नाम का मतलब
साद (मुक़त्तआत हुरूफ)
पृष्ठभूमि
सूरह साद में दाऊद अलैहिस्सलाम के इंसाफ, सुलेमान अलैहिस्सलाम की आज़माइश और अय्यूब अलैहिस्सलाम के सब्र का ज़िक्र है, साथ ही इबलीस की नाफरमानी का वाकिया दोबारा दोहराया गया है।
फ़ज़ीलत / सार
इसमें दाऊद अलैहिस्सलाम की तौबा और इंसाफ की मिसाल है, जो हुक्मरानों और फैसला करने वालों के लिए बड़ी नसीहत है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ صٓ ۚ وَٱلْقُرْءَانِ ذِى ٱلذِّكْرِ
صٓ ۚ
ص
وَٱلْقُرْءَانِ
क़सम है क़ुरआन
ذِى
full (of) reminder
ٱلذِّكْرِ
नसीहत वाले की
साद। क़सम है, याददिहानी-वाले क़ुरआन की (जिसमें कोई कमी नहीं कि धर्मविरोधी सत्य को न समझ सकें)
तफ़्सीर:
{सॉद} इस तरह के अक्षरों (हुरूफ़-ए-मुक़त्तआत) के विषय में सूरतुल-बक़रा के आरंभ में बात गुज़र चुकी है। अल्लाह ने क़ुरआन की क़सम खाई है, जिसमें लोगों को उस चीज़ की याद दिलाना शामिल है, जो दुनिया और आखिरत में उनके लिए लाभदायक है। बात वैसी नहीं है, जैसा मुश्रिक लोग समझते हैं कि अल्लाह के साथ कोई भागीदार हैं।
आयत 2
بَلِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ فِى عِزَّةٍۢ وَشِقَاقٍۢ
بَلِ
बल्कि
ٱلَّذِينَ
वो लोग जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
فِى
(are) in
عِزَّةٍۢ
तकब्बुर में
وَشِقَاقٍۢ
और मुख़ालिफ़त में हैं
बल्कि जिन्होंने इनकार किया वे गर्व और विरोध में पड़े हुए है
तफ़्सीर:
लेकिन काफ़िर लोग अल्लाह की तौहीद (एकेश्वरवाद) के बार में स्वाभिमान और अहंकार में हैं, तथा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के विरोध और उनसे दुश्मनी में पड़े हुए हैं।
आयत 3
كَمْ أَهْلَكْنَا مِن قَبْلِهِم مِّن قَرْنٍۢ فَنَادَوا۟ وَّلَاتَ حِينَ مَنَاصٍۢ
كَمْ
कितनी ही
أَهْلَكْنَا
हलाक कीं हमने
مِن
before them
قَبْلِهِم
उनसे पहले
مِّن
of
قَرْنٍۢ
उम्मतें
فَنَادَوا۟
तो उन्होंने पुकारा
وَّلَاتَ
और ना थी
حِينَ
उस वक़्त
مَنَاصٍۢ
कोई पनाहगाह
उनसे पहले हमने कितनी ही पीढ़ियों को विनष्ट किया, तो वे लगे पुकारने। किन्तु वह समय हटने-बचने का न था
तफ़्सीर:
इनसे पहले हमने कितने ही समुदायों को विनष्ट कर दिया, जिन्होंने अपने रसूलों को झुठलाया था। फिर जब उनपर अज़ाब उतर आया, तो उन्होंने मदद की गुहार लगाई। लेकिन वह समय उनके लिए अज़ाब से बचने का समय नहीं था कि उन्हें मदद की गुहार लगाना कोई लाभ देता।
आयत 4
وَعَجِبُوٓا۟ أَن جَآءَهُم مُّنذِرٌۭ مِّنْهُمْ ۖ وَقَالَ ٱلْكَـٰفِرُونَ هَـٰذَا سَـٰحِرٌۭ كَذَّابٌ
وَعَجِبُوٓا۟
और उन्होंने ताअज्जुब किया
أَن
कि
جَآءَهُم
आया उनके पास
مُّنذِرٌۭ
एक डराने वाला
مِّنْهُمْ ۖ
उनमें से
وَقَالَ
और कहा
ٱلْكَـٰفِرُونَ
काफ़िरों ने
هَـٰذَا
ये है
سَـٰحِرٌۭ
जादूगर
كَذَّابٌ
सख़्त झूठा
उन्होंने आश्चर्य किया इसपर कि उनके पास उन्हीं में से एक सचेतकर्ता आया और इनकार करनेवाले कहने लगे, "यह जादूगर है बड़ा झूठा
तफ़्सीर:
उन्होंने उस समय आश्चर्य प्रकट किया जब उनके पास उन्हीं में से एक रसूल आया, जो उन्हें उनके अपने कुफ़्र पर क़ायम रहने पर अल्लाह की यातना से डराता था। तथा काफ़िरों ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लाए हुए धर्म की सच्चाई के प्रमाणों को देखकर कहा : यह एक जादूगर व्यक्ति है, जो लोगों को मोहित कर देता है। यह अपने इस दावे में बड़ा झूठा है कि वह अल्लाह का एक रसूल है, जिसकी ओर वह़्य (प्रकाशना) की जाती है।
आयत 5
أَجَعَلَ ٱلْـَٔالِهَةَ إِلَـٰهًۭا وَٰحِدًا ۖ إِنَّ هَـٰذَا لَشَىْءٌ عُجَابٌۭ
أَجَعَلَ
क्या उसने बना लिया
ٱلْـَٔالِهَةَ
बहुत से इलाहों को
إِلَـٰهًۭا
इलाह
وَٰحِدًا ۖ
एक ही
إِنَّ
बेशक
هَـٰذَا
ये
لَشَىْءٌ
अलबत्ता एक चीज़ है
عُجَابٌۭ
बहुत अजीब
क्या उसने सारे उपास्यों को अकेला एक उपास्य ठहरा दिया? निस्संदेह यह तो बहुत अचम्भेवाली चीज़ है!"
तफ़्सीर:
क्या इस व्यक्ति ने विभिन्न पूज्यों को एक ही पूज्य बना दिया, जिसके सिवा कोई दूसरा पूज्य नहीं?! निश्चय उसका यह कार्य अत्यंत आश्चर्यजनक है।
आयत 6
وَٱنطَلَقَ ٱلْمَلَأُ مِنْهُمْ أَنِ ٱمْشُوا۟ وَٱصْبِرُوا۟ عَلَىٰٓ ءَالِهَتِكُمْ ۖ إِنَّ هَـٰذَا لَشَىْءٌۭ يُرَادُ
وَٱنطَلَقَ
और चल दिए
ٱلْمَلَأُ
सरदार
مِنْهُمْ
उनमें से
أَنِ
कि
ٱمْشُوا۟
चलो
وَٱصْبِرُوا۟
और जमे रहो
عَلَىٰٓ
over
ءَالِهَتِكُمْ ۖ
अपने इलाहों पर
إِنَّ
बेशक
هَـٰذَا
ये
لَشَىْءٌۭ
अलबत्ता एक चीज़ है
يُرَادُ
जो इरादा की जारही है
और उनके सरदार (यह कहते हुए) चल खड़े हुए कि "चलते रहो और अपने उपास्यों पर जमें रहो। निस्संदेह यह वांछिच चीज़ है
तफ़्सीर:
उनके प्रमुख और बड़े लोग अपने अनुयायियों से यह कहते हुए चल खड़े हुए कि : तुम उसी पर चलते रहो, जिसपर पहले थे। मुहम्मद के धर्म में प्रवेश न करो। अपने पूज्यों की इबादत पर जमे रहो। क्योंकि मुहम्मद ने जो तुम्हें एक अल्लाह की इबादत करने के लिए बुलाया है, वह एक जानबूझकर की गई (सुनियोजित) बात है, वह चाहता है कि हमसे ऊपर उठ जाए और हम उसके अनुयायी (पीछे चलने वाले) बन जाएँ।
आयत 7
مَا سَمِعْنَا بِهَـٰذَا فِى ٱلْمِلَّةِ ٱلْـَٔاخِرَةِ إِنْ هَـٰذَآ إِلَّا ٱخْتِلَـٰقٌ
مَا
नहीं
سَمِعْنَا
सुनी हमने
بِهَـٰذَا
ये (बात)
فِى
in
ٱلْمِلَّةِ
मिल्लत में
ٱلْـَٔاخِرَةِ
पिछली
إِنْ
नहीं
هَـٰذَآ
ये
إِلَّا
मगर
ٱخْتِلَـٰقٌ
मन गढ़त
यह बात तो हमने पिछले धर्म में सुनी ही नहीं। यह तो बस मनघड़त है
तफ़्सीर:
मुहम्मद हमें जिस तौहीद (एकेश्वरवाद) की ओर बुला रहे हैं, वह बात हमने उस धर्म में नहीं सुनी जिसपर हमने अपने बाप-दादा को पाया और न ही ईसा अलैहिस्सलाम के धर्म में वह (तौहीद की) बात सुनी। यह बात जो हमने उनसे सुनी है, झूठ और गढ़ी हुई बात के सिवा कुछ नहीं है।
आयत 8
أَءُنزِلَ عَلَيْهِ ٱلذِّكْرُ مِنۢ بَيْنِنَا ۚ بَلْ هُمْ فِى شَكٍّۢ مِّن ذِكْرِى ۖ بَل لَّمَّا يَذُوقُوا۟ عَذَابِ
أَءُنزِلَ
क्या नाज़िल की गई
عَلَيْهِ
उस पर
ٱلذِّكْرُ
नसीहत
مِنۢ
from
بَيْنِنَا ۚ
हमारे दर्मियान से
بَلْ
बल्कि
هُمْ
वो
فِى
(are) in
شَكٍّۢ
शक में हैं
مِّن
about
ذِكْرِى ۖ
मेरी नसीहत से
بَل
बल्कि
لَّمَّا
अभी तक नहीं
يَذُوقُوا۟
उन्होंने चखा
عَذَابِ
अज़ाब मेरा
क्या हम सबमें से (चुनकर) इसी पर अनुस्मृति अवतरित हुई है?" नहीं, बल्कि वे मेरी अनुस्मृति के विषय में संदेह में है, बल्कि उन्होंने अभी तक मेरी यातना का मज़ा चखा ही नहीं है
तफ़्सीर:
क्या यह सही है कि हमारे बीच में से उसी पर क़ुरआन उतरे और यह उसी के लिए विशिष्ट हो, और यह हमपर न उतरे, जबकि हम सरदार और प्रमुख लोग हैं?! बल्कि, इन बहुदेववादियों को आपपर उतरने वाली वह़्य (प्रकाशना) के बारे में संदेह है। तथा उन्होंने अभी तक अल्लाह की यातना नहीं चखी है, इसलिए वे मोहलत दिए जाने से धोखे में पड़ गए हैं। यदि उन्होंने यातना का स्वाद चखा होता, तो अल्लाह का इनकार करने, उसके साथ साझी ठहराने और आपकी ओर जो वह़्य (प्रकाशना) की जाती है, उसके बारे में संदेह करने का साहस नहीं करते।
आयत 9
أَمْ عِندَهُمْ خَزَآئِنُ رَحْمَةِ رَبِّكَ ٱلْعَزِيزِ ٱلْوَهَّابِ
أَمْ
क्या
عِندَهُمْ
उनके पास
خَزَآئِنُ
ख़ज़ाने हैं
رَحْمَةِ
रहमत के
رَبِّكَ
आपके रब की
ٱلْعَزِيزِ
जो बड़ा ज़बरदस्त हैं
ٱلْوَهَّابِ
बहुत अता करने वाला है
या, तेरे प्रभुत्वशाली, बड़े दाता रब की दयालुता के ख़ज़ाने उनके पास है?
तफ़्सीर:
क्या इन झुठलाने वाले मुश्रिकों के पास आपके उस प्रभुत्वशाली पालनहार के अनुग्रह के खज़ाने हैं, जिसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता, जो जिसे चाहता है जो चाहता है, देता है। तथा उसके अनुग्रह के खज़ानों में नुबुव्वत भी शामिल है। अतः वह जिसे चाहता है, उससे सम्मानित करता है। यह उनका नहीं है कि वे उसे जिसे चाहें दें और जिसे चाहें उससे वंचित कर दें।
आयत 10
أَمْ لَهُم مُّلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا ۖ فَلْيَرْتَقُوا۟ فِى ٱلْأَسْبَـٰبِ
أَمْ
या
لَهُم
उनके लिए
مُّلْكُ
बादशाहत है
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन की
وَمَا
और जो
بَيْنَهُمَا ۖ
दर्मियान है उन दोनों के
فَلْيَرْتَقُوا۟
पस चाहिए कि वो चढ़ जाऐं
فِى
by
ٱلْأَسْبَـٰبِ
रास्तों में (आसमान के)
या, आकाशों और धरती और जो कुछ उनके बीच है, उन सबकी बादशाही उन्हीं की है? फिर तो चाहिए कि वे रस्सियों द्वारा ऊपर चढ़ जाए
तफ़्सीर:
या आकाशों और धरती तथा उनके बीच मौजूद सारी चीज़ों की बादशाही उन्हीं के पास है? इसलिए उन्हें देने और न देने का अधिकार प्राप्त है? यदि यह उनका दावा है, तो उन्हें आकाश पर पहुँचाने वाले कारणों को अपनाना चाहिए, ताकि वे जो चाहें देने या न देने का फैसला जारी कर सकें। स्पष्ट है कि वे ऐसा हरगिज़ नहीं कर पाएँगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुफ्फार के घमंड और नबी ﷺ से मुकाबले की कोशिश का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि हक बात के मुकाबले में घमंड करने वाले आखिरकार नाकाम रहते हैं।
आयत 11
جُندٌۭ مَّا هُنَالِكَ مَهْزُومٌۭ مِّنَ ٱلْأَحْزَابِ
جُندٌۭ
Soldiers
مَّا
एक लश्कर हक़ीर सा
هُنَالِكَ
उसी जगह
مَهْزُومٌۭ
शिकस्त खाने वाला है
مِّنَ
among
ٱلْأَحْزَابِ
गिरोहों में से
वह एक साधारण सेना है (विनष्ट होनेवाले) दलों में से, वहाँ मात खाना जिसकी नियति है
तफ़्सीर:
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को झुठलाने वाले ये लोग एक पराजित सेना हैं, अपने से पूर्व की उन सेनाओं की तरह, जिन्होंने अपने रसूलों को झुठलाया था।
आयत 12
كَذَّبَتْ قَبْلَهُمْ قَوْمُ نُوحٍۢ وَعَادٌۭ وَفِرْعَوْنُ ذُو ٱلْأَوْتَادِ
كَذَّبَتْ
झुठलाया
قَبْلَهُمْ
उनसे पहले
قَوْمُ
क़ौमे
نُوحٍۢ
नूह ने
وَعَادٌۭ
और आद
وَفِرْعَوْنُ
और फ़िरऔन
ذُو
(the) owner
ٱلْأَوْتَادِ
मेख़ों वाले ने
उनसे पहले नूह की क़ौम और आद और मेखोंवाले फ़िरऔन ने झुठलाया
तफ़्सीर:
ये झुठलाने वाले, पहले झुठलाने वाले नहीं हैं। क्योंकि इनसे पहले नूह अलैहिस्सलाम की जाति ने झुठलाया, आद ने झुठलाया तथा फ़िरऔन ने झुठलाया, जिसके पास मेखें होती थीं, जिनसे वह लोगों को दंडित किया करता था।
आयत 13
وَثَمُودُ وَقَوْمُ لُوطٍۢ وَأَصْحَـٰبُ لْـَٔيْكَةِ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلْأَحْزَابُ
وَثَمُودُ
और समूद ने
وَقَوْمُ
और क़ौमे
لُوطٍۢ
लूत
وَأَصْحَـٰبُ
and (the) companions
لْـَٔيْكَةِ ۚ
और ऐका वालों ने
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही हैं वो
ٱلْأَحْزَابُ
गिरोह
और समूद और लूत की क़ौम और 'ऐकावाले' भी, ये है वे दल
तफ़्सीर:
तथा समूद ने झुठलाया, और लूत की जाति ने झुठलाया, और शुऐब की जाति ने झुठलाया। यही लोग वे गिरोह (सेनाएँ) हैं, जो अपने रसूलों को झुठलाने और उनके लाए हुए संदेश का इनकार करने पर एकजुट हुए।
आयत 14
إِن كُلٌّ إِلَّا كَذَّبَ ٱلرُّسُلَ فَحَقَّ عِقَابِ
إِن
नहीं
كُلٌّ
सबने
إِلَّا
मगर
كَذَّبَ
झुठलाया
ٱلرُّسُلَ
रसूलों को
فَحَقَّ
तो साबित हो गई
عِقَابِ
सज़ा मेरी
उनमें से प्रत्येक ने रसूलों को झुठलाया, तो मेरी ओर से दंड अवश्यम्भावी होकर रहा
तफ़्सीर:
इन गिरोहों में से हर एक ने रसूलों को झुठलाया। इसलिए उनपर अल्लाह की यातना सिद्ध हो गई और उनपर अल्लाह की सज़ा आ पहुँची, भले ही इसमें कुछ समय के लिए देरी हुई।
आयत 15
وَمَا يَنظُرُ هَـٰٓؤُلَآءِ إِلَّا صَيْحَةًۭ وَٰحِدَةًۭ مَّا لَهَا مِن فَوَاقٍۢ
وَمَا
और नहीं
يَنظُرُ
इन्तिज़ार करते
هَـٰٓؤُلَآءِ
ये लोग
إِلَّا
मगर
صَيْحَةًۭ
चिंघाड़ का
وَٰحِدَةًۭ
एक ही
مَّا
नहीं (होगा)
لَهَا
जिसके लिए
مِن
any
فَوَاقٍۢ
कोई वक़्फ़ा
इन्हें बस एक चीख की प्रतीक्षा है जिसमें तनिक भी अवकाश न होगा
तफ़्सीर:
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को झुठलाने वाले ये लोग केवल इस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि सूर में दूसरी फूँक मार दी जाए, जो अपरिवर्तनीय है। फिर वे यातना से ग्रस्त होंगे, अगर वे आपको झुठलाने की अवस्था में मर गए।
आयत 16
وَقَالُوا۟ رَبَّنَا عَجِّل لَّنَا قِطَّنَا قَبْلَ يَوْمِ ٱلْحِسَابِ
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
عَجِّل
जल्दी दे
لَّنَا
हमें
قِطَّنَا
हिस्सा हमारा
قَبْلَ
पहले
يَوْمِ
(the) Day
ٱلْحِسَابِ
यौमे हिसाब के
वे कहते है, "ऐ हमारे रब! हिसाब के दिन से पहले ही शीघ्र हमारा हिस्सा दे दे।"
तफ़्सीर:
उन्होंने मज़ाक़ उड़ाते हुए कहा : ऐ हमारे पालनहार! हमें हमारे हिस्से की यातना क़ियामत के दिन से पहले इस सांसारिक जीवन ही में दे दे।
आयत 17
ٱصْبِرْ عَلَىٰ مَا يَقُولُونَ وَٱذْكُرْ عَبْدَنَا دَاوُۥدَ ذَا ٱلْأَيْدِ ۖ إِنَّهُۥٓ أَوَّابٌ
ٱصْبِرْ
सब्र कीजिए
عَلَىٰ
over
مَا
उस पर जो
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
وَٱذْكُرْ
और ज़िक्र कीजिए
عَبْدَنَا
हमारे बन्दे
دَاوُۥدَ
दाऊद का
ذَا
the possessor of strength
ٱلْأَيْدِ ۖ
जो क़ुव्वत वाला था
إِنَّهُۥٓ
बेशक वो
أَوَّابٌ
बहुत रुजूअ करने वाला था
वे जो कुछ कहते है उसपर धैर्य से काम लो और ज़ोर व शक्तिवाले हमारे बन्दे दाऊद को याद करो। निश्चय ही वह (अल्लाह की ओर) बहुत रुजू करनेवाला था
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) ये मुश्रिक लोग जो ऐसी बातें कहते हैं, जो आपको पसंद नहीं हैं, उनपर सब्र से काम लें और हमारे बंदे दाऊद को याद करें, जो अपने दुश्मनों से लड़ने की शक्ति रखते थे और अल्लाह के आज्ञापालन पर धैर्य से काम लेते थे। निश्चय वह तौबा करके और अल्लाह को प्रसन्न करने वाले कार्य करके, अल्लाह की ओर बहुत ज़्यादा लौटने वाले थे।
आयत 18
إِنَّا سَخَّرْنَا ٱلْجِبَالَ مَعَهُۥ يُسَبِّحْنَ بِٱلْعَشِىِّ وَٱلْإِشْرَاقِ
إِنَّا
बेशक हम
سَخَّرْنَا
मुसख़्खर किया हमने
ٱلْجِبَالَ
पहाड़ों को
مَعَهُۥ
साथ उसके
يُسَبِّحْنَ
वो तस्बीह करते थे
بِٱلْعَشِىِّ
शाम को
وَٱلْإِشْرَاقِ
और सुबह को
हमने पर्वतों को उसके साथ वशीभूत कर दिया था कि प्रातःकाल और सन्ध्य समय तसबीह करते रहे।
तफ़्सीर:
हमने दाऊद अलैहिस्सलाम के साथ पहाड़ों को वशीभूत कर दिया था। जब वह दिन के अंत में और उसकी शुरुआत में सूरज चढ़ने के समय अल्लाह की पवित्रता का गान करते थे, तो वे भी उनके साथ पवित्रता का गान करते थे।
आयत 19
وَٱلطَّيْرَ مَحْشُورَةًۭ ۖ كُلٌّۭ لَّهُۥٓ أَوَّابٌۭ
وَٱلطَّيْرَ
और परिन्दे
مَحْشُورَةًۭ ۖ
इकट्ठे किए हुए
كُلٌّۭ
सब के सब
لَّهُۥٓ
उसके लिए
أَوَّابٌۭ
रुजूअ करने वाले थे
और पक्षियों को भी, जो एकत्र हो जाते थे। प्रत्येक उसके आगे रुजू रहता
तफ़्सीर:
और हमने हवा में एकत्र पक्षियों को वशीभूत कर दिया था। सभी आज्ञाकारी थे, उनके अधीन होकर पवित्रता का गान करते थे।
आयत 20
وَشَدَدْنَا مُلْكَهُۥ وَءَاتَيْنَـٰهُ ٱلْحِكْمَةَ وَفَصْلَ ٱلْخِطَابِ
وَشَدَدْنَا
और मज़बूत कर दी हमने
مُلْكَهُۥ
सल्तनत उसकी
وَءَاتَيْنَـٰهُ
और दी हमने उसे
ٱلْحِكْمَةَ
हिकमत
وَفَصْلَ
और फ़ैसला कुन
ٱلْخِطَابِ
बात (की सलाहियत)
हमने उसका राज्य सुदृढ़ कर दिया था और उसे तत्वदर्शिता प्रदान की थी और निर्णायक बात कहने की क्षमता प्रदान की थी
तफ़्सीर:
और हमने उन्हें रोब दबदबा, शक्ति और उनके दुश्मनों पर विजय प्रदान करके, उनके राज्य को मज़बूत किया। तथा हमने उन्हें नुबुव्वत और उनके मामलों में यथार्थता प्रदान किया, तथा हमने हर इरादे में उन्हें संतोषजनक कथन शक्ति, तथा भाषण और फैसले में निर्णायकता प्रदान किया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
पिछली कौमों के इनकार और दाऊद अलैहिस्सलाम की ताकत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि ताकत और सलाहियत अल्लाह की नेमत है, इसे इंसाफ के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।
आयत 21
۞ وَهَلْ أَتَىٰكَ نَبَؤُا۟ ٱلْخَصْمِ إِذْ تَسَوَّرُوا۟ ٱلْمِحْرَابَ
۞ وَهَلْ
और क्या
أَتَىٰكَ
आई आपके पास
نَبَؤُا۟
ख़बर
ٱلْخَصْمِ
झगड़ने वालों की
إِذْ
जब
تَسَوَّرُوا۟
वो दीवार फाँद कर आए थे
ٱلْمِحْرَابَ
इबादत ख़ाने में
और क्या तुम्हें उन विवादियों की ख़बर पहुँची है? जब वे दीवार पर चढ़कर मेहराब (एकान्त कक्ष) मे आ पहुँचे
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) क्या आपके पास दो झगड़ने वालों की खबर आई, जब वे दाऊद अलैहिस्सलाम के पास उनके उपासना स्थल में चढ़ आए।
आयत 22
إِذْ دَخَلُوا۟ عَلَىٰ دَاوُۥدَ فَفَزِعَ مِنْهُمْ ۖ قَالُوا۟ لَا تَخَفْ ۖ خَصْمَانِ بَغَىٰ بَعْضُنَا عَلَىٰ بَعْضٍۢ فَٱحْكُم بَيْنَنَا بِٱلْحَقِّ وَلَا تُشْطِطْ وَٱهْدِنَآ إِلَىٰ سَوَآءِ ٱلصِّرَٰطِ
إِذْ
जब
دَخَلُوا۟
वो दाख़िल हुए
عَلَىٰ
upon
دَاوُۥدَ
दाऊद पर
فَفَزِعَ
तो वो घबरा गया
مِنْهُمْ ۖ
उनसे
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لَا
(Do) not
تَخَفْ ۖ
ना तुम डरो
خَصْمَانِ
(हम) दो झगड़ने वाले हैं
بَغَىٰ
ज़्यादती की
بَعْضُنَا
हमारे बाज़ ने
عَلَىٰ
to
بَعْضٍۢ
बाज़ पर
فَٱحْكُم
पस फ़ैसला कर दे
بَيْنَنَا
दर्मियान हमारे
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
وَلَا
और ना
تُشْطِطْ
तू बेइन्साफ़ी कर
وَٱهْدِنَآ
और रहनुमाई कर हमारी
إِلَىٰ
to
سَوَآءِ
तरफ़ सीधे
ٱلصِّرَٰطِ
रास्ते के
जब वे दाऊद के पास पहुँचे तो वह उनसे सहम गया। वे बोले, "डरिए नहीं, हम दो विवादी हैं। हममें से एक ने दूसरे पर ज़्यादती की है; तो आप हमारे बीच ठीक-ठीक फ़ैसला कर दीजिए। और बात को दूर न डालिए और हमें ठीक मार्ग बता दीजिए
तफ़्सीर:
जब वे दोनों अचानक दाऊद अलैहिस्सलाम के पास आए, तो वह उनके इस तरह अचानक और अपरिचित तरीक़े से प्रवेश करने से घबरा गए। जब उन्हें यह स्पष्ट हो गया कि दाऊद अलैहिस्सलाम डर गए हैं, तो उन्होंने कहा : डरिए नहीं। क्योंकि हम दो झगड़ने वाले हैं, हममें से एक ने दूसरे पर अत्याचार किया है। अतः आप हमारे बीच न्याय के साथ फैसला कर दें और जब आप हमारे बीच फैसला करें, तो हमपर अन्याय न करें। तथा हमारा सीधे रास्ते की ओर मार्गदर्शन करें, जो कि यथार्थ रास्ता है।
आयत 23
إِنَّ هَـٰذَآ أَخِى لَهُۥ تِسْعٌۭ وَتِسْعُونَ نَعْجَةًۭ وَلِىَ نَعْجَةٌۭ وَٰحِدَةٌۭ فَقَالَ أَكْفِلْنِيهَا وَعَزَّنِى فِى ٱلْخِطَابِ
إِنَّ
बेशक
هَـٰذَآ
ये
أَخِى
मेरा भाई है
لَهُۥ
इसकी हैं
تِسْعٌۭ
ninety-nine
وَتِسْعُونَ
निनानवे
نَعْجَةًۭ
दुम्बियाँ
وَلِىَ
और मेरे लिए
نَعْجَةٌۭ
दुम्बी है
وَٰحِدَةٌۭ
एक ही
فَقَالَ
तो इसने कहा
أَكْفِلْنِيهَا
सौंप दे मुझे उसे
وَعَزَّنِى
और उसने ग़ल्बा पा लिया मुझ पर
فِى
in
ٱلْخِطَابِ
गुफ़्तगू में
यह मेरा भाई है। इसके पास निन्यानबे दुंबियाँ है और मेरे पास एक दुंबी है। अब इसका कहना है कि इसे भी मुझे सौप दे और बातचीत में इसने मुझे दबा लिया।"
तफ़्सीर:
दोनों विरोधियों में से एक ने दाऊद अलैहिस्सलाम से कहा : यह व्यक्ति मेरा भाई है। इसके पास निन्नानवे दुंबियाँ हैं और मेरे पास एक दुंबी है। तो इसने मुझसे कहा है कि वह एक भी मैं उसके हवाले कर दूँ और वह बहस में मुझसे जीत गया है।
आयत 24
قَالَ لَقَدْ ظَلَمَكَ بِسُؤَالِ نَعْجَتِكَ إِلَىٰ نِعَاجِهِۦ ۖ وَإِنَّ كَثِيرًۭا مِّنَ ٱلْخُلَطَآءِ لَيَبْغِى بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَقَلِيلٌۭ مَّا هُمْ ۗ وَظَنَّ دَاوُۥدُ أَنَّمَا فَتَنَّـٰهُ فَٱسْتَغْفَرَ رَبَّهُۥ وَخَرَّ رَاكِعًۭا وَأَنَابَ ۩
قَالَ
उसने कहा
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
ظَلَمَكَ
उसने ज़ुल्म किया तुझ पर
بِسُؤَالِ
सवाल करके
نَعْجَتِكَ
तेरी दुम्बी का
إِلَىٰ
to
نِعَاجِهِۦ ۖ
तरफ़ अपनी दुम्बियों के
وَإِنَّ
और बेशक
كَثِيرًۭا
बहुत से
مِّنَ
of
ٱلْخُلَطَآءِ
शिराकत दारों में से
لَيَبْغِى
अलबत्ता ज़्यादती करते हैं
بَعْضُهُمْ
बाज़ उनके
عَلَىٰ
[on]
بَعْضٍ
बाज़ पर
إِلَّا
मगर
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
وَقَلِيلٌۭ
and few
مَّا
और कितने थोड़े हैं
هُمْ ۗ
वो
وَظَنَّ
और समझ गया
دَاوُۥدُ
दाऊद
أَنَّمَا
बेशक
فَتَنَّـٰهُ
आज़माया है हमने उसे
فَٱسْتَغْفَرَ
पस उसने बख़्शिश माँगी
رَبَّهُۥ
अपने रब से
وَخَرَّ
और वो गिर पड़ा
رَاكِعًۭا
रुकूअ करते हुए
وَأَنَابَ ۩
और उसने रुजूअ कर लिया
उसने कहा, "इसने अपनी दुंबियों के साथ तेरी दुंबी को मिला लेने की माँग करके निश्चय ही तुझपर ज़ुल्म किया है। और निस्संदेह बहुत-से साथ मिलकर रहनेवाले एक-दूसरे पर ज़्यादती करते है, सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए। किन्तु ऐसे लोग थोड़े ही है।" अब दाऊद समझ गया कि यह तो हमने उसे परीक्षा में डाला है। अतः उसने अपने रब से क्षमा-याचना की और झुककर (सीधे सजदे में) गिर पड़ा और रुजू हुआ
तफ़्सीर:
दाऊद अलैहिस्सलाम ने उन दोनों के बीच निर्णय किया और दावेदार को संबोधित करते हुए कहा : तुम्हारे भाई ने तुम्हारी दुंबी को अपनी दुंबियों के साथ मिलाने की माँग करके तुमपर ज़ुल्म किया है। सच्चाई यह है कि बहुत-से साझीदार अपने साथी का हक़ दबाकर और इंसाफ़ से मुँह मोड़कर एक-दूसरे पर अत्याचार करते हैं। अलबत्ता, उन ईमान वालों का मामला अलग है, जो अच्छे कार्य करते हैं। वे अपने साझीदारों के साथ न्याय करते हैं और उनपर अत्याचार नहीं करते। लेकिन इस तरह के लोग बहुत कम हैं। और दाऊद अलैहिस्सलाम को यक़ीन हो गया कि इस झगड़े के द्वारा हमने उन्हें आज़माइश में डाला है। चुनाँचे उन्होंने अपने पालनहार से क्षमा याचना की, अल्लाह की निकटता प्राप्त करने के लिए सजदे में गिर पड़े और उसकी ओर लौट आए।
आयत 25
فَغَفَرْنَا لَهُۥ ذَٰلِكَ ۖ وَإِنَّ لَهُۥ عِندَنَا لَزُلْفَىٰ وَحُسْنَ مَـَٔابٍۢ
فَغَفَرْنَا
पस बख़्श दिया हमने
لَهُۥ
उसे
ذَٰلِكَ ۖ
उसमें
وَإِنَّ
और बेशक
لَهُۥ
उसके लिए
عِندَنَا
हमारे यहाँ
لَزُلْفَىٰ
अलबत्ता तक़र्रुब है
وَحُسْنَ
और बेहतर
مَـَٔابٍۢ
ठिकाना है
तो हमने उसका वह क़सूर माफ़ कर दिया। और निश्चय ही हमारे यहाँ उसके लिए अनिवार्यतः सामीप्य और उत्तम ठिकाना है
तफ़्सीर:
तो हमने उनकी बात स्वीकार कर ली और उनकी इस ग़लती को क्षमा कर दिया। और निश्चित रूप से वह हमारे पास समीपवर्ती लोगों में से हैं। और आखिरत में उनके लिए अच्छा ठिकाना है।
आयत 26
يَـٰدَاوُۥدُ إِنَّا جَعَلْنَـٰكَ خَلِيفَةًۭ فِى ٱلْأَرْضِ فَٱحْكُم بَيْنَ ٱلنَّاسِ بِٱلْحَقِّ وَلَا تَتَّبِعِ ٱلْهَوَىٰ فَيُضِلَّكَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ ۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ يَضِلُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ لَهُمْ عَذَابٌۭ شَدِيدٌۢ بِمَا نَسُوا۟ يَوْمَ ٱلْحِسَابِ
يَـٰدَاوُۥدُ
ऐ दाऊद
إِنَّا
बेशक हम
جَعَلْنَـٰكَ
बनाया हमने तुझे
خَلِيفَةًۭ
ख़लीफ़ा
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
فَٱحْكُم
पस फ़ैसला कर
بَيْنَ
दर्मियान
ٱلنَّاسِ
लोगों के
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
وَلَا
और ना
تَتَّبِعِ
तू पैरवी कर
ٱلْهَوَىٰ
ख़्वाहिश की
فَيُضِلَّكَ
तो वो भटका देगी तुझे
عَن
from
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के रास्ते से
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَضِلُّونَ
भटकते हैं
عَن
from
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते से
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابٌۭ
अज़ाब है
شَدِيدٌۢ
शदीद
بِمَا
बवजह उसके जो
نَسُوا۟
वो भूल गए
يَوْمَ
दिन को
ٱلْحِسَابِ
हिसाब के
"ऐ दाऊद! हमने धरती में तुझे ख़लीफ़ा (उत्तराधिकारी) बनाया है। अतः तू लोगों के बीच हक़ के साथ फ़ैसला करना और अपनी इच्छा का अनुपालन न करना कि वह तुझे अल्लाह के मार्ग से भटका दे। जो लोग अल्लाह के मार्ग से भटकते है, निश्चय ही उनके लिए कठोर यातना है, क्योंकि वे हिसाब के दिन को भूले रहे।-
तफ़्सीर:
ऐ दाऊद! हमने आपको धरती में ख़लीफ़ा बनाया है, जिसका काम धार्मिक और सांसारिक नियमों और फ़ैसलों को लागू करना होता है। अतः आप लोगों के बीच न्याय के साथ निर्णय करें। और लोगों के बीच अपने निर्णय में अपनी इच्छाओं का पालन न करें; कि रिश्तेदारी या दोस्ती के कारण किसी एक पक्ष की ओर झुक जाएँ, या किसी दुश्मनी की वजह से किसी को नज़र अंदाज़ करें। क्योंकि इच्छा का पालन करना आपको अल्लाह के सीधे रास्ते से भटका देगा। निश्चय जो लोग अल्लाह के सीधे रास्ते से भटक जाते हैं, उनके लिए उनके हिसाब के दिन को भूल जाने के कारण, कठोर यातना है। क्योंकि अगर वे उसे याद रखते और उससे डरते, तो अपनी इच्छाओं पर न चलते।
आयत 27
وَمَا خَلَقْنَا ٱلسَّمَآءَ وَٱلْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا بَـٰطِلًۭا ۚ ذَٰلِكَ ظَنُّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ ۚ فَوَيْلٌۭ لِّلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِنَ ٱلنَّارِ
وَمَا
और नहीं
خَلَقْنَا
पैदा किया हमने
ٱلسَّمَآءَ
आसमान
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
وَمَا
और जो
بَيْنَهُمَا
उन दोनों के दर्मियान है
بَـٰطِلًۭا ۚ
बातिल
ذَٰلِكَ
ये
ظَنُّ
गुमान है
ٱلَّذِينَ
उनका जिन्होंने
كَفَرُوا۟ ۚ
कुफ़्र किया
فَوَيْلٌۭ
पस हलाकत है
لِّلَّذِينَ
उनके लिए जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
مِنَ
from
ٱلنَّارِ
आग से
हमने आकाश और धरती को और जो कुछ उनके बीच है, व्यर्थ नहीं पैदा किया। यह तो उन लोगों का गुमान है जिन्होंने इनकार किया। अतः आग में झोंके जाने के कारण इनकार करनेवालों की बड़ी दुर्गति है
तफ़्सीर:
हमने आकाश और धरती को व्यर्थ पैदा नहीं किया। यह तो उन लोगों की सोच है, जिन्होंने कुफ़्र किया। अतः इन काफ़िरों के लिए, जो यह सोच रखते हैं, क़ियामत के दिन जहन्नम की आग के रूप में बड़ा विनाश है, अगर वे अपने कुफ़्र और अल्लाह के बारे में बुरी सोच की अवस्था ही में मर गए।
आयत 28
أَمْ نَجْعَلُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ كَٱلْمُفْسِدِينَ فِى ٱلْأَرْضِ أَمْ نَجْعَلُ ٱلْمُتَّقِينَ كَٱلْفُجَّارِ
أَمْ
क्या
نَجْعَلُ
हम कर देंगे
ٱلَّذِينَ
उन्हें जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
كَٱلْمُفْسِدِينَ
फ़साद करने वालों की तरह
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
أَمْ
या
نَجْعَلُ
हम कर देंगे
ٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों को
كَٱلْفُجَّارِ
बदकारों की तरह
(क्या हम उनको जो समझते है कि जगत की संरचना व्यर्थ नहीं है, उनके समान कर देंगे जो जगत को निरर्थक मानते है।) या हम उन लोगों को जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, उनके समान कर देंगे जो धरती में बिगाड़ पैदा करते है; या डर रखनेवालों को हम दुराचारियों जैसा कर देंगे?
तफ़्सीर:
हम हरगिज़ अल्लाह पर ईमान रखने वालों, उसके रसूल का अनुसरण करने वालों और अच्छे कार्य करने वालों को, उन लोगों के जैसा नहीं बनाएँगे, जो कुफ़्र और पापों के साथ धरती में बिगाड़ पैदा करने वाले हैं। तथा हम उन लोगों को जो अपने पालनहार से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर डरते हैं, पापों में लिप्त काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों के समान नहीं बनाएँगे। उन दोनों के बीच बराबरी करना अन्याय है, जो अल्लाह के लिए शोभित नहीं है। बल्कि, अल्लाह परहेज़गार मोमिनों को जन्नत में प्रवेश के साथ पुरस्कृत करेगा। और दुर्भाग्यशाली काफ़िरों को जहन्नम में दाखिल करके दंडित करेगा। क्योंकि ये दोनों अल्लाह के निकट बराबर नहीं हैं। इसलिए उसके पास उनका बदला भी बराबर नहीं होगा।
आयत 29
كِتَـٰبٌ أَنزَلْنَـٰهُ إِلَيْكَ مُبَـٰرَكٌۭ لِّيَدَّبَّرُوٓا۟ ءَايَـٰتِهِۦ وَلِيَتَذَكَّرَ أُو۟لُوا۟ ٱلْأَلْبَـٰبِ
كِتَـٰبٌ
एक किताब है
أَنزَلْنَـٰهُ
नाज़िल किया हमने उसे
إِلَيْكَ
आपकी तरफ़
مُبَـٰرَكٌۭ
बाबरकत है
لِّيَدَّبَّرُوٓا۟
ताकि वो ग़ौरो फ़िक्र करें
ءَايَـٰتِهِۦ
उसकी आयात में
وَلِيَتَذَكَّرَ
और ताकि नसीहत पकड़ें
أُو۟لُوا۟
those of understanding
ٱلْأَلْبَـٰبِ
अक़्ल वाले
यह एक बरकत वाली किताब है, जो हमने आपकी तरफ़ इसलिए उतारी है, ताकि लोग इसकी आयतों में ग़ौर-ओ-फ़िक्र करें और ताकि अक़्ल वाले नसीहत हासिल करें।
तफ़्सीर:
यह क़ुरआन एक पुस्तक है, जिसे हमने आपकी ओर उतारा है, बड़ी भलाई और लाभ वाली पुस्तक है। ताकि लोग इसकी आयतों पर विचार करें और उनके अर्थों पर ग़ौर करें, और ताकि प्रबल एवं उज्ज्वल दिमाग वाले लोग इससे शिक्षा ग्रहण करें।
आयत 30
وَوَهَبْنَا لِدَاوُۥدَ سُلَيْمَـٰنَ ۚ نِعْمَ ٱلْعَبْدُ ۖ إِنَّهُۥٓ أَوَّابٌ
وَوَهَبْنَا
और अता किया हमने
لِدَاوُۥدَ
दाऊद को
سُلَيْمَـٰنَ ۚ
सुलैमान
نِعْمَ
कितना अच्छा
ٱلْعَبْدُ ۖ
बन्दा
إِنَّهُۥٓ
बेशक वो
أَوَّابٌ
बहुत रुजूअ करने वाला था
और हमने दाऊद को सुलैमान प्रदान किया। वह कितना अच्छा बन्दा था! निश्चय ही वह बहुत ही रुजू रहनेवाला था।
तफ़्सीर:
हमने दाऊद को, अपनी ओर से उनपर अनुग्रह और उपकार करते हुए, उनका बेटा सुलैमान प्रदान किया, ताकि उससे उनकी आँखें ठंडी हो जाएँ। सुलैमान बहुत अच्छे बंदे थे। वह बहुत तौबा करने वाले और अल्लाह की ओर बहुत लौटने वाले और उसकी ओर रुजू' करने वाले थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दाऊद अलैहिस्सलाम के सामने आए फैसले के वाकिये और उनकी तौबा का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि गलती होने पर फौरन तौबा करना और अल्लाह की तरफ रुजू करना नबियों की सुन्नत है।
आयत 31
إِذْ عُرِضَ عَلَيْهِ بِٱلْعَشِىِّ ٱلصَّـٰفِنَـٰتُ ٱلْجِيَادُ
إِذْ
जब
عُرِضَ
पेश किए गए
عَلَيْهِ
उस पर
بِٱلْعَشِىِّ
शाम के वक़्त
ٱلصَّـٰفِنَـٰتُ
असील घोड़े
ٱلْجِيَادُ
उम्दा
याद करो, जबकि सन्ध्या समय उसके सामने सधे हुए द्रुतगामी घोड़े हाज़िर किए गए
तफ़्सीर:
उस समय को याद करें, जब अस्र के समय उनके सामने तेज़ दौड़ने वाले असली घोड़े लाए गए, जो तीन पैरों पर खड़े और चौथे को उठाए हुए थे। ये उत्तम नस्ल के घोड़े उनपर प्रदर्शित किए जाते रहे, यहाँ तक कि सूरज डूब गया।
आयत 32
فَقَالَ إِنِّىٓ أَحْبَبْتُ حُبَّ ٱلْخَيْرِ عَن ذِكْرِ رَبِّى حَتَّىٰ تَوَارَتْ بِٱلْحِجَابِ
فَقَالَ
तो उसने कहा
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَحْبَبْتُ
महबूब रखा मैं ने
حُبَّ
मुहब्बत को
ٱلْخَيْرِ
माल की
عَن
over
ذِكْرِ
याद की वजह से
رَبِّى
अपने रब की
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
تَوَارَتْ
वो छुप गए
بِٱلْحِجَابِ
परदे में
तो उसने कहा, "मैंने इनके प्रति प्रेम अपने रब की याद के कारण अपनाया है।" यहाँ तक कि वे (घोड़े) ओट में छिप गए
तफ़्सीर:
तो सुलैमान अलैहिस्सलाम ने कहा : मैंने धन (जिसमें ये घोड़े भी शामिल हैं) के प्रेम को अपने पालनहार के ज़िक्र पर प्राथमिकता दी यहाँ तक कि सूर्य डूब गया और मुझे अस्र की नमाज़ अदा करने में देर हो गई।
आयत 33
رُدُّوهَا عَلَىَّ ۖ فَطَفِقَ مَسْحًۢا بِٱلسُّوقِ وَٱلْأَعْنَاقِ
رُدُّوهَا
फेर लाओ उन्हें
عَلَىَّ ۖ
मुझ पर
فَطَفِقَ
तो लगा
مَسْحًۢا
हाथ फेरने
بِٱلسُّوقِ
पिंडलियों पर
وَٱلْأَعْنَاقِ
और गर्दनों पर
"उन्हें मेरे पास वापस लाओ!" फिर वह उनकी पिंडलियों और गरदनों पर हाथ फेरने लगा
तफ़्सीर:
इन घोड़ों को मेरे पास वापस लाओ। चुनाँचे उन्हें उनके पास लाया गया। फिर वह तलवार से उनकी पिंडलियों और गरदनों को मारने लगे।
आयत 34
وَلَقَدْ فَتَنَّا سُلَيْمَـٰنَ وَأَلْقَيْنَا عَلَىٰ كُرْسِيِّهِۦ جَسَدًۭا ثُمَّ أَنَابَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक
فَتَنَّا
आज़माया हमने
سُلَيْمَـٰنَ
सुलैमान को
وَأَلْقَيْنَا
और डाल दिया हमने
عَلَىٰ
on
كُرْسِيِّهِۦ
उसकी कुर्सी पर
جَسَدًۭا
एक जिस्म
ثُمَّ
फिर
أَنَابَ
उसने रुजूअ कर लिया
निश्चय ही हमने सुलैमान को भी परीक्षा में डाला। और हमने उसके तख़्त पर एक धड़ डाल दिया। फिर वह रुजू हुआ
तफ़्सीर:
और हमने सुलैमान को आज़माइश में डाला और उनके राज्य के सिंहासन पर शैतान को डाल दिया, जो मानव रूप धारण किए हुए था। उसने थोड़े समय के लिए उनके राज्य में शासन किया। फिर अल्लाह ने सुलैमान के लिए उनका राज्य बहाल कर दिया और उन्हें शैतानों पर प्रभुत्व प्रदान किया।
आयत 35
قَالَ رَبِّ ٱغْفِرْ لِى وَهَبْ لِى مُلْكًۭا لَّا يَنۢبَغِى لِأَحَدٍۢ مِّنۢ بَعْدِىٓ ۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْوَهَّابُ
قَالَ
उसने कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
ٱغْفِرْ
बख़्श दे
لِى
मुझे
وَهَبْ
और अता कर
لِى
मुझे
مُلْكًۭا
ऐसी बादशाहत
لَّا
not
يَنۢبَغِى
ना हासिल हो
لِأَحَدٍۢ
किसी एक को
مِّنۢ
after me
بَعْدِىٓ ۖ
मेरे बाद
إِنَّكَ
बेशक
أَنتَ
तू ही है
ٱلْوَهَّابُ
बहुत अता करने वाला
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे और मुझे वह राज्य प्रदान कर, जो मेरे पश्चात किसी के लिए शोभनीय न हो। निश्चय ही तू बड़ा दाता है।"
तफ़्सीर:
सुलैमान अलैहिस्सलाम ने कहा : ऐ मेरे पालनहार, मेरे गुनाह क्षमा कर दे, और मुझे ऐसी बादशाहत प्रदान कर जो मेरे ही लिए विशिष्ट हो, मेरे बाद किसी को प्राप्त न हो। निश्चय (ऐ मेरे पालनहार!) तू बहुत बड़ा दाता और बड़ा दानशील है।
आयत 36
فَسَخَّرْنَا لَهُ ٱلرِّيحَ تَجْرِى بِأَمْرِهِۦ رُخَآءً حَيْثُ أَصَابَ
فَسَخَّرْنَا
तो मुसख़्खर किया हमने
لَهُ
उसके लिए
ٱلرِّيحَ
हवा को
تَجْرِى
जो चलती थी
بِأَمْرِهِۦ
उसके हुक्म से
رُخَآءً
नर्मी से
حَيْثُ
जहाँ
أَصَابَ
वो पहुँचना चाहता
तब हमने वायु को उसके लिए वशीभूत कर दिया, जो उसके आदेश से, जहाँ वह पहुँचना चाहता, सरलतापूर्वक चलती थी
तफ़्सीर:
तो हमने उनकी दुआ क़बूल कर ली और हवा को उनके अधीन कर दिया, जो उनके आदेश से नरम होकर चलती थी। हवा के तेज़ और शक्तिशाली होने के बावजूद उसमें कोई झटका नहीं थी। वह उन्हें, जहाँ चाहते, ले जाती थी।
आयत 37
وَٱلشَّيَـٰطِينَ كُلَّ بَنَّآءٍۢ وَغَوَّاصٍۢ
وَٱلشَّيَـٰطِينَ
और सरकश जिन्नों को
كُلَّ
हर तरह के
بَنَّآءٍۢ
मेअमार
وَغَوَّاصٍۢ
और ग़ोता ख़ोर
और शैतानों को भी (वशीभुत कर दिया), प्रत्येक निर्माता और ग़ोताख़ोर को
तफ़्सीर:
तथा हमने शैतानों को उनके अधीन कर दिया, जो उनके आदेश अनुसार काम करते थे। चुनाँचे उनमें से कुछ निर्माण करने वाले थे, तो कुछ ग़ोताख़ोर थे, जो समुद्र में गोता लगाकर मोती निकालते थे।
आयत 38
وَءَاخَرِينَ مُقَرَّنِينَ فِى ٱلْأَصْفَادِ
وَءَاخَرِينَ
और कुछ दूसरे
مُقَرَّنِينَ
जकड़े हुए
فِى
in
ٱلْأَصْفَادِ
बेड़ियों में
और दूसरों को भी जो ज़जीरों में जकड़े हुए रहत
तफ़्सीर:
और शैतानों में से कुछ सरकश थे, वे भी उनके अधीन कर दिए गए थे। चुनाँचे वे बेड़ियों में जकड़े हुए थे, हिल-डोल नहीं सकते थे।
आयत 39
هَـٰذَا عَطَآؤُنَا فَٱمْنُنْ أَوْ أَمْسِكْ بِغَيْرِ حِسَابٍۢ
هَـٰذَا
ये है
عَطَآؤُنَا
बख़्शिश हमारी
فَٱمْنُنْ
पस एहसान करो
أَوْ
या
أَمْسِكْ
रोक लो
بِغَيْرِ
बग़ैर
حِسَابٍۢ
हिसाब के
"यह हमारी बेहिसाब देन है। अब एहसान करो या रोको।"
तफ़्सीर:
ऐ सुलैमान! यह हमारी बख़्शिश है, जो हमने तुम्हारी दुआ को स्वीकार करते हुए तुम्हें प्रदान की है। अब तुम जिसे चाहो, दो और जिसे चाहो, न दो। देने या न देने के मामले में तुमसे कोई हिसाब नहीं लिया जाएगा।
आयत 40
وَإِنَّ لَهُۥ عِندَنَا لَزُلْفَىٰ وَحُسْنَ مَـَٔابٍۢ
وَإِنَّ
और बेशक
لَهُۥ
उसके लिए
عِندَنَا
हमारे पास
لَزُلْفَىٰ
अलबत्ता तक़र्रुब है
وَحُسْنَ
और बेहतरीन
مَـَٔابٍۢ
ठिकाना है
और निश्चय ही हमारे यहाँ उसके लिए अनिवार्यतः समीप्य और उत्तम ठिकाना है
तफ़्सीर:
निश्चित रूप से सुलैमान हमारे पास समीपवर्ती लोगों में से हैं। और उनके लिए लौटने की एक अच्छी जगह है और वह जन्नत है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सुलेमान अलैहिस्सलाम की आज़माइश (घोड़ों की मोहब्बत) का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि दुनियावी चीज़ों की मोहब्बत में अल्लाह की याद से गफलत नहीं होनी चाहिए।
आयत 41
وَٱذْكُرْ عَبْدَنَآ أَيُّوبَ إِذْ نَادَىٰ رَبَّهُۥٓ أَنِّى مَسَّنِىَ ٱلشَّيْطَـٰنُ بِنُصْبٍۢ وَعَذَابٍ
وَٱذْكُرْ
और ज़िक्र कीजिए
عَبْدَنَآ
हमारे बन्दे
أَيُّوبَ
अय्यूब का
إِذْ
जब
نَادَىٰ
उसने पुकारा
رَبَّهُۥٓ
अपने रब को
أَنِّى
बेशक मुझे
مَسَّنِىَ
पहुँचाई मुझे
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान ने
بِنُصْبٍۢ
तकलीफ़
وَعَذَابٍ
और अज़ाब
हमारे बन्दे अय्यूब को भी याद करो, जब उसने अपने रब को पुकारा कि "शैतान ने मुझे दुख और पीड़ा पहुँचा रखी है।"
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) हमारे बंदे अय्यूब को याद करें, जब उन्होंने अपने पालनहार अल्लाह को पुकारा : शैतान ने मुझे दुःख तथा कष्ट पहुँचाया है।
आयत 42
ٱرْكُضْ بِرِجْلِكَ ۖ هَـٰذَا مُغْتَسَلٌۢ بَارِدٌۭ وَشَرَابٌۭ
ٱرْكُضْ
मार
بِرِجْلِكَ ۖ
पाँव अपना
هَـٰذَا
ये
مُغْتَسَلٌۢ
नहाने का पानी है
بَارِدٌۭ
ठंडा
وَشَرَابٌۭ
और पीने का पानी
"अपना पाँव (धरती पर) मार, यह है ठंडा (पानी) नहाने को और पीने को।"
तफ़्सीर:
तो हमने उनसे कहा : अपने पाँव को धरती पर मारो। चुनाँचे उन्होंने अपना पाँव धरती पर मारा, तो उनके लिए उससे पानी का स्रोत फूट पड़ा, जिससे वह पी सकें और स्नान कर सकें और उनकी परेशानी और कष्ट दूर हो जाए।
आयत 43
وَوَهَبْنَا لَهُۥٓ أَهْلَهُۥ وَمِثْلَهُم مَّعَهُمْ رَحْمَةًۭ مِّنَّا وَذِكْرَىٰ لِأُو۟لِى ٱلْأَلْبَـٰبِ
وَوَهَبْنَا
और अता किए हमने
لَهُۥٓ
उसे
أَهْلَهُۥ
उसके घर वाले
وَمِثْلَهُم
और मानिन्द उनके
مَّعَهُمْ
साथ उनके
رَحْمَةًۭ
बतौरे रहमत
مِّنَّا
हमारी तरफ़ से
وَذِكْرَىٰ
और एक नसीहत
لِأُو۟لِى
for those of understanding
ٱلْأَلْبَـٰبِ
अक़्ल वालों के लिए
और हमने उसे उसके परिजन दिए और उनके साथ वैसे ही और भी; अपनी ओर से दयालुता के रूप में और बुद्धि और समझ रखनेवालों के लिए शिक्षा के रूप में।
तफ़्सीर:
तो हमने उनकी दुआ क़बूल कर ली। चुनाँचे उनकी तकलीफ़ दूर कर दी, उन्हें उनके घर वाले दे दिए और अपनी ओर से उनपर दया करते हुए तथा उनके सब्र के बदले में, उनके समान और भी बेटे एवं पोते प्रदान किए। ताकि सही बुद्धि रखने वाले यह याद रखें कि धैर्य का परिणाम राहत और सवाब है।
आयत 44
وَخُذْ بِيَدِكَ ضِغْثًۭا فَٱضْرِب بِّهِۦ وَلَا تَحْنَثْ ۗ إِنَّا وَجَدْنَـٰهُ صَابِرًۭا ۚ نِّعْمَ ٱلْعَبْدُ ۖ إِنَّهُۥٓ أَوَّابٌۭ
وَخُذْ
और ले ले
بِيَدِكَ
अपने हाथ से
ضِغْثًۭا
तिनकों का एक मुठ्ठा
فَٱضْرِب
फिर मार
بِّهِۦ
साथ उसके
وَلَا
और ना
تَحْنَثْ ۗ
तू क़सम तोड़
إِنَّا
बेशक हम
وَجَدْنَـٰهُ
पाया हमने उसे
صَابِرًۭا ۚ
साबिर
نِّعْمَ
कितना अच्छा
ٱلْعَبْدُ ۖ
बन्दा
إِنَّهُۥٓ
बेशक वो
أَوَّابٌۭ
बहुत रुजूअ करने वाला था
"और अपने हाथ में तिनकों का एक मुट्ठा ले और उससे मार और अपनी क़सम न तोड़।" निश्चय ही हमने उसे धैर्यवान पाया, क्या ही अच्छा बन्दा! निस्संदेह वह बड़ा ही रुजू रहनेवाला था
तफ़्सीर:
जब अय्यूब (अलैहिस्सलाम) अपनी पत्नी पर क्रोधित हुए और उन्हें सौ कोड़े मारने की क़सम खाई, तो हमने उनसे कहा : (ऐ अय्यूब!) अपने हाथ में पतली और नर्म डालियों का एक गुच्छा लो और अपनी क़सम पूरी करने के लिए उनसे अपनी पत्नी को मार दो। और अपनी खाई हुई क़सम को न तोड़ो। चुनाँचे उन्होंने पतली और नर्म डालियों का एक गुच्छा लिया और उनसे उसे मारा। हमने उन्हें उसपर सब्र करने वाला पाया, जिससे उन्हें आज़माया था। वह अच्छे बंदे थे। निश्चय वह अल्लाह की तरफ़ बहुत ज़्यादा लौटने वाले थे।
आयत 45
وَٱذْكُرْ عِبَـٰدَنَآ إِبْرَٰهِيمَ وَإِسْحَـٰقَ وَيَعْقُوبَ أُو۟لِى ٱلْأَيْدِى وَٱلْأَبْصَـٰرِ
وَٱذْكُرْ
और ज़िक्र करो
عِبَـٰدَنَآ
हमारे बन्दों
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम
وَإِسْحَـٰقَ
और इस्हाक़
وَيَعْقُوبَ
और याक़ूब का
أُو۟لِى
possessors
ٱلْأَيْدِى
जो हाथों वाले
وَٱلْأَبْصَـٰرِ
और आँखों वाले थे
हमारे बन्दों, इबराहीम और इसहाक़ और याक़ूब को भी याद करो, जो हाथों (शक्ति) और निगाहोंवाले (ज्ञान-चक्षुवाले) थे
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) हमारे चुने हुए बंदों और भेजे हुए रसूलों : इबराहीम, इसहाक़ और याक़ूब को याद करें। वे अल्लाह की आज्ञा मानने और उसकी प्रसन्नता की तलाश में शक्तिशाली थे, तथा सत्य के मामले में सच्ची अंतर्दृष्टि के मालिक थे।
आयत 46
إِنَّآ أَخْلَصْنَـٰهُم بِخَالِصَةٍۢ ذِكْرَى ٱلدَّارِ
إِنَّآ
बेशक हम
أَخْلَصْنَـٰهُم
ख़ालिस कर लिया था हमने उन्हें
بِخَالِصَةٍۢ
साथ ख़ास सिफ़त के
ذِكْرَى
(जो) याद थी
ٱلدَّارِ
असल घर की
निस्संदेह हमने उन्हें एक विशिष्ट बात के लिए चुन लिया था और वह वास्तविक घर (आख़िरत) की याद थी
तफ़्सीर:
और हमने उनपर एक विशेष गुण के साथ उपकार किया, जिसे उनके लिए विशिष्ट कर दिया, जो कि उनके दिलों को आख़िरत को याद करने, अच्छे कर्मों के साथ उसके लिए तैयारी करने और लोगों को उसके लिए काम करने के लिए आमंत्रित करने के साथ आबाद करना है।
आयत 47
وَإِنَّهُمْ عِندَنَا لَمِنَ ٱلْمُصْطَفَيْنَ ٱلْأَخْيَارِ
وَإِنَّهُمْ
और बेशक वो
عِندَنَا
हमारे नज़दीक
لَمِنَ
(are) from
ٱلْمُصْطَفَيْنَ
अलबत्ता चुने हुओं में से थे
ٱلْأَخْيَارِ
जो नेक थे
और निश्चय ही वे हमारे यहाँ चुने हुए नेक लोगों में से है
तफ़्सीर:
निश्चय वे हमारे निकट उन लोगों में से थे, जिन्हें हमने अपने आज्ञापालन और इबादत के लिए चुन लिया था, तथा अपने संदेश को उठाने और उसे लोगों तक पहुँचाने के लिए उनका चयन कर लिया था।
आयत 48
وَٱذْكُرْ إِسْمَـٰعِيلَ وَٱلْيَسَعَ وَذَا ٱلْكِفْلِ ۖ وَكُلٌّۭ مِّنَ ٱلْأَخْيَارِ
وَٱذْكُرْ
और ज़िक्र कीजिए
إِسْمَـٰعِيلَ
इस्माईल
وَٱلْيَسَعَ
और यसा
وَذَا
and Dhul-kifl
ٱلْكِفْلِ ۖ
और जुलकिफ़्ल का
وَكُلٌّۭ
और वो सब
مِّنَ
(are) from
ٱلْأَخْيَارِ
नेक लोगों में से थे
इसमाईल और अल-यसअ और ज़ुलकिफ़्ल को भी याद करो। इनमें से प्रत्येक ही अच्छा रहा है
तफ़्सीर:
और (ऐ नबी!) आप इसमाईल बिन इबराहीम को याद करें, अल-यसअ् को याद करें, तथा ज़ुल-किफ़्ल को याद करें और सबसे अच्छी प्रशंसा के साथ उनकी सराहना करें। क्योंकि वे इसके योग्य हैं। और ये सभी अल्लाह के निकट चीदा और चुने हुए लोगों में से हैं।
आयत 49
هَـٰذَا ذِكْرٌۭ ۚ وَإِنَّ لِلْمُتَّقِينَ لَحُسْنَ مَـَٔابٍۢ
هَـٰذَا
ये
ذِكْرٌۭ ۚ
एक ज़िक्र है
وَإِنَّ
और बेशक
لِلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के लिए
لَحُسْنَ
अलबत्ता अच्छा है
مَـَٔابٍۢ
ठिकाना
यह एक अनुस्मृति है। और निश्चय ही डर रखनेवालों के लिए अच्छा ठिकाना है
तफ़्सीर:
यह इन लोगों का क़ुरआन में अच्छी प्रशंसा के साथ उल्लेख है। तथा निश्चय अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, डरने वालों के लिए आख़िरत के घर में बेहतर लौटने का स्थान है।
आयत 50
جَنَّـٰتِ عَدْنٍۢ مُّفَتَّحَةًۭ لَّهُمُ ٱلْأَبْوَٰبُ
جَنَّـٰتِ
बाग़ात
عَدْنٍۢ
हमेशगी के
مُّفَتَّحَةًۭ
खुले होंगे
لَّهُمُ
उनके लिए
ٱلْأَبْوَٰبُ
दरवाज़े
सदैव रहने के बाग़ है, जिनके द्वार उनके लिए खुले होंगे
तफ़्सीर:
यह बेहतर लौटने का स्थान वह रहने के बाग़ हैं, जिनमें वे क़ियामत के दिन प्रवेश करेंगे और उनके स्वागत में उनके द्वार खोल दिए गए होंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अय्यूब अलैहिस्सलाम के सब्र का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि सख्त बीमारी और तकलीफ में भी सब्र और अल्लाह से उम्मीद रखना असली ईमान की निशानी है।
आयत 51
مُتَّكِـِٔينَ فِيهَا يَدْعُونَ فِيهَا بِفَـٰكِهَةٍۢ كَثِيرَةٍۢ وَشَرَابٍۢ
مُتَّكِـِٔينَ
तकिया लगाए हुए होंगे
فِيهَا
उनमें
يَدْعُونَ
वो तलब करेंगे
فِيهَا
उनमें
بِفَـٰكِهَةٍۢ
फल
كَثِيرَةٍۢ
बहुत से
وَشَرَابٍۢ
और मशरूबात
उनमें वे तकिया लगाए हुए होंगे। वहाँ वे बहुत-से मेवे और पेय मँगवाते होंगे
तफ़्सीर:
अपने लिए सजाए गए तख़्तों पर तकिया लगाए बैठे होंगे। वे अपने सेवकों से अपनी इच्छाओं के अनुसार विभिन्न प्रकार के बहुत-से फल और अपने मनपसंद पेय, जैसे शराब आदि पेश करने के लिए कहेंगे।
आयत 52
۞ وَعِندَهُمْ قَـٰصِرَٰتُ ٱلطَّرْفِ أَتْرَابٌ
۞ وَعِندَهُمْ
और उनके पास होंगी
قَـٰصِرَٰتُ
नीची रखने वालियाँ
ٱلطَّرْفِ
निगाहों को
أَتْرَابٌ
हम उमर
और उनके पास निगाहें बचाए रखनेवाली स्त्रियाँ होंगी, जो समान अवस्था की होंगी
तफ़्सीर:
उनके पास ऐसी स्त्रियाँ होंगी, जिनकी निगाहें उनके पतियों पर सीमित रहेंगी, उनके अलावा किसी अन्य की तरफ़ नहीं उठेंगी और वे एक-सी आयु वाली होंगी।
आयत 53
هَـٰذَا مَا تُوعَدُونَ لِيَوْمِ ٱلْحِسَابِ
هَـٰذَا
ये है
مَا
वो जिसका
تُوعَدُونَ
तुम वादा किए जाते थे
لِيَوْمِ
दिन के लिए
ٱلْحِسَابِ
हिसाब के
यह है वह चीज़, जिसका हिसाब के दिन के लिए तुमसे वादा किया जाता है
तफ़्सीर:
यह वही अच्छा बदला है जिसका (ऐ अल्लाह का भय रखने वालो!) तुमसे क़ियामत के दिन तुम्हारे उन नेक कामों के प्रतिफल के रूप में वादा किया जाता था, जो तुम दुनिया में किया करते थे।
आयत 54
إِنَّ هَـٰذَا لَرِزْقُنَا مَا لَهُۥ مِن نَّفَادٍ
إِنَّ
बेशक
هَـٰذَا
ये
لَرِزْقُنَا
अलबत्ता रिज़्क़ है हमारा
مَا
नहीं है
لَهُۥ
उसके लिए
مِن
any
نَّفَادٍ
कभी ख़त्म होना
यह हमारा दिया है, जो कभी समाप्त न होगा
तफ़्सीर:
यह बदला जिसका हमने उल्लेख किया है, यही हमारी जीविका है, जो हम क़ियामत के दिन अल्लाह का भय रखने वालों को प्रदान करेंगे। यह एक निरंतर जीविका है, जो न कभी बाधित होगी और न कभी समाप्त होगी।
आयत 55
هَـٰذَا ۚ وَإِنَّ لِلطَّـٰغِينَ لَشَرَّ مَـَٔابٍۢ
هَـٰذَا ۚ
ये है (बदला)
وَإِنَّ
और बेशक
لِلطَّـٰغِينَ
सरकश लोगों के लिए
لَشَرَّ
अलबत्ता बुरा है
مَـَٔابٍۢ
ठिकाना
एक और यह है, किन्तु सरकशों के लिए बहुत बुरा ठिकाना है;
तफ़्सीर:
यह जो हमने उल्लेख किया है, अल्लाह का भय रखने वालों का बदला है। जबकि कुफ़्र और गुनाहों के साथ अल्लाह की सीमाओं को पार करने वालों का बदला, अल्लाह का भय रखने वालों के बदले से अलग है। उनके लिए क़ियामत के दिन लौटने का बहुत बुरा स्थान है।
आयत 56
جَهَنَّمَ يَصْلَوْنَهَا فَبِئْسَ ٱلْمِهَادُ
جَهَنَّمَ
जहन्नम
يَصْلَوْنَهَا
वो जलेंगे उसमें
فَبِئْسَ
तो बहुत बुरा है
ٱلْمِهَادُ
ठिकाना
जहन्नम, जिसमें वे प्रवेश करेंगे। तो वह बहुत ही बुरा विश्राम-स्थल है!
तफ़्सीर:
यह बदला जहन्नम है, जो उन्हें चारों ओर से घेर लेगी। वे उसकी ताप और लौ का सामना करते रहेंगे। उनके लिए उसी का बिछौना होगा। तो उनका बिछौना बहुत बुरा बिछौना है।
आयत 57
هَـٰذَا فَلْيَذُوقُوهُ حَمِيمٌۭ وَغَسَّاقٌۭ
هَـٰذَا
ये है (बदला)
فَلْيَذُوقُوهُ
पस चाहिए कि वो चखें उसे
حَمِيمٌۭ
खौलता हुआ पानी
وَغَسَّاقٌۭ
और पीप
यह है, अब उन्हें इसे चखना है - खौलता हुआ पानी और रक्तयुक्त पीप
तफ़्सीर:
यह यातना अत्यंत गर्म पानी और जहन्नम में यातना ग्रस्त लोगों के शरीर से निकलने वाली पीप है। सो वे इसे पिएं। क्योंकि यही उनका पेय है, जो उनकी प्यास नहीं बुझाएगी।
आयत 58
وَءَاخَرُ مِن شَكْلِهِۦٓ أَزْوَٰجٌ
وَءَاخَرُ
और कुछ दूसरे
مِن
of
شَكْلِهِۦٓ
उसकी शक्ल के
أَزْوَٰجٌ
कई क़िस्मों के
और इसी प्रकार की दूसरी और भी चीज़ें
तफ़्सीर:
उनके लिए इस यातना के रूप की एक और भी यातना है। इस तरह उनके लिए यातना के विभिन्न प्रकार हैं, जिनके साथ उन्हें आख़िरत में दंडित किया जाएगा।
आयत 59
هَـٰذَا فَوْجٌۭ مُّقْتَحِمٌۭ مَّعَكُمْ ۖ لَا مَرْحَبًۢا بِهِمْ ۚ إِنَّهُمْ صَالُوا۟ ٱلنَّارِ
هَـٰذَا
ये
فَوْجٌۭ
एक फ़ौज/ लश्कर है
مُّقْتَحِمٌۭ
घुसने वाला है
مَّعَكُمْ ۖ
साथ तुम्हारे
لَا
No
مَرْحَبًۢا
नहीं कोई ख़ुश आमदीद
بِهِمْ ۚ
उन्हें
إِنَّهُمْ
बेशक वो
صَالُوا۟
जलने वाले हैं
ٱلنَّارِ
आग में
"यह एक भीड़ है जो तुम्हारे साथ घुसी चली आ रही है। कोई आवभगत उनके लिए नहीं। वे तो आग में पड़नेवाले है।"
तफ़्सीर:
जब जहन्नमी लोग जहन्नम में प्रवेश कर जाएँगे, तो उनके बीच वैसी ही कहा-सुनी होगी, जो विरोधियों के बीच आपस में हुआ करती है और वे एक-दूसरे से अपनी बराअत का इज़हार करेंगे। चुनाँचे उनमें से कुछ लोग कहेंगे : यह जहन्नम वालों का एक समूह है जो तुम्हारे साथ जहन्नम में घुसता चला आ रहा है। तो वे जवाब देंगे : उनका स्वागत नहीं है। वे उसी तरह आग की यातना झेलने वाले हैं, जैसे हम झेल रहे हैं।
आयत 60
قَالُوا۟ بَلْ أَنتُمْ لَا مَرْحَبًۢا بِكُمْ ۖ أَنتُمْ قَدَّمْتُمُوهُ لَنَا ۖ فَبِئْسَ ٱلْقَرَارُ
قَالُوا۟
वो कहेंगे
بَلْ
बल्कि
أَنتُمْ
तुम
لَا
ना
مَرْحَبًۢا
नहीं कोई ख़ुश आमदीद
بِكُمْ ۖ
तुम्हें
أَنتُمْ
तुम ही
قَدَّمْتُمُوهُ
आगे लाए तुम उसे
لَنَا ۖ
हमारे लिए
فَبِئْسَ
तो कितनी बुरी है
ٱلْقَرَارُ
जाय क़रार
वे कहेंगे, "नहीं, तुम नहीं। तुम्हारे लिए कोई आवभगत नहीं। तुम्ही यह हमारे आगे लाए हो। तो बहुत ही बुरी है यह ठहरने की जगह!"
तफ़्सीर:
अनुयायियों का समूह अपने उन सरदारों से कहेगा, जिनके वे अधीनस्थ थे : बल्कि तुम (ऐ अनुसरण किए गए सरदारो!) तुम्हारा कोई स्वागत नहीं। क्योंकि तुम ही हो, जो हमें गुमराह करके और बहकाकर हमारे लिए इस दर्दनाक यातना के कारण बने हो। चुनाँचे यह ठिकाना, सभी लोगों का ठिकाना, बहुत बुरा ठिकाना है, जो कि जहन्नम की आग है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जन्नत की नेमतों और दोज़ख़ के अज़ाब के मुकाबले का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि दुनिया में किए अमल के मुताबिक आखिरत में जन्नत या दोज़ख़ मिलेगी, इसलिए अमल में एहतियात ज़रूरी है।
आयत 61
قَالُوا۟ رَبَّنَا مَن قَدَّمَ لَنَا هَـٰذَا فَزِدْهُ عَذَابًۭا ضِعْفًۭا فِى ٱلنَّارِ
قَالُوا۟
वो कहेंगे
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
مَن
जो
قَدَّمَ
आगे लाया
لَنَا
हमारे
هَـٰذَا
ये
فَزِدْهُ
पस ज़्यादा दे उसे
عَذَابًۭا
अज़ाब
ضِعْفًۭا
कई गुना
فِى
in
ٱلنَّارِ
आग में
वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! जो हमारे आगे यह (मुसीबत) लाया उसे आग में दोहरी यातना दे!"
तफ़्सीर:
अनुसरण करने वाले कहेंगे : ऐ हमारे पालनहार! जिसने हमारे पास हिदायत आ जाने के बाद हमें उससे गुमराह किया है, उसे जहन्नम में दोगुनी यातना दे।
आयत 62
وَقَالُوا۟ مَا لَنَا لَا نَرَىٰ رِجَالًۭا كُنَّا نَعُدُّهُم مِّنَ ٱلْأَشْرَارِ
وَقَالُوا۟
और वो कहेंगे
مَا
क्या है
لَنَا
हमारे लिए
لَا
not
نَرَىٰ
नहीं हम देखते
رِجَالًۭا
कुछ लोगों को
كُنَّا
थे हम
نَعُدُّهُم
शुमार करते उन्हें
مِّنَ
among
ٱلْأَشْرَارِ
शरीर लोगों में से
और वे कहेंगे, "क्या बात है कि हम उन लोगों को नहीं देखते जिनकी गणना हम बुरों में करते थे?
तफ़्सीर:
सरकश अभिमानी लोग कहेंगे : हमें क्या हुआ कि हम अपने साथ जहन्नम में उन लोगों को नहीं देखते, जिन्हें हम दुनिया में उन अभागा लोगों में से समझते थे जो यातना के पात्र थे।
आयत 63
أَتَّخَذْنَـٰهُمْ سِخْرِيًّا أَمْ زَاغَتْ عَنْهُمُ ٱلْأَبْصَـٰرُ
أَتَّخَذْنَـٰهُمْ
क्या बना लिया हमने उनको
سِخْرِيًّا
मज़ाक़
أَمْ
या
زَاغَتْ
कज हो गईं
عَنْهُمُ
उनसे
ٱلْأَبْصَـٰرُ
निगाहें
क्या हमने यूँ ही उनका मज़ाक बनाया था, यह उनसे निगाहें चूक गई हैं?"
तफ़्सीर:
क्या हमारा उनका मज़ाक़ उड़ाना और ठट्ठा करना गलत था, चुनाँचे वे यातना के पात्र नहीं थे, या हमारा उनका परिहास करना सही था और वे जहन्नम में दाखिल हुए हैं, किंतु हमारी नज़र उन पर नहीं पड़ी?!
आयत 64
إِنَّ ذَٰلِكَ لَحَقٌّۭ تَخَاصُمُ أَهْلِ ٱلنَّارِ
إِنَّ
बेशक
ذَٰلِكَ
ये
لَحَقٌّۭ
अलबत्ता हक़ है
تَخَاصُمُ
बाहम झगड़ना
أَهْلِ
(of the) people
ٱلنَّارِ
आग वालों का
निस्संदेह आग में पड़नेवालों का यह आपस का झगड़ा तो अवश्य होना है
तफ़्सीर:
यह जो हमने तुमसे काफ़िरों के, क़ियामत के दिन परस्पर झगड़ने का ज़िक्र किया है, निश्चित रूप से सत्य है। इसमें कोई संशय और संदेह नहीं है।
आयत 65
قُلْ إِنَّمَآ أَنَا۠ مُنذِرٌۭ ۖ وَمَا مِنْ إِلَـٰهٍ إِلَّا ٱللَّهُ ٱلْوَٰحِدُ ٱلْقَهَّارُ
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّمَآ
बेशक
أَنَا۠
मैं
مُنذِرٌۭ ۖ
डराने वाला हूँ
وَمَا
और नहीं
مِنْ
(is there) any
إِلَـٰهٍ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
सिवाए
ٱللَّهُ
अल्लाह के
ٱلْوَٰحِدُ
जो एक है
ٱلْقَهَّارُ
बहुत ज़बरदस्त है
कह दो, "मैं तो बस एक सचेत करनेवाला हूँ। कोई पूज्य-प्रभु नहीं सिवाय अल्लाह के, जो अकेला है, सबपर क़ाबू रखनेवाला;
तफ़्सीर:
(ऐ मुहम्मद!) आप अपनी जाति के काफ़िरों से कह दें : मैं तो केवल तुम्हें अल्लाह की यातना से डराने वाला हूँ कि कहीं वह तुम्हारे कुफ़्र और रसूलों को झुठलाने के कारण तुम्हें उससे दंडित न कर दे। और अल्लाह सर्वशक्तिमान के सिवा कोई ऐसा पूज्य नहीं, जो इबादत के योग्य हो। क्योंकि वह अपनी महानता, गुणों और नामों में अकेला है। तथा वह परम प्रभुत्वशाली है, जिसने हर चीज़ को पराजित कर दिया। अतः हर चीज़ उसके अधीन है।
आयत 66
رَبُّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا ٱلْعَزِيزُ ٱلْغَفَّـٰرُ
رَبُّ
रब है
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन का
وَمَا
और जो कुछ
بَيْنَهُمَا
उन दोनों के दर्मियान है
ٱلْعَزِيزُ
जो बहुत ज़बरदस्त है
ٱلْغَفَّـٰرُ
बहुत बख़्शिश फ़रमाने वाला है
आकाशों और धरती का रब है, और जो कुछ इन दोनों के बीच है उसका भी, अत्यन्त प्रभुत्वशाली, बड़ा क्षमाशील।"
तफ़्सीर:
वह आकाशों का पालनहार, धरती का पालनहार और उन दोनों के बीच मौजूद सारी चीज़ों का पालनहार है। वह अपने राज्य में प्रभुत्वशाली है, जिसे कोई पराजित नहीं कर सकता। तथा वह अपने तौबा करने वाले बंदों के गुनाहों को माफ़ करने वाला है।
आयत 67
قُلْ هُوَ نَبَؤٌا۟ عَظِيمٌ
قُلْ
कह दीजिए
هُوَ
वो
نَبَؤٌا۟
एक ख़बर है
عَظِيمٌ
बहुत बड़ी
कह दो, "वह एक बड़ी ख़बर है, ‘
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन झुठलाने वालों से कह दें : निश्चय क़ुरआन बहुत महत्वपूर्ण ख़बर है।
आयत 68
أَنتُمْ عَنْهُ مُعْرِضُونَ
أَنتُمْ
तुम
عَنْهُ
उससे
مُعْرِضُونَ
ऐराज़ करने वाले हो
जिसे तुम ध्यान में नहीं ला रहे हो
तफ़्सीर:
तुम इस महत्वपूर्ण ख़बर से मुँह फेरने वाले हो। उसपर कोई ध्यान नहीं देते हो।
आयत 69
مَا كَانَ لِىَ مِنْ عِلْمٍۭ بِٱلْمَلَإِ ٱلْأَعْلَىٰٓ إِذْ يَخْتَصِمُونَ
مَا
नहीं
كَانَ
है
لِىَ
मुझे
مِنْ
any
عِلْمٍۭ
कोई इल्म
بِٱلْمَلَإِ
(of) the chiefs
ٱلْأَعْلَىٰٓ
मलाए आला/ मुक़र्रब फ़रिश्तों का
إِذْ
जब
يَخْتَصِمُونَ
वो झगड़ते है
मुझे 'मलए आला' (ऊपरी लोक के फ़रिश्तों) का कोई ज्ञान नहीं था, जब वे वाद-विवाद कर रहे थे
तफ़्सीर:
आदम की रचना के बारे में फ़रिश्तों के बीच जो बात चल रही थी मुझे उसका कभी कोई ज्ञान नहीं था, यदि अल्लाह ने मेरी ओर वह़्य न की होती और मुझे जानकारी न दी होती।
आयत 70
إِن يُوحَىٰٓ إِلَىَّ إِلَّآ أَنَّمَآ أَنَا۠ نَذِيرٌۭ مُّبِينٌ
إِن
नहीं
يُوحَىٰٓ
वही की जाती
إِلَىَّ
मेरी तरफ़
إِلَّآ
मगर
أَنَّمَآ
ये कि
أَنَا۠
मैं तो
نَذِيرٌۭ
डराने वाला हूँ
مُّبِينٌ
खुल्लम-खुल्ला
मेरी ओर तो बस इसलिए प्रकाशना की जाती है कि मैं खुल्लम-खुल्ला सचेत करनेवाला हूँ।"
तफ़्सीर:
अल्लाह मेरी ओर जो कुछ भी वह़्य (प्रकाशना) करता है, वह केवल इसलिए वह़्य करता है कि मैं तुम्हें उसकी यातना से खुले तौर पर डराने वाला हूँ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दोज़खियों के आपसी झगड़े का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि दुनिया में गलत रास्ता दिखाने वाले साथी आखिरत में एक-दूसरे को कोसेंगे, इसलिए सोहबत का चुनाव अहम है।
आयत 71
إِذْ قَالَ رَبُّكَ لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ إِنِّى خَـٰلِقٌۢ بَشَرًۭا مِّن طِينٍۢ
إِذْ
जब
قَالَ
फ़रमाया
رَبُّكَ
आपके रब ने
لِلْمَلَـٰٓئِكَةِ
फ़रिश्तों से
إِنِّى
बेशक मैं
خَـٰلِقٌۢ
पैदा करने वाला हूँ
بَشَرًۭا
एक बशर को
مِّن
from
طِينٍۢ
मिट्टी से
याद करो जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों से कहा कि "मैं मिट्टी से एक मनुष्य पैदा करनेवाला हूँ
तफ़्सीर:
उस समय को याद करें, जब आपके पालनहार ने फ़रिश्तों से कहा : मैं मिट्टी से एक मनुष्य पैदा करने वाला हूँ, और वह आदम अलैहिस्सलाम हैं।
आयत 72
فَإِذَا سَوَّيْتُهُۥ وَنَفَخْتُ فِيهِ مِن رُّوحِى فَقَعُوا۟ لَهُۥ سَـٰجِدِينَ
فَإِذَا
फिर जब
سَوَّيْتُهُۥ
दुरुस्त कर दूँ मैं उसे
وَنَفَخْتُ
और फूँक दूँ मैं
فِيهِ
उसमें
مِن
of
رُّوحِى
अपनी रूह से
فَقَعُوا۟
तो गिर पड़ना
لَهُۥ
उसके लिए
سَـٰجِدِينَ
सजदा करते हुए
तो जब मैं उसको ठीक-ठाक कर दूँ औऱ उसमें अपनी रूह फूँक दूँ, तो तुम उसके आगे सजदे में गिर जाना।"
तफ़्सीर:
जब मैं उसकी रचना का काम पूरा कर लूँ, उसकी शक्ल-सूरत ठीक कर दूँ और उसमें अपनी आत्मा फूँक दूँ, तो तुम उसे सजदा करो।
आयत 73
فَسَجَدَ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ كُلُّهُمْ أَجْمَعُونَ
فَسَجَدَ
तो सजदा किया
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्तों ने
كُلُّهُمْ
उन सब ने
أَجْمَعُونَ
इकट्ठे
तो सभी फ़रिश्तों ने सजदा किया, सिवाय इबलीस के।
तफ़्सीर:
तो फ़रिश्तों ने अपने पालनहार के आदेश का पालन किया। चुनाँचे उन सब ने सम्मान स्वरूप सजदा किया, और उनमें से कोई भी न बचा, जिसने सजदा न किया हो।
आयत 74
إِلَّآ إِبْلِيسَ ٱسْتَكْبَرَ وَكَانَ مِنَ ٱلْكَـٰفِرِينَ
إِلَّآ
सिवाए
إِبْلِيسَ
इब्लीस के
ٱسْتَكْبَرَ
उसने तकब्बुर किया
وَكَانَ
और हो गया वो
مِنَ
of
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों में से
उसने घमंड किया और इनकार करनेवालों में से हो गया
तफ़्सीर:
सिवाय इबलीस के। उसने सजदा करने से अहंकार किया। और वह अपने पालनहार के आदेश के पालन से अभिमान करने के कारण काफ़िरों में से हो गया।
आयत 75
قَالَ يَـٰٓإِبْلِيسُ مَا مَنَعَكَ أَن تَسْجُدَ لِمَا خَلَقْتُ بِيَدَىَّ ۖ أَسْتَكْبَرْتَ أَمْ كُنتَ مِنَ ٱلْعَالِينَ
قَالَ
फ़रमाया
يَـٰٓإِبْلِيسُ
ऐ इब्लीस
مَا
किस चीज़ ने
مَنَعَكَ
रोका तुझे
أَن
इससे कि
تَسْجُدَ
तू सजदा करे
لِمَا
उसको जिसे
خَلَقْتُ
पैदा किया मैं ने
بِيَدَىَّ ۖ
अपने दोनों हाथों से
أَسْتَكْبَرْتَ
क्या तकब्बुर किया तू ने
أَمْ
या
كُنتَ
था तू
مِنَ
of
ٱلْعَالِينَ
बुलन्द मरतबा लोगों में से
कहा, "ऐ इबलीस! तूझे किस चीज़ ने उसको सजदा करने से रोका जिसे मैंने अपने दोनों हाथों से बनाया? क्या तूने घमंड किया, या तू कोई ऊँची हस्ती है?"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने कहा : ऐ इबलीस! तुझे आदम को सजदा करने से किस चीज़ ने रोका, जिसे मैंने अपने दोनों हाथों से बनाया?! क्या तुझे अभिमान ने सजदा करने से रोका, या तू इससे पहले ही से अपने रब से अभिमान और घमंड करने वाले था?!
आयत 76
قَالَ أَنَا۠ خَيْرٌۭ مِّنْهُ ۖ خَلَقْتَنِى مِن نَّارٍۢ وَخَلَقْتَهُۥ مِن طِينٍۢ
قَالَ
उसने कहा
أَنَا۠
मैं
خَيْرٌۭ
बेहतर हूँ
مِّنْهُ ۖ
उससे
خَلَقْتَنِى
पैदा किया तू ने मुझे
مِن
from
نَّارٍۢ
आग से
وَخَلَقْتَهُۥ
और पैदा किया तू ने उसे
مِن
from
طِينٍۢ
मिट्टी से
उसने कहा, "मैं उससे उत्तम हूँ। तूने मुझे आग से पैदा किया और उसे मिट्टी से पैदा किया।"
तफ़्सीर:
इबलीस ने कहा : मैं आदम से बेहतर हूँ। क्योंकि तूने मुझे आग से पैदा किया और उसे मिट्टी से बनाया। या उसका गुमान था कि आग मिट्टी से अधिक सम्माननीय तत्व है।
आयत 77
قَالَ فَٱخْرُجْ مِنْهَا فَإِنَّكَ رَجِيمٌۭ
قَالَ
फ़रमाया
فَٱخْرُجْ
पस निकल जा
مِنْهَا
इससे
فَإِنَّكَ
पस बेशक तू
رَجِيمٌۭ
मरदूद है
कहा, "अच्छा, निकल जा यहाँ से, क्योंकि तू धुत्कारा हुआ है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने इबलीस से कहा : जन्नत से निकल जा। क्योंकि तू शापित और धुत्कारा हुआ है।
आयत 78
وَإِنَّ عَلَيْكَ لَعْنَتِىٓ إِلَىٰ يَوْمِ ٱلدِّينِ
وَإِنَّ
और बेशक
عَلَيْكَ
तुझ पर
لَعْنَتِىٓ
लानत है मेरी
إِلَىٰ
until
يَوْمِ
दिन तक
ٱلدِّينِ
बदले के
और निश्चय ही बदला दिए जाने के दिन तक तुझपर मेरी लानत है।"
तफ़्सीर:
और तेरे लिए बदले के दिन अर्थात् क़ियामत के दिन तक जन्नत से निष्कासन है।
आयत 79
قَالَ رَبِّ فَأَنظِرْنِىٓ إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ
قَالَ
उसने कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
فَأَنظِرْنِىٓ
फिर मोहलत दे मुझे
إِلَىٰ
until
يَوْمِ
उस दिन तक
يُبْعَثُونَ
जब वो सब उठाए जाऐंगे
उसने कहा, "ऐ मेरे रब! फिर तू मुझे उस दिन तक के लिए मुहल्लत दे, जबकि लोग (जीवित करके) उठाए जाएँगे।"
तफ़्सीर:
इबलीस ने कहा : फिर मुझे मोहलत दे और मुझे उस दिन तक मौत न दे, जिस दिन तू अपने बंदों को दोबारा जीवित करके उठाएगा।
आयत 80
قَالَ فَإِنَّكَ مِنَ ٱلْمُنظَرِينَ
قَالَ
फ़रमाया
فَإِنَّكَ
पस बेशक तू
مِنَ
(are) of
ٱلْمُنظَرِينَ
मोहलत दिए जाने वालों में से है
कहा, "अच्छा, तुझे निश्चित एवं
तफ़्सीर:
अल्लाह ने कहा : निःसंदेह तू उन लोगों में से है जिन्हें मोहलत दी गई।
आज की ज़िंदगी में सबक़
आदम अलैहिस्सलाम की तख्लीक और इबलीस की नाफरमानी का दोबारा ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि घमंड और नाफरमानी इंसान को अल्लाह की रहमत से दूर कर देती है।
आयत 81
إِلَىٰ يَوْمِ ٱلْوَقْتِ ٱلْمَعْلُومِ
إِلَىٰ
Until
يَوْمِ
उस दिन तक
ٱلْوَقْتِ
जिसका वक़्त
ٱلْمَعْلُومِ
मालूम है
ज्ञात समय तक मुहलत है।"
तफ़्सीर:
तुझे विनष्ट करने के लिए निर्धारित ज्ञात समय के दिन तक।
आयत 82
قَالَ فَبِعِزَّتِكَ لَأُغْوِيَنَّهُمْ أَجْمَعِينَ
قَالَ
उसने कहा
فَبِعِزَّتِكَ
पस क़सम है तेरी इज़्ज़त की
لَأُغْوِيَنَّهُمْ
अलबत्ता मैं ज़रूर गुमराह कर दूँगा उन्हें
أَجْمَعِينَ
सब के सब को
उसने कहा, "तेरे प्रताप की सौगन्ध! मैं अवश्य उन सबको बहकाकर रहूँगा,
तफ़्सीर:
इबलीस ने कहा : मैं तेरी शक्ति और प्रभुत्व की क़सम खाता हूँ कि मैं आदम की समस्त संतान को अवश्य ही गुमराह कर दूँगा।
आयत 83
إِلَّا عِبَادَكَ مِنْهُمُ ٱلْمُخْلَصِينَ
إِلَّا
सिवाए
عِبَادَكَ
तेरे बन्दों के
مِنْهُمُ
उनमें से
ٱلْمُخْلَصِينَ
जो ख़ालिस किए हुए हैं
सिवाय उनमें से तेरे उन बन्दों के, जो चुने हुए है।"
तफ़्सीर:
सिवाय उसके, जिसे तूने मेरे गुमराह करने से बचा लिया और उसे केवल अपनी इबादत के लिए चुन लिया।
आयत 84
قَالَ فَٱلْحَقُّ وَٱلْحَقَّ أَقُولُ
قَالَ
फ़रमाया
فَٱلْحَقُّ
पस हक़ है
وَٱلْحَقَّ
और हक़ ही
أَقُولُ
मैं कहता हूँ
कहा, "तो यह सत्य है और मैं सत्य ही कहता हूँ
तफ़्सीर:
अल्लाह तआला ने कहा : सत्य मेरी ओर से है। और मैं सत्य ही कहता हूँ। उसके सिवा कुछ नहीं कहता।
आयत 85
لَأَمْلَأَنَّ جَهَنَّمَ مِنكَ وَمِمَّن تَبِعَكَ مِنْهُمْ أَجْمَعِينَ
لَأَمْلَأَنَّ
अलबत्ता मैं ज़रूर भर दूँगा
جَهَنَّمَ
जहन्नम को
مِنكَ
तुझसे
وَمِمَّن
और उनसे जो
تَبِعَكَ
पैरवी करेंगे तेरी
مِنْهُمْ
उनमें से
أَجْمَعِينَ
सब के सब से
कि मैं जहन्नम को तुझसे और उन सबसे भर दूँगा, जिन्होंने उनमें से तेरा अनुसरण किया होगा।"
तफ़्सीर:
मैं क़ियामत के दिन जहन्नम को तुझसे और उन सभी लोगों से भर दूँगा, जो आदम की संतान में से तेरे कुफ़्र में तेरा अनुसरण करेंगे।
आयत 86
قُلْ مَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍۢ وَمَآ أَنَا۠ مِنَ ٱلْمُتَكَلِّفِينَ
قُلْ
कह दीजिए
مَآ
नहीं
أَسْـَٔلُكُمْ
मैं माँगता तुमसे
عَلَيْهِ
इस पर
مِنْ
any
أَجْرٍۢ
कोई अजर
وَمَآ
और नहीं हूँ
أَنَا۠
मैं
مِنَ
of
ٱلْمُتَكَلِّفِينَ
तकल्लुफ़ करने वालों में से
कह दो, "मैं इसपर तुमसे कोई पारिश्रमिक नहीं माँगता और न मैं बनानट करनेवालों में से हूँ।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) इन मुश्रिकों से कह दें : मैं तुम्हें जो संदेश पहुँचाता हूँ, उसका तुमसे कोई पारिश्रमिक नहीं माँगता, और मैं अपनी ओर से कुछ बनाने वाला भी नहीं हूँ कि मुझे जितना आदेश दिया गया है, उससे कुछ अधिक बताऊँ।
आयत 87
إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرٌۭ لِّلْعَـٰلَمِينَ
إِنْ
नहीं है
هُوَ
वो
إِلَّا
मगर
ذِكْرٌۭ
एक नसीहत
لِّلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों के लिए
वह तो एक अनुस्मृति है सारे संसारवालों के लिए
तफ़्सीर:
क़ुरआन केवल उन जिन्नों और इनसानों के लिए एक अनुस्मारक (उपदेश) है, जो शरई आदेश के बाध्य हैं।
आयत 88
وَلَتَعْلَمُنَّ نَبَأَهُۥ بَعْدَ حِينٍۭ
وَلَتَعْلَمُنَّ
और अलबत्ता तुम ज़रूर जान लोगे
نَبَأَهُۥ
ख़बर उसकी
بَعْدَ
बाद
حِينٍۭ
एक वक़्त के
और थोड़ी ही अवधि के पश्चात उसकी दी हुई ख़बर तुम्हे मालूम हो जाएगी
तफ़्सीर:
और निश्चय तुम मरने के बाद जल्द ही इस क़ुरआन की खबर अवश्य जान लोगे और यह कि यह सत्य है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन को पूरी दुनिया के लिए एक नसीहत बताए जाने के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि कुरआन को सिर्फ किताब नहीं बल्कि रहनुमा समझकर अपनाना चाहिए।
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