بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ ٱتَّقُوا۟ رَبَّكُمُ ٱلَّذِى خَلَقَكُم مِّن نَّفْسٍۢ وَٰحِدَةٍۢ وَخَلَقَ مِنْهَا زَوْجَهَا وَبَثَّ مِنْهُمَا رِجَالًۭا كَثِيرًۭا وَنِسَآءًۭ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ٱلَّذِى تَسَآءَلُونَ بِهِۦ وَٱلْأَرْحَامَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلَيْكُمْ رَقِيبًۭا
يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلنَّاسُ
लोगो
ٱتَّقُوا۟
डरो
رَبَّكُمُ
अपने रब से
ٱلَّذِى
वो जिसने
خَلَقَكُم
पैदा किया तुम्हें
مِّن
from
نَّفْسٍۢ
a soul
وَٰحِدَةٍۢ
एक जान से
وَخَلَقَ
और उसने पैदा की
مِنْهَا
उसी से
زَوْجَهَا
बीवी उसकी
وَبَثَّ
और उसने फैला दिए
مِنْهُمَا
उन दोनों से
رِجَالًۭا
मर्द
كَثِيرًۭا
बहुत से
وَنِسَآءًۭ ۚ
और औरतें
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
ٱلَّذِى
वो जो
تَسَآءَلُونَ
तुम एक दूसरे से सवाल करते हो
بِهِۦ
उसके वास्ते से
وَٱلْأَرْحَامَ ۚ
और रिश्तों को (काटने से)
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
عَلَيْكُمْ
तुम पर
رَقِيبًۭا
निगरान
ऐ लोगों! अपने रब का डर रखों, जिसने तुमको एक जीव से पैदा किया और उसी जाति का उसके लिए जोड़ा पैदा किया और उन दोनों से बहुत-से पुरुष और स्त्रियाँ फैला दी। अल्लाह का डर रखो, जिसका वास्ता देकर तुम एक-दूसरे के सामने माँगें रखते हो। और नाते-रिश्तों का भी तुम्हें ख़याल रखना हैं। निश्चय ही अल्लाह तुम्हारी निगरानी कर रहा हैं
तफ़्सीर:
ऐ लोगो! अपने पालनहार से डरो। क्योंकि वही है जिसने तुम्हें एक जान से पैदा किया जो तुम्हारे पिता आदम हैं। और आदम से उनकी पत्नी तुम्हारी माँ हव्वा को पैदा किया। और उन दोनों से पृथ्वी के कोनों में बहुत-से पुरुषों और महिलाओं को फैला दिए। और उस अल्लाह से डरो जिसके नाम पर तुम एक-दूसरे से यह कहते हुए माँगते हो : मैं अल्लाह के नाम पर तुझसे ऐसा करने के लिए कहता हूँ। तथा रिश्ते-नाते को तोड़ने से बचो, जो तुम्हें आपस में जोड़ता है। निःसंदेह अल्लाह तुम्हारा निरीक्षण कर रहा है। अतः तुम्हारा कोई काम उससे ओझल नहीं होता, बल्कि वह उन्हें गिनकर रखता है और तुम्हें उनका बदला देगा।
आयत 2
وَءَاتُوا۟ ٱلْيَتَـٰمَىٰٓ أَمْوَٰلَهُمْ ۖ وَلَا تَتَبَدَّلُوا۟ ٱلْخَبِيثَ بِٱلطَّيِّبِ ۖ وَلَا تَأْكُلُوٓا۟ أَمْوَٰلَهُمْ إِلَىٰٓ أَمْوَٰلِكُمْ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ حُوبًۭا كَبِيرًۭا
وَءَاتُوا۟
और दो
ٱلْيَتَـٰمَىٰٓ
यतीमों को
أَمْوَٰلَهُمْ ۖ
माल उनके
وَلَا
और ना
تَتَبَدَّلُوا۟
तुम तब्दील करो
ٱلْخَبِيثَ
नापाक को
بِٱلطَّيِّبِ ۖ
पाक से
وَلَا
और ना
تَأْكُلُوٓا۟
तुम खाओ
أَمْوَٰلَهُمْ
माल उनके
إِلَىٰٓ
तरफ़
أَمْوَٰلِكُمْ ۚ
अपने मालों के (मिला कर)
إِنَّهُۥ
यक़ीनन वो
كَانَ
है वो
حُوبًۭا
गुनाह
كَبِيرًۭا
बहुत बड़ा
और अनाथों को उनका माल दे दो और बुरी चीज़ को अच्छी चीज़ से न बदलो, और न उनके माल को अपने माल के साथ मिलाकर खा जाओ। यह बहुत बड़ा गुनाह हैं
तफ़्सीर:
तथा (ऐ अभिभावकों) तुम अनाथों (जिनके पिता उनके बालिग होने से पहले मर गए) को उनका धन उस समय पूरा का पूरा दे दो, जब वे बालिग़ और समझदार हो जाएँ। और तुम हलाल के बदले हराम माल मत लो; इस प्रकार कि तुम अनाथों के अच्छे-अच्छे धन स्वयं ले लो और उसके बदले अपने घटिया और ख़राब धन उन्हें दे दो। और अनाथों का धन अपने धन के साथ मिलाकर हड़प न लो। ऐसा करना अल्लाह के निकट बहुत बड़ा पाप है।
आयत 3
وَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا تُقْسِطُوا۟ فِى ٱلْيَتَـٰمَىٰ فَٱنكِحُوا۟ مَا طَابَ لَكُم مِّنَ ٱلنِّسَآءِ مَثْنَىٰ وَثُلَـٰثَ وَرُبَـٰعَ ۖ فَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا تَعْدِلُوا۟ فَوَٰحِدَةً أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُكُمْ ۚ ذَٰلِكَ أَدْنَىٰٓ أَلَّا تَعُولُوا۟
وَإِنْ
और अगर
خِفْتُمْ
ख़ौफ़ हो तुम्हें
أَلَّا
कि ना
تُقْسِطُوا۟
तुम इन्साफ़ कर सकोगे
فِى
with
ٱلْيَتَـٰمَىٰ
यतीम (लड़कियों) में
فَٱنكِحُوا۟
तो निकाह कर लो
مَا
जो
طَابَ
पसंद आऐं
لَكُم
तुम्हें
مِّنَ
from
ٱلنِّسَآءِ
औरतों में से
مَثْنَىٰ
दो दो
وَثُلَـٰثَ
या तीन तीन
وَرُبَـٰعَ ۖ
या चार चार
فَإِنْ
फिर अगर
خِفْتُمْ
डरो तुम
أَلَّا
कि ना
تَعْدِلُوا۟
तुम अदल करोगे
فَوَٰحِدَةً
तो एक ही से
أَوْ
या
مَا
what
مَلَكَتْ
जिनके मालिक हुए
أَيْمَـٰنُكُمْ ۚ
दाऐं हाथ तुम्हारे
ذَٰلِكَ
ये
أَدْنَىٰٓ
ज़्यादा क़रीब है
أَلَّا
कि ना
تَعُولُوا۟
तुम नाइन्साफ़ी करो
और यदि तुम्हें आशंका हो कि तुम अनाथों (अनाथ लड़कियों) के प्रति न्याय न कर सकोगे तो उनमें से, जो तुम्हें पसन्द हों, दो-दो या तीन-तीन या चार-चार से विवाह कर लो। किन्तु यदि तुम्हें आशंका हो कि तुम उनके साथ एक जैसा व्यवहार न कर सकोंगे, तो फिर एक ही पर बस करो, या उस स्त्री (लौंड़ी) पर जो तुम्हारे क़ब्ज़े में आई हो, उसी पर बस करो। इसमें तुम्हारे न्याय से न हटने की अधिक सम्भावना है
तफ़्सीर:
यदि तुम्हें डर हो कि अपने अधीन रहने वाली अनाथ लड़कियों से विवाह करके तुम न्याय नहीं कर पाओगे; या तो इस डर से कि तुम उनके आवश्यक मह्र को कम कर दोगे, या उनके साथ दुर्व्यवहार करोगे, तो ऐसी स्थिति में तुम उन्हें छोड़कर उनके अलावा दूसरी अच्छी महिलाओं से विवाह कर लो। यदि तुम चाहो तो दो, या तीन, या चार से विवाह कर सकते हो। परन्तु यदि तुम्हें डर हो कि तुम उनके बीच न्याय नहीं कर सकोगे, तो एक ही तक सीमित रहो, या फिर उन दासियों से लाभान्वित हो जिनके तुम मालिक हो; क्योंकि उनके लिए उस तरह के अधिकार अनिवार्य नहीं हैं जो पत्नियों के लिए आवश्यक हैं। आयत में अनाथ लड़कियों के संबंध में, तथा एक ही महिला से विवाह करने अथवा दासियों से लाभ उठाने के संबंध में जो कुछ वर्णित है, वह इस बात के अधिक निकट है कि तुम अत्याचार न करो और किसी एक की तरफ झुकाव न रखो।
आयत 4
وَءَاتُوا۟ ٱلنِّسَآءَ صَدُقَـٰتِهِنَّ نِحْلَةًۭ ۚ فَإِن طِبْنَ لَكُمْ عَن شَىْءٍۢ مِّنْهُ نَفْسًۭا فَكُلُوهُ هَنِيٓـًۭٔا مَّرِيٓـًۭٔا
وَءَاتُوا۟
और दो
ٱلنِّسَآءَ
औरतों को
صَدُقَـٰتِهِنَّ
महर उनके
نِحْلَةًۭ ۚ
ख़ुश दिली से
فَإِن
फिर अगर
طِبْنَ
वो ख़ुशी से दे दें
لَكُمْ
तुम्हें
عَن
of
شَىْءٍۢ
कोई चीज़
مِّنْهُ
उसमें से
نَفْسًۭا
ख़ुद
فَكُلُوهُ
तो खाओ उसे
هَنِيٓـًۭٔا
ख़ुशी से
مَّرِيٓـًۭٔا
ख़ुशगवार (समझ कर)
और स्त्रियों को उनके मह्रा ख़ुशी से अदा करो। हाँ, यदि वे अपनी ख़ुशी से उसमें से तुम्हारे लिए छोड़ दे तो उसे तुम अच्छा और पाक समझकर खाओ
तफ़्सीर:
स्त्रियों को उनके मह्र एक अनिवार्य उपहार के तौर पर अदा करो। यदि वे बिना किसी मजबूरी के अपनी इच्छा से तुम्हारे लिए मह्र में से कुछ छोड़ दें, तो उसे हलाल व पाक समझकर (रूचिकर) खाओ।
आयत 5
وَلَا تُؤْتُوا۟ ٱلسُّفَهَآءَ أَمْوَٰلَكُمُ ٱلَّتِى جَعَلَ ٱللَّهُ لَكُمْ قِيَـٰمًۭا وَٱرْزُقُوهُمْ فِيهَا وَٱكْسُوهُمْ وَقُولُوا۟ لَهُمْ قَوْلًۭا مَّعْرُوفًۭا
وَلَا
और ना
تُؤْتُوا۟
तुम दो
ٱلسُّفَهَآءَ
नादानों को
أَمْوَٰلَكُمُ
माल अपने
ٱلَّتِى
वो जो
جَعَلَ
बनाया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
قِيَـٰمًۭا
क़याम (का ज़रिया)
وَٱرْزُقُوهُمْ
और रिज़्क़ दो उन्हें
فِيهَا
उसमें से
وَٱكْسُوهُمْ
और पहनाओ उन्हें
وَقُولُوا۟
और कहो
لَهُمْ
उन्हें
قَوْلًۭا
बात
مَّعْرُوفًۭا
भली/अच्छी
और अपने माल, जिसे अल्लाह ने तुम्हारे लिए जीवन-यापन का साधन बनाया है, बेसमझ लोगों को न दो। उन्हें उसमें से खिलाते और पहनाते रहो और उनसे भली बात कहो
तफ़्सीर:
और (ऐ अभिभावको!) उन लोगों को धन न दो, जो अच्छी तरह से उसका प्रबंधन नहीं कर सकते हैं। क्योंकि अल्लाह ने इस धन को बंदो के हितों की रक्षा और उनकी आजीविका का साधन बनाया है और ये लोग धन का प्रभार लेने और उसे संरक्षित करने के योग्य नहीं हैं। उस धन से उन पर खर्च करो और उन्हें कपड़े पहनाओ, तथा उनसे अच्छी बात कहो और उनसे अच्छा वादा करो कि उनके परिपक्व हो जाने और धन प्रबंधन में कुशल हो जाने पर तुम उन्हें उनका धन दे दोगे।
आयत 6
وَٱبْتَلُوا۟ ٱلْيَتَـٰمَىٰ حَتَّىٰٓ إِذَا بَلَغُوا۟ ٱلنِّكَاحَ فَإِنْ ءَانَسْتُم مِّنْهُمْ رُشْدًۭا فَٱدْفَعُوٓا۟ إِلَيْهِمْ أَمْوَٰلَهُمْ ۖ وَلَا تَأْكُلُوهَآ إِسْرَافًۭا وَبِدَارًا أَن يَكْبَرُوا۟ ۚ وَمَن كَانَ غَنِيًّۭا فَلْيَسْتَعْفِفْ ۖ وَمَن كَانَ فَقِيرًۭا فَلْيَأْكُلْ بِٱلْمَعْرُوفِ ۚ فَإِذَا دَفَعْتُمْ إِلَيْهِمْ أَمْوَٰلَهُمْ فَأَشْهِدُوا۟ عَلَيْهِمْ ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ حَسِيبًۭا
وَٱبْتَلُوا۟
और आज़माते रहो
ٱلْيَتَـٰمَىٰ
यतीमों को
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
بَلَغُوا۟
वो पहुँच जाऐं
ٱلنِّكَاحَ
निकाह की (उम्र को)
فَإِنْ
फिर अगर
ءَانَسْتُم
पाओ तुम
مِّنْهُمْ
उनमें
رُشْدًۭا
समझ बूझ
فَٱدْفَعُوٓا۟
तो दे दो
إِلَيْهِمْ
उन्हें
أَمْوَٰلَهُمْ ۖ
माल उनके
وَلَا
और ना
تَأْكُلُوهَآ
तुम खाओ
إِسْرَافًۭا
इसराफ़ करते हुए
وَبِدَارًا
और जल्दी करते हुए
أَن
कि
يَكْبَرُوا۟ ۚ
वो बड़े हो जाऐंगे
وَمَن
और जो कोई
كَانَ
हो
غَنِيًّۭا
ग़नी
فَلْيَسْتَعْفِفْ ۖ
पस चाहिए कि वो बचे
وَمَن
और जो कोई
كَانَ
हो
فَقِيرًۭا
मोहताज
فَلْيَأْكُلْ
पस चाहिए कि वो खाए
بِٱلْمَعْرُوفِ ۚ
भले तरीक़े से
فَإِذَا
फिर जब
دَفَعْتُمْ
दे दो तुम
إِلَيْهِمْ
उन्हें
أَمْوَٰلَهُمْ
माल उनके
فَأَشْهِدُوا۟
तो गवाह बना लो
عَلَيْهِمْ ۚ
उन पर
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِٱللَّهِ
अल्लाह
حَسِيبًۭا
ख़ूब हिसाब लेने वाला
और अनाथों को जाँचते रहो, यहाँ तक कि जब वे विवाह की अवस्था को पहुँच जाएँ, तो फिर यदि तुम देखो कि उनमें सूझ-बूझ आ गई है, तो उनके माल उन्हें सौंप दो, और इस भय से कि कहीं वे बड़े न हो जाएँ तुम उनके माल अनुचित रूप से उड़ाकर और जल्दी करके न खाओ। और जो धनवान हो, उसे तो (इस माल से) से बचना ही चाहिए। हाँ, जो निर्धन हो, वह उचित रीति से कुछ खा सकता है। फिर जब उनके माल उन्हें सौंपने लगो, तो उनकी मौजूदगी में गवाह बना लो। हिसाब लेने के लिए अल्लाह काफ़ी है
तफ़्सीर:
(ऐ अभिभावको) जब अनाथ बच्चे वयस्कता की आयु को पहुँच जाएँ, तो उनकी इस प्रकार जाँच करो कि उन्हें उनके माल का कुछ हिस्सा दे दो कि वे उसे अपनी मर्ज़ी से काम में लाएं। यदि वे उसका सदुपयोग करें और तुम्हारे लिए उनकी समझदारी (योग्यता) स्पष्ट हो जाए, तो तुम उनका पूरा धन बिना किसी कमी के उनके हवाले कर दो। तथा उनके धन को उस सीमा से बढ़कर न खाओ जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए ज़रूरत के समय उनके धन से वैध ठहराया है, और उसे इस डर से जल्दी-जल्दी न खाओ कि वे बालिग होने के बाद उसे ले लेंगे। और तुममें से जिसके पास इतना धन हो कि वह उसे बेनियाज़ कर दे, तो उसे अनाथ का धन लेने से बचना चाहिए। और तुममें से जो गरीब हो उसके पास कोई धन न हो, तो वह अपनी आवश्यकता के अनुसार खा सकता है। और जब तुम उनके वयस्क और परिपक्व होने के बाद उनका धन उनके हवाले करो, तो अधिकारों को संरक्षित करने और विवाद के कारणों को रोकने के लिए उस सुपुर्दगी पर गवाह बना लो। और अल्लाह उसपर साक्षी और अपने बंदों के कार्यों का हिसाब लेने के लिए काफी है।
आयत 7
لِّلرِّجَالِ نَصِيبٌۭ مِّمَّا تَرَكَ ٱلْوَٰلِدَانِ وَٱلْأَقْرَبُونَ وَلِلنِّسَآءِ نَصِيبٌۭ مِّمَّا تَرَكَ ٱلْوَٰلِدَانِ وَٱلْأَقْرَبُونَ مِمَّا قَلَّ مِنْهُ أَوْ كَثُرَ ۚ نَصِيبًۭا مَّفْرُوضًۭا
لِّلرِّجَالِ
मर्दों के लिए
نَصِيبٌۭ
एक हिस्सा है
مِّمَّا
उसमें से जो
تَرَكَ
छोड़ जाऐं
ٱلْوَٰلِدَانِ
वालिदैन
وَٱلْأَقْرَبُونَ
और क़राबतदार
وَلِلنِّسَآءِ
और औरतों के लिए
نَصِيبٌۭ
एक हिस्सा है
مِّمَّا
उसमें से जो
تَرَكَ
छोड़ जाऐं
ٱلْوَٰلِدَانِ
वालिदैन
وَٱلْأَقْرَبُونَ
और क़राबतदार
مِمَّا
उसमें से जो
قَلَّ
क़लील हो
مِنْهُ
उस (माल) में से
أَوْ
या
كَثُرَ ۚ
कसीर/ज़्यादा हो
نَصِيبًۭا
हिस्सा है
مَّفْرُوضًۭا
फ़र्ज़ किया गया
पुरुषों का उस माल में एक हिस्सा है जो माँ-बाप और नातेदारों ने छोड़ा हो; और स्त्रियों का भी उस माल में एक हिस्सा है जो माल माँ-बाप और नातेदारों ने छोड़ा हो - चाह वह थोड़ा हो या अधिक हो - यह हिस्सा निश्चित किया हुआ है
तफ़्सीर:
पुरुषों का उस माल में हिस्सा है, जिसे माता-पिता और रिश्तेदारों जैसे भाइयों और चाचाओं ने मरने के बाद छोड़ा है, यह धन कम हो या अधिक। इसी प्रकार इन लोगों के छोड़े हुए धन में स्त्रियों का भी हिस्सा है। यह अज्ञानता के समय की उस रीति के विपरीत है जिसमें महिलाओं और बच्चों को विरासत से वंचित रखा जाता था। यह हिस्सा एक ऐसा अधिकार है जिसकी राशि सर्वशक्तिमान अल्लाह की ओर से निश्चित व निर्धारित है।
आयत 8
وَإِذَا حَضَرَ ٱلْقِسْمَةَ أُو۟لُوا۟ ٱلْقُرْبَىٰ وَٱلْيَتَـٰمَىٰ وَٱلْمَسَـٰكِينُ فَٱرْزُقُوهُم مِّنْهُ وَقُولُوا۟ لَهُمْ قَوْلًۭا مَّعْرُوفًۭا
وَإِذَا
और जब
حَضَرَ
हाज़िर/मौजूद हों
ٱلْقِسْمَةَ
तक़सीम के वक़्त
أُو۟لُوا۟
(of)
ٱلْقُرْبَىٰ
क़राबतदार
وَٱلْيَتَـٰمَىٰ
और यतीम
وَٱلْمَسَـٰكِينُ
और मसाकीन
فَٱرْزُقُوهُم
तो तुम दो उन्हें
مِّنْهُ
उस (माल) में से
وَقُولُوا۟
और कहो
لَهُمْ
उनसे
قَوْلًۭا
बात
مَّعْرُوفًۭا
भली/अच्छी
और जब बाँटने के समय नातेदार और अनाथ और मुहताज उपस्थित हो तो उन्हें भी उसमें से (उनका हिस्सा) दे दो और उनसे भली बात करो
तफ़्सीर:
जब पैतृक संपत्ति के बंटवारे के समय गैर-वारिस रिश्तेदार, अनाथ और निर्धन उपस्थित हों; तो इस धन में से उसके बंटवारे से पहले - ऐच्छिक रूप से - जितनी तुम्हारी इच्छा हो उन्हें भी दो। क्योंकि वे उसकी आस लगाते हैं, और यह धन तुम्हारे पास बिना किसी कष्ट के आया है। तथा उनसे अच्छी बात कहो जिसमें कोई अभद्रता न हो।
आयत 9
وَلْيَخْشَ ٱلَّذِينَ لَوْ تَرَكُوا۟ مِنْ خَلْفِهِمْ ذُرِّيَّةًۭ ضِعَـٰفًا خَافُوا۟ عَلَيْهِمْ فَلْيَتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَلْيَقُولُوا۟ قَوْلًۭا سَدِيدًا
وَلْيَخْشَ
और चाहिए कि डरें
ٱلَّذِينَ
वो जो
لَوْ
अगर
تَرَكُوا۟
वो छोड़ जाऐं
مِنْ
from
خَلْفِهِمْ
अपने पीछे से
ذُرِّيَّةًۭ
औलाद
ضِعَـٰفًا
कमज़ोर
خَافُوا۟
वो ख़ौफ़ खाऐं
عَلَيْهِمْ
उन पर
فَلْيَتَّقُوا۟
पस चाहिए कि वो डरें
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَلْيَقُولُوا۟
और चाहिए कि वो कहें
قَوْلًۭا
बात
سَدِيدًا
दुरुस्त
और लोगों को डरना चाहिए कि यदि वे स्वयं अपने पीछे अपने निर्बल बच्चे छोड़ते तो उन्हें उन बच्चों के विषय में कितना भय होता। तो फिर उन्हें अल्लाह से डरना चाहिए और ठीक सीधी बात कहनी चाहिए
तफ़्सीर:
और उन लोगों को डरना चाहिए जो अगर मर जाते और अपने पीछे कमज़ोर छोटे बच्चे छोड़ जाते, तो उन्हें उनके नष्ट होने का कैसा डर होता। अतः उन्हें अल्लाह से डरते हुए उन अनाथों पर अत्याचार नहीं करना चाहिए जो उनके संरक्षण में हैं। ताकि अल्लाह उनकी मौत के पश्चात उनके लिए ऐसे लोगों का प्रबंध करे, जो उनकी औलाद के साथ अच्छा व्यवहार करें, जैसा कि उन्होंने उन अनाथों के साथ सद्व्यवहार किया था। तथा उन्हें उस व्यक्ति की औलाद के हक़ में अच्छा व्यवहार करना चाहिए जिसकी वसीयत के समय वे उपस्थित होते हैं, इस प्रकार कि उनसे सही व सच्ची बात कहें कि वह अपनी वसीयत में अपने वारिसों के हक़ पर अत्याचार न करे, तथा वसीयत को छोड़कर खुद को भलाई से वंचित न करे।
आयत 10
إِنَّ ٱلَّذِينَ يَأْكُلُونَ أَمْوَٰلَ ٱلْيَتَـٰمَىٰ ظُلْمًا إِنَّمَا يَأْكُلُونَ فِى بُطُونِهِمْ نَارًۭا ۖ وَسَيَصْلَوْنَ سَعِيرًۭا
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَأْكُلُونَ
खाते हैं
أَمْوَٰلَ
माल
ٱلْيَتَـٰمَىٰ
यतीमों के
ظُلْمًا
ज़ुल्म करते हुए
إِنَّمَا
बेशक
يَأْكُلُونَ
वो खाते हैं
فِى
in
بُطُونِهِمْ
अपने पेटों में
نَارًۭا ۖ
आग
وَسَيَصْلَوْنَ
और अनक़रीब वो जलेंगे
سَعِيرًۭا
भड़कती हुई आग में
जो लोग अनाथों के माल अन्याय के साथ खाते है, वास्तव में वे अपने पेट आग से भरते है, और वे अवश्य भड़कती हुई आग में पड़ेगे
तफ़्सीर:
जो लोग अनाथों का धन ले लेते हैं और उसमें अन्यायपूर्ण और आक्रामक तरीक़े से अपना अधिकार चलाते हैं, वे वास्तव में अपने पेट में दहकती हुई आग डाल रहे हैं। और यह आग उन्हें क़यामत (पुनरुत्थान) के दिन जलाएगी।
आयत 11
يُوصِيكُمُ ٱللَّهُ فِىٓ أَوْلَـٰدِكُمْ ۖ لِلذَّكَرِ مِثْلُ حَظِّ ٱلْأُنثَيَيْنِ ۚ فَإِن كُنَّ نِسَآءًۭ فَوْقَ ٱثْنَتَيْنِ فَلَهُنَّ ثُلُثَا مَا تَرَكَ ۖ وَإِن كَانَتْ وَٰحِدَةًۭ فَلَهَا ٱلنِّصْفُ ۚ وَلِأَبَوَيْهِ لِكُلِّ وَٰحِدٍۢ مِّنْهُمَا ٱلسُّدُسُ مِمَّا تَرَكَ إِن كَانَ لَهُۥ وَلَدٌۭ ۚ فَإِن لَّمْ يَكُن لَّهُۥ وَلَدٌۭ وَوَرِثَهُۥٓ أَبَوَاهُ فَلِأُمِّهِ ٱلثُّلُثُ ۚ فَإِن كَانَ لَهُۥٓ إِخْوَةٌۭ فَلِأُمِّهِ ٱلسُّدُسُ ۚ مِنۢ بَعْدِ وَصِيَّةٍۢ يُوصِى بِهَآ أَوْ دَيْنٍ ۗ ءَابَآؤُكُمْ وَأَبْنَآؤُكُمْ لَا تَدْرُونَ أَيُّهُمْ أَقْرَبُ لَكُمْ نَفْعًۭا ۚ فَرِيضَةًۭ مِّنَ ٱللَّهِ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلِيمًا حَكِيمًۭا
يُوصِيكُمُ
ताकीद करता है तुम्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
فِىٓ
concerning
أَوْلَـٰدِكُمْ ۖ
तुम्हारी औलाद के बारे में
لِلذَّكَرِ
मर्द के लिए
مِثْلُ
मानिन्द
حَظِّ
हिस्सा है
ٱلْأُنثَيَيْنِ ۚ
दो औरतों के
فَإِن
फिर अगर
كُنَّ
हों वो
نِسَآءًۭ
औरतें
فَوْقَ
ऊपर
ٱثْنَتَيْنِ
दो से
فَلَهُنَّ
तो उनके लिए है
ثُلُثَا
दो तिहाई
مَا
जो
تَرَكَ ۖ
उस (मय्यत) ने छोड़ा
وَإِن
और अगर
كَانَتْ
हो वो
وَٰحِدَةًۭ
एक (औरत)
فَلَهَا
तो उसके लिए
ٱلنِّصْفُ ۚ
आधा है
وَلِأَبَوَيْهِ
और उसके माँ बाप के लिए
لِكُلِّ
वास्ते हर
وَٰحِدٍۢ
एक के
مِّنْهُمَا
उन दोनों में से
ٱلسُّدُسُ
छठा हिस्सा है
مِمَّا
उसमें से जो
تَرَكَ
उसने छोड़ा
إِن
अगर
كَانَ
है
لَهُۥ
उसके लिए
وَلَدٌۭ ۚ
कोई औलाद
فَإِن
फिर अगर
لَّمْ
नहीं
يَكُن
है
لَّهُۥ
उसके लिए
وَلَدٌۭ
कोई औलाद
وَوَرِثَهُۥٓ
और वारिस हों उसके
أَبَوَاهُ
माँ बाप उसके
فَلِأُمِّهِ
तो उसकी माँ के लिए
ٱلثُّلُثُ ۚ
तीसरा हिस्सा है
فَإِن
फिर अगर
كَانَ
हों
لَهُۥٓ
उसके
إِخْوَةٌۭ
बहन भाई
فَلِأُمِّهِ
तो उसकी माँ के लिए
ٱلسُّدُسُ ۚ
छठा हिस्सा है
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद
وَصِيَّةٍۢ
वसीयत पूरी करने के
يُوصِى
वो वसीयत कर जाए
بِهَآ
उसकी
أَوْ
या
دَيْنٍ ۗ
क़र्ज़ (की अदायगी के बाद)
ءَابَآؤُكُمْ
बाप तुम्हारे
وَأَبْنَآؤُكُمْ
और बेटे तुम्हारे
لَا
not
تَدْرُونَ
नहीं तुम जानते
أَيُّهُمْ
उनमें से कौन
أَقْرَبُ
ज़्यादा क़रीब है
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
نَفْعًۭا ۚ
नफ़ा में
فَرِيضَةًۭ
फ़रीज़ा है
مِّنَ
from
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह की तरफ़ से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
عَلِيمًا
बहुत इल्म वाला
حَكِيمًۭا
बहुत हिकमत वाला
अल्लाह तुम्हारी सन्तान के विषय में तुम्हें आदेश देता है कि दो बेटियों के हिस्से के बराबर एक बेटे का हिस्सा होगा; और यदि दो से अधिक बेटियाँ ही हो तो उनका हिस्सा छोड़ी हुई सम्पत्ति का दो तिहाई है। और यदि वह अकेली हो तो उसके लिए आधा है। और यदि मरनेवाले की सन्तान हो जो उसके माँ-बाप में से प्रत्येक का उसके छोड़े हुए माल का छठा हिस्सा है। और यदि वह निस्संतान हो और उसके माँ-बाप ही उसके वारिस हों, तो उसकी माँ का हिस्सा तिहाई होगा। और यदि उसके भाई भी हो, तो उसका माँ का छठा हिस्सा होगा। ये हिस्से, वसीयत जो वह कर जाए पूरी करने या ऋण चुका देने के पश्चात है। तुम्हारे बाप भी है और तुम्हारे बेटे भी। तुम नहीं जानते कि उनमें से लाभ पहुँचाने की दृष्टि से कौन तुमसे अधिक निकट है। यह हिस्सा अल्लाह का निश्चित किया हुआ है। अल्लाह सब कुछ जानता, समझता है
तफ़्सीर:
अल्लाह तुम्हें तुम्हारी संतान की पैतृक संपत्ति के संबंध में आदेश देता है कि पैतृक संपत्ति का बंटवरा उनके बीच इस तरह होगा कि एक बेटे को दो बेटियों के समान हिस्सा मिलेगा। यदि मृतक ने केवल बेटियाँ छोड़ी हों, कोई बेटा न हो, तो दो या उनसे अधिक बेटियों को विरासत का दो तिहाई हिस्सा मिलेगा। और यदि उसकी केवल एक ही बेटी हो, तो उसे विरासत का आधा हिस्सा मिलेगा। तथा मृतक के माता-पिता में से प्रत्येक को छोड़े हुए धन का छठवाँ हिस्सा मिलेगा, यदि उसकी कोई संतान हो, चाहे वह नर हो या नारी। और यदि उसकी कोई औलाद न हो और उसके माता-पिता के अतिरिक्त उसका कोई वारिस न हो, तो ऐसी स्थिति में उसकी माँ को एक तिहाई हिस्सा मिलेगा और विरासत का शेष भाग बाप का होगा। और यदि मृतक के दो या दो से अधिक भाई-बहन हों, सगे हों या सौतेले, तो फर्ज़ के रूप में माँ को छठवाँ हिस्सा मिलेगा, और बाकी असबह होने के कारण बाप के लिए होगा और भाइयों (और बहनों) को कुछ नहीं मिलेगा। विरासत का यह बंटवारा उस वसीयत के कार्यान्वयन के बाद होगा जो मृतक ने की थी, बशर्ते कि उसकी वसीयत की राशि उसके एक तिहाई धन से अधिक न हो, तथा इस शर्त के साथ कि उसपर अनिवार्य कर्ज़ का भुगतान कर दिया जाए। अल्लाह ने विरासत का बंटवारा इस प्रकार निर्धारित किया है; क्योंकि तुम नहीं जानते कि तुम्हारे बाप और बेटों में से इस दुनिया और आखिरत में तुम्हारे लिए कौन सबसे अधिक लाभदायक है। क्योंकि ऐसा हो सकता है कि मृतक अपने किसी वारिस के बारे में अच्छा गुमान रखे और उसे अपना पूरा धन दे दे, या वह उसके बारे में बुरा गुमान रखे और उसे विरासत से वंचित कर दे, जबकि हो सकता है कि मामला उसके विपरीत हो। हालांकि जो यह सब कुछ जानता है वह अल्लाह है, जिससे कोई वस्तु छिप नहीं सकती। इसीलिए उसने विरासत का बंटवारा उक्त तरीक़े पर किया है और उसे अपने बंदों पर अनिवार्य कर्तव्य ठहराया है। नि:संदेह अल्लाह जानने वाला है, जिसपर उसके बंदों के हितों में से कोई भी चीज़ गुप्त नहीं है, तथा वह अपने विधान और प्रबंधन में हिकमत वाला है।
आयत 12
۞ وَلَكُمْ نِصْفُ مَا تَرَكَ أَزْوَٰجُكُمْ إِن لَّمْ يَكُن لَّهُنَّ وَلَدٌۭ ۚ فَإِن كَانَ لَهُنَّ وَلَدٌۭ فَلَكُمُ ٱلرُّبُعُ مِمَّا تَرَكْنَ ۚ مِنۢ بَعْدِ وَصِيَّةٍۢ يُوصِينَ بِهَآ أَوْ دَيْنٍۢ ۚ وَلَهُنَّ ٱلرُّبُعُ مِمَّا تَرَكْتُمْ إِن لَّمْ يَكُن لَّكُمْ وَلَدٌۭ ۚ فَإِن كَانَ لَكُمْ وَلَدٌۭ فَلَهُنَّ ٱلثُّمُنُ مِمَّا تَرَكْتُم ۚ مِّنۢ بَعْدِ وَصِيَّةٍۢ تُوصُونَ بِهَآ أَوْ دَيْنٍۢ ۗ وَإِن كَانَ رَجُلٌۭ يُورَثُ كَلَـٰلَةً أَوِ ٱمْرَأَةٌۭ وَلَهُۥٓ أَخٌ أَوْ أُخْتٌۭ فَلِكُلِّ وَٰحِدٍۢ مِّنْهُمَا ٱلسُّدُسُ ۚ فَإِن كَانُوٓا۟ أَكْثَرَ مِن ذَٰلِكَ فَهُمْ شُرَكَآءُ فِى ٱلثُّلُثِ ۚ مِنۢ بَعْدِ وَصِيَّةٍۢ يُوصَىٰ بِهَآ أَوْ دَيْنٍ غَيْرَ مُضَآرٍّۢ ۚ وَصِيَّةًۭ مِّنَ ٱللَّهِ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَلِيمٌۭ
۞ وَلَكُمْ
और तुम्हारे लिए
نِصْفُ
आधा है
مَا
जो
تَرَكَ
छोड़ा
أَزْوَٰجُكُمْ
तुम्हारी बीवियों ने
إِن
अगर
لَّمْ
ना
يَكُن
हो
لَّهُنَّ
उनके लिए
وَلَدٌۭ ۚ
कोई औलाद
فَإِن
फिर अगर
كَانَ
है
لَهُنَّ
उनके लिए
وَلَدٌۭ
कोई औलाद
فَلَكُمُ
तो तुम्हारे लिए
ٱلرُّبُعُ
चौथा हिस्सा
مِمَّا
उस में से जो
تَرَكْنَ ۚ
वो छोड़ जाऐं
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद
وَصِيَّةٍۢ
वसीयत के
يُوصِينَ
वो औरतें वसीयत कर जाऐं
بِهَآ
जिसकी
أَوْ
या
دَيْنٍۢ ۚ
क़र्ज़ (की अदायगी के बाद)
وَلَهُنَّ
और उन औरतों के लिए है
ٱلرُّبُعُ
चौथा हिस्सा
مِمَّا
उसमें से जो
تَرَكْتُمْ
छोड़ा तुमने
إِن
अगर
لَّمْ
नहीं
يَكُن
है
لَّكُمْ
तुम्हारे लिए
وَلَدٌۭ ۚ
कोई औलाद
فَإِن
फिर अगर
كَانَ
है
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
وَلَدٌۭ
कोई औलाद
فَلَهُنَّ
तो उनके लिए है
ٱلثُّمُنُ
आठवाँ हिस्सा
مِمَّا
उसमें से जो
تَرَكْتُم ۚ
छोड़ा तुमने
مِّنۢ
from
بَعْدِ
बाद
وَصِيَّةٍۢ
वसीयत के
تُوصُونَ
तुम वसीयत कर जाओ
بِهَآ
जिसकी
أَوْ
या
دَيْنٍۢ ۗ
क़र्ज़ (की अदायगी के बाद)
وَإِن
और अगर
كَانَ
है
رَجُلٌۭ
कोई मर्द
يُورَثُ
मीरास ली जा रही है (जिसकी)
كَلَـٰلَةً
कलाला
أَوِ
या
ٱمْرَأَةٌۭ
कोई औरत
وَلَهُۥٓ
और उसके लिए हो
أَخٌ
एक भाई
أَوْ
या
أُخْتٌۭ
एक बहन
فَلِكُلِّ
तो वास्ते हर
وَٰحِدٍۢ
एक के
مِّنْهُمَا
उन दोनों में से
ٱلسُّدُسُ ۚ
छठा हिस्सा है
فَإِن
फिर अगर
كَانُوٓا۟
हों वो
أَكْثَرَ
ज़्यादा
مِن
than
ذَٰلِكَ
उससे
فَهُمْ
तो वो
شُرَكَآءُ
शरीक हैं
فِى
in
ٱلثُّلُثِ ۚ
एक तिहाई में
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद
وَصِيَّةٍۢ
वसीयत के
يُوصَىٰ
वसीयत की जाए
بِهَآ
जिसकी
أَوْ
या
دَيْنٍ
क़र्ज़ (की अदायगी के बाद)
غَيْرَ
ना
مُضَآرٍّۢ ۚ
नुक़सान पहुँचाने वाला हो
وَصِيَّةًۭ
वसीयत है
مِّنَ
from
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह की तरफ़ से
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌ
ख़ूब जानने बाला है
حَلِيمٌۭ
बहुत बुर्दबार है
और तुम्हारी पत्नि यों ने जो कुछ छोड़ा हो, उसमें तुम्हारा आधा है, यदि उनकी सन्तान न हो। लेकिन यदि उनकी सन्तान हो तो वे छोड़े, उसमें तुम्हारा चौथाई होगा, इसके पश्चात कि जो वसीयत वे कर जाएँ वह पूरी कर दी जाए, या जो ऋण (उनपर) हो वह चुका दिया जाए। और जो कुछ तुम छोड़ जाओ, उसमें उनका (पत्ऩियों का) चौथाई हिस्सा होगा, यदि तुम्हारी कोई सन्तान न हो। लेकिन यदि तुम्हारी सन्तान है, तो जो कुछ तुम छोड़ोगे, उसमें से उनका (पत्नियों का) आठवाँ हिस्सा होगा, इसके पश्चात कि जो वसीयत तुमने की हो वह पूरी कर दी जाए, या जो ऋण हो उसे चुका दिया जाए, और यदि किसी पुरुष या स्त्री के न तो कोई सन्तान हो और न उसके माँ-बाप ही जीवित हो और उसके एक भाई या बहन हो तो उन दोनों में से प्रत्येक को छठा हिस्सा होगा। लेकिन यदि वे इससे अधिक हों तो फिर एक तिहाई में वे सब शरीक होंगे, इसके पश्चात कि जो वसीयत उसने की वह पूरी कर दी जाए या जो ऋण (उसपर) हो वह चुका दिया जाए, शर्त यह है कि वह हानिकर न हो। यह अल्लाह की ओर से ताकीदी आदेश है और अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, अत्यन्त सहनशील है
तफ़्सीर:
तुम्हें (ऐ पतियो!) तुम्हारी पत्नियों के छोड़े हुए धन का आधा हिस्सा मिलेगा; यदि उनकी कोई संतान (चाहे नर हो या नारी) तुमसे या किसी अन्य व्यक्ति से न हो। यदि उनकी कोई संतान है (चाहे नर हो या नारी), तो तुम्हें उनके छोड़े हुए धन का चौथा हिस्सा मिलेगा। तुम्हारे लिए इसका वितरण उनकी वसीयत लागू करने तथा उनके ज़िम्मे अनिवार्य क़र्ज़ को चुकाने के बाद किया जाएगा। और (ऐ पतियो!) तुम्हारी स्त्रियों को तुम्हारे छोड़े हुए धन का चौथा हिस्सा मिलेगा, यदि तुम्हारी कोई संतान (चाहे नर हो या नारी) उनसे या उनके अलावा किसी अन्य (पत्नी) से न हो। यदि तुम्हारी कोई संतान है (चाहे नर हो या नारी), तो ऐसी स्थिति में उन्हें तुम्हारे छोड़े हुए धन का आठवाँ हिस्सा मिलेगा। उनके लिए इसका वितरण तुम्हारी वसीयत को लागू करने और तुम्हारे ज़िम्मे अनिवार्य क़र्ज़ का भुगतान करने के बाद किया जाएगा। यदि कोई ऐसा आदमी मर जाए जिसका न बाप हो और न संतान, या ऐसी स्त्री का निधन हो जाए जिसका न बाप हो और न संतान, और उन दोनों में से मृतक का अख़्याफ़ी भाई या अख़्याफ़ी बहन हो (अर्थात वह भाई बहन, जिनके बाप अलग-अलग और माँ एक हो); तो उस अख़्याफ़ी भाई या अख़्याफ़ी बहन में से प्रत्येक को फ़र्ज़ के रूप में छठवाँ हिस्सा मिलेगा। और यदि अख़्याफ़ी भाई या अख़्याफ़ी बहन एक से अधिक हों, तो उन सभी के लिए फ़र्ज़ के रूप में एक तिहाई हिस्सा है जिसमें वे सब साझीदार होंगे। इस मामले में महिला एवं पुरुष सब समान होंगे। वे लोग अपने इस हिस्से को मृतक की वसीयत लागू करने और उसके ज़िम्मे अनिवार्य क़र्ज़ को चुकाने के बाद ही प्राप्त करेंगे, बशर्ते कि उसकी वसीयत से वारिसों को कोई नुकसान न पहुँचता हो; जैसे कि वह उसके धन के एक तिहाई से अधिक की वसीयत हो। यह प्रावधान जिस पर यह आयत आधारित है वह तुम्हारे लिए अल्लाह की ओर से एक वचन है जिसे उसने तुमपर अनिवार्य किया है। और अल्लाह खूब जानता है कि दुनिया एवं आख़िरत में बंदों की भलाई व अच्छाई किस चीज़ में है। वह सहनशील है, अवज्ञाकारी को सज़ा देने में जल्दी नहीं करता।
आयत 13
تِلْكَ حُدُودُ ٱللَّهِ ۚ وَمَن يُطِعِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ يُدْخِلْهُ جَنَّـٰتٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۚ وَذَٰلِكَ ٱلْفَوْزُ ٱلْعَظِيمُ
تِلْكَ
ये
حُدُودُ
हुदूद हैं
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह की
وَمَن
और जो कोई
يُطِعِ
इताअत करेगा
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَرَسُولَهُۥ
और उसके रसूल की
يُدْخِلْهُ
वो दाख़िल करेगा उसे
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात में
تَجْرِى
बहती हैं
مِن
from
تَحْتِهَا
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَا ۚ
उनमें
وَذَٰلِكَ
और ये है
ٱلْفَوْزُ
कामयाबी
ٱلْعَظِيمُ
बहुत बड़ी
ये अल्लाह की निश्चित की हुई सीमाएँ है। जो कोई अल्लाह और उसके रसूल के आदेशों का पालन करेगा, उसे अल्लाह ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। उनमें वह सदैव रहेगा और यही बड़ी सफलता है
तफ़्सीर:
ये अनाथों और उनके अलावा अन्य लोगों के संबंध में उल्लिखित प्रावधान, अल्लाह के कानून हैं जो उसने अपने बंदों के लिए निर्धारित किए हैं, ताकि वे उनपर अमल करें। और जो भी अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करेगा, उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई बातों से बचकर; अल्लाह उसे ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेगा, जिनके महलों के नीचे नहरें बह रही होंगी। वे उसी में रहेंगे, उन्हें मौत नहीं आएगी। यह ईश्वरीय बदला ही वह महान सफलता है, जिसकी तुलना किसी भी सफलता से नहीं की जा सकती।
आयत 14
وَمَن يَعْصِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ وَيَتَعَدَّ حُدُودَهُۥ يُدْخِلْهُ نَارًا خَـٰلِدًۭا فِيهَا وَلَهُۥ عَذَابٌۭ مُّهِينٌۭ
وَمَن
और जो कोई
يَعْصِ
नाफ़रमानी करेगा
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَرَسُولَهُۥ
और उसके रसूल की
وَيَتَعَدَّ
और वो तजावुज़ करेगा
حُدُودَهُۥ
उसकी हुदूद से
يُدْخِلْهُ
वो दाख़िल करेगा उसे
نَارًا
आग में
خَـٰلِدًۭا
हमेशा रहने वाला है
فِيهَا
उसमें
وَلَهُۥ
और उसके लिए
عَذَابٌۭ
अज़ाब है
مُّهِينٌۭ
ज़लील करने वाला
परन्तु जो अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करेगा और उसकी सीमाओं का उल्लंघन करेगा उसे अल्लाह आग में डालेगा, जिसमें वह सदैव रहेगा। और उसके लिए अपमानजनक यातना है
तफ़्सीर:
और जो अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करेगा उसके आदेशों को निरस्त करके और उनपर अमल करना त्याग करके, या उनके सत्य होने में संदेह करके, और जो उसके बनाए हुए कानून की सीमाओं का उल्लंघन करेगा, अल्लाह उसे जहन्नम की आग में दाखिल करेगा जिसमें वह हमेशा रहेगा और उसमें उसके लिए अपमानजनक यातना होगी।
आयत 15
وَٱلَّـٰتِى يَأْتِينَ ٱلْفَـٰحِشَةَ مِن نِّسَآئِكُمْ فَٱسْتَشْهِدُوا۟ عَلَيْهِنَّ أَرْبَعَةًۭ مِّنكُمْ ۖ فَإِن شَهِدُوا۟ فَأَمْسِكُوهُنَّ فِى ٱلْبُيُوتِ حَتَّىٰ يَتَوَفَّىٰهُنَّ ٱلْمَوْتُ أَوْ يَجْعَلَ ٱللَّهُ لَهُنَّ سَبِيلًۭا
وَٱلَّـٰتِى
और वो औरतें जो
يَأْتِينَ
आऐं
ٱلْفَـٰحِشَةَ
बेहयाई को
مِن
from
نِّسَآئِكُمْ
तुम्हारी औरतों में से
فَٱسْتَشْهِدُوا۟
तो गवाह बना लो
عَلَيْهِنَّ
उन पर
أَرْبَعَةًۭ
चार
مِّنكُمْ ۖ
तुम में से
فَإِن
फिर अगर
شَهِدُوا۟
वो गवाही दे दें
فَأَمْسِكُوهُنَّ
तो रोक लो उन्हें
فِى
in
ٱلْبُيُوتِ
घरों में
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَتَوَفَّىٰهُنَّ
फ़ौत कर दे उन्हें
ٱلْمَوْتُ
मौत
أَوْ
या
يَجْعَلَ
बना दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَهُنَّ
उनके लिए
سَبِيلًۭا
कोई रास्ता
और तुम्हारी स्त्रियों में से जो व्यभिचार कर बैठे, उनपर अपने में से चार आदमियों की गवाही लो, फिर यदि वे गवाही दे दें तो उन्हें घरों में बन्द रखो, यहाँ तक कि उनकी मृत्यु आ जाए या अल्लाह उनके लिए कोई रास्ता निकाल दे
तफ़्सीर:
और तुम्हारी महिलाएँ में से जो व्यभिचार कर बैठें, चाहे वे विवाहिता हों अथवा अविवाहित, उनके विरुद्ध चार विश्वसनीय मुसलमानों को गवाह लाओ। यदि वे उनके विरुद्ध व्यभिचार की गवाही दे दें, तो उन्हें सज़ा के तौर पर घरों में बंद रखो, यहाँ तक कि मौत से उनके जीवन का अंत हो जाए अथवा अल्लाह उनके लिए क़ैद के अतिरिक्त कोई दूसरा रास्ता निकाल दे। फिर अल्लाह ने इसके बाद उनके लिए रास्ता निकाल दिया। चुनांचे अविवाहित व्यभिचारिणी को सौ कोड़े मारने और एक साल के लिए देशनिकाला देने, जबकि विवाहिता को पत्थर मार-मार कर हलाक करने की सज़ा निर्धारित की गई।
आयत 16
وَٱلَّذَانِ يَأْتِيَـٰنِهَا مِنكُمْ فَـَٔاذُوهُمَا ۖ فَإِن تَابَا وَأَصْلَحَا فَأَعْرِضُوا۟ عَنْهُمَآ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ تَوَّابًۭا رَّحِيمًا
وَٱلَّذَانِ
और वो दो (मर्द) जो
يَأْتِيَـٰنِهَا
आऐं इस (बुराई) को
مِنكُمْ
तुम में से
فَـَٔاذُوهُمَا ۖ
तो अज़ियत दो उन दोनों को
فَإِن
फिर अगर
تَابَا
वो दोनों तौबा कर लें
وَأَصْلَحَا
और इस्लाह कर लें
فَأَعْرِضُوا۟
तो ऐराज़ करो
عَنْهُمَآ ۗ
उन दोनों से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
تَوَّابًۭا
बहुत तौबा क़ुबूल करने वाला
رَّحِيمًا
निहायत रहम करने वाला
और तुममें से जो दो पुरुष यह कर्म करें, उन्हें प्रताड़ित करो, फिर यदि वे तौबा कर ले और अपने आपको सुधार लें, तो उन्हें छोड़ दो। अल्लाह तौबा क़बूल करनेवाला, दयावान है
तफ़्सीर:
तथा पुरुषों में से जो दो व्यक्ति व्यभिचार का पाप कर बैठें - चाहे वे विवाहित हों या अविवाहित - तो उन्हें ज़बान और हाथ से ऐसी सज़ा दो जिससे उन्हें अपमान और फटकार प्राप्त हो। फिर यदि वे दोनों उस चीज़ को छोड़ दें जो कुछ उन्होंने किया था और उनके कार्य सुधर जाएँ; तो उन्हें कष्ट पहुँचाने से उपेक्षा करो। क्योंकि पाप से तौबा करने वाला निर्दोष व्यक्ति के समान हो जाता है। निःसंदेह अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों की तौबा कबूल करने वाला और उनपर दया करने वाला है। ज्ञात होना चाहिए कि इस तरह की सज़ा का प्रावधान शुरू-शुरू इस्लाम में था, लेकिन बाद में इसे निरस्त करके अविवाहित को सौ कोड़े मारने और एक साल के लिए देशनिकाला देने, तथा विवाहित को पत्थरों से मार-मार कर मार डालने का आदेश दिया गया।
आयत 17
إِنَّمَا ٱلتَّوْبَةُ عَلَى ٱللَّهِ لِلَّذِينَ يَعْمَلُونَ ٱلسُّوٓءَ بِجَهَـٰلَةٍۢ ثُمَّ يَتُوبُونَ مِن قَرِيبٍۢ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ يَتُوبُ ٱللَّهُ عَلَيْهِمْ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلِيمًا حَكِيمًۭا
إِنَّمَا
बेशक
ٱلتَّوْبَةُ
तौबा (क़ुबूल करना)
عَلَى
by
ٱللَّهِ
अल्लाह के ज़िम्मे है
لِلَّذِينَ
उनके लिए जो
يَعْمَلُونَ
अमल करते हैं
ٱلسُّوٓءَ
बुरा
بِجَهَـٰلَةٍۢ
जहालत से
ثُمَّ
फिर
يَتُوبُونَ
वो तौबा कर लेते हैं
مِن
from
قَرِيبٍۢ
क़रीब से
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही वो लोग हैं
يَتُوبُ
मेहरबान होता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَيْهِمْ ۗ
उन पर
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلِيمًا
बहुत इल्म वाला
حَكِيمًۭا
बहुत हिकमत वाला
उन्ही लोगों की तौबा क़बूल करना अल्लाह के ज़िम्मे है जो भावनाओं में बह कर नादानी से कोई बुराई कर बैठे, फिर जल्द ही तौबा कर लें, ऐसे ही लोग है जिनकी तौबा अल्लाह क़बूल करता है। अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
अल्लाह केवल उन लोगों की तौबा कबूल करता है, जो पाप और अवज्ञा को उसके परिणाम और दुर्भाग्य से अनभिज्ञ होने के कारण करते हैं, (और हर गुनाह करने वाले का यही मामला होता है, चाहे वह जानबूझकर करे या अनजाने में) फिर वे मृत्यु को देखने से पहले पश्चाताप करते हुए अपने पालनहार की ओर लौट आते हैं, तो अल्लाह ऐसे ही लोगों की तौबा स्वीकार करता है और उनके पापों को क्षमा कर देता है। अल्लाह अपनी मख़लूक की स्थितियों से अवगत, अपने फ़ैसले और विधान में हिकमत वाला है।
आयत 18
وَلَيْسَتِ ٱلتَّوْبَةُ لِلَّذِينَ يَعْمَلُونَ ٱلسَّيِّـَٔاتِ حَتَّىٰٓ إِذَا حَضَرَ أَحَدَهُمُ ٱلْمَوْتُ قَالَ إِنِّى تُبْتُ ٱلْـَٔـٰنَ وَلَا ٱلَّذِينَ يَمُوتُونَ وَهُمْ كُفَّارٌ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ أَعْتَدْنَا لَهُمْ عَذَابًا أَلِيمًۭا
وَلَيْسَتِ
और नहीं है
ٱلتَّوْبَةُ
तौबा
لِلَّذِينَ
उनके लिए जो
يَعْمَلُونَ
अमल करते हैं
ٱلسَّيِّـَٔاتِ
बुरे
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
حَضَرَ
आती है
أَحَدَهُمُ
उनमें से किसी एक को
ٱلْمَوْتُ
मौत
قَالَ
वो कहता है
إِنِّى
बेशक मैं
تُبْتُ
तौबा की मैंने
ٱلْـَٔـٰنَ
अब
وَلَا
और ना
ٱلَّذِينَ
उनके लिए जो
يَمُوتُونَ
मर जाते हैं
وَهُمْ
इस हाल में कि वो
كُفَّارٌ ۚ
काफ़िर हैं
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
أَعْتَدْنَا
तैयार कर रखा है हमने
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابًا
अज़ाब
أَلِيمًۭا
दर्दनाक
और ऐसे लोगों की तौबा नहीं जो बुरे काम किए चले जाते है, यहाँ तक कि जब उनमें से किसी की मृत्यु का समय आ जाता है तो कहने लगता है, "अब मैं तौबा करता हूँ।" और इसी प्रकार तौबा उनकी भी नहीं है, जो मरते दम तक इनकार करनेवाले ही रहे। ऐसे लोगों के लिए हमने दुखद यातना तैयार कर रखी है
तफ़्सीर:
अल्लाह उन लोगों की तौबा कबूल नहीं करता जो अवज्ञा के कामों पर अडिग रहते हैं, और उनसे तौबा नहीं करते हैं यहाँ तक कि वे मृत्यु की व्यथा का अवलोकन कर लेते हैं। तो उस समय उनमें से एक कहता है : मैंने जो कुछ पाप किया है, अब मैं उससे तौबा करता हूँ। इसी तरह अल्लाह उन लोगों की तौबा - भी - कबूल नहीं करता, जो कुफ़्र पर अडिग रहते हुए मर जाते हैं। ये गुनाहों पर अडिग रहने वाले अवज्ञाकारी, तथा वे लोग जो अपने कुफ़्र (अविश्वास) पर स्थिर रहते हुए मर जाते हैं; हमने उनके लिए दर्दनाक सज़ा तैयार कर रखी है।
आयत 19
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا يَحِلُّ لَكُمْ أَن تَرِثُوا۟ ٱلنِّسَآءَ كَرْهًۭا ۖ وَلَا تَعْضُلُوهُنَّ لِتَذْهَبُوا۟ بِبَعْضِ مَآ ءَاتَيْتُمُوهُنَّ إِلَّآ أَن يَأْتِينَ بِفَـٰحِشَةٍۢ مُّبَيِّنَةٍۢ ۚ وَعَاشِرُوهُنَّ بِٱلْمَعْرُوفِ ۚ فَإِن كَرِهْتُمُوهُنَّ فَعَسَىٰٓ أَن تَكْرَهُوا۟ شَيْـًۭٔا وَيَجْعَلَ ٱللَّهُ فِيهِ خَيْرًۭا كَثِيرًۭا
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
Not
يَحِلُّ
नहीं हलाल
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
أَن
कि
تَرِثُوا۟
तुम वारिस बन जाओ
ٱلنِّسَآءَ
औरतों के
كَرْهًۭا ۖ
ज़बरदस्ती
وَلَا
और ना
تَعْضُلُوهُنَّ
तुम रोको उन्हें
لِتَذْهَبُوا۟
ताकि तुम ले जाओ
بِبَعْضِ
बाज़
مَآ
जो
ءَاتَيْتُمُوهُنَّ
दिया तुमने उन्हें
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
يَأْتِينَ
वो आऐं
بِفَـٰحِشَةٍۢ
बेहयाई को
مُّبَيِّنَةٍۢ ۚ
खुली-खुली
وَعَاشِرُوهُنَّ
और गुज़र बसर करो उनके साथ
بِٱلْمَعْرُوفِ ۚ
भले तरीक़े से
فَإِن
फिर अगर
كَرِهْتُمُوهُنَّ
तुम नापसंद करो उन्हें
فَعَسَىٰٓ
तो हो सकता है
أَن
कि
تَكْرَهُوا۟
तुम नापसंद करो
شَيْـًۭٔا
एक चीज़ को
وَيَجْعَلَ
और कर दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
فِيهِ
उसमें
خَيْرًۭا
भलाई
كَثِيرًۭا
बहुत सी
ऐ ईमान लानेवालो! तुम्हारे लिए वैध नहीं कि स्त्रियों के माल के ज़बरदस्ती वारिस बन बैठो, और न यह वैध है कि उन्हें इसलिए रोको और तंग करो कि जो कुछ तुमने उन्हें दिया है, उसमें से कुछ ले उड़ो। परन्तु यदि वे खुले रूप में अशिष्ट कर्म कर बैठे तो दूसरी बात है। और उनके साथ भले तरीक़े से रहो-सहो। फिर यदि वे तुम्हें पसन्द न हों, तो सम्भव है कि एक चीज़ तुम्हें पसन्द न हो और अल्लाह उसमें बहुत कुछ भलाई रख दे
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! तुम्हारे लिए वैध नहीं है कि अपने पिता और रिश्तेदारों की पत्नियों के वारिस बन जाओ जिस तरह कि धन का वारिस होते हैं और उनके बारे में यह रवैया अपनाओ कि उनसे खुद विवाह कर लो, या उनका विवाह उनसे कर दो जिन्हें तुम चाहते हो, या उन्हें विवाह करने से (ही) रोक दो। तुम्हारे लिए यह भी जायज़ नहीं है कि अपनी उन पत्नियों को जिन्हें तुम नापसंद करते हो नुकसान पहुँचाने के लिए रोके रखो, ताकि वे तुम्हारी दी हुई महर आदि का कुछ हिस्सा तुम्हारे लिए परित्याग कर दें। सिवाय इसके कि वे कोई स्पष्ट (घोर) अश्लील काम जैसे व्यभिचार आदि कर बैठें। यदि वे ऐसा करती हैं तो तुम्हारे लिए उन्हें रोकना और उन्हें तंग करना जायज़ है यहाँ तक कि वे तुम्हारी दी हुई चीज़ें वापस करके तुमसे आज़ाद हो जाएँ। तथा तुम अपनी स्त्रियों के साथ अच्छी संगति रखो, उनसे कष्ट को दूर करके और अच्छा व्यवहार करके। यदि तुम उन्हें किसी सांसारिक मामले की वजह से नापसंद करो तो उनपर धैर्य से काम लो; क्योंकि संभव है कि अल्लाह उस चीज़ में जो तुम नापसंद करते हो, दुनिया एवं आख़िरत की बहुत-सी भलाइयाँ रख दे।
आयत 20
وَإِنْ أَرَدتُّمُ ٱسْتِبْدَالَ زَوْجٍۢ مَّكَانَ زَوْجٍۢ وَءَاتَيْتُمْ إِحْدَىٰهُنَّ قِنطَارًۭا فَلَا تَأْخُذُوا۟ مِنْهُ شَيْـًٔا ۚ أَتَأْخُذُونَهُۥ بُهْتَـٰنًۭا وَإِثْمًۭا مُّبِينًۭا
وَإِنْ
और अगर
أَرَدتُّمُ
इरादा करो तुम
ٱسْتِبْدَالَ
बदलने का
زَوْجٍۢ
एक बीवी को
مَّكَانَ
जगह
زَوْجٍۢ
बीवी के (दूसरी)
وَءَاتَيْتُمْ
और दे दिया हो तुमने
إِحْدَىٰهُنَّ
उनमें से किसी एक को
قِنطَارًۭا
ढेरों माल
فَلَا
तो ना
تَأْخُذُوا۟
तुम लो
مِنْهُ
उसमें से
شَيْـًٔا ۚ
कुछ भी
أَتَأْخُذُونَهُۥ
क्या तुम लोगे उसे
بُهْتَـٰنًۭا
बोहतान लगाकर
وَإِثْمًۭا
और गुनाह
مُّبِينًۭا
खुले से
और यदि तुम एक पत्ऩी की जगह दूसरी पत्ऩी लाना चाहो तो, चाहे तुमने उनमें किसी को ढेरों माल दे दिया हो, उसमें से कुछ मत लेना। क्या तुम उसपर झूठा आरोप लगाकर और खुले रूप में हक़ मारकर उसे लोगे?
तफ़्सीर:
और (ऐ पतियो!) यदि तुम किसी पत्नी को तलाक़ देना चाहो और उसकी जगह पर दूसरी पत्नी लाना चाहो, तो इसमें तुम्हारे लिए कोई बुराई नहीं है। और यदि तुमने उस पत्नी को, जिसे तुमने तलाक़ देने का इरादा किया है, महर के तौर पर बहुत सारा धन दिया था; तो तुम्हारे लिए उसमें से कुछ भी लेना जायज़ नहीं है। क्योंकि तुमने उन्हें जो कुछ दिया है उसे लेना खुला मिथ्यारोप और स्पष्ट पाप समझा जाएगा।
आयत 21
وَكَيْفَ تَأْخُذُونَهُۥ وَقَدْ أَفْضَىٰ بَعْضُكُمْ إِلَىٰ بَعْضٍۢ وَأَخَذْنَ مِنكُم مِّيثَـٰقًا غَلِيظًۭا
وَكَيْفَ
और किस तरह
تَأْخُذُونَهُۥ
तुम ले सकते हो उसे
وَقَدْ
हालाँकि तहक़ीक़
أَفْضَىٰ
पहुँच चुका
بَعْضُكُمْ
बाज़ तुम्हारा
إِلَىٰ
to
بَعْضٍۢ
तरफ़ बाज़ के
وَأَخَذْنَ
और वो ले चुकीं
مِنكُم
तुम से
مِّيثَـٰقًا
अहद
غَلِيظًۭا
पुख़्ता
और तुम उसे किस तरह ले सकते हो, जबकि तुम एक-दूसरे से मिल चुके हो और वे तुमसे दृढ़ प्रतिज्ञा भी ले चुकी है?
तफ़्सीर:
भला तुम उन्हें दिया हुआ महर कैसे वापस लोगे, जबकि तुम्हारे बीच एक रिश्ता और स्नेह स्थापित हो चुका, तथा तुम एक-दूसरे से लाभान्वित और एक-दूसरे के रहस्यों से अवगत हो चुके हो। इसके बाद उनके हाथों में मौजूद धन की लालच करना बहुत बुरी और घृणित बात है, जबकि वे तुमसे दृढ़ और पक्का वचन (भी) ले चुकी हैं। और वह वचन अल्लाह के शब्द और उसकी शरीयत के द्वारा उन्हें हलाल ठहराना है।
आयत 22
وَلَا تَنكِحُوا۟ مَا نَكَحَ ءَابَآؤُكُم مِّنَ ٱلنِّسَآءِ إِلَّا مَا قَدْ سَلَفَ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ فَـٰحِشَةًۭ وَمَقْتًۭا وَسَآءَ سَبِيلًا
وَلَا
और ना
تَنكِحُوا۟
तुम निकाह करो
مَا
जिनसे
نَكَحَ
निकाह कर चुके
ءَابَآؤُكُم
बाप तुम्हारे
مِّنَ
of
ٱلنِّسَآءِ
औरतों में से
إِلَّا
मगर
مَا
जो
قَدْ
तहक़ीक़
سَلَفَ ۚ
गुज़र चुका
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
है वो
فَـٰحِشَةًۭ
बेहयाई का काम
وَمَقْتًۭا
और क़ाबिले नफ़रत
وَسَآءَ
और बहुत ही बुरा
سَبِيلًا
रास्ता
और उन स्त्रियों से विवाह न करो, जिनसे तुम्हारे बाप विवाह कर चुके हों, परन्तु जो पहले हो चुका सो हो चुका। निस्संदेह यह एक अश्लील और अत्यन्त अप्रिय कर्म है, और बुरी रीति है
तफ़्सीर:
और तुम उन स्त्रियों से निकाह न करो, जिनसे तुम्हारे पिताओं ने निकाह किया है, क्योंकि यह हराम (निषिद्ध) है। परंतु जो इस्लाम से पहले ऐसा हो चुका है, उसपर कोई पकड़ नहीं है। इसके हराम होने का कारण यह है कि बेटों का अपने पिताओं की पत्नियों से विवाह करना अत्यन्त घृणित बात है तथा ऐसा करने वाले पर अल्लाह के क्रोध का कारण है और यह चलने का एक बुरा रास्ता है।
आयत 23
حُرِّمَتْ عَلَيْكُمْ أُمَّهَـٰتُكُمْ وَبَنَاتُكُمْ وَأَخَوَٰتُكُمْ وَعَمَّـٰتُكُمْ وَخَـٰلَـٰتُكُمْ وَبَنَاتُ ٱلْأَخِ وَبَنَاتُ ٱلْأُخْتِ وَأُمَّهَـٰتُكُمُ ٱلَّـٰتِىٓ أَرْضَعْنَكُمْ وَأَخَوَٰتُكُم مِّنَ ٱلرَّضَـٰعَةِ وَأُمَّهَـٰتُ نِسَآئِكُمْ وَرَبَـٰٓئِبُكُمُ ٱلَّـٰتِى فِى حُجُورِكُم مِّن نِّسَآئِكُمُ ٱلَّـٰتِى دَخَلْتُم بِهِنَّ فَإِن لَّمْ تَكُونُوا۟ دَخَلْتُم بِهِنَّ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ وَحَلَـٰٓئِلُ أَبْنَآئِكُمُ ٱلَّذِينَ مِنْ أَصْلَـٰبِكُمْ وَأَن تَجْمَعُوا۟ بَيْنَ ٱلْأُخْتَيْنِ إِلَّا مَا قَدْ سَلَفَ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا
حُرِّمَتْ
हराम कर दी गईं
عَلَيْكُمْ
तुम पर
أُمَّهَـٰتُكُمْ
माँऐं तुम्हारी
وَبَنَاتُكُمْ
और बेटियाँ तुम्हारी
وَأَخَوَٰتُكُمْ
और बहनें तुम्हारी
وَعَمَّـٰتُكُمْ
और फूफियाँ तुम्हारी
وَخَـٰلَـٰتُكُمْ
और ख़ालाऐं तुम्हारी
وَبَنَاتُ
और बेटियाँ
ٱلْأَخِ
भाई की
وَبَنَاتُ
और बेटियाँ
ٱلْأُخْتِ
बहन की
وَأُمَّهَـٰتُكُمُ
और माँऐं तुम्हारी
ٱلَّـٰتِىٓ
वो जिन्होंने
أَرْضَعْنَكُمْ
दूध पिलाया तुम्हें
وَأَخَوَٰتُكُم
और बहनें तुम्हारी
مِّنَ
from
ٱلرَّضَـٰعَةِ
रज़ाअत से
وَأُمَّهَـٰتُ
और माँऐं
نِسَآئِكُمْ
तुम्हारी बीवियों की
وَرَبَـٰٓئِبُكُمُ
और बेटियाँ तुम्हारी बीवियों की
ٱلَّـٰتِى
वो जो
فِى
(are) in
حُجُورِكُم
तुम्हारी गोदों में हैं
مِّن
of
نِّسَآئِكُمُ
तुम्हारी बीवियों में से
ٱلَّـٰتِى
वो जो
دَخَلْتُم
दख़ूल किया तुमने
بِهِنَّ
उनसे
فَإِن
फिर अगर
لَّمْ
ना
تَكُونُوا۟
हो तुम
دَخَلْتُم
दख़ूल कर चुके तुम
بِهِنَّ
उनसे
فَلَا
तो नहीं
جُنَاحَ
कोई गुनाह
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَحَلَـٰٓئِلُ
और बीवियाँ
أَبْنَآئِكُمُ
तुम्हारे बेटों की
ٱلَّذِينَ
वो जो
مِنْ
(are) from
أَصْلَـٰبِكُمْ
तुम्हारी पुश्तों से हैं
وَأَن
और ये कि
تَجْمَعُوا۟
तुम जमा करो
بَيْنَ
दर्मियान
ٱلْأُخْتَيْنِ
दो बहनों के
إِلَّا
मगर
مَا
जो
قَدْ
तहक़ीक़
سَلَفَ ۗ
गुज़र चुका
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
غَفُورًۭا
बहुत बख़्शने वाला
رَّحِيمًۭا
निहायत रहम करने वाला
तुम्हारे लिए हराम है तुम्हारी माएँ, बेटियाँ, बहनें, फूफियाँ, मौसियाँ, भतीतियाँ, भाँजिया, और तुम्हारी वे माएँ जिन्होंने तुम्हें दूध पिलाया हो और दूध के रिश्ते से तुम्हारी बहनें और तुम्हारी सासें और तुम्हारी पत्ऩियों की बेटियाँ जिनसे तुम सम्भोग कर चुक हो। परन्तु यदि सम्भोग नहीं किया है तो इसमें तुमपर कोई गुनाह नहीं - और तुम्हारे उन बेटों की पत्ऩियाँ जो तुमसे पैदा हों और यह भी कि तुम दो बहनों को इकट्ठा करो; जो पहले जो हो चुका सो हो चुका। निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
अल्लाह ने तुम्हारे लिए विवाह हराम किया है, तुम्हारी माताओं से, चाहे वे कितनी ही दूर तक ऊपर चली जाएँ; अर्थात् : माँ की माँ और उसकी दादी, चाहे पिता की तरफ से हो या माता। और तुम्हारी बेटियों से, चाहे वे कितनी ही दूर तक नीचे चली जाएँ; अर्थात् : उसकी बेटी और उसकी बेटी की बेटी, इसी तरह बेटे की बेटियाँ और बेटी की बेटियाँ चाहे वे कितनी ही दूर तक नीचे चली जाएँ। और तुम्हारी सगी बहनों, या बाप शरीक (अल्लाती) या माँ शरीक (अख़्याफ़ी) बहनों से। और तुम्हारी फूफियों से, इसी तरह तुम्हारे पिताओं और माताओं की फूफियों से, चाहे वे कितनी दूर तक ऊपर चली जाएँ। और तुम्हारी खालाओं से, और इसी तरह तुम्हारी माताओं और पिताओं की खालाओं से, चाहे वे कितनी दूर तक ऊपर चली जाएँ। और भाई की बेटियों तथा बहन की बेटियों और उनकी बेटियों से, चाहे वे कितनी दूर तक नीचे चली जाएँ। और तुम्हारी उन माताओं से जिन्होंने तुम्हें दूध पिलाया है, और तुम्हारी दूध में साझीदार बहनों से, और तुम्हारी पत्नियों की माताओं से, चाहे तुम्हारा उनसे मिलन हुआ हो या न हुआ हो। और तुम्हारी पत्नियों की उन बेटियों से, जो तुम्हारे सिवा किसी अन्य पति से हों और जो अधिकतर तुम्हारे घरों में ही पलती बढ़ती हैं, इसी तरह यदि वे तुम्हारे घरों में न पली हों, अगर तुमने उनकी माताओं से मिलन कर लिया हो। लेकिन यदि तुमने उनकी माताओं से मिलन न किया हो, तो उनकी बेटियों से निकाह करने में कोई आपत्ति नहीं है। तथा तुम्हारे लिए तुम्हारे सगे बेटों की पत्नियों से विवाह करना भी हराम है, यद्यपि उनका उनसे मिलन न हुआ हो। और इस हुक्म में तुम्हारे दूध में साझीदार बेटों की पत्नियाँ भी शामिल हैं। तथा तुम्हारे लिए दो नसबी या दूध शरीक बहनों को एक साथ निकाह में रखना भी हराम है। हाँ, अज्ञानता के समयकाल में जो हो चुका, सो हो चुका। अल्लाह ने उसे क्षमा कर दिया। निःसंदेह अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को माफ़ करने वाला, उनपर दया करने वाला है। इसी तरह सुन्नत (हदीस) से साबित है कि किसी महिला और उसकी फूफी या उसकी खाला को एक साथ (निकाह) में रखना निषिद्ध है।
आयत 24
۞ وَٱلْمُحْصَنَـٰتُ مِنَ ٱلنِّسَآءِ إِلَّا مَا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُكُمْ ۖ كِتَـٰبَ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ ۚ وَأُحِلَّ لَكُم مَّا وَرَآءَ ذَٰلِكُمْ أَن تَبْتَغُوا۟ بِأَمْوَٰلِكُم مُّحْصِنِينَ غَيْرَ مُسَـٰفِحِينَ ۚ فَمَا ٱسْتَمْتَعْتُم بِهِۦ مِنْهُنَّ فَـَٔاتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ فَرِيضَةًۭ ۚ وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا تَرَٰضَيْتُم بِهِۦ مِنۢ بَعْدِ ٱلْفَرِيضَةِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلِيمًا حَكِيمًۭا
۞ وَٱلْمُحْصَنَـٰتُ
और वो जो शादी शुदा हैं
مِنَ
of
ٱلنِّسَآءِ
औरतों में से
إِلَّا
मगर
مَا
जिनके
مَلَكَتْ
मालिक हुए
أَيْمَـٰنُكُمْ ۖ
दाऐं हाथ तुम्हारे
كِتَـٰبَ
लिखा हुआ है
ٱللَّهِ
अल्लाह का
عَلَيْكُمْ ۚ
तुम पर
وَأُحِلَّ
और हलाल किया गया है
لَكُم
तुम्हारे लिए
مَّا
वो जो
وَرَآءَ
अलावा है
ذَٰلِكُمْ
उनके
أَن
कि
تَبْتَغُوا۟
तुम तलाश करो
بِأَمْوَٰلِكُم
साथ अपने मालों के
مُّحْصِنِينَ
निकाह में लाने वाले हो
غَيْرَ
ना कि
مُسَـٰفِحِينَ ۚ
बदकारी करने वाले
فَمَا
तो जो
ٱسْتَمْتَعْتُم
फ़ायदा उठाया तुमने
بِهِۦ
साथ उस (निकाह) के
مِنْهُنَّ
उनसे
فَـَٔاتُوهُنَّ
तो दे दो उन्हें
أُجُورَهُنَّ
महर उनके
فَرِيضَةًۭ ۚ
मुक़र्रर किए हुए
وَلَا
और नहीं
جُنَاحَ
कोई गुनाह
عَلَيْكُمْ
तुम पर
فِيمَا
उसमें जो
تَرَٰضَيْتُم
तुम बाहम राज़ी हो जाओ
بِهِۦ
जिस पर
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद
ٱلْفَرِيضَةِ ۚ
मुक़र्रर करने के (महर)
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
عَلِيمًا
बहुत इल्म वाला
حَكِيمًۭا
बहुत हिकमत वाला
और विवाहित स्त्रियाँ भी वर्जित है, सिवाय उनके जो तुम्हारी लौंडी हों। यह अल्लाह ने तुम्हारे लिए अनिवार्य कर दिया है। इनके अतिरिक्त शेष स्त्रियाँ तुम्हारे लिए वैध है कि तुम अपने माल के द्वारा उन्हें प्राप्त करो उनकी पाकदामनी की सुरक्षा के लिए, न कि यह काम स्वच्छन्द काम-तृप्ति के लिए हो। फिर उनसे दाम्पत्य जीवन का आनन्द लो तो उसके बदले उनका निश्चित किया हुए हक़ (मह्रि) अदा करो और यदि हक़ निश्चित हो जाने के पश्चात तुम आपम में अपनी प्रसन्नता से कोई समझौता कर लो, तो इसमें तुम्हारे लिए कोई दोष नहीं। निस्संदेह अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
शादी-शुदा स्त्रियों से निकाह करना तुम्हारे लिए हराम कर दिया गया है। परंतु जो स्त्रियाँ अल्लाह की राह में जिहाद करते समय, बंदी बनकर तुम्हारे पास आएं, उनसे एक मासिक धर्म के पश्चात जब यह स्पष्ट हो जाए कि वे गर्भवती नहीं हैं, तुम्हारे लिए संभोग करना जायज़ है। यह (हुक्म) अल्लाह ने तुम पर फ़र्ज़ कर दिया है। तथा अल्लाह ने इनके अलावा दूसरी स्त्रियों को तुम्हारे लिए हलाल किया है कि तुम अपना माल खर्च करके, हलाल तरीक़े से, अपने सतीत्व की रक्षा करो, तुम्हारा उद्देश्य व्यभिचार का न हो। फिर जिन स्त्रियों से तुम निकाह करके लाभ उठाओ, उन्हें उनका महर चुका दो, जो अल्लाह ने तुम्हारे ऊपर फ़र्ज़ किया है। किन्तु वाजिब महर के निर्धारण के बाद, उसमें कुछ वृद्धि करने या कुछ माफ करने पर तुम्हारी आपस में सहमति हो जाती है, तो इसमें तुम पर कोई पाप नहीं है। अल्लाह अपनी सृष्टि से अवगत है, उनकी कोई चीज़ उससे छिपी नहीं है। वह अपने प्रबंधन और विधान में हिकमत वाला है।
आयत 25
وَمَن لَّمْ يَسْتَطِعْ مِنكُمْ طَوْلًا أَن يَنكِحَ ٱلْمُحْصَنَـٰتِ ٱلْمُؤْمِنَـٰتِ فَمِن مَّا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُكُم مِّن فَتَيَـٰتِكُمُ ٱلْمُؤْمِنَـٰتِ ۚ وَٱللَّهُ أَعْلَمُ بِإِيمَـٰنِكُم ۚ بَعْضُكُم مِّنۢ بَعْضٍۢ ۚ فَٱنكِحُوهُنَّ بِإِذْنِ أَهْلِهِنَّ وَءَاتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ بِٱلْمَعْرُوفِ مُحْصَنَـٰتٍ غَيْرَ مُسَـٰفِحَـٰتٍۢ وَلَا مُتَّخِذَٰتِ أَخْدَانٍۢ ۚ فَإِذَآ أُحْصِنَّ فَإِنْ أَتَيْنَ بِفَـٰحِشَةٍۢ فَعَلَيْهِنَّ نِصْفُ مَا عَلَى ٱلْمُحْصَنَـٰتِ مِنَ ٱلْعَذَابِ ۚ ذَٰلِكَ لِمَنْ خَشِىَ ٱلْعَنَتَ مِنكُمْ ۚ وَأَن تَصْبِرُوا۟ خَيْرٌۭ لَّكُمْ ۗ وَٱللَّهُ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
وَمَن
और जो कोई
لَّمْ
ना
يَسْتَطِعْ
इस्तिताअत रखे
مِنكُمْ
तुम में से
طَوْلًا
वुसअत / माल की
أَن
कि
يَنكِحَ
वो निकाह करे
ٱلْمُحْصَنَـٰتِ
आज़ाद औरतों से
ٱلْمُؤْمِنَـٰتِ
जो मोमिना हों
فَمِن
then (marry) from
مَّا
तो उनसे जिनके
مَلَكَتْ
मालिक हुए
أَيْمَـٰنُكُم
दाऐं हाथ तुम्हारे
مِّن
of
فَتَيَـٰتِكُمُ
तुम्हारी लौंडियों में से
ٱلْمُؤْمِنَـٰتِ ۚ
जो मोमिना हों
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِإِيمَـٰنِكُم ۚ
तुम्हारे ईमान को
بَعْضُكُم
बाज़ तुम्हारे
مِّنۢ
(are) from
بَعْضٍۢ ۚ
बाज़ से हैं
فَٱنكِحُوهُنَّ
तो निकाह कर लो उनसे
بِإِذْنِ
इजाज़त से
أَهْلِهِنَّ
उनके मालिकों की
وَءَاتُوهُنَّ
और दो उन्हें
أُجُورَهُنَّ
महर उनके
بِٱلْمَعْرُوفِ
मारूफ़ तरीक़े से
مُحْصَنَـٰتٍ
निकाह में महफ़ूज़ होने वालियाँ
غَيْرَ
ना
مُسَـٰفِحَـٰتٍۢ
बदकारी करने वालियाँ
وَلَا
और ना
مُتَّخِذَٰتِ
बनाने वालियाँ
أَخْدَانٍۢ ۚ
छुपे दोस्त
فَإِذَآ
तो जब
أُحْصِنَّ
वो निकाह में लाई जाऐं
فَإِنْ
फिर अगर
أَتَيْنَ
वो आऐं
بِفَـٰحِشَةٍۢ
किसी बेहयाई को
فَعَلَيْهِنَّ
तो उन पर है
نِصْفُ
आधी
مَا
वो जो
عَلَى
(is) on
ٱلْمُحْصَنَـٰتِ
पाकदामन औरतों पर है
مِنَ
of
ٱلْعَذَابِ ۚ
सज़ा में से
ذَٰلِكَ
ये
لِمَنْ
उसके लिए है जो
خَشِىَ
डरे
ٱلْعَنَتَ
गुनाह से
مِنكُمْ ۚ
तुम में से
وَأَن
और ये कि
تَصْبِرُوا۟
तुम सब्र करो
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لَّكُمْ ۗ
तुम्हारे लिए
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
और तुममें से जिस किसी की इतनी सामर्थ्य न हो कि पाकदामन, स्वतंत्र, ईमानवाली स्त्रियों से विवाह कर सके, तो तुम्हारी वे ईमानवाली जवान लौडियाँ ही सही जो तुम्हारे क़ब्ज़े में हो। और अल्लाह तुम्हारे ईमान को भली-भाँति जानता है। तुम सब आपस में एक ही हो, तो उनके मालिकों की अनुमति से तुम उनसे विवाह कर लो और सामान्य नियम के अनुसार उन्हें उनका हक़ भी दो। वे पाकदामनी की सुरक्षा करनेवाली हों, स्वच्छन्द काम-तृप्ति न करनेवाली हों और न वे चोरी-छिपे ग़ैरो से प्रेम करनेवाली हों। फिर जब वे विवाहिता बना ली जाएँ और उसके पश्चात कोई अश्लील कर्म कर बैठें, तो जो दंड सम्मानित स्त्रियों के लिए है, उसका आधा उनके लिए होगा। यह तुममें से उस व्यक्ति के लिए है, जिसे ख़राबी में पड़ जाने का भय हो, और यह कि तुम धैर्य से काम लो तो यह तुम्हारे लिए अधिक अच्छा है। निस्संदेह अल्लाह बहुत क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
तथा - ऐ पुरुषो - तुममें से जो व्यक्ति पैसे की कमी के कारण आज़ाद स्त्रियों से विवाह करने में सक्षम न हो, उसके लिए किसी अन्य व्यक्ति के स्वामित्व में मौजूद दासियों से निकाह करना जायज़ है, यदि वे तुम्हें ईमान वाली दिखाई दें, जबकि तुम्हारे ईमान की सच्चाई और भीतरी स्थिति को अल्लाह ही बेहतर जानता है। तुम और वे (दासियाँ) धर्म एवं मानवता में बराबर हैं, इसलिए उनसे शादी करने में शर्म महसूस न करो। सो, तुम उनसे उनके मालिकों की अनुमति से विवाह कर लो और उनका महर बिना किसी कमी या टाल-मटोल के उन्हें अदा कर दो। परंतु यह उस स्थिति में है जब वे पाकदामन (निष्कलंक चरित्र) हों, खुल्लम खुल्ला व्यभिचार करने वाली न हों, तथा गुप्त रूप से व्यभिचार के लिए मित्र रखने वाली न हों। जब वे शादी कर लें, फिर उसके बाद व्यभिचार में लिप्त हो जाएं, तो उन्हें आज़ाद स्त्रियों का आधा दंड दिया जाएगा। अर्थात् पचास कोड़े लगाए जाएंगे, लेकिन आज़ाद शादीशुदा स्त्रियों की तरह उन्हें संगसार नहीं किया जाएगा। सच्चरित्र ईमान वाली दासियों से निकाह करने की यह अनुमति, उसके लिए है, जिसे व्यभिचार में पड़ने का डर हो और वह आज़ाद स्त्रियों से निकाह करने की शक्ति न रखता हो। जबकि दासियों के निकाह से धैर्य करना (अर्थात् रुक जाना) बेहतर है; ताकि संतान दासता से सुरक्षित रहे।अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला और उनपर दया करने वाला है। और यह उसकी दया में से है कि उसने उनके लिए, आज़ाद स्त्रियों से निकाह करने में असमर्थ होने की स्थिति में, व्यभिचार में पड़ने के डर के समय दासियों से निकाह करना धर्मसंगत कर दिया है।
आयत 26
يُرِيدُ ٱللَّهُ لِيُبَيِّنَ لَكُمْ وَيَهْدِيَكُمْ سُنَنَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ وَيَتُوبَ عَلَيْكُمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌۭ
يُرِيدُ
चाहता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِيُبَيِّنَ
कि वो वाज़ेह कर दे
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
وَيَهْدِيَكُمْ
और वो हिदायत दे तुम्हें
سُنَنَ
तरीक़ों की
ٱلَّذِينَ
उन लोगों के जो
مِن
from
قَبْلِكُمْ
तुमसे पहले थे
وَيَتُوبَ
और वो मेहरबान हो
عَلَيْكُمْ ۗ
तुम पर
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌ
बहुत इल्म वाला है
حَكِيمٌۭ
बहुत हिकमत वाला है
अल्लाह चाहता है कि तुमपर स्पष्ट कर दे और तुम्हें उन लोगों के तरीक़ों पर चलाए, जो तुमसे पहले हुए है और तुमपर दयादृष्टि करे। अल्लाह तो सब कुछ जाननेवाला, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
अल्लाह तआला तुम्हारे लिए इन प्रावधानों को निर्मित करके तुम्हारे लिए अपनी शरीयत और धर्म की निशानियों एवं दुनिया व आख़िरत में तुम्हारे हितों की चीज़ों को बयान करना चाहता है। तथा वह तुम्हारा, हलाल व हराम ठहराने में तुमसे पूर्व नबियों के तरीक़ों, उनके अच्छे गुणों और उनके सराहनीय आचरण की ओर, मार्गदर्शन करना चाहता है, ताकि तुम उनका अनुसरण करो। अल्लाह यह भी चाहता है कि तुम्हें अपनी अवज्ञा से हटाकर अपने आज्ञापालन की ओर फेर दे। अल्लाह उस चीज़ से अवगत है जिसमें उसके बंदों का हित है, चुनाँचे वह उसे उनके लिए धर्मसंगत बना देता है। वह अपने विधान और उनके मामलों के प्रबंधन में हिकमात वाला है।
आयत 27
وَٱللَّهُ يُرِيدُ أَن يَتُوبَ عَلَيْكُمْ وَيُرِيدُ ٱلَّذِينَ يَتَّبِعُونَ ٱلشَّهَوَٰتِ أَن تَمِيلُوا۟ مَيْلًا عَظِيمًۭا
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يُرِيدُ
चाहता है
أَن
कि
يَتُوبَ
वो मेहरबान हो
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَيُرِيدُ
और चाहते हैं
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَتَّبِعُونَ
पैरवी करते हैं
ٱلشَّهَوَٰتِ
ख़्वाहिशात की
أَن
कि
تَمِيلُوا۟
तुम झुक जाओ
مَيْلًا
झुक जाना
عَظِيمًۭا
बहुत बड़ा
और अल्लाह चाहता है कि जो तुमपर दयादृष्टि करे, किन्तु जो लोग अपनी तुच्छ इच्छाओं का पालन करते है, वे चाहते है कि तुम राह से हटकर बहुत दूर जा पड़ो
तफ़्सीर:
अल्लाह चाहता है कि तुम्हारी तौबा क़बूल करे और तुम्हारे पापों को क्षमा कर दे, जबकि अपनी इच्छाओं के पीछे चलने वाले चाहते हैं कि तुम हिदायत के मार्ग से बहुत दूर हो जाओ।
आयत 28
يُرِيدُ ٱللَّهُ أَن يُخَفِّفَ عَنكُمْ ۚ وَخُلِقَ ٱلْإِنسَـٰنُ ضَعِيفًۭا
يُرِيدُ
चाहता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَن
कि
يُخَفِّفَ
वो हल्का कर दे
عَنكُمْ ۚ
तुम से
وَخُلِقَ
और पैदा किया गया है
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
ضَعِيفًۭا
कमज़ोर
अल्लाह चाहता है कि तुमपर से बोझ हलका कर दे, क्योंकि इनसान निर्बल पैदा किया गया है
तफ़्सीर:
अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी शरीयत में आसानी पैदा करना चाहता है। इसी कारण वह तुम्हें ऐसी चीज़ का आदेश नहीं देता, जो तुम्हारी शक्ति से बाहर हो। क्योंकि वह मनुष्य की अपनी रचना एवं व्यवहार में कमज़ोरी से अवगत है।
आयत 29
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَأْكُلُوٓا۟ أَمْوَٰلَكُم بَيْنَكُم بِٱلْبَـٰطِلِ إِلَّآ أَن تَكُونَ تِجَـٰرَةً عَن تَرَاضٍۢ مِّنكُمْ ۚ وَلَا تَقْتُلُوٓا۟ أَنفُسَكُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًۭا
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Do) not
تَأْكُلُوٓا۟
ना तुम खाओ
أَمْوَٰلَكُم
अपने मालों को
بَيْنَكُم
आपस में
بِٱلْبَـٰطِلِ
बातिल तरीक़े से
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
تَكُونَ
हो
تِجَـٰرَةً
तिजारत
عَن
on
تَرَاضٍۢ
बाहमी रज़ामन्दी से
مِّنكُمْ ۚ
तुम्हारी
وَلَا
और ना
تَقْتُلُوٓا۟
तुम क़त्ल करो
أَنفُسَكُمْ ۚ
अपने नफ़्सों को
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
بِكُمْ
तुम पर
رَحِيمًۭا
निहायत रहम करने वाला
ऐ ईमान लानेवालो! आपस में एक-दूसरे के माल ग़लत तरीक़े से न खाओ - यह और बात है कि तुम्हारी आपस में रज़ामन्दी से कोई सौदा हो - और न अपनों की हत्या करो। निस्संदेह अल्लाह तुमपर बहुत दयावान है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! तुम एक दूसरे का माल अवैध रूप से न लो, जैसे- जबरन क़ब्ज़ा, चोरी और रिश्वत आदि। परंतु यदि वह धन दोनों पक्षों की आपसी सहमति से होने वाले व्यवसाय का धन हो, तो तुम्हारे लिए उसको खाना और उसमें अपना अधिकार चलाना जायज़ है। तथा तुम एक-दूसरे की हत्या न करो और न तुममें से कोई अपने आपकी हत्या करे और न खुद को हलाकत में डाले। निःसंदेह अल्लाह तुमपर बड़ा दयावान् है और यह उसकी दया ही है कि उसने तुम्हारी जानों, तुम्हारे धनों और तुम्हारी इज्जत को हराम क़रार दिया है।
आयत 30
وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ عُدْوَٰنًۭا وَظُلْمًۭا فَسَوْفَ نُصْلِيهِ نَارًۭا ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرًا
وَمَن
और जो कोई
يَفْعَلْ
करेगा
ذَٰلِكَ
ये
عُدْوَٰنًۭا
ज़्यादती
وَظُلْمًۭا
और ज़ुल्म से
فَسَوْفَ
पस अनक़रीब
نُصْلِيهِ
हम जलाऐंगे उसे
نَارًۭا ۚ
आग में
وَكَانَ
और है
ذَٰلِكَ
ये
عَلَى
for
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
يَسِيرًا
निहायत आसान
और जो कोई ज़ुल्म और ज़्यादती से ऐसा करेगा, तो उसे हम जल्द ही आग में झोंक देंगे, और यह अल्लाह के लिए सरल है
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति वह काम करेगा जिससे वह मना किया गया है; चुनाँचे वह किसी का धन खाएगा या किसी की हत्या करेगा, वह भी अनजाने या भूलवश नहीं, बल्कि जान-बूझकर और ज़्यादती करते हुए; तो क़ियामत के दिन अल्लाह उसे एक बड़ी आग में झोंक देगा। वह उसकी गर्मी सहेगा और उसकी यातना झेलेगा। यह कार्य अल्लाह के लिए बड़ा आसान है, क्योंकि वह हर कार्य की ताक़त रखता है, उसे कोई वस्तु विवश नहीं कर सकती।
आयत 31
إِن تَجْتَنِبُوا۟ كَبَآئِرَ مَا تُنْهَوْنَ عَنْهُ نُكَفِّرْ عَنكُمْ سَيِّـَٔاتِكُمْ وَنُدْخِلْكُم مُّدْخَلًۭا كَرِيمًۭا
إِن
अगर
تَجْتَنِبُوا۟
तुम इज्तिनाब करो/बचो
كَبَآئِرَ
बड़े गुनाहों से
مَا
वो जो
تُنْهَوْنَ
तुम रोके जाते हो
عَنْهُ
जिनसे
نُكَفِّرْ
हम दूर कर देंगे
عَنكُمْ
तुम से
سَيِّـَٔاتِكُمْ
बुराईयाँ तुम्हारी
وَنُدْخِلْكُم
और हम दाख़िल करेंगे तुम्हें
مُّدْخَلًۭا
दाख़िल करना
كَرِيمًۭا
इज़्ज़त से
यदि तुम उन बड़े गुनाहों से बचते रहो, जिनसे तुम्हे रोका जा रहा है, तो हम तुम्हारी बुराइयों को तुमसे दूर कर देंगे और तुम्हें प्रतिष्ठित स्थान में प्रवेश कराएँगे
तफ़्सीर:
- ऐ मोमिनो! - यदि तुम बड़े गुनाहों से बचते रहोगे, जैसे अल्लाह का साझी बनाना, माता-पिता की अवज्ञा करना, किसी की हत्या करना और ब्याज लेना, तो हम तुम्हारे छोटे गुनाहों को क्षमा कर देंगे और तुम्हें अल्लाह के पास एक सम्मानित स्थान अर्थात जन्नत में प्रवेश का सौभाग्य प्रदान करेंगे।
आयत 32
وَلَا تَتَمَنَّوْا۟ مَا فَضَّلَ ٱللَّهُ بِهِۦ بَعْضَكُمْ عَلَىٰ بَعْضٍۢ ۚ لِّلرِّجَالِ نَصِيبٌۭ مِّمَّا ٱكْتَسَبُوا۟ ۖ وَلِلنِّسَآءِ نَصِيبٌۭ مِّمَّا ٱكْتَسَبْنَ ۚ وَسْـَٔلُوا۟ ٱللَّهَ مِن فَضْلِهِۦٓ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمًۭا
وَلَا
और ना
تَتَمَنَّوْا۟
तुम तमन्ना करो
مَا
उसकी जो
فَضَّلَ
फ़ज़ीलत दी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
بِهِۦ
साथ उसके
بَعْضَكُمْ
तुम्हारे बाज़ को
عَلَىٰ
over
بَعْضٍۢ ۚ
बाज़ पर
لِّلرِّجَالِ
मर्दों के लिए है
نَصِيبٌۭ
एक हिस्सा
مِّمَّا
उसमें से जो
ٱكْتَسَبُوا۟ ۖ
उन्होंने कमाया
وَلِلنِّسَآءِ
और औरतों के लिए है
نَصِيبٌۭ
एक हिस्सा
مِّمَّا
उसमें से जो
ٱكْتَسَبْنَ ۚ
उन्होंने कमाया
وَسْـَٔلُوا۟
और सवाल करो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
مِن
of
فَضْلِهِۦٓ ۗ
उसके फज़ल का
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ को
عَلِيمًۭا
ख़ूब जानने वाला
और उसकी कामना न करो जिसमें अल्लाह ने तुमसे किसी को किसी से उच्च रखा है। पुरुषों ने जो कुछ कमाया है, उसके अनुसार उनका हिस्सा है और स्त्रियों ने जो कुछ कमाया है, उसके अनुसार उनका हिस्सा है। अल्लाह से उसका उदार दान चाहो। निस्संदेह अल्लाह को हर चीज़ का ज्ञान है
तफ़्सीर:
(ऐ मोमिनो!) अल्लाह ने जिस चीज़ के द्वारा तुममें से कुछ को दूसरों पर श्रेष्ठता प्रदान की है, उसकी कामना न करो; ताकि ऐसा न हो कि यह असंतोष और ईर्ष्या पैदा कर दे। अतः स्त्रियों के लिए उचित नहीं है कि अल्लाह ने पुरुषों को जो विशिष्टताएँ प्रदान की हैं, उनकी आकांक्षा करें। क्योंकि प्रत्येक वर्ग के लिए उसके अनुरूप प्रतिफल का एक हिस्सा है।तथा अल्लाह से प्रार्थना करो कि वह तुम्हें अपने अनुदान से अधिक प्रदान करे। इसमें कोई शक नहीं कि अल्लाह हर वस्तु का ज्ञान रखता है; इसलिए उसने हर वर्ग को वही दिया है जो उसके अनुकूल है।
आयत 33
وَلِكُلٍّۢ جَعَلْنَا مَوَٰلِىَ مِمَّا تَرَكَ ٱلْوَٰلِدَانِ وَٱلْأَقْرَبُونَ ۚ وَٱلَّذِينَ عَقَدَتْ أَيْمَـٰنُكُمْ فَـَٔاتُوهُمْ نَصِيبَهُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ شَهِيدًا
وَلِكُلٍّۢ
और हर एक के लिए
جَعَلْنَا
बना दिए हमने
مَوَٰلِىَ
वारिस
مِمَّا
उसमें से जो
تَرَكَ
छोड़ जाऐं
ٱلْوَٰلِدَانِ
वालिदैन
وَٱلْأَقْرَبُونَ ۚ
और रिश्तेदार
وَٱلَّذِينَ
और वो जिनको
عَقَدَتْ
बाँध रखा है
أَيْمَـٰنُكُمْ
तुम्हारे अहदो पैमान ने
فَـَٔاتُوهُمْ
पस दो तुम उन्हें
نَصِيبَهُمْ ۚ
हिस्सा उनका
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
شَهِيدًا
ख़ूब गवाह
और प्रत्येक माल के लिए, जो माँ-बाप और नातेदार छोड़ जाएँ, हमने वासिस ठहरा दिए है और जिन लोगों से अपनी क़समों के द्वारा तुम्हारा पक्का मामला हुआ हो, तो उन्हें भी उनका हिस्सा दो। निस्संदेह हर चीज़ अल्लाह के समक्ष है
तफ़्सीर:
हमने तुममें से हर एक के हक़दार बना दिए हैं, जो माता-पिता और निकटवर्ती रिश्तेदारों की छोड़ी हुई संपत्ति के वारिस होंगे। रही बात उनकी जिनसे तुमने क़समें खाकर आपसी एकता एवं सहोग का मुआहदा कर रखा है, तो उन्हें मीरास से उनका हिस्सा दो। बेशक अल्लाह हर वस्तु से सूचित है, और इसी में उसका तुम्हारी इन क़समों और वचनों से अवगत होना भी शामिल है। आपसी एकता एवं सहोग के मुआहदा के द्वारा विरासत का नियम शुरू इस्लाम में थे, फिर उसे निरस्त कर दिया गया।
आयत 34
ٱلرِّجَالُ قَوَّٰمُونَ عَلَى ٱلنِّسَآءِ بِمَا فَضَّلَ ٱللَّهُ بَعْضَهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍۢ وَبِمَآ أَنفَقُوا۟ مِنْ أَمْوَٰلِهِمْ ۚ فَٱلصَّـٰلِحَـٰتُ قَـٰنِتَـٰتٌ حَـٰفِظَـٰتٌۭ لِّلْغَيْبِ بِمَا حَفِظَ ٱللَّهُ ۚ وَٱلَّـٰتِى تَخَافُونَ نُشُوزَهُنَّ فَعِظُوهُنَّ وَٱهْجُرُوهُنَّ فِى ٱلْمَضَاجِعِ وَٱضْرِبُوهُنَّ ۖ فَإِنْ أَطَعْنَكُمْ فَلَا تَبْغُوا۟ عَلَيْهِنَّ سَبِيلًا ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلِيًّۭا كَبِيرًۭا
ٱلرِّجَالُ
मर्द
قَوَّٰمُونَ
ज़िम्मेदार हैं
عَلَى
of
ٱلنِّسَآءِ
औरतों पर
بِمَا
बवजह उसके जो
فَضَّلَ
फ़ज़ीलत दी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
بَعْضَهُمْ
उनके बाज़ को
عَلَىٰ
over
بَعْضٍۢ
बाज़ पर
وَبِمَآ
और बवजह उसके जो
أَنفَقُوا۟
उन्होंने ख़र्च किया
مِنْ
from
أَمْوَٰلِهِمْ ۚ
अपने मालों में से
فَٱلصَّـٰلِحَـٰتُ
पस नेक औरतें
قَـٰنِتَـٰتٌ
फ़रमाबरदार हैं
حَـٰفِظَـٰتٌۭ
हिफ़ाज़त करने वालियाँ है
لِّلْغَيْبِ
ग़ायबाना
بِمَا
बवजह उसके जो
حَفِظَ
हिफ़ाज़त की (उनकी)
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह ने
وَٱلَّـٰتِى
और वो औरतें जो
تَخَافُونَ
तुम डरते हो
نُشُوزَهُنَّ
उनकी सरकशी से
فَعِظُوهُنَّ
पस नसीहत करो उन्हें
وَٱهْجُرُوهُنَّ
और अलैहदा कर दो उन्हें
فِى
in
ٱلْمَضَاجِعِ
बिस्तरों में
وَٱضْرِبُوهُنَّ ۖ
और मारो उन्हें
فَإِنْ
फिर अगर
أَطَعْنَكُمْ
वो इताअत करें तुम्हारी
فَلَا
तो ना
تَبْغُوا۟
तुम तलाश करो
عَلَيْهِنَّ
उन पर
سَبِيلًا ۗ
कोई रास्ता
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
عَلِيًّۭا
बहुत बुलन्द
كَبِيرًۭا
बहुत बड़ा
पति पत्नियों संरक्षक और निगराँ है, क्योंकि अल्लाह ने उनमें से कुछ को कुछ के मुक़ाबले में आगे रहा है, और इसलिए भी कि पतियों ने अपने माल ख़र्च किए है, तो नेक पत्ऩियाँ तो आज्ञापालन करनेवाली होती है और गुप्त बातों की रक्षा करती है, क्योंकि अल्लाह ने उनकी रक्षा की है। और जो पत्नियों ऐसी हो जिनकी सरकशी का तुम्हें भय हो, उन्हें समझाओ और बिस्तरों में उन्हें अकेली छोड़ दो और (अति आवश्यक हो तो) उन्हें मारो भी। फिर यदि वे तुम्हारी बात मानने लगे, तो उनके विरुद्ध कोई रास्ता न ढूढ़ो। अल्लाह सबसे उच्च, सबसे बड़ा है
तफ़्सीर:
पुरुष गण स्त्रियों की देखभाल करते हैं और उनके मामलों का प्रबंधन करते हैं, क्योंकि अल्लाह ने उन्हें स्त्रियों पर विशेष प्रधानता दी है तथा इस कारण कि उनपर खर्च करना और उनकी देख-रेख करना पुरुषों पर अनिवार्य है। सदाचारी स्त्रियाँ अपने पालनहार की आज्ञाकारी, अपने पतियों की बात मानने वाली और अल्लाह की तौफ़ीक़ से अपने पतियों की अनुपस्थिति में उनके अधिकारों की रक्षा करने वाली होती हैं। तथा - ऐ पतियो! - जिन स्त्रियों के विषय में किसी बात या कार्य में अपने पतियों के आज्ञापालन से उपेक्षा करने का डर हो, तो पहले उन्हें समझाओ-बुझाओ और अल्लाह का भय दिलाओ। यदि वे न मानें, तो उन्हें बिस्तर में अलग रखो, जैसे सोते समय उनकी ओर पीठ कर लो और उनसे संभोग न करो। यदि वे इसपर भी न मानें तो हल्की मार मारो। यदि वे आज्ञापालन की ओर लौट आएँ, तो उनपर किसी प्रकार का अत्याचार न करो या उन्हें बुरा भला न कहो। अल्लाह हर चीज़ से सर्वोच्च और अपने व्यक्तित्व और गुणों में महान है, इसलिए उससे डरो।
आयत 35
وَإِنْ خِفْتُمْ شِقَاقَ بَيْنِهِمَا فَٱبْعَثُوا۟ حَكَمًۭا مِّنْ أَهْلِهِۦ وَحَكَمًۭا مِّنْ أَهْلِهَآ إِن يُرِيدَآ إِصْلَـٰحًۭا يُوَفِّقِ ٱللَّهُ بَيْنَهُمَآ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلِيمًا خَبِيرًۭا
وَإِنْ
और अगर
خِفْتُمْ
डरो तुम
شِقَاقَ
इख़्तिलाफ़ से
بَيْنِهِمَا
उन दोनों के दर्मियान
فَٱبْعَثُوا۟
तो मुक़र्रर करो
حَكَمًۭا
एक मुन्सिफ़
مِّنْ
from
أَهْلِهِۦ
उस (मर्द) के घर वालों में से
وَحَكَمًۭا
और एक मुन्सिफ़
مِّنْ
from
أَهْلِهَآ
उस (औरत) के घर वालों में से
إِن
अगर
يُرِيدَآ
वो दोनों चाहेंगे
إِصْلَـٰحًۭا
इस्लाह करना
يُوَفِّقِ
मुवाफ़िक़त पैदा कर देगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
بَيْنَهُمَآ ۗ
उन दोनों के दर्मियान
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
عَلِيمًا
ख़ूब इल्म वाला
خَبِيرًۭا
ख़ूब ख़बर रखने वाला
और यदि तुम्हें पति-पत्नी के बीच बिगाड़ का भय हो, तो एक फ़ैसला करनेवाला पुरुष के लोगों में से और एक फ़ैसला करनेवाला स्त्री के लोगों में से नियुक्त करो, यदि वे दोनों सुधार करना चाहेंगे, तो अल्लाह उनके बीच अनुकूलता पैदा कर देगा। निस्संदेह, अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, ख़बर रखनेवाला है
तफ़्सीर:
यदि तुम्हें - ऐ पति-पत्नी के अभिभावको! - इस बात का भय हो कि दोनों के बीच का विवाद दुश्मनी और परस्पर संबंध-विच्छेद की सीमा तक पहुँच जाएगा, तो पति के परिवार से एक न्यायी पुरुष और पत्नी के परिवार से एक न्यायी पुरुष को भेजो; ताकि वे दोनों के हितों को ध्यान में रखते हुए उनके बीच जुदाई अथवा मिलाप का निर्णय करें।जबकि मेलमिलाप ही ज़्यादा प्रिय और बेहतर है। यदि दोनों मध्यस्थों ने मेलमिलाप चाहा और उसके लिए बेहतरीन प्रयास किए, तो अल्लाह पति-पत्नी के बीच मिलाप पैदा कर देगा और उनके बीच का विवाद समाप्त हो जाएगा। अल्लाह पर उसके बंदों की कोई बात छिपी नहीं है और वह उनके दिलों के निहित भेदों से भी अवगत है।
आयत 36
۞ وَٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ وَلَا تُشْرِكُوا۟ بِهِۦ شَيْـًۭٔا ۖ وَبِٱلْوَٰلِدَيْنِ إِحْسَـٰنًۭا وَبِذِى ٱلْقُرْبَىٰ وَٱلْيَتَـٰمَىٰ وَٱلْمَسَـٰكِينِ وَٱلْجَارِ ذِى ٱلْقُرْبَىٰ وَٱلْجَارِ ٱلْجُنُبِ وَٱلصَّاحِبِ بِٱلْجَنۢبِ وَٱبْنِ ٱلسَّبِيلِ وَمَا مَلَكَتْ أَيْمَـٰنُكُمْ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ مَن كَانَ مُخْتَالًۭا فَخُورًا
۞ وَٱعْبُدُوا۟
और इबादत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَلَا
और ना
تُشْرِكُوا۟
तुम शरीक करो
بِهِۦ
साथ उसके
شَيْـًۭٔا ۖ
किसी चीज़ को
وَبِٱلْوَٰلِدَيْنِ
और साथ वालिदैन के
إِحْسَـٰنًۭا
एहसान करना
وَبِذِى
and with
ٱلْقُرْبَىٰ
और साथ क़राबतदारों के
وَٱلْيَتَـٰمَىٰ
और यतीमों के
وَٱلْمَسَـٰكِينِ
और मिस्कीनों के
وَٱلْجَارِ
और पड़ोसी
ذِى
(who is)
ٱلْقُرْبَىٰ
क़राबतदार के
وَٱلْجَارِ
और पड़ोसी
ٱلْجُنُبِ
अजनबी के
وَٱلصَّاحِبِ
और साथी
بِٱلْجَنۢبِ
पहलू के
وَٱبْنِ
and the
ٱلسَّبِيلِ
और मुसाफ़िर / राहगीर के
وَمَا
और जिनके
مَلَكَتْ
मालिक हुए
أَيْمَـٰنُكُمْ ۗ
दाऐं हाथ तुम्हारे
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يُحِبُّ
नहीं वो पसंद करता
مَن
उसे जो
كَانَ
हो
مُخْتَالًۭا
ख़ुद पसंद
فَخُورًا
फ़ख़्र करने वाला
अल्लाह की बन्दगी करो और उसके साथ किसी को साझी न बनाओ और अच्छा व्यवहार करो माँ-बाप के साथ, नातेदारों, अनाथों और मुहताजों के साथ, नातेदार पड़ोसियों के साथ और अपरिचित पड़ोसियों के साथ और साथ रहनेवाले व्यक्ति के साथ और मुसाफ़िर के साथ और उनके साथ भी जो तुम्हारे क़ब्ज़े में हों। अल्लाह ऐसे व्यक्ति को पसन्द नहीं करता, जो इतराता और डींगें मारता हो
तफ़्सीर:
अल्लाह के प्रति अधीनता के साथ अकेले उसी की इबादत करो और उसके साथ किसी की इबादत न करो। तथा माता-पिता का सम्मान और उनके साथ अच्छा व्यवहार करो। और रिश्तेदारों, अनाथों और ज़रूरतमंदों के साथ अच्छा व्यवहार करो। तथा रिश्तेदार पड़ोसी एवं गैर-रिश्तेदार पड़ोसी के साथ भलाई करो। तथा साथ रहने वाले साथी के साथ अच्छा व्यवहार करो। तथा उस अनजान यात्री के साथ भलाई करो जिसका रास्ता कट गया है। तथा अपने दास-दासियों के साथ अच्छा व्यवहार करो। निःसंदेह अल्लाह ऐसे व्यक्ति से प्रेम नहीं करता, जो आत्ममुग्ध हो, उसके बंदों के समक्ष अपनी बड़ाई दिखाता हो और लोगों पर गर्व करने के लिए स्वयं की प्रशंसा करता हो।
आयत 37
ٱلَّذِينَ يَبْخَلُونَ وَيَأْمُرُونَ ٱلنَّاسَ بِٱلْبُخْلِ وَيَكْتُمُونَ مَآ ءَاتَىٰهُمُ ٱللَّهُ مِن فَضْلِهِۦ ۗ وَأَعْتَدْنَا لِلْكَـٰفِرِينَ عَذَابًۭا مُّهِينًۭا
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يَبْخَلُونَ
बुख़्ल करते हैं
وَيَأْمُرُونَ
और वो हुक्म देते हैं
ٱلنَّاسَ
लोगों को
بِٱلْبُخْلِ
बुख़्ल का
وَيَكْتُمُونَ
और वो छुपाते हैं
مَآ
उसको जो
ءَاتَىٰهُمُ
दिया उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِن
of
فَضْلِهِۦ ۗ
अपने फ़ज़ल से
وَأَعْتَدْنَا
और तैयार कर रखा है हमने
لِلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के लिए
عَذَابًۭا
अज़ाब
مُّهِينًۭا
रुस्वा करने वाला
वे जो स्वयं कंजूसी करते है और लोगों को भी कंजूसी पर उभारते है और अल्लाह ने अपने उदार दान से जो कुछ उन्हें दे रखा होता है, उसे छिपाते है, जो हमने अकृतज्ञ लोगों के लिए अपमानजनक यातना तैयार कर रखी है
तफ़्सीर:
अल्लाह उन लोगों से प्रेम नहीं करता, जो अल्लाह के दिए हुए धन को खर्च नहीं करते, जो अल्लाह ने उन पर ज़रूरी कर दिया है तथा वे अपने कथन एवं कर्म से दूसरों को भी ऐसा करने का आदेश देते हैं। वे अल्लाह की दी हुई जीविका तथा ज्ञान आदि को छिपाते हैं। अतः वे लोगों के सामने सत्य को बयान नहीं करते हैं, बल्जाकि उसे छिपाकर रखते हैं और असत्य को ज़ाहिर करते हैं। ये दरअसल काफ़िरों की विशेषताएँ हैं और हमने काफ़िरों के लिए अपमानकारी यातना तैयार कर रखी है।
आयत 38
وَٱلَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَٰلَهُمْ رِئَآءَ ٱلنَّاسِ وَلَا يُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَلَا بِٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۗ وَمَن يَكُنِ ٱلشَّيْطَـٰنُ لَهُۥ قَرِينًۭا فَسَآءَ قَرِينًۭا
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
يُنفِقُونَ
ख़र्च करते है
أَمْوَٰلَهُمْ
अपने मालों को
رِئَآءَ
दिखाने के लिए
ٱلنَّاسِ
लोगों को
وَلَا
और नहीं
يُؤْمِنُونَ
वो ईमान रखते
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَلَا
और ना
بِٱلْيَوْمِ
in the Day
ٱلْـَٔاخِرِ ۗ
आख़िरी दिन पर
وَمَن
और जो कोई
يَكُنِ
हो
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान
لَهُۥ
उसका
قَرِينًۭا
साथी
فَسَآءَ
तो कितना बुरा है
قَرِينًۭا
साथी
वे जो अपने माल लोगों को दिखाने के लिए ख़र्च करते है, न अल्लाह पर ईमान रखते है, न अन्तिम दिन पर, और जिस किसी का साथी शैतान हुआ, तो वह बहुत ही बुरा साथी है
तफ़्सीर:
तथा हमने उन लोगों के लिए भी अज़ाब तैयार कर रखा है, जो अपना धन इसलिए ख़र्च करते हैं कि लोग उन्हें देखें और उनकी प्रशंसा करें। उनका अल्लाह एवं क़यामत के दिन पर ईमान नहीं होता है। हमने उनके लिए वह अपमानकारी यातना तैयार किया है। उन्हें दरअसल शैतान के अनुसरण ही ने गुमराह किया है। और शैतान जिसका साथी बन गया, वह जान जाए कि शैतान बहुत बुरा साथी है।
आयत 39
وَمَاذَا عَلَيْهِمْ لَوْ ءَامَنُوا۟ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ وَأَنفَقُوا۟ مِمَّا رَزَقَهُمُ ٱللَّهُ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ بِهِمْ عَلِيمًا
وَمَاذَا
और क्या (आफ़त आती)
عَلَيْهِمْ
उन पर
لَوْ
अगर
ءَامَنُوا۟
वो ईमान ले आते
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَٱلْيَوْمِ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرِ
और आख़िरी दिन पर
وَأَنفَقُوا۟
और वो ख़र्च करते
مِمَّا
उसमें से जो
رَزَقَهُمُ
रिज़्क़ दिया उन्हें
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह ने
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِهِمْ
उन्हें
عَلِيمًا
ख़ूब जानने वाला
उनका बिगड़ जाता, यदि वे अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान लाते और जो कुछ अल्लाह ने उन्हें दिया है, उसमें से ख़र्च करते है? अल्लाह उन्हें भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
इन लोगों का क्या नुक़सान होता, यदि वे वास्तव में अल्लाह पर और क़ियामत के दिन पर ईमान ले आते और जो कुछ अल्लाह ने उन्हें प्रदान किया है उसमें से उन रास्तों में खर्च करते जिनसे वह प्यार करता है और प्रसन्न होता है?! बल्कि उसमें भलाई ही भलाई है। और अल्लाह अन्हें भली-भाँति जानने वाला है, उनकी स्थिति उससे छिपी नहीं है और वह हर एक को उसके कार्य का बदला देगा।
आयत 40
إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَظْلِمُ مِثْقَالَ ذَرَّةٍۢ ۖ وَإِن تَكُ حَسَنَةًۭ يُضَـٰعِفْهَا وَيُؤْتِ مِن لَّدُنْهُ أَجْرًا عَظِيمًۭا
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يَظْلِمُ
नहीं वो ज़ुल्म करता
مِثْقَالَ
बराबर
ذَرَّةٍۢ ۖ
ज़र्रे के
وَإِن
और अगर
تَكُ
हो
حَسَنَةًۭ
एक नेकी
يُضَـٰعِفْهَا
वो दोगुना कर देगा उसे
وَيُؤْتِ
और वो देगा
مِن
from
لَّدُنْهُ
अपने पास से
أَجْرًا
अजर
عَظِيمًۭا
बड़ा
निस्संदेह अल्लाह रत्ती-भर भी ज़ुल्म नहीं करता और यदि कोई एक नेकी हो तो वह उसे कई गुना बढ़ा देगा और अपनी ओर से बड़ा बदला देगा
तफ़्सीर:
निश्चय अल्लाह, न्यायवान् है, अपने बंदों पर ज़रा भी अत्याचार नहीं करता। अतः वह उनकी नेकियों में एक छोटी चींटी के बराबर कमी नहीं करता और न उनके गुनाहों में कुछ वृद्धि करता है। बल्कि यदि ज़र्रा बराबर भी नेकी हो, तो उसका सवाब अपनी कृपा से कई गुना बढ़ा देता है और उसके अतिरिक्त अपनी ओर से बड़ा बदला प्रदान करता है।
आयत 41
فَكَيْفَ إِذَا جِئْنَا مِن كُلِّ أُمَّةٍۭ بِشَهِيدٍۢ وَجِئْنَا بِكَ عَلَىٰ هَـٰٓؤُلَآءِ شَهِيدًۭا
فَكَيْفَ
फिर क्या हाल होगा
إِذَا
जब
جِئْنَا
लाऐंगे हम
مِن
from
كُلِّ
every
أُمَّةٍۭ
हर उम्मत से
بِشَهِيدٍۢ
एक गवाह
وَجِئْنَا
और लाऐंगे हम
بِكَ
आपको
عَلَىٰ
against
هَـٰٓؤُلَآءِ
उन सब पर
شَهِيدًۭا
गवाह
फिर क्या हाल होगा जब हम प्रत्येक समुदाय में से एक गवाह लाएँगे और स्वयं तुम्हें इन लोगों के मुक़ाबले में गवाह बनाकर पेश करेंगे?
तफ़्सीर:
तो क़यामत के दिन क्या हाल होगा, जब हम हर समुदाय के नबी को इस बात की गवाही देने के लिए लाएँगे जो कुछ उन्होंने किया है, और - ऐ नबी! - हम आपको आपकी उम्मत पर गवाह की हैसियत से पेश करेंगे?
आयत 42
يَوْمَئِذٍۢ يَوَدُّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَعَصَوُا۟ ٱلرَّسُولَ لَوْ تُسَوَّىٰ بِهِمُ ٱلْأَرْضُ وَلَا يَكْتُمُونَ ٱللَّهَ حَدِيثًۭا
يَوْمَئِذٍۢ
जिस दिन
يَوَدُّ
चाहेंगे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
وَعَصَوُا۟
और नाफ़रमानी की
ٱلرَّسُولَ
रसूल की
لَوْ
काश
تُسَوَّىٰ
बराबर कर दी जाए
بِهِمُ
उन पर
ٱلْأَرْضُ
ज़मीन
وَلَا
और ना
يَكْتُمُونَ
वो छुपा सकेंगे
ٱللَّهَ
अल्लाह से
حَدِيثًۭا
कोई बात
उस दिन वे लोग जिन्होंने इनकार किया होगा और रसूल की अवज्ञा की होगी, यही चाहेंगे कि किसी तरह धरती में समोकर उसे बराबर कर दिया जाए। वे अल्लाह से कोई बात भी न छिपा सकेंगे
तफ़्सीर:
उस महान दिन में, अल्लाह का इनकार करने वाले और उसके रसूल की बात पर न चलने वाले इच्छा करेंगे कि काश वे मिट्टी हो गए होते, तो वे और धरती एक जैसे हो जाते। उस दिन वे अल्लाह से अपना कोई कर्म छिपा नहीं सकेंगे। क्योंकि अल्लाह उनकी ज़बानों पर मुहर लगा देगा, इसलिए वे बोल नहीं सकेंगी और उनके शरीर के अंगों को को अनुमति देगा तो वे उनके बुरे कामों की गवाही देंगे।
आयत 43
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَقْرَبُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَأَنتُمْ سُكَـٰرَىٰ حَتَّىٰ تَعْلَمُوا۟ مَا تَقُولُونَ وَلَا جُنُبًا إِلَّا عَابِرِى سَبِيلٍ حَتَّىٰ تَغْتَسِلُوا۟ ۚ وَإِن كُنتُم مَّرْضَىٰٓ أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍ أَوْ جَآءَ أَحَدٌۭ مِّنكُم مِّنَ ٱلْغَآئِطِ أَوْ لَـٰمَسْتُمُ ٱلنِّسَآءَ فَلَمْ تَجِدُوا۟ مَآءًۭ فَتَيَمَّمُوا۟ صَعِيدًۭا طَيِّبًۭا فَٱمْسَحُوا۟ بِوُجُوهِكُمْ وَأَيْدِيكُمْ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَفُوًّا غَفُورًا
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Do) not
تَقْرَبُوا۟
ना तुम क़रीब जाओ
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़ के
وَأَنتُمْ
जबकि तुम
سُكَـٰرَىٰ
नशे में हो
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
تَعْلَمُوا۟
तुम जान लो
مَا
जो
تَقُولُونَ
तुम कहते हो
وَلَا
और ना
جُنُبًا
हालते जनाबत में
إِلَّا
मगर
عَابِرِى
उबूर करने वाले हो
سَبِيلٍ
रास्ते को
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
تَغْتَسِلُوا۟ ۚ
तुम ग़ुस्ल कर लो
وَإِن
और अगर
كُنتُم
हो तुम
مَّرْضَىٰٓ
मरीज़
أَوْ
या
عَلَىٰ
on
سَفَرٍ
सफ़र पर
أَوْ
या
جَآءَ
आया
أَحَدٌۭ
कोई एक
مِّنكُم
तुम में से
مِّنَ
from
ٱلْغَآئِطِ
क़ज़ा-ए- हाजत से
أَوْ
या
لَـٰمَسْتُمُ
छुआ हो तुमने
ٱلنِّسَآءَ
औरतों को
فَلَمْ
फिर ना
تَجِدُوا۟
तुम पाओ
مَآءًۭ
पानी
فَتَيَمَّمُوا۟
तो तयम्मुम करो
صَعِيدًۭا
मिट्टी
طَيِّبًۭا
पाक से
فَٱمْسَحُوا۟
फिर मसह करो
بِوُجُوهِكُمْ
अपने चेहरों का
وَأَيْدِيكُمْ ۗ
और अपने हाथों का
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
عَفُوًّا
बहुत माफ़ करने वाला
غَفُورًا
बहुत बख़्शने वाला
ऐ ईमान लानेवालो! नशे की दशा में नमाज़ में व्यस्त न हो, जब तक कि तुम यह न जानने लगो कि तुम क्या कह रहे हो। और इसी प्रकार नापाकी की दशा में भी (नमाज़ में व्यस्त न हो), जब तक कि तुम स्नान न कर लो, सिवाय इसके कि तुम सफ़र में हो। और यदि तुम बीमार हो या सफ़र में हो, या तुममें से कोई शौच करके आए या तुमने स्त्रियों को हाथ लगाया हो, फिर तुम्हें पानी न मिले, तो पाक मिट्टी से काम लो और उसपर हाथ मारकर अपने चहरे और हाथों पर मलो। निस्संदेह अल्लाह नर्मी से काम लेनेवाला, अत्यन्त क्षमाशील है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! जब तुम नशे की हालत में हो तो नमाज़ न पढ़ो, यहाँ तक कि नशा उतर जाए और जो कुछ तुम कहते हो उसमें भेद कर सको। (यह आदेश पूर्णतया शराब के हराम होने से पहले था)। इसी तरह जनाबत की हालत में, जब तक स्नान न कर लो, नमाज़ न पढ़ो और मस्जिदों में प्रवेश न करो, परंतु यदि मस्जिद में रुके बिना गुज़रते हुए चले जाओ, तो कोई बात नहीं है। तथा यदि तुम्हें ऐसी बीमारी हो जाए जिसके साथ पानी इस्तेमाल करना संभव न हो, या तुम यात्रा में हो, या तुममें से कोई अशुद्ध (बे-वुज़ू) हो जाए, या तुमने स्त्रियों से सहवास किया हो; फिर तुम्हें पानी न मिल सके, तो पाक मिट्टी से काम लो और उससे अपने चेहरे और हाथों का मसह कर लो। निश्चय अल्लाह तुम्हारी कोताहियों को माफ़ करने वाला और तुम्हें क्षमा करने वाला है।
आयत 44
أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ نَصِيبًۭا مِّنَ ٱلْكِتَـٰبِ يَشْتَرُونَ ٱلضَّلَـٰلَةَ وَيُرِيدُونَ أَن تَضِلُّوا۟ ٱلسَّبِيلَ
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
إِلَى
[towards]
ٱلَّذِينَ
तरफ़ उनके जो
أُوتُوا۟
दिए गए
نَصِيبًۭا
एक हिस्सा
مِّنَ
of
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में से
يَشْتَرُونَ
वो ख़रीदते हैं
ٱلضَّلَـٰلَةَ
गुमराही को
وَيُرِيدُونَ
और वो चाहते है
أَن
कि
تَضِلُّوا۟
तुम भटक जाओ
ٱلسَّبِيلَ
रास्ते से
क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा, जिन्हें सौभाग्य प्रदान हुआ था अर्थात किताब दी गई थी? वे पथभ्रष्टता के खरीदार बने हुए है और चाहते है कि तुम भी रास्ते से भटक जाओ
तफ़्सीर:
क्या - ऐ रसूल! - आप उन यहूदियों के हाल से अवगत नहीं हैं, जिन्हें अल्लाह ने तौरात के ज्ञान का कुछ भाग दिया, वे हिदायत के बदले गुमराही ख़रीद रहे हैं, तथा वे तुम्हें - ऐ मोमिनो! - रसूल के लाए हुए सीधे मार्ग से भटकाने के बड़े इच्छुक हैं; ताकि तुम उनके टेढ़े मार्ग पर चलने लगो!?
आयत 45
وَٱللَّهُ أَعْلَمُ بِأَعْدَآئِكُمْ ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ وَلِيًّۭا وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ نَصِيرًۭا
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِأَعْدَآئِكُمْ ۚ
तुम्हारे दुश्मनों को
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِٱللَّهِ
अल्लाह
وَلِيًّۭا
दोस्त
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِٱللَّهِ
अल्लाह
نَصِيرًۭا
मददगार
अल्लाह तुम्हारे शत्रुओं को भली-भाँति जानता है। अल्लाह एक संरक्षक के रूप में काफ़ी है और अल्लाह एक सहायक के रूप में भी काफ़ी है
तफ़्सीर:
अल्लाह तुम्हारे दुश्मनों को - ऐ मोमिनो! - तुमसे अधिक जानता है। अतः उसने तुम्हें उनका हाल बता दिया है और तुम्हारे लिए उनकी दुश्मनी को स्पष्ट कर दिया है। तथा अल्लाह एक संरक्षक के रूप में काफ़ी है जो उनकी शक्ति के विरुद्ध तुम्हारी रक्षा करता है, तथा अल्लाह एक सहायक के रूप में काफ़ी है जो तुम्हें उनकी चाल और उनके नुकसान पहुँचाने से बचाता है और उनके विरुद्ध तुम्हारी मदद करता है।
आयत 46
مِّنَ ٱلَّذِينَ هَادُوا۟ يُحَرِّفُونَ ٱلْكَلِمَ عَن مَّوَاضِعِهِۦ وَيَقُولُونَ سَمِعْنَا وَعَصَيْنَا وَٱسْمَعْ غَيْرَ مُسْمَعٍۢ وَرَٰعِنَا لَيًّۢا بِأَلْسِنَتِهِمْ وَطَعْنًۭا فِى ٱلدِّينِ ۚ وَلَوْ أَنَّهُمْ قَالُوا۟ سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا وَٱسْمَعْ وَٱنظُرْنَا لَكَانَ خَيْرًۭا لَّهُمْ وَأَقْوَمَ وَلَـٰكِن لَّعَنَهُمُ ٱللَّهُ بِكُفْرِهِمْ فَلَا يُؤْمِنُونَ إِلَّا قَلِيلًۭا
مِّنَ
Of
ٱلَّذِينَ
उन लोगों में से जो
هَادُوا۟
यहूदी बन गए
يُحَرِّفُونَ
वो तब्दील कर देते हैं
ٱلْكَلِمَ
अलफ़ाज़ को
عَن
from
مَّوَاضِعِهِۦ
उनकी जगहों से
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
سَمِعْنَا
सुना हमने
وَعَصَيْنَا
और नाफ़रमानी की हमने
وَٱسْمَعْ
और सुनो तुम
غَيْرَ
not
مُسْمَعٍۢ
ना सुनवाए जाओ
وَرَٰعِنَا
और राइना (कहते हैं)
لَيًّۢا
मोड़ते हुए
بِأَلْسِنَتِهِمْ
अपनी ज़बानों को
وَطَعْنًۭا
और ऐब लगाने के लिए
فِى
[in]
ٱلدِّينِ ۚ
दीन में
وَلَوْ
और अगर
أَنَّهُمْ
बेशक वो
قَالُوا۟
वो कहते
سَمِعْنَا
सुना हमने
وَأَطَعْنَا
और इताअत की हमने
وَٱسْمَعْ
और सुनिए
وَٱنظُرْنَا
और देखिए हमें
لَكَانَ
अलबत्ता होता
خَيْرًۭا
बेहतर
لَّهُمْ
उनके लिए
وَأَقْوَمَ
और ज़्यादा दुरुस्त
وَلَـٰكِن
और लेकिन
لَّعَنَهُمُ
लानत की उन पर
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
بِكُفْرِهِمْ
बवजह उनके कुफ़्र के
فَلَا
तो नहीं
يُؤْمِنُونَ
वो ईमान लाते
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا
बहुत थोड़ा
वे लोग जो यहूदी बन गए, वे शब्दों को उनके स्थानों से दूसरी ओर फेर देते है और कहते हैं, "समि'अना व 'असैना" (हमने सुना, लेकिन हम मानते नही); और "इसम'अ ग़ै-र मुसम'इन" (सुनो हालाँकि तुम सुनने के योग्य नहीं हो और "राइना" (हमारी ओर ध्यान दो) - यह वे अपनी ज़बानों को तोड़-मरोड़कर और दीन पर चोटें करते हुए कहते है। और यदि वे कहते, "समिअ'ना व अ-त'अना" (हमने सुना और माना) और "इसम'अ" (सुनो) और "उनज़ुरना" (हमारी ओर निगाह करो) तो यह उनके लिए अच्छा और अधिक ठीक होता। किन्तु उनपर तो उनके इनकार के कारण अल्लाह की फिटकार पड़ी हुई है। फिर वे ईमान थोड़े ही लाते है
तफ़्सीर:
यहूदियों में कुछ लोग बहुत बुरे हैं, जो अल्लाह की उतारी हुई बात को बदल देते हैं। अतः उसे वह अर्थ पहना देते हैं, जो अल्लाह ने अवतरित नहीं किया है। जब रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उन्हें कोई आदेश देते हैं, तो वे आपसे कहते हैं : "हमने आपकी बात सुनी और हमने आपके आदेश की अवहेलना की।" और वे व्यंग्य करते हुए कहते हैं :"हम जो कहते हैं, उसे सुनें, आप सुन न पाएँ!" तथा वे "राइना" कहकर यह भ्रम फैलाते हैं कि उनका मतलब यह है कि :"आप हमारी बात पर ध्यान दीजिए", जबकि उनका मक़सद "रऊनत" अर्थात् बेवकूफी आदि की ओर इशारा करना होता है। वे इसके उच्चारण के समय अपनी ज़बान को मोड़ देते थे। वे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर शाप करना चाहते थे तथा उनका उद्देश्य (इस्लाम) धर्म पर लांक्षन करना होता था। यदि वे "हमने आपकी बात सुनी और हमने आपके आदेश की अवहेलना की" की जगह "हमने आपकी बात सुनी और आपके आदेश का पालन किया" कहते, तथा "आप हमारी बात सुनिए, आप सुन न पाएँ!" की जगह "हमारी बात सुनिए", तथा "राइना" कहने की जगह "ज़रा प्रतीक्षा करें कि हम आपकी बात समझ जाएँ" कहते; तो यह उनके लिए पहले कहे हुए शब्द से बेहतर और उससे अधिक न्यायसंगत होता। क्योंकि इसमें नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के व्यक्तित्व के योग्य शिष्टाचार पाया जाता है। लेकिन अल्लाह ने उन्हें शापित किया है। अतः उनके कुफ़्र के कारण उन्हें अपनी दया से दूर कर दिया है। इसलिए वे ऐसा ईमान नहीं लाएँगे, जो उनके लिए लाभदायक हो।
आयत 47
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ ءَامِنُوا۟ بِمَا نَزَّلْنَا مُصَدِّقًۭا لِّمَا مَعَكُم مِّن قَبْلِ أَن نَّطْمِسَ وُجُوهًۭا فَنَرُدَّهَا عَلَىٰٓ أَدْبَارِهَآ أَوْ نَلْعَنَهُمْ كَمَا لَعَنَّآ أَصْحَـٰبَ ٱلسَّبْتِ ۚ وَكَانَ أَمْرُ ٱللَّهِ مَفْعُولًا
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
أُوتُوا۟
दिए गए हो
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
ءَامِنُوا۟
ईमान लाओ
بِمَا
उस पर जो
نَزَّلْنَا
नाज़िल किया हमने
مُصَدِّقًۭا
तसदीक़ करने वाला है
لِّمَا
उसकी जो
مَعَكُم
तुम्हारे पास है
مِّن
from
قَبْلِ
इससे पहले
أَن
कि
نَّطْمِسَ
हम मिटा दें
وُجُوهًۭا
चेहरों को
فَنَرُدَّهَا
फिर हम फेर दें उन्हें
عَلَىٰٓ
on
أَدْبَارِهَآ
उनकी पुश्तों पर
أَوْ
या
نَلْعَنَهُمْ
हम लानत करें उन पर
كَمَا
जैसा कि
لَعَنَّآ
लानत की हमने
أَصْحَـٰبَ
companions
ٱلسَّبْتِ ۚ
सब्त (हफ़्ता) वालों पर
وَكَانَ
और है
أَمْرُ
हुक्म
ٱللَّهِ
अल्लाह का
مَفْعُولًا
होकर रहने वाला
ऐ लोगों! जिन्हें किताब दी गई, उस चीज को मानो जो हमने उतारी है, जो उसकी पुष्टि में है, जो स्वयं तुम्हारे पास है, इससे पहले कि हम चेहरों की रूपरेखा को मिटाकर रख दें और उन्हें उनके पीछ की ओर फेर दें या उनपर लानत करें, जिस प्रकार हमने सब्तवालों पर लानत की थी। और अल्लाह का आदेश तो लागू होकर ही रहता है
तफ़्सीर:
ऐ यहूदियो और ईसाइयो, जिन्हें किताब दी गई है, उस पुस्तक पर ईमान लाओ, जो हमने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतारी है, जो तुम्हारे पास मौजूद तौरात एवं इंजील की पुष्टि करने हेतु आए हैं, इससे पहले कि हम चेहरों में मौजूद इंद्रियों को मिटा दें, और उन्हें उनके पीछे की दिशा में बना दें, या हम उन्हें अल्लाह की दया से वैसे ही निष्कासित कर दें, जैसे हमने शनिवार वालों को उससे निष्कासित किया था, जिन्होंने शनिवार के दिन शिकार से मनाही के बावजूद उसमें शिकार किया था। जिसके कारण अल्लाह ने उन्हें बंदर बना दिया। और अल्लाह का आदेश और उसका फ़ैसला अनिवार्य रूप से पूरा होकर रहता है।
आयत 48
إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَن يُشْرَكَ بِهِۦ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَٰلِكَ لِمَن يَشَآءُ ۚ وَمَن يُشْرِكْ بِٱللَّهِ فَقَدِ ٱفْتَرَىٰٓ إِثْمًا عَظِيمًا
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يَغْفِرُ
नहीं बख़्शेगा
أَن
कि
يُشْرَكَ
शिर्क किया जाए
بِهِۦ
साथ उसके
وَيَغْفِرُ
और वो बख़्श देगा
مَا
जो
دُونَ
अलावा है
ذَٰلِكَ
उसके
لِمَن
जिसके लिए
يَشَآءُ ۚ
वो चाहेगा
وَمَن
और जो कोई
يُشْرِكْ
शिर्क करेगा
بِٱللَّهِ
साथ अल्लाह के
فَقَدِ
तो तहक़ीक़
ٱفْتَرَىٰٓ
उसने गढ़ लिया
إِثْمًا
गुनाह
عَظِيمًا
बहुत बड़ा
अल्लाह इसके क्षमा नहीं करेगा कि उसका साझी ठहराया जाए। किन्तु उससे नीचे दर्जे के अपराध को जिसके लिए चाहेगा, क्षमा कर देगा और जिस किसी ने अल्लाह का साझी ठहराया, तो उसने एक बड़ा झूठ घड़ लिया
तफ़्सीर:
अल्लाह इस बात को क्षमा नहीं करेगा कि उसके प्राणियों में से किसी को उसका साझी बनाया जाए, परंतु शिर्क और कुफ़्र से कमतर गुनाहों को, जिसके लिए चाहेगा, अपनी कृपा से क्षमा कर देगा, अथवा उनमें से जिसे चाहेगा, उसके गुनाहों के अनुसार, अपने न्याय के आधार पर, दंड देगा। तथा जिसने किसी को अल्लाह का साझी बनाया, उसने इतना बड़ा पाप किया कि उस पर मरने वाले को क्षमा नहीं किया जाएगा।
आयत 49
أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ يُزَكُّونَ أَنفُسَهُم ۚ بَلِ ٱللَّهُ يُزَكِّى مَن يَشَآءُ وَلَا يُظْلَمُونَ فَتِيلًا
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
إِلَى
[towards]
ٱلَّذِينَ
तरफ़ उनके जो
يُزَكُّونَ
पाक क़रार देते हैं
أَنفُسَهُم ۚ
अपने नफ़्सों को
بَلِ
बल्कि
ٱللَّهُ
अल्लाह
يُزَكِّى
पाक करता है
مَن
जिसको
يَشَآءُ
वो चाहता है
وَلَا
और ना
يُظْلَمُونَ
वो ज़ुल्म किए जाऐंगे
فَتِيلًا
धागे बराबर
क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जो अपने को पूर्ण एवं शिष्ट होने का दावा करते हैं? (कोई यूँ ही शिष्ट नहीं हुआ करता) बल्कि अल्लाह ही जिसे चाहता है, पूर्णता एवं शिष्टता प्रदान करता है। और उनके साथ तनिक भी अत्याचार नहीं किया जाता
तफ़्सीर:
क्या आप - ऐ रसूल! - उन लोगों के मामले से अवगत नहीं हैं, जो खुद अपनी और अपने कार्यों की प्रशंसा करते हैं? बल्कि केवल अल्लाह ही है जो अपने बंदों में से जिसकी चाहे प्रशंसा करे और पवित्र बनाए, क्योंकि वह दिलों की गुप्त बातों को जानने वाला है। तथा उनके सत्कर्मों के सवाब में कुछ भी कमी नहीं की जाएगी, चाहे वह खजूर की गुठली के धागे के बराबर ही क्यों न हो।
आयत 50
ٱنظُرْ كَيْفَ يَفْتَرُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلْكَذِبَ ۖ وَكَفَىٰ بِهِۦٓ إِثْمًۭا مُّبِينًا
ٱنظُرْ
देखो
كَيْفَ
किस तरह
يَفْتَرُونَ
वो गढ़ते हैं
عَلَى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
ٱلْكَذِبَ ۖ
झूठ
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِهِۦٓ
उसका
إِثْمًۭا
गुनाह होना
مُّبِينًا
खुल्लम-खुला
देखो तो सही, वे अल्लाह पर कैसा झूठ मढ़ते हैं? खुले गुनाह के लिए तो यही पर्याप्त है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) देखिए तो सही कि वे लोग स्वयं की प्रशंसा करके कैसे अल्लाह पर मिथ्या आरोप लगा रहे हैं! और उनकी गुमराही को स्पष्ट करने के लिए यही गुनाह काफ़ी है।
आयत 51
أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ نَصِيبًۭا مِّنَ ٱلْكِتَـٰبِ يُؤْمِنُونَ بِٱلْجِبْتِ وَٱلطَّـٰغُوتِ وَيَقُولُونَ لِلَّذِينَ كَفَرُوا۟ هَـٰٓؤُلَآءِ أَهْدَىٰ مِنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ سَبِيلًا
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
إِلَى
[towards]
ٱلَّذِينَ
तरफ़ उनके जो
أُوتُوا۟
दिए गए
نَصِيبًۭا
एक हिस्सा
مِّنَ
of
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में से
يُؤْمِنُونَ
वो ईमान लाते हैं
بِٱلْجِبْتِ
साथ जिब्त (जादू)
وَٱلطَّـٰغُوتِ
और ताग़ूत (शैतान) के
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
لِلَّذِينَ
उनके लिए जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
هَـٰٓؤُلَآءِ
ये लोग
أَهْدَىٰ
ज़्यादा हिदायत याफ़्ता हैं
مِنَ
than
ٱلَّذِينَ
उनसे जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
سَبِيلًا
रास्ते के ऐतबार से
क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा, जिन्हें किताब का एक हिस्सा दिय् गया? वे अवास्तविक चीज़ो और ताग़ूत (बढ़ हुए सरकश) को मानते है। और अधर्मियों के विषय में कहते है, "ये ईमानवालों से बढ़कर मार्ग पर है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) क्या आप नहीं जानते और आपको उन यहूदियों की दशा पर आश्चर्य नहीं होता, जिन्हें अल्लाह ने ज्ञान का कुछ हिस्सा दिया है, कि वे अल्लाह को छोड़कर अपने बनाए हुए माबूदों (देवताओं) पर ईमान रखते हैं और - मुश्रिकों के साथ बनाए रखने और उनकी चाटुकारिता के तौर पर - कहते हैं : ये (मुश्रिक लोग) मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथियों से अधिक हिदायत के मार्ग पर हैं?
आयत 52
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ لَعَنَهُمُ ٱللَّهُ ۖ وَمَن يَلْعَنِ ٱللَّهُ فَلَن تَجِدَ لَهُۥ نَصِيرًا
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
ٱلَّذِينَ
वो जो
لَعَنَهُمُ
लानत की उन पर
ٱللَّهُ ۖ
अल्लाह ने
وَمَن
और जिस पर
يَلْعَنِ
लानत कर दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
فَلَن
तो हरगिज़ नहीं
تَجِدَ
आप पाऐंगे
لَهُۥ
उसके लिए
نَصِيرًا
कोई मददगार
वही है जिनपर अल्लाह ने लातन की है, और जिसपर अल्लाह लानत कर दे, उसका तुम कोई सहायक कदापि न पाओगे
तफ़्सीर:
जो लोग इस भ्रष्ट विश्वास को मानते हैं, वही हैं जिन्हें अल्लाह ने अपनी दया से निष्कासित कर दिया है और जिसे अल्लाह (अपनी दया से) निष्कासित कर दे, तो आप कदापि उसका कोई सहायक नहीं पाएँगे,जो उसकी मदद कर सके।
आयत 53
أَمْ لَهُمْ نَصِيبٌۭ مِّنَ ٱلْمُلْكِ فَإِذًۭا لَّا يُؤْتُونَ ٱلنَّاسَ نَقِيرًا
أَمْ
या
لَهُمْ
उनके लिए
نَصِيبٌۭ
कोई हिस्सा है
مِّنَ
of
ٱلْمُلْكِ
बादशाहत में से
فَإِذًۭا
तो तब
لَّا
not would
يُؤْتُونَ
नहीं वो देंगे
ٱلنَّاسَ
लोगों को
نَقِيرًا
खजूर की गुठली में सूराख़ बराबर
या बादशाही में इनका कोई हिस्सा है? फिर तो ये लोगों को फूटी कौड़ी तक भी न देते
तफ़्सीर:
उनके पास राज्य का कोई हिस्सा नहीं है। यदि ऐसा होता, तो लोगों को उसमें से कुछ भी नहीं देते, यद्यपि खजूर की गुठली के ऊपर के गड्ढे के बराबर ही क्यों न हो।
आयत 54
أَمْ يَحْسُدُونَ ٱلنَّاسَ عَلَىٰ مَآ ءَاتَىٰهُمُ ٱللَّهُ مِن فَضْلِهِۦ ۖ فَقَدْ ءَاتَيْنَآ ءَالَ إِبْرَٰهِيمَ ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْحِكْمَةَ وَءَاتَيْنَـٰهُم مُّلْكًا عَظِيمًۭا
أَمْ
या
يَحْسُدُونَ
वो हसद करते हैं
ٱلنَّاسَ
लोगों से
عَلَىٰ
ऊपर
مَآ
उसके जो
ءَاتَىٰهُمُ
दिया उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِن
from
فَضْلِهِۦ ۖ
अपने फ़ज़ल से
فَقَدْ
पस तहक़ीक़
ءَاتَيْنَآ
दी हमने
ءَالَ
(the) family
إِبْرَٰهِيمَ
आले इब्राहीम को
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
وَٱلْحِكْمَةَ
और हिकमत
وَءَاتَيْنَـٰهُم
और दी हमने उन्हें
مُّلْكًا
बादशाहत
عَظِيمًۭا
बहुत बड़ी
या ये लोगों से इसलिए ईर्ष्या करते है कि अल्लाह ने उन्हें अपने उदार दान से अनुग्रहित कर दिया? हमने तो इबराहीम के लोगों को किताब और हिकमत (तत्वदर्शिता) दी और उन्हें बड़ा राज्य प्रदान किया
तफ़्सीर:
बल्कि वे मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके साथियों से इस बिना पर ईर्ष्या करते हैं कि अल्लाह ने उन्हें, नुबुव्वत (ईश्दूतत्व), ईमान और धरती में सत्ता प्रदान किया है। तो ये लोग उनसे ईर्ष्या क्यों करते हैं, जबकि हमने इससे पहले भी इबराहीम अलैहिस्सलाम के वंशज को आसमानी किताब प्रदान किया और किताब के अलावा भी उनकी ओर वह्य की, तथा उन्हें लोगों पर विशाल राज्य प्रदान किया!?
आयत 55
فَمِنْهُم مَّنْ ءَامَنَ بِهِۦ وَمِنْهُم مَّن صَدَّ عَنْهُ ۚ وَكَفَىٰ بِجَهَنَّمَ سَعِيرًا
فَمِنْهُم
तो उनमें से कोई है
مَّنْ
जो
ءَامَنَ
ईमान लाया
بِهِۦ
उस पर
وَمِنْهُم
और उनमें से कोई है
مَّن
जो
صَدَّ
रुक गया
عَنْهُ ۚ
उस से
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِجَهَنَّمَ
जहन्नम
سَعِيرًا
भड़कती हुई
फिर उनमें से कोई उसपर ईमान लाया और उसमें से किसी ने किनारा खीच लिया। और (ऐसे लोगों के लिए) जहन्नम की भड़कती आग ही काफ़ी है
तफ़्सीर:
अह्ले किताब में से कुछ लोग उस चीज़ पर ईमान लाए, जो अल्लाह ने इबराहीम अलैहिस्सलाम पर और उनके वंश के नबियों पर अवतरित किया और कुछ लोगों ने उस पर ईमान लाने से उपेक्षा किया। उनका यही रवैया उसके प्रति भी है जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अवतिरत किया गया है। तथा उनमें से कुफ़्र करने वालों के लिए आग ही बराबर की सज़ा है।
आयत 56
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا سَوْفَ نُصْلِيهِمْ نَارًۭا كُلَّمَا نَضِجَتْ جُلُودُهُم بَدَّلْنَـٰهُمْ جُلُودًا غَيْرَهَا لِيَذُوقُوا۟ ٱلْعَذَابَ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَزِيزًا حَكِيمًۭا
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
بِـَٔايَـٰتِنَا
साथ हमारी आयात के
سَوْفَ
अनक़रीब
نُصْلِيهِمْ
हम जलाऐंगे उन्हें
نَارًۭا
आग में
كُلَّمَا
जब भी
نَضِجَتْ
पक जाऐंगीं
جُلُودُهُم
खालें उनकी
بَدَّلْنَـٰهُمْ
बदल देंगे हम उन्हें
جُلُودًا
खालें
غَيْرَهَا
अलावा उनके
لِيَذُوقُوا۟
ताकि वो चखें
ٱلْعَذَابَ ۗ
अज़ाब को
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
عَزِيزًا
बहुत ज़बरदस्त
حَكِيمًۭا
बहुत हिकमत वाला
जिन लोगों ने हमारी आयतों का इनकार किया, उन्हें हम जल्द ही आग में झोंकेंगे। जब भी उनकी खालें पक जाएँगी, तो हम उन्हें दूसरी खालों में बदल दिया करेंगे, ताकि वे यातना का मज़ा चखते ही रहें। निस्संदेह अल्लाह प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
निःसंदेह जिन लोगों ने हमारी आयतों के साथ कुफ़्र किया, हम उन्हें क़यामत के दिन आग में दाख़िल करेंगे, जो उन्हें चारों ओर से घेरे हुई होगी। जब भी उनकी खालें जल जाएँगी, हम उन्हें दूसरी खाल पहना देंगे, ताकि उन पर यातना जारी रहे। निःसंदेह अल्लाह प्रभुत्वशाली है, उसपर कोई चीज़ हावी नहीं हो सकती, वह जो कुछ उपाय करता और निर्णय लेता है, उसमें हिकमत वाला है।
आयत 57
وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ سَنُدْخِلُهُمْ جَنَّـٰتٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدًۭا ۖ لَّهُمْ فِيهَآ أَزْوَٰجٌۭ مُّطَهَّرَةٌۭ ۖ وَنُدْخِلُهُمْ ظِلًّۭا ظَلِيلًا
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
سَنُدْخِلُهُمْ
ज़रूर हम दाखिल करेंगे उन्हें
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात में
تَجْرِى
बहती हैं
مِن
from
تَحْتِهَا
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَآ
उनमें
أَبَدًۭا ۖ
हमेशा-हमेशा
لَّهُمْ
उनके लिए
فِيهَآ
उनमें
أَزْوَٰجٌۭ
बीवियाँ हैं
مُّطَهَّرَةٌۭ ۖ
इन्तिहाई पाकीज़ा
وَنُدْخِلُهُمْ
और हम दाख़िल करेंगे उन्हें
ظِلًّۭا
साए में
ظَلِيلًا
घने
और जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, उन्हें हम ऐसे बाग़ो में दाखिल करेंगे, जिनके नीचे नहरें बह रहीं होगी, जहाँ वे सदैव रहेंगे। उनके लिए वहाँ पाक जोड़े होंगे और हम उन्हें घनी छाँव में दाखिल करेंगे
तफ़्सीर:
जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए और उसके रसूल का पालन किया, तथा अच्छे कर्म किए, हम उन्हें क़यामत के दिन ऐसी जन्नतों में दाख़िल करेंगे, जिनके महलों के नीचे से नहरें प्रवाहित होंगी, जिनमें वे हमेशा रहेंगे। उनके लिए उन जन्नतों में हर गंदगी से पवित्र पत्नियाँ होंगी। तथा हम उन्हें एक घनी, विस्तारित छाया में रखेंगे, जिसमें गर्मी होगी न सर्दी।
आयत 58
۞ إِنَّ ٱللَّهَ يَأْمُرُكُمْ أَن تُؤَدُّوا۟ ٱلْأَمَـٰنَـٰتِ إِلَىٰٓ أَهْلِهَا وَإِذَا حَكَمْتُم بَيْنَ ٱلنَّاسِ أَن تَحْكُمُوا۟ بِٱلْعَدْلِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ نِعِمَّا يَعِظُكُم بِهِۦٓ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ سَمِيعًۢا بَصِيرًۭا
۞ إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَأْمُرُكُمْ
हुक्म देता है तुम्हें
أَن
कि
تُؤَدُّوا۟
तुम अदा करो
ٱلْأَمَـٰنَـٰتِ
अमानतों को
إِلَىٰٓ
to
أَهْلِهَا
तरफ़ उनके अहल के
وَإِذَا
और जब
حَكَمْتُم
फैसला करो तुम
بَيْنَ
दर्मियान
ٱلنَّاسِ
लोगों के
أَن
ये कि
تَحْكُمُوا۟
तुम फैसला करो
بِٱلْعَدْلِ ۚ
साथ अदल के
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
نِعِمَّا
बहुत अच्छी है जो
يَعِظُكُم
वो नसीहत करता है तुम्हें
بِهِۦٓ ۗ
उसकी
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
سَمِيعًۢا
बहुत सुनने वाला
بَصِيرًۭا
बहुत देखने वाला
अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि अमानतों को उनके हक़दारों तक पहुँचा दिया करो। और जब लोगों के बीच फ़ैसला करो, तो न्यायपूर्वक फ़ैसला करो। अल्लाह तुम्हें कितनी अच्छी नसीहत करता है। निस्सदेह, अल्लाह सब कुछ सुनता, देखता है
तफ़्सीर:
अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि अपने पास अमानत के रूप में रखी हुई हर चीज़ को उसके मालिक तक पहुँचा दो। तथा तुम्हें यह आदेश देता है कि जब तुम लोगों के बीच फैसला करो, तो न्याय के साथ फैसला करो। तथा फैसला करते समय पक्षपात अथवा अत्याचार से काम न लो। अल्लाह तुम्हें कितनी अच्छी नसीहत करता है और तुम्हारी सभी परिस्थितियों में उसकी ओर मार्गदर्शन करता है। निःसंदेह अल्लाह तुम्हारी बातों को सुनने वाला और तुम्हारे कार्यों को जानने वाला है।
आयत 59
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَطِيعُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُوا۟ ٱلرَّسُولَ وَأُو۟لِى ٱلْأَمْرِ مِنكُمْ ۖ فَإِن تَنَـٰزَعْتُمْ فِى شَىْءٍۢ فَرُدُّوهُ إِلَى ٱللَّهِ وَٱلرَّسُولِ إِن كُنتُمْ تُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ ۚ ذَٰلِكَ خَيْرٌۭ وَأَحْسَنُ تَأْوِيلًا
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
أَطِيعُوا۟
इताअत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَأَطِيعُوا۟
और इताअत करो
ٱلرَّسُولَ
रसूल की
وَأُو۟لِى
and those
ٱلْأَمْرِ
और ऊलुल अम्र की
مِنكُمْ ۖ
तुम में से
فَإِن
फिर अगर
تَنَـٰزَعْتُمْ
तनाज़ेआ हो जाए तुम में
فِى
in
شَىْءٍۢ
किसी चीज़ में
فَرُدُّوهُ
तो फेर दो इसे
إِلَى
to
ٱللَّهِ
तरफ अल्लाह के
وَٱلرَّسُولِ
और रसूल के
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
تُؤْمِنُونَ
तुम ईमान रखते
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَٱلْيَوْمِ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرِ ۚ
और आख़िरी दिन पर
ذَٰلِكَ
ये
خَيْرٌۭ
बेहतर है
وَأَحْسَنُ
और ज़्यादा अच्छा है
تَأْوِيلًا
अंजाम के ऐतबार से
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह की आज्ञा का पालन करो और रसूल का कहना मानो और उनका भी कहना मानो जो तुममें अधिकारी लोग है। फिर यदि तुम्हारे बीच किसी मामले में झगड़ा हो जाए, तो उसे तुम अल्लाह और रसूल की ओर लौटाओ, यदि तुम अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखते हो। यदि उत्तम है और परिणाम की स्पष्ट से भी अच्छा है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! आदेशों का पालन करके और निषेधों से बचकर अल्लाह का और उसके रसूल का आज्ञापालन करो। तथा अपने शासकों का पालन करो जब तक कि वे अवज्ञा का आदेश न दें। फिर यदि किसी बात में तुम्हारा मतभेद हो जाए, तो उसके संबंध में अल्लाह की किताब और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत की तरफ लौटो, यदि तुम अल्लाह और अंतिम दिन पर ईमान रखते हो। (तुम्हारा) यह क़ुरआन और सुन्नत की तरफ लौटना, मतभेद में पड़े रहने और राय के आधार पर कोई बात कहने से बेहतर है और तुम्हारे लिए सबसे अच्छे परिणाम वाला है।
आयत 60
أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ يَزْعُمُونَ أَنَّهُمْ ءَامَنُوا۟ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيْكَ وَمَآ أُنزِلَ مِن قَبْلِكَ يُرِيدُونَ أَن يَتَحَاكَمُوٓا۟ إِلَى ٱلطَّـٰغُوتِ وَقَدْ أُمِرُوٓا۟ أَن يَكْفُرُوا۟ بِهِۦ وَيُرِيدُ ٱلشَّيْطَـٰنُ أَن يُضِلَّهُمْ ضَلَـٰلًۢا بَعِيدًۭا
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
إِلَى
[towards]
ٱلَّذِينَ
तरफ़ उनके जो
يَزْعُمُونَ
दावा करते हैं
أَنَّهُمْ
बेशक वो
ءَامَنُوا۟
वो ईमान लाए
بِمَآ
उस पर जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
وَمَآ
और जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
مِن
from
قَبْلِكَ
आप से पहले
يُرِيدُونَ
वो चाहते हैं
أَن
कि
يَتَحَاكَمُوٓا۟
वो फैसला ले जाऐं
إِلَى
to
ٱلطَّـٰغُوتِ
तरफ़ ताग़ूत के
وَقَدْ
हालाँकि तहक़ीक़
أُمِرُوٓا۟
वो हुक्म दिए गए
أَن
कि
يَكْفُرُوا۟
वो कुफ़्र करें
بِهِۦ
उसका
وَيُرِيدُ
और चाहता है
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान
أَن
कि
يُضِلَّهُمْ
वो गुमराह कर दे उन्हें
ضَلَـٰلًۢا
गुमराह करना
بَعِيدًۭا
दूर का
क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा, जो दावा तो करते है कि वे उस चीज़ पर ईमान रखते हैं, जो तुम्हारी ओर उतारी गई है और तुमसे पहले उतारी गई है। और चाहते है कि अपना मामला ताग़ूत के पास ले जाकर फ़ैसला कराएँ, जबकि उन्हें हुक्म दिया गया है कि वे उसका इनकार करें? परन्तु शैतान तो उन्हें भटकाकर बहुत दूर डाल देना चाहता है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) क्या आपने उन मुनाफ़िक़ यहूदियों का विरोधाभास नहीं देखा, जो झूठा दावा करते हैं कि वे उसपर ईमान रखते हैं जो कुछ आप पर अवतरित किया गया है और जो कुछ आपसे पूर्व रसूलों पर अवतिरत किया गया था। परंतु वे अपने विवादों में फैसले के लिए अल्लाह की शरीयत को छोड़कर मानव निर्मित क़ानून के पास जाना पसंद करते हैं। जबकि उन्हें आदेश दिया गया था कि वे उसका इनकार करें। और शैतान तो यह चाहता है कि उन्हें सत्य से इतना दूर कर दे कि वे उसके चलते मार्गदर्शन न पा सकें।
आयत 61
وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ تَعَالَوْا۟ إِلَىٰ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ وَإِلَى ٱلرَّسُولِ رَأَيْتَ ٱلْمُنَـٰفِقِينَ يَصُدُّونَ عَنكَ صُدُودًۭا
وَإِذَا
और जब
قِيلَ
कहा जाता है
لَهُمْ
उन्हें
تَعَالَوْا۟
आओ
إِلَىٰ
to
مَآ
तरफ़ उसके जो
أَنزَلَ
नाज़िल किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
وَإِلَى
and to
ٱلرَّسُولِ
और तरफ़ रसूल के
رَأَيْتَ
आप देखते हैं
ٱلْمُنَـٰفِقِينَ
मुनाफ़िक़ों को
يَصُدُّونَ
वो रुकते हैं
عَنكَ
आप से
صُدُودًۭا
रुक जाना
और जब उनसे कहा जाता है कि आओ उस चीज़ की ओर जो अल्लाह ने उतारी है और आओ रसूल की ओरस तो तुम मुनाफ़िको (कपटाचारियों) को देखते हो कि वे तुमसे कतराकर रह जाते है
तफ़्सीर:
जब इन मुनाफ़िक़ों (पाखंडियों) से कहा जाता है कि अल्लाह ने अपनी किताब में जो फैसला उतारा है, उसकी तरफ़ आओ और रसूल के पास आओ, ताकि वह तुम्हारे झगड़ों में तुम्हारे बीच फ़ैसला कर दें, तो - ऐ रसूल - आप उन्हें देखेंगे कि वे पूर्णतया आपसे विमुख होकर फैसला के लिए आपके अलावा की ओर जाते हैं।
आयत 62
فَكَيْفَ إِذَآ أَصَـٰبَتْهُم مُّصِيبَةٌۢ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ ثُمَّ جَآءُوكَ يَحْلِفُونَ بِٱللَّهِ إِنْ أَرَدْنَآ إِلَّآ إِحْسَـٰنًۭا وَتَوْفِيقًا
فَكَيْفَ
तो क्या होता है
إِذَآ
जब
أَصَـٰبَتْهُم
पहुँचती है उन्हें
مُّصِيبَةٌۢ
कोई मुसीबत
بِمَا
बवजह उसके जो
قَدَّمَتْ
आगे भेजा
أَيْدِيهِمْ
उनके हाथों ने
ثُمَّ
फिर
جَآءُوكَ
वो आ जाते हैं आपके पास
يَحْلِفُونَ
क़समें खाते हैं
بِٱللَّهِ
अल्लाह की
إِنْ
नहीं
أَرَدْنَآ
इरादा किया हमने
إِلَّآ
मगर
إِحْسَـٰنًۭا
एहसान
وَتَوْفِيقًا
और मुवाफ़िक़त का
फिर कैसी बात होगी कि जब उनकी अपनी करतूतों के कारण उनपर बड़ी मुसीबत आ पडेगी। फिर वे तुम्हारे पास अल्लाह की क़समें खाते हुए आते है कि हम तो केवल भलाई और बनाव चाहते थे?
तफ़्सीर:
उस समय मुनाफिक़ों का क्य हाल होता है जब उनके किए हुए गुनाहों के कारण उनपर कोई आपदा आ पड़ती है, फिर - ऐ रसूल - वे आपके पास माफ़ी माँगने के उद्देश्य से आते हैं और अल्लाह की क़समें खाकर कहते हैं कि आपको छोड़कर अन्य के पास फैसला के लिए जाने के पीछे हमारा उद्देश्य केवल भलाई और परस्पर विरोधी पक्षों के बीच मेल कराना था। हालाँकि वे अपने इस दावे में झूठे हैं; क्योंकि भलाई तो लोगों के बीच अल्लाह की शरीयत से फैसला कराने में है।
आयत 63
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ يَعْلَمُ ٱللَّهُ مَا فِى قُلُوبِهِمْ فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ وَعِظْهُمْ وَقُل لَّهُمْ فِىٓ أَنفُسِهِمْ قَوْلًۢا بَلِيغًۭا
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَعْلَمُ
जानता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
مَا
उसको जो
فِى
(is) in
قُلُوبِهِمْ
उनके दिलों में है
فَأَعْرِضْ
पस आप ऐराज़ कीजिए
عَنْهُمْ
उनसे
وَعِظْهُمْ
और नसीहत कीजिए उन्हें
وَقُل
और कह दीजिए
لَّهُمْ
उन्हें
فِىٓ
concerning
أَنفُسِهِمْ
उनके दिलों में
قَوْلًۢا
बात
بَلِيغًۭا
पहुँचने वाली / पुर असर
ये वे लोग है जिनके दिलों की बात अल्लाह भली-भाँति जानता है; तो तुम उन्हें जाने दो और उन्हें समझओ और उनसे उनके विषय में वह बात कहो जो प्रभावकारी हो
तफ़्सीर:
ये वो लोग हैं जिनके दिलों में छिपे निफ़ाक़ (पाखंड) और बुरे आशय को अल्लाह भली-भाँति जानता है। अतः - ऐ पैग़ंबर - उन्हें उनके हाल पर छोड़ दें और उनकी उपेक्षा करें, तथा उन्हें प्रोत्साहित करते हुए और डराते हुए उनके सामने अल्लाह का हुक्म (फैसला) स्पष्ट कर दें और उनसे ऐसी बात कहें जो उनके दिल की गहराइयों में उतर जाए।
आयत 64
وَمَآ أَرْسَلْنَا مِن رَّسُولٍ إِلَّا لِيُطَاعَ بِإِذْنِ ٱللَّهِ ۚ وَلَوْ أَنَّهُمْ إِذ ظَّلَمُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ جَآءُوكَ فَٱسْتَغْفَرُوا۟ ٱللَّهَ وَٱسْتَغْفَرَ لَهُمُ ٱلرَّسُولُ لَوَجَدُوا۟ ٱللَّهَ تَوَّابًۭا رَّحِيمًۭا
وَمَآ
और नहीं
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
مِن
any
رَّسُولٍ
कोई रसूल
إِلَّا
मगर
لِيُطَاعَ
ताकि वो इताअत किया जाए
بِإِذْنِ
by (the) permission
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के इज़्न से
وَلَوْ
और अगर
أَنَّهُمْ
बेशक वो
إِذ
जब
ظَّلَمُوٓا۟
उन्होंने ज़ुल्म किया
أَنفُسَهُمْ
अपने नफ़्सों पर
جَآءُوكَ
वो आ जाते हैं आपके पास
فَٱسْتَغْفَرُوا۟
फिर वो बख़्शिश माँगते
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَٱسْتَغْفَرَ
और बख़्शिश माँगते
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلرَّسُولُ
रसूल
لَوَجَدُوا۟
अलबत्ता वो पाते
ٱللَّهَ
अल्लाह को
تَوَّابًۭا
बहुत तौबा क़ुबूल करने वाला
رَّحِيمًۭا
निहायत रहम करने वाला
हमने जो रसूल भी भेजा, इसलिए भेजा कि अल्लाह की अनुमति से उसकी आज्ञा का पालन किया जाए। और यदि यह उस समय, जबकि इन्होंने स्वयं अपने ऊपर ज़ुल्म किया था, तुम्हारे पास आ जाते और अल्लाह से क्षमा की प्रार्थना करता तो निश्चय ही वे अल्लाह को अत्यन्त क्षमाशील और दयावान पाते
तफ़्सीर:
हमने जो भी रसूल भेजा, उसका उद्देश्य यह था कि वह अल्लाह की इच्छा और तक़दीर से जिस चीज़ का आदेश दें उसमें उनका पालन किया जाए। और यदि वे लोग, जब उन्होंने पाप करके स्वयं पर अत्याचार किया था, अपने गुनाहों को स्वीकारते और पछतावा व पश्चाताप प्रकट करते हुए आपके जीवन में (ऐ रसूल) आपके पास आ जाते, और अल्लाह से माफी माँगते, और आप भी उनके लिए माफ़ी माँगते, तो वे अवश्य अल्लाह को बहुत तौबा क़बूल करने वाला और अपने ऊपर दयालु पाते।
आयत 65
فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَ حَتَّىٰ يُحَكِّمُوكَ فِيمَا شَجَرَ بَيْنَهُمْ ثُمَّ لَا يَجِدُوا۟ فِىٓ أَنفُسِهِمْ حَرَجًۭا مِّمَّا قَضَيْتَ وَيُسَلِّمُوا۟ تَسْلِيمًۭا
فَلَا
पस नहीं
وَرَبِّكَ
क़सम है आपके रब की
لَا
not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो मोमिन हो सकते
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يُحَكِّمُوكَ
वो मुन्सिफ़ बनाऐं आपको
فِيمَا
उस मामले में जो
شَجَرَ
इख़्तिलाफ़ हुआ
بَيْنَهُمْ
दर्मियान उनके
ثُمَّ
फिर
لَا
not
يَجِدُوا۟
ना वो पाऐं
فِىٓ
in
أَنفُسِهِمْ
अपने नफ़्सों में
حَرَجًۭا
कोई तंगी
مِّمَّا
उससे जो
قَضَيْتَ
फैसला करें आप
وَيُسَلِّمُوا۟
और वो तसलीम कर लें
تَسْلِيمًۭا
पूरी तरह तसलीम करना
तो तुम्हें तुम्हारे रब की कसम! ये ईमानवाले नहीं हो सकते जब तक कि अपने आपस के झगड़ो में ये तुमसे फ़ैसला न कराएँ। फिर जो फ़ैसला तुम कर दो, उसपर ये अपने दिलों में कोई तंगी न पाएँ और पूरी तरह मान ले
तफ़्सीर:
अतः मामला ऐसा नहीं है जैसा कि ये पाखंडी लोग दावा करते हैं। फिर अल्लाह ने अपने अस्तित्व की क़सम खाकर फरमाया कि वे सच्चे मोमिन नहीं हो सकते, जब तक कि वे अपने बीच उत्पन्न होने वाले समस्त मतभेदों में रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जीवन काल में रसूल के पास और आपकी मृत्यु के बाद आपकी शरीयत की ओर निर्णय के लिए न जाएँ। फिर वे रसूल के फैसले से संतुष्ट हो जाएँ और उनके दिलों में आपके निर्णय के संबंध में कोई तंगी और संदेह न हो और परोक्ष एवं प्रत्यक्ष रूप से उसे पूरी तरह से स्वीकार कर लें।
आयत 66
وَلَوْ أَنَّا كَتَبْنَا عَلَيْهِمْ أَنِ ٱقْتُلُوٓا۟ أَنفُسَكُمْ أَوِ ٱخْرُجُوا۟ مِن دِيَـٰرِكُم مَّا فَعَلُوهُ إِلَّا قَلِيلٌۭ مِّنْهُمْ ۖ وَلَوْ أَنَّهُمْ فَعَلُوا۟ مَا يُوعَظُونَ بِهِۦ لَكَانَ خَيْرًۭا لَّهُمْ وَأَشَدَّ تَثْبِيتًۭا
وَلَوْ
और अगर
أَنَّا
बेशक हम
كَتَبْنَا
लिख देते हम
عَلَيْهِمْ
उन पर
أَنِ
कि
ٱقْتُلُوٓا۟
क़त्ल करो
أَنفُسَكُمْ
अपने नफ़्सों को
أَوِ
या
ٱخْرُجُوا۟
निकल जाओ
مِن
from
دِيَـٰرِكُم
अपने घरों से
مَّا
ना
فَعَلُوهُ
वो करते उसे
إِلَّا
मगर
قَلِيلٌۭ
थोड़े
مِّنْهُمْ ۖ
उनमें से
وَلَوْ
और अगर
أَنَّهُمْ
बेशक वो
فَعَلُوا۟
करते
مَا
जो
يُوعَظُونَ
वो नसीहत किए जाते हैं
بِهِۦ
जिसकी
لَكَانَ
अलबत्ता होता
خَيْرًۭا
बेहतर
لَّهُمْ
उनके लिए
وَأَشَدَّ
और ज़्यादा शदीद
تَثْبِيتًۭا
साबित क़दमी में
और यदि कहीं हमने उन्हें आदेश दिया होता कि "अपनों को क़त्ल करो या अपने घरों से निकल जाओ।" तो उनमें से थोड़े ही ऐसा करते। हालाँकि जो नसीहत उन्हें दी जाती है, अगर वे उसे व्यवहार में लाते तो यह बात उनके लिए अच्छी होती और ज़्यादा ज़माव पैदा करनेवाली होती
तफ़्सीर:
यदि हमने उनपर एक-दूसरे को क़त्ल करना या अपने घरों से निकल जाना अनिवार्य किया होता, तो उनमें से थोड़े लोगों के सिवा कोई हमारे आदेश को नहीं मानता। अतः उन्हें अल्लाह का धन्यवाद करना चाहिए कि उसने उन्हें ऐसे कार्य के लिए बाध्य नहीं किया, जो उनके लिए कठिन हो। और यदि उन्होंने अल्लाह की आज्ञाकारिता की होती जिसकी उन्हें नसीहत की जाती है, तो यह अवहेलना करने से बेहतर होता और उनके ईमान के लिए अधिक दृढ़ता का कारण होता। तथा हम उन्हें अपनी ओर से बड़ा बदला देते और उन्हें अल्लाह एवं उसकी जन्नत तक ले जाने वाले रास्ते पर चलने का सामर्थ्य प्रदान करते।
आयत 67
وَإِذًۭا لَّـَٔاتَيْنَـٰهُم مِّن لَّدُنَّآ أَجْرًا عَظِيمًۭا
وَإِذًۭا
और तब
لَّـَٔاتَيْنَـٰهُم
अलबत्ता देते हम उन्हें
مِّن
from
لَّدُنَّآ
अपने पास से
أَجْرًا
अजर
عَظِيمًۭا
बहुत बड़ा
और उस समय हम उन्हें अपनी ओर से निश्चय ही बड़ा बदला प्रदान करते
तफ़्सीर:
यदि हमने उनपर एक-दूसरे को क़त्ल करना या अपने घरों से निकल जाना अनिवार्य किया होता, तो उनमें से थोड़े लोगों के सिवा कोई हमारे आदेश को नहीं मानता। अतः उन्हें अल्लाह का धन्यवाद करना चाहिए कि उसने उन्हें ऐसे कार्य के लिए बाध्य नहीं किया, जो उनके लिए कठिन हो। और यदि उन्होंने अल्लाह की आज्ञाकारिता की होती जिसकी उन्हें नसीहत की जाती है, तो यह अवहेलना करने से बेहतर होता और उनके ईमान के लिए अधिक दृढ़ता का कारण होता। तथा हम उन्हें अपनी ओर से बड़ा बदला देते और उन्हें अल्लाह एवं उसकी जन्नत तक ले जाने वाले रास्ते पर चलने का सामर्थ्य प्रदान करते।
आयत 68
وَلَهَدَيْنَـٰهُمْ صِرَٰطًۭا مُّسْتَقِيمًۭا
وَلَهَدَيْنَـٰهُمْ
और अलबत्ता हिदायत देते हम उन्हें
صِرَٰطًۭا
रास्ते
مُّسْتَقِيمًۭا
सीधे की
और उन्हें सीधे मार्ग पर लगा देते
तफ़्सीर:
यदि हमने उनपर एक-दूसरे को क़त्ल करना या अपने घरों से निकल जाना अनिवार्य किया होता, तो उनमें से थोड़े लोगों के सिवा कोई हमारे आदेश को नहीं मानता। अतः उन्हें अल्लाह का धन्यवाद करना चाहिए कि उसने उन्हें ऐसे कार्य के लिए बाध्य नहीं किया, जो उनके लिए कठिन हो। और यदि उन्होंने अल्लाह की आज्ञाकारिता की होती जिसकी उन्हें नसीहत की जाती है, तो यह अवहेलना करने से बेहतर होता और उनके ईमान के लिए अधिक दृढ़ता का कारण होता। तथा हम उन्हें अपनी ओर से बड़ा बदला देते और उन्हें अल्लाह एवं उसकी जन्नत तक ले जाने वाले रास्ते पर चलने का सामर्थ्य प्रदान करते।
आयत 69
وَمَن يُطِعِ ٱللَّهَ وَٱلرَّسُولَ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ مَعَ ٱلَّذِينَ أَنْعَمَ ٱللَّهُ عَلَيْهِم مِّنَ ٱلنَّبِيِّـۧنَ وَٱلصِّدِّيقِينَ وَٱلشُّهَدَآءِ وَٱلصَّـٰلِحِينَ ۚ وَحَسُنَ أُو۟لَـٰٓئِكَ رَفِيقًۭا
وَمَن
और जो कोई
يُطِعِ
इताअत करेगा
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَٱلرَّسُولَ
और रसूल की
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग
مَعَ
साथ होंगे
ٱلَّذِينَ
उन लोगों के
أَنْعَمَ
इनाम किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَيْهِم
जिन पर
مِّنَ
of
ٱلنَّبِيِّـۧنَ
नबियों में से
وَٱلصِّدِّيقِينَ
और सिद्दीक़ीन
وَٱلشُّهَدَآءِ
और शोहदा
وَٱلصَّـٰلِحِينَ ۚ
और सालिहीन में से
وَحَسُنَ
और कितने अच्छे हैं
أُو۟لَـٰٓئِكَ
ये लोग
رَفِيقًۭا
बतौर साथी के
जो अल्लाह और रसूल की आज्ञा का पालन करता है, तो ऐसे ही लोग उन लोगों के साथ है जिनपर अल्लाह की कृपा स्पष्ट रही है - वे नबी, सिद्दीक़, शहीद और अच्छे लोग है। और वे कितने अच्छे साथी है
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करेगा, वह उन लोगों के साथ होगा, जिन्हें अल्लाह ने जन्नत में प्रवेश के पुरस्कार से सम्मानित किया है, अर्थात नबी, और सिद्दीक़ (सत्यवादी) लोग जिन्होंने रसूलों के लाए हुए धर्म को पूरी तरह से सत्य जाना और उसके अनुसार कार्य किया, और शहीद लोग जो अल्लाह के रास्ते में क़त्ल किए गए, और सदाचारी लोग जिनके परोक्ष एवं प्रत्यक्ष विशुद्ध हैं, तो परिणाम स्वरूप उनके कार्य भी विशुद्ध हैं। ये लोग जन्नत के क्या ही अच्छे साथी हैं!
आयत 70
ذَٰلِكَ ٱلْفَضْلُ مِنَ ٱللَّهِ ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ عَلِيمًۭا
ذَٰلِكَ
ये
ٱلْفَضْلُ
फ़ज़ल है
مِنَ
of
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह की तरफ़ से
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِٱللَّهِ
अल्लाह
عَلِيمًۭا
बहुत इल्म वाला
यह अल्लाह का उदार अनुग्रह है। और काफ़ी है अल्लाह, इस हाल में कि वह भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
यह उक्त सवाब अल्लाह की ओर से उसके बंदों पर अनुग्रह एवं कृपा है और अल्लाह काफ़ी है उनकी स्थितियों को जानने वाला, और वह हर एक को उसके कार्य का बदला देगा।
आयत 71
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ خُذُوا۟ حِذْرَكُمْ فَٱنفِرُوا۟ ثُبَاتٍ أَوِ ٱنفِرُوا۟ جَمِيعًۭا
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगों जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
خُذُوا۟
पकड़ो
حِذْرَكُمْ
बचाव (हथियार) अपना
فَٱنفِرُوا۟
फिर निकलो
ثُبَاتٍ
छोटे दस्तों में
أَوِ
या
ٱنفِرُوا۟
निकलो
جَمِيعًۭا
सब इकट्ठे
ऐ ईमान लानेवालो! अपने बचाव की साम्रगी (हथियार आदि) सँभालो। फिर या तो अलग-अलग टुकड़ियों में निकलो या इकट्ठे होकर निकलो
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! अपने दुश्मनों से, उनसे जंग करने पर सहायक कारणों को अपनाकर, सावधान रहो। अतः उनकी ओर एक के बाद एक गुट बनाकर निकलो, या सब के सब इकट्ठे होकर निकल पड़ो। यह सब इस तथ्य के अधीन है कि किस चीज़ में तुम्हारा हित और किसी चीज़ में तुम्हारे दुश्मनों का पराजय है।
आयत 72
وَإِنَّ مِنكُمْ لَمَن لَّيُبَطِّئَنَّ فَإِنْ أَصَـٰبَتْكُم مُّصِيبَةٌۭ قَالَ قَدْ أَنْعَمَ ٱللَّهُ عَلَىَّ إِذْ لَمْ أَكُن مَّعَهُمْ شَهِيدًۭا
وَإِنَّ
और बेशक
مِنكُمْ
तुम में से
لَمَن
अलबत्ता वो है जो
لَّيُبَطِّئَنَّ
ज़रूर देर लगाता है
فَإِنْ
फिर अगर
أَصَـٰبَتْكُم
पहुँचे तुम्हें
مُّصِيبَةٌۭ
कोई मुसीबत
قَالَ
वो कहता है
قَدْ
तहक़ीक़
أَنْعَمَ
इनाम किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَىَّ
मुझ पर
إِذْ
जब कि
لَمْ
ना
أَكُن
था मैं
مَّعَهُمْ
साथ उनके
شَهِيدًۭا
हाज़िर / मौजूद
तुमसे से कोई ऐसा भी है जो ढीला पड़ जाता है, फिर यदि तुमपर कोई मुसीबत आए तो कहने लगता है कि अल्लाह ने मुझपर कृपा की कि मैं इन लोगों के साथ न गया
तफ़्सीर:
(ऐ मुसलमानो!) तुम्हारे अंदर कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो अपनी कायरता के कारण तुम्हारे दुश्मनों से लड़ाई के लिए निकलने से पीछे रहते हैं और दूसरों को भी पीछे रखते (रोकते) हैं। ये मुनाफ़िक़ और कमज़ोर ईमान वाले लोग हैं। फिर यदि तुम शहीद हो जाओ या तुम्हें पराजय का सामना करना पड़े, तो उनमें से एक अपनी सुरक्षा पर हर्षित होकर कहता है : अल्लाह ने मुझपर कृपा की है, इसलिए मैं उनके साथ लड़ाई में शामिल नहीं हुआ, नहीं तो मेरी भी वही हालत होती, जो इनकी हुई।
आयत 73
وَلَئِنْ أَصَـٰبَكُمْ فَضْلٌۭ مِّنَ ٱللَّهِ لَيَقُولَنَّ كَأَن لَّمْ تَكُنۢ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُۥ مَوَدَّةٌۭ يَـٰلَيْتَنِى كُنتُ مَعَهُمْ فَأَفُوزَ فَوْزًا عَظِيمًۭا
وَلَئِنْ
और अलबत्ता अगर
أَصَـٰبَكُمْ
पहुँचे तुम्हें
فَضْلٌۭ
कोई फ़ज़ल
مِّنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
لَيَقُولَنَّ
अलबत्ता वो ज़रूर कहेगा
كَأَن
गोया कि
لَّمْ
ना
تَكُنۢ
थी
بَيْنَكُمْ
दर्मियान तुम्हारे
وَبَيْنَهُۥ
और दर्मियान उसके
مَوَدَّةٌۭ
कोई मोहब्बत
يَـٰلَيْتَنِى
हाय अफ़सोस मुझ पर
كُنتُ
होता मैं
مَعَهُمْ
साथ उनके
فَأَفُوزَ
तो मैं कामयाबी पाता
فَوْزًا
कामयाबी
عَظِيمًۭا
बहुत बड़ी
परन्तु यदि अल्लाह की ओर से तुमपर कोई उदार अनुग्रह हो तो वह इस प्रकार से जैसे तुम्हारे और उनके बीच प्रेम का कोई सम्बन्ध ही नहीं, कहता है, "क्या ही अच्छा होता कि मैं भी उनके साथ होता, तो बड़ी सफलता प्राप्त करता।"
तफ़्सीर:
और यदि तुम्हें - ऐ मुसलमानो! - विजय अथवा माले ग़नीमत के रूप में अल्लाह का अनुग्रह प्राप्त हो जाए, तो जिहाद से पीछे रहने वाला यही व्यक्ति अवश्य इस तरह कहेगा मानो वह तुममें से है ही नहीं और तुम्हारे और उसके बीच कोई प्यार और साहचर्य नहीं था कि काश! मैं भी उनके साथ इस युद्ध में शामिल होता, तो उनकी तरह मैं भी बड़ी सफलता प्राप्त कर लेता!
आयत 74
۞ فَلْيُقَـٰتِلْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ٱلَّذِينَ يَشْرُونَ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا بِٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ وَمَن يُقَـٰتِلْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ فَيُقْتَلْ أَوْ يَغْلِبْ فَسَوْفَ نُؤْتِيهِ أَجْرًا عَظِيمًۭا
۞ فَلْيُقَـٰتِلْ
पस चाहिए कि जंग करें
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَشْرُونَ
बेच देते हैं
ٱلْحَيَوٰةَ
ज़िन्दगी
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
بِٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ
बदले आख़िरत के
وَمَن
और जो कोई
يُقَـٰتِلْ
जंग करे
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
فَيُقْتَلْ
फिर वो क़त्ल कर दिया जाए
أَوْ
या
يَغْلِبْ
वो ग़ालिब आ जाए
فَسَوْفَ
पस अनक़रीब
نُؤْتِيهِ
हम देंगे उसे
أَجْرًا
अजर
عَظِيمًۭا
बहुत बड़ा
तो जो लोग आख़िरत (परलोक) के बदले सांसारिक जीवन का सौदा करें, तो उन्हें चाहिए कि अल्लाह के मार्ग में लड़े। जो अल्लाह के मार्ग में लड़ेगी, चाहे वह मारा जाए या विजयी रहे, उसे हम शीघ्र ही बड़ा बदला प्रदान करेंगे
तफ़्सीर:
अतः सच्चे ईमान वाले, जो सांसारिक जीवन को उसके प्रति अरुचि प्रकट करते हुए, आख़िरत के बदले उसकी इच्छा रखते हुए बेच देते हैं, उन्हें चाहिए कि अल्लाह के रास्ते में युद्ध करें ताकि अल्लाह का धर्म सर्वोच्च हो। और जो अल्लाह के धर्म को सर्वोच्च करने के लिए अल्लाह के रास्ते में युद्ध करे, फिर वह शहीद हो जाए या दुश्मन पर विजय प्राप्त कर ले, तो अल्लाह उसे महान प्रतिफल प्रदान करेगा और वह जन्नत और अल्लाह की प्रसन्नता है।
आयत 75
وَمَا لَكُمْ لَا تُقَـٰتِلُونَ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَٱلْمُسْتَضْعَفِينَ مِنَ ٱلرِّجَالِ وَٱلنِّسَآءِ وَٱلْوِلْدَٰنِ ٱلَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَآ أَخْرِجْنَا مِنْ هَـٰذِهِ ٱلْقَرْيَةِ ٱلظَّالِمِ أَهْلُهَا وَٱجْعَل لَّنَا مِن لَّدُنكَ وَلِيًّۭا وَٱجْعَل لَّنَا مِن لَّدُنكَ نَصِيرًا
وَمَا
और क्या है
لَكُمْ
तुम्हें
لَا
(that) not
تُقَـٰتِلُونَ
नहीं तुम जंग करते
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
وَٱلْمُسْتَضْعَفِينَ
हालाँकि जो कमज़ोर हैं
مِنَ
among
ٱلرِّجَالِ
मर्दों में से
وَٱلنِّسَآءِ
और औरतों
وَٱلْوِلْدَٰنِ
और बच्चों (में से)
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَقُولُونَ
कहते हैं
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
أَخْرِجْنَا
निकाल हमें
مِنْ
of
هَـٰذِهِ
this
ٱلْقَرْيَةِ
इस बस्ती से
ٱلظَّالِمِ
ज़ालिम हैं
أَهْلُهَا
रहने वाले इसके
وَٱجْعَل
और बना दे
لَّنَا
हमारे लिए
مِن
from
لَّدُنكَ
अपने पास से
وَلِيًّۭا
कोई हिमायती
وَٱجْعَل
और बना दे
لَّنَا
हमारे लिए
مِن
from
لَّدُنكَ
अपने पास से
نَصِيرًا
कोई मददगार
तुम्हें क्या हुआ है कि अल्लाह के मार्ग में और उन कमज़ोर पुरुषों, औरतों और बच्चों के लिए युद्ध न करो, जो प्रार्थनाएँ करते है कि "हमारे रब! तू हमें इस बस्ती से निकाल, जिसके लोग अत्याचारी है। और हमारे लिए अपनी ओर से तू कोई समर्थक नियुक्त कर और हमारे लिए अपनी ओर से तू कोई सहायक नियुक्त कर।"
तफ़्सीर:
- ऐ मोमिनो! - तुम्हें अल्लाह के रास्ते में, उसके धर्म को ऊँचा करने और बेसहारा पुरुषों, स्त्रियों तथा बच्चों को मुक्ति दिलाने के लिए जिहाद करने से कौन-सी चीज़ रोकती है, जो बेबसी के आलम में अल्लाह से दुआ कर रहें हैं कि ऐ हमारे पालनहार! हमें मक्का से निकाल दे, क्योंकि उसके वासी अल्लाह का साझी बनाकर और उसके बंदों को उत्पीड़ित करके अत्याचार करते हैं। तथा हमारे लिए अपनी ओर से कोई संरक्षक बना दे, जो हमारी देखभाल और संरक्षण करे और ऐसा सहायक बना दे, जो हमसे हर प्रकार की हानि को दूर कर दे।
आयत 76
ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ يُقَـٰتِلُونَ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ۖ وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ يُقَـٰتِلُونَ فِى سَبِيلِ ٱلطَّـٰغُوتِ فَقَـٰتِلُوٓا۟ أَوْلِيَآءَ ٱلشَّيْطَـٰنِ ۖ إِنَّ كَيْدَ ٱلشَّيْطَـٰنِ كَانَ ضَعِيفًا
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
يُقَـٰتِلُونَ
वो जंग करते हैं
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के रास्ते में
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
يُقَـٰتِلُونَ
वो जंग करते हैं
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱلطَّـٰغُوتِ
ताग़ूत के रास्ते में
فَقَـٰتِلُوٓا۟
पस जंग करो
أَوْلِيَآءَ
दोस्तों से
ٱلشَّيْطَـٰنِ ۖ
शैतान के
إِنَّ
बेशक
كَيْدَ
चाल
ٱلشَّيْطَـٰنِ
शैतान की
كَانَ
है
ضَعِيفًا
बहुत कमज़ोर
ईमान लानेवाले तो अल्लाह के मार्ग में युद्ध करते है और अधर्मी लोग ताग़ूत (बढ़े हुए सरकश) के मार्ग में युद्ध करते है। अतः तुम शैतान के मित्रों से लड़ो। निश्चय ही, शैतान की चाल बहुत कमज़ोर होती है
तफ़्सीर:
सच्चे मोमिन, अल्लाह के रास्ते में उसके धर्म को सर्वोच्च करने के लिए लड़ते हैं, जबकि काफिर अपने असत्य पूज्यों (देवताओं) की खातिर लड़ते हैं। अतः तुम शैतान के सहायकों से युद्ध करो, क्योंकि यदि तुम उनसे युद्ध करोगे, तो उनपर विजय प्राप्त कर लोगे। क्योंकि शैतान की चाल कमज़ोर होती है। वह सर्वशक्तिमान अल्लाह पर भरोसा रखने वालों को नुक़सान नहीं पहुँचा सकता।
आयत 77
أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ قِيلَ لَهُمْ كُفُّوٓا۟ أَيْدِيَكُمْ وَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُوا۟ ٱلزَّكَوٰةَ فَلَمَّا كُتِبَ عَلَيْهِمُ ٱلْقِتَالُ إِذَا فَرِيقٌۭ مِّنْهُمْ يَخْشَوْنَ ٱلنَّاسَ كَخَشْيَةِ ٱللَّهِ أَوْ أَشَدَّ خَشْيَةًۭ ۚ وَقَالُوا۟ رَبَّنَا لِمَ كَتَبْتَ عَلَيْنَا ٱلْقِتَالَ لَوْلَآ أَخَّرْتَنَآ إِلَىٰٓ أَجَلٍۢ قَرِيبٍۢ ۗ قُلْ مَتَـٰعُ ٱلدُّنْيَا قَلِيلٌۭ وَٱلْـَٔاخِرَةُ خَيْرٌۭ لِّمَنِ ٱتَّقَىٰ وَلَا تُظْلَمُونَ فَتِيلًا
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
إِلَى
[towards]
ٱلَّذِينَ
तरफ़ उनके
قِيلَ
कहा गया
لَهُمْ
जिन्हें
كُفُّوٓا۟
रोके रखो
أَيْدِيَكُمْ
अपने हाथों को
وَأَقِيمُوا۟
और क़ायम करो
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَءَاتُوا۟
और अदा करो
ٱلزَّكَوٰةَ
ज़कात
فَلَمَّا
तो जब
كُتِبَ
फ़र्ज़ किया गया
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلْقِتَالُ
जंग करना
إِذَا
तब
فَرِيقٌۭ
एक गिरोह (के लोग)
مِّنْهُمْ
उनमें से
يَخْشَوْنَ
वो डर रहे थे
ٱلنَّاسَ
लोगों से
كَخَشْيَةِ
जैसा डरना
ٱللَّهِ
अल्लाह से
أَوْ
या
أَشَدَّ
ज़्यादा शदीद
خَشْيَةًۭ ۚ
डरना
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
لِمَ
क्यों
كَتَبْتَ
फ़र्ज़ किया तूने
عَلَيْنَا
हम पर
ٱلْقِتَالَ
जंग करना
لَوْلَآ
क्यों ना
أَخَّرْتَنَآ
तूने मोहलत दी हमें
إِلَىٰٓ
to
أَجَلٍۢ
एक मुद्दत तक
قَرِيبٍۢ ۗ
क़रीब की
قُلْ
कह दीजिए
مَتَـٰعُ
फ़ायदा
ٱلدُّنْيَا
दुनिया का
قَلِيلٌۭ
बहुत थोड़ा है
وَٱلْـَٔاخِرَةُ
और आख़िरत
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لِّمَنِ
उसके लिए जो
ٱتَّقَىٰ
तक़वा करे
وَلَا
और ना
تُظْلَمُونَ
तुम ज़ुल्म किए जाओगे
فَتِيلًا
धागे बराबर
क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जिनसे कहा गया था कि अपने हाथ रोके रखो और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात दो? फिर जब उन्हें युद्ध का आदेश दिया गया तो क्या देखते है कि उनमें से कुछ लोगों का हाल यह है कि वे लोगों से ऐसा डरने लगे जैसे अल्लाह का डर हो या यह डर उससे भी बढ़कर हो। कहने लगे, "हमारे रब! तूने हमपर युद्ध क्यों अनिवार्य कर दिया? क्यों न थोड़ी मुहलत हमें और दी?" कह दो, "दुनिया की पूँजी बहुत थोड़ी है, जबकि आख़िरत उस व्यक्ति के अधिक अच्छी है जो अल्लाह का डर रखता हो और तुम्हारे साथ तनिक भी अन्याय न किया जाएगा।
तफ़्सीर:
क्या (ऐ रसलू!) आप अपने उन साथियों के हाल से अवगत नहीं हैं, जिन्होंने माँग की कि उनपर जिहाद फ़र्ज़ (अनिवार्य) कर दिया जाए, तो उनसे कहा गया : अपने हाथों को लड़ाई से रोके रखो, नमाज़ क़ायम करो और ज़कात देते रहो। (और यह जिहाद के अनिवार्य होने से पहले की बात है) फिर जब वे मदीना हिजरत कर गए, और इस्लाम को मज़बूती प्राप्त हो गई और जिहाद फ़र्ज़ कर दिया गया; तो उनमें से कुछ लोगों को यह आदेश बड़ा कठिन मालूम हुआ और वे लोगों से ऐसे डरने लगे, जैसे अल्लाह से डरते हैं अथवा उससे भी अधिक। और कहने लगे : ऐ हमारे पालनहार! हमपर जिहाद क्यों अनिवार्य कर दिया? इसे कुछ दिनों के लिए विलंब क्यों नहीं कर दिया कि हम दुनिया का कुछ फ़ायदा उठा लेते। (ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : दुनिया का सामान (आनंद) चाहे जितना प्राप्त हो जाए, थोड़ा और नश्वर है, जबकि आख़िरत अल्लाह से डरने वालों के लिए बेहतर है, क्योंकि उसकी नेमतें सदा बाक़ी रहेंगी। और तुम्हारे अच्छे कामों में किसी भी तरह की कमी नहीं की जाएगी, चाहे वह उस धागे के बराबर ही क्यों न हो जो खजूर की गुठली में होता है।
आयत 78
أَيْنَمَا تَكُونُوا۟ يُدْرِككُّمُ ٱلْمَوْتُ وَلَوْ كُنتُمْ فِى بُرُوجٍۢ مُّشَيَّدَةٍۢ ۗ وَإِن تُصِبْهُمْ حَسَنَةٌۭ يَقُولُوا۟ هَـٰذِهِۦ مِنْ عِندِ ٱللَّهِ ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌۭ يَقُولُوا۟ هَـٰذِهِۦ مِنْ عِندِكَ ۚ قُلْ كُلٌّۭ مِّنْ عِندِ ٱللَّهِ ۖ فَمَالِ هَـٰٓؤُلَآءِ ٱلْقَوْمِ لَا يَكَادُونَ يَفْقَهُونَ حَدِيثًۭا
أَيْنَمَا
जहाँ कहीं
تَكُونُوا۟
तुम होगे
يُدْرِككُّمُ
पा लेगी तुम्हें
ٱلْمَوْتُ
मौत
وَلَوْ
और अगरचे
كُنتُمْ
हो तुम
فِى
in
بُرُوجٍۢ
क़िलों में
مُّشَيَّدَةٍۢ ۗ
मज़बूत
وَإِن
और अगर
تُصِبْهُمْ
पहुँचती है उन्हें
حَسَنَةٌۭ
कोई भलाई
يَقُولُوا۟
वो कहते हैं
هَـٰذِهِۦ
ये
مِنْ
(is)
عِندِ
from
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह की तरफ़ से है
وَإِن
और अगर
تُصِبْهُمْ
पहुँचती है उन्हें
سَيِّئَةٌۭ
कोई बुराई
يَقُولُوا۟
वो कहते हैं
هَـٰذِهِۦ
ये
مِنْ
(is)
عِندِكَ ۚ
आपकी तरफ़ से है
قُلْ
कह दीजिए
كُلٌّۭ
सब कुछ
مِّنْ
(is)
عِندِ
from
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह की तरफ़ से है
فَمَالِ
तो क्या है वास्ते
هَـٰٓؤُلَآءِ
उस
ٱلْقَوْمِ
क़ौम के
لَا
not
يَكَادُونَ
नहीं वो क़रीब होते
يَفْقَهُونَ
कि वो समझें
حَدِيثًۭا
बात को
"तुम जहाँ कहीं भी होंगे, मृत्यु तो तुम्हें आकर रहेगी; चाहे तुम मज़बूत बुर्जों (क़िलों) में ही (क्यों न) हो।" यदि उन्हें कोई अच्छी हालत पेश आती है तो कहते है, "यह तो अल्लाह के पास से है।" परन्तु यदि उन्हें कोई बुरी हालत पेश आती है तो कहते है, "यह तुम्हारे कारण है।" कह दो, "हरेक चीज़ अल्लाह के पास से है।" आख़िर इन लोगों को क्या हो गया कि ये ऐसे नहीं लगते कि कोई बात समझ सकें?
तफ़्सीर:
तुम जहाँ कहीं भी हो, तुम्हारा समय आने पर मृत्यु तुमको पा लेगी, भले ही तुम युद्ध के मैदान से दूर अभेद्य महलों में हो। इन मुनाफ़िक़ों (पाखंडियों) का हाल यह है कि यदि इन्हें संतान और ढेर सारी आजीविका जैसी कोई खुशी की चीज़ मिलती है, तो कहते हैं कि यह अल्लाह की ओर से है। लेकिन यदि इन्हें संतान या आजीविका में कठोर स्थिति का सामना होता है, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अपशकुन लेते हैं और कहते हैं कि यह बुराई आपके कारण है। (ऐ रसूल!) इनका खंडन करते हुए कह दें : भलाइयाँ और बुराइयाँ, सब अल्लाह के फ़ैसले और उसकी तक़दीर के अधीन हैं। तो इस तरह की बात कहने वालों को क्या हो गया है कि वे समझ ही नहीं पा रहे हैं कि आप उनसे क्या कह रहे हैं?!
आयत 79
مَّآ أَصَابَكَ مِنْ حَسَنَةٍۢ فَمِنَ ٱللَّهِ ۖ وَمَآ أَصَابَكَ مِن سَيِّئَةٍۢ فَمِن نَّفْسِكَ ۚ وَأَرْسَلْنَـٰكَ لِلنَّاسِ رَسُولًۭا ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ شَهِيدًۭا
مَّآ
जो भी
أَصَابَكَ
पहुँचती है तुझको
مِنْ
of
حَسَنَةٍۢ
कोई भलाई
فَمِنَ
(is) from
ٱللَّهِ ۖ
तो अल्लाह की तरफ़ से है
وَمَآ
और जो भी
أَصَابَكَ
पहुँचती है तुझको
مِن
of
سَيِّئَةٍۢ
कोई बुराई
فَمِن
(is) from
نَّفْسِكَ ۚ
तो तुम्हारे नफ़्स की तरफ़ से है
وَأَرْسَلْنَـٰكَ
और भेजा हमने आपको
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
رَسُولًۭا ۚ
रसूल बनाकर
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِٱللَّهِ
अल्लाह
شَهِيدًۭا
गवाह
तुम्हें जो भी भलाई प्राप्त" होती है, वह अल्लाह को ओर से है और जो बुरी हालत तुम्हें पेश आ जाती है तो वह तुम्हारे अपने ही कारण पेश आती है। हमने तुम्हें लोगों के लिए रसूल बनाकर भेजा है और (इसपर) अल्लाह का गवाह होना काफ़ी है
तफ़्सीर:
(ऐ आदम के बेटो!) तुझे जो भी खुशी की चीज़ें जैसे आजीविका और संतान आदि प्राप्त होती हैं, वे सब अल्लाह की ओर से हैं, जिनके द्वारा अल्लाह ने तुझ पर अनुग्रह किया है। तथा तेरी रोज़ी और संतान के बारे में तुझे जो परेशानी आती है, वह सब तेरी तरफ से तेरे द्वारा किए गए पापों के कारण है। और - ऐ नबी! - हमने आपको समस्त लोगो के लिए अल्लाह का रसूल बनाकर भेजा है, ताकि आप उन्हें अपने पालनहार का संदेश पहुँचाएँ। तथा आप अल्लाह की तरफ से लोगों को जो कुछ पहुँचा रहे हैं, उसकी सत्यता पर अल्लाह साक्षी के तौर पर काफ़ी है उन सबूतों और प्रमाणों के साथ जो उसने आपको प्रदान किए हैं।
आयत 80
مَّن يُطِعِ ٱلرَّسُولَ فَقَدْ أَطَاعَ ٱللَّهَ ۖ وَمَن تَوَلَّىٰ فَمَآ أَرْسَلْنَـٰكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًۭا
مَّن
जिसने
يُطِعِ
इताअत की
ٱلرَّسُولَ
रसूल की
فَقَدْ
पस तहक़ीक़
أَطَاعَ
उसने इताअत की
ٱللَّهَ ۖ
अल्लाह की
وَمَن
और जिसने
تَوَلَّىٰ
मुँह मोड़ा
فَمَآ
तो नहीं
أَرْسَلْنَـٰكَ
भेजा हमने आपको
عَلَيْهِمْ
उन पर
حَفِيظًۭا
निगरान
जिसने रसूल की आज्ञा का पालन किया, उसने अल्लाह की आज्ञा का पालन किया और जिसने मुँह मोड़ा तो हमने तुम्हें ऐसे लोगों पर कोई रखवाला बनाकर तो नहीं भेजा है
तफ़्सीर:
जिसने रसूल का, उनके आदेशों का अनुपालन कर और उनकी मना की हुई चीज़ों से बचकर, आज्ञापालन किया, तो उसने अल्लाह के आदेश का पालन किया और जिसने - ऐ रसूल! - आपके आज्ञापालन से मुँह फेरा, तो आप उसके लिए दुखी न होंं। क्योंकि हमने आपको उसके ऊपर संरक्षक बनाकर नहीं भेजा है कि आप उसके कार्यों को संरक्षित करें। बल्कि उसके कार्यों को गिनकर रखने और उसका हिसाब लेने का काम हमारा है।
आयत 81
وَيَقُولُونَ طَاعَةٌۭ فَإِذَا بَرَزُوا۟ مِنْ عِندِكَ بَيَّتَ طَآئِفَةٌۭ مِّنْهُمْ غَيْرَ ٱلَّذِى تَقُولُ ۖ وَٱللَّهُ يَكْتُبُ مَا يُبَيِّتُونَ ۖ فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ وَتَوَكَّلْ عَلَى ٱللَّهِ ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ وَكِيلًا
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
طَاعَةٌۭ
इताअत (करेंगे)
فَإِذَا
फिर जब
بَرَزُوا۟
वो निकलते हैं
مِنْ
from
عِندِكَ
आपके पास से
بَيَّتَ
रात को मशवरे करता है
طَآئِفَةٌۭ
एक गिरोह
مِّنْهُمْ
उनमें से
غَيْرَ
अलावा
ٱلَّذِى
उसके जो
تَقُولُ ۖ
आप कहते हैं
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَكْتُبُ
लिख रहा है
مَا
जो
يُبَيِّتُونَ ۖ
वो रात को मशवरे करते हैं
فَأَعْرِضْ
पस ऐराज़ कीजिए
عَنْهُمْ
उनसे
وَتَوَكَّلْ
और भरोसा कीजिए
عَلَى
in
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह पर
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِٱللَّهِ
अल्लाह
وَكِيلًا
कारसाज़
और वे दावा तो आज्ञापालन का करते है, परन्तु जब तुम्हारे पास से हटते है तो उनमें एक गिरोह अपने कथन के विपरीत रात में षड्यंत्र करता है । जो कुछ वे षड्यंत्र करते है, अल्लाह उसे लिख रहा है। तो तुम उनसे रुख़ फेर लो और अल्लाह पर भरोसा रखो, और अल्लाह का कार्यसाधक होना काफ़ी है!
तफ़्सीर:
मुनाफ़िक़ लोग आपसे अपने मुँह से कहते हैं कि हम आपके आदेश को मानते हैं और उसका पालन करते हैं। परन्तु, जब वे आपके पास से निकलकर जाते हैं, तो उनका एक समूह गुप्त रूप से उसके विपरीत षड्यंत्र करता है जो उन्होंने आपके सामने ज़ाहिर किया है। हालाँकि अल्लाह उनके षड्यंत्र से अवगत है और उनकी इस चाल का उन्हें बदला देगा। अतः आप उनपर कोई ध्यान न दें; वे आपको कुछ भी नुक़सान नहीं पहुँचा सकेंगे। आप अपना मामला अल्लाह के हवाले कर दें और उस पर भरोसा करें और अल्लाह कार्यसाधक के तैर पर काफी है जिस पर आप भरोसा कर सकते हैं।
आयत 82
أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ ٱلْقُرْءَانَ ۚ وَلَوْ كَانَ مِنْ عِندِ غَيْرِ ٱللَّهِ لَوَجَدُوا۟ فِيهِ ٱخْتِلَـٰفًۭا كَثِيرًۭا
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
يَتَدَبَّرُونَ
वो तदब्बुर करते
ٱلْقُرْءَانَ ۚ
क़ुरआन में
وَلَوْ
और अगर
كَانَ
होता वो
مِنْ
(of)
عِندِ
पास से
غَيْرِ
ग़ैर
ٱللَّهِ
अल्लाह के
لَوَجَدُوا۟
अलबत्ता वो पाते
فِيهِ
उसमें
ٱخْتِلَـٰفًۭا
इख्तिलाफ़
كَثِيرًۭا
बहुत ज़्यादा
क्या वे क़ुरआन में सोच-विचार नहीं करते? यदि यह अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की ओर से होता, तो निश्चय ही वे इसमें बहुत-सी बेमेल बातें पाते
तफ़्सीर:
ये लोग क़ुरआन पर मनन चिंतन और उसका गहन अध्ययन क्यों नहीं करते, ताकि उनके लिए यह साबित हो जाए उसमें कोई अंतर (असंगति) या गड़बड़ी नहीं है?! और ताकि उन्हें आपके लाए हुए धर्म की सच्चाई पर विश्वास हो जाए। यदि यह (क़ुरआन) अल्लाह सर्वशक्तिमान के अलावा किसी अन्य की ओर से होता, तो वे उसके प्रावधानों में गड़बड़ी और उसके अर्थों में बहुत अंतर (असंगित) पाते।
आयत 83
وَإِذَا جَآءَهُمْ أَمْرٌۭ مِّنَ ٱلْأَمْنِ أَوِ ٱلْخَوْفِ أَذَاعُوا۟ بِهِۦ ۖ وَلَوْ رَدُّوهُ إِلَى ٱلرَّسُولِ وَإِلَىٰٓ أُو۟لِى ٱلْأَمْرِ مِنْهُمْ لَعَلِمَهُ ٱلَّذِينَ يَسْتَنۢبِطُونَهُۥ مِنْهُمْ ۗ وَلَوْلَا فَضْلُ ٱللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُۥ لَٱتَّبَعْتُمُ ٱلشَّيْطَـٰنَ إِلَّا قَلِيلًۭا
وَإِذَا
और जब
جَآءَهُمْ
आता है उनके पास
أَمْرٌۭ
कोई मामला
مِّنَ
of
ٱلْأَمْنِ
अमन में से
أَوِ
या
ٱلْخَوْفِ
ख़ौफ़ में से
أَذَاعُوا۟
वो फैला देते हैं
بِهِۦ ۖ
उसे
وَلَوْ
और अगर
رَدُّوهُ
वो लौटाते उसे
إِلَى
to
ٱلرَّسُولِ
तरफ़ रसूल के
وَإِلَىٰٓ
और तरफ़
أُو۟لِى
those
ٱلْأَمْرِ
ऊलुल अम्र के
مِنْهُمْ
उनमें से
لَعَلِمَهُ
अलबत्ता जान लेते उसे
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَسْتَنۢبِطُونَهُۥ
निकाल लाते हैं नतीजा उसका
مِنْهُمْ ۗ
उनमें से
وَلَوْلَا
और अगर ना होता
فَضْلُ
फ़ज़ल
ٱللَّهِ
अल्लाह का
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَرَحْمَتُهُۥ
और रहमत उसकी
لَٱتَّبَعْتُمُ
अलबत्ता पैरवी करते तुम
ٱلشَّيْطَـٰنَ
शैतान की
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا
बहुत थोड़े
जब उनके पास निश्चिन्तता या भय की कोई बात पहुचती है तो उसे फैला देते है, हालाँकि अगर वे उसे रसूल और अपने समुदाय के उतरदायी व्यक्तियों तक पहुँचाते तो उसे वे लोग जान लेते जो उनमें उसकी जाँच कर सकते है। और यदि तुमपर अल्लाह का उदार अनुग्रह और उसकी दयालुता न होती, तो थोड़े लोगों के सिवा तुम सब शैतान के पीछे चलने लग जाते
तफ़्सीर:
जब इन मुनाफ़िक़ों के पास मुसलमानों की सुरक्षा और ख़ुशी, या उनके डर और दुःख की कोई सूचना आती है, तो उसे फैला देते और प्रकाशित कर देते हैं। यदि वे धीरज धरते और उस मामले को रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ओर तथा सोच-विचार, ज्ञान एवं शुभचिंतन वाले लोगों की तरफ़ लौटा देते, तो सोच-विचार करने और निष्कर्ष निकालने वाले लोग इस बात को अवश्य जान लेते कि उसे प्रकाशित करना चाहिए या गोपनीय रखना चाहिए। और - ऐ मोमिनो! - अगर इस्लाम के साथ तुमपर अल्लाह की अनुकंपा और क़ुरआन के साथ तुमपर उसकी दया न होती कि उसने तुम्हें उस दुर्दशा से सुरक्षित रखा जिससे इन मुनाफ़िक़ों को पीड़ित किया है; तो तुममें से कुछ को छोड़कर, सब शैतान के बहकावे में आ जाते।
आयत 84
فَقَـٰتِلْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ لَا تُكَلَّفُ إِلَّا نَفْسَكَ ۚ وَحَرِّضِ ٱلْمُؤْمِنِينَ ۖ عَسَى ٱللَّهُ أَن يَكُفَّ بَأْسَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ ۚ وَٱللَّهُ أَشَدُّ بَأْسًۭا وَأَشَدُّ تَنكِيلًۭا
فَقَـٰتِلْ
तो जंग कीजिए
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
لَا
not
تُكَلَّفُ
नहीं आप मुकल्लफ़ बनाए गए
إِلَّا
मगर
نَفْسَكَ ۚ
अपनी जान के
وَحَرِّضِ
और उभारिए
ٱلْمُؤْمِنِينَ ۖ
मोमिनों को
عَسَى
उम्मीद है
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَن
कि
يَكُفَّ
वो रोक दे
بَأْسَ
जंग
ٱلَّذِينَ
उनकी जिन्होंने
كَفَرُوا۟ ۚ
कुफ़्र किया
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
أَشَدُّ
ज़्यादा सख़्त है
بَأْسًۭا
ताक़त में
وَأَشَدُّ
और ज़्यादा सख़्त है
تَنكِيلًۭا
इबरतनाक सज़ा देने में
अतः अल्लाह के मार्ग में युद्ध करो - तुमपर तो बस तुम्हारी अपनी ही ज़िम्मेदारी है - और ईमानवालों की कमज़ोरियो को दूर करो और उन्हें (युद्ध के लिए) उभारो। इसकी बहुत सम्भावना है कि अल्लाह इनकार करनेवालों के ज़ोर को रोक लगा दे। अल्लाह बड़ा ज़ोरवाला और कठोर दंड देनेवाला है
तफ़्सीर:
अतः - ऐ रसूल! - आप अल्लाह के रास्ते में, उसके धर्म को सर्वोच्च करने के लिए युद्ध करें। आपसे आपके अलावा किसी अन्य के बारे में नहीं पूछा जाएगा और न आप उसके लिए बाध्य हैं। क्योंकि आप पर केवल अपने आपको युद्ध पर तत्पर करने की ज़िम्मेदारी है। तथा मोमिनों को भी युद्ध के लिए प्रोत्साहित करें और उस पर उभारें। संभव है कि अल्लाह तुम्हारे युद्ध के द्वारा काफ़िरों का ज़ोर तोड़ दे। अल्लाह अधिक शक्तिशाली और अधिक कठोर दंड देने वाला है।
आयत 85
مَّن يَشْفَعْ شَفَـٰعَةً حَسَنَةًۭ يَكُن لَّهُۥ نَصِيبٌۭ مِّنْهَا ۖ وَمَن يَشْفَعْ شَفَـٰعَةًۭ سَيِّئَةًۭ يَكُن لَّهُۥ كِفْلٌۭ مِّنْهَا ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ مُّقِيتًۭا
مَّن
जो कोई
يَشْفَعْ
सिफ़ारिश करेगा
شَفَـٰعَةً
सिफ़ारिश
حَسَنَةًۭ
अच्छी
يَكُن
होगा
لَّهُۥ
उसके लिए
نَصِيبٌۭ
एक हिस्सा
مِّنْهَا ۖ
उसमें से
وَمَن
और जो कोई
يَشْفَعْ
सिफ़ारिश करेगा
شَفَـٰعَةًۭ
सिफ़ारिश
سَيِّئَةًۭ
बुरी
يَكُن
होगा
لَّهُۥ
उसके लिए
كِفْلٌۭ
एक हिस्सा
مِّنْهَا ۗ
उसमें से
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
مُّقِيتًۭا
निगरान
जो कोई अच्छी सिफ़ारिश करेगा, उसे उसके कारण उसका प्रतिदान मिलेगा और जो बुरी सिफ़ारिश करेगा, तो उसके कारँ उसका बोझ उसपर पड़कर रहेगा। अल्लाह को तो हर चीज़ पर क़ाबू हासिल है
तफ़्सीर:
जो दूसरों को भलाई पहुँचाने के लिए प्रयास करेगा, उसे उसके सवाब का कुछ हिस्सा प्राप्त होगा तथा जो दूसरों को बुराई पहुँचाने के लिए प्रयास करेगा, उसे उसके पाप का कुछ हिस्सा मिलेगा। अल्लाह मनुष्य के हर कार्य को देख रहा है और उसे उसका बदला देगा। अतः तुममें से जो व्यक्ति किसी भलाई की प्राप्ति का कारण बनेगा, उसे उसका हिस्सा मिलेगा और जो किसी बुराई की प्राप्ति का कारण बनेगा, उसे उसमें से कुछ प्राप्त होगी।
आयत 86
وَإِذَا حُيِّيتُم بِتَحِيَّةٍۢ فَحَيُّوا۟ بِأَحْسَنَ مِنْهَآ أَوْ رُدُّوهَآ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ حَسِيبًا
وَإِذَا
और जब
حُيِّيتُم
दुआ दिए जाओ तुम
بِتَحِيَّةٍۢ
कोई दुआ
فَحَيُّوا۟
तो तुम भी दुआ दो
بِأَحْسَنَ
ज़्यादा अच्छी
مِنْهَآ
उस से
أَوْ
या
رُدُّوهَآ ۗ
लौटा दो उसे
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ के
حَسِيبًا
ख़ूब हिसाब लेने वाला
और तुम्हें जब सलामती की कोई दुआ दी जाए, तो तुम सलामती की उससे अच्छी दुआ दो या उसी को लौटा दो। निश्चय ही, अल्लाह हर चीज़ का हिसाब रखता है
तफ़्सीर:
जब कोई तुम्हें सलाम करे, तो उसे सलाम का उससे अच्छा उत्तर दो अथवा उसके कहे हुए शब्दों ही को दोहरा दो। अलबत्ता, उससे अच्छा उत्तर देना बेहतर है। निःसंदेह अल्लाह तुम्हारे कार्यों का संरक्षक है और वह हर एक को उसके कार्य का बदला देगा।
आयत 87
ٱللَّهُ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۚ لَيَجْمَعَنَّكُمْ إِلَىٰ يَوْمِ ٱلْقِيَـٰمَةِ لَا رَيْبَ فِيهِ ۗ وَمَنْ أَصْدَقُ مِنَ ٱللَّهِ حَدِيثًۭا
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ ۚ
वो ही
لَيَجْمَعَنَّكُمْ
अलबत्ता वो ज़रूर जमा करेगा तुम्हें
إِلَىٰ
to
يَوْمِ
तरफ़ दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
لَا
नहीं
رَيْبَ
कोई शक
فِيهِ ۗ
उस में
وَمَنْ
और कौन
أَصْدَقُ
ज़्यादा सच्चा है
مِنَ
than
ٱللَّهِ
अल्लाह से (बढ़ कर)
حَدِيثًۭا
बात में
अल्लाह के सिवा कोई इष्ट -पूज्य नहीं। वह तुम्हें क़ियामत के दिन की ओर ले जाकर इकट्ठा करके रहेगा, जिसके आने में कोई संदेह नहीं, और अल्लाह से बढ़कर सच्ची बात और किसकी हो सकती है
तफ़्सीर:
अल्लाह के सिवा कोई सच्चा माबूद (पूज्य) नहीं। वह तुम्हारे पहले और बाद के लोगों को क़यामत के दिन अवश्य इकट्ठा करेगा, जिसमें कोई शक नहीं; ताकि तुम्हें तुम्हारे कर्मों का बदला दिया जाए। और अल्लाह से अधिक सच्ची बात वाला कोई नहीं है।
आयत 88
۞ فَمَا لَكُمْ فِى ٱلْمُنَـٰفِقِينَ فِئَتَيْنِ وَٱللَّهُ أَرْكَسَهُم بِمَا كَسَبُوٓا۟ ۚ أَتُرِيدُونَ أَن تَهْدُوا۟ مَنْ أَضَلَّ ٱللَّهُ ۖ وَمَن يُضْلِلِ ٱللَّهُ فَلَن تَجِدَ لَهُۥ سَبِيلًۭا
۞ فَمَا
तो क्या है
لَكُمْ
तुम्हें
فِى
concerning
ٱلْمُنَـٰفِقِينَ
मुनाफ़िक़ों के बारे में
فِئَتَيْنِ
दो गिरोह (हो गए हो)
وَٱللَّهُ
और अल्लाह ने
أَرْكَسَهُم
उलटा फेर दिया उन्हें
بِمَا
बवजह उसके जो
كَسَبُوٓا۟ ۚ
उन्होंने कमाई की
أَتُرِيدُونَ
क्या तुम चाहते हो
أَن
कि
تَهْدُوا۟
तुम हिदायत दो
مَنْ
उसको जिसे
أَضَلَّ
गुमराह कर दिया
ٱللَّهُ ۖ
अल्लाह ने
وَمَن
और जिसे
يُضْلِلِ
गुमराह कर दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
فَلَن
तो हरगिज़ नहीं
تَجِدَ
तुम पाओगे
لَهُۥ
उसके लिए
سَبِيلًۭا
कोई रास्ता
फिर तुम्हें क्या हो गया है कि कपटाचारियों (मुनाफ़िक़ो) के विषय में तुम दो गिरोह हो रहे हो, यद्यपि अल्लाह ने तो उनकी करतूतों के कारण उन्हें उल्टा फेर दिया है? क्या तुम उसे मार्ग पर लाना चाहते हो जिसे अल्लाह ने गुमराह छोड़ दिया है? हालाँकि जिसे अल्लाह मार्ग न दिखाए, उसके लिए तुम कदापि कोई मार्ग नहीं पा सकते
तफ़्सीर:
(मोमिनो!) तुम्हें क्या हो गया है कि तुम, मुनाफ़िक़ों के साथ व्यवहार के बारे में दो अलग-अलग पक्ष बन गए हो : एक पक्ष कहता है कि उनके कुफ़्र के कारण उनसे युद्ध करना चाहिए, तथा दूसरा पक्ष कहता है कि उनके ईमान लाने के कारण उनसे युद्ध नहीं करना चाहिए?! तुम्हें उनके बारे में मतभेद में नहीं पड़ना चाहिए, जबकि अल्लाह ने उनके बुरे कर्मों के कारण उन्हें कुफ़्र और गुमराही की ओर लौटा दिया है। क्या तुम उसे सीधी राह पर लगाना चाहते हो, जिसे अल्लाह ने सत्य को स्वीकार करने का सामर्थ्य नहीं दिया है? और जिसे अल्लाह पथभ्रष्ट कर दे, तुम्हें उसे मार्गदर्शन करने का कोई रास्ता नहीं मिलेगा।
आयत 89
وَدُّوا۟ لَوْ تَكْفُرُونَ كَمَا كَفَرُوا۟ فَتَكُونُونَ سَوَآءًۭ ۖ فَلَا تَتَّخِذُوا۟ مِنْهُمْ أَوْلِيَآءَ حَتَّىٰ يُهَاجِرُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ۚ فَإِن تَوَلَّوْا۟ فَخُذُوهُمْ وَٱقْتُلُوهُمْ حَيْثُ وَجَدتُّمُوهُمْ ۖ وَلَا تَتَّخِذُوا۟ مِنْهُمْ وَلِيًّۭا وَلَا نَصِيرًا
وَدُّوا۟
वो दिल से चाहते हैं
لَوْ
कि काश
تَكْفُرُونَ
तुम कुफ़्र करो
كَمَا
जैसा कि
كَفَرُوا۟
उन्होंने कुफ़्र किया
فَتَكُونُونَ
तो तुम हो जाओ
سَوَآءًۭ ۖ
बराबर
فَلَا
तो ना
تَتَّخِذُوا۟
तुम बनाओ
مِنْهُمْ
उनमें से
أَوْلِيَآءَ
दोस्त
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يُهَاجِرُوا۟
वो हिजरत कर जाऐं
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के रास्ते में
فَإِن
फिर अगर
تَوَلَّوْا۟
वो मुँह मोड़ जाऐं
فَخُذُوهُمْ
तो पकड़ो उन्हें
وَٱقْتُلُوهُمْ
और क़त्ल करो उन्हें
حَيْثُ
जहाँ कहीं
وَجَدتُّمُوهُمْ ۖ
पाओ तुम उन्हें
وَلَا
और ना
تَتَّخِذُوا۟
तुम बनाओ
مِنْهُمْ
उनमें से
وَلِيًّۭا
कोई दोस्त
وَلَا
और ना
نَصِيرًا
कोई मददगार
वे तो चाहते है कि जिस प्रकार वे स्वयं अधर्मी है, उसी प्रकार तुम भी अधर्मी बनकर उन जैसे हो जाओ; तो तुम उनमें से अपने मित्र न बनाओ, जब तक कि वे अल्लाह के मार्ग में घरबार न छोड़े। फिर यदि वे इससे पीठ फेरें तो उन्हें पकड़ो, और उन्हें क़त्ल करो जहाँ कही भी उन्हें पाओ - तो उनमें से किसी को न अपना मित्र बनाना और न सहायक -
तफ़्सीर:
मुनाफ़िक़ों (पाखंडियों) की कामना है कि उनके कुफ़्र करने की तरह तुम भी उसका इनकार कर दो, जो तुमपर उतारा गया है, ताकि कुफ़्र करने में, तुम उनके बराबर हो जाओ। अतः उनकी इसी दुश्मनी के कारण, तुम उन्हें अपना मित्र न बनाओ, यहाँ तक कि वे, अपने ईमान के संकेत के रूप में, शिर्क के घर से इस्लाम के देश की ओर हिजरत कर जाएं। यदि वे इससे मुँह फेरें और अपनी स्थिति पर बने रहें, तो जहाँ भी पाओ, उन्हें पकड़ो और क़त्ल करो। तथा उनमें से किसी को न अपना मित्र बनाओ, जो तुम्हारे मामलों में तुम्हारा साथ दे और न सहायक बनाओ, जो तुम्हारे दुश्मनों के विरुद्ध तुम्हारी सहायता करे।
आयत 90
إِلَّا ٱلَّذِينَ يَصِلُونَ إِلَىٰ قَوْمٍۭ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُم مِّيثَـٰقٌ أَوْ جَآءُوكُمْ حَصِرَتْ صُدُورُهُمْ أَن يُقَـٰتِلُوكُمْ أَوْ يُقَـٰتِلُوا۟ قَوْمَهُمْ ۚ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ لَسَلَّطَهُمْ عَلَيْكُمْ فَلَقَـٰتَلُوكُمْ ۚ فَإِنِ ٱعْتَزَلُوكُمْ فَلَمْ يُقَـٰتِلُوكُمْ وَأَلْقَوْا۟ إِلَيْكُمُ ٱلسَّلَمَ فَمَا جَعَلَ ٱللَّهُ لَكُمْ عَلَيْهِمْ سَبِيلًۭا
إِلَّا
सिवाय
ٱلَّذِينَ
उन लोगों के जो
يَصِلُونَ
जा मिलते हैं
إِلَىٰ
[to]
قَوْمٍۭ
एक क़ौम से
بَيْنَكُمْ
दर्मियान तुम्हारे
وَبَيْنَهُم
और दर्मियान उनके
مِّيثَـٰقٌ
पुख़्ता अहद है
أَوْ
या
جَآءُوكُمْ
वो आते हैं तुम्हारे पास
حَصِرَتْ
कि तंग हो गए
صُدُورُهُمْ
सीने उनके
أَن
कि
يُقَـٰتِلُوكُمْ
वो जंग करें तुम से
أَوْ
या
يُقَـٰتِلُوا۟
वो जंग करें
قَوْمَهُمْ ۚ
अपनी क़ौम से
وَلَوْ
और अगर
شَآءَ
चाहता
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَسَلَّطَهُمْ
अलबत्ता मुसल्लत कर देता उन्हें
عَلَيْكُمْ
तुम पर
فَلَقَـٰتَلُوكُمْ ۚ
पस ज़रूर वो जंग करते तुम से
فَإِنِ
फिर अगर
ٱعْتَزَلُوكُمْ
वो अलग रहें तुम से
فَلَمْ
फिर ना
يُقَـٰتِلُوكُمْ
वो जंग करें तुम से
وَأَلْقَوْا۟
और वो डालें
إِلَيْكُمُ
तरफ़ तुम्हारे
ٱلسَّلَمَ
सुलह को
فَمَا
तो नहीं
جَعَلَ
बनाया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
عَلَيْهِمْ
उन पर
سَبِيلًۭا
कोई रास्ता
सिवाय उन लोगों के जो ऐसे लोगों से सम्बन्ध रखते हों, जिनसे तुम्हारे और उनकी बीच कोई समझौता हो या वे तुम्हारे पास इस दशा में आएँ कि उनके दिल इससे तंग हो रहे हों कि वे तुमसे लड़े या अपने लोगों से लड़ाई करें। यदि अल्लाह चाहता तो उन्हें तुमपर क़ाबू दे देता। फिर तो वे तुमसे अवश्य लड़ते; तो यदि वे तुमसे अलग रहें और तुमसे न लड़ें और संधि के लिए तुम्हारी ओर हाथ बढ़ाएँ तो उनके विरुद्ध अल्लाह ने तुम्हारे लिए कोई रास्ता नहीं रखा है
तफ़्सीर:
परन्तु उनमें से जो लोग ऐसी क़ौम के पास पहुँच जाएँ कि तुम्हारे और उनके बीच युद्ध विराम का निश्चित अनुबंध है, अथवा वे लोग जो तुम्हारे पास इस स्थिति में आएँ कि उनके दिल संकुचित हों, वे न तुमसे लड़ना चाहते हों न अपनी क़ौम से लड़ना चाहते हों। हालाँकि यदि अल्लाह चाहता, तो उन्हें तुम्हारे ऊपर सक्षम कर देता और वे तुमसे लड़ाई करते।इसलिए अल्लाह की ओर से उसकी आफियत (विपत्ति रहित अवस्था) को स्वीकार करो और उन्हें क़त्ल करने अथवा बंदी बनाने से परहेज़ करो। यदि वे तुमसे अलग रहें और तुमसे युद्ध न करें, तथा तुमसे लड़ाई छोड़कर तुम्हारे साथ संधि के लिए हाथ बढ़ाएँ, तो अल्लाह ने तुम्हारे लिए उन्हें क़त्ल करने अथवा बंदी बनाने का कोई रास्ता नहीं बनाया है।
आयत 91
سَتَجِدُونَ ءَاخَرِينَ يُرِيدُونَ أَن يَأْمَنُوكُمْ وَيَأْمَنُوا۟ قَوْمَهُمْ كُلَّ مَا رُدُّوٓا۟ إِلَى ٱلْفِتْنَةِ أُرْكِسُوا۟ فِيهَا ۚ فَإِن لَّمْ يَعْتَزِلُوكُمْ وَيُلْقُوٓا۟ إِلَيْكُمُ ٱلسَّلَمَ وَيَكُفُّوٓا۟ أَيْدِيَهُمْ فَخُذُوهُمْ وَٱقْتُلُوهُمْ حَيْثُ ثَقِفْتُمُوهُمْ ۚ وَأُو۟لَـٰٓئِكُمْ جَعَلْنَا لَكُمْ عَلَيْهِمْ سُلْطَـٰنًۭا مُّبِينًۭا
سَتَجِدُونَ
अनक़रीब तुम पाओगे
ءَاخَرِينَ
कुछ दूसरों को
يُرِيدُونَ
वो चाहते हैं
أَن
कि
يَأْمَنُوكُمْ
वो अमन में रहें तुम से
وَيَأْمَنُوا۟
और वो अमन में रहें
قَوْمَهُمْ
अपनी क़ौम से
كُلَّ
Everytime
مَا
जब कभी
رُدُّوٓا۟
वो लौटाए जाते हैं
إِلَى
to
ٱلْفِتْنَةِ
तरफ़ फ़ितने के
أُرْكِسُوا۟
वो उल्टा दिए जाते हैं
فِيهَا ۚ
उसमें
فَإِن
फिर अगर
لَّمْ
ना
يَعْتَزِلُوكُمْ
वो अलग रहें तुम से
وَيُلْقُوٓا۟
और (ना) वो डालें
إِلَيْكُمُ
तरफ़ तुम्हारे
ٱلسَّلَمَ
सुलह को
وَيَكُفُّوٓا۟
और (ना) वो रोकें
أَيْدِيَهُمْ
अपने हाथों को
فَخُذُوهُمْ
तो पकड़ो उन्हें
وَٱقْتُلُوهُمْ
और क़त्ल करो उन्हें
حَيْثُ
जहाँ कहीं
ثَقِفْتُمُوهُمْ ۚ
पाओ तुम उन्हें
وَأُو۟لَـٰٓئِكُمْ
और यही वो लोग हैं
جَعَلْنَا
बनाया हमने
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
عَلَيْهِمْ
जिन पर
سُلْطَـٰنًۭا
ग़लबा
مُّبِينًۭا
वाज़ेह
अब तुम कुछ ऐसे लोगों को भी पाओगे, जो चाहते है कि तुम्हारी ओर से निश्चिन्त होकर रहें और अपने लोगों की ओर से भी निश्चिन्त होकर रहे। परन्तु जब भी वे फ़साद और उपद्रव की ओर फेरे गए तो वे उसी में औधे जो गिरे। तो यदि वे तुमसे अलग-थलग न रहें और तुम्हारी ओर सुलह का हाथ न बढ़ाएँ, और अपने हाथ न रोकें, तो तुम उन्हें पकड़ो और क़त्ल करो, जहाँ कहीं भी तुम उन्हें पाओ। उनके विरुद्ध हमने तुम्हें खुला अधिकार दे रखा है
तफ़्सीर:
- ऐ मोमिनो! - तुम मुनाफ़िक़ों का एक अन्य समूह ऐसा पाओगे, जो तुम्हारे सामने ईमान को प्रदर्शित करते हैं ताकि वे खुद के लिए प्रतिरक्षा प्राप्त कर सकें। परन्तु जब वे अपनी काफ़िर क़ौम के पास जाते हैं, तो उनके सामने कुफ़्र को प्रदर्शित करते हैं, ताकि उनसे भी निश्चिंत और सुरक्षित रहें। जब भी उन्हें अल्लाह का इनकार करने और उसके साथ शिर्क करने के लिए बुलाया जाता है, तो वे उसमें भयानक रूप से गिर जाते हैं। ये लोग यदि तुमसे लड़ना न छोड़ें, सुलह करने के लिए आगे न आएं और अपने हाथ तुमसे न रोकें, तो उन्हें जहाँ पाओ, पकड़ो और क़त्ल करो। और वे लोग जिनकी यह विशेषता है, हमने तुम्हारे लिए उन्हें पकड़ने और क़त्ल करने का स्पष्ट तर्क बना दिया है; और ऐसा उनके विश्वासघात और चालबाज़ी के कारण किया है।
आयत 92
وَمَا كَانَ لِمُؤْمِنٍ أَن يَقْتُلَ مُؤْمِنًا إِلَّا خَطَـًۭٔا ۚ وَمَن قَتَلَ مُؤْمِنًا خَطَـًۭٔا فَتَحْرِيرُ رَقَبَةٍۢ مُّؤْمِنَةٍۢ وَدِيَةٌۭ مُّسَلَّمَةٌ إِلَىٰٓ أَهْلِهِۦٓ إِلَّآ أَن يَصَّدَّقُوا۟ ۚ فَإِن كَانَ مِن قَوْمٍ عَدُوٍّۢ لَّكُمْ وَهُوَ مُؤْمِنٌۭ فَتَحْرِيرُ رَقَبَةٍۢ مُّؤْمِنَةٍۢ ۖ وَإِن كَانَ مِن قَوْمٍۭ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُم مِّيثَـٰقٌۭ فَدِيَةٌۭ مُّسَلَّمَةٌ إِلَىٰٓ أَهْلِهِۦ وَتَحْرِيرُ رَقَبَةٍۢ مُّؤْمِنَةٍۢ ۖ فَمَن لَّمْ يَجِدْ فَصِيَامُ شَهْرَيْنِ مُتَتَابِعَيْنِ تَوْبَةًۭ مِّنَ ٱللَّهِ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلِيمًا حَكِيمًۭا
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
لِمُؤْمِنٍ
किसी मोमिन के लिए
أَن
कि
يَقْتُلَ
वो क़त्ल कर दे
مُؤْمِنًا
किसी मोमिन को
إِلَّا
मगर
خَطَـًۭٔا ۚ
ख़ता से
وَمَن
और जो
قَتَلَ
क़त्ल करे
مُؤْمِنًا
किसी मोमिन को
خَطَـًۭٔا
ख़ता से
فَتَحْرِيرُ
तो आज़ाद करना है
رَقَبَةٍۢ
एक गर्दन (ग़ुलाम)
مُّؤْمِنَةٍۢ
मोमिन का
وَدِيَةٌۭ
और दियत
مُّسَلَّمَةٌ
जो सुपुर्द की जाएगी
إِلَىٰٓ
तरफ़
أَهْلِهِۦٓ
उसके अहल (वारिस) के
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
يَصَّدَّقُوا۟ ۚ
वो माफ़ कर दें
فَإِن
फिर अगर
كَانَ
है वो
مِن
from
قَوْمٍ
ऐसी क़ौम से
عَدُوٍّۢ
जो दुश्मन है
لَّكُمْ
तुम्हारी
وَهُوَ
और वो
مُؤْمِنٌۭ
मोमिन है
فَتَحْرِيرُ
तो आज़ाद करना है
رَقَبَةٍۢ
एक गर्दन (ग़ुलाम)
مُّؤْمِنَةٍۢ ۖ
मोमिन का
وَإِن
और अगर
كَانَ
है वो
مِن
from
قَوْمٍۭ
उस क़ौम से
بَيْنَكُمْ
दर्मियान तुम्हारे
وَبَيْنَهُم
और दर्मियान उनके
مِّيثَـٰقٌۭ
पुख़्ता अहद है
فَدِيَةٌۭ
तो दियत
مُّسَلَّمَةٌ
जो सुपुर्द की जाएगी
إِلَىٰٓ
तरफ़
أَهْلِهِۦ
उसके अहल (वारिस) के
وَتَحْرِيرُ
और आज़ाद करना है
رَقَبَةٍۢ
एक गर्दन (ग़ुलाम)
مُّؤْمِنَةٍۢ ۖ
मोमिन का
فَمَن
तो जो कोई
لَّمْ
ना
يَجِدْ
पाए
فَصِيَامُ
पस रोज़े रखना है
شَهْرَيْنِ
दो माह
مُتَتَابِعَيْنِ
मुसलसल/ पै-दर-पै
تَوْبَةًۭ
तौबा का (क़ुबूल करना है)
مِّنَ
from
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह की तरफ़ से
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلِيمًا
बहुत इल्म वाला
حَكِيمًۭا
बहुत हिकमत वाला
किसी ईमानवाले का यह काम नहीं कि वह किसी ईमानवाले का हत्या करे, भूल-चूक की बात और है। और यदि कोई क्यक्ति यदि ग़लती से किसी ईमानवाले की हत्या कर दे, तो एक मोमिन ग़ुलाम को आज़ाद करना होगा और अर्थदंड उस (मारे गए क्यक्ति) के घरवालों को सौंपा जाए। यह और बात है कि वे अपनी ख़ुशी से छोड़ दें। और यदि वह उन लोगों में से हो, जो तुम्हारे शत्रु हों और वह (मारा जानेवाला) स्वयं मोमिन रहा तो एक मोमिन को ग़ुलामी से आज़ाद करना होगा। और यदि वह उन लोगों में से हो कि तुम्हारे और उनके बीच कोई संधि और समझौता हो, तो अर्थदंड उसके घरवालों को सौंपा जाए और एक मोमिन को ग़ुलामी से आज़ाद करना होगा। लेकिन जो (ग़ुलाम) न पाए तो वह निरन्तर दो मास के रोज़े रखे। यह अल्लाह की ओर से निश्चित किया हुआ उसकी तरफ़ पलट आने का तरीक़ा है। अल्लाह तो सब कुछ जाननेवाला, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
किसी मोमिन के लिए यह उचित नहीं है कि किसी मोमिन की हत्या करे, परन्तु यह कि चूक से ऐसा हो जाए। जो व्यक्ति गलती से किसी मोमिन की हत्या कर दे, वह अपने कृत्य के कफ़्फ़ारा के तौर पर एक मोमिन गुलाम आज़ाद करे और हत्यारे के वारिस रिश्तेदार हत व्यक्ति के वारिसों को दियत (खून की क़ीमत) दें। लेकिन अगर हत व्यकित के वारिस खून के पैसे माफ कर दें, तो दियत समाप्त हो जाएगी। यदि हत व्यक्ति तुमसे युद्ध कने वाली क़ौम से हो, और वह स्वयं मोमिन हो, तो हत्यारे पर (केवल) एक मोमिन ग़ुलाम आज़ाद करना अनिवार्य है, उसपर दियत अनिवार्य नहीं है। तथा यदि हत व्यक्ति ईमान वाला न हो, लेकिन वह ऐसी क़ौम से हो कि तुम्हारे और उनके बीच ज़िम्मियों की तरह कोई प्रतिज्ञा और समझौता हो, तो हत्यारे के वारिस रिश्तेदारों पर हत व्यक्ति के वारिसों को ख़ून की क़ीमत देना अनिवार्य है और हत्यारे को अपने कृत्य के कफ़्फ़ारा के तौर पर एक मोमिन ग़ुलाम आज़ाद करना होगा। यदि उसे आज़ाद करने के लिए ग़ुलाम न मिले अथवा वह ग़ुलाम की क़ीमत भुगतान करने में सक्षम न हो, तो वह लगातार दो महीने बिना किसी बाधा के इस तरह रोज़े रखे कि उनके बीच (बिना किसी कारण के) रोज़ा न तोड़े। ये प्रावधान इसलिए हैं, ताकि अल्लाह उसके किए को क्षमा कर दे। अल्लाह अपने बंदों के कृत्यों और उनके इरादों से अवगत, अपने विधान और प्रबंधन में हिकमत वाला है।
आयत 93
وَمَن يَقْتُلْ مُؤْمِنًۭا مُّتَعَمِّدًۭا فَجَزَآؤُهُۥ جَهَنَّمُ خَـٰلِدًۭا فِيهَا وَغَضِبَ ٱللَّهُ عَلَيْهِ وَلَعَنَهُۥ وَأَعَدَّ لَهُۥ عَذَابًا عَظِيمًۭا
وَمَن
और जो
يَقْتُلْ
क़त्ल करे
مُؤْمِنًۭا
किसी मोमिन को
مُّتَعَمِّدًۭا
जान बूझकर
فَجَزَآؤُهُۥ
तो बदला है उसका
جَهَنَّمُ
जहन्नम
خَـٰلِدًۭا
हमेशा रहने वाला है
فِيهَا
उसमें
وَغَضِبَ
और ग़ज़बनाक हुआ
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَيْهِ
उस पर
وَلَعَنَهُۥ
और उसने लानत की उस पर
وَأَعَدَّ
और उसने तैयार कर रखा है
لَهُۥ
उसके लिए
عَذَابًا
अज़ाब
عَظِيمًۭا
बहुत बड़ा
और जो व्यक्ति जान-बूझकर किसी मोमिन की हत्या करे, तो उसका बदला जहन्नम है, जिसमें वह सदा रहेगा; उसपर अल्लाह का प्रकोप और उसकी फिटकार है और उसके लिए अल्लाह ने बड़ी यातना तैयार कर रखी है
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति किसी मोमिन को बिना किसी हक़ के जान-बूझकर क़त्ल कर दे; तो उसका बदला जहन्नम में प्रवेश है, जिसमें वह हमेशा के लिए रहेगा, यदि उसने उसे हलाल समझा या उससे तौबा नहीं किया। तथा अल्लाह उसपर क्रोधित है और उसे अपनी दया से निष्कासित कर दिया। तथा उसके इस महान पाप को करने के कारण, उसके लिए बड़ा अज़ाब तैयार कर रखा है।
आयत 94
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِذَا ضَرَبْتُمْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ فَتَبَيَّنُوا۟ وَلَا تَقُولُوا۟ لِمَنْ أَلْقَىٰٓ إِلَيْكُمُ ٱلسَّلَـٰمَ لَسْتَ مُؤْمِنًۭا تَبْتَغُونَ عَرَضَ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا فَعِندَ ٱللَّهِ مَغَانِمُ كَثِيرَةٌۭ ۚ كَذَٰلِكَ كُنتُم مِّن قَبْلُ فَمَنَّ ٱللَّهُ عَلَيْكُمْ فَتَبَيَّنُوٓا۟ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًۭا
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
إِذَا
जब
ضَرَبْتُمْ
सफ़र करो तुम
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
فَتَبَيَّنُوا۟
तो तहक़ीक़ कर लिया करो
وَلَا
और ना
تَقُولُوا۟
तुम कहो
لِمَنْ
उसके लिए जो
أَلْقَىٰٓ
डाले
إِلَيْكُمُ
तरफ़ तुम्हारे
ٱلسَّلَـٰمَ
सलाम
لَسْتَ
नहीं हो तुम
مُؤْمِنًۭا
मोमिन
تَبْتَغُونَ
तुम चाहते हो
عَرَضَ
सामान
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी का
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
فَعِندَ
तो पास
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مَغَانِمُ
ग़नीमतें हैं
كَثِيرَةٌۭ ۚ
बहुत सी
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
كُنتُم
थे तुम
مِّن
from
قَبْلُ
इससे पहले
فَمَنَّ
तो एहसान किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَيْكُمْ
तुम पर
فَتَبَيَّنُوٓا۟ ۚ
पस तहक़ीक़ कर लिया करो
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
بِمَا
उसकी जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
خَبِيرًۭا
ख़ूब ख़बर रखने वाला
ऐ ईमान लानेवालो! जब तुम अल्लाह के मार्ग से निकलो तो अच्छी तरह पता लगा लो और जो तुम्हें सलाम करे, उससे यह न कहो कि तुम ईमान नहीं रखते, और इससे तुम्हारा ध्येय यह हो कि सांसारिक जीवन का माल प्राप्त करो। अल्लाह ने तुमपर उपकार किया, जो अच्छी तरह पता लगा लिया करो। जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने वालो और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! जब तुम अल्लाह के मार्ग में जिहाद के लिए निकलो, तो छानबीन कर लिया करो कि किससे युद्ध कर रहे हो और जो तुम्हें अपने मुसलमान होने का सबूत दिखाए, उसे यह न कहो कि तुम मोमिन नहीं हो, बल्कि तुम केवल अपनी जान एवं माल की रक्षा के लिए मुसलमान होने का प्रदर्शन कर रहे हो। फिर तुम ग़नीमत के धन जैसे दुनिया के तुच्छ सामानों के लोभ में उसकी हत्या कर दो! सुनो, अल्लाह के पास बहुत-सी ग़नीमतें हैं, जो इससे बेहतर और बड़ी हैं। इससे पहले तुम भी इसी व्यक्ति की तरह थे, जो अपनी क़ौम से अपना ईमान छिपा रहा है। फिर अल्लाह ने इस्लाम की दौलत प्रदानकर तुमपर उपकार किया और तुम्हारे रक्त की रक्षा की। इसलिए छानबीन कर लिया करो। यक़ीनन अल्लाह से तुम्हारा कोई छोटे से छोटा कार्य भी छिपा नहीं है और वह तुम्हें उसका बदला देगा।
आयत 95
لَّا يَسْتَوِى ٱلْقَـٰعِدُونَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ غَيْرُ أُو۟لِى ٱلضَّرَرِ وَٱلْمُجَـٰهِدُونَ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ بِأَمْوَٰلِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ ۚ فَضَّلَ ٱللَّهُ ٱلْمُجَـٰهِدِينَ بِأَمْوَٰلِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ عَلَى ٱلْقَـٰعِدِينَ دَرَجَةًۭ ۚ وَكُلًّۭا وَعَدَ ٱللَّهُ ٱلْحُسْنَىٰ ۚ وَفَضَّلَ ٱللَّهُ ٱلْمُجَـٰهِدِينَ عَلَى ٱلْقَـٰعِدِينَ أَجْرًا عَظِيمًۭا
لَّا
Not
يَسْتَوِى
नहीं बराबर हो सकते
ٱلْقَـٰعِدُونَ
जो बैठने वाले हैं
مِنَ
among
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों में से
غَيْرُ
सिवाय
أُو۟لِى
the ones (who are)
ٱلضَّرَرِ
ज़रर वालों (माज़ूर) के
وَٱلْمُجَـٰهِدُونَ
और जो जिहाद करने वाले हैं
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
بِأَمْوَٰلِهِمْ
साथ अपने मालों के
وَأَنفُسِهِمْ ۚ
और अपनी जानों के
فَضَّلَ
फ़ज़ीलत दी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلْمُجَـٰهِدِينَ
जिहाद करने वालों को
بِأَمْوَٰلِهِمْ
साथ अपने मालों के
وَأَنفُسِهِمْ
और अपनी जानों के
عَلَى
to
ٱلْقَـٰعِدِينَ
बैठने वालों पर
دَرَجَةًۭ ۚ
दर्जे में
وَكُلًّۭا
और हर एक से
وَعَدَ
वादा कर रखा है
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلْحُسْنَىٰ ۚ
अच्छा
وَفَضَّلَ
और फ़ज़ीलत दी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلْمُجَـٰهِدِينَ
जिहाद करने वालों को
عَلَى
over
ٱلْقَـٰعِدِينَ
बैठने वालों पर
أَجْرًا
अजर की
عَظِيمًۭا
बहुत बड़े
ईमानवालों में से वे लोग जो बिना किसी कारण के बैठे रहते है और जो अल्लाह के मार्ग में अपने धन और प्राणों के साथ जी-तोड़ कोशिश करते है, दोनों समान नहीं हो सकते। अल्लाह ने बैठे रहनेवालों की अपेक्षा अपने धन और प्राणों से जी-तोड़ कोशिश करनेवालों का दर्जा बढ़ा रखा है। यद्यपि प्रत्यके के लिए अल्लाह ने अच्छे बदले का वचन दिया है। परन्तु अल्लाह ने जी-तोड़ कोशिश करनेवालों का बड़ा बदला रखा है
तफ़्सीर:
उज़्र वालों जैसे कि बीमार और अंधे लोगों के अलावा अल्लाह के रास्ते में जिहाद छोड़कर घर बैठ रहने वाले मोमिन तथा अल्लाह के मार्ग में अपनी जानों और मालों के साथ जिहाद करने वाले बराबर नहीं हो सकते। अल्लाह ने जान एवं माल के साथ जिहाद करने वालों को पद के एतिबार से, जिहाद से बैठे रहने वालों पर प्रधानता प्रदान किया है। जबकि जिहाद करने वालों और उचित कारण की बिना पर जिहाद से बैठे रहने वालों में से प्रत्येक को उसका वह प्रतिफल मिलेगा जिसका वह वह हक़दार है।परंतु अल्लाह ने जिहाद करने वालों को अपनी ओर से महान प्रतिफल देकर उन्हें जिहाद से बैठ रहने वालों पर श्रेष्ठता प्रदान किया है।
आयत 96
دَرَجَـٰتٍۢ مِّنْهُ وَمَغْفِرَةًۭ وَرَحْمَةًۭ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًۭا رَّحِيمًا
دَرَجَـٰتٍۢ
दरजात हैं
مِّنْهُ
उसकी तरफ़ से
وَمَغْفِرَةًۭ
और बख़्शिश
وَرَحْمَةًۭ ۚ
और रहमत है
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
غَفُورًۭا
बहुत बख़्शने वाला
رَّحِيمًا
निहायत रहम करने वाला
उसकी ओर से दर्जे है और क्षमा और दयालुता है। और अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
यह सवाब (स्वर्ग में) एक के ऊपर एक घरों, साथ ही साथ उनके पापों के क्षमादान और उनपर अल्लाह की दया के रूप में होगा। तथा अल्लाह अपने बंदों को बड़ा क्षमा करने वाला और उन पर दया करने वाला है।
आयत 97
إِنَّ ٱلَّذِينَ تَوَفَّىٰهُمُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ ظَالِمِىٓ أَنفُسِهِمْ قَالُوا۟ فِيمَ كُنتُمْ ۖ قَالُوا۟ كُنَّا مُسْتَضْعَفِينَ فِى ٱلْأَرْضِ ۚ قَالُوٓا۟ أَلَمْ تَكُنْ أَرْضُ ٱللَّهِ وَٰسِعَةًۭ فَتُهَاجِرُوا۟ فِيهَا ۚ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ مَأْوَىٰهُمْ جَهَنَّمُ ۖ وَسَآءَتْ مَصِيرًا
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
تَوَفَّىٰهُمُ
फ़ौत करते हैं उन्हें
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्ते
ظَالِمِىٓ
ज़ुल्म करने वाले हैं (जब कि वो)
أَنفُسِهِمْ
अपनी जानों पर
قَالُوا۟
वो कहते हैं
فِيمَ
किस (हाल) में
كُنتُمْ ۖ
थे तुम
قَالُوا۟
वो कहते हैं
كُنَّا
थे हम
مُسْتَضْعَفِينَ
कमज़ोर
فِى
in
ٱلْأَرْضِ ۚ
ज़मीन में
قَالُوٓا۟
वो कहते हैं
أَلَمْ
क्या नहीं
تَكُنْ
थी
أَرْضُ
ज़मीन
ٱللَّهِ
अल्लाह की
وَٰسِعَةًۭ
वसीअ
فَتُهَاجِرُوا۟
पस तुम हिजरत कर जाते
فِيهَا ۚ
उसमें
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
مَأْوَىٰهُمْ
ठिकाना उनका
جَهَنَّمُ ۖ
जहन्नम है
وَسَآءَتْ
और कितना बुरा है
مَصِيرًا
ठिकाना
जो लोग अपने-आप पर अत्याचार करते है, जब फ़रिश्ते उस दशा में उनके प्राण ग्रस्त कर लेते है, तो कहते है, "तुम किस दशा में पड़े रहे?" वे कहते है, "हम धरती में निर्बल और बेबस थे।" फ़रिश्ते कहते है, "क्या अल्लाह की धरती विस्तृत न थी कि तुम उसमें घर-बार छोड़कर कहीं ओर चले जाते?" तो ये वही लोग है जिनका ठिकाना जहन्नम है। - और वह बहुत ही बुरा ठिकाना है
तफ़्सीर:
फ़रिश्ते जिन लोगाों के प्राण इस हाल में निकालते हैं कि वे कुफ़्र की नगरी से इस्लाम की नगरी की तरफ़ हिजरत न करके अपने ऊपर अत्याचार करने वाले होते हैं, तो फरिश्ते उनका प्राण निकालते समय उन्हें फटकार लगाते हुए कहते हैं : तुम किस हाल में थे? और तुम किस चीज़ के द्वारा मुश्रिकों से भिन्न थे? तो वे कारण बताते हुए जवाब देते हैं : हम कमज़ोर व असहाय थे, हमारे पास इतनी शक्ति और ताक़त नहीं थी जिससे हम अपना बचाव कर सकते। तो फ़रिश्ते उन्हें फटकारते हुए कहेंगे : क्या अल्लाह की धरती विस्तृत नहीं थी कि तुम उसमें हिजरत कर जाते ताकि तुम अपने धर्म और अपने आपको अपमान और उत्पीड़न से बचा सकते?! अतः वे लोग जिन्होंने हिजरत नहीं किया, उनका ठिकाना जहाँ वे रहेंगे, नरक है और वह उनके लिए बहुत ही बुरा ठिकाना है।
आयत 98
إِلَّا ٱلْمُسْتَضْعَفِينَ مِنَ ٱلرِّجَالِ وَٱلنِّسَآءِ وَٱلْوِلْدَٰنِ لَا يَسْتَطِيعُونَ حِيلَةًۭ وَلَا يَهْتَدُونَ سَبِيلًۭا
إِلَّا
सिवाय (उनके)
ٱلْمُسْتَضْعَفِينَ
जो कमज़ोर हैं
مِنَ
among
ٱلرِّجَالِ
मर्दों में से
وَٱلنِّسَآءِ
और औरतों में से
وَٱلْوِلْدَٰنِ
और बच्चों में से
لَا
(who) not
يَسْتَطِيعُونَ
नहीं वो इस्तिताअत रखते
حِيلَةًۭ
किसी हीले / तदबीर की
وَلَا
और नहीं
يَهْتَدُونَ
वो पाते
سَبِيلًۭا
कोई रास्ता
सिवाय उन बेबस पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों के जिनके बस में कोई उपाय नहीं और न कोई राह पा रहे है;
तफ़्सीर:
परंतु सज़ा की इस धमकी से उज़्र वाले कमज़ोर व लाचार पुरुष, स्त्री और बच्चे अलग हैं, जिनके पास अपने आपसे अत्याचार और उत्पीड़न को हटाने की शक्ति नहीं है तथा वे अपने उत्पीड़न से छुटकारा पाने का कोई रास्ता नहीं पाते हैं। तो अल्लाह ऐसे लोगों को अपनी दया व कृपा से निश्चय ही माफ़ कर देगा। अल्लाह अपने बंदों को माफ़ करने वाला और उनमें से तौबा करने वालों को क्षमा करने वाला है।
आयत 99
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ عَسَى ٱللَّهُ أَن يَعْفُوَ عَنْهُمْ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَفُوًّا غَفُورًۭا
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
पस यही लोग
عَسَى
उम्मीद है
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَن
ये कि
يَعْفُوَ
दरगुज़र करे
عَنْهُمْ ۚ
उन से
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَفُوًّا
बहुत माफ़ करने वाला
غَفُورًۭا
बहुत बख़्शने वाला
तो सम्भव है कि अल्लाह ऐसे लोगों को छोड़ दे; क्योंकि अल्लाह छोड़ देनेवाला और बड़ा क्षमाशील है
तफ़्सीर:
परंतु सज़ा की इस धमकी से उज़्र वाले कमज़ोर व लाचार पुरुष, स्त्री और बच्चे अलग हैं, जिनके पास अपने आपसे अत्याचार और उत्पीड़न को हटाने की शक्ति नहीं है तथा वे अपने उत्पीड़न से छुटकारा पाने का कोई रास्ता नहीं पाते हैं। तो अल्लाह ऐसे लोगों को अपनी दया व कृपा से निश्चय ही माफ़ कर देगा। अल्लाह अपने बंदों को माफ़ करने वाला और उनमें से तौबा करने वालों को क्षमा करने वाला है।
आयत 100
۞ وَمَن يُهَاجِرْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ يَجِدْ فِى ٱلْأَرْضِ مُرَٰغَمًۭا كَثِيرًۭا وَسَعَةًۭ ۚ وَمَن يَخْرُجْ مِنۢ بَيْتِهِۦ مُهَاجِرًا إِلَى ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ ثُمَّ يُدْرِكْهُ ٱلْمَوْتُ فَقَدْ وَقَعَ أَجْرُهُۥ عَلَى ٱللَّهِ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا
۞ وَمَن
और जो कोई
يُهَاجِرْ
हिजरत करेगा
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
يَجِدْ
वो पाएगा
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
مُرَٰغَمًۭا
जाए पनाह
كَثِيرًۭا
बहुत सी
وَسَعَةًۭ ۚ
और वुसअत
وَمَن
और जो कोई
يَخْرُجْ
निकलेगा
مِنۢ
from
بَيْتِهِۦ
अपने घर से
مُهَاجِرًا
हिजरत करते हुए
إِلَى
to
ٱللَّهِ
तरफ़ अल्लाह के
وَرَسُولِهِۦ
और उसके रसूल के
ثُمَّ
फिर
يُدْرِكْهُ
पा ले उसे
ٱلْمَوْتُ
मौत
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
وَقَعَ
वाक़ेअ हो गया
أَجْرُهُۥ
अजर उसका
عَلَى
on
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह पर
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
غَفُورًۭا
बहुत बख़्शने वाला
رَّحِيمًۭا
निहायत रहम करने वाला
जो कोई अल्लाह के मार्ग में घरबार छोड़कर निकलेगा, वह धरती में शरण लेने की बहुत जगह और समाई पाएगा, और जो कोई अपने घर में सब कुछ छोड़कर अल्लाह और उसके रसूल की ओर निकले और उसकी मृत्यु हो जाए, तो उसका प्रतिदान अल्लाह के ज़िम्मे हो गया। अल्लाह बहुत क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए कुफ़्र के देश से इस्लाम के देश की ओर हिजरत करेगा, वह उस भूमि में जिसमें उसने पलायन किया है एक नया स्थान और ज़मीन पाएगा, जहाँ उसे गौरव और व्यापक आजीविका प्राप्त होगी। तथा जो व्यक्ति अपने घर से अल्लाह और उसके रसूल की ओर हिजरत के उद्देश्य से निकलता है, फिर उसके अपने प्रवास स्थल पर पहुँचने से पहले उसकी मृत्यु हो जाती है, तो अल्लाह के यहाँ उसका सवाब निश्चित हो गया। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वह अपने प्रवास स्थल तक नहीं पहुँच सका। तथा अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला और उनपर दया करने वाला है।
आयत 101
وَإِذَا ضَرَبْتُمْ فِى ٱلْأَرْضِ فَلَيْسَ عَلَيْكُمْ جُنَاحٌ أَن تَقْصُرُوا۟ مِنَ ٱلصَّلَوٰةِ إِنْ خِفْتُمْ أَن يَفْتِنَكُمُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ ۚ إِنَّ ٱلْكَـٰفِرِينَ كَانُوا۟ لَكُمْ عَدُوًّۭا مُّبِينًۭا
وَإِذَا
और जब
ضَرَبْتُمْ
सफ़र करो तुम
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
فَلَيْسَ
तो नहीं है
عَلَيْكُمْ
तुम पर
جُنَاحٌ
कोई गुनाह
أَن
कि
تَقْصُرُوا۟
तुम क़सर कर लो
مِنَ
[of]
ٱلصَّلَوٰةِ
नमाज में से
إِنْ
अगर
خِفْتُمْ
ख़ौफ़ हो तुम्हें
أَن
कि
يَفْتِنَكُمُ
फ़ितने में डालेंगे तुम्हें
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟ ۚ
कुफ़्र किया
إِنَّ
बेशक
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िर
كَانُوا۟
हैं
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
عَدُوًّۭا
दुश्मन
مُّبِينًۭا
खुल्लम-खुल्ला
और जब तुम धरती में यात्रा करो, तो इसमें तुमपर कोई गुनाह नहीं कि नमाज़ को कुछ संक्षिप्त कर दो; यदि तुम्हें इस बात का भय हो कि विधर्मी लोग तुम्हें सताएँगे और कष्ट पहुँचाएँगे। निश्चय ही विधर्मी लोग तुम्हारे खुले शत्रु है
तफ़्सीर:
जब तुम धरती में यात्रा करो और काफ़िरों की ओर से कोई कष्ट पहुँचने का डर हो, तो चार रक्अत वाली नमाज़ों को क़स्र (कम) करके दो रक्अत पढ़ने में तुमपर कोई गुनाह नहीं है। निःसंदेह काफ़िरों की तुमसे दुश्मनी बिल्कुल खुली हुई स्पष्ट है। तथा सहीह सुन्नत (हदीस) से साबित है कि सुरक्षा की स्थिति में भी यात्रा करने में नमाज़ को क़स्र करना जायज़ है।
आयत 102
وَإِذَا كُنتَ فِيهِمْ فَأَقَمْتَ لَهُمُ ٱلصَّلَوٰةَ فَلْتَقُمْ طَآئِفَةٌۭ مِّنْهُم مَّعَكَ وَلْيَأْخُذُوٓا۟ أَسْلِحَتَهُمْ فَإِذَا سَجَدُوا۟ فَلْيَكُونُوا۟ مِن وَرَآئِكُمْ وَلْتَأْتِ طَآئِفَةٌ أُخْرَىٰ لَمْ يُصَلُّوا۟ فَلْيُصَلُّوا۟ مَعَكَ وَلْيَأْخُذُوا۟ حِذْرَهُمْ وَأَسْلِحَتَهُمْ ۗ وَدَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لَوْ تَغْفُلُونَ عَنْ أَسْلِحَتِكُمْ وَأَمْتِعَتِكُمْ فَيَمِيلُونَ عَلَيْكُم مَّيْلَةًۭ وَٰحِدَةًۭ ۚ وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ إِن كَانَ بِكُمْ أَذًۭى مِّن مَّطَرٍ أَوْ كُنتُم مَّرْضَىٰٓ أَن تَضَعُوٓا۟ أَسْلِحَتَكُمْ ۖ وَخُذُوا۟ حِذْرَكُمْ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ أَعَدَّ لِلْكَـٰفِرِينَ عَذَابًۭا مُّهِينًۭا
وَإِذَا
और जब
كُنتَ
हों आप
فِيهِمْ
उनमें
فَأَقَمْتَ
तो क़ायम करें आप
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
فَلْتَقُمْ
तो चाहिए कि खड़ी हो
طَآئِفَةٌۭ
एक जमाअत
مِّنْهُم
उनमें से
مَّعَكَ
आपके साथ
وَلْيَأْخُذُوٓا۟
और चाहिए कि वो पकड़े रहें
أَسْلِحَتَهُمْ
अस्लिहा अपना
فَإِذَا
फिर जब
سَجَدُوا۟
वो सजदा करें
فَلْيَكُونُوا۟
पस चाहिए कि वो हों
مِن
from
وَرَآئِكُمْ
तुम्हारे पीछे
وَلْتَأْتِ
और चाहिए कि आए
طَآئِفَةٌ
जमाअत
أُخْرَىٰ
दूसरी
لَمْ
नहीं
يُصَلُّوا۟
उन्होंने नमाज़ पढ़ी
فَلْيُصَلُّوا۟
पस चाहिए कि वो नमाज़ पढ़ें
مَعَكَ
आपके साथ
وَلْيَأْخُذُوا۟
और चाहिए कि वो पकड़े रहें
حِذْرَهُمْ
बचाव (हथियार) अपना
وَأَسْلِحَتَهُمْ ۗ
और अस्लिहा अपना
وَدَّ
चाहते हैं
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لَوْ
काश
تَغْفُلُونَ
तुम ग़ाफ़िल हो जाओ
عَنْ
[about]
أَسْلِحَتِكُمْ
अपने अस्लिहा से
وَأَمْتِعَتِكُمْ
और अपने साज़ो सामान से
فَيَمِيلُونَ
तो वो हमला कर दें
عَلَيْكُم
तुम पर
مَّيْلَةًۭ
हमला करना
وَٰحِدَةًۭ ۚ
एक ही बार
وَلَا
और नहीं
جُنَاحَ
कोई गुनाह
عَلَيْكُمْ
तुम पर
إِن
अगर
كَانَ
है
بِكُمْ
तुम्हें
أَذًۭى
कोई तकलीफ़
مِّن
(because) of
مَّطَرٍ
बारिश से
أَوْ
या
كُنتُم
हो तुम
مَّرْضَىٰٓ
बीमार
أَن
कि
تَضَعُوٓا۟
तुम रख दो
أَسْلِحَتَكُمْ ۖ
अस्लिहा अपना
وَخُذُوا۟
और पकड़े रहो
حِذْرَكُمْ ۗ
बचाव अपना
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
أَعَدَّ
तैयार कर रखा है
لِلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के लिए
عَذَابًۭا
अज़ाब
مُّهِينًۭا
रुस्वाकुन
और जब तुम उनके बीच हो और (लड़ाई की दशा में) उन्हें नमाज़ पढ़ाने के लिए खड़े हो, जो चाहिए कि उनमें से एक गिरोह के लोग तुम्हारे साथ खड़े हो जाएँ और अपने हथियार साथ लिए रहें, और फिर जब वे सजदा कर लें तो उन्हें चाहिए कि वे हटकर तुम्हारे पीछे हो जाएँ और दूसरे गिरोंह के लोग, जिन्होंने अभी नमाज़ नही पढ़ी, आएँ और तुम्हारे साथ नमाज़ पढ़े, और उन्हें भी चाहिए कि वे भी अपने बचाव के सामान और हथियार लिए रहें। विधर्मी चाहते ही है कि वे भी अपने हथियारों और सामान से असावधान हो जाओ तो वे तुम पर एक साथ टूट पड़े। यदि वर्षा के कारण तुम्हें तकलीफ़ होती हो या तुम बीमार हो, तो तुम्हारे लिए कोई गुनाह नहीं कि अपने हथियार रख दो, फिर भी अपनी सुरक्षा का सामान लिए रहो। अल्लाह ने विधर्मियों के लिए अपमानजनक यातना तैयार कर रखी है
तफ़्सीर:
जब - ऐ रसूल! - आप दुश्मन से युद्ध के समय सेना के साथ रहें और लोगों को नमाज़ पढ़ाना चाहें, तो सेना को दो समूहों में विभाजित कर दें : एक समूह आपके साथ नमाज़ पढ़े और नमाज़ के समय हथियार अपने साथ रखे। दूसरा समूह तुम्हारी पहरेदारी करे। जब पहला समूह इमाम के साथ एक रक्अत पढ़ ले, तो अकेले नमाज़ पूरी कर ले। जब वह नमाज़ पढ़ चुके तो तुम्हारे पीछे दुश्मन की ओर खड़ा हो जाए और वह समूह आए जो पहरेदारी में लगे होने के कारण नमाज़ नहीं पढ़ सका था और इमाम के साथ एक रक्अत नमाज़ पढ़े। जब इमाम सलाम फेर दे, तो वह अपनी बाक़ी नमाज़ पूरी करे और दुश्मन से बचाव के लिए अपने हथियार उठाए रखे। क्योंकि काफ़िर चाहते हैं कि नमाज़ के समय तुम अपने हथियारों और सामानों से बेख़बर हो जाओ और वे तुमपर यकायक धावा बोल दें और तुम्हारी असावधानी की हालत में तुम्हें पकड़ लें। यदि वर्षा के कारण तुम्हें कष्ट हो अथवा तुम बीमार आदि हो, तो तुमपर कोई गुनाह नहीं है कि तुम अपने हथियार रख दो और उसे उठाए न रहो, परंतु जहाँ तक हो सके अपने दुश्मन से सावधान रहो। निःसंदेह अल्लाह ने काफ़िरों के लिए अपमानकारी यातना तैयार कर रखी है।
आयत 103
فَإِذَا قَضَيْتُمُ ٱلصَّلَوٰةَ فَٱذْكُرُوا۟ ٱللَّهَ قِيَـٰمًۭا وَقُعُودًۭا وَعَلَىٰ جُنُوبِكُمْ ۚ فَإِذَا ٱطْمَأْنَنتُمْ فَأَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ ۚ إِنَّ ٱلصَّلَوٰةَ كَانَتْ عَلَى ٱلْمُؤْمِنِينَ كِتَـٰبًۭا مَّوْقُوتًۭا
فَإِذَا
फिर जब
قَضَيْتُمُ
पूरा कर चुको तुम
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़ को
فَٱذْكُرُوا۟
तो याद करो
ٱللَّهَ
अल्लाह को
قِيَـٰمًۭا
खड़े
وَقُعُودًۭا
और बैठे
وَعَلَىٰ
and (lying) on
جُنُوبِكُمْ ۚ
और अपने पहलुओं पर
فَإِذَا
फिर जब
ٱطْمَأْنَنتُمْ
इत्मिनान में आ जाओ तुम
فَأَقِيمُوا۟
तो क़ायम करो
ٱلصَّلَوٰةَ ۚ
नमाज़
إِنَّ
बेशक
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
كَانَتْ
है
عَلَى
on
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों पर
كِتَـٰبًۭا
फ़र्ज़
مَّوْقُوتًۭا
मुक़र्रर औक़ात में
फिर जब तुम नमाज़ अदा कर चुको तो खड़े, बैठे या लेटे अल्लाह को याद करते रहो। फिर जब तुम्हें इतमीनान हो जाए तो विधिवत रूप से नमाज़ पढ़ो। निस्संदेह ईमानवालों पर समय की पाबन्दी के साथ नमाज़ पढना अनिवार्य है
तफ़्सीर:
जब - ऐ मोमिनो - तुम नमाज़ अदा कर चुको, तो खड़े, बैठे और लेटे अपनी सभी परिस्थितियों में तस्बीह, तहमीद और तहलील के साथ अल्लाह को याद करो। फिर जब तुम्हारा भय दूर हो जाए और तुम निश्चिंत हो जाओ तो नमाज़ को उसके अर्कान, वाजिबात और मुस्तह़ब्बात के साथ पूर्ण रूप से अदा करो, जैसा कि तुम्हें आदेश दिया गया है। निःसंदेह नमाज़ मोमिनों पर एक नियत समय के साथ फ़र्ज की गई है। उसे बिना किसी कारण के उसके निर्धारित समय से विलंब करना जायज़ नहीं है। यह किसी स्थान पर निवास करने की स्थिति में है, लेकिन यात्रा की हालत में तुम्हारे लिए दो नमाजों को एक साथ पढ़ना तथा चार रक्अत वाली नमाज़ को क़स्र करके दो रक्अत पढ़ना जायज़ है।
आयत 104
وَلَا تَهِنُوا۟ فِى ٱبْتِغَآءِ ٱلْقَوْمِ ۖ إِن تَكُونُوا۟ تَأْلَمُونَ فَإِنَّهُمْ يَأْلَمُونَ كَمَا تَأْلَمُونَ ۖ وَتَرْجُونَ مِنَ ٱللَّهِ مَا لَا يَرْجُونَ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلِيمًا حَكِيمًا
وَلَا
और ना
تَهِنُوا۟
तुम कमज़ोरी दिखाओ
فِى
in
ٱبْتِغَآءِ
तलाश में
ٱلْقَوْمِ ۖ
क़ौम की (दुश्मन)
إِن
अगर
تَكُونُوا۟
हो तुम
تَأْلَمُونَ
तकलीफ़ उठाते
فَإِنَّهُمْ
तो बेशक वो (भी)
يَأْلَمُونَ
वो तकलीफ़ उठाते हैं
كَمَا
जैसा कि
تَأْلَمُونَ ۖ
तुम तकलीफ़ उठाते हो
وَتَرْجُونَ
और तुम उम्मीद रखते हो
مِنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह से
مَا
उसकी जो
لَا
not
يَرْجُونَ ۗ
नहीं वो उम्मीद रखते
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلِيمًا
बहुत इल्म वाला
حَكِيمًا
बहुत हिकमत वाला
और उन लोगों का पीछा करने में सुस्ती न दिखाओ। यदि तुम्हें दुख पहुँचता है; तो उन्हें भी दुख पहुँचता है, जिस तरह तुमको दुख पहुँचता है। और तुम अल्लाह से उस चीज़ की आशा करते हो, जिस चीज़ की वे आशा नहीं करते। अल्लाह तो सब कुछ जाननेवाला, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
- ऐ मोमिनो - अपने काफ़िर दुश्मनों का पीछा करने में कमज़ोर और आलसी न बनो। यदि तुम्हें अपने आपको पहुँचने वाले क़त्ल और आघात से तकलीफ़ महसूस होती है, तो इसी तरह वे भी तकलीफ़ महसूस करते हैं जिस तरह तुम तकलीफ़ महसूस करते हो, तथा उन्हें भी कष्ट पहुँचता है जिस तरह तुमहें कष्ट पहुँचता है। अतः उनका धैर्य तुम्हारे धैर्य से बढ़कर नहीं होना चाहिए। क्योंकि तुम्हें अल्लाह से जिस सवाब, सहायता और समर्थन की आशा है, उसकी आशा उन्हें नहीं है। और अल्लाह अपने बंदों की स्थितियों से अवगत, तथा अपने प्रबंधन और विधान-रचना में हिकमत वाला है।
आयत 105
إِنَّآ أَنزَلْنَآ إِلَيْكَ ٱلْكِتَـٰبَ بِٱلْحَقِّ لِتَحْكُمَ بَيْنَ ٱلنَّاسِ بِمَآ أَرَىٰكَ ٱللَّهُ ۚ وَلَا تَكُن لِّلْخَآئِنِينَ خَصِيمًۭا
إِنَّآ
बेशक हम
أَنزَلْنَآ
नाज़िल की हमने
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
لِتَحْكُمَ
ताकि आप फ़ैसला करें
بَيْنَ
दर्मियान
ٱلنَّاسِ
लोगों के
بِمَآ
साथ उसके जो
أَرَىٰكَ
दिखाया आपको
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह ने
وَلَا
और ना
تَكُن
आप हों
لِّلْخَآئِنِينَ
ख़यानत करने वालों के लिए
خَصِيمًۭا
झगड़ा करने वाले
निस्संदेह हमने यह किताब हक़ के साथ उतारी है, ताकि अल्लाह ने जो कुछ तुम्हें दिखाया है उसके अनुसार लोगों के बीच फ़ैसला करो। और तुम विश्वासघाती लोगों को ओर से झगड़नेवाले न बनो
तफ़्सीर:
हमने - ऐ रसूल - आपकी ओर सत्य पर आधारित क़ुरआन उतारा है; ताकि आप लोगों के बीच उनके सभी मामलों में उसके अनुसार फ़ैसला करें, जो अल्लाह ने आपको सिखाया और आपके दिल में डाला है, न कि अपने मन की आकांक्षा और राय के अनुसार। तथा आप स्वयं के साथ विश्वासघात करने वालों और अमानतों में ख़यानत करने वालों के तरफ़दार न बनें कि उनसे अधिकार माँगने वालों से उनका बचाव करें।
आयत 106
وَٱسْتَغْفِرِ ٱللَّهَ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا
وَٱسْتَغْفِرِ
और बख़्शिश माँगिए
ٱللَّهَ ۖ
अल्लाह से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
غَفُورًۭا
बहुत बख़्शने वाला
رَّحِيمًۭا
निहायत रहम करने वाला
अल्लाह से क्षमा की प्रार्थना करो। निस्संदेह अल्लाह बहुत क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
अल्लाह से क्षमा और माफ़ी की याचना करें। निःसंदेह अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदे को क्षमा करने वाला और उसपर दया करने वाला है।
आयत 107
وَلَا تُجَـٰدِلْ عَنِ ٱلَّذِينَ يَخْتَانُونَ أَنفُسَهُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ مَن كَانَ خَوَّانًا أَثِيمًۭا
وَلَا
और ना
تُجَـٰدِلْ
आप झगड़ा करें
عَنِ
for
ٱلَّذِينَ
उनकी तरफ़ से जो
يَخْتَانُونَ
ख़यानत करते हैं
أَنفُسَهُمْ ۚ
अपने नफ़्सों से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يُحِبُّ
नहीं पसंद करता
مَن
उसको जो
كَانَ
हो
خَوَّانًا
बहुत ख़ाइन
أَثِيمًۭا
बहुत गुनाहगार
और तुम उन लोगों की ओर से न झगड़ो जो स्वयं अपनों के साथ विश्वासघात करते है। अल्लाह को ऐसा व्यक्ति प्रिय नहीं है जो विश्वासघाती, हक़ मारनेवाला हो
तफ़्सीर:
आप किसी ऐसे व्यक्ति का पक्ष न लें, जो विश्वासघात करता है और अपने विश्वासघात को छिपाने में अतिशयोक्ति करता है। और अल्लाह ऐसे व्यक्ति को पसंद नहीं करता जो बहुत विश्वासघात और पाप करने वाला है।
आयत 108
يَسْتَخْفُونَ مِنَ ٱلنَّاسِ وَلَا يَسْتَخْفُونَ مِنَ ٱللَّهِ وَهُوَ مَعَهُمْ إِذْ يُبَيِّتُونَ مَا لَا يَرْضَىٰ مِنَ ٱلْقَوْلِ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ بِمَا يَعْمَلُونَ مُحِيطًا
يَسْتَخْفُونَ
वो छुप सकते हैं
مِنَ
from
ٱلنَّاسِ
लोगों से
وَلَا
और नहीं
يَسْتَخْفُونَ
वो छुप सकते
مِنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह से
وَهُوَ
और वो
مَعَهُمْ
उनके साथ है
إِذْ
जब
يُبَيِّتُونَ
वो रातों को मशवरे करते हैं
مَا
जो
لَا
not
يَرْضَىٰ
नहीं वो पसंद करता
مِنَ
of
ٱلْقَوْلِ ۚ
बात में से
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِمَا
उसको जो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते हैं
مُحِيطًا
घेरने वाला
वे लोगों से तो छिपते है, परन्तु अल्लाह से नहीं छिपते। वह तो (उस समय भी) उनके साथ होता है, जब वे रातों में उस बात की गुप्त-मंत्रणा करते है जो उनकी इच्छा के विरुद्ध होती है। जो कुछ वे करते है, वह अल्लाह (के ज्ञान) से आच्छदित है
तफ़्सीर:
वे गुनाह करते समय भय और शर्म के कारण लोगों से छिपते हैं, परंतु अल्लाह से नहीं छिपते। हालाँकि अल्लाह अपने ज्ञान के द्वारा उनके साथ होता है। उससे उस समय उनकी कोई बात छिपी नहीं होती है, जब वे गुप्त रूप से ऐसी बात की योजना बनाते हैं, जो अल्लाह को पसंद नहीं है। जैसे कि दोषी का बचाव करना और निर्दोष पर आरोप लगाना। तथा वे जो कुछ गुप्त रूप से और सार्वजनिक रूप से करते हैं, अल्लाह उससे अच्छी तरह अवगत है। उससे कुछ भी छिपा नहीं है और वह उन्हें उनके कार्यों का बदला देगा।
आयत 109
هَـٰٓأَنتُمْ هَـٰٓؤُلَآءِ جَـٰدَلْتُمْ عَنْهُمْ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا فَمَن يُجَـٰدِلُ ٱللَّهَ عَنْهُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ أَم مَّن يَكُونُ عَلَيْهِمْ وَكِيلًۭا
هَـٰٓأَنتُمْ
ख़बरदार तुम
هَـٰٓؤُلَآءِ
वो लोग हो
جَـٰدَلْتُمْ
झगड़ा किया तुमने
عَنْهُمْ
उनकी तरफ़ से
فِى
in
ٱلْحَيَوٰةِ
the life
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की ज़िन्दगी में
فَمَن
तो कौन
يُجَـٰدِلُ
झगड़ा करेगा
ٱللَّهَ
अल्लाह से
عَنْهُمْ
उनके बारे में
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
أَم
या
مَّن
कौन
يَكُونُ
होगा
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَكِيلًۭا
कारसाज़
हाँ, ये तुम ही हो, जिन्होंने सांसारिक जीवन में उनको ओर से झगड़ लिया, परन्तु क़ियामत के दिन उनकी ओर से अल्लाह से कौन झगड़ेगा या कौन उनका वकील होगा?
तफ़्सीर:
सुनो, - ऐ इन अपराध करने वालों की परवाह करने वालो!- तुमने दुनिया के जीवन में इनकी ओर से झगड़ लिया ताकि तुम इनकी बेगुनाही साबित कर सको और उन्हें सज़ा से बचा सको। परंतु क़यामत के दिन इनकी ओर से अल्लाह के साथ कौन बहस करेगा, जबकि वह इनकी स्थिति की सच्चाई को जानता है?! तथा उस दिन इनका वकील कौन होगा?! इसमें कोई शक नहीं कि कोई भी ऐसा नहीं कर सकता।
आयत 110
وَمَن يَعْمَلْ سُوٓءًا أَوْ يَظْلِمْ نَفْسَهُۥ ثُمَّ يَسْتَغْفِرِ ٱللَّهَ يَجِدِ ٱللَّهَ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا
وَمَن
और जो कोई
يَعْمَلْ
अमल करे
سُوٓءًا
बुरा
أَوْ
या
يَظْلِمْ
वो ज़ुल्म करे
نَفْسَهُۥ
अपनी जान पर
ثُمَّ
फिर
يَسْتَغْفِرِ
वो बख़्शिश माँगे
ٱللَّهَ
अल्लाह से
يَجِدِ
वो पाएगा
ٱللَّهَ
अल्लाह को
غَفُورًۭا
बहुत बख़्शने वाला
رَّحِيمًۭا
निहायत रहम करने वाला
और जो कोई बुरा कर्म कर बैठे या अपने-आप पर अत्याचार करे, फिर अल्लाह से क्षमा की प्रार्थना करे, तो अल्लाह को बड़ा क्षमाशील, दयावान पाएगा
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति कोई बुरा काम करे अथवा पाप करके अपने ऊपर अत्याचार करे, फिर वह अपने गुनाह को स्वीकारते हुए, उसपर पछतावा करते हुए और उसे छोड़ते हुए अल्लाह से क्षमा याचना करे, तो वह अल्लाह को हमेशा उसके गुनाहों को क्षमा करने वाला, उसपर दयावान पाएगा।
आयत 111
وَمَن يَكْسِبْ إِثْمًۭا فَإِنَّمَا يَكْسِبُهُۥ عَلَىٰ نَفْسِهِۦ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلِيمًا حَكِيمًۭا
وَمَن
और जो कोई
يَكْسِبْ
कमाए
إِثْمًۭا
कोई गुनाह
فَإِنَّمَا
तो बेशक
يَكْسِبُهُۥ
वो कमाता है उसे
عَلَىٰ
against
نَفْسِهِۦ ۚ
अपने ख़िलाफ़
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلِيمًا
बहुत इल्म वाला
حَكِيمًۭا
बहुत हिकमत वाला
और जो व्यक्ति गुनाह कमाए, तो वह अपने ही लिए कमाता है। अल्लाह तो सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति कोई छोटा या बड़ा पाप करता है, तो उसकी सज़ा अकेले उसी पर है, उसके अलावा किसी और पर नहीं। तथा अल्लाह बंदों के कृत्यों को जानने वाला, अपने प्रबंधन और विधान-रचना में हिकमत वाला है।
आयत 112
وَمَن يَكْسِبْ خَطِيٓـَٔةً أَوْ إِثْمًۭا ثُمَّ يَرْمِ بِهِۦ بَرِيٓـًۭٔا فَقَدِ ٱحْتَمَلَ بُهْتَـٰنًۭا وَإِثْمًۭا مُّبِينًۭا
وَمَن
और जो कोई
يَكْسِبْ
कमाए
خَطِيٓـَٔةً
कोई ख़ता
أَوْ
या
إِثْمًۭا
कोई गुनाह
ثُمَّ
फिर
يَرْمِ
वो इल्ज़ाम लगाए
بِهِۦ
साथ उसके
بَرِيٓـًۭٔا
किसी बेगुनाह पर
فَقَدِ
पस तहक़ीक़
ٱحْتَمَلَ
उसने उठाया
بُهْتَـٰنًۭا
बोहतान
وَإِثْمًۭا
और गुनाह
مُّبِينًۭا
खुल्लम-खुल्ला
और जो व्यक्ति कोई ग़लती या गुनाह की कमाई करे, फिर उसे किसी निर्दोष पर थोप दे, तो उसने एक बड़े लांछन और खुले गुनाह का बोझ अपने ऊपर ले लिया
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति बिना सोचे समझे कोई ग़लती कर बैठे अथवा जानबूझकर कोई पाप कर ले, फिर उसका आरोप किसी ऐसे आदमी पर मढ़ दे जो उस पाप से निर्दोष है, तो उसने ऐसा करके गंभीर झूठ और खुले गुनाह का बोझ लाद लिया।
आयत 113
وَلَوْلَا فَضْلُ ٱللَّهِ عَلَيْكَ وَرَحْمَتُهُۥ لَهَمَّت طَّآئِفَةٌۭ مِّنْهُمْ أَن يُضِلُّوكَ وَمَا يُضِلُّونَ إِلَّآ أَنفُسَهُمْ ۖ وَمَا يَضُرُّونَكَ مِن شَىْءٍۢ ۚ وَأَنزَلَ ٱللَّهُ عَلَيْكَ ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْحِكْمَةَ وَعَلَّمَكَ مَا لَمْ تَكُن تَعْلَمُ ۚ وَكَانَ فَضْلُ ٱللَّهِ عَلَيْكَ عَظِيمًۭا
وَلَوْلَا
और अगर ना होता
فَضْلُ
फ़ज़ल
ٱللَّهِ
अल्लाह का
عَلَيْكَ
आप पर
وَرَحْمَتُهُۥ
और रहमत उसकी
لَهَمَّت
अलबत्ता इरादा कर लिया था
طَّآئِفَةٌۭ
एक गिरोह ने
مِّنْهُمْ
उनमें से
أَن
कि
يُضِلُّوكَ
वो बहका दें आपको
وَمَا
और नहीं
يُضِلُّونَ
वो बहकाते
إِلَّآ
मगर
أَنفُسَهُمْ ۖ
अपने आपको
وَمَا
और नहीं
يَضُرُّونَكَ
वो नुक़सान दे सकते आपको
مِن
in
شَىْءٍۢ ۚ
कुछ भी
وَأَنزَلَ
और नाज़िल की
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَيْكَ
आप पर
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
وَٱلْحِكْمَةَ
और हिकमत
وَعَلَّمَكَ
और सिखाया आपको
مَا
वो जो
لَمْ
ना
تَكُن
थे आप
تَعْلَمُ ۚ
आप जानते
وَكَانَ
और है
فَضْلُ
फ़ज़ल
ٱللَّهِ
अल्लाह का
عَلَيْكَ
आप पर
عَظِيمًۭا
बहुत बड़ा
यदि तुमपर अल्लाह का उदार अनुग्रह और उसकी दयालुता न होती तो उनमें से कुछ लोग तो यह निश्चय कर ही चुके थे कि तुम्हें राह से भटका दें, हालाँकि वे अपने आप ही को पथभ्रष्टि कर रहे है, और तुम्हें वे कोई हानि नहीं पहुँचा सकते। अल्लाह ने तुमपर किताब और हिकमत (तत्वदर्शिता) उतारी है और उसने तुम्हें वह कुछ सिखाया है जो तुम जानते न थे। अल्लाह का तुमपर बहुत बड़ा अनुग्रह है
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) यदि अल्लाह ने अपने अनुग्रह से आपको बचाया न होता, तो अपने साथ विश्वासघात करने वाले इन लोगों के एक समूह ने आपको सत्य से गुमराह करने का निर्णय कर लिया था, ताकि आप न्याय के बिना फ़ैसला करें। हालाँकि वास्तव में वे केवल अपने आपको गुमराह कर रहे हैं। क्योंकि उनके गुमराह करने के प्रयास का परिणाम उन्हीं को भुगतना पड़ेगा। और अल्लाह के आपको संरक्षण प्रदान करने के कारण वे आपको नुकसान नहीं पहुँचा सकते हैं। अल्लाह ने आप पर क़ुरआन एवं सुन्नत उतारी है और आपको हिदायत एवं प्रकाश का वह ज्ञान प्रदान किया है, जो आप उससे पहले नहीं जानते थे। तथा नुबुव्वत (ईश्दूतत्व) और संरक्षण द्वारा आपपर अल्लाह का अनुग्रह बहुत बड़ा था।
आयत 114
۞ لَّا خَيْرَ فِى كَثِيرٍۢ مِّن نَّجْوَىٰهُمْ إِلَّا مَنْ أَمَرَ بِصَدَقَةٍ أَوْ مَعْرُوفٍ أَوْ إِصْلَـٰحٍۭ بَيْنَ ٱلنَّاسِ ۚ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ ٱبْتِغَآءَ مَرْضَاتِ ٱللَّهِ فَسَوْفَ نُؤْتِيهِ أَجْرًا عَظِيمًۭا
۞ لَّا
(There is) no
خَيْرَ
नहीं कोई भलाई
فِى
in
كَثِيرٍۢ
बहुत सी
مِّن
of
نَّجْوَىٰهُمْ
उनकी सरगोशियों में
إِلَّا
सिवाय
مَنْ
उसके जो
أَمَرَ
हुक्म दे
بِصَدَقَةٍ
सदक़ा का
أَوْ
या
مَعْرُوفٍ
नेकी का
أَوْ
या
إِصْلَـٰحٍۭ
इस्लाह का
بَيْنَ
दर्मियान
ٱلنَّاسِ ۚ
लोगों के
وَمَن
और जो कोई
يَفْعَلْ
करेगा
ذَٰلِكَ
ये
ٱبْتِغَآءَ
चाहने को
مَرْضَاتِ
रज़ा / रज़ामन्दी
ٱللَّهِ
अल्लाह की
فَسَوْفَ
तो अनक़रीब
نُؤْتِيهِ
हम देंगे उसे
أَجْرًا
अजर
عَظِيمًۭا
बहुत बड़ा
उनकी अधिकतर काना-फूसियों में कोई भलाई नहीं होती। हाँ, जो व्यक्ति सदक़ा देने या भलाई करने या लोगों के बीच सुधार के लिए कुछ कहे, तो उसकी बात और है। और जो कोई यह काम अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए करेगा, उसे हम निश्चय ही बड़ा प्रतिदान प्रदान करेंगे
तफ़्सीर:
बहुत-सी ऐसी बातें जो लोग छिपाकर करते हैं,उनमें कोई भलाई नहीं है और न उनसे कोई लाभ मिलता है। हाँ, अगर उनकी बात में दान का या किसी ऐसी बात (नेकी) का आदेश हो जो शरीयत द्वारा आई हो और बुद्धि ने उसकी पुष्टि की हो, या दो झगड़ने वालों के बीच सुलह-सफाई का आह्वान हो (तो यह भली बात है)। तथा जो व्यक्ति अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए ऐसा करेगा, हम जल्द ही उसे बहुत बड़ा सवाब प्रदान करेंगे।
आयत 115
وَمَن يُشَاقِقِ ٱلرَّسُولَ مِنۢ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُ ٱلْهُدَىٰ وَيَتَّبِعْ غَيْرَ سَبِيلِ ٱلْمُؤْمِنِينَ نُوَلِّهِۦ مَا تَوَلَّىٰ وَنُصْلِهِۦ جَهَنَّمَ ۖ وَسَآءَتْ مَصِيرًا
وَمَن
और जो कोई
يُشَاقِقِ
मुख़ालिफ़त करे
ٱلرَّسُولَ
रसूल की
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद उसके
مَا
जो
تَبَيَّنَ
वाज़ेह हो गई
لَهُ
उसके लिए
ٱلْهُدَىٰ
हिदायत
وَيَتَّبِعْ
और पैरवी करे
غَيْرَ
other than
سَبِيلِ
(the) way
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों के रास्ते के अलावा
نُوَلِّهِۦ
हम फेर देंगे उसे
مَا
जिधर
تَوَلَّىٰ
वो फिर गया
وَنُصْلِهِۦ
और हम जलाऐंगे उसे
جَهَنَّمَ ۖ
जहन्नम में
وَسَآءَتْ
और कितनी बुरी है
مَصِيرًا
लौटने की जगह
और जो क्यक्ति, इसके पश्चात भी मार्गदर्शन खुलकर उसके सामने आ गया है, रसूल का विरोध करेगा और ईमानवालों के मार्ग के अतिरिक्त किसी और मार्ग पर चलेगा तो उसे हम उसी पर चलने देंगे, जिसको उसने अपनाया होगा और उसे जहन्नम में झोंक देंगे, और वह बहुत ही बुरा ठिकाना है
तफ़्सीर:
जो अपने सामने सत्य स्पष्ट हो जाने के बावजूद रसूल से दुश्मनी करेगा, उनके लाए हुए धर्म का विरोध करेगा और मोमिनों के मार्ग को छोड़कर दूसरे मार्ग पर चलेगा, हम उसे उसके चुने हुए मार्ग पर छोड़ देंगे। उसके जानबूझकर सत्य से मुँह फेरने के कारण हम उसे सत्य मार्ग की तौफ़ीक़ नहीं देंगे और उसे जहन्नम की आग में दाख़िल करेंगे, जहाँ वह उसके ताप को झेलेगा। यह उसमें रहने वालों का बुरा ठिकाना है।
आयत 116
إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَن يُشْرَكَ بِهِۦ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَٰلِكَ لِمَن يَشَآءُ ۚ وَمَن يُشْرِكْ بِٱللَّهِ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَـٰلًۢا بَعِيدًا
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
does not
يَغْفِرُ
नहीं बख़्शेगा
أَن
कि
يُشْرَكَ
शिर्क किया जाए
بِهِۦ
साथ उसके
وَيَغْفِرُ
और वो बख्श देगा
مَا
जो
دُونَ
अलावा हो
ذَٰلِكَ
उसके
لِمَن
जिसके लिए
يَشَآءُ ۚ
वो चाहेगा
وَمَن
और जो कोई
يُشْرِكْ
शिर्क करेगा
بِٱللَّهِ
साथ अल्लाह के
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
ضَلَّ
वो भटक गया
ضَلَـٰلًۢا
भटकना
بَعِيدًا
बहुत दूर का
निस्संदेह अल्लाह इस चीज़ को क्षमा नहीं करेगा कि उसके साथ किसी को शामिल किया जाए। हाँ, इससे नीचे दर्जे के अपराध को, जिसके लिए चाहेगा, क्षमा कर देगा। जो अल्लाह के साथ किसी को साझी ठहराता है, तो वह भटककर बहुत दूर जा पड़ा
तफ़्सीर:
निःसंदेह अल्लाह इस बात को क्षमा नहीं करेगा कि किसी को उसका साझी बनाया जाए, बल्कि साझी बनाने वाले को हमेशा के लिए जहन्नम में डाल देगा। लेकिन शिर्क से कमतर गुनाहों को जिसके लिए चाहेगा अपनी दया एवं कृपा से माफ़ कर देगा। जो किसी को अल्लाह का साझी बनाता है, वह निश्चय ही सत्य मार्ग से भटक गया और उससे बहुत दूर हो गया; क्योंकि उसने सृष्टि और सृष्टिकर्ता को बराबर बना दिया।
आयत 117
إِن يَدْعُونَ مِن دُونِهِۦٓ إِلَّآ إِنَـٰثًۭا وَإِن يَدْعُونَ إِلَّا شَيْطَـٰنًۭا مَّرِيدًۭا
إِن
नहीं
يَدْعُونَ
वो पुकारते
مِن
from
دُونِهِۦٓ
उसके सिवा
إِلَّآ
मगर
إِنَـٰثًۭا
औरतों / देवियों को
وَإِن
और नहीं
يَدْعُونَ
वो पुकारते
إِلَّا
मगर
شَيْطَـٰنًۭا
शैतान
مَّرِيدًۭا
सरकश को
वे अल्लाह से हटकर बस कुछ देवियों को पुकारते है। और वे तो बस सरकश शैतान को पुकारते है;
तफ़्सीर:
ये मुश्रिक (बहुदेववादी) अल्लाह के साथ जिनकी पूजा करते और पुकारते हैं, वे केवल महिलाओं के नाम की मूर्तियाँ हैं, जैसे कि लात और उज़्ज़ा,जो न लाभ पहुँचा सकती हैं, न हानि। वास्तव में, वे केवल एक ऐसे शैतान की पूजा करते हैं जो अल्लाह की आज्ञाकारिता से निकला हुआ है और उसमें कोई अच्छाई नहीं है; क्योंकि उसी ने उन्हें मूर्तियों की पूजा करने का आदेश दिया है।
आयत 118
لَّعَنَهُ ٱللَّهُ ۘ وَقَالَ لَأَتَّخِذَنَّ مِنْ عِبَادِكَ نَصِيبًۭا مَّفْرُوضًۭا
لَّعَنَهُ
लानत की उस पर
ٱللَّهُ ۘ
अल्लाह ने
وَقَالَ
और कहा उसने
لَأَتَّخِذَنَّ
अलबत्ता मैं ज़रूर लेकर रहूँगा
مِنْ
from
عِبَادِكَ
तेरे बन्दों में से
نَصِيبًۭا
एक हिस्सा
مَّفْرُوضًۭا
मुक़र्रर
जिसपर अल्लाह की फिटकार है। उसने कहा था, "मैं तेरे बन्दों में से एख निश्चित हिस्सा लेकर रहूँगा
तफ़्सीर:
इसलिए, अल्लाह ने उसे अपनी दया से निष्कासित कर दिया। इस शैतान ने क़सम खाकर अपने पालनहार से कहा था : मैं अवश्य तेरे बंदों में से एक ज्ञात हिस्सा अपने साथ कर लूँगा, जिन्हें सत्य से बहकाऊँगा।
आयत 119
وَلَأُضِلَّنَّهُمْ وَلَأُمَنِّيَنَّهُمْ وَلَـَٔامُرَنَّهُمْ فَلَيُبَتِّكُنَّ ءَاذَانَ ٱلْأَنْعَـٰمِ وَلَـَٔامُرَنَّهُمْ فَلَيُغَيِّرُنَّ خَلْقَ ٱللَّهِ ۚ وَمَن يَتَّخِذِ ٱلشَّيْطَـٰنَ وَلِيًّۭا مِّن دُونِ ٱللَّهِ فَقَدْ خَسِرَ خُسْرَانًۭا مُّبِينًۭا
وَلَأُضِلَّنَّهُمْ
और अलबत्ता मैं ज़रूर भटकाऊँगा उन्हें
وَلَأُمَنِّيَنَّهُمْ
और अलबत्ता मैं ज़रूर उम्मीदें दिलाऊँगा उन्हें
وَلَـَٔامُرَنَّهُمْ
और अलबत्ता मैं ज़रूर हुक्म दूँगा उन्हें
فَلَيُبَتِّكُنَّ
फिर अलबत्ता वो ज़रूर काटेंगे
ءَاذَانَ
कान
ٱلْأَنْعَـٰمِ
मवेशियों के
وَلَـَٔامُرَنَّهُمْ
और अलबत्ता मैं ज़रूर हुक्म दूँगा उन्हें
فَلَيُغَيِّرُنَّ
पस अलबत्ता वो ज़रूर बदल देंगे
خَلْقَ
तख़्लीक़
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह की
وَمَن
और जो कोई
يَتَّخِذِ
बनाएगा
ٱلشَّيْطَـٰنَ
शैतान को
وَلِيًّۭا
दोस्त
مِّن
from
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
خَسِرَ
उसने नुक़सान उठाया
خُسْرَانًۭا
नुक़सान उठाना
مُّبِينًۭا
खुल्लम-खुल्ला
"और उन्हें अवश्य ही भटकाऊँगा और उन्हें कामनाओं में उलझाऊँगा, और उन्हें हुक्म दूँगा तो वे चौपायों के कान फाड़ेगे, और उन्हें मैं सुझाव दूँगा तो वे अल्लाह की संरचना में परिवर्तन करेंगे।" और जिसने अल्लाह से हटकर शैतान को अपना संरक्षक और मित्र बनाया, वह खुले घाटे में पड़ गया
तफ़्सीर:
मैं उन्हें ज़रूर तेरे सीधे मार्ग से रोकूँगा, उन्हें अवश्य उनकी गुमराही को सजाने वाले झूठे वादों के साथ उम्मीदें दिलाऊँगा। अल्लाह के हलाल किए हुए जानवरों को हराम करने के लिए, उन्हें जानवरों के कान काटने का आदेश दूँगा। तथा उन्हें अल्लाह की रचना और उसकी प्रकृति को बदलने के लिए भी ज़रूर आदेश दूँगा। तथा जो शैतान को अपना सहायक व दोस्त बनाकर, उससे दोस्ती निभाता और उसकी आज्ञा का पालन करता है, तो वह धिक्कारित शैतान से वफादारी करके एक स्पष्ट नुक़सान में पड़ गया।
आयत 120
يَعِدُهُمْ وَيُمَنِّيهِمْ ۖ وَمَا يَعِدُهُمُ ٱلشَّيْطَـٰنُ إِلَّا غُرُورًا
يَعِدُهُمْ
वो वादा करता है उनसे
وَيُمَنِّيهِمْ ۖ
और उम्मीदें दिलाता है उन्हें
وَمَا
और नहीं
يَعِدُهُمُ
वादा करता उनसे
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान
إِلَّا
मगर
غُرُورًا
धोखे का
वह उनसे वादा करता है और उन्हें कामनाओं में उलझाए रखता है, हालाँकि शैतान उनसे जो कुछ वादा करता है वह एक धोके के सिवा कुछ भी नहीं होता
तफ़्सीर:
शैतान उनसे झूठे वादे करता है और उन्हें झूठी उम्मीदें दिलाता है। हालाँकि, वास्तव में, वह उनसे झूठा वादा करता है, जिसकी कोई सच्चाई नहीं होती है।
आयत 121
أُو۟لَـٰٓئِكَ مَأْوَىٰهُمْ جَهَنَّمُ وَلَا يَجِدُونَ عَنْهَا مَحِيصًۭا
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
مَأْوَىٰهُمْ
ठिकाना उनका
جَهَنَّمُ
जहन्नम है
وَلَا
और नहीं
يَجِدُونَ
वो पाऐंगे
عَنْهَا
उससे
مَحِيصًۭا
कोई जाए पनाह
वही लोग है जिनका ठिकाना जहन्नम है और वे उससे अलग होने की कोई जगह न पाएँगे
तफ़्सीर:
शैतान के नक्शेकदम और उसकी सिखाई हुई बातों का पालन करने वाले लोगों का ठिकाना जहन्नम की आग है, जिससे भाग निकलने का कोई स्थान नहीं पाएँगे जहाँ वे पनाह ले सकें।
आयत 122
وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ سَنُدْخِلُهُمْ جَنَّـٰتٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدًۭا ۖ وَعْدَ ٱللَّهِ حَقًّۭا ۚ وَمَنْ أَصْدَقُ مِنَ ٱللَّهِ قِيلًۭا
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
سَنُدْخِلُهُمْ
अनक़रीब हम दाख़िल करेंगे उन्हें
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात में
تَجْرِى
बहती हैं
مِن
from
تَحْتِهَا
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَآ
उनमें
أَبَدًۭا ۖ
अब्द तक / हमेशा-हमेशा
وَعْدَ
वादा है
ٱللَّهِ
अल्लाह का
حَقًّۭا ۚ
सच्चा
وَمَنْ
और कौन
أَصْدَقُ
ज़्यादा सच्चा है
مِنَ
than
ٱللَّهِ
अल्लाह से
قِيلًۭا
बात में
रहे वे लोग जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, उन्हें हम जल्द ही ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेंगे, जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, जहाँ वे सदैव रहेंगे। अल्लाह का वादा सच्चा है, और अल्लाह से बढ़कर बात का सच्चा कौन हो सकता है?
तफ़्सीर:
जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए और उससे क़रीब करने वाले अच्छे कार्य किए, हम उन्हें ऐसी जन्नतों में दाख़िल करेंगे, जिनके महलों के नीचे से नहरें बहती है। वे उनमें हमेशा के लिए रहेंगे। यह अल्लाह का वचन है और उसका वचन सच्चा है। क्योंकि वह वचन को नहीं तोड़ता है और अल्लाह से बढ़कर वचन में सच्चा कोई नहीं।
आयत 123
لَّيْسَ بِأَمَانِيِّكُمْ وَلَآ أَمَانِىِّ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ ۗ مَن يَعْمَلْ سُوٓءًۭا يُجْزَ بِهِۦ وَلَا يَجِدْ لَهُۥ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَلِيًّۭا وَلَا نَصِيرًۭا
لَّيْسَ
नहीं है
بِأَمَانِيِّكُمْ
तुम्हारी आरज़ुओं पर
وَلَآ
और ना
أَمَانِىِّ
आरज़ुओं पर
أَهْلِ
(of the) People
ٱلْكِتَـٰبِ ۗ
अहले किताब की
مَن
जो कोई
يَعْمَلْ
अमल करेगा
سُوٓءًۭا
बुरा
يُجْزَ
वो बदला दिया जाएगा
بِهِۦ
उसका
وَلَا
और ना
يَجِدْ
वो पाएगा
لَهُۥ
अपने लिए
مِن
from
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَلِيًّۭا
कोई दोस्त
وَلَا
और ना
نَصِيرًۭا
मददगार
बात न तुम्हारी कामनाओं की है और न किताबवालों की कामनाओं की। जो भी बुराई करेगा उसे उसका फल मिलेगा और वह अल्लाह से हटकर न तो कोई मित्र पाएगा और न ही सहायक
तफ़्सीर:
मोक्ष और सफलता का मामला - ऐ मुसलमानो! - तुम्हारी कामनाओं पर या अह्ले किताब की कामनाओं पर निर्भर नहीं है। बल्कि, यह मामला काम से जुड़ा है। इसलिए तुममें से जो भी बुरा काम करेगा, क़यामत के दिन उसका बदला पाएगा। उसे अल्लाह के सिवा कोई संरक्षक नहीं मिलेगा, जो उसे लाभ पहुँचा सके और न उसे कोई सहायक मिलेगा, जो उससे नुक़सान को टाल सके।
आयत 124
وَمَن يَعْمَلْ مِنَ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ مِن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَىٰ وَهُوَ مُؤْمِنٌۭ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ يَدْخُلُونَ ٱلْجَنَّةَ وَلَا يُظْلَمُونَ نَقِيرًۭا
وَمَن
और जो कोई
يَعْمَلْ
अमल करे
مِنَ
[of]
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
مِن
from
ذَكَرٍ
मर्द हो
أَوْ
या
أُنثَىٰ
औरत
وَهُوَ
जब कि वो
مُؤْمِنٌۭ
मोमिन हो
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग
يَدْخُلُونَ
दाख़िल होंगे
ٱلْجَنَّةَ
जन्नत में
وَلَا
और ना
يُظْلَمُونَ
वो ज़ुल्म किए जाऐंगे
نَقِيرًۭا
खजूर की गुठली में सुराख़ बराबर
किन्तु जो अच्छे कर्म करेगा, चाहे पुरुष हो या स्त्री, यदि वह ईमानवाला है तो ऐसे लोग जन्नत में दाख़िल होंगे। और उनका हक़ रत्ती भर भी मारा नहीं जाएगा
तफ़्सीर:
जो भी अच्छे कार्य करता है, चाहे नर हो या नारी और वह अल्लाह पर सच्चा ईमान भी रखने वाला है, तो ऐसे लोग जिन्होंने ईमान के साथ सत्कर्म भी किया, जन्नत में प्रवेश करेंगे। उनके कार्यों के प्रतिफल में कुछ भी कमी नहीं की जाएगी, भले ही वह खजूर की गुठली के ऊपरी भाग के गड्ढे जितना कम क्यों न हो।
आयत 125
وَمَنْ أَحْسَنُ دِينًۭا مِّمَّنْ أَسْلَمَ وَجْهَهُۥ لِلَّهِ وَهُوَ مُحْسِنٌۭ وَٱتَّبَعَ مِلَّةَ إِبْرَٰهِيمَ حَنِيفًۭا ۗ وَٱتَّخَذَ ٱللَّهُ إِبْرَٰهِيمَ خَلِيلًۭا
وَمَنْ
और कौन
أَحْسَنُ
ज़्यादा अच्छा है
دِينًۭا
दीन में
مِّمَّنْ
उससे जो
أَسْلَمَ
सुपुर्द कर दे
وَجْهَهُۥ
चेहरा अपना
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
وَهُوَ
और वो
مُحْسِنٌۭ
नेकोकार हो
وَٱتَّبَعَ
और वो पैरवी करे
مِلَّةَ
मिल्लत
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम की
حَنِيفًۭا ۗ
जो यकसू था
وَٱتَّخَذَ
और बना लिया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम को
خَلِيلًۭا
ख़ास दोस्त
और दीन (धर्म) की स्पष्ट से उस व्यक्ति से अच्छा कौन हो सकता है, जिसने अपने आपको अल्लाह के आगे झुका दिया और इबराहीम के तरीक़े का अनुसरण करे, जो सबसे कटकर एक का हो गया था? अल्लाह ने इबराहीम को अपना घनिष्ठ मित्र बनाया था
तफ़्सीर:
उस व्यक्ति से बेहतर धर्म किसी का नहीं है, जो बाहरी और आंतरिक रूप से अल्लाह के प्रति समर्पित हो जाए, अपनी नीयत को उसके लिए विशुद्ध कर ले, उसकी शरीयत का पालनकर अपने कार्य को अच्छा कर ले और शिर्क एवं कुफ़्र से कटकर तौहीद और ईमान की ओर एकाग्र होकर, इबराहीम अलैहिसस्सलाम के धर्म का अनुसरण करे, जो मुह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के धर्म का मूल है। अल्लाह ने अपने नबी इबराहीम अलैहिस्सलाम को सारे लोगों के बीच पूर्ण प्रेम के लिए चुन लिया है।
आयत 126
وَلِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ بِكُلِّ شَىْءٍۢ مُّحِيطًۭا
وَلِلَّهِ
और अल्लाह ही के लिए है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ ۚ
ज़मीन में है
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ को
مُّحِيطًۭا
घेरने वाला
जो कुछ आकाशों में और जो कुछ धरती में है, वह अल्लाह ही का है और अल्लाह हर चीज़ को घेरे हुए है
तफ़्सीर:
आसमानों और ज़मीन की सारी चीज़ों का राज्य अकेले अल्लाह का है और अल्लाह अपनी सृष्टि की हर चीज़ को अपने ज्ञान, शक्ति और प्रबंधन के साथ घेरे हुए है।
आयत 127
وَيَسْتَفْتُونَكَ فِى ٱلنِّسَآءِ ۖ قُلِ ٱللَّهُ يُفْتِيكُمْ فِيهِنَّ وَمَا يُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ فِى ٱلْكِتَـٰبِ فِى يَتَـٰمَى ٱلنِّسَآءِ ٱلَّـٰتِى لَا تُؤْتُونَهُنَّ مَا كُتِبَ لَهُنَّ وَتَرْغَبُونَ أَن تَنكِحُوهُنَّ وَٱلْمُسْتَضْعَفِينَ مِنَ ٱلْوِلْدَٰنِ وَأَن تَقُومُوا۟ لِلْيَتَـٰمَىٰ بِٱلْقِسْطِ ۚ وَمَا تَفْعَلُوا۟ مِنْ خَيْرٍۢ فَإِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِهِۦ عَلِيمًۭا
وَيَسْتَفْتُونَكَ
और वो फ़तवा माँगते हैं आपसे
فِى
concerning
ٱلنِّسَآءِ ۖ
औरतों के बारे में
قُلِ
कह दीजिए
ٱللَّهُ
अल्लाह
يُفْتِيكُمْ
फ़तवा देता है तुम्हें
فِيهِنَّ
उनके मामले में
وَمَا
और जो
يُتْلَىٰ
पढ़ा जाता है
عَلَيْكُمْ
तुम पर
فِى
in
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में से
فِى
concerning
يَتَـٰمَى
orphans
ٱلنِّسَآءِ
यतीम लड़कियों के बारे में
ٱلَّـٰتِى
वो जो
لَا
not
تُؤْتُونَهُنَّ
नहीं तुम देते उन्हें
مَا
जो
كُتِبَ
लिखा गया
لَهُنَّ
उनके लिए
وَتَرْغَبُونَ
और तुम रग़बत रखते हो
أَن
कि
تَنكِحُوهُنَّ
तुम निकाह कर लो उनसे
وَٱلْمُسْتَضْعَفِينَ
और कमज़ोरों (के बारे में)
مِنَ
of
ٱلْوِلْدَٰنِ
बच्चों में से
وَأَن
और ये कि
تَقُومُوا۟
तुम क़ायम रहो
لِلْيَتَـٰمَىٰ
यतीमों के लिए
بِٱلْقِسْطِ ۚ
इन्साफ़ पर
وَمَا
और जो भी
تَفْعَلُوا۟
तुम करोगे
مِنْ
of
خَيْرٍۢ
नेकी में से
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
بِهِۦ
उसे
عَلِيمًۭا
ख़ूब जानने वाला
लोग तुमसे स्त्रियों के विषय में पूछते है, कहो, "अल्लाह तुम्हें उनके विषय में हुक्म देता है और जो आयतें तुमको इस किताब में पढ़कर सुनाई जाती है, वे उन स्त्रियों के, अनाथों के विषय में भी है, जिनके हक़ तुम अदा नहीं करते। और चाहते हो कि तुम उनके साथ विवाह कर लो और कमज़ोर यतीम बच्चों के बारे में भी यही आदेश है। और इस विषय में भी कि तुम अनाथों के विषय में इनसाफ़ पर क़ायम रहो। जो भलाई भी तुम करोगे तो निश्चय ही, अल्लाह उसे भली-भाँति जानता होगा।"
तफ़्सीर:
- ऐ रसूल - लोग आपसे स्त्रियों के मामले में तथा उनके अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में पूछते हैं। आप उनसे कह दें : अल्लाह तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर देता है और तुम्हारे लिए कुरआन की वह आयतें भी बयान करता हैं, जो उन अनाथ स्त्रियों के विषय में तुम्हें पढ़कर सुनाई जाती हैं जो तुम्हारी अभिभावकता के अंतर्गत होती हैं और तुम उन्हें अल्लाह की ओर से उनके लिए निर्धारित किए गए महर या विरासत से वंचित रखते हो। तुम स्वयं उनसे शादी नहीं करना चाहते और उनके धन के लालच में उन्हें शादी करने से भी रोकते हो। वह तुम्हारे लिए कमज़ोर बच्चों के अधिकारों को भी स्पष्ट करता है कि उन्हें विरासत में उनका अधिकार दो और उनके धन पर क़ब्ज़ा जमाकर उन पर अत्याचार न करो। तथा तुम्हारे लिए यह दायित्व भी बयान करता है कि अनाथों के मामलों का न्याय के साथ इस तरह प्रबंधन करो, जिससे दुनिया एवं आख़िरत में उनका भला हो। तुम अनाथों और अन्य लोगों के लिए जो भी अच्छा करोगे, अल्लाह उससे अवगत है और तुम्हें उसका बदला देगा।
आयत 128
وَإِنِ ٱمْرَأَةٌ خَافَتْ مِنۢ بَعْلِهَا نُشُوزًا أَوْ إِعْرَاضًۭا فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَآ أَن يُصْلِحَا بَيْنَهُمَا صُلْحًۭا ۚ وَٱلصُّلْحُ خَيْرٌۭ ۗ وَأُحْضِرَتِ ٱلْأَنفُسُ ٱلشُّحَّ ۚ وَإِن تُحْسِنُوا۟ وَتَتَّقُوا۟ فَإِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًۭا
وَإِنِ
और अगर
ٱمْرَأَةٌ
कोई औरत
خَافَتْ
डरे
مِنۢ
from
بَعْلِهَا
अपने शौहर से
نُشُوزًا
ज़्यादती करने से
أَوْ
या
إِعْرَاضًۭا
बेरुख़ी से
فَلَا
तो नहीं
جُنَاحَ
कोई गुनाह
عَلَيْهِمَآ
उन दोनों पर
أَن
कि
يُصْلِحَا
वो दोनो सुलह कर लें
بَيْنَهُمَا
आपस में
صُلْحًۭا ۚ
सुलह करना
وَٱلصُّلْحُ
और सुलह करना
خَيْرٌۭ ۗ
बेहतर है
وَأُحْضِرَتِ
और रख दी गई
ٱلْأَنفُسُ
नफ़्सों में
ٱلشُّحَّ ۚ
बख़ीली
وَإِن
और अगर
تُحْسِنُوا۟
तुम एहसान करो
وَتَتَّقُوا۟
और तुम तक़वा करो
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
بِمَا
साथ उसके जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
خَبِيرًۭا
ख़ूब ख़बर रखने वाला
यदि किसी स्त्री को अपने पति की और से दुर्व्यवहार या बेरुख़ी का भय हो, तो इसमें उनके लिए कोई दोष नहीं कि वे दोनों आपस में मेल-मिलाप की कोई राह निकाल ले। और मेल-मिलाव अच्छी चीज़ है। और मन तो लोभ एवं कृपणता के लिए उद्यत रहता है। परन्तु यदि तुम अच्छा व्यवहार करो और (अल्लाह का) भय रखो, तो अल्लाह को निश्चय ही जो कुछ तुम करोगे उसकी खबर रहेगी
तफ़्सीर:
यदि किसी स्त्री को अपने पति से इस बात का भय हो कि वह उसकी उपेक्षा कर रहा है और उसमें रुचि नहीं ले रहा है, तो उन दोनों पर आपस में समझौता कर लेने में कोई गुनाह नहीं है, इस प्रकार कि वह पति पर अपने कुछ अनिवार्य अधिकारों जैसे- भरण-पोषण एवं रात गुज़ारने की बारी के अधिकार, को छोड़ दे। यहाँ सुलह करना उन दोनों के लिए तलाक़ से बेहतर है। हालाँकि लोभ और कंजूसी मानव स्वभाव में शामिल हैं। इसलिए वह अपने अधिकारों को छोड़ना नहीं चाहती है। ऐसे में पति-पत्नी को इस स्वभाव का उपचार, स्वयं का उदारहृदयता और परोपकार पर प्रशिक्षण करके करना चाहिए। यदि तुम अपने सभी मामलों में उपकार का रास्ता अपनाओ और अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई चीज़ों का परित्याग करके, डरते रहो, तो अल्लाह तुम्हारे कर्मों से अवगत है, उससे कुछ भी छिपा नहीं है और वह तुम्हें उसका बदला देगा।
आयत 129
وَلَن تَسْتَطِيعُوٓا۟ أَن تَعْدِلُوا۟ بَيْنَ ٱلنِّسَآءِ وَلَوْ حَرَصْتُمْ ۖ فَلَا تَمِيلُوا۟ كُلَّ ٱلْمَيْلِ فَتَذَرُوهَا كَٱلْمُعَلَّقَةِ ۚ وَإِن تُصْلِحُوا۟ وَتَتَّقُوا۟ فَإِنَّ ٱللَّهَ كَانَ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا
وَلَن
और हरगिज़ नहीं
تَسْتَطِيعُوٓا۟
तुम इस्तिताअत रख सकते
أَن
कि
تَعْدِلُوا۟
तुम अदल करो
بَيْنَ
दर्मियान
ٱلنِّسَآءِ
बीवियों के
وَلَوْ
और अगरचे
حَرَصْتُمْ ۖ
तुम हिर्स करो
فَلَا
तो ना
تَمِيلُوا۟
तुम माइल हो जाओ
كُلَّ
मुकम्मल
ٱلْمَيْلِ
माइल हो जाना
فَتَذَرُوهَا
कि तुम छोड़ दो उसे
كَٱلْمُعَلَّقَةِ ۚ
मानिन्द लटकती हुई (शै) के
وَإِن
और अगर
تُصْلِحُوا۟
तुम इस्लाह / सुलह करो
وَتَتَّقُوا۟
और तुम तक़वा करो
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
غَفُورًۭا
बहुत बख़्शने वाला
رَّحِيمًۭا
निहायत रहम करने वाला
और चाहे तुम कितना ही चाहो, तुममें इसकी सामर्थ्य नहीं हो सकती कि औरतों के बीच पूर्ण रूप से न्याय कर सको। तो ऐसा भी न करो कि किसी से पूर्णरूप से फिर जाओ, जिसके परिणामस्वरूप वह ऐसी हो जाए, जैसे उसका पति खो गया हो। परन्तु यदि तुम अपना व्यवहार ठीक रखो और (अल्लाह से) डरते रहो, तो निस्संदेह अल्लाह भी बड़ा क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
- ऐ पतियो - तुम चाहते हुए भी, दिली लगाव के मामले में पत्नियों के साथ पूरी तरह से न्याय नहीं कर सकते। इसके कुछ कारण हैं, जो तुम्हारे नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं। इसलिए उस पत्नी से पूरी तरह विमुख न हो जाओ, जो तुम्हें पसंद नहीं है। फिर तुम उसे अधर में लटकी हुई की तरह छोड़ दो; न तो उसका कोई पति है, जो उसका हक़ अदा करे, और न वह बिना पति वाली है कि शादी की अपेक्षा करे। यदि तुम अपने बीच के मामलों को सुधार लो इस प्रकार कि दिल के न चाहते हुए भी अपने आपको पत्नी के अधिकारों का निर्वाहन करने के लिए बाध्य कर लो और पत्नी के मामले में अल्लाह से डरते रहो, तो अल्लाह बड़ा क्षमा करने वाला और तुम पर दयावान है।
आयत 130
وَإِن يَتَفَرَّقَا يُغْنِ ٱللَّهُ كُلًّۭا مِّن سَعَتِهِۦ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ وَٰسِعًا حَكِيمًۭا
وَإِن
और अगर
يَتَفَرَّقَا
वो दोनों अलग हो जाऐं
يُغْنِ
ग़नी कर देगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
كُلًّۭا
हर एक को
مِّن
from
سَعَتِهِۦ ۚ
अपनी वुसअत से
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
وَٰسِعًا
वुसअत वाला
حَكِيمًۭا
बहुत हिकमत वाला
और यदि दोनों अलग ही हो जाएँ तो अल्लाह अपनी समाई से एक को दूसरे से बेपररवाह कर देगा। अल्लाह बड़ी समाईवाला, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
यदि तलाक़ या ख़ुलअ के द्वारा पति-पत्नी एक दूसरे से अलग हो जाएँ, तो अल्लाह उनमें से प्रत्येक को अपने व्यापक अनुग्रह से समृद्ध कर देगा। अल्लाह व्यापक अनुग्रह एवं दया वाला, तथा अपने प्रबंधन और तक़दीर (नियति) में हिकमत वाला है।
आयत 131
وَلِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۗ وَلَقَدْ وَصَّيْنَا ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ مِن قَبْلِكُمْ وَإِيَّاكُمْ أَنِ ٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ۚ وَإِن تَكْفُرُوا۟ فَإِنَّ لِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ غَنِيًّا حَمِيدًۭا
وَلِلَّهِ
और अल्लाह ही के लिए है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ ۗ
ज़मीन में है
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
وَصَّيْنَا
ताकीद की हमने
ٱلَّذِينَ
उन्हें जो
أُوتُوا۟
दिए गए
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
مِن
from
قَبْلِكُمْ
तुमसे पहले
وَإِيَّاكُمْ
और तुम्हें भी
أَنِ
कि
ٱتَّقُوا۟
डरो
ٱللَّهَ ۚ
अल्लाह से
وَإِن
और अगर
تَكْفُرُوا۟
तुम कुफ़्र करोगे
فَإِنَّ
तो बेशक
لِلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ ۚ
ज़मीन में है
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
غَنِيًّا
बहुत बेनियाज़
حَمِيدًۭا
बहुत तारीफ़ वाला
आकाशों और धरती में जो कुछ है, सब अल्लाह ही का है। तुमसे पहले जिन्हें किताब दी गई थी, उन्हें और तुम्हें भी हमने ताकीद की है कि "अल्लाह का डर रखो।" यदि तुम इनकार करते हो, तो इससे क्या होने का? आकाशों और धरती में जो कुछ है, सब अल्लाह ही का रहेगा। अल्लाह तो निस्पृह, प्रशंसनीय है
तफ़्सीर:
जो कुछ आकाशों और धरती में तथा जो कुछ उन दोनों के बीच है, उन सब का मालिक केवल अल्लाह है। हमने किताब वाले यहूदियों और ईसाइयों को आदेश दिया था और तुम्हें भी आदेश दिया है कि अल्लाह के आदेशों का पालन करो और उसकी मना की हुई चीज़ों से बचो। यदि तुम इस आदेश का इनकार करोगे, तो केवल अपने आप को नुक़सान पहुँचाओग।क्योंकि अल्लाह तुम्हारी आज्ञाकारिता से बेपरवाह है। वह तो आसमानों और ज़मीन की सारी चीज़ों का मालिक है, और वह अपनी सारी रचनाओं से बेनियाज़ और अपने सभी गुणों और कार्यों पर स्तुति के योग्य है।
आयत 132
وَلِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ وَكِيلًا
وَلِلَّهِ
और अल्लाह ही के लिए है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ ۚ
ज़मीन में है
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِٱللَّهِ
अल्लाह
وَكِيلًا
कारसाज़
हाँ, आकाशों और धरती में जो कुछ है, अल्लाह ही का है और अल्लाह कार्यसाधक की हैसियत से काफ़ी है
तफ़्सीर:
आसमानों और ज़मीन की सारी चीज़ें केवल अल्लाह की हैं, जो आज्ञापालन के योग्य है और अल्लाह अपनी रचना के सभी मामलों का प्रभार लेने के लिए पर्याप्त है।
आयत 133
إِن يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ أَيُّهَا ٱلنَّاسُ وَيَأْتِ بِـَٔاخَرِينَ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلَىٰ ذَٰلِكَ قَدِيرًۭا
إِن
अगर
يَشَأْ
वो चाहे
يُذْهِبْكُمْ
वो ले जाए तुम्हें
أَيُّهَا
ऐ
ٱلنَّاسُ
लोगो
وَيَأْتِ
और वो ले आए
بِـَٔاخَرِينَ ۚ
दूसरों को
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
ذَٰلِكَ
उसके
قَدِيرًۭا
बहुत क़ुदरत रखने वाला
ऐ लोगों! यदि वह चाहे तो तुम्हें हटा दे और तुम्हारी जगह दूसरों को ले आए। अल्लाह को इसकी पूरी सामर्थ्य है
तफ़्सीर:
यदि वह चाहे, तो - ऐ लोगो - वह तुम्हें विनष्ट कर दे और तुम्हारे स्थान पर दूसरे लोगों को ले आए, जो अल्लाह की आज्ञा मानें और उसकी अवज्ञा न करें। तथा अल्लाह ऐसा करने में सक्षम है।
आयत 134
مَّن كَانَ يُرِيدُ ثَوَابَ ٱلدُّنْيَا فَعِندَ ٱللَّهِ ثَوَابُ ٱلدُّنْيَا وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ سَمِيعًۢا بَصِيرًۭا
مَّن
जो कोई
كَانَ
है
يُرِيدُ
चाहता
ثَوَابَ
सवाब
ٱلدُّنْيَا
दुनिया का
فَعِندَ
तो पास है
ٱللَّهِ
अल्लाह के
ثَوَابُ
सवाब
ٱلدُّنْيَا
दुनिया का
وَٱلْـَٔاخِرَةِ ۚ
और आख़िरत का
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
سَمِيعًۢا
बहुत सुनने वाला
بَصِيرًۭا
बहुत देखने वाला
जो कोई दुनिया का बदला चाहता है, तो अल्लाह के पास दुनिया का बदला भी है और आख़िरत का भी। अल्लाह सब कुछ सुनता, देखता है
तफ़्सीर:
- ऐ लोगो! - तुममें से जो व्यक्ति अपने कार्य से केवल दुनिया का बदला चाहता है, वह जान ले कि अल्लाह के पास दुनिया और आखिरत दोनों का बदला है। इसलिए वह अल्लाह से दोनों का बदला माँगे। अल्लाह तुम्हारी बातों को सुनने वाला, तुम्हारे कार्यों को देखने वाला है और वह तुम्हें उनका बदला देगा।
आयत 135
۞ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ كُونُوا۟ قَوَّٰمِينَ بِٱلْقِسْطِ شُهَدَآءَ لِلَّهِ وَلَوْ عَلَىٰٓ أَنفُسِكُمْ أَوِ ٱلْوَٰلِدَيْنِ وَٱلْأَقْرَبِينَ ۚ إِن يَكُنْ غَنِيًّا أَوْ فَقِيرًۭا فَٱللَّهُ أَوْلَىٰ بِهِمَا ۖ فَلَا تَتَّبِعُوا۟ ٱلْهَوَىٰٓ أَن تَعْدِلُوا۟ ۚ وَإِن تَلْوُۥٓا۟ أَوْ تُعْرِضُوا۟ فَإِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًۭا
۞ يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
كُونُوا۟
हो जाओ
قَوَّٰمِينَ
क़ायम रहने वाले
بِٱلْقِسْطِ
इन्साफ़ पर
شُهَدَآءَ
गवाही देने वाले
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
وَلَوْ
और अगरचे
عَلَىٰٓ
(it is) against
أَنفُسِكُمْ
ख़िलाफ़ हो तुम्हारे अपने
أَوِ
or
ٱلْوَٰلِدَيْنِ
या वालिदैन के
وَٱلْأَقْرَبِينَ ۚ
और क़राबतदारों के
إِن
अगर
يَكُنْ
वो होंगे
غَنِيًّا
ग़नी
أَوْ
या
فَقِيرًۭا
फ़क़ीर
فَٱللَّهُ
तो अल्लाह
أَوْلَىٰ
ज़्यादा ख़ैरख़्वाह है
بِهِمَا ۖ
उन दोनों का
فَلَا
तो ना
تَتَّبِعُوا۟
तुम पैरवी करो
ٱلْهَوَىٰٓ
ख़्वाहिशात की
أَن
कि
تَعْدِلُوا۟ ۚ
तुम अदल करो (ना)
وَإِن
और अगर
تَلْوُۥٓا۟
तुम मोड़ दोगे (ज़बान)
أَوْ
या
تُعْرِضُوا۟
तुम ऐराज़ करोगे
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
بِمَا
उसकी जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
خَبِيرًۭا
ख़ूब ख़बर रखने वाला
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह के लिए गवाही देते हुए इनसाफ़ पर मज़बूती के साथ जमे रहो, चाहे वह स्वयं तुम्हारे अपने या माँ-बाप और नातेदारों के विरुद्ध ही क्यों न हो। कोई धनवान हो या निर्धन (जिसके विरुद्ध तुम्हें गवाही देनी पड़े) अल्लाह को उनसे (तुमसे कहीं बढ़कर) निकटता का सम्बन्ध है, तो तुम अपनी इच्छा के अनुपालन में न्याय से न हटो, क्योंकि यदि तुम हेर-फेर करोगे या कतराओगे, तो जो कुछ तुम करते हो अल्लाह को उसकी ख़बर रहेगी
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! अपनी सभी परिस्थितियों में न्याय पर जमे रहने वाले, हर एक के साथ सच्ची गवाही देने वाले बन जाओ। भले ही इसके लिए तुम्हें अपने आपके, या अपने माता-पिता या अपने रिश्तेदारों के विरुद्ध सच्च का इक़रार करना पड़े। किसी की ग़रीबी या अमीरी तुम्हें गवाही देने या न देने के लिए बाध्य न करे। क्योंकि अल्लाह उस ग़रीब और अमीर का तुमसे अधिक हक़दार है और उनके हितों को तुमसे अधिक जानता है। इसलिए अपनी गवाही में इच्छाओं का पालन न करें ताकि ऐसा न हो कि आप उसमें सत्य से हट जाएँ। यदि तुम गवाही को गलत तरीक़े से पेश करके उसमें हेर-फेर करोगे या गवाही देने से उपेक्षा करोगे, तो जान लो कि अल्लाह तुम्हारे सभी कार्यों से अवगत है।
आयत 136
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ ءَامِنُوا۟ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَٱلْكِتَـٰبِ ٱلَّذِى نَزَّلَ عَلَىٰ رَسُولِهِۦ وَٱلْكِتَـٰبِ ٱلَّذِىٓ أَنزَلَ مِن قَبْلُ ۚ وَمَن يَكْفُرْ بِٱللَّهِ وَمَلَـٰٓئِكَتِهِۦ وَكُتُبِهِۦ وَرُسُلِهِۦ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَـٰلًۢا بَعِيدًا
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
ءَامِنُوا۟
ईमान ले आओ
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَرَسُولِهِۦ
और उसके रसूल पर
وَٱلْكِتَـٰبِ
और उस किताब पर
ٱلَّذِى
जो
نَزَّلَ
उसने नाज़िल की
عَلَىٰ
upon
رَسُولِهِۦ
अपने रसूल पर
وَٱلْكِتَـٰبِ
और वो किताब
ٱلَّذِىٓ
जो
أَنزَلَ
उसने नाज़िल की
مِن
from
قَبْلُ ۚ
इससे पहले
وَمَن
और जो कोई
يَكْفُرْ
कुफ़्र करे
بِٱللَّهِ
अल्लाह का
وَمَلَـٰٓئِكَتِهِۦ
और उसके फ़रिश्तों का
وَكُتُبِهِۦ
और उसकी किताबों का
وَرُسُلِهِۦ
और उसके रसूलों का
وَٱلْيَوْمِ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرِ
और आख़िरी दिन का
فَقَدْ
पस तहक़ीक़
ضَلَّ
वो भटक गया
ضَلَـٰلًۢا
भटक जाना
بَعِيدًا
बहुत दूर का
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह पर ईमान लाओ और उसके रसूल पर और उस किताब पर जो उसने अपने रसूल पर उतारी है और उस किताब पर भी, जिसको वह इसके पहले उतार चुका है। और जिस किसी ने भी अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसकी किताबों और उसके रसूलों और अन्तिम दिन का इनकार किया, तो वह भटककर बहुत दूर जा पड़ा
तफ़्सीर:
ऐ ईमान वालो! अल्लाह और उसके रसूल पर अपने ईमान, उस कुरआन पर ईमान जिसे अल्लाह ने अपने रसूल (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर अवतरित किया तथा उन किताबों पर अपने ईमान पर सुदृढ़ रहो जिन्हें उसने आपसे पहले रूसलूों पर अवतरित किया। जो अल्लाह, उसके फ़रिश्तों, उसकी किताबों, उसके रसूलों और क़यामत के दिन का इनकार करे, तो वह सीधे रास्ते से बहुत दूर हो गया।
आयत 137
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ثُمَّ كَفَرُوا۟ ثُمَّ ءَامَنُوا۟ ثُمَّ كَفَرُوا۟ ثُمَّ ٱزْدَادُوا۟ كُفْرًۭا لَّمْ يَكُنِ ٱللَّهُ لِيَغْفِرَ لَهُمْ وَلَا لِيَهْدِيَهُمْ سَبِيلًۢا
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
ثُمَّ
फिर
كَفَرُوا۟
उन्होंने कुफ़्र किया
ثُمَّ
फिर
ءَامَنُوا۟
वो ईमान लाए
ثُمَّ
फिर
كَفَرُوا۟
उन्होंने कुफ़्र किया
ثُمَّ
फिर
ٱزْدَادُوا۟
वो बढ़ गए
كُفْرًۭا
कुफ़्र में
لَّمْ
नहीं
يَكُنِ
है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِيَغْفِرَ
कि वो बख़्श दे
لَهُمْ
उन्हें
وَلَا
और ना
لِيَهْدِيَهُمْ
ये कि हिदायत दे उन्हें
سَبِيلًۢا
रास्ते की
रहे वे लोग जो ईमान लाए, फिर इनकार किया; फिर ईमान लाए, फिर इनकार किया; फिर इनकार की दशा में बढते चले गए तो अल्लाह उन्हें कदापि क्षमा नहीं करेगा और न उन्हें राह दिखाएगा
तफ़्सीर:
जो लोग ईमान लाने के बाद बार-बार कुफ़्र करते रहे, इस प्रकार कि वे ईमान लाए, फिर उससे पलट गए, इसके बाद उन्होंने फिर से ईमान में प्रवेश किया, फिर उससे पलट गए और कुफ़्र पर जमे रहे और उसी हाल में मर गए; तो अल्लाह उनके पापों को क्षमा नहीं करेगा और न ही उन्हें उस सीधे रास्ते का मार्गदर्शन करेगा जो उस सर्वशक्तिमान तक पहुँचाने वाला है।
आयत 138
بَشِّرِ ٱلْمُنَـٰفِقِينَ بِأَنَّ لَهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا
بَشِّرِ
ख़ुशख़बरी दे दीजिए
ٱلْمُنَـٰفِقِينَ
मुनाफ़िक़ों को
بِأَنَّ
कि बेशक
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابًا
अज़ाब है
أَلِيمًا
दर्दनाक
मुनाफ़िको (कपटाचारियों) को मंगल-सूचना दे दो कि उनके लिए दुखद यातना है;
तफ़्सीर:
- ऐ रसूल! - मुनाफ़िकों को, जो ईमान का प्रदर्शन करते हैं और अपने दिलों में कुफ़्र छिपाए होते हैं, शुभ-सूचना सुना दें कि उनके लिए क़यामत के दिन अल्लाह के पास दर्दनाक यातना है।
आयत 139
ٱلَّذِينَ يَتَّخِذُونَ ٱلْكَـٰفِرِينَ أَوْلِيَآءَ مِن دُونِ ٱلْمُؤْمِنِينَ ۚ أَيَبْتَغُونَ عِندَهُمُ ٱلْعِزَّةَ فَإِنَّ ٱلْعِزَّةَ لِلَّهِ جَمِيعًۭا
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَتَّخِذُونَ
बना लेते हैं
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों को
أَوْلِيَآءَ
दोस्त
مِن
(from)
دُونِ
सिवाय
ٱلْمُؤْمِنِينَ ۚ
मोमिनों के
أَيَبْتَغُونَ
क्या वो चाहते हैं
عِندَهُمُ
पास उनके
ٱلْعِزَّةَ
इज़्ज़त
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱلْعِزَّةَ
इज़्ज़त
لِلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
جَمِيعًۭا
सारी की सारी
जो ईमानवालों को छोड़कर इनकार करनेवालों को अपना मित्र बनाते है। क्या उन्हें उनके पास प्रतिष्ठा की तलाश है? प्रतिष्ठा तो सारी की सारी अल्लाह ही के लिए है
तफ़्सीर:
इस यातना कारण यह है कि उन्होंने मोमिनों को छोड़कर काफ़िरों को अपना समर्थक और सहायक बना लिया। यह बात आश्चर्यजनक है जिसने उन्हें उनका वफादार बना दिया। क्या वे उनसे शक्ति एवं बल-प्रतिष्ठा प्राप्त करके अपना वैभव बढ़ाना चाहते हैं?! तो उन्हें याद रखना चाहिए कि सारी शक्ति एवं बल-प्रतिष्ठा का मालिक केवल अल्लाह है।
आयत 140
وَقَدْ نَزَّلَ عَلَيْكُمْ فِى ٱلْكِتَـٰبِ أَنْ إِذَا سَمِعْتُمْ ءَايَـٰتِ ٱللَّهِ يُكْفَرُ بِهَا وَيُسْتَهْزَأُ بِهَا فَلَا تَقْعُدُوا۟ مَعَهُمْ حَتَّىٰ يَخُوضُوا۟ فِى حَدِيثٍ غَيْرِهِۦٓ ۚ إِنَّكُمْ إِذًۭا مِّثْلُهُمْ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ جَامِعُ ٱلْمُنَـٰفِقِينَ وَٱلْكَـٰفِرِينَ فِى جَهَنَّمَ جَمِيعًا
وَقَدْ
हालाँकि तहक़ीक़
نَزَّلَ
उसने नाज़िल किया
عَلَيْكُمْ
तुम पर
فِى
in
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में
أَنْ
कि
إِذَا
जब
سَمِعْتُمْ
सुनो तुम
ءَايَـٰتِ
(the) Verses
ٱللَّهِ
अल्लाह की आयात को
يُكْفَرُ
कुफ़्र किया जाता है
بِهَا
उनका
وَيُسْتَهْزَأُ
और मज़ाक़ उड़ाया जाता है
بِهَا
उनका
فَلَا
तो ना
تَقْعُدُوا۟
तुम बैठो
مَعَهُمْ
साथ उनके
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَخُوضُوا۟
वो मशग़ूल हो जाऐं
فِى
in
حَدِيثٍ
किसी बात में
غَيْرِهِۦٓ ۚ
अलावा उसके
إِنَّكُمْ
बेशक तुम (वरना)
إِذًۭا
तब
مِّثْلُهُمْ ۗ
उन जैसे (होगे)
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
جَامِعُ
जमा करने वाला है
ٱلْمُنَـٰفِقِينَ
मुनाफ़िक़ों को
وَٱلْكَـٰفِرِينَ
और काफ़िरों को
فِى
in
جَهَنَّمَ
जहन्नम में
جَمِيعًا
सबके-सबको
वह 'किताब' में तुमपर यह हुक्म उतार चुका है कि जब तुम सुनो कि अल्लाह की आयतों का इनकार किया जा रहा है और उसका उपहास किया जा रहा है, तो जब तब वे किसी दूसरी बात में न लगा जाएँ, उनके साथ न बैठो, अन्यथा तुम भी उन्हीं के जैसे होगे; निश्चय ही अल्लाह कपटाचारियों और इनकार करनेवालों - सबको जहन्नम में एकत्र करनेवाला है
तफ़्सीर:
- ऐ मोमिनो! - अल्लाह ने तुम्हारे लिए पवित्र क़ुरआन में अवतरित किया है कि जब तुम किसी सभी में बैठो और वहाँ किसी को अल्लाह की आयतों का इनकार करते हुए और उनका मज़ाक़ उड़ाते हुए सुनो; तो उनके साथ न बैठो और वहाँ से उठकर चल दो, यहाँ तक कि वे अल्लाह की आयतों का इनकार और उनका मज़ाक़ छोड़कर कोई दूसरी बात शुरू कर दें। यदि तुमने ऐसा नहीं किया और सब कुछ सुनने के बावजूद बैठे रहे, तो उन्हीं की तरह अल्लाह के आदेश का उल्लंघन करने वाले बन जाओगे। क्योंकि तुमने वहाँ बैठकर अल्लाह की अवज्ञा की है, जिस तरह कि उन्होंने कुफ़्र करके अल्लाह की अवज्ञा की है। निःसंदेह, अल्लाह मुनाफ़िक़ों को जो ईमान को प्रदर्शित करते और कुफ़्र को गुप्त रखते हैं, क़यामत के दिन काफ़िरों के साथ जहन्नम में एकत्रित करेगा।
आयत 141
ٱلَّذِينَ يَتَرَبَّصُونَ بِكُمْ فَإِن كَانَ لَكُمْ فَتْحٌۭ مِّنَ ٱللَّهِ قَالُوٓا۟ أَلَمْ نَكُن مَّعَكُمْ وَإِن كَانَ لِلْكَـٰفِرِينَ نَصِيبٌۭ قَالُوٓا۟ أَلَمْ نَسْتَحْوِذْ عَلَيْكُمْ وَنَمْنَعْكُم مِّنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ ۚ فَٱللَّهُ يَحْكُمُ بَيْنَكُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ وَلَن يَجْعَلَ ٱللَّهُ لِلْكَـٰفِرِينَ عَلَى ٱلْمُؤْمِنِينَ سَبِيلًا
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يَتَرَبَّصُونَ
इन्तिज़ार कर रहे हैं
بِكُمْ
तुम्हारे बारे में
فَإِن
फिर अगर
كَانَ
हो
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
فَتْحٌۭ
कोई फ़तह
مِّنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
قَالُوٓا۟
वो कहते हैं
أَلَمْ
क्या ना
نَكُن
थे हम
مَّعَكُمْ
साथ तुम्हारे
وَإِن
और अगर
كَانَ
हो
لِلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के लिए
نَصِيبٌۭ
कोई हिस्सा
قَالُوٓا۟
वो कहते हैं
أَلَمْ
क्या नहीं
نَسْتَحْوِذْ
हम ग़ालिब आने लगे थे
عَلَيْكُمْ
तुम पर
وَنَمْنَعْكُم
और हम बचा रहे थे तुम्हें
مِّنَ
from
ٱلْمُؤْمِنِينَ ۚ
मोमिनों से
فَٱللَّهُ
पस अल्लाह
يَحْكُمُ
फ़ैसला करेगा
بَيْنَكُمْ
दर्मियान तुम्हारे
يَوْمَ
(on the) Day
ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ
दिन क़यामत के
وَلَن
और हरगिज़ नहीं
يَجْعَلَ
बनाएगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के लिए
عَلَى
over
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों पर
سَبِيلًا
कोई रास्ता
जो तुम्हारे मामले में प्रतीक्षा करते है, यदि अल्लाह की ओर से तुम्हारी विजय़ हुई तो कहते है, "क्या हम तुम्हार साथ न थे?" और यदि विधर्मियों के हाथ कुछ लगा तो कहते है, "क्या हमने तुम्हें घेर नहीं लिया था और ईमानवालों से बचाया नहीं?" अतः अल्लाह क़ियामत के दिन तुम्हारे बीच फ़ैसला कर देगा, और अल्लाह विधर्मियों को ईमानवालों के मुक़ाबले में कोई राह नहीं देगा
तफ़्सीर:
जो तुम्हें पहुँचने वाली अच्छाई या बुराई की प्रतीक्षा में रहते हैं। यदि अल्लाह की ओर से तुम्हें विजय प्राप्त होता है और तुम्हें ग़नीमत का धन मिलता है, तो वे तुमसे कहते हैं : क्या हम तुम्हारे साथ नहीं थे, जिस युद्ध में तुम उपस्थित हुए हम भी उपस्थित हुए?! ताकि वे ग़नीमत से हिस्सा पा सकें। और यदि काफ़िरों को कुछ हिस्सा मिल जाए, तो उनसे कहते हैं : क्या हमने तुम्हारे मामलों का ध्यान नहीं रखा, तुम्हारी देखभाल और समर्थन नहीं किया, तथा तुम्हारी मदद करके और उनका अत्साह भंग करके, मोमिनों से तुम्हारा बचाव नहीं किया?! अतः अल्लाह तुम सब के बीच क़ियामत के दिन निर्णय कर देगा। चुनाँचे मोमिनों को जन्नत में दाख़िल करेगा और मुनाफिक़ों को जहन्नम के सबसे निचले क्षेत्र में दाख़िल करेगा। तथा अल्लाह, अपनी कृपा से, क़ियामत के दिन काफ़िरों को मोमिनों के ख़िलाफ तर्क (हुज्जत) प्रदान नहीं करेगा, बल्कि वह अंतिम परिणाम ईमान वालों ही का बनाएगा जब तक वे सच्चे ईमान वाले, शरीयत के अनुसार कार्य करने वाले होंगे।
आयत 142
إِنَّ ٱلْمُنَـٰفِقِينَ يُخَـٰدِعُونَ ٱللَّهَ وَهُوَ خَـٰدِعُهُمْ وَإِذَا قَامُوٓا۟ إِلَى ٱلصَّلَوٰةِ قَامُوا۟ كُسَالَىٰ يُرَآءُونَ ٱلنَّاسَ وَلَا يَذْكُرُونَ ٱللَّهَ إِلَّا قَلِيلًۭا
إِنَّ
बेशक
ٱلْمُنَـٰفِقِينَ
मुनाफ़िक़ीन
يُخَـٰدِعُونَ
वो धोखा देते हैं
ٱللَّهَ
अल्लाह को
وَهُوَ
हालाँकि वो
خَـٰدِعُهُمْ
धोखा देने वाला है उन्हें
وَإِذَا
और जब
قَامُوٓا۟
वो खड़े होते हैं
إِلَى
for
ٱلصَّلَوٰةِ
तरफ़ नमाज़ के
قَامُوا۟
वो खड़े होते हैं
كُسَالَىٰ
इन्तिहाई सुस्ती से
يُرَآءُونَ
वो दिखावा करते हैं
ٱلنَّاسَ
लोगों को
وَلَا
और नहीं
يَذْكُرُونَ
वो याद करते
ٱللَّهَ
अल्लाह को
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا
बहुत थोड़ा
कपटाचारी अल्लाह के साथ धोखबाज़ी कर रहे है, हालाँकि उसी ने उन्हें धोखे में डाल रखा है। जब वे नमाज़ के लिए खड़े होते है तो कसमसाते हुए, लोगों को दिखाने के लिए खड़े होते है। और अल्लाह को थोड़े ही याद करते है
तफ़्सीर:
मुनाफ़िक़ लोग इस्लाम का प्रदर्शन करके और अविश्वास को गुप्त रखकर अल्लाह को धोखा देते हैं, हालाँकि अल्लाह ही उन्हें धोखे में डाल रहा है। क्योंकि उसने उनके अविश्वास से अवगत होने के बावजूद उनके खून को सुरक्षित कर दिया है और आख़िरत में उनके लिए सबसे कठोर दंड तैयार किया है। और जब वे नमाज़ के लिए खड़े होते हैं, तो आलसी होकर उसे नापसंद करते हुए खड़े होते हैं। उनका उद्देश्य लोगों को दिखाना और उनका सम्मान होता है, और वे अल्लाह के लिए निष्ठावान नहीं होते हैं तथा अल्लाह को केवल थोड़ा ही याद करते हैं जब वे मोमिनों को देखते हैं।
आयत 143
مُّذَبْذَبِينَ بَيْنَ ذَٰلِكَ لَآ إِلَىٰ هَـٰٓؤُلَآءِ وَلَآ إِلَىٰ هَـٰٓؤُلَآءِ ۚ وَمَن يُضْلِلِ ٱللَّهُ فَلَن تَجِدَ لَهُۥ سَبِيلًۭا
مُّذَبْذَبِينَ
मुतज़बज़ब हैं
بَيْنَ
दर्मियान
ذَٰلِكَ
उसके
لَآ
ना
إِلَىٰ
तरफ़
هَـٰٓؤُلَآءِ
उन लोगों के
وَلَآ
और ना
إِلَىٰ
तरफ़
هَـٰٓؤُلَآءِ ۚ
उन लोगों के
وَمَن
और जिसे
يُضْلِلِ
भटका दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
فَلَن
तो हरगिज़ नहीं
تَجِدَ
आप पाऐंगे
لَهُۥ
उसके लिए
سَبِيلًۭا
कोई रास्ता
इसी के बीच डाँवाडोल हो रहे है, न इन (ईमानवालों) की तरफ़ के है, न इन (इनकार करनेवालों) की तरफ़ के। जिसे अल्लाह भटका दे, उसके लिए तो तुम कोई राह नहीं पा सकते
तफ़्सीर:
ये मुनाफ़िक़ लोग हैरानी और असमंजस में पड़े हुए हैं। चुनाँचे वे प्रत्यक्ष एवं प्रोक्ष रूप से न मुसलमानों के साथ हैं और न काफ़िरों के साथ। बल्कि वे प्रत्यक्ष रूप से मुसलमानों के साथ हैं, और प्रोक्ष रूप से काफ़िरों के साथ हैं। और जिसे अल्लाह गुमराह कर दे, तो - ऐ रसूल! - आप उसके लिए पथभ्रष्टता से मार्गदर्शन पर लाने का हरगिज़ कोई रास्ता नहीं पाएँगे।
आयत 144
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَتَّخِذُوا۟ ٱلْكَـٰفِرِينَ أَوْلِيَآءَ مِن دُونِ ٱلْمُؤْمِنِينَ ۚ أَتُرِيدُونَ أَن تَجْعَلُوا۟ لِلَّهِ عَلَيْكُمْ سُلْطَـٰنًۭا مُّبِينًا
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Do) not
تَتَّخِذُوا۟
ना तुम बनाओ
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों को
أَوْلِيَآءَ
दोस्त
مِن
from
دُونِ
सिवाय
ٱلْمُؤْمِنِينَ ۚ
मोमिनों के
أَتُرِيدُونَ
क्या तुम चाहते हो
أَن
कि
تَجْعَلُوا۟
तुम बनाओ
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
عَلَيْكُمْ
अपने ख़िलाफ़
سُلْطَـٰنًۭا
कोई दलील
مُّبِينًا
वाज़ेह
ऐ ईमान लानेवालो! ईमानवालों से हटकर इनकार करनेवालों को अपना मित्र न बनाओ। क्या तुम चाहते हो कि अल्लाह का स्पष्टा तर्क अपने विरुद्ध जुटाओ?
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! अल्लाह के साथ कुफ़्र करनेवालों को घनिष्ठ मित्र न बनाओ कि मोमिनों को छोड़कर उनसे दोस्ती गाँठो। क्या तुम अपने इस कार्य से अल्लाह को, अपने यातना के हक़दार होने का स्पष्ट प्रमाण देना चाहते हो?
आयत 145
إِنَّ ٱلْمُنَـٰفِقِينَ فِى ٱلدَّرْكِ ٱلْأَسْفَلِ مِنَ ٱلنَّارِ وَلَن تَجِدَ لَهُمْ نَصِيرًا
إِنَّ
बेशक
ٱلْمُنَـٰفِقِينَ
मुनाफिक़ीन
فِى
(will be) in
ٱلدَّرْكِ
दर्जे में होंगे
ٱلْأَسْفَلِ
सबसे निचले
مِنَ
of
ٱلنَّارِ
आग के
وَلَن
और हरगिज़ नहीं
تَجِدَ
आप पाऐंगे
لَهُمْ
उनके लिए
نَصِيرًا
कोई मददगार
निस्संदेह कपटाचारी आग (जहन्नम) के सबसे निचले खंड में होंगे, और तुम कदापि उनका कोई सहायक न पाओगे
तफ़्सीर:
अल्लाह तआला क़यामत के दिन मुनाफ़िक़ों को नरक के सबसे निचले स्थान में जगह देगा और तुम उनका हरगिज़ कोई सहायक नहीं पाओगे,जो उनसे यातना को हटा सके।
आयत 146
إِلَّا ٱلَّذِينَ تَابُوا۟ وَأَصْلَحُوا۟ وَٱعْتَصَمُوا۟ بِٱللَّهِ وَأَخْلَصُوا۟ دِينَهُمْ لِلَّهِ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ مَعَ ٱلْمُؤْمِنِينَ ۖ وَسَوْفَ يُؤْتِ ٱللَّهُ ٱلْمُؤْمِنِينَ أَجْرًا عَظِيمًۭا
إِلَّا
मगर
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
تَابُوا۟
तौबा की
وَأَصْلَحُوا۟
और इस्लाह कर ली
وَٱعْتَصَمُوا۟
और मज़बूती से थाम लिया
بِٱللَّهِ
अल्लाह को
وَأَخْلَصُوا۟
और ख़ालिस कर लिया
دِينَهُمْ
अपने दीन को
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
مَعَ
साथ
ٱلْمُؤْمِنِينَ ۖ
मोमिनों के
وَسَوْفَ
और अनक़रीब
يُؤْتِ
देगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों को
أَجْرًا
अजर
عَظِيمًۭا
बहुत बड़ा
उन लोगों की बात और है जिन्होंने तौबा कर ली और अपने को सुधार लिया और अल्लाह को मज़बूती से पकड़ लिया और अपने दीन (धर्म) में अल्लाह ही के हो रहे। ऐसे लोग ईमानवालों के साथ है और अल्लाह ईमानवालों को शीघ्र ही बड़ा प्रतिदान प्रदान करेगा
तफ़्सीर:
परंतु जो लोग अपने निफ़ाक़ (पाखंड) से पश्चाताप करके अल्लाह की ओर लौट आए, अपने अंतरमन को सुधार लिया, अल्लाह की प्रतिज्ञा का पालन किया और अपने कार्य को दिखावा किए बिना अल्लाह के लिए विशुद्ध कर दिया, तो इन गुणों वाले लोग दुनिया एवं आख़िरत में मोमिनों के साथ होंगे, और अल्लाह मोमिनों को बड़ा प्रतिफल प्रदान करेगा।
आयत 147
مَّا يَفْعَلُ ٱللَّهُ بِعَذَابِكُمْ إِن شَكَرْتُمْ وَءَامَنتُمْ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ شَاكِرًا عَلِيمًۭا
مَّا
क्या
يَفْعَلُ
करेगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِعَذَابِكُمْ
तुम्हें अज़ाब देकर
إِن
अगर
شَكَرْتُمْ
शुक्र करो तुम
وَءَامَنتُمْ ۚ
और ईमान ले आओ तुम
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
شَاكِرًا
क़द्रदान
عَلِيمًۭا
बहुत इल्म वाला
अल्लाह को तुम्हें यातना देकर क्या करना है, यदि तुम कृतज्ञता दिखलाओ और ईमान लाओ? अल्लाह गुणग्राहक, सब कुछ जाननेवाला है
तफ़्सीर:
यदि तुम अल्लाह के आभारी बनो और उसपर ईमान रखो, तो उसे तुम्हें यातना देने की कोई ज़रूरत नहीं है। क्योंकि वह सर्वशक्तिमान बड़ा उपकारी अत्यंत दयावान है। वह तुम्हें केवल तुम्हारे गुनाहों के कारण यातना देता है। यदि तुमने अपने कार्य सुधार लिए, अल्लाह के प्रति उसकी नेमतों पर आभार प्रकट करते रहे और प्रत्यक्ष एवं प्रोक्ष रूप से उसपर ईमान लाए, तो वह तुम्हें हरगिज़ यातना नहीं देगा। अल्लाह उन लोगों का क़द्रदान (गुणग्राहक) है जिन्होंने उसकी नेमतों को स्वीकार किया, चुनाँचे वह उन्हें उसपर भरपूर बदला प्रदान करेगा। वह अपने बंदों के ईमान से अवगत है और हर एक को उसके कर्मों का बदला देगा।
आयत 148
۞ لَّا يُحِبُّ ٱللَّهُ ٱلْجَهْرَ بِٱلسُّوٓءِ مِنَ ٱلْقَوْلِ إِلَّا مَن ظُلِمَ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ سَمِيعًا عَلِيمًا
۞ لَّا
(Does) not
يُحِبُّ
नहीं पसंद करता
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْجَهْرَ
आवाज़ बुलन्द करना
بِٱلسُّوٓءِ
साथ बुरी
مِنَ
[of]
ٱلْقَوْلِ
बात के
إِلَّا
मगर
مَن
जिस पर
ظُلِمَ ۚ
ज़ुल्म किया गया हो
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
سَمِيعًا
ख़ूब सुनने वाला
عَلِيمًا
ख़ूब जानने वाला
अल्लाह बुरी बात खुल्लम-खुल्ला कहने को पसन्द नहीं करता, मगर उसकी बात और है जिसपर ज़ुल्म किया गया हो। अल्लाह सब कुछ सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
अल्लाह बुरी बात के साथ आवाज़ ऊँची करना पसंद नहीं करता, बल्कि उसे नापसंद करता और उस पर सज़ा की धमकी देता है। परंतु जिसपर अत्याचार हुआ हो, उसे अपने उत्पीड़क के बारे में शिकायत करने, उसपर बद्-दुआ करने और उससे उसी के समान शब्दों के साथ बदला लेने के लिए, बुरी बात के साथ आवाज़ ऊँची करने की अनुमति है। लेकिन उत्पीड़ित का धैर्य से काम लेना, बुरी बात के साथ आवाज़ बुलंद करने से बेहतर है। अल्लाह तुम्हारी बातों को सुनने वाला, तुम्हारे इरादों को जानने वाला है। इसलिए बुरे शब्दों या इरादों से सावधान रहो।
आयत 149
إِن تُبْدُوا۟ خَيْرًا أَوْ تُخْفُوهُ أَوْ تَعْفُوا۟ عَن سُوٓءٍۢ فَإِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَفُوًّۭا قَدِيرًا
إِن
अगर
تُبْدُوا۟
तुम ज़ाहिर करो
خَيْرًا
कोई नेकी
أَوْ
या
تُخْفُوهُ
तुम छुपाओ उसे
أَوْ
या
تَعْفُوا۟
तुम दरगुज़र करो
عَن
[of]
سُوٓءٍۢ
किसी बुराई से
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
كَانَ
है
عَفُوًّۭا
बहुत माफ़ करने वाला
قَدِيرًا
बहुत क़ुदरत रखने वाला
यदि तुम खुले रूप में नेकी और भलाई करो या उसे छिपाओ या किसी बुराई को क्षमा कर दो, तो अल्लाह भी क्षमा करनेवाला, सामर्थ्यवान है
तफ़्सीर:
यदि तुम कोई भली बात या भला कार्य प्रकट करो, या उसे छिपाओ, या उस व्यक्ति को क्षमा कर दो, जिसने तुमसे बुरा व्यवहार किया है; तो निःसंदेह अल्लाह बहुत माफ़ करने वाला, सर्वशक्तिमान है। इसलिए क्षमा करना तुम्हारे आचरण का हिस्सा होना चाहिए, शायद अल्लाह तुम्हें क्षमा कर दे।
आयत 150
إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكْفُرُونَ بِٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦ وَيُرِيدُونَ أَن يُفَرِّقُوا۟ بَيْنَ ٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦ وَيَقُولُونَ نُؤْمِنُ بِبَعْضٍۢ وَنَكْفُرُ بِبَعْضٍۢ وَيُرِيدُونَ أَن يَتَّخِذُوا۟ بَيْنَ ذَٰلِكَ سَبِيلًا
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَكْفُرُونَ
कुफ़्र करते हैं
بِٱللَّهِ
साथ अल्लाह के
وَرُسُلِهِۦ
और उसके रसूलों के
وَيُرِيدُونَ
और वो चाहते हैं
أَن
कि
يُفَرِّقُوا۟
वो तफ़रीक़ करें
بَيْنَ
दर्मियान
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَرُسُلِهِۦ
और उसके रसूलों के
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
نُؤْمِنُ
हम ईमान लाते हैं
بِبَعْضٍۢ
बाज़ पर
وَنَكْفُرُ
और हम कुफ़्र करते है
بِبَعْضٍۢ
बाज़ का
وَيُرِيدُونَ
और वो चाहते हैं
أَن
कि
يَتَّخِذُوا۟
वो बना लें
بَيْنَ
दर्मियान
ذَٰلِكَ
उसके
سَبِيلًا
कोई रास्ता
जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों का इनकार करते है और चाहते है कि अल्लाह और उसके रसूलों के बीच विच्छेद करें, और कहते है कि "हम कुछ को मानते है और कुछ को नहीं मानते" और इस तरह वे चाहते है कि बीच की कोई राह अपनाएँ;
तफ़्सीर:
जो लोग अल्लाह के साथ कुफ़्र करते और उसके रसूलों के साथ कुफ़्र करते हैं, तथा अल्लाह और उसके रसूलों के बीच अंतर करना चाहते हैं; कि वे अल्लाह पर ईमान लाएँ, परंतु उसके रसूलों का इनकार कर दें। तथा वे कहते हैं : हम कुछ रसूलों पर विश्वास करते हैं और उनमें से कुछ पर विश्वास नहीं करते। इस प्रकार वे कुफ़्र और ईमान के बीच का रास्ता अपनाना चाहते हैं, यह भ्रम रखते हुए कि यह उन्हें बचा लेगा।
आयत 151
أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْكَـٰفِرُونَ حَقًّۭا ۚ وَأَعْتَدْنَا لِلْكَـٰفِرِينَ عَذَابًۭا مُّهِينًۭا
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْكَـٰفِرُونَ
जो काफ़िर हैं
حَقًّۭا ۚ
हक़ीकी
وَأَعْتَدْنَا
और तैयार कर रखा है हमने
لِلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के लिए
عَذَابًۭا
अज़ाब
مُّهِينًۭا
रुस्वा करने वाला
वही लोग पक्के इनकार करनेवाले है और हमने इनकार करनेवालों के लिए अपमानजनक यातना तैयार कर रखी है
तफ़्सीर:
जो लोग यह रास्ता अपनाते हैं, वही सचमुच काफ़िर हैं; क्योंकि जिसने समस्त रसूलों या उनमें से कुछ का इनकार किया, उसने दरअसल अल्लाह और उसके रसूलों के साथ कुफ़्र किया। और हमने काफ़िरों के लिए क़ियामत के दिन उन्हें अपमानित करने वाली यातना तैयार कर रखी है, जो उनके अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाने से अहंकार करने की सज़ा के रूप में है।
आयत 152
وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ بِٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦ وَلَمْ يُفَرِّقُوا۟ بَيْنَ أَحَدٍۢ مِّنْهُمْ أُو۟لَـٰٓئِكَ سَوْفَ يُؤْتِيهِمْ أُجُورَهُمْ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَرُسُلِهِۦ
और उसके रसूलों पर
وَلَمْ
और नहीं
يُفَرِّقُوا۟
उन्होंने तफ़रीक़ की
بَيْنَ
दर्मियान
أَحَدٍۢ
किसी एक के
مِّنْهُمْ
उनमें से
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
سَوْفَ
अनक़रीब
يُؤْتِيهِمْ
वो देगा उन्हें
أُجُورَهُمْ ۗ
अजर उनका
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
غَفُورًۭا
बहुत बख़्शने वाला
رَّحِيمًۭا
निहायत रहम करने वाला
रहे वे लोग जो अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान रखते है और उनमें से किसी को उस सम्बन्ध में पृथक नहीं करते जो उनके बीच पाया जाता है, ऐसे लोगों को अल्लाह शीघ्र ही उनके प्रतिदान प्रदान करेगा। अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए और उसे एक माना, और उसके साथ किसी को साझी नहीं ठहराया, तथा उसके सभी रसूलों पर ईमान लाए और काफ़िरों की तरह उनमें से किसी के बीच अंतर नहीं किया, बल्कि उन सभी पर ईमान लाए; यही लोग हैं जिन्हें अल्लाह उनके ईमान तथा अच्छे कर्मों का बड़ा बदला प्रदान करेगा, और अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को बहुत क्षमा करने वाला, उनपर अति दयालु है।
आयत 153
يَسْـَٔلُكَ أَهْلُ ٱلْكِتَـٰبِ أَن تُنَزِّلَ عَلَيْهِمْ كِتَـٰبًۭا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ ۚ فَقَدْ سَأَلُوا۟ مُوسَىٰٓ أَكْبَرَ مِن ذَٰلِكَ فَقَالُوٓا۟ أَرِنَا ٱللَّهَ جَهْرَةًۭ فَأَخَذَتْهُمُ ٱلصَّـٰعِقَةُ بِظُلْمِهِمْ ۚ ثُمَّ ٱتَّخَذُوا۟ ٱلْعِجْلَ مِنۢ بَعْدِ مَا جَآءَتْهُمُ ٱلْبَيِّنَـٰتُ فَعَفَوْنَا عَن ذَٰلِكَ ۚ وَءَاتَيْنَا مُوسَىٰ سُلْطَـٰنًۭا مُّبِينًۭا
يَسْـَٔلُكَ
सवाल करते हैं आप से
أَهْلُ
(the) People
ٱلْكِتَـٰبِ
अहले किताब
أَن
कि
تُنَزِّلَ
आप उतार लाऐं
عَلَيْهِمْ
उन पर
كِتَـٰبًۭا
एक किताब
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ ۚ
आसमान से
فَقَدْ
पस तहक़ीक़
سَأَلُوا۟
उन्होंने सवाल किया था
مُوسَىٰٓ
मूसा से
أَكْبَرَ
ज़्यादा बड़ा
مِن
than
ذَٰلِكَ
इससे
فَقَالُوٓا۟
पस उन्होंने कहा था
أَرِنَا
दिखा हमें
ٱللَّهَ
अल्लाह
جَهْرَةًۭ
सामने
فَأَخَذَتْهُمُ
तो पकड़ लिया उन्हें
ٱلصَّـٰعِقَةُ
बिजली की कड़क ने
بِظُلْمِهِمْ ۚ
बवजह उनके ज़ुल्म के
ثُمَّ
फिर
ٱتَّخَذُوا۟
उन्होंने बना लिया
ٱلْعِجْلَ
बछड़े को (माबूद)
مِنۢ
from
بَعْدِ
बाद उसके
مَا
जो
جَآءَتْهُمُ
आ गईं उनके पास
ٱلْبَيِّنَـٰتُ
वाज़ेह निशानियाँ
فَعَفَوْنَا
पस दरगुज़र किया हमने
عَن
for
ذَٰلِكَ ۚ
उससे
وَءَاتَيْنَا
और दिया हमने
مُوسَىٰ
मूसा को
سُلْطَـٰنًۭا
ग़लबा
مُّبِينًۭا
वाज़ेह
किताबवालों की तुमसे माँग है कि तुम उनपर आकाश से कोई किताब उतार लाओ, तो वे तो मूसा से इससे भी बड़ी माँग कर चुके है। उन्होंने कहा था, "हमें अल्लाह को प्रत्यक्ष दिखा दो," तो उनके इस अपराध पर बिजली की कड़क ने उन्हें आ दबोचा। फिर वे बछड़े को अपना उपास्य बना बैठे, हालाँकि उनके पास खुली-खुली निशानियाँ आ चुकी थी। फिर हमने उसे भी क्षमा कर दिया और मूसा का स्पष्टा बल एवं प्रभाव प्रदान किया
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) यहूदी आपसे माँग करते हैं कि जैसे मूसा के साथ हुआ, वैसे ही आप उनके लिए आकाश से एक ही बार में कोई पुस्तक उतार लाएँ, जो आपकी सच्चाई की निशानी हो। तो आप इसे उनकी ओर से कोई बड़ा माँग न समझें। क्योंकि उनके पूर्वजों ने मूसा अलैहिस्सलाम से इससे कहीं बड़ी माँग की थी जो इन लोगों ने आपसे की है। उन्होंने कहा था कि "हमें अल्लाह को आमने-सामने दिखा दो", चुनाँचे उन्हें सज़ा के तौर पर बेहोश कर दिया गया। फिर अल्लाह ने उन्हें पुनर्जीवित किया, तो उन्होंने अल्लाह को छोड़कर बछड़े की पूजा की, हालाँकि उनके पास अल्लाह के एकत्व और उसके एकमात्र रब (पालनहार) और पूज्य होने को दर्शाने वाली स्पष्ट निशानियाँ आ चुकी थीं। फिर हमने उन्हें क्षमा कर दिया, तथा मूसा - अलैहिस्सलाम - को उनकी जाति के विरुद्ध स्पष्ट तर्क प्रदान किया।
आयत 154
وَرَفَعْنَا فَوْقَهُمُ ٱلطُّورَ بِمِيثَـٰقِهِمْ وَقُلْنَا لَهُمُ ٱدْخُلُوا۟ ٱلْبَابَ سُجَّدًۭا وَقُلْنَا لَهُمْ لَا تَعْدُوا۟ فِى ٱلسَّبْتِ وَأَخَذْنَا مِنْهُم مِّيثَـٰقًا غَلِيظًۭا
وَرَفَعْنَا
और उठाया हमने
فَوْقَهُمُ
उन पर
ٱلطُّورَ
तूर को
بِمِيثَـٰقِهِمْ
उनसे पुख़्ता अहद लेने के लिए
وَقُلْنَا
और कहा हमने
لَهُمُ
उन्हें
ٱدْخُلُوا۟
दाख़िल हो जाओ
ٱلْبَابَ
दरवाज़े में
سُجَّدًۭا
सजदा करते हुए
وَقُلْنَا
और कहा हमने
لَهُمْ
उन्हें
لَا
(Do) not
تَعْدُوا۟
ना तुम ज़्यादती करो
فِى
in
ٱلسَّبْتِ
सब्त में
وَأَخَذْنَا
और लिया हमने
مِنْهُم
उनसे
مِّيثَـٰقًا
अहद
غَلِيظًۭا
पक्का
और उन लोगों से वचन लेने के साथ (तूर) पहाड़ को उनपर उठा दिया और उनसे कहा, "दरवाज़े में सजदा करते हुए प्रवेश करो।" और उनसे कहा, "सब्त (सामूहिक इबादत का दिन) के विषय में ज़्यादती न करना।" और हमने उनसे बहुत-ही दृढ़ वचन लिया था
तफ़्सीर:
तथा हमने उनसे दृढ़ वचन लेने के कारण, उसके अनुसार काम करने के लिए उन्हें डराने के लिए पहाड़ को उनके ऊपर उठा लिया, और उसे उठाने के बाद हमने उनसे कहा : बैतुल मक़दिस के द्वार में सजदा करते हुए सिर झुकाकर प्रवेश करो। परंतु वे अपनी पीठ के बल घिसटते हुए भीतर गए। तथा हमने उनसे कहा : शनिवार को शिकार करके अति न करो। लेकिन उन्होंने अति किया, सो उन्होंने शिकार किया। तथा हमने उनसे इस बात का कड़ा वचन लिया, पर उन्होंने उस वचन को तोड़ दिया जो उनसे लिया गया था।
आयत 155
فَبِمَا نَقْضِهِم مِّيثَـٰقَهُمْ وَكُفْرِهِم بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ وَقَتْلِهِمُ ٱلْأَنۢبِيَآءَ بِغَيْرِ حَقٍّۢ وَقَوْلِهِمْ قُلُوبُنَا غُلْفٌۢ ۚ بَلْ طَبَعَ ٱللَّهُ عَلَيْهَا بِكُفْرِهِمْ فَلَا يُؤْمِنُونَ إِلَّا قَلِيلًۭا
فَبِمَا
पस बवजह
نَقْضِهِم
उनके तोड़ने के
مِّيثَـٰقَهُمْ
अपने अहद को
وَكُفْرِهِم
और उनके कुफ़्र के
بِـَٔايَـٰتِ
साथ आयात के
ٱللَّهِ
अल्लाह की
وَقَتْلِهِمُ
और उनके क़त्ल करने के
ٱلْأَنۢبِيَآءَ
अम्बिया को
بِغَيْرِ
बग़ैर
حَقٍّۢ
हक़ के
وَقَوْلِهِمْ
और उनके कहने के
قُلُوبُنَا
दिल हमारे
غُلْفٌۢ ۚ
ग़िलाफ़ हैं
بَلْ
बल्कि
طَبَعَ
मोहर लगा दी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَيْهَا
उन पर
بِكُفْرِهِمْ
बवजह उनके कुफ़्र के
فَلَا
पस नहीं
يُؤْمِنُونَ
वो ईमान लाते
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا
बहुत थोड़ा
फिर उनके अपने वचन भंग करने और अल्लाह की आयतों का इनकार करने के कारण और नबियों को नाहक़ क़त्ल करने और उनके यह कहने के कारण कि "हमारे हृदय आवरणों में सुरक्षित है" - नहीं, बल्कि वास्तव में उनके इनकार के कारण अल्लाह ने उनके दिलों पर ठप्पा लगा दिया है। तो ये ईमान थोड़े ही लाते है
तफ़्सीर:
अतः हमने उन्हें अपनी दया से दूर कर दिया, क्योंकि उन्होंने उस दृढ़ वचन को तोड़ दिया, जो उनसे लिया गया था, तथा इस कारण कि उन्होंने अल्लाह की निशानियों का इनकार किया और नबियों की हत्या करने का दुस्साहस किया एवं मुहम्मद - सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम - से कहा कि : "हमारे दिल एक आवरण में हैं, इसलिए आप जो कहते हैं उसे नहीं समझते।" जबकि मामला ऐसा नहीं है। बल्कि अल्लाह ने उनके कुफ़्र के कारण उनके दिलों पर मुहर लगा दी है, इसलिए कोई अच्छाई उन तक नहीं पहुँचती। अतः वे बहुत कम ईमान लाते हैं, जिससे उन्हें कोई फायदा नहीं होता है।
आयत 156
وَبِكُفْرِهِمْ وَقَوْلِهِمْ عَلَىٰ مَرْيَمَ بُهْتَـٰنًا عَظِيمًۭا
وَبِكُفْرِهِمْ
और बवजह उनके कुफ़्र के
وَقَوْلِهِمْ
और उनके कहने (बाँधने) के
عَلَىٰ
ऊपर
مَرْيَمَ
मरियम के
بُهْتَـٰنًا
बोहतान
عَظِيمًۭا
बहुत बड़ा
और उनके इनकार के कारण और मरयम के ख़िलाफ ऐसी बात करने पर जो एक बड़ा लांछन था -
तफ़्सीर:
और हमने उन्हें उनके कुफ़्र के कारण, तथा इस कारण दया से निकाल दिया कि उन्होंने मरयम - अलैहस्सलाम - पर व्यभिचार का झूठा और निराधार आरोप लगाया।
आयत 157
وَقَوْلِهِمْ إِنَّا قَتَلْنَا ٱلْمَسِيحَ عِيسَى ٱبْنَ مَرْيَمَ رَسُولَ ٱللَّهِ وَمَا قَتَلُوهُ وَمَا صَلَبُوهُ وَلَـٰكِن شُبِّهَ لَهُمْ ۚ وَإِنَّ ٱلَّذِينَ ٱخْتَلَفُوا۟ فِيهِ لَفِى شَكٍّۢ مِّنْهُ ۚ مَا لَهُم بِهِۦ مِنْ عِلْمٍ إِلَّا ٱتِّبَاعَ ٱلظَّنِّ ۚ وَمَا قَتَلُوهُ يَقِينًۢا
وَقَوْلِهِمْ
और उनके कहने के
إِنَّا
बेशक हम
قَتَلْنَا
क़त्ल किया हमने
ٱلْمَسِيحَ
मसीह
عِيسَى
Isa
ٱبْنَ
son
مَرْيَمَ
ईसा इब्ने मरियम को
رَسُولَ
जो रसूल था
ٱللَّهِ
अल्लाह का
وَمَا
हालाँकि नहीं
قَتَلُوهُ
उन्होंने क़त्ल किया उसे
وَمَا
और नहीं
صَلَبُوهُ
उन्होंने सलीब/सूली चढ़ाया उसे
وَلَـٰكِن
और लेकिन
شُبِّهَ
वो मुश्तबा कर दिया गया
لَهُمْ ۚ
उनके लिए
وَإِنَّ
और बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
ٱخْتَلَفُوا۟
इख़्तिलाफ़ किया
فِيهِ
उसमें
لَفِى
(are) surely in
شَكٍّۢ
अलबत्ता शक में हैं
مِّنْهُ ۚ
उससे
مَا
नहीं
لَهُم
उनके लिए
بِهِۦ
उसका
مِنْ
[of]
عِلْمٍ
कोई इल्म
إِلَّا
मगर
ٱتِّبَاعَ
पैरवी करना
ٱلظَّنِّ ۚ
गुमान की
وَمَا
और नहीं
قَتَلُوهُ
उन्होंने क़त्ल किया उसे
يَقِينًۢا
यक़ीनी तौर पर
और उनके इस कथन के कारण कि हमने मरयम के बेटे ईसा मसीह, अल्लाह के रसूल, को क़त्ल कर डाला - हालाँकि न तो इन्होंने उसे क़त्ल किया और न उसे सूली पर चढाया, बल्कि मामला उनके लिए संदिग्ध हो गया। और जो लोग इसमें विभेद कर रहे है, निश्चय ही वे इस मामले में सन्देह में थे। अटकल पर चलने के अतिरिक्त उनके पास कोई ज्ञान न था। निश्चय ही उन्होंने उसे (ईसा को) क़त्ल नहीं किया,
तफ़्सीर:
तथा हमने उनपर उनके गर्व करते हुए झूठमूठ यह कहने के कारण लानत भेजी : निःसंदेह हमने ही अल्लाह के रसूल मरयम के पुत्र ईसा मसीह को क़त्ल किया। हालाँकि न तो उन्होंने उन्हें क़त्ल किया, जैसा कि उनका दावा है, और न ही उन्हें सूली पर चढ़ाया। बल्कि उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति को क़त्ल किया, जिसे अल्लाह ने ईसा - अलैहिस्सलाम - का सदृश बना दिया था और उसे सूली पर चढ़ाया। इसलिए उन्होंने सोचा कि क़त्ल होने वाला ईसा अलैहिस्सलाम ही थे। जिन यहूदियों ने ईसा अलैहिस्सलाम की हत्या का दावा किया और जिन ईसाइयों ने उन्हें यहूदियों के हवाले किया, दोनों ही उनके मामले में भ्रम और संदेह में हैं। क्योंकि उन्हें इसका कोई ज्ञान नहीं है। वे केवल अनुमान का पालन करते हैं और अनुमान से सच्चाई का कुछ भी लाभ नहीं होता है। उन्होंने निश्चित रूप से ईसा अलैहिस्सलाम को न तो क़त्ल किया और न उन्हें सूली पर चढ़ाया।
आयत 158
بَل رَّفَعَهُ ٱللَّهُ إِلَيْهِ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًۭا
بَل
बल्कि
رَّفَعَهُ
उठा लिया उसे
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
إِلَيْهِ ۚ
अपनी तरफ़
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَزِيزًا
बहुत ज़बरदस्त
حَكِيمًۭا
ख़ूब हिकमत वाला
बल्कि उसे अल्लाह ने अपनी ओर उठा लिया। और अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
बल्कि अल्लाह ने ईसा अलैहिस्सलाम को उनकी साज़िश से बचा लिया और उन्हें उनके शरीर एवं आत्मा के साथ अपनी ओर उठा लिया। अल्लाह सदा से अपने राज्य में प्रभुत्वशाली है, कोई उसे पराजित नहीं कर सकता, अपने प्रबंधन, फ़ैसले और विधान में पूर्ण हिकमत वाला है।
आयत 159
وَإِن مِّنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ إِلَّا لَيُؤْمِنَنَّ بِهِۦ قَبْلَ مَوْتِهِۦ ۖ وَيَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ يَكُونُ عَلَيْهِمْ شَهِيدًۭا
وَإِن
और नहीं
مِّنْ
from
أَهْلِ
(the) People
ٱلْكِتَـٰبِ
अहले किताब में से कोई
إِلَّا
मगर
لَيُؤْمِنَنَّ
अलबत्ता वो ज़रूर ईमान लाएगा
بِهِۦ
इस पर
قَبْلَ
पहले
مَوْتِهِۦ ۖ
उसकी मौत से
وَيَوْمَ
और दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
يَكُونُ
वो होगा
عَلَيْهِمْ
उन पर
شَهِيدًۭا
गवाह
किताबवालों में से कोई ऐसा न होगा, जो उसकी मृत्यु से पहले उसपर ईमान न ले आए। वह क़ियामत के दिन उनपर गवाह होगा
तफ़्सीर:
अह्ले किताब (यहूदियों एवं ईसाइयों) में से हर व्यक्ति, ईसा अलैहिस्सलाम पर उनके अंतिम युग में उतरने के पश्चात और उनकी मृत्यु से पहले अवश्य ईमान लाएगा, तथा क़ियामत के दिन ईसा अलैहिस्सलाम उनके कर्मों के साक्षी होंगे; कि उनमें से क्या शरीयत के अनुसार है और क्या उसके ख़िलाफ़।
आयत 160
فَبِظُلْمٍۢ مِّنَ ٱلَّذِينَ هَادُوا۟ حَرَّمْنَا عَلَيْهِمْ طَيِّبَـٰتٍ أُحِلَّتْ لَهُمْ وَبِصَدِّهِمْ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ كَثِيرًۭا
فَبِظُلْمٍۢ
पस बवजह ज़ुल्म के
مِّنَ
of
ٱلَّذِينَ
उन लोगों के जो
هَادُوا۟
यहूदी बन गए
حَرَّمْنَا
हराम कर दीं हमने
عَلَيْهِمْ
उन पर
طَيِّبَـٰتٍ
पाकीज़ा चीज़ें
أُحِلَّتْ
जो हलाल की गई थीं
لَهُمْ
उनके लिए
وَبِصَدِّهِمْ
और बवजह उनके रोकने के
عَن
from
سَبِيلِ
रास्ते से
ٱللَّهِ
अल्लाह के
كَثِيرًۭا
अक्सरियत को
सारांश यह कि यहूदियों के अत्याचार के कारण हमने बहुत-सी अच्छी पाक चीज़े उनपर हराम कर दी, जो उनके लिए हलाल थी और उनके प्रायः अल्लाह के मार्ग से रोकने के कारण;
तफ़्सीर:
यहूदियों के अत्याचार के कारण, हमने उनपर कई पाकीज़ा खाने की चीज़ों को हराम कर दिया, जो उनके लिए हलाल थीं। चुनाँचे हमने उनपर हर नाख़ून (पंजे) से शिकार करने वाला पक्षी हराम कर दिया, तथा गायों और बकरियों में से हमने उनकी चर्बी को उनपर हराम कर दिया, सिवाय उस (चर्बी) के जो उन दोनों की पीठों से लगी हुई हो। इसका एक कारण यह भी था कि वे खुद को और दूसरों को अल्लाह के मार्ग से रोकते थे, यहाँ तक कि भलाई से रोकना उनका स्वभाव बन गया था।
आयत 161
وَأَخْذِهِمُ ٱلرِّبَوٰا۟ وَقَدْ نُهُوا۟ عَنْهُ وَأَكْلِهِمْ أَمْوَٰلَ ٱلنَّاسِ بِٱلْبَـٰطِلِ ۚ وَأَعْتَدْنَا لِلْكَـٰفِرِينَ مِنْهُمْ عَذَابًا أَلِيمًۭا
وَأَخْذِهِمُ
और (बवजह) उनके लेने के
ٱلرِّبَوٰا۟
सूद को
وَقَدْ
हालाँकि तहक़ीक़
نُهُوا۟
वो रोके गए थे
عَنْهُ
उससे
وَأَكْلِهِمْ
और (बवजह) उनके खाने के
أَمْوَٰلَ
माल
ٱلنَّاسِ
लोगों के
بِٱلْبَـٰطِلِ ۚ
बातिल (तरीक़े) से
وَأَعْتَدْنَا
और तैयार कर रखा है हमने
لِلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के लिए
مِنْهُمْ
उनमें से
عَذَابًا
अज़ाब
أَلِيمًۭا
दर्दनाक
और उनके ब्याज लेने के कारण, जबकि उन्हें इससे रोका गया था। और उनके अवैध रूप से लोगों के माल खाने के कारण ऐसा किया गया और हमने उनमें से जिन लोगों ने इनकार किया उनके लिए दुखद यातना तैयार कर रखी है
तफ़्सीर:
तथा उनके ब्याज का लेन-देन करने के कारण, जबकि अल्लाह ने उन्हें उसे लेने से मना किया था, तथा लोगों के धन को बिना किसी उचित अधिकार के लेने के कारण। और हमने उनमें से काफ़िरों के लिए एक दर्दनाक अज़ाब तैयार किया है।
आयत 162
لَّـٰكِنِ ٱلرَّٰسِخُونَ فِى ٱلْعِلْمِ مِنْهُمْ وَٱلْمُؤْمِنُونَ يُؤْمِنُونَ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيْكَ وَمَآ أُنزِلَ مِن قَبْلِكَ ۚ وَٱلْمُقِيمِينَ ٱلصَّلَوٰةَ ۚ وَٱلْمُؤْتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَٱلْمُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ أُو۟لَـٰٓئِكَ سَنُؤْتِيهِمْ أَجْرًا عَظِيمًا
لَّـٰكِنِ
लेकिन
ٱلرَّٰسِخُونَ
जो रासिख़ हैं
فِى
in
ٱلْعِلْمِ
इल्म में
مِنْهُمْ
उनमें से
وَٱلْمُؤْمِنُونَ
और जो ईमान लाने वाले हैं
يُؤْمِنُونَ
वो ईमान लाते हैं
بِمَآ
उस पर जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
وَمَآ
और जो
أُنزِلَ
नाज़िल किया गया
مِن
from
قَبْلِكَ ۚ
आपसे पहले
وَٱلْمُقِيمِينَ
और जो क़ायम करने वाले हैं
ٱلصَّلَوٰةَ ۚ
नमाज़
وَٱلْمُؤْتُونَ
और जो देने वाले हैं
ٱلزَّكَوٰةَ
ज़कात
وَٱلْمُؤْمِنُونَ
और जो ईमान लाने वाले हैं
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَٱلْيَوْمِ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرِ
और आख़िरी दिन पर
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
سَنُؤْتِيهِمْ
अनक़रीब हम देंगे उन्हें
أَجْرًا
अजर
عَظِيمًا
बहुत बड़ा
परन्तु उनमें से जो लोग ज्ञान में पक्के है और ईमानवाले हैं, वे उस पर ईमान रखते है जो तुम्हारी ओर उतारा गया है और जो तुमसे पहले उतारा गया था, और जो विशेष रूप से नमाज़ क़ायम करते है, ज़कात देते और अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान रखते है। यही लोग है जिन्हें हम शीघ्र ही बड़ी प्रतिदान प्रदान करेंगे
तफ़्सीर:
परंतु यहूदियों में से ठोस ज्ञान रखने वाले तथा ईमान लाने वाले लोग, उस क़ुरआन को सच्चा मानते हैं, जो अल्लाह ने (ऐ रसूल!) आपपर उतारा है, तथा वे उन किताबों को भी सत्य मानते हैं, जो आपसे पहले के रसूलों पर उतारी गई थीं, जैसे तौरात और इंजील, और वे नमाज़ क़ायम करते और अपने धन की ज़कात देते हैं, तथा इस बात पर विश्वास रखते हैं कि अल्लाह ही अकेला पूज्य है, जिसका कोई साझी नहीं, और क़ियामत के दिन को सत्य मानते हैं; ये लोग जिनके पास ये गुण हैं हम उन्हें बहुत बड़ा बदला प्रदान करेंगे।
आयत 163
۞ إِنَّآ أَوْحَيْنَآ إِلَيْكَ كَمَآ أَوْحَيْنَآ إِلَىٰ نُوحٍۢ وَٱلنَّبِيِّـۧنَ مِنۢ بَعْدِهِۦ ۚ وَأَوْحَيْنَآ إِلَىٰٓ إِبْرَٰهِيمَ وَإِسْمَـٰعِيلَ وَإِسْحَـٰقَ وَيَعْقُوبَ وَٱلْأَسْبَاطِ وَعِيسَىٰ وَأَيُّوبَ وَيُونُسَ وَهَـٰرُونَ وَسُلَيْمَـٰنَ ۚ وَءَاتَيْنَا دَاوُۥدَ زَبُورًۭا
۞ إِنَّآ
बेशक हम
أَوْحَيْنَآ
वही की हमने
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
كَمَآ
जैसा कि
أَوْحَيْنَآ
वही की हमने
إِلَىٰ
तरफ़
نُوحٍۢ
नूह के
وَٱلنَّبِيِّـۧنَ
और नबियों के
مِنۢ
from
بَعْدِهِۦ ۚ
बाद इसके
وَأَوْحَيْنَآ
और वही की हमने
إِلَىٰٓ
तरफ़
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम
وَإِسْمَـٰعِيلَ
और इस्माईल
وَإِسْحَـٰقَ
और इसहाक़
وَيَعْقُوبَ
और याक़ूब
وَٱلْأَسْبَاطِ
और औलादे याक़ूब के
وَعِيسَىٰ
और ईसा
وَأَيُّوبَ
और अय्यूब
وَيُونُسَ
और यूनुस
وَهَـٰرُونَ
और हारून
وَسُلَيْمَـٰنَ ۚ
और सुलेमान के
وَءَاتَيْنَا
और दी हमने
دَاوُۥدَ
दाऊद को
زَبُورًۭا
ज़बूर
हमने तुम्हारी ओर उसी प्रकार वह्यड की है जिस प्रकार नूह और उसके बाद के नबियों की ओर वह्यु की। और हमने इबराहीम, इसमाईल, इसहाक़ और याक़ूब और उसकी सन्तान और ईसा और अय्यूब और यूनुस और हारून और सुलैमान की ओर भी वह्यक की। और हमने दाउद को ज़बूर प्रदान किया
तफ़्सीर:
हमने (ऐ रसूल!) आपकी ओर वैसे ही वह़्य (प्रकाशना) भेजी है, जैसे कि हमने आपसे पहले के नबियों की ओर वह़्य भेजी थी। इसलिए आप कोई अनोखे रसूल नहीं हैं। चुनाँचे हमने नूह की ओर वह़्य भेजी तथा उनके बाद आने वाले नबियों की ओर वह़्य भेजी, और हमने इबराहीम की ओर, उनके दोनों सुपुत्रों इसमाईल एवं इसहाक़ की ओर, तथा याक़ूब बिन इसहाक़ की ओर और असबात (यानी याक़ूब अलैहिस्सलाम के बेटों से निकलने वाले बनी इसराईल के बारह वंशों में होने वाले नबियों) की ओर वह़्य भेजी। तथा हमने ईसा, अय्यूब, यूनुस, हारून और सुलैमान की ओर वह़्य भेजी, और हमने दाऊद अलैहिस्सलाम को ज़बूर नामी पुस्तक दी।
आयत 164
وَرُسُلًۭا قَدْ قَصَصْنَـٰهُمْ عَلَيْكَ مِن قَبْلُ وَرُسُلًۭا لَّمْ نَقْصُصْهُمْ عَلَيْكَ ۚ وَكَلَّمَ ٱللَّهُ مُوسَىٰ تَكْلِيمًۭا
وَرُسُلًۭا
और कई रसूल
قَدْ
तहक़ीक़
قَصَصْنَـٰهُمْ
ज़िक्र किया हमने उनका
عَلَيْكَ
आप पर
مِن
from
قَبْلُ
इससे पहले
وَرُسُلًۭا
और कई रसूल
لَّمْ
नहीं
نَقْصُصْهُمْ
हमने ज़िक्र किया उनका
عَلَيْكَ ۚ
आप पर
وَكَلَّمَ
और कलाम किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مُوسَىٰ
मूसा से
تَكْلِيمًۭا
कलाम करना
और कितने ही रसूल हुए जिनका वृतान्त पहले हम तुमसे बयान कर चुके है और कितने ही ऐसे रसूल हुए जिनका वृतान्त हमने तुमसे बयान नहीं किया। और मूसा से अल्लाह ने बातचीत की, जिस प्रकार बातचीत की जाती है
तफ़्सीर:
हमने कुछ रसूल ऐसे भेजे, जिनके वृत्तांत हमने आपसे क़ुरआन में बयान कर दिए हैं, तथा कुछ रसूल ऐसे भेजे जिनके बारे में हमने आपसे उसमें कुछ बयान नहीं किया और किसी हिकमत के तहत उसमें उनका उल्लेख करना छोड़ दिया। तथा अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम से उनके सम्मान में उन्हें नबी बनाने के संबंध में - बिना मध्यस्थता के - वास्तविक रूप से बात की, जैसा उसकी महिमा के योग्य है।
आयत 165
رُّسُلًۭا مُّبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَى ٱللَّهِ حُجَّةٌۢ بَعْدَ ٱلرُّسُلِ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًۭا
رُّسُلًۭا
रसूल थे (ये)
مُّبَشِّرِينَ
ख़ुशख़बरी देने वाले
وَمُنذِرِينَ
और डराने वाले
لِئَلَّا
ताकि ना
يَكُونَ
हो
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
عَلَى
against
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
حُجَّةٌۢ
कोई हुज्जत
بَعْدَ
बाद
ٱلرُّسُلِ ۚ
रसूलों के
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَزِيزًا
बहुत ज़बरदस्त
حَكِيمًۭا
ख़ूब हिकमत वाला
रसूल शुभ समाचार देनेवाले और सचेत करनेवाले बनाकर भेजे गए है, ताकि रसूलों के पश्चात लोगों के पास अल्लाह के मुक़ाबले में (अपने निर्दोष होने का) कोई तर्क न रहे। अल्लाह अत्यन्त प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
हमने उन्हें अल्लाह पर ईमान लाने वालों को अच्छे प्रतिफल की शुभ सूचना देने वाला तथा उसके साथ कुफ़्र करने वालों को दर्दनाक यातना से डराने वाला बनाकर भेजा, ताकि रसूलों को भेजने के बाद लोगों के लिए अल्लाह के ख़िलाफ़ कोई तर्क न रह जाए, जिसे वे बहाना बना सकें। तथा अल्लाह अपने राज्य में प्रभुत्वशाली, अपने फ़ैसले में हिकमत वाला है।
आयत 166
لَّـٰكِنِ ٱللَّهُ يَشْهَدُ بِمَآ أَنزَلَ إِلَيْكَ ۖ أَنزَلَهُۥ بِعِلْمِهِۦ ۖ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ يَشْهَدُونَ ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ شَهِيدًا
لَّـٰكِنِ
लेकिन
ٱللَّهُ
अल्लाह
يَشْهَدُ
वो गवाही देता है
بِمَآ
उसकी जो
أَنزَلَ
उसने नाज़िल किया
إِلَيْكَ ۖ
तरफ़ आपके
أَنزَلَهُۥ
उसने नाज़िल किया है उसे
بِعِلْمِهِۦ ۖ
अपने इल्म से
وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
और फ़रिश्ते
يَشْهَدُونَ ۚ
वो गवाही देते हैं
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِٱللَّهِ
अल्लाह
شَهِيدًا
गवाह
परन्तु अल्लाह गवाही देता है कि उसके द्वारा जो उसने तुम्हारी ओर उतारा है कि उसे उसने अपने ज्ञान के साथ उतारा है और फ़रिश्ते भी गवाही देते है, यद्यपि अल्लाह का गवाह होना ही काफ़ी है
तफ़्सीर:
यदि यहूद आपका इनकार करते हैं, तो अल्लाह उस क़ुरआन की प्रामाणिकता के संबंध में आपकी पुष्टि करता है, जो उसने (ऐ रसूल!) आपकी ओर उतारा है। अल्लाह ने उसमें अपना वह ज्ञान उतारा है, जिससे वह अपने बंदों को अवगत कराना चाहता है, कि वह किन चीज़ों को पसंद करता और उनसे प्रसन्न होता है या किन चीज़ों को नापसंद करता और उनसे नफरता करता है। अल्लाह की गवाही के साथ फ़रिश्ते भी उसकी सच्चाई की गवाही देते हैं जो आप लेकर आए हैं। तथा अल्लाह गवाह के रूप में पर्याप्त है। क्योंकि उसकी गवाही के बाद किसी दूसरे की गवाही की ज़रूरत नहीं।
आयत 167
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَصَدُّوا۟ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ قَدْ ضَلُّوا۟ ضَلَـٰلًۢا بَعِيدًا
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
وَصَدُّوا۟
और उन्होंने रोका
عَن
from
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते से
قَدْ
तहक़ीक़
ضَلُّوا۟
वो गुमराह हो गए
ضَلَـٰلًۢا
गुमराह होना
بَعِيدًا
दूर का
निश्चय ही, जिन लोगों ने इनकार किया और अल्लाह के मार्ग से रोका, वे भटककर बहुत दूर जा पड़े
तफ़्सीर:
निःसंदेह जिन लोगों ने आपके नबी होने का इनकार किया और लोगों को इस्लाम के मार्ग से रोका, निश्चय वे सत्य से बहुत दूर जा पड़े।
आयत 168
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَظَلَمُوا۟ لَمْ يَكُنِ ٱللَّهُ لِيَغْفِرَ لَهُمْ وَلَا لِيَهْدِيَهُمْ طَرِيقًا
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
وَظَلَمُوا۟
और ज़ुल्म किया
لَمْ
नहीं
يَكُنِ
है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِيَغْفِرَ
कि वो बख़्श दे
لَهُمْ
उन्हें
وَلَا
और ना
لِيَهْدِيَهُمْ
कि वो हिदायत दे उन्हें
طَرِيقًا
रास्ते की
जिन लोगों ने इनकार किया और ज़ुल्म पर उतर आए, उन्हें अल्लाह कदापि क्षमा नहीं करेगा और न उन्हें कोई मार्ग दिखाएगा
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूलों के साथ कुफ़्र किया और कुफ़्र पर बने रहकर ख़ुद पर ज़ुल्म किया, अल्लाह उनके कुफ़्र पर अटल रहने को कभी क्षमा नहीं करेगा, और न ही उन्हें अल्लाह की यातना से बचाने वाला मार्ग दर्शाएगा।
आयत 169
إِلَّا طَرِيقَ جَهَنَّمَ خَـٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدًۭا ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرًۭا
إِلَّا
सिवाय
طَرِيقَ
रास्ते के
جَهَنَّمَ
जहन्नम के
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَآ
उसमें
أَبَدًۭا ۚ
अब्द तक/हमेशा-हमेशा
وَكَانَ
और है
ذَٰلِكَ
ये बात
عَلَى
for
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
يَسِيرًۭا
बहुत आसान
सिवाय जहन्नम के मार्ग के, जिसमें वे सदैव पड़े रहेंगे। और यह अल्लाह के लिए बहुत-ही सहज बात है
तफ़्सीर:
सिवाय उस रास्ते के जो जहन्नम में प्रवेश की ओर ले जाता है, जिसमें वे सदा-सर्वदा रहने वाले हैं। और यह काम अल्लाह के लिए बहुत ही आसान है, क्योंकि कोई भी चीज़ उसे विवश नहीं कर सकती।
आयत 170
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ قَدْ جَآءَكُمُ ٱلرَّسُولُ بِٱلْحَقِّ مِن رَّبِّكُمْ فَـَٔامِنُوا۟ خَيْرًۭا لَّكُمْ ۚ وَإِن تَكْفُرُوا۟ فَإِنَّ لِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلِيمًا حَكِيمًۭا
يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلنَّاسُ
लोगो
قَدْ
तहक़ीक़
جَآءَكُمُ
आ गया है तुम्हारे पास
ٱلرَّسُولُ
रसूल
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ है
مِن
from
رَّبِّكُمْ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
فَـَٔامِنُوا۟
पस ईमान ले आओ
خَيْرًۭا
बेहतर है
لَّكُمْ ۚ
तुम्हारे लिए
وَإِن
और अगर
تَكْفُرُوا۟
तुम कुफ़्र करोगे
فَإِنَّ
तो बेशक
لِلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَٱلْأَرْضِ ۚ
और ज़मीन में
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلِيمًا
बहुत इल्म वाला
حَكِيمًۭا
बहुत हिकमत वाला
ऐ लोगों! रसूल तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से सत्य लेकर आ गया है। अतः तुम उस भलाई को मानो जो तुम्हारे लिए जुटाई गई। और यदि तुम इनकार करते हो तो आकाशों और धरती में जो कुछ है, वह अल्लाह ही का है। और अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
ऐ लोगो! रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तुम्हारे पास मार्गदर्शन और सत्य धर्म के साथ अल्लाह की ओर से आए हैं। अतः वह तुम्हारे पास जो कुछ लाए हैं उसपर ईमान ले आओ, यह दुनिया तथा आख़िरत में तुम्हारे लिए बेहतर होगा। यदि तुम अल्लाह के साथ कुफ़्र करते हो, तो अल्लाह तुम्हारे ईमान से बेनियाज़ है, तुम्हारा कुफ़्र करना उसे नुक़सान नहीं पहुँचाएगा। क्योंकि जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में तथा इन दोनों के बीच है, सब उसके अधिकार में है। तथा अल्लाह उसके बारे में जानने वाला है जो मार्गदर्शन का पात्र है, इसलिए उसके लिए मार्गदर्शन को आसान बना देता है, और जो उसका हक़दार नहीं है, इसलिए उसे उससे अंधा कर देता है। वह अपनी बातों, कार्यों, विधान और नियति में पूर्ण हिकमत वाला है।
आयत 171
يَـٰٓأَهْلَ ٱلْكِتَـٰبِ لَا تَغْلُوا۟ فِى دِينِكُمْ وَلَا تَقُولُوا۟ عَلَى ٱللَّهِ إِلَّا ٱلْحَقَّ ۚ إِنَّمَا ٱلْمَسِيحُ عِيسَى ٱبْنُ مَرْيَمَ رَسُولُ ٱللَّهِ وَكَلِمَتُهُۥٓ أَلْقَىٰهَآ إِلَىٰ مَرْيَمَ وَرُوحٌۭ مِّنْهُ ۖ فَـَٔامِنُوا۟ بِٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦ ۖ وَلَا تَقُولُوا۟ ثَلَـٰثَةٌ ۚ ٱنتَهُوا۟ خَيْرًۭا لَّكُمْ ۚ إِنَّمَا ٱللَّهُ إِلَـٰهٌۭ وَٰحِدٌۭ ۖ سُبْحَـٰنَهُۥٓ أَن يَكُونَ لَهُۥ وَلَدٌۭ ۘ لَّهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۗ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ وَكِيلًۭا
يَـٰٓأَهْلَ
O People
ٱلْكِتَـٰبِ
ऐ अहले किताब
لَا
(Do) not
تَغْلُوا۟
ना तुम ग़ुलुव करो
فِى
in
دِينِكُمْ
अपने दीन में
وَلَا
और ना
تَقُولُوا۟
तुम कहो
عَلَى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
إِلَّا
मगर
ٱلْحَقَّ ۚ
हक़
إِنَّمَا
बेशक
ٱلْمَسِيحُ
मसीह
عِيسَى
Isa
ٱبْنُ
son
مَرْيَمَ
ईसा इब्ने मरियम
رَسُولُ
रसूल है
ٱللَّهِ
अल्लाह का
وَكَلِمَتُهُۥٓ
और कलमा उसका
أَلْقَىٰهَآ
उसने डाला था उसको
إِلَىٰ
तरफ़
مَرْيَمَ
मरियम के
وَرُوحٌۭ
और रूह
مِّنْهُ ۖ
उसकी तरफ़ से
فَـَٔامِنُوا۟
तो ईमान लाओ तुम
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَرُسُلِهِۦ ۖ
और उसके रसूलों पर
وَلَا
और ना
تَقُولُوا۟
तुम कहो
ثَلَـٰثَةٌ ۚ
तीन हैं
ٱنتَهُوا۟
बाज़ आ जाओ
خَيْرًۭا
बेहतर है
لَّكُمْ ۚ
तुम्हारे लिए
إِنَّمَا
बेशक
ٱللَّهُ
अल्लाह
إِلَـٰهٌۭ
इलाह है
وَٰحِدٌۭ ۖ
एक ही
سُبْحَـٰنَهُۥٓ
पाक है वो
أَن
कि
يَكُونَ
हो
لَهُۥ
उसके लिए
وَلَدٌۭ ۘ
कोई औलाद
لَّهُۥ
उसी के लिए है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ ۗ
ज़मीन में है
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِٱللَّهِ
अल्लाह
وَكِيلًۭا
कारसाज़
ऐ किताबवालों! अपने धर्म में हद से आगे न बढ़ो और अल्लाह से जोड़कर सत्य के अतिरिक्त कोई बात न कहो। मरयम का बेटा मसीह-ईसा इसके अतिरिक्त कुछ नहीं कि अल्लाह का रसूल है और उसका एक 'कलिमा' है, जिसे उसने मरमय की ओर भेजा था। और उसकी ओर से एक रूह है। तो तुम अल्लाह पर और उसके रसूलों पर ईमान लाओ और "तीन" न कहो - बाज़ आ जाओ! यह तुम्हारे लिए अच्छा है - अल्लाह तो केवल अकेला पूज्य है। यह उसकी महानता के प्रतिकूल है कि उसका कोई बेटा हो। आकाशों और धरती में जो कुछ है, उसी का है। और अल्लाह कार्यसाधक की हैसियत से काफ़ी है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इंजील वाले ईसाइयों से कह दें : तुम अपने धर्म में सीमा से परे मत जाओ तथा ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में अल्लाह पर सत्य के अलावा कुछ भी न कहो। मरयम के बेटे ईसा मसीह अलैहिस्सलाम केवल अल्लाह के रसूल हैं, जिन्हें उसने सच्चाई के साथ भेजा। अल्लाह ने उन्हें अपने उस शब्द से पैदा किया, जिसे उसने जिबरील के साथ मरयम के पास भेजा। वह शब्द उसका 'कुन' (अर्थात् हो जा) कहना था, तो वह हो गए। यह दरअसल अल्लाह की ओर से एक फूँक थी, जो जिबरील ने अल्लाह की आज्ञा से (फूँक) मारी थी। अतः अल्लाह और उसके सभी रसूलों पर बिना किसी भेद (अंतर) के ईमान लाओ और यह मत कहो कि पूज्य तीन हैं। इस झूठी और भ्रष्ट बात से बाज़ आ जाओ! तुम्हारा इसे त्यागना तुम्हारे लिए दुनिया और आख़िरत में बेहतर होगा। अल्लाह केवल एक ही पूज्य है। वह साझी तथा संतान से सर्वोच्च है। क्योंकि वह हर चीज़ से बेनियाज़ है, जो कुछ आकाशों एवं धरती तथा उन दोनों के बीच में है, उन सबका मालिक वही है। तथा आकाशों और धरती की सारी चीज़ों के संरक्षक और उनके प्रबंधक के रूप में अल्लाह काफ़ी है।
आयत 172
لَّن يَسْتَنكِفَ ٱلْمَسِيحُ أَن يَكُونَ عَبْدًۭا لِّلَّهِ وَلَا ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ ٱلْمُقَرَّبُونَ ۚ وَمَن يَسْتَنكِفْ عَنْ عِبَادَتِهِۦ وَيَسْتَكْبِرْ فَسَيَحْشُرُهُمْ إِلَيْهِ جَمِيعًۭا
لَّن
हरगिज़ नहीं
يَسْتَنكِفَ
आर महसूस करेगा
ٱلْمَسِيحُ
मसीह
أَن
कि
يَكُونَ
हो वो
عَبْدًۭا
बन्दा
لِّلَّهِ
अल्लाह का
وَلَا
और ना
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्ते
ٱلْمُقَرَّبُونَ ۚ
मुक़र्रब
وَمَن
और जो कोई
يَسْتَنكِفْ
आर महसूस करे
عَنْ
from
عِبَادَتِهِۦ
उसकी इबादत से
وَيَسْتَكْبِرْ
और तकब्बुर करे
فَسَيَحْشُرُهُمْ
पस अनक़रीब वो इकट्ठा करेगा उन्हें
إِلَيْهِ
अपनी तरफ़
جَمِيعًۭا
सबके सबको
मसीह ने कदापि अपने लिए बुरा नहीं समझा कि वह अल्लाह का बन्दा हो और न निकटवर्ती फ़रिश्तों ने ही (इसे बुरा समझा) । और जो कोई अल्लाह की बन्दगी को अपने लिए बुरा समझेगा और घमंड करेगा, तो वह (अल्लाह) उन सभी लोगों को अपने पास इकट्ठा करके रहेगा
तफ़्सीर:
ईसा बिन मरयम अलैहिस्सलाम अल्लाह का बंदा होने से कदापि उपेक्षा और संकोच नहीं करेंगे, और न ही वे फ़रिश्ते जिन्हें अल्लाह ने अपना निकटवर्ती बनाया और उनके पद को ऊँचा किया है, अल्लाह के बंदे होने से उपेक्षा करते हैं। तो फिर तुम ईसा को एक पूज्य कैसे बनाते हो?! तथा शिर्क करने वाले लोग फ़रिश्तों को पूज्य कैसे बनाते हैं?! जो कोई भी अल्लाह की इबादत से उपेक्षा करे और अपने को उससे ऊँचा समझे, तो (ज्ञात रहना चाहिए कि) अल्लाह क़ियामत के दिन सबको अपने पास इकट्ठा करेगा और वह हर एक को वह प्रतिफल देगा, जिसके वह योग्य है।
आयत 173
فَأَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ فَيُوَفِّيهِمْ أُجُورَهُمْ وَيَزِيدُهُم مِّن فَضْلِهِۦ ۖ وَأَمَّا ٱلَّذِينَ ٱسْتَنكَفُوا۟ وَٱسْتَكْبَرُوا۟ فَيُعَذِّبُهُمْ عَذَابًا أَلِيمًۭا وَلَا يَجِدُونَ لَهُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ وَلِيًّۭا وَلَا نَصِيرًۭا
فَأَمَّا
तो रहे
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
فَيُوَفِّيهِمْ
पस वो पूरे-पूरे देगा उन्हें
أُجُورَهُمْ
अजर उनके
وَيَزِيدُهُم
और वो ज़्यादा देगा उन्हें
مِّن
from
فَضْلِهِۦ ۖ
अपने फ़ज़ल से
وَأَمَّا
और रहे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
ٱسْتَنكَفُوا۟
आर महसूस की
وَٱسْتَكْبَرُوا۟
और उन्होंने तकब्बुर किया
فَيُعَذِّبُهُمْ
तो वो अज़ाब देगा उन्हें
عَذَابًا
अज़ाब
أَلِيمًۭا
दर्दनाक
وَلَا
और नहीं
يَجِدُونَ
वो पाऐंगे
لَهُم
अपने लिए
مِّن
from
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَلِيًّۭا
कोई हिमायती
وَلَا
और ना
نَصِيرًۭا
कोई मददगार
अतः जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, जो अल्लाह उन्हें उनका पूरा-पूरा बदला देगा और अपने उदार अनुग्रह से उन्हें और अधिक प्रदान करेगा। और जिन लोगों ने बन्दगी को बुरा समझा और घमंड किया, तो उन्हें वह दुखद यातना देगा। और वे अल्लाह से बच सकने के लिए न अपना कोई निकट का समर्थक पाएँगे और न ही कोई सहायक
तफ़्सीर:
जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए और उसके रसूलों को सच्चा माना तथा विशुद्ध रूप से अल्लाह के लिए, उसके बताए हुए तरीक़े के अनुसार अच्छे कार्य किए, तो अल्लाह उन्हें उनके कर्मों का प्रतिफल बिना कम किए देगा, तथा अपने अनुग्रह और उपकार से उन्हें उससे अधिक भी देगा। परंतु जिन लोगों ने अल्लाह की इबादत और उसकी आज्ञाकारिता से उपेक्षा किया तथा अहंकार करते हुए अपने आपको उससे ऊँचा समझा, तो वह उन्हें दर्दनाक यातना देगा। तथा वे अल्लाह के सिवा किसी को नहीं पाएँगे, जो उनका संरक्षक बनकर उन्हें लाभ पहुँचाए और मददगार बनकर उन्हें नुक़सान से बचा सके।
आयत 174
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ قَدْ جَآءَكُم بُرْهَـٰنٌۭ مِّن رَّبِّكُمْ وَأَنزَلْنَآ إِلَيْكُمْ نُورًۭا مُّبِينًۭا
يَـٰٓأَيُّهَا
ऐ
ٱلنَّاسُ
लोगो
قَدْ
तहक़ीक़
جَآءَكُم
आ चुकी तुम्हारे पास
بُرْهَـٰنٌۭ
एक दलील
مِّن
from
رَّبِّكُمْ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
وَأَنزَلْنَآ
और नाज़िल किया हमने
إِلَيْكُمْ
तरफ़ तुम्हारे
نُورًۭا
एक नूर
مُّبِينًۭا
वाज़ेह
ऐ लोगों! तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से खुला प्रमाण आ चुका है और हमने तुम्हारी ओर एक स्पष्ट प्रकाश उतारा है
तफ़्सीर:
ऐ लोगो! तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से एक स्पष्ट तर्क आया है, जो बहाने को काट देता है और शक को दूर कर देता है - और वह मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं - तथा हमने तुम्हारी ओर एक स्पष्ट प्रकाश उतारा है, जो कि यह क़ुरआन है।
आयत 175
فَأَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ بِٱللَّهِ وَٱعْتَصَمُوا۟ بِهِۦ فَسَيُدْخِلُهُمْ فِى رَحْمَةٍۢ مِّنْهُ وَفَضْلٍۢ وَيَهْدِيهِمْ إِلَيْهِ صِرَٰطًۭا مُّسْتَقِيمًۭا
فَأَمَّا
तो रहे
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَٱعْتَصَمُوا۟
और उन्होंने मज़बूत पकड़ा
بِهِۦ
उसे
فَسَيُدْخِلُهُمْ
तो अनक़रीब वो दाख़िल करेगा उन्हें
فِى
in
رَحْمَةٍۢ
रहमत में
مِّنْهُ
अपनी तरफ़ से
وَفَضْلٍۢ
और फ़ज़ल में
وَيَهْدِيهِمْ
और रहनुमाई करेगा उनकी
إِلَيْهِ
अपनी तरफ़
صِرَٰطًۭا
रास्ते
مُّسْتَقِيمًۭا
सीधे की
तो रहे वे लोग जो अल्लाह पर ईमान लाए और उसे मज़बूती के साथ पकड़े रहे, उन्हें तो शीघ्र ही अपनी दयालुता और अपने उदार अनुग्रह के क्षेत्र में दाख़िल करेगा और उन्हें अपनी ओर का सीधा मार्ग दिया देगा
तफ़्सीर:
जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए और उस क़ुरआन को मज़बूती से पकड़ लिया, जो उनके नबी पर उतारा गया है, तो अल्लाह उनपर दया करते हुए उन्हें जन्नत में दाखिल करेगा। तथा उनके प्रतिफल को बढ़ा देगा और उनके दर्जों को ऊँचा करेगा, तथा उन्हें सीधे मार्ग पर चलने का सामर्थ्य प्रदान करेगा, जिसमें कोई टेढ़ नहीं, जो कि वह रास्ता है जो सदा निवास के बाग़ों की ओर ले जाने वाला है।
आयत 176
يَسْتَفْتُونَكَ قُلِ ٱللَّهُ يُفْتِيكُمْ فِى ٱلْكَلَـٰلَةِ ۚ إِنِ ٱمْرُؤٌا۟ هَلَكَ لَيْسَ لَهُۥ وَلَدٌۭ وَلَهُۥٓ أُخْتٌۭ فَلَهَا نِصْفُ مَا تَرَكَ ۚ وَهُوَ يَرِثُهَآ إِن لَّمْ يَكُن لَّهَا وَلَدٌۭ ۚ فَإِن كَانَتَا ٱثْنَتَيْنِ فَلَهُمَا ٱلثُّلُثَانِ مِمَّا تَرَكَ ۚ وَإِن كَانُوٓا۟ إِخْوَةًۭ رِّجَالًۭا وَنِسَآءًۭ فَلِلذَّكَرِ مِثْلُ حَظِّ ٱلْأُنثَيَيْنِ ۗ يُبَيِّنُ ٱللَّهُ لَكُمْ أَن تَضِلُّوا۟ ۗ وَٱللَّهُ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌۢ
يَسْتَفْتُونَكَ
वो फ़तवा पूछते हैं आपसे
قُلِ
कह दीजिए
ٱللَّهُ
अल्लाह
يُفْتِيكُمْ
वो फ़तवा देता है तुम्हें
فِى
concerning
ٱلْكَلَـٰلَةِ ۚ
कलाला के बारे में
إِنِ
अगर
ٱمْرُؤٌا۟
कोई मर्द
هَلَكَ
हलाक हो जाए
لَيْسَ
ना हो
لَهُۥ
उसकी
وَلَدٌۭ
कोई औलाद
وَلَهُۥٓ
और हो उसकी
أُخْتٌۭ
एक बहन
فَلَهَا
तो उसके लिए
نِصْفُ
आधा है
مَا
उसका जो
تَرَكَ ۚ
उसने छोड़ा
وَهُوَ
और वो ख़ुद
يَرِثُهَآ
वारिस होगा उसका
إِن
अगर
لَّمْ
ना
يَكُن
हो
لَّهَا
उस (बहन) की
وَلَدٌۭ ۚ
कोई औलाद
فَإِن
फिर अगर
كَانَتَا
हों वो दोनों
ٱثْنَتَيْنِ
दो बहनें
فَلَهُمَا
तो उन दोनों के लिए
ٱلثُّلُثَانِ
दो तिहाई है
مِمَّا
उसमें से जो
تَرَكَ ۚ
उस (भाई) ने छोड़ा
وَإِن
और अगर
كَانُوٓا۟
हों वो
إِخْوَةًۭ
कई बहन भाई
رِّجَالًۭا
मर्द
وَنِسَآءًۭ
और औरतें
فَلِلذَّكَرِ
तो मर्द के लिए
مِثْلُ
मानिन्द
حَظِّ
हिस्सा
ٱلْأُنثَيَيْنِ ۗ
दो औरतों के है
يُبَيِّنُ
वाज़ेह करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
أَن
ताकि
تَضِلُّوا۟ ۗ
तुम गुमराह (ना) हो जाओ
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ को
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
वे तुमसे आदेश मालूम करना चाहते है। कह दो, "अल्लाह तुम्हें ऐसे व्यक्ति के विषय में, जिसका कोई वारिस न हो, आदेश देता है - यदि किसी पुरुष की मृत्यु हो जाए जिसकी कोई सन्तान न हो, परन्तु उसकी एक बहन हो, तो जो कुछ उसने छोड़ा है उसका आधा हिस्सा उस बहन का होगा। और भाई बहन का वारिस होगा, यदि उस (बहन) की कोई सन्तान न हो। और यदि (वारिस) दो बहनें हो, तो जो कुछ उसने छोड़ा है, उसमें से उनके लिए दो-तिहाई होगा। और यदि कई भाई-बहन (वारिस) हो तो एक पुरुष को हिस्सा दो स्त्रियों के बराबर होगा।" अल्लाह तुम्हारे लिए आदेशों को स्पष्ट करता है, ताकि तुम न भटको। और अल्लाह को हर चीज का पूरा ज्ञान है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) लोग आपसे पूछते हैं कि आप उन्हें 'कलाला' की विरासत के विषय में शरई हुक्म से सूचित करें। 'कलाला' उस व्यक्ति को कहा जाता है, जिसकी मृत्यु हो जाए और उसने पिता या कोई संतान न छोड़ी हो। आप कह दीजिए : अल्लाह उसका हुक्म बयान करता है : यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए और उसका न पिता जीवित हो न कोई संतान हो, जबकि उसकी कोई सगी अथवा बाप शरीक बहन हो, तो बहन को फ़र्ज़ (क़ुरआन में निर्दिष्ट हिस्से) के रूप में छोड़े हुए धन का आधा हिस्सा मिलेगा। तथा उसका सगा या अल्लाती (बाप शरीक) भाई 'असबा' (जिस का हिस्सा निर्दिष्ट न हो) के तौर पर उसके छोड़े हुए धन का वारिस होगा, यदि उसके साथ कोई फ़र्ज़ (निर्दिष्ट हिस्से) वाला न हो। किंतु यदि उसके साथ कोई फ़र्ज़ (निर्दिष्ट हिस्से) वाला मौजूद हो, तो वह उसका हिस्सा निकालने के बाद शेष धन का वारिस होगा। यदि सगी या बाप शरीक बहनें एक से अधिक हों, तो फ़र्ज़ (निर्दिष्ट हिस्से) के रूप में उन्हें दो-तिहाई मिलेगा। तथा यदि सगे या बाप शरीक भाई और बहन दोनों हों, तो वे 'असबा' के रूप में "पुरुष के लिए दो महिलाओं के बराबर हिस्सा है।" के नियम के अनुसार वारिस होंगे इस प्रकार कि उनमें से पुरुष का हिस्सा महिला के हिस्से का दोगुना होगा। अल्लाह तुम्हारे लिए 'कलाला' का नियम तथा विरासत के अन्य प्रावधान स्पष्ट रूप से बयान करता है, ताकि तुम उसके मामले में पथभ्रष्ट न हो जाओ, और अल्लाह हर चीज़ को जानने वाला है, उससे कुछ भी छिपा नहीं है।
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