नाम का मतलब
तफ्सील से बयान की गई (आयतों का साफ और मुफस्सल होना)
पृष्ठभूमि
सूरह फुस्सिलत में कुरआन की वाज़ेह और तफ्सीली आयतों का ज़िक्र है, साथ ही अल्लाह की कुदरत की निशानियां और कयामत के दिन इंसान के आज़ा (अंग) की गवाही का ज़िक्र है।
फ़ज़ीलत / सार
इसमें यह हैरतअंगेज़ खबर है कि कयामत के दिन इंसान के अपने हाथ-पांव उसके खिलाफ गवाही देंगे, जो हमें अपने आमाल पर गौर करने की तरगीब देती है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ حمٓ
حمٓ
ح م
हा॰ मीम॰
तफ़्सीर:
(ह़ा, मीम) सूरतुल-बक़रा की शुरुआत में इस प्रकार के अक्षरों के बारे में बात गुज़र चुकी है।
आयत 2
تَنزِيلٌۭ مِّنَ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
تَنزِيلٌۭ
नाज़िल करदा है
مِّنَ
from
ٱلرَّحْمَـٰنِ
बहुत महरबान की तरफ़ से
ٱلرَّحِيمِ
जो निहायत रहम करने वाला है
यह अवतरण है बड़े कृपाशील, अत्यन्त दयावान की ओर से,
तफ़्सीर:
यह क़ुरआन उस अल्लाह की ओर से अवतरित हुआ है, जो अत्यंत दयावान्, असीम दयालु है।
आयत 3
كِتَـٰبٌۭ فُصِّلَتْ ءَايَـٰتُهُۥ قُرْءَانًا عَرَبِيًّۭا لِّقَوْمٍۢ يَعْلَمُونَ
كِتَـٰبٌۭ
एक ऐसी किताब
فُصِّلَتْ
खोल कर बयान की गईं हैं
ءَايَـٰتُهُۥ
आयात उसकी
قُرْءَانًا
क़ुरआन है
عَرَبِيًّۭا
अर्बी
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَعْلَمُونَ
जो इल्म रखते हैं
एक किताब, जिसकी आयतें खोल-खोलकर बयान हुई है; अरबी क़ुरआन के रूप में, उन लोगों के लिए जो जानना चाहें;
तफ़्सीर:
यह ऐसी पुस्तक है, जिसकी आयतों को, संपूर्ण रूप से खोल-खोलकर बयान किया गया है, और उसे अरबी क़ुरआन के रूप में प्रस्तुत किया गया है, उन लोगों के लिए जो ज्ञान रखते हैं, क्योंकि वही उसकी शिक्षा सामग्री और मार्गदर्शन से लाभ उठाते हैं।
आयत 4
بَشِيرًۭا وَنَذِيرًۭا فَأَعْرَضَ أَكْثَرُهُمْ فَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ
بَشِيرًۭا
ख़ुश ख़बरी देने वाला
وَنَذِيرًۭا
और डराने वाला
فَأَعْرَضَ
तो ऐराज़ किया
أَكْثَرُهُمْ
उनके अक्सर ने
فَهُمْ
पस वो
لَا
(do) not
يَسْمَعُونَ
नहीं वो सुनते
शुभ सूचक एवं सचेतकर्त्ता किन्तु उनमें से अधिकतर कतरा गए तो वे सुनते ही नहीं
तफ़्सीर:
वह मोमिनों को उस पूर्ण प्रतिफ़ल की शुभ सूचना देता है, जो अल्लाह ने उनके लिए तैयार कर रखा है, तथा काफ़िरों को अल्लाह की कठिन यातना से डराता है। फ़िर भी उनमें अधिकतर लोगों ने उससे मुहँ मोड़ रखा है और उसकी हिदायत की बातों को मानने के इरादे से सुनने को तैयार नहीं हैं।
आयत 5
وَقَالُوا۟ قُلُوبُنَا فِىٓ أَكِنَّةٍۢ مِّمَّا تَدْعُونَآ إِلَيْهِ وَفِىٓ ءَاذَانِنَا وَقْرٌۭ وَمِنۢ بَيْنِنَا وَبَيْنِكَ حِجَابٌۭ فَٱعْمَلْ إِنَّنَا عَـٰمِلُونَ
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
قُلُوبُنَا
दिल हमारे
فِىٓ
(are) in
أَكِنَّةٍۢ
पर्दों में हैं
مِّمَّا
उससे जो
تَدْعُونَآ
तुम पुकारते हो हमें
إِلَيْهِ
तरफ़ जिसके
وَفِىٓ
and in
ءَاذَانِنَا
और हमारे कानों में
وَقْرٌۭ
एक बोझ है
وَمِنۢ
and between us
بَيْنِنَا
और दर्मियान हमारे
وَبَيْنِكَ
और दर्मियान तुम्हारे
حِجَابٌۭ
हिजाब है
فَٱعْمَلْ
पस अमल करो
إِنَّنَا
बेशक हम भी
عَـٰمِلُونَ
अमल करने वाले हैं
और उनका कहना है कि "जिसकी ओर तुम हमें बुलाते हो उसके लिए तो हमारे दिल आवरणों में है। और हमारे कानों में बोझ है। और हमारे और तुम्हारे बीच एक ओट है; अतः तुम अपना काम करो, हम तो अपना काम करते है।"
तफ़्सीर:
तथा उन्होंने कहा कि हमारे दिलों परदों में ढके हैं, अतः वे उसे समझ नहीं पाते जिसकी ओर आप हमें बुला रहे हैं। और हमारें कानों में बोझ है, अतः वह आपकी बात सुन नहीं पाते। और हमारे तथा आपके बीच ऐक परदा है, जिसके कारण आपकी कोई भी बात हम तक नहीं पहुँच नहीं पाती। तो आप अपना रास्ता चलते रहें, हम अपने रास्ते पर चलते हैं। कदापि हम आपका अनुसरण नहीं करेंगे।
आयत 6
قُلْ إِنَّمَآ أَنَا۠ بَشَرٌۭ مِّثْلُكُمْ يُوحَىٰٓ إِلَىَّ أَنَّمَآ إِلَـٰهُكُمْ إِلَـٰهٌۭ وَٰحِدٌۭ فَٱسْتَقِيمُوٓا۟ إِلَيْهِ وَٱسْتَغْفِرُوهُ ۗ وَوَيْلٌۭ لِّلْمُشْرِكِينَ
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّمَآ
बेशक
أَنَا۠
मैं
بَشَرٌۭ
एक इन्सान हूँ
مِّثْلُكُمْ
तुम जैसा
يُوحَىٰٓ
वही की जाती है
إِلَىَّ
मेरी तरफ़
أَنَّمَآ
बेशक
إِلَـٰهُكُمْ
इलाह तुम्हारा
إِلَـٰهٌۭ
इलाह है
وَٰحِدٌۭ
एक ही
فَٱسْتَقِيمُوٓا۟
पस सीधे रहो
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
وَٱسْتَغْفِرُوهُ ۗ
और बख़्शिश माँगो उससे
وَوَيْلٌۭ
और हलाकत है
لِّلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकों के लिए
कह दो, "मैं तो तुम्हीं जैसा मनुष्य हूँ। मेरी ओर प्रकाशना की जाती है कि तुम्हारा पूज्य-प्रभु बस अकेला पूज्य-प्रभु है। अतः तुम सीधे उसी का रुख करो और उसी से क्षमा-याचना करो - साझी ठहरानेवालों के लिए तो बड़ी तबाही है,
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) इन अवज्ञाकारियों से कह दें कि मैं तुम्हारे ही जैसा एक इनसान हूँ। अल्लाह मेरी आेर वह्य भेजता है कि तुम्हारा सत्य पूज्य बस एक ही सत्य पूज्य है। वह अल्लाह है। अत-, उसी की ओर ले जाने वाली राह पर चलो। उसी से गुनाहों की क्षमा माँगो। बेशक विनाश व यातना उन मुश्रिकों के लिए है, जो अल्लाह के सिवा किसी और की वंदना करते हैं अथवा उसका किसी दूसरे को साझी बनाते हैं।
आयत 7
ٱلَّذِينَ لَا يُؤْتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَهُم بِٱلْـَٔاخِرَةِ هُمْ كَـٰفِرُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जो
لَا
(do) not
يُؤْتُونَ
नहीं वो अदा करते
ٱلزَّكَوٰةَ
ज़कात
وَهُم
और वो
بِٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत के
هُمْ
वो
كَـٰفِرُونَ
इन्कारी हैं
जो ज़कात नहीं देते और वही है जो आख़िरत का इनकार करते है। -
तफ़्सीर:
जो लोग अपने धन की ज़कात नहीं देते, तथा आखिरत और उसकी सदा बाकी रहने वाली नेमतों एवं दर्दनाक यातना का इनकार करते हैं।
आयत 8
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ لَهُمْ أَجْرٌ غَيْرُ مَمْنُونٍۢ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
لَهُمْ
उनके लिए
أَجْرٌ
अजर है
غَيْرُ
ना
مَمْنُونٍۢ
ख़त्म होने वाला
रहे वे लोग जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, उनके लिए ऐसा बदला है जिसका क्रम टूटनेवाला नहीं।"
तफ़्सीर:
निश्चय जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाए और अच्छे कार्य किए, उनके लिए कभी न समाप्त होने वाला बदला अर्थात जन्नत है।
आयत 9
۞ قُلْ أَئِنَّكُمْ لَتَكْفُرُونَ بِٱلَّذِى خَلَقَ ٱلْأَرْضَ فِى يَوْمَيْنِ وَتَجْعَلُونَ لَهُۥٓ أَندَادًۭا ۚ ذَٰلِكَ رَبُّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
۞ قُلْ
कह दीजिए
أَئِنَّكُمْ
क्या बेशक तुम
لَتَكْفُرُونَ
अलबत्ता तुम कुफ़्र करते हो
بِٱلَّذِى
उसका जिसने
خَلَقَ
पैदा किया
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
فِى
in
يَوْمَيْنِ
दो दिन में
وَتَجْعَلُونَ
और तुम बनाते हो
لَهُۥٓ
उसके लिए
أَندَادًۭا ۚ
कुछ शरीक
ذَٰلِكَ
वो है
رَبُّ
रब
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों का
कहो, "क्या तुम उसका इनकार करते हो, जिसने धरती को दो दिनों (काल) में पैदा किया और तुम उसके समकक्ष ठहराते हो? वह तो सारे संसार का रब है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप मुश्रिकों को डाँटते हुए कह देंः तुम उस अल्लाह का इनकार क्यों करते हो, जिसने धरती को दो दिनों (रविवार तथा सोमवार) में पैदा किया और उसके साझी बनाकर उन्हें अल्लाह के सिवा क्यों पूजते हो? वह तो सारी सृष्टियों का पालनहार है।
आयत 10
وَجَعَلَ فِيهَا رَوَٰسِىَ مِن فَوْقِهَا وَبَـٰرَكَ فِيهَا وَقَدَّرَ فِيهَآ أَقْوَٰتَهَا فِىٓ أَرْبَعَةِ أَيَّامٍۢ سَوَآءًۭ لِّلسَّآئِلِينَ
وَجَعَلَ
और उसने गाड़ दिया
فِيهَا
उसमें
رَوَٰسِىَ
पहाड़ों को
مِن
above it
فَوْقِهَا
उसके ऊपर से
وَبَـٰرَكَ
और बरकत डाली
فِيهَا
उसमें
وَقَدَّرَ
और अंदाज़े से रखा
فِيهَآ
उसमें
أَقْوَٰتَهَا
उसकी ग़िज़ाओं को
فِىٓ
in
أَرْبَعَةِ
four
أَيَّامٍۢ
चार दिनों में
سَوَآءًۭ
बराबर/यक्साँ है
لِّلسَّآئِلِينَ
सवाल करने वालों के लिए
और उसने उस (धरती) में उसके ऊपर से पहाड़ जमाए और उसमें बरकत रखी और उसमें उसकी ख़ुराकों को ठीक अंदाज़े से रखा। माँग करनेवालों के लिए समान रूप से यह सब चार दिन में हुआ
तफ़्सीर:
उसने धरती में उसके ऊपर से मज़बूत पहाड़ बनाए, जो उसे स्थिर रखते हैं, ताकि वह हिलने न लगे। तथा उसमें बरकत रख दी, चुनाँचे उसे उसके वासियों के लिए स्थायी भलाई वाली बना दिया, तथा उसमें इनसानों तथा चौपायों के आहार निर्धारित किए, पिछले दो दिनों को मिलाकर चार दिनों के भीतर। बाद के दो दिन : मंगलवार और बुधवार हैं। ये पूरे चार दिन बराबर हैं उनके बारे में प्रश्न करने वाले के लिए।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन की तफ्सीली आयतों और कायनात की तख्लीक का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कुरआन की आयतें साफ और वाज़ेह हैं, इन्हें समझने की कोशिश करनी चाहिए।
आयत 11
ثُمَّ ٱسْتَوَىٰٓ إِلَى ٱلسَّمَآءِ وَهِىَ دُخَانٌۭ فَقَالَ لَهَا وَلِلْأَرْضِ ٱئْتِيَا طَوْعًا أَوْ كَرْهًۭا قَالَتَآ أَتَيْنَا طَآئِعِينَ
ثُمَّ
फिर
ٱسْتَوَىٰٓ
वो मुतवज्जा हुआ
إِلَى
towards
ٱلسَّمَآءِ
तरफ़ आसमान के
وَهِىَ
और वो
دُخَانٌۭ
एक धुवाँ था
فَقَالَ
तो उसने कहा
لَهَا
उससे
وَلِلْأَرْضِ
और ज़मीन से
ٱئْتِيَا
दोनों आ जाओ
طَوْعًا
ख़ुशी से
أَوْ
या
كَرْهًۭا
ना ख़ुशी से
قَالَتَآ
दोनों ने कहा
أَتَيْنَا
आ गए हम
طَآئِعِينَ
ख़ुश होकर
फिर उसने आकाश की ओर रुख़ किया, जबकि वह मात्र धुआँ था- और उसने उससे और धरती से कहा, 'आओ, स्वेच्छा के साथ या अनिच्छा के साथ।' उन्होंने कहा, 'हम स्वेच्छा के साथ आए।' -
तफ़्सीर:
फ़िर अल्लाह ने आकाश पैदा करने का इरादा किया। उस समय आकाश धुआँ था। चुनांचे आकाश एवं धरती से कहा : तुम मेरे आदेशों का पालन करो। चाहे खुशी-खुशी या दबाव के तहत। इससे तुम्हें छुटकारा नहीं मिलने वाला। तो दोनों ने कहा : हम प्रसन्न होकर आ गए। ऐ हमारे पालनहार! हम आपके इरादे के अधीन हैं।
आयत 12
فَقَضَىٰهُنَّ سَبْعَ سَمَـٰوَاتٍۢ فِى يَوْمَيْنِ وَأَوْحَىٰ فِى كُلِّ سَمَآءٍ أَمْرَهَا ۚ وَزَيَّنَّا ٱلسَّمَآءَ ٱلدُّنْيَا بِمَصَـٰبِيحَ وَحِفْظًۭا ۚ ذَٰلِكَ تَقْدِيرُ ٱلْعَزِيزِ ٱلْعَلِيمِ
فَقَضَىٰهُنَّ
तो उसने पूरा बना दिया उन्हें
سَبْعَ
सात
سَمَـٰوَاتٍۢ
आसमान
فِى
in
يَوْمَيْنِ
दो दिनों में
وَأَوْحَىٰ
और उसने वही कर दिया
فِى
in
كُلِّ
each
سَمَآءٍ
हर आसमान में
أَمْرَهَا ۚ
काम उसका
وَزَيَّنَّا
और मुज़य्यन किया हमने
ٱلسَّمَآءَ
आसमान को
ٱلدُّنْيَا
दुनिया के
بِمَصَـٰبِيحَ
साथ चिराग़ों के
وَحِفْظًۭا ۚ
और हिफ़ाज़त के लिए
ذَٰلِكَ
ये
تَقْدِيرُ
अंदाज़ा है
ٱلْعَزِيزِ
बहुत ज़बरदस्त का
ٱلْعَلِيمِ
ख़ूब इल्म वाले का
फिर दो दिनों में उनको अर्थात सात आकाशों को बनाकर पूरा किया और प्रत्येक आकाश में उससे सम्बन्धित आदेश की प्रकाशना कर दी औऱ दुनिया के (निकटवर्ती) आकाश को हमने दीपों से सजाया (रात के यात्रियों के दिशा-निर्देश आदि के लिए) और सुरक्षित करने के उद्देश्य से। यह अत्.न्त प्रभुत्वशाली, सर्वज्ञ का ठहराया हुआ है।"
तफ़्सीर:
अल्लाह ने आकाशों को दो दिनों में बनाकर पूरा किया। अर्थात् बृहस्पतिवार एवं शुक्रवार को। इस तरह, आकाशों एवं धरती की सृष्टि कुल छः दिनों में संपन्न हुई। और अल्लाह ने प्रत्येक आकाश में उससे संबंधित अपने निर्णयों और आदेशों की वह्य कर दी। और हमने निचले आकाश को सितारों से सजाया तथा उनके ज़रिए उसे सुरक्षा प्रदान की, ताकि शैतान छिपकर कुछ सुन न सके। यह सारी योजना उस अति प्रभुत्वशाली अल्लाह की है, जिसे कोई हरा नहीं सकता, वह अपनी मखलूक़ को भली-भाँति जानता है।
आयत 13
فَإِنْ أَعْرَضُوا۟ فَقُلْ أَنذَرْتُكُمْ صَـٰعِقَةًۭ مِّثْلَ صَـٰعِقَةِ عَادٍۢ وَثَمُودَ
فَإِنْ
फिर अगर
أَعْرَضُوا۟
वो मुँह मोड़ लें
فَقُلْ
तो कह दीजिए
أَنذَرْتُكُمْ
डराता हूँ मैं तुम्हें
صَـٰعِقَةًۭ
बिजली की कड़क से
مِّثْلَ
मानिन्द
صَـٰعِقَةِ
बिजली की कड़क
عَادٍۢ
आद
وَثَمُودَ
और समूद की
अब यदि वे लोग ध्यान में न लाएँ तो कह दो, "मैं तुम्हें उसी तरह के कड़का (वज्रवात) से डराता हूँ, जैसा कड़का आद और समूद पर हुआ था।"
तफ़्सीर:
फ़िर भी यदि ये लोग आपके लाए धर्म को मानने से मुँह फेरें, तो (ऐ रसूल) उनसे कह दें कि मैंने तुम्हें उसी तरह की यातना से सावधान कर दिया है, जिस तरह की यातना हूद अलैहिस्सलाम की जाति आद पर और सालेह अलैहिस्सलाम की जाति समूद पर आई थी।
आयत 14
إِذْ جَآءَتْهُمُ ٱلرُّسُلُ مِنۢ بَيْنِ أَيْدِيهِمْ وَمِنْ خَلْفِهِمْ أَلَّا تَعْبُدُوٓا۟ إِلَّا ٱللَّهَ ۖ قَالُوا۟ لَوْ شَآءَ رَبُّنَا لَأَنزَلَ مَلَـٰٓئِكَةًۭ فَإِنَّا بِمَآ أُرْسِلْتُم بِهِۦ كَـٰفِرُونَ
إِذْ
जब
جَآءَتْهُمُ
आए उनके पास
ٱلرُّسُلُ
कई रसूल
مِنۢ
from before them
بَيْنِ
from before them
أَيْدِيهِمْ
उनके आगे से
وَمِنْ
and from
خَلْفِهِمْ
और उनके पीछे से
أَلَّا
कि ना
تَعْبُدُوٓا۟
तुम इबादत करो
إِلَّا
मगर
ٱللَّهَ ۖ
अल्लाह की
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لَوْ
अगर
شَآءَ
चाहता
رَبُّنَا
रब हमारा
لَأَنزَلَ
अलबत्ता वो उतार देता
مَلَـٰٓئِكَةًۭ
फ़रिश्ते
فَإِنَّا
तो बेशक हम
بِمَآ
उसका जो
أُرْسِلْتُم
भेजे गए हो तुम
بِهِۦ
साथ उसके
كَـٰفِرُونَ
इन्कार करने वाले हैं
जब उनके पास रसूल उनके आगे और उनके पीछे से आए कि "अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करो।" तो उन्होंने कहा, "यदि हमारा रब चाहता तो फ़रिश्तों को उतार देता। अतः जिस चीज़ के साथ तुम्हें भेजा गया है, हम उसे नहीं मानते।"
तफ़्सीर:
जब उनके पास उनके रसूल, एक-दूसरे के बाद, एक ही आह्वान लेकर आए और उन्हें आदेश दिया कि एक अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करें, तो उनमें से काफ़िरों ने कहा : यदि हमारा रब चाहता, तो हमारी आेर फ़िश्तों को रसूल बनाकर भेजता। अतः, तुम जिस बात के साथ भेजे गए हो, हम उसे नहीं मानते। क्योंकि तुम हमारे ही जैसे इनसान हो।
आयत 15
فَأَمَّا عَادٌۭ فَٱسْتَكْبَرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ بِغَيْرِ ٱلْحَقِّ وَقَالُوا۟ مَنْ أَشَدُّ مِنَّا قُوَّةً ۖ أَوَلَمْ يَرَوْا۟ أَنَّ ٱللَّهَ ٱلَّذِى خَلَقَهُمْ هُوَ أَشَدُّ مِنْهُمْ قُوَّةًۭ ۖ وَكَانُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا يَجْحَدُونَ
فَأَمَّا
तो रहे
عَادٌۭ
आद
فَٱسْتَكْبَرُوا۟
पस उन्होंने तकब्बुर किया
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
بِغَيْرِ
बग़ैर
ٱلْحَقِّ
हक़ के
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
مَنْ
कौन
أَشَدُّ
ज़्यादा शदीद है
مِنَّا
हमसे
قُوَّةً ۖ
क़ुव्वत में
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَرَوْا۟
उन्होंने देखा
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
ٱلَّذِى
वो है जिसने
خَلَقَهُمْ
पैदा किया उन्हें
هُوَ
वो
أَشَدُّ
ज़्यादा शदीद है
مِنْهُمْ
उनसे
قُوَّةًۭ ۖ
क़ुव्वत में
وَكَانُوا۟
और थे वो
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात का
يَجْحَدُونَ
वो इन्कार करते
रहे आद, तो उन्होंने नाहक़ धरती में घमंड किया और कहा, "कौन हमसे शक्ति में बढ़कर है?" क्या उन्होंने नहीं देखा कि अल्लाह, जिसने उन्हें पैदा किया, वह उनसे शक्ति में बढ़कर है? वे तो हमारी आयतों का इनकार ही करते रहे
तफ़्सीर:
रहे हूद अलैहिस्सलाम की जाति 'आद' समुदाय के लोग, तो उन्होंने अल्लाह का इनकार करने के साथ-साथ धरती में नाहक़ अभिमान किया और अपने आस-पास के लोगों पर अत्याचार किया, तथा अपनी शक्ति के धोखे में कहने लगे : हमसे अधिक शक्तिशाली कौन है?! उनके ख़याल से उनसे अधिक शक्तिशाली कोई नहीं था। तो अल्लाह ने उन्हें उत्तर दिया : क्या वे नहीं जानते और देखते हैं कि अल्लाह, जिसने उन्हें पैदा किया और उन्हें वह शक्ति प्रदान की, जिसने उन्हें सरकश (उद्दंड) बना दिया, वह उनसे कहीं अधिक शक्तिशाली है?! तथा वे अल्लाह की उन निशानियों का इनकार करते थे, जो हूद अलैहिस्सलाम लेकर आए थे।
आयत 16
فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ رِيحًۭا صَرْصَرًۭا فِىٓ أَيَّامٍۢ نَّحِسَاتٍۢ لِّنُذِيقَهُمْ عَذَابَ ٱلْخِزْىِ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۖ وَلَعَذَابُ ٱلْـَٔاخِرَةِ أَخْزَىٰ ۖ وَهُمْ لَا يُنصَرُونَ
فَأَرْسَلْنَا
तो भेजी हमने
عَلَيْهِمْ
उन पर
رِيحًۭا
एक हवा
صَرْصَرًۭا
तुंद व तेज़
فِىٓ
in
أَيَّامٍۢ
(the) days
نَّحِسَاتٍۢ
नहूसत के दिनों में
لِّنُذِيقَهُمْ
ताकि हम चखाऐं उन्हें
عَذَابَ
अज़ाब
ٱلْخِزْىِ
रुस्वाई का
فِى
in
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी में
ٱلدُّنْيَا ۖ
दुनिया की
وَلَعَذَابُ
और यक़ीनन अज़ाब
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत का
أَخْزَىٰ ۖ
ज़्यादा रुस्वाकुन है
وَهُمْ
और वो
لَا
will not be helped
يُنصَرُونَ
ना वो मदद किए जाऐंगे
अन्ततः हमने कुछ अशुभ दिनों में उनपर एक शीत-झंझावात चलाई, ताकि हम उन्हें सांसारिक जीवन में अपमान और रुसवाई की यातना का मज़ा चखा दें। और आख़िरत की यातना तो इससे कहीं बढ़कर रुसवा करनेवाली है। और उनको कोई सहायता भी न मिल सकेगी
तफ़्सीर:
अंततः, हमने उनपर कुछ ऐसे दिनों में, जो अपनी यातना के कारण उनके हक़ में अशुभ थे, उनपर ऐसी वायु भेज दी, जो घबराहट पैदा करने वाली आवाज़ के साथ चल रही थी; ताकि उन्हें सांसारिक जीवन में ही अपमानकारी यातना चखाएँ और आख़िरत की यातना, जिसकी उन्हें प्रतीक्षा है, और ज़्यादा अपमानकारी है। तथा उन्हें कोई सहायक नहीं मिलेगा, जो उन्हें यातना से बचा सके।
आयत 17
وَأَمَّا ثَمُودُ فَهَدَيْنَـٰهُمْ فَٱسْتَحَبُّوا۟ ٱلْعَمَىٰ عَلَى ٱلْهُدَىٰ فَأَخَذَتْهُمْ صَـٰعِقَةُ ٱلْعَذَابِ ٱلْهُونِ بِمَا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ
وَأَمَّا
और रहे
ثَمُودُ
समूद
فَهَدَيْنَـٰهُمْ
तो हिदायत दी हमने उन्हें
فَٱسْتَحَبُّوا۟
तो उन्होंने पसंद किया
ٱلْعَمَىٰ
अंधेपन को
عَلَى
over
ٱلْهُدَىٰ
हिदायत पर
فَأَخَذَتْهُمْ
तो पकड़ लिया उन्हें
صَـٰعِقَةُ
बिजली की कड़क ने
ٱلْعَذَابِ
(of) the punishment
ٱلْهُونِ
ज़िल्लत वाले अज़ाब की
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَكْسِبُونَ
वो कमाई करते
और रहे समूद, तो हमने उनके सामने सीधा मार्ग दिखाया, किन्तु मार्गदर्शन के मुक़ाबले में उन्होंने अन्धा रहना ही पसन्द किया। परिणामतः जो कुछ वे कमाई करते रहे थे उसके बदले में अपमानजनक यातना के कड़के ने उन्हें आ पकड़ा
तफ़्सीर:
रहे सालेह अलैहिस्सलाम की जाति 'समूद' समुदाय के लोग, तो हमने उनके सामने सत्य के रास्ते को स्पष्ट करके उनका मार्गदर्शन किया। लेकिन उन्होंने सत्य की ओर मार्गदर्शन पर गुमराही को प्राथमिकता दी। तो उन्हें, उनके कुफ़्र और पापों के कारण, अपमानजनक दंड के वज्र ने नष्ट कर दिया।
आयत 18
وَنَجَّيْنَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَكَانُوا۟ يَتَّقُونَ
وَنَجَّيْنَا
और निजात दी हमने
ٱلَّذِينَ
उन्हें जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَكَانُوا۟
और थे वो
يَتَّقُونَ
वो डरते
और हमने उन लोगों को बचा लिया जो ईमान लाए थे और डर रखते थे
तफ़्सीर:
और हमने उन लोगों को बचा लिया, जो अल्लाह तथा उसके रसूलों पर ईमान रखते थे, तथा अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके एवं उसकी मना की हुई वस्तुओं से बचकर डरते थे। हमने उन्हें उस यातना से बचा लिया, जो उनकी जाति के और लोगों पर आई।
आयत 19
وَيَوْمَ يُحْشَرُ أَعْدَآءُ ٱللَّهِ إِلَى ٱلنَّارِ فَهُمْ يُوزَعُونَ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يُحْشَرُ
इकट्ठे किए जाऐंगे
أَعْدَآءُ
दुश्मन
ٱللَّهِ
अल्लाह के
إِلَى
to
ٱلنَّارِ
तरफ़ आग के
فَهُمْ
तो वो
يُوزَعُونَ
वो रोके जाऐंगे
और विचार करो जिस दिन अल्लाह के शत्रु आग की ओर एकत्र करके लाए जाएँगे, फिर उन्हें श्रेणियों में क्रमबद्ध किया जाएगा, यहाँ तक की जब वे उसके पास पहुँच जाएँगे
तफ़्सीर:
और जिस दिन अल्लाह अपने शत्रुओं को जहन्नम की ओर एकत्र करेगा, तो निगरानी पर नियुक्त फ़रिश्ते उनके पहलों को बाद वालों से मिला देंगे। वे आग से भाग नहीं सकेंगे।
आयत 20
حَتَّىٰٓ إِذَا مَا جَآءُوهَا شَهِدَ عَلَيْهِمْ سَمْعُهُمْ وَأَبْصَـٰرُهُمْ وَجُلُودُهُم بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
when
مَا
जैसे ही
جَآءُوهَا
वो आऐंगे उसके पास
شَهِدَ
गवाही देंगे
عَلَيْهِمْ
ख़िलाफ़ उनके
سَمْعُهُمْ
कान उनके
وَأَبْصَـٰرُهُمْ
और निगाहें उनकी
وَجُلُودُهُم
और जिल्दें उनकी
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
तो उनके कान और उनकी आँखें और उनकी खालें उनके विरुद्ध उन बातों की गवाही देंगी, जो कुछ वे करते रहे होंगे
तफ़्सीर:
यहाँ तक कि जब वे उस जहन्नम के पास आ जाएँगे, जहाँ उन्हें ले जाया जा रहा होगा, और सांसार में जो कर्म वे किया करते थे, उनका इनकार कर देंगे, तो उनके कान तथा उनकी आँखें और उनकी खालें, उनके विरुद्ध उस कुफ़्र और गुनाह के कामों की गवाही देंगी, जो वे दुनिया में किया करते थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
आद-समूद कौम के अंजाम का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि तकब्बुर और सरकशी करने वाली कौमें आखिरकार तबाह हुईं, इससे नसीहत लेनी चाहिए।
आयत 21
وَقَالُوا۟ لِجُلُودِهِمْ لِمَ شَهِدتُّمْ عَلَيْنَا ۖ قَالُوٓا۟ أَنطَقَنَا ٱللَّهُ ٱلَّذِىٓ أَنطَقَ كُلَّ شَىْءٍۢ وَهُوَ خَلَقَكُمْ أَوَّلَ مَرَّةٍۢ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
وَقَالُوا۟
और वो कहेंगे
لِجُلُودِهِمْ
अपनी जिल्दों को
لِمَ
क्यों
شَهِدتُّمْ
गवाही दी तुमने
عَلَيْنَا ۖ
ख़िलाफ़ हमारे
قَالُوٓا۟
वो कहेंगी
أَنطَقَنَا
बुलवाया हमें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلَّذِىٓ
वो जिसने
أَنطَقَ
बुलवाया
كُلَّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ को
وَهُوَ
और वो ही है
خَلَقَكُمْ
जिसने पैदा किया तुम्हें
أَوَّلَ
पहली
مَرَّةٍۢ
बार
وَإِلَيْهِ
और तरफ़ उसी के
تُرْجَعُونَ
तुम लौटाए जाओगे
वे अपनी खालों से कहेंगे, "तुमने हमारे विरुद्ध क्यों गवाही दी?" वे कहेंगी, "हमें उसी अल्लाह ने वाक्-शक्ति प्रदान की है, जिसने प्रत्येक चीज़ को वाक्-शक्ति प्रदान की।" - उसी ने तुम्हें पहली बार पैदा किया और उसी की ओर तुम्हें लौटना है
तफ़्सीर:
और काफ़िर अपनी खालों से कहेंगेः तुमने हमारे विरुद्ध, हमारे सांसारिक कर्मों की गवाही क्यों दी? तो वे उत्तर देंगीः हमें उसी अल्लाह ने बोलने की शक्ति दी है, जिसने प्रत्येक वस्तु को बोलने की शक्ति प्रदान की है, तथा उसीने तुम्हें प्रथम बार पैदा किया जब तुम दुनिया में थे, और उसीकी ओर तुम सब आख़िरत में हिसाब व प्रतिकार के लिए फेरे जा रहे हो।
आयत 22
وَمَا كُنتُمْ تَسْتَتِرُونَ أَن يَشْهَدَ عَلَيْكُمْ سَمْعُكُمْ وَلَآ أَبْصَـٰرُكُمْ وَلَا جُلُودُكُمْ وَلَـٰكِن ظَنَنتُمْ أَنَّ ٱللَّهَ لَا يَعْلَمُ كَثِيرًۭا مِّمَّا تَعْمَلُونَ
وَمَا
और नहीं
كُنتُمْ
थे तुम
تَسْتَتِرُونَ
तुम छुपते (इस बात से)
أَن
कि
يَشْهَدَ
गवाही देंगे
عَلَيْكُمْ
तुम पर
سَمْعُكُمْ
कान तुम्हारे
وَلَآ
और ना
أَبْصَـٰرُكُمْ
आँखें तुम्हारी
وَلَا
और ना
جُلُودُكُمْ
जिल्दें तुम्हारी
وَلَـٰكِن
और लेकिन
ظَنَنتُمْ
गुमान किया तुमने
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يَعْلَمُ
नहीं वो जानता
كَثِيرًۭا
बहुत कुछ
مِّمَّا
उसमें से जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
तुम इस भय से छिपते न थे कि तुम्हारे कान तुम्हारे विरुद्ध गवाही देंगे, और न इसलिए कि तुम्हारी आँखें गवाही देंगी और न इस कारण से कि तुम्हारी खाले गवाही देंगी, बल्कि तुमने तो यह समझ रखा था कि अल्लाह तुम्हारे बहुत-से कामों को जानता ही नहीं
तफ़्सीर:
और तुम पाप करते समय अपने पापों को छिपाते भी नहीं थे कि कहीं तुम्हारे कान, तुम्हारी आँखें तथा तुम्हारी खालें तुम्हारे विरुद्ध गवाही न दे दें, क्योंकि तुम हिसाब, यातना तथा मौत के पश्चात बदले का यक़ीन ही नहीं रखते थे। तुम समझते रहे कि अल्लाह तुम्हारे अधिकतर कर्मों को जानता ही नहीं है, बल्कि वह उनसे अनभिज्ञ रहता है। यही कारण है कि तुम धोखे में पड़ गए।
आयत 23
وَذَٰلِكُمْ ظَنُّكُمُ ٱلَّذِى ظَنَنتُم بِرَبِّكُمْ أَرْدَىٰكُمْ فَأَصْبَحْتُم مِّنَ ٱلْخَـٰسِرِينَ
وَذَٰلِكُمْ
और ये
ظَنُّكُمُ
गुमान तुम्हारा
ٱلَّذِى
वो जो
ظَنَنتُم
गुमान किया तुमने
بِرَبِّكُمْ
अपने रब के बारे में
أَرْدَىٰكُمْ
उसने हलाक कर दिया तुम्हें
فَأَصْبَحْتُم
तो हो गए तुम
مِّنَ
of
ٱلْخَـٰسِرِينَ
ख़सारा पाने वालों में से
और तुम्हारे उस गुमान ने तुम्हे बरबाद किया जो तुमने अपने रब के साथ किया; अतः तुम घाटे में पड़कर रहे
तफ़्सीर:
और तुम्हारे इसी बुरे ख़याल ने जो तुमने अपने रब के बारे में रखा, तुम्हें हलाक कर दिया और इसीके कारण तुम उन क्षति उठाने वालों में शामिल हो गए, जो दुनिया एवं आख़िरत दोनों से हाथ धो बैठे।
आयत 24
فَإِن يَصْبِرُوا۟ فَٱلنَّارُ مَثْوًۭى لَّهُمْ ۖ وَإِن يَسْتَعْتِبُوا۟ فَمَا هُم مِّنَ ٱلْمُعْتَبِينَ
فَإِن
फिर अगर
يَصْبِرُوا۟
वो सब्र करें
فَٱلنَّارُ
तो आग
مَثْوًۭى
ठिकाना है
لَّهُمْ ۖ
उनके लिए
وَإِن
और अगर
يَسْتَعْتِبُوا۟
वो माफ़ी तलब करेंगे
فَمَا
तो नहीं
هُم
वो
مِّنَ
(will be) of
ٱلْمُعْتَبِينَ
उज़्र क़ुबूल किए जाने वालों में से
अब यदि वे धैर्य दिखाएँ तब भी आग ही उनका ठिकाना है। और यदि वे किसी प्रकार (उसके) क्रोध को दूर करना चाहें, तब भी वे ऐसे नहीं कि वे राज़ी कर सकें
तफ़्सीर:
तो यदि यह लोग, जिनके विरुद्ध उनके कानों, आँखों एवं खालों ने गवाही दी है, धैर्य रखें, तो भी उनका आवास जहन्नम है और यदि यतना से मुक्ति और अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति की दुआ करें, तो भी न उसकी प्रसन्नता प्राप्त कर सकते हैं, न जन्नत में प्रवेश कर सकते हैं।
आयत 25
۞ وَقَيَّضْنَا لَهُمْ قُرَنَآءَ فَزَيَّنُوا۟ لَهُم مَّا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَحَقَّ عَلَيْهِمُ ٱلْقَوْلُ فِىٓ أُمَمٍۢ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهِم مِّنَ ٱلْجِنِّ وَٱلْإِنسِ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ خَـٰسِرِينَ
۞ وَقَيَّضْنَا
और मुक़र्रर किए हमने
لَهُمْ
उनके लिए
قُرَنَآءَ
कुछ साथी
فَزَيَّنُوا۟
तो उन्होंने ख़ुशनुमा बना दिया
لَهُم
उनके लिए
مَّا
जो कुछ
بَيْنَ
(was) before them
أَيْدِيهِمْ
उनके सामने था
وَمَا
और जो कुछ
خَلْفَهُمْ
उनके पीछे था
وَحَقَّ
और साबित हो गई
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلْقَوْلُ
बात
فِىٓ
among
أُمَمٍۢ
उम्मतों में
قَدْ
तहक़ीक़
خَلَتْ
जो गुज़र चुकीं
مِن
before them
قَبْلِهِم
उनसे पहले
مِّنَ
of
ٱلْجِنِّ
जिन्नों में से
وَٱلْإِنسِ ۖ
और इन्सानों में से
إِنَّهُمْ
बेशक वो
كَانُوا۟
थे वो
خَـٰسِرِينَ
ख़सारा पाने वाले
हमने उनके लिए कुछ साथी नियुक्त कर दिए थे। फिर उन्होंने उनके आगे और उनके पीछे जो कुछ था उसे सुहाना बनाकर उन्हें दिखाया। अन्ततः उनपर भी जिन्नों और मनुष्यों के उन गिरोहों के साथ फ़ैसला सत्यापित होकर रहा, जो उनसे पहले गुज़र चुके थे। निश्चय ही वे घाटा उठानेवाले थे
तफ़्सीर:
और हमने इन काफ़िरों के लिए शैतानों में से ऐसे साथी बना दिए थे, जो हमेशा उनके साथ रहते थे। उन्होंने ही उनके दुनिया के बुरे कर्मों को सुंदर बनाकर पेश किया था, और बाद में आने वाली आख़िरत को भी, उनके हक़ में सुंदर बनाकर उसे उनके ज़ेहन से ग़ायब कर दिया था और उसकी तैयारी से ग़ाफ़िल कर दिया था। चुनांचे, उनपर जिन्नों एवं इनसानों के उन गिरोहों के साथ, जो ग़ुज़र चुके थे, यातना सिद्ध हो गई। निश्चय वे घाटा उठाने वाले लोग थे, जिन्होंने खुद अपना और अपने परिवार का नुकसान किया और जहन्नम का हक़दार बना लिया।
आयत 26
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لَا تَسْمَعُوا۟ لِهَـٰذَا ٱلْقُرْءَانِ وَٱلْغَوْا۟ فِيهِ لَعَلَّكُمْ تَغْلِبُونَ
وَقَالَ
और कहा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لَا
(Do) not
تَسْمَعُوا۟
ना तुम सुनो
لِهَـٰذَا
इस
ٱلْقُرْءَانِ
क़ुरआन को
وَٱلْغَوْا۟
और ग़ुल मचाओ
فِيهِ
उसमें
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَغْلِبُونَ
तुम ग़ालिब आ जाओ
जिन लोगों ने इनकार किया उन्होंने कहा, "इस क़ुरआन को सुनो ही मत और इसके बीच में शोर-गुल मचाओ, ताकि तुम प्रभावी रहो।"
तफ़्सीर:
और काफ़िरों ने, तर्कों का सामना करने से विवश होकर एक-दूसरे को नसीहत करते हुए कहा कि उस क़ुरआन को न सुनो, जो मुहम्मद तुम्हें पढ़कर सुनाता है, और उसकी शिक्षाओं को भी न मानो, और जब उसे पढ़ा जाए तो खूब शोर मचाओ, हो सकता है कि इस तरह तुम उससे जीत जाओ और वह उसकी तिलावत और तुम्हें उसकी ओर बुलाने से बाज़ रहे और हम उससे मुक्ति पा जाएँ।
आयत 27
فَلَنُذِيقَنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ عَذَابًۭا شَدِيدًۭا وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ أَسْوَأَ ٱلَّذِى كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
فَلَنُذِيقَنَّ
पस अलबत्ता हम ज़रूर चखाऐंगे
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
عَذَابًۭا
अज़ाब
شَدِيدًۭا
शदीद
وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ
और अलबत्ता हम ज़रूर बदला देंगे उन्हें
أَسْوَأَ
बदतरीन
ٱلَّذِى
उसका जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
अतः हम अवश्य ही उन लोगों को, जिन्होंने इनकार किया, कठोर यातना का मजा चखाएँगे, और हम अवश्य उन्हें उसका बदला देंगे, जो निकृष्टतम कर्म वे करते रहे है
तफ़्सीर:
हम अवश्य अल्लाह का इनकार करने वालों तथा उसके रसूलों को झुठलाने वालों को क़ियामत के दिन कड़ी यातना चखाएँगे और अवश्य उन्हें उनके शिर्क एवं पापों की सज़ा के तौर पर बुरा प्रतिफल देंगे।
आयत 28
ذَٰلِكَ جَزَآءُ أَعْدَآءِ ٱللَّهِ ٱلنَّارُ ۖ لَهُمْ فِيهَا دَارُ ٱلْخُلْدِ ۖ جَزَآءًۢ بِمَا كَانُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا يَجْحَدُونَ
ذَٰلِكَ
ये
جَزَآءُ
बदला है
أَعْدَآءِ
दुश्मनों का
ٱللَّهِ
अल्लाह के
ٱلنَّارُ ۖ
आग का
لَهُمْ
उनके लिए है
فِيهَا
उसमें
دَارُ
घर
ٱلْخُلْدِ ۖ
हमेशगी का
جَزَآءًۢ
बदला है
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात का
يَجْحَدُونَ
वो इन्कार करते
वह है अल्लाह के शत्रुओं का बदला - आग। उसी में उसका सदा का घर है, उसके बदले में जो वे हमारी आयतों का इनकार करते रहे
तफ़्सीर:
यह अलालह का इनकार करने वाले तथा उसके रसूलों को झूठलाने वाले अल्लाह के शत्रुओं का प्रतिकार जहन्नम है। वह उसमें सदैव रहेंगे। क्योंकि उन्होंने अल्लाह की आयतों का इनकार किया था तथा स्पष्ट सुदृढ़ प्रमाण होने के बावजूद उनपर ईमान नहीं लाए थे।
आयत 29
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ رَبَّنَآ أَرِنَا ٱلَّذَيْنِ أَضَلَّانَا مِنَ ٱلْجِنِّ وَٱلْإِنسِ نَجْعَلْهُمَا تَحْتَ أَقْدَامِنَا لِيَكُونَا مِنَ ٱلْأَسْفَلِينَ
وَقَالَ
और कहेंगे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
رَبَّنَآ
ऐ हमारे रब
أَرِنَا
दिखा हमें
ٱلَّذَيْنِ
वो दोनों जिन्होंने
أَضَلَّانَا
भटकाया हमें
مِنَ
of
ٱلْجِنِّ
जिन्नों में से
وَٱلْإِنسِ
और इन्सानों में से
نَجْعَلْهُمَا
हम कर दें उन दोनों को
تَحْتَ
नीचे
أَقْدَامِنَا
अपने क़दमों के
لِيَكُونَا
ताकि वो दोनों हो जाऐं
مِنَ
of
ٱلْأَسْفَلِينَ
सबसे निचलों में से
और जिन लोगों ने इनकार किया वे कहेंगे, "ऐ हमारे रब! हमें दिखा दे उन जिन्नों और मनुष्यों को, जिन्होंने हमको पथभ्रष़्ट किया कि हम उन्हें अपने पैरों तले डाल दे ताकि वे सबसे नीचे जा पड़े
तफ़्सीर:
तथा वह लोग कहेंगे, जिन्होंने अल्लाह का इनकार किया था और उसके रसूलों को झुठलाया थाः ऐ हमारे पालनहार! जिन्नों तथा मनुष्यों में से जिन लोगों ने हमें कुपथ किया है, उन्हें हमें दिखा दे। इबलीस को दिखा दे, जिसने कुफ़्र की राह दिखाई और उसकी ओर बुलाया, तथा आदम के उस संतान को दिखा दे, जिसने खून बहाने का सिलसिला शुरू किया। हम उन्हें जहन्नम में अपने पैरों से रौंदेंगे, ताकि वे सबसे निचले भाग वाले हो जाएँ, जिन्हें जहन्नमियों में सबसे कठिन यातना का सामना होगा।
आयत 30
إِنَّ ٱلَّذِينَ قَالُوا۟ رَبُّنَا ٱللَّهُ ثُمَّ ٱسْتَقَـٰمُوا۟ تَتَنَزَّلُ عَلَيْهِمُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ أَلَّا تَخَافُوا۟ وَلَا تَحْزَنُوا۟ وَأَبْشِرُوا۟ بِٱلْجَنَّةِ ٱلَّتِى كُنتُمْ تُوعَدُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
قَالُوا۟
कहा
رَبُّنَا
रब हमारा
ٱللَّهُ
अल्लाह है
ثُمَّ
फिर
ٱسْتَقَـٰمُوا۟
उन्होंने इस्तिक़ामत इख़्तियार की
تَتَنَزَّلُ
उतरते हैं
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्ते
أَلَّا
कि ना
تَخَافُوا۟
तुम डरो
وَلَا
और ना
تَحْزَنُوا۟
तुम ग़म करो
وَأَبْشِرُوا۟
और ख़ुश हो जाओ
بِٱلْجَنَّةِ
साथ जन्नत के
ٱلَّتِى
वो जो
كُنتُمْ
थे तुम
تُوعَدُونَ
तुम वादा दिए जाते
जिन लोगों ने कहा कि "हमारा रब अल्लाह है।" फिर इस पर दृढ़तापूर्वक जमें रहे, उनपर फ़रिश्ते उतरते है कि "न डरो और न शोकाकुल हो, और उस जन्नत की शुभ सूचना लो जिसका तुमसे वादा किया गया है
तफ़्सीर:
निश्चय जिन लोगों ने कहा कि हमारा पालनहार अल्लाह है, उसके सिवा हमारा कोई पालनहार नहीं है, और उसके आदेशों के पालन तथा उसके निषेधों से बचने में दृढ़ता दिखाते रहे, उनके पास मौत के समय फ़रिश्ते उतरते हैं और कहते हैंः तुम मौत तथा मौत के बाद के मरहलों के विषय में भय न करो, और जो कुछ दुनिया में छोड़ आए हो, उसपर ग़म न करो, तथा उस जन्नत की ख़ुशख़बरी ले लो, जिसका बचन तुम्हें दुनिया में, ईमान और नेक कर्म के बदले में दिया जाता रहा है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन आज़ा (अंगों) की गवाही का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि हमारे अपने आज़ा हमारे खिलाफ या हक में गवाही देंगे, इसलिए हर अमल में एहतियात बरतनी चाहिए।
आयत 31
نَحْنُ أَوْلِيَآؤُكُمْ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا وَفِى ٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ وَلَكُمْ فِيهَا مَا تَشْتَهِىٓ أَنفُسُكُمْ وَلَكُمْ فِيهَا مَا تَدَّعُونَ
نَحْنُ
हम
أَوْلِيَآؤُكُمْ
दोस्त हैं तुम्हारे
فِى
in
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी में
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
وَفِى
and in
ٱلْـَٔاخِرَةِ ۖ
और आख़िरत में
وَلَكُمْ
और तुम्हारे लिए
فِيهَا
उसमें
مَا
वो है जो
تَشْتَهِىٓ
चाहेंगे
أَنفُسُكُمْ
नफ़्स तुम्हारे
وَلَكُمْ
और तुम्हारे लिए
فِيهَا
उसमें
مَا
वो है जो
تَدَّعُونَ
तुम तलब करोगे
हम सांसारिक जीवन में भी तुम्हारे सहचर मित्र है और आख़िरत में भी। और वहाँ तुम्हारे लिए वह सब कुछ है, जिसकी इच्छा तुम्हारे जी को होगी। और वहाँ तुम्हारे लिए वह सब कुछ होगा, जिसका तुम माँग करोगे
तफ़्सीर:
हम सांसारिक जीवन में तुम्हारे सहायक थे। यही कारण है कि तुम्हें सही रास्ता दिखाते थे और तुम्हारी सुरक्षा करते थे। तथा आख़िरत में भी तुम्हारे सहायक हैं। इस तरह तुम्हें हमारा सहयोग हमेशा प्राप्त रहेगा। तुम्हें जन्नत में मज़े और आनंद की वह सारी चीज़ें मिलेंगी, जो तुम्हारे दिल चाहें और वहाँ तुम्हारी पसंद की वह सारी चीज़ें उपस्थित होंगी, जिनकी तुम इच्छा व्यक्त करो।
आयत 32
نُزُلًۭا مِّنْ غَفُورٍۢ رَّحِيمٍۢ
نُزُلًۭا
महमानी है
مِّنْ
from
غَفُورٍۢ
बहुत बख़्शने वाले की तरफ़ से
رَّحِيمٍۢ
निहायत रहम करने वाले की
आतिथ्य के रूप में क्षमाशील, दयावान सत्ता की ओर से"
तफ़्सीर:
तुम्हारे सत्कार के लिए यह तैयार रोज़ी है। उस पालनहार की ओर से जो अपने तौबा करने वाले बंदों के गुनाहों को माफ़ करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 33
وَمَنْ أَحْسَنُ قَوْلًۭا مِّمَّن دَعَآ إِلَى ٱللَّهِ وَعَمِلَ صَـٰلِحًۭا وَقَالَ إِنَّنِى مِنَ ٱلْمُسْلِمِينَ
وَمَنْ
और कौन
أَحْسَنُ
ज़्यादा अच्छा है
قَوْلًۭا
बात में
مِّمَّن
उससे जो
دَعَآ
बुलाए
إِلَى
to
ٱللَّهِ
तरफ़ अल्लाह के
وَعَمِلَ
और वो अमल करे
صَـٰلِحًۭا
नेक
وَقَالَ
और वो कहे
إِنَّنِى
बेशक मैं
مِنَ
of
ٱلْمُسْلِمِينَ
मुसलमानों में से हूँ
और उस व्यक्ति से बात में अच्छा कौन हो सकता है जो अल्लाह की ओर बुलाए और अच्छे कर्म करे और कहे, "निस्संदेह मैं मुस्लिम (आज्ञाकारी) हूँ?"
तफ़्सीर:
और किसी की बात उससे अच्छी नहीं हो सकती, जो अल्लाह के एक होने और उसकी शरीयत पर अमल करने की ओर बुलाए, और खुद ऐसा नेक अमल करे जो उसके पालनहार को पसंद हो और कहे किः "मैं अल्लाह की आज्ञा का पालन करने वाला तथा उसके सम्मुख झुकने वाला हूँ।" जो भी यह सारे कार्य करेगा, वही, लोगों में सबसे अच्छी बात करने वाला होगा।
आयत 34
وَلَا تَسْتَوِى ٱلْحَسَنَةُ وَلَا ٱلسَّيِّئَةُ ۚ ٱدْفَعْ بِٱلَّتِى هِىَ أَحْسَنُ فَإِذَا ٱلَّذِى بَيْنَكَ وَبَيْنَهُۥ عَدَٰوَةٌۭ كَأَنَّهُۥ وَلِىٌّ حَمِيمٌۭ
وَلَا
और नहीं
تَسْتَوِى
बराबर हो सकती
ٱلْحَسَنَةُ
नेकी
وَلَا
और ना
ٱلسَّيِّئَةُ ۚ
बुराई
ٱدْفَعْ
दूर कीजिए
بِٱلَّتِى
साथ उस (तरीक़े )के जो
هِىَ
वो
أَحْسَنُ
सबसे अच्छा है
فَإِذَا
तो यकायक
ٱلَّذِى
वो जो
بَيْنَكَ
दर्मियान आपके
وَبَيْنَهُۥ
और दर्मियान उसके
عَدَٰوَةٌۭ
अदावत है
كَأَنَّهُۥ
गोया कि वो
وَلِىٌّ
दोस्त है
حَمِيمٌۭ
निहायत गहरा
भलाई और बुराई समान नहीं है। तुम (बुरे आचरण की बुराई को) अच्छे से अच्छे आचरण के द्वारा दूर करो। फिर क्या देखोगे कि वही व्यक्ति तुम्हारे और जिसके बीच वैर पड़ा हुआ था, जैसे वह कोई घनिष्ठ मित्र है
तफ़्सीर:
नेकियाँ और इबादतें करना, जिनसे अल्लाह प्रसन्न होता है, और गुनाह एवं अवज्ञा में लिप्त रहना, जिनसे अल्लाह क्रोधित होता होता, दोनों समान नहीं हैं। जो आपके साथ बुरा व्यवहार करे, उसके बुरे व्यवहार की बुराई उत्तम व्यवहार के द्वारा दूर करें। यदि आप ऐसा करते हैं, तो देखेंगे कि आपके और जिसके बीच पहले सख्त बैर था, वह आपका हार्दिक और घनिष्ट मित्र बन गया है।
आयत 35
وَمَا يُلَقَّىٰهَآ إِلَّا ٱلَّذِينَ صَبَرُوا۟ وَمَا يُلَقَّىٰهَآ إِلَّا ذُو حَظٍّ عَظِيمٍۢ
وَمَا
और नहीं
يُلَقَّىٰهَآ
डाला जाता उसे
إِلَّا
मगर
ٱلَّذِينَ
उन पर जिन्होंने
صَبَرُوا۟
सब्र किया
وَمَا
और नहीं
يُلَقَّىٰهَآ
डाला जाता उसे
إِلَّا
मगर
ذُو
(to the) owner
حَظٍّ
(of) fortune
عَظِيمٍۢ
बड़े नसीब वाले पर
किन्तु यह चीज़ केवल उन लोगों को प्राप्त होती है जो धैर्य से काम लेते है, और यह चीज़ केवल उसको प्राप्त होती है जो बड़ा भाग्यशाली होता है
तफ़्सीर:
और यह अच्छा गुण उन्हीं को प्राप्त होता है, जो अत्याचार तथा लोगों के बुरे व्यवहार पर सब्र करता है, और यह बड़े भाग्यशाली लोगों को ही प्राप्त होता है, क्योंकि इसमें अपार भलाइयाँ और अनगिनत लाभ निहित हैं।
आयत 36
وَإِمَّا يَنزَغَنَّكَ مِنَ ٱلشَّيْطَـٰنِ نَزْغٌۭ فَٱسْتَعِذْ بِٱللَّهِ ۖ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ
وَإِمَّا
और अगर
يَنزَغَنَّكَ
वसवसा आए आपको
مِنَ
from
ٱلشَّيْطَـٰنِ
शैतान की तरफ़ से
نَزْغٌۭ
कोई वसवसा
فَٱسْتَعِذْ
पस पनाह माँग लीजिए
بِٱللَّهِ ۖ
अल्लाह की
إِنَّهُۥ
बेशक वो
هُوَ
वो ही है
ٱلسَّمِيعُ
ख़ूब सुनने वाला
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब जानने वाला
और यदि शैतान की ओर से कोई उकसाहट तुम्हें चुभे तो अल्लाह की शरण माँग लो। निश्चय ही वह सबकुछ सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
और यदि किसी भी समय शैतान आपको बुराई पर उकसाए, तो अल्लाह को मज़बूती से पकड़ लें और उसीका शरण लें। निःसंदेह वही आपकी बातों को सुनने वाला तथा आपका हाल जानने वाला है।
आयत 37
وَمِنْ ءَايَـٰتِهِ ٱلَّيْلُ وَٱلنَّهَارُ وَٱلشَّمْسُ وَٱلْقَمَرُ ۚ لَا تَسْجُدُوا۟ لِلشَّمْسِ وَلَا لِلْقَمَرِ وَٱسْجُدُوا۟ لِلَّهِ ٱلَّذِى خَلَقَهُنَّ إِن كُنتُمْ إِيَّاهُ تَعْبُدُونَ
وَمِنْ
And of
ءَايَـٰتِهِ
और उसकी निशानियों में से है
ٱلَّيْلُ
रात
وَٱلنَّهَارُ
और दिन
وَٱلشَّمْسُ
और सूरज
وَٱلْقَمَرُ ۚ
और चाँद
لَا
(Do) not
تَسْجُدُوا۟
ना तुम सजदा करो
لِلشَّمْسِ
सूरज को
وَلَا
और ना
لِلْقَمَرِ
चाँद को
وَٱسْجُدُوا۟
बल्कि सजदा करो
لِلَّهِ
अल्लाह ही को
ٱلَّذِى
वो जिस ने
خَلَقَهُنَّ
पैदा किया उन्हें
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
إِيَّاهُ
सिर्फ़ उसी की
تَعْبُدُونَ
तुम इबादत करते
रात और दिन और सूर्य और चन्द्रमा उसकी निशानियों में से है। तुम न तो सूर्य को सजदा करो और न चन्द्रमा को, बल्कि अल्लाह को सजदा करो जिसने उन्हें पैदा किया, यदि तुम उसी की बन्दगी करनेवाले हो
तफ़्सीर:
और अल्लाह की महानता तथा उसके एक होने का पता देने वाली निशानियों में से रात और दिन का एक-दूसरे के बाद आना-जाना भी है और सूरज तथा चाँद भी हैं। (ऐ लोगो) तुम सूरज को सजदा न करो और चाँद को भी सजदा न करो। बल्कि केवल उस अल्लाह को सजदा करो, जिसने इन सब को पैदा किया है, यदि तुम सचमुच उसीकी वंदना करते हो।
आयत 38
فَإِنِ ٱسْتَكْبَرُوا۟ فَٱلَّذِينَ عِندَ رَبِّكَ يُسَبِّحُونَ لَهُۥ بِٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ وَهُمْ لَا يَسْـَٔمُونَ ۩
فَإِنِ
फिर अगर
ٱسْتَكْبَرُوا۟
वो तकब्बुर करें
فَٱلَّذِينَ
तो वो जो
عِندَ
पास हैं
رَبِّكَ
आपके रब के
يُسَبِّحُونَ
वो तस्बीह करते हैं
لَهُۥ
उसकी
بِٱلَّيْلِ
रात
وَٱلنَّهَارِ
और दिन
وَهُمْ
और वो
لَا
(do) not
يَسْـَٔمُونَ ۩
नहीं वो उकताते
लेकिन यदि वे घमंड करें (और अल्लाह को याद न करें), तो जो फ़रिश्ते तुम्हारे रब के पास है वे तो रात और दिन उसकी तसबीह करते ही रहते है और वे उकताते नहीं
तफ़्सीर:
तथा यदि वे अभिमान करें, मुँह मोड़ लें तथा उस अल्लाह को सजदा न करें, जिसने कायनात की रचना की है, तो जो फ़रिश्ते अल्लाह के निकट हैं. वे रात दिन अल्लाह की पवित्रता का वर्णन और तारीफ़ करते रहते हैं, और वे उसकी इबादत से थकते नहीं हैं।
आयत 39
وَمِنْ ءَايَـٰتِهِۦٓ أَنَّكَ تَرَى ٱلْأَرْضَ خَـٰشِعَةًۭ فَإِذَآ أَنزَلْنَا عَلَيْهَا ٱلْمَآءَ ٱهْتَزَّتْ وَرَبَتْ ۚ إِنَّ ٱلَّذِىٓ أَحْيَاهَا لَمُحْىِ ٱلْمَوْتَىٰٓ ۚ إِنَّهُۥ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌ
وَمِنْ
And among
ءَايَـٰتِهِۦٓ
और उसकी निशानियों में से है
أَنَّكَ
बेशक आप
تَرَى
आप देखते हैं
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
خَـٰشِعَةًۭ
दबी हुई
فَإِذَآ
फिर जब
أَنزَلْنَا
उतारते हैं हम
عَلَيْهَا
उस पर
ٱلْمَآءَ
पानी
ٱهْتَزَّتْ
वो तरो ताज़ा हो जाती है
وَرَبَتْ ۚ
और वो उभर आती है
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِىٓ
वो जिसने
أَحْيَاهَا
ज़िन्दा किया उसे
لَمُحْىِ
अलबत्ता ज़िन्दा करने वाला है
ٱلْمَوْتَىٰٓ ۚ
मुर्दों को
إِنَّهُۥ
बेशक वो
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌ
ख़ूब क़ुदरत रखने वाला है
और यह चीज़ भी उसकी निशानियों में से है कि तुम देखते हो कि धरती दबी पड़ी है; फिर ज्यों ही हमने उसपर पानी बरसाया कि वह फबक उठी और फूल गई। निश्चय ही जिसने उसे जीवित किया, वही मुर्दों को जीवित करनेवाला है। निस्संदेह उसे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
अल्लाह की महानता, उसके एकत्व और दोबारा जीवित करके उठाने की क्षमता की निशानियों में से यह भी है कि तुम धरती को पौधों से खाली और बंजर देखते हो, फ़िर जैसे ही हम उसमें बारिश का जल उतारते हैं, वह अपने गर्भ में छिपे बीजों के बढ़ने के कारण हरकत में आ जाती है और लहलहा उठती है। निश्चित रूप से जिसने इस मरी हुई धरती में पौधे उगाकर उसे जीवित कर दिया, वह मरे हुए लोगों को भी जीवित कर सकता है और उन्हें हिसाब-किताब और बदले के लिए उठा सकता है। निश्चय अल्लाह हर चीज़ की शक्ति रखता है। न उसके लिए मरी हुई धरती को जीवित करना कुछ मुश्किल है न मरे हुए लोगों को जीवित करके क़ब्रों से उठाना।
आयत 40
إِنَّ ٱلَّذِينَ يُلْحِدُونَ فِىٓ ءَايَـٰتِنَا لَا يَخْفَوْنَ عَلَيْنَآ ۗ أَفَمَن يُلْقَىٰ فِى ٱلنَّارِ خَيْرٌ أَم مَّن يَأْتِىٓ ءَامِنًۭا يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۚ ٱعْمَلُوا۟ مَا شِئْتُمْ ۖ إِنَّهُۥ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
يُلْحِدُونَ
इल्हाद करते हैं
فِىٓ
[in]
ءَايَـٰتِنَا
हमारी आयात में
لَا
(are) not
يَخْفَوْنَ
नहीं वो छुप सकते
عَلَيْنَآ ۗ
हम पर
أَفَمَن
क्या फिर वो जो
يُلْقَىٰ
डाला जाएगा
فِى
in
ٱلنَّارِ
आग में
خَيْرٌ
बेहतर है
أَم
या
مَّن
वो जो
يَأْتِىٓ
आएगा
ءَامِنًۭا
अमन में
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ ۚ
क़यामत के
ٱعْمَلُوا۟
अमल करे
مَا
जो
شِئْتُمْ ۖ
चाहो तुम
إِنَّهُۥ
बेशक वो
بِمَا
उसे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
بَصِيرٌ
ख़ूब देखने वाला है
जो लोग हमारी आयतों में कुटिलता की नीति अपनाते है वे हमसे छिपे हुए नहीं हैं, तो क्या जो व्यक्ति आग में डाला जाए वह अच्छा है या वह जो क़ियामत के दिन निश्चिन्त होकर आएगा? जो चाहो कर लो, तुम जो कुछ करते हो वह तो उसे देख ही रहा है
तफ़्सीर:
जो लोग हमारी आयतों के बारे में ग़लत नीति अपनाते हैं; उनका इनकार करते हैं, उन्हें झुठलाते हैं और उनके अर्थ को बदल देते हैं, उनका हाल अल्लाह से छिपा नहीं है। हम उन्हें जानते हैं। क्या जो व्यक्ति जहन्नम में डाला जाएगा वह उत्तम है अथवा वह व्यक्ति जो क़ियामत के दिन यातना से निर्भय होकर आएगा? (ऐ लोगो!) अच्छा-बुरा जो चाहो, करो। हमने तुम्हारे सामने अच्छाई तथा बुराई को खोल-खोलकर बयान कर दिया है। तुम, दोनों में से जो भी करते हो, अल्लाह उसे देख रहा है। उससे तुम्हारा कोई कर्म छिपता नहीं है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
बुराई का जवाब अच्छाई से देने की ताकीद का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि बुराई का जवाब अच्छाई से देना दुश्मनी को दोस्ती में बदल सकता है।
आयत 41
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِٱلذِّكْرِ لَمَّا جَآءَهُمْ ۖ وَإِنَّهُۥ لَكِتَـٰبٌ عَزِيزٌۭ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
بِٱلذِّكْرِ
ज़िक्र (क़ुरआन)का
لَمَّا
जब
جَآءَهُمْ ۖ
वो आया उनके पास
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
لَكِتَـٰبٌ
अलबत्ता एक किताब है
عَزِيزٌۭ
बहुत ज़बरदस्त
जिन लोगों ने अनुस्मृति का इनकार किया, जबकि वह उनके पास आई, हालाँकि वह एक प्रभुत्वशाली किताब है, (तो न पूछो कि उनका कितना बुरा परिणाम होगा)
तफ़्सीर:
निश्चय जिन लोगों ने अल्लाह की जानिब से क़ुरआन आने के पश्चात, उसका इनकार कर दिया, उन्हें क़ियामत के दिन यातना का सामना करना पड़ेगा। निःसंदेह यह एक ज़बरदस्त और सुरक्षित पुस्तक है। न कोई परिवर्तन करने वाला उसमें परिवर्तन कर सकता है, न कोई बदलने वाला उसे बदल सकता है।
आयत 42
لَّا يَأْتِيهِ ٱلْبَـٰطِلُ مِنۢ بَيْنِ يَدَيْهِ وَلَا مِنْ خَلْفِهِۦ ۖ تَنزِيلٌۭ مِّنْ حَكِيمٍ حَمِيدٍۢ
لَّا
Not
يَأْتِيهِ
नहीं आ सकता उस पर
ٱلْبَـٰطِلُ
बातिल
مِنۢ
from
بَيْنِ
before it
يَدَيْهِ
उसके सामने से
وَلَا
और ना
مِنْ
from
خَلْفِهِۦ ۖ
उसके पीछे से
تَنزِيلٌۭ
नाज़िल करदा है
مِّنْ
from
حَكِيمٍ
हिकमत वाले की तरफ़ से
حَمِيدٍۢ
बहुत तारीफ़
असत्य उस तक न उसके आगे से आ सकता है और न उसके पीछे से; अवतरण है उसकी ओर से जो अत्यन्त तत्वदर्शी, प्रशंसा के योग्य है
तफ़्सीर:
असत्य न उसके आगे से आ सकता है और न उसके पीछे से। न कमी-बेशी के रूप में, न शाब्दिक या आर्थिक बदलाव के रूप में। यह उस अल्लाह की तरफ़ से उतरा है, जो रचना, निर्णय एवं शरीयत में हिकमत वाला है, हर हाल में प्रशंसित है।
आयत 43
مَّا يُقَالُ لَكَ إِلَّا مَا قَدْ قِيلَ لِلرُّسُلِ مِن قَبْلِكَ ۚ إِنَّ رَبَّكَ لَذُو مَغْفِرَةٍۢ وَذُو عِقَابٍ أَلِيمٍۢ
مَّا
नहीं
يُقَالُ
कहा जाता
لَكَ
आपसे
إِلَّا
मगर
مَا
वो जो
قَدْ
तहक़ीक़
قِيلَ
कहा गया
لِلرُّسُلِ
रसूलों से
مِن
before you
قَبْلِكَ ۚ
आपसे पहले
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
لَذُو
(is) Possessor
مَغْفِرَةٍۢ
अलबत्ता बख़्शिश वाला है
وَذُو
and Possessor
عِقَابٍ
और सज़ा देने वाला है
أَلِيمٍۢ
दर्दनाक
तुम्हें बस वही कहा जा रहा है, जो उन रसूलों को कहा जा चुका है, जो तुमसे पहले गुज़र चुके है। निस्संदेह तुम्हारा रब बड़ा क्षमाशील है और दुखद दंड देनेवाला भी
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आपके संबंध में भी वही झुठलाने की बातें कही जा रही हैं, जो आपसे पहले के रसूलों के बारे में कही जा चुकी हैं। अतः, आप धैर्य रखें। क्योंकि आपका पालनहार अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला और तौबा न करने वालों तथा अपने गुनाह पर अड़े रहने वालों को कठोर सज़ा देने वाला है।
आयत 44
وَلَوْ جَعَلْنَـٰهُ قُرْءَانًا أَعْجَمِيًّۭا لَّقَالُوا۟ لَوْلَا فُصِّلَتْ ءَايَـٰتُهُۥٓ ۖ ءَا۬عْجَمِىٌّۭ وَعَرَبِىٌّۭ ۗ قُلْ هُوَ لِلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ هُدًۭى وَشِفَآءٌۭ ۖ وَٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ فِىٓ ءَاذَانِهِمْ وَقْرٌۭ وَهُوَ عَلَيْهِمْ عَمًى ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ يُنَادَوْنَ مِن مَّكَانٍۭ بَعِيدٍۢ
وَلَوْ
और अगर
جَعَلْنَـٰهُ
बनाते हम उसे
قُرْءَانًا
क़ुरआन
أَعْجَمِيًّۭا
अजमी
لَّقَالُوا۟
अलबत्ता वो कहते
لَوْلَا
क्यों ना
فُصِّلَتْ
खोल कर बयान की गईं
ءَايَـٰتُهُۥٓ ۖ
आयात उसकी
ءَا۬عْجَمِىٌّۭ
क्या अजमी (किताब)
وَعَرَبِىٌّۭ ۗ
और अर्बी (रसूल)
قُلْ
कह दीजिए
هُوَ
वो
لِلَّذِينَ
उनके लिए जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
هُدًۭى
हिदायत
وَشِفَآءٌۭ ۖ
और शिफ़ा है
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाए
فِىٓ
in
ءَاذَانِهِمْ
उनके कानों में
وَقْرٌۭ
बोझ है
وَهُوَ
और वो
عَلَيْهِمْ
उन पर
عَمًى ۚ
अंधापन है
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
يُنَادَوْنَ
जो पुकारे जाते हैं
مِن
from
مَّكَانٍۭ
जगह से
بَعِيدٍۢ
दूर की
यदि हम उसे ग़ैर अरबी क़ुरआन बनाते तो वे कहते कि "उसकी आयतें क्यों नहीं (हमारी भाषा में) खोलकर बयान की गई? यह क्या कि वाणी तो ग़ैर अरबी है और व्यक्ति अरबी?" कहो, "वह उन लोगों के लिए जो ईमान लाए मार्गदर्शन और आरोग्य है, किन्तु जो लोग ईमान नहीं ला रहे है उनके कानों में बोझ है और वह (क़ुरआन) उनके लिए अन्धापन (सिद्ध हो रहा) है, वे ऐसे है जिनको किसी दूर के स्थान से पुकारा जा रहा हो।"
तफ़्सीर:
यदि हम इस क़ुरआन को अरबों की भाषा के अलावा किसी दूसरी भाषा में उतारते, तो उनमें से काफ़िर लोग कहते : इसकी आयतों को स्पष्ट क्यों नहीं किया गया कि हम उन्हें समझते? क्या क़ुरआन ग़ैर अरबी भाषा में है और उसे लाने वाला अरबी भाषी है? (ऐ रसूल!) आप इनसे कह दें : क़ुरआन - अल्लाह पर ईमान रखने वालों तथा उसके रसूलों की पुष्टि करने वालों के लिए - गुमराही से मार्गदर्शन, तथा दिलों के भीतर जो अज्ञानता और उससे संबंधित बीमारियाँ हैं, उनसे आरोग्य है। और जो लोग अल्लाह पर ईमान नहीं रखते, उनके कानों में डाट (बहरापन) है। तथा यह उनके हक़ में अंधापन है, जिसकी वजह से वे इसे नहीं समझते हैं। इन विशेषताओं के वाहक लोग दूर से पुकारे जाने वालों की तरह हैं। तो भला वे पुकारने वाले की आवाज़ कैसे सुन सकते हैं?!
आयत 45
وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ فَٱخْتُلِفَ فِيهِ ۗ وَلَوْلَا كَلِمَةٌۭ سَبَقَتْ مِن رَّبِّكَ لَقُضِىَ بَيْنَهُمْ ۚ وَإِنَّهُمْ لَفِى شَكٍّۢ مِّنْهُ مُرِيبٍۢ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
ءَاتَيْنَا
दी हमने
مُوسَى
मूसा को
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
فَٱخْتُلِفَ
पस इख़्तिलाफ़ किया गया
فِيهِ ۗ
उसमें
وَلَوْلَا
और अगर ना होती
كَلِمَةٌۭ
एक बात
سَبَقَتْ
जो पहले हो चुकी
مِن
from
رَّبِّكَ
आपके रब की तरफ़ से
لَقُضِىَ
अलबत्ता फ़ैसला कर दिया जाता
بَيْنَهُمْ ۚ
दर्मियान उनके
وَإِنَّهُمْ
और बेशक वो
لَفِى
surely (are) in
شَكٍّۢ
अलबत्ता शक में हैं
مِّنْهُ
उसकी तरफ़ से
مُرِيبٍۢ
बेचैन करने वाले
हमने मूसा को भी किताब प्रदान की थी, फिर उसमें भी विभेद किया गया। यदि तुम्हारे रब की ओर से पहले ही से एक बात निश्चित न हो चुकी होती तो उनके बीत फ़ैसला चुका दिया जाता। हालाँकि वे उसकी ओर से उलझन में डाल देनेवाले सन्देह में पड़े हुए है
तफ़्सीर:
और हमने मूसा को तौरात प्रदान की, तो उसमें विभेद किया गया। अतः कुछ लोग उसपर ईमान लाए और कुछ ने इनकार किया। और यदि अल्लाह ने पहले से ही बंदों के बीच विभेद वाली वस्तुओं के बारे में, क़ियामत के दिन निर्णय करने का वचन न दिया होता, तो तौरात में विभेद करने वालों के बीच निर्णय कर देता और बता देता कि सत्य पर कौन है और असत्य पर कौन। फिर सत्य वालों को सम्मानित और बातिल परस्तों को अपमानित करता। वास्तव में, काफ़िर क़ुरआन के बारे में संदेह और शंका में पड़े हुए हैं।
आयत 46
مَّنْ عَمِلَ صَـٰلِحًۭا فَلِنَفْسِهِۦ ۖ وَمَنْ أَسَآءَ فَعَلَيْهَا ۗ وَمَا رَبُّكَ بِظَلَّـٰمٍۢ لِّلْعَبِيدِ
مَّنْ
जिसने
عَمِلَ
अमल किया
صَـٰلِحًۭا
नेक
فَلِنَفْسِهِۦ ۖ
तो अपने ही लिए है
وَمَنْ
और जिसने
أَسَآءَ
बुरा किया
فَعَلَيْهَا ۗ
तो उसी पर है
وَمَا
और नहीं
رَبُّكَ
रब आपका
بِظَلَّـٰمٍۢ
कुछ भी ज़ुल्म करने वाला
لِّلْعَبِيدِ
बन्दों पर
जिस किसी ने अच्छा कर्म किया तो अपने ही लिए और जिस किसी ने बुराई की, तो उसका वबाल भी उसी पर पड़ेगा। वास्तव में तुम्हारा रब अपने बन्दों पर तनिक भी ज़ुल्म नहीं करता
तफ़्सीर:
जो सदाचार करेगा, उसके सदाचार का लाभ उसीको होगा। किसी का सुकर्म अल्लाह को लाभ नहीं देगा। और जो दुराचार करेगा, उसका खामियाज़ा उसे ही भुगतना होगा। अल्लाह को किसी बंदे के पाप से कुछ क्षति नहीं होने वाली। अल्लाह हर एक को उसके कर्म के अनुसार बदला देगा। (ऐ रसूल) आपका पालनहार अपने बंदो पर तनिक भी अत्याचार नहीं करता। न किसी की एक नेकी घटाता है, न किसी का एक गुनाह बढ़ाता है।
आयत 47
۞ إِلَيْهِ يُرَدُّ عِلْمُ ٱلسَّاعَةِ ۚ وَمَا تَخْرُجُ مِن ثَمَرَٰتٍۢ مِّنْ أَكْمَامِهَا وَمَا تَحْمِلُ مِنْ أُنثَىٰ وَلَا تَضَعُ إِلَّا بِعِلْمِهِۦ ۚ وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ أَيْنَ شُرَكَآءِى قَالُوٓا۟ ءَاذَنَّـٰكَ مَا مِنَّا مِن شَهِيدٍۢ
۞ إِلَيْهِ
उसी की तरफ़
يُرَدُّ
लौटाया जाता है
عِلْمُ
इल्म
ٱلسَّاعَةِ ۚ
क़यामत का
وَمَا
और नहीं
تَخْرُجُ
निकलता
مِن
any
ثَمَرَٰتٍۢ
फलों में से ( कोई फल)
مِّنْ
from
أَكْمَامِهَا
अपने ग़िलाफ़ों में से
وَمَا
और नहीं
تَحْمِلُ
हामिला होती
مِنْ
any
أُنثَىٰ
कोई मादा
وَلَا
और ना
تَضَعُ
वो जन्म देती है
إِلَّا
मगर
بِعِلْمِهِۦ ۚ
उसके इल्म से
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يُنَادِيهِمْ
वो पुकारेगा उन्हें
أَيْنَ
कहाँ हैं
شُرَكَآءِى
शरीक मेरे
قَالُوٓا۟
वो कहेंगे
ءَاذَنَّـٰكَ
अर्ज़ कर चुके हम तुझसे
مَا
नहीं है
مِنَّا
हम में से
مِن
any
شَهِيدٍۢ
कोई गवाह
उस घड़ी का ज्ञान अल्लाह की ओर फिरता है। जो फल भी अपने कोषों से निकलते है और जो मादा भी गर्भवती होती है और बच्चा जनती है, अनिवार्यतः उसे इन सबका ज्ञान होता है। जिस दिन वह उन्हें पुकारेगा, "कहाँ है मेरे साझीदार?" वे कहेंगे, "हम तेरे समक्ष खुल्लम-ख़ुल्ला कह चुके है कि हममें से कोई भी इसका गवाह नहीं।"
तफ़्सीर:
क़ियामत का ज्ञान केवल अल्लाह की ओर लौटाया जाता है; क्योंकि केवल वही जानता है कि क़ियामत कब घटित होगी, इसे कोई और नहीं जानता। तथा जो फल अपने गाभों से निकलते हैं और जो मादा गर्भ धारण करती है और बच्चा जनती है, सबका ज्ञान अल्लाह को है। इनमें से कोई भी चीज़ उससे नहीं छूटती। और जिस दिन अल्लाह उन बहुदेववादियों को, जो उसके साथ मूर्तियों की पूजा किया करते थे, पुकारकर ; उन्हें इन मूर्तियों की इबादत पर फटकार लगाते हुए कहेगा : कहाँ हैं मेरे वे साझी, जिन्हें तुमने साझेदार समझ रखा था? मुश्रिक कहेंगे : हम तेरे सामने स्वीकार करते हैं कि अब हममें से कोई भी इस बात की गवाही नहीं देता कि तेरा कोई साझी है।
आयत 48
وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَدْعُونَ مِن قَبْلُ ۖ وَظَنُّوا۟ مَا لَهُم مِّن مَّحِيصٍۢ
وَضَلَّ
और गुम हो जाऐंगे
عَنْهُم
उनसे
مَّا
जिन्हें
كَانُوا۟
थे वो
يَدْعُونَ
वो पुकारते
مِن
before
قَبْلُ ۖ
इससे पहले
وَظَنُّوا۟
और वो समझ लेंगे
مَا
नहीं है
لَهُم
उनके लिए
مِّن
any
مَّحِيصٍۢ
कोई जाए पनाह
और जिन्हें वे पहले पुकारा करते थे वे उनसे गुम हो जाएँगे। और वे समझ लेंगे कि उनके लिए कोई भी भागने की जगह नहीं है
तफ़्सीर:
और वे मूर्तियाँ उनसे ग़ायब हो जाएँगी, जिन्हें वे पुकारा करते थे और उन्हें यह विश्वास हो जाएगा कि उनके लिए अल्लाह की यातना से भागने और शरण लेने का कोई स्थान नहीं है।
आयत 49
لَّا يَسْـَٔمُ ٱلْإِنسَـٰنُ مِن دُعَآءِ ٱلْخَيْرِ وَإِن مَّسَّهُ ٱلشَّرُّ فَيَـُٔوسٌۭ قَنُوطٌۭ
لَّا
(Does) not
يَسْـَٔمُ
नहीं उक्ताता
ٱلْإِنسَـٰنُ
इन्सान
مِن
of
دُعَآءِ
दुआ से
ٱلْخَيْرِ
भलाई की
وَإِن
और अगर
مَّسَّهُ
पहुँचता है उसे
ٱلشَّرُّ
शर
فَيَـُٔوسٌۭ
तो निहायत मायूस
قَنُوطٌۭ
बहुत ना उम्मीद (हो जाता है)
मनुष्य भलाई माँगने से नहीं उकताता, किन्तु यदि उसे कोई तकलीफ़ छू जाती है तो वह निराश होकर आस छोड़ बैठता है
तफ़्सीर:
मनुष्य स्वास्थ्य, धन एवं संतान आदि नेमतें माँगने से नहीं थकता है, लेकिन यदि वह ग़रीबी या बीमारी आदि चीज़ों से ग्रस्त होता है, तो अल्लाह की दया से बहुत निराश और हताश हो जाता है।
आयत 50
وَلَئِنْ أَذَقْنَـٰهُ رَحْمَةًۭ مِّنَّا مِنۢ بَعْدِ ضَرَّآءَ مَسَّتْهُ لَيَقُولَنَّ هَـٰذَا لِى وَمَآ أَظُنُّ ٱلسَّاعَةَ قَآئِمَةًۭ وَلَئِن رُّجِعْتُ إِلَىٰ رَبِّىٓ إِنَّ لِى عِندَهُۥ لَلْحُسْنَىٰ ۚ فَلَنُنَبِّئَنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِمَا عَمِلُوا۟ وَلَنُذِيقَنَّهُم مِّنْ عَذَابٍ غَلِيظٍۢ
وَلَئِنْ
और अलबत्ता अगर
أَذَقْنَـٰهُ
चखाते हैं हम उसे
رَحْمَةًۭ
कोई रहमत
مِّنَّا
अपनी तरफ़ से
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद
ضَرَّآءَ
तक्लीफ़ के
مَسَّتْهُ
जो पहुँचती है उसे
لَيَقُولَنَّ
अलबत्ता वो ज़रूर कहता है
هَـٰذَا
ये
لِى
मेरे लिए है
وَمَآ
और नहीं
أَظُنُّ
मैं गुमान करता
ٱلسَّاعَةَ
क़यामत को
قَآئِمَةًۭ
क़ायम होने वाली
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
رُّجِعْتُ
लौटाया गया मैं
إِلَىٰ
to
رَبِّىٓ
तरफ़ अपने रब के
إِنَّ
यक़ीनन
لِى
मेरे लिए
عِندَهُۥ
उसके पास
لَلْحُسْنَىٰ ۚ
अलबत्ता भलाई है
فَلَنُنَبِّئَنَّ
पस अलबत्ता हम ज़रूर ख़बर देंगे
ٱلَّذِينَ
उन्हें जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
بِمَا
उसकी जो
عَمِلُوا۟
उन्होंने अमल किए
وَلَنُذِيقَنَّهُم
और अलबत्ता हम ज़रूर चखाऐंगे उन्हें
مِّنْ
of
عَذَابٍ
a punishment
غَلِيظٍۢ
सख़्त अज़ाब में से
और यदि उस तकलीफ़ के बाद, जो उसे पहुँची, हम उसे अपनी दयालुता का आस्वादन करा दें तो वह निश्चय ही कहेंगा, "यह तो मेरा हक़ ही है। मैं तो यह नहीं समझता कि वह, क़ियामत की घड़ी, घटित होगी और यदि मैं अपने रब की ओर लौटाया भी गया तो अवश्य ही उसके पास मेरे लिए अच्छा पारितोषिक होगा।" फिर हम उन लोगों को जिन्होंने इनकार किया, अवश्य बताकर रहेंगे, जो कुछ उन्होंने किया होगा। और हम उन्हें अवश्य ही कठोर यातना का मज़ा चखाएँगे
तफ़्सीर:
और यदि हम उसे विपत्ति और बीमारी के बाद स्वास्थ्य, धन और सुख का स्वाद चखाएँ, तो निश्चय वह कहेगा : यह तो मेरे ही लिए है; क्योंकि मैं इसका योग्य और हक़दार हूँ। और मैं नहीं समझता कि क़ियामत आने वाली है। यदि मान भी लिया जाए कि क़ियामत आएगी, तो अल्लाह के पास भी मुझे संपन्नता और धन प्राप्त होगा। अतः जिस तरह उसने मेरे उसका हक़दार होने के कारण इस दुनिया में मुझ पर अनुग्रह किया है, उसी तरह आख़िरत में भी मुझ पर अनुग्रह करेगा। तो हम अल्लाह के साथ कुफ़्र करने वालों को ज़रूर उनके कुफ़्र और पापों से सूचित करेंगे और उन्हें ज़रूर कठोरतम यातना का स्वाद चखाएँगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन की हिफाज़त और इंसान की नाशुक्री की फितरत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि तकलीफ में दुआ मांगना और आराम में गफलत करना इंसान की आम कमज़ोरी है, इससे बचना चाहिए।
आयत 51
وَإِذَآ أَنْعَمْنَا عَلَى ٱلْإِنسَـٰنِ أَعْرَضَ وَنَـَٔا بِجَانِبِهِۦ وَإِذَا مَسَّهُ ٱلشَّرُّ فَذُو دُعَآءٍ عَرِيضٍۢ
وَإِذَآ
और जब
أَنْعَمْنَا
इनआम करते हैं हम
عَلَى
upon
ٱلْإِنسَـٰنِ
इन्सान पर
أَعْرَضَ
वो ऐराज़ करता है
وَنَـَٔا
और वो फेर लेता है
بِجَانِبِهِۦ
पहलू अपना
وَإِذَا
और जब
مَسَّهُ
पहुँचती है उसे
ٱلشَّرُّ
तक्लीफ़
فَذُو
then (he is) full
دُعَآءٍ
तो दुआ करने वाला हो जाता है
عَرِيضٍۢ
लम्बी चौड़ी
जब हम मनुष्य पर अनुकम्पा करते है तो वह ध्यान में नहीं लाता और अपना पहलू फेर लेता है। किन्तु जब उसे तकलीफ़ छू जाती है, तो वह लम्बी-चौड़ी प्रार्थनाएँ करने लगता है
तफ़्सीर:
और जब हम मनुष्य को स्वास्थ्य और सुख आदि प्रदान करते हैं, तो वह अल्लाह को याद करने और उसका आज्ञापालन करने से लापरवाह हो जाता है और अहंकार में आकर मुँह मोड़ लेता है। परंतु जब वह बीमारी और ग़रीबा आदि से ग्रस्त होता है, तो अल्लाह से बहुत दुआएँ करता है; उससे अपनी विपत्ति की शिकायत करता है, ताकि वह उसे उससे दूर कर दे। इस तरह, वह न तो अनुग्रह प्राप्त होने पर अपने पालनहार का शुक्रिया अदा करता है और न ही किसी विपत्ति से पीड़ित होने पर धैर्य से काम लेता है।
आयत 52
قُلْ أَرَءَيْتُمْ إِن كَانَ مِنْ عِندِ ٱللَّهِ ثُمَّ كَفَرْتُم بِهِۦ مَنْ أَضَلُّ مِمَّنْ هُوَ فِى شِقَاقٍۭ بَعِيدٍۢ
قُلْ
कह दीजिए
أَرَءَيْتُمْ
क्या ग़ौर किया तुमने
إِن
अगर
كَانَ
है वो
مِنْ
from
عِندِ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
ثُمَّ
फिर
كَفَرْتُم
कुफ़्र किया तुमने
بِهِۦ
उसका
مَنْ
कौन
أَضَلُّ
ज़्यादा भटका हुआ है
مِمَّنْ
उससे जो
هُوَ
वो
فِى
(is) in
شِقَاقٍۭ
मुख़ालफ़त में है
بَعِيدٍۢ
बहुत दूर की
कह दो, "क्या तुमने विचार किया, यदि वह (क़ुरआन) अल्लाह की ओर सो ही हुआ और तुमने उसका इनकार किया तो उससे बढ़कर भटका हुआ और कौन होगा जो विरोध में बहुत दूर जा पड़ा हो?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन झुठलाने वाले मुश्रिकों से कह दें : मुझे बताओ कि यदि यह क़ुरआन अल्लाह की ओर से है, फिर भी तुम इसका इनकार कर रहे हो और इसे झुठला रहे हो, तो (अल्लाह के पास) तुम्हारा क्या हाल होगा?! और उससे अधिक पथभ्रष्ट कौन है, जो सत्य से दुश्मनी रखे, जबकि वह प्रकट हो चुका है तथा उसका तर्क और उसकी प्रबलता स्पष्ट है?!
आयत 53
سَنُرِيهِمْ ءَايَـٰتِنَا فِى ٱلْـَٔافَاقِ وَفِىٓ أَنفُسِهِمْ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَهُمْ أَنَّهُ ٱلْحَقُّ ۗ أَوَلَمْ يَكْفِ بِرَبِّكَ أَنَّهُۥ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ شَهِيدٌ
سَنُرِيهِمْ
अनक़रीब हम दिखाएँगे उन्हे
ءَايَـٰتِنَا
निशानियाँ अपनी
فِى
in
ٱلْـَٔافَاقِ
आफ़ाक़ / अतराफ़ में
وَفِىٓ
and in
أَنفُسِهِمْ
और उनके नफ़्सों में
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَتَبَيَّنَ
वाज़ेह हो जाएगा
لَهُمْ
उनके लिए
أَنَّهُ
कि बेशक वो
ٱلْحَقُّ ۗ
हक़ है
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَكْفِ
काफ़ी
بِرَبِّكَ
आपका रब (उस पर)
أَنَّهُۥ
कि बेशक वो
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
شَهِيدٌ
ख़ूब गवाह है
शीघ्र ही हम उन्हें अपनी निशानियाँ वाह्य क्षेत्रों में दिखाएँगे और स्वयं उनके अपने भीतर भी, यहाँ तक कि उनपर स्पष्टा हो जाएगा कि वह (क़ुरआन) सत्य है। क्या तुम्हारा रब इस दृष्टि, से काफ़ी नहीं कि वह हर चीज़ का साक्षी है
तफ़्सीर:
हम शीघ्र ही मुसलमानों को विजय प्रदान करके क़ुरैश के काफ़िरों को धरती के कोने-कोने में अपनी निशानियाँ दिखाएँगे, तथा मक्का पर विजय देकर स्वयं उनके अपने भीतर भी अपनी निशानियाँ दिखाएँगे; यहाँ तक कि उनके लिए इस तरह स्पष्ट हो जाए जो शक को दूर कर दे कि यह क़ुरआन वह सत्य पुस्तक है जिसमें कोई संदेह नहीं है। क्या इन मुश्रिकों को यह जानने के लिए कि यह कुरआन सत्य है, अल्लाह की यह गवाही काफ़ी नहीं है कि यह उसी की ओर से उतरा है?! भला अल्लाह से बड़ी गवाही किसकी हो सकती है?! यदि उन्हें सत्य की तलाश होती, तो उनके लिए अपने पालनहार की गवाही पर्याप्त होती।
आयत 54
أَلَآ إِنَّهُمْ فِى مِرْيَةٍۢ مِّن لِّقَآءِ رَبِّهِمْ ۗ أَلَآ إِنَّهُۥ بِكُلِّ شَىْءٍۢ مُّحِيطٌۢ
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّهُمْ
बेशक वो
فِى
(are) in
مِرْيَةٍۢ
शक में हैं
مِّن
about
لِّقَآءِ
मुलाक़ात से
رَبِّهِمْ ۗ
अपने रब की
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّهُۥ
बेशक वो
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ का
مُّحِيطٌۢ
एहाता करने वाला है
जान लो कि वे लोग अपने रब से मिलन के बारे में संदेह में पड़े हुए है। जान लो कि निश्चय ही वह हर चीज़ को अपने घेरे में लिए हुए है
तफ़्सीर:
सुन लो! ये मुश्रिक, मरणोपरांत पुनः जीवित किए जाने का इनकार करने के कारण, क़ियामत के दिन अपने पालनहार से मिलने के बारे में संदेह में हैं। अतः वे आख़िरत पर ईमान नहीं रखते हैं। यही कारण है कि वे अच्छे कार्यों के द्वारा उसके लिए तैयारी नहीं करते हैं। सुन लो, अल्लाह ने हर वस्तु को अपने ज्ञान और शक्ति के घेरे में ले रखा है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह की निशानियां आफाक (कायनात) और अनफुस (खुद के अंदर) दोनों में होने के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह की निशानियां सिर्फ बाहर की कायनात में नहीं, बल्कि हमारे अपने वजूद में भी मौजूद हैं, खुद पर गौर करना भी ज़रूरी है।
मेरा एक्शन प्लान
अपना एक्शन प्लान लिखने और सेव करने के लिए लॉगिन करें।