नाम का मतलब
मशवरा (आपसी मशवरे से काम करने की ताकीद से)
पृष्ठभूमि
सूरह अश-शूरा में मुसलमानों को आपसी मामलों में मशवरे से फैसला करने की ताकीद की गई है। इसमें वही (कुरआन) के नाज़िल होने के तरीकों का भी ज़िक्र है।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह इस्लामी समाज में मशवरे (शूरा) के उसूल की बुनियाद मानी जाती है, जो अच्छे फैसलों के लिए ज़रूरी है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ حمٓ
حمٓ
ح م
हा॰ मीम॰
तफ़्सीर:
{हा, मीम। ऐन, सीन, क़ाफ़।} सूरतुल-बक़रा की शुरुआत में इस प्रकार के अक्षरों के बारे में बात गुज़र चुकी है।
आयत 2
عٓسٓقٓ
عٓسٓقٓ
ع س ق
ऐन॰ सीन॰ क़ाफ़॰
तफ़्सीर:
{हा, मीम। ऐन, सीन, क़ाफ़।} सूरतुल-बक़रा की शुरुआत में इस प्रकार के अक्षरों के बारे में बात गुज़र चुकी है।
आयत 3
كَذَٰلِكَ يُوحِىٓ إِلَيْكَ وَإِلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِكَ ٱللَّهُ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يُوحِىٓ
वही करता है
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
وَإِلَى
और तरफ़
ٱلَّذِينَ
उनके जो
مِن
before you
قَبْلِكَ
आपसे पहले थे
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْعَزِيزُ
जो बड़ा ज़बरदस्त है
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिकमत वाला है
इसी प्रकार अल्लाह प्रुभत्वशाली, तत्वदर्शी तुम्हारी ओर और उन लोगों की ओर प्रकाशना (वह्यप) करता रहा है, जो तुमसे पहले गुज़र चुके है
तफ़्सीर:
इसी वह़्य की तरह, ऐ मुहम्मद! आपकी ओर और आपसे पहले के नबियों की ओर, वह अल्लाह वह़्य करता है, जो अपने दुश्मनों से बदला लेने में बड़ा शक्तिशाली और अपने प्रबंधन और रचना में हिकमत वाला है।
आयत 4
لَهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۖ وَهُوَ ٱلْعَلِىُّ ٱلْعَظِيمُ
لَهُۥ
उसी के लिए ही है
مَا
जो
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ ۖ
ज़मीन में है
وَهُوَ
और वो
ٱلْعَلِىُّ
बहुत बुलन्द है
ٱلْعَظِيمُ
बहुत बड़ा है
आकाशों और धरती में जो कुछ है उसी का है और वह सर्वोच्च महिमावान है
तफ़्सीर:
जो कुछ आकाशों में और जो कुछ धरती में है, उन सब का रचयिता, स्वामी और प्रबंध करने वाला अकेला अल्लाह है। वह अपने अस्तित्व, महिमा और प्रभुत्व के साथ सर्वोच्च और अपने अस्तित्व में महान है।
आयत 5
تَكَادُ ٱلسَّمَـٰوَٰتُ يَتَفَطَّرْنَ مِن فَوْقِهِنَّ ۚ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ يُسَبِّحُونَ بِحَمْدِ رَبِّهِمْ وَيَسْتَغْفِرُونَ لِمَن فِى ٱلْأَرْضِ ۗ أَلَآ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلْغَفُورُ ٱلرَّحِيمُ
تَكَادُ
क़रीब है कि
ٱلسَّمَـٰوَٰتُ
आसमान
يَتَفَطَّرْنَ
वो फट पड़ें
مِن
from
فَوْقِهِنَّ ۚ
अपने ऊपर से
وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
और फ़रिश्ते
يُسَبِّحُونَ
वो तस्बीह करते हैं
بِحَمْدِ
साथ तारीफ़ के
رَبِّهِمْ
अपने रब की
وَيَسْتَغْفِرُونَ
और वो बख़्शिश माँगते हैं
لِمَن
उनके लिए जो
فِى
on
ٱلْأَرْضِ ۗ
ज़मीन में हैं
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
هُوَ
वो ही है
ٱلْغَفُورُ
बहुत बख़्शने वाला
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला
लगता है कि आकाश स्वयं अपने ऊपर से फट पड़े। हाल यह है कि फ़रिश्ते अपने रब का गुणगान कर रहे, और उन लोगों के लिए जो धरती में है, क्षमा की प्रार्थना करते रहते है। सुन लो! निश्चय ही अल्लाह ही क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
अल्लाह की महानता के कारण निकट है कि आकाश अपनी विशालता और ऊँचाई के बावजूद धरती के ऊपर से फट पड़ें। तथा फ़रिश्ते अपने पालनहार की पवित्रता का वर्णन करते हैं और विनम्रता एवं सम्मान में उसकी प्रशंसा करते हुए, उसकी महिमा का गान करते हैं। तथा वे अल्लाह से धरती वालों के लिए क्षमा याचना करते हैं। सुन लो, निश्चय अल्लाह ही अपने तौबा करने वाले बंदों के पापों को क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 6
وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِهِۦٓ أَوْلِيَآءَ ٱللَّهُ حَفِيظٌ عَلَيْهِمْ وَمَآ أَنتَ عَلَيْهِم بِوَكِيلٍۢ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
ٱتَّخَذُوا۟
बना लिया
مِن
besides
دُونِهِۦٓ
उसके सिवा
أَوْلِيَآءَ
हिमायती / दोस्त
ٱللَّهُ
अल्लाह
حَفِيظٌ
ख़ूब निगहबान है
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَمَآ
और नहीं
أَنتَ
आप
عَلَيْهِم
उन पर
بِوَكِيلٍۢ
कोई ज़िम्मेदार
और जिन लोगों ने उससे हटकर अपने कुछ दूसरे संरक्षक बना रखे हैं, अल्लाह उनपर निगरानी रखे हुए है। तुम उनके कोई ज़िम्मेदार नहीं हो
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने अल्लाह के अलावा मूर्तियों को अपना संरक्षक बना लिया है, जिनकी वे अल्लाह को छोड़कर पूजा करते हैं, अल्लाह उनपर निगरानी रखे हुए है; उनके कार्यों को रिकॉर्ड कर रहा है और उन्हें उनका बदला देगा। आपको (ऐ रसूल!) उनके कार्यों को संरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी नहीं सौंपी गई है। इसलिए आपसे उनके कार्यों के बारे में हरगिज़ नहीं पूछा जाएगा। आपका काम तो केवल पहुँचा देना है।
आयत 7
وَكَذَٰلِكَ أَوْحَيْنَآ إِلَيْكَ قُرْءَانًا عَرَبِيًّۭا لِّتُنذِرَ أُمَّ ٱلْقُرَىٰ وَمَنْ حَوْلَهَا وَتُنذِرَ يَوْمَ ٱلْجَمْعِ لَا رَيْبَ فِيهِ ۚ فَرِيقٌۭ فِى ٱلْجَنَّةِ وَفَرِيقٌۭ فِى ٱلسَّعِيرِ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
أَوْحَيْنَآ
वही की हमने
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
قُرْءَانًا
क़ुरान
عَرَبِيًّۭا
अर्बी
لِّتُنذِرَ
ताकि आप डराऐं
أُمَّ
(the) mother
ٱلْقُرَىٰ
मक्का वालों को
وَمَنْ
और उनको जो
حَوْلَهَا
इर्द -गिर्द हैं उसके
وَتُنذِرَ
और आप डराऐं
يَوْمَ
(of the) Day
ٱلْجَمْعِ
जमा होने के दिन से
لَا
(there is) no
رَيْبَ
नहीं कोई शक
فِيهِ ۚ
उसमें
فَرِيقٌۭ
एक गिरोह ( होगा )
فِى
(will be) in
ٱلْجَنَّةِ
जन्नत में
وَفَرِيقٌۭ
और एक गिरोह (होगा)
فِى
in
ٱلسَّعِيرِ
दोज़ख़ में
और (जैसे हम स्पष्ट आयतें उतारते है) उसी प्रकार हमने तुम्हारी ओर एक अरबी क़ुरआन की प्रकाशना की है, ताकि तुम बस्तियों के केन्द्र (मक्का) को और जो लोग उसके चतुर्दिक है उनको सचेत कर दो और सचेत करो इकट्ठा होने के दिन से, जिसमें कोई सन्देह नहीं। एक गिरोह जन्नत में होगा और एक गिरोह भड़कती आग में
तफ़्सीर:
जिस तरह हमने (ऐ रसूल!) आपसे पहले के नबियों की ओर वह़्य की थी, उसी तरह आपकी ओर अरबी भाषा में क़ुरआन की वह़्य की है, ताकि आप मक्का तथा उसके आस-पास के लोगों को, फिर सभी लोगों को सावधान करें और लोगों को क़ियामत के दिन से डराएँ, जिस दिन अल्लाह अगले-पिछले सभी लोगों को एक ही स्थान पर हिसाब तथा बदले के लिए इकट्ठा करेगा, उस दिन के आने के बारे में कोई संदेह नहीं है। उस दिन लोग दो समूहों में विभाजित होंगे : एक समूह जन्नत में जाएगा, जो कि ईमान वाले होंगे और एक समूह जहन्नम में जाएगा, जो कि काफ़िर लोग होंगे।
आयत 8
وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ لَجَعَلَهُمْ أُمَّةًۭ وَٰحِدَةًۭ وَلَـٰكِن يُدْخِلُ مَن يَشَآءُ فِى رَحْمَتِهِۦ ۚ وَٱلظَّـٰلِمُونَ مَا لَهُم مِّن وَلِىٍّۢ وَلَا نَصِيرٍ
وَلَوْ
और अगर
شَآءَ
चाहता
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَجَعَلَهُمْ
अलबत्ता वो बना देता उन्हें
أُمَّةًۭ
उम्मत
وَٰحِدَةًۭ
एक ही
وَلَـٰكِن
और लेकिन
يُدْخِلُ
वो दाख़िल करता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
فِى
in (to)
رَحْمَتِهِۦ ۚ
अपनी रहमत में
وَٱلظَّـٰلِمُونَ
और जो ज़ालिम हैं
مَا
नहीं
لَهُم
उनके लिए
مِّن
any
وَلِىٍّۢ
कोई दोस्त
وَلَا
और ना
نَصِيرٍ
कोई मददगार
यदि अल्लाह चाहता तो उन्हें एक ही समुदाय बना देता, किन्तु वह जिसे चाहता है अपनी दयालुता में दाख़िल करता है। रहे ज़ालिम, तो उनका न तो कोई निकटवर्ती मित्र है और न कोई (दूर का) सहायक
तफ़्सीर:
अगर अल्लाह उन्हें इस्लाम धर्म पर चलने वाला एक ही समुदाय बनाना चाहता, तो उन्हें इस्लाम पर क़ायम रहने वाला एक ही समुदाय बना देता और उन सभी को जन्नत में दाख़िल कर देता। लेकिन उसकी हिकमत की अपेक्षा यह हुई कि वह जिसे चाहे इस्लाम में प्रवेश दे और जन्नत में दाख़िल करे। जो लोग कुफ़्र और पाप के द्वारा अपने ऊपर अत्याचार करने वाले हैं, उनका कोई संरक्षक न होगा, जो उनकी रक्षा कर सके और न कोई मददगार होगा, जो उन्हें अल्लाह की यातना से बचा सके।
आयत 9
أَمِ ٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِهِۦٓ أَوْلِيَآءَ ۖ فَٱللَّهُ هُوَ ٱلْوَلِىُّ وَهُوَ يُحْىِ ٱلْمَوْتَىٰ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ
أَمِ
या
ٱتَّخَذُوا۟
उन्होंने बना रखे हैं
مِن
besides Him
دُونِهِۦٓ
उसके सिवा
أَوْلِيَآءَ ۖ
कारसाज़
فَٱللَّهُ
पस अल्लाह
هُوَ
वो ही है
ٱلْوَلِىُّ
कारसाज़
وَهُوَ
और वो
يُحْىِ
वो ज़िन्दा करेगा
ٱلْمَوْتَىٰ
मुर्दों को
وَهُوَ
और वो
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌۭ
ख़ूब क़ुदरत रखने वाला है
(क्या उन्होंने अल्लाह से हटकर दूसरे सहायक बना लिए है,) या उन्होंने उससे हटकर दूसरे संरक्षक बना रखे है? संरक्षक तो अल्लाह ही है। वही मुर्दों को जीवित करता है और उसे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
बल्कि इन मुश्रिकों ने अल्लाह के अलावा (दूसरे) संरक्षक बना लिए हैं, जिनसे वे दोस्ती रखते हैं। हालाँकि अल्लाह ही सच्चा संरक्षक है। क्योंकि उसके सिवा कोई और लाभ या हानि नहीं पहुँचा सकता है। वही मृतकों को पुनर्जीवित करके हिसाब और बदले के लिए उठाएगा। उस महिमावान को कोई चीज़ विवश नहीं कर सकती।
आयत 10
وَمَا ٱخْتَلَفْتُمْ فِيهِ مِن شَىْءٍۢ فَحُكْمُهُۥٓ إِلَى ٱللَّهِ ۚ ذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ رَبِّى عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإِلَيْهِ أُنِيبُ
وَمَا
और जो भी
ٱخْتَلَفْتُمْ
इख़्तिलाफ़ किया तुमने
فِيهِ
उसमें
مِن
of
شَىْءٍۢ
किसी चीज़ से
فَحُكْمُهُۥٓ
तो फ़ैसला उसका
إِلَى
(is) to
ٱللَّهِ ۚ
तरफ़ अल्लाह के है
ذَٰلِكُمُ
ये है
ٱللَّهُ
अल्लाह
رَبِّى
रब मेरा
عَلَيْهِ
उसी पर
تَوَكَّلْتُ
तवक्कल किया मैं ने
وَإِلَيْهِ
और उसका की तरफ़
أُنِيبُ
मैं रुजूअ करता हूँ
(रसूल ने कहा,) "जिस चीज़ में तुमने विभेद किया है उसका फ़ैसला तो अल्लाह के हवाले है। वही अल्लाह मेरा रब है। उसी पर मैंने भरोसा किया है, और उसी की ओर में रुजू करता हूँ
तफ़्सीर:
तुम (ऐ लोगो!) अपने धर्म के मूल सिद्धांतों या उसकी शाखाओं में से जिस चीज़ के बारे में भी मतभेद करो, उसका निर्णय अल्लाह की ओर है। चुनाँचे उसके बारे में अल्लाह की किताब या उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत की ओर लौटा जाएगा। यह जो इन गुणों से विशिष्ट है, वही मेरा पालनहार है, उसी पर मैंने अपने सभी मामलों में भरोसा किया है और उसी की ओर मैं तौबा के साथ लौटता हूँ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
वही (कुरआन) के नाज़िल होने और दीन में एकता की ताकीद का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि दीन के बुनियादी उसूलों पर तमाम नबियों का इत्तेफाक था, इसमें तफरका नहीं डालनी चाहिए।
आयत 11
فَاطِرُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ جَعَلَ لَكُم مِّنْ أَنفُسِكُمْ أَزْوَٰجًۭا وَمِنَ ٱلْأَنْعَـٰمِ أَزْوَٰجًۭا ۖ يَذْرَؤُكُمْ فِيهِ ۚ لَيْسَ كَمِثْلِهِۦ شَىْءٌۭ ۖ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْبَصِيرُ
فَاطِرُ
पैदा करने वाला
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ ۚ
और ज़मीन का
جَعَلَ
उसने बनाए
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنْ
from
أَنفُسِكُمْ
तुम्हारे नफ़्सों से
أَزْوَٰجًۭا
जोड़े
وَمِنَ
and among
ٱلْأَنْعَـٰمِ
और मवेशियों से
أَزْوَٰجًۭا ۖ
जोड़े
يَذْرَؤُكُمْ
वो फैलाता है तुम्हें
فِيهِ ۚ
उसमें
لَيْسَ
नहीं है
كَمِثْلِهِۦ
उसकी मानिन्द
شَىْءٌۭ ۖ
कोई चीज़
وَهُوَ
और वो
ٱلسَّمِيعُ
ख़ूब सुनने वाला है
ٱلْبَصِيرُ
ख़ूब देखने वाला है
वह आकाशों और धरती का पैदा करनेवाला है। उसने तुम्हारे लिए तुम्हारी अपनी सहजाति से जोड़े बनाए और चौपायों के जोड़े भी। फैला रहा है वह तुमको अपने में। उसके सदृश कोई चीज़ नहीं। वही सबकुछ सुनता, देखता है
तफ़्सीर:
अल्लाह ही आकाशों तथा धरती का बिना किसी पूर्व उदाहरण के रचयिता है। उसने तुम्हारे लिए तुम्हारी अपनी सहजाति से जोड़े बनाए, और तुम्हारे लिए ऊँट, गाय और बकरी के भी जोड़े बनाए। ताकि तुम्हारे लिए उनका प्रजनन होता रहे। उसने तुम्हारे लिए जो जोड़े बनाए हैं उनके मिलाप से वह तुम्हें पैदा करता (तुम्हारी नस्ल बढ़ाता) है, तथा उसने तुम्हारे लिए जो चौपाए बनाए हैं उनके मांस और दूध से तुम्हारे जीवन यापन का प्रबंध करता है। उसकी मख़्लूक़ात में से कोई भी उसके समान नहीं है। तथा वह अपने बंदों की बातों को सुनने वाला, उनके कामों को देखने वाला है। इनमें से कोई चीज़ उससे नहीं छूटती है। और वह उन्हें उनके कर्मों का बदला देगा; यदि अच्छा है तो अच्छा बदला और यदि बुरा है तो बुरा बदला।
आयत 12
لَهُۥ مَقَالِيدُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ يَبْسُطُ ٱلرِّزْقَ لِمَن يَشَآءُ وَيَقْدِرُ ۚ إِنَّهُۥ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌۭ
لَهُۥ
उसी के लिए हैं
مَقَالِيدُ
कुंजियाँ
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ ۖ
और ज़मीन की
يَبْسُطُ
वो फैलाता है
ٱلرِّزْقَ
रिज़्क़
لِمَن
जिसके लिए
يَشَآءُ
वो चाहता है
وَيَقْدِرُ ۚ
और वो तंग कर देता है
إِنَّهُۥ
बेशक वो
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ को
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
आकाशों और धरती की कुंजियाँ उसी के पास हैं। वह जिसके लिए चाहता है रोज़ी कुशादा कर देता है और जिसके लिए चाहता है नपी-तुली कर देता है। निस्संदेह उसे हर चीज़ का ज्ञान है
तफ़्सीर:
आकाशों तथा धरती के ख़ज़ानों की कुंजियाँ केवल उसी के पास हैं। वह अपने बंदों में से जिसके लिए चाहता है, उसकी आजीविका को विस्तृत कर देता है; उसके परीक्षण के लिए कि वह आभार व्यक्त करता है या अकृतज्ञ हो जाता है? और जिसकी चाहता है, आजीविका तंग कर देता है; उसे आज़माने के लिए कि वह धैर्य रखता है या अल्लाह की नियति पर क्रोध प्रकट करता है? निःसंदेह वह हर चीज़ का जानने वाला है। उससे अपने बंदों के हितों की कोई चीज़ छिपी नहीं है।
आयत 13
۞ شَرَعَ لَكُم مِّنَ ٱلدِّينِ مَا وَصَّىٰ بِهِۦ نُوحًۭا وَٱلَّذِىٓ أَوْحَيْنَآ إِلَيْكَ وَمَا وَصَّيْنَا بِهِۦٓ إِبْرَٰهِيمَ وَمُوسَىٰ وَعِيسَىٰٓ ۖ أَنْ أَقِيمُوا۟ ٱلدِّينَ وَلَا تَتَفَرَّقُوا۟ فِيهِ ۚ كَبُرَ عَلَى ٱلْمُشْرِكِينَ مَا تَدْعُوهُمْ إِلَيْهِ ۚ ٱللَّهُ يَجْتَبِىٓ إِلَيْهِ مَن يَشَآءُ وَيَهْدِىٓ إِلَيْهِ مَن يُنِيبُ
۞ شَرَعَ
उसने मुक़र्रर किया
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنَ
of
ٱلدِّينِ
दीन में से
مَا
वो जो
وَصَّىٰ
उसने वसीयत की
بِهِۦ
उसकी
نُوحًۭا
नूह को
وَٱلَّذِىٓ
और वो जो
أَوْحَيْنَآ
वही की हमने
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
وَمَا
और वो जो
وَصَّيْنَا
वसीयत की हमने
بِهِۦٓ
उसकी
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम
وَمُوسَىٰ
और मूसा
وَعِيسَىٰٓ ۖ
और ईसा को
أَنْ
कि
أَقِيمُوا۟
क़ायम करो
ٱلدِّينَ
दीन को
وَلَا
और ना
تَتَفَرَّقُوا۟
तुम तफ़रक़ा डालो
فِيهِ ۚ
उसमें
كَبُرَ
बड़ा ( भारी ) है
عَلَى
on
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकों पर
مَا
जो
تَدْعُوهُمْ
तुम बुलाते हो उन्हें
إِلَيْهِ ۚ
तरफ़ उसके
ٱللَّهُ
अल्लाह
يَجْتَبِىٓ
वो चुन लेता है
إِلَيْهِ
अपनी तरफ़
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
وَيَهْدِىٓ
और वो हिदायत देता है
إِلَيْهِ
अपनी तरफ़
مَن
उसे जो
يُنِيبُ
रुजूअ करता है
उसने तुम्हारे लिए वही धर्म निर्धारित किया जिसकी ताकीद उसने नूह को की थी।" और वह (जीवन्त आदेश) जिसकी प्रकाशना हमने तुम्हारी ओर की है और वह जिसकी ताकीद हमने इबराहीम और मूसा और ईसा को की थी यह है कि "धर्म को क़ायम करो और उसके विषय में अलग-अलग न हो जाओ।" बहुदेववादियों को वह चीज़ बहुत अप्रिय है, जिसकी ओर तुम उन्हें बुलाते हो। अल्लाह जिसे चाहता है अपनी ओर छाँट लेता है और अपनी ओर का मार्ग उसी को दिखाता है जो उसकी ओर रुजू करता है
तफ़्सीर:
उसने तुम्हारे लिए उसी तरह का धर्म निर्धारित किया है, जिसका प्रचार करने और जिसपर चलने का आदेश हमने नूह को दिया था, और जिसकी वह़्य हमने (ऐ रसूल!) आपकी ओर की है। तथा तुम्हारे लिए उसी तरह का धर्म निर्धारित किया है, जिसका प्रचार करने और जिसपर चलने का आदेश हमने इबराहीम, मूसा और ईसा को दिया था। उसका सार यह है कि : तुम (इस) धर्म को क़ायम करो और उसके विषय में अलग-अलग समूहों में बँटना छोड़ दो। आप बहुदेववादियों को जिस एकेश्वरवाद तथा अल्लाह के अलावा की इबादत को छोड़ने की ओर बुला रहे हैं, वह उनपर बहुत भारी और कठिन है। अल्लाह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, चुन लेता है और उसे अपनी उपासना और आज्ञाकारिता का सामर्थ्य प्रदान करता है। तथा अल्लाह उनमें से उसी का अपनी ओर मार्गदर्शन करता है, जो अपने गुनाहों से तौबा करके उसकी ओर लौटता है।
आयत 14
وَمَا تَفَرَّقُوٓا۟ إِلَّا مِنۢ بَعْدِ مَا جَآءَهُمُ ٱلْعِلْمُ بَغْيًۢا بَيْنَهُمْ ۚ وَلَوْلَا كَلِمَةٌۭ سَبَقَتْ مِن رَّبِّكَ إِلَىٰٓ أَجَلٍۢ مُّسَمًّۭى لَّقُضِىَ بَيْنَهُمْ ۚ وَإِنَّ ٱلَّذِينَ أُورِثُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ مِنۢ بَعْدِهِمْ لَفِى شَكٍّۢ مِّنْهُ مُرِيبٍۢ
وَمَا
और नहीं
تَفَرَّقُوٓا۟
उन्होंने तफ़रक़ा डाला
إِلَّا
मगर
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद उसके
مَا
जो
جَآءَهُمُ
आ गया उनके पास
ٱلْعِلْمُ
इल्म
بَغْيًۢا
सरकशी की वजह से
بَيْنَهُمْ ۚ
आपस में
وَلَوْلَا
और अगर ना होती
كَلِمَةٌۭ
एक बात
سَبَقَتْ
जो पहले गुज़र चुकी
مِن
from
رَّبِّكَ
आपके रब की तरफ़ से
إِلَىٰٓ
for
أَجَلٍۢ
एक वक़्त तक
مُّسَمًّۭى
मुक़र्रर
لَّقُضِىَ
अलबत्ता फ़ैसला कर दिया जाता
بَيْنَهُمْ ۚ
दर्मियान उनके
وَإِنَّ
और बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
أُورِثُوا۟
वारिस बनाए गए
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब के
مِنۢ
after them
بَعْدِهِمْ
उनके बाद
لَفِى
(are) surely in
شَكٍّۢ
अलबत्ता शक में हैं
مِّنْهُ
उसकी तरफ़ से
مُرِيبٍۢ
जो बेचैन करने वाला है
उन्होंने तो परस्पर एक-दूसरे पर ज़्यादती करने के उद्देश्य से इसके पश्चात विभेद किया कि उनके पास ज्ञान आ चुका था। और यदि तुम्हारे रब की ओर से एक नियत अवधि तक के लिए बात पहले निश्चित न हो चुकी होती तो उनके बीच फ़ैसला चुका दिया गया होता। किन्तु जो लोग उनके पश्चात किताब के वारिस हुए वे उसकी ओर से एक उलझन में डाल देनेवाले संदेह में पड़े हुए है
तफ़्सीर:
काफ़िरों और मुश्रिकों ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ईशदूतत्व के द्वारा अपने ऊपर तर्क स्थापित होने के पश्चात ही विभेद किया। और उनका यह विभेद भी केवल सरकशी और अत्याचार के कारण था। अगर अल्लाह के ज्ञान में यह बात पहले से न होती कि वह अपने ज्ञान में निर्दिष्ट एक अवधि यानी क़ियामत के दिन तक उनसे यातना को विलंबित रखेगा, तो अल्लाह अवश्य उनके बीच निर्णय कर देता और उनके अल्लाह का इनकार करने तथा उसके रसूलों को झुठलाने के कारण, उन्हें इसी दुनिया में यातना देता। इन बहुदेववादियों के बाद तथा अपने पूर्वजों के बाद जो यहूदी तौरात के और जो ईसाई इंजील के वारिस हुए, वे इस क़ुरआन के बारे में, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लेकर आए हैं, संदेह में पड़े हुए हैं और उसे झुठला रहे हैं।
आयत 15
فَلِذَٰلِكَ فَٱدْعُ ۖ وَٱسْتَقِمْ كَمَآ أُمِرْتَ ۖ وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَآءَهُمْ ۖ وَقُلْ ءَامَنتُ بِمَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ مِن كِتَـٰبٍۢ ۖ وَأُمِرْتُ لِأَعْدِلَ بَيْنَكُمُ ۖ ٱللَّهُ رَبُّنَا وَرَبُّكُمْ ۖ لَنَآ أَعْمَـٰلُنَا وَلَكُمْ أَعْمَـٰلُكُمْ ۖ لَا حُجَّةَ بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمُ ۖ ٱللَّهُ يَجْمَعُ بَيْنَنَا ۖ وَإِلَيْهِ ٱلْمَصِيرُ
فَلِذَٰلِكَ
तो इसी ( दीन) के लिए
فَٱدْعُ ۖ
पस दावत दीजिए
وَٱسْتَقِمْ
और क़ायम रहिए
كَمَآ
जैसा कि
أُمِرْتَ ۖ
हुक्म दिए गए आप
وَلَا
और ना
تَتَّبِعْ
आप पैरवी कीजिए
أَهْوَآءَهُمْ ۖ
उनकी ख़्वाहिशात की
وَقُلْ
और कह दीजिए
ءَامَنتُ
ईमान लाया मैं
بِمَآ
उस पर जो
أَنزَلَ
नाज़िल किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِن
of
كِتَـٰبٍۢ ۖ
किताब से
وَأُمِرْتُ
और हुक्म दिया गया है मुझे
لِأَعْدِلَ
कि मैं अदल करूँ
بَيْنَكُمُ ۖ
दर्मियान तुम्हारे
ٱللَّهُ
अल्लाह ही
رَبُّنَا
रब है हमारा
وَرَبُّكُمْ ۖ
और रब तुम्हारा
لَنَآ
हमारे लिए
أَعْمَـٰلُنَا
आमाल हमारे
وَلَكُمْ
और तुम्हारे लिए
أَعْمَـٰلُكُمْ ۖ
आमाल तुम्हारे
لَا
(There is) no
حُجَّةَ
नहीं कोई झगड़ा
بَيْنَنَا
दर्मियान हमारे
وَبَيْنَكُمُ ۖ
और दर्मियान तुम्हारे
ٱللَّهُ
अल्लाह
يَجْمَعُ
वो जमा कर देगा
بَيْنَنَا ۖ
हमें आपस में
وَإِلَيْهِ
और तरफ़ उसी के
ٱلْمَصِيرُ
लौटना है
अतः इसी लिए (उन्हें सत्य की ओर) बुलाओ, और जैसा कि तुम्हें हुक्म दिया गया है स्वयं क़ायम रहो, और उनकी इच्छाओं का पालन न करना और कह दो, "अल्लाह ने जो किताब अवतरित की है, मैं उसपर ईमान लाया। मुझे तो आदेश हुआ है कि मैं तुम्हारे बीच न्याय करूँ। अल्लाह ही हमारा भी रब है और तुम्हारा भी। हमारे लिए हमारे कर्म है और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म। हममें और तुममें कोई झगड़ा नहीं। अल्लाह हम सबको इकट्ठा करेगा और अन्ततः उसी की ओर जाना है।"
तफ़्सीर:
आप इसी सीधे धर्म की ओर बुलाते रहें और अल्लाह के आदेश के अनुसार उस पर जमे रहें, तथा उनकी झूठी इच्छाओं का पालन न करें। उनके साथ बहस करते समय कह दें : मैं अल्लाह पर तथा उन सभी पुस्तकों पर ईमान लाया, जो अल्लाह ने अपने रसूलों पर उतारी हैं। अल्लाह ने मुझे आदेश दिया है कि मैं तुम्हारे बीच न्याय के साथ निर्णय करूँ। अल्लाह ही, जिसकी मैं उपासना करता हूँ, हमारा और तुम सब का पालनहार है। हमारे लिए हमारे कर्म हैं, अच्छे हों या बुरे और तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्म हैं, अच्छे हों या बुरे। तर्क स्पष्ट हो जाने और सीधा मार्ग प्रकट होने के बाद हमारे और आपके बीच कोई झगड़ा नहीं है। अल्लाह हम सभी लोगों को एकत्र करेगा और क़ियामत के दिन उसी की ओर लौटकर जाना है। फिर वह हम में से हर एक को वह प्रतिफल देगा, जिसका वह हक़दार है। उस समय यह स्पष्ट हो जाएगा कि कौन सच्चा है और कौन झूठा, तथा कौन सत्य पर चलने वाला है और कौन असत्य पर।
आयत 16
وَٱلَّذِينَ يُحَآجُّونَ فِى ٱللَّهِ مِنۢ بَعْدِ مَا ٱسْتُجِيبَ لَهُۥ حُجَّتُهُمْ دَاحِضَةٌ عِندَ رَبِّهِمْ وَعَلَيْهِمْ غَضَبٌۭ وَلَهُمْ عَذَابٌۭ شَدِيدٌ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
يُحَآجُّونَ
झगड़ते हैं
فِى
concerning
ٱللَّهِ
अल्लाह के बारे में
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद उसके
مَا
जो
ٱسْتُجِيبَ
क़ुबूल कर लिया गया
لَهُۥ
उसी के लिए
حُجَّتُهُمْ
हुज्जत /दलील उनकी
دَاحِضَةٌ
ज़ायल होने वाली है
عِندَ
नज़दीक
رَبِّهِمْ
उनके रब के
وَعَلَيْهِمْ
और उन पर
غَضَبٌۭ
ग़ज़ब है
وَلَهُمْ
और उनके लिए
عَذَابٌۭ
अज़ाब है
شَدِيدٌ
सख़्त
जो लोग अल्लाह के विषय में झगड़ते है, इसके पश्चात कि उसकी पुकार स्वीकार कर ली गई, उनका झगड़ना उनके रब की स्पष्ट में बिलकुल न ठहरनेवाला (असत्य) है। प्रकोप है उनपर और उनके लिए कड़ी यातना है
तफ़्सीर:
और जो लोग मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतरने वाले इस धर्म के बारे में झूठे तर्कों के साथ बहस करते हैं जबकि लोगों ने उसे स्वीकार कर लिया है, इन बहस करने वालों का तर्क उनके पालनहार के निकट और मोमिनों के निकट व्यर्थ है, उसका कोई प्रभाव नहीं है। तथा उनके कुफ़्र करने और सत्य का इनकार करने के कारण, उनपर अल्लाह का क्रोध है। और उनके लिए कठोर यातना है, जो क़ियामत के दिन उनकी प्रतीक्षा कर रही है।
आयत 17
ٱللَّهُ ٱلَّذِىٓ أَنزَلَ ٱلْكِتَـٰبَ بِٱلْحَقِّ وَٱلْمِيزَانَ ۗ وَمَا يُدْرِيكَ لَعَلَّ ٱلسَّاعَةَ قَرِيبٌۭ
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّذِىٓ
वो है जिसने
أَنزَلَ
नाज़िल किया
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब को
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
وَٱلْمِيزَانَ ۗ
और मीज़ान को
وَمَا
और क्या चीज़
يُدْرِيكَ
बताए आपको
لَعَلَّ
शायद कि
ٱلسَّاعَةَ
क़यामत
قَرِيبٌۭ
क़रीब हो
वह अल्लाह ही है जिसने हक़ के साथ किताब और तुला अवतरित की। और तुम्हें क्या मालूम कदाचित क़ियामत की घड़ी निकट ही आ लगी हो
तफ़्सीर:
अल्लाह ही है, जिसने सत्य के साथ क़ुरआन उतारा है, जिसमें कोई संदेह नहीं है। और न्याय उतारा है, ताकि लोगों के बीच इनसाफ़ के साथ निर्णय करे। संभव है कि वह क़ियामत, जिसे ये लोग झुठला रहे हैं, निकट ही हो। और यह सर्वज्ञात है कि हर आने वाली चीज़ निकट ही होती है।
आयत 18
يَسْتَعْجِلُ بِهَا ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِهَا ۖ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مُشْفِقُونَ مِنْهَا وَيَعْلَمُونَ أَنَّهَا ٱلْحَقُّ ۗ أَلَآ إِنَّ ٱلَّذِينَ يُمَارُونَ فِى ٱلسَّاعَةِ لَفِى ضَلَـٰلٍۭ بَعِيدٍ
يَسْتَعْجِلُ
जल्दी माँगते है
بِهَا
उसे
ٱلَّذِينَ
वो जो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाते
بِهَا ۖ
उस पर
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हैं
مُشْفِقُونَ
डरने वाले हैं
مِنْهَا
उससे
وَيَعْلَمُونَ
और वो इल्म रखते हैं
أَنَّهَا
कि बेशक वो
ٱلْحَقُّ ۗ
हक़ है
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
يُمَارُونَ
झगड़ते हैं
فِى
concerning
ٱلسَّاعَةِ
क़यामत के बारे में
لَفِى
(are) certainly in
ضَلَـٰلٍۭ
अलबत्ता गुमराही में हैं
بَعِيدٍ
दूर की
उसकी जल्दी वे लोग मचाते है जो उसपर ईमान नहीं रखते, किन्तु जो ईमान रखते है वे तो उससे डरते है और जानते है कि वह सत्य है। जान लो, जो लोग उस घड़ी के बारे में सन्देह डालनेवाली बहसें करते है, वे परले दरजे की गुमराही में पड़े हुए है
तफ़्सीर:
जो लोग क़ियामत के दिन पर विश्वास नहीं रखते, वे लोग उसकी जल्दी मचाते हैं। क्योंकि वे हिसाब, इनाम और सज़ा पर यक़ीन नहीं रखते। किंतु जो लोग अल्लाह पर ईमान रखते हैं, वे उससे भयभीत रहते हैं; क्योंकि वे उसमें अपने परिणाम से डरते हैं। तथा वे निश्चित रूप से जानते हैं कि वह ऐसा सत्य है जिसमें कोई संदेह नहीं। सुन लो, निश्चय जो लोग क़ियामत के बारे में बहस और झगड़ा करते हैं, तथा उसके आने के बारे में संदेह पैदा करते हैं, वे सच्चाई से बहुत दूर हैं।
आयत 19
ٱللَّهُ لَطِيفٌۢ بِعِبَادِهِۦ يَرْزُقُ مَن يَشَآءُ ۖ وَهُوَ ٱلْقَوِىُّ ٱلْعَزِيزُ
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَطِيفٌۢ
बहुत महरबान है
بِعِبَادِهِۦ
अपने बन्दों पर
يَرْزُقُ
वो रिज़्क़ देता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۖ
वो चाहता है
وَهُوَ
और वो
ٱلْقَوِىُّ
बहुत क़ुव्वत वाला है
ٱلْعَزِيزُ
ख़ूब ग़लबे वाला है
अल्लाह अपने बन्दों पर अत्यन्त दयालु है। वह जिसे चाहता है रोज़ी देता है। वह शक्तिमान, अत्यन्त प्रभुत्वशाली है
तफ़्सीर:
अल्लाह अपने बंदों के प्रति दयालु है। वह जिसे चाहता है रोज़ी देता है, चुनाँचे उसकी रोज़ी में विस्तार कर देता है, तथा वह जिसके लिए चाहता है, अपनी हिकमत और दया की अपेक्षाओं के अनुसार, उसकी रोज़ी को तंग कर देता है। वह ऐसा शक्तिशाली है जिसे कोई पराजित नहीं कर सकता, ऐसा प्रभुत्वशाली है जो अपने दुश्मनों से बदला लेता है।
आयत 20
مَن كَانَ يُرِيدُ حَرْثَ ٱلْـَٔاخِرَةِ نَزِدْ لَهُۥ فِى حَرْثِهِۦ ۖ وَمَن كَانَ يُرِيدُ حَرْثَ ٱلدُّنْيَا نُؤْتِهِۦ مِنْهَا وَمَا لَهُۥ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ مِن نَّصِيبٍ
مَن
जो कोई
كَانَ
है
يُرِيدُ
चाहता
حَرْثَ
खेती
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत की
نَزِدْ
हम ज़्यादा कर देंगे
لَهُۥ
उसके लिए
فِى
in
حَرْثِهِۦ ۖ
उसकी खेती में
وَمَن
और जो कोई
كَانَ
है
يُرِيدُ
चाहता
حَرْثَ
खेती
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
نُؤْتِهِۦ
हम देते हैं उसे
مِنْهَا
उसमें से
وَمَا
और नहीं होगा
لَهُۥ
उसके लिए
فِى
in
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत में
مِن
any
نَّصِيبٍ
कोई हिस्सा
जो कोई आख़िरत की खेती चाहता है, हम उसके लिए उसकी खेती में बढ़ोत्तरी प्रदान करेंगे और जो कोई दुनिया की खेती चाहता है, हम उसमें से उसे कुछ दे देते है, किन्तु आख़िरत में उसका कोई हिस्सा नहीं
तफ़्सीर:
जो कोई आख़िरत का प्रतिफल चाहता है और उसके लिए उसका कार्य करता है, हम उसके लिए उसके प्रतिफल को कई गुना बढ़ा देते हैं, क्योंकि नेकी का बदला दस गुना से सात सौ गुना तक, बल्कि उससे भी अधिक गुना तक मिलता है। तथा जो केवल दुनिया चाहता है, हम उसे दुनिया में उसका नियत भाग प्रदान कर देते हैं और उसके दुनिया को (आख़िरत पर) तरजीह देने के कारण उसके लिए आख़िरत में कोई भाग नहीं है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दीन में फूट डालने वालों की मज़म्मत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि दीनी मामलों में गुटबाज़ी और फूट डालने से बचना चाहिए, इत्तेहाद पर ज़ोर देना चाहिए।
आयत 21
أَمْ لَهُمْ شُرَكَـٰٓؤُا۟ شَرَعُوا۟ لَهُم مِّنَ ٱلدِّينِ مَا لَمْ يَأْذَنۢ بِهِ ٱللَّهُ ۚ وَلَوْلَا كَلِمَةُ ٱلْفَصْلِ لَقُضِىَ بَيْنَهُمْ ۗ وَإِنَّ ٱلظَّـٰلِمِينَ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
أَمْ
या
لَهُمْ
उनके लिए
شُرَكَـٰٓؤُا۟
कुछ शरीक हैं
شَرَعُوا۟
उन्होंने मुक़र्रर कर दिया
لَهُم
उनके लिए
مِّنَ
of
ٱلدِّينِ
दीन में से
مَا
वो जो
لَمْ
नहीं
يَأْذَنۢ
इजाज़त दी
بِهِ
उसकी
ٱللَّهُ ۚ
अल्लाह ने
وَلَوْلَا
और अगर ना होती
كَلِمَةُ
बात
ٱلْفَصْلِ
फ़ैसले की
لَقُضِىَ
अलबत्ता फ़ैसला कर दिया जाता
بَيْنَهُمْ ۗ
दर्मियान उनके
وَإِنَّ
और बेशक
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिम लोग
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
(क्या उन्हें समझ नहीं) या उनके कुछ ऐसे (ठहराए हुए) साझीदार है, जिन्होंन उनके लिए कोई ऐसा धर्म निर्धारित कर दिया है जिसकी अनुज्ञा अल्लाह ने नहीं दी? यदि फ़ैसले की बात निश्चित न हो गई होती तो उनके बीच फ़ैसला हो चुका होता। निश्चय ही ज़ालिमों के लिए दुखद यातना है
तफ़्सीर:
क्या इन मुश्रिकों के अल्लाह के अलावा कुछ अन्य पूज्य हैं, जिन्होंने उनके लिए धर्म के ऐसे प्रावधान निर्धारित किए हैं, जिन्हें निर्धारित करने की अनुमति अल्लाह ने उन्हें नहीं दी है, जैसे अल्लाह का साझी बनाना, उसकी हलाल की हुई चीज़ को हराम करना और उसकी हराम की हुई चीज़ को हलाल कर लेना? अगर अल्लाह ने इन विभेद करने वालों के बीच निर्णय के लिए एक निश्चित समय निर्धारित न कर दिया होता और यह कि उस समय तक उनके मामले को विलंबित कर देगा, तो अवश्य उनके बीच निर्णय कर दिया जता। निःसंदेह अल्लाह के साथ शिर्क और गुनाहों के द्वारा अपने ऊपर अत्याचार करने वालों के लिए दर्दनाक यातना है, जो क़ियामत के दिन उनकी प्रतीक्षा कर रही है।
आयत 22
تَرَى ٱلظَّـٰلِمِينَ مُشْفِقِينَ مِمَّا كَسَبُوا۟ وَهُوَ وَاقِعٌۢ بِهِمْ ۗ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ فِى رَوْضَاتِ ٱلْجَنَّاتِ ۖ لَهُم مَّا يَشَآءُونَ عِندَ رَبِّهِمْ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ ٱلْفَضْلُ ٱلْكَبِيرُ
تَرَى
आप देखेंगे
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़लिमों को
مُشْفِقِينَ
डरने वाले होंगे
مِمَّا
उससे जो
كَسَبُوا۟
उन्होंने कमाई की
وَهُوَ
और वो
وَاقِعٌۢ
वाक़ेअ होने वाला है
بِهِمْ ۗ
उन पर
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
فِى
(will be) in
رَوْضَاتِ
बाग़ों में होंगे
ٱلْجَنَّاتِ ۖ
जन्नतों के
لَهُم
उनके लिए होगा
مَّا
जो
يَشَآءُونَ
वो चाहेंगे
عِندَ
पास
رَبِّهِمْ ۚ
उनके रब के
ذَٰلِكَ
यही
هُوَ
वो
ٱلْفَضْلُ
फ़ज़ल है
ٱلْكَبِيرُ
बहुत बड़ा
तुम ज़ालिमों को देखोगे कि उन्होंने जो कुछ कमाया उससे डर रहे होंगे, किन्तु वह तो उनपर पड़कर रहेगा। किन्तु जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए, वे जन्न्तों की वाटिकाओं में होंगे। उनके लिए उनके रब के पास वह सब कुछ है जिसकी वे इच्छा करेंगे। वही तो बड़ा उदार अनुग्रह है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप शिर्क और अवज्ञाओं के द्वारा अपने ऊपर अत्याचार करने वालों को देखेंगे कि वे अपने किए हुए पाप के कारण, सज़ा से डर रहे होंगे, हालाँकि वह सज़ा उनपर अवश्य आकर रहेगी। अतः तौबा किए बिना मात्र डर अनुभव करना, उन्हें कोई लाभ नहीं देगा। परंतु जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाए और अच्छे कार्य किए, उनका हाल इनके विपरीत होगा; चुनाँचे वे जन्नतों के बागों में आनंद ले रहे होंगे। उनके लिए उनके पालनहार के पास कभी न समाप्त होने वाली अनेक प्रकार की वो नेमतें होंगी, जिनकी वे इच्छा करेंगे। यही वह महान अनुग्रह है, जिसकी बराबरी कोई (अन्य) अनुग्रह नहीं कर सकता।
आयत 23
ذَٰلِكَ ٱلَّذِى يُبَشِّرُ ٱللَّهُ عِبَادَهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ ۗ قُل لَّآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِلَّا ٱلْمَوَدَّةَ فِى ٱلْقُرْبَىٰ ۗ وَمَن يَقْتَرِفْ حَسَنَةًۭ نَّزِدْ لَهُۥ فِيهَا حُسْنًا ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ شَكُورٌ
ذَٰلِكَ
ये वो ही है
ٱلَّذِى
जिसकी
يُبَشِّرُ
ख़ुशख़बरी देता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عِبَادَهُ
अपने बन्दों को
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ ۗ
नेक
قُل
कह दीजिए
لَّآ
नहीं
أَسْـَٔلُكُمْ
मैं माँगता तुमसे
عَلَيْهِ
इस पर
أَجْرًا
कोई अजर
إِلَّا
सिवाय
ٱلْمَوَدَّةَ
मुहब्बत के
فِى
among
ٱلْقُرْبَىٰ ۗ
क़राबत दारी में
وَمَن
और जो कोई
يَقْتَرِفْ
कमायेगा
حَسَنَةًۭ
कोई नेकी
نَّزِدْ
हम ज़्यादा कर देंगे
لَهُۥ
उसके लिए
فِيهَا
उसमें
حُسْنًا ۚ
ख़ूबी को
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
شَكُورٌ
ख़ूब क़द्रदान है
उसी की शुभ सूचना अल्लाह अपने बन्दों को देता है जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए। कहो, "मैं इसका तुमसे कोई पारिश्रमिक नहीं माँगता, बस निकटता का प्रेम-भाव चाहता हूँ, जो कोई नेकी कमाएगा हम उसके लिए उसमें अच्छाई की अभिवृद्धि करेंगे। निश्चय ही अल्लाह अत्यन्त क्षमाशील, गुणग्राहक है।"
तफ़्सीर:
यही वह बड़ी शुभ सूचना है, जो अल्लाह अपने रसूल के हाथों उन लोगों को देता है, जो अल्लाह तथा उसके रसूलों पर ईमान लाए और अच्छे कर्म किए। (ऐ रसूल!) आप कह दें : मैं सत्य पहुँचाने पर तुमसे कोई बदला नहीं माँगता, सिवाय एक बदले के, जिसका लाभ भी तुम्हें ही होगा, वह यह कि तुम अपने बीच मेरी रिश्तेदारी के कारण मुझसे मोहब्बत करो। जो भी नेकी कमाएगा, हम उसे उसका बदला बढ़ाकर देंगे; एक नेकी उसके दस गुना कर दी जाती है। निश्चय अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों के पापों को क्षमा करने वाला और उनके उन अच्छे कार्यों का गुण-ग्राहक है जो वे अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए करते हैं।
आयत 24
أَمْ يَقُولُونَ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًۭا ۖ فَإِن يَشَإِ ٱللَّهُ يَخْتِمْ عَلَىٰ قَلْبِكَ ۗ وَيَمْحُ ٱللَّهُ ٱلْبَـٰطِلَ وَيُحِقُّ ٱلْحَقَّ بِكَلِمَـٰتِهِۦٓ ۚ إِنَّهُۥ عَلِيمٌۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ
أَمْ
या
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
ٱفْتَرَىٰ
उसने गढ़ लिया
عَلَى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
كَذِبًۭا ۖ
झूठ
فَإِن
फिर अगर
يَشَإِ
चाहता
ٱللَّهُ
अल्लाह
يَخْتِمْ
वो मुहर लगा देता
عَلَىٰ
[over]
قَلْبِكَ ۗ
आपके दिल पर
وَيَمْحُ
और जल्द मिटा देता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْبَـٰطِلَ
बातिल को
وَيُحِقُّ
और वो हक़ कर दिखाता है
ٱلْحَقَّ
हक़ को
بِكَلِمَـٰتِهِۦٓ ۚ
अपने कलमात से
إِنَّهُۥ
बेशक वो
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِذَاتِ
of what
ٱلصُّدُورِ
सीनों वाले (भेद)
(क्या वे ईमान नहीं लाएँगे) या उनका कहना है कि "इस व्यक्ति ने अल्लाह पर मिथ्यारोपण किया है?" यदि अल्लाह चाहे तो तुम्हारे दिल पर मुहर लगा दे (जिस प्रकार उसने इनकार करनेवालों के दिल पर मुहर लगा दी है) । अल्लाह तो असत्य को मिटा रहा है और सत्य को अपने बोलों से सिद्ध कर रहा है। निश्चय ही वह सीनों तक की बात को भी भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
मुश्रिकों का यह दावा था कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस क़ुरआन को अपनी ओर से बनाकर अल्लाह के साथ संबद्ध कर दिया है। इसलिए अल्लाह उनका खंडन करते हुए कहता है : यदि आपके दिल में झूठ गढ़ने का ख़याल भी आया होता, तो मैं आपके दिल पर मुहर लगा देता और गढ़े हुए झूठ को मिटाकर सत्य को संरक्षित कर देता। जब इस तरह की कोई बात नहीं हुई, तो इससे पता चला कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी इस बात में सच्चे हैं कि यह क़ुरआन आप पर आपके पालनहार की ओर से वह़्य के माध्यम से अवतिरत हुआ है। निश्चय वह अपने बंदों के दिलों की बातों को ख़ूब जानने वाला है, उससे कुछ भी छिपा नहीं है।
आयत 25
وَهُوَ ٱلَّذِى يَقْبَلُ ٱلتَّوْبَةَ عَنْ عِبَادِهِۦ وَيَعْفُوا۟ عَنِ ٱلسَّيِّـَٔاتِ وَيَعْلَمُ مَا تَفْعَلُونَ
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जो
يَقْبَلُ
क़ुबूल करता है
ٱلتَّوْبَةَ
तौबा
عَنْ
of
عِبَادِهِۦ
अपने बन्दों से
وَيَعْفُوا۟
और वो दरगुज़र करता है
عَنِ
[of]
ٱلسَّيِّـَٔاتِ
बुराइयों से
وَيَعْلَمُ
और वो जानता है
مَا
जो
تَفْعَلُونَ
तुम करते हो
वही है जो अपने बन्दों की तौबा क़बूल करता है और बुराइयों को माफ़ करता है, हालाँकि वह जानता है, जो कुछ तुम करते हो
तफ़्सीर:
वही अल्लाह है, जो अपने बंदों की कुफ़्र और गुनाहों से तौबा को क़बूल करता है, यदि वे उसके सामने तौबा करते हैं और उनके किए हुए दुष्कर्मों को क्षमा कर देता है। तथा तुम जो कुछ भी करते हो, वह उसे जानता है। तुम्हारे कार्यों में से कुछ भी उससे छिपा नहीं है और वह तुम्हें उनका बदला देगा।
आयत 26
وَيَسْتَجِيبُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَيَزِيدُهُم مِّن فَضْلِهِۦ ۚ وَٱلْكَـٰفِرُونَ لَهُمْ عَذَابٌۭ شَدِيدٌۭ
وَيَسْتَجِيبُ
और वो (दुआ) क़ुबूल करता है
ٱلَّذِينَ
उनकी जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
وَيَزِيدُهُم
और वो ज़्यादा देता है उन्हें
مِّن
from
فَضْلِهِۦ ۚ
अपने फ़ज़ल से
وَٱلْكَـٰفِرُونَ
और जो काफ़िर हैं
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابٌۭ
अज़ाब है
شَدِيدٌۭ
शदीद
और वह उन लोगों की प्रार्थनाएँ स्वीकार करता है जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए। और अपने उदार अनुग्रह से उन्हें और अधिक प्रदान करता है। रहे इनकार करनेवाले, तो उनके लिए कड़ा यातना है
तफ़्सीर:
और वह उन लोगों की दुआ क़बूल करता है, जो अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाए और सत्कर्म किए। और अपने अनुग्रह से उन्हें वे सारी चीज़ें भी प्रदान करता है, जो उन्होंने नहीं माँगी थीं। जबकि अल्लाह और उसके रसूलों का इनकार करने वालों के लिए कठोर यातना है, जो क़ियामत के दिन उनकी प्रतीक्षा कर रही है।
आयत 27
۞ وَلَوْ بَسَطَ ٱللَّهُ ٱلرِّزْقَ لِعِبَادِهِۦ لَبَغَوْا۟ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَـٰكِن يُنَزِّلُ بِقَدَرٍۢ مَّا يَشَآءُ ۚ إِنَّهُۥ بِعِبَادِهِۦ خَبِيرٌۢ بَصِيرٌۭ
۞ وَلَوْ
और अगर
بَسَطَ
खोल दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلرِّزْقَ
रिज़्क़ को
لِعِبَادِهِۦ
अपने बन्दों के लिए
لَبَغَوْا۟
अलबत्ता वो सरकशी करें
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَلَـٰكِن
और लेकिन
يُنَزِّلُ
वो उतारता है
بِقَدَرٍۢ
साथ एक अंदाज़े के
مَّا
जो
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता है
إِنَّهُۥ
बेशक वो
بِعِبَادِهِۦ
अपने बन्दों से
خَبِيرٌۢ
ख़ूब बाख़बर है
بَصِيرٌۭ
ख़ूब देखने वाला है
यदि अल्लाह अपने बन्दों के लिए रोज़ी कुशादा कर देता तो वे धरती में सरकशी करने लगते। किन्तु वह एक अंदाज़े के साथ जो चाहता है, उतारता है। निस्संदेह वह अपने बन्दों की ख़बर रखनेवाला है। वह उनपर निगाह रखता है
तफ़्सीर:
यदि अल्लाह अपने सभी बंदों की आजीविका में विस्तार कर देता, तो वे धरती में अत्याचार और सरकशी करने लगते। लेकिन अल्लाह जिस मात्रा में चाहता है, विस्तृत या संकीर्ण रोज़ी उतारता है। निःसंदेह वह अपने बंदों की परिस्थितियों की खबर रखने वाला और उन्हें अच्छी तरह देखने वाला है। अतः वह हिकमत के अनुसार देता और हिकमत ही के अनुसार रोकता भी है।
आयत 28
وَهُوَ ٱلَّذِى يُنَزِّلُ ٱلْغَيْثَ مِنۢ بَعْدِ مَا قَنَطُوا۟ وَيَنشُرُ رَحْمَتَهُۥ ۚ وَهُوَ ٱلْوَلِىُّ ٱلْحَمِيدُ
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जो
يُنَزِّلُ
उतारता है
ٱلْغَيْثَ
बारिश को
مِنۢ
after
بَعْدِ
इसके बाद
مَا
जो
قَنَطُوا۟
वो मायूस हो गए
وَيَنشُرُ
और वो फैला देता है
رَحْمَتَهُۥ ۚ
अपनी रहमत को
وَهُوَ
और वो ही
ٱلْوَلِىُّ
मददगार है
ٱلْحَمِيدُ
बहुत तारीफ़ वाला है
वही है जो इसके पश्चात कि लोग निराश हो चुके होते है, मेंह बरसाता है और अपनी दयालुता को फैला देता है। और वही है संरक्षक मित्र, प्रशंसनीय!
तफ़्सीर:
और वही है, जो अपने बंदों पर बारिश का पानी उतारता है, जबकि वे उसके उतरने से निराश हो चुके होते हैं। तथा इस बारिश को फैला देता है, तो धरती अंकुरित हो जाती है। वही अपने बंदों के मामलों का प्रभारी, हर हाल में स्तुत्य है।
आयत 29
وَمِنْ ءَايَـٰتِهِۦ خَلْقُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَثَّ فِيهِمَا مِن دَآبَّةٍۢ ۚ وَهُوَ عَلَىٰ جَمْعِهِمْ إِذَا يَشَآءُ قَدِيرٌۭ
وَمِنْ
And among
ءَايَـٰتِهِۦ
और उसकी निशानियों में से है
خَلْقُ
पैदाइश
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन की
وَمَا
और जो भी
بَثَّ
उसने फैला दिए
فِيهِمَا
इन दोनों में
مِن
of
دَآبَّةٍۢ ۚ
कोई जानदार
وَهُوَ
और वो
عَلَىٰ
(is) over
جَمْعِهِمْ
उनके जमा करने पर
إِذَا
जब
يَشَآءُ
वो चाहे
قَدِيرٌۭ
ख़ूब क़ुदरत रखने वाला है
और उसकी निशानियों में से है आकाशों और धरती को पैदा करना, और वे जीवधारी भी जो उसने इन दोनों में फैला रखे है। वह जब चाहे उन्हें इकट्ठा करने की सामर्थ्य भी रखता है
तफ़्सीर:
अल्लाह की शक्ति और एकता (एकेश्वरवाद) को दर्शाने वाली निशानियों में से आकाशों और धरती का पैदा करना, तथा वे विचित्र प्राणी हैं, जो उसने उन दोनों में फैला रखे हैं। तथा वह जब चाहे, उन्हें हश्र (महा-प्रलय) और बदले के लिए इकट्ठा करने में सक्षम है। ऐसा करना उसे विवश नहीं कर सकता, जिस तरह कि उन्हें पहली बार पैदा करना उसे विवश नहीं किया।
आयत 30
وَمَآ أَصَـٰبَكُم مِّن مُّصِيبَةٍۢ فَبِمَا كَسَبَتْ أَيْدِيكُمْ وَيَعْفُوا۟ عَن كَثِيرٍۢ
وَمَآ
और जो भी
أَصَـٰبَكُم
पहुँची तुम्हें
مِّن
of
مُّصِيبَةٍۢ
कोई मुसीबत
فَبِمَا
पस बवजह उसके जो
كَسَبَتْ
कमाई की
أَيْدِيكُمْ
तुम्हारे हाथों ने
وَيَعْفُوا۟
और वो दरगुज़र करता है
عَن
[from]
كَثِيرٍۢ
बहुत कुछ से
जो मुसीबत तुम्हें पहुँची वह तो तुम्हारे अपने हाथों की कमाई से पहुँची और बहुत कुछ तो वह माफ़ कर देता है
तफ़्सीर:
तथा (ऐ लोगो!) तुम्हें तुम्हारी जानों या तुम्हारे धनों में जो भी विपत्ति पहुँचती है, वह तुम्हारे हाथों के कमाए हुए गुनाहों के कारण (पहुँचती) है। हालाँकि अल्लाह उनमें से बहुत-से गुनाह माफ़ कर देता है। इसलिए उनपर तुम्हारी पकड़ नहीं करता।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मशवरे (शूरा) की ताकीद और गुनाह के बाद मुसीबत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि आपसी मामलों में मशवरे से फैसला करना बेहतर नतीजे देता है।
आयत 31
وَمَآ أَنتُم بِمُعْجِزِينَ فِى ٱلْأَرْضِ ۖ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِن وَلِىٍّۢ وَلَا نَصِيرٍۢ
وَمَآ
और नहीं
أَنتُم
तुम
بِمُعْجِزِينَ
आजिज़ करने वाले
فِى
in
ٱلْأَرْضِ ۖ
ज़मीन में
وَمَا
और नहीं
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّن
besides
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مِن
any
وَلِىٍّۢ
कोई दोस्त
وَلَا
और ना
نَصِيرٍۢ
कोई मददगार
तुम धरती में काबू से निकल जानेवाले नहीं हो, और न अल्लाह से हटकर तुम्हारा कोई संरक्षक मित्र है और न सहायक ही
तफ़्सीर:
यदि अल्लाह तुम्हें दंडित करना चाहे, तो तुम भागकर अपने पालनहार से बचने में सक्षम नहीं हो सकते। तथा अल्लाह के सिवा तुम्हारा कोई संरक्षक नहीं है, जो तुम्हारे कामों का प्रभार ले सके और न ही कोई सहायक है, जो तुमसे यातना को टाल सके, अगर वह तुम्हें यातना देना चाहे।
आयत 32
وَمِنْ ءَايَـٰتِهِ ٱلْجَوَارِ فِى ٱلْبَحْرِ كَٱلْأَعْلَـٰمِ
وَمِنْ
And among
ءَايَـٰتِهِ
और उसकी निशानियों में से हैं
ٱلْجَوَارِ
कश्तियाँ
فِى
in
ٱلْبَحْرِ
समुन्दर में
كَٱلْأَعْلَـٰمِ
पहाड़ों की तरह
उसकी निशानियों में से समुद्र में पहाड़ो के सदृश चलते जहाज़ भी है
तफ़्सीर:
अल्लाह की शक्ति और एकता (एकेश्वरवाद) को दर्शाने वाली निशानियों में से समुद्र में चलने वाली कश्तियाँ (जहाज़) भी हैं, जो अपनी ऊँचाई में पहाड़ों की तरह हैं।
आयत 33
إِن يَشَأْ يُسْكِنِ ٱلرِّيحَ فَيَظْلَلْنَ رَوَاكِدَ عَلَىٰ ظَهْرِهِۦٓ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّكُلِّ صَبَّارٍۢ شَكُورٍ
إِن
अगर
يَشَأْ
वो चाहे
يُسْكِنِ
वो साकिन कर दे
ٱلرِّيحَ
हवा को
فَيَظْلَلْنَ
तो वो रह जाऐं
رَوَاكِدَ
खड़ी हुई
عَلَىٰ
on
ظَهْرِهِۦٓ ۚ
उसकी पुश्त पर
إِنَّ
यक़ीनन
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
لِّكُلِّ
वास्ते हर
صَبَّارٍۢ
बहुत सब्र करने वाले
شَكُورٍ
बहुत शुक्र गुज़ार के
यदि वह चाहे तो वायु को ठहरा दे, तो वे समुद्र की पीठ पर ठहरे रह जाएँ - निश्चय ही इसमें कितनी ही निशानियाँ है हर उस व्यक्ति के लिए जो अत्यन्त धैर्यवान, कृतज्ञ हो
तफ़्सीर:
अगर अल्लाह उन कश्तियों को चलाने वाली हवाओं को रोकना चाहे, तो उन्हें रोक दे। फिर वे कश्तियाँ समुद्र में स्थिर रहें,अपनी जगह से हिल न सकें। निःसंदेह उपर्युक्त कश्तियों के निर्माण और हवाओं के नियंत्रित करने में अल्लाह की शक्ति की स्पष्ट निशानियाँ हैं, हर ऐसे व्यक्ति के लिए, जो परीक्षण और विपत्तियों पर बड़ा धैर्य रखने वाला, अपने ऊपर अल्लाह की नेमतों का शुक्रिया अदा करने वाला है।
आयत 34
أَوْ يُوبِقْهُنَّ بِمَا كَسَبُوا۟ وَيَعْفُ عَن كَثِيرٍۢ
أَوْ
या
يُوبِقْهُنَّ
वो हलाक कर दे उन्हें
بِمَا
बवजह इसके जो
كَسَبُوا۟
उन्होंने कमाई की
وَيَعْفُ
और वो दरगुज़र कर दे
عَن
[from]
كَثِيرٍۢ
बहुत सों सो
या उनको उनकी कमाई के कारण विनष्ट कर दे और बहुतो को माफ़ भी कर दे
तफ़्सीर:
या अगर अल्लाह सर्वशक्तिमान उन कश्तियों (जहाजों) को उन पर तूफ़ानी हवा भेजकर नष्ट करना चाहे, तो उन्हें लोगों के किए हुए गुनाहों के कारण विनष्ट कर दे। जबकि अल्लाह अपने बंदों के बहुत-से गुनाहों को माफ़ कर देता है। इसलिए उन्हें उनपर सज़ा नहीं देता है।
आयत 35
وَيَعْلَمَ ٱلَّذِينَ يُجَـٰدِلُونَ فِىٓ ءَايَـٰتِنَا مَا لَهُم مِّن مَّحِيصٍۢ
وَيَعْلَمَ
और (ताकि) जान लें
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يُجَـٰدِلُونَ
झगड़ते हैं
فِىٓ
concerning
ءَايَـٰتِنَا
हमारी आयात में
مَا
नहीं
لَهُم
उनके लिए
مِّن
any
مَّحِيصٍۢ
कोई जाए पनाह
और परिणामतः वे लोग जान लें जो हमारी आयतों में झगड़ते है कि उनके लिए भागने की कोई जगह नहीं
तफ़्सीर:
ताकि तूफ़ानी हवा भेजकर उन कश्तियों को विनष्ट करते समय, वे लोग जो अल्लाह की आयतों के बारे में उन्हें असत्य साबित करने के लिए झगड़ते हैं, इस बात को जान लें कि उनके पास विनाश से बचने का कोई उपाय नहीं है। अतः वे केवल अल्लाह को पुकारें और उसके अलावा को छोड़ दें।
आयत 36
فَمَآ أُوتِيتُم مِّن شَىْءٍۢ فَمَتَـٰعُ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۖ وَمَا عِندَ ٱللَّهِ خَيْرٌۭ وَأَبْقَىٰ لِلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَلَىٰ رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ
فَمَآ
पस जो भी
أُوتِيتُم
दिए गए हो तुम
مِّن
of
شَىْءٍۢ
कोई चीज़
فَمَتَـٰعُ
तो सामान है
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी का
ٱلدُّنْيَا ۖ
दुनिया की
وَمَا
और जो
عِندَ
पास है
ٱللَّهِ
अल्लाह के
خَيْرٌۭ
बेहतर है
وَأَبْقَىٰ
और ज़्यादा बाक़ी रहने वाला है
لِلَّذِينَ
उनके लिए जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَلَىٰ
and upon
رَبِّهِمْ
और अपने रब पर ही
يَتَوَكَّلُونَ
वो तवक्कल करते है
तुम्हें जो चीज़ भी मिली है वह तो सांसारिक जीवन की अस्थायी सुख-सामग्री है। किन्तु जो कुछ अल्लाह के पास है वह उत्तम है और शेष रहनेवाला भी, वह उन्ही के लिए है जो ईमान लाए और अपने रब पर भरोसा रखते है;
तफ़्सीर:
तुम्हें (ऐ लोगो!) जो भी धन, या पद, या संतान आदि दिया गया है, वह सांसारिक जीवन की सुख-सामग्री है, जो अस्थायी एवं समाप्त होने वाली है। हमेशा रहने वाली नेमत तो जन्नत की नेमत है, जिसे अल्लाह ने उन लोगों के लिए तैयार किया है, जो अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाए, तथा वे अपने सभी मामलों में केवल अपने पालनहार ही पर भरोसा रखते हैं।
आयत 37
وَٱلَّذِينَ يَجْتَنِبُونَ كَبَـٰٓئِرَ ٱلْإِثْمِ وَٱلْفَوَٰحِشَ وَإِذَا مَا غَضِبُوا۟ هُمْ يَغْفِرُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
يَجْتَنِبُونَ
इजतिनाब करते हैं
كَبَـٰٓئِرَ
कबीरा
ٱلْإِثْمِ
गुनाहों से
وَٱلْفَوَٰحِشَ
और बेहयाई के कामों से
وَإِذَا
and when
مَا
और जब भी
غَضِبُوا۟
वो ग़ज़बनाक होते है
هُمْ
वो
يَغْفِرُونَ
वो माफ़ कर देते हैं
जो बड़े-बड़े गुनाहों और अश्लील कर्मों से बचते है और जब उन्हे (किसी पर) क्रोध आता है तो वे क्षमा कर देते हैं;
तफ़्सीर:
जो लोग बड़े-बड़े पापों और घृणित कामों से दूर रहते हैं, और जब वे किसी ऐसे व्यक्ति पर क्रोधित होते हैं, जिसने उन्हें अपने वचन या कर्म से ठेस पहुँचाई है, तो वे उसकी ग़लती को क्षमा कर देते हैं और उसे उसपर दंडित नहीं करते हैं। यह क्षमादान उनकी ओर से कृपा के तौर पर होता है, जब उसमें कोई भलाई और हित हो।
आयत 38
وَٱلَّذِينَ ٱسْتَجَابُوا۟ لِرَبِّهِمْ وَأَقَامُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَأَمْرُهُمْ شُورَىٰ بَيْنَهُمْ وَمِمَّا رَزَقْنَـٰهُمْ يُنفِقُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
ٱسْتَجَابُوا۟
लब्बैक कही (अपने रब की बात को)
لِرَبِّهِمْ
अपने रब के लिए
وَأَقَامُوا۟
और उन्होंने क़ायम की
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَأَمْرُهُمْ
और काम उनका
شُورَىٰ
मश्वरा करना है
بَيْنَهُمْ
आपस में
وَمِمَّا
और उसमें से जो
رَزَقْنَـٰهُمْ
रिज़्क़ दिया हमने उन्हें
يُنفِقُونَ
वो ख़र्च करते हैं
और जिन्होंने अपने रब का हुक्म माना और नमाज़ क़ायम की, और उनका मामला उनके पारस्परिक परामर्श से चलता है, और जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसमें से ख़र्च करते है;
तफ़्सीर:
और जिन लोगों ने अपने रब की बात मानी; उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई चीज़ों को छोड़कर, और संपूर्ण तरीके से नमाज़ अदा की, तथा जो लोग अपने संबंधित मामलों में आपस में परामर्श करते हैं, और हमने जो कुछ उन्हें प्रदान किया है, उसमें से अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए खर्च करते हैं।
आयत 39
وَٱلَّذِينَ إِذَآ أَصَابَهُمُ ٱلْبَغْىُ هُمْ يَنتَصِرُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
إِذَآ
जब
أَصَابَهُمُ
पहुँचती है उन्हें
ٱلْبَغْىُ
कोई ज़्यादती
هُمْ
वो
يَنتَصِرُونَ
वो बदला लेते है
और जो ऐसे है कि जब उनपर ज़्यादती होती है तो वे प्रतिशोध करते है
तफ़्सीर:
और वे लोग कि जब उनपर अत्याचार होता है, तो आत्म-सम्मान और गौरव की रक्षा के लिए बदला लेते हैं, यदि अत्याचार करने वाला व्यक्ति क्षमा के योग्य नहीं है। और यह बदला लेना उचित है, खासकर अगर क्षमा करने में कोई हित नहीं है।
आयत 40
وَجَزَٰٓؤُا۟ سَيِّئَةٍۢ سَيِّئَةٌۭ مِّثْلُهَا ۖ فَمَنْ عَفَا وَأَصْلَحَ فَأَجْرُهُۥ عَلَى ٱللَّهِ ۚ إِنَّهُۥ لَا يُحِبُّ ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَجَزَٰٓؤُا۟
और बदला
سَيِّئَةٍۢ
बुराई का
سَيِّئَةٌۭ
बुराई है
مِّثْلُهَا ۖ
उसकी मसल
فَمَنْ
पस जो कोई
عَفَا
माफ़ कर दे
وَأَصْلَحَ
और वो इस्लाह करे
فَأَجْرُهُۥ
तो अजर उसका
عَلَى
(is) on
ٱللَّهِ ۚ
ज़िम्मे है अल्लाह के
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَا
(does) not
يُحِبُّ
नहीं वो मुहब्बत करता
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों से
बुराई का बदला वैसी ही बुराई है किन्तु जो क्षमा कर दे और सुधार करे तो उसका बदला अल्लाह के ज़िम्मे है। निश्चय ही वह ज़ालिमों को पसन्द नहीं करता
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति अपना हक़ (बदला) लेना चाहे, उसे इसका अधिकार है। लेकिन वह ज़्यादती के बराबर ही होना चाहिए, उससे अधिक नहीं। तथा जो व्यक्ति बुरा व्यवहार करने वाले को क्षमा कर दे औैर उसके दुर्व्यवहार पर उसकी पकड़ न करे तथा अपने और अपने भाई के बीच सुधार कर ले, तो उसका प्रतिफल अल्लाह के पास है। निश्चय वह अत्याचार करने वालों को पसंद नहीं करता, जो लोगों पर उनकी जान, या उनके धन, या उनके सम्मान (सतीत्व) के मामले में अत्याचार करते हैं। बल्कि वह उनसे घृणा करता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
माफी और दरगुज़र की फ़ज़ीलत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि बदला लेने की ताकत होते हुए भी माफ कर देना ज़्यादा बड़े दर्जे की नेकी है।
आयत 41
وَلَمَنِ ٱنتَصَرَ بَعْدَ ظُلْمِهِۦ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ مَا عَلَيْهِم مِّن سَبِيلٍ
وَلَمَنِ
और अलबत्ता जो कोई
ٱنتَصَرَ
बदला ले
بَعْدَ
बाद
ظُلْمِهِۦ
अपने (ऊपर) ज़ुल्म के
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
مَا
नहीं
عَلَيْهِم
उन पर
مِّن
any
سَبِيلٍ
कोई मुआख़िज़ा
और जो कोई अपने ऊपर ज़ु्ल्म होने के पश्चात बदला ले ले, तो ऐसे लोगों पर कोई इलज़ाम नहीं
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति अपने ऊपर होने वाले अत्याचार का बदला लेता है, तो ऐसे लोगों पर अपना हक़ लेने के लिए कोई दोष नहीं है।
आयत 42
إِنَّمَا ٱلسَّبِيلُ عَلَى ٱلَّذِينَ يَظْلِمُونَ ٱلنَّاسَ وَيَبْغُونَ فِى ٱلْأَرْضِ بِغَيْرِ ٱلْحَقِّ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
إِنَّمَا
बेशक
ٱلسَّبِيلُ
मुआख़िज़ा तो
عَلَى
against
ٱلَّذِينَ
उन पर है जो
يَظْلِمُونَ
ज़ुल्म करते है
ٱلنَّاسَ
लोगों पर
وَيَبْغُونَ
और वो बग़ावत करते है
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
بِغَيْرِ
बग़ैर
ٱلْحَقِّ ۚ
हक़ के
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابٌ
अज़ाब है
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
इलज़ाम तो केवल उनपर आता है जो लोगों पर ज़ुल्म करते है और धरती में नाहक़ ज़्यादती करते है। ऐसे लोगों के लिए दुखद यातना है
तफ़्सीर:
बल्कि पकड़ और सज़ा के पात्र वे लोग हैं, जो लोगों पर अत्याचार करते हैं और धरती पर पाप करते हैं। ऐसे लोगों के लिए आख़िरत में दर्दनाक यातना है।
आयत 43
وَلَمَن صَبَرَ وَغَفَرَ إِنَّ ذَٰلِكَ لَمِنْ عَزْمِ ٱلْأُمُورِ
وَلَمَن
और अलबत्ता जिसने
صَبَرَ
सब्र किया
وَغَفَرَ
और उसने माफ़ कर दिया
إِنَّ
बेशक
ذَٰلِكَ
ये
لَمِنْ
(is) surely of
عَزْمِ
matters of determination
ٱلْأُمُورِ
अलबत्ता हिम्मत के कामों में से है
किन्तु जिसने धैर्य से काम लिया और क्षमा कर दिया तो निश्चय ही वह उन कामों में से है जो (सफलता के लिए) आवश्यक ठहरा दिए गए है
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति किसी के द्वारा कष्ट दिए जाने पर धैर्य से काम लेता है और उसे माफ़ कर देता है, तो निश्चय वह धैर्य उसके लिए और समाज के लिए अच्छा होता है; और वह एक सराहनीय कार्य है। इसका सौभाग्य केवल उसी को प्राप्त होता है, जो महान भाग्य वाला है।
आयत 44
وَمَن يُضْلِلِ ٱللَّهُ فَمَا لَهُۥ مِن وَلِىٍّۢ مِّنۢ بَعْدِهِۦ ۗ وَتَرَى ٱلظَّـٰلِمِينَ لَمَّا رَأَوُا۟ ٱلْعَذَابَ يَقُولُونَ هَلْ إِلَىٰ مَرَدٍّۢ مِّن سَبِيلٍۢ
وَمَن
और जिसे
يُضْلِلِ
भटका दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
فَمَا
तो नहीं
لَهُۥ
उसके लिए
مِن
any
وَلِىٍّۢ
कोई करसाज़
مِّنۢ
after Him
بَعْدِهِۦ ۗ
उसके बाद
وَتَرَى
और आप देखेंगे
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों को
لَمَّا
जब
رَأَوُا۟
वो देख लेंगे
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब
يَقُولُونَ
वो कहेंगे
هَلْ
क्या है
إِلَىٰ
(there) for
مَرَدٍّۢ
वापस लौटने की तरफ़
مِّن
any
سَبِيلٍۢ
कोई रास्ता
जिस व्यक्ति को अल्लाह गुमराही में डाल दे, तो उसके पश्चात उसे सम्भालनेवाला कोई भी नहीं। तुम ज़ालिमों को देखोगे कि जब वे यातना को देख लेंगे तो कह रहे होंगे, "क्या लौटने का भी कोई मार्ग है?"
तफ़्सीर:
अल्लाह जिसे मार्गदर्शन करने से हाथ खींच ले और उसे सत्य मार्ग से पथभ्रष्ट कर दे, तो उसके बाद उसके मामले को संभालने के लिए उसका कोई संरक्षक नहीं है। तथा तुम कुफ़्र और अवज्ञाओं के द्वारा अपने ऊपर अत्याचार करने वालों को देखोगे कि जब वे क़ियामत के दिन यातना को अपनी आँखों से देख लेंगे, तो कामना करते हुए कहेंगे : क्या दुनिया में वापसी का कोई रास्ता है कि हम अल्लाह के सामने तौबा कर सकें?
आयत 45
وَتَرَىٰهُمْ يُعْرَضُونَ عَلَيْهَا خَـٰشِعِينَ مِنَ ٱلذُّلِّ يَنظُرُونَ مِن طَرْفٍ خَفِىٍّۢ ۗ وَقَالَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِنَّ ٱلْخَـٰسِرِينَ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ وَأَهْلِيهِمْ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ أَلَآ إِنَّ ٱلظَّـٰلِمِينَ فِى عَذَابٍۢ مُّقِيمٍۢ
وَتَرَىٰهُمْ
और आप देखेंगे उन्हें
يُعْرَضُونَ
वो पेश किए जाऐंगे
عَلَيْهَا
उस पर
خَـٰشِعِينَ
झुके हुए
مِنَ
by
ٱلذُّلِّ
ज़िल्लत की वजह से
يَنظُرُونَ
वो देखेंगे
مِن
with
طَرْفٍ
a glance
خَفِىٍّۢ ۗ
झुकी आँख /कनअखियों से
وَقَالَ
और कहेंगे
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए
إِنَّ
बेशक
ٱلْخَـٰسِرِينَ
ख़सारा पाने वाले
ٱلَّذِينَ
वो हैं जिन्होंने
خَسِرُوٓا۟
ख़सारे में डाला
أَنفُسَهُمْ
अपने नफ़्सों को
وَأَهْلِيهِمْ
और अपने घर वालों को
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ ۗ
क़यामत के
أَلَآ
ख़बरदार
إِنَّ
बेशक
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिम लोग
فِى
(are) in
عَذَابٍۢ
अज़ाब में होंगे
مُّقِيمٍۢ
मुक़ीम /दाइमी
और तुम उन्हें देखोगे कि वे उस (जहन्नम) पर इस दशा में लाए जा रहे है कि बेबसी और अपमान के कारण दबे हुए है। कनखियों से देख रहे है। जो लोग ईमान लाए, वे उस समय कहेंगे कि "निश्चय ही घाटे में पड़नेवाले वही है जिन्होंने क़ियामत के दिन अपने आपको और अपने लोगों को घाटे में डाल दिया। सावधान! निश्चय ही ज़ालिम स्थिर रहनेवाली यातना में होंगे
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन अत्याचारियों को देखेंगे कि जब वे जहन्नम के सामने इस दशा में लाए जाएँगे कि वे अपमानित और तिरस्कृत होंगे, तो वे जहन्नम से अपने डर की तीव्रता से लोगों को चुपके से देखेंगे। उस समय अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान रखने वाले कहेंगे : वास्तव में घाटा उठाने वाले वही लोग हैं, जिन्होंने क़ियामत के दिन, अल्लाह की यातना का सामना करने के कारण, अपने आपको और अपने परिवार को घाटे में डाल दिया। सुन लो, कुफ़्र एवं अवज्ञाओं के द्वारा अपने ऊपर ज़ुल्म करने वाले लोग स्थायी यातना में होंगे, जो कभी समाप्त न होगी।
आयत 46
وَمَا كَانَ لَهُم مِّنْ أَوْلِيَآءَ يَنصُرُونَهُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ ۗ وَمَن يُضْلِلِ ٱللَّهُ فَمَا لَهُۥ مِن سَبِيلٍ
وَمَا
और ना
كَانَ
होंगे
لَهُم
उनके लिए
مِّنْ
any
أَوْلِيَآءَ
कोई मददगार
يَنصُرُونَهُم
जो मदद करें उनकी
مِّن
besides
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ ۗ
अल्लाह के
وَمَن
और जिसे
يُضْلِلِ
भटका दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
فَمَا
तो नहीं
لَهُۥ
उसके लिए
مِن
any
سَبِيلٍ
कोई रास्ता
और उनके कुछ संरक्षक भी न होंगे, जो सहायता करके उन्हें अल्लाह से बचा सकें। जिसे अल्लाह गुमराही में डाल दे तो उसके लिए फिर कोई मार्ग नहीं।"
तफ़्सीर:
और उनके लिए संरक्षक भी नहीं होंगे, जो क़ियामत के दिन उन्हें अल्लाह की यातना से बचाने के लिए उनकी मदद कर सकें। तथा जिसे अल्लाह सत्य से हटाकर गुमराह कर दे, तो फिर उसके पास सच्चाई की ओर मार्गदर्शन करने के लिए हरगिज़ कोई रास्ता नहीं है।
आयत 47
ٱسْتَجِيبُوا۟ لِرَبِّكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِىَ يَوْمٌۭ لَّا مَرَدَّ لَهُۥ مِنَ ٱللَّهِ ۚ مَا لَكُم مِّن مَّلْجَإٍۢ يَوْمَئِذٍۢ وَمَا لَكُم مِّن نَّكِيرٍۢ
ٱسْتَجِيبُوا۟
लब्बैक कहो
لِرَبِّكُم
अपने रब के लिए
مِّن
before
قَبْلِ
इससे पहले
أَن
कि
يَأْتِىَ
आ जाए
يَوْمٌۭ
एक दिन
لَّا
(there is) no
مَرَدَّ
नहीं कोई टलना
لَهُۥ
उसके लिए
مِنَ
from
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह की तरफ़ से
مَا
नहीं
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّن
any
مَّلْجَإٍۢ
कोई जाए पनाह
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
وَمَا
और नहीं
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّن
any
نَّكِيرٍۢ
कोई इन्कार करना
अपने रब की बात मान लो इससे पहले कि अल्लाह की ओर से वह दिन आ जाए जो पलटने का नहीं। उस दिन तुम्हारे लिए न कोई शरण-स्थल होगा और न तुम किसी चीज़ को रद्द कर सकोगे
तफ़्सीर:
(ऐ लोगो!) अपने पालनहार की बात मान लो, इस प्रकार कि उसके आदेशों क पालन करने और उसके निषेधों से बचने में जल्दी करो और टालमटोल को छोड़ दो, इससे पहले कि क़ियामत का दिन आ जाए, जिसके आ जाने पर उसे कोई टाल नहीं सकता। उस दिन तुम्हारे पास कोई शरण स्थल न होगा, जहाँ तुम शरण ले सको और तुम दुनिया में अपने किए हुए गुनाहों का इनकार भी नहीं कर सकोगे।
आयत 48
فَإِنْ أَعْرَضُوا۟ فَمَآ أَرْسَلْنَـٰكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًا ۖ إِنْ عَلَيْكَ إِلَّا ٱلْبَلَـٰغُ ۗ وَإِنَّآ إِذَآ أَذَقْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ مِنَّا رَحْمَةًۭ فَرِحَ بِهَا ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌۢ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ فَإِنَّ ٱلْإِنسَـٰنَ كَفُورٌۭ
فَإِنْ
फिर अगर
أَعْرَضُوا۟
वो ऐराज़ करें
فَمَآ
तो नहीं
أَرْسَلْنَـٰكَ
भेजा हमने आपको
عَلَيْهِمْ
उन पर
حَفِيظًا ۖ
निगेहबान बना कर
إِنْ
नहीं
عَلَيْكَ
आपके ज़िम्मे
إِلَّا
मगर
ٱلْبَلَـٰغُ ۗ
पहुँचा देना
وَإِنَّآ
और बेशक हम
إِذَآ
जब
أَذَقْنَا
चखाते हैं हम
ٱلْإِنسَـٰنَ
इन्सान को
مِنَّا
अपनी तरफ़ से
رَحْمَةًۭ
कोई रहमत
فَرِحَ
वो ख़ुश हो जाता है
بِهَا ۖ
उस पर
وَإِن
और अगर
تُصِبْهُمْ
पहुँचती है उन्हें
سَيِّئَةٌۢ
कोई तक्लीफ़
بِمَا
बवजह उसके जो
قَدَّمَتْ
आगे भेजा
أَيْدِيهِمْ
उनके हाथों ने
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱلْإِنسَـٰنَ
इन्सान
كَفُورٌۭ
सख़्त नाशुक्रा है
अब यदि वे ध्यान में न लाएँ तो हमने तो तुम्हें उनपर कोई रक्षक बनाकर तो भेजा नहीं है। तुमपर तो केवल (संदेश) पहुँचा देने की ज़िम्मेदारी है। हाल यह है कि जब हम मनुष्य को अपनी ओर से किसी दयालुता का आस्वादन कराते है तो वह उसपर इतराने लगता है, किन्तु ऐसे लोगों के हाथों ने जो कुछ आगे भेजा है उसके कारण यदि उन्हें कोई तकलीफ़ पहुँचती है तो निश्चय ही वही मनुष्य बड़ा कृतघ्न बन जाता है
तफ़्सीर:
फिर यदि वे आपके दिए हुए आदेशों से मुँह फेर लें, तो हमने (ऐ रसूल!) आपको उनके ऊपर संरक्षक बनाकर नहीं भेजा है कि आप उनके कार्यों को संरक्षित करें। आपका कर्तव्य तो केवल उस चीज़ को पहुँचा देना है, जिसे पहुँचाने का आपको आदेश दिया गया है और उनका हिसाब अल्लाह के हवाले है। जब हम इनसान को अपनी ओर से समृद्धि और स्वास्थ्य आदि के रूप में दया का स्वाद चखाते हैं, तो वह खुशी से झूम उठता है। लेकिन अगर लोगों को उनके गुनाहों के कारण किसी विपत्ति का सामना होता है, तो उनका स्वभाव अल्लाह की नेमतों की कृतघ्नता तथा उनके प्रति आभार न व्यक्त करना और अल्लाह ने अपनी हिकमत के तहत जो कुछ नियत किया है उसपर असंतोष प्रकट करना होता है।
आयत 49
لِّلَّهِ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ يَخْلُقُ مَا يَشَآءُ ۚ يَهَبُ لِمَن يَشَآءُ إِنَـٰثًۭا وَيَهَبُ لِمَن يَشَآءُ ٱلذُّكُورَ
لِّلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
مُلْكُ
बादशाहत
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ ۚ
और ज़मीन की
يَخْلُقُ
वो पैदा करता है
مَا
जो
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता है
يَهَبُ
वो अता करता है
لِمَن
जिसके लिए
يَشَآءُ
वो चाहता है
إِنَـٰثًۭا
लड़कियाँ
وَيَهَبُ
और वो अता करता है
لِمَن
जिसके लिए
يَشَآءُ
वो चाहता है
ٱلذُّكُورَ
लड़के
अल्लाह ही की है आकाशों और धरती की बादशाही। वह जो चाहता है पैदा करता है, जिसे चाहता है लड़कियाँ देता है और जिसे चाहता है लड़के देता है।
तफ़्सीर:
आकाशों और धरती का राज्य अल्लाह ही का है। वह जो चाहे, पुरुष या महिला या इसके अलावा, पैदा करता है। वह जिसे चाहता है बेटियाँ देता है और बेटों से वंचित रखता है। तथा जिसे चाहता है बेटे देता है और बेटियों से वंचित रखता है। या जिसे चाहता है, बेटे और बेटियाँ दोनों एक साथ देता है। तथा जिसे चाहता है बाँझ बना देता है कि उसकी कोई संतान नहीं होती। निश्चय ही वह जानता है जो कुछ हो चुका और जो कुछ भविष्य में होगा। यह उसके पूर्ण ज्ञान और पूर्ण हिकमत का पता देता है। उससे कुछ भी छिपा नहीं है और न ही वह किसी चीज़ में असमर्थ है।
आयत 50
أَوْ يُزَوِّجُهُمْ ذُكْرَانًۭا وَإِنَـٰثًۭا ۖ وَيَجْعَلُ مَن يَشَآءُ عَقِيمًا ۚ إِنَّهُۥ عَلِيمٌۭ قَدِيرٌۭ
أَوْ
या
يُزَوِّجُهُمْ
वो मिला- जुला कर देता है उन्हें
ذُكْرَانًۭا
लड़के
وَإِنَـٰثًۭا ۖ
और लड़कियाँ
وَيَجْعَلُ
और वो बना देता है
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
عَقِيمًا ۚ
बाँझ
إِنَّهُۥ
बेशक वो
عَلِيمٌۭ
ख़ूब इल्म वाला है
قَدِيرٌۭ
ख़ूब क़ुदरत वाला है
या उन्हें लड़के और लड़कियाँ मिला-जुलाकर देता है और जिसे चाहता है निस्संतान रखता है। निश्चय ही वह सर्वज्ञ, सामर्थ्यवान है
तफ़्सीर:
आकाशों और धरती का राज्य अल्लाह ही का है। वह जो चाहे, पुरुष या महिला या इसके अलावा, पैदा करता है। वह जिसे चाहता है बेटियाँ देता है और बेटों से वंचित कर देता है। तथा वह जिसे चाहता है बेटे देता है और बेटियों से वंचित कर देता है। या जिसे वह चाहता है बेटे और बेटियाँ दोनों एक साथ देता है। तथा जिसे वह चाहता है बाँझ बना देता है कि उसकी कोई संतान नहीं होती। निश्चय ही वह जानता है जो कुछ हो चुका और जो कुछ भविष्य में होगा। यह उसके ज्ञान की पूर्णता और उसकी हिकमत की पूर्णता से है। उससे कुछ भी छिपा नहीं है और न ही कोई चीज़ उसे अक्षम कर सकती है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
औलाद में फर्क (बेटा-बेटी) अल्लाह के इख्तियार में होने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि औलाद की किस्म और तादाद अल्लाह की मर्ज़ी है, इस पर शिकायत की बजाय रज़ा रखनी चाहिए।
आयत 51
۞ وَمَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن يُكَلِّمَهُ ٱللَّهُ إِلَّا وَحْيًا أَوْ مِن وَرَآئِ حِجَابٍ أَوْ يُرْسِلَ رَسُولًۭا فَيُوحِىَ بِإِذْنِهِۦ مَا يَشَآءُ ۚ إِنَّهُۥ عَلِىٌّ حَكِيمٌۭ
۞ وَمَا
और नहीं
كَانَ
है
لِبَشَرٍ
किसी इन्सान के लिए
أَن
कि
يُكَلِّمَهُ
कलाम करे उससे
ٱللَّهُ
अल्लाह
إِلَّا
मगर
وَحْيًا
वही के तौर
أَوْ
या
مِن
from
وَرَآئِ
पीछे से
حِجَابٍ
पर्दे के
أَوْ
या
يُرْسِلَ
वो भेजे
رَسُولًۭا
कोई रसूल(फ़रिश्ता)
فَيُوحِىَ
तो वो वही पहुँचाता है
بِإِذْنِهِۦ
उसके इज़्न से
مَا
जो
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता है
إِنَّهُۥ
यक़ीनन वो
عَلِىٌّ
बहुत बुलन्द है
حَكِيمٌۭ
ख़ूब हिकमत वाला है
किसी मनुष्य की यह शान नहीं कि अल्लाह उससे बात करे, सिवाय इसके कि प्रकाशना के द्वारा या परदे के पीछे से (बात करे) । या यह कि वह एक रसूल (फ़रिश्ता) भेज दे, फिर वह उसकी अनुज्ञा से जो कुछ वह चाहता है प्रकाशना कर दे। निश्चय ही वह सर्वोच्च अत्यन्त तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
किसी इनसान के लिए उचित नहीं है कि अल्लाह उससे बात करे, सिवाय इसके कि वह़्य द्वारा उसके दिल में कोई बात डाल दे, या उससे ऐसे बात करे कि वह अल्लाह की बात तो सुनता हो लेकिन उसे देखता न हो, या उसकी ओर दूत के रूप में किसी फ़रिश्ते को भेजे, जैसे जिबरील अलैहिस्सलाम, और वह अल्लाह की अनुमति से मानव दूत (रसूल) की ओर उस चीज़ की वह़्य करे, जो अल्लाह उसकी ओर वह़्य करना चाहता है। निःसंदेह वह महिमावान (अल्लाह) अपने अस्तित्व एवं गुणों में सर्वोच्च, तथा अपनी रचना, नियति और शरीयत में हिकमत वाला है।
आयत 52
وَكَذَٰلِكَ أَوْحَيْنَآ إِلَيْكَ رُوحًۭا مِّنْ أَمْرِنَا ۚ مَا كُنتَ تَدْرِى مَا ٱلْكِتَـٰبُ وَلَا ٱلْإِيمَـٰنُ وَلَـٰكِن جَعَلْنَـٰهُ نُورًۭا نَّهْدِى بِهِۦ مَن نَّشَآءُ مِنْ عِبَادِنَا ۚ وَإِنَّكَ لَتَهْدِىٓ إِلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
أَوْحَيْنَآ
वही की हमने
إِلَيْكَ
आपकी तरफ़
رُوحًۭا
एक रूह (क़ुरान ) की
مِّنْ
by
أَمْرِنَا ۚ
अपने हुक्म से
مَا
ना
كُنتَ
थे आप
تَدْرِى
आप जानते
مَا
क्या है
ٱلْكِتَـٰبُ
किताब
وَلَا
और ना
ٱلْإِيمَـٰنُ
ईमान
وَلَـٰكِن
और लेकिन
جَعَلْنَـٰهُ
बनाया हमने उसे
نُورًۭا
ऐसा नूर
نَّهْدِى
हम हिदायत देते हैं
بِهِۦ
साथ उसके
مَن
जिसे
نَّشَآءُ
हम चाहते हैं
مِنْ
of
عِبَادِنَا ۚ
अपने बन्दों में से
وَإِنَّكَ
और बेशक आप
لَتَهْدِىٓ
अलबत्ता आप रहनुमाई करते हैं
إِلَىٰ
to
صِرَٰطٍۢ
तरफ़ रास्ते
مُّسْتَقِيمٍۢ
सीधे के
और इसी प्रकार हमने अपने आदेश से एक रूह (क़ुरआन) की प्रकाशना तुम्हारी ओर की है। तुम नहीं जानते थे कि किताब क्या होती है और न ईमान को (जानते थे), किन्तु हमने इस (प्रकाशना) को एक प्रकाश बनाया, जिसके द्वारा हम अपने बन्दों में से जिसे चाहते है मार्ग दिखाते है। निश्चय ही तुम एक सीधे मार्ग की ओर पथप्रदर्शन कर रहे हो-
तफ़्सीर:
जिस तरह हमने (ऐ रसूल!) आपसे पहले के नबियों की ओर वह़्य की थी, उसी तरह हमने आपकी ओर अपने पास से एक क़ुरआन की वह़्य की है। आप उससे पहले नहीं जानते थे कि रसूलों पर उतरने वाली आसमानी किताबें क्या हैं और न आप यह जानते थे कि ईमान क्या है? लेकिन हमने इस क़ुरआन को एक प्रकाश बनाकर उतारा है, जिसके द्वारा हम अपने बंदों में से जिसे चाहते हैं, मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। निश्चय ही आप लोगों को एक सीधा मार्ग दिखाते हैं जो कि इस्लाम धर्म है।
आयत 53
صِرَٰطِ ٱللَّهِ ٱلَّذِى لَهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۗ أَلَآ إِلَى ٱللَّهِ تَصِيرُ ٱلْأُمُورُ
صِرَٰطِ
रास्ता
ٱللَّهِ
अल्लाह का
ٱلَّذِى
वो जो
لَهُۥ
उसका के लिए है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ ۗ
ज़मीन में है
أَلَآ
ख़बरदार
إِلَى
To
ٱللَّهِ
तरफ़ अल्लाह ही के
تَصِيرُ
लौटते हैं
ٱلْأُمُورُ
तमाम मामलात
उस अल्लाह के मार्ग की ओर जिसका वह सब कुछ है, जो आकाशों में है और जो धरती में है। सुन लो, सारे मामले अन्ततः अल्लाह ही की ओर पलटते हैं
तफ़्सीर:
उस अल्लाह का मार्ग कि जो कुछ आकाशों में हैं और जो कुछ धरती पर है, रचना, स्वामित्व और प्रबंधन में उसी का है। अनिवार्य रूप से, सभी मामले अपनी नियति और प्रबंधन में अकेले अल्लाह की ओर लौटते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
वही के अलग-अलग तरीकों के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह ने हर दौर में इंसानों तक अपना पैगाम पहुंचाने का इंतज़ाम किया, हमें इस नेमत की कद्र करनी चाहिए।
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