُؤْمِنِينَ
जो मोमिन हैं
निश्चय ही वह हमारे ईमानवाले बन्दों में से था
तफ़्सीर:
निश्चय इबराहीम अलैहिस्सलाम हमारे मोमिन बंदों में से थे, जो अल्लाह की बंदगी के तक़ाज़ों को पूरा करते हैं।
आयत 112
وَبَشَّرْنَـٰهُ بِإِسْحَـٰقَ نَبِيًّۭا مِّنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ
وَبَشَّرْنَـٰهُ
और ख़ुशख़बरी दी हमने उसे
بِإِسْحَـٰقَ
इस्हाक़ की
نَبِيًّۭا
एक नबी
مِّنَ
among
ٱلصَّـٰلِحِينَ
सालेहीन में से
और हमने उसे इसहाक़ की शुभ सूचना दी, अच्छों में से एक नबी
तफ़्सीर:
तथा हमने उन्हें एक और बालक की शुभ सूचना दी, जो नबी और नेक बंदा बनेगा, और वह इसहाक़ अलैहिस्सलाम हैं। यह उनके अपने इकलौते बेटे इसमाईल अलैहिस्सलाम को ज़बह करने में अल्लाह का आज्ञापालन करने के बदले के तौर पर है।
आयत 113
وَبَـٰرَكْنَا عَلَيْهِ وَعَلَىٰٓ إِسْحَـٰقَ ۚ وَمِن ذُرِّيَّتِهِمَا مُحْسِنٌۭ وَظَالِمٌۭ لِّنَفْسِهِۦ مُبِينٌۭ
وَبَـٰرَكْنَا
और बरकत नाज़िल की हमने
عَلَيْهِ
उस पर
وَعَلَىٰٓ
and [on]
إِسْحَـٰقَ ۚ
और इस्हाक़ पर
وَمِن
And of
ذُرِّيَّتِهِمَا
और दोनों की औलादों में से
مُحْسِنٌۭ
कोई मोहसिन है
وَظَالِمٌۭ
और कोई ज़ालिम है
لِّنَفْسِهِۦ
अपने नफ़्स के लिए
مُبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
और हमने उसे और इसहाक़ को बरकत दी। और उन दोनों की संतति में कोई तो उत्तमकार है और कोई अपने आप पर खुला ज़ुल्म करनेवाला
तफ़्सीर:
और हमने उनपर और उनके बेटे इसहाक़ पर अपनी ओर से बरकत उतारी। चुनाँचे उन दोनों को ढेर सारी नेमतें प्रदान कीं, जिनमें उनकी संतान को खूब बढ़ाना भी शामिल है। उनके वंश में से कुछ लोग अपने पालनहार की आज्ञा का पालन करके अच्छे काम करने वाले हैं, जबकि उनमें से कुछ लोग कुफ़्र और पाप करके अपने आप पर खुला अत्याचार करने वाले हैं।
आयत 114
وَلَقَدْ مَنَنَّا عَلَىٰ مُوسَىٰ وَهَـٰرُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
مَنَنَّا
एहसान किया हमने
عَلَىٰ
upon
مُوسَىٰ
ऊपर मूसा
وَهَـٰرُونَ
और हारून के
और हम मूसा और हारून पर भी उपकार कर चुके है
तफ़्सीर:
और हमने मूसा और उनके भाई हारून को नबी बनाकर उनपर उपकार किया।
आयत 115
وَنَجَّيْنَـٰهُمَا وَقَوْمَهُمَا مِنَ ٱلْكَرْبِ ٱلْعَظِيمِ
وَنَجَّيْنَـٰهُمَا
और निजात दी हमने उन दोनों को
وَقَوْمَهُمَا
और उन दोनों की क़ौम को
مِنَ
from
ٱلْكَرْبِ
मुसीबत से
ٱلْعَظِيمِ
बहुत बड़ी
और हमने उन्हें और उनकी क़ौम को बड़ी घुटन और बेचैनी से छुटकारा दिया
तफ़्सीर:
तथा हमने उन दोनों को और उनकी जाति बनी इसराईल को फ़िरऔन की ग़ुलामी और डूबने से बचा लिया।
आयत 116
وَنَصَرْنَـٰهُمْ فَكَانُوا۟ هُمُ ٱلْغَـٰلِبِينَ
وَنَصَرْنَـٰهُمْ
और मदद की हमने उनकी
فَكَانُوا۟
फिर हो गए वो
هُمُ
वो ही
ٱلْغَـٰلِبِينَ
ग़ालिब
हमने उनकी सहायता की, तो वही प्रभावी रहे
तफ़्सीर:
हमने फ़िरऔन और उसकी सेना के विरुद्ध उनकी मदद की, जिसके परिणामस्वरूप वे अपने शत्रु पर प्रबल हुए।
आयत 117
وَءَاتَيْنَـٰهُمَا ٱلْكِتَـٰبَ ٱلْمُسْتَبِينَ
وَءَاتَيْنَـٰهُمَا
और दी हमने उन दोनों को
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
ٱلْمُسْتَبِينَ
वाज़ेह
हमने उनको अत्यन्त स्पष्टा किताब प्रदान की।
तफ़्सीर:
हमने मूसा और उनके भाई हारून को तौरात प्रदान की, जो अल्लाह की ओर से एक स्पष्ट पुस्तक है, जिसमें कोई संशयता नहीं है।
आयत 118
وَهَدَيْنَـٰهُمَا ٱلصِّرَٰطَ ٱلْمُسْتَقِيمَ
وَهَدَيْنَـٰهُمَا
और हिदायत दी हमने उन दोनों को
ٱلصِّرَٰطَ
रास्ते
ٱلْمُسْتَقِيمَ
सीधे की
और उन्हें सीधा मार्ग दिखाया
तफ़्सीर:
और हमने दोनों को सीधे मार्ग पर चलाया, जिसमें कोई टेढ़ापन नहीं है। और वह इस्लाम धर्म का मार्ग है, जो अल्लाह महिमावान की प्रसन्नता तक पहुँचाने वाला है।
आयत 119
وَتَرَكْنَا عَلَيْهِمَا فِى ٱلْـَٔاخِرِينَ
وَتَرَكْنَا
और बाक़ी रखा हमने
عَلَيْهِمَا
उन दोनों पर ( ज़िक्र ख़ैर)
فِى
among
ٱلْـَٔاخِرِينَ
बाद वालों में
और हमने पीछे आनेवाली नस्लों में उसका अच्छा ज़िक्र छोड़ा
तफ़्सीर:
और हमने बाद में आने वाले समुदायों में उन दोनों की अच्छी प्रशंसा और अच्छा स्मरण बाक़ी रखा।
आयत 120
سَلَـٰمٌ عَلَىٰ مُوسَىٰ وَهَـٰرُونَ
سَلَـٰمٌ
सलाम हो
عَلَىٰ
upon
مُوسَىٰ
ऊपर मूसा
وَهَـٰرُونَ
और हारून को
कि "सलाम है मूसा और हारून पर!"
तफ़्सीर:
उन दोनों के लिए अल्लाह की ओर से पवित्र सलाम, उनकी प्रशंसा तथा हर विपत्ति से सुरक्षा की दुआ हो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इस्हाक़ अलैहिस्सलाम की बशारत और मूसा-हारून अलैहिस्सलाम का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह अपने सच्चे बंदों को नेक नस्ल और मदद अता करता है।
आयत 121
إِنَّا كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ
إِنَّا
यक़ीनन हम
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نَجْزِى
हम बदला देते हैं
ٱلْمُحْسِنِينَ
मोहसिनीन को
निस्संदेह हम उत्तमकारों को ऐसा बदला देते है
तफ़्सीर:
निश्चित रूप से जिस तरह हमने मूसा और हारून को यह उत्तम बदला दिया, उसी तरह हम अपने पालनहार की आज्ञा का पालन करके अच्छे काम करने वालों को बदला देते हैं।
आयत 122
إِنَّهُمَا مِنْ عِبَادِنَا ٱلْمُؤْمِنِينَ
إِنَّهُمَا
बेशक वो दोनों
مِنْ
(were) of
عِبَادِنَا
हमारे बन्दों में से थे
ٱلْمُؤْمِنِينَ
जो मोमिन हैं
निश्चय ही वे दोनों हमारे ईमानवाले बन्दों में से थे
तफ़्सीर:
निश्चय मूसा और हारून हमारे उन बंदों में से थे, जो अल्लाह पर ईमान रखने वाले, उसके निर्धारित किए हुए विधानों का पालन करने वाले थे।
आयत 123
وَإِنَّ إِلْيَاسَ لَمِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ
وَإِنَّ
और बेशक
إِلْيَاسَ
इल्यास
لَمِنَ
(was) surely of
ٱلْمُرْسَلِينَ
अलबत्ता रसूलों में से था
और निस्संदेह इलयास भी रसूलों में से था।
तफ़्सीर:
निश्चय इलयास अपने पालनहार की ओर से भेजे गए रसूलों में से थे, जिन्हें अल्लाह ने नुबुव्वत व रिसालत (पैग़ंबरी) से सम्मानित किया था।
आयत 124
إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِۦٓ أَلَا تَتَّقُونَ
إِذْ
जब
قَالَ
उसने कहा
لِقَوْمِهِۦٓ
अपनी क़ौम को
أَلَا
क्या नहीं
تَتَّقُونَ
तुम डरते
याद करो, जब उसने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, "क्या तुम डर नहीं रखते?
तफ़्सीर:
जब उन्होंने अपनी जाति बनी इसराईल से कहा, जिनकी ओर वह रसूल बनाकर भेजे गए थे : ऐ मेरी जाति के लोगो! क्या तुम अल्लाह के आदेशों का पालन करके, जिसमें तौहीद शामिल है, और उसके निषेधों से बचकर, जिसमें शिर्क शामिल है, उससे डरते नहीं हो?!
आयत 125
أَتَدْعُونَ بَعْلًۭا وَتَذَرُونَ أَحْسَنَ ٱلْخَـٰلِقِينَ
أَتَدْعُونَ
क्या तुम पुकारते हो
بَعْلًۭا
बअल को
وَتَذَرُونَ
और तुम छोड़ देते हो (अल्लाह को)
أَحْسَنَ
बेहतरीन
ٱلْخَـٰلِقِينَ
पैदा करने वाले को
क्या तुम 'बअत' (देवता) को पुकारते हो और सर्वोत्तम सृष्टा। को छोड़ देते हो;
तफ़्सीर:
क्या तुम अल्लाह के अलावा अपनी मूर्ति 'बअ्ल' की पूजा करते हो और अल्लाह की इबादत छोड़ देते हो, जो पैदा करने वालों में सबस बेहतर है?!
आयत 126
ٱللَّهَ رَبَّكُمْ وَرَبَّ ءَابَآئِكُمُ ٱلْأَوَّلِينَ
ٱللَّهَ
अल्लाह
رَبَّكُمْ
रब तुम्हारा
وَرَبَّ
और रब
ءَابَآئِكُمُ
तुम्हारे आबा ओ अजदाद का
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों का
अपने रब और अपने अगले बाप-दादा के रब, अल्लाह को!"
तफ़्सीर:
जबकि अल्लाह ही तुम्हारा पालनहार है, जिसने तुम्हें पैदा किया और इससे पहले तुम्हारे बाप-दादा को भी पैदा किया। अतः वही इबादत का हक़दार है, न कि उसके अलावा वे मूर्तियाँ जो न तो लाभ पहुँचा सकती हैं और न हानि।
आयत 127
فَكَذَّبُوهُ فَإِنَّهُمْ لَمُحْضَرُونَ
فَكَذَّبُوهُ
तो उन्होंने झुठला दिया उसे
فَإِنَّهُمْ
तो बेशक वो
لَمُحْضَرُونَ
ज़रूर हाज़िर किए जाने वाले हैं
किन्तु उन्होंने उसे झुठला दिया। सौ वे निश्चय ही पकड़कर हाज़िर किए जाएँगे
तफ़्सीर:
तो उनकी जाति की प्रतिक्रिया यह थी कि उन्होंने उसे झुठला दिया, इसलिए वे अपने झुठलाने के कारण यातना में उपस्थित किए जाने वाले हैं।
आयत 128
إِلَّا عِبَادَ ٱللَّهِ ٱلْمُخْلَصِينَ
إِلَّا
मगर
عِبَادَ
बन्दे
ٱللَّهِ
अल्लाह के
ٱلْمُخْلَصِينَ
जो ख़ालिस किए हुए हैं
अल्लाह के बन्दों की बात और है, जिनको उसने चुन लिया है
तफ़्सीर:
परंतु उनकी जाति में से जो व्यक्ति मोमिन और अल्लाह की इबादत में इख़्लास (निष्ठा) से काम लेने वाला है; तो वह यातना में उपस्थित किए जाने से मुक्ति पाने वाला है।
आयत 129
وَتَرَكْنَا عَلَيْهِ فِى ٱلْـَٔاخِرِينَ
وَتَرَكْنَا
और बाक़ी रखा हमने
عَلَيْهِ
उस पर (ज़िक्र ख़ैर )
فِى
among
ٱلْـَٔاخِرِينَ
बाद वालों में
और हमने पीछे आनेवाली नस्लों में उसका अच्छा ज़िक्र छोड़ा
तफ़्सीर:
और हमने बाद में आने वाले समुदायों में उनकी अच्छी प्रशंसा और अच्छा स्मरण बाक़ी रखा।
आयत 130
سَلَـٰمٌ عَلَىٰٓ إِلْ يَاسِينَ
سَلَـٰمٌ
सलाम हो
عَلَىٰٓ
upon
إِلْ يَاسِينَ
ऊपर इल्यास के
कि "सलाम है इलयास पर!"
तफ़्सीर:
इलयास के लिए अल्लाह की ओर से सलाम और प्रशंसा हो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मूसा-हारून अलैहिस्सलाम की कौम के इनकार का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि हक की दावत को बार-बार झुठलाना कौम को गुमराही में डालता है।
आयत 131
إِنَّا كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ
إِنَّا
बेशक हम
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نَجْزِى
हम बदला देते हैं
ٱلْمُحْسِنِينَ
मोहसिनीन को
निस्संदेह हम उत्तमकारों को ऐसा ही बदला देते है
तफ़्सीर:
निश्चित रूप से जिस तरह हमने इलयास को यह उत्तम बदला दिया, उसी तरह हम अपने मोमिन बंदों में से अच्छे कार्य करने वालों को बदला देते हैं।
आयत 132
إِنَّهُۥ مِنْ عِبَادِنَا ٱلْمُؤْمِنِينَ
إِنَّهُۥ
और बेशक वो
مِنْ
of
عِبَادِنَا
हमारे बन्दों में से था
ٱلْمُؤْمِنِينَ
जो मोमिन हैं
निश्चय ही वह हमारे ईमानवाले बन्दों में से था
तफ़्सीर:
निश्चय इलयास हमारे सच्चे मोमिन बंदों में से थे, जो अपने पालनहार पर अपने ईमान में सच्चे थे।
आयत 133
وَإِنَّ لُوطًۭا لَّمِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ
وَإِنَّ
और बेशक
لُوطًۭا
लूत
لَّمِنَ
(was) of
ٱلْمُرْسَلِينَ
अलबत्ता रसूलों में से था
और निश्चय ही लूत भी रसूलों में से था
तफ़्सीर:
निश्चय लूत अलैहिस्सलाम अल्लाह के उन रसूलों में से थे, जिन्हें अल्लाह ने उनकी जातियों की ओर शुभ सूचना देने वाला और डराने वाला बनाकर भेजा था।
आयत 134
إِذْ نَجَّيْنَـٰهُ وَأَهْلَهُۥٓ أَجْمَعِينَ
إِذْ
जब
نَجَّيْنَـٰهُ
निजात दी हमने उसे
وَأَهْلَهُۥٓ
और उसके घरवालों को
أَجْمَعِينَ
सब के सब को
याद करो, जब हमने उसे और उसके सभी लोगों को बचा लिया,
तफ़्सीर:
आप उस समय को याद करें, जब हमने उन्हें और उनके सभी परिजनों को उनके समुदाय पर भेजी गई यातना से बचाया।
आयत 135
إِلَّا عَجُوزًۭا فِى ٱلْغَـٰبِرِينَ
إِلَّا
सिवाए
عَجُوزًۭا
एक बुढ़िया के
فِى
(was) among
ٱلْغَـٰبِرِينَ
पीछे रह जाने वालों में
सिवाय एक बुढ़िया के, जो पीछे रह जानेवालों में से थी
तफ़्सीर:
सिवाय उनकी पत्नी के। क्योंकि वह भी अपनी जाति पर आने वाली यातना की चपेट में आ गई। इसलिए कि वह भी उन्हीं की तरह काफ़िर थी।
आयत 136
ثُمَّ دَمَّرْنَا ٱلْـَٔاخَرِينَ
ثُمَّ
फिर
دَمَّرْنَا
तबाह कर दिया हमने
ٱلْـَٔاخَرِينَ
दूसरों को
फिर दूसरों को हमने तहस-नहस करके रख दिया
तफ़्सीर:
फिर हमने उनके समुदाय के बाकी उन लोगों को नष्ट कर दिया, जिन्होंने उन्हें झुठलाया था और जो कुछ वह लेकर आए थे उसपर विश्वास नहीं किया था।
आयत 137
وَإِنَّكُمْ لَتَمُرُّونَ عَلَيْهِم مُّصْبِحِينَ
وَإِنَّكُمْ
और बेशक तुम
لَتَمُرُّونَ
अलबत्ता तुम गुज़रते हो
عَلَيْهِم
उन पर
مُّصْبِحِينَ
इस हाल में कि सुबह करने वाले हो
और निस्संदेह तुम उनपर (उनके क्षेत्र) से गुज़रते हो कभी प्रातः करते हुए
तफ़्सीर:
और तुम (ऐ मक्का वालो!) सुबह के समय शाम (लेवंत) की यात्रा पर, उनके घरों से गुज़रते हो।
आयत 138
وَبِٱلَّيْلِ ۗ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
وَبِٱلَّيْلِ ۗ
और रात को
أَفَلَا
क्या भला नहीं
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल रखते
और रात में भी। तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?
तफ़्सीर:
तथा रात में भी तुम उनके पास से गुज़रते हो। तो क्या तुम समझते नहीं, तथा उनके झुठलाने और इनकार करने तथा ऐसा अनैतिक कार्य करने के बाद, जो उनसे पहले किसी ने नहीं किया था, उनके साथ जो कुछ हुआ, उससे नसीहत नहीं पकड़ते?!
आयत 139
وَإِنَّ يُونُسَ لَمِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ
وَإِنَّ
और बेशक
يُونُسَ
यूनुस
لَمِنَ
(was) surely of
ٱلْمُرْسَلِينَ
अलबत्ता रसूलों में से था
और निस्संदेह यूनुस भी रसूलो में से था
तफ़्सीर:
और हमारे बंदे यूनुस अल्लाह के उन रसूलों में से थे, जिन्हें अल्लाह ने उनकी जातियों की ओर शुभ सूचना देने वाला और डराने वाला बनाकर भेजा था।
आयत 140
إِذْ أَبَقَ إِلَى ٱلْفُلْكِ ٱلْمَشْحُونِ
إِذْ
जब
أَبَقَ
जब वो भाग कर गया
إِلَى
to
ٱلْفُلْكِ
तरफ़ कश्ती
ٱلْمَشْحُونِ
भरी हुई के
याद करो, जब वह भरी नौका की ओर भाग निकला,
तफ़्सीर:
जब वह अपने पालनहार की आज्ञा के बिना अपनी जाति के पास से भाग खड़े हुए और यात्रियों तथा सामान से भरी हुई कश्ती में सवार हो गए।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इलियास अलैहिस्सलाम की दावत और कौम के इनकार का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि बुतों की पूजा छोड़कर सिर्फ अल्लाह की तरफ बुलाना हर नबी का मुश्तरका पैगाम था।
आयत 141
فَسَاهَمَ فَكَانَ مِنَ ٱلْمُدْحَضِينَ
فَسَاهَمَ
तो क़ुरअ डाला
فَكَانَ
फिर वो हो गया
مِنَ
of
ٱلْمُدْحَضِينَ
हार जाने वालों में से
फिर पर्ची डालने में शामिल हुआ और उसमें मात खाई
तफ़्सीर:
जब कश्ती अपनी समाई से अधिक भरी होने के कारण डूबने के क़रीब हो गई, तो उसमें सवार लोगों ने, यात्रियों की बड़ी संख्या के कारण कश्ती के डूबने के डर से, क़ुर'आ-अंदाज़ी की, ताकि कुछ लोगों को फेंक दें। तो यूनुस अलैहिस्सलाम उन हारने वाले लोगों में से एक थे, चुनाँचे उन्होंने आपको समुद्र में फेंक दिया।
आयत 142
فَٱلْتَقَمَهُ ٱلْحُوتُ وَهُوَ مُلِيمٌۭ
فَٱلْتَقَمَهُ
तो लुक़्मा बना लिया उसका
ٱلْحُوتُ
मछली ने
وَهُوَ
और वो
مُلِيمٌۭ
मलामत ज़दा था
फिर उसे मछली ने निगल लिया और वह निन्दनीय दशा में ग्रस्त हो गया था।
तफ़्सीर:
जब उन लोगों ने उन्हें समुद्र में फेंक दिया, तो मछली ने उन्हें पकड़कर निगल लिया। जबकि उन्होंने अल्लाह की अनुमति के बिना समुद्र की ओर जाकर, ऐसा कार्य किया था, जो निंदा का पात्र था।
आयत 143
فَلَوْلَآ أَنَّهُۥ كَانَ مِنَ ٱلْمُسَبِّحِينَ
فَلَوْلَآ
फिर अगर ना
أَنَّهُۥ
ये कि
كَانَ
होता वो
مِنَ
of
ٱلْمُسَبِّحِينَ
तस्बीह करने वालों में से
अब यदि वह तसबीह करनेवाला न होता
तफ़्सीर:
अगर यह बात न होती कि यूनुस अलैहिस्सलाम इस विपत्ति से ग्रस्त होने से पहले भी अल्लाह को बहुत ज़्यादा याद करने वालों में से थे, तथा यदि वह मछली के पेट में भी अल्लाह की तसबीह करने वाले न होते।
आयत 144
لَلَبِثَ فِى بَطْنِهِۦٓ إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ
لَلَبِثَ
अलबत्ता वो ठहरा रहता
فِى
in
بَطْنِهِۦٓ
उसके पेट में
إِلَىٰ
until
يَوْمِ
उस दिन तक
يُبْعَثُونَ
(जब) वो दोबारा उठाए जाऐंगे
तो उसी के भीतर उस दिन तक पड़ा रह जाता, जबकि लोग उठाए जाएँगे।
तफ़्सीर:
तो वह मछली के पेट में क़ियामत के दिन तक रहते और वही उनकी क़ब्र बन जाता।
आयत 145
۞ فَنَبَذْنَـٰهُ بِٱلْعَرَآءِ وَهُوَ سَقِيمٌۭ
۞ فَنَبَذْنَـٰهُ
तो हमने फेंक दिया उसे
بِٱلْعَرَآءِ
चटियल मैदान में
وَهُوَ
इस हाल में कि वो
سَقِيمٌۭ
बीमार था
अन्ततः हमने उसे इस दशा में कि वह निढ़ाल था, साफ़ मैदान में डाल दिया।
तफ़्सीर:
फिर हमने उन्हें मछली के पेट से पेड़ों और निर्माण से रहित भूमि पर फेंक दिया, इस अवस्था में कि उनका शरीर एक अवधि तक मछली के पेट में रहने के कारण कमज़ोर हो गया था।
आयत 146
وَأَنۢبَتْنَا عَلَيْهِ شَجَرَةًۭ مِّن يَقْطِينٍۢ
وَأَنۢبَتْنَا
और उगाया हमने
عَلَيْهِ
उस पर
شَجَرَةًۭ
एक पौदा
مِّن
of
يَقْطِينٍۢ
कद्दू की बेल का
हमने उसपर बेलदार वृक्ष उगाया था
तफ़्सीर:
और हमने उनपर उस खाली भूमि में कुम्हड़े का एक पेड़ (बेल) उगा दिया, ताकि वह उससे साया प्राप्त करें और उसका फल खाएँ।
आयत 147
وَأَرْسَلْنَـٰهُ إِلَىٰ مِا۟ئَةِ أَلْفٍ أَوْ يَزِيدُونَ
وَأَرْسَلْنَـٰهُ
और भेजा हमने उसे
إِلَىٰ
to
مِا۟ئَةِ
a hundred
أَلْفٍ
तरफ़ सौ हज़ार (एक लाख) के
أَوْ
बल्कि
يَزِيدُونَ
वो ज़्यादा होंगे
और हमने उसे एक लाख या उससे अधिक (लोगों) की ओर भेजा
तफ़्सीर:
और हमने उन्हें उनकी जाति की ओर भेज दिया, जिनकी संख्या एक लाख थी, बल्कि वे उससे अधिक होंगे।
आयत 148
فَـَٔامَنُوا۟ فَمَتَّعْنَـٰهُمْ إِلَىٰ حِينٍۢ
فَـَٔامَنُوا۟
तो वो ईमान ले आए
فَمَتَّعْنَـٰهُمْ
तो हमने फ़ायदा दिया उन्हें
إِلَىٰ
for
حِينٍۢ
एक वक़्त तक
फिर वे ईमान लाए तो हमने उन्हें एक अवधि कर सुख भोगने का अवसर दिया।
तफ़्सीर:
चुनाँचे वे ईमान ले आए और यूनुस अलैहिस्सलाम के लाए हुए संदेश को सत्य माना। तो अल्लाह ने उन्हें, उनके सांसारिक जीवन में लाभ उठाने दिया, यहाँ तक कि उनके लिए उनकी निर्धारित समय सीमा समाप्त हो गई।
आयत 149
فَٱسْتَفْتِهِمْ أَلِرَبِّكَ ٱلْبَنَاتُ وَلَهُمُ ٱلْبَنُونَ
فَٱسْتَفْتِهِمْ
पस पूछो उनसे
أَلِرَبِّكَ
क्या आपके रब के लिए हैं
ٱلْبَنَاتُ
बेटियाँ
وَلَهُمُ
और उनके लिए हैं
ٱلْبَنُونَ
बेटे
अब उनसे पूछो, "क्या तुम्हारे रब के लिए तो बेटियाँ हों और उनके अपने लिए बेटे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ मुहम्मद!) आप मुश्रिकों से खंडन के तौर पर पूछें : क्या तुम अल्लाह के लिए बेटियाँ ठहराते हो, जिन्हें तुम नापसंद करते हो, और अपने लिए बेटे सिद्ध करते हो, जिन्हें तुम पसंद करते हों?! भला यह कौन सा विभाजन है?!
आयत 150
أَمْ خَلَقْنَا ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ إِنَـٰثًۭا وَهُمْ شَـٰهِدُونَ
أَمْ
या
خَلَقْنَا
बनाया हमने
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ
फ़रिश्तों को
إِنَـٰثًۭا
औरतें
وَهُمْ
जब कि वो
شَـٰهِدُونَ
हाज़िर थे
क्या हमने फ़रिश्तों को औरतें बनाया और यह उनकी आँखों देखी बात हैं?"
तफ़्सीर:
उन्होंने कैसे दावा किया कि फ़रिश्ते मादा हैं, जबकि वे उनकी रचना के समय उपस्थित नहीं थे और उन्होंने उनकी रचना को नहीं देखा है?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
यूनुस अलैहिस्सलाम के मछली के पेट के वाकिये का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि मुश्किल और तंग हालात में भी अल्लाह की तस्बीह और तौबा नजात का ज़रिया बनती है।
आयत 151
أَلَآ إِنَّهُم مِّنْ إِفْكِهِمْ لَيَقُولُونَ
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّهُم
बेशक वो
مِّنْ
of
إِفْكِهِمْ
अपने झूठ ही सो
لَيَقُولُونَ
अलबत्ता वो कहते हैं
सुन लो, निश्चय ही वे अपनी मनघड़ंत कहते है
तफ़्सीर:
सुन लो, निःसंदेह बहुदेववादी लोग अल्लाह पर झूठ बाँधते हुए और मिथ्यारोपण करते हुए उसकी ओर संतान की निसबत करते हैं, और निश्चित रूप से वे अपने इस दावे में झूठे हैं।
आयत 152
وَلَدَ ٱللَّهُ وَإِنَّهُمْ لَكَـٰذِبُونَ
وَلَدَ
कि जन्म दिया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
وَإِنَّهُمْ
और बेशक वो
لَكَـٰذِبُونَ
अलबत्ता झूठे हैं
कि "अल्लाह के औलाद हुई है!" निश्चय ही वे झूठे है।
तफ़्सीर:
सुन लो, निःसंदेह बहुदेववादी लोग अल्लाह पर झूठ बाँधते हुए और मिथ्यारोपण करते हुए उसकी ओर संतान की निसबत करते हैं, और निश्चित रूप से वे अपने इस दावे में झूठे हैं।
आयत 153
أَصْطَفَى ٱلْبَنَاتِ عَلَى ٱلْبَنِينَ
أَصْطَفَى
क्या उसने चुन लिया
ٱلْبَنَاتِ
बेटियों को
عَلَى
over
ٱلْبَنِينَ
बेटों पर
क्या उसने बेटों की अपेक्षा बेटियाँ चुन ली है?
तफ़्सीर:
क्या अल्लाह ने अपने लिए उन बेटों के स्थान पर जिन्हें तुम पसंद करते हो, उन लड़कियों को चुना है जिन्हें तुम नापसंद करते हो?! हरगिज़ नहीं।
आयत 154
مَا لَكُمْ كَيْفَ تَحْكُمُونَ
مَا
क्या है
لَكُمْ
तुम्हें
كَيْفَ
कैसे
تَحْكُمُونَ
तुम फ़ैसले करते हो
तुम्हें क्या हो गया है? तुम कैसा फ़ैसला करते हो?
तफ़्सीर:
(ऐ मुश्रिको!) तुम्हें क्या हो गया है कि यह अन्यायपूर्ण फ़ैसला कर रहे हो, कि अल्लाह के लिए बेटियाँ ठहराते हो और अपने लिए बेटे?!
आयत 155
أَفَلَا تَذَكَّرُونَ
أَفَلَا
क्या भला नहीं
تَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ते
तो क्या तुम होश से काम नहीं लेते?
तफ़्सीर:
क्या तुम अपने इस असत्य अक़ीदे के गलत होने के बारे में सोच-विचार नहीं करते?! क्योंकि अगर तुम सोच-विचार किए होते, तो इस तरह की बात न कहते।
आयत 156
أَمْ لَكُمْ سُلْطَـٰنٌۭ مُّبِينٌۭ
أَمْ
या
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
سُلْطَـٰنٌۭ
कोई दलील है
مُّبِينٌۭ
वाज़ेह
क्या तुम्हारे पास कोई स्पष्ट प्रमाण है?
तफ़्सीर:
क्या तुम्हारे पास किसी किताब या रसूल से इसका कोई स्पष्ट तर्क और प्रत्यक्ष प्रमाण है?!
आयत 157
فَأْتُوا۟ بِكِتَـٰبِكُمْ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
فَأْتُوا۟
पस ले आओ
بِكِتَـٰبِكُمْ
अपनी किताब
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
तो लाओ अपनी किताब, यदि तुम सच्चे हो
तफ़्सीर:
अगर तुम अपने दावे में सच्चे हो, तो अपनी वह पुस्तक लाओ जिसमें इसका प्रमाण हो।
आयत 158
وَجَعَلُوا۟ بَيْنَهُۥ وَبَيْنَ ٱلْجِنَّةِ نَسَبًۭا ۚ وَلَقَدْ عَلِمَتِ ٱلْجِنَّةُ إِنَّهُمْ لَمُحْضَرُونَ
وَجَعَلُوا۟
और उन्होंने बनाया
بَيْنَهُۥ
दर्मियान उसके
وَبَيْنَ
और दर्मियान
ٱلْجِنَّةِ
जिन्नों के
نَسَبًۭا ۚ
एक रिश्ता
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक
عَلِمَتِ
जान लिया
ٱلْجِنَّةُ
जिन्नों ने
إِنَّهُمْ
बेशक वो
لَمُحْضَرُونَ
ज़रूर हाज़िर किए जाऐंगे
उन्होंने अल्लाह और जिन्नों के बीच नाता जोड़ रखा है, हालाँकि जिन्नों को भली-भाँति मालूम है कि वे अवश्य पकड़कर हाज़िर किए जाएँगे-
तफ़्सीर:
मुश्रिकों ने यह दावा करके कि फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ हैं, अल्लाह और फ़रिश्तों के बीच, जो उनसे पोशीदा हैं, रिश्तेदारी बना दी। हालाँकि फ़रिश्तों को मालूम है कि अल्लाह मुश्रिकों को हिसाब के लिए ज़रूर हाज़िर करेगा।
आयत 159
سُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ عَمَّا يَصِفُونَ
سُبْحَـٰنَ
पाक है
ٱللَّهِ
अल्लाह
عَمَّا
उससे जो
يَصِفُونَ
वो बयान करते हैं
महान और उच्च है अल्लाह उससे, जो वे बयान करते है। -
तफ़्सीर:
अल्लाह उन बातों से पवित्र और सर्वोच्च है, जो मुश्रिक लोग उसके बारे में ऐसी चीज़ें वर्णन करते हैं जो उसकी महिमा के योग्य नहीं हैं, जैसे उसका बेटा और साझी होना आदि।
आयत 160
إِلَّا عِبَادَ ٱللَّهِ ٱلْمُخْلَصِينَ
إِلَّا
सिवाए
عِبَادَ
बन्दे
ٱللَّهِ
अल्लाह के
ٱلْمُخْلَصِينَ
जो ख़ालिस किए हुए हैं
अल्लाह के उन बन्दों की बात और है, जिन्हें उसने चुन लिया
तफ़्सीर:
सिवाय अल्लाह के चुने हुए बंदों के। क्योंकि वे अल्लाह को केवल उसकी महिमा के योग्य उसके प्रताप और पूर्णता के गुणों के साथ वर्णित करते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मुशरिकों के फरिश्तों को बेटियां कहने की गलत बात के रद्द का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह के बारे में बगैर इल्म के बातें बनाना सख्त गुनाह है।
आयत 161
فَإِنَّكُمْ وَمَا تَعْبُدُونَ
فَإِنَّكُمْ
पस बेशक तुम सब
وَمَا
और जिनकी
تَعْبُدُونَ
तुम इबादत करते हो
अतः तुम और जिनको तुम पूजते हो वे,
तफ़्सीर:
तो (ऐ मुश्रिको!) तुम और तुम्हारे वे पूज्य जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो।
आयत 162
مَآ أَنتُمْ عَلَيْهِ بِفَـٰتِنِينَ
مَآ
नहीं
أَنتُمْ
तुम
عَلَيْهِ
उसके ख़िलाफ़
بِفَـٰتِنِينَ
फ़ितने में डालने वाले
तुम सब अल्लाह के विरुद्ध किसी को बहका नहीं सकते,
तफ़्सीर:
तुम किसी को भी सत्य धर्म से नहीं भटका सकते।
आयत 163
إِلَّا مَنْ هُوَ صَالِ ٱلْجَحِيمِ
إِلَّا
मगर
مَنْ
उसे जो
هُوَ
वो
صَالِ
दाख़िल होने वाला
ٱلْجَحِيمِ
जहन्नम में
सिवाय उसके जो जहन्नम की भड़कती आग में पड़ने ही वाला हो
तफ़्सीर:
सिवाय उसके, जिसके बारे में अल्लाह ने निर्णय कर दिया है कि वह जहन्नम में प्रवेश करने वालों में से है। तो अल्लाह उसके बारे में अपने निर्णय को लागू करेगा। चुनाँचे वह कुफ़्र करेगा और जहन्नम में प्रवेश करेगा। जहाँ तक तुम्हारा और तुम्हारे पूज्यों का संबंध है, तो तुम्हें ऐसा करने की कोई शक्ति हासिल नहीं है।
आयत 164
وَمَا مِنَّآ إِلَّا لَهُۥ مَقَامٌۭ مَّعْلُومٌۭ
وَمَا
और नहीं
مِنَّآ
हम में से कोई
إِلَّا
मगर
لَهُۥ
उसके लिए
مَقَامٌۭ
एक मुक़ाम है
مَّعْلُومٌۭ
मालूम
और हमारी ओर से उसके लिए अनिवार्यतः एक ज्ञात और नियत स्थान है
तफ़्सीर:
फ़रिश्तों ने अल्लाह के प्रति अपनी दासता और मुश्रिकों के दावों से अपने बरी होने को स्पष्ट करते हुआ कहा : हममें से प्रत्येक व्यक्ति का अल्लाह की इबादत और उसकी आज्ञाकारिता में एक नियत स्थान है।
आयत 165
وَإِنَّا لَنَحْنُ ٱلصَّآفُّونَ
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَنَحْنُ
अलबत्ता हम
ٱلصَّآفُّونَ
सफ़ बाँधने वाले हैं
और हम ही पंक्तिबद्ध करते है।
तफ़्सीर:
तथा निःसंदेह हम - फ़रिश्ते - अल्लाह की इबादत और उसके आज्ञापालन में पंक्तियों में खड़े रहते हैं। और निश्चय हम अल्लाह को उन विशेषताओं और गुणों से पवित्र ठहराते हैं, जो उसकी महिमा के योग्य नहीं हैं।
आयत 166
وَإِنَّا لَنَحْنُ ٱلْمُسَبِّحُونَ
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَنَحْنُ
अलबत्ता हम ही
ٱلْمُسَبِّحُونَ
तस्बीह करने वाले हैं
और हम ही महानता बयान करते है
तफ़्सीर:
तथा निःसंदेह हम - फ़रिश्ते - अल्लाह की इबादत और उसके आज्ञापालन में पंक्तियों में खड़े रहते हैं। और निश्चय हम अल्लाह को उन विशेषताओं और गुणों से पवित्र ठहराते हैं, जो उसकी महिमा के योग्य नहीं हैं।
आयत 167
وَإِن كَانُوا۟ لَيَقُولُونَ
وَإِن
और बेशक
كَانُوا۟
थे वो
لَيَقُولُونَ
अलबत्ता वो कहते
वे तो कहा करते थे,
तफ़्सीर:
मक्का के मुश्रिक मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नबी बनाए जाने से पहले कहा करते थे : अगर हमारे पास पहले लोगों की किताबों, उदाहरण के तौर पर तौरात, जैसी कोई किताब होती; तो हम अल्लाह ही के लिए इबादत को ख़ालिस करते। जबकि वे इस बारे में झूठे हैं। क्योंकि उनके पास मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क़ुरआन लेकर आए, परंतु उन्होंने उसका इनकार कर दिया। अतः शीघ्र ही वे उस गंभीर यातना को जान लेंगे जो क़ियामत के दिन उनकी प्रतीक्षा कर रही है।
आयत 168
لَوْ أَنَّ عِندَنَا ذِكْرًۭا مِّنَ ٱلْأَوَّلِينَ
لَوْ
अगर
أَنَّ
ये कि (होती)
عِندَنَا
हमारे पास
ذِكْرًۭا
नसीहत
مِّنَ
from
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों में से
"यदि हमारे पास पिछलों की कोई शिक्षा होती
तफ़्सीर:
मक्का के मुश्रिक मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नबी बनाए जाने से पहले कहा करते थे : अगर हमारे पास पहले लोगों की किताबों, उदाहरण के तौर पर तौरात, जैसी कोई किताब होती; तो हम अल्लाह ही के लिए इबादत को ख़ालिस करते। जबकि वे इस बारे में झूठे हैं। क्योंकि उनके पास मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क़ुरआन लेकर आए, परंतु उन्होंने उसका इनकार कर दिया। अतः शीघ्र ही वे उस गंभीर यातना को जान लेंगे जो क़ियामत के दिन उनकी प्रतीक्षा कर रही है।
आयत 169
لَكُنَّا عِبَادَ ٱللَّهِ ٱلْمُخْلَصِينَ
لَكُنَّا
अलबत्ता होते हम
عِبَادَ
बन्दे
ٱللَّهِ
अल्लाह के
ٱلْمُخْلَصِينَ
जो ख़ालिस किए हुए हैं
तो हम अल्लाह के चुने हुए बन्दे होते।"
तफ़्सीर:
मक्का के मुश्रिक मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नबी बनाए जाने से पहले कहा करते थे : अगर हमारे पास पहले लोगों की किताबों, उदाहरण के तौर पर तौरात, जैसी कोई किताब होती; तो हम अल्लाह ही के लिए इबादत को ख़ालिस करते। जबकि वे इस बारे में झूठे हैं। क्योंकि उनके पास मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क़ुरआन लेकर आए, परंतु उन्होंने उसका इनकार कर दिया। अतः शीघ्र ही वे उस गंभीर यातना को जान लेंगे जो क़ियामत के दिन उनकी प्रतीक्षा कर रही है।
आयत 170
فَكَفَرُوا۟ بِهِۦ ۖ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ
فَكَفَرُوا۟
तो उन्होंने कुफ़्र किया
بِهِۦ ۖ
साथ उसके
فَسَوْفَ
तो अनक़रीब
يَعْلَمُونَ
वो जान लेंगे
किन्तु उन्होंने इनकार कर दिया, तो अब जल्द ही वे जान लेंगे
तफ़्सीर:
मक्का के मुश्रिक मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नबी बनाए जाने से पहले कहा करते थे : अगर हमारे पास पहले लोगों की किताबों, उदाहरण के तौर पर तौरात, जैसी कोई किताब होती; तो हम अल्लाह ही के लिए इबादत को ख़ालिस करते। जबकि वे इस बारे में झूठे हैं। क्योंकि उनके पास मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क़ुरआन लेकर आए, परंतु उन्होंने उसका इनकार कर दिया। अतः शीघ्र ही वे उस गंभीर यातना को जान लेंगे जो क़ियामत के दिन उनकी प्रतीक्षा कर रही है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
फरिश्तों की सफबंदी और तस्बीह का ज़िक्र दोबारा है। यह हमें सिखाता है कि हर मखलूक अल्लाह की तस्बीह और इबादत में मशगूल है, इंसान को भी इसमें शामिल होना चाहिए।
आयत 171
وَلَقَدْ سَبَقَتْ كَلِمَتُنَا لِعِبَادِنَا ٱلْمُرْسَلِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
سَبَقَتْ
पहले गुज़र चुकी है
كَلِمَتُنَا
बात हमारी
لِعِبَادِنَا
हमारे बन्दों के लिए
ٱلْمُرْسَلِينَ
जो भेजे हुए हैं
और हमारे अपने उन बन्दों के हक़ में, जो रसूल बनाकर भेजे गए, हमारी बात पहले ही निश्चित हो चुकी है
तफ़्सीर:
और हमारे रसूलों के संबंध में हमारी बात गुज़र चुकी है कि वही अपने दुश्मनों पर विजयी रहेंगे क्योंकि अल्लाह ने उन्हें तर्क और शक्ति प्रदान की है। और यह कि हमारे उन सैनिकों ही को प्रभुत्व प्राप्त होगा, जो अल्लाह के मार्ग में इसलिए लड़ाई करते हैं ताकि अल्लाह का वचन सर्वोच्च हो।
आयत 172
إِنَّهُمْ لَهُمُ ٱلْمَنصُورُونَ
إِنَّهُمْ
बेशक वो
لَهُمُ
अलबत्ता वो ही
ٱلْمَنصُورُونَ
मदद किए जाऐंगे
कि निश्चय ही उन्हीं की सहायता की जाएगी।
तफ़्सीर:
और हमारे रसूलों के संबंध में हमारी बात गुज़र चुकी है कि वही अपने दुश्मनों पर विजयी रहेंगे क्योंकि अल्लाह ने उन्हें तर्क और शक्ति प्रदान की है। और यह कि हमारे उन सैनिकों ही को प्रभुत्व प्राप्त होगा, जो अल्लाह के मार्ग में इसलिए लड़ाई करते हैं ताकि अल्लाह का वचन सर्वोच्च हो।
आयत 173
وَإِنَّ جُندَنَا لَهُمُ ٱلْغَـٰلِبُونَ
وَإِنَّ
और बेशक
جُندَنَا
लश्कर हमारा
لَهُمُ
अलबत्ता वो ही है
ٱلْغَـٰلِبُونَ
ग़ालिब आने वाला
और निश्चय ही हमारी सेना ही प्रभावी रहेगी
तफ़्सीर:
और हमारे रसूलों के संबंध में हमारी बात गुज़र चुकी है कि वही अपने दुश्मनों पर विजयी रहेंगे क्योंकि अल्लाह ने उन्हें तर्क और शक्ति प्रदान की है। और यह कि हमारे उन सैनिकों ही को प्रभुत्व प्राप्त होगा, जो अल्लाह के मार्ग में इसलिए लड़ाई करते हैं ताकि अल्लाह का वचन सर्वोच्च हो।
आयत 174
فَتَوَلَّ عَنْهُمْ حَتَّىٰ حِينٍۢ
فَتَوَلَّ
तो मुँह फेर लीजिए
عَنْهُمْ
उनसे
حَتَّىٰ
until
حِينٍۢ
एक वक़्त तक
अतः एक अवधि तक के लिए उनसे रुख़ फेर लो
तफ़्सीर:
तो (ऐ रसूल!) इन दुश्मनी रखने वाले मुश्रिकों से एक अवधि तक के लिए, जिसे अल्लाह जानता है, मुँह फेरे रहें यहाँ तक कि उनकी यातना का समय आ जाए।
आयत 175
وَأَبْصِرْهُمْ فَسَوْفَ يُبْصِرُونَ
وَأَبْصِرْهُمْ
और देखते रहिए उन्हें
فَسَوْفَ
पस अनक़रीब
يُبْصِرُونَ
वो भी देखेंगे
और उन्हें देखते रहो। वे भी जल्द ही (अपना परिणाम) देख लेंगे
तफ़्सीर:
तथा उन्हें देखें जब उनपर यातना उतरे। चुनाँचे वे भी उस समय देख लेंगे, जब उन्हें देखने से कोई लाभ नहीं होगा।
आयत 176
أَفَبِعَذَابِنَا يَسْتَعْجِلُونَ
أَفَبِعَذَابِنَا
क्या भला हमारे अज़ाब को
يَسْتَعْجِلُونَ
वो जल्दी माँगते हैं
क्या वे हमारी यातना के लिए जल्दी मचा रहे हैं?
तफ़्सीर:
क्या ये मुश्रिक लोग अल्लाह की यातना के लिए जल्दी कर रहे हैं?!
आयत 177
فَإِذَا نَزَلَ بِسَاحَتِهِمْ فَسَآءَ صَبَاحُ ٱلْمُنذَرِينَ
فَإِذَا
फिर जब
نَزَلَ
वो उतरेगा
بِسَاحَتِهِمْ
उनके सहन में
فَسَآءَ
तो बहुत बुरी होगी
صَبَاحُ
सुबह
ٱلْمُنذَرِينَ
डराए जाने वालों की
तो जब वह उनके आँगन में उतरेगी तो बड़ी ही बुरी सुबह होगी उन लोगों की, जिन्हें सचेत किया जा चुका है!
तफ़्सीर:
चुनाँचे जब उनपर अल्लाह की यातना उतरेगी, तो उनकी सुबह बहुत ही बुरी सुबह होगी।
आयत 178
وَتَوَلَّ عَنْهُمْ حَتَّىٰ حِينٍۢ
وَتَوَلَّ
और मुँह फेर लीजिए
عَنْهُمْ
उनसे
حَتَّىٰ
for
حِينٍۢ
एक वक़्त तक
एक अवधि तक के लिए उनसे रुख़ फेर लो
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) उनसे मुँह फेर लें, यहाँ तक कि अल्लाह उनकी यातना का फैसला कर दे।
आयत 179
وَأَبْصِرْ فَسَوْفَ يُبْصِرُونَ
وَأَبْصِرْ
और देखते रहिए
فَسَوْفَ
तो अनक़रीब
يُبْصِرُونَ
वो भी देखेंगे
और देखते रहो, वे जल्द ही देख लेंगे
तफ़्सीर:
और आप देखते रहें। बहुत जल्द ये लोग भी देख लेंगे कि उनपर अल्लाह की कौन-सी यातना और सज़ा उतरती है।
आयत 180
سُبْحَـٰنَ رَبِّكَ رَبِّ ٱلْعِزَّةِ عَمَّا يَصِفُونَ
سُبْحَـٰنَ
पाक है
رَبِّكَ
रब आपका
رَبِّ
रब
ٱلْعِزَّةِ
इज़्ज़त वाला
عَمَّا
उससे जो
يَصِفُونَ
वो बयान करते हैं
महान और उच्च है तुम्हारा रब, प्रताप का स्वामी, उन बातों से जो वे बताते है!
तफ़्सीर:
(ऐ मुहम्मद!) आपका पालनहार, जो सारी शक्ति का मालिक है, उन सभी कमियों और त्रुटियों से पवित्र और सर्वोच्च है, जो बहुदेववादी उसके बारे में बयान करते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
रसूलों की मदद और फतह के वादे का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि हक की मदद और फतह आखिरकार अल्लाह की तरफ से ही आती है, इसलिए मायूस नहीं होना चाहिए।
आयत 181
وَسَلَـٰمٌ عَلَى ٱلْمُرْسَلِينَ
وَسَلَـٰمٌ
और सलाम है
عَلَى
upon
ٱلْمُرْسَلِينَ
सब रसूलों पर
और सलाम है रसूलों पर;
तफ़्सीर:
और अल्लाह का सलाम (अभिवादन) और उसकी प्रशंसा है, उसके सम्माननीय रसूलों के लिए।
आयत 182
وَٱلْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
وَٱلْحَمْدُ
और सब तारीफ़
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए है
رَبِّ
जो रब है
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों का
औऱ सब प्रशंसा अल्लाह, सारे संसार के रब के लिए है
तफ़्सीर:
हर प्रकार की प्रशंसा और स्तुति सर्वशक्तिमान व महिमावान अल्लाह के लिए है। क्योंकि वही उसके योग्य है, और वह सारे संसार का पालनहार है, उसके सिवा उनका कोई पालनहार नहीं है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह की पाकी और तमाम तारीफ के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि हर काम के आखिर में अल्लाह की तारीफ और शुक्र अदा करना एक अच्छी आदत है।
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