नाम का मतलब
रेत के टीले (आद कौम की बस्ती अहकाफ के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-अहकाफ में आद कौम की बस्ती अहकाफ (रेत के टीलों वाला इलाका) का ज़िक्र है, साथ ही वालिदैन के हुकूक और जिन्नों के कुरआन सुनने का वाकिया भी बयान हुआ है।
फ़ज़ीलत / सार
इस सूरह में जिन्नों का कुरआन सुनकर ईमान लाने का वाकिया दर्ज है, जो कुरआन के असर की एक अनोखी मिसाल है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ حمٓ
حمٓ
ح م
हा॰ मीम॰
तफ़्सीर:
{हा॰ मीम॰} सूरतुल-बक़रा की शुरुआत में इस प्रकार के अक्षरों के बारे में बात गुज़र चुकी है।
आयत 2
تَنزِيلُ ٱلْكِتَـٰبِ مِنَ ٱللَّهِ ٱلْعَزِيزِ ٱلْحَكِيمِ
تَنزِيلُ
नाज़िल करना है
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब का
مِنَ
(is) from
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
ٱلْعَزِيزِ
जो बहुत ज़बरदस्त है
ٱلْحَكِيمِ
ख़ूब हिकमत वाला है
इस किताब का अवतरण अल्लाह की ओर से है, जो प्रभुत्वशाली, अत्यन्त तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
क़ुरआन का उतारना अल्लाह की ओर से है, जो सबपर प्रभुत्वशाली है, उसे कोई पराजित नहीं कर सकता, अपनी रचना, तक़दीर और शरीयत में हिकमत वाला है।
आयत 3
مَا خَلَقْنَا ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَآ إِلَّا بِٱلْحَقِّ وَأَجَلٍۢ مُّسَمًّۭى ۚ وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ عَمَّآ أُنذِرُوا۟ مُعْرِضُونَ
مَا
नहीं
خَلَقْنَا
पैदा किया हमने
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
وَمَا
और जो कुछ
بَيْنَهُمَآ
दर्मियान है इन दोनों के
إِلَّا
मगर
بِٱلْحَقِّ
साथ हक़ के
وَأَجَلٍۢ
और वक़्त
مُّسَمًّۭى ۚ
मुक़र्रर के
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
عَمَّآ
उस चीज़ से जो
أُنذِرُوا۟
वो डराए गए
مُعْرِضُونَ
ऐराज़ करने वाले हैं
हमने आकाशों और धरती को और जो कुछ उन दोनों के मध्य है उसे केवल हक़ के साथ और एक नियत अवधि तक के लिए पैदा किया है। किन्तु जिन लोगों ने इनकार किया है, वे उस चीज़ को ध्यान में नहीं लाते जिससे उन्हें सावधान किया गया है
तफ़्सीर:
हमने आकाशों और धरती को और जो कुछ उन दोनों के बीच है, व्यर्थ नहीं बनाया, बल्कि हमने उन सभी को सत्य के साथ व्यापक हिकमतों के तहत बनाया है। उन हिकमतों में से यह है कि बंदे उनके माध्यम से अपने रब को पहचानें, ताकि वे केवल उसी की इबादत करें, और उसके साथ किसी चीज़ को साझी न बनाएँ, और यह कि वे धरती पर अपने उत्तराधिकार की अपेक्षाओं को एक विशिष्ट अवधि के लिए पूरा करें जिसे केवल अल्लाह ही जानता है। लेकिन जिन लोगों ने अल्लाह का इनकार किया, वे उस चीज़ से मुँह फेरने वाले हैं, जिससे उन्हें अल्लाह की किताब में डराया गया है। वे उसकी परवाह नहीं करते।
आयत 4
قُلْ أَرَءَيْتُم مَّا تَدْعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ أَرُونِى مَاذَا خَلَقُوا۟ مِنَ ٱلْأَرْضِ أَمْ لَهُمْ شِرْكٌۭ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ ۖ ٱئْتُونِى بِكِتَـٰبٍۢ مِّن قَبْلِ هَـٰذَآ أَوْ أَثَـٰرَةٍۢ مِّنْ عِلْمٍ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
قُلْ
कह दीजिए
أَرَءَيْتُم
क्या देखा तुमने
مَّا
जिन्हें
تَدْعُونَ
तुम पुकारते हो
مِن
besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
أَرُونِى
दिखाओ मुझे
مَاذَا
क्या कुछ
خَلَقُوا۟
उन्होंने पैदा किया है
مِنَ
of
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन से
أَمْ
या
لَهُمْ
उनके लिए
شِرْكٌۭ
कोई शराकत है
فِى
in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ ۖ
आसमानों में
ٱئْتُونِى
लाओ मेरे पास
بِكِتَـٰبٍۢ
कोई किताब
مِّن
from
قَبْلِ
before
هَـٰذَآ
इससे पहले की
أَوْ
या
أَثَـٰرَةٍۢ
बाक़ी मान्दा
مِّنْ
of
عِلْمٍ
इल्म में से
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
कहो, "क्या तुमने उनको देखा भी, जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पुकारते हो? मुझे दिखाओ उन्होंने धरती की चीज़ों में से क्या पैदा किया है या आकाशों में उनकी कोई साझेदारी है? मेरे पास इससे पहले की कोई किताब ले आओ या ज्ञान की कोई अवशेष बात ही, यदि तुम सच्चे हो।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप सत्य से मुँह फेरने वाले इन मुश्रिकों से कह दें : मुझे अपने उन बुतों के बारे में बताओ, जिनकी तुम अल्लाह के अलावा पूजा करते हो कि उन्होंने धरती के हिस्सों में से क्या बनाया है? क्या उन्होंने कोई पहाड़ बनाया? क्या उन्होंने कोई नहर बनाई? या क्या आकाशों को बनाने में अल्लाह के साथ उनका कोई हिस्सा है? यदि तुम अपने इस दावे में सच्चे हो कि तुम्हारी मूर्तियाँ पूजा के योग्य हैं, तो मेरे पास क़ुरआन से पहले अल्लाह की उतारी हुई कोई किताब या पूर्वजों के छोड़े हुए ज्ञान का अवशेष ले आओ।
आयत 5
وَمَنْ أَضَلُّ مِمَّن يَدْعُوا۟ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَن لَّا يَسْتَجِيبُ لَهُۥٓ إِلَىٰ يَوْمِ ٱلْقِيَـٰمَةِ وَهُمْ عَن دُعَآئِهِمْ غَـٰفِلُونَ
وَمَنْ
और कौन
أَضَلُّ
ज़्यादा गुमराह है
مِمَّن
उससे जो
يَدْعُوا۟
पुकारता है
مِن
besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مَن
उन्हें जो
لَّا
will not respond
يَسْتَجِيبُ
नहीं वो जवाब दे सकते
لَهُۥٓ
उसे
إِلَىٰ
until
يَوْمِ
(the) Day
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के दिन तक
وَهُمْ
और वो
عَن
of
دُعَآئِهِمْ
उनकी पुकार से
غَـٰفِلُونَ
गाफ़िल हैं
आख़़िर उस व्यक्ति से बढ़कर पथभ्रष्ट और कौन होगा, जो अल्लाह से हटकर उन्हें पुकारता हो जो क़ियामत के दिन तक उसकी पुकार को स्वीकार नहीं कर सकते, बल्कि वे तो उनकी पुकार से भी बेख़बर है;
तफ़्सीर:
उस व्यक्ति से अधिक पथभ्रष्ट कोई नहीं, जो अल्लाह को छोड़कर ऐसी मूर्ति की पूजा करे, जो क़ियामत के दिन तक उसकी प्रार्थना क़बूल नहीं कर सकती। ये मूर्तियाँ जिनकी ये लोग अल्लाह के अलावा पूजा करते हैं, उन्हें लाभ या हानि पहुँचाना तो दूर की बात, अपने उपासकों की प्रार्थना तक से बेखबर हैं।
आयत 6
وَإِذَا حُشِرَ ٱلنَّاسُ كَانُوا۟ لَهُمْ أَعْدَآءًۭ وَكَانُوا۟ بِعِبَادَتِهِمْ كَـٰفِرِينَ
وَإِذَا
और जब
حُشِرَ
जमा किए जाऐंगे
ٱلنَّاسُ
लोग
كَانُوا۟
होंगे वो
لَهُمْ
उनके लिए
أَعْدَآءًۭ
दुश्मन
وَكَانُوا۟
और होंगे वो
بِعِبَادَتِهِمْ
उनकी इबादत के
كَـٰفِرِينَ
इन्कारी
और जब लोग इकट्ठे किए जाएँगे तो वे उनके शत्रु होंगे औऱ उनकी बन्दगी का इनकार करेंगे
तफ़्सीर:
हालाँकि ये मूर्तियाँ उन्हें इस दुनिया में कोई लाभ नहीं पहुँचा सकतीं, इसके बावजूद जब वे क़ियामत के दिन एकत्र किए जाएँगे, तो वे उनके दुश्मन हो जाएँगे जो उनकी पूजा करते थे, और उनसे अलगाव प्रकट करेंगे और इस बात का इनकार कर देंगे कि वे उनकी पूजा के बारे में जानते थे।
आयत 7
وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ ءَايَـٰتُنَا بَيِّنَـٰتٍۢ قَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لِلْحَقِّ لَمَّا جَآءَهُمْ هَـٰذَا سِحْرٌۭ مُّبِينٌ
وَإِذَا
और जब
تُتْلَىٰ
पढ़ी जाती हैं
عَلَيْهِمْ
उन पर
ءَايَـٰتُنَا
आयात हमारी
بَيِّنَـٰتٍۢ
वाज़ेह
قَالَ
कहा
ٱلَّذِينَ
उन्होंने जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لِلْحَقِّ
हक़ के बारे में
لَمَّا
जब
جَآءَهُمْ
वो आ गया उनके पास
هَـٰذَا
ये है
سِحْرٌۭ
जादू
مُّبِينٌ
खुल्लम-खुल्ला
जब हमारी स्पष्ट आयतें उन्हें पढ़कर सुनाई जाती है तो वे लोग जिन्होंने इनकार किया, सत्य के विषय में, जबकि वह उनके पास आ गया, कहते है कि "यह तो खुला जादू है।"
तफ़्सीर:
और जब उनके सामने हमारे रसूल पर उतरने वाली आयतें पढ़ी जाती हैं, तो काफ़िर लोग क़ुरआन के बारे में, जब वह रसूल के माध्यम से उनके पास आ गया, कहते हैं : यह स्पष्ट जादू है, और यह अल्लाह की ओर से कोई वह़्य नहीं है।
आयत 8
أَمْ يَقُولُونَ ٱفْتَرَىٰهُ ۖ قُلْ إِنِ ٱفْتَرَيْتُهُۥ فَلَا تَمْلِكُونَ لِى مِنَ ٱللَّهِ شَيْـًٔا ۖ هُوَ أَعْلَمُ بِمَا تُفِيضُونَ فِيهِ ۖ كَفَىٰ بِهِۦ شَهِيدًۢا بَيْنِى وَبَيْنَكُمْ ۖ وَهُوَ ٱلْغَفُورُ ٱلرَّحِيمُ
أَمْ
या
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
ٱفْتَرَىٰهُ ۖ
कि इसने गढ़ लिया है उसे
قُلْ
कह दीजिए
إِنِ
अगर
ٱفْتَرَيْتُهُۥ
मैं ने गढ़ लिया है उसे
فَلَا
तो नहीं
تَمْلِكُونَ
तुम मालिक हो सकते
لِى
मेरे लिए
مِنَ
against
ٱللَّهِ
अल्लाह से
شَيْـًٔا ۖ
किसी चीज़ के
هُوَ
वो
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानने वाला है
بِمَا
उसे जो
تُفِيضُونَ
तुम मश्ग़ूल होते हो
فِيهِ ۖ
जिसमें
كَفَىٰ
काफ़ी है
بِهِۦ
उसका
شَهِيدًۢا
गवाह होना
بَيْنِى
दर्मियान मेरे
وَبَيْنَكُمْ ۖ
और दर्मियान तुम्हारे
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلْغَفُورُ
बहुत बख़्शने वाला
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला
(क्या ईमान लाने से उन्हें कोई चीज़ रोक रही है) या वे कहते है, "उसने इसे स्वयं ही घड़ लिया है?" कहो, "यदि मैंने इसे स्वयं घड़ा है तो अल्लाह के विरुद्ध मेरे लिए तुम कुछ भी अधिकार नहीं रखते। जिसके विषय में तुम बातें बनाने में लगे हो, वह उसे भली-भाँति जानता है। और वह मेरे और तुम्हारे बीच गवाह की हैसियत से काफ़ी है। और वही बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है।"
तफ़्सीर:
क्या ये मुश्रिक लोग कहते हैं : मुहम्मद ने इस क़ुरआन को गढ़कर अल्लाह की ओर मनसूब कर दिया है?! (ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : यदि मैंने इसे अपनी मर्ज़ी से गढ़ लिया है और इसके कारण अल्लाह मुझे यातना देना चाहे, तो तुम मुझे बचा नहीं सकते। तो फिर मैं इसे अल्लाह पर गढ़कर अपने आपको यातना से कैसे पीड़ित कर सकता हूं?! तुम क़ुरआन पर जो आरोप और मुझपर जो लांछन लगा रहे हो, उसे अल्लाह बहुत अच्छी तरह से जानता है। वह महिमावान मेरे और तुम्हारे बीच गवाह के रूप में पर्याप्त है। तथा वह अपने तौबा करने वाले बंदों के गुनाहों को माफ़ करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 9
قُلْ مَا كُنتُ بِدْعًۭا مِّنَ ٱلرُّسُلِ وَمَآ أَدْرِى مَا يُفْعَلُ بِى وَلَا بِكُمْ ۖ إِنْ أَتَّبِعُ إِلَّا مَا يُوحَىٰٓ إِلَىَّ وَمَآ أَنَا۠ إِلَّا نَذِيرٌۭ مُّبِينٌۭ
قُلْ
कह दीजिए
مَا
नहीं
كُنتُ
हूँ मैं
بِدْعًۭا
नया /अनोखा
مِّنَ
among
ٱلرُّسُلِ
रसूलों में से
وَمَآ
और नहीं
أَدْرِى
मैं जानता
مَا
क्या
يُفْعَلُ
किया जाएगा
بِى
मेरे साथ
وَلَا
और ना
بِكُمْ ۖ
तुम्हारे साथ
إِنْ
नहीं
أَتَّبِعُ
मैं पैरवी करता
إِلَّا
मगर
مَا
उसकी जो
يُوحَىٰٓ
वही की जाती है
إِلَىَّ
मेरी तरफ़
وَمَآ
और नहीं
أَنَا۠
मैं
إِلَّا
मगर
نَذِيرٌۭ
डराने वाला
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
कह दो, "मैं कोई पहला रसूल तो नहीं हूँ। और मैं नहीं जानता कि मेरे साथ क्या किया जाएगा और न यह कि तुम्हारे साथ क्या किया जाएगा। मैं तो बस उसी का अनुगामी हूँ, जिसकी प्रकाशना मेरी ओर की जाती है और मैं तो केवल एक स्पष्ट सावधान करनेवाला हूँ।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन मुश्रिकों से, जो आपकी नुबुव्वत को झुठलाते हैं, कह दें : मैं कोई पहला रसूल नहीं हूँ, जिसे अल्लाह ने भेजा है, कि तुम मेरे आह्वान पर आश्चर्यचकित हो। मुझसे पहले बहुत-से रसूल गुज़र चुके हैं। और मैं नहीं जानता कि अल्लाह दुनिया में मेरे साथ क्या करेगा और तुम्हारे साथ क्या करेगा। मैं तो केवल अल्लाह की वह़्य (प्रकाशना) का पालन करता हूँ। मैं केवल वही कहता और करता हूँ जो वह मुझे वह़्य द्वारा निर्देश देता है। मैं तो केवल एक सावधान करने वाला हूँ, तुम्हें अल्लाह की यातना से, स्पष्ट तौर पर, सावधान करता हूँ।
आयत 10
قُلْ أَرَءَيْتُمْ إِن كَانَ مِنْ عِندِ ٱللَّهِ وَكَفَرْتُم بِهِۦ وَشَهِدَ شَاهِدٌۭ مِّنۢ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ عَلَىٰ مِثْلِهِۦ فَـَٔامَنَ وَٱسْتَكْبَرْتُمْ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلظَّـٰلِمِينَ
قُلْ
कह दीजिए
أَرَءَيْتُمْ
क्या देखा तुमने
إِن
अगर
كَانَ
है वो
مِنْ
from Allah
عِندِ
from Allah
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
وَكَفَرْتُم
और कुफ़्र किया तुमने
بِهِۦ
साथ उसके
وَشَهِدَ
और गवाही दे चुका
شَاهِدٌۭ
एक गवाह
مِّنۢ
from
بَنِىٓ
(the) Children of Israel
إِسْرَٰٓءِيلَ
बनी इस्राईल में से
عَلَىٰ
to
مِثْلِهِۦ
इस जैसे (कलाम) पर
فَـَٔامَنَ
पस वो ईमान ले आया
وَٱسْتَكْبَرْتُمْ ۖ
और तकब्बुर किया तुमने
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يَهْدِى
नहीं वो हिदायत देता
ٱلْقَوْمَ
उन लोगों को
ٱلظَّـٰلِمِينَ
जो ज़ालिम हैं
कहो, "क्या तुमने सोचा भी (कि तुम्हारा क्या परिणाम होगा)? यदि वह (क़ुरआन) अल्लाह के यहाँ से हुआ और तुमने उसका इनकार कर दिया, हालाँकि इसराईल की सन्तान में से एक गवाह ने उसके एक भाग की गवाही भी दी। सो वह ईमान ले आया और तुम घमंड में पड़े रहे। अल्लाह तो ज़ालिम लोगों को मार्ग नहीं दिखाता।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) इन झुठलाने वालों से कह दें : मुझे बताओ कि यदि यह क़ुरआन अल्लाह की ओर से है और तुमने इसका इनकार कर दिया, जबकि बनी इसराईल के एक व्यक्ति ने, उसके बारे में तौरात के अंदर जो कुछ उल्लेख हुआ हुआ है, उसके आधार पर गवाही दी कि यह अल्लाह की ओर से है, फिर वह उसपर ईमान ले आया और तुमने उसपर ईमान लाने से घमंड किया - क्या ऐसी स्थिति में तुम अत्याचारी नहीं हो?! निःसंदेह अल्लाह अत्याचारियों को सत्य की तौफ़ीक़ नहीं देता।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कायनात की तख्लीक और कुफ्फार के ऐतराज़ात का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कायनात को बगैर मकसद के नहीं बनाया गया, इस पर गौर करना ईमान बढ़ाता है।
आयत 11
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لِلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَوْ كَانَ خَيْرًۭا مَّا سَبَقُونَآ إِلَيْهِ ۚ وَإِذْ لَمْ يَهْتَدُوا۟ بِهِۦ فَسَيَقُولُونَ هَـٰذَآ إِفْكٌۭ قَدِيمٌۭ
وَقَالَ
और कहा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لِلَّذِينَ
उनसे जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
لَوْ
अगर
كَانَ
होता वो
خَيْرًۭا
बेहतर
مَّا
ना
سَبَقُونَآ
वो सबक़त ले जाते हम पर
إِلَيْهِ ۚ
तरफ़ उसके
وَإِذْ
और जब कि
لَمْ
नहीं
يَهْتَدُوا۟
उन्होंने हिदायत पाई
بِهِۦ
साथ उसके
فَسَيَقُولُونَ
तो ज़रूर वो कहेंगे
هَـٰذَآ
ये
إِفْكٌۭ
झूठ है
قَدِيمٌۭ
पुराना
जिन लोगों ने इनकार किया, वे ईमान लानेवालों के बारे में कहते है, "यदि वह अच्छा होता तो वे उसकी ओर (बढ़ने में) हमसे अग्रसर न रहते।" औऱ जब उन्होंने उससे मार्ग ग्रहण नहीं किया तो अब अवश्य कहेंगे, "यह तो पुराना झूठ है!"
तफ़्सीर:
तथा क़ुरआन और रसूल के लाए हुए संदेश का इनकार करने वालों ने ईमान वालों के बारे में कहा : यदि मुहम्मद जो लेकर आए हैं वह सत्य होता, जो भलाई का मार्गदर्शन करता, तो ये ग़रीब, ग़ुलाम और कमज़ोर लोग हमसे पहले उसकी ओर न आते। चूँकि उनके रसूल उनके पास जो कुछ लाए थे, उससे उन्होंने मार्गदर्शन प्राप्त नहीं किया, इसलिए वे यही कहेंगे : यह जो मुहम्मद हमारे पास लाए हैं, पुराना झूठ है और हम झूठ पर नहीं चलते।
आयत 12
وَمِن قَبْلِهِۦ كِتَـٰبُ مُوسَىٰٓ إِمَامًۭا وَرَحْمَةًۭ ۚ وَهَـٰذَا كِتَـٰبٌۭ مُّصَدِّقٌۭ لِّسَانًا عَرَبِيًّۭا لِّيُنذِرَ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ وَبُشْرَىٰ لِلْمُحْسِنِينَ
وَمِن
And before it
قَبْلِهِۦ
और उससे पहले थी
كِتَـٰبُ
किताब
مُوسَىٰٓ
मूसा की
إِمَامًۭا
इमाम/ राहनुमा
وَرَحْمَةًۭ ۚ
और रहमत
وَهَـٰذَا
और ये
كِتَـٰبٌۭ
किताब है
مُّصَدِّقٌۭ
तस्दीक़ करने वाली
لِّسَانًا
(in) language
عَرَبِيًّۭا
अर्बी ज़बान में
لِّيُنذِرَ
ताकि वो डराए
ٱلَّذِينَ
उन्हें जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
وَبُشْرَىٰ
और ख़ुश्ख़बरी है
لِلْمُحْسِنِينَ
नेकोकारों के लिए
हालाँकि इससे पहले मूसा की किताब पथप्रदर्शक और दयालुता रही है। और यह किताब, जो अरबी भाषा में है, उसकी पुष्टि में है, ताकि उन लोगों को सचेत कर दे जिन्होंने ज़ु्ल्म किया और शुभ सूचना हो उत्तमकारों के लिए
तफ़्सीर:
और इस क़ुरआन से पहले, तौरात, वह किताब जिसे अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम पर पेशवा के रूप में उतारा, जिसका सच्चाई में पालन किया जाता था, तथा उन लोगों के लिए दया के रूप में थी, जो बनी इसराईल में से उसपर ईमान लाए और उसका पालन किया। और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतारा गया यह क़ुरआन, एक ऐसी किताब है जो अपने से पहली किताबों की पुष्टि करने वाली, अरबी भाषा में है; ताकि इसके द्वारा उन लोगों को डराया जाए, जिन्होंने अल्लाह के साथ शिर्क करके और पाप करके अपने ऊपर अत्याचार किया है। तथा यह उन उपकारकों के लिए शुभ सूचना है, जिन्होंने अपने स्रष्टा के साथ अपने संबंध को तथा उसकी सृष्टि के साथ अपने संबंध को बेहतर बनाया।
आयत 13
إِنَّ ٱلَّذِينَ قَالُوا۟ رَبُّنَا ٱللَّهُ ثُمَّ ٱسْتَقَـٰمُوا۟ فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
قَالُوا۟
कहा
رَبُّنَا
रब हमारा
ٱللَّهُ
अल्लाह है
ثُمَّ
फिर
ٱسْتَقَـٰمُوا۟
उन्होंने इस्तिक़ामत इख़्तियार की
فَلَا
तो ना
خَوْفٌ
कोई ख़ौफ़ होगा
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يَحْزَنُونَ
वो ग़मगीन होंगे
निश्चय ही जिन लोगों ने कहा, "हमारा रब अल्लाह है।" फिर वे उसपर जमे रहे, तो उन्हें न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होगे
तफ़्सीर:
निःसंदेह जिन लोगों ने कहा : हमारा रब अल्लाह है, उसके सिवा हमारा कोई रब नहीं, फिर वे ईमान और अच्छे कर्म पर जमे रहे, तो वे आख़िरत में जिस चीज़ का सामना करेंगे उसके बारे में उन्हें कोई भय न होगा, और न ही उन्हें उसपर कोई शोक होगा, जो दुनिया के सुखों में से उनसे छूट गया है या जो उन्होंने अपने पीछे छोड़ा है।
आयत 14
أُو۟لَـٰٓئِكَ أَصْحَـٰبُ ٱلْجَنَّةِ خَـٰلِدِينَ فِيهَا جَزَآءًۢ بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
أَصْحَـٰبُ
साथी
ٱلْجَنَّةِ
जन्नत के
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَا
उसमें
جَزَآءًۢ
बदला है
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
वही जन्नतवाले है, वहाँ वे सदैव रहेंगे उसके बदले में जो वे करते रहे है
तफ़्सीर:
इन विशेषताओं से परिपूर्ण लोग जन्नत वाले हैं, जिसमें वे हमेशा रहेंगे; यह उनके उन अच्छे कार्यों का बदला है, जो उन्होंने दुनिया में किए थे।
आयत 15
وَوَصَّيْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ بِوَٰلِدَيْهِ إِحْسَـٰنًا ۖ حَمَلَتْهُ أُمُّهُۥ كُرْهًۭا وَوَضَعَتْهُ كُرْهًۭا ۖ وَحَمْلُهُۥ وَفِصَـٰلُهُۥ ثَلَـٰثُونَ شَهْرًا ۚ حَتَّىٰٓ إِذَا بَلَغَ أَشُدَّهُۥ وَبَلَغَ أَرْبَعِينَ سَنَةًۭ قَالَ رَبِّ أَوْزِعْنِىٓ أَنْ أَشْكُرَ نِعْمَتَكَ ٱلَّتِىٓ أَنْعَمْتَ عَلَىَّ وَعَلَىٰ وَٰلِدَىَّ وَأَنْ أَعْمَلَ صَـٰلِحًۭا تَرْضَىٰهُ وَأَصْلِحْ لِى فِى ذُرِّيَّتِىٓ ۖ إِنِّى تُبْتُ إِلَيْكَ وَإِنِّى مِنَ ٱلْمُسْلِمِينَ
وَوَصَّيْنَا
और ताकीद की हमने
ٱلْإِنسَـٰنَ
इन्सान को
بِوَٰلِدَيْهِ
साथ अपने वालिदैन के
إِحْسَـٰنًا ۖ
एहसान करने की
حَمَلَتْهُ
उठाया उसे
أُمُّهُۥ
उसकी माँ ने
كُرْهًۭا
तक्लीफ़ से
وَوَضَعَتْهُ
और उसने जन्म दिया उसे
كُرْهًۭا ۖ
तक्लीफ़ से
وَحَمْلُهُۥ
और हमल उसका
وَفِصَـٰلُهُۥ
और दूध छुड़ाना उसका
ثَلَـٰثُونَ
तीस
شَهْرًا ۚ
माह है
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
بَلَغَ
वो पहुँच गया
أَشُدَّهُۥ
अपनी जवानी को
وَبَلَغَ
और वो पहुँचा
أَرْبَعِينَ
चालीस
سَنَةًۭ
साल को
قَالَ
उसने कहा
رَبِّ
ऐ मेरे रब
أَوْزِعْنِىٓ
तौफ़ीक़ दे मुझे
أَنْ
कि
أَشْكُرَ
मैं शुक्र अदा करूँ
نِعْمَتَكَ
तेरी नेअमत का
ٱلَّتِىٓ
वो जो
أَنْعَمْتَ
इनआम की तू ने
عَلَىَّ
मुझ पर
وَعَلَىٰ
and upon
وَٰلِدَىَّ
और मेरे वालिदैन पर
وَأَنْ
और ये कि
أَعْمَلَ
मैं अमल करूँ
صَـٰلِحًۭا
नेक
تَرْضَىٰهُ
तू राज़ी हो जाए जिससे
وَأَصْلِحْ
और इस्लाह कर दे
لِى
मेरे लिए
فِى
among
ذُرِّيَّتِىٓ ۖ
मेरी औलाद में
إِنِّى
बेशक मैं
تُبْتُ
तौबा की मैं ने
إِلَيْكَ
तरफ़ तेरे
وَإِنِّى
और बेशक मैं
مِنَ
of
ٱلْمُسْلِمِينَ
मुसलमानों में से हूँ
हमने मनुष्य को अपने माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने की ताकीद की। उसकी माँ ने उसे (पेट में) तकलीफ़ के साथ उठाए रखा और उसे जना भी तकलीफ़ के साथ। और उसके गर्भ की अवस्था में रहने और दूध छुड़ाने की अवधि तीस माह है, यहाँ तक कि जब वह अपनी पूरी शक्ति को पहुँचा और चालीस वर्ष का हुआ तो उसने कहा, "ऐ मेरे रब! मुझे सम्भाल कि मैं तेरी उस अनुकम्पा के प्रति कृतज्ञता दिखाऊँ, जो तुने मुझपर और मेरे माँ-बाप पर की है। और यह कि मैं ऐसा अच्छा कर्म करूँ जो तुझे प्रिय हो और मेरे लिए मेरी संतति में भलाई रख दे। मैं तेरे आगे तौबा करता हूँ औऱ मैं मुस्लिम (आज्ञाकारी) हूँ।"
तफ़्सीर:
हमने निश्चित रूप से मनुष्य को आदेश दिया है कि अपने माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करे। उनका उनके जीवन के दौरान और उनकी मृत्यु के बाद इस तरह से आदर-सम्मान करे कि उसमें शरीयत का उल्लंघन न हो। विशेष रूप से अपनी माँ का ध्यान रखे, जिसने उसे कठिनाई से (गर्भ में) उठाए रखा और कठिनाई से उसे जन्म दिया। उसके गर्भ में रहने और दूध छुड़ाने की शुरुआत तक की अवधि : तीस महीना है। यहाँ तक कि जब वह अपनी मानसिक और शारीरिक शक्ति की पूर्णता को पहुँच गया और चालीस वर्ष का हो गया, तो उसने कहा : ऐ मेरे पालनहार! मुझे प्रेरणा दे कि मैं तेरी उस नेमत का शुक्र अदा करूँ, जो तूने मुझे तथा मेरे माता-पिता को प्रदान की है, तथा मुझे प्रेरणा दे कि मैं वह नेक काम करूँ, जिसे तू पसंद करता है और उसे मेरी ओर से क़बूल कर ले, और मेरे लिए मेरी संतान को सुधार दे। मैं तेरे सामने अपने गुनाहों से तौबा करता हूँ, तथा मैं उन लोगों में से हूँ जो तेरी आज्ञाकारिता के अधीन हैं और तेरे आदेशों के प्रति समर्पित हैं।
आयत 16
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ نَتَقَبَّلُ عَنْهُمْ أَحْسَنَ مَا عَمِلُوا۟ وَنَتَجَاوَزُ عَن سَيِّـَٔاتِهِمْ فِىٓ أَصْحَـٰبِ ٱلْجَنَّةِ ۖ وَعْدَ ٱلصِّدْقِ ٱلَّذِى كَانُوا۟ يُوعَدُونَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही वो लोग हैं
ٱلَّذِينَ
जो
نَتَقَبَّلُ
हम क़ुबूल कर लेते हैं
عَنْهُمْ
उनसे
أَحْسَنَ
बेहतरीन
مَا
जो
عَمِلُوا۟
उन्होंने अमल किए
وَنَتَجَاوَزُ
और हम दरगुज़र करते है
عَن
[from]
سَيِّـَٔاتِهِمْ
उनकी बुराइयों से
فِىٓ
among
أَصْحَـٰبِ
(the) companions
ٱلْجَنَّةِ ۖ
जन्नत वालों में होंगे
وَعْدَ
वादा है
ٱلصِّدْقِ
सच्चा
ٱلَّذِى
वो जो
كَانُوا۟
थे वो
يُوعَدُونَ
वो वादा किए जाते
ऐसे ही लोग जिनसे हम अच्छे कर्म, जो उन्होंने किए होंगे, स्वीकार कर लेगें और उनकी बुराइयों को टाल जाएँगे। इस हाल में कि वे जन्नतवालों में होंगे, उस सच्चे वादे के अनुरूप जो उनसे किया जाता रहा है
तफ़्सीर:
यही वे लोग हैं कि हम उनके द्वारा किए गए सबसे अच्छे कामों को स्वीकार करते हैं और उनके बुरे कामों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, इसलिए हम उनपर उनकी पकड़ नहीं करते हैं। तथा वे जन्नत वालों में शामिल हैं। यह वादा जो उनसे किया गया है, बिलकुल सच्चा वादा है, अनिवार्य रूप से पूरा होगा।
आयत 17
وَٱلَّذِى قَالَ لِوَٰلِدَيْهِ أُفٍّۢ لَّكُمَآ أَتَعِدَانِنِىٓ أَنْ أُخْرَجَ وَقَدْ خَلَتِ ٱلْقُرُونُ مِن قَبْلِى وَهُمَا يَسْتَغِيثَانِ ٱللَّهَ وَيْلَكَ ءَامِنْ إِنَّ وَعْدَ ٱللَّهِ حَقٌّۭ فَيَقُولُ مَا هَـٰذَآ إِلَّآ أَسَـٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ
وَٱلَّذِى
और वो जिसने
قَالَ
कहा
لِوَٰلِدَيْهِ
अपने वालिदैन से
أُفٍّۢ
उफ़्फ़
لَّكُمَآ
तुम दोनों के लिए
أَتَعِدَانِنِىٓ
क्या तुम मुझे धमकी देते हो
أَنْ
कि
أُخْرَجَ
मैं निकाला जाऊँगा
وَقَدْ
हालाँकि तहक़ीक़
خَلَتِ
गुज़र चुकीं
ٱلْقُرُونُ
उम्मतें
مِن
before me
قَبْلِى
मुझसे पहले
وَهُمَا
और वो दोनों
يَسْتَغِيثَانِ
वो दोनों फ़रियाद करते हैं
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَيْلَكَ
(कहते हैं) तेरा बुरा हो
ءَامِنْ
ईमान ले आ
إِنَّ
बेशक
وَعْدَ
वादा
ٱللَّهِ
अल्लाह का
حَقٌّۭ
सच्चा है
فَيَقُولُ
तो वो कहता है
مَا
नहीं
هَـٰذَآ
ये
إِلَّآ
मगर
أَسَـٰطِيرُ
कहानियाँ
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों की
किन्तु वह व्यक्ति जिसने अपने माँ-बाप से कहा, "धिक है तुम पर! क्या तुम मुझे डराते हो कि मैं (क़ब्र से) निकाला जाऊँगा, हालाँकि मुझसे पहले कितनी ही नस्लें गुज़र चुकी है?" और वे दोनों अल्लाह से फ़रियाद करते है - "अफ़सोस है तुमपर! मान जा। निस्संदेह अल्लाह का वादा सच्चा है।" किन्तु वह कहता है, "ये तो बस पहले के लोगों की कहानियाँ है।"
तफ़्सीर:
और जिसने अपने माता-पिता से कहा : तुम्हारा नाश हो! क्या तुम दोनों मुझे डराते हो कि मैं अपनी मृत्यु के बाद अपनी क़ब्र से जीवित निकाला जाऊँगा, हालाँकि कई शताब्दियाँ बीत चुकी हैं, और लोग उनमें मरे हैं, परंतु उनमें से कोई भी जीवित नहीं उठाया गया है?! जबकि उसके माता-पिता अल्लाह से फ़रयाद कर रहे होते हैं कि उनके बेटे को ईमान की राह पर लगा दे और अपने बेटे से कहते हैं : तेरा सर्वनाश हो यदि तू पुनर्जीवन पर ईमान नहीं लाया। अतः उसपर ईमान ले आ। निश्चय पुनर्जीवन का अल्लाह का वादा सच है, जिसमें कोई संदेह नहीं। किंतु वह फिर से पुनर्जीवन का इनकार करते हुए कहता है : पुनर्जीवन के बारे में जो कुछ कहा जा रहा है, वह पहले लोगों की पुस्तकों और उनकी लिखी हुई बातों से नक़ल (कॉपी) किया गया है, अल्लाह से प्रमाणित नहीं है।
आयत 18
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ حَقَّ عَلَيْهِمُ ٱلْقَوْلُ فِىٓ أُمَمٍۢ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهِم مِّنَ ٱلْجِنِّ وَٱلْإِنسِ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ خَـٰسِرِينَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही वो लोग हैं
ٱلَّذِينَ
जो
حَقَّ
हक़ हो गई
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلْقَوْلُ
बात
فِىٓ
among
أُمَمٍۢ
उम्मतों में
قَدْ
तहक़ीक़
خَلَتْ
जो गुज़र चुकीं
مِن
before them
قَبْلِهِم
उनस पहल
مِّنَ
of
ٱلْجِنِّ
जिन्नों में से
وَٱلْإِنسِ ۖ
और इन्सानों में से
إِنَّهُمْ
बेशक वो
كَانُوا۟
थे वो
خَـٰسِرِينَ
ख़सारा पाने वाले
ऐसे ही लोग है जिनपर उन गिरोहों के साथ यातना की बात सत्यापित होकर रही जो जिन्नों और मनुष्यों में से उनसे पहले गुज़र चुके है। निश्चय ही वे घाटे में रहे
तफ़्सीर:
यही वे लोग हैं जिनके लिए यातना अनिवार्य हो गई, जिन्नों और मनुष्यों के उन समुदायों के साथ जो इनसे पहले थे। निश्चय वे घाटा उठाने वाले लोग थे। क्योंकि उन्होंने जहन्नम में प्रवेश करके खुद को तथा अपने परिवार को घाटे में डाल दिया।
आयत 19
وَلِكُلٍّۢ دَرَجَـٰتٌۭ مِّمَّا عَمِلُوا۟ ۖ وَلِيُوَفِّيَهُمْ أَعْمَـٰلَهُمْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
وَلِكُلٍّۢ
और हर एक के लिए
دَرَجَـٰتٌۭ
दर्जे हैं
مِّمَّا
उसमें से जो
عَمِلُوا۟ ۖ
उन्होंने अमल किए
وَلِيُوَفِّيَهُمْ
और ताकि वो पुरा-पूरा बदला दे उन्हें
أَعْمَـٰلَهُمْ
उनके आमाल का
وَهُمْ
और वो
لَا
will not be wronged
يُظْلَمُونَ
वो ज़ुल्म ना किए जाऐंगे
उनमें से प्रत्येक के दरजे उनके अपने किए हुए कर्मों के अनुसार होंगे (ताकि अल्लाह का वादा पूरा हो) और वह उन्हें उनके कर्मों का पूरा-पूरा बदला चुका दे और उनपर कदापि ज़ुल्म न होगा
तफ़्सीर:
और दोनों समूहों (जन्नत के समूह और जहन्नम के समूह) के लिए उनके कर्मों के अनुसार (अलग-अलग) दर्जे होंगे। चुनाँचे जन्नत वालों के दर्जे ऊँचे होंगे और जहन्नम वालों के दर्जे नीचे। और ताकि अल्लाह उन्हें उनके कर्मों का पूरा बदला दे। तथा क़ियामत के दिन उनकी नेकियों को घटाकर या उनके गुनाहों को बढ़ाकर उनपर अत्याचार नहीं किया जाएगा।
आयत 20
وَيَوْمَ يُعْرَضُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ عَلَى ٱلنَّارِ أَذْهَبْتُمْ طَيِّبَـٰتِكُمْ فِى حَيَاتِكُمُ ٱلدُّنْيَا وَٱسْتَمْتَعْتُم بِهَا فَٱلْيَوْمَ تُجْزَوْنَ عَذَابَ ٱلْهُونِ بِمَا كُنتُمْ تَسْتَكْبِرُونَ فِى ٱلْأَرْضِ بِغَيْرِ ٱلْحَقِّ وَبِمَا كُنتُمْ تَفْسُقُونَ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يُعْرَضُ
पेश किए जाऐंगे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
عَلَى
to
ٱلنَّارِ
आग पर
أَذْهَبْتُمْ
(कहा जाएगा) ले चुके तुम
طَيِّبَـٰتِكُمْ
अपनी नेअमतें
فِى
in
حَيَاتِكُمُ
अपनी ज़िन्दगी में
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
وَٱسْتَمْتَعْتُم
और फ़ायदा उठालिया तुमने
بِهَا
उनका
فَٱلْيَوْمَ
तो आज
تُجْزَوْنَ
तुम बदला दिए जाओगे
عَذَابَ
अज़ाब
ٱلْهُونِ
रुस्वाई की
بِمَا
बवजह उसके जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَسْتَكْبِرُونَ
तुम तकब्बुर करते
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
بِغَيْرِ
बग़ैर
ٱلْحَقِّ
हक़ के
وَبِمَا
और बवजह उसके जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَفْسُقُونَ
तुम नाफ़रमानी करते
और याद करो जिस दिन वे लोग जिन्होंने इनकार किया, आग के सामने पेश किए जाएँगे। (कहा जाएगा), "तुम अपने सांसारिक जीवन में अच्छी रुचिकर चीज़े नष्ट कर बैठे और उनका मज़ा ले चुके। अतः आज तुम्हे अपमानजनक यातना दी जाएगी, क्योंकि तुम धरती में बिना किसी हक़ के घमंड करते रहे और इसलिए कि तुम आज्ञा का उल्लंघन करते रहे।"
तफ़्सीर:
और जिस दिन अल्लाह का इनकार करने वालों और उसके रसूलों को झुठलाने वालों को आग के सामने लाया जाएगा, ताकि उन्हें उसमें यातना दी जाए और उन्हें डाँट-फटकार लगाते हुए उनसे कहा जाएगा : तुम अपनी अच्छी चीज़ें अपने सांसारिक जीवन में ले जा चुके और उसमें पाए जाने वाले सुखों का आनंद ले चुके। लेकिन आज के दिन तो तुम्हें धरती में नाहक़ अहंकार करने तथा कुफ़्र और पाप के द्वारा अल्लाह की आज्ञाकारिता से निकलने के कारण, अपमानजनक यातना दी जाएगी।
आज की ज़िंदगी में सबक़
वालिदैन के हुकूक और नेक औलाद की दुआ का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि माता-पिता की तकलीफ और मेहनत का एहसास रखना और उनके लिए दुआ करना औलाद का फर्ज़ है।
आयत 21
۞ وَٱذْكُرْ أَخَا عَادٍ إِذْ أَنذَرَ قَوْمَهُۥ بِٱلْأَحْقَافِ وَقَدْ خَلَتِ ٱلنُّذُرُ مِنۢ بَيْنِ يَدَيْهِ وَمِنْ خَلْفِهِۦٓ أَلَّا تَعْبُدُوٓا۟ إِلَّا ٱللَّهَ إِنِّىٓ أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍۢ
۞ وَٱذْكُرْ
और ज़िक्र कीजिए
أَخَا
भाई का
عَادٍ
आद के
إِذْ
जब
أَنذَرَ
उसने डराया
قَوْمَهُۥ
अपनी क़ौम को
بِٱلْأَحْقَافِ
अहक़ाफ़ में
وَقَدْ
और तहक़ीक़
خَلَتِ
गुज़र चुके
ٱلنُّذُرُ
कई डराने वाले
مِنۢ
before him
بَيْنِ
before him
يَدَيْهِ
उससे पहले
وَمِنْ
and after him
خَلْفِهِۦٓ
और उसके बाद
أَلَّا
कि ना
تَعْبُدُوٓا۟
तुम इबादत करो
إِلَّا
मगर
ٱللَّهَ
अल्लाह की
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَخَافُ
मैं डरता हूँ
عَلَيْكُمْ
तुम पर
عَذَابَ
अज़ाब से
يَوْمٍ
(of) a Day
عَظِيمٍۢ
एक बड़े दिन के
आद के भाई को याद करो, जबकि उसने अपनी क़ौम के लोगों को अहक़ाफ़ में सावधान किया, और उसके आगे और पीछे भी सावधान करनेवाले गुज़र चुके थे - कि, "अल्लाह के सिवा किसी की बन्दगी न करो। मुझे तुम्हारे बारे में एक बड़े दिन की यातना का भय है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आद समुदाय के नसबी भाई हूद (अलैहिस्सलाम) को याद करें, जब उन्होंने अपनी जाति के लोगों को उनपर अल्लाह की यातना उतरने से डराया। यह उस समय की बात है, जब वे अरब प्रायद्वीप के दक्षिण में स्थित 'अहक़ाफ़' नामी स्थान में अपने घरों में थे। जबकि हूद (अलैहिस्सलाम) से पहले और उनके बाद बहुत-से रसूल अपनी जातियों को सावधान करने वाले आ चुके थे। उन्होंने अपने समुदायों से कहा : केवल अल्लाह की इबादत करो। उसके साथ उसके अलावा की इबादत न करो। निःसंदेह मुझे (ऐ मेरी जाति के लोगो!) तुमपर एक बहुत बड़े दिन की यातना का भय है और वह क़ियामत का दिन है।
आयत 22
قَالُوٓا۟ أَجِئْتَنَا لِتَأْفِكَنَا عَنْ ءَالِهَتِنَا فَأْتِنَا بِمَا تَعِدُنَآ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
أَجِئْتَنَا
क्या आया है तू हमारे पास
لِتَأْفِكَنَا
ताकि तू फेरदे हमें
عَنْ
from
ءَالِهَتِنَا
हमारे इलाहों से
فَأْتِنَا
पस ले आ हमारे पास
بِمَا
जिसकी
تَعِدُنَآ
तू धमकी देता है हमें
إِن
अगर
كُنتَ
है तू
مِنَ
of
ٱلصَّـٰدِقِينَ
सच्चों में से
उन्होंने कहा, "क्या तू हमारे पास इसलिए आया है कि झूठ बोलकर हमको अपने उपास्यों से विमुख कर दे? अच्छा, तो हमपर ले आ, जिसकी तू हमें धमकी देता है, यदि तू सच्चा है।"
तफ़्सीर:
उनकी जाति ने उनसे कहा : क्या तुम हमारे पास हमें हमारे पूज्यों की उपासना से रोकने के लिए आए हो?! ऐसा हरगिज़ नहीं हो सकता। इसलिए अगर तुम अपने दावे में सच्चे हो, तो हमपर वह यातना ले आओ, जिसकी तुम हमें धमकी देते हो।
आयत 23
قَالَ إِنَّمَا ٱلْعِلْمُ عِندَ ٱللَّهِ وَأُبَلِّغُكُم مَّآ أُرْسِلْتُ بِهِۦ وَلَـٰكِنِّىٓ أَرَىٰكُمْ قَوْمًۭا تَجْهَلُونَ
قَالَ
उसने कहा
إِنَّمَا
बेशक
ٱلْعِلْمُ
इल्म
عِندَ
पास है
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَأُبَلِّغُكُم
और मैं पहुँचाता हूँ तुम्हें
مَّآ
वो जो
أُرْسِلْتُ
भेजा गया मैं
بِهِۦ
साथ उसके
وَلَـٰكِنِّىٓ
और लेकिन मैं
أَرَىٰكُمْ
मैं देखता हूँ तुम्हें
قَوْمًۭا
ऐसे लोग
تَجْهَلُونَ
तुम जिहालत बरतते हो
उसने कहा, "ज्ञान तो अल्लाह ही के पास है (कि वह कब यातना लाएगा) । और मैं तो तुम्हें वह संदेश पहुँचा रहा हूँ जो मुझे देकर भेजा गया है। किन्तु मैं तुम्हें देख रहा हूँ कि तुम अज्ञानता से काम ले रहे हो।"
तफ़्सीर:
हूद (अलैहिस्सलाम) ने कहा : यातना के समय को तो केवल अल्लाह ही जानता है। मुझे इसका कोई ज्ञान नहीं है। मैं तो केवल एक रसूल हूँ, तुम्हें वह संदेश पहुँचाता हूँ, जो मुझे देकर तुम्हारी ओर भेजा गया है। लेकिन मैं तुम लोगों को देखता हूँ कि तुम उस चीज़ से अनभिज्ञ हो जिसमें तुम्हारा लाभ है, इसलिए तुम उसे छोड़ देते हो, तथा उस चीज़ से भी (अनभिज्ञ हो) जिसमें तुम्हारी हानि है, इसलिए तुम उसे करते हो।
आयत 24
فَلَمَّا رَأَوْهُ عَارِضًۭا مُّسْتَقْبِلَ أَوْدِيَتِهِمْ قَالُوا۟ هَـٰذَا عَارِضٌۭ مُّمْطِرُنَا ۚ بَلْ هُوَ مَا ٱسْتَعْجَلْتُم بِهِۦ ۖ رِيحٌۭ فِيهَا عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
فَلَمَّا
तो जब
رَأَوْهُ
उन्होंने देखा उसे
عَارِضًۭا
एक बादल
مُّسْتَقْبِلَ
सामने आने वाला
أَوْدِيَتِهِمْ
उनकी वादियों के
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
هَـٰذَا
ये
عَارِضٌۭ
बादल
مُّمْطِرُنَا ۚ
मींह बरसाने वाला है हम पर
بَلْ
बल्कि
هُوَ
ये वो है
مَا
जो
ٱسْتَعْجَلْتُم
जल्दी मचा रहे थे तुम
بِهِۦ ۖ
उसकी
رِيحٌۭ
हवा है
فِيهَا
जिसमें
عَذَابٌ
अज़ाब है
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
फिर जब उन्होंने उसे बादल के रूप में देखा, जिसका रुख़ उनकी घाटियों की ओर था, तो वे कहने लगे, "यह बादल है जो हमपर बरसनेवाला है!' "नहीं, बल्कि यह तो वही चीज़ है जिसके लिए तुमने जल्दी मचा रखी थी। - यह वायु है जिसमें दुखद यातना है
तफ़्सीर:
फिर जब उनके पास वह यातना आ गई, जिसके लिए उन्होंने जल्दी मचा रखी थी, तो उन्होंने उसे आकाश के एक किनारे पर फैले हुए बादल के रूप में देखा, जो उनकी वादियों की ओर आ रहा था, सो कहने लगे : यह बादल है, जो हमपर बारिश बरसाने वाला है। हूद (अलैहिस्सलाम) ने उनसे कहा : मामला ऐसा नहीं है जैसा तुमने सोचा था कि वह बादल है जो तुम पर बरसने वाला है। बल्कि यह वह यातना है, जिसके लिए तुमने जल्दी मचा रखी थी। दरअसल, यह एक आँधी है, जिसमें दर्दनाक यातना है।
आयत 25
تُدَمِّرُ كُلَّ شَىْءٍۭ بِأَمْرِ رَبِّهَا فَأَصْبَحُوا۟ لَا يُرَىٰٓ إِلَّا مَسَـٰكِنُهُمْ ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْقَوْمَ ٱلْمُجْرِمِينَ
تُدَمِّرُ
वो तबाह कर देगी
كُلَّ
हर
شَىْءٍۭ
चीज़ को
بِأَمْرِ
हुक्म से
رَبِّهَا
अपने रब के
فَأَصْبَحُوا۟
फिर वो हो गए
لَا
not
يُرَىٰٓ
कि ना दिखाई देता था (कुछ भी)
إِلَّا
सिवाय
مَسَـٰكِنُهُمْ ۚ
उनके घरों के
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
نَجْزِى
हम बदला दिया करते हैं
ٱلْقَوْمَ
उन लोगों को
ٱلْمُجْرِمِينَ
जो मुजरिम हैं
हर चीज़ को अपने रब के आदेश से विनष्ट- कर देगी।" अन्ततः वे ऐसे हो गए कि उनके रहने की जगहों के सिवा कुछ नज़र न आता था। अपराधी लोगों को हम इसी तरह बदला देते है
तफ़्सीर:
वह जहाँ से गुज़रेगी, हर उस चीज़ को विनष्ट कर देगी, जिसे विनष्ट करने का अल्लाह ने उसे आदेश दिया होगा। चुनाँचे वे इस प्रकार नष्ट हो गए कि केवल उनके वे घर दिखाई देते थे जिनमें वे रहा करते थे, जो उनके वहाँ कभी आबाद होने का पता दे रहे थे। ऐसी ही दर्दनाक यातना हम उन अपराधियों को देते हैं जो अपने कुफ़्र और पाप पर अडिग रहते हैं।
आयत 26
وَلَقَدْ مَكَّنَّـٰهُمْ فِيمَآ إِن مَّكَّنَّـٰكُمْ فِيهِ وَجَعَلْنَا لَهُمْ سَمْعًۭا وَأَبْصَـٰرًۭا وَأَفْـِٔدَةًۭ فَمَآ أَغْنَىٰ عَنْهُمْ سَمْعُهُمْ وَلَآ أَبْصَـٰرُهُمْ وَلَآ أَفْـِٔدَتُهُم مِّن شَىْءٍ إِذْ كَانُوا۟ يَجْحَدُونَ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
مَكَّنَّـٰهُمْ
क़ुदरत दी हमने उन्हें
فِيمَآ
उसमें जो
إِن
नहीं
مَّكَّنَّـٰكُمْ
क़ुदरत दी थी हमने तुम्हें
فِيهِ
उसमें
وَجَعَلْنَا
और बनाए हमने
لَهُمْ
उनके लिए
سَمْعًۭا
कान
وَأَبْصَـٰرًۭا
और आँखें
وَأَفْـِٔدَةًۭ
और दिल
فَمَآ
तो ना
أَغْنَىٰ
काम आए
عَنْهُمْ
उन्हें
سَمْعُهُمْ
कान उनके
وَلَآ
और ना
أَبْصَـٰرُهُمْ
आँखें उनकी
وَلَآ
और ना
أَفْـِٔدَتُهُم
दिल उनके
مِّن
any
شَىْءٍ
कुछ भी
إِذْ
जब
كَانُوا۟
थे वो
يَجْحَدُونَ
वो इन्कार करते
بِـَٔايَـٰتِ
आयात का
ٱللَّهِ
अल्लाह की
وَحَاقَ
और घेर लिया
بِهِم
उन्हें
مَّا
उसने जो
كَانُوا۟
थे वो
بِهِۦ
उसका
يَسْتَهْزِءُونَ
वो मज़ाक़ उड़ाते
हमने उन्हें उन चीज़ों में जमाव और सामर्थ्य प्रदान की थी, जिनमें तुम्हें जमाव और सामर्थ्य नहीं प्रदान की। औऱ हमने उन्हें कान, आँखें और दिल दिए थे। किन्तु न तो उनके कान उनके कुछ काम आए औऱ न उनकी आँखे और न उनके दिल ही। क्योंकि वे अल्लाह की आयतों का इनकार करते थे और जिस चीज़ की वे हँसी उड़ाते थे, उसी ने उन्हें आ घेरा
तफ़्सीर:
और हमने हूद (अलैहिस्सलाम) की जाति को सशक्तीकरण के ऐसे साधन प्रदान किए थे, जो हमने तुम्हें नहीं दिए। तथा हमने उन्हें सुनने के लिए कान दिए, देखने के लिए आँखें दीं और समझने के लिए दिल दिए। लेकिन उनके कानों, उनकी आँखों और उनकी बुद्धि ने उन्हें कुछ भी लाभ नहीं दिया। चुनाँचे जब उनपर अल्लाह की यातना आई, तो ये उसे उनसे टाल नहीं सके। क्योंकि वे अल्लाह की आयतों का इनकार करते थे और उनपर वही यातना टूट पड़ी, जिसका वे मज़ाक़ उड़ाया करते थे, जिससे उनके नबी हूद (अलैहिस्सलाम) ने उन्हें डराया था।
आयत 27
وَلَقَدْ أَهْلَكْنَا مَا حَوْلَكُم مِّنَ ٱلْقُرَىٰ وَصَرَّفْنَا ٱلْـَٔايَـٰتِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَهْلَكْنَا
हलाक कर दिया हमने
مَا
जो
حَوْلَكُم
तुम्हारे इर्द-गिर्द है
مِّنَ
of
ٱلْقُرَىٰ
बस्तियों में से
وَصَرَّفْنَا
और फेर-फेर कर लाए हैं हम
ٱلْـَٔايَـٰتِ
आयात को
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَرْجِعُونَ
वो लौट आऐं
हम तुम्हारे आस-पास की बस्तियों को विनष्ट कर चुके हैं, हालाँकि हमने तरह-तरह से आयते पेश की थीं, ताकि वे रुजू करें
तफ़्सीर:
निश्चय हमने (ऐ मक्का वालो!) तुम्हारे आस-पास की बस्तियों को नष्ट कर दिया। चुनाँचे हमने आद, समूद, लूत (अलैहिस्सलाम) की जाति तथा मदयन वालों को नष्ट कर दिया और हमने उनके लिए विविध प्रकार के प्रमाण और तर्क प्रस्तुत किए; इस आशा में कि वे अपने कुफ़्र से बाज़ आ जाएँ।
आयत 28
فَلَوْلَا نَصَرَهُمُ ٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِ ٱللَّهِ قُرْبَانًا ءَالِهَةًۢ ۖ بَلْ ضَلُّوا۟ عَنْهُمْ ۚ وَذَٰلِكَ إِفْكُهُمْ وَمَا كَانُوا۟ يَفْتَرُونَ
فَلَوْلَا
तो क्यों ना
نَصَرَهُمُ
मदद की उनकी
ٱلَّذِينَ
उन्होंने जिनको
ٱتَّخَذُوا۟
उन्होंने बनाया
مِن
besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
قُرْبَانًا
तक़र्रूब के लिए
ءَالِهَةًۢ ۖ
कुछ इलाह
بَلْ
बल्कि
ضَلُّوا۟
वो गुम हो गए
عَنْهُمْ ۚ
उनसे
وَذَٰلِكَ
और ये
إِفْكُهُمْ
झूठ था उनका
وَمَا
और जो
كَانُوا۟
थे वो
يَفْتَرُونَ
वो गढ़ा करते
फिर क्यों न उन बस्तियों ने उसकी सहायता की जिनको उन्होंने अपने और अल्लाह का बीच माध्यम ठहराकर सामीप्य प्राप्त करने के लिए उपास्य बना लिया था? बल्कि वे उनसे गुम हो गए, और यह था उनका मिथ्यारोपण और वह कुछ जो वे घड़ते थे
तफ़्सीर:
फिर उन मूर्तियों ने उनकी सहायता क्यों न की, जिन्हें उन्होंने अल्लाह के अलावा पूज्य बना लिया था, जिनकी वे पूजा और बलिदान के माध्यम से निकटता प्राप्त करते थे?! उन्होंने उनकी बिल्कुल भी मदद नहीं की। बल्कि वे उनसे उस समय लुप्त हो गईं जब उन्हें उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी। यह उनका झूठ और मिथ्यारोपण है, जिसकी वे अपने आपको आशा दिला रहे थे कि ये मूर्तियाँ उन्हें लाभ पहुँचाएँगी और अल्लाह के पास उनके लिए सिफ़ारिश करेंगी।
आयत 29
وَإِذْ صَرَفْنَآ إِلَيْكَ نَفَرًۭا مِّنَ ٱلْجِنِّ يَسْتَمِعُونَ ٱلْقُرْءَانَ فَلَمَّا حَضَرُوهُ قَالُوٓا۟ أَنصِتُوا۟ ۖ فَلَمَّا قُضِىَ وَلَّوْا۟ إِلَىٰ قَوْمِهِم مُّنذِرِينَ
وَإِذْ
और जब
صَرَفْنَآ
फेर लाए हम
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
نَفَرًۭا
एक गिरोह
مِّنَ
of
ٱلْجِنِّ
जिन्नों में से
يَسْتَمِعُونَ
जो ग़ौर से सुन रहे थे
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरआन
فَلَمَّا
फिर जब
حَضَرُوهُ
वो हाज़िर हुए उसके पास
قَالُوٓا۟
वो कहने लगे
أَنصِتُوا۟ ۖ
चुप हो जाओ
فَلَمَّا
तो जब
قُضِىَ
वो पूरा कर दिया गया
وَلَّوْا۟
वो वापस लौटे
إِلَىٰ
to
قَوْمِهِم
तरफ़ अपनी क़ौम के
مُّنذِرِينَ
डराने वाले बन कर
और याद करो (ऐ नबी) जब हमने कुछ जिन्नों को तुम्हारी ओर फेर दिया जो क़ुरआन सुनने लगे थे, तो जब वे वहाँ पहुँचे तो कहने लगे, "चुप हो जाओ!" फिर जब वह (क़ुरआन का पाठ) पूरा हुआ तो वे अपनी क़ौम की ओर सावधान करनेवाले होकर लौटे
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) उस समय को याद करें, जब हमने आपकी ओर जिन्नों का एक समूह भेजा कि वे आपपर उतरने वाले क़ुरआन को सुनें। जब वे क़ुरआन सुनने के लिए आए, तो उन्होंने एक-दूसरे से कहा : खामोश हो जाओ, ताकि हम इसे ठीक से सुन सकें। फिर जब रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने क़ुरआन पढ़ना समाप्त किया, तो वे अपनी जाति के लोगों के पास लौटे, उन्हें डराते थे कि यदि वे इस क़ुरआन पर ईमान न लाए, तो उन्हें अल्लाह की यातना का सामना करना पड़ेगा।
आयत 30
قَالُوا۟ يَـٰقَوْمَنَآ إِنَّا سَمِعْنَا كِتَـٰبًا أُنزِلَ مِنۢ بَعْدِ مُوسَىٰ مُصَدِّقًۭا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ يَهْدِىٓ إِلَى ٱلْحَقِّ وَإِلَىٰ طَرِيقٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
يَـٰقَوْمَنَآ
ऐ हमारी क़ौम
إِنَّا
बेशक हम
سَمِعْنَا
सुना हमने
كِتَـٰبًا
एक किताब को
أُنزِلَ
जो नाज़िल की गई
مِنۢ
after
بَعْدِ
बाद
مُوسَىٰ
मूसा के
مُصَدِّقًۭا
तस्दीक़ करने वाली है
لِّمَا
उसकी जो
بَيْنَ
(was) before it
يَدَيْهِ
उससे पहले है
يَهْدِىٓ
वो रहनुमाई करती है
إِلَى
to
ٱلْحَقِّ
तरफ़ हक़ के
وَإِلَىٰ
and to
طَرِيقٍۢ
और तरफ़ रास्ते
مُّسْتَقِيمٍۢ
सीधे के
उन्होंने कहा, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! हमने एक किताब सुनी है, जो मूसा के पश्चात अवतरित की गई है। उसकी पुष्टि में हैं जो उससे पहले से मौजूद है, सत्य की ओर और सीधे मार्ग की ओर मार्गदर्शन करती है
तफ़्सीर:
उन्होंने अपनी जाति से कहा : ऐ मेरी जाति के लोगो! हमने एक किताब सुनी है, जिसे अल्लाह ने मूसा (अलैहिस्सलाम) के बाद उतारा है। वह अल्लाह की ओर से अपने से पहले उतरने वाली किताबों की पुष्टि करती है। यह किताब जो हमने सुनी है, सत्य की ओर मार्गदर्शन करती है और सीधा मार्ग दिखाती है और वह इस्लाम का मार्ग है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
आद कौम की तबाही और जिन्नों के कुरआन सुनने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कुरआन का असर सिर्फ इंसानों तक महदूद नहीं, यह हर सुनने वाले दिल को मुतास्सिर करता है।
आयत 31
يَـٰقَوْمَنَآ أَجِيبُوا۟ دَاعِىَ ٱللَّهِ وَءَامِنُوا۟ بِهِۦ يَغْفِرْ لَكُم مِّن ذُنُوبِكُمْ وَيُجِرْكُم مِّنْ عَذَابٍ أَلِيمٍۢ
يَـٰقَوْمَنَآ
ऐ हमारी क़ौम
أَجِيبُوا۟
जवाब दो
دَاعِىَ
(to the) caller
ٱللَّهِ
अल्लाह के दाई को
وَءَامِنُوا۟
और ईमान ले आओ
بِهِۦ
उस पर
يَغْفِرْ
वो बख़्श देगा
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّن
of
ذُنُوبِكُمْ
तुम्हारे गुनाहों को
وَيُجِرْكُم
और वो पनाह देगा तुम्हें
مِّنْ
from
عَذَابٍ
a punishment
أَلِيمٍۢ
दर्दनाक अज़ाब से
ऐ हमारी क़ौम के लोगो! अल्लाह के आमंत्रणकर्त्ता का आमंत्रण स्वीकार करो और उसपर ईमान लाओ। अल्लाह तुम्हें क्षमा करके गुनाहों से तुम्हें पाक कर देगा और दुखद यातना से तुम्हें बचाएगा
तफ़्सीर:
ऐ मेरी जाति के लोगो! मुहम्मद ने तुम्हें जिस सत्य की ओर बुलाया है, उसे स्वीकार कर लो और इस बात पर ईमान ले आओ कि वह अपने पालनहार की ओर से एक रसूल हैं, अल्लाह तुम्हारे पापों को क्षमा कर देगा और तुम्हें उस दर्दनाक यातना से बचा लेगा, जो तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है, यदि तुमने उस सत्य को स्वीकार न किया जिसकी ओर उन्होंने तुम्हें बुलाया है और इस बात पर ईमान न लाए कि वह अपने पालनहार की ओर से रसूल बनाकर भेजे गए हैं।
आयत 32
وَمَن لَّا يُجِبْ دَاعِىَ ٱللَّهِ فَلَيْسَ بِمُعْجِزٍۢ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَيْسَ لَهُۥ مِن دُونِهِۦٓ أَوْلِيَآءُ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ فِى ضَلَـٰلٍۢ مُّبِينٍ
وَمَن
और जो
لَّا
(does) not
يُجِبْ
ना जवाब दे
دَاعِىَ
(to the) caller
ٱللَّهِ
अल्लाह के दाई को
فَلَيْسَ
तो नहीं है वो
بِمُعْجِزٍۢ
आजिज़ करने वाला
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَلَيْسَ
और नहीं
لَهُۥ
उसके लिए
مِن
besides Him
دُونِهِۦٓ
उसके सिवा
أَوْلِيَآءُ ۚ
कोई मददगार
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
فِى
(are) in
ضَلَـٰلٍۢ
गुमराही में
مُّبِينٍ
खुली
और जो कोई अल्लाह के आमंत्रणकर्त्ता का आमंत्रण स्वीकार नहीं करेगा तो वह धरती में क़ाबू से बच निकलनेवाला नहीं है और न अल्लाह से हटकर उसके संरक्षक होंगे। ऐसे ही लोग खुली गुमराही में हैं।"
तफ़्सीर:
और जो उस सत्य को नहीं मानेगा, जिसकी ओर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बुला रहे हैं, वह धरती में कहीं भागकर अल्लाह के वश से निकल नहीं सकता। और अल्लाह के सिवा उसके कोई सहायक नहीं होंगे, जो उसे यातना से बचा सकें। ये लोग स्पष्ट रूप से सत्य से भटके हुए हैं।
आयत 33
أَوَلَمْ يَرَوْا۟ أَنَّ ٱللَّهَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَلَمْ يَعْىَ بِخَلْقِهِنَّ بِقَـٰدِرٍ عَلَىٰٓ أَن يُحْـِۧىَ ٱلْمَوْتَىٰ ۚ بَلَىٰٓ إِنَّهُۥ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَرَوْا۟
उन्होंने देखा
أَنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
ٱلَّذِى
वो है जिसने
خَلَقَ
पैदा किया
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
وَلَمْ
और नहीं
يَعْىَ
वो थका
بِخَلْقِهِنَّ
उनको पैदा करने से
بِقَـٰدِرٍ
क़ादिर है
عَلَىٰٓ
इस पर
أَن
कि
يُحْـِۧىَ
वो ज़िन्दा करे
ٱلْمَوْتَىٰ ۚ
मुर्दों को
بَلَىٰٓ
क्यों नहीं
إِنَّهُۥ
बेशक वो
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌۭ
ख़ूब क़ुदरत रखने वाला है
क्या उन्होंने देखा नहीं कि जिस अल्लाह ने आकाशों और धरती को पैदा किया और उनके पैदा करने से थका नहीं; क्या ऐसा नहीं कि वह मुर्दों को जीवित कर दे? क्यों नहीं, निश्चय ही उसे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
क्या पुनर्जीवन को झुठलाने वाले इन मुश्रिकों ने यह नहीं देखा कि वह अल्लाह जिसने आकाशों और धरती की रचना की और उनकी भव्यता और विशालता के बावजूद उन्हें बनाने में अक्षम नहीं हुआ, वह मुर्दों को हिसाब-किताब और बदले के लिए जीवित करने में सक्षम है?! क्यों नहीं! निश्चित रूप से वह उन्हें पुनर्जीवित करने में सक्षम है, क्योंकि वह महिमावान हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है। इसलिए वह मृतकों को पुनर्जीवित करने में असमर्थ नहीं हो सकता है।
आयत 34
وَيَوْمَ يُعْرَضُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ عَلَى ٱلنَّارِ أَلَيْسَ هَـٰذَا بِٱلْحَقِّ ۖ قَالُوا۟ بَلَىٰ وَرَبِّنَا ۚ قَالَ فَذُوقُوا۟ ٱلْعَذَابَ بِمَا كُنتُمْ تَكْفُرُونَ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يُعْرَضُ
पेश किए जाऐंगे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
عَلَى
to
ٱلنَّارِ
आग पर
أَلَيْسَ
क्या नहीं है
هَـٰذَا
ये
بِٱلْحَقِّ ۖ
हक़
قَالُوا۟
वो कहेंगे
بَلَىٰ
क्यों नहीं
وَرَبِّنَا ۚ
क़सम हमारे रब की
قَالَ
वो फ़रमायगा
فَذُوقُوا۟
पस चखो
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब
بِمَا
बवजह उसक जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَكْفُرُونَ
तुम कुफ़्र करते
और याद करो जिस दिन वे लोग, जिन्होंने इनकार किया, आग के सामने पेश किए जाएँगे, (कहा जाएगा) "क्या यह सत्य नहीं है?" वे कहेंगे, "नहीं, हमारे रब की क़सम!" वह कहेगा, "तो अब यातना का मज़ा चखो, उउस इनकार के बदले में जो तुम करते रहे थे।"
तफ़्सीर:
और जिस दिन अल्लाह और उसके रसूल का इनकार करने वालों को आग के सामने लाया जाएगा, ताकि उन्हें उसकी यातना में डाला जाए और उन्हें फटकार लगाते हुए कहा जाएगा : क्या यह यातना जो तुम देख रहे हो, सत्य नहीं है?! या यह झूठ है जैसा कि तुम दुनिया में कहा करते थे?! वे कहेंगे : क्यों नहीं, हमारे पालनहार की क़सम! यह निश्चय सत्य है। तो उनसे कहा जाएगा : अल्लाह का इनकार करने के कारण यातना का स्वाद चखो।
आयत 35
فَٱصْبِرْ كَمَا صَبَرَ أُو۟لُوا۟ ٱلْعَزْمِ مِنَ ٱلرُّسُلِ وَلَا تَسْتَعْجِل لَّهُمْ ۚ كَأَنَّهُمْ يَوْمَ يَرَوْنَ مَا يُوعَدُونَ لَمْ يَلْبَثُوٓا۟ إِلَّا سَاعَةًۭ مِّن نَّهَارٍۭ ۚ بَلَـٰغٌۭ ۚ فَهَلْ يُهْلَكُ إِلَّا ٱلْقَوْمُ ٱلْفَـٰسِقُونَ
فَٱصْبِرْ
पस सब्र कीजिए
كَمَا
जैसा कि
صَبَرَ
सब्र किया
أُو۟لُوا۟
those of determination
ٱلْعَزْمِ
उलुल अज़म /हिम्मत वालों ने
مِنَ
of
ٱلرُّسُلِ
रसूलों में से
وَلَا
और ना
تَسْتَعْجِل
आप जल्दी तलब कीजिए
لَّهُمْ ۚ
उनके लिए
كَأَنَّهُمْ
गोया कि वो
يَوْمَ
जिस दिन
يَرَوْنَ
वो देखेंगे
مَا
जो
يُوعَدُونَ
वो वादा किए जाते हैं
لَمْ
नहीं
يَلْبَثُوٓا۟
वो ठहरे
إِلَّا
मगर
سَاعَةًۭ
एक घड़ी
مِّن
of
نَّهَارٍۭ ۚ
दिन की
بَلَـٰغٌۭ ۚ
पहुँचा देना है
فَهَلْ
तो नहीं
يُهْلَكُ
हलाक किया जाएगा
إِلَّا
मगर
ٱلْقَوْمُ
उन लोगों को
ٱلْفَـٰسِقُونَ
जो फ़ासिक़ हैं
अतः धैर्य से काम लो, जिस प्रकार संकल्पवान रसूलों ने धैर्य से काम लिया। और उनके लिए जल्दी न करो। जिस दिन वे लोग उस चीज़ को देख लेंगे जिसका उनसे वादा किया जाता है, तो वे महसूस करेंगे कि जैसे वे बस दिन की एक घड़ी भर ही ठहरे थे। यह (संदेश) साफ़-साफ़ पहुँचा देना है। अब क्या अवज्ञाकारी लोगों के अतिरिक्त कोई और विनष्ट होगा?
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप अपनी जाति के लोगों के आपको झुठलाने पर उसी तरह धैर्य रखें, जिस तरह दृढ़ संकल्प वाले रसूलों : नूह, इबराहीम, मूसा और ईसा अलैहिमुस्सलाम ने धैर्य रखा। तथा उनके लिए यातना की जल्दी न करें। आपकी जाति के ये झुठलाने वाले लोग जब आख़िरत में वह यातना देख लेंगे, जिसका उनसे वादा किया जाता है, तो उन्हें अपनी यातना की दीर्घता के कारण ऐसा लगेगा कि वे दुनिया में दिन के एक घंटे से अधिक नहीं रहे। मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतरने वाला यह क़ुरआन तो संदेश का पहुँचा देना है और (यह) इनसानों एवं जिन्नों के लिए काफ़ी है। (अब) यातना से केवल वही लोग नष्ट किए जाएँगे, जो कुफ़्र और पापों के द्वारा अल्लाह की आज्ञाकारिता से निकल जाने वाले हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सब्र की ताकीद और रसूलों के सब्र की मिसाल के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि हक की राह में सब्र करना नबियों की सुन्नत है, जल्दबाज़ी से बचना चाहिए।
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