सूरह अल-हुजुरात سورة الحجرات
मदनी 18 आयतें
नाम का मतलब
हुजरे / कमरे (नबी ﷺ के घरों के बाहर से आवाज़ लगाने के आदाब से)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-हुजुरात में समाजी और अखलाकी आदाब सिखाए गए हैं, जैसे नबी ﷺ के सामने आवाज़ बुलंद न करना, बदगुमानी और ग़ीबत से बचना, और मुसलमानों के आपसी भाईचारे की ताकीद।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह मुसलमानों के आपसी अखलाक और समाजी आदाब की सबसे जामे तालीम देने वाली सूरतों में से एक मानी जाती है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تُقَدِّمُوا۟ بَيْنَ يَدَىِ ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ ۖ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌۭ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Do) not
تُقَدِّمُوا۟
ना तुम क़दम बढ़ाओ
بَيْنَ
before Allah
يَدَىِ
आगे
ٱللَّهِ
अल्लाह से
وَرَسُولِهِۦ ۖ
और उसके रसूल से
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ ۚ
अल्लाह से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
سَمِيعٌ
ख़ूब सुनने वाला है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
ऐ ईमानवालो! अल्लाह और उसके रसूल से आगे न बढो और अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने वालो और उसकी शरीयत का पालन करने वालो! किसी वचन या कर्म द्वारा अल्लाह और उसके रसूल से आगे न बढ़ो। और अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, डरते रहो। निःसंदेह अल्लाह तुम्हारी बातों को सुनने वाला, तुम्हारे कार्यों को जानने वाला है। उनमें से कोई भी चीज़ उससे छूट नहीं सकती और वह तुम्हें उनका बदला देगा।
आयत 2
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَرْفَعُوٓا۟ أَصْوَٰتَكُمْ فَوْقَ صَوْتِ ٱلنَّبِىِّ وَلَا تَجْهَرُوا۟ لَهُۥ بِٱلْقَوْلِ كَجَهْرِ بَعْضِكُمْ لِبَعْضٍ أَن تَحْبَطَ أَعْمَـٰلُكُمْ وَأَنتُمْ لَا تَشْعُرُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Do) not
تَرْفَعُوٓا۟
ना तुम ऊँचा करो
أَصْوَٰتَكُمْ
अपनी आवाज़ों को
فَوْقَ
ऊपर
صَوْتِ
आवाज़ के
ٱلنَّبِىِّ
नबी की
وَلَا
और ना
تَجْهَرُوا۟
तुम बुलन्द आवाज़ से करो
لَهُۥ
उनसे
بِٱلْقَوْلِ
बात
كَجَهْرِ
मानिन्द बुलन्द करने के
بَعْضِكُمْ
तुम्हारे बाज़ के
لِبَعْضٍ
बाज़ के लिए
أَن
कि
تَحْبَطَ
(ना) ज़ाया हो जाऐं
أَعْمَـٰلُكُمْ
आमाल तुम्हारे
وَأَنتُمْ
और तुम
لَا
(do) not
تَشْعُرُونَ
ना शऊर रखते हो
ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो! तुम अपनी आवाज़ों को नबी की आवाज़ से ऊँची न करो। और जिस तरह तुम आपस में एक-दूसरे से ज़ोर से बोलते हो, उससे ऊँची आवाज़ में बात न करो। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे कर्म अकारथ हो जाएँ और तुम्हें ख़बर भी न हो
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने वालो और उसकी शरीयत का पालन करने वालो! उसके रसूल के साथ शिष्टाचार से पेश आओ और नबी से बात करते समय अपनी आवाज़ को उनकी आवाज़ से ऊँची न होने दो, और उन्हें आपस में एक-दूसरे को पुकारने की तरह उनके नाम से न पुकारो। बल्कि उन्हें ऐ नबी! और ऐ रसूल! कहकर विनम्रता से पुकारो; ऐसा न हो कि कहीं तुम्हारे कर्मों का बदला अकारथ चला जाए और तुम्हें इसका एहसास तक न हो।
आयत 3
إِنَّ ٱلَّذِينَ يَغُضُّونَ أَصْوَٰتَهُمْ عِندَ رَسُولِ ٱللَّهِ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ ٱمْتَحَنَ ٱللَّهُ قُلُوبَهُمْ لِلتَّقْوَىٰ ۚ لَهُم مَّغْفِرَةٌۭ وَأَجْرٌ عَظِيمٌ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَغُضُّونَ
पस्त रखते हैं
أَصْوَٰتَهُمْ
अपनी आवाज़ों को
عِندَ
पास
رَسُولِ
(of the) Messenger of Allah
ٱللَّهِ
रसूल अल्लाह के
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही वो लोग हैं
ٱلَّذِينَ
जो
ٱمْتَحَنَ
आज़मा लिए
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
قُلُوبَهُمْ
दिल उनके
لِلتَّقْوَىٰ ۚ
तक़्वा के लिए
لَهُم
उनके लिए
مَّغْفِرَةٌۭ
बख़्शिश है
وَأَجْرٌ
और अजर है
عَظِيمٌ
बहुत बड़ा
वे लोग जो अल्लाह के रसूल के समक्ष अपनी आवाज़ों को दबी रखते है, वही लोग है जिनके दिलों को अल्लाह ने परहेज़गारी के लिए जाँचकर चुन लिया है। उनके लिए क्षमा और बड़ा बदला है
तफ़्सीर:
जो लोग अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास अपनी आवाज़ें धीमी रखते हैं, वही लोग हैं, जिनके दिलों को अल्लाह ने अपनी परहेज़गारी के लिए जाँच लिया है और उन्हें उसके लिए चुन लिया है। उनके लिए उनके पापों की क्षमा है, इसलिए वह उनकी पकड़ नहीं करेगा। तथा उनके लिए क़ियामत के दिन महान प्रतिफल है, जो कि यह है कि अल्लाह उन्हें जन्नत में दाखिल करेगा।
आयत 4
إِنَّ ٱلَّذِينَ يُنَادُونَكَ مِن وَرَآءِ ٱلْحُجُرَٰتِ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يُنَادُونَكَ
आवाज़ देते हैं आपको
مِن
from
وَرَآءِ
बाहर से
ٱلْحُجُرَٰتِ
हुजरों के
أَكْثَرُهُمْ
अक्सर उनके
لَا
(do) not
يَعْقِلُونَ
नहीं वो अक़्ल रखते
जो लोग (ऐ नबी) तुम्हें कमरों के बाहर से पुकारते है उनमें से अधिकतर बुद्धि से काम नहीं लेते
तफ़्सीर:
जो बद्दू लोग (ऐ रसूल!) आपको, आपकी पत्नियों के कमरों के बाहर से पुकारते हैं, उनमें से अधिकांश नहीं समझते।
आयत 5
وَلَوْ أَنَّهُمْ صَبَرُوا۟ حَتَّىٰ تَخْرُجَ إِلَيْهِمْ لَكَانَ خَيْرًۭا لَّهُمْ ۚ وَٱللَّهُ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
وَلَوْ
और अगर
أَنَّهُمْ
ये कि वो
صَبَرُوا۟
वो सब्र करते
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
تَخْرُجَ
आप निकलते
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
لَكَانَ
अलबत्ता होता
خَيْرًۭا
बेहतर
لَّهُمْ ۚ
उनके लिए
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
यदि वे धैर्य से काम लेते यहाँ तक कि तुम स्वयं निकलकर उनके पास आ जाते तो यह उनके लिए अच्छा होता। किन्तु अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
और यदि ये लोग जो (ऐ रसूल!) आपको आपकी पत्नियों के कमरों के बाहर से पुकारते हैं, धैर्य रखते और आपको न पुकारते यहाँ तक कि आप उनके पास निकल कर आते, फिर वे धीमी आवाज़ में आपसे बात करते; तो यह उनके लिए आपको बाहर से पुकारने की तुलना में बेहतर होता; क्योंकि इसमें आदर और सम्मान पाया जाता है। तथा अल्लाह उनमें से तथा उनके अलावा लोगों में से तौबा करने वालों के पापों को माफ़ करने वाला है और उन्हें उनकी अज्ञानता के कारण क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 6
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِن جَآءَكُمْ فَاسِقٌۢ بِنَبَإٍۢ فَتَبَيَّنُوٓا۟ أَن تُصِيبُوا۟ قَوْمًۢا بِجَهَـٰلَةٍۢ فَتُصْبِحُوا۟ عَلَىٰ مَا فَعَلْتُمْ نَـٰدِمِينَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
إِن
अगर
جَآءَكُمْ
लाए तुम्हारे पास
فَاسِقٌۢ
कोई फ़ासिक़
بِنَبَإٍۢ
किसी ख़बर को
فَتَبَيَّنُوٓا۟
तो तहक़ीक़ कर लिया करो
أَن
कि
تُصِيبُوا۟
(ना) तुम तक्लीफ़ पहुँचाओ
قَوْمًۢا
किसी क़ौम को
بِجَهَـٰلَةٍۢ
जिहालत से
فَتُصْبِحُوا۟
फिर तुम हो जाओ
عَلَىٰ
ऊपर
مَا
उसके जो
فَعَلْتُمْ
किया तुमने
نَـٰدِمِينَ
नादिम
ऐ लोगों, जो ईमान लाए हो! यदि कोई अवज्ञाकारी तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आए तो उसकी छानबीन कर लिया करो। कहीं ऐसा न हो कि तुम किसी गिरोह को अनजाने में तकलीफ़ और नुक़सान पहुँचा बैठो, फिर अपने किए पर पछताओ
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान लाने वालो और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो! यदि कोई दुराचारी व्यक्ति तुम्हारे पास किसी समुदाय के बारे में कोई समाचार लेकर आए, तो उसके समाचार की प्रामाणिकता को सत्यापित कर लिया करो, और उसपर विश्वास करने में जल्दबाज़ी न करो; ऐसा न हो कि (यदि तुमने बिना छानबीन के उसकी खबर पर विश्वास कर लिया) तुम किसी समुदाय को कुछ नुक़सान पहुँचा दो, जबकि तुम उनके बारे में सच्चाई से अनजान हो। फिर उन्हें नुक़सान पहुँचाने के बाद तुम्हें पछताना पड़े, जब तुम्हारे लिए यह स्पष्ट हो जाए कि उसकी ख़बर झूठी है।
आयत 7
وَٱعْلَمُوٓا۟ أَنَّ فِيكُمْ رَسُولَ ٱللَّهِ ۚ لَوْ يُطِيعُكُمْ فِى كَثِيرٍۢ مِّنَ ٱلْأَمْرِ لَعَنِتُّمْ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ حَبَّبَ إِلَيْكُمُ ٱلْإِيمَـٰنَ وَزَيَّنَهُۥ فِى قُلُوبِكُمْ وَكَرَّهَ إِلَيْكُمُ ٱلْكُفْرَ وَٱلْفُسُوقَ وَٱلْعِصْيَانَ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلرَّٰشِدُونَ
وَٱعْلَمُوٓا۟
और जान लो
أَنَّ
बेशक
فِيكُمْ
तुम में
رَسُولَ
रसूल हैं
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के
لَوْ
अगर
يُطِيعُكُمْ
वो कहा मानें तुम्हारा
فِى
in
كَثِيرٍۢ
बहुत से
مِّنَ
of
ٱلْأَمْرِ
मामलात में
لَعَنِتُّمْ
अलबत्ता मुश्किल में पड़ जाओ तुम
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
حَبَّبَ
महबूब बना दिया
إِلَيْكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْإِيمَـٰنَ
ईमान को
وَزَيَّنَهُۥ
और उसने मुज़य्यन कर दिया उसे
فِى
in
قُلُوبِكُمْ
तुम्हारे दिलों में
وَكَرَّهَ
और उसने नापसंदीदा कर दिया
إِلَيْكُمُ
तुम्हारी तरफ़
ٱلْكُفْرَ
कुफ़्र
وَٱلْفُسُوقَ
और गुनाह
وَٱلْعِصْيَانَ ۚ
और नाफ़रमानी को
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلرَّٰشِدُونَ
जो हिदायत याफ़्ता हैं
जान लो कि तुम्हारे बीच अल्लाह का रसूल मौजूद है। बहुत-से मामलों में यदि वह तुम्हारी बात मान ले तो तुम कठिनाई में पड़ जाओ। किन्तु अल्लाह ने तुम्हारे लिए ईमान को प्रिय बना दिया और उसे तुम्हारे दिलों में सुन्दरता दे दी और इनकार, उल्लंघन और अवज्ञा को तुम्हारे लिए बहुत अप्रिय बना दिया।
तफ़्सीर:
और (ऐ ईमान वालों!) जान लो कि तुम्हारे बीच अल्लाह के रसूल मौजूद हैं जिनपर वह़्य (प्रकाशना) उतरती है। इसलिए झूठ बोलने से सावधान रहो। क्योंकि अल्लाह उनपर वह़्य उतारकर उन्हें तुम्हारे झूठ के बारे में बता देगा। वह उसे अधिक जानते हैं जिसमें तुम्हारा हित है। अगर वह तुम्हारे बहुत-से सुझावों में तुम्हारी बात मान लें, तो तुम कठिनाई में पड़ जाओगे, जो वह तुम्हारे लिए पसंद नहीं करता है। लेकिन अल्लाह ने अपने अनुग्रह से तुम्हारे लिए ईमान को प्रिय कर दिया और उसे तुम्हारे दिलों में सुंदर बना दिया है, इसलिए तुम ईमान ले आए तथा उसने कुफ़्र, अवज्ञा और पाप को तुम्हारे लिए घिनौना बना दिया। ये लोग जो इन गुणों से सुसज्जित हैं वही हिदायत और भलाई के रास्ते पर चलने वाले हैं।
आयत 8
فَضْلًۭا مِّنَ ٱللَّهِ وَنِعْمَةًۭ ۚ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌۭ
فَضْلًۭا
फ़ज़ल है
مِّنَ
from Allah
ٱللَّهِ
अल्लाह की तरफ़ से
وَنِعْمَةًۭ ۚ
और नेअमत
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌ
ख़ूब इल्म वाला है
حَكِيمٌۭ
ख़ूब हिकमत वाला है
ऐसे ही लोग अल्लाह के उदार अनुग्रह और अनुकम्पा से सूझबूझवाले है। और अल्लाह सब कुछ जाननेवाला, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
तुम्हें जो कुछ प्राप्त हुआ (जैसे तुम्हारे दिलों में भलाई को सुंदर और बुराई को अप्रिय बनाना), वह केवल अल्लाह का अनुग्रह है, जो उसने तुमपर किया है और उसकी नेमत है, जो उसने तुम्हें प्रदान की है। और अल्लाह अपने बंदों में से उसे खूब जानने वाला है, जो उसका शुक्र अदा करता है, इसलिए उसे सामर्थ्य प्रदान करता है, तथा पूर्ण हिकमत वाला है क्योंकि वह हर चीज़ को उसके उचित स्थान पर रखता है।
आयत 9
وَإِن طَآئِفَتَانِ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ ٱقْتَتَلُوا۟ فَأَصْلِحُوا۟ بَيْنَهُمَا ۖ فَإِنۢ بَغَتْ إِحْدَىٰهُمَا عَلَى ٱلْأُخْرَىٰ فَقَـٰتِلُوا۟ ٱلَّتِى تَبْغِى حَتَّىٰ تَفِىٓءَ إِلَىٰٓ أَمْرِ ٱللَّهِ ۚ فَإِن فَآءَتْ فَأَصْلِحُوا۟ بَيْنَهُمَا بِٱلْعَدْلِ وَأَقْسِطُوٓا۟ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُقْسِطِينَ
وَإِن
और अगर
طَآئِفَتَانِ
दो गिरोह
مِنَ
among
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों में से
ٱقْتَتَلُوا۟
वो बाहम लड़ पड़ें
فَأَصْلِحُوا۟
तो सुलह करा दो
بَيْنَهُمَا ۖ
दर्मियान उन दोनों के
فَإِنۢ
फिर अगर
بَغَتْ
ज़्यादती करे
إِحْدَىٰهُمَا
उन दोनों में से एक
عَلَى
on
ٱلْأُخْرَىٰ
दूसरे पर
فَقَـٰتِلُوا۟
तो लड़ो
ٱلَّتِى
उससे जो
تَبْغِى
ज़्यादती करे
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
تَفِىٓءَ
वो पलट आए
إِلَىٰٓ
तरफ़
أَمْرِ
(the) command
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के हुक्म के
فَإِن
फिर अगर
فَآءَتْ
वो पलट आए
فَأَصْلِحُوا۟
तो सुलह करा दो
بَيْنَهُمَا
दर्मियान उन दोनों के
بِٱلْعَدْلِ
साथ अदल के
وَأَقْسِطُوٓا۟ ۖ
और इन्साफ़ करो
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يُحِبُّ
वो पसंद करता है
ٱلْمُقْسِطِينَ
इन्साफ़ करने वालों को
यदि मोमिनों में से दो गिरोह आपस में लड़ पड़े तो उनके बीच सुलह करा दो। फिर यदि उनमें से एक गिरोह दूसरे पर ज़्यादती करे, तो जो गिरोह ज़्यादती कर रहा हो उससे लड़ो, यहाँ तक कि वह अल्लाह के आदेश की ओर पलट आए। फिर यदि वह पलट आए तो उनके बीच न्याय के साथ सुलह करा दो, और इनसाफ़ करो। निश्चय ही अल्लाह इनसाफ़ करनेवालों को पसन्द करता है
तफ़्सीर:
यदि मोमिनों के दो समूह आपस में लड़ पड़ें, तो (ऐ मोमिनो!) दोनों के बीच सुलह करा दो, इस प्रकार कि उन दोनों को अपने विवाद में अल्लाह की शरीयत को मध्यस्थ बनाने के लिए आमंत्रित करो। फिर यदि दोनों में से एक सुलह से इनकार कर दे और ज़्यादती करे, तो ज़्यादती करने वाले समूह से लड़ो, यहाँ तक कि वह अल्लाह के फैसले की ओर पलट आए। अगर वह अल्लाह के फैसले की ओर पलट आए, तो दोनों के बीच न्याय और निष्पक्षता के साथ सुलह करा दो और दोनों के बीच अपने निर्णय में न्याय से काम लो। निःसंदेह अल्लाह उन लोगों से प्रेम करता है, जो अपने निर्णय में न्याय से काम लेते हैं।
आयत 10
إِنَّمَا ٱلْمُؤْمِنُونَ إِخْوَةٌۭ فَأَصْلِحُوا۟ بَيْنَ أَخَوَيْكُمْ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
إِنَّمَا
बेशक
ٱلْمُؤْمِنُونَ
मोमिन तो
إِخْوَةٌۭ
भाई-भाई हैं
فَأَصْلِحُوا۟
तो सुलह करा दो
بَيْنَ
दर्मियान
أَخَوَيْكُمْ ۚ
अपने दो भाइयों के
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تُرْحَمُونَ
तुम रहम किए जाओ
मोमिन तो भाई-भाई ही है। अतः अपने दो भाईयो के बीच सुलह करा दो और अल्लाह का डर रखो, ताकि तुमपर दया की जाए
तफ़्सीर:
ईमान वाले तो इस्लाम में भाई हैं, और इस्लाम में भाईचारे का तक़ाज़ा है यह है कि (ऐ ईमान वालो!) तुम अपने दो झगड़ने वाले भाइयों के बीच मेल-मिलाप करा दो। तथा अल्लाह से, उसकी आज्ञाओं का पालन करके और उसके निषेधों से दूर रहकर, डरते रहो; इस आशा में कि तुमपर दया की जाए।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नबी ﷺ के सामने अदब, फासिक की खबर की तहकीक और मुसलमानों में सुलह का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कोई भी खबर बगैर तहकीक के आगे नहीं बढ़ानी चाहिए, यह बड़े फसाद से बचाता है।
आयत 11
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا يَسْخَرْ قَوْمٌۭ مِّن قَوْمٍ عَسَىٰٓ أَن يَكُونُوا۟ خَيْرًۭا مِّنْهُمْ وَلَا نِسَآءٌۭ مِّن نِّسَآءٍ عَسَىٰٓ أَن يَكُنَّ خَيْرًۭا مِّنْهُنَّ ۖ وَلَا تَلْمِزُوٓا۟ أَنفُسَكُمْ وَلَا تَنَابَزُوا۟ بِٱلْأَلْقَـٰبِ ۖ بِئْسَ ٱلِٱسْمُ ٱلْفُسُوقُ بَعْدَ ٱلْإِيمَـٰنِ ۚ وَمَن لَّمْ يَتُبْ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Let) not
يَسْخَرْ
ना मज़ाक़ उड़ाए
قَوْمٌۭ
कोई क़ौम
مِّن
[of]
قَوْمٍ
किसी क़ौम का
عَسَىٰٓ
हो सकता है
أَن
कि
يَكُونُوا۟
हों वो
خَيْرًۭا
बेहतर
مِّنْهُمْ
उनसे
وَلَا
और ना
نِسَآءٌۭ
औरतें
مِّن
[of]
نِّسَآءٍ
औरतों का
عَسَىٰٓ
हो सकता है
أَن
कि
يَكُنَّ
हों वो
خَيْرًۭا
बेहतर
مِّنْهُنَّ ۖ
उनसे
وَلَا
और ना
تَلْمِزُوٓا۟
तुम ऐब लगाओ
أَنفُسَكُمْ
अपनों को
وَلَا
और ना
تَنَابَزُوا۟
तुम चिढ़ाओ एक दूसरे को
بِٱلْأَلْقَـٰبِ ۖ
साथ(बुरे) अलक़ाब के
بِئْسَ
कितना बुरा है
ٱلِٱسْمُ
नाम
ٱلْفُسُوقُ
फ़िस्क़ में
بَعْدَ
बाद
ٱلْإِيمَـٰنِ ۚ
ईमान के
وَمَن
और जो कोई
لَّمْ
ना
يَتُبْ
तौबा करे
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلظَّـٰلِمُونَ
जो ज़ालिम हैं
ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो! न पुरुषों का कोई गिरोह दूसरे पुरुषों की हँसी उड़ाए, सम्भव है वे उनसे अच्छे हों और न स्त्रियाँ स्त्रियों की हँसी उड़ाए, सम्भव है वे उनसे अच्छी हों, और न अपनों पर ताने कसो और न आपस में एक-दूसरे को बुरी उपाधियों से पुकारो। ईमान के पश्चात अवज्ञाकारी का नाम जुडना बहुत ही बुरा है। और जो व्यक्ति बाज़ न आए, तो ऐसे ही व्यक्ति ज़ालिम है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान लाने वालो और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो! तुम्हारे पुरुषों का कोई समूह दूसरे समूह का मज़ाक न उड़ाए, संभव है कि जिनका मज़ाक उड़ाया जा रहा है, वे अल्लाह के निकट अच्छे हों, और मायने वही रखता है जो अल्लाह के निकट है। और न कोई स्त्रियाँ दूसरी स्त्रियों का मज़ाक उड़ाएँ, संभव है कि जिन स्त्रियों का मज़ाक उड़ाया जा रहा है, वे अल्लाह के निकट बेहतर हों। और अपने भाइयों पर दोष न लगाओ, क्योंकि वे तुम्हारी अपनी जानों के दर्जे में हैं। और तुममें से कोई किसी को ऐसी उपाधि के द्वारा शरम न दिलाए, जिसे वह नापसंद करता है, जैसा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आगमन से पहले कुछ अंसारियों का हाल था। तुममें से जो ऐसा करेगा, वह अवज्ञाकारी है। ईमान के बाद अवज्ञा की विशेषता बहुत बुरी विशेषता है। और जिसने इन पापों से तौबा नहीं की, तो वही लोग अपने किए हुए पापों के कारण खुद को विनाश के संसाधनों में लाकर, अपने आपपर अत्याचार करने वाले हैं।
आयत 12
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱجْتَنِبُوا۟ كَثِيرًۭا مِّنَ ٱلظَّنِّ إِنَّ بَعْضَ ٱلظَّنِّ إِثْمٌۭ ۖ وَلَا تَجَسَّسُوا۟ وَلَا يَغْتَب بَّعْضُكُم بَعْضًا ۚ أَيُحِبُّ أَحَدُكُمْ أَن يَأْكُلَ لَحْمَ أَخِيهِ مَيْتًۭا فَكَرِهْتُمُوهُ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ تَوَّابٌۭ رَّحِيمٌۭ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you who believe
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
ٱجْتَنِبُوا۟
इज्तिनाब करो /बचो
كَثِيرًۭا
बहुत ज़्यादा
مِّنَ
of
ٱلظَّنِّ
गुमान करने से
إِنَّ
बेशक
بَعْضَ
बाज़
ٱلظَّنِّ
गुमान
إِثْمٌۭ ۖ
गुनाह हैं
وَلَا
और ना
تَجَسَّسُوا۟
तुम तजस्सुस करो
وَلَا
और ना
يَغْتَب
ग़ीबत करे
بَّعْضُكُم
बाज़ तुम्हारा
بَعْضًا ۚ
बाज़ की
أَيُحِبُّ
क्या पसंद करता है
أَحَدُكُمْ
तुम में से कोई एक
أَن
कि
يَأْكُلَ
वो खाए
لَحْمَ
गोश्त
أَخِيهِ
अपने भाई
مَيْتًۭا
मुर्दा का
فَكَرِهْتُمُوهُ ۚ
पस तुम नापसंद करते हो उसे
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ ۚ
अल्लाह से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
تَوَّابٌۭ
बहुत तौबा क़ुबूल करने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
ऐ ईमान लानेवालो! बहुत से गुमानों से बचो, क्योंकि कतिपय गुमान गुनाह होते है। और न टोह में पड़ो और न तुममें से कोई किसी की पीठ पीछे निन्दा करे - क्या तुममें से कोई इसको पसन्द करेगा कि वह मरे हुए भाई का मांस खाए? वह तो तुम्हें अप्रिय होगी ही। - और अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो! बहुत-से ऐसे आरोपों से बचो, जो उन्हें अनिवार्य करने वाले कारणों और संकेतों (लक्षणों) पर आधारित नहीं हैं। निश्चय कुछ गुमान पाप हैं, जैसे किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में बुरा ख़याल रखना, जो नेक दिखाई देता है। और ईमान वालों की छिपी हुई बातों (दोषों) के पीछे न पड़ो। तथा कोई व्यक्ति अपने भाई के बारे में ऐसी बात का उल्लेख न करे, जो उसे नापसंद हो। क्योंकि उसका उल्लेख ऐसी बात के साथ करना, जो उसे नापसंद है, उसके मरे हुए मांस को खाने के समान है। क्या तुममें से कोई अपने मरे हुए भाई का मांस खाना चाहेगा?! अतः उसकी गीबत करने को नापसंद करो, क्योंकि वह उसके समान है। तथा अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से दूर रहकर, डरते रहो। निश्चय अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को बहुत ज़्यादा माफ़ करने वाला, उनपर बहुत दया करने वाला है।
आयत 13
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَـٰكُم مِّن ذَكَرٍۢ وَأُنثَىٰ وَجَعَلْنَـٰكُمْ شُعُوبًۭا وَقَبَآئِلَ لِتَعَارَفُوٓا۟ ۚ إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ ٱللَّهِ أَتْقَىٰكُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌۭ
يَـٰٓأَيُّهَا
O mankind
ٱلنَّاسُ
ऐ लोगो
إِنَّا
बेशक हम
خَلَقْنَـٰكُم
पैदा किया हमने तुम्हें
مِّن
from
ذَكَرٍۢ
एक मर्द से
وَأُنثَىٰ
और एक औरत से
وَجَعَلْنَـٰكُمْ
और बनाया तुम्हें
شُعُوبًۭا
क़ौमें
وَقَبَآئِلَ
और क़बीले
لِتَعَارَفُوٓا۟ ۚ
ताकि तुम एक दूसरे को पहचानो
إِنَّ
बेशक
أَكْرَمَكُمْ
तुम में सब से ज़्यादा इज़्ज़त वाला
عِندَ
near
ٱللَّهِ
अल्लाह के नज़दीक
أَتْقَىٰكُمْ ۚ
तुम में सब से ज़्यादा तक़्वा वाला है
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
عَلِيمٌ
ख़ूब इल्म वाला है
خَبِيرٌۭ
ख़ूब ख़बर रखने वाला है
ऐ लोगो! हमनें तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें बिरादरियों और क़बिलों का रूप दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। वास्तव में अल्लाह के यहाँ तुममें सबसे अधिक प्रतिष्ठित वह है, जो तुममे सबसे अधिक डर रखता है। निश्चय ही अल्लाह सबकुछ जाननेवाला, ख़बर रखनेवाला है
तफ़्सीर:
ऐ लोगो! हमने तुम्हें एक नर अर्थात् तुम्हारे पिता आदम अलैहिस्सलाम और एक मादा अर्थात् तुम्हारी माँ हव्वा से पैदा किया। इस तरह तुम्हारा वंश एक ही है। इसलिए तुम वंश में एक-दूसरे पर गर्व न करो। फिर उसके बाद हमने तुमको बहुत सी जातियाँ और बिखरे हुए गोत्र बनाए; ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो, न कि उसपर घमंड करो। क्योंकि एक-दूसरे से प्रतिष्ठित होने का मानदंड केवल तक़्वा (परहेज़गारी) है। इसलिए आगे फरमाया : निःसंदहे तुममें सबसे सम्मान वाला अल्लाह के निकट वह है, जो तुममें सबसे ज़्यादा तक़्वा वाला है। निश्चय अल्लाह तुम्हारी स्थितियों को जानने वाला, तुम्हारी पूर्णता और अपूर्णता के बारे में अवगत है, इसमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है।
आयत 14
۞ قَالَتِ ٱلْأَعْرَابُ ءَامَنَّا ۖ قُل لَّمْ تُؤْمِنُوا۟ وَلَـٰكِن قُولُوٓا۟ أَسْلَمْنَا وَلَمَّا يَدْخُلِ ٱلْإِيمَـٰنُ فِى قُلُوبِكُمْ ۖ وَإِن تُطِيعُوا۟ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ لَا يَلِتْكُم مِّنْ أَعْمَـٰلِكُمْ شَيْـًٔا ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌ
۞ قَالَتِ
कहा
ٱلْأَعْرَابُ
देहातियों / बदवियों ने
ءَامَنَّا ۖ
ईमान लाए हम
قُل
कह दीजिए
لَّمْ
नहीं
تُؤْمِنُوا۟
तुम ईमान लाए
وَلَـٰكِن
और लेकिन
قُولُوٓا۟
कहो
أَسْلَمْنَا
इस्लाम लाए हम
وَلَمَّا
और अभी तक नहीं
يَدْخُلِ
दाख़िल हुआ
ٱلْإِيمَـٰنُ
ईमान
فِى
in
قُلُوبِكُمْ ۖ
तुम्हारे दिलों में
وَإِن
और अगर
تُطِيعُوا۟
तुम इताअत करोगे
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَرَسُولَهُۥ
और उसके रसूल की
لَا
not
يَلِتْكُم
नहीं वो कमी करेगा तुमसे
مِّنْ
of
أَعْمَـٰلِكُمْ
तुम्हारे आमाल में से
شَيْـًٔا ۚ
कुछ भी
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌ
निहायत रहम करने वाला है
बद्‌दुओं ने कहा कि, "हम ईमान लाए।" कह दो, "तुम ईमान नहीं लाए। किन्तु यूँ कहो, 'हम तो आज्ञाकारी हुए' ईमान तो अभी तुम्हारे दिलों में दाख़िल ही नहीं हुआ। यदि तुम अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो तो वह तुम्हारे कर्मों में से तुम्हारे लिए कुछ कम न करेगा। निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है।"
तफ़्सीर:
कुछ बद्दुओं ने, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आकर कहा : हम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान ले आए। (ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : तुम ईमान नहीं लाए। लेकिन तुम यह कहो : हम समर्पित हो गए और आज्ञाकारी बन गए। और अभी तक ईमान तुम्हारे दिलों में प्रवेश नहीं किया। अलबत्ता उसके प्रवेश करने की उम्मीद है। और अगर (ऐ देहातियो!) तुम ईमान, अच्छे कर्मों तथा हराम कामों से बचने में अल्लाह और उसके रसूल का आज्ञापालन करोगे, तो अल्लाह तुम्हें तुम्हारे कर्मों के प्रतिफल में से कुछ भी कमी नहीं करेगा। निःसंदेह अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को बहुत माफ़ करने वाला, उनपर अत्यंत दया करने वाला है।
आयत 15
إِنَّمَا ٱلْمُؤْمِنُونَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ ثُمَّ لَمْ يَرْتَابُوا۟ وَجَـٰهَدُوا۟ بِأَمْوَٰلِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلصَّـٰدِقُونَ
إِنَّمَا
बेशक
ٱلْمُؤْمِنُونَ
मोमिन तो
ٱلَّذِينَ
वो लोग हैं जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَرَسُولِهِۦ
और उसके रसूल पर
ثُمَّ
फिर
لَمْ
नहीं
يَرْتَابُوا۟
वो शक में पड़े
وَجَـٰهَدُوا۟
और उन्होंने जिहाद किया
بِأَمْوَٰلِهِمْ
साथ अपने मालों के
وَأَنفُسِهِمْ
और अपनी जानों के
فِى
in
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के रास्ते में
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلصَّـٰدِقُونَ
जो सच्चे है
मोमिन तो बस वही लोग है जो अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाए, फिर उन्होंने कोई सन्देह नहीं किया और अपने मालों और अपनी जानों से अल्लाह के मार्ग में जिहाद किया। वही लोग सच्चे है
तफ़्सीर:
मोमिन तो वही लोग हैं, जो अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाए, फिर उनके ईमान पर संदेह का गुज़र नहीं हुआ। तथा उन्होंने अपने धन एवं प्राण के साथ अल्लाह के मार्ग में जिहाद किया और इस मामले में कोई कंजूसी नहीं की। जो लोग इन गुणों से सुसज्जित हैं, वही लोग अपने ईमान में सच्चे हैं।
आयत 16
قُلْ أَتُعَلِّمُونَ ٱللَّهَ بِدِينِكُمْ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۚ وَٱللَّهُ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌۭ
قُلْ
कह दीजिए
أَتُعَلِّمُونَ
क्या तुम बताते हो
ٱللَّهَ
अल्लाह को
بِدِينِكُمْ
अपना दीन
وَٱللَّهُ
हालाँकि अल्लाह
يَعْلَمُ
वो जानता है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ ۚ
ज़मीन में है
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ का
عَلِيمٌۭ
ख़ूब इल्म रखने वाला है
कहो, "क्या तुम अल्लाह को अपने धर्म की सूचना दे रहे हो। हालाँकि जो कुछ आकाशों में और जो कुछ धरती में है, अल्लाह सब जानता है? अल्लाह को हर चीज़ का ज्ञान है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन बद्दुओं से कह दें : क्या तुम अल्लाह को अपने धर्म से अवगत करा रहे हो और उसे उसकी सूचना दे रहे हो?! हालाँकि अल्लाह जानता है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती पर है। और अल्लाह सब कुछ जानने वाला है, उससे कुछ भी छिपा नहीं है। अतः उसे यह आवश्यकता नहीं है कि तुम उसे अपने धर्म के बारे में बताओ।
आयत 17
يَمُنُّونَ عَلَيْكَ أَنْ أَسْلَمُوا۟ ۖ قُل لَّا تَمُنُّوا۟ عَلَىَّ إِسْلَـٰمَكُم ۖ بَلِ ٱللَّهُ يَمُنُّ عَلَيْكُمْ أَنْ هَدَىٰكُمْ لِلْإِيمَـٰنِ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
يَمُنُّونَ
वो एहसान जताते है
عَلَيْكَ
आप पर
أَنْ
कि
أَسْلَمُوا۟ ۖ
वो इस्लाम ले आए
قُل
कह दीजिए
لَّا
(Do) not
تَمُنُّوا۟
ना तुम एहसान जताओ
عَلَىَّ
मुझ पर
إِسْلَـٰمَكُم ۖ
अपने इस्लाम का
بَلِ
बल्कि
ٱللَّهُ
अल्लाह
يَمُنُّ
वो एहसान करता है
عَلَيْكُمْ
तुम पर
أَنْ
कि
هَدَىٰكُمْ
उसने हिदायत दी तुम्हें
لِلْإِيمَـٰنِ
इमान के लिए
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
वे तुमपर एहसान जताते है कि उन्होंने इस्लाम क़बूल कर लिया। कह दो, "मुझ पर अपने इस्लाम का एहसान न रखो, बल्कि यदि तुम सच्चे हो तो अल्लाह ही तुमपर एहसान रखता है कि उसने तुम्हें ईमान की राह दिखाई।-
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) ये बद्दू आपपर अपने इस्लाम लाने का एहसान जतला रहे हैं। आप उनसे कह दें : तुम अपने अल्लाह के धर्म में दाखिल होने का मुझपर एहसान मत रखो। क्योंकि उसका लाभ (यदि हुआ तो) तुम्हें ही होगा। बल्कि अल्लाह ही तुमपर एहसान रखता है कि उसने तुम्हें उसपर ईमान लाने का सामर्थ्य प्रदान किया, यदि तुम अपने इस दावे में सच्चे हो कि तुम अल्लाह के धर्म में दाखिल प्रवेश किए हो।
आयत 18
إِنَّ ٱللَّهَ يَعْلَمُ غَيْبَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ وَٱللَّهُ بَصِيرٌۢ بِمَا تَعْمَلُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يَعْلَمُ
वो जानता है
غَيْبَ
ग़ैब
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ ۚ
और ज़मीन के
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بَصِيرٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِمَا
उसे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
"निश्चय ही अल्लाह आकाशों और धरती के अदृष्ट को जानता है। और अल्लाह देख रहा है जो कुछ तुम करते हो।"
तफ़्सीर:
निःसंदेह अल्लाह आकाशों और धरती की छिपी चीज़ों को जानता है। उनमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है। तथा अल्लाह खूब देखने वाला है जो कुछ तुम करते हो, तुम्हारे कामों में से कुछ भी उससे छिपा नहीं है, और वह तुम्हें उसके भले और बुरे के लिए बदला देगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
बदगुमानी, ग़ीबत और मज़ाक उड़ाने की मुमानअत के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि किसी की बुराई पीठ पीछे करना मुर्दा भाई का गोश्त खाने जैसा है, इससे सख्ती से बचना चाहिए।
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