नाम का मतलब
माफ करने वाला (अल्लाह की सिफत, गुनाह माफ करने वाला)
पृष्ठभूमि
सूरह ग़ाफिर (जिसे अल-मुमिन भी कहा जाता है) में फिरऔन के दरबार के एक मुखलिस ईमान वाले शख्स का ज़िक्र है, जिसने मूसा अलैहिस्सलाम की हिमायत में बात की। इसमें अल्लाह की माफी और उसके गज़ब दोनों का ज़िक्र है।
फ़ज़ीलत / सार
फिरऔन के दरबार के उस गुमनाम मोमिन का किरदार सच्चाई के लिए खड़े होने की हिम्मत की बेहतरीन मिसाल मानी जाती है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ حمٓ
حمٓ
ح م
हा॰ मीम॰
तफ़्सीर:
(ह़ा, मीम) सूरतुल-बक़रा की शुरुआत में इस प्रकार के अक्षरों के बारे में बात गुज़र चुकी है।
आयत 2
تَنزِيلُ ٱلْكِتَـٰبِ مِنَ ٱللَّهِ ٱلْعَزِيزِ ٱلْعَلِيمِ
تَنزِيلُ
नाज़िल करना है
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब का
مِنَ
(is) from
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
ٱلْعَزِيزِ
जो बहुत ज़बरदस्त है
ٱلْعَلِيمِ
ख़ूब इल्म वाला है
इस किताब का अवतरण प्रभुत्वशाली, सर्वज्ञ अल्लाह की ओर से है,
तफ़्सीर:
क़ुरआन का अवतरण उस अल्लाह की ओर से है, जो सब पर प्रभुत्वशाली है, उसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता, वह अपने बंदों के हितों काे भली- भाँति जानने वाला है, यह उसके रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतरा है।
आयत 3
غَافِرِ ٱلذَّنۢبِ وَقَابِلِ ٱلتَّوْبِ شَدِيدِ ٱلْعِقَابِ ذِى ٱلطَّوْلِ ۖ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ إِلَيْهِ ٱلْمَصِيرُ
غَافِرِ
बख़्शने वाला है
ٱلذَّنۢبِ
गुनाह का
وَقَابِلِ
और क़ुबूल करने वाल है
ٱلتَّوْبِ
तौबा का
شَدِيدِ
सख़्त
ٱلْعِقَابِ
सज़ा देने वाला
ذِى
Owner (of) the abundance
ٱلطَّوْلِ ۖ
बड़े फ़ज़ल वाला है
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ ۖ
वो ही
إِلَيْهِ
तरफ़ उसी के
ٱلْمَصِيرُ
लौटना है
जो गुनाह क्षमा करनेवाला, तौबा क़बूल करनेवाला, कठोर दंड देनेवाला, शक्तिमान है। उसके अतिरिक्त कोई पूज्य-प्रभु नहीं। अन्ततः उसी की ओर जाना है
तफ़्सीर:
जो पापियो के पापों को क्षमा करने वाला है, अपने तौबा करने वाले बंदों की तौबा कबूल करने वाला है, तौबा न करने वालों को कड़ी सज़ा देने वाला है, उपकार और अनुग्रह करने वाला है। उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। केवल उसी की ओर क़ियामत के दिन सारी मख़लूकों को लौटकर जाना है, जिन्हें वह उनके कर्म अनुसार बदला देगा।
आयत 4
مَا يُجَـٰدِلُ فِىٓ ءَايَـٰتِ ٱللَّهِ إِلَّا ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ فَلَا يَغْرُرْكَ تَقَلُّبُهُمْ فِى ٱلْبِلَـٰدِ
مَا
नहीं
يُجَـٰدِلُ
झगड़ा करते
فِىٓ
concerning
ءَايَـٰتِ
आयात में
ٱللَّهِ
अल्लाह की
إِلَّا
मगर
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
فَلَا
तो ना
يَغْرُرْكَ
धोखे में डाले आपको
تَقَلُّبُهُمْ
चलना फिरना उनका
فِى
in
ٱلْبِلَـٰدِ
शहरों में
अल्लाह की आयतों के बारे में बस वही लोग झगड़ते हैं जिन्होंने इनकार किया, तो नगरों में उसकी चलत-फिरत तुम्हें धोखे में न डाले
तफ़्सीर:
अल्लाह की आयतों के बारे में, जो उसके एकत्व और उसके रसूलों की सच्चाई प्रस्तुत करती हैं, केवल वही लोग झगड़ते हैं, जो अपनी विवेकहीनता के कारण अल्लाह का इनकार कर बैठे हैं। अतः, आप उनपर ग़म न करें। क्योंकि उन्हें मोहलत ढील देने और धोखे में पड़ने के लिए दी गई है।
आयत 5
كَذَّبَتْ قَبْلَهُمْ قَوْمُ نُوحٍۢ وَٱلْأَحْزَابُ مِنۢ بَعْدِهِمْ ۖ وَهَمَّتْ كُلُّ أُمَّةٍۭ بِرَسُولِهِمْ لِيَأْخُذُوهُ ۖ وَجَـٰدَلُوا۟ بِٱلْبَـٰطِلِ لِيُدْحِضُوا۟ بِهِ ٱلْحَقَّ فَأَخَذْتُهُمْ ۖ فَكَيْفَ كَانَ عِقَابِ
كَذَّبَتْ
झुठलाया
قَبْلَهُمْ
उनसे पहले
قَوْمُ
क़ौमे
نُوحٍۢ
नूह ने
وَٱلْأَحْزَابُ
और गिरोहों ने
مِنۢ
after them
بَعْدِهِمْ ۖ
बाद उनके
وَهَمَّتْ
और इरादा किया
كُلُّ
हर
أُمَّةٍۭ
उम्मत ने
بِرَسُولِهِمْ
अपने रसूल का
لِيَأْخُذُوهُ ۖ
ताकि वो पकड़ें उसे
وَجَـٰدَلُوا۟
और उन्होंने झगड़ा किया
بِٱلْبَـٰطِلِ
साथ बातिल के
لِيُدْحِضُوا۟
ताकि वो ख़त्म (ज़ाइल)कर दें
بِهِ
साथ उसके
ٱلْحَقَّ
हक़ को
فَأَخَذْتُهُمْ ۖ
तो पकड़ लिया मैं ने उन्हें
فَكَيْفَ
तो कैसी
كَانَ
थी
عِقَابِ
सज़ा मेरी
उनसे पहले नूह की क़ौम ने और उनके पश्चात दूसरों गिरोहों ने भी झुठलाया और हर समुदाय के लोगों ने अपने रसूलों के बारे में इरादा किया कि उन्हें पकड़ लें और वे सत्य का सहारा लेकर झगडे, ताकि उसके द्वारा सत्य को उखाड़ दें। अन्ततः मैंने उन्हें पकड़ लिया। तौ कैसी रही मेरी सज़ा!
तफ़्सीर:
इनसे पहले नूह (अलैहिस्सलाम) की जाति ने झुठलाया। तथा उनके बाद भी बहुत-से समुदायों ने झुठलाया। चुनांचे आद समुदाय, समूद समुदाय, लूत अलैहिस्सलाम की जाति और मदयन वालों तथा फ़िरऔन ने झुठलाया। और हर समुदाय के लोगों ने अपने रसूल को पकड़कर मार डालने का इरादा किया। तथा उन्होंने अपने असत्य के ज़रिए सत्य का सफाया करने के लिए बहस की। जिसके नतीजे में हमने इन सारे समुदायों की गिरफ़्त कर ली। अब ज़रा ग़ौर करो कि उनके हक में मेरी यातना कैसी रही। क्योंकि उन्हें जो सज़ा दी गई थी, वह बड़ी सख़्त थी।
आयत 6
وَكَذَٰلِكَ حَقَّتْ كَلِمَتُ رَبِّكَ عَلَى ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ أَنَّهُمْ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
حَقَّتْ
साबित हो गई
كَلِمَتُ
बात
رَبِّكَ
आपके रब की
عَلَى
against
ٱلَّذِينَ
ऊपर उनके जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
أَنَّهُمْ
कि यक़ीनन वो
أَصْحَـٰبُ
साथी हैं
ٱلنَّارِ
आग के
और (जैसे दुनिया में सज़ा मिली) उसी प्रकार तेरे रब की यह बात भी उन लोगों पर सत्यापित हो गई है, जिन्होंने इनकार किया कि वे आग में पड़नेवाले है;
तफ़्सीर:
और जिस तरह अल्लाह ने उन झुठलाने वाली जातियों के विनाश का निर्णय लिया, उसी तरह (ऐ रसूल) आपके पालनहार की बात काफ़िरों पर अनिवार्य हो गई कि वे जहन्नम वाले लोग हैं।
आयत 7
ٱلَّذِينَ يَحْمِلُونَ ٱلْعَرْشَ وَمَنْ حَوْلَهُۥ يُسَبِّحُونَ بِحَمْدِ رَبِّهِمْ وَيُؤْمِنُونَ بِهِۦ وَيَسْتَغْفِرُونَ لِلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ رَبَّنَا وَسِعْتَ كُلَّ شَىْءٍۢ رَّحْمَةًۭ وَعِلْمًۭا فَٱغْفِرْ لِلَّذِينَ تَابُوا۟ وَٱتَّبَعُوا۟ سَبِيلَكَ وَقِهِمْ عَذَابَ ٱلْجَحِيمِ
ٱلَّذِينَ
वो (फ़रिश्ते )जो
يَحْمِلُونَ
उठाए हुए हैं
ٱلْعَرْشَ
अर्श को
وَمَنْ
और जो
حَوْلَهُۥ
उसके इर्द-गिर्द हैं
يُسَبِّحُونَ
वो तस्बीह कर रहे हैं
بِحَمْدِ
साथ तारीफ़ के
رَبِّهِمْ
अपने रब की
وَيُؤْمِنُونَ
और वो ईमान रखते हैं
بِهِۦ
उस पर
وَيَسْتَغْفِرُونَ
और वो बख़्शिश माँगते हैं
لِلَّذِينَ
उनके लिए जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
وَسِعْتَ
घेर रखा है तू ने
كُلَّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ को
رَّحْمَةًۭ
रहमत
وَعِلْمًۭا
और इल्म से
فَٱغْفِرْ
पस बख़्श दे
لِلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
تَابُوا۟
तौबा की
وَٱتَّبَعُوا۟
और उन्होंने पैरवी की
سَبِيلَكَ
तेरे रास्ते की
وَقِهِمْ
और बचा उन्हें
عَذَابَ
अज़ाब से
ٱلْجَحِيمِ
जहन्नम के
जो सिंहासन को उठाए हुए है और जो उसके चतुर्दिक हैं, अपने रब का गुणगान करते है और उस पर ईमान रखते है और उन लोगों के लिए क्षमा की प्रार्थना करते है जो ईमान लाए कि "ऐ हमारे रब! तू हर चीज़ को व्याप्त है। अतः जिन लोगों ने तौबा की और तेरे मार्ग का अनुसरण किया, उन्हें क्षमा कर दे और भड़कती हुई आग की यातना से बचा लें
तफ़्सीर:
वह फ़रिश्ते जो (ऐ रसूल) आपके पालनहार के अर्श को उठाए हुए हैं, और जो अर्श के चारों ओर हैं, सब अल्लाह की उन चीज़ों से पाकी बयान करते हैं, जो उसके लायक नहीं हैं, और उसपर विश्वास रखते हैं और अल्लाह पर ईमान रखने वालों के हक में माफ़ी की दुआ करते रहते हैं। कहते हैंः ऐ हमारे पालनहार! तेरे ज्ञान तथा तेरी दया ने प्रत्येक चीज़ को घेर रखा है। अतः, उन लोगों को माफ़ कर दे, जो अपने गुनाहों से तौबा कर चुके हैं और तेरे धर्म का पालन कर रहे हैं, तथा उन्हें जहन्नम की आग से सुरक्षित रख।
आयत 8
رَبَّنَا وَأَدْخِلْهُمْ جَنَّـٰتِ عَدْنٍ ٱلَّتِى وَعَدتَّهُمْ وَمَن صَلَحَ مِنْ ءَابَآئِهِمْ وَأَزْوَٰجِهِمْ وَذُرِّيَّـٰتِهِمْ ۚ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
وَأَدْخِلْهُمْ
और दाख़िल कर उन्हें
جَنَّـٰتِ
बाग़ात में
عَدْنٍ
हमेशगी के
ٱلَّتِى
वो जो
وَعَدتَّهُمْ
वादा किया था तू ने उनसे
وَمَن
और जो कोई
صَلَحَ
नेक हुए
مِنْ
among
ءَابَآئِهِمْ
उनके आबा ओ अजदाद में से
وَأَزْوَٰجِهِمْ
और उनकी बीवियों
وَذُرِّيَّـٰتِهِمْ ۚ
और उनकी औलादों में से
إِنَّكَ
बेशक तू
أَنتَ
तू ही है
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिकमत वाला
ऐ हमारे रब! और उन्हें सदैव रहने के बागों में दाख़िल कर जिनका तूने उनसे वादा किया है और उनके बाप-दादा और उनकी पत्नि यों और उनकी सन्ततियों में से जो योग्य हुए उन्हें भी। निस्संदेह तू प्रभुत्वशाली, अत्यन्त तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
और फ़रिश्ते कहते हैंः ऐ हमारे पालनहार! और ईमान वालों को उन स्थायी स्वर्गों में दाखिल कर, जिनमें दाखिल करने का तूने उन्हें वचन दिया है। तथा उनके बाप दादाओं, उनकी पत्नियों और उनकी संतानों में से जो सत्कर्म किए हैं, उन्हें भी उनके अंदर दाखिल होने का सौभाग्य प्रदान कर। निश्चय ही तू प्रभुत्वशाली है, तुझपर कोई गालिब नहीं आ सकता। तू अपने प्रबंध तथा निर्णय में हिकमत वाला है।
आयत 9
وَقِهِمُ ٱلسَّيِّـَٔاتِ ۚ وَمَن تَقِ ٱلسَّيِّـَٔاتِ يَوْمَئِذٍۢ فَقَدْ رَحِمْتَهُۥ ۚ وَذَٰلِكَ هُوَ ٱلْفَوْزُ ٱلْعَظِيمُ
وَقِهِمُ
और बचा उन्हें
ٱلسَّيِّـَٔاتِ ۚ
बुराइयों से
وَمَن
और जिसे
تَقِ
तू बचा लेगा
ٱلسَّيِّـَٔاتِ
बुराइयों से
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
فَقَدْ
पस तहक़ीक़
رَحِمْتَهُۥ ۚ
रहम किया तू ने उस पर
وَذَٰلِكَ
और यही है
هُوَ
वो
ٱلْفَوْزُ
कामयाबी
ٱلْعَظِيمُ
बहुत बड़ी
और उन्हें अनिष्टों से बचा। जिसे उस दिन तूने अनिष्टों से बचा लिया, तो निश्चय ही उसपर तूने दया की। और वही बड़ी सफलता है।"
तफ़्सीर:
तथा उन्हें उनके कर्मों की बुराइयों (दुष्परिणाम) से सुरक्षित रख, इसलिए उन्हें उनके कारण यातना में न डाल। और जिसे तूने क़ियामत के दिन उसके बुरे कामों की सज़ा से बचा लिया, तो निश्चय तूने उसपर दया की। और यह यातना से बचाव और जन्नत में दाखिल करने की कृपा ही बड़ी सफलता है, जिसका मुकाबला कोई सफलता नहीं कर सकती।
आयत 10
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ يُنَادَوْنَ لَمَقْتُ ٱللَّهِ أَكْبَرُ مِن مَّقْتِكُمْ أَنفُسَكُمْ إِذْ تُدْعَوْنَ إِلَى ٱلْإِيمَـٰنِ فَتَكْفُرُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
يُنَادَوْنَ
वो पुकारे जाऐंगे
لَمَقْتُ
यक़ीनन नाराज़गी
ٱللَّهِ
अल्लाह की
أَكْبَرُ
ज़्यादा बड़ी है
مِن
than
مَّقْتِكُمْ
तुम्हारी नाराज़गी से
أَنفُسَكُمْ
अपने आप पर
إِذْ
जब
تُدْعَوْنَ
तुम बुलाए जाते थे
إِلَى
to
ٱلْإِيمَـٰنِ
तरफ़ ईमान के
فَتَكْفُرُونَ
तो तुम इन्कार करते थे
निश्चय ही जिन लोगों ने इनकार किया उन्हें पुकारकर कहा जाएगा कि "अपने आपसे जो तुम्हें विद्वेष एवं क्रोध है, तुम्हारे प्रति अल्लाह का क्रोध एवं द्वेष उससे कहीं बढकर है कि जब तुम्हें ईमान की ओर बुलाया जाता था तो तुम इनकार करते थे।"
तफ़्सीर:
निश्चय जिन लोगों ने अल्लाह एवं उसके रसूलों का इनकार किया, उन्हें क़ियामत के दिन, जब वे जहन्नम में प्रवेश कर रहे होंगे तथा स्वयं पर बिगड़ रहे होंगे और खुद को कोस रहे हैं, पुकारकर कहा जाएगाः निश्चित रूप से आज जितना क्रोधित तुम अपने आप पर हो, उससे कहीं अधिक क्रोधित अल्लाह उस समय तुम्हारे ऊपर था, जब तुम्हें दुनिया में अल्लाह पर ईमान लाने को कहा जाता था और तुम उसका इनकार कर देते थे और उसके साथ बहुत-से पूज्य बना लेते थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह की माफी और सख्त सज़ा दोनों सिफात का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह बहुत माफ करने वाला भी है और सख्त सज़ा देने वाला भी, इसलिए उम्मीद और डर दोनों संतुलन में रखने चाहिए।
आयत 11
قَالُوا۟ رَبَّنَآ أَمَتَّنَا ٱثْنَتَيْنِ وَأَحْيَيْتَنَا ٱثْنَتَيْنِ فَٱعْتَرَفْنَا بِذُنُوبِنَا فَهَلْ إِلَىٰ خُرُوجٍۢ مِّن سَبِيلٍۢ
قَالُوا۟
वो कहेंगे
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
أَمَتَّنَا
मौत दी तू ने हमें
ٱثْنَتَيْنِ
दो बार
وَأَحْيَيْتَنَا
और ज़िन्दगी बख़्शी तू ने हमें
ٱثْنَتَيْنِ
दो बार
فَٱعْتَرَفْنَا
तो एतराफ़ कर लिया हमने
بِذُنُوبِنَا
अपने गुनाहों का
فَهَلْ
तो क्या है
إِلَىٰ
to
خُرُوجٍۢ
तरफ़ निकलने के
مِّن
any
سَبِيلٍۢ
कोई रास्ता
वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! तूने हमें दो बार मृत रखा और दो बार जीवन प्रदान किया। अब हमने अपने गुनाहों को स्वीकार किया, तो क्या अब (यहाँ से) निकलने का भी कोई मार्ग है?"
तफ़्सीर:
तो काफ़िर, उस समय अपने गुनाहों का इकरार करते हुए कहेंगे, जब उन्हें इक़रार और तौबा से कोई लाभ न होगाः ऐ हमारे पालनहार! तूने हमें दो बार मारा; एक बार जब हम कुछ न थे, तो तूने हमें अस्तित्व प्रदान किया, और फ़िर इसके पश्चात मौत दी। और दो बार जीवन प्रदान किय; एक बार अनस्तित्व से अस्तित्व प्रदान करके तथा दूसरी बार हिसाब-किताब के लिए जीवित करके। अब हम अपने पापों काे स्वीकार कर चुके हैं, जो हमने किए थे। तो क्या जहन्नम से निकलने का कोई रास्ता है, ताकि सांसारिक जीवन की ओर लौटकर अपने कर्मों को सुधार लें और तू हमसे राज़ी हो जाए?!
आयत 12
ذَٰلِكُم بِأَنَّهُۥٓ إِذَا دُعِىَ ٱللَّهُ وَحْدَهُۥ كَفَرْتُمْ ۖ وَإِن يُشْرَكْ بِهِۦ تُؤْمِنُوا۟ ۚ فَٱلْحُكْمُ لِلَّهِ ٱلْعَلِىِّ ٱلْكَبِيرِ
ذَٰلِكُم
ये तुम्हारा(अंजाम)
بِأَنَّهُۥٓ
इस लिए कि
إِذَا
जब
دُعِىَ
पुकारा जाता
ٱللَّهُ
अल्लाह
وَحْدَهُۥ
अकेले उसी को
كَفَرْتُمْ ۖ
इन्कार करते थे तुम
وَإِن
और अगर
يُشْرَكْ
शरीक ठहराया जाता
بِهِۦ
साथ उसके
تُؤْمِنُوا۟ ۚ
तो तुम मान जाते
فَٱلْحُكْمُ
पस फ़ैसला
لِلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
ٱلْعَلِىِّ
जो बहुत बुलन्द है
ٱلْكَبِيرِ
बहुत बड़ा है
वह (बुरा परिणाम) तो इसलिए सामने आएगा कि जब अकेला अल्लाह को पुकारा जाता है तो तुम इनकार करते हो। किन्तु यदि उसके साथ साझी ठहराया जाए तो तुम मान लेते हो। तो अब फ़ैसला तो अल्लाह ही के हाथ में है, जो सर्वोच्च बड़ा महान है। -
तफ़्सीर:
यह यातना जिसके साथ तुम प्रताड़ित किए गए हो, वह इसलिए है कि जब अकेले अल्लाह को पुकारा जाता था और उसके साथ किसी को साझी नहीं ठहराया जाता था, तो तुम उसका इनकार कर देते थे और उसके लिए साझी ठहराते थे। और जब अल्लाह के साथ किसी साझी की पूजा की जाती थी, तो तुम मान लेते थे। अतः आज निर्णय अकेले अल्लाह के हाथ में है, जो अपने अस्तित्व, नियति और प्रभुत्व में सबसे ऊंचा, बड़ा महान है जिससे हर चीज़ छोटी है।
आयत 13
هُوَ ٱلَّذِى يُرِيكُمْ ءَايَـٰتِهِۦ وَيُنَزِّلُ لَكُم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ رِزْقًۭا ۚ وَمَا يَتَذَكَّرُ إِلَّا مَن يُنِيبُ
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِى
जो
يُرِيكُمْ
दिखाता है तुम्हें
ءَايَـٰتِهِۦ
निशानियाँ अपनी
وَيُنَزِّلُ
और उतारता है
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
رِزْقًۭا ۚ
रिज़्क़
وَمَا
और नहीं
يَتَذَكَّرُ
नसीहत पकड़ता
إِلَّا
मगर
مَن
वो जो
يُنِيبُ
वो रुजूअ करता है
वही है जो तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है और तुम्हारे लिए आकाश से रोज़ी उतारता है, किन्तु याददिहानी तो बस वही हासिल करता है जो (उसकी ओर) रुजू करे
तफ़्सीर:
अल्लाह वही हस्ती है, जो तुम्हें आकाशों तथा स्वंय तुम्हारे वजूद के अंदर अपनी निशानियाँ दिखाती है, ताकि तुम उसकी शक्ति एवं उसके एकत्व से परिचित हो सको। और वही आकाश से वर्षा उतारता है, ताकि उससे पौधे और खेतियाँ उग सकें, जिनसे तुम्हें रोज़ी प्राप्त होती है। और अल्लाह की निशानियों से वही लोग शिक्षा ग्रहण करते हैं, जो उसके आगे तौबा करके और साफ़ मन से हाज़िर होते हैं।
आयत 14
فَٱدْعُوا۟ ٱللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ وَلَوْ كَرِهَ ٱلْكَـٰفِرُونَ
فَٱدْعُوا۟
पस पुकारो
ٱللَّهَ
अल्लाह को
مُخْلِصِينَ
ख़ालिस करने वाले हो कर
لَهُ
उसी के लिए
ٱلدِّينَ
दीन को
وَلَوْ
और अगरचे
كَرِهَ
नापसंद करें
ٱلْكَـٰفِرُونَ
काफ़िर
अतः तुम अल्लाह ही को, धर्म को उसी के लिए विशुद्ध करते हुए, पुकारो, यद्यपि इनकार करनेवालों को अप्रिय ही लगे। -
तफ़्सीर:
तो (ऐ मोमिनो) तुम अल्लाह को पुकारे, खालिस उसी की इबादत करते हुए, उसी से दुआ करते हुए तथा किसी को उसका साझी बनाने से बचते हुए, यद्यपि काफ़िरों को तुम्हारा यह रवैया बुरा लगे और वे इससे क्रोधित हों।
आयत 15
رَفِيعُ ٱلدَّرَجَـٰتِ ذُو ٱلْعَرْشِ يُلْقِى ٱلرُّوحَ مِنْ أَمْرِهِۦ عَلَىٰ مَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦ لِيُنذِرَ يَوْمَ ٱلتَّلَاقِ
رَفِيعُ
बुलन्द
ٱلدَّرَجَـٰتِ
दर्जों वाला है
ذُو
Owner (of) the Throne
ٱلْعَرْشِ
अर्श वाला है
يُلْقِى
वो डालता है
ٱلرُّوحَ
वही को
مِنْ
of
أَمْرِهِۦ
अपने हुक्म से
عَلَىٰ
upon
مَن
जिस पर
يَشَآءُ
वो चाहता है
مِنْ
of
عِبَادِهِۦ
अपने बन्दों में से
لِيُنذِرَ
ताकि वो डराए
يَوْمَ
दिन से
ٱلتَّلَاقِ
मुलाक़ात के
वह ऊँचे दर्जोवाला, सिंहासनवाला है, अपने बन्दों में से जिसपर चाहता है, अपने हुक्म में से जिसपर चाहता है, अपने हुक्म से रूह उतारता है, ताकि वह मुलाक़ात के दिन से सावधान कर दे
तफ़्सीर:
वह इस बात के लायक है कि केवल उसी से दुआ की जाए और उसी की बंदगी की जाए। क्योंकि वह उच्च श्रेणियों वाला और तमाम मखलूक़ से अलग है। वही महान अर्श का मालिक है। वह अपने जिन बंदों पर चाहता है, वह्य उतार देता है, ताकि वे खुद भी जीवित हों और अन्य लोगों को भी जीवित करें और लोगों को क़ियामत के दिन से डराएँ, जब पहले एवं बाद के सब लोग आपस में मिलेंगे।
आयत 16
يَوْمَ هُم بَـٰرِزُونَ ۖ لَا يَخْفَىٰ عَلَى ٱللَّهِ مِنْهُمْ شَىْءٌۭ ۚ لِّمَنِ ٱلْمُلْكُ ٱلْيَوْمَ ۖ لِلَّهِ ٱلْوَٰحِدِ ٱلْقَهَّارِ
يَوْمَ
जिस दिन
هُم
वो
بَـٰرِزُونَ ۖ
ज़ाहिर होंगे
لَا
ना
يَخْفَىٰ
छुपी होगी
عَلَى
from
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
مِنْهُمْ
उन की
شَىْءٌۭ ۚ
कोई चीज़
لِّمَنِ
किस के लिए है
ٱلْمُلْكُ
बादशाहत
ٱلْيَوْمَ ۖ
आज के दिन
لِلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
ٱلْوَٰحِدِ
जो एक है
ٱلْقَهَّارِ
सब पर ग़ालिब है
जिस दिन वे खुले रूप में सामने उपस्थित होंगे, उनकी कोई चीज़ अल्लाह से छिपी न रहेगी, "आज किसकी बादशाही है?" "अल्लाह की, जो अकेला सबपर क़ाबू रखनेवाला है।"
तफ़्सीर:
जिस दिन सारे लोग निकलकर एक ही स्थान में एकत्र होंगे। उनकी कोई बात अल्लाह से छिपी नहीं होगी। न उनके व्यक्तित्व से संबंधित, न उनके कर्मों से संबंधित और न उनके प्रतिफ़ल से संबंधित। वह पूछेगाः "कहो आज किसका राज्य है? अब तो बस एक ही उत्तर है; राज्य उस अल्लाह का है, जो अपने व्यक्तिव्त में, विशेषताओं में तथा कर्मों में एक है। जो ऐसा सर्वशक्तिमान है कि उसने प्रत्येक चीज़ को अपने क़ाबू में रखा है और हर चीज़ उसके आगे झुकने पर मजबूर है।
आयत 17
ٱلْيَوْمَ تُجْزَىٰ كُلُّ نَفْسٍۭ بِمَا كَسَبَتْ ۚ لَا ظُلْمَ ٱلْيَوْمَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَرِيعُ ٱلْحِسَابِ
ٱلْيَوْمَ
आज के दिन
تُجْزَىٰ
बदला दिया जाएगा
كُلُّ
हर
نَفْسٍۭ
नफ़्स को
بِمَا
उसका जो
كَسَبَتْ ۚ
उसने कमाई की
لَا
No
ظُلْمَ
नहीं कोई ज़ुल्म होगा
ٱلْيَوْمَ ۚ
आज के दिन
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
سَرِيعُ
जल्द लेने वाला है
ٱلْحِسَابِ
हिसाब
आज प्रत्येक व्यक्ति को उसकी कमाई का बदला दिया जाएगा। आज कोई ज़ुल्म न होगा। निश्चय ही अल्लाह हिसाब लेने में बहुत तेज है
तफ़्सीर:
आज प्रत्येक प्राणी को उसके कर्मों का प्रतिकार दिया जाएगा। यदि कर्म अच्छे होंगे, तो बदला अच्छा और कर्म बुरे होंगे, तो बदला बुरा। आज किसी पर अत्याचार नही होगा। क्योंकि निर्णय करने वाला अल्लाह है, जो न्याय करने वाला है। अवश्य अल्लाह अपने बंदों का शघ्र ही हिसाब लेने वाला है, क्योंकि वह उन्हें भली-भाँति जानता है।
आयत 18
وَأَنذِرْهُمْ يَوْمَ ٱلْـَٔازِفَةِ إِذِ ٱلْقُلُوبُ لَدَى ٱلْحَنَاجِرِ كَـٰظِمِينَ ۚ مَا لِلظَّـٰلِمِينَ مِنْ حَمِيمٍۢ وَلَا شَفِيعٍۢ يُطَاعُ
وَأَنذِرْهُمْ
और आप डराऐं उन्हें
يَوْمَ
उस दिन से
ٱلْـَٔازِفَةِ
जो क़रीब आ लगा है
إِذِ
जब
ٱلْقُلُوبُ
दिल
لَدَى
क़रीब(होंगे)
ٱلْحَنَاجِرِ
हलक़ के
كَـٰظِمِينَ ۚ
ग़म से भरे हुए
مَا
नहीं
لِلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों के लिए
مِنْ
any
حَمِيمٍۢ
कोई गहरा दोस्त
وَلَا
और ना
شَفِيعٍۢ
कोई सिफ़ारिशी
يُطَاعُ
जिस की बात मानी जाए
(उन्हें अल्लाह की ओर बुलाओ) और उन्हें निकट आ जानेवाले (क़ियामत के) दिन से सावधान कर दो, जबकि उर (हृदय) कंठ को आ लगे होंगे और वे दबा रहे होंगे। ज़ालिमों का न कोई घनिष्ट मित्र होगा और न ऐसा सिफ़ारिशी जिसकी बात मानी जाए
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उन्हें क़ियामत के दिन से डराएँ। वह क़ियामत, जो निकट है। क्योंकि वह आने वाली है और हर आने वाली चीज़ निकट होती है। उस दिन स्थिति इतनी भयावह होगी कि लोगों के दिल उनके मुँह को आ रहे होंगे। सब लोग ख़ामोश खड़े होंगे। केवल वही बात करेगा, जिसे 'अति दयावान्' ने बात करने की अनुमति दी होगी। तथा शिर्क एवं गुनाहों के द्वारा ख़ुद पर अत्याचार करने वालों के लिए न कोई मित्र होगा, न निकटवर्ती, और न ही कोई ऐसा सिफ़ारिशी होगा, जिसकी बात मानी जाए, यदि मान लिया जाए कि वह सिफ़ारिश करे।
आयत 19
يَعْلَمُ خَآئِنَةَ ٱلْأَعْيُنِ وَمَا تُخْفِى ٱلصُّدُورُ
يَعْلَمُ
वो जानता है
خَآئِنَةَ
ख़यानत
ٱلْأَعْيُنِ
आँखों की
وَمَا
और जो कुछ
تُخْفِى
छुपाते हैं
ٱلصُّدُورُ
सीने
वह निगाहों की चोरी तक को जानता है और उसे भी जो सीने छिपा रहे होते है
तफ़्सीर:
अल्लाह आँखों के किसी चीज़ को चुपके से देख लेने को जानता है तथा उसे भी जानता है, जो दिलों में छिपा होता है। इस तरह की कोई चीज़ उससे छिप नहीं सकती।
आयत 20
وَٱللَّهُ يَقْضِى بِٱلْحَقِّ ۖ وَٱلَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِهِۦ لَا يَقْضُونَ بِشَىْءٍ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْبَصِيرُ
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَقْضِى
वो फ़ैसला करता है
بِٱلْحَقِّ ۖ
साथ हक़ के
وَٱلَّذِينَ
और जिन्हें
يَدْعُونَ
वो पुकारते हैं
مِن
besides Him
دُونِهِۦ
उसके सिवा
لَا
not
يَقْضُونَ
नहीं वो फ़ैसला करते
بِشَىْءٍ ۗ
किसी चीज़ का
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
هُوَ
वो ही है
ٱلسَّمِيعُ
ख़ूब सुनने वाला
ٱلْبَصِيرُ
ख़ूब देखने वाला
अल्लाह ठीक-ठीक फ़ैसला कर देगा। रहे वे लोग जिन्हें वे अल्लाह को छोड़कर पुकारते हैं, वे किसी चीज़ का भी फ़ैसला करनेवाले नहीं। निस्संदेह अल्लाह ही है जो सुनता, देखता है
तफ़्सीर:
और अल्लाह न्याय के साथ निर्णय करेगा। अतः किसी पर, उसके अच्छे कर्मों को घटाकर और बुरे कर्मों को बढ़ाकर अत्याचार नहीं करेगा। और मुश्रिक लोग जिन्हें अल्लाह को छोड़कर पूजते हैं, वे कोई फ़ैसला नहीं कर सकते, क्योंकि वे किसी चीज़ के मालिक नहीं हैं। निश्चय अल्लाह अपने बंदों की बातों को सुनने वाला तथा उनकी नीयतों एवं कर्मों को देखने वाला है। और वह उन्हें उनका प्रतिफल भी देगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन के मंज़र और दिलों के उछल आने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि कयामत के खौफ को याद रखना हमें गुनाहों से बचने में मदद देता है।
आयत 21
۞ أَوَلَمْ يَسِيرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ فَيَنظُرُوا۟ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلَّذِينَ كَانُوا۟ مِن قَبْلِهِمْ ۚ كَانُوا۟ هُمْ أَشَدَّ مِنْهُمْ قُوَّةًۭ وَءَاثَارًۭا فِى ٱلْأَرْضِ فَأَخَذَهُمُ ٱللَّهُ بِذُنُوبِهِمْ وَمَا كَانَ لَهُم مِّنَ ٱللَّهِ مِن وَاقٍۢ
۞ أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَسِيرُوا۟
वो चले फिरे
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
فَيَنظُرُوا۟
तो वो देखते
كَيْفَ
किस तरह
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अंजाम
ٱلَّذِينَ
उनका जो
كَانُوا۟
थे
مِن
before them
قَبْلِهِمْ ۚ
उनसे पहले
كَانُوا۟
थे वो
هُمْ
वो
أَشَدَّ
ज़्यादा शदीद
مِنْهُمْ
उनसे
قُوَّةًۭ
क़ुव्वत में
وَءَاثَارًۭا
और आसार में
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
فَأَخَذَهُمُ
पस पकड़ लिया उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
بِذُنُوبِهِمْ
बवजह उनके गुनाहों के
وَمَا
और ना
كَانَ
था
لَهُم
उनके लिए
مِّنَ
against
ٱللَّهِ
अल्लाह से
مِن
any
وَاقٍۢ
कोई बचाने वाला
क्या वे धरती में चले-फिरे नहीं कि देखते कि उन लोगों का कैसा परिणाम हुआ, जो उनसे पहले गुज़र चुके है? वे शक्ति और धरती में अपने चिन्हों की दृष्टि से उनसे कहीं बढ़-चढ़कर थे, फिर उनके गुनाहों के कारण अल्लाह ने उन्हें पकड़ लिया। और अल्लाह से उन्हें बचानेवाला कोई न हुआ
तफ़्सीर:
क्या ये बहुदेववादी धरती में चले-फ़िरे नहीं, ताकि ग़ौर करते कि इनसे पहले झुठलाने वाली जातियों का अंजाम कैसा रहा। अवश्य उनका अंत बहुत बुरा था। वे लोग इनसे अधिक ताकतवर थे, तथा धरती में ऐसे-ऐसे महल तैयार किए हुए थे, जो इनसे संभव नहीं हुए। फिर भी अल्लाह ने उनके पापों के कारण उनका विनाश कर दिया और कोई उन्हें अल्लाह की यातना से बचा न सका।
आयत 22
ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَانَت تَّأْتِيهِمْ رُسُلُهُم بِٱلْبَيِّنَـٰتِ فَكَفَرُوا۟ فَأَخَذَهُمُ ٱللَّهُ ۚ إِنَّهُۥ قَوِىٌّۭ شَدِيدُ ٱلْعِقَابِ
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّهُمْ
बवजह उसके कि वो
كَانَت
थे
تَّأْتِيهِمْ
आते उनके पास
رُسُلُهُم
रसूल उनके
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ
साथ वाज़ेह दलाइल के
فَكَفَرُوا۟
तो उन्होंने इन्कार किया
فَأَخَذَهُمُ
फिर पकड़ लिया उन्हें
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह ने
إِنَّهُۥ
बेशक वो
قَوِىٌّۭ
बहुत क़ुव्वत वाला है
شَدِيدُ
सख़्त
ٱلْعِقَابِ
सज़ा वाला है
वह (बुरा परिणाम) तो इसलिए सामने आया कि उनके पास उनके रसूल स्पष्ट प्रमाण लेकर आते रहे, किन्तु उन्होंने इनकार किया। अन्ततः अल्लाह ने उन्हें पकड़ लिया। निश्चय ही वह बड़ी शक्तिवाला, सज़ा देने में अत्याधिक कठोर है
तफ़्सीर:
यह यातना उन्हें इसलिए झेलनी पड़ी कि उनके पास अल्लाह के रसूल खुली निशानियाँ तथा शानदार तर्क लेकर आते रहे ,परन्तु उन्हेंने अल्लाह के साथ कुफ़्र किया तथा उसके रसूलों को झठलाया। तो अल्लाह ने उनकी शक्ति एवं कुव्वत के बावजूद उन्हें विनष्ट कर दिया। यक़ीनन अल्लाह उन लोगों को जिन्होंने कुफ़्र किया और उसके रसूलों को झुठलाया, कठोर सज़ा देने वाला, शक्तिशाली है।
आयत 23
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مُوسَىٰ بِـَٔايَـٰتِنَا وَسُلْطَـٰنٍۢ مُّبِينٍ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
مُوسَىٰ
मूसा को
بِـَٔايَـٰتِنَا
साथ अपनी निशानियों के
وَسُلْطَـٰنٍۢ
और दलील
مُّبِينٍ
वाज़ेह के
और हमने मूसा को भी अपनी निशानियों और स्पष्ट प्रमाण के साथ
तफ़्सीर:
और हमने मूसा को अपनी खुली निशानियों (चमत्कारों) तथा सुदृढ़ प्रमाण के साथ भेजा।
आयत 24
إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَهَـٰمَـٰنَ وَقَـٰرُونَ فَقَالُوا۟ سَـٰحِرٌۭ كَذَّابٌۭ
إِلَىٰ
To
فِرْعَوْنَ
तरफ़ फ़िरऔन
وَهَـٰمَـٰنَ
और हामान
وَقَـٰرُونَ
और क़ारून के
فَقَالُوا۟
तो उन्होंने कहा
سَـٰحِرٌۭ
जादूगर है
كَذَّابٌۭ
बहुत झूठा
फ़िरऔन औऱ हामान और क़ारून की ओर भेजा था, किन्तु उन्होंने कहा, "यह तो जादूगर है, बड़ा झूठा!"
तफ़्सीर:
फ़िरऔन और उसके मंत्री हामान तथा क़ारून की ओर मूसा को भेजा। तो उन्होंने कहा कि मूसा जादुगर है तथा रसूल होने के दावे में झूठा है।
आयत 25
فَلَمَّا جَآءَهُم بِٱلْحَقِّ مِنْ عِندِنَا قَالُوا۟ ٱقْتُلُوٓا۟ أَبْنَآءَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مَعَهُۥ وَٱسْتَحْيُوا۟ نِسَآءَهُمْ ۚ وَمَا كَيْدُ ٱلْكَـٰفِرِينَ إِلَّا فِى ضَلَـٰلٍۢ
فَلَمَّا
तो जब
جَآءَهُم
वो लाया उनके पास
بِٱلْحَقِّ
हक़
مِنْ
from
عِندِنَا
हमारे पास से
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
ٱقْتُلُوٓا۟
क़त्ल कर दो
أَبْنَآءَ
बेटों को
ٱلَّذِينَ
उनके जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
مَعَهُۥ
साथ उसके
وَٱسْتَحْيُوا۟
और ज़िन्दा रहने दो
نِسَآءَهُمْ ۚ
उनकी औरतों को
وَمَا
और नहीं
كَيْدُ
चाल
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों की
إِلَّا
मगर
فِى
in
ضَلَـٰلٍۢ
गुमराही में
फिर जब वह उनके सामने हमारे पास से सत्य लेकर आया तो उन्होंने कहा, "जो लोग ईमान लेकर उसके साथ है, उनके बेटों को मार डालो औऱ उनकी स्त्रियों को जीवित छोड़ दो।" किन्तु इनकार करनेवालों की चाल तो भटकने ही के लिए होती है
तफ़्सीर:
जब मूसा उनके पास अपनी सच्चाई के प्रमाण लेकर आए, तो फ़िरऔन ने कहा : "जो लोग उसपर ईमान लाए हैं, उनके बेटों को मार डालो तथा उनकी स्त्रियों को अपमान के तौर पर बाक़ी रहने दो।" काफ़िरों की, मोमिनों की संख्या कम करने वाली चाल तो ख़त्म होने वाली और बेअसर होने वाली थी ही।
आयत 26
وَقَالَ فِرْعَوْنُ ذَرُونِىٓ أَقْتُلْ مُوسَىٰ وَلْيَدْعُ رَبَّهُۥٓ ۖ إِنِّىٓ أَخَافُ أَن يُبَدِّلَ دِينَكُمْ أَوْ أَن يُظْهِرَ فِى ٱلْأَرْضِ ٱلْفَسَادَ
وَقَالَ
और कहा
فِرْعَوْنُ
फ़िरऔन ने
ذَرُونِىٓ
छोड़ दो मुझे
أَقْتُلْ
मैं क़त्ल करूँ
مُوسَىٰ
मूसा को
وَلْيَدْعُ
और चाहिए कि वो पुकारे
رَبَّهُۥٓ ۖ
अपने रब को
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَخَافُ
मैं डरता हूँ
أَن
कि
يُبَدِّلَ
वो बदल देगा
دِينَكُمْ
तुम्हारे दीन को
أَوْ
या
أَن
ये कि
يُظْهِرَ
वो फैला देगा
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
ٱلْفَسَادَ
फ़साद
फ़िरऔन ने कहा, "मुझे छोड़ो, मैं मूसा को मार डालूँ और उसे चाहिए कि वह अपने रब को (अपनी सहायता के लिए) पुकारे। मुझे डर है कि ऐसा न हो कि वह तुम्हारे धर्म को बदल डाले या यह कि वह देश में बिगाड़ पैदा करे।"
तफ़्सीर:
और फ़िरऔन ने कहा : मुझे मूसा को दंड के तौर पर क़त्ल करने दो। उसे भी चाहिए कि अपने बचाव के लिए अपने पालनहार को पुकारे। मुझे उसके अपने रब को पुकारने की कोई परवाह नहीं है। मुझे इस बात का डर है कि वह तुम्हारे धर्म को बदल देगा या धरती में क़त्ल एवं बिगाड़ के जरिए उपद्रव मचाएगा।
आयत 27
وَقَالَ مُوسَىٰٓ إِنِّى عُذْتُ بِرَبِّى وَرَبِّكُم مِّن كُلِّ مُتَكَبِّرٍۢ لَّا يُؤْمِنُ بِيَوْمِ ٱلْحِسَابِ
وَقَالَ
और कहा
مُوسَىٰٓ
मूसा ने
إِنِّى
बेशक मैं
عُذْتُ
पनाह ली मैंने
بِرَبِّى
अपने रब की
وَرَبِّكُم
और तुम्हारे रब की
مِّن
from
كُلِّ
every
مُتَكَبِّرٍۢ
हर तकब्बुर करने वाले से
لَّا
not
يُؤْمِنُ
जो नहीं ईमान रखता
بِيَوْمِ
दिन पर
ٱلْحِسَابِ
हिसाब के
मूसा ने कहा, "मैंने हर अहंकारी के मुक़ाबले में, जो हिसाब के दिन पर ईमान नहीं रखता, अपने रब और तुम्हारे रब की शरण ले ली है।"
तफ़्सीर:
मुसा अलैहिस्सलाम को जब फ़िरऔन की धमकी का पता चला, तो बोलेः मैंने अपने तथा तुम्हारे पालनहार की शरण ली है, प्रत्येक ऐसे व्यक्ति से, जो सत्य से तथा उसे मानने से अहंकार दिखाता हो, वह क़ियामत के दिन तथा उसके हिसाब और सज़ा पर विश्वास नहीं रखता।
आयत 28
وَقَالَ رَجُلٌۭ مُّؤْمِنٌۭ مِّنْ ءَالِ فِرْعَوْنَ يَكْتُمُ إِيمَـٰنَهُۥٓ أَتَقْتُلُونَ رَجُلًا أَن يَقُولَ رَبِّىَ ٱللَّهُ وَقَدْ جَآءَكُم بِٱلْبَيِّنَـٰتِ مِن رَّبِّكُمْ ۖ وَإِن يَكُ كَـٰذِبًۭا فَعَلَيْهِ كَذِبُهُۥ ۖ وَإِن يَكُ صَادِقًۭا يُصِبْكُم بَعْضُ ٱلَّذِى يَعِدُكُمْ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهْدِى مَنْ هُوَ مُسْرِفٌۭ كَذَّابٌۭ
وَقَالَ
और कहा
رَجُلٌۭ
एक मर्द
مُّؤْمِنٌۭ
मोमिन ने
مِّنْ
from
ءَالِ
(the) family
فِرْعَوْنَ
आले फ़िरऔन में से
يَكْتُمُ
जो छुपाता था
إِيمَـٰنَهُۥٓ
ईमान अपना
أَتَقْتُلُونَ
क्या तुम क़त्ल कर दोगे
رَجُلًا
एक आदमी को
أَن
कि
يَقُولَ
वो कहता है
رَبِّىَ
मेरा रब
ٱللَّهُ
अल्लाह है
وَقَدْ
हालाँकि तहक़ीक़
جَآءَكُم
वो लाया है तुम्हारे पास
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ
वाज़ेह दलाइल
مِن
from
رَّبِّكُمْ ۖ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
وَإِن
और अगर
يَكُ
है वो
كَـٰذِبًۭا
झूठा
فَعَلَيْهِ
तो उसी पर है
كَذِبُهُۥ ۖ
झूठ उसका
وَإِن
और अगर
يَكُ
है वो
صَادِقًۭا
सच्चा
يُصِبْكُم
पहुँचेगा तुम्हें
بَعْضُ
बाज
ٱلَّذِى
वो जिसका
يَعِدُكُمْ ۖ
वो वादा करता है तुम से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يَهْدِى
नहीं वो हिदायत देता
مَنْ
उसे जो हो
هُوَ
वो
مُسْرِفٌۭ
हद से गुज़रने वाला
كَذَّابٌۭ
सख़्त झूठा
फ़िरऔन के लोगों में से एक ईमानवाले व्यक्ति ने, जो अपने ईमान को छिपा रहा था, कहा, "क्या तुम एक ऐसे व्यक्ति को इसलिए मार डालोगे कि वह कहता है कि मेरा रब अल्लाह है और वह तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से खुले प्रमाण भी लेकर आया है? यदि वह झूठा है तो उसके झूठ का वबाल उसी पर पड़ेगा। किन्तु यदि वह सच्चा है तो जिस चीज़ की वह तुम्हें धमकी दे रहा है, उसमें से कुछ न कुछ तो तुमपर पड़कर रहेगा। निश्चय ही अल्लाह उसको मार्ग नहीं दिखाता जो मर्यादाहीन, बड़ा झूठा हो
तफ़्सीर:
और फ़िरऔन के घराने के एक मोमिन व्यक्ति ने, जो लोगों से अपना ईमान छिपाया हुआ था, मूसा अलैहिस्सलाम के कत्ल के फ़ैसले को नकारते हुए कहा : क्या तुम एक ऐसे व्यक्ति को कत्ल करना चाहते हो, जिसका अपराध केवल यह है कि वह कहता है कि मेरा रब अल्लाह है, हालाँकि वह ऐसे खुले प्रमाण और सबूत लेकर आया है, जो उसके अल्लाह के रसूल होने के दावे की पुष्टि करते हैं? और यदि मान भी लिया जाए कि वह झूठा है, तो इस झूठ का नुकसान उसी को होगा। और यदि वह अपने दावे में सच्चा है, तो वह जिस यातना की धमकी दे रहा है, उसका कुछ भाग तुम्हें पहुँचकर रहेगा। वास्तव में, अल्लाह उसे मार्गदर्शन नहीं देता, जो उसकी सीमाओं का उल्लंघन करता हो तथा उसपर एवं उसके रसूल पर झूठा लांछन लगाता हो।
आयत 29
يَـٰقَوْمِ لَكُمُ ٱلْمُلْكُ ٱلْيَوْمَ ظَـٰهِرِينَ فِى ٱلْأَرْضِ فَمَن يَنصُرُنَا مِنۢ بَأْسِ ٱللَّهِ إِن جَآءَنَا ۚ قَالَ فِرْعَوْنُ مَآ أُرِيكُمْ إِلَّا مَآ أَرَىٰ وَمَآ أَهْدِيكُمْ إِلَّا سَبِيلَ ٱلرَّشَادِ
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
لَكُمُ
तुम्हारे लिए है
ٱلْمُلْكُ
बादशाहत
ٱلْيَوْمَ
आज
ظَـٰهِرِينَ
कि ग़ालिब हो
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
فَمَن
फिर कौन
يَنصُرُنَا
मदद करेगा हमारी
مِنۢ
from
بَأْسِ
अज़ाब से
ٱللَّهِ
अल्लाह के
إِن
अगर
جَآءَنَا ۚ
वो आ गया हमारे पास
قَالَ
कहा
فِرْعَوْنُ
फ़िरऔन ने
مَآ
नहीं
أُرِيكُمْ
मैं दिखाता तुम्हें
إِلَّا
मगर
مَآ
जो
أَرَىٰ
मैं देखता हूँ
وَمَآ
और नहीं
أَهْدِيكُمْ
मैं दिखाता तुम्हें
إِلَّا
मगर
سَبِيلَ
रास्ता
ٱلرَّشَادِ
भलाई का
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! आज तुम्हारी बादशाही है। धरती में प्रभावी हो। किन्तु अल्लाह की यातना के मुक़ाबले में कौन हमारी सहायता करेगा, यदि वह हम पर आ जाए?" फ़िरऔन ने कहा, "मैं तो तुम्हें बस वही दिखा रहा हूँ जो मैं स्वयं देख रहा हूँ और मैं तुम्हें बस ठीक रास्ता दिखा रहा हूँ, जो बुद्धिसंगत भी है।"
तफ़्सीर:
ऐ मेरी जाति के लोगो! आज मिस्र में तुम्हारा राज्य है, और इस धरती में तुम प्रभावशाली हो। लेकिन अगर मूसा अलैहिस्सलाम को मारने के कारण हमपर अल्लाह की यातना आ जाए, तो उससे बचाने में कौन हमारी मदद करेगा? फ़िरऔन ने कहा : मेरी राय ही सही राय है, तथा मेरा फ़ैसला है सही फ़ैसला है, और मेरी राय है कि बुराई एवं बिगाड़ को रोकने के लिए मूसा को मार दिया जाए। और मैं तुम्हें सीधी एवं सही राह ही दिखाता हूँ।
आयत 30
وَقَالَ ٱلَّذِىٓ ءَامَنَ يَـٰقَوْمِ إِنِّىٓ أَخَافُ عَلَيْكُم مِّثْلَ يَوْمِ ٱلْأَحْزَابِ
وَقَالَ
और कहा उसने
ٱلَّذِىٓ
जो
ءَامَنَ
ईमान लाया
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَخَافُ
मैं डरता हूँ
عَلَيْكُم
तुम पर
مِّثْلَ
मानिन्द
يَوْمِ
दिन के
ٱلْأَحْزَابِ
(गुज़िश्ता) गिरोहों के
उस व्यक्ति ने, जो ईमान ला चुका था, कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मुझे भय है कि तुमपर (विनाश का) ऐसा दिन न आ पड़े, जैसा दूसरे विगत समुदायों पर आ पड़ा था।
तफ़्सीर:
और उस व्यक्ति ने, जो ईमान लाया था, अपनी जाति को नसीहत करते हुए कहा : यदि तुम मुसा को नाहक़ मार देते हो, तो मुझे डर है कि तुमपर भी उसी प्रकार की यातना आ जाए, जिस प्रकार की यातना उन लोगों पर आई थी, जिन्होंने अपने रसूलों के विरुद्ध हुड़दंग की थी और अल्लाह ने उन्हें हलाक कर दिया था।
आज की ज़िंदगी में सबक़
फिरऔन के दरबार के मुखलिस मोमिन का ज़िक्र शुरू होता है। यह हमें सिखाता है कि सच्चाई के लिए आवाज़ उठाने वाला अकेला शख्स भी बड़ा फर्क डाल सकता है।
आयत 31
مِثْلَ دَأْبِ قَوْمِ نُوحٍۢ وَعَادٍۢ وَثَمُودَ وَٱلَّذِينَ مِنۢ بَعْدِهِمْ ۚ وَمَا ٱللَّهُ يُرِيدُ ظُلْمًۭا لِّلْعِبَادِ
مِثْلَ
मानिन्द
دَأْبِ
हालत
قَوْمِ
क़ौमे
نُوحٍۢ
नूह
وَعَادٍۢ
और आद
وَثَمُودَ
और समूद
وَٱلَّذِينَ
और उनकी जो
مِنۢ
after them
بَعْدِهِمْ ۚ
बाद थे उनके
وَمَا
और नहीं
ٱللَّهُ
अल्लाह
يُرِيدُ
वो इरादा रखता
ظُلْمًۭا
ज़ुल्म का
لِّلْعِبَادِ
बन्दों पर
जैसे नूह की क़ौम और आद और समूद और उनके पश्चात्वर्ती लोगों का हाल हुआ। अल्लाह तो ऐसा नहीं कि बन्दों पर कोई ज़ुल्म करना चाहे
तफ़्सीर:
उन समुदायों के जैसे हाल से, जिन्होंने कुफ़्र किया और रसूलों को झुठलाया, जैसे नूह अलैहिस्सलाम की जाति, आद और समूद समुदायों और उनके बाद आने वाली जातियों के हाल से। क्योंकि अल्लाह ने उन्हें उनके रसूलों का इनकार करने और उनको झुठलाने के कारण हलाक कर दिया था। और अल्लाह बंदों के साथ अत्याचार नहीं चाहता। वह उन्हें यातना केवल उनके गुनाहों के बदले में देता है।
आयत 32
وَيَـٰقَوْمِ إِنِّىٓ أَخَافُ عَلَيْكُمْ يَوْمَ ٱلتَّنَادِ
وَيَـٰقَوْمِ
और ऐ मेरी क़ौम
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَخَافُ
मैं डरता हूँ
عَلَيْكُمْ
तुम पर
يَوْمَ
(the) Day
ٱلتَّنَادِ
एक दूसरे को पुकारने के दिन से
और ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मुझे तुम्हारे बारे में चीख़-पुकार के दिन का भय है,
तफ़्सीर:
ऐ मेरी जाति के लोगो! मुझे तुम्हारे विषय में क़ियामत के दिन का भय है, जिस दिन लोग, एक-दूसरे को, रिश्तों-नातों और पद-प्रतिष्ठाओं के आधार पर पुकारेंगे, यह समझकर कि इस भयावह परिस्थिति में शायद इससे कुछ लाभ हो जाए।
आयत 33
يَوْمَ تُوَلُّونَ مُدْبِرِينَ مَا لَكُم مِّنَ ٱللَّهِ مِنْ عَاصِمٍۢ ۗ وَمَن يُضْلِلِ ٱللَّهُ فَمَا لَهُۥ مِنْ هَادٍۢ
يَوْمَ
जिस दिन
تُوَلُّونَ
तुम फिर जाओगे
مُدْبِرِينَ
पीठ फेरते हुए
مَا
नहीं (होगा)
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह से
مِنْ
any
عَاصِمٍۢ ۗ
कोई बचाने वाला
وَمَن
और जिसे
يُضْلِلِ
भटकादे
ٱللَّهُ
अल्लाह
فَمَا
तो नहीं
لَهُۥ
उसके लिए
مِنْ
any
هَادٍۢ
कोई हिदायत देने वाला
जिस दिन तुम पीठ फेरकर भागोगे, तुम्हें अल्लाह से बचानेवाला कोई न होगा - और जिसे अल्लाह ही भटका दे उसे मार्ग दिखानेवाला कोई नहीं। -
तफ़्सीर:
जिस दिन तुम जहन्नम के भय से पीठ फेरकर भागोगे। कोई तुम्हें अल्लाह की यातना से बचा न सकेगा। और जिसे अल्लाह अकेला छोड़ दे और ईमान लाने का सामर्थ्य न दे, उसे कोई हिदायत नहीं दे सकता। क्योंकि सही राह पर चलने का सामर्थ्य केवल अल्लाह ही प्रदान करता है।
आयत 34
وَلَقَدْ جَآءَكُمْ يُوسُفُ مِن قَبْلُ بِٱلْبَيِّنَـٰتِ فَمَا زِلْتُمْ فِى شَكٍّۢ مِّمَّا جَآءَكُم بِهِۦ ۖ حَتَّىٰٓ إِذَا هَلَكَ قُلْتُمْ لَن يَبْعَثَ ٱللَّهُ مِنۢ بَعْدِهِۦ رَسُولًۭا ۚ كَذَٰلِكَ يُضِلُّ ٱللَّهُ مَنْ هُوَ مُسْرِفٌۭ مُّرْتَابٌ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
جَآءَكُمْ
आया तुम्हारे पास
يُوسُفُ
यूसुफ़
مِن
before
قَبْلُ
इससे पहले
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ
साथ वाज़ेह दलाइल के
فَمَا
but not
زِلْتُمْ
तो मुसलसल रहे तुम
فِى
in
شَكٍّۢ
शक में
مِّمَّا
उससे चीज़ से जो
جَآءَكُم
वो लाया तुम्हारे पास
بِهِۦ ۖ
उसे
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
هَلَكَ
वो फ़ौत हो गया
قُلْتُمْ
कहा तुम ने
لَن
हरगिज़ नहीं
يَبْعَثَ
भेजेगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
مِنۢ
after him
بَعْدِهِۦ
इसके बाद
رَسُولًۭا ۚ
किसी रसूल को
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يُضِلُّ
भटकाता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
مَنْ
उसे जो
هُوَ
हो वो
مُسْرِفٌۭ
हद से बढ़ने वाला
مُّرْتَابٌ
शक में पड़ने वाला
हमने पहले भी तुम्हारे पास यूसुफ़ खुले प्रमाण लेकर आ चुके है, किन्तु जो कुछ वे लेकर तुम्हारे पास आए थे, उसके बारे में तुम बराबर सन्देह में पड़े रहे, यहाँ तक कि जब उनकी मृत्यु हो गई तो तुम कहने लगे, "अल्लाह उनके पश्चात कदापि कोई रसूल न भेजेगा।" इसी प्रकार अल्लाह उसे गुमराही में डाल देता है जो मर्यादाहीन, सन्देहों में पड़नेवाला हो। -
तफ़्सीर:
और मूसा (अलैहिस्सलाम) से पहले यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) तुम्हारे पास अल्लाह के एक होने के स्पष्ट प्रमाण लेकर आए। किन्तु तुम उनके लाए हुए संदेश के बारे में संदेह में पड़े रहे और उन्हें झुठलाते रहे। यहाँ तक कि जब वे मर गए, तो तुम्हारे संदेह एवं शक में और वृद्धि हो गई और तुमने कह दिया कि अल्लाह उनके बाद कोई रसूल हरगिज़ नहीं भेजेगा! जैसे तुम यहाँ सत्य से भटक गए, वैसे ही अल्लाह हर उस आदमी को राह से भटका देता है, जो उसकी सीमाओं का उल्लंघन करता हो, उसके एक होने पर संदेह करता हो।
आयत 35
ٱلَّذِينَ يُجَـٰدِلُونَ فِىٓ ءَايَـٰتِ ٱللَّهِ بِغَيْرِ سُلْطَـٰنٍ أَتَىٰهُمْ ۖ كَبُرَ مَقْتًا عِندَ ٱللَّهِ وَعِندَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ۚ كَذَٰلِكَ يَطْبَعُ ٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ قَلْبِ مُتَكَبِّرٍۢ جَبَّارٍۢ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يُجَـٰدِلُونَ
झगड़ते हैं
فِىٓ
concerning
ءَايَـٰتِ
आयात में
ٱللَّهِ
अल्लाह की
بِغَيْرِ
बग़ैर
سُلْطَـٰنٍ
किसी दलील के
أَتَىٰهُمْ ۖ
जो आई हो उनके पास
كَبُرَ
बड़ी है
مَقْتًا
नाराज़गी की बात
عِندَ
नज़्दीक
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَعِندَ
और नज़्दीक
ٱلَّذِينَ
उनके जो
ءَامَنُوا۟ ۚ
ईमान लाए
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يَطْبَعُ
मुहर लगा देता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर (उस शख़्स के)
قَلْبِ
दिल के
مُتَكَبِّرٍۢ
जो तकब्बुर करने वाला है
جَبَّارٍۢ
सरकश है
ऐसे लोगो को (गुमराही में डालता है) जो अल्लाह की आयतों में झगड़ते है, बिना इसके कि उनके पास कोई प्रमाण आया हो, अल्लाह की दृष्टि) में और उन लोगों की दृष्टि में जो ईमान लाए यह (बात) अत्यन्त अप्रिय है। इसी प्रकार अल्लाह हर अहंकारी, निर्दय- अत्याचारी के दिल पर मुहर लगा देता है। -
तफ़्सीर:
जो अल्लाह की आयतों को, बिना किसी प्रमाण के, जो उनके पास आया हो, ग़लत साबित करने के लिए बहस व तकरार करते हैं। उनकी यह बहस व तकरार अल्लाह के यहाँ तथा उसपर एवं उसके रसूलों पर ईमान रखने वालों के यहाँ, बड़े क्रोध का कारण है। जिस तरह अल्लाह ने हमारी आयतों को ग़लत साबित करने के लिए बहस व तकरार करने वालों के दिलों पर मुहर लगा दी है, उसी तरह प्रत्येक उस व्यक्ति के दिल पर मुहर लगा देगा, जो सत्य से अभिमान करता हो, अत्याचारी हो। अतः न वह सही मार्ग पा सकेगा, न भलाई को पहुँच सकेगा।
आयत 36
وَقَالَ فِرْعَوْنُ يَـٰهَـٰمَـٰنُ ٱبْنِ لِى صَرْحًۭا لَّعَلِّىٓ أَبْلُغُ ٱلْأَسْبَـٰبَ
وَقَالَ
और कहा
فِرْعَوْنُ
फ़िरऔन ने
يَـٰهَـٰمَـٰنُ
ऐ हामान
ٱبْنِ
बना
لِى
मेरे लिए
صَرْحًۭا
एक बुलन्द इमारत
لَّعَلِّىٓ
ताकि मैं
أَبْلُغُ
मैं पहुँच सकूँ
ٱلْأَسْبَـٰبَ
रास्तों पर
फ़िरऔन ने कहा, "ऐ हामान! मेरे एक उच्च भवन बना, ताकि मैं साधनों तक पहुँच सकूँ,
तफ़्सीर:
फ़िरऔन ने अपने मंत्री हामान से कहा : मेरे लिए एक उच्च भवन बनाओ। संभवतः मैं मार्गों तक पहुँच सकूँ।
आयत 37
أَسْبَـٰبَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ فَأَطَّلِعَ إِلَىٰٓ إِلَـٰهِ مُوسَىٰ وَإِنِّى لَأَظُنُّهُۥ كَـٰذِبًۭا ۚ وَكَذَٰلِكَ زُيِّنَ لِفِرْعَوْنَ سُوٓءُ عَمَلِهِۦ وَصُدَّ عَنِ ٱلسَّبِيلِ ۚ وَمَا كَيْدُ فِرْعَوْنَ إِلَّا فِى تَبَابٍۢ
أَسْبَـٰبَ
रास्तों पर
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमान के
فَأَطَّلِعَ
फिर मैं झाँक कर देखूँ
إِلَىٰٓ
at
إِلَـٰهِ
तरफ़ इलाह
مُوسَىٰ
मूसा के
وَإِنِّى
और बेशक मैं
لَأَظُنُّهُۥ
अलबत्ता मैं गुमान करता हूँ उसे
كَـٰذِبًۭا ۚ
झूठा
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
زُيِّنَ
मुज़य्यन कर दिया गया
لِفِرْعَوْنَ
फ़िरऔन के लिए
سُوٓءُ
बुरा
عَمَلِهِۦ
अमल उसका
وَصُدَّ
और वो रोक दिया गया
عَنِ
from
ٱلسَّبِيلِ ۚ
रास्ते से
وَمَا
और नहीं
كَيْدُ
चाल
فِرْعَوْنَ
फ़िरऔन की
إِلَّا
मगर
فِى
in
تَبَابٍۢ
हलाकत में
आकाशों को साधनों (और क्षत्रों) तक। फिर मूसा के पूज्य को झाँककर देखूँ। मैं तो उसे झूठा ही समझता हूँ।" इस प्रकार फ़िरऔन को लिए उसका दुष्कर्म सुहाना बना दिया गया और उसे मार्ग से रोक दिया गया। फ़िरऔन की चाल तो बस तबाही के सिलसिले में रही
तफ़्सीर:
"ताकि मैं आकाशों के मार्गों तक पहुँच सकूँ, जो आकाशों की ओर ले जाने वाले हों अौर मूसा के पूज्य (उपास्य) को देख लूँ, जिसके बारे उसका कहना है कि वही सत्य पूज्य है। निश्चय मैं मूसा को अपने दावे में झूठा समझता हूँ।" इस तरह, फ़िरऔन के लिए उसके बुरे कर्म को सुंदर बना दिया गया। यही कारण है कि उसने हामान को उक्त आदेश दिया। उसे सत्य मार्ग से हटाकर असत्य मार्ग पर लगा दिया गया था। और फ़िरऔन की (अपने ग़लत पंथ को बढ़ावा देने और मूसा अलैहिस्सलाम के लाए हुए सत्य को दबाने की) चाल को विनष्ट होना ही था। क्योंकि अंततः वह अपने कोशिश में असफल रहा और ऐसे दुर्भाग्य तक जा पहुँचा, जो कभी उसका पीछा नहीं छोड़ेगा।
आयत 38
وَقَالَ ٱلَّذِىٓ ءَامَنَ يَـٰقَوْمِ ٱتَّبِعُونِ أَهْدِكُمْ سَبِيلَ ٱلرَّشَادِ
وَقَالَ
और कहा
ٱلَّذِىٓ
उसने जो
ءَامَنَ
ईमान लाया
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
ٱتَّبِعُونِ
पैरवी करो मेरी
أَهْدِكُمْ
मैं दिखाऊँगा तुम्हें
سَبِيلَ
रास्ता
ٱلرَّشَادِ
भलाई का
उस व्यक्ति ने, जो ईमान लाया था, कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! मेरा अनुसरण करो, मैं तुम्हे भलाई का ठीक रास्ता दिखाऊँगा
तफ़्सीर:
और फ़िरऔन के परिवार के उस व्यक्ति ने अपनी जाति के लोगों को नसीहत करते हुए और उन्हें सही रास्ता दिखाते हुए कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! मेरी बात मान लो। मैं तुम्हें सच्ची एवं सीधी राह बता रहा हूँ।
आयत 39
يَـٰقَوْمِ إِنَّمَا هَـٰذِهِ ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَا مَتَـٰعٌۭ وَإِنَّ ٱلْـَٔاخِرَةَ هِىَ دَارُ ٱلْقَرَارِ
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
إِنَّمَا
बेशक
هَـٰذِهِ
ये
ٱلْحَيَوٰةُ
ज़िन्दगी
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
مَتَـٰعٌۭ
थोड़ा फ़ायदा है
وَإِنَّ
और बेशक
ٱلْـَٔاخِرَةَ
आख़िरत
هِىَ
वो ही
دَارُ
घर है
ٱلْقَرَارِ
क़रार का
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह सांसारिक जीवन तो बस अस्थायी उपभोग है। निश्चय ही स्थायी रूप से ठहरनेका घर तो आख़िरत ही है
तफ़्सीर:
ऐ मेरी जाति के लोगो! यह सांसारिक जीवन तो केवल दुनिया की सुख-सुविधाओं से क्षणिक लाभ उठाने का एक अवसर है। अतः, तुम दुनिया की नाशवान् वस्तुओं के धोखे में न पड़ो। और आख़िरत का घर, अपनी कभी ख़त्म न होने वाली और हमेशा बाकी रहने वाली नेमतों समेत, हमेशा रहने की जगह है। इसलिए अल्लाह की आज्ञा का पालन करके, आखिरत के लिए काम किए जाओ और सांसारिक जीवन में मग्न होकर आख़िरत की तैयारी से गाफ़िल न हो।
आयत 40
مَنْ عَمِلَ سَيِّئَةًۭ فَلَا يُجْزَىٰٓ إِلَّا مِثْلَهَا ۖ وَمَنْ عَمِلَ صَـٰلِحًۭا مِّن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَىٰ وَهُوَ مُؤْمِنٌۭ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ يَدْخُلُونَ ٱلْجَنَّةَ يُرْزَقُونَ فِيهَا بِغَيْرِ حِسَابٍۢ
مَنْ
जिस ने
عَمِلَ
अमल किया
سَيِّئَةًۭ
बुरा
فَلَا
तो ना
يُجْزَىٰٓ
वो बदला दिया जाएगा
إِلَّا
मगर
مِثْلَهَا ۖ
मानिन्द उसी के
وَمَنْ
और जिसने
عَمِلَ
अमल किया
صَـٰلِحًۭا
नेक
مِّن
of
ذَكَرٍ
कोई मर्द हो
أَوْ
या
أُنثَىٰ
औरत
وَهُوَ
जब कि वो
مُؤْمِنٌۭ
मोमिन हो
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
يَدْخُلُونَ
जो दाख़िल होंगे
ٱلْجَنَّةَ
जन्नत में
يُرْزَقُونَ
वो रिज़्क़ दिए जाऐंगे
فِيهَا
उसमें
بِغَيْرِ
बग़ैर
حِسَابٍۢ
हिसाब के
जिस किसी ने बुराई की तो उसे वैसा ही बदला मिलेगा, किन्तु जिस किसी ने अच्छा कर्म किया, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, किन्तु हो वह मोमिन, तो ऐसे लोग जन्नत में प्रवेश करेंगे। वहाँ उन्हें बेहिसाब दिया जाएगा
तफ़्सीर:
जिसने बुरा काम किया, उसे उसकेे कर्म के जैसी ही सज़ा दी जाएगी। उसे उसके कर्म से अधिक सज़ा नहीं दी जाएगी। और जो अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए अच्छा काम करेगा, वह नर हो अथवा नारी, तथा वह अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान रखने वाला भी हो, तो इन अच्छी विशेषताओं से परिपूर्ण लोग ही क़ियामत के दिन जन्नत में प्रवेश करेंगे। वहाँ अल्लाह उन्हें जन्नत के अनगिनत फलों और अपार नेमतों से लाभान्वित होने का अवसर देगा, जो कभी समाप्त नहीं होंगी।
आज की ज़िंदगी में सबक़
उस मोमिन शख्स की मज़ीद नसीहतों का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि दुनिया की ज़िंदगी चंद दिनों की है, आखिरत की तैयारी को तरजीह देनी चाहिए।
आयत 41
۞ وَيَـٰقَوْمِ مَا لِىٓ أَدْعُوكُمْ إِلَى ٱلنَّجَوٰةِ وَتَدْعُونَنِىٓ إِلَى ٱلنَّارِ
۞ وَيَـٰقَوْمِ
और ऐ मेरी क़ौम
مَا
क्या है
لِىٓ
मुझे
أَدْعُوكُمْ
मैं बुलाता हूँ तुम्हें
إِلَى
to
ٱلنَّجَوٰةِ
तरफ़ निजात के
وَتَدْعُونَنِىٓ
और तुम बुलाते हो मुझे
إِلَى
to
ٱلنَّارِ
तरफ़ आग के
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह मेरे साथ क्या मामला है कि मैं तो तुम्हें मुक्ति की ओर बुलाता हूँ और तुम मुझे आग की ओर बुला रहे हो?
तफ़्सीर:
ऐ मेरी जाति के लोगो! क्या बात है कि मैं तुम्हें, अल्लाह पर ईमान और अच्छे कार्य के ज़रिए, दुनिया एवं आख़िरत की क्षति से मुक्ति प्राप्त करने की ओर बुला रहा हूँ और तुम मुझे अल्लाह के साथ कुफ़्र और उसकी अवज्ञा की ओर बुलाकर जहन्नम में दाखिल होने की ओर बुला रहे हो?
आयत 42
تَدْعُونَنِى لِأَكْفُرَ بِٱللَّهِ وَأُشْرِكَ بِهِۦ مَا لَيْسَ لِى بِهِۦ عِلْمٌۭ وَأَنَا۠ أَدْعُوكُمْ إِلَى ٱلْعَزِيزِ ٱلْغَفَّـٰرِ
تَدْعُونَنِى
तुम बुलाते हो मुझे
لِأَكْفُرَ
कि मैं कुफ़्र करूँ
بِٱللَّهِ
साथ अल्लाह के
وَأُشْرِكَ
और मैं शरीक ठहराऊँ
بِهِۦ
साथ उसके
مَا
उसको जो
لَيْسَ
नहीं है
لِى
मुझे
بِهِۦ
उसका
عِلْمٌۭ
कोई इल्म
وَأَنَا۠
और मैं
أَدْعُوكُمْ
मैं बुलाता हूँ तुम्हें
إِلَى
तरफ़
ٱلْعَزِيزِ
बहुत ज़बरदस्त के
ٱلْغَفَّـٰرِ
बहुत बख़्शने वाले के
तुम मुझे बुला रहे हो कि मैं अल्लाह के साथ कुफ़्र करूँ और उसके साथ उसे साझी ठहराऊँ जिसका मुझे कोई ज्ञान नहीं, जबकि मैं तुम्हें बुला रहा हूँ उसकी ओर जो प्रभुत्वशाली, अत्यन्त क्षमाशील है
तफ़्सीर:
तुम मुझे बातिल की आेर बुला रहे हो, ताकि मैं अल्लाह के साथ कुफ़्र करुँ, तथा उसके साथ ऐसी वस्तु की वंदना करुँ, जिसके वंदना के सही होने का मेरे पास कोई ज्ञान नहीं है। हालाँकि मैं तुम्हें उस अल्लाह पर ईमान लाने की ओर बुला रहा हुँ, जो ऐसा प्रभावशाली है कि कोई उसपर गालिब नहीं आ सकता तथा अपने बंदों को अति क्षमा करने वाला है।
आयत 43
لَا جَرَمَ أَنَّمَا تَدْعُونَنِىٓ إِلَيْهِ لَيْسَ لَهُۥ دَعْوَةٌۭ فِى ٱلدُّنْيَا وَلَا فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ وَأَنَّ مَرَدَّنَآ إِلَى ٱللَّهِ وَأَنَّ ٱلْمُسْرِفِينَ هُمْ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ
لَا
No
جَرَمَ
नहीं कोई शक
أَنَّمَا
बेशक
تَدْعُونَنِىٓ
तुम बुलाते हो मुझे
إِلَيْهِ
जिसकी तरफ़
لَيْسَ
नहीं है
لَهُۥ
उसके लिए
دَعْوَةٌۭ
कोई पुकारा जाना
فِى
in
ٱلدُّنْيَا
दुनिया में
وَلَا
और ना
فِى
in
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत में
وَأَنَّ
और बेशक
مَرَدَّنَآ
पलटना हमारा
إِلَى
(is) to
ٱللَّهِ
तरफ़ अल्लाह के है
وَأَنَّ
और बेशक
ٱلْمُسْرِفِينَ
जो हद से बढ़ने वाले हैं
هُمْ
वो ही हैं
أَصْحَـٰبُ
साथी
ٱلنَّارِ
आग के
निस्संदेह तुम मुझे जिसकी ओर बुलाते हो उसके लिए न संसार में आमंत्रण है और न आख़िरत (परलोक) में और यह की हमें लौटना भी अल्लाह ही की ओर है और यह कि जो मर्यादाही है, वही आग (में पड़नेवाले) वाले है
तफ़्सीर:
सच्ची बात यह है कि तुम मुझे जिसे मानने और जिसकी इबादत करने को कहते हो, वह सचमुच इस लायक है ही नहीं कि उसे दुनिया एवं आख़िरत में पुकारा जाए, और वह पुकारने वाले की बात का जवाब भी नहीं दे सकता, और हम सभी को केवल अल्लाह के पास लौटकर जाना है, और कुफ़्र एवं गुनाह में पड़ने वाले लोग ही जहन्नमी हैं, जो क़ियामत के दिन हर हाल में उसमें दाख़िल होंगे।
आयत 44
فَسَتَذْكُرُونَ مَآ أَقُولُ لَكُمْ ۚ وَأُفَوِّضُ أَمْرِىٓ إِلَى ٱللَّهِ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ بَصِيرٌۢ بِٱلْعِبَادِ
فَسَتَذْكُرُونَ
पस अनक़रीब तुम याद करोगे
مَآ
जो
أَقُولُ
मैं कह रहा हूँ
لَكُمْ ۚ
तुम्हें
وَأُفَوِّضُ
और मैं सुपुर्द करता हूँ
أَمْرِىٓ
मामला अपना
إِلَى
to
ٱللَّهِ ۚ
तरफ़ अल्लाह के
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
بَصِيرٌۢ
ख़ूब देखने वाला है
بِٱلْعِبَادِ
बन्दों को
अतः शीघ्र ही तुम याद करोगे, जो कुछ मैं तुमसे कह रहा हूँ। मैं तो अपना मामला अल्लाह को सौंपता हूँ। निस्संदेह अल्लाह की दृष्टि सब बन्दों पर है
तफ़्सीर:
तो उन्होंने उसकी नसीहत को नकार दिया। फिर उसने कहा : तुम बहुत जल्द मेरी नसीहत को याद करोगे और उसे न मानने पर हाथ मलोगे। मैं अपने मामलों को अल्लाह के हवाले करता हुँ। वास्तव में, अल्लाह पर बंदों का कोई कर्म छिपा नहीं रहता।
आयत 45
فَوَقَىٰهُ ٱللَّهُ سَيِّـَٔاتِ مَا مَكَرُوا۟ ۖ وَحَاقَ بِـَٔالِ فِرْعَوْنَ سُوٓءُ ٱلْعَذَابِ
فَوَقَىٰهُ
पस बचा लिया उसे
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
سَيِّـَٔاتِ
बुराइयों से
مَا
उसकी जो
مَكَرُوا۟ ۖ
उन्होंने मकर किया
وَحَاقَ
और घेर लिया
بِـَٔالِ
(the) people
فِرْعَوْنَ
आले फ़िरऔन को
سُوٓءُ
बुरे
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब ने
अन्ततः जो चाल वे चल रहे थे, उसकी बुराइयों से अल्लाह ने उसे बचा लिया और फ़िरऔनियों को बुरी यातना ने आ घेरा;
तफ़्सीर:
अतः जब उन्होंने मूसा को मार डालने का निर्णय किया, तो अल्लाह ने उन्हें उनके षड्यंत्र से बचा लिया, और फ़िरऔनियों को डूबने की यातना ने घेर लिया। चुनांचे अल्लाह ने उसे और उसकी सारी सेनाओं को दुनिया में ही डूबोकर हलाक कर दिया।
आयत 46
ٱلنَّارُ يُعْرَضُونَ عَلَيْهَا غُدُوًّۭا وَعَشِيًّۭا ۖ وَيَوْمَ تَقُومُ ٱلسَّاعَةُ أَدْخِلُوٓا۟ ءَالَ فِرْعَوْنَ أَشَدَّ ٱلْعَذَابِ
ٱلنَّارُ
आग के
يُعْرَضُونَ
वो पेश किए जाते हैं
عَلَيْهَا
उस पर
غُدُوًّۭا
सुब्ह
وَعَشِيًّۭا ۖ
और शाम
وَيَوْمَ
और जिस दिन
تَقُومُ
क़ायम होगी
ٱلسَّاعَةُ
क़यामत
أَدْخِلُوٓا۟
(कहा जाएगा)कि दाख़िल करो
ءَالَ
(the) people
فِرْعَوْنَ
आले फ़िरऔन को
أَشَدَّ
शदीद तरीन
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब में
अर्थात आग ने; जिसके सामने वे प्रातःकाल और सायंकाल पेश किए जाते है। और जिन दिन क़ियामत की घड़ी घटित होगी (कहा जाएगा), "फ़िरऔन के लोगों को निकृष्ट तम यातना में प्रविष्टी कराओ!"
तफ़्सीर:
और वे, मरने के पश्चात अपनी क़ब्रों में प्रातः तथा संध्या अग्नी पर प्रस्तुत किए जाएँगे, तथा क़ियामत के दिन कहा जाएगाः फ़िरऔन के माननेवालों को कड़ी से कड़ी यातना में झोंक दो, क्योंकि वे काफ़िर , झुठलाने वाले तथा अल्लाह की राह से रोकने वाले थे।
आयत 47
وَإِذْ يَتَحَآجُّونَ فِى ٱلنَّارِ فَيَقُولُ ٱلضُّعَفَـٰٓؤُا۟ لِلَّذِينَ ٱسْتَكْبَرُوٓا۟ إِنَّا كُنَّا لَكُمْ تَبَعًۭا فَهَلْ أَنتُم مُّغْنُونَ عَنَّا نَصِيبًۭا مِّنَ ٱلنَّارِ
وَإِذْ
और जब
يَتَحَآجُّونَ
वो बाहम झाड़ेंगे
فِى
in
ٱلنَّارِ
आग में
فَيَقُولُ
तो कहेंगे
ٱلضُّعَفَـٰٓؤُا۟
कमज़ोर लोग
لِلَّذِينَ
उनसे जिन्होंने
ٱسْتَكْبَرُوٓا۟
तकब्बुर किया था
إِنَّا
बेशक हम
كُنَّا
थे हम
لَكُمْ
तुम्हारे
تَبَعًۭا
ताबेअ/ पैरवी करने वाले
فَهَلْ
तो क्या
أَنتُم
तुम
مُّغْنُونَ
दूर करने वाले हो
عَنَّا
हमसे
نَصِيبًۭا
कुछ हिस्सा
مِّنَ
of
ٱلنَّارِ
आग से
और सोचो जबकि वे आग के भीतर एक-दूसरे से झगड़ रहे होंगे, तो कमज़ोर लोग उन लोगों से, जो बड़े बनते थे, कहेंगे, "हम तो तुम्हारे पीछे चलनेवाले थे। अब क्या तुम हमपर से आग का कुछ भाग हटा सकते हो?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) उस समय को याद करें, जब जहन्नम में जाने के बाद अनुसरणकारी और उनके पेशवा आपस में झगड़ने लगेंगे। चुनांचे पीछे चलने वाले कमज़ोर लोग उन लोगों से कहेंगे, जो बड़े बने फिरते थे और जिनका वे अनुसरण किया करते थेः हम दुनिया में गुमराही में तुम्हारे अनुयायी थे, तो क्या तुम हमें अल्लाह की यातना के कुछ भाग से बचा सकते हो?
आयत 48
قَالَ ٱلَّذِينَ ٱسْتَكْبَرُوٓا۟ إِنَّا كُلٌّۭ فِيهَآ إِنَّ ٱللَّهَ قَدْ حَكَمَ بَيْنَ ٱلْعِبَادِ
قَالَ
कहेंगे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
ٱسْتَكْبَرُوٓا۟
तकब्बुर किया था
إِنَّا
बेशक हम
كُلٌّۭ
सब ही
فِيهَآ
उस में हैं
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
قَدْ
तहक़ीक़
حَكَمَ
फ़ैसला कर चुका है
بَيْنَ
दर्मियान
ٱلْعِبَادِ
बन्दों के
वे लोग, जो बड़े बनते थे, कहेंगे, "हममें से प्रत्येक इसी में पड़ा है। निश्चय ही अल्लाह बन्दों के बीच फ़ैसला कर चुका।"
तफ़्सीर:
बड़े बनने वाले पेशवा कहेंगेः हम सभी लोग, क्या पेशवा और क्या अनुसरणकारी, जहन्नम में हैं। हम में से कोई किसी की यातना बाँटकर नहीं ले सकता। अल्लाह ने बंदों के बीच निर्णय कर दिया है और जो जिसका हक़दार था, उसे वह बदला दे दिया है।
आयत 49
وَقَالَ ٱلَّذِينَ فِى ٱلنَّارِ لِخَزَنَةِ جَهَنَّمَ ٱدْعُوا۟ رَبَّكُمْ يُخَفِّفْ عَنَّا يَوْمًۭا مِّنَ ٱلْعَذَابِ
وَقَالَ
और कहेंगे
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
فِى
in
ٱلنَّارِ
आग में (होंगे)
لِخَزَنَةِ
दर्बानों से
جَهَنَّمَ
जहन्नम के
ٱدْعُوا۟
दुआ करो
رَبَّكُمْ
अपने रब से
يُخَفِّفْ
वो हल्का कर दे
عَنَّا
हमसे
يَوْمًۭا
एक दिन
مِّنَ
of
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब से
जो लोग आग में होंगे वे जहन्नम के प्रहरियों से कहेंगे कि "अपने रब को पुकारो कि वह हमपर से एक दिन यातना कुछ हल्की कर दे!"
तफ़्सीर:
और जहन्नम की यातना में पड़े हुए लोग, अनुसरणकारी हों या पेशवा, आग से निकलने की उम्मीदें टूटने और दुनिया के जीवन की ओर वापसी से निराश होने के बाद, हजन्नम में नियुक्त फ़रिश्तों से कहेंगेः अपने पालनहार से प्रार्थना करो कि हमसे एक दिन के लिए ही सही, इस हमेशा की यातना को हल्का कर दे।
आयत 50
قَالُوٓا۟ أَوَلَمْ تَكُ تَأْتِيكُمْ رُسُلُكُم بِٱلْبَيِّنَـٰتِ ۖ قَالُوا۟ بَلَىٰ ۚ قَالُوا۟ فَٱدْعُوا۟ ۗ وَمَا دُعَـٰٓؤُا۟ ٱلْكَـٰفِرِينَ إِلَّا فِى ضَلَـٰلٍ
قَالُوٓا۟
वो कहेंगे
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
تَكُ
थे
تَأْتِيكُمْ
आए तुम्हारे पास
رُسُلُكُم
रसूल तुम्हारे
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ ۖ
साथ वाज़ेह दलाइल के
قَالُوا۟
वो कहेंगे
بَلَىٰ ۚ
क्यों नहीं
قَالُوا۟
वो कहेंगे
فَٱدْعُوا۟ ۗ
पस तुम दुआ करो
وَمَا
और नहीं
دُعَـٰٓؤُا۟
दुआ
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों की
إِلَّا
मगर
فِى
in
ضَلَـٰلٍ
गुमराही में
वे कहेंगे, "क्या तुम्हारे पास तुम्हारे रसूल खुले प्रमाण लेकर नहीं आते रहे?" कहेंगे, "क्यों नहीं!" वे कहेंगे, "फिर तो तुम्ही पुकारो।" किन्तु इनकार करनेवालों की पुकार तो बस भटककर ही रह जाती है
तफ़्सीर:
जहन्नम के रक्षक काफ़िरों को उत्तर देते हुए कहेंगेः "क्या तुम्हारे पास, तुम्हारे रसूल, खुले प्रमाण लेकर नहीं आते रहे?" काफ़िर कहेंगेः "क्यों नहीं? वे हमारे पास खुले प्रमाण लेकर आया तो करते थे।" तो फ़रिश्ते काफ़िरों को फटकारते हुए कहेंगेः "तो तुम ही प्रार्थना करो। हम काफ़िरों की सिफ़ारिश नहीं करते।" दरअसल, काफ़िरों की प्रार्थना व्यर्थ ही जाएगी। क्योंकि उनके कुफ़्र के कारण वह क़बूल नहीं की जाएगी।
आज की ज़िंदगी में सबक़
फिरऔन की कौम के अंजाम का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि ज़ुल्म और सरकशी करने वाली कौमें आखिरकार अपने ही किए की सज़ा पाती हैं।
आयत 51
إِنَّا لَنَنصُرُ رُسُلَنَا وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا وَيَوْمَ يَقُومُ ٱلْأَشْهَـٰدُ
إِنَّا
बेशक हम
لَنَنصُرُ
अलबत्ता हम मदद करते हैं
رُسُلَنَا
अपने रसूलों की
وَٱلَّذِينَ
और उनकी जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हैं
فِى
in
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी में
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يَقُومُ
खड़े होंगे
ٱلْأَشْهَـٰدُ
गवाह
निश्चय ही हम अपने रसूलों की और उन लोगों की जो ईमान लाए अवश्य सहायता करते है, सांसारिक जीवन में भी और उस दिन भी, जबकि गवाह खड़े होंगे
तफ़्सीर:
निश्चय हम अपने रसूलों की तथा उन लोगों की जो अल्लाह अौर उसके रसूलों पर ईमान लाए, सहायता करते हैं; दुनिया उनके पक्ष को मज़बूत करके, दुश्मनों के विरुद्ध समर्थन देकर, क़ियामत के दिन उन्हें जन्नत में दाखिल करके और दुनिया में उनका विरोध करने वालों को जहन्नम में दाख़िल करके। यह सब कुछ उस समय होगा, जब नबियों, फ़रिश्तों और मोमिनों ने यह गवाही दे दी होगी कि उनके पास इस्लाम का संदेश आया था और उन्होंने उसे झुठला दिया था।
आयत 52
يَوْمَ لَا يَنفَعُ ٱلظَّـٰلِمِينَ مَعْذِرَتُهُمْ ۖ وَلَهُمُ ٱللَّعْنَةُ وَلَهُمْ سُوٓءُ ٱلدَّارِ
يَوْمَ
जिस दिन
لَا
not
يَنفَعُ
ना नफ़ा देगी
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों को
مَعْذِرَتُهُمْ ۖ
माज़रत उनकी
وَلَهُمُ
और उनके लिए है
ٱللَّعْنَةُ
लाअनत
وَلَهُمْ
और उनके लिए है
سُوٓءُ
बदतरीन
ٱلدَّارِ
घर
जिस दिन ज़ालिमों को उनका उज्र (सफ़ाई पेश करना) कुछ भी लाभ न पहुँचाएगा, बल्कि उनके लिए तो लानत है और उनके लिए बुरा घर है
तफ़्सीर:
जिस दिन, कुफ़्र तथा पाप के माध्यम से अपने ऊपर अत्याचार करने वालों को, उनके अत्याचार की सफ़ाई पेश करने से, कोई लाभ नहीं होगा। और उस दिन उन्हें अल्लाह की कृपा से धुतकार दिया जाएगा और उन्हीं के लिए आख़िरत में बुरा ठिकाना होगा, जहाँ वे दुखदायी यातना का सामना करेंगे।
आयत 53
وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْهُدَىٰ وَأَوْرَثْنَا بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ ٱلْكِتَـٰبَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
ءَاتَيْنَا
दी हमने
مُوسَى
मूसा को
ٱلْهُدَىٰ
हिदायत
وَأَوْرَثْنَا
और वारिस बनाया हमने
بَنِىٓ
(the) Children of Israel
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल को
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब का
मूसा को भी हम मार्ग दिखा चुके है, और इसराईल की सन्तान को हमने किताब का उत्ताराधिकारी बनाया,
तफ़्सीर:
और हमने मूसा (अलैहिस्सलाम) को वह ज्ञान दिया, जिसके ज़रिए बनी इसराईल सत्य का मार्ग प्राप्त करते थे। और तौरात को बनी इसराईल के हक में एक ऐसी किताब बना दी, जिसके वे नस्ल दर नस्ल वारिस बनते रहे।
आयत 54
هُدًۭى وَذِكْرَىٰ لِأُو۟لِى ٱلْأَلْبَـٰبِ
هُدًۭى
जो हिदायत
وَذِكْرَىٰ
और नसीहत थी
لِأُو۟لِى
for those
ٱلْأَلْبَـٰبِ
अक़्ल वालों के लिए
जो बुद्धि और समझवालों के लिए मार्गदर्शन और अनुस्मृति थी
तफ़्सीर:
जो सत्य का मार्ग दिखाती थी और सही समझ-बूझ रखने वालों के हक में शिक्षा सामग्री थी।
आयत 55
فَٱصْبِرْ إِنَّ وَعْدَ ٱللَّهِ حَقٌّۭ وَٱسْتَغْفِرْ لِذَنۢبِكَ وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ بِٱلْعَشِىِّ وَٱلْإِبْكَـٰرِ
فَٱصْبِرْ
पस सब्र कीजिए
إِنَّ
बेशक
وَعْدَ
वादा
ٱللَّهِ
अल्लाह का
حَقٌّۭ
सच्चा है
وَٱسْتَغْفِرْ
और बख़्शिश तलब कीजिए
لِذَنۢبِكَ
अपने गुनाह की
وَسَبِّحْ
और तस्बीह कीजिए
بِحَمْدِ
साथ हम्द के
رَبِّكَ
अपने रब की
بِٱلْعَشِىِّ
शाम के वक़्त
وَٱلْإِبْكَـٰرِ
और सुब्ह के वक़्त
अतः धैर्य से काम लो। निश्चय ही अल्लाह का वादा सच्चा है और अपने क़सूर की क्षमा चाहो और संध्या समय और प्रातः की घड़ियों में अपने रब की प्रशंसा की तसबीह करो
तफ़्सीर:
तो (ऐ रसूल!) आप अपनी जाति के झुठलाने और कष्ट देने पर सब्र करें। निश्चय अल्लाह ने आपको सहायता एवं समर्थन का जो वचन दिया है, वह सत्य है और उसमें कोई संदेह नहीं है। तथा अपने गुनाह की क्षमा याचना करें। और दिन के शुरू एवं अंत में अपने रब की प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता बयान करें।
आयत 56
إِنَّ ٱلَّذِينَ يُجَـٰدِلُونَ فِىٓ ءَايَـٰتِ ٱللَّهِ بِغَيْرِ سُلْطَـٰنٍ أَتَىٰهُمْ ۙ إِن فِى صُدُورِهِمْ إِلَّا كِبْرٌۭ مَّا هُم بِبَـٰلِغِيهِ ۚ فَٱسْتَعِذْ بِٱللَّهِ ۖ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْبَصِيرُ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يُجَـٰدِلُونَ
झगड़ते हैं
فِىٓ
concerning
ءَايَـٰتِ
आयात में
ٱللَّهِ
अल्लाह की
بِغَيْرِ
बग़ैर
سُلْطَـٰنٍ
किसी दलील के
أَتَىٰهُمْ ۙ
जो आई हो उनके पास
إِن
नहीं
فِى
(is) in
صُدُورِهِمْ
उनके सीनों में
إِلَّا
मगर
كِبْرٌۭ
बड़ाई
مَّا
नहीं
هُم
वो
بِبَـٰلِغِيهِ ۚ
पहुँचने वाले उसे
فَٱسْتَعِذْ
पस पनाह तलब कीजिए
بِٱللَّهِ ۖ
अल्लाह की
إِنَّهُۥ
बेशक वो
هُوَ
वो ही है
ٱلسَّمِيعُ
ख़ूब सुनने वाला
ٱلْبَصِيرُ
ख़ूब देखने वाला
जो लोग बिना किसी ऐसे प्रमाण के जो उनके पास आया हो अल्लाह की आयतों में झगड़ते है उनके सीनों में केवल अहंकार है जिसतक वे पहुँचनेवाले नहीं। अतः अल्लाह की शरण लो। निश्चय ही वह सुनता, देखता है
तफ़्सीर:
जो लोग अल्लाह की आयतों के बारे में उन्हें ग़लत साबित करने के प्रयास में, बिना किसी तर्क और प्रमाण के जो अल्लाह की ओर से उनके पास आई हो, झगड़ते हैं, उन्हें इसपर केवल सत्य पर अहंकारी और अभिमानी होने की इच्छा प्रेरित करती है। लेकिन वे सत्य पर ऊँचा और बड़ा बनने की जो इच्छा रखते हैं, उस तक हरगिज़ नहीं पहुँचेंगे। अतः (ऐ रसूल!) आप अल्लाह को मज़बूती से पकड़ लें। निःसंदेह वह अपने बंदों की बातों को सुनने वाला, उनके कर्मों को देखने वाला है। उनमें से कोई चीज़ उससे नहीं छूटती है और वह उन्हें उनपर बदला देगा।
आयत 57
لَخَلْقُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ أَكْبَرُ مِنْ خَلْقِ ٱلنَّاسِ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
لَخَلْقُ
यक़ीनन पैदा करना
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन का
أَكْبَرُ
ज़्यादा बड़ा है
مِنْ
than
خَلْقِ
पैदा करने से
ٱلنَّاسِ
इन्सानों के
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَ
अक्सर
ٱلنَّاسِ
लोग
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
निस्संदेह, आकाशों और धरती को पैदा करना लोगों को पैदा करने की अपेक्षा अधिक बड़ा (कठिन) काम है। किन्तु अधिकतर लोग नहीं जानते
तफ़्सीर:
निश्चय आकाशों तथा धरती को पैदा करना, उनकी विशालता और फैलाव के कारण, इनसान को पैदा करने से अधिक बड़ा काम है। अतः, जिसने उन दो विशाल वस्तुओं को पैदा किया, वह मुर्दों को, हिसाब-किताब और अच्छा-बुरा बदला देने के लिए, क़ब्रों से ज़िंदा करके उठाने की भी शक्ति रखता है। परन्तु, अधिकतर लोग ज्ञान ही नहीं रखते। जिसके कारण इससे सीख नहीं लेते और इसे दोबारा उठाने का प्रमाण नहीं समझते। हालाँकि यह बहुत ही स्पष्ट बात है।
आयत 58
وَمَا يَسْتَوِى ٱلْأَعْمَىٰ وَٱلْبَصِيرُ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَلَا ٱلْمُسِىٓءُ ۚ قَلِيلًۭا مَّا تَتَذَكَّرُونَ
وَمَا
और नहीं
يَسْتَوِى
बराबर हो सकते
ٱلْأَعْمَىٰ
अंधा
وَٱلْبَصِيرُ
और देखने वाला
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
وَلَا
और ना
ٱلْمُسِىٓءُ ۚ
बदकार
قَلِيلًۭا
कितना कम
مَّا
(is) what
تَتَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ते हो
अंधा और आँखोंवाला बराबर नहीं होते, और वे लोग भी परस्पर बराबर नहीं होते जिन्होंने ईमान लाकर अच्छे कर्म किए, और न बुरे कर्म करनेवाले ही परस्पर बराबर हो सकते है। तुम होश से काम थोड़े ही लेते हो!
तफ़्सीर:
तथा अंधा और आँखों वाला बराबर नहीं होते। और जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए और उसके रसूलों की पुष्टि की और अच्छे कार्य किए, वे उनके बराबर नहीं हो सकते, जो बुरे अक़ीदे और गुनाह में पड़कर बदअमली की राह पर चल पड़े हों। तुम बहुत कम ही सीख प्राप्त करते हो। क्योंकि, यदी सीख प्राप्त किए होते, तो दोनों गिरोहों के बीच अंतर से अवगत होते और उन लोगों में शामिल होते, जो अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए ईमान ले आए तथा अच्छे कर्म किए।
आयत 59
إِنَّ ٱلسَّاعَةَ لَـَٔاتِيَةٌۭ لَّا رَيْبَ فِيهَا وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يُؤْمِنُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلسَّاعَةَ
क़यामत
لَـَٔاتِيَةٌۭ
अलबत्ता आने वाली है
لَّا
no
رَيْبَ
नहीं कोई शक
فِيهَا
उसमें
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَ
अक्सर
ٱلنَّاسِ
लोग
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान रखते
निश्चय ही क़ियामत की घड़ी आनेवाली है, इसमें कोई सन्देह नहीं। किन्तु अधिकतर लोग मानते नही
तफ़्सीर:
निश्चय ही वह क़ियामत, जिसमें अल्लाह मुर्दों को हिसाब-किताब तथा प्रतिकार के लिए जीवित करके उठाएगा, आने वाली है। उसमें कोई शंका या संदेह नहीं। परन्तु, अधिकतर लोग उसके आने पर ईमान (विश्वास) नहीं रखते। इसी कारण उसके लिए तैयारी नहीं करते।
आयत 60
وَقَالَ رَبُّكُمُ ٱدْعُونِىٓ أَسْتَجِبْ لَكُمْ ۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِى سَيَدْخُلُونَ جَهَنَّمَ دَاخِرِينَ
وَقَالَ
और कहा
رَبُّكُمُ
तुम्हारे रब ने
ٱدْعُونِىٓ
दुआ करो मुझसे
أَسْتَجِبْ
मैं क़ुबूल करूँगा
لَكُمْ ۚ
तुम्हारे लिए
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَسْتَكْبِرُونَ
तकब्बुर करते है
عَنْ
to
عِبَادَتِى
मेरी इबादत से
سَيَدْخُلُونَ
अनक़रीब वो दाख़िल होंगे
جَهَنَّمَ
जहन्नम में
دَاخِرِينَ
ज़लील व ख़्वार हो कर
तुम्हारे रब ने कहा कि "तुम मुझे पुकारो, मैं तुम्हारी प्रार्थनाएँ स्वीकार करूँगा।" जो लोग मेरी बन्दगी के मामले में घमंड से काम लेते है निश्चय ही वे शीघ्र ही अपमानित होकर जहन्नम में प्रवेश करेंगे
तफ़्सीर:
और (ऐ लोगो) तुम्हारे पालनहार ने कहा है कि केवल मेरी ही वंदना करो और मुझ ही से माँगो। मैं तुम्हारी पुकार का जवाब दूँगा और तुम्हें क्षमा कर दूँगा तथा तुम पर दया करुँगा। अवश्य जो लोग अकेले मेरी इबादत (प्रार्थना) से अभिमान करेंगे, वे क़ियामत के दिन अपमानित एवं ज़लील होकर जहन्नम में दाख़िल होंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दुआ की ताकीद और अल्लाह के वादे का ज़िक्र है कि वह दुआ सुनता है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह से दुआ मांगते रहना चाहिए, वह ज़रूर सुनता है, बस सब्र और यकीन के साथ मांगना चाहिए।
आयत 61
ٱللَّهُ ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُمُ ٱلَّيْلَ لِتَسْكُنُوا۟ فِيهِ وَٱلنَّهَارَ مُبْصِرًا ۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى ٱلنَّاسِ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَ ٱلنَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّذِى
वो है जिसने
جَعَلَ
बनाया
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلَّيْلَ
रात को
لِتَسْكُنُوا۟
ताकि तुम सुकून पाओ
فِيهِ
उसमें
وَٱلنَّهَارَ
और दिन को
مُبْصِرًا ۚ
रौशन
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَذُو
(is) Full (of) Bounty
فَضْلٍ
अलबत्ता फ़ज़ल वाला है
عَلَى
to
ٱلنَّاسِ
लोगों पर
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَ
अक्सर
ٱلنَّاسِ
लोग
لَا
(do) not
يَشْكُرُونَ
नहीं वो शुक्र करते
अल्लाह ही है जिसने तुम्हारे लिए रात (अंधकारमय) बनाई, तुम उसमें शान्ति प्राप्त करो औऱ दिन को प्रकाशमान बनाया (ताकि उसमें दौड़-धूप करो) । निस्संदेह अल्लाह लोगों के लिए बड़ा उदार अनुग्रहवाला हैं, किन्तु अधिकतर लोग कृतज्ञता नहीं दिखाते
तफ़्सीर:
अल्लाह ही ने तुम्हारे लिए रात्रि को अंधकारमय बनाया, ताकि तुम उसमें विश्राम कर सको, तथा दिन को प्रकाशमान बनाया, ताकि उसमें काम कर सको। निश्चय अल्लाह लोगों पर बड़ा अनुग्रहशील है कि उन्हें अपनी प्रकट एवं गुप्त नेमतों से नवाज़ा। किन्तु, अधिकतर लोग उसकी नेमतों का शुक्र अदा नहीं करते।
आयत 62
ذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ رَبُّكُمْ خَـٰلِقُ كُلِّ شَىْءٍۢ لَّآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ فَأَنَّىٰ تُؤْفَكُونَ
ذَٰلِكُمُ
ये है
ٱللَّهُ
अल्लाह
رَبُّكُمْ
रब तुम्हारा
خَـٰلِقُ
पैदा करने वाला
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ का
لَّآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़ )
إِلَّا
मगर
هُوَ ۖ
वो ही
فَأَنَّىٰ
तो क्हाँ से
تُؤْفَكُونَ
तुम फेरे जाते हो
वह है अल्लाह, तुम्हारा रब, हर चीज़ का पैदा करनेवाला! उसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं। फिर तुम कहाँ उलटे फिरे जा रहे हो?
तफ़्सीर:
यही अल्लाह, जिसने अपनी नेमतों के साथ तुमपर उपकार किया है, वही हर चीज़ का पैदा करने वाला है। अतः उसके अलावा कोई दूसरा पैदा करने वाला नहीं है, और उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। फिर तुम उसकी इबादत छोड़कर उसके अलावा ऐसी चीज़ की इबादत की ओर कैसे फिरे जाते हो, जो किसी लाभ या हानि का मालिक नहीं है।
आयत 63
كَذَٰلِكَ يُؤْفَكُ ٱلَّذِينَ كَانُوا۟ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ يَجْحَدُونَ
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يُؤْفَكُ
फेरे जाते हैं
ٱلَّذِينَ
वो जो
كَانُوا۟
हैं वो
بِـَٔايَـٰتِ
आयात से
ٱللَّهِ
अल्लाह की
يَجْحَدُونَ
वो इन्कार करते
इसी प्रकार वे भी उलटे फिरे जाते थे जो अल्लाह की निशानियों का इनकार करते थे
तफ़्सीर:
जिस प्रकार यह लोग एक अल्लाह पर ईमान तथा केवल उसी की इबादत से फेर दिए गए, उसी प्रकार वह लोग भी हर युग तथा हर स्थान में बहकाए जाएँगे, जो अल्लाह के एकत्व की निशानियों का इनकार करेंगे। फिर वे सत्य मार्ग तक पहुँच नहीं पाएँगे और उन्हें सही रास्ते पर चलने की शक्ति भी नहीं दी जाएगी।
आयत 64
ٱللَّهُ ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُمُ ٱلْأَرْضَ قَرَارًۭا وَٱلسَّمَآءَ بِنَآءًۭ وَصَوَّرَكُمْ فَأَحْسَنَ صُوَرَكُمْ وَرَزَقَكُم مِّنَ ٱلطَّيِّبَـٰتِ ۚ ذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ رَبُّكُمْ ۖ فَتَبَارَكَ ٱللَّهُ رَبُّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّذِى
वो है जिसने
جَعَلَ
बनाया
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
قَرَارًۭا
क़रार गाह
وَٱلسَّمَآءَ
और आसमान को
بِنَآءًۭ
छत
وَصَوَّرَكُمْ
और उसने सूरतें बनाईं तुम्हारी
فَأَحْسَنَ
तो उसने अच्छी बनाईं
صُوَرَكُمْ
सूरतें तुम्हारी
وَرَزَقَكُم
और उसने रिज़्क़ दिया तुम्हें
مِّنَ
of
ٱلطَّيِّبَـٰتِ ۚ
पाकीज़ा चीज़ों से
ذَٰلِكُمُ
ये है
ٱللَّهُ
अल्लाह
رَبُّكُمْ ۖ
रब तुम्हारा
فَتَبَارَكَ
पस बाबरकत है
ٱللَّهُ
अल्लाह
رَبُّ
जो रब है
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों का
अल्लाह ही है जिसने तुम्हारे लिए धरती को ठहरने का स्थान बनाया और आकाश को एक भवन के रूप में बनाया, और तुम्हें रूप दिए तो क्या ही अच्छे रूप दिए, और तुम्हें अच्छी पाक चीज़ों की रोज़ी दी। वह है अल्लाह, तुम्हारा रब। तो बड़ी बरकतवाला है अल्लाह, सारे संसार का रब
तफ़्सीर:
अल्लाह ही है, जिसने धरती को (ऐ लोगो!) तुम्हारे रहने योग्य बनाया और तुम्हारे ऊपर आसमान को मज़बूत संरचना वाला बनाया, जो गिरने से सुरक्षित है। और उसने तुम्हें तुम्हारी माताओं के गर्भ में चित्रित किया, तो तुम्हारे अच्छे रूप बनाए। तथा तुम्हें हलाल और अच्छी चीज़ों से जीविका प्रदान की। जिस अस्तित्व ने तुम्हें इन नेमतों से अनुगृहीत किया है, वही अल्लाह तुम्हारा पालनहार है। अतः सभी प्राणियों का पालनहार अल्लाह बहुत बरकत वाला है। इसलिए उस महिमावान के सिवा उनका कोई पालनहार नहीं है।
आयत 65
هُوَ ٱلْحَىُّ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ فَٱدْعُوهُ مُخْلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ ۗ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
هُوَ
वो
ٱلْحَىُّ
ज़िन्दा है
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ
वो ही
فَٱدْعُوهُ
पस पुकारो उसे
مُخْلِصِينَ
ख़ालिस करने वाले हो कर
لَهُ
उसी के लिए
ٱلدِّينَ ۗ
दीन को
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए है
رَبِّ
जो रब है
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों का
वह जीवन्त है। उसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं। अतः उसी को पुकारो, धर्म को उसी के लिए विशुद्ध करके। सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है, जो सारे संसार का रब है
तफ़्सीर:
वह जीवित है, जो मरेगा नहीं। उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। अतः, उसी को, उसकी प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए, पुकारो; इबादत के रूप में भी और फ़रियाद के तौर भी। उसके साथ किसी मखलूक़ को शरीक न करो। सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जो सारी सृष्टियों का पालनहार है।
आयत 66
۞ قُلْ إِنِّى نُهِيتُ أَنْ أَعْبُدَ ٱلَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ لَمَّا جَآءَنِىَ ٱلْبَيِّنَـٰتُ مِن رَّبِّى وَأُمِرْتُ أَنْ أُسْلِمَ لِرَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
۞ قُلْ
कह दीजिए
إِنِّى
बेशक मैं
نُهِيتُ
रोका गया हूँ मैं
أَنْ
कि
أَعْبُدَ
मैं इबादत करूँ
ٱلَّذِينَ
उनकी जिन्हें
تَدْعُونَ
तुम पुकारते हो
مِن
besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
لَمَّا
जबकि
جَآءَنِىَ
आ गईं मेरे पास
ٱلْبَيِّنَـٰتُ
वाज़ेह निशानियाँ
مِن
from
رَّبِّى
मेरे रब की तरफ़ से
وَأُمِرْتُ
और हुक्म दिया गया है मुझे
أَنْ
कि
أُسْلِمَ
मैं फ़रमाबरदार हो जाऊँ
لِرَبِّ
रब के लिए
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों के
कह दो, "मुझे इससे रोक दिया गया है कि मैं उनकी बन्दगी करूँ जिन्हें अल्लाह से हटकर पुकारते हो, जबकि मेरे पास मेरे रब की ओर से खुले प्रमाण आ चुके है। मुझे तो हुक्म हुआ है कि मैं सारे संसार के रब के आगे नतमस्तक हो जाऊँ।" -
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप कह देंः निश्चय मुझे मेरे अल्लाह ने इस बात से मना किया है कि उन मूर्तियों की वंदना करूँ, जिनकी वंदना में तुम लगे हो, जो न नुकसान पहुँचा सकती हैं न लाभ, जबकि मेरे पास इस बात के प्रमाण आ चुके हैं कि उनकी वंदना ग़लत है। और अल्लाह ने मुझे आदेश दिया है कि मैं इबादत के माध्यम से केवल उसीके आगे झुकूँ, क्योंकि वही सारी सृष्टियों का पालनहार है। उनका उसके सिवा कोई पालनहार नहीं है।
आयत 67
هُوَ ٱلَّذِى خَلَقَكُم مِّن تُرَابٍۢ ثُمَّ مِن نُّطْفَةٍۢ ثُمَّ مِنْ عَلَقَةٍۢ ثُمَّ يُخْرِجُكُمْ طِفْلًۭا ثُمَّ لِتَبْلُغُوٓا۟ أَشُدَّكُمْ ثُمَّ لِتَكُونُوا۟ شُيُوخًۭا ۚ وَمِنكُم مَّن يُتَوَفَّىٰ مِن قَبْلُ ۖ وَلِتَبْلُغُوٓا۟ أَجَلًۭا مُّسَمًّۭى وَلَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
هُوَ
वो
ٱلَّذِى
वो ही है जिसने
خَلَقَكُم
पैदा किया तुम्हें
مِّن
from
تُرَابٍۢ
मिट्टी से
ثُمَّ
फिर
مِن
from
نُّطْفَةٍۢ
नुत्फ़े से
ثُمَّ
फिर
مِنْ
from
عَلَقَةٍۢ
जमे हुए ख़ून से
ثُمَّ
फिर
يُخْرِجُكُمْ
वो निकालता है तुम्हें
طِفْلًۭا
बच्चा (बनाकर)
ثُمَّ
फिर
لِتَبْلُغُوٓا۟
ताकि तुम पहुँच जाओ
أَشُدَّكُمْ
अपनी जवानी को
ثُمَّ
फिर
لِتَكُونُوا۟
ताकि तुम हो जाओ
شُيُوخًۭا ۚ
बूढ़े
وَمِنكُم
और तुम में से
مَّن
कोई है जो
يُتَوَفَّىٰ
फ़ौत कर दिया जाता है
مِن
before
قَبْلُ ۖ
उससे पहले
وَلِتَبْلُغُوٓا۟
और ताकि तुम पहुँचो
أَجَلًۭا
एक वक़्त को
مُّسَمًّۭى
मुक़र्रर
وَلَعَلَّكُمْ
और ताकि तुम
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल से काम लो
वही है जिसने तुम्हें मिट्टी से पैदा, फिर वीर्य से, फिर रक्त के लोथड़े से; फिर वह तुम्हें एक बच्चे के रूप में निकालता है, फिर (तुम्हें बढ़ाता है) ताकि अपनी प्रौढ़ता को प्राप्ति हो, फिर मुहलत देता है कि तुम बुढापे को पहुँचो - यद्यपि तुममें से कोई इससे पहले भी उठा लिया जाता है - और यह इसलिए करता है कि तुम एक नियत अवधि तक पहुँच जाओ और ऐसा इसलिए है कि तुम समझो
तफ़्सीर:
वही है, जिसने तुमहारे बाप आदम (अलैहिस्सलाम) को मिट्टी से पैदा किया। फ़िर उसके पश्चात तम्हें वीर्य से पैदा किया। फ़िर वीर्य के बाद जमे हुए रक्त से। फिर वह तुम्हें तुम्हारी माओं के गर्भाशयों से शिशु बनाकर निकालता है। फिर तुम्हें बड़े करता है, ताकि तुम शारीरिक रूप से मज़बूती की आयु तक पहुँच जाओ। फिर तुम बूढ़े हो जाओ। और तुममें से कोई तो इससे पहले ही मर जाता है। यह इसलिए होता है, ताकि तुम उस आयु तक पहुँच जाओ, जो अल्लाह के ज्ञान में निर्धारित है, न तुम उसे घटा सकते हो न बढ़ा सकते हो। और ताकि तुम इन प्रमाणों और दलीलों से अल्लाह की शक्ति और उसके एकत्व का पता लगा सको।
आयत 68
هُوَ ٱلَّذِى يُحْىِۦ وَيُمِيتُ ۖ فَإِذَا قَضَىٰٓ أَمْرًۭا فَإِنَّمَا يَقُولُ لَهُۥ كُن فَيَكُونُ
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِى
जो
يُحْىِۦ
ज़िन्दा करता है
وَيُمِيتُ ۖ
और वो मौत देता है
فَإِذَا
फिर जब
قَضَىٰٓ
वो फ़ैसला करता है
أَمْرًۭا
किसी काम का
فَإِنَّمَا
तो बेशक
يَقُولُ
वो कहता है
لَهُۥ
उसे
كُن
हो जा
فَيَكُونُ
तो वो हो जाता है
वही है जो जीवन और मृत्यु देता है, और जब वह किसी काम का फ़ैसला करता है, तो उसके लिए बस कह देता है कि 'हो जा' तो वह हो जाता है
तफ़्सीर:
वही अल्लाह है जिसके हाथ में जीवित करने की शक्ति है, और उसीके हाथ में मारने की शक्ति है। अतः जब किसी कार्य का निर्णय करता है, तो उसके लिए कहता है कि 'हो जा' और वह हो जाता है।
आयत 69
أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ يُجَـٰدِلُونَ فِىٓ ءَايَـٰتِ ٱللَّهِ أَنَّىٰ يُصْرَفُونَ
أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
إِلَى
[to]
ٱلَّذِينَ
तरफ़ उनके जो
يُجَـٰدِلُونَ
झगड़ते हैं
فِىٓ
concerning
ءَايَـٰتِ
आयात में
ٱللَّهِ
अल्लाह की
أَنَّىٰ
कहाँ से
يُصْرَفُونَ
वो फेरे जाते हैं
क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जो अल्लाह की आयतों के बारे में झगड़ते है, वे कहाँ फिरे जाते हैं?
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) क्या आपने उन लोगों को नहीं देखा, जो अल्लाह की स्पष्ट आयतों के बारे में, उन्हें झुठलाने के उद्देश्य से, झगड़ते हैं, ताकि उनके हाल पर आश्चर्य करें, जो सत्य के स्पष्ट होने के बावजूद उससे मुँह मोड़े हुए हैं?!
आयत 70
ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِٱلْكِتَـٰبِ وَبِمَآ أَرْسَلْنَا بِهِۦ رُسُلَنَا ۖ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِٱلْكِتَـٰبِ
किताब को
وَبِمَآ
और उसे जो
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
بِهِۦ
साथ उसके
رُسُلَنَا ۖ
अपने रसूलों को
فَسَوْفَ
तो अनक़रीब
يَعْلَمُونَ
वो जान लेंगे
जिन लोगों ने किताब को झुठलाया और उसे भी जिसके साथ हमने अपने रसूलों को भेजा था। तो शीघ्र ही उन्हें मालूम हो जाएगा
तफ़्सीर:
जिन्होंने क़ुरआन को तथा उस सत्य को झुठला दिया, जिसके साथ हमने अपने रसूलों को भेजा था, तो शीघ्र ही इन झुठलाने वालों को अपने झुठलाने का परिणाम पता चल जाएगा और वे अपने बुरे अंत को देख लेंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह की नेमतों (दिन-रात) का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि दिन को काम के लिए और रात को आराम के लिए बनाना अल्लाह की बड़ी हिकमत और नेमत है।
आयत 71
إِذِ ٱلْأَغْلَـٰلُ فِىٓ أَعْنَـٰقِهِمْ وَٱلسَّلَـٰسِلُ يُسْحَبُونَ
إِذِ
जब
ٱلْأَغْلَـٰلُ
तौक़ होंगे
فِىٓ
(will be) around
أَعْنَـٰقِهِمْ
उनकी गर्दनों में
وَٱلسَّلَـٰسِلُ
और ज़नजीरें होंगी
يُسْحَبُونَ
वो घसीटे जाऐंगे
जबकि तौक़ उनकी गरदनों में होंगे और ज़ंजीरें (उनके पैरों में)
तफ़्सीर:
उन्हें इसके परिणाम का ज्ञान उस समय होगा, जब तौक़ उनकी गरदनों में होंगे तथा बेड़ियाँ उनके पैरों में होंगी। यातना के फ़रिश्ते उन्हें घसीटकर ले जा रहे होंगे।
आयत 72
فِى ٱلْحَمِيمِ ثُمَّ فِى ٱلنَّارِ يُسْجَرُونَ
فِى
In
ٱلْحَمِيمِ
खौलते पानी में
ثُمَّ
फिर
فِى
in
ٱلنَّارِ
आग में
يُسْجَرُونَ
वो झोंके जाऐंगे
वे खौलते हुए पानी में घसीटे जाएँगे, फिर आग में झोंक दिए जाएँगे
तफ़्सीर:
उन्हें सख़्त गर्म और खौलते पानी में घसीटा जाएगा। फ़िर आग में, जलने के लिए डाल दिया जाएगा।
आयत 73
ثُمَّ قِيلَ لَهُمْ أَيْنَ مَا كُنتُمْ تُشْرِكُونَ
ثُمَّ
फिर
قِيلَ
कहा जाएगा
لَهُمْ
उन्हें
أَيْنَ
कहाँ हैं
مَا
वो जिन्हें
كُنتُمْ
थे तुम
تُشْرِكُونَ
तुम शरीक ठहराते
फिर उनसे कहा जाएगा, "कहाँ है वे जिन्हें प्रभुत्व में साझी ठहराकर तुम अल्लाह के सिवा पूजते थे?"
तफ़्सीर:
उन्हें डाँट पिलाते हुए कहा जाएगाः कहाँ हैं तुम्हारे वह तथाकथित पुज्य, जन्हें तुम अल्लाह का साझी बनाकर उनकी वंदना करते थे?!
आयत 74
مِن دُونِ ٱللَّهِ ۖ قَالُوا۟ ضَلُّوا۟ عَنَّا بَل لَّمْ نَكُن نَّدْعُوا۟ مِن قَبْلُ شَيْـًۭٔا ۚ كَذَٰلِكَ يُضِلُّ ٱللَّهُ ٱلْكَـٰفِرِينَ
مِن
Other than
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह के
قَالُوا۟
वो कहेंगे
ضَلُّوا۟
वो गुम हो गए
عَنَّا
हमसे
بَل
बल्कि
لَّمْ
ना
نَكُن
थे हम
نَّدْعُوا۟
हम पुकारते
مِن
before
قَبْلُ
इससे पहले
شَيْـًۭٔا ۚ
किसी भी चीज़ को
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يُضِلُّ
भटकाता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों को
वे कहेंगे, "वे हमसे गुम होकर रह गए, बल्कि हम इससे पहले किसी चीज़ को नहीं पुकारते थे।" इसी प्रकार अल्लाह इनकार करनेवालों को भटकता छोड़ देता है
तफ़्सीर:
अल्लाह के सिवा तुम्हारी वह मूर्तियाँ, जो न कोई लाभ पहुँचा सकती हैं, न कोई हानि? काफ़िर कहेंगेः "वे हम से खो गए हैं। अतः वे हमें नज़र नहीं आ रहे। बल्कि, हम सांसार में किसी ऐसी वस्तु की वंदना नहीं करते थे, जो सही मायने में वंदनीय हो।" इसी प्रकार, अल्लाह काफ़िरों को, प्रत्येक युग तथा प्रत्येक स्थान में सत्य से गुमराह कर देता है।
आयत 75
ذَٰلِكُم بِمَا كُنتُمْ تَفْرَحُونَ فِى ٱلْأَرْضِ بِغَيْرِ ٱلْحَقِّ وَبِمَا كُنتُمْ تَمْرَحُونَ
ذَٰلِكُم
ये तुम्हारा (अंजाम)
بِمَا
बवजह उसके जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَفْرَحُونَ
तुम ख़ुश होते
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
بِغَيْرِ
बग़ैर
ٱلْحَقِّ
हक़ के
وَبِمَا
और बवजह उसके जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَمْرَحُونَ
तुम इतराते
"यह इसलिए कि तुम धरती में नाहक़ मग्न थे और इसलिए कि तुम इतराते रहे हो
तफ़्सीर:
और उनसे कहा जाएगा कि जो यातना तुम झेल रहे हो, उसका कारण तुम्हारा अपना शिर्क की दुनिया में मग्न रहना और इताराना है।
आयत 76
ٱدْخُلُوٓا۟ أَبْوَٰبَ جَهَنَّمَ خَـٰلِدِينَ فِيهَا ۖ فَبِئْسَ مَثْوَى ٱلْمُتَكَبِّرِينَ
ٱدْخُلُوٓا۟
दाख़िल हो जाओ
أَبْوَٰبَ
दरवाज़ों में
جَهَنَّمَ
जहन्नम के
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले
فِيهَا ۖ
उसमें
فَبِئْسَ
तो कितना बुरा है
مَثْوَى
ठिकाना
ٱلْمُتَكَبِّرِينَ
तकब्बुर करने वालों का
प्रवेश करो जहन्नम के द्वारों में, उसमे सदैव रहने के लिए।" अतः बहुत ही बुरा ठिकाना है अहंकारियों का!
तफ़्सीर:
तो जहन्नम के द्वारों में प्रवेश कर जाओ। उसमें सदावासी रहोगे। अतः क्या ही बुरा है सत्य से अभिमान करने वालों का ठिकाना!
आयत 77
فَٱصْبِرْ إِنَّ وَعْدَ ٱللَّهِ حَقٌّۭ ۚ فَإِمَّا نُرِيَنَّكَ بَعْضَ ٱلَّذِى نَعِدُهُمْ أَوْ نَتَوَفَّيَنَّكَ فَإِلَيْنَا يُرْجَعُونَ
فَٱصْبِرْ
पस सब्र कीजिए
إِنَّ
बेशक
وَعْدَ
वादा
ٱللَّهِ
अल्लाह का
حَقٌّۭ ۚ
सच्चा है
فَإِمَّا
फिर अगर
نُرِيَنَّكَ
हम दिखाऐं आपको
بَعْضَ
बाज़
ٱلَّذِى
वो चीज़ जो
نَعِدُهُمْ
हम वादा करते हैं उनसे
أَوْ
या
نَتَوَفَّيَنَّكَ
हम फ़ौत कर दें आपको
فَإِلَيْنَا
तो तरफ़ हमारे ही
يُرْجَعُونَ
वो लौटाए जाऐंगे
अतः धैर्य से काम लो। निश्चय ही अल्लाह का वादा सच्चा है। तो जिस चीज़ की हम उन्हें धमकी दे रहे है उसमें से कुछ यदि हम तुम्हें दिखा दें या हम तुम्हे उठा लें, हर हाल में उन्हें लौटना तो हमारी ही ओर है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप अपनी जाति के आत्याचार एवं झुठलाने पर धैर्य रखें। अल्लाह का यह वचन कि वह आपकी सहायता करेगा सत्य है, इसमें कोई संदेह नहीं। अगर हम आपको, आपके जीवनकाल ही में उस यातना का कुछ भाग दिखा दें, जिसका वचन हम उन्हें दे रहे हैं, जैसा कि बद्र के दिन हुआ, या उससे पहले ही आपको उठा लें, हर हाल में उन्हें हमारी ओर लौटकर आना है और हम उन्हें उनके कर्मों का बदला भी देंगे तथा जहन्नम में दाख़िल करेंगे, जहाँ उन्हें हमेशा रहना पड़ेगा।
आयत 78
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا رُسُلًۭا مِّن قَبْلِكَ مِنْهُم مَّن قَصَصْنَا عَلَيْكَ وَمِنْهُم مَّن لَّمْ نَقْصُصْ عَلَيْكَ ۗ وَمَا كَانَ لِرَسُولٍ أَن يَأْتِىَ بِـَٔايَةٍ إِلَّا بِإِذْنِ ٱللَّهِ ۚ فَإِذَا جَآءَ أَمْرُ ٱللَّهِ قُضِىَ بِٱلْحَقِّ وَخَسِرَ هُنَالِكَ ٱلْمُبْطِلُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَرْسَلْنَا
भेजे हमने
رُسُلًۭا
कई रसूल
مِّن
before you
قَبْلِكَ
आपसे पहले
مِنْهُم
उनमें से बाज वो हैं
مَّن
जिन्हें
قَصَصْنَا
बयान किया हमने
عَلَيْكَ
आप पर
وَمِنْهُم
और उनमें से बाज़ वो हैं
مَّن
जिन्हें
لَّمْ
नहीं
نَقْصُصْ
हमने बयान किया
عَلَيْكَ ۗ
आप पर
وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
لِرَسُولٍ
किसी रसूल के लिए
أَن
कि
يَأْتِىَ
वो ले आए
بِـَٔايَةٍ
कोई निशानी
إِلَّا
मगर
بِإِذْنِ
by (the) permission
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के इज़्न से
فَإِذَا
फिर जब
جَآءَ
आ गया
أَمْرُ
हुक्म
ٱللَّهِ
अल्लाह का
قُضِىَ
फ़ैसला कर दिया गया
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
وَخَسِرَ
और ख़सारे में पड़ गए
هُنَالِكَ
उस वक़्त
ٱلْمُبْطِلُونَ
अहले बातिल
हम तुमसे पहले कितने ही रसूल भेज चुके है। उनमें से कुछ तो वे है जिनके वृत्तान्त का उल्लेख हमने तुमसे किया है और उनमें ऐसे भी है जिनके वृत्तान्त का उल्लेख हमने तुमसे नहीं किया। किसी रसूल को भी यह सामर्थ्य प्राप्त न थी कि वह अल्लाह की अनुज्ञा के बिना कोई निशानी ले आए। फिर जब अल्लाह का आदेश आ जाता है तो ठीक-ठीक फ़ैसला कर दिया जाता है। और उस समय झूठवाले घाटे में पड़ जाते है
तफ़्सीर:
और हमने (ऐ रसूल!) आपसे पूर्व बहुत-से रसूलों को उनके समुदायों की ओर भेजा। पर उन्होंने रसूलों को झुठलाया और उन्हें कष्ट पहुँचाया। लेकिन उन्होंने उनके झुठलाने और कष्ट पहुँचाने पर धैर्य से काम लिया। इन रसूलों में से कुछ के समाचार तो हमने आपको बता दिए और उनमें से कुछ के समाचार हमने आपको नहीं बताए। तथा किसी रसूल के वश में यह नहीं है कि वह अपने पालनहार की ओर से उसकी इच्छा के बिना अपनी जाति के पास कोई चमत्कार ले आए। अतः काफ़िरों का अपने रसूलों को निशानियाँ (चमत्कार) लाने का सुझाव देना अन्याय है। फिर जब रसूलों और उनकी जातियों के बीच निर्णय करने का अल्लाह का आदेश आ गया, तो उनके बीच न्याय के साथ निर्णय कर दिया गया। चुनाँचे काफ़िरों को विनष्ट कर दिया गया और रसूलों को बचा लिया गया। और - बंदों के बीच निर्णय किए जाने की उस स्थिति में - झूठे लोगों ने, अपने कुफ़्र के कारण खुद को विनाश में डालकर, अपना घाटा कर लिया।
आयत 79
ٱللَّهُ ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُمُ ٱلْأَنْعَـٰمَ لِتَرْكَبُوا۟ مِنْهَا وَمِنْهَا تَأْكُلُونَ
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّذِى
वो है जिसने
جَعَلَ
बनाए
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْأَنْعَـٰمَ
मवेशी
لِتَرْكَبُوا۟
ताकि तुम सवारी करो
مِنْهَا
उनमें से बाज़ पर
وَمِنْهَا
और उनमें से कुछ
تَأْكُلُونَ
तुम खाते हो
अल्लाह ही है जिसने तुम्हारे लिए चौपाए बनाए ताकि उनमें से कुछ पर तुम सवारी करो और उनमें से कुछ को तुम खाते भी हो
तफ़्सीर:
अल्लाह ही है, जिसने तुम्हारे लिए ऊँट, गाय तथा बकरियाँ पैदा कीं, ताकि उनमें कुछ पर तुम सवारी करो और कुछ के मांस खाओ।
आयत 80
وَلَكُمْ فِيهَا مَنَـٰفِعُ وَلِتَبْلُغُوا۟ عَلَيْهَا حَاجَةًۭ فِى صُدُورِكُمْ وَعَلَيْهَا وَعَلَى ٱلْفُلْكِ تُحْمَلُونَ
وَلَكُمْ
और तुम्हारे लिए
فِيهَا
उनमें
مَنَـٰفِعُ
फ़ायदे हैं
وَلِتَبْلُغُوا۟
और ताकि तुम पहुँचो
عَلَيْهَا
उन पर
حَاجَةًۭ
हाजत को
فِى
(that is) in
صُدُورِكُمْ
जो तुम्हारे सीनों में है
وَعَلَيْهَا
और उन पर
وَعَلَى
and upon
ٱلْفُلْكِ
और कश्तियों पर
تُحْمَلُونَ
तुम सवार किए जाते हो
उनमें तुम्हारे लिए और भी फ़ायदे है - और ताकि उनके द्वारा तुम उस आवश्यकता की पूर्ति कर सको जो तुम्हारे सीनों में हो, और उनपर भी और नौकाओं पर भी सवार होते हो
तफ़्सीर:
तथा तुम्हारे लिए इन प्राणियों में अनेक प्रकार के लाभ हैं, जो प्रत्येक युग में नवीनीकृत होते रहते हैं, तथा उनके माध्यम से तुम्हारे मन की वे आवश्यकताएँ पूरी होती हैं, जो तुम चाहते हो, जिनमें से सबसे प्रमुख भूमि और समुद्र में एक जगह से दूसरी जगह जाना है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दोज़खियों की पछतावे भरी बातचीत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि आखिरत में पछताने से पहले दुनिया में ही सुधरने की कोशिश करनी चाहिए।
आयत 81
وَيُرِيكُمْ ءَايَـٰتِهِۦ فَأَىَّ ءَايَـٰتِ ٱللَّهِ تُنكِرُونَ
وَيُرِيكُمْ
और वो दिखाता है तुम्हें
ءَايَـٰتِهِۦ
निशानियाँ अपनी
فَأَىَّ
पस कौन सी
ءَايَـٰتِ
(of the) Signs
ٱللَّهِ
अल्लाह की निशानियों का
تُنكِرُونَ
तुम इन्कार करोगे
और वह तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाता है। आख़िर तुम अल्लाह की कौन-सी निशानी को नहीं पहचानते?
तफ़्सीर:
वह पवित्र हस्ती तुम्हें अपनी क्षमता तथा एकत्व के प्रमाण दिखाता रहता है, तो तुम उसकी कौन-कौन-सी निशानियों से नज़र बचाकर चलोगे, जब तुम्हारे सामने उनका अल्लाह की निशानी होना स्पष्ट हो जाए?
आयत 82
أَفَلَمْ يَسِيرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ فَيَنظُرُوا۟ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ كَانُوٓا۟ أَكْثَرَ مِنْهُمْ وَأَشَدَّ قُوَّةًۭ وَءَاثَارًۭا فِى ٱلْأَرْضِ فَمَآ أَغْنَىٰ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ
أَفَلَمْ
क्या भला नहीं
يَسِيرُوا۟
वो चले फिरे
فِى
through
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
فَيَنظُرُوا۟
तो वो देखते
كَيْفَ
कैसा
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अंजाम
ٱلَّذِينَ
उन लोगों का जो
مِن
(were) before them
قَبْلِهِمْ ۚ
उनसे पहले थे
كَانُوٓا۟
थे वो
أَكْثَرَ
अक्सर
مِنْهُمْ
उनसे
وَأَشَدَّ
और ज़्यादा शदीद
قُوَّةًۭ
क़ुव्वत में
وَءَاثَارًۭا
और आसार में
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
فَمَآ
पस ना
أَغْنَىٰ
काम आया
عَنْهُم
उन्हें
مَّا
जो कुछ
كَانُوا۟
थे वो
يَكْسِبُونَ
वो कमाई करते
फिर क्या वे धरती में चले-फिरे नहीं कि देखते कि उन लोगों का कैसा परिणाम हुआ, जो उनसे पहले गुज़र चुके है। वे उनसे अधिक थे और शक्ति और अपनी छोड़ी हुई निशानियों की दृष्टि से भी बढ़-चढ़कर थे। किन्तु जो कुछ वे कमाते थे, वह उनके कुछ भी काम न आया
तफ़्सीर:
तो क्या ये झुठलाने वाले लोग धरती में चले-फिरे नहीं, ताकि देख लेते कि उनसे पहले झुठलाने वाली जातियों का परिणाम कैसा रहा और उससे सीख प्राप्त करते? उनसे पहले के लोग ज़्यादा धन वाले तथा ज़्यादा शक्तिशाली थे और वे धरती में अधिक चिह्न भी छोड़ गए हैं। परंतु, उनकी यह शक्ति, जिसे प्राप्त करने में वे लगे रहते थे, उस समय कुछ काम न आई, जब अल्लाह की विनाशकारी यातना आ गई।
आयत 83
فَلَمَّا جَآءَتْهُمْ رُسُلُهُم بِٱلْبَيِّنَـٰتِ فَرِحُوا۟ بِمَا عِندَهُم مِّنَ ٱلْعِلْمِ وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ
فَلَمَّا
तो जब
جَآءَتْهُمْ
आए उनके पास
رُسُلُهُم
रसूल उनके
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ
साथ वाज़ेह दलाइल के
فَرِحُوا۟
तो वो ख़ुश हुए
بِمَا
उस पर जो
عِندَهُم
उनके पास था
مِّنَ
of
ٱلْعِلْمِ
इल्म में से
وَحَاقَ
और घेर लिया
بِهِم
उन्हें
مَّا
उसने जो
كَانُوا۟
थे वो
بِهِۦ
जिसका
يَسْتَهْزِءُونَ
वो मज़ाक़ उड़ाते
फिर जब उनके रसूल उनके पास स्पष्ट प्रमाणों के साथ आए तो जो ज्ञान उनके अपने पास था वे उसी पर मग्न होते रहे और उनको उसी चीज़ ने आ घेरा जिसका वे परिहास करते थे
तफ़्सीर:
फिर जब उनके पास उनके रसूल खुली निशानियाँ लेकर आए, तो उन्होंने झुठला दिया और उसी ज्ञान से चिमटे रहने पर संतुष्ट हो गए, जो उनके पास था और जो रसूलों की शिक्षा के विपरीत था। चुनांचे उनपर वही यातना उतर आई, जिससे उनके रसूल उन्हें सावधान करते, तो वे उसका मज़ाक़ उड़ाने लगते थे।
आयत 84
فَلَمَّا رَأَوْا۟ بَأْسَنَا قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَحْدَهُۥ وَكَفَرْنَا بِمَا كُنَّا بِهِۦ مُشْرِكِينَ
فَلَمَّا
फिर जब
رَأَوْا۟
उन्होंने देखा
بَأْسَنَا
अज़ाब हमारा
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَحْدَهُۥ
अकेले उसी पर
وَكَفَرْنَا
और इन्कार किया हमने
بِمَا
उनका जिन्हें
كُنَّا
थे हम
بِهِۦ
साथ उसके
مُشْرِكِينَ
शरीक करते
फिर जब उन्होंने हमारी यातना देखी तो कहने लगे, "हम ईमान लाए अल्लाह पर जो अकेला है और उसका इनकार किया जिसे हम उसका साझी ठहराते थे।"
तफ़्सीर:
फ़िर जब उन्होंने हमारी यातना देख ली, तो उस समय इक़रार करने लगे, जब इकरार से कुछ लाभ होने वाला न था। बोलेः हम केवल एक अल्लाह पर ईमान लाए तथा उसके सिवा जिन बुतों एवं साझियें की वंदना करते थे, उनका इनकार कर दिया।
आयत 85
فَلَمْ يَكُ يَنفَعُهُمْ إِيمَـٰنُهُمْ لَمَّا رَأَوْا۟ بَأْسَنَا ۖ سُنَّتَ ٱللَّهِ ٱلَّتِى قَدْ خَلَتْ فِى عِبَادِهِۦ ۖ وَخَسِرَ هُنَالِكَ ٱلْكَـٰفِرُونَ
فَلَمْ
पस ना
يَكُ
था
يَنفَعُهُمْ
कि नफ़ा देता उन्हें
إِيمَـٰنُهُمْ
ईमान उनका
لَمَّا
जब
رَأَوْا۟
उन्होंने देखा
بَأْسَنَا ۖ
अज़ाब हमारा
سُنَّتَ
तरीक़ा है
ٱللَّهِ
अल्लाह का
ٱلَّتِى
वो जो
قَدْ
तहक़ीक़
خَلَتْ
गुज़र चुका
فِى
among
عِبَادِهِۦ ۖ
उसके बन्दों में
وَخَسِرَ
और ख़सारे में पड़ गए
هُنَالِكَ
उस वक़्त
ٱلْكَـٰفِرُونَ
काफ़िर
किन्तु उनका ईमान उनको कुछ भी लाभ नहीं पहुँचा सकता था जबकि उन्होंने हमारी यातना को देख लिया - यही अल्लाह की रीति है, जो उसके बन्दों में पहले से चली आई है - और उस समय इनकार करनेवाले घाटे में पड़कर रहे
तफ़्सीर:
तो हमारी यातना को उतरते हुए देखकर ईमान लाना, उनके लिए लाभदायक न हो सका। यही अल्लाह की रीति है, जो उसके बंदों के बारे में चली आ रही है कि यातना देख लेने के बाद ईमान लाने से उन्हें कुछ लाभ नहीं होने वाला। और काफ़िरों ने अपने आप को विनाश के स्थान में लाकर क्षतिग्रस्त किया , इसलिए कि उन्होंने अल्लाह के साथ कुफ़्र किया तथा यातना देखने से पूर्व क्षमा याचना नहीं की।
आज की ज़िंदगी में सबक़
पिछली कौमों के अज़ाब देखने के बाद ईमान लाने का फायदा न होने के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि अज़ाब देखने के बाद का ईमान कबूल नहीं होता, इसलिए मोहलत में ही ईमान और नेक अमल की कद्र करनी चाहिए।
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