सूरह अज़-ज़ुख़रुफ़ سورة الزخرف
मक्की 89 आयतें
नाम का मतलब
सोने-चांदी की सजावट (दुनियावी माल-ओ-ज़ीनत की बेकद्री के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अज़-ज़ुखरुफ में दुनियावी माल-ओ-दौलत की हकीकत और इब्राहीम अलैहिस्सलाम की तौहीद की दावत का ज़िक्र है। इसमें यह बताया गया है कि दुनियावी माल कामयाबी का असली मेयार नहीं।
फ़ज़ीलत / सार
इस सूरह में दुनियावी शान-ओ-शौकत की बेकद्री को वाज़ेह करके असली कामयाबी आखिरत में तलाश करने की तालीम दी गई है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ حمٓ
حمٓ
ح م
हा॰ मीम॰
तफ़्सीर:
{हा, मीम।} सूरतुल-बक़रा की शुरुआत में इस प्रकार के अक्षरों के बारे में बात गुज़र चुकी है।
आयत 2
وَٱلْكِتَـٰبِ ٱلْمُبِينِ
وَٱلْكِتَـٰبِ
क़सम है किताब
ٱلْمُبِينِ
वाज़ेह की
गवाह है स्पष्ट किताब
तफ़्सीर:
अल्लाह ने सत्य का मार्ग दर्शाने वाले क़ुरआन की क़सम खाई है।
आयत 3
إِنَّا جَعَلْنَـٰهُ قُرْءَٰنًا عَرَبِيًّۭا لَّعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
إِنَّا
बेशक हमने
جَعَلْنَـٰهُ
बनाया हमने उसे
قُرْءَٰنًا
क़ुरान
عَرَبِيًّۭا
अर्बी
لَّعَلَّكُمْ
ताकि
تَعْقِلُونَ
तुम समझ सको
हमने उसे अरबी क़ुरआन बनाया, ताकि तुम समझो
तफ़्सीर:
हमने इसे अरबों की भाषा का क़ुरआन बनाया है, ताकि (ऐ वे लोगो! जिनकी भाषा में कुरआन उतरा है) तुम उसके अर्थ को समझ सको और फिर उसे दूसरे समुदायों तक स्थानांतरित करो।
आयत 4
وَإِنَّهُۥ فِىٓ أُمِّ ٱلْكِتَـٰبِ لَدَيْنَا لَعَلِىٌّ حَكِيمٌ
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
فِىٓ
(is) in
أُمِّ
(the) Mother
ٱلْكِتَـٰبِ
असल किताब में है
لَدَيْنَا
हमारे पास
لَعَلِىٌّ
अलबत्ता बहुत बुलन्द है
حَكِيمٌ
हिकमत से लबरेज़ है
और निश्चय ही वह मूल किताब में अंकित है, हमारे यहाँ बहुच उच्च कोटि की, तत्वदर्शिता से परिपूर्ण है
तफ़्सीर:
निःसंदेह यह क़ुरआन लौह़े मह़फ़ूज़ में बड़े ऊँचे स्थान वाला और हिकमत वाला है। उसकी आयतों को उसके आदेशों और निषेधों में सुदृढ़ बनाया गया है।
आयत 5
أَفَنَضْرِبُ عَنكُمُ ٱلذِّكْرَ صَفْحًا أَن كُنتُمْ قَوْمًۭا مُّسْرِفِينَ
أَفَنَضْرِبُ
क्या फिर हम रोक लें
عَنكُمُ
तुम से
ٱلذِّكْرَ
इस नसीहत को
صَفْحًا
ऐराज़ करते हुए
أَن
कि
كُنتُمْ
हो तुम
قَوْمًۭا
लोग
مُّسْرِفِينَ
हद से बढ़ने वाले
क्या इसलिए कि तुम मर्यादाहीन लोग हो, हम तुमपर से बिलकुल ही नज़र फेर लेंगे?
तफ़्सीर:
क्या हम तुम्हारे ऊपर क़ुरआन उतारना, इस कारण से छोड़ दें कि तुम बहुत ज़्यादा शिर्क और पाप करते हो? हम ऐसा नहीं करेंगे। बल्कि तुम्हारे प्रति दया इसके विपरीत की अपेक्षा करती है।
आयत 6
وَكَمْ أَرْسَلْنَا مِن نَّبِىٍّۢ فِى ٱلْأَوَّلِينَ
وَكَمْ
और कितने ही
أَرْسَلْنَا
भेजे हमने
مِن
of
نَّبِىٍّۢ
नबियों में से
فِى
among
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों में
हमने पहले के लोगों में कितने ही रसूल भेजे
तफ़्सीर:
और हमने पिछले समुदायों में कितने ही नबी भेजे।
आयत 7
وَمَا يَأْتِيهِم مِّن نَّبِىٍّ إِلَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ
وَمَا
और नहीं
يَأْتِيهِم
आया उनके पास
مِّن
any Prophet
نَّبِىٍّ
कोई नबी
إِلَّا
मगर
كَانُوا۟
थे वो
بِهِۦ
उसका
يَسْتَهْزِءُونَ
वो मज़ाक़ उड़ाते
किन्तु जो भी नबी उनके पास आया, वे उसका परिहास ही करते रहे
तफ़्सीर:
तथा उन पिछले समुदायों के पास अल्लाह की ओर से जब भी कोई नबी आता, तो वे उसका मज़ाक़ उड़ाया करते थे।
आयत 8
فَأَهْلَكْنَآ أَشَدَّ مِنْهُم بَطْشًۭا وَمَضَىٰ مَثَلُ ٱلْأَوَّلِينَ
فَأَهْلَكْنَآ
तो हलाक कर दिया हमने
أَشَدَّ
सबसे शदीद को
مِنْهُم
उनमें से
بَطْشًۭا
पकड़ में
وَمَضَىٰ
और गुज़र चुकी
مَثَلُ
मिसाल
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों की
अन्ततः हमने उनको पकड़ में लेकर विनष्ट कर दिया जो उनसे कहीं अधिक बलशाली थे। और पहले के लोगों की मिसाल गुज़र-चुकी है
तफ़्सीर:
अंततः हमने उन समुदायों को विनष्ट कर दिया, जो अधिक बलवान थे। इसलिए हम उनसे कमज़ोर लोगों को विनष्ट करने से विवश नहीं हो सकते। और क़ुरआन में पिछले समुदायों, जैसे आद, समूद, लूत अलैहिस्सलाम की जाति और मद्यन वालों के विनाश का हाल गुज़र चुका है।
आयत 9
وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ لَيَقُولُنَّ خَلَقَهُنَّ ٱلْعَزِيزُ ٱلْعَلِيمُ
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
سَأَلْتَهُم
पूछें आप उनसे
مَّنْ
किसने
خَلَقَ
पैदा किया
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
لَيَقُولُنَّ
अलबत्ता वो ज़रूर कहेंगे
خَلَقَهُنَّ
पैदा किया उन्हें
ٱلْعَزِيزُ
निहायत ग़ालिब
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब इल्म वाले ने
यदि तुम उनसे पूछो कि "आकाशों और धरती को किसने पैदा किया?" तो वे अवश्य कहेंगे, "उन्हें अत्यन्त प्रभुत्वशाली, सर्वज्ञ सत्ता ने पैदा किया।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) अगर आप इन झुठलाने वाले मुश्रिकों से पूछें कि आकाशों को किसने पैदा किया और धरती को किसने पैदा किया? तो वे आपके सवाल का जवाब देते हुए अवश्य कहेंगे : उन्हें उस प्रभुत्वशाली अल्लाह ने पैदा किया है, जिसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता, जो हर चीज़ को जानने वाला है।
आयत 10
ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُمُ ٱلْأَرْضَ مَهْدًۭا وَجَعَلَ لَكُمْ فِيهَا سُبُلًۭا لَّعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ
ٱلَّذِى
वो जिसने
جَعَلَ
बनाया
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
مَهْدًۭا
बिछौना
وَجَعَلَ
और उसने बनाए
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
فِيهَا
उसमें
سُبُلًۭا
रास्ते
لَّعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَهْتَدُونَ
तुम राह पाओ
जिसने तुम्हारे लिए धरती को गहवारा बनाया औऱ उसमें तुम्हारे लिए मार्ग बना दिए. ताकि तुम्हें मार्गदर्शन प्राप्त हो
तफ़्सीर:
वही अल्लाह जिसने तुम्हारे लिए पृथ्वी को समतल बनाया। चुनाँचे उसे तुम्हारे लिए हमवार कर दिया जिसपर तुम अपने पैरों से चलते हो, तथा उसके पहाड़ों और घाटियों में तुम्हारे लिए रास्ते बना दिए, ताकि तुम अपने चलने में उनसे मार्गदर्शन प्राप्त कर सको।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन की अज़मत और अल्लाह की नेमतों का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह की दी नेमतों का शुक्र अदा करना चाहिए, न कि उन्हें अपनी काबिलियत समझना चाहिए।
आयत 11
وَٱلَّذِى نَزَّلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۢ بِقَدَرٍۢ فَأَنشَرْنَا بِهِۦ بَلْدَةًۭ مَّيْتًۭا ۚ كَذَٰلِكَ تُخْرَجُونَ
وَٱلَّذِى
और वो जिसने
نَزَّلَ
उतारा
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مَآءًۢ
पानी
بِقَدَرٍۢ
साथ एक अंदाज़े के
فَأَنشَرْنَا
फिर ज़िन्दा किया हमने
بِهِۦ
साथ उसके
بَلْدَةًۭ
शहर
مَّيْتًۭا ۚ
मुर्दा को
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
تُخْرَجُونَ
तुम निकाले जाओगे
और जिसने आकाश से एक अन्दाज़े से पानी उतारा। और हमने उसके द्वारा मृत भूमि को जीवित कर दिया। इसी तरह तुम भी (जीवित करके) निकाले जाओगे
तफ़्सीर:
और वह जिसने आकाश से इतना पानी उतारा, जो तुम्हारे लिए पर्याप्त है और तुम्हारे पशुधन और फसलों के लिए पर्याप्त है। फिर हमने उससे एक बंजर भूमि को जीवित कर दिया, जो पेड़-पौधों से खाली थी। और जैसे अल्लाह ने उस बंजर भूमि को पौधों के द्वारा जीवित किया है, वैसे ही वह तुम्हें क़ियामत (महा-प्रलय) के लिए पुनर्जीवित करेगा।
आयत 12
وَٱلَّذِى خَلَقَ ٱلْأَزْوَٰجَ كُلَّهَا وَجَعَلَ لَكُم مِّنَ ٱلْفُلْكِ وَٱلْأَنْعَـٰمِ مَا تَرْكَبُونَ
وَٱلَّذِى
और वो जिसने
خَلَقَ
बनाए
ٱلْأَزْوَٰجَ
जोड़े
كُلَّهَا
सारे के सारे
وَجَعَلَ
और उसने बनाया
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنَ
[of]
ٱلْفُلْكِ
कश्तियों
وَٱلْأَنْعَـٰمِ
और मवेशियों को
مَا
जिन पर
تَرْكَبُونَ
तुम सवारी करते हो
और जिसने विभिन्न प्रकार की चीज़े पैदा कीं, और तुम्हारे लिए वे नौकाएँ और जानवर बनाए जिनपर तुम सवार होते हो
तफ़्सीर:
और वह जिसने रात और दिन, नर और मादा, और अन्य सभी प्रकार की चीजें पैदा कीं तथा तुम्हारे लिए नाव एवं जानवर बनाए, जिनकी तुम अपनी यात्राओं में सवारी करते हो। चुनाँचे तुम जल में नावों पर सवार होते हो और थल में अपने जानवरों पर सवार होते हो।
आयत 13
لِتَسْتَوُۥا۟ عَلَىٰ ظُهُورِهِۦ ثُمَّ تَذْكُرُوا۟ نِعْمَةَ رَبِّكُمْ إِذَا ٱسْتَوَيْتُمْ عَلَيْهِ وَتَقُولُوا۟ سُبْحَـٰنَ ٱلَّذِى سَخَّرَ لَنَا هَـٰذَا وَمَا كُنَّا لَهُۥ مُقْرِنِينَ
لِتَسْتَوُۥا۟
ताकि तुम जम कर बैठो
عَلَىٰ
on
ظُهُورِهِۦ
उनकी पुश्तों पर
ثُمَّ
फिर
تَذْكُرُوا۟
तुम याद करो
نِعْمَةَ
नेअमत
رَبِّكُمْ
अपने रब की
إِذَا
जब
ٱسْتَوَيْتُمْ
तुम जम कर बैठ जाओ
عَلَيْهِ
उन पर
وَتَقُولُوا۟
और तुम कहो
سُبْحَـٰنَ
पाक है
ٱلَّذِى
वो जिसने
سَخَّرَ
मुसख़्खर किया
لَنَا
हमारे लिए
هَـٰذَا
उसे
وَمَا
और ना
كُنَّا
थे हम
لَهُۥ
उसे
مُقْرِنِينَ
क़ाबू में लाने वाले
ताकि तुम उनकी पीठों पर जमकर बैठो, फिर याद करो अपने रब की अनुकम्पा को जब तुम उनपर बैठ जाओ और कहो, "कितना महिमावान है वह जिसने इसको हमारे वश में किया, अन्यथा हम तो इसे क़ाबू में कर सकनेवाले न थे
तफ़्सीर:
यह सब उसने तुम्हारे लिए इसलिए बनाया है, ताकि सफ़र में उनकी पीठ पर जमकर बैठ सको। फिर जब तुम उनकी पीठ पर बैठ जाओ, तो अपने पालनहार की नेमत को याद करो कि उसने इन्हें तुम्हारे वश में कर दिया और तुम अपनी ज़बान से कहो : पवित्र है वह अल्लाह, जिसने इस सवारी को हमारे वश में कर दिया, तो हम इसपर नियंत्रण रखते हैं। हालाँकि यदि अल्लाह ने उसे हमारे वश में न कर दिया होता, तो हम ऐसा करने में सक्षम नहीं थे।
आयत 14
وَإِنَّآ إِلَىٰ رَبِّنَا لَمُنقَلِبُونَ
وَإِنَّآ
और बेशक हम
إِلَىٰ
to
رَبِّنَا
तरफ़ अपने रब के
لَمُنقَلِبُونَ
यक़ीनन पलटने वाले हैं
और निश्चय ही हम अपने रब की ओर लौटनेवाले है।"
तफ़्सीर:
निःसंदेह हम अपनी मृत्यु के बाद, हिसाब और बदले के लिए अकेले अपने पालनहार की ओर लौटने वाले हैं।
आयत 15
وَجَعَلُوا۟ لَهُۥ مِنْ عِبَادِهِۦ جُزْءًا ۚ إِنَّ ٱلْإِنسَـٰنَ لَكَفُورٌۭ مُّبِينٌ
وَجَعَلُوا۟
और उन्होंने बना दिया
لَهُۥ
उसके लिए
مِنْ
from
عِبَادِهِۦ
उसके बन्दों में से
جُزْءًا ۚ
एक जुज़(औलाद)
إِنَّ
बेशक
ٱلْإِنسَـٰنَ
इन्सान
لَكَفُورٌۭ
यक़ीनन बहुत नाशुक्रा है
مُّبِينٌ
खुल्लम-खुल्ला
उन्होंने उसके बन्दों में से कुछ को उसका अंश ठहरा दिया! निश्चय ही मनुष्य खुला कृतघ्न है
तफ़्सीर:
मुश्रिकों ने दावा किया कि कुछ जीव महिमावान सृष्टिकर्ता (अल्लाह) से पैदा हुए हैं, जब उन्होंने कहा : फ़रिश्ते अल्लाह की बेटियाँ हैं। निश्चय ही ऐसा कहने वाला व्यक्ति स्पष्ट कृतघ्न और गुमराह है।
आयत 16
أَمِ ٱتَّخَذَ مِمَّا يَخْلُقُ بَنَاتٍۢ وَأَصْفَىٰكُم بِٱلْبَنِينَ
أَمِ
या
ٱتَّخَذَ
उसने बना लीं
مِمَّا
उसमें से जो
يَخْلُقُ
वो पैदा करता है
بَنَاتٍۢ
बेटियाँ
وَأَصْفَىٰكُم
और चुन लिया तुम्हें
بِٱلْبَنِينَ
बेटों के लिए
(क्या किसी ने अल्लाह को इससे रोक दिया है कि वह अपने लिए बेटे चुनता) या जो कुछ वह पैदा करता है उसमें से उसने स्वयं ही अपने लिए तो बेटियाँ लीं और तुम्हें चुन लिया बेटों के लिए?
तफ़्सीर:
(ऐ मुश्रिको!) क्या तुम कहते हो कि अल्लाह ने अपनी पैदा की हुई चीज़ों में से अपने लिए बेटियाँ बना ली हैं और तुम्हें बेटों के लिए चुन लिया है?! भला यह कैसा विभाजन है, जिसका तुमने दावा किया है?!
आयत 17
وَإِذَا بُشِّرَ أَحَدُهُم بِمَا ضَرَبَ لِلرَّحْمَـٰنِ مَثَلًۭا ظَلَّ وَجْهُهُۥ مُسْوَدًّۭا وَهُوَ كَظِيمٌ
وَإِذَا
हालाँकि जब
بُشِّرَ
ख़ुशख़बरी दी जाती है
أَحَدُهُم
उनमें से किसी एक को
بِمَا
साथ उसके जो
ضَرَبَ
उसने बयान की
لِلرَّحْمَـٰنِ
रहमान के लिए
مَثَلًۭا
मिसाल
ظَلَّ
हो जाता है
وَجْهُهُۥ
चेहरा उसका
مُسْوَدًّۭا
सियाह
وَهُوَ
और वो
كَظِيمٌ
ग़म से भरा होता है
और हाल यह है कि जब उनमें से किसी को उसकी मंगल सूचना दी जाती है, जो वह रहमान के लिए बयान करता है, तो उसके मुँह पर कलौंस छा जाती है और वह ग़म के मारे घुटा-घुटा रहने लगता है
तफ़्सीर:
हालाँकि जब उनमें से किसी को उस बेटी की शुभ सूचना दी जाए, जिसकी निस्बत वह अपने पालनहार की ओर करता है, तो शोक और दु:ख की तीव्रता से उसका चेहरा काला हो जाता है और वह क्रोध से भर जाता है। तो वह अपने पालनहार की ओर ऐसी चीज़ की निस्बत कैसे करता है, जिसकी शुभ सूचना दिए जाने पर वह शोकाकुल हो जाता है।
आयत 18
أَوَمَن يُنَشَّؤُا۟ فِى ٱلْحِلْيَةِ وَهُوَ فِى ٱلْخِصَامِ غَيْرُ مُبِينٍۢ
أَوَمَن
क्या भला जिसे
يُنَشَّؤُا۟
पाला जाता है
فِى
in
ٱلْحِلْيَةِ
ज़ेवरात में
وَهُوَ
और वो
فِى
in
ٱلْخِصَامِ
झगड़े में
غَيْرُ
ग़ैर
مُبِينٍۢ
वाज़ेह है
और क्या वह जो आभूषणों में पले और वह जो वाद-विवाद और झगड़े में खुल न पाए (ऐसी अबला को अल्लाह की सन्तान घोषित करते हो)?
तफ़्सीर:
क्या वे अपने पालनहार की ओर उसकी निस्बत करते हैं, जो आभूषणों में पलती है और वह अपने स्त्रीत्व के कारण विवाद के समय खुलकर बात (भी) नहीं कर सकती?!
आयत 19
وَجَعَلُوا۟ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ ٱلَّذِينَ هُمْ عِبَـٰدُ ٱلرَّحْمَـٰنِ إِنَـٰثًا ۚ أَشَهِدُوا۟ خَلْقَهُمْ ۚ سَتُكْتَبُ شَهَـٰدَتُهُمْ وَيُسْـَٔلُونَ
وَجَعَلُوا۟
और उन्होंने बना लिया
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ
फ़रिश्तों को
ٱلَّذِينَ
जो
هُمْ
वो
عِبَـٰدُ
बन्दे हैं
ٱلرَّحْمَـٰنِ
रहमान के
إِنَـٰثًا ۚ
औरतें
أَشَهِدُوا۟
क्या वो हाज़िर थे
خَلْقَهُمْ ۚ
उनकी पैदाइश (के वक़्त )
سَتُكْتَبُ
ज़रूर लिखी जाएगी
شَهَـٰدَتُهُمْ
गवाही उनकी
وَيُسْـَٔلُونَ
और वो पूछे जाऐंगे
उन्होंने फ़रिश्तों को, जो रहमान के बन्दे है, स्त्रियाँ ठहरा ली है। क्या वे उनकी संरचना के समय मौजूद थे? उनकी गवाही लिख ली जाएगी और उनसे पूछ होगी
तफ़्सीर:
उन्होंने फ़रिश्तों को, जो कि परम दयालु अल्लाह के बंदे हैं, नारी ठहरा लिया है। क्या वे उस समय उपस्थित थे जब अल्लाह ने उन्हें बनाया था, इसलिए उन्हें पता चल गया कि वे नारी हैं?! फ़रिश्ते उनकी इस गवाही को लिख लेंगे और वे क़ियामत के दिन इसके बारे में पूछे जाएँगे तथा उनके झूठ बोलने के कारण इसपर उन्हें यातना दी जाएगी।
आयत 20
وَقَالُوا۟ لَوْ شَآءَ ٱلرَّحْمَـٰنُ مَا عَبَدْنَـٰهُم ۗ مَّا لَهُم بِذَٰلِكَ مِنْ عِلْمٍ ۖ إِنْ هُمْ إِلَّا يَخْرُصُونَ
وَقَالُوا۟
और वो कहते हैं
لَوْ
अगर
شَآءَ
चाहता
ٱلرَّحْمَـٰنُ
रहमान
مَا
ना
عَبَدْنَـٰهُم ۗ
इबादत करते हम उनकी
مَّا
नहीं
لَهُم
उनके लिए
بِذَٰلِكَ
इसका
مِنْ
any
عِلْمٍ ۖ
कोई इल्म
إِنْ
नहीं
هُمْ
वो
إِلَّا
मगर
يَخْرُصُونَ
वो अंदाज़े लगाते हैं
वे कहते है कि "यदि रहमान चाहता तो हम उन्हें न पूजते।" उन्हें इसका कुछ ज्ञान नहीं। वे तो बस अटकल दौड़ाते है
तफ़्सीर:
उन्होंने तक़दीर को तर्क (बहाना) बनाते हुए कहा : अगर अल्लाह चाहता कि हम फ़रिश्तों की पूजा न करें, तो हम उनकी पूजा न करते। अतः उसका हमसे यह चाहना उसकी संतुष्टि को इंगित करता है। उन्हें अपनी इस बात का कोई ज्ञान नहीं है, वे केवल झूठ बोल रहे हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मुशरिकों के फरिश्तों को बेटियां कहने की गलत बात का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि अपनी पसंद-नापसंद के मुताबिक अल्लाह के बारे में राय बनाना गलत है।
आयत 21
أَمْ ءَاتَيْنَـٰهُمْ كِتَـٰبًۭا مِّن قَبْلِهِۦ فَهُم بِهِۦ مُسْتَمْسِكُونَ
أَمْ
या
ءَاتَيْنَـٰهُمْ
दी हमने उन्हें
كِتَـٰبًۭا
कोई किताब
مِّن
before it
قَبْلِهِۦ
इससे पहले
فَهُم
तो वो
بِهِۦ
उसे
مُسْتَمْسِكُونَ
मज़बूत पकड़े हुए हैं
(क्या हमने इससे पहले उनके पास कोई रसूल भेजा है) या हमने इससे पहले उनको कोई किताब दी है तो वे उसे दृढ़तापूर्वक थामें हुए है?
तफ़्सीर:
क्या हमने इन मुश्रिकों को क़ुरआन से पहले कोई पुस्तक दी है, जो उन्हें अल्लाह के अलावा किसी अन्य की पूजा करने की अनुमति देती है?! अतः वे उसी पुस्तक को थामे हुए हैं, उसी को तर्क बनाते हैं।
आयत 22
بَلْ قَالُوٓا۟ إِنَّا وَجَدْنَآ ءَابَآءَنَا عَلَىٰٓ أُمَّةٍۢ وَإِنَّا عَلَىٰٓ ءَاثَـٰرِهِم مُّهْتَدُونَ
بَلْ
बल्कि
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
إِنَّا
बेशक हम
وَجَدْنَآ
पाया हमने
ءَابَآءَنَا
अपने आबा ओ अजदाद को
عَلَىٰٓ
upon
أُمَّةٍۢ
एक तरीक़े पर
وَإِنَّا
और बेशक हम
عَلَىٰٓ
on
ءَاثَـٰرِهِم
उन्हीं के नक़्शे क़दम पर
مُّهْتَدُونَ
राह पाने वाले हैं
नहीं, बल्कि वे कहते है, "हमने तो अपने बाप-दादा को एक तरीक़े पर पाया और हम उन्हीं के पद-चिन्हों पर हैं, सीधे मार्ग पर चल रहे है।"
तफ़्सीर:
नहीं, ऐसा नहीं हुआ। बल्कि, उन्होंने (बाप-दादा के) अनुकरण को तर्क बनाते हुए कहा : हमने अपने बाप-दादा को एक धर्म और एक मार्ग पर पाया है, और वे मूर्तियों की पूजा करते थे। हम इन (मूर्तियों) की पूजा में उन्हीं के पदचिह्नों पर चल रहे हैं।
आयत 23
وَكَذَٰلِكَ مَآ أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ فِى قَرْيَةٍۢ مِّن نَّذِيرٍ إِلَّا قَالَ مُتْرَفُوهَآ إِنَّا وَجَدْنَآ ءَابَآءَنَا عَلَىٰٓ أُمَّةٍۢ وَإِنَّا عَلَىٰٓ ءَاثَـٰرِهِم مُّقْتَدُونَ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
مَآ
नहीं
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
مِن
before you
قَبْلِكَ
आपसे क़ब्ल
فِى
in
قَرْيَةٍۢ
किसी बस्ती में
مِّن
any
نَّذِيرٍ
कोई डराने वाला
إِلَّا
मगर
قَالَ
कहा
مُتْرَفُوهَآ
उसके ख़ुशहाल लोगों ने
إِنَّا
बेशक हम
وَجَدْنَآ
पाया हमने
ءَابَآءَنَا
अपने आबा ओ अजदाद को
عَلَىٰٓ
on
أُمَّةٍۢ
एक तरीक़े पर
وَإِنَّا
और बेशक हम
عَلَىٰٓ
[on]
ءَاثَـٰرِهِم
उन्हीं के नक़्शे क़दम पर
مُّقْتَدُونَ
पीछे चलने वाले हैं
इसी प्रकार हमने जिस किसी बस्ती में तुमसे पहले कोई सावधान करनेवाला भेजा तो वहाँ के सम्पन्न लोगों ने बस यही कहा कि "हमने तो अपने बाप-दादा को एक तरीक़े पर पाया और हम उन्हीं के पद-चिन्हों पर है, उनका अनुसरण कर रहे है।"
तफ़्सीर:
जिस तरह इन लोगों ने झुठलाया और अपने बाप-दादा का अनुकरण करने को तर्क बनाया, उसी तरह (ऐ रसूल) हमने आपसे पहले जिस बस्ती में भी किसी रसूल को उसकी जाति के लोगों को सावधान करने के लिए भेजा, तो उनके समृद्ध प्रमुखों तथा बड़े लोगों ने कहा : हमने अपने बाप-दादा को एक धर्म और एक मार्ग पर पाया है और हम उन्हीं के पदचिह्नों पर चल रहे हैं। अतः आपकी जाति इस मामले में कोई अनूठी नहीं है।
आयत 24
۞ قَـٰلَ أَوَلَوْ جِئْتُكُم بِأَهْدَىٰ مِمَّا وَجَدتُّمْ عَلَيْهِ ءَابَآءَكُمْ ۖ قَالُوٓا۟ إِنَّا بِمَآ أُرْسِلْتُم بِهِۦ كَـٰفِرُونَ
۞ قَـٰلَ
उसने कहा
أَوَلَوْ
क्या भला अगर
جِئْتُكُم
लाया हूँ मैं तुम्हारे पास
بِأَهْدَىٰ
ज़्यादा हिदायत वाला(तरीक़ा)
مِمَّا
उससे जो
وَجَدتُّمْ
पाया तुमने
عَلَيْهِ
उस पर
ءَابَآءَكُمْ ۖ
अपने आबा ओ अजदाद को
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
إِنَّا
बेशक हम
بِمَآ
उसका जो
أُرْسِلْتُم
भेजे गए तुम
بِهِۦ
साथ उसके
كَـٰفِرُونَ
इन्कार करने वाले हैं
उसने कहा, "क्या यदि मैं उससे उत्तम मार्गदर्शन लेकर आया हूँ, जिसपर तूने अपने बाप-दादा को पाया है, तब भी (तुम अपने बाप-दादा के पद-चिह्मों का ही अनुसरण करोगं)?" उन्होंने कहा, "तुम्हें जो कुछ देकर भेजा गया है, हम तो उसका इनकार करते है।"
तफ़्सीर:
उनके रसूल ने उनसे कहा : क्या तुम अपने बाप-दादा का अनुसरण करते रहोगे, अगरचे मैं तुम्हारे पास उससे बेहतर मार्ग लाया हूँ जिसपर तुम्हारे बाप-दादा थे? उन्होंने कहा : जो (धर्म) तुम और तुमसे पहले के रसूल देकर भेजे गए हैं, हम उसका इनकार करते हैं।
आयत 25
فَٱنتَقَمْنَا مِنْهُمْ ۖ فَٱنظُرْ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلْمُكَذِّبِينَ
فَٱنتَقَمْنَا
पस इन्तक़ाम लिया हमने
مِنْهُمْ ۖ
उनसे
فَٱنظُرْ
तो देखो
كَيْفَ
किस तरह
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अंजाम
ٱلْمُكَذِّبِينَ
झुठलाने वालों का
अन्ततः हमने उनसे बदला लिया। तो देख लो कि झुठलानेवालों का कैसा परिणाम हुआ?
तफ़्सीर:
चुनाँचे हमने आपसे पूर्व रसूलों को झुठलाने वाले समुदायों से बदला लिया, सो हमने उन्हें विनष्ट कर दिया। अतः विचार करें कि अपने रसूलों को झुठलाने वालों का अंत कैसा हुआ। वास्तव में, वह एक दर्दनाक अंत था।
आयत 26
وَإِذْ قَالَ إِبْرَٰهِيمُ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِۦٓ إِنَّنِى بَرَآءٌۭ مِّمَّا تَعْبُدُونَ
وَإِذْ
और जब
قَالَ
कहा
إِبْرَٰهِيمُ
इब्राहीम ने
لِأَبِيهِ
अपने बाप से
وَقَوْمِهِۦٓ
और अपनी क़ौम से
إِنَّنِى
बेशक मैं
بَرَآءٌۭ
बेज़ार हूँ
مِّمَّا
उनसे जिनकी
تَعْبُدُونَ
तुम इबादत करते हो
याद करो, जबकि इबराहीम ने अपने बाप और अपनी क़ौम से कहा, "तुम जिनको पूजते हो उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं,
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) उस समय को याद करें, जब इबराहीम अलैहिस्सलाम ने अपने बाप और अपनी जाति से कहा : तुम अल्लाह के सिवा जिन मूर्तियों को पूजते हो, मैं उनसे बरी हूँ।
आयत 27
إِلَّا ٱلَّذِى فَطَرَنِى فَإِنَّهُۥ سَيَهْدِينِ
إِلَّا
सिवाय
ٱلَّذِى
उसके जिसने
فَطَرَنِى
पैदा किया मुझे
فَإِنَّهُۥ
तो बेशक वो
سَيَهْدِينِ
वो ज़रूर हिदायत देगा मुझे
सिवाय उसके जिसने मुझे पैदा किया। अतः निश्चय ही वह मुझे मार्ग दिखाएगा।"
तफ़्सीर:
सिवाय उस अल्लाह के, जिसने मुझे पैदा किया है। अतः निःसंदेह वही मुझे अपने सीधे धर्म का पालन करने के लिए मार्गदर्शन करेगा, जिसमें मेरा लाभ निहित है।
आयत 28
وَجَعَلَهَا كَلِمَةًۢ بَاقِيَةًۭ فِى عَقِبِهِۦ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
وَجَعَلَهَا
और उसने बना दिया उसे
كَلِمَةًۢ
एक बात
بَاقِيَةًۭ
बाक़ी रहने वाली
فِى
among
عَقِبِهِۦ
अपने पिछलों में
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَرْجِعُونَ
वो रुजूअ करें
और यही बात वह अपने पीछे (अपनी सन्तान में) बाक़ी छोड़ गया, ताकि वे रुजू करें
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सालाम ने तौहीद (एकेश्वरवाद) के वाक्य : (ला इलाहा इल्लल्लाह) को, अपने बाद, अपनी संतान में बाक़ी रहने वाला वाक्य बना दिया। चुनाँचे उनके अंदर हमेशा ऐसे लोग रहे हैं, जो अल्लाह को एकमात्र पूज्य मानते हैं और उसके साथ किसी भी चीज़ को साझी नहीं बनाते। इस आशा में कि वे शिर्क और पाप से तौबा करके अल्लाह की ओर लौट आएँ।
आयत 29
بَلْ مَتَّعْتُ هَـٰٓؤُلَآءِ وَءَابَآءَهُمْ حَتَّىٰ جَآءَهُمُ ٱلْحَقُّ وَرَسُولٌۭ مُّبِينٌۭ
بَلْ
बल्कि
مَتَّعْتُ
सामाने ज़िन्दगी दिया मैं ने
هَـٰٓؤُلَآءِ
उन्हें
وَءَابَآءَهُمْ
और उनके आबा ओ अजदाद को
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
جَآءَهُمُ
आ गया उनके पास
ٱلْحَقُّ
हक़
وَرَسُولٌۭ
और रसूल
مُّبِينٌۭ
वाज़ेह करने वाला
नहीं,बल्कि मैं उन्हें और उनके बाप-दादा को जीवन-सुख प्रदान करता रहा, यहाँ तक कि उनके पास सत्य और खोल-खोलकर बतानेवाला रसूल आ गया
तफ़्सीर:
मैंने इन झूठलाने वाले मुश्रिकों को नष्ट करने में जल्दी नहीं की, बल्कि उन्हें दुनिया में बाकी रहने दिया और उनसे पहले उनके बाप-दादा को भी बाकी रहने दिया था, यहाँ तक कि उनके पास क़ुरआन और स्पष्ट रसूल अर्थात मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आ गए।
आयत 30
وَلَمَّا جَآءَهُمُ ٱلْحَقُّ قَالُوا۟ هَـٰذَا سِحْرٌۭ وَإِنَّا بِهِۦ كَـٰفِرُونَ
وَلَمَّا
और जब
جَآءَهُمُ
आ गया उनके पास
ٱلْحَقُّ
हक़
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
هَـٰذَا
ये
سِحْرٌۭ
जादू है
وَإِنَّا
और बेशक हम
بِهِۦ
उसका
كَـٰفِرُونَ
इन्कार करने वाले हैं
किन्तु जब वह हक़ लेकर उनके पास आया तो वे कहने लगे, "यह तो जादू है। और हम तो इसका इनकार करते है।"
तफ़्सीर:
और जब उनके पास यह क़ुरआन आ गया, जो ऐसा सत्य है, जिसमें कोई संदेह नहीं है, तो उन्होंने कहा : यह तो एक जादू है, जिसके द्वारा मुहम्मद हमपर जादू कर देता है। हम तो इसका इनकार करते हैं। अतः हम कदापि इसपर ईमान नहीं लाएँगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
बाप-दादा की अंधी तकलीद की मज़म्मत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि सिर्फ इसलिए किसी बात को सही मान लेना कि हमारे बड़े ऐसा करते आए हैं, अक्लमंदी नहीं, हक की तलाश खुद करनी चाहिए।
आयत 31
وَقَالُوا۟ لَوْلَا نُزِّلَ هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانُ عَلَىٰ رَجُلٍۢ مِّنَ ٱلْقَرْيَتَيْنِ عَظِيمٍ
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
لَوْلَا
क्यों नहीं
نُزِّلَ
नाज़िल किया गया
هَـٰذَا
ये
ٱلْقُرْءَانُ
क़ुरान
عَلَىٰ
to
رَجُلٍۢ
ऊपर किसी शख़्स के
مِّنَ
from
ٱلْقَرْيَتَيْنِ
दो बस्तियों में से
عَظِيمٍ
बहुत बड़े
वे कहते है, "यह क़ुरआन इन दो बस्तियों के किसी बड़े आदमी पर क्यों नहीं अवतरित हुआ?"
तफ़्सीर:
झूठलाने वाले मुश्रिकों ने कहा : अल्लाह ने इस क़ुरआन को मुहम्मद जैसे निर्धन अनाथ पर उतारने के बजाय, मक्का अथवा तायफ़ के दो महान व्यक्तियों में से किसी एक पर क्यों नहीं उतारा?
आयत 32
أَهُمْ يَقْسِمُونَ رَحْمَتَ رَبِّكَ ۚ نَحْنُ قَسَمْنَا بَيْنَهُم مَّعِيشَتَهُمْ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۚ وَرَفَعْنَا بَعْضَهُمْ فَوْقَ بَعْضٍۢ دَرَجَـٰتٍۢ لِّيَتَّخِذَ بَعْضُهُم بَعْضًۭا سُخْرِيًّۭا ۗ وَرَحْمَتُ رَبِّكَ خَيْرٌۭ مِّمَّا يَجْمَعُونَ
أَهُمْ
क्या वो
يَقْسِمُونَ
वो तक़सीम करते है
رَحْمَتَ
रहमत
رَبِّكَ ۚ
आपके रब की
نَحْنُ
हम
قَسَمْنَا
तक़सीम कर रखी है हमने
بَيْنَهُم
दर्मियान उनके
مَّعِيشَتَهُمْ
मईशत उनकी
فِى
in
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी में
ٱلدُّنْيَا ۚ
दुनिया की
وَرَفَعْنَا
और बुलन्द किया हमने
بَعْضَهُمْ
उनके बाज़ को
فَوْقَ
ऊपर
بَعْضٍۢ
बाज़ के
دَرَجَـٰتٍۢ
दरजात में
لِّيَتَّخِذَ
ताकि बनाऐं
بَعْضُهُم
उनके बाज़
بَعْضًۭا
बाज़ को
سُخْرِيًّۭا ۗ
ख़िदमतगार
وَرَحْمَتُ
और रहमत
رَبِّكَ
आपके रब की
خَيْرٌۭ
बेहतर है
مِّمَّا
उससे जो
يَجْمَعُونَ
वो जमा करते हैं
क्या वे तुम्हारे रब की दयालुता को बाँटते है? सांसारिक जीवन में उनके जीवन-यापन के साधन हमने उनके बीच बाँटे है और हमने उनमें से कुछ लोगों को दूसरे कुछ लोगों से श्रेणियों की दृष्टि से उच्च रखा है, ताकि उनमें से वे एक-दूसरे से काम लें। और तुम्हारे रब की दयालुता उससे कहीं उत्तम है जिसे वे समेट रहे है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) क्या आपके पालनहार की दया को ये लोग बाँटते हैं कि जिसे चाहते हैं देते हैं और जिसे चाहते हैं नहीं देते हैं या अल्लाह बाँटता है? हमने ही दुनिया में उनके बीच उनकी रोज़ी को बाँटा है और उनमें से किसी को धनवान् और किसी को निर्धन बनाया है; ताकि उनमें से कुछ लोग कुछ के अधीन हो जाएँ। और आख़िरत में आपके पालनहार की अपने बंदों के प्रति दया, उससे बेहतर है, जिसे ये लोग इस नश्वर दुनिया के सामान से इकट्ठा कर रहे हैं।
आयत 33
وَلَوْلَآ أَن يَكُونَ ٱلنَّاسُ أُمَّةًۭ وَٰحِدَةًۭ لَّجَعَلْنَا لِمَن يَكْفُرُ بِٱلرَّحْمَـٰنِ لِبُيُوتِهِمْ سُقُفًۭا مِّن فِضَّةٍۢ وَمَعَارِجَ عَلَيْهَا يَظْهَرُونَ
وَلَوْلَآ
और अगर ये ना होता
أَن
कि
يَكُونَ
हो जाऐंगे
ٱلنَّاسُ
लोग
أُمَّةًۭ
उम्मत
وَٰحِدَةًۭ
एक ही
لَّجَعَلْنَا
अलबत्ता बना देते हम
لِمَن
उनके लिए जो
يَكْفُرُ
कुफ़्र करते हैं
بِٱلرَّحْمَـٰنِ
रहमान का
لِبُيُوتِهِمْ
उनके घरों की
سُقُفًۭا
छतें
مِّن
of
فِضَّةٍۢ
चाँदी से
وَمَعَارِجَ
सीढ़ियाँ
عَلَيْهَا
जिन पर
يَظْهَرُونَ
वो चढ़ते हैं
यदि इस बात की सम्भावना न होती कि सब लोग एक ही समुदाय (अधर्मी) हो जाएँगे, तो जो लोग रहमान के साथ कुफ़्र करते है उनके लिए हम उनके घरों की छतें चाँदी की कर देते है और सीढ़ियाँ भी जिनपर वे चढ़ते।
तफ़्सीर:
अगर यह बात न होती कि सभी लोग कुफ़्र की राह पर चल पड़ेंगे, तो हम उन लोगों के घरों की छतों को, जो अल्लाह का इनकार करते हैं, चाँदी की बना देते और उनके लिए सीढ़ियाँ भी बना देते, जिनपर वे चढ़ते।
आयत 34
وَلِبُيُوتِهِمْ أَبْوَٰبًۭا وَسُرُرًا عَلَيْهَا يَتَّكِـُٔونَ
وَلِبُيُوتِهِمْ
और उनके घरों के
أَبْوَٰبًۭا
दरवाज़े
وَسُرُرًا
और तख़्त
عَلَيْهَا
जिन पर
يَتَّكِـُٔونَ
वो तकिया लगाते है
और उनके घरों के दरवाज़े भी और वे तख़्त भी जिनपर वे टेक लगाते
तफ़्सीर:
और हम उन्हें ढील देने तथा आज़माने के उद्देश्य से, उनके घरों के द्वार बना देते और उनके लिए ऐसे तख़्त बना देते, जिनपर वे तकिया लगाकर बैठते।
आयत 35
وَزُخْرُفًۭا ۚ وَإِن كُلُّ ذَٰلِكَ لَمَّا مَتَـٰعُ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۚ وَٱلْـَٔاخِرَةُ عِندَ رَبِّكَ لِلْمُتَّقِينَ
وَزُخْرُفًۭا ۚ
और सोने के भी
وَإِن
और नहीं है
كُلُّ
सब कुछ
ذَٰلِكَ
ये
لَمَّا
मगर
مَتَـٰعُ
सामान
ٱلْحَيَوٰةِ
ज़िन्दगी का
ٱلدُّنْيَا ۚ
दुनिया की
وَٱلْـَٔاخِرَةُ
और आख़िरत
عِندَ
with
رَبِّكَ
आपके रब के नज़दीक
لِلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के लिए है
और सोने द्वारा सजावट का आयोजन भी कर देते। यह सब तो कुछ भी नहीं, बस सांसारिक जीवन की अस्थायी सुख-सामग्री है। और आख़िरत तुम्हारे रब के यहाँ डर रखनेवालों के लिए है
तफ़्सीर:
तथा हम उनके लिए सोना बना देते। ये सारी चीज़ें सांसारिक जीवन की सुख सामग्री के सिवा कुछ नहीं हैं। इनका लाभ बहुत कम है, क्योंकि ये बाकी रहने वाली नहीं हैं। और आख़िरत में जो नेमत है, वह (ऐ रसूल!) आपके पालनहार के निकट उन लोगों के लिए उत्तम है, जो अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई चीज़ों से बचकर, डरते हैं।
आयत 36
وَمَن يَعْشُ عَن ذِكْرِ ٱلرَّحْمَـٰنِ نُقَيِّضْ لَهُۥ شَيْطَـٰنًۭا فَهُوَ لَهُۥ قَرِينٌۭ
وَمَن
और जो
يَعْشُ
अंधा बन जाए
عَن
from
ذِكْرِ
ज़िक्र से
ٱلرَّحْمَـٰنِ
रहमान के
نُقَيِّضْ
हम मुक़र्रर कर देते हैं
لَهُۥ
उसके लिए
شَيْطَـٰنًۭا
एक शैतान
فَهُوَ
तो वो
لَهُۥ
उसका
قَرِينٌۭ
साथी हो जाता है
जो रहमान के स्मरण की ओर से अंधा बना रहा है, हम उसपर एक शैतान नियुक्त कर देते है तो वही उसका साथी होता है
तफ़्सीर:
जो क़ुरआन को ध्यानपूर्वक न पढ़ने के कारणवश उससे विमुख हो जाता है, उसपर, सज़ा के तौर पर, एक शैतान नियुक्त कर दिया जाता है, जो हमेशा उसके साथ लगा रहता है और उसे पथभ्रष्टता में बढ़ाता रहता है।
आयत 37
وَإِنَّهُمْ لَيَصُدُّونَهُمْ عَنِ ٱلسَّبِيلِ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُم مُّهْتَدُونَ
وَإِنَّهُمْ
और बेशक वो
لَيَصُدُّونَهُمْ
अलबत्ता वो रोकते हैं उन्हें
عَنِ
from
ٱلسَّبِيلِ
रास्ते से
وَيَحْسَبُونَ
और वो समझते हैं
أَنَّهُم
कि बेशक वो
مُّهْتَدُونَ
हिदायत याफ़्ता है
औऱ वे (शैतान) उन्हें मार्ग से रोकते है और वे (इनकार करनेवाले) यह समझते है कि वे मार्ग पर है
तफ़्सीर:
और ये साथ रहने वाले (शैतान), जो क़ुरआन से मुँह फेरने वाले लोगों पर नियुक्त कर दिए जाते हैं, अवश्य उन्हें अल्लाह के धर्म से रोकते हैं। चुनाँचे वे न अल्लाह के आदेशों का पानल करते हैं और न उसकी मना की हुई चीज़ों से बचते हैं। और यह समझते हैं कि वे सत्य के मार्ग पर चलने वाले हैं। इसी कारण वे अपनी गुमराही से तौबा नहीं करते हैं।
आयत 38
حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءَنَا قَالَ يَـٰلَيْتَ بَيْنِى وَبَيْنَكَ بُعْدَ ٱلْمَشْرِقَيْنِ فَبِئْسَ ٱلْقَرِينُ
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
جَآءَنَا
वो आएगा हमारे पास
قَالَ
वो कहेगा
يَـٰلَيْتَ
ऐ काश
بَيْنِى
दर्मियान मेरे
وَبَيْنَكَ
और दर्मियान तुम्हारे
بُعْدَ
दूरी (होती )
ٱلْمَشْرِقَيْنِ
दो मशरिक़ों की
فَبِئْسَ
तो कितना बुरा है
ٱلْقَرِينُ
साथी
यहाँ तक कि जब वह हमारे पास आएगा तो (शैतान से) कहेगा, "ऐ काश, मेरे और तेरे बीच पूरब के दोनों किनारों की दूरी होती! तू तो बहुत ही बुरा साथी निकला!"
तफ़्सीर:
यहाँ तक कि जब अल्लाह के ज़िक्र से मुँह मोड़ने वाला व्यक्ति क़ियामत के दिन हमारे पास आएगा, तो कामना करते हुए कहेगा : ऐ काश! मेरे और (ऐ हमेशा साथ रहने वाले शैतान!) तेरे बीच पूर्व और पश्चिम के बीच की दूरी होती। तू तो बहुत बुरा साथी है।
आयत 39
وَلَن يَنفَعَكُمُ ٱلْيَوْمَ إِذ ظَّلَمْتُمْ أَنَّكُمْ فِى ٱلْعَذَابِ مُشْتَرِكُونَ
وَلَن
और हरगिज़ ना
يَنفَعَكُمُ
वो नफ़्अ देगा तुम्हें
ٱلْيَوْمَ
आज
إِذ
जब
ظَّلَمْتُمْ
ज़ुल्म कर चुके तुम
أَنَّكُمْ
बेशक तुम
فِى
(will be) in
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब में
مُشْتَرِكُونَ
मुश्तरिक हो
और जबकि तुम ज़ालिम ठहरे तो आज यह बात तुम्हें कुछ लाभ न पहुँचा सकेगी कि यातना में तुम एक-दूसरे के साझी हो
तफ़्सीर:
अल्लाह क़ियामत के दिन काफ़िरों से कहेगा : आज तुम्हारा यातना में एक साथ होना, तुम्हें हरगिज़ लाभ न देगा, जबकि तुम शिर्क और पाप के द्वारा अपने ऊपर अत्याचार कर चुके हो। क्योंकि तुम्हारे साथी तुम्हारी ओर से तुम्हारी यातना का कुछ भी वहन नहीं करेंगे।
आयत 40
أَفَأَنتَ تُسْمِعُ ٱلصُّمَّ أَوْ تَهْدِى ٱلْعُمْىَ وَمَن كَانَ فِى ضَلَـٰلٍۢ مُّبِينٍۢ
أَفَأَنتَ
क्या भला आप
تُسْمِعُ
आप सुनाऐंगे
ٱلصُّمَّ
बहरों को
أَوْ
या
تَهْدِى
आप राह दिखाएँगे
ٱلْعُمْىَ
अंधों को
وَمَن
और उसे जो
كَانَ
हो
فِى
in
ضَلَـٰلٍۢ
गुमराही में
مُّبِينٍۢ
खुली
क्या तुम बहरों को सुनाओगे या अंधो को और जो खुली गुमराही में पड़ा हुआ हो उसको राह दिखाओगे?
तफ़्सीर:
ये लोग सत्य सुनने से बहरे और उसे देखने से अंधे हैं। तो क्या (ऐ रसूल!) आप बहरे को सुना सकते हैं, अथवा अंधे को रास्ता दिखा सकते हैं, अथवा उन्हें राह पर ला सकते हैं, जो सीधे मार्ग से खुले तौर पर भटके हुए हैं?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
दुनियावी माल-ओ-दौलत की तक्सीम अल्लाह के हाथ में होने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि दुनियावी माल किसी की अज़मत का पैमाना नहीं, यह सिर्फ अल्लाह की आज़माइश है।
आयत 41
فَإِمَّا نَذْهَبَنَّ بِكَ فَإِنَّا مِنْهُم مُّنتَقِمُونَ
فَإِمَّا
फिर अगर
نَذْهَبَنَّ
हम ले जाऐं
بِكَ
आपको
فَإِنَّا
तो बेशक हम
مِنْهُم
उनसे
مُّنتَقِمُونَ
इन्तक़ाम लेने वाले हैं
फिर यदि तुम्हें उठा भी लें तब भी हम उनसे बदला लेकर रहेंगे
तफ़्सीर:
फिर अगर हम आपको उठा लें - इस प्रकार कि उन्हें यातना देने से पहले आपको मृत्यु दे दें - तो भी हम उन्हें दुनिया और आख़िरत में यातना देकर उनसे बदला लेने वाले हैं।
आयत 42
أَوْ نُرِيَنَّكَ ٱلَّذِى وَعَدْنَـٰهُمْ فَإِنَّا عَلَيْهِم مُّقْتَدِرُونَ
أَوْ
या
نُرِيَنَّكَ
हम दिखाऐं आपको
ٱلَّذِى
वो जिसका
وَعَدْنَـٰهُمْ
वादा किया हमने उनसे
فَإِنَّا
तो बेशक हम
عَلَيْهِم
उन पर
مُّقْتَدِرُونَ
क़ुदरत रखने वाले हैं
या हम तुम्हें वह चीज़ दिखा देंगे जिसका हमने वादा किया है। निस्संदेह हमें उनपर पूरी सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
या हम आपको उस यातना का कुछ भाग दिखा दें, जिसका हम उनसे वादा कर रहे हैं, तो निश्चय ही हम उनपर शक्तिमान हैं। वे किसी भी चीज़ में हमारा मुक़ाबला नहीं कर सकते।
आयत 43
فَٱسْتَمْسِكْ بِٱلَّذِىٓ أُوحِىَ إِلَيْكَ ۖ إِنَّكَ عَلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ
فَٱسْتَمْسِكْ
पस मज़बूत थाम लीजिए
بِٱلَّذِىٓ
उसे जो
أُوحِىَ
वही की जाती है
إِلَيْكَ ۖ
तरफ़ आपके
إِنَّكَ
बेशक आप
عَلَىٰ
(are) on
صِرَٰطٍۢ
रास्ते पर हैं
مُّسْتَقِيمٍۢ
सीधे
अतः तुम उस चीज़ को मज़बूती से थामे रहो जिसकी तुम्हारी ओर प्रकाशना की गई। निश्चय ही तु सीधे मार्ग पर हो
तफ़्सीर:
अतः (ऐ रसूल!) आप उसे मज़बूती से थामे रहें, जिसकी आपके पालनहार ने आपकी ओर वह़्य की है और उसपर अमल करते रहें। निःसंदेह आप सत्य मार्ग पर हैं, जिसमें कोई संशय नहीं है।
आयत 44
وَإِنَّهُۥ لَذِكْرٌۭ لَّكَ وَلِقَوْمِكَ ۖ وَسَوْفَ تُسْـَٔلُونَ
وَإِنَّهُۥ
और बेशक ये
لَذِكْرٌۭ
अलबत्ता एक नसीहत है
لَّكَ
आपके लिए
وَلِقَوْمِكَ ۖ
और आपकी क़ौम के लिए
وَسَوْفَ
और अनक़रीब
تُسْـَٔلُونَ
तुम पूछे जाओगे
निश्चय ही वह अनुस्मृति है तुम्हारे लिए और तुम्हारी क़ौम के लिए। शीघ्र ही तुम सबसे पूछा जाएगा
तफ़्सीर:
निःसंदेह यह क़ुरआन आपके लिए तथा आपकी जाति के लिए एक सम्मान है। और क़ियामत के दिन तुमसे इसपर ईमान लाने, इसके मार्गदर्शन का पालन करने और इसकी ओर लोगों को आमंत्रित करने के बारे में पूछा जाएगा।
आयत 45
وَسْـَٔلْ مَنْ أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ مِن رُّسُلِنَآ أَجَعَلْنَا مِن دُونِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ءَالِهَةًۭ يُعْبَدُونَ
وَسْـَٔلْ
और पूछ लीजिए
مَنْ
उससे जिसे
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
مِن
before you
قَبْلِكَ
आपसे क़ब्ल
مِن
of
رُّسُلِنَآ
अपने रसूलों में से
أَجَعَلْنَا
क्या बनाया हमने
مِن
besides
دُونِ
सिवाय
ٱلرَّحْمَـٰنِ
रहमान के
ءَالِهَةًۭ
कुछ इलाह
يُعْبَدُونَ
(जिनकी) बन्दगी की जाए
तुम हमारे रसूलों से, जिन्हें हमने तुमसे पहले भेजा, पूछ लो कि क्या हमने रहमान के सिवा भी कुछ उपास्य ठहराए थे, जिनकी बन्दगी की जाए?
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उन रसूलों से पूछ लें, जिन्हें हमने आपसे पहले भेजा था : क्या हमने रहमान (परम दयालु अल्लाह) के सिवा भी कुछ पूज्य बनाए हैं, जिनकी पूजा की जाए?!
आयत 46
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مُوسَىٰ بِـَٔايَـٰتِنَآ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَإِي۟هِۦ فَقَالَ إِنِّى رَسُولُ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
مُوسَىٰ
मूसा को
بِـَٔايَـٰتِنَآ
साथ अपनी निशानियों के
إِلَىٰ
to
فِرْعَوْنَ
तरफ़ फ़िरऔन
وَمَلَإِي۟هِۦ
और उसके सरदारों के
فَقَالَ
तो उसने कहा
إِنِّى
बेशक मैं
رَسُولُ
रसूल हूँ
رَبِّ
रब का
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों के
और हमने मूसा को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन और उसके सरदारों के पास भेजा तो उसने कहा, "मैं सारे संसार के रब का रसूल हूँ।"
तफ़्सीर:
और हमने मूसा को अपनी निशानियाँ देकर फ़िरऔन और उसकी जाति के प्रमुख लोगों के पास भेजा, तो उसने उनसे कहा : मैं सभी प्राणियों के पालनहार का रसूल हूँ।
आयत 47
فَلَمَّا جَآءَهُم بِـَٔايَـٰتِنَآ إِذَا هُم مِّنْهَا يَضْحَكُونَ
فَلَمَّا
फिर जब
جَآءَهُم
वो लाया उनके पास
بِـَٔايَـٰتِنَآ
निशानियाँ हमारी
إِذَا
तब
هُم
वो
مِّنْهَا
उनसे
يَضْحَكُونَ
वो हँसते थे
लेकिन जब वह उनके पास हमारी निशानियाँ लेकर आया तो क्या देखते है कि वे लगे उनकी हँसी उड़ाने
तफ़्सीर:
तो जब वह उनके पास हमारी निशानियाँ लेकर आए, तो वे मज़ाक़ और उपहास के तौर पर उनपर हँसने लगे।
आयत 48
وَمَا نُرِيهِم مِّنْ ءَايَةٍ إِلَّا هِىَ أَكْبَرُ مِنْ أُخْتِهَا ۖ وَأَخَذْنَـٰهُم بِٱلْعَذَابِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
وَمَا
और नहीं
نُرِيهِم
हम दिखाते उन्हें
مِّنْ
of
ءَايَةٍ
कोई निशानी
إِلَّا
मगर
هِىَ
वो
أَكْبَرُ
ज़्यादा बड़ी होती थी
مِنْ
than
أُخْتِهَا ۖ
अपनी जैसी से
وَأَخَذْنَـٰهُم
और पकड़ लिया हमने उन्हें
بِٱلْعَذَابِ
साथ अज़ाब के
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَرْجِعُونَ
वो लौट आऐं
और हम उन्हें जो निशानी भी दिखाते वह अपने प्रकार की पहली निशानी से बढ़-चढ़कर होती और हमने उन्हें यातना से ग्रस्त कर लिया, ताकि वे रुजू करें
तफ़्सीर:
और हम फ़िरऔन तथा उसकी जाति के प्रमुखों को, मूसा अलैहिस्सलाम के लाए हुए धर्म के सही होने की जो भी निशानी दिखाते, वह उससे पहले की निशानी से बढ़कर होती थी। और हमने उन्हें दुनिया में यातना से ग्रस्त किया, ताकि वे अपने कुफ़्र से बाज़ आ जाएँ। लेकिन इसका कोई फ़ायदा न हुआ।
आयत 49
وَقَالُوا۟ يَـٰٓأَيُّهَ ٱلسَّاحِرُ ٱدْعُ لَنَا رَبَّكَ بِمَا عَهِدَ عِندَكَ إِنَّنَا لَمُهْتَدُونَ
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
يَـٰٓأَيُّهَ
ٱلسَّاحِرُ
जादूगर
ٱدْعُ
दुआ कर
لَنَا
हमारे लिए
رَبَّكَ
अपने रब से
بِمَا
बवजह उसके जो
عَهِدَ
उसने अहद किया
عِندَكَ
तेरे पास
إِنَّنَا
बेशक हम
لَمُهْتَدُونَ
ज़रूर हिदायत पा लेंगे
उनका कहना था, "ऐ जादूगर! अपने रब से हमारे लिए प्रार्थना कर, उस प्रतिज्ञा के आधार पर जो उसने तुझसे कर रखी है। निश्चय ही हम सीधे मार्ग पर चलेंगे।"
तफ़्सीर:
जब उन्हें कुछ यातना का सामना हुआ, तो उन्होंने मूसा अलैहिस्सलाम से कहा : ऐ जादूगर! अपने पालनहार से हमारे लिए उसके द्वारा दुआ कर, जो उसने तुझे बताया है कि हमारे ईमान लाने पर वह यातना हटा देगा। अगर वह हमसे यातना हटा देता है, तो हम अवश्य उसकी राह पर चल पड़ेंगे।
आयत 50
فَلَمَّا كَشَفْنَا عَنْهُمُ ٱلْعَذَابَ إِذَا هُمْ يَنكُثُونَ
فَلَمَّا
फिर जब
كَشَفْنَا
हटा देते हम
عَنْهُمُ
उनसे
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब को
إِذَا
तब
هُمْ
वो
يَنكُثُونَ
वो अहद तोड़ देते
फिर जब भी हम उनपर ले यातना हटा देते है, तो क्या देखते है कि वे प्रतिज्ञा-भंग कर रहे है
तफ़्सीर:
फिर जब हम उनसे यातना को दूर कर देते, तो वे (तुरंत) अपना वचन तोड़ देते और उसे पूरा नहींं करते।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मूसा अलैहिस्सलाम और फिरऔन के मुकाबले का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि सच्चाई के मुकाबले में घमंड और लाव-लश्कर की नुमाइश आखिरकार बेकार साबित होती है।
आयत 51
وَنَادَىٰ فِرْعَوْنُ فِى قَوْمِهِۦ قَالَ يَـٰقَوْمِ أَلَيْسَ لِى مُلْكُ مِصْرَ وَهَـٰذِهِ ٱلْأَنْهَـٰرُ تَجْرِى مِن تَحْتِىٓ ۖ أَفَلَا تُبْصِرُونَ
وَنَادَىٰ
और पुकारा
فِرْعَوْنُ
फ़िरऔन ने
فِى
among
قَوْمِهِۦ
अपनी क़ौम में
قَالَ
कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
أَلَيْسَ
क्या नहीं है
لِى
मेरे लिए
مُلْكُ
बादशाहत
مِصْرَ
मिस्र की
وَهَـٰذِهِ
और ये
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
تَجْرِى
जो बहती हैं
مِن
underneath me
تَحْتِىٓ ۖ
मेरे नीचे से
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
تُبْصِرُونَ
तुम देखते
फ़िरऔन ने अपनी क़ौम के बीच पुकारकर कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! क्या मिस्र का राज्य मेरा नहीं और ये मेरे नीचे बहती नहरें? तो क्या तुम देखते नहीं?
तफ़्सीर:
और फ़िरऔन ने अपने राज्य पर गर्व करते हुए अपनी जाति के बीच पुकारते हुए कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! क्या मिस्र का राज्य मेरा नहीं है और नील नदी से निकलने वाली ये नहरें मेरे महलों के नीचे नहीं बहती हैं? क्या तुम मेरे राज्य को नहीं देखते और मेरी महानता को नहीं पहचानते?!
आयत 52
أَمْ أَنَا۠ خَيْرٌۭ مِّنْ هَـٰذَا ٱلَّذِى هُوَ مَهِينٌۭ وَلَا يَكَادُ يُبِينُ
أَمْ
बल्कि
أَنَا۠
मैं
خَيْرٌۭ
बेहतर हूँ
مِّنْ
than
هَـٰذَا
उस(शख़्स) से
ٱلَّذِى
वो जो
هُوَ
वो
مَهِينٌۭ
हक़ीर है
وَلَا
और नहीं
يَكَادُ
क़रीब कि वो
يُبِينُ
वो वाज़ेह कर सके (बात को)
(यह अच्छा है) या मैं इससे अच्छा हूँ जो तुच्छ है, और साफ़ बोल भी नहीं पाता?
तफ़्सीर:
मैं प्रतिष्ठाहीन और कमज़ोर मूसा से बेहतर हूँ, जो सही से बात भी नहीं कर पाता।
आयत 53
فَلَوْلَآ أُلْقِىَ عَلَيْهِ أَسْوِرَةٌۭ مِّن ذَهَبٍ أَوْ جَآءَ مَعَهُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ مُقْتَرِنِينَ
فَلَوْلَآ
तो क्यों नहीं
أُلْقِىَ
डाले गए
عَلَيْهِ
उस पर
أَسْوِرَةٌۭ
कंगन
مِّن
of
ذَهَبٍ
सोने के
أَوْ
या
جَآءَ
आए
مَعَهُ
साथ उसके
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्ते
مُقْتَرِنِينَ
जमा होकर
(यदि वह रसूल है तो) फिर ऐसा क्यों न हुआ कि उसके लिए ऊपर से सोने के कंगन डाले गए होते या उसके साथ पार्श्ववर्ती होकर फ़रिश्ते आए होते?"
तफ़्सीर:
तो उसे रसूल बनाकर भेजने वाले अल्लाह ने उसपर सोने के कंगन क्यों नहीं उतारे; यह दिखाने के लिए कि वह अल्लाह का रसूल है, या उसके साथ सिलसिलेवार फ़रिश्ते क्यों न आए?!
आयत 54
فَٱسْتَخَفَّ قَوْمَهُۥ فَأَطَاعُوهُ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَوْمًۭا فَـٰسِقِينَ
فَٱسْتَخَفَّ
तो उसने हल्का (बेअक़्ल)कर दिया
قَوْمَهُۥ
अपनी क़ौम को
فَأَطَاعُوهُ ۚ
तो उन्होंने इताअत की उसकी
إِنَّهُمْ
बेशक वो
كَانُوا۟
थे वो
قَوْمًۭا
लोग
فَـٰسِقِينَ
फ़ासिक़
तो उसने अपनी क़ौम के लोगों को मूर्ख बनाया औऱ उन्होंने उसकी बात मान ली। निश्चय ही वे अवज्ञाकारी लोग थे
तफ़्सीर:
इस तरह फ़िरऔन ने अपनी जाति के लोगों को बहकाया और उन्होंने उसकी गुमराही में उसका पालन किया। निःसंदेह वे अल्लाह की आज्ञाकारिता से निकले हुए लोग थे।
आयत 55
فَلَمَّآ ءَاسَفُونَا ٱنتَقَمْنَا مِنْهُمْ فَأَغْرَقْنَـٰهُمْ أَجْمَعِينَ
فَلَمَّآ
तो जब
ءَاسَفُونَا
उन्होंने ग़ुस्सा दिलाया हमें
ٱنتَقَمْنَا
इन्तक़ाम लिया हमने
مِنْهُمْ
उनसे
فَأَغْرَقْنَـٰهُمْ
फिर ग़र्क़ कर दिया हमने उन्हें
أَجْمَعِينَ
सब के सब को
अन्ततः जब उन्होंने हमें अप्रसन्न कर दिया तो हमने उनसे बदला लिया और हमने उन सबको डूबो दिया
तफ़्सीर:
फिर जब उन्होंने कुफ़्र पर स्थिर रहकर हमें क्रोधित कर दिया, तो हमने उनसे बदला लिया और उन सभी को डुबो दिया।
आयत 56
فَجَعَلْنَـٰهُمْ سَلَفًۭا وَمَثَلًۭا لِّلْـَٔاخِرِينَ
فَجَعَلْنَـٰهُمْ
तो बना दिया हमने उन्हें
سَلَفًۭا
गए गुज़रे
وَمَثَلًۭا
और एक मिसाल
لِّلْـَٔاخِرِينَ
बाद वालों के लिए
अतः हमने उन्हें अग्रगामी और बादवालों के लिए शिक्षाप्रद उदाहरण बना दिया
तफ़्सीर:
तो हमने फ़िरऔन और उसकी जाति के प्रमुखों को लोगों के लिए अग्रगामी बना दिया और आपकी जाति के काफ़िर उन्हीं के पदचिह्नों पर चल रहे हैं। तथा हमने उन्हें सीख लेने वाले के लिए शिक्षाप्रद उदाहरण बना दिया, ताकि वह उन्हीं जैसा कर्म करके उन्हीं के अंजाम को न पहुँचे।
आयत 57
۞ وَلَمَّا ضُرِبَ ٱبْنُ مَرْيَمَ مَثَلًا إِذَا قَوْمُكَ مِنْهُ يَصِدُّونَ
۞ وَلَمَّا
और जब
ضُرِبَ
बयान किया गया
ٱبْنُ
(the) son
مَرْيَمَ
मरियम के बेटे को
مَثَلًا
बतौर मिसाल
إِذَا
अचानक
قَوْمُكَ
आपकी क़ौम (के लोग)
مِنْهُ
उससे
يَصِدُّونَ
चीख़ने -चिल्लाने लगे
और जब मरयम के बेटे की मिसाल दी गई तो क्या देखते है कि उसपर तुम्हारी क़ौम के लोग लगे चिल्लाने
तफ़्सीर:
जब मुश्रिकों ने यह समझा कि ईसा अलैहिस्सलाम, जिनकी ईसाई पूजा करते हैं, अल्लाह के फरमान : (إِنَّكُمْ وَمَا تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ حَصَبُ جَهَنَّمَ أَنْتُمْ لَهَا وَارِدُونَ) ''निःसंदेह तुम और जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो, सब नरक का ईंधन बनेंगे, तुम उसमें प्रवेश करने वाले हो।'' (सूरतुल अंबिया : 98) में दाखिल हैं, तथा अल्लाह ने ईसा अलैहिस्सलाम की पूजा करने से वैसे ही रोका है, जैसे मूर्तियों की पूजा से रोका है, तो अचानक (ऐ रसूल!) आपकी जाति के लोग खुशी से शोर मचाने लगे और कहने लगे : हम इस बात से संतुष्ट हैं कि हमारे देवता ईसा (अलैहिस्सलाम) की तरह हैं। इसपर अल्लाह ने उनके जवाब में यह आयत उतारी : (إِنَّ الَّذِينَ سَبَقَتْ لَهُمْ مِنَّا الْحُسْنَى أُولَئِكَ عَنْهَا مُبْعَدُونَ) ''निःसंदेह जिनके के लिए हमारी ओर से पहले भलाई निर्धारित हो चुकी है, वे उस (नरक) से दूर रखे जाएँगे।'' (सूरतुल अंबिया : 101).
आयत 58
وَقَالُوٓا۟ ءَأَـٰلِهَتُنَا خَيْرٌ أَمْ هُوَ ۚ مَا ضَرَبُوهُ لَكَ إِلَّا جَدَلًۢا ۚ بَلْ هُمْ قَوْمٌ خَصِمُونَ
وَقَالُوٓا۟
और उन्होंने कहा
ءَأَـٰلِهَتُنَا
क्या इलाह हमारे
خَيْرٌ
बेहतर हैं
أَمْ
या
هُوَ ۚ
वो
مَا
नहीं
ضَرَبُوهُ
उन्होंने बयान किया उसे
لَكَ
आपके लिए
إِلَّا
मगर
جَدَلًۢا ۚ
झगड़ने को
بَلْ
बल्कि
هُمْ
वो
قَوْمٌ
लोग हैं
خَصِمُونَ
झगड़ालू
और कहने लगे, "क्या हमारे उपास्य अच्छे नहीं या वह (मसीह)?" उन्होंने यह बात तुमसे केवल झगड़ने के लिए कही, बल्कि वे तो है ही झगड़ालू लोग
तफ़्सीर:
और उन्होंने कहा : क्या हमारे पूज्य बेहतर हैं या ईसा?! ज़िबा'रा के पुत्र और उस जैसे लोगों ने यह उदाहरण सत्य तक पहुँचने के लिए नहीं दिया है, बल्कि बहस करने और झगड़ने के लिए दिया है। क्योंकि वे ऐसे लोग हैं कि झगड़ना उनके स्वभाव में दाखिल है।
आयत 59
إِنْ هُوَ إِلَّا عَبْدٌ أَنْعَمْنَا عَلَيْهِ وَجَعَلْنَـٰهُ مَثَلًۭا لِّبَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ
إِنْ
नहीं
هُوَ
वो
إِلَّا
मगर
عَبْدٌ
एक बन्दा
أَنْعَمْنَا
इनआम किया हमने
عَلَيْهِ
जिस पर
وَجَعَلْنَـٰهُ
और बना दिया हमने उसे
مَثَلًۭا
एक मिसाल
لِّبَنِىٓ
for (the) Children of Israel
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल के लिए
वह (ईसा मसीह) तो बस एक बन्दा था, जिसपर हमने अनुकम्पा की और उसे हमने इसराईल की सन्तान के लिए एक आदर्श बनाया
तफ़्सीर:
मर्यम का पुत्र ईसा केवल अल्लाह का एक बंदा है, जिसे हमने नबी और रसूल बनाया। तथा हमने उसे बनी इसराईल के लिए एक उदाहरण बना दिया, जिससे वे अल्लाह की शक्ति का अनुमान लगाते हैं कि उसने ईसा अलैहिस्सलाम को बिना पिता के बनाया, जिस तरह कि आदम अलैहिस्सलाम को बिना माता-पिता के बनाया था।
आयत 60
وَلَوْ نَشَآءُ لَجَعَلْنَا مِنكُم مَّلَـٰٓئِكَةًۭ فِى ٱلْأَرْضِ يَخْلُفُونَ
وَلَوْ
और अगर
نَشَآءُ
हम चाहते
لَجَعَلْنَا
अलबत्ता बना देते हम
مِنكُم
तुम्हारी जगह
مَّلَـٰٓئِكَةًۭ
फ़रिश्ते
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
जो ज़मीन में
يَخْلُفُونَ
वो जानशीन होते
और यदि हम चाहते हो तुममें से फ़रिश्ते पैदा कर देते, जो धरती में उत्ताराधिकारी होते
तफ़्सीर:
और अगर हम (ऐ आदम की संतान!) तुम्हें नष्ट करना चाहें, तो अवश्य तुम्हें नष्ट कर दें और तुम्हारे स्थान पर फ़रिश्तों को ले आएँ, जो धरती में तुम्हारे उत्तराधिकारी बनें। वे अल्लाह की इबादत करें और उसके साथ किसी को साझी न करें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
फिरऔन के अपनी बादशाहत पर घमंड का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि दुनियावी शान-ओ-शौकत पर घमंड करना और उसे बड़ी बात समझना गुमराही की निशानी है।
आयत 61
وَإِنَّهُۥ لَعِلْمٌۭ لِّلسَّاعَةِ فَلَا تَمْتَرُنَّ بِهَا وَٱتَّبِعُونِ ۚ هَـٰذَا صِرَٰطٌۭ مُّسْتَقِيمٌۭ
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
لَعِلْمٌۭ
अलबत्ता एक अलामत है
لِّلسَّاعَةِ
क़यामत की
فَلَا
So (do) not
تَمْتَرُنَّ
तो ना तुम हरगिज़ शक करो
بِهَا
उसमें
وَٱتَّبِعُونِ ۚ
और पैरवी करो मेरी
هَـٰذَا
ये है
صِرَٰطٌۭ
रास्ता
مُّسْتَقِيمٌۭ
सीधा
निश्चय ही वह उस घड़ी (जिसका वादा किया गया है) के ज्ञान का साधन है। अतः तुम उसके बारे में संदेह न करो और मेरा अनुसरण करो। यही सीधा मार्ग है
तफ़्सीर:
ईसा अलैहिस्सलाम का आख़िरी ज़माने में उतरना क़ियामत की बड़ी निशानियों में से एक निशानी है। अतः तुम क़ियामत के आने के बारे में संदेह न करो, तथा मैं अल्लाह की ओर से तुम्हारे पास जो कुछ लेकर आया हूँ, उसमें मेरा अनुसरण करो। यह जो मैं तुम्हारे पास लेकर आया हूँ, वही सीधा मार्ग है जिसमें कोई टेढ़ापन नहीं है।
आयत 62
وَلَا يَصُدَّنَّكُمُ ٱلشَّيْطَـٰنُ ۖ إِنَّهُۥ لَكُمْ عَدُوٌّۭ مُّبِينٌۭ
وَلَا
और ना
يَصُدَّنَّكُمُ
हरगिज़ रोके तुम्हें
ٱلشَّيْطَـٰنُ ۖ
शैतान
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَكُمْ
तुम्हारा
عَدُوٌّۭ
दुश्मन है
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
और शैतान तुम्हें रोक न दे, निश्चय ही वह तुम्हारा खुला शत्रु है
तफ़्सीर:
और शैतान तुम्हें बहकाकर और प्रलोभन देकर सीधे रास्ते से विचलित न कर दे। निःसंदेह वह तुम्हारा खुला दुश्मन है।
आयत 63
وَلَمَّا جَآءَ عِيسَىٰ بِٱلْبَيِّنَـٰتِ قَالَ قَدْ جِئْتُكُم بِٱلْحِكْمَةِ وَلِأُبَيِّنَ لَكُم بَعْضَ ٱلَّذِى تَخْتَلِفُونَ فِيهِ ۖ فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
وَلَمَّا
और जब
جَآءَ
लाए
عِيسَىٰ
ईसा
بِٱلْبَيِّنَـٰتِ
वाज़ेह निशानियाँ
قَالَ
उसने कहा
قَدْ
तहक़ीक़
جِئْتُكُم
लाया हूँ मैं तुम्हारे पास
بِٱلْحِكْمَةِ
हिकमत
وَلِأُبَيِّنَ
और ताकि मैं वाज़ेह कर दूँ
لَكُم
तुम्हारे लिए
بَعْضَ
बाज़
ٱلَّذِى
वो चीज़
تَخْتَلِفُونَ
तुम इख़्तिलाफ़ करते हो
فِيهِ ۖ
जिसमें
فَٱتَّقُوا۟
पस डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَأَطِيعُونِ
और इताअत करो मेरी
जब ईसा स्पष्ट प्रमाणों के साथ आया तो उसने कहा, "मैं तुम्हारे पास तत्वदर्शिता लेकर आया हूँ (ताकि उसकी शिक्षा तुम्हें दूँ) और ताकि कुछ ऐसी बातें तुमपर खोल दूँ, जिनमं तुम मतभेद करते हो। अतः अल्लाह का डर रखो और मेरी बात मानो
तफ़्सीर:
जब ईसा अलैहिस्सलाम अपनी जाति के पास अपने रसूल होने के सपष्ट प्रमाण लेकर आए, तो उनसे कहा : मैं तुम्हारे पास अल्लाह की ओर से हिकमत लेकर आया हुँ और (इसलिए भी) ताकि मैं तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म की कुछ उन बातों को स्पष्ट कर दूँ, जिनमें तुम मतभेद करते हो। अतः तुम अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई बातों से बचकर, डरो और उन बातों में मेरा अनुसरण करो, जिनका मैं तुम्हें आदेश दूँ और जिनसे मैं तुम्हें मना करूँ।
आयत 64
إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ رَبِّى وَرَبُّكُمْ فَٱعْبُدُوهُ ۚ هَـٰذَا صِرَٰطٌۭ مُّسْتَقِيمٌۭ
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
هُوَ
वो ही है
رَبِّى
रब मेरा
وَرَبُّكُمْ
और रब तुम्हारा
فَٱعْبُدُوهُ ۚ
पस इबादत करो उसकी
هَـٰذَا
ये है
صِرَٰطٌۭ
रास्ता
مُّسْتَقِيمٌۭ
सीधा
वास्तव में अल्लाह ही मेरा भी रब है और तुम्हारा भी रब है, तो उसी की बन्दगी करो। यही सीधा मार्ग है।"
तफ़्सीर:
निःसंदेह अल्लाह ही मेरा पालनहार और तुम्हारा पालनहार है, उसके सिवा हमारा कोई पालनहार नहीं है। अतः केवल उसी की इबादत करो। और यह एकेश्वरवाद (तौहीद) ही वह सीधा रास्ता है, जिसमें कोई टेढ़ापन नहीं है।
आयत 65
فَٱخْتَلَفَ ٱلْأَحْزَابُ مِنۢ بَيْنِهِمْ ۖ فَوَيْلٌۭ لِّلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ مِنْ عَذَابِ يَوْمٍ أَلِيمٍ
فَٱخْتَلَفَ
पस इख़्तिलाफ़ किया
ٱلْأَحْزَابُ
गिरोहों ने
مِنۢ
from
بَيْنِهِمْ ۖ
आपस में
فَوَيْلٌۭ
पस हलाकत है
لِّلَّذِينَ
उनके लिए जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
مِنْ
from
عَذَابِ
अज़ाब से
يَوْمٍ
(of the) Day
أَلِيمٍ
दर्दनाक दिन के
किन्तु उनमें के कितने ही गिरोहों ने आपस में विभेद किया। अतः तबाही है एक दुखद दिन की यातना से, उन लोगों के लिए जिन्होंने ज़ुल्म किया
तफ़्सीर:
फिर ईसाइयों के समूहों ने ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में परस्पर मतभेद किया; चुनाँचे उनमें से कुछ का कहना है कि वह पूज्य हैं, तथा कुछ का कहना है कि वह अल्लाह के बेटे हैं। जबकि उनमें से कुछ कहते हैं कि वह और उनकी माँ दोनों पूज्य हैं। तो जिन लोगों ने (ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में पूज्य होने, या अल्लाह का बेटा होने या तीन पूज्यों में से तीसरा होने की बात कहकर) अपने ऊपर अत्याचार किया है, उनके लिए दुःखदायी यातना की ख़राबी है, जो क़ियामत के दिन उनकी प्रतीक्षा कर रही है।
आयत 66
هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّا ٱلسَّاعَةَ أَن تَأْتِيَهُم بَغْتَةًۭ وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
هَلْ
नहीं
يَنظُرُونَ
वो इन्तज़ार करते
إِلَّا
मगर
ٱلسَّاعَةَ
क़यामत का
أَن
कि
تَأْتِيَهُم
वो आ जाए उनके पास
بَغْتَةًۭ
अचानक
وَهُمْ
और वो
لَا
(do) not
يَشْعُرُونَ
ना वो शऊर रखते हों
क्या वे बस उस (क़ियामत की) घड़ी की प्रतीक्षा कर रहे है कि वह सहसा उनपर आ पड़े और उन्हें ख़बर भी न हो
तफ़्सीर:
क्या ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में मतभेद करने वाले ये समूह इस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि क़ियामत उनके पास अचानक आ जाए और उन्हें उसके आने की आहट तक न लगे?! यदि वह उनपर उनके कुफ़्र की अवस्था में आ जाती है, तो उनका अंजाम पीड़ादायक यातना है।
आयत 67
ٱلْأَخِلَّآءُ يَوْمَئِذٍۭ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ إِلَّا ٱلْمُتَّقِينَ
ٱلْأَخِلَّآءُ
तमाम दिली दोस्त
يَوْمَئِذٍۭ
उस दिन
بَعْضُهُمْ
बाज़ उनके
لِبَعْضٍ
बाज़ के
عَدُوٌّ
दुश्मन होंगे
إِلَّا
सिवाय
ٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के
उस दिन सभी मित्र परस्पर एक-दूसरे के शत्रु होंगे सिवाय डर रखनेवालों के। -
तफ़्सीर:
कुफ़्र तथा गुमराही के आधार पर मित्रता और दोस्ती रखने वाले क़ियामत के दिन एक-दूसरे के शत्रु होंगे, लेकिन जो लोग अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई चीज़ों से बचते हुए उससे डरने वाले हैं, उनकी मित्रता स्थायी और अंतहीन होगी।
आयत 68
يَـٰعِبَادِ لَا خَوْفٌ عَلَيْكُمُ ٱلْيَوْمَ وَلَآ أَنتُمْ تَحْزَنُونَ
يَـٰعِبَادِ
ऐ मेरे बन्दों
لَا
ना
خَوْفٌ
कोई ख़ौफ़ होगा
عَلَيْكُمُ
तुम पर
ٱلْيَوْمَ
आज
وَلَآ
और ना
أَنتُمْ
तुम
تَحْزَنُونَ
तुम ग़मगीन होगे
"ऐ मेरे बन्दों! आज न तुम्हें कोई भय है और न तुम शोकाकुल होगे।" -
तफ़्सीर:
और अल्लाह उनसे कहेगा : ऐ मेरे बंदो! जो कुछ तुम सामना करने वाले हो, उसमें आज तुम्हारे लिए कोई भय नहीं है, और न ही तुम उसपर शोक करोगे जो संसार के आनंदों में से तुमसे छूट गया है।
आयत 69
ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا وَكَانُوا۟ مُسْلِمِينَ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात पर
وَكَانُوا۟
और थे वो
مُسْلِمِينَ
फ़रमाबरदार
वह जो हमारी आयतों पर ईमान लाए और आज्ञाकारी रहे;
तफ़्सीर:
वे लोग जो अपने रसूल पर उतरने वाले क़ुरआन पर ईमान लाए तथा वे क़ुरआन के आज्ञाकारी थे; उसके आदेशों का पालन करते और उसके निषेधों से बचते थे।
आयत 70
ٱدْخُلُوا۟ ٱلْجَنَّةَ أَنتُمْ وَأَزْوَٰجُكُمْ تُحْبَرُونَ
ٱدْخُلُوا۟
दाख़िल हो जाओ
ٱلْجَنَّةَ
जन्नत में
أَنتُمْ
तुम
وَأَزْوَٰجُكُمْ
और बीवियाँ तुम्हारी
تُحْبَرُونَ
तुम ख़ुश किए जाओगे
"प्रवेश करो जन्नत में, तुम भी और तुम्हारे जोड़े भी, हर्षित होकर!"
तफ़्सीर:
तुम और तुम जैसे ईमान वाले लोग जन्नत में प्रवेश कर जाओ। तुम उसमें प्राप्त होने वाले शाश्वत आनंद से प्रसन्न किए जाओगे, जो न कभी ख़त्म होगा और न बाधित होगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
ईसा अलैहिस्सलाम के ज़िक्र और कयामत के दिन दोस्ती के हाल का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि दुनिया की गलत दोस्तियां आखिरत में दुश्मनी में बदल जाएंगी, सिवाय उनके जो तक़वे पर मबनी हों।
आयत 71
يُطَافُ عَلَيْهِم بِصِحَافٍۢ مِّن ذَهَبٍۢ وَأَكْوَابٍۢ ۖ وَفِيهَا مَا تَشْتَهِيهِ ٱلْأَنفُسُ وَتَلَذُّ ٱلْأَعْيُنُ ۖ وَأَنتُمْ فِيهَا خَـٰلِدُونَ
يُطَافُ
गर्दिश कराया जाएगा
عَلَيْهِم
उन पर
بِصِحَافٍۢ
रिकाबियों को
مِّن
of
ذَهَبٍۢ
सोने के
وَأَكْوَابٍۢ ۖ
और साग़र
وَفِيهَا
और उसमें होगा
مَا
वो जो
تَشْتَهِيهِ
ख़्वाहिश करेंगे जिसकी
ٱلْأَنفُسُ
दिल
وَتَلَذُّ
और लज़्ज़त पाऐंगी
ٱلْأَعْيُنُ ۖ
निगाहें
وَأَنتُمْ
और तुम
فِيهَا
उनमें
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले हो
उनके आगे सोने की तशतरियाँ और प्याले गर्दिश करेंगे और वहाँ वह सब कुछ होगा, जो दिलों को भाए और आँखे जिससे लज़्ज़त पाएँ। "और तुम उसमें सदैव रहोगे
तफ़्सीर:
उनके सेवक उनके चारों ओर सोने के थाल और बिना हत्थे वाले प्याले लेकर फिरेंगे। तथा जन्नत के अंदर, हर वह चीज़ उपलब्ध होगी, जिसको दिल चाहेंगे और जिसे देखकर आँखें आनंदित होंगी। तथा तुम उसी में रहोगे, वहाँ से कभी बाहर नहीं निकलोगे।
आयत 72
وَتِلْكَ ٱلْجَنَّةُ ٱلَّتِىٓ أُورِثْتُمُوهَا بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
وَتِلْكَ
और ये है
ٱلْجَنَّةُ
जन्नत
ٱلَّتِىٓ
वो जो
أُورِثْتُمُوهَا
वारिस बनाय गए हो तुम उसके
بِمَا
बवजह उसके जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते
यह वह जन्नत है जिसके तुम वारिस उसके बदले में हुए जो कर्म तुम करते रहे।
तफ़्सीर:
वह जन्नत जिसकी विशेषताएँ तुम्हारे सामने बयान की गईं, यही वह जन्नत है जिसका अल्लाह ने तुम्हें, अपनी कृपा से, तुम्हारे कर्मों के कारण वारिस बनाया है।
आयत 73
لَكُمْ فِيهَا فَـٰكِهَةٌۭ كَثِيرَةٌۭ مِّنْهَا تَأْكُلُونَ
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
فِيهَا
उसमें
فَـٰكِهَةٌۭ
फल होंगे
كَثِيرَةٌۭ
बहुत से
مِّنْهَا
उनमें से
تَأْكُلُونَ
तुम खाओगे
तुम्हारे लिए वहाँ बहुत-से स्वादिष्ट फल है जिन्हें तुम खाओगे।"
तफ़्सीर:
तुम्हारे लिए उसमें न खत्म होने वाले बहुत-से फल होंगे, जिनमें से तुम खाओगे।
आयत 74
إِنَّ ٱلْمُجْرِمِينَ فِى عَذَابِ جَهَنَّمَ خَـٰلِدُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلْمُجْرِمِينَ
मुजरिम लोग
فِى
(will be) in
عَذَابِ
अज़ाब में (होंगे)
جَهَنَّمَ
जहन्नम के
خَـٰلِدُونَ
हमेशा रहने वाले
निस्संदेह अपराधी लोग सदैव जहन्नम की यातना में रहेंगे
तफ़्सीर:
निःसंदेह कुफ़्र और पाप करने वाले अपराधी क़ियामत के दिन जहन्नम की यातना में होंगे, जिसमें वे सदैव रहेंगे।
आयत 75
لَا يُفَتَّرُ عَنْهُمْ وَهُمْ فِيهِ مُبْلِسُونَ
لَا
Not
يُفَتَّرُ
ना कम किया जाएगा
عَنْهُمْ
उनसे
وَهُمْ
और वो
فِيهِ
उसमें
مُبْلِسُونَ
मायूस होंगे
वह (यातना) कभी उनपर से हल्की न होगी और वे उसी में निराश पड़े रहेंगे
तफ़्सीर:
उनसे यातना कम नहीं की जाएगी और वे उसमें अल्लाह की दया से निराश होंगे।
आयत 76
وَمَا ظَلَمْنَـٰهُمْ وَلَـٰكِن كَانُوا۟ هُمُ ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَمَا
और नहीं
ظَلَمْنَـٰهُمْ
ज़ुल्म किया हमने उन पर
وَلَـٰكِن
और लेकिन
كَانُوا۟
थे वो
هُمُ
वो ही
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिम
हमने उनपर कोई ज़ुल्म नहीं किया, परन्तु वे खुद ही ज़ालिम थे
तफ़्सीर:
हमने उन्हें जहन्नम में दाखिल करके उनपर अत्याचार नहीं किया, बल्कि वे कुफ़्र करके स्वयं ही अपने आप पर अत्याचार करने वाले थे।
आयत 77
وَنَادَوْا۟ يَـٰمَـٰلِكُ لِيَقْضِ عَلَيْنَا رَبُّكَ ۖ قَالَ إِنَّكُم مَّـٰكِثُونَ
وَنَادَوْا۟
और वो पुकारेंगे
يَـٰمَـٰلِكُ
ऐ मालिक
لِيَقْضِ
चाहिए कि फ़ैसला कर दे
عَلَيْنَا
हम पर
رَبُّكَ ۖ
रब तेरा
قَالَ
वो कहेगा
إِنَّكُم
बेशक तुम
مَّـٰكِثُونَ
(यूँही )रहने वाले हो
वे पुकारेंगे, "ऐ मालिक! तुम्हारा रब हमारा काम ही तमाम कर दे!" वह कहेगा, "तुम्हें तो इसी दशा में रहना है।"
तफ़्सीर:
वे जहन्नम के दारोग़ा मालिक को पुकारकर कहेंगे : ऐ मालिक! तुम्हारा पालनहार हमें मृत्यु दे दे, ताकि हम यातना से आराम पा जाएँ। तो मालिक उन्हें जवाब देते हुए कहेगा : तुम सदैव यातना में रहने वाले हो, तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी और न तुम्हारी यातना रुकेगी।
आयत 78
لَقَدْ جِئْنَـٰكُم بِٱلْحَقِّ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَكُمْ لِلْحَقِّ كَـٰرِهُونَ
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
جِئْنَـٰكُم
लाए हम तुम्हारे पास
بِٱلْحَقِّ
हक़
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَكُمْ
अक्सर तुम्हारे
لِلْحَقِّ
हक़ को
كَـٰرِهُونَ
नापसंद करने वाले थे
"निश्चय ही हम तुम्हारे पास सत्य लेकर आए है, किन्तु तुममें से अधिकतर लोगों को सत्य प्रिय नहीं
तफ़्सीर:
निश्चय ही हम दुनिया में तुम्हारे पास संदेहरहित सत्य लेकर आए थे, लेकिन तुममें से अधिकतर लोग सत्य को नापसंद करने वाले थे।
आयत 79
أَمْ أَبْرَمُوٓا۟ أَمْرًۭا فَإِنَّا مُبْرِمُونَ
أَمْ
बल्कि
أَبْرَمُوٓا۟
उन्होंने पुख़्ता फ़ैसला किया
أَمْرًۭا
एक काम का
فَإِنَّا
तो यक़ीनन हम भी
مُبْرِمُونَ
पुख़्ता फ़ैसला करने वाले हैं
(क्या उन्होंने कुछ निश्चय नहीं किया है) या उन्होंने किसी बात का निश्चय कर लिया है? अच्छा तो हमने भी निश्चय कर लिया है
तफ़्सीर:
यदि वे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ कोई चाल चलते हैं और आपके विरुद्ध कोई षड्यंत्र करते हैं, तो हम उनके लिए उनके षड्यंत्र से बढ़कर उपाय करने वाले हैं।
आयत 80
أَمْ يَحْسَبُونَ أَنَّا لَا نَسْمَعُ سِرَّهُمْ وَنَجْوَىٰهُم ۚ بَلَىٰ وَرُسُلُنَا لَدَيْهِمْ يَكْتُبُونَ
أَمْ
या
يَحْسَبُونَ
वो समझते हैं
أَنَّا
बेशक हम
لَا
(can) not
نَسْمَعُ
नहीं हम सुनते
سِرَّهُمْ
राज़ उनका
وَنَجْوَىٰهُم ۚ
और सरगोशी उनकी
بَلَىٰ
क्यों नहीं
وَرُسُلُنَا
और हमारे भेजे हुए(फ़रिश्ते)
لَدَيْهِمْ
उनके पास हैं
يَكْتُبُونَ
वो लिखते हैं
या वे समझते है कि हम उनकी छिपी बात और उनकी कानाफूसी को सुनते नही? क्यों नहीं, और हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) उनके समीप हैं, वे लिखते रहते है।"
तफ़्सीर:
क्या वे समझ्ते हैं कि हम उनकी छिपी बात (भेद) को जो उन्होंने अपने दिलों में छिपा रखी है या उनकी कानाफूसी को जो वे एक-दूसरे से करते हैं, नहीं सुनते हैं? क्यों नहीं, हम उनकी सारी बातें सुनते हैं और उनके साथ नियुक्त फ़रिश्ते उनके प्रत्येक कार्य को लिखते रहते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जन्नत की नेमतों और दोज़खियों की मायूसी के मुकाबले का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि जन्नत की उम्मीद हमें नेक अमल की तरफ मुतवज्जह रखनी चाहिए।
आयत 81
قُلْ إِن كَانَ لِلرَّحْمَـٰنِ وَلَدٌۭ فَأَنَا۠ أَوَّلُ ٱلْعَـٰبِدِينَ
قُلْ
कह दीजिए
إِن
अगर
كَانَ
है
لِلرَّحْمَـٰنِ
रहमान के लिए
وَلَدٌۭ
कोई औलाद
فَأَنَا۠
तो मैं
أَوَّلُ
सब से पहला हूँ
ٱلْعَـٰبِدِينَ
इबादत करने वालों में
कहो, "यदि रहमान की कोई सन्तान होती तो सबसे पहले मैं (उसे) पूजता
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उन लोगों से, जो अल्लाह की ओर बेटियों की निस्बत करते हैं, (अल्लाह उनकी इस बात से बहुत ऊँचा है) कह दें : अल्लाह की कोई संतान नहीं है; अल्लाह इससे बहुत पाक एवं पवित्र है। मैं तो अल्लाह की सबसे पहले इबादत करने वाला तथा उसकी पवित्रता बयान करने वाला हूँ।
आयत 82
سُبْحَـٰنَ رَبِّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ رَبِّ ٱلْعَرْشِ عَمَّا يَصِفُونَ
سُبْحَـٰنَ
पाक है
رَبِّ
रब
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन का
رَبِّ
रब
ٱلْعَرْشِ
अर्श का
عَمَّا
उससे जो
يَصِفُونَ
वो बयान करते हैं
आकाशों और धरती का रब, सिंहासन का स्वामी, उससे महान और उच्च है जो वे बयान करते है।"
तफ़्सीर:
आकाशों और धरती का रब तथा अर्श (सिंहासन) का स्वामी उससे पवित्र है, जो ये मुश्रिक (बहुदेववादी) लोग उसकी ओर साझी, पत्नी और संतान की निस्बत करते हैं।
आयत 83
فَذَرْهُمْ يَخُوضُوا۟ وَيَلْعَبُوا۟ حَتَّىٰ يُلَـٰقُوا۟ يَوْمَهُمُ ٱلَّذِى يُوعَدُونَ
فَذَرْهُمْ
तो छोड़ दीजिए उन्हें
يَخُوضُوا۟
वो बहस करते रहें
وَيَلْعَبُوا۟
और खेलते रहें
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يُلَـٰقُوا۟
वो जा मिलें
يَوْمَهُمُ
अपने उस दिन से
ٱلَّذِى
जिसका
يُوعَدُونَ
वो वादा किए जाते हैं
अच्छा, छोड़ो उन्हें कि वे व्यर्थ की बहस में पड़े रहे और खेलों में लगे रहें। यहाँ तक कि उनकी भेंट अपने उस दिन से हो जिसका वादा उनसे किया जाता है
तफ़्सीर:
अतः (ऐ रसूल!) आप उन्हें छोड़ दें कि वे अपनी झूठ और व्यर्थ की बहसों में पड़े रहें और खेलते रहें, यहाँ तक कि उनका सामना उस दिन से हो जाए, जिसका उनसे वादा किया जा रहा है और वह क़ियामत का दिन है।
आयत 84
وَهُوَ ٱلَّذِى فِى ٱلسَّمَآءِ إِلَـٰهٌۭ وَفِى ٱلْأَرْضِ إِلَـٰهٌۭ ۚ وَهُوَ ٱلْحَكِيمُ ٱلْعَلِيمُ
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जो
فِى
(is) in
ٱلسَّمَآءِ
आसमान में
إِلَـٰهٌۭ
इलाह है
وَفِى
and in
ٱلْأَرْضِ
और ज़मीन में
إِلَـٰهٌۭ ۚ
इलाह है
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلْحَكِيمُ
बहुत हिकमत वाला
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब इल्म वाला
वही है जो आकाशों में भी पूज्य है और धरती में भी पूज्य है और वह तत्वदर्शी, सर्वज्ञ है
तफ़्सीर:
और वही पवित्र अल्लाह आकाश में सत्य पूज्य है और वही धरती में भी सत्य पूज्य है। तथा वह अपनी रचना, तक़दीर (नियति) और प्रबंधन में पूर्ण हिकमत वाला, तथा अपने बंदों की स्थितियों से अवगत है। उससे उनमें से कुछ भी छिपा नहीं है।
आयत 85
وَتَبَارَكَ ٱلَّذِى لَهُۥ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا وَعِندَهُۥ عِلْمُ ٱلسَّاعَةِ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
وَتَبَارَكَ
और बाबरकत है
ٱلَّذِى
वो जो
لَهُۥ
उसी के लिए है
مُلْكُ
बादशाहत
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन की
وَمَا
और जो
بَيْنَهُمَا
दर्मियान है उन दोनों के
وَعِندَهُۥ
और उसी के पास है
عِلْمُ
इल्म
ٱلسَّاعَةِ
क़यामत का
وَإِلَيْهِ
और उसका की तरफ़
تُرْجَعُونَ
तुम लौटाए जाओगे
बड़ी ही बरकतवाली है वह सत्ता, जिसके अधिकार में है आकाशों और धरती की बादशाही और जो कुछ उन दिनों के बीच है उसकी भी। और उसी के पास उस घड़ी का ज्ञान है, और उसी की ओर तुम लौटाए जाओगे।
तफ़्सीर:
बड़ी भलाई तथा बरकत वाला है वह पवित्र अल्लाह, जिस अकेले के पास ही आकाशों का राज्य, धरती का राज्य तथा उन दोनों के बीच की सारी चीज़ों का राज्य है। तथा अकेले उसी के पास उस घड़ी का ज्ञान है, जिसमें क़ियामत क़ायम होगी, उसे उसके सिवा कोई नहीं जानता। और तुम आख़िरत में हिसाब और बदले के लिए अकेले उसी की ओर लौटाए जाओगे।
आयत 86
وَلَا يَمْلِكُ ٱلَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِهِ ٱلشَّفَـٰعَةَ إِلَّا مَن شَهِدَ بِٱلْحَقِّ وَهُمْ يَعْلَمُونَ
وَلَا
और नहीं
يَمْلِكُ
वो इख़्तियार रखते
ٱلَّذِينَ
जिन्हें
يَدْعُونَ
वो पुकारते हैं
مِن
besides Him
دُونِهِ
उसके सिवा
ٱلشَّفَـٰعَةَ
शफ़ाअत का
إِلَّا
मगर
مَن
जो
شَهِدَ
गवाही दे
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
وَهُمْ
और वो
يَعْلَمُونَ
वो जानते हों
और जिन्हें वे उसके और अपने बीच माध्यम ठहराकर पुकारते है, उन्हें सिफ़ारिश का कुछ भी अधिकार नहीं, बस उसे ही यह अधिकार प्राप्त, है जो हक की गवाही दे, और ऐसे लोग जानते है।-
तफ़्सीर:
और वे लोग, जिन्हें ये मुश्रिक अल्लाह को छोड़कर पूजते हैं, अल्लाह के निकट सिफ़ारिश का अधिकार नहीं रखते। अधिकार केवल वही रखता है, जो इस बात की गवाही दे कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं और वह उस बात को जानता हो, जिसकी उसने गवाही दी है; जैसे कि ईसा, उज़ैर और फ़रिश्ते।
आयत 87
وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَهُمْ لَيَقُولُنَّ ٱللَّهُ ۖ فَأَنَّىٰ يُؤْفَكُونَ
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
سَأَلْتَهُم
पूछें आप उनसे
مَّنْ
किसने
خَلَقَهُمْ
पैदा किया उन्हें
لَيَقُولُنَّ
अलबत्ता वो ज़रूर कहेंगे
ٱللَّهُ ۖ
अल्लाह ने
فَأَنَّىٰ
तो कहाँ से
يُؤْفَكُونَ
वो फेरे जाते हैं
यदि तुम उनसे पूछो कि "उन्हें किसने पैदा किया?" तो वे अवश्य कहेंगे, "अल्लाह ने।" तो फिर वे कहाँ उलटे फिर जाते है?-
तफ़्सीर:
यदि आप उनसे पूछें कि उन्हें किसने पैदा किया है? तो वे अवश्य कहेंगे : हमें अल्लाह ने पैदा किया है। फिर इस स्वीकृति के बाद वे उसकी इबादत से कैसे फेर दिए जाते हैं?!
आयत 88
وَقِيلِهِۦ يَـٰرَبِّ إِنَّ هَـٰٓؤُلَآءِ قَوْمٌۭ لَّا يُؤْمِنُونَ
وَقِيلِهِۦ
क़सम है उस (रसूल) के क़ौल की
يَـٰرَبِّ
ऐ मेरे रब
إِنَّ
बेशक
هَـٰٓؤُلَآءِ
ये
قَوْمٌۭ
लोग
لَّا
(who do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाऐंगे
और उसका कहना हो कि "ऐ मेरे रब! निश्चय ही ये वे लोग है, जो ईमान नहीं रखते थे।"
तफ़्सीर:
अल्लाह महिमावान को अपने रसूल की इस शिकायत का ज्ञान है कि उसकी जाति ने उसे झुठलाया है और उसमें उनका कहना है कि : ऐ मेरे पालनहार! ये ऐसे लोग हैं, जो उसपर ईमान लाने वाले नहीं हैं, जिसके साथ तूने मुझे उनकी ओर भेजा है।
आयत 89
فَٱصْفَحْ عَنْهُمْ وَقُلْ سَلَـٰمٌۭ ۚ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ
فَٱصْفَحْ
पस दरगुज़र कीजिए
عَنْهُمْ
उनसे
وَقُلْ
और कह दीजिए
سَلَـٰمٌۭ ۚ
सलाम है
فَسَوْفَ
पस अनक़रीब
يَعْلَمُونَ
वो जान लेंगे
अच्छा तो उनसे नज़र फेर लो और कह दो, "सलाम है तुम्हें!" अन्ततः शीघ्र ही वे स्वयं जान लेंगे
तफ़्सीर:
अतः आप उनसे मुँह फेर लें और उनसे ऐसी बात करें, जिससे उनकी बुराई से बच सकें। (यह उस समय की बात है जब आप मक्का में थे।) क्योंकि शीघ्र ही उन्हें पता चल जाएगा कि उन्हें किस सज़ा का सामना करना पड़ेगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नबी ﷺ को दरगुज़र और सलाम कहने की ताकीद के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि मुखालिफत के बावजूद नर्मी और सलामती का रवैया अपनाना बेहतर हिकमत है।
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