सूरह मुहम्मद سورة محمد
मदनी 38 आयतें
नाम का मतलब
मुहम्मद ﷺ (नबी ﷺ का नाम, जिनका ज़िक्र इस सूरह में है)
पृष्ठभूमि
सूरह मुहम्मद (जिसे सूरह अल-क़िताल भी कहा जाता है) में जिहाद के अहकाम, कुफ्फार से मुकाबले और मुनाफिकों के रवैये का ज़िक्र है।
फ़ज़ीलत / सार
यह उन चंद सूरतों में से है जिनमें नबी ﷺ का नाम मुबारक सीधे सूरह के नाम के तौर पर आया है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَصَدُّوا۟ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ أَضَلَّ أَعْمَـٰلَهُمْ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
وَصَدُّوا۟
और उन्होंने रोका
عَن
from
سَبِيلِ
(the) way of Allah
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते से
أَضَلَّ
उसने ज़ाए कर दिए
أَعْمَـٰلَهُمْ
आमाल उनके
जिन लोगों ने इनकार किया और अल्लाह के मार्ग से रोका उनके कर्म उसने अकारथ कर दिए
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने अल्लाह का इनकार किया और लोगों को अल्लाह के धर्म से रोका, अल्लाह ने उनके कर्मों को व्यर्थ कर दिया।
आयत 2
وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ وَءَامَنُوا۟ بِمَا نُزِّلَ عَلَىٰ مُحَمَّدٍۢ وَهُوَ ٱلْحَقُّ مِن رَّبِّهِمْ ۙ كَفَّرَ عَنْهُمْ سَيِّـَٔاتِهِمْ وَأَصْلَحَ بَالَهُمْ
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
وَءَامَنُوا۟
और वो ईमान लाए
بِمَا
उस पर जो
نُزِّلَ
नाज़िल किया गया
عَلَىٰ
to
مُحَمَّدٍۢ
मुहम्मद पर
وَهُوَ
और वो ही
ٱلْحَقُّ
हक़ है
مِن
from
رَّبِّهِمْ ۙ
उनके रब की तरफ़ से
كَفَّرَ
उसने दूर कर दीं
عَنْهُمْ
उनसे
سَيِّـَٔاتِهِمْ
बुराइयाँ उनकी
وَأَصْلَحَ
और उसने दुरुस्त कर दिया
بَالَهُمْ
हाल उनका
रहे वे लोग जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए और उस चीज़ पर ईमान लाए जो मुहम्मद पर अवतरित किया गया - और वही सत्य है उनके रब की ओर से - उसने उसकी बुराइयाँ उनसे दूर कर दीं और उनका हाल ठीक कर दिया
तफ़्सीर:
और जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए और अच्छे कार्य किए और उसपर ईमान लाए, जो अल्लाह ने अपने रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर अवतरित किया है (और वही उनके पालनहार की ओर से सत्य है), अल्लाह ने उनके पापों को मिटा दिया, चुनाँचे वह उनपर उनकी पकड़ नहीं करेगा और उनके सांसारिक और आख़िरत के मामलों को ठीक कर दिया।
आयत 3
ذَٰلِكَ بِأَنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ ٱتَّبَعُوا۟ ٱلْبَـٰطِلَ وَأَنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱتَّبَعُوا۟ ٱلْحَقَّ مِن رَّبِّهِمْ ۚ كَذَٰلِكَ يَضْرِبُ ٱللَّهُ لِلنَّاسِ أَمْثَـٰلَهُمْ
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّ
बवजह इसके कि
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
ٱتَّبَعُوا۟
उन्होंने पैरवी की
ٱلْبَـٰطِلَ
बातिल की
وَأَنَّ
और ये कि
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
ٱتَّبَعُوا۟
उन्होंने पैरवी की
ٱلْحَقَّ
हक़ की
مِن
from
رَّبِّهِمْ ۚ
अपने रब की तरफ़ से
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يَضْرِبُ
बयान करता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
أَمْثَـٰلَهُمْ
मिसालें उनकी
यह इसलिए कि जिन लोगों ने इनकार किया उन्होंने असत्य का अनुसरण किया और यह कि जो लोग ईमान लाए उन्होंने सत्य का अनुसरण किया, जो उनके रब की ओर से है। इस प्रकार अल्लाह लोगों के लिए उनकी मिसालें बयान करता है
तफ़्सीर:
दोनों पक्षों के लिए यह उल्लिखित बदला इस कारण है कि अल्लाह का इनकार करने वालों ने असत्य का अनुसरण किया और अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रखने वालों ने अपने रब की ओर से सत्य का अनुसरण किया। अतः दोनों के प्रयासों में अंतर के कारण उनका बदला अलग-अलग था। जिस तरह अल्लाह ने दोनों पक्षों : मोमिनों के पक्ष और काफ़िरों के पक्ष के बारे में अपना निर्णय स्पष्ट किया, उसी तरह अल्लाह लोगों के लिए उनकी मिसालें बयान करता है, इसलिए हर एक को उसके सदृश से मिलाता है।
आयत 4
فَإِذَا لَقِيتُمُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ فَضَرْبَ ٱلرِّقَابِ حَتَّىٰٓ إِذَآ أَثْخَنتُمُوهُمْ فَشُدُّوا۟ ٱلْوَثَاقَ فَإِمَّا مَنًّۢا بَعْدُ وَإِمَّا فِدَآءً حَتَّىٰ تَضَعَ ٱلْحَرْبُ أَوْزَارَهَا ۚ ذَٰلِكَ وَلَوْ يَشَآءُ ٱللَّهُ لَٱنتَصَرَ مِنْهُمْ وَلَـٰكِن لِّيَبْلُوَا۟ بَعْضَكُم بِبَعْضٍۢ ۗ وَٱلَّذِينَ قُتِلُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ فَلَن يُضِلَّ أَعْمَـٰلَهُمْ
فَإِذَا
फिर जब
لَقِيتُمُ
मिलो तुम
ٱلَّذِينَ
उनसे जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
فَضَرْبَ
तो मारना है
ٱلرِّقَابِ
गर्दनों का
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَآ
जब
أَثْخَنتُمُوهُمْ
ख़ूब ख़ून रेज़ी कर चुको तुम उनकी
فَشُدُّوا۟
फिर मज़बूत बाँधो
ٱلْوَثَاقَ
बन्धन
فَإِمَّا
फिर ख़्वाह
مَنًّۢا
एहसान करो
بَعْدُ
उसके बाद
وَإِمَّا
और ख़्वाह
فِدَآءً
फ़िदया लो
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
تَضَعَ
रख दे
ٱلْحَرْبُ
जंग
أَوْزَارَهَا ۚ
हथियार उपने
ذَٰلِكَ
ये है (हुक्म)
وَلَوْ
और अगर
يَشَآءُ
चाहता
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَٱنتَصَرَ
अलबत्ता वो बदला ले लेता
مِنْهُمْ
उनसे
وَلَـٰكِن
और लेकिन
لِّيَبْلُوَا۟
ताकि वो आज़माए
بَعْضَكُم
तुम्हारे बाज़ को
بِبَعْضٍۢ ۗ
साथ बाज़ के
وَٱلَّذِينَ
और वो लोग जो
قُتِلُوا۟
मारे गए
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way of Allah
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
فَلَن
तो हरगिज़ ना
يُضِلَّ
वो ज़ाया करेगा
أَعْمَـٰلَهُمْ
आमाल उनके
अतः जब इनकार करनेवालो से तुम्हारी मुठभेड़ हो तो (उनकी) गरदनें मारना है, यहाँ तक कि जब उन्हें अच्छी तरह कुचल दो तो बन्धनों में जकड़ो, फिर बाद में या तो एहसान करो या फ़िदया (अर्थ-दंड) का मामला करो, यहाँ तक कि युद्ध अपने बोझ उतारकर रख दे। यह भली-भाँति समझ लो, यदि अल्लाह चाहे तो स्वयं उनसे निपट ले। किन्तु (उसने या आदेश इसलिए दिया) ताकि तुम्हारी एक-दूसरे की परीक्षा ले। और जो लोग अल्लाह के मार्ग में मारे जाते है उनके कर्म वह कदापि अकारथ न करेगा
तफ़्सीर:
अतः जब (ऐ ईमान वालो!) तुम युद्धरत काफिरों से मिलो, तो अपनी तलवारों से उनकी गरदनें उड़ाओ और जब तक उन्हें अधिक से अधिक संख्या में क़त्ल करके उनकी शक्ति तोड़ न दो, उनसे लड़ाई जारी रखो। जब उनमें से बहुत से लोगों को क़त्ल कर चुको, तो कैदियों के बंधनों को कस लो। फिर उन्हें क़ैद करने के बाद हित की अपेक्षा के अनुसार तुम्हारे पास यह विकल्प है कि : उनपर उपकार करते हुए कुछ लिए बिना ही उन्हें रिहा कर दो, या उन्हें पैसे लेकर या किसी अन्य चीज़ के बदले में छोड़ दो। उनसे तब तक लड़ते रहो और उन्हें बंदी बनाते रहो, जब तक कि काफ़िरों के इस्लाम लाने या उनकी संधि के साथ युद्ध समाप्त न हो जाए। यह उपर्युक्त काफ़िरों द्वारा मोमिनों का परीक्षण, दिनों का परिवर्तन और उनमें से कुछ की दूसरों पर विजय, अल्लाह का हुक्म (फैसला) है। यदि अल्लाह बिना लड़ाई के काफ़िरों से बदला लेना चाहे, तो वह अवश्य उनसे बदला ले ले। लेकिन अल्लाह ने तुम्हें एक-दूसरे के द्वारा आज़माने के लिए जिहाद का कानून बनाया है। चुनाँचे वह उन लोगों की परीक्षा लेता है जो ईमान वालों में से लड़ते हैं और जो नहीं लड़ते हैं, तथा काफ़िर की मोमिन के द्वारा परीक्षा लेता है। क्योंकि यदि उसने किसी ईमान वाले को क़त्ल कर दिया, तो ईमान वाला जन्नत में जाएगा, लेकिन अगर किसी ईमान वाले ने उसे मार दिया, तो वह जहन्नम में जाएगा। और जो लोग अल्लाह के रास्ते में मारे गए, तो अल्लाह उनके कर्मों को कदापि व्यर्थ नहीं करेगा।
आयत 5
سَيَهْدِيهِمْ وَيُصْلِحُ بَالَهُمْ
سَيَهْدِيهِمْ
ज़रूर वो रहनुमाई करेगा उनकी
وَيُصْلِحُ
और वो दुरूस्त कर देगा
بَالَهُمْ
हाल उनके
वह उनका मार्गदर्शन करेगा और उनका हाल ठीक कर देगा
तफ़्सीर:
वह उन्हें उनके सांसारिक जीवन में सच्चाई का पालन करने की तौफ़ीक़ देगा और उनकी स्थिति सुधार देगा।
आयत 6
وَيُدْخِلُهُمُ ٱلْجَنَّةَ عَرَّفَهَا لَهُمْ
وَيُدْخِلُهُمُ
और वो दाख़िल करेगा उन्हें
ٱلْجَنَّةَ
उस जन्नत में
عَرَّفَهَا
उसने पहचान करा दी जिसकी
لَهُمْ
उनको
और उन्हें जन्नत में दाख़िल करेगा, जिससे वह उन्हें परिचित करा चुका है
तफ़्सीर:
वह उन्हें क़ियामत के दिन जन्नत में दाख़िल करेगा, जिससे उसने उन्हें दुनिया में उसके विवरण के साथ परिचित करा दिया है और वे उसे पहचान गए हैं, तथा उसने उन्हें आखिरत में उसके अंदर उनके ठिकानों की पहचान करा दी है।
आयत 7
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِن تَنصُرُوا۟ ٱللَّهَ يَنصُرْكُمْ وَيُثَبِّتْ أَقْدَامَكُمْ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
إِن
अगर
تَنصُرُوا۟
तुम मदद करोगे
ٱللَّهَ
अल्लाह की
يَنصُرْكُمْ
वो मदद करेगा तुम्हारी
وَيُثَبِّتْ
और वो जमा देगा
أَقْدَامَكُمْ
तुम्हारे क़दमों को
ऐ लोगों, जो ईमान लाए हो, यदि तुम अल्लाह की सहायता करोगे तो वह तुम्हारी सहायता करेगा और तुम्हारे क़दम जमा देगा
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने वालो और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो! यदि तुम अल्लाह की, उसके नबी और उसके धर्म की मदद करके और काफ़िरों से लड़ाई करके, मदद करोगे, तो अल्लाह तुम्हें उनपर विजय प्रदान करके तुम्हारी मदद करेगा और युद्ध में उनसे मुठभेड़ के समय तुम्हारे क़दम जमा देगा।
आयत 8
وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ فَتَعْسًۭا لَّهُمْ وَأَضَلَّ أَعْمَـٰلَهُمْ
وَٱلَّذِينَ
और वो लोग जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
فَتَعْسًۭا
पस तबाही है
لَّهُمْ
उनके लिए
وَأَضَلَّ
और उसने ज़ाया कर दिए
أَعْمَـٰلَهُمْ
आमाल उनके
रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया, तो उनके लिए तबाही है। और उनके कर्मों को अल्लाह ने अकारथ कर दिया
तफ़्सीर:
और जिन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया, उनके लिए नुकसान और विनाश है और अल्लाह ने उनके कर्मों के प्रतिफल को नष्ट कर दिया।
आयत 9
ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَرِهُوا۟ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ فَأَحْبَطَ أَعْمَـٰلَهُمْ
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّهُمْ
बवजह उसके कि वो
كَرِهُوا۟
उन्होंने नापसंद किया
مَآ
जो
أَنزَلَ
नाज़िल किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
فَأَحْبَطَ
तो उसने बरबाद कर दिए
أَعْمَـٰلَهُمْ
आमाल उनके
यह इसलिए कि उन्होंने उस चीज़ को नापसन्द किया जिसे अल्लाह ने अवतरित किया, तो उसने उनके कर्म अकारथ कर दिए
तफ़्सीर:
उन्हें यह सज़ा इस कारण मिली कि उन्होंने उस क़ुरआन को नापसंद किया, जो अल्लाह ने अपने रसूल पर उतारा, सिर्फ इस कारण कि उसमें अल्लाह की तौहीद (एकेश्वरवाद) की शिक्षा है। तो अल्लाह ने उनके कार्यों को अकारथ कर दिया। इसलिए वे दुनिया और आखिरत दोनों जगह घाटे में रहे।
आयत 10
۞ أَفَلَمْ يَسِيرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ فَيَنظُرُوا۟ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ دَمَّرَ ٱللَّهُ عَلَيْهِمْ ۖ وَلِلْكَـٰفِرِينَ أَمْثَـٰلُهَا
۞ أَفَلَمْ
क्या फिर नहीं
يَسِيرُوا۟
वो चले फिरे
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
فَيَنظُرُوا۟
तो वो देखते
كَيْفَ
किस तरह
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अंजाम
ٱلَّذِينَ
उन लोगों का जो
مِن
before them
قَبْلِهِمْ ۚ
उनसे पहले थे
دَمَّرَ
हलाकत डाली
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَيْهِمْ ۖ
उन पर
وَلِلْكَـٰفِرِينَ
और काफ़िरों के लिए
أَمْثَـٰلُهَا
उस जैसी (सज़ाऐं )हैं
क्या वे धरती में चले-फिरे नहीं कि देखते कि उन लोगों का कैसा परिणाम हुआ जो उनसे पहले गुज़र चुके है? अल्लाह ने उन्हें तहस-नहस कर दिया और इनकार करनेवालों के लिए ऐसे ही मामले होने है
तफ़्सीर:
क्या ये झुठलाने वाले लोग धरती में चले-फिरे नहीं, ताकि वे सोच-विचार करते कि उनसे पहले झुठलाने वाले लोगों का अंत कैसा रहा? वास्तव में, वह एक दर्दनाक अंत था। अल्लाह ने उनके घरों को उनपर ध्वस्त कर दिया और इस तरह उसने उन्हें, उनके बाल-बच्चों और उनके धन को नष्ट कर दिया। तथा काफ़िरों के लिए हर समय और जगह में इसी तरह की सज़ाएँ हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुफ्फार और मोमिनों के आमाल के फर्क का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि नेक अमल अल्लाह के यहां कभी बेकार नहीं जाता, जबकि कुफ्र के आमाल ज़ाया हो जाते हैं।
आयत 11
ذَٰلِكَ بِأَنَّ ٱللَّهَ مَوْلَى ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَأَنَّ ٱلْكَـٰفِرِينَ لَا مَوْلَىٰ لَهُمْ
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّ
बवजह उसके कि
ٱللَّهَ
अल्लाह
مَوْلَى
मददगार है
ٱلَّذِينَ
उन लोगों का जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَأَنَّ
और बेशक
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िर
لَا
(there is) no
مَوْلَىٰ
नहीं कोई मददगार
لَهُمْ
उनका
यह इसलिए कि जो लोग ईमान लाए उनका संरक्षक अल्लाह है और यह कि इनकार करनेवालों को कोई संरक्षक नहीं
तफ़्सीर:
दोनों पक्षों के लिए उक्त (अलग-अलग) बदला इस कारण है कि अल्लाह ईमान वालों का मददगार है और काफ़िरों का कोई सहायक नहीं है।
आयत 12
إِنَّ ٱللَّهَ يُدْخِلُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ جَنَّـٰتٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ ۖ وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ يَتَمَتَّعُونَ وَيَأْكُلُونَ كَمَا تَأْكُلُ ٱلْأَنْعَـٰمُ وَٱلنَّارُ مَثْوًۭى لَّهُمْ
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يُدْخِلُ
वो दाख़िल करेगा
ٱلَّذِينَ
उन लोगों को जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात में
تَجْرِى
बहती हैं
مِن
from
تَحْتِهَا
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ ۖ
नहरें
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
يَتَمَتَّعُونَ
वो फ़ायदा उठाते हैं
وَيَأْكُلُونَ
और वो खाते हैं
كَمَا
जैसा कि
تَأْكُلُ
खाते है
ٱلْأَنْعَـٰمُ
जानवर
وَٱلنَّارُ
और आग
مَثْوًۭى
ठिकाना है
لَّهُمْ
उनका
निश्चय ही अल्लाह उन लोगों को जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए ऐसे बागों में दाख़िल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया, वे कुछ दिनों का सुख भोग रहे है और खा रहे है, जिसे चौपाए खाते है। और आग उनका ठिकाना है
तफ़्सीर:
निश्चय अल्लाह उन लोगों को, जो अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाए और अच्छे कर्म किए, ऐसे बागों में दाखिल करेगा, जिनके महलों और पेड़ों के नीचे से नहरें बहती हैं। तथा जिन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया, वे अपनी इच्छाओं का पालन करके दुनिया में आनंद लेते हैं और उसी तरह खाते हैं, जैसे जानवर खाते हैं। उन्हें केवल अपने पेट और भोग-विलास की परवाह होती है। और क़ियामत के दिन आग ही उनका ठिकाना है जिसमें वे शरण लेंगे।
आयत 13
وَكَأَيِّن مِّن قَرْيَةٍ هِىَ أَشَدُّ قُوَّةًۭ مِّن قَرْيَتِكَ ٱلَّتِىٓ أَخْرَجَتْكَ أَهْلَكْنَـٰهُمْ فَلَا نَاصِرَ لَهُمْ
وَكَأَيِّن
और कितनी ही
مِّن
of
قَرْيَةٍ
बस्तियाँ
هِىَ
वो
أَشَدُّ
ज़्यादा शदीद थीं
قُوَّةًۭ
क़ुव्वत में
مِّن
than
قَرْيَتِكَ
आपकी बस्ती से
ٱلَّتِىٓ
वो जिसने
أَخْرَجَتْكَ
निकाल दिया आपको
أَهْلَكْنَـٰهُمْ
हलाक किया हमने उन्हें
فَلَا
पस ना था
نَاصِرَ
कोई मदद करने वाला
لَهُمْ
उनके लिए
कितनी ही बस्तियाँ थी जो शक्ति में तुम्हारी उस बस्ती से, जिसने तुम्हें निकाल दिया, बढ़-चढ़कर थीं। हमने उन्हे विनष्टम कर दिया! फिर कोई उनका सहायक न हुआ
तफ़्सीर:
पिछले समुदायों की बस्तियों में से कितनी ही बस्तियाँ थीं, जो मक्का से अधिक शक्तिशाली तथा अधिक धन और संतान वाली थीं, जहाँ से उसके लोगों ने आपको निकाल दिया है। हमने उन्हें नष्ट कर दिया जब उन्होंने अपने रसूलों को झुठलाया। फिर उनका कोई सहायक न हुआ, जो उन्हें अल्लाह की सज़ा से बचा सके। इसलिए अगर हम मक्का वालों को नष्ट करना चाहें, तो हम इसमें अक्षम नहीं हैं।
आयत 14
أَفَمَن كَانَ عَلَىٰ بَيِّنَةٍۢ مِّن رَّبِّهِۦ كَمَن زُيِّنَ لَهُۥ سُوٓءُ عَمَلِهِۦ وَٱتَّبَعُوٓا۟ أَهْوَآءَهُم
أَفَمَن
क्या भला जो
كَانَ
हो
عَلَىٰ
on
بَيِّنَةٍۢ
ऊपर एक वाज़ेह दलील के
مِّن
from
رَّبِّهِۦ
अपने रब की तरफ़ से
كَمَن
मानिन्द उसके हो सकता है जो
زُيِّنَ
मुज़य्यन कर दिए गए हों
لَهُۥ
उसके लिए
سُوٓءُ
बुरे
عَمَلِهِۦ
अमल उसके
وَٱتَّبَعُوٓا۟
और उन्होंने पैरवी की
أَهْوَآءَهُم
अपनी ख़्वाहिशात की
तो क्या जो व्यक्ति अपने रब की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण पर हो वह उन लोगों जैसा हो सकता है, जिन्हें उनका बुरा कर्म ही सुहाना लगता हो और वे अपनी इच्छाओं के पीछे ही चलने लग गए हो?
तफ़्सीर:
क्या वह व्यक्ति जिसके पास अपने पालनहार की ओर से स्पष्ट प्रमाण और खुला तर्क है और वह उसकी इबादत ज्ञान और अंतर्दृष्टि के साथ करता है, उस व्यक्ति की तरह है, जिसके लिए शैतान ने उसके बुरे काम को सुंदर बना दिया, तथा उन्होंने अपनी इच्छाओं का पालन करते हुए मूर्तियों की पूजा की, पाप किए और रसूलों को झुठलाया?
आयत 15
مَّثَلُ ٱلْجَنَّةِ ٱلَّتِى وُعِدَ ٱلْمُتَّقُونَ ۖ فِيهَآ أَنْهَـٰرٌۭ مِّن مَّآءٍ غَيْرِ ءَاسِنٍۢ وَأَنْهَـٰرٌۭ مِّن لَّبَنٍۢ لَّمْ يَتَغَيَّرْ طَعْمُهُۥ وَأَنْهَـٰرٌۭ مِّنْ خَمْرٍۢ لَّذَّةٍۢ لِّلشَّـٰرِبِينَ وَأَنْهَـٰرٌۭ مِّنْ عَسَلٍۢ مُّصَفًّۭى ۖ وَلَهُمْ فِيهَا مِن كُلِّ ٱلثَّمَرَٰتِ وَمَغْفِرَةٌۭ مِّن رَّبِّهِمْ ۖ كَمَنْ هُوَ خَـٰلِدٌۭ فِى ٱلنَّارِ وَسُقُوا۟ مَآءً حَمِيمًۭا فَقَطَّعَ أَمْعَآءَهُمْ
مَّثَلُ
मिसाल
ٱلْجَنَّةِ
उस जन्नत की
ٱلَّتِى
वो जो
وُعِدَ
वादा दिए गए
ٱلْمُتَّقُونَ ۖ
मुत्तक़ी लोग
فِيهَآ
उसमें
أَنْهَـٰرٌۭ
नहरें है
مِّن
of
مَّآءٍ
पानी की
غَيْرِ
ना
ءَاسِنٍۢ
बदलने वाले
وَأَنْهَـٰرٌۭ
और नहरें हैं
مِّن
of
لَّبَنٍۢ
दूध की
لَّمْ
ना
يَتَغَيَّرْ
तब्दील होगा
طَعْمُهُۥ
मज़ा जिसका
وَأَنْهَـٰرٌۭ
और नहरें हैं
مِّنْ
of
خَمْرٍۢ
शराब की
لَّذَّةٍۢ
बाइसे लज़्ज़त हैं
لِّلشَّـٰرِبِينَ
पीने वालों के लिए
وَأَنْهَـٰرٌۭ
और नहरें हैं
مِّنْ
of
عَسَلٍۢ
शहद की
مُّصَفًّۭى ۖ
ख़ूब साफ़ किया हुआ
وَلَهُمْ
और उनके लिए हैं
فِيهَا
उसमें
مِن
of
كُلِّ
हर क़िस्म के
ٱلثَّمَرَٰتِ
फल
وَمَغْفِرَةٌۭ
और बख़्शिश
مِّن
from
رَّبِّهِمْ ۖ
उनके रब की तरफ़ से
كَمَنْ
मानिन्द उसके हो सकता है जो
هُوَ
वो
خَـٰلِدٌۭ
हमेशा रहने वाला है
فِى
in
ٱلنَّارِ
आग में
وَسُقُوا۟
और वो पिलाए जाऐंगे
مَآءً
पानी
حَمِيمًۭا
खौलता हुआ
فَقَطَّعَ
तो वो काट देगा
أَمْعَآءَهُمْ
आँतें उनकी
उस जन्नत की शान, जिसका वादा डर रखनेवालों से किया गया है, यह है कि ऐसे पानी की नहरें होगी जो प्रदूषित नहीं होता। और ऐसे दूध की नहरें होंगी जिसके स्वाद में तनिक भी अन्तर न आया होगा, और ऐसे पेय की नहरें होंगी जो पीनेवालों के लिए मज़ा ही मज़ा होंगी, और साफ़-सुधरे शहद की नहरें भी होंगी। और उनके लिए वहाँ हर प्रकार के फल होंगे और क्षमा उनके अपने रब की ओर से - क्या वे उन जैसे हो सकते है, जो सदैव आग में रहनेवाले है और जिन्हें खौलता हुआ पानी पिलाया जाएगा, जो उनकी आँतों को टुकड़े-टुकड़े करके रख देगा?
तफ़्सीर:
उस जन्नत की विशेषता, जिसमें दाखिल करने का वादा, अल्लाह ने उन लोगों से किया है, जो (उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर) उससे डरने वाले हैं, यह है कि उसमें ऐसे पानी की नहरें हैं, जिसकी गंध या स्वाद में अधिक दिनों तक ठहरे रहने के कारण कोई बदलाव नहीं आता। तथा ऐसे दूध की नहरें हैं, जिसका स्वाद नहीं बदला। और ऐसी शराब की नहरें हैं, जो पीने वालों के लिए स्वादिष्ट है। तथा ऐसे मधु की नहरें हैं, जो अशुद्धियों से शुद्ध किए गए हैं। और उनके लिए उसके अंदर हर प्रकार के फल होंगे, जो वे चाहेंगे। तथा उनके लिए इन सबसे बढ़कर अल्लाह की ओर से उनके गुनाहों की माफ़ी होगी। अतः अल्लाह उनपर उनकी पकड़ नहीं करेगा। क्या वह व्यक्ति जिसका यह बदला है, उसके बराबर हो सकता है, जो हमेशा जहन्नम में रहने वाला है, उससे कभी बाहर नहीं निकलेगा, और उन्हें बहुत गर्म पानी पिलाया जाएगा, जो अपनी गर्मी की तीव्रता से उनके पेट की आँतों को टुकड़े-टुकड़े कर देगा?!
आयत 16
وَمِنْهُم مَّن يَسْتَمِعُ إِلَيْكَ حَتَّىٰٓ إِذَا خَرَجُوا۟ مِنْ عِندِكَ قَالُوا۟ لِلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْعِلْمَ مَاذَا قَالَ ءَانِفًا ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ طَبَعَ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ وَٱتَّبَعُوٓا۟ أَهْوَآءَهُمْ
وَمِنْهُم
और उनमें से कुछ हैं
مَّن
जो
يَسْتَمِعُ
ग़ौर से सुनते है
إِلَيْكَ
आपको
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
خَرَجُوا۟
वो निकलते हैं
مِنْ
from
عِندِكَ
आपके पास से
قَالُوا۟
वो कहते हैं
لِلَّذِينَ
उन लोगों से जो
أُوتُوا۟
दिए गए
ٱلْعِلْمَ
इल्म
مَاذَا
क्या कुछ
قَالَ
उसने कहा था
ءَانِفًا ۚ
अभी
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही वो लोग हैं
ٱلَّذِينَ
जो
طَبَعَ
मोहर लगा दी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَىٰ
upon
قُلُوبِهِمْ
उनके दिलों पर
وَٱتَّبَعُوٓا۟
और उन्होंने पैरवी की
أَهْوَآءَهُمْ
अपनी ख़्वाहिशात की
और उनमें कुछ लोग ऐसे है जो तुम्हारी ओर कान लगाते है, यहाँ तक कि जब वे तुम्हारे पास से निकलते है तो उन लोगों से, जिन्हें ज्ञान प्रदान हुआ है कहते है, "उन्होंने अभी-अभी क्या कहा?" वही वे लोग है जिनके दिलों पर अल्लाह ने ठप्पा लगा दिया है और वे अपनी इच्छाओं के पीछे चले है
तफ़्सीर:
और मुनाफ़िक़ों में से कुछ लोग ऐसे हैं, जो (ऐ रसूल!) आपकी ओर कान लगाते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य स्वीकार करना नहीं, बल्कि मुँह फेरना होता है। यहाँ तक कि जब आपके पास से निकलते हैं, तो अनजान बनते हुए और उपेक्षा करते हुए उन लोगों से कहते हैं, जिन्हें अल्लाह ने ज्ञान दिया है : उन्होंने अभी-अभी अपनी बात में क्या कहा? यही वे लोग हैं, जिनके दिलों पर अल्लाह ने मुहर लगा दी है, इसलिए कोई अच्छाई उन तक नहीं पहुँचती, तथा उन्होंने अपनी इच्छाओं का पालन किया है, जिनके कारण वे सच्चाई से अंधे कर दिए गए हैं।
आयत 17
وَٱلَّذِينَ ٱهْتَدَوْا۟ زَادَهُمْ هُدًۭى وَءَاتَىٰهُمْ تَقْوَىٰهُمْ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
ٱهْتَدَوْا۟
हिदायत पाई
زَادَهُمْ
उसने ज़्यादा किया उन्हें
هُدًۭى
हिदायत में
وَءَاتَىٰهُمْ
और उसने दिया उन्हें
تَقْوَىٰهُمْ
तक़्वा उनका
रहे वे लोग जिन्होंने सीधा रास्ता अपनाया, (अल्लाह ने) उनके मार्गदर्शन में अभिवृद्धि कर दी और उन्हें उनकी परहेज़गारी प्रदान की
तफ़्सीर:
और जिन लोगों ने सत्य का रास्ता अपनाया और रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लाए हुए धर्म का पालन किया, उनके रब ने उन्हें मार्गदर्शन में बढ़ा दिया और अधिक भलाई का सामर्थ्य प्रदान किया, तथा उन्हें आग (जहन्नम) से बचाने वाला काम करने के लिए प्रेरित किया।
आयत 18
فَهَلْ يَنظُرُونَ إِلَّا ٱلسَّاعَةَ أَن تَأْتِيَهُم بَغْتَةًۭ ۖ فَقَدْ جَآءَ أَشْرَاطُهَا ۚ فَأَنَّىٰ لَهُمْ إِذَا جَآءَتْهُمْ ذِكْرَىٰهُمْ
فَهَلْ
तो नहीं
يَنظُرُونَ
वो इन्तिज़ार करते
إِلَّا
मगर
ٱلسَّاعَةَ
क़यामत का
أَن
कि
تَأْتِيَهُم
वो आ जाए उनके पास
بَغْتَةًۭ ۖ
अचानक
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
جَآءَ
आ चुकीं
أَشْرَاطُهَا ۚ
अलामात उसकी
فَأَنَّىٰ
तो कहाँ से होगी
لَهُمْ
उनके लिए
إِذَا
जब
جَآءَتْهُمْ
आ जाएगी उनके पास
ذِكْرَىٰهُمْ
नसीहत उनकी
अब क्या वे लोग बस उस घड़ी की प्रतीक्षा कर रहे है कि वह उनपर अचानक आ जाए? उसके लक्षण तो सामने आ चुके है, जब वह स्वयं भी उनपर आ जाएगी तो फिर उनके लिए होश में आने का अवसर कहाँ शेष रहेगा?
तफ़्सीर:
तो क्या काफ़िर लोग यही प्रतीक्षा कर रहे हैं कि क़ियामत उनपर उनकी पूर्व जानकारी के बिना अचानक आ जाए?! निश्चय उसकी निशानियाँ तो आ ही चुकी हैं। जैसे कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का नबी बनकर आना और चंद्रमा का दो टुकड़े होना। फिर जब क़ियामत उनके पास आ गई, तो उनके लिए उपदेश ग्रहण करना कैसे संभव होगा?
आयत 19
فَٱعْلَمْ أَنَّهُۥ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا ٱللَّهُ وَٱسْتَغْفِرْ لِذَنۢبِكَ وَلِلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ ۗ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ مُتَقَلَّبَكُمْ وَمَثْوَىٰكُمْ
فَٱعْلَمْ
तो जान लीजिए
أَنَّهُۥ
बेशक
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
ٱللَّهُ
अल्लाह
وَٱسْتَغْفِرْ
और बख़्शिश माँगिए
لِذَنۢبِكَ
अपने क़ुसूर के लिए
وَلِلْمُؤْمِنِينَ
और मोमिन मर्दों के लिए
وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ ۗ
और मोमिन औरतों के लिए
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَعْلَمُ
वो जानता है
مُتَقَلَّبَكُمْ
चलना-फिरना तुम्हारा
وَمَثْوَىٰكُمْ
और ठिकाना तुम्हारा
अतः जान रखों कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई पूज्य-प्रभु नहीं। और अपने गुनाहों के लिए क्षमा-याचना करो और मोमिन पुरुषों और मोमिन स्त्रियों के लिए भी। अल्लाह तुम्हारी चलत-फिरत को भी जानता है और तुम्हारे ठिकाने को भी
तफ़्सीर:
तो (ऐ रसूल!) आप यकीन कर लें कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, तथा अल्लाह से अपने पापों के लिए क्षमा माँगें और ईमान वाले पुरुषों और ईमान वाली स्त्रियों के पापों के लिए भी उससे क्षमा माँगे। अल्लाह दिन में तुम्हारे चलने-फिरने और रात में तुम्हारे ठहरने के स्थान को जानता है। उससे उसमें से कुछ भी छिपा नहीं है।
आयत 20
وَيَقُولُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَوْلَا نُزِّلَتْ سُورَةٌۭ ۖ فَإِذَآ أُنزِلَتْ سُورَةٌۭ مُّحْكَمَةٌۭ وَذُكِرَ فِيهَا ٱلْقِتَالُ ۙ رَأَيْتَ ٱلَّذِينَ فِى قُلُوبِهِم مَّرَضٌۭ يَنظُرُونَ إِلَيْكَ نَظَرَ ٱلْمَغْشِىِّ عَلَيْهِ مِنَ ٱلْمَوْتِ ۖ فَأَوْلَىٰ لَهُمْ
وَيَقُولُ
और कहते हैं
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
لَوْلَا
क्यों नहीं
نُزِّلَتْ
नाज़िल की गई
سُورَةٌۭ ۖ
कोई सूरत
فَإِذَآ
फिर जब
أُنزِلَتْ
नाज़िल की जाती है
سُورَةٌۭ
कोई सूरत
مُّحْكَمَةٌۭ
मोहकम
وَذُكِرَ
और ज़िक्र किया जाता है
فِيهَا
उसमें
ٱلْقِتَالُ ۙ
जंग का
رَأَيْتَ
आप देखेंगे
ٱلَّذِينَ
उन लोगों को
فِى
in
قُلُوبِهِم
जिनके दिलों में
مَّرَضٌۭ
बीमारी है
يَنظُرُونَ
वो देख रहे होंगे
إِلَيْكَ
आपकी तरफ़
نَظَرَ
(जैसे) देखना
ٱلْمَغْشِىِّ
उसका ग़शी तारी हो गई हो
عَلَيْهِ
जिस पर
مِنَ
from
ٱلْمَوْتِ ۖ
मौत की वजह से
فَأَوْلَىٰ
तो तबाही/हलाकत है
لَهُمْ
उनके लिए
जो लोग ईमान लाए वे कहते है, "कोई सूरा क्यों नहीं उतरी?" किन्तु जब एक पक्की सूरा अवतरित की जाती है, जिसमें युद्ध का उल्लेख होता है, तो तुम उन लोगों को देखते हो जिनके दिलों में रोग है कि वे तुम्हारी ओर इस प्रकार देखते है जैसे किसी पर मृत्यु की बेहोशी छा गई हो। तो अफ़सोस है उनके हाल पर!
तफ़्सीर:
अल्लाह पर ईमान रखने वाले लोग (इस बात की कामना करते हुए कि अल्लाह अपने रसूल पर कोई सूरत उतारे, जिसमें लड़ाई के हुक्म का उल्लेख हो) कहते हैं : अल्लाह ने कोई सूरत क्यों नहीं उतारी, जिसमें युद्ध का उल्लेख हो? फिर जब अल्लाह युद्ध के उल्लेख पर आधारित अपनी व्याख्या और नियमों में अच्छी तरह से स्पष्ट कोई सूरत उतारता है, तो (ऐ रसूल!) आप उन मुनाफ़िक़ों को देखते हैं, जिनके दिलों में संदेह है, कि वे आपकी ओर उस व्यक्ति की तरह देखते हैं, जिसपर भय और डर की गंभीरता से बेहोशी छा गई हो। तो अल्लाह ने ऐसे लोगों को धमकी दी है कि उनके लड़ाई से पीछे हटने और उससे भय खाने के कारण उनकी यातना निकट आ चुकी है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जन्नत की नेमतों की मिसाल (नहरें) का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि जन्नत की नेमतें दुनिया की नेमतों से कहीं बेहतर हैं, इनकी तलाश में मेहनत करनी चाहिए।
आयत 21
طَاعَةٌۭ وَقَوْلٌۭ مَّعْرُوفٌۭ ۚ فَإِذَا عَزَمَ ٱلْأَمْرُ فَلَوْ صَدَقُوا۟ ٱللَّهَ لَكَانَ خَيْرًۭا لَّهُمْ
طَاعَةٌۭ
इताअत करना
وَقَوْلٌۭ
और बात कहना
مَّعْرُوفٌۭ ۚ
भली(बेहतर है)
فَإِذَا
फिर जब
عَزَمَ
पुख़्ता हो जाए
ٱلْأَمْرُ
हुक्म(जंग का)
فَلَوْ
फिर अगर
صَدَقُوا۟
वो सच्चे रहें
ٱللَّهَ
अल्लाह से
لَكَانَ
अलबत्ता होगा
خَيْرًۭا
बेहतर
لَّهُمْ
उनके लिए
उनके लिए उचित है आज्ञापालन और अच्छी-भली बात। फिर जब (युद्ध की) बात पक्की हो जाए (तो युद्ध करना चाहिए) तो यदि वे अल्लाह के लिए सच्चे साबित होते तो उनके लिए ही अच्छा होता
तफ़्सीर:
अल्लाह के आदेश का पालन करना और भली बात कहना, उनके लिए अच्छा है। फिर जब लड़ना अनिवार्य हो जाए और उसके बिना कोई चारा न हो, तो यदि वे अल्लाह पर अपने ईमान के प्रति और उसकी आज्ञाकारिता में सच्चे रहें, तो यह उनके लिए निफ़ाक़ और अल्लाह के आदेशों की अवहेलना करने से बेहतर होगा।
आयत 22
فَهَلْ عَسَيْتُمْ إِن تَوَلَّيْتُمْ أَن تُفْسِدُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ وَتُقَطِّعُوٓا۟ أَرْحَامَكُمْ
فَهَلْ
तो क्या
عَسَيْتُمْ
उम्मीद है तुमसे
إِن
कि अगर
تَوَلَّيْتُمْ
हाकिम बन जाओ तुम
أَن
ये कि
تُفْسِدُوا۟
तुम फ़साद करो
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَتُقَطِّعُوٓا۟
और तुम काटो
أَرْحَامَكُمْ
अपने रिश्तों को
यदि तुम उल्टे फिर गए तो क्या तुम इससे निकट हो कि धरती में बिगाड़ पैदा करो और अपने नातों-रिश्तों को काट डालो?
तफ़्सीर:
यदि तुम अल्लाह पर ईमान लाने और उसकी आज्ञा मानने से दूर हो जाओ, तो तुम्हारी स्थिति पर यही प्रबल है कि तुम कुफ़्र और पापों के द्वारा धरती में बिगाड़ पैदा करोगे और रिश्तेदारी के बंधनों को तोड़ोगे; जैसा कि जाहिलिय्यत (इस्लाम से पूर्व) के समयकाल में तुम्हारी स्थिति थी।
आयत 23
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ لَعَنَهُمُ ٱللَّهُ فَأَصَمَّهُمْ وَأَعْمَىٰٓ أَبْصَـٰرَهُمْ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही वो लोग हैं
ٱلَّذِينَ
जो
لَعَنَهُمُ
लानत की उन पर
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
فَأَصَمَّهُمْ
फिर उसने बहरा कर दिया उन्हें
وَأَعْمَىٰٓ
और उसने अंधा कर दिया
أَبْصَـٰرَهُمْ
उनकी आँखों को
ये वे लोग है जिनपर अल्लाह ने लानत की और उन्हें बहरा और उनकी आँखों को अन्धा कर दिया
तफ़्सीर:
ये धरती में बिगाड़ पैदा करने और रिश्ते-नातों को तोड़ने वाले ही वे लोग हैं, जिन्हें अल्लाह ने अपनी दया से दूर कर दिया, उनके कानों को स्वीकारने और अनुपालन करने के इरादे से सत्य को सुनने से बहरा कर दिया और उनकी आँखों को उसे सोच-विचार करने की दृष्टि से देखने से अंधा कर दिया।
आयत 24
أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ ٱلْقُرْءَانَ أَمْ عَلَىٰ قُلُوبٍ أَقْفَالُهَآ
أَفَلَا
क्या भला नहीं
يَتَدَبَّرُونَ
वो ग़ौरो फ़िक्र करते
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरान में
أَمْ
या
عَلَىٰ
upon
قُلُوبٍ
दिलों पर
أَقْفَالُهَآ
उनके ताले हैं
तो क्या वे क़ुरआन में सोच-विचार नहीं करते या उनके दिलों पर ताले लगे हैं?
तफ़्सीर:
तो इन मुँह फेरने वालों ने क़ुरआन पर विचार क्यों नहीं किया और उस पर ध्यान क्यों नहीं दिया जो उसमें है?! यदि वे उसपर विचार करते, तो वह अवश्य उन्हें सभी अच्छाइयों का मार्गदर्शन करता और उन्हें सभी बुराइयों से दूर रखता। या फिर उनके दिलों पर मज़बूत ताले पड़े हुए हैं, जिसके कारण कोई उपदेश उन तक नहीं पहुँचता और न कोई याददहानी उन्हें लाभ देती है।
आयत 25
إِنَّ ٱلَّذِينَ ٱرْتَدُّوا۟ عَلَىٰٓ أَدْبَـٰرِهِم مِّنۢ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمُ ٱلْهُدَى ۙ ٱلشَّيْطَـٰنُ سَوَّلَ لَهُمْ وَأَمْلَىٰ لَهُمْ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ٱرْتَدُّوا۟
फिर गए
عَلَىٰٓ
on
أَدْبَـٰرِهِم
अपनी पुश्तों पर
مِّنۢ
after
بَعْدِ
बाद उसके
مَا
जो
تَبَيَّنَ
वाज़ेह हो गई
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلْهُدَى ۙ
हिदायत
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान ने
سَوَّلَ
आरास्ता कर दिया
لَهُمْ
उनके लिए
وَأَمْلَىٰ
और (अल्लाह ने)ढील दी
لَهُمْ
उन्हें
वे लोग जो पीठ-फेरकर पलट गए, इसके पश्चात कि उनपर मार्ग स्पष्ट॥ हो चुका था, उन्हें शैतान ने बहका दिया और उसने उन्हें ढील दे दी
तफ़्सीर:
निश्चय जो लोग अपने ईमान से कुफ़्र और निफ़ाक़ की ओर फिर गए, इसके बाद कि उनपर तर्क स्थापित हो गया और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सच्चाई उनके लिए स्पष्ट हो गई। दरअसल शैतान ही है जिसने उनके लिए कुफ़्र और निफ़ाक़ को सुशोभित किया है और उसे उनके लिए आसान बना दिया है और उन्हें लंबी आशा दिलाई है।
आयत 26
ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَالُوا۟ لِلَّذِينَ كَرِهُوا۟ مَا نَزَّلَ ٱللَّهُ سَنُطِيعُكُمْ فِى بَعْضِ ٱلْأَمْرِ ۖ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ إِسْرَارَهُمْ
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّهُمْ
बवजह उसके कि वो
قَالُوا۟
वो कहते हैं
لِلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
كَرِهُوا۟
नापसंद किया
مَا
उस चीज़ को जो
نَزَّلَ
नाज़िल की
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
سَنُطِيعُكُمْ
अनक़रीब हम इताअत करेंगे तुम्हारी
فِى
in
بَعْضِ
part
ٱلْأَمْرِ ۖ
बाज़ कामों में
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَعْلَمُ
वो जानता है
إِسْرَارَهُمْ
राज़ उनके
यह इसलिए कि उन्होंने उन लोगों से, जिन्होंने उस चीज़ को नापसन्द किया जो कुछ अल्लाह ने उतारा है, कहा कि "हम कुछ मामलों में तुम्हारी बात मान लेंगे।" अल्लाह उनकी गुप्त बातों को भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
उन्हें गुमराही के रास्ते पर इसलिए डाल दिया गया, क्योंकि उन्होंने गुप्त रूप से उन मुश्रिकों से कहा, जिन्होंने अल्लाह की अपने रसूल पर उतारी हुई वह़्य (प्रकाशना) को नापसंद किया : हम कुछ मामलों में तुम्हारी बात मानेंगे, जैसे कि लड़ने से हतोत्साहित करना। और अल्लाह जानता है जो कुछ वे छिपाते और गुप्त रखते हैं, उससे कोई बात छिपी नहीं है। इसलिए वह उसमें से जो चाहता है, अपने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लिए प्रकट कर देता है।
आयत 27
فَكَيْفَ إِذَا تَوَفَّتْهُمُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ يَضْرِبُونَ وُجُوهَهُمْ وَأَدْبَـٰرَهُمْ
فَكَيْفَ
तो क्या होगा
إِذَا
जब
تَوَفَّتْهُمُ
फ़ौत करेंगे उन्हें
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्ते
يَضْرِبُونَ
वो मारेंगे
وُجُوهَهُمْ
उनके चेहरों को
وَأَدْبَـٰرَهُمْ
और उनकी पीठों को
फिर उस समय क्या हाल होगा जब फ़रिश्तें उनके चहरों और उनकी पीठों पर मारते हुए उनकी रूह क़ब्ज़ करेंगे?
तफ़्सीर:
तो आप उसे कैसे देखते हैं जिस यातना और विकट स्थिति में वे उस समय होंगे, जब उनके प्राण निकालने पर नियुक्त फरिश्ते, उनके प्राण निकालते हुए, लोहे के हथोड़े से उनके चेहरों और पीठों पर मार रहे होंगे?!
आयत 28
ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمُ ٱتَّبَعُوا۟ مَآ أَسْخَطَ ٱللَّهَ وَكَرِهُوا۟ رِضْوَٰنَهُۥ فَأَحْبَطَ أَعْمَـٰلَهُمْ
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّهُمُ
बवजह उसके कि वो
ٱتَّبَعُوا۟
उन्होंने पैरवी की
مَآ
उसकी जिसने
أَسْخَطَ
ग़ुस्सा दिलाया
ٱللَّهَ
अल्लाह को
وَكَرِهُوا۟
और उन्होंने नापसंद किया
رِضْوَٰنَهُۥ
उसकी रज़ा को
فَأَحْبَطَ
तो उसने ज़ाया कर दिए
أَعْمَـٰلَهُمْ
आमाल उनके
यह इसलिए कि उन्होंने उस चीज़ का अनुसरण किया जो अल्लाह को अप्रसन्न करनेवाली थी और उन्होंने उसकी ख़ुशी को नापसन्द किया तो उसने उनके कर्मों को अकारथ कर दिया
तफ़्सीर:
यह यातना उन्हें इस कारण दी जाएगी कि उन्होंने हर उस चीज़ का अनुसरण किया जिसने अल्लाह को उनपर क्रोधित कर दिया, जैसे कुफ़्र, निफ़ाक़ तथा अल्लाह एवं उसके रसूल से दुश्मनी, और उस चीज़ को बुरा जाना, जो उन्हें उनके पालनहार के क़रीब लाती है और उनपर उसकी प्रसन्नता लाती है, जैसे अल्लाह पर ईमान लाना और उसके रसूल का अनुसरण करना। अतः अल्लाह ने उनके कर्मों को व्यर्थ कर दिया।
आयत 29
أَمْ حَسِبَ ٱلَّذِينَ فِى قُلُوبِهِم مَّرَضٌ أَن لَّن يُخْرِجَ ٱللَّهُ أَضْغَـٰنَهُمْ
أَمْ
या
حَسِبَ
समझा है
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने
فِى
in
قُلُوبِهِم
जिनके दिलों में
مَّرَضٌ
बीमारी है
أَن
कि
لَّن
हरगिज़ नहीं
يُخْرِجَ
निकालेगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَضْغَـٰنَهُمْ
कीने उनके
(क्या अल्लाह से कोई चीज़ छिपी है) या जिन लोगों के दिलों में रोग है वे समझ बैठे है कि अल्लाह उनके द्वेषों को कदापि प्रकट न करेगा?
तफ़्सीर:
क्या वे मुनाफ़िक़, जिनके दिलों में संदेह है, यह समझते हैं कि अल्लाह उनके द्वेष को बाहर नहीं निकालेगा और उन्हें प्रकट नहीं करेगा?! निश्चय अल्लाह विपत्तियों के द्वारा उन्हें अवश्य बाहर निकालेगा। ताकि सच्चे ईमान वाला झूठे से अलग हो जाए तथा ईमान वाला स्पष्ट हो जाए और मुनाफिक़ का पर्दाफाश हो जाए।
आयत 30
وَلَوْ نَشَآءُ لَأَرَيْنَـٰكَهُمْ فَلَعَرَفْتَهُم بِسِيمَـٰهُمْ ۚ وَلَتَعْرِفَنَّهُمْ فِى لَحْنِ ٱلْقَوْلِ ۚ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ أَعْمَـٰلَكُمْ
وَلَوْ
और अगर
نَشَآءُ
हम चाहें
لَأَرَيْنَـٰكَهُمْ
अलबत्ता दिखा दें हम आपको उन्हें
فَلَعَرَفْتَهُم
फिर अलबत्ता पहचान लें आप उन्हें
بِسِيمَـٰهُمْ ۚ
उनके चेहरों से
وَلَتَعْرِفَنَّهُمْ
और अलबत्ता आप ज़रूर पहचान लेंगे उन्हें
فِى
by
لَحْنِ
अंदाज़/असलूब से
ٱلْقَوْلِ ۚ
गुफ़्तगू के
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَعْلَمُ
वो जानता है
أَعْمَـٰلَكُمْ
आमाल तुम्हारे
यदि हम चाहें तो उन्हें तुम्हें दिखा दें, फिर तुम उन्हें उनके लक्षणों से पहचान लो; किन्तु तुम उन्हें उनकी बातचीत के ढब से अवश्य पहचान लोगे। अल्लाह तो तुम्हारे कर्मों को जानता ही है
तफ़्सीर:
और अगर हम (ऐ रसूल!) आपको मुनाफ़िक़ों की पहचान कराना चाहें, तो अवश्य आपको उनकी पहचान करा दें। फिर निश्चय आप उन्हें उनकी निशानियों से पहचान लेंगे, तथा आप उन्हें उनके बात करने की शैली से अवश्य पहचान लेंगे। तथा अल्लाह तुम्हारे कर्मों को जानता है। उससे उनमें से कुछ भी छिपा हुआ नहीं है, और वह तुम्हें उनका बदला देगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मुनाफिकों के दिलों की बीमारी का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि दिल की बीमारी (नफाक) ज़ाहिरी इबादत से नहीं, बल्कि नीयत की सच्चाई से ठीक होती है।
आयत 31
وَلَنَبْلُوَنَّكُمْ حَتَّىٰ نَعْلَمَ ٱلْمُجَـٰهِدِينَ مِنكُمْ وَٱلصَّـٰبِرِينَ وَنَبْلُوَا۟ أَخْبَارَكُمْ
وَلَنَبْلُوَنَّكُمْ
और अलबत्ता हम ज़रूर आज़माऐंगे तुम्हें
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
نَعْلَمَ
हम जान लें
ٱلْمُجَـٰهِدِينَ
मुजाहिदों को
مِنكُمْ
तुम में से
وَٱلصَّـٰبِرِينَ
और सब्र करने वालों को
وَنَبْلُوَا۟
और हम आज़माऐंगे
أَخْبَارَكُمْ
तुम्हारे हालात को
हम अवश्य तुम्हारी परीक्षा करेंगे, यहाँ तक कि हम तुममें से जो जिहाद करनेवाले है और जो दृढ़तापूर्वक जमे रहनेवाले है उनको जान ले और तुम्हारी हालतों को जाँच लें
तफ़्सीर:
और हम अवश्य ही (ऐ ईमान वालो!) जिहाद, दुश्मनों से लड़ाई करने और क़त्ल के द्वारा तुम्हारी परीक्षा लेंगे, ताकि हम तुममें से अल्लाह की राह में जिहाद करने वालों और उसके दुश्मनों से लड़ने में धैर्य रखने वालों को जान लें। तथा हम तुम्हारी परीक्षा लेंगे, ताकि हम तुममें से सच्चे और झूठे को जान लें।
आयत 32
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَصَدُّوا۟ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ وَشَآقُّوا۟ ٱلرَّسُولَ مِنۢ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمُ ٱلْهُدَىٰ لَن يَضُرُّوا۟ ٱللَّهَ شَيْـًۭٔا وَسَيُحْبِطُ أَعْمَـٰلَهُمْ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
وَصَدُّوا۟
और उन्होंने रोका
عَن
from
سَبِيلِ
(the) way of Allah
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते से
وَشَآقُّوا۟
और उन्होंने मुख़ालिफ़त की
ٱلرَّسُولَ
रसूल की
مِنۢ
after
بَعْدِ
उसके बाद
مَا
कि
تَبَيَّنَ
वाज़ेह हो चुकी
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلْهُدَىٰ
हिदायत
لَن
हरगिज़ नहीं
يَضُرُّوا۟
वो नुक़्सान पहुँचा सकते
ٱللَّهَ
अल्लाह को
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
وَسَيُحْبِطُ
और अनक़रीब वो ज़ाया करदेगा
أَعْمَـٰلَهُمْ
आमाल उनके
जिन लोगों ने इसके पश्चात कि मार्ग उनपर स्पष्ट हो चुका था, इनकार किया और अल्लाह के मार्ग से रोका और रसूल का विरोध किया, वे अल्लाह को कदापि कोई हानि नहीं पहुँचा सकेंगे, बल्कि वही उनका सब किया-कराया उनकी जान को लागू कर देगा
तफ़्सीर:
निःसंदेह जिन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया, तथा खुद को और अन्य लोगों को अल्लाह के धर्म से रोका और उसके रसूल का विरोध किया तथा उनके साथ दुश्मनी की, जबकि यह स्पष्ट हो गया कि वह अल्लाह के नबी हैं - वे कदापि अल्लाह को कोई नुकसान नहीं पहुँचाएंगे, बल्कि वे ख़ुद अपना नुक़सान करेंगे और अल्लाह उनके कर्मों को व्यर्थ कर देगा।
आयत 33
۞ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَطِيعُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُوا۟ ٱلرَّسُولَ وَلَا تُبْطِلُوٓا۟ أَعْمَـٰلَكُمْ
۞ يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
أَطِيعُوا۟
इताअत करो
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَأَطِيعُوا۟
और इताअत करो
ٱلرَّسُولَ
रसूल की
وَلَا
और ना
تُبْطِلُوٓا۟
तुम बातिल करो
أَعْمَـٰلَكُمْ
आमाल अपने
ऐ ईमान लानेवालों! अल्लाह का आज्ञापालन करो और रसूल का आज्ञापालन करो और अपने कर्मों को विनष्ट न करो
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने वालो और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो! अल्लाह का और उसके रसूल का आज्ञापालन करो। इस प्रकार कि उनके आदेशों का पालन करो और उनके निषेधों से बचो। तथा कुफ़्र और दिखावा आदि के द्वारा अपने कार्यों को व्यर्थ न करो।
आयत 34
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَصَدُّوا۟ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ ثُمَّ مَاتُوا۟ وَهُمْ كُفَّارٌۭ فَلَن يَغْفِرَ ٱللَّهُ لَهُمْ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
وَصَدُّوا۟
और उन्होंने रोका
عَن
from
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते से
ثُمَّ
फिर
مَاتُوا۟
वो मर गए
وَهُمْ
इस हाल में कि वो
كُفَّارٌۭ
काफ़िर थे
فَلَن
तो हरगिज़ नहीं
يَغْفِرَ
माफ़ करेगा
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَهُمْ
उन्हें
निश्चय ही जिन लोगों ने इनकार किया और अल्लाह के मार्ग से रोका और इनकार करनेवाले ही रहकर मर गए, अल्लाह उन्हें कदापि क्षमा न करेगा
तफ़्सीर:
निश्चय जिन लोगों ने अल्लाह का इनकार किया और खुद को तथा अन्य लोगों को अल्लाह के धर्म से रोका, फिर तौबा करने से पहले अपने कुफ़्र ही की अवस्था में मर गए - तो अल्लाह उनके गुनाहों को हरगिज़ माफ नहीं करेगा, बल्कि उनपर उनकी पकड़ करेगा और उन्हें जहन्नम में दाखिल करेगा, जहाँ वे हमेशा रहेंगे।
आयत 35
فَلَا تَهِنُوا۟ وَتَدْعُوٓا۟ إِلَى ٱلسَّلْمِ وَأَنتُمُ ٱلْأَعْلَوْنَ وَٱللَّهُ مَعَكُمْ وَلَن يَتِرَكُمْ أَعْمَـٰلَكُمْ
فَلَا
पस ना
تَهِنُوا۟
तुम सुस्ती करो
وَتَدْعُوٓا۟
और (ना) तुम बुलाओ
إِلَى
for
ٱلسَّلْمِ
तरफ़ सुलह के
وَأَنتُمُ
और तुम ही
ٱلْأَعْلَوْنَ
ग़ालिब रहने वाले हो
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
مَعَكُمْ
साथ है तुम्हारे
وَلَن
और हरगिज़ ना
يَتِرَكُمْ
वो कम करेगा तुमसे
أَعْمَـٰلَكُمْ
आमाल तुम्हारे
अतः ऐसा न हो कि तुम हिम्मत हार जाओ और सुलह का निमंत्रण देने लगो, जबकि तुम ही प्रभावी हो। अल्लाह तुम्हारे साथ है और वह तुम्हारे कर्मों (के फल) में तुम्हें कदापि हानि न पहुँचाएगा
तफ़्सीर:
अतः (ऐ मोमिनो!) तुम अपने दुश्मन का सामना करने में कमज़ोर न बनो और उनकी ओर सुलह का हाथ न बढ़ाओ, इससे पहले कि वे तुम्हारी ओर सुलह का हाथ बढ़ाएँ। तथा तुम ही उनपर प्रभुत्वशाली और विजयी हो। और अल्लाह अपनी सहायता और समर्थन के साथ तुम्हारे संग है। वह तुम्हारे कर्मों के प्रतिफल को ज़रा भी कम नहीं करेगा, बल्कि अपने अनुग्रह और कृपा से तुम्हें बढ़ाकर देगा।
आयत 36
إِنَّمَا ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَا لَعِبٌۭ وَلَهْوٌۭ ۚ وَإِن تُؤْمِنُوا۟ وَتَتَّقُوا۟ يُؤْتِكُمْ أُجُورَكُمْ وَلَا يَسْـَٔلْكُمْ أَمْوَٰلَكُمْ
إِنَّمَا
बेशक
ٱلْحَيَوٰةُ
ज़िन्दगी
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
لَعِبٌۭ
खेल
وَلَهْوٌۭ ۚ
तमाशा है
وَإِن
और अगर
تُؤْمِنُوا۟
तुम ईमान ले आओ
وَتَتَّقُوا۟
और तुम तक़्वा करो
يُؤْتِكُمْ
वो देगा तुम्हें
أُجُورَكُمْ
अजर तुम्हारे
وَلَا
और ना
يَسْـَٔلْكُمْ
वो तलब करेगा तुमसे
أَمْوَٰلَكُمْ
माल तुम्हारे
सांसारिक जीवन तो बस एक खेल और तमाशा है। और यदि तुम ईमान लाओ और डर रखो तो वह तुम्हारे कर्मफल तुम्हें प्रदान करेगा और तुमसे धन नही माँगेगा। -
तफ़्सीर:
दुनिया का जीवन तो केवल खेल और तमाशा है। अतः एक समझदार व्यक्ति को इसमें व्यस्त होकर आख़िरत से गाफ़िल नहीं होना चाहिए। यदि तुम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ और अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई वस्तुओं से बचकर डरते रहो, तो वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों का पूरा बदला देगा, कोई कमी नहीं करेगा। तथा वह तुमसे तुम्हारा सारा धन नहीं माँगेगा, बल्कि वह तुमसे केवल अनिवार्य ज़कात माँगेगा।
आयत 37
إِن يَسْـَٔلْكُمُوهَا فَيُحْفِكُمْ تَبْخَلُوا۟ وَيُخْرِجْ أَضْغَـٰنَكُمْ
إِن
अगर
يَسْـَٔلْكُمُوهَا
वो तलब करे तुमसे उन्हें
فَيُحْفِكُمْ
फिर वो इसरार करे तुमसे
تَبْخَلُوا۟
तुम बुख़्ल करोगे
وَيُخْرِجْ
और वो ज़ाहिर कर देगा
أَضْغَـٰنَكُمْ
कीने तुम्हारे
और यदि वह उनको तुमसे माँगे और समेटकर तुमसे माँगे तो तुम कंजूसी करोगे। और वह तुम्हारे द्वेष को निकाल बाहर कर देगा
तफ़्सीर:
अगर वह तुमसे तुम्हारा पूरा धन माँगे और उसे खूब ज़ोर देकर माँगे, तो तुम उसमें कंजूसी करोगे और तुम्हारे दिलों में अल्लाह के रास्ते में खर्च करने की जो अनिच्छा है, वह उसे बाहर कर देगा। अतः उसने तुमपर दया करते हुए तुमसे उसका माँगना छोड़ दिया।
आयत 38
هَـٰٓأَنتُمْ هَـٰٓؤُلَآءِ تُدْعَوْنَ لِتُنفِقُوا۟ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ فَمِنكُم مَّن يَبْخَلُ ۖ وَمَن يَبْخَلْ فَإِنَّمَا يَبْخَلُ عَن نَّفْسِهِۦ ۚ وَٱللَّهُ ٱلْغَنِىُّ وَأَنتُمُ ٱلْفُقَرَآءُ ۚ وَإِن تَتَوَلَّوْا۟ يَسْتَبْدِلْ قَوْمًا غَيْرَكُمْ ثُمَّ لَا يَكُونُوٓا۟ أَمْثَـٰلَكُم
هَـٰٓأَنتُمْ
सुनो तुम
هَـٰٓؤُلَآءِ
वो लोग हो
تُدْعَوْنَ
तुम बुलाए जाते हो
لِتُنفِقُوا۟
कि तुम ख़र्च करो
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ
अल्लाह के रास्ते में
فَمِنكُم
तो तुम में से कोई है
مَّن
जो
يَبْخَلُ ۖ
बुख़्ल करता है
وَمَن
और जो
يَبْخَلْ
बुख़्ल करता है
فَإِنَّمَا
तो बेशक वो
يَبْخَلُ
वो बुख़्ल करता है
عَن
from
نَّفْسِهِۦ ۚ
अपने आपसे
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
ٱلْغَنِىُّ
बहुत ग़नी है
وَأَنتُمُ
और तुम
ٱلْفُقَرَآءُ ۚ
मोहताज हो
وَإِن
और अगर
تَتَوَلَّوْا۟
तुम मुँह मोड़ोगे
يَسْتَبْدِلْ
वो बदल लाएगा
قَوْمًا
एक क़ौम को
غَيْرَكُمْ
तुम्हारे सिवा
ثُمَّ
फिर
لَا
not
يَكُونُوٓا۟
ना होंगे वो
أَمْثَـٰلَكُم
तुम जैसे
सुनो! यह तुम्ही लोग हो कि तुम्हें आमंत्रण दिया जा रहा है कि "अल्लाह के मार्ग में ख़र्च करो।" फिर तुमसे कुछ लोग है जो कंजूसी करते है। हालाँकि जो कंजूसी करता है वह वास्तव में अपने आप ही से कंजूसी करता है। अल्लाह तो निस्पृह है, तुम्हीं मुहताज हो। और यदि तुम फिर जाओ तो वह तुम्हारी जगह अन्य लोगों को ले आएगा; फिर वे तुम जैसे न होंगे
तफ़्सीर:
सुनो, तुम वे लोग हो कि तुम्हें कहा जाता है कि अपने धन का एक हिस्सा अल्लाह के रास्ते में खर्च करो, तुमसे अपना पूरा धन खर्च करने के लिए नहीं कहा जाता है, तो तुममें से कुछ लोग अपनी कंजूसी के कारण आवश्यक खर्च को रोक लेते हैं। और जो अपने धन का एक भाग अल्लाह के रास्ते में खर्च करने में कंजूसी करता है, तो वह वास्तव में ख़ुद पर कंजूसी करता है; क्योंकि वह अपने आपको खर्च करने के सवाब से वंचित कर देता है। अल्लाह तो बेनियाज़ है, उसे तुम्हारे खर्च करने की आवश्यकता नहीं है। और तुम ही उसके मुहताज हो। और यदि तुम इस्लाम से कुफ़्र की ओर फिर जाओगे, तो वह तुम्हें नष्ट कर देगा और तुम्हारे अलावा अन्य लोगों को ले आएगा। फिर वे तुम्हारे जैसे नहीं होंगे। बल्कि वे उसके आज्ञाकारी होंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह की राह में खर्च करने की ताकीद के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि कंजूसी करना अपने ही नुकसान का सबब बनता है, अल्लाह की राह में खर्च करने से हमारा ही फायदा है।
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