सूरह अल-फ़तह سورة الفتح
मदनी 29 आयतें
नाम का मतलब
फतह (सुलह-ए-हुदैबिया को कुरआन ने खुली फतह करार दिया)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-फत्ह सुलह-ए-हुदैबिया के मौके पर नाज़िल हुई, जिसे शुरू में सहाबा ने नाकामी समझा था मगर अल्लाह ने इसे खुली फतह करार दिया, क्योंकि इसी सुलह से इस्लाम की तबलीग़ को बहुत फायदा हुआ।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह हमें सिखाती है कि कभी-कभी जो बात ज़ाहिर में नाकामी लगती है, वह असल में बड़ी कामयाबी की बुनियाद होती है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ إِنَّا فَتَحْنَا لَكَ فَتْحًۭا مُّبِينًۭا
إِنَّا
बेशक हम
فَتَحْنَا
फ़तह अता की हमने
لَكَ
आपको
فَتْحًۭا
फ़तह
مُّبِينًۭا
खुली
निश्चय ही हमने तुम्हारे लिए एक खुली विजय प्रकट की,
तफ़्सीर:
निःसंदेह हमने (ऐ रसूल!) आपको हुदैबियह की संधि के रूप में एक स्पष्ट विजय प्रदान की है।
आयत 2
لِّيَغْفِرَ لَكَ ٱللَّهُ مَا تَقَدَّمَ مِن ذَنۢبِكَ وَمَا تَأَخَّرَ وَيُتِمَّ نِعْمَتَهُۥ عَلَيْكَ وَيَهْدِيَكَ صِرَٰطًۭا مُّسْتَقِيمًۭا
لِّيَغْفِرَ
ताकि बख़्श दे
لَكَ
आपके लिए
ٱللَّهُ
अल्लाह
مَا
जो
تَقَدَّمَ
पहले हुआ
مِن
of
ذَنۢبِكَ
आपके क़ुसूर में से
وَمَا
और जो
تَأَخَّرَ
बाद में हुआ
وَيُتِمَّ
और वो पूरा कर दे
نِعْمَتَهُۥ
अपनी नेअमत को
عَلَيْكَ
आप पर
وَيَهْدِيَكَ
और वो रहनुमाई करे आपकी
صِرَٰطًۭا
(तरफ़) रास्ते
مُّسْتَقِيمًۭا
सीधे के
ताकि अल्लाह तुम्हारे अगले और पिछले गुनाहों को क्षमा कर दे और तुमपर अपनी अनुकम्पा पूर्ण कर दे और तुम्हें सीधे मार्ग पर चलाए,
तफ़्सीर:
ताकि अल्लाह आपके इस विजय से पहले हुए और इसके बाद होने वाले गुनाहों को क्षमा कर दे, और आपके धर्म की मदद करके आपपर अपनी अनुकंपा को पूर्ण कर दे, और आपको सीधे मार्ग पर चलाए, जिसमें कोई टेढ़ापन नहीं है और वह इस्लाम का सीधा मार्ग है।
आयत 3
وَيَنصُرَكَ ٱللَّهُ نَصْرًا عَزِيزًا
وَيَنصُرَكَ
और मदद फ़रमाए आपकी
ٱللَّهُ
अल्लाह
نَصْرًا
मदद
عَزِيزًا
ज़बरदस्त
और अल्लाह तुम्हें प्रभावकारी सहायता प्रदान करे
तफ़्सीर:
और अल्लाह आपकी आपके दुश्मनों के विरुद्ध भरपूर सहायता करे, जिसका कोई मुकाबला न कर सके।
आयत 4
هُوَ ٱلَّذِىٓ أَنزَلَ ٱلسَّكِينَةَ فِى قُلُوبِ ٱلْمُؤْمِنِينَ لِيَزْدَادُوٓا۟ إِيمَـٰنًۭا مَّعَ إِيمَـٰنِهِمْ ۗ وَلِلَّهِ جُنُودُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلِيمًا حَكِيمًۭا
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِىٓ
जिसने
أَنزَلَ
नाज़िल की
ٱلسَّكِينَةَ
सकीनत
فِى
in(to)
قُلُوبِ
दिलों में
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों के
لِيَزْدَادُوٓا۟
ताकि वो बढ़ जाऐं
إِيمَـٰنًۭا
ईमान में
مَّعَ
साथ
إِيمَـٰنِهِمْ ۗ
अपने ईमान के
وَلِلَّهِ
और अल्लाह ही के लिए हैं
جُنُودُ
लश्कर
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ ۚ
और ज़मीन के
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلِيمًا
बहुत इल्म वाला
حَكِيمًۭا
ख़ूब हिकमत वाला
वहीं है जिसने ईमानवालों के दिलों में सकीना (प्रशान्ति) उतारी, ताकि अपने ईमान के साथ वे और ईमान की अभिवृद्धि करें - आकाशों और धरती की सभी सेनाएँ अल्लाह ही की है, और अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है। -
तफ़्सीर:
अल्लाह वही है, जिसने ईमान वालों के दिलों में स्थिरता और शांति उतारी, ताकि वे अपने ईमान के साथ ईमान में और बढ़ जाएँ। तथा आकाशों और धरती की सेनाएँ केवल अल्लाह ही की हैं। वह उनके द्वारा अपने बंदों में से जिसका चाहता है, समर्थन करता है। और अल्लाह अपने बंदों के हितों को जानने वाला, सहायता और समर्थन के मामले में जो करता है उसमें पूर्ण हिकमत वाला है।
आयत 5
لِّيُدْخِلَ ٱلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ جَنَّـٰتٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ خَـٰلِدِينَ فِيهَا وَيُكَفِّرَ عَنْهُمْ سَيِّـَٔاتِهِمْ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عِندَ ٱللَّهِ فَوْزًا عَظِيمًۭا
لِّيُدْخِلَ
ताकि वो दाख़िल करे
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिन मर्दों
وَٱلْمُؤْمِنَـٰتِ
और मोमिन औरतों को
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात में
تَجْرِى
बहती हैं
مِن
from
تَحْتِهَا
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ
नहरें
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हैं
فِيهَا
उसमें
وَيُكَفِّرَ
और वो दूर कर दे
عَنْهُمْ
उनसे
سَيِّـَٔاتِهِمْ ۚ
बुराइयाँ उनकी
وَكَانَ
और है
ذَٰلِكَ
ये
عِندَ
with
ٱللَّهِ
अल्लाह के नज़दीक
فَوْزًا
कामयाबी
عَظِيمًۭا
बहुत बड़ी
ताकि वह मोमिन पुरुषों औप मोमिन स्त्रियों को ऐसे बाग़ों में दाख़िल करे जिनके नीचे नहरें बहती होंगी कि वे उनमें सदैव रहें और उनसे उनकी बुराईयाँ दूर कर दे - यह अल्लाह के यहाँ बड़ी सफलता है। -
तफ़्सीर:
ताकि वह अल्लाह पर तथा उसके रसूल पर ईमान रखने वाले पुरुषों और ईमान रखने वाली स्त्रियों को ऐसे बाग़ों में दाखिल करे, जिनके महलों और पेड़ों के नीचे से नहरें बहती हैं और उनके गुनाहों को उनसे मिटा दे और उनपर उनकी पकड़ न करे। और यह जिसका उल्लेख हुआ (अर्थात् जन्नत की प्राप्ति और गुनाहों पर पकड़ होने से मुक्ति) अल्लाह के निकट बहुत बड़ी सफलता है, जिसके बराबर कोई अन्य सफलता नहीं है।
आयत 6
وَيُعَذِّبَ ٱلْمُنَـٰفِقِينَ وَٱلْمُنَـٰفِقَـٰتِ وَٱلْمُشْرِكِينَ وَٱلْمُشْرِكَـٰتِ ٱلظَّآنِّينَ بِٱللَّهِ ظَنَّ ٱلسَّوْءِ ۚ عَلَيْهِمْ دَآئِرَةُ ٱلسَّوْءِ ۖ وَغَضِبَ ٱللَّهُ عَلَيْهِمْ وَلَعَنَهُمْ وَأَعَدَّ لَهُمْ جَهَنَّمَ ۖ وَسَآءَتْ مَصِيرًۭا
وَيُعَذِّبَ
और वो अज़ाब दे
ٱلْمُنَـٰفِقِينَ
मुनाफ़िक़ मर्दों
وَٱلْمُنَـٰفِقَـٰتِ
और मुनाफ़िक़ औरतों को
وَٱلْمُشْرِكِينَ
और मुशरिक मर्दों
وَٱلْمُشْرِكَـٰتِ
और मुशरिक औरतों को
ٱلظَّآنِّينَ
जो गुमान करने वाले हैं
بِٱللَّهِ
अल्लाह के बारे में
ظَنَّ
गुमान
ٱلسَّوْءِ ۚ
बुरा
عَلَيْهِمْ
उन्हीं पर है
دَآئِرَةُ
गर्दिश
ٱلسَّوْءِ ۖ
बुरी
وَغَضِبَ
और ग़ज़बनाक हुआ
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَلَعَنَهُمْ
और उसने लानत की उन पर
وَأَعَدَّ
और उसने तैयार कर रखा है
لَهُمْ
उनके लिए
جَهَنَّمَ ۖ
जहन्नम को
وَسَآءَتْ
और वो बहुत ही बुरा
مَصِيرًۭا
ठिकाना है
और कपटाचारी पुरुषों और कपटाचारी स्त्रियों और बहुदेववादी पुरुषों और बहुदेववादी स्त्रियों को, जो अल्लाह के बारे में बुरा गुमान रखते है, यातना दे। उन्हीं पर बुराई की गर्दिश है। उनपर अल्लाह का क्रोध हुआ और उसने उनपर लानत की, और उसने उनके लिए जहन्नम तैयार कर रखा है, और वह अत्यन्त बुरा ठिकाना है!
तफ़्सीर:
और (ताकि) उन मुनाफ़िक़ पुरुषों और मुनाफ़िक़ स्त्रियों, तथा अल्लाह के साथ साझी ठहराने वाले पुरुषों और साझी ठहराने वाली स्त्रियों को यातना दे, जो अल्लाह के बारे में यह सोच रखते हैं कि वह अपने धर्म की सहायता नहीं करेगा और अपनी बात को सर्वोच्च नहीं करेगा। अतः यातना का चक्र उन्हीं पर लौट आया, उनके कुफ़्र और बुरी सोच के कारण अल्लाह उनपर क्रोधित हुआ और उन्हें अपनी दया से दूर कर दिया, तथा उसने आख़िरत में उनके लिए जहन्नम तैयार कर रखा है, जिसमें वे हमेशा रहने के लिए प्रवेश करेंगे, और जहन्नम बहुत बुरा ठिकाना है, जहाँ वे लौटकर जाएँगे।
आयत 7
وَلِلَّهِ جُنُودُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًا
وَلِلَّهِ
और अल्लाह ही के लिए हैं
جُنُودُ
लश्कर
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ ۚ
और ज़मीन के
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَزِيزًا
बहुत ज़बरदस्त
حَكِيمًا
ख़ूब हिकमत वाला
आकाशों और धरती की सब सेनाएँ अल्लाह ही की है। अल्लाह प्रभुत्वशाली, अत्यन्त तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
और आकाशों और धरती की सब सेनाएँ अल्लाह ही की हैं, जिनके द्वारा वह अपने बंदों में से जिसका चाहता है, समर्थन करता है। और अल्लाह सबपर प्रभुत्वशाली है, उसे कोई पराजित नहीं कर सकता, अपनी रचना, तक़दीर और प्रबंधन में हिकमत वाला है।
आयत 8
إِنَّآ أَرْسَلْنَـٰكَ شَـٰهِدًۭا وَمُبَشِّرًۭا وَنَذِيرًۭا
إِنَّآ
बेशक हम
أَرْسَلْنَـٰكَ
भेजा हमने आपको
شَـٰهِدًۭا
गवाही देने वाला
وَمُبَشِّرًۭا
और ख़ुशख़बरी देने वाला
وَنَذِيرًۭا
और डराने वाला बनाकर
निश्चय ही हमने तुम्हें गवाही देनेवाला और शुभ सूचना देनेवाला और सचेतकर्त्ता बनाकर भेजा,
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) हमने आपको गवाह बनाकर भेजा है। आप क़ियामत के दिन अपनी उम्मत के बारे में गवाही देंगे। और ईमान वालों को उस चीज़ की खुशख़बरी देने वाला बनाकर भेजा है, जो दुनिया में उनके लिए विजय और सशक्तिकरण तैयार किया गया है, और जो आख़िरत में उनके लिए आनंद तैयार किया गया। तथा काफ़िरों को उस चीज़ से डराने वाला बनाकर भेजा है, जो दुनिया में उनके लिए ईमान वालों के हाथों अपमान और पराजय तैयार किया गया है और जो आख़िरत में दर्दनाक यातना तैयार की गई है, जो उनकी प्रतीक्षा कर रही है।
आयत 9
لِّتُؤْمِنُوا۟ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَتُعَزِّرُوهُ وَتُوَقِّرُوهُ وَتُسَبِّحُوهُ بُكْرَةًۭ وَأَصِيلًا
لِّتُؤْمِنُوا۟
ताकि तुम ईमान लाओ
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَرَسُولِهِۦ
और उसके रसूल पर
وَتُعَزِّرُوهُ
और तुम क़ुव्वत दो उसे
وَتُوَقِّرُوهُ
और तुम ताज़ीम करो उसकी
وَتُسَبِّحُوهُ
और तुम तस्बीह बयान करो
بُكْرَةًۭ
सुबह
وَأَصِيلًا
और शाम
ताकि तुम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ, उसे सहायता पहुँचाओ और उसका आदर करो, और प्रातःकाल और संध्या समय उसकी तसबीह करते रहो
तफ़्सीर:
इस उम्मीद में कि तुम अल्लाह पर और उसके रसूल पर ईमान लाओ, उसके रसूल का सम्मान और आदर करो और दिन की शुरुआत और उसके अंत में अल्लाह की पवित्रता का गान करो।
आयत 10
إِنَّ ٱلَّذِينَ يُبَايِعُونَكَ إِنَّمَا يُبَايِعُونَ ٱللَّهَ يَدُ ٱللَّهِ فَوْقَ أَيْدِيهِمْ ۚ فَمَن نَّكَثَ فَإِنَّمَا يَنكُثُ عَلَىٰ نَفْسِهِۦ ۖ وَمَنْ أَوْفَىٰ بِمَا عَـٰهَدَ عَلَيْهُ ٱللَّهَ فَسَيُؤْتِيهِ أَجْرًا عَظِيمًۭا
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يُبَايِعُونَكَ
बैअत करते हैं आपसे
إِنَّمَا
बेशक
يُبَايِعُونَ
वो बैअत करते है
ٱللَّهَ
अल्लाह से
يَدُ
हाथ
ٱللَّهِ
अल्लाह का
فَوْقَ
ऊपर है
أَيْدِيهِمْ ۚ
उनके हाथों के
فَمَن
तो जो कोई
نَّكَثَ
अहद तोड़ दे
فَإِنَّمَا
तो बेशक
يَنكُثُ
वो अहद तोड़ता है
عَلَىٰ
against
نَفْسِهِۦ ۖ
अपने ही नफ़्स पर
وَمَنْ
और जो कोई
أَوْفَىٰ
पूरा करे
بِمَا
उसे जो
عَـٰهَدَ
अहद किया था उसने
عَلَيْهُ
उस पर
ٱللَّهَ
अल्लाह से
فَسَيُؤْتِيهِ
तो अनक़रीब वो देगा उसे
أَجْرًا
अजर
عَظِيمًۭا
बहुत बड़ा
(ऐ नबी) वे लोग जो तुमसे बैअत करते है वे तो वास्तव में अल्लाह ही से बैअत करते है। उनके हाथों के ऊपर अल्लाह का हाथ होता है। फिर जिस किसी ने वचन भंग किया तो वह वचन भंग करके उसका बवाल अपने ही सिर लेता है, किन्तु जिसने उस प्रतिज्ञा को पूरा किया जो उसने अल्लाह से की है तो उसे वह बड़ा बदला प्रदान करेगा
तफ़्सीर:
निश्चय जो लोग (ऐ रसूल!) आपसे मक्का के बहुदेववादियों से लड़ने के लिए 'बै'अते रिज़वान' कर रहे हैं, वे दरअसल अल्लाह से बै'अत कर रहे हैं; क्योंकि वही है जिसने उन्हें मुश्रिकों से लड़ने का आदेश आदेश दिया है और वही उन्हें बदला देगा। बै'अत के समय अल्लाह का हाथ उनके हाथों के ऊपर है और वह उनके बारे में जानता है, उनकी कोई चीज़ उससे छिपी नहीं है। फिर जिसने अपनी बै'अत तोड़ दी और अल्लाह से उसके धर्म का समर्थन करने का जो वादा किया था उसे पूरा नहीं किया, तो उसके अपनी बै'अत को तोड़ने तथा अपने वचन को भंग करने का नुक़सान उसी पर लौटने वाला है। क्योंकि इससे अल्लाह को कोई नुकसान नहीं पहुँचता है। और जिसने अल्लाह से उसके धर्म का समर्थन करने का अपना वादा पूरा किया, तो अल्लाह उसे शीघ्र ही बहुत बड़ा प्रतिफल प्रदान करेगा और वह जन्नत है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सुलह-ए-हुदैबिया को खुली फतह करार दिए जाने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि जो बात ज़ाहिर में नाकामी लगे, हो सकता है वह अल्लाह के यहां बड़ी कामयाबी हो, इसलिए मायूस नहीं होना चाहिए।
आयत 11
سَيَقُولُ لَكَ ٱلْمُخَلَّفُونَ مِنَ ٱلْأَعْرَابِ شَغَلَتْنَآ أَمْوَٰلُنَا وَأَهْلُونَا فَٱسْتَغْفِرْ لَنَا ۚ يَقُولُونَ بِأَلْسِنَتِهِم مَّا لَيْسَ فِى قُلُوبِهِمْ ۚ قُلْ فَمَن يَمْلِكُ لَكُم مِّنَ ٱللَّهِ شَيْـًٔا إِنْ أَرَادَ بِكُمْ ضَرًّا أَوْ أَرَادَ بِكُمْ نَفْعًۢا ۚ بَلْ كَانَ ٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًۢا
سَيَقُولُ
अनक़रीब कहेंगे
لَكَ
आपको
ٱلْمُخَلَّفُونَ
पीछे रहने वाले
مِنَ
of
ٱلْأَعْرَابِ
देहाती/ बदवियों में से
شَغَلَتْنَآ
कि मश्ग़ूल कर लिया हमें
أَمْوَٰلُنَا
हमारे मालों ने
وَأَهْلُونَا
और हमारे घर वालों ने
فَٱسْتَغْفِرْ
पस बख़्शिश माँगिए
لَنَا ۚ
हमारे लिए
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
بِأَلْسِنَتِهِم
अपनी ज़बानों से
مَّا
जो
لَيْسَ
नहीं
فِى
in
قُلُوبِهِمْ ۚ
उनके दिलों में
قُلْ
कह दीजिए
فَمَن
पस कौन
يَمْلِكُ
मालिक होगा
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنَ
against
ٱللَّهِ
अल्लाह से
شَيْـًٔا
किसी चीज़ क
إِنْ
अगर
أَرَادَ
उसने इरादा किया
بِكُمْ
तुम्हारे साथ
ضَرًّا
किसी नुक़्सान का
أَوْ
या
أَرَادَ
उसने इरादा किया
بِكُمْ
तुम्हारे साथ
نَفْعًۢا ۚ
किसी नफ़ा का
بَلْ
बल्कि
كَانَ
है
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِمَا
उससे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
خَبِيرًۢا
पूरा बाख़बर
जो बद्‌दू पीछे रह गए थे, वे अब तुमसे कहेगे, "हमारे माल और हमारे घरवालों ने हमें व्यस्त कर रखा था; तो आप हमारे लिए क्षमा की प्रार्थना कीजिए।" वे अपनी ज़बानों से वे बातें कहते है जो उनके दिलों में नहीं। कहना कि, "कौन है जो अल्लाह के मुक़ाबले में तुम्हारे किए किसी चीज़ का अधिकार रखता है, यदि वह तुम्हें कोई हानि पहुँचानी चाहे या वह तुम्हें कोई लाभ पहुँचाने का इरादा करे? बल्कि जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उसकी ख़बर रखता है। -
तफ़्सीर:
जब (ऐ रसूल!) आप उन देहातियों को डाँट-डपट करेंगे, जिन्हें अल्लाह ने आपके साथ मक्का की यात्रा पर जाने से पीछे छोड़ दिया था, तो वे आपसे कहेंगे : हमें हमारे धन की देखरेख और हमारे बाल-बच्चों की देखभाल ने आपके साथ चलने से रोक दिया। अतः अल्लाह से हमारे पापों के लिए क्षमा की प्रार्थना करें। वे अपनी ज़बानों से नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से उनके लिए क्षमा याचना करने का अनुरोध करते हैं, जो कि उनके दिलों में नहीं है; क्योंकि उन्होंने अपने पापों से तौबा नहीं की है। आप उनसे कह दें : यदि अल्लाह तुम्हें भलाई पहुँचाना चाहे या तुम्हारे साथ बुराई का निश्चय कर ले, तो कोई अल्लाह के मुकाबले में तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकता। बल्कि अल्लाह हमेशा तुम्हारे हर कार्य से अवगत है। तुम्हारा कोई काम, चाहे तुम उसे जितना भी छिपाओ, अल्लाह से छिपा नहीं है।
आयत 12
بَلْ ظَنَنتُمْ أَن لَّن يَنقَلِبَ ٱلرَّسُولُ وَٱلْمُؤْمِنُونَ إِلَىٰٓ أَهْلِيهِمْ أَبَدًۭا وَزُيِّنَ ذَٰلِكَ فِى قُلُوبِكُمْ وَظَنَنتُمْ ظَنَّ ٱلسَّوْءِ وَكُنتُمْ قَوْمًۢا بُورًۭا
بَلْ
बल्कि
ظَنَنتُمْ
गुमान किया तुमने
أَن
कि
لَّن
हरगिज़ नहीं
يَنقَلِبَ
पलट कर आऐंगे
ٱلرَّسُولُ
रसूल
وَٱلْمُؤْمِنُونَ
और मोमिन
إِلَىٰٓ
to
أَهْلِيهِمْ
तरफ़ अपने घर वालों के
أَبَدًۭا
कभी भी
وَزُيِّنَ
और मुज़य्यन कर दी गई
ذَٰلِكَ
ये (बात)
فِى
in
قُلُوبِكُمْ
तुम्हारे दिलों में
وَظَنَنتُمْ
और गुमान किया तुमने
ظَنَّ
गुमान
ٱلسَّوْءِ
बुरा
وَكُنتُمْ
और हो तुम
قَوْمًۢا
लोग
بُورًۭا
हलाक होने वाले
"नहीं, बल्कि तुमने यह समझा कि रसूल और ईमानवाले अपने घरवालों की ओर लौटकर कभी न आएँगे और यह तुम्हारे दिलों को अच्छा लगा। तुमने तो बहुत बुरे गुमान किए और तुम्हीं लोग हुए तबाही में पड़नेवाले।"
तफ़्सीर:
तुमने माल और बाल-बच्चों की देखभाल में व्यस्त होने का जो बहाना पेश किया है, वह तुम्हारे रसूल के साथ न चलने का (वास्तविक) कारण नहीं है। बल्कि, तुमने सोचा था कि रसूल और उनके साथी सभी नष्ट हो जाएँगे, और मदीना में अपने परिवारों के पास नहीं लौटेंगे। शैतान ने इस सोच को तुम्हारे दिलों में सुंदर बना दिया था। तथा तुमने अपने पालनहार के बारे में बुरा गुमान किया कि वह अपने नबी की मदद नहीं करेगा। दरअसल, तुम अल्लाह के बारे में बुरा सोचने और उसके रसूल के साथ चलने से पीछे रहने के कारण, थे ही विनाश होने वाले लोग।
आयत 13
وَمَن لَّمْ يُؤْمِنۢ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ فَإِنَّآ أَعْتَدْنَا لِلْكَـٰفِرِينَ سَعِيرًۭا
وَمَن
और जो कोई
لَّمْ
ना
يُؤْمِنۢ
वो ईमान लाया
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَرَسُولِهِۦ
और उसके रसूल पर
فَإِنَّآ
तो बेशक हम
أَعْتَدْنَا
तैयार कर रखा है हमने
لِلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के लिए
سَعِيرًۭا
भड़कती हुई आग को
और अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान न लाया, तो हमने भी इनकार करनेवालों के लिए भड़कती आग तैयार कर रखी है
तफ़्सीर:
और जो अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान न लाए, वह काफ़िर है। और हमने क़ियामत के दिन काफ़िरों के लिए भड़कती आग तैयार कर रखी है, जिसमें उन्हें यातना दी जाएगी।
आयत 14
وَلِلَّهِ مُلْكُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ يَغْفِرُ لِمَن يَشَآءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَآءُ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورًۭا رَّحِيمًۭا
وَلِلَّهِ
और अल्लाह ही के लिए है
مُلْكُ
बादशाहत
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ ۚ
और ज़मीन की
يَغْفِرُ
वो बख़्श देगा
لِمَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहेगा
وَيُعَذِّبُ
और वो अज़ाब देगा
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۚ
वो चाहेगा
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
غَفُورًۭا
बहुत बख़्शने वाला
رَّحِيمًۭا
निहायत रहम करने वाला
अल्लाह ही की है आकाशों और धरती की बादशाही। वह जिसे चाहे क्षमा करे और जिसे चाहे यातना दे। और अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
आकाशों और धरती की बादशाहत केवल अल्लाह ही के लिए है। वह अपने बंदों में से जिसके गुनाहों को चाहता है, माफ़ कर देता है और अपने अनुग्रह से उसे जन्नत में दाखिल करता है। तथा अपने बंदों में से जिसे चाहता है, अपने न्याय के साथ यातना देता है। और अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों के गुनाहों को खूब माफ़ करने वाला, उनपर बहुत दया करने वाला है।
आयत 15
سَيَقُولُ ٱلْمُخَلَّفُونَ إِذَا ٱنطَلَقْتُمْ إِلَىٰ مَغَانِمَ لِتَأْخُذُوهَا ذَرُونَا نَتَّبِعْكُمْ ۖ يُرِيدُونَ أَن يُبَدِّلُوا۟ كَلَـٰمَ ٱللَّهِ ۚ قُل لَّن تَتَّبِعُونَا كَذَٰلِكُمْ قَالَ ٱللَّهُ مِن قَبْلُ ۖ فَسَيَقُولُونَ بَلْ تَحْسُدُونَنَا ۚ بَلْ كَانُوا۟ لَا يَفْقَهُونَ إِلَّا قَلِيلًۭا
سَيَقُولُ
अनक़रीब कहेंगे
ٱلْمُخَلَّفُونَ
पीछे रहने वाले
إِذَا
जब
ٱنطَلَقْتُمْ
चलोगे तुम
إِلَىٰ
towards
مَغَانِمَ
तरफ़ ग़नीमतों के
لِتَأْخُذُوهَا
ताकि तुम ले सको उन्हें
ذَرُونَا
छोड़ दो हमें
نَتَّبِعْكُمْ ۖ
हम पीछे चलें तुम्हारे
يُرِيدُونَ
वो चाहते है
أَن
कि
يُبَدِّلُوا۟
वो बदल डालें
كَلَـٰمَ
कलाम
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह का
قُل
कह दीजिए
لَّن
हरगिज़ नहीं
تَتَّبِعُونَا
तुम पीछे आओगे हमारे
كَذَٰلِكُمْ
इसी तरह
قَالَ
फ़रमाया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِن
before
قَبْلُ ۖ
इससे पहले
فَسَيَقُولُونَ
पस ज़रूर वो कहेंगे
بَلْ
बल्कि
تَحْسُدُونَنَا ۚ
तुम हसद करते हो हम से
بَلْ
बल्कि
كَانُوا۟
हैं वो
لَا
not
يَفْقَهُونَ
नहीं वो समझते
إِلَّا
मगर
قَلِيلًۭا
बहुत कम
जब तुम ग़नीमतों को प्राप्त करने के लिए उनकी ओर चलोगे तो पीछे रहनेवाले कहेंगे, "हमें भी अनुमति दी जाए कि हम तुम्हारे साथ चले।" वे चाहते है कि अल्लाह का कथन को बदल दे। कह देना, "तुम हमारे साथ कदापि नहीं चल सकते। अल्लाह ने पहले ही ऐसा कह दिया है।" इसपर वे कहेंगे, "नहीं, बल्कि तुम हमसे ईर्ष्या कर रहे हो।" नहीं, बल्कि वे लोग समझते थोड़े ही है
तफ़्सीर:
जब (ऐ ईमान वालो!) तुम ख़ैबर की ग़नीमतों को लेने के लिए निकलोगे, जिनका अल्लाह ने तुमसे हुदैबिया की संधि के बाद वादा किया था, तो वे लोग जिन्हें अल्लाह ने पीछे छोड़ दिया था, कहेंगे : हमें छोड़ो कि हम तुम्हारे साथ चलें। ताकि हम भी ग़नीमत का धन प्राप्त कर सकें। ये पीछे छोड़ दिए गए लोग अपने इस अनुरोध से अल्लाह के उस वादे को बदलना चाहते हैं, जो उसने सुलह हुदैबिया के बाद ईमान वालों से वादा किया था कि वह ख़ैबर की ग़नीमतें केवल उन्हीं को प्रदान करेगा। (ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : "तुम हमारे साथ उन ग़नीमतों की ओर हरगिज़ नहीं चल सकते। क्योंकि अल्लाह ने हमसे वादा किया है कि ख़ैबर की ग़नीमत उनके लिए विशिष्ट है, जो हुदैबिया में मौजूद थे। तो वे ज़रूर कहेंगे : तुम्हरा हमें ख़ैबर की ओर जाने से रोकना अल्लाह के आदेश से नहीं, बल्कि हमसे ईर्ष्या के कारण है। हालाँकि बात यह नहीं है कि जो इन पीछे छोड़ दिए गए लोगों ने दावा किया है, बल्कि वे अल्लाह के आदेशों और निषेधों को बहुत ही कम समझते हैं। इसी कारण वे उसकी अवज्ञा के गर्त में गिर गए।
आयत 16
قُل لِّلْمُخَلَّفِينَ مِنَ ٱلْأَعْرَابِ سَتُدْعَوْنَ إِلَىٰ قَوْمٍ أُو۟لِى بَأْسٍۢ شَدِيدٍۢ تُقَـٰتِلُونَهُمْ أَوْ يُسْلِمُونَ ۖ فَإِن تُطِيعُوا۟ يُؤْتِكُمُ ٱللَّهُ أَجْرًا حَسَنًۭا ۖ وَإِن تَتَوَلَّوْا۟ كَمَا تَوَلَّيْتُم مِّن قَبْلُ يُعَذِّبْكُمْ عَذَابًا أَلِيمًۭا
قُل
कह दीजिए
لِّلْمُخَلَّفِينَ
पीछे रहने वालों से
مِنَ
of
ٱلْأَعْرَابِ
देहाती /बदवियों में से
سَتُدْعَوْنَ
अनक़रीब तुम बुलाए जाओगे
إِلَىٰ
to
قَوْمٍ
तरफ़ एक क़ौम के
أُو۟لِى
possessors of military might
بَأْسٍۢ
possessors of military might
شَدِيدٍۢ
सख़्त जंगजू/ लड़ने वाली
تُقَـٰتِلُونَهُمْ
तुम जंग करोगे उनसे
أَوْ
या
يُسْلِمُونَ ۖ
वो मुसलमान हो जाऐंगे
فَإِن
फिर अगर
تُطِيعُوا۟
तुम इताअत करोगे
يُؤْتِكُمُ
देगा तुम्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَجْرًا
अजर
حَسَنًۭا ۖ
अच्छा
وَإِن
और अगर
تَتَوَلَّوْا۟
तुम मुँह मोड़ गए
كَمَا
जैसा कि
تَوَلَّيْتُم
तुमने मुँह मोड़ा था
مِّن
before
قَبْلُ
इससे पहले
يُعَذِّبْكُمْ
वो अज़ाब देगा तुम्हें
عَذَابًا
अज़ाब
أَلِيمًۭا
दर्दनाक
पीछे रह जानेवाले बद्‌दूओं से कहना, "शीघ्र ही तुम्हें ऐसे लोगों की ओर बुलाया जाएगा जो बड़े युद्धवीर है कि तुम उनसे लड़ो या वे आज्ञाकारी हो जाएँ। तो यदि तुम आज्ञाकारी हो जाएँ। तो यदि तुम आज्ञापालन करोगे तो अल्लाह तुम्हें अच्छा बदला प्रदान करेगा। किन्तु यदि तुम फिर गए, जैसे पहले फिर गए थे, तो वह तुम्हें दुखद यातना देगा।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उन बद्दुओं से, जो मक्का के सफर में आपके साथ जाने से पीछे रह गए थे, उनकी परीक्षा के तौर पर, कह दें : बहुत जल्द तुम्हें एक ऐसे समुदाय से लड़ने के लिए कहा जाएगा, जो युद्ध में प्रबल शूरवीर हैं। तुम उनसे अल्लाह के मार्ग में लड़ाई करोगे, या वे बिना लड़ाई के इस्लाम में दाखिल हो जाएँगे। अगर तुम अल्लाह की बात मानते हुए उनसे युद्ध करोगे, तो वह तुम्हें अच्छा बदला अर्थात् जन्नत प्रदान करेगा। और अगर तुम उसकी आज्ञा मानने से फिर गए (जैसा कि तुम उस समय आज्ञा मानने से फिर गए जब तुम उसके साथ मक्का जाने से पीछे रह गए), तो वह तुम्हें दर्दनाक यातना देगा।
आयत 17
لَّيْسَ عَلَى ٱلْأَعْمَىٰ حَرَجٌۭ وَلَا عَلَى ٱلْأَعْرَجِ حَرَجٌۭ وَلَا عَلَى ٱلْمَرِيضِ حَرَجٌۭ ۗ وَمَن يُطِعِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ يُدْخِلْهُ جَنَّـٰتٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَـٰرُ ۖ وَمَن يَتَوَلَّ يُعَذِّبْهُ عَذَابًا أَلِيمًۭا
لَّيْسَ
नहीं है
عَلَى
upon
ٱلْأَعْمَىٰ
अंधे पर
حَرَجٌۭ
कोई गुनाह
وَلَا
और ना
عَلَى
on
ٱلْأَعْرَجِ
लंगड़े पर
حَرَجٌۭ
कोई गुनाह
وَلَا
और ना
عَلَى
on
ٱلْمَرِيضِ
मरीज़ पर
حَرَجٌۭ ۗ
कोई गुनाह
وَمَن
और जो कोई
يُطِعِ
इताअत करेगा
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَرَسُولَهُۥ
और उसके रसूल की
يُدْخِلْهُ
वो दाख़िल करेगा उसे
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात में
تَجْرِى
बहती हैं
مِن
from
تَحْتِهَا
उनके नीचे से
ٱلْأَنْهَـٰرُ ۖ
नहरें
وَمَن
और जो कोई
يَتَوَلَّ
मुँह फेरेगा
يُعَذِّبْهُ
वो अज़ाब देगा उसे
عَذَابًا
अज़ाब
أَلِيمًۭا
दर्दनाक
न अन्धे के लिए कोई हरज है, न लँगडे के लिए कोई हरज है और न बीमार के लिए कोई हरज है। जो भी अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करेगा, उसे वह ऐसे बाग़ों में दाख़िल करके, जिनके नीचे नहरे बह रही होगी, किन्तु जो मुँह फेरेगा उसे वह दुखद यातना देगा
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति अंधापन, या लंगड़ापन, या बीमारी के कारण अक्षम है, यदि वह अल्लाह के मार्ग में लड़ने से पीछे रह गया, तो उसपर कोई पाप नहीं है। और जो अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करेगा, वह उसे ऐसे बाग़ों में दाखिल करेगा, जिनके महलों और पेड़ों के नीचे से नहरें बहती हैं। और जो उन दोनों की आज्ञाकारिता से मुँह फेरेगा, अल्लाह उसे दर्दनाक अज़ाब देगा।
आयत 18
۞ لَّقَدْ رَضِىَ ٱللَّهُ عَنِ ٱلْمُؤْمِنِينَ إِذْ يُبَايِعُونَكَ تَحْتَ ٱلشَّجَرَةِ فَعَلِمَ مَا فِى قُلُوبِهِمْ فَأَنزَلَ ٱلسَّكِينَةَ عَلَيْهِمْ وَأَثَـٰبَهُمْ فَتْحًۭا قَرِيبًۭا
۞ لَّقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
رَضِىَ
राज़ी हो गया
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَنِ
with
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों से
إِذْ
जब
يُبَايِعُونَكَ
वो बैअत कर रहे थे आपसे
تَحْتَ
नीचे
ٱلشَّجَرَةِ
दरख़्त के
فَعَلِمَ
तो उसने जान लिया
مَا
जो
فِى
(was) in
قُلُوبِهِمْ
उनके दिलों में था
فَأَنزَلَ
तो उसने उतारी
ٱلسَّكِينَةَ
सकीनत /तस्कीन
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَأَثَـٰبَهُمْ
और अता की उन्हें
فَتْحًۭا
फ़तह
قَرِيبًۭا
क़रीबी
निश्चय ही अल्लाह मोमिनों से प्रसन्न हुआ, जब वे वृक्ष के नीचे तुमसे बैअत कर रहे थे। उसने जान लिया जो कुछ उनके दिलों में था। अतः उनपर उसने सकीना (प्रशान्ति) उतारी और बदले में उन्हें मिलनेवाली विजय निश्चित कर दी;
तफ़्सीर:
निश्चय अल्लाह ईमान वालों से प्रसन्न हो गया, जबकि वे हुदैबियह के स्थान पर पेड़ के नीचे आपसे बै'अत कर रहे थे, जो बै'अत-ए-रिज़वान के नाम से प्रसिद्ध है। तो उसने उनके दिलों में जो ईमान, इख़्लास और सच्चाई थी, उसे जान लिया। अतः उनके दिलों पर शांति एवं स्थिरता उतार दी। तथा इसके बदले में उन्हें एक निकट विजय प्रदान की, जो ख़ैबर की विजय है। उन्हें यह सब इसके बदले दिया कि वे इससे पहले मक्का में दाखिल न हो सके।
आयत 19
وَمَغَانِمَ كَثِيرَةًۭ يَأْخُذُونَهَا ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًۭا
وَمَغَانِمَ
और ग़नीमतें
كَثِيرَةًۭ
बहुत सी
يَأْخُذُونَهَا ۗ
वो हासिल करेंगे जिन्हें
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَزِيزًا
बहुत ज़बरदस्त
حَكِيمًۭا
बहुत हिकमत वाला
और बहुत-सी ग़नीमतें भी, जिन्हें वे प्राप्त करेंगे। अल्लाह प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
और उसने उन्हें बहुत-से ग़नीमत के धन दिए, जो वे ख़ैबर वालों से हासिल करेंगे। और अल्लाह हमेशा से सब पर प्रभुत्वशाली है, उसे कोई हरा नहीं सकता। वह अपनी रचना, तक़दीर (नियति) और प्रबंधन में पूर्ण हिकमत वाला है।
आयत 20
وَعَدَكُمُ ٱللَّهُ مَغَانِمَ كَثِيرَةًۭ تَأْخُذُونَهَا فَعَجَّلَ لَكُمْ هَـٰذِهِۦ وَكَفَّ أَيْدِىَ ٱلنَّاسِ عَنكُمْ وَلِتَكُونَ ءَايَةًۭ لِّلْمُؤْمِنِينَ وَيَهْدِيَكُمْ صِرَٰطًۭا مُّسْتَقِيمًۭا
وَعَدَكُمُ
वादा किया तुमसे
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مَغَانِمَ
ग़नीमतों का
كَثِيرَةًۭ
बहुत सी
تَأْخُذُونَهَا
तुम हासिल करोगे जिन्हें
فَعَجَّلَ
तो उसने जल्दी दी
لَكُمْ
तुम्हें
هَـٰذِهِۦ
ये
وَكَفَّ
और उसने रोक दिए
أَيْدِىَ
हाथ
ٱلنَّاسِ
लोगों क
عَنكُمْ
तुम से
وَلِتَكُونَ
और ताकि वो हो जाए
ءَايَةًۭ
एक निशानी
لِّلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों के लिए
وَيَهْدِيَكُمْ
और वो हिदायत दे तुम्हें
صِرَٰطًۭا
(तरफ़) रास्ते
مُّسْتَقِيمًۭا
सीधे के
अल्लाह ने तुमसे बहुत-सी गंनीमतों का वादा किया हैं, जिन्हें तुम प्राप्त करोगे। यह विजय तो उसने तुम्हें तात्कालिक रूप से निश्चित कर दी। और लोगों के हाथ तुमसे रोक दिए (कि वे तुमपर आक्रमण करने का साहस न कर सकें) और ताकि ईमानवालों के लिए एक निशानी हो। और वह सीधे मार्ग की ओर तुम्हारा मार्गदर्शन करे
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने (ऐ मोमिनो!) तुमसे बहुत-से ग़नीमत के धन का वादा किया है, जो तुम भविष्य में इस्लामी विजयों में प्राप्त करोगे। फिर उसने ख़ैबर की ग़नीमत तुम्हें जल्दी प्रदान कर दी, और यहूदियों के हाथों को रोक दिया, जब उन्होंने तुम्हारे युद्ध में निकलने के बाद, तुम्हारे परिवारों को नुकसान पहुँचाना चाहा। ताकि ये शीघ्र प्राप्त होने वाले ग़नीमत के धन, तुम्हारे लिए अल्लाह की मदद और समर्थन की निशानी बन जाएँ, और वह तुम्हें सीधे रास्ते पर चलाए, जिसमें कोई टेढ़ापन नहीं है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
पीछे रह जाने वाले बद्दुओं की मज़म्मत और बैअत-ए-रिज़वान का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि मुश्किल मौकों पर साथ देना असली वफादारी की परख है।
आयत 21
وَأُخْرَىٰ لَمْ تَقْدِرُوا۟ عَلَيْهَا قَدْ أَحَاطَ ٱللَّهُ بِهَا ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرًۭا
وَأُخْرَىٰ
और दूसरी (ग़नीमतें )
لَمْ
नहीं
تَقْدِرُوا۟
तुम क़ादिर हो
عَلَيْهَا
जिन पर
قَدْ
तहक़ीक़
أَحَاطَ
घेर रखा है
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
بِهَا ۚ
उन्हें
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرًۭا
ख़ूब क़ुदरत रखने वाला
इसके अतिरिक्त दूसरी और विजय का भी वादा है, जिसकी सामर्थ्य अभी तुम्हे प्राप्त नहीं, उन्हें अल्लाह ने घेर रखा है। अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
तथा अल्लाह ने तुमसे अन्य ग़नीमतों का (भी) वादा किया है, जिन्हें तुम इस समय प्राप्त करने में सक्षम नहीं हो। उनपर केवल अल्लाह ही शक्ति रखता है और वे उसके ज्ञान और प्रबंधन में हैं। और अल्लाह हर चीज़ पर सर्वशक्तिमान है, उसे कोई चीज़ अक्षम नहीं कर सकती।
आयत 22
وَلَوْ قَـٰتَلَكُمُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لَوَلَّوُا۟ ٱلْأَدْبَـٰرَ ثُمَّ لَا يَجِدُونَ وَلِيًّۭا وَلَا نَصِيرًۭا
وَلَوْ
और अगर
قَـٰتَلَكُمُ
जंग करते तुमसे
ٱلَّذِينَ
वो लोग जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لَوَلَّوُا۟
अलबत्ता वो फेर लेते
ٱلْأَدْبَـٰرَ
पुश्तें
ثُمَّ
फिर
لَا
not
يَجِدُونَ
ना वो पाते
وَلِيًّۭا
कोई दोस्त
وَلَا
और ना
نَصِيرًۭا
कोई मददगार
यदि (मक्का के) इनकार करनेवाले तुमसे लड़ते तो अवश्य ही पीठ फेर जाते। फिर यह भी कि वे न तो कोई संरक्षक पाएँगे और न कोई सहायक
तफ़्सीर:
और यदि अल्लाह और उसके रसूल का इनकार करने वाले (ऐ ईमान वालो!) तुमसे युद्ध करते, तो तुम्हारे सामने पराजित होकर भाग खड़े होते, फिर वे अपने मामलों को संभालने के लिए न कोई संरक्षक पाते, और न ही उन्हें कोई सहायक मिलता, जो तुम्हारे ख़िलाफ़ लड़ने में उनकी मदद करता।
आयत 23
سُنَّةَ ٱللَّهِ ٱلَّتِى قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلُ ۖ وَلَن تَجِدَ لِسُنَّةِ ٱللَّهِ تَبْدِيلًۭا
سُنَّةَ
तरीक़ा
ٱللَّهِ
अल्लाह का
ٱلَّتِى
वो जो
قَدْ
तहक़ीक़
خَلَتْ
वो गुज़र चुका
مِن
before
قَبْلُ ۖ
इससे पहले
وَلَن
और हरगिज़ ना
تَجِدَ
आप पाऐंगे
لِسُنَّةِ
तरीक़े को
ٱللَّهِ
अल्लाह के
تَبْدِيلًۭا
बदलने वाला
यह अल्लाह की उस रीति के अनुकूल है जो पहले से चली आई है, और तुम अल्लाह की रीति में कदापि कोई परिवर्तन न पाओगे
तफ़्सीर:
ईमान वालों की जीत और काफ़िरों की हार हर समय और जगह में तय है। यह उन समुदायों में अल्लाह का नियम रहा है, जो इन इनकार करने वालों से पहले गुज़रे हैं। और (ऐ रसूल!) आप अल्लाह के नियम में कदापि कोई बदलाव नहीं पाएँगे।
आयत 24
وَهُوَ ٱلَّذِى كَفَّ أَيْدِيَهُمْ عَنكُمْ وَأَيْدِيَكُمْ عَنْهُم بِبَطْنِ مَكَّةَ مِنۢ بَعْدِ أَنْ أَظْفَرَكُمْ عَلَيْهِمْ ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرًا
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
كَفَّ
रोक दिया
أَيْدِيَهُمْ
उनके हाथों को
عَنكُمْ
तुम से
وَأَيْدِيَكُمْ
और तुम्हारे हाथों को
عَنْهُم
उनसे
بِبَطْنِ
वादी में
مَكَّةَ
मक्का की
مِنۢ
after
بَعْدِ
उसके बाद
أَنْ
कि
أَظْفَرَكُمْ
उसने कामयाब किया तुम्हें
عَلَيْهِمْ ۚ
उन पर
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِمَا
उसे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
بَصِيرًا
ख़ूब देखने वाला
वही है जिसने उसके हाथ तुमसे और तुम्हारे हाथ उनसे मक्के की घाटी में रोक दिए इसके पश्चात कि वह तुम्हें उनपर प्रभावी कर चुका था। अल्लाह उसे देख रहा था जो कुछ तुम कर रहे थे
तफ़्सीर:
और वही है जिसने बहुदेववादियों के हाथों को तुमसे रोक दिया, जब उनमें से लगभग अस्सी आदमी हुदैबियह में तुम्हें नुकसान पहुँचाने के लिए आए। तथा उसने तुम्हारे हाथों को उनसे रोक दिया। अतः तुमने न तो उन्हें क़त्ल किया और न ही उन्हें नुकसान पहुँचाया। बल्कि उन्हें बंदी बनाने में सक्षम बनाए जाने के बाद भी तुमने उन्हें रिहा कर दिया। और जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसे हमेशा से खूब देखने वाला है, तुम्हारे कर्मों में से कुछ भी उससे छिपा नहीं है।
आयत 25
هُمُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَصَدُّوكُمْ عَنِ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ وَٱلْهَدْىَ مَعْكُوفًا أَن يَبْلُغَ مَحِلَّهُۥ ۚ وَلَوْلَا رِجَالٌۭ مُّؤْمِنُونَ وَنِسَآءٌۭ مُّؤْمِنَـٰتٌۭ لَّمْ تَعْلَمُوهُمْ أَن تَطَـُٔوهُمْ فَتُصِيبَكُم مِّنْهُم مَّعَرَّةٌۢ بِغَيْرِ عِلْمٍۢ ۖ لِّيُدْخِلَ ٱللَّهُ فِى رَحْمَتِهِۦ مَن يَشَآءُ ۚ لَوْ تَزَيَّلُوا۟ لَعَذَّبْنَا ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِنْهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا
هُمُ
वो ही हैं
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
وَصَدُّوكُمْ
और उन्होंने रोका तुम्हें
عَنِ
from
ٱلْمَسْجِدِ
Al-Masjid Al-Haraam
ٱلْحَرَامِ
मस्जिदे हराम से
وَٱلْهَدْىَ
और क़ुर्बानी के जानवरों को
مَعْكُوفًا
जो रोके हुए थे
أَن
कि
يَبْلُغَ
वो पहुँचें
مَحِلَّهُۥ ۚ
अपनी हलाल गाह को
وَلَوْلَا
और अगर ना होते
رِجَالٌۭ
कुछ मर्द
مُّؤْمِنُونَ
मोमिन
وَنِسَآءٌۭ
और औरतें
مُّؤْمِنَـٰتٌۭ
मोमिन
لَّمْ
नहीं
تَعْلَمُوهُمْ
तुम जानते उन्हें
أَن
कि
تَطَـُٔوهُمْ
तुम पामाल कर दोगे उन्हें
فَتُصِيبَكُم
फिर पहुँचती तुम्हें
مِّنْهُم
उन(की वजह) से
مَّعَرَّةٌۢ
कोई तक्लीफ़
بِغَيْرِ
बग़ैर
عِلْمٍۢ ۖ
इल्म के
لِّيُدْخِلَ
ताकि दाख़िल करे
ٱللَّهُ
अल्लाह
فِى
to
رَحْمَتِهِۦ
अपनी रहमत में
مَن
जिसे
يَشَآءُ ۚ
वो चाहे
لَوْ
अगर
تَزَيَّلُوا۟
वो अलग हो गए होते
لَعَذَّبْنَا
अलबत्ता अज़ाब देते हम
ٱلَّذِينَ
उन लोगों को जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
مِنْهُمْ
उनमें से
عَذَابًا
अज़ाब
أَلِيمًا
दर्दनाक
ये वही लोग तो है जिन्होंने इनकार किया और तुम्हें मस्जिदे हराम (काबा) से रोक दिया और क़ुरबानी के बँधे हुए जानवरों को भी इससे रोके रखा कि वे अपने ठिकाने पर पहुँचे। यदि यह ख़याल न होता कि बहुत-से मोमिन पुरुष और मोमिन स्त्रियाँ (मक्का में) मौजूद है, जिन्हें तुम नहीं जानते, उन्हें कुचल दोगे, फिर उनके सिलसिले में अनजाने तुमपर इल्ज़ाम आएगा (तो युद्ध की अनुमति दे दी जाती, अनुमति इसलिए नहीं दी गई) ताकि अल्लाह जिसे चाहे अपनी दयालुता में दाख़िल कर ले। यदि वे ईमानवाले अलग हो गए होते तो उनमें से जिन लोगों ने इनकार किया उनको हम अवश्य दुखद यातना देते
तफ़्सीर:
ये वही लोग हैं जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का इनकार किया, तुम्हें मस्जिद-ए-हराम से रोका और क़ुर्बानी के जानवरों को रोका, इस हाल में कि वे अपने ज़बह के स्थान हरम तक पहुँचने से रोके हुए थे। यदि वहाँ कुछ अल्लाह पर ईमान रखने वाले पुरुषों और उसपर ईमान रखने वाली स्त्रियाँ मौजूद न होतीं, जिन्हें तुम नहीं जानते, तो तुम उन्हें काफ़िरों के साथ क़त्ल कर देते, फिर तुम्हें उन्हें अनजाने में क़त्ल करने से पाप लगता और खून बहा देना पड़ता; तो तुम्हें मक्का पर चढ़ाई करने की अनुमति दे दी जाती, ताकि अल्लाह जिसे चाहे अपनी रहमत में दाखिल कर दे, जैसे मक्का के ईमान वाले लोग। अगर मक्का में काफ़िर लोग मोमिनों से अलग होते, तो हम उन लोगों को दर्दनाक यातना देते, जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का इनकार किया।
आयत 26
إِذْ جَعَلَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ فِى قُلُوبِهِمُ ٱلْحَمِيَّةَ حَمِيَّةَ ٱلْجَـٰهِلِيَّةِ فَأَنزَلَ ٱللَّهُ سَكِينَتَهُۥ عَلَىٰ رَسُولِهِۦ وَعَلَى ٱلْمُؤْمِنِينَ وَأَلْزَمَهُمْ كَلِمَةَ ٱلتَّقْوَىٰ وَكَانُوٓا۟ أَحَقَّ بِهَا وَأَهْلَهَا ۚ وَكَانَ ٱللَّهُ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمًۭا
إِذْ
जब
جَعَلَ
रख लिया
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
فِى
in
قُلُوبِهِمُ
अपने दिलों में
ٱلْحَمِيَّةَ
हमीयत(ज़िद) को
حَمِيَّةَ
(जैसे) हमीयत
ٱلْجَـٰهِلِيَّةِ
जाहिलियत की
فَأَنزَلَ
तो नाज़िल की
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
سَكِينَتَهُۥ
सकीनत अपनी
عَلَىٰ
upon
رَسُولِهِۦ
अपने रसूल पर
وَعَلَى
and upon
ٱلْمُؤْمِنِينَ
और मोमिनों पर
وَأَلْزَمَهُمْ
और उसने लाज़िम कर दी उन पर
كَلِمَةَ
बात
ٱلتَّقْوَىٰ
तक़्वा की
وَكَانُوٓا۟
और थे वो
أَحَقَّ
ज़्यादा हक़दार
بِهَا
उसके
وَأَهْلَهَا ۚ
और अहल उसके
وَكَانَ
और है
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ को
عَلِيمًۭا
ख़ूब जानने वाला
याद करो जब इनकार करनेवाले लोगों ने अपने दिलों में हठ को जगह दी, अज्ञानपूर्ण हठ को; तो अल्लाह ने अपने रसूल पर और ईमानवालो पर सकीना (प्रशान्ति) उतारी और उन्हें परहेज़गारी (धर्मपरायणता) की बात का पाबन्द रखा। वे इसके ज़्यादा हक़दार और इसके योग्य भी थे। अल्लाह तो हर चीज़ जानता है
तफ़्सीर:
जब अल्लाह और उसके रसूल का इनकार करने वालों ने अपने दिलों में हठ को जगह दी, जाहिलिय्यत (पूर्व-इस्लामी युग) का हठ, जिसका संबंध सत्य को साबित करने से नहीं, बल्कि इच्छाओं के पालन से है। इसलिए उन्होंने हुदैबिया के साल, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मक्का में प्रवेश को अस्वीकार कर दिया; इस डर से कि उन्हें यह शर्म न दिलाया जाए कि मुहम्मद उन पर हावी हो गए। तो अल्लाह ने अपने रसूल पर और मोमिनों पर अपनी ओर से शांति एवं स्थिरता उतार दी। इसलिए क्रोध ने उन्हें बहुदेववादियों के साथ उनके कार्यों जैसा व्यवहार करने के लिए प्रेरित नहीं किया। और अल्लाह ने मोमिनों को सत्य के वचन का प्रतिबद्ध कर दिया, जो कि 'ला इलाहा इल्लल्लाह' है और यह कि वे उसके अधिकार को पूरा करें। सो उन्होंने ऐसा करके दिखाया और ईमान वाले दूसरों की तुलना में इस वचन के अधिक हक़दार थे, तथा वे इसके योग्य लोग थे; क्योंकि उनके दिलों में जो अच्छाई थी अल्लाह उसे जानता था। और अल्लाह हमेशा से सब कुछ जानने वाला है, उससे कुछ भी छिपा नहीं है।
आयत 27
لَّقَدْ صَدَقَ ٱللَّهُ رَسُولَهُ ٱلرُّءْيَا بِٱلْحَقِّ ۖ لَتَدْخُلُنَّ ٱلْمَسْجِدَ ٱلْحَرَامَ إِن شَآءَ ٱللَّهُ ءَامِنِينَ مُحَلِّقِينَ رُءُوسَكُمْ وَمُقَصِّرِينَ لَا تَخَافُونَ ۖ فَعَلِمَ مَا لَمْ تَعْلَمُوا۟ فَجَعَلَ مِن دُونِ ذَٰلِكَ فَتْحًۭا قَرِيبًا
لَّقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
صَدَقَ
सच्ची ख़बर दी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
رَسُولَهُ
अपने रसूल को
ٱلرُّءْيَا
ख़्वाब में
بِٱلْحَقِّ ۖ
साथ हक़ के
لَتَدْخُلُنَّ
अलबत्ता तुम ज़रूर दाख़िल होगे
ٱلْمَسْجِدَ
मस्जिदे
ٱلْحَرَامَ
हराम में
إِن
अगर
شَآءَ
चाहा
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ءَامِنِينَ
अमन की हालत में
مُحَلِّقِينَ
मुंडवाए हुए
رُءُوسَكُمْ
अपने सिरों को
وَمُقَصِّرِينَ
और तरशवाए हुए
لَا
not
تَخَافُونَ ۖ
नहीं तुम्हें ख़ौफ़ होगा
فَعَلِمَ
तो उसने जान लिया
مَا
जो
لَمْ
नहीं
تَعْلَمُوا۟
तुम जानते थे
فَجَعَلَ
तो उसने कर दी
مِن
besides
دُونِ
अलावा
ذَٰلِكَ
उसके
فَتْحًۭا
फ़तह
قَرِيبًا
क़रीबी
निश्चय ही अल्लाह ने अपने रसूल को हक़ के साथ सच्चा स्वप्न दिखाया, "यदि अल्लाह ने चाहा तो तुम अवश्य मस्जिदे हराम (काबा) में प्रवेश करोगे बेखटके, अपने सिर के बाल मुड़ाते और कतरवाते हुए, तुम्हें कोई भय न होगा।" हुआ यह कि उसने वह बात जान ली जो तुमने नहीं जानी। अतः इससे पहले उसने शीघ्र प्राप्त होनेवाली विजय तुम्हारे लिए निश्चिंत कर दी
तफ़्सीर:
निश्चय अल्लाह ने अपने रसूल के सत्य के साथ सच्चा स्वप्न दिखाया, जब उसने आपको उसे आपके सपने में दिखाया और आपने अपने साथियों को उसकी सूचना दी। जो कि यह था कि आप और आपके साथी अपने दुश्मनों से सुरक्षित अल्लाह के सम्मानित घर में दाखिल होंगे। उनमें से कुछ अपने सिर मुँडवाने वाले होंगे और कुछ बाल कटाने वाले, यह उम्रा के अनुष्ठान के अंत का सूचक होगा।अल्लाह को (ऐ मोमिनो!) तुम्हारे हित की उन बातों का ज्ञान है, जो तुम नहीं जानते, अतः उस वर्ष मक्का में प्रवेश के द्वारा सपने की पूर्ति से पहले उसने एक निकट विजय रख दी। और यह अल्लाह की बनाई हुई हुदैबियह की संधि है तथा उसके बाद हुदैबियह में शामिल मोमिनों के हाथों पर घटित होने वाली ख़ैबर की विजय है।
आयत 28
هُوَ ٱلَّذِىٓ أَرْسَلَ رَسُولَهُۥ بِٱلْهُدَىٰ وَدِينِ ٱلْحَقِّ لِيُظْهِرَهُۥ عَلَى ٱلدِّينِ كُلِّهِۦ ۚ وَكَفَىٰ بِٱللَّهِ شَهِيدًۭا
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِىٓ
जिसने
أَرْسَلَ
भेजा
رَسُولَهُۥ
अपने रसूल को
بِٱلْهُدَىٰ
साथ हिदायत
وَدِينِ
and (the) religion
ٱلْحَقِّ
और दीने हक़ के
لِيُظْهِرَهُۥ
ताकि वो ग़ालिब कर दे
عَلَى
over
ٱلدِّينِ
ऊपर दीन
كُلِّهِۦ ۚ
तमाम उसके
وَكَفَىٰ
और काफ़ी है
بِٱللَّهِ
अल्लाह
شَهِيدًۭا
गवाह
वही है जिसने अपने रसूल को मार्गदर्शन और सत्यधर्म के साथ भेजा, ताकि उसे पूरे के पूरे धर्म पर प्रभुत्व प्रदान करे और गवाह की हैसियत से अल्लाह काफ़ी है
तफ़्सीर:
अल्लाह ही है, जिसने अपने रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को स्पष्ट विवरण और सत्य धर्म अर्थात् इस्लाम के साथ भेजा; ताकि वह उसे उसके सभी विरोधी धर्मों से ऊँचा कर दे। तथा अल्लाह ने इसकी गवाही दी है और अल्लाह गवाह के रूप में पर्याप्त है।
आयत 29
مُّحَمَّدٌۭ رَّسُولُ ٱللَّهِ ۚ وَٱلَّذِينَ مَعَهُۥٓ أَشِدَّآءُ عَلَى ٱلْكُفَّارِ رُحَمَآءُ بَيْنَهُمْ ۖ تَرَىٰهُمْ رُكَّعًۭا سُجَّدًۭا يَبْتَغُونَ فَضْلًۭا مِّنَ ٱللَّهِ وَرِضْوَٰنًۭا ۖ سِيمَاهُمْ فِى وُجُوهِهِم مِّنْ أَثَرِ ٱلسُّجُودِ ۚ ذَٰلِكَ مَثَلُهُمْ فِى ٱلتَّوْرَىٰةِ ۚ وَمَثَلُهُمْ فِى ٱلْإِنجِيلِ كَزَرْعٍ أَخْرَجَ شَطْـَٔهُۥ فَـَٔازَرَهُۥ فَٱسْتَغْلَظَ فَٱسْتَوَىٰ عَلَىٰ سُوقِهِۦ يُعْجِبُ ٱلزُّرَّاعَ لِيَغِيظَ بِهِمُ ٱلْكُفَّارَ ۗ وَعَدَ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ مِنْهُم مَّغْفِرَةًۭ وَأَجْرًا عَظِيمًۢا
مُّحَمَّدٌۭ
मोहम्मद
رَّسُولُ
रसूल हैं
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
مَعَهُۥٓ
साथ हैं उनके
أَشِدَّآءُ
सख़्त हैं
عَلَى
against
ٱلْكُفَّارِ
काफ़िरों पर
رُحَمَآءُ
मेहरबान हैं
بَيْنَهُمْ ۖ
आपस में
تَرَىٰهُمْ
आप देखेंगे उन्हें
رُكَّعًۭا
रुकूअ करते हुए
سُجَّدًۭا
सजदा करते हुए
يَبْتَغُونَ
वो तलाश करते हैं
فَضْلًۭا
फ़ज़ल
مِّنَ
from Allah
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
وَرِضْوَٰنًۭا ۖ
और रज़ामंदी
سِيمَاهُمْ
अलामत उनकी
فِى
(is) on
وُجُوهِهِم
उनके चेहरों में है
مِّنْ
from
أَثَرِ
(the) trace
ٱلسُّجُودِ ۚ
सजदों के असर से
ذَٰلِكَ
ये है
مَثَلُهُمْ
मिसाल उनकी
فِى
in
ٱلتَّوْرَىٰةِ ۚ
तौरात में
وَمَثَلُهُمْ
और मिसाल उनकी
فِى
in
ٱلْإِنجِيلِ
इन्जील में
كَزَرْعٍ
मानिन्द एक खेती के
أَخْرَجَ
जिसने निकाली
شَطْـَٔهُۥ
कोंपल अपनी
فَـَٔازَرَهُۥ
फिर उसने मज़बूत किया उसको
فَٱسْتَغْلَظَ
फिर वो सख़्त हो गई
فَٱسْتَوَىٰ
फिर वो खड़ी हो गई
عَلَىٰ
upon
سُوقِهِۦ
अपने तने पर
يُعْجِبُ
वो ख़ुश करती है
ٱلزُّرَّاعَ
काश्तकारों को
لِيَغِيظَ
ताकि वो ग़ज़बनाक कर दे
بِهِمُ
उनके ज़रिए
ٱلْكُفَّارَ ۗ
काफ़िरों को
وَعَدَ
वादा किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱلَّذِينَ
उन लोगों से जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَعَمِلُوا۟
और उन्होंने अमल किए
ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ
नेक
مِنْهُم
उनमें से
مَّغْفِرَةًۭ
बख़्शिश का
وَأَجْرًا
और अजर
عَظِيمًۢا
बहुत बड़े का
अल्लाह के रसूल मुहम्मद और जो लोग उनके साथ हैं, वे इनकार करनेवालों पर भारी हैं, आपस में दयालु है। तुम उन्हें रुकू में, सजदे में, अल्लाह का उदार अनुग्रह और उसकी प्रसन्नता चाहते हुए देखोगे। वे अपने चहरों से पहचाने जाते हैं जिनपर सजदों का प्रभाव है। यही उनकी विशेषता तौरात में और उनकी विशेषता इंजील में उस खेती की तरह उल्लिखित है जिसने अपना अंकुर निकाला; फिर उसे शक्ति पहुँचाई तो वह मोटा हुआ और वह अपने तने पर सीधा खड़ा हो गया। खेती करनेवालों को भा रहा है, ताकि उनसे इनकार करनेवालों का भी जी जलाए। उनमें से जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए उनसे अल्लाह ने क्षमा और बदले का वादा किया है
तफ़्सीर:
मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के रसूल हैं और उनके सहाबा जो उनके साथ हैं, युद्ध करने वाले काफ़िरों के खिलाफ बहुत सख़्त हैं, आपस में दयालु, एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति रखने वाले और एक-दूसरे से प्रेम करने वाले हैं। (ऐ देखने वाले!) तुम उन्हें अल्लाह के सामने रुकू' और सजदा करते हुए देखोगे, वे अल्लाह से अनुरोध करते हैं कि उन्हें क्षमा और उत्तम बदला प्रदान करे और उनसे प्रसन्न हो जाए। उनकी निशानी उनका रंग रूप तथा उनके चेहरों पर सजदों के चिह्न होगी। उनके चेहरों से नमाज़ का नूर टपक रहा होगा। उनका यह विवरण मूसा अलैहिस्सलाम पर उतरने वाली किताब तौरात में वर्णित विवरण है। ईसा अलैहिस्सलाम पर उतरने वाली किताब इंजील में उनका उदाहरण यह है कि वे आपसी सहयोग और अपनी पूर्णता में, उस पौधे के समान हैं, जिसने अपना कोंपल निकाला, फिर वह शक्तिशाली और मोटा होकर अपने तने के बल पर खड़ा हो गया, उसकी शक्ति और पूर्णता खेती करने वालों को भाती है; ताकि अल्लाह उन (सहाबा) के द्वारा काफिरों को गुस्सा दिलाए और वे उनकी शक्ति, एक-दूसरे से अटूट संबंध और पूर्णता को देखकर जल-भुन जाएँ। अल्लाह ने सहाबा में से उन लोगों से, जो अल्लाह पर ईमान लाए और नेक अमल किए, उनके पापों की क्षमा का वादा किया है, इसलिए उनके गुनाहों पर उनकी पकड़ नहीं करेगा। तथा अपनी ओर से बहुत बड़े प्रतिफल का वादा किया है, जो कि जन्नत है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नबी ﷺ की सिफात और सहाबा के आपसी रहम-ओ-करम के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि कुफ्फार के सामने सख्त और आपस में नर्म रहना ईमान वालों की खूबसूरत सिफत है।
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