सूरह क़ाफ़ سورة ق
मक्की 45 आयतें
नाम का मतलब
क़ाफ (मुक़त्तआत हुरूफ)
पृष्ठभूमि
सूरह क़ाफ में कयामत के यकीन, इंसान की तख्लीक और मौत के फरिश्ते के आने का ज़िक्र है। इसमें अल्लाह की कुदरत की निशानियां तफ्सील से बयान हुई हैं।
फ़ज़ीलत / सार
इसी सूरह में यह मशहूर आयत है कि अल्लाह इंसान की रगे-जान (गर्दन की नस) से भी ज़्यादा करीब है, जो अल्लाह की करीबी का बेहतरीन एहसास दिलाती है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ قٓ ۚ وَٱلْقُرْءَانِ ٱلْمَجِيدِ
قٓ ۚ
ق
وَٱلْقُرْءَانِ
क़सम है क़ुरआन की
ٱلْمَجِيدِ
जो बड़ी शान वाला है
क़ाफ़॰; गवाह है क़ुरआन मजीद! -
तफ़्सीर:
{क़ाफ़} सूरतुल-बक़रा के आरंभ में इस प्रकार के अक्षरों के बारे में बात गुज़र चुकी है।। अल्लाह ने महान क़ुरआन की क़सम खाई है क्योंकि उसके अर्थ बहुत व्यापक तथा उसकी भलाइयाँ और बरकतें बहुत अधिक हैं; कि तुम क़ियामत के दिन हिसाब और बदले के लिए ज़रूर उठाए जाओगे।
आयत 2
بَلْ عَجِبُوٓا۟ أَن جَآءَهُم مُّنذِرٌۭ مِّنْهُمْ فَقَالَ ٱلْكَـٰفِرُونَ هَـٰذَا شَىْءٌ عَجِيبٌ
بَلْ
बल्कि
عَجِبُوٓا۟
उन्हें ताअज्जुब हुआ
أَن
कि
جَآءَهُم
आ गया उनके पास
مُّنذِرٌۭ
एक डराने वाला
مِّنْهُمْ
उन्हीं में से
فَقَالَ
तो कहा
ٱلْكَـٰفِرُونَ
काफ़िरों ने
هَـٰذَا
ये
شَىْءٌ
एक चीज़ है
عَجِيبٌ
अजीब
बल्कि उन्हें तो इस बात पर आश्चर्य हुआ कि उनके पास उन्हीं में से एक सावधान करनेवाला आ गया। फिर इनकार करनेवाले कहने लगे, "यह तो आश्चर्य की बात है
तफ़्सीर:
उनके इनकार करने का कारण यह नहीं था कि वे आपसे झूठ बोलने की उम्मीद करते थे, क्योंकि वे आपकी सच्चाई जानते थे। बल्कि, उन्हें आश्चर्य हुआ कि उनके पास, फ़रिश्तों में से न होकर, उन्हीं में से एक डराने वाला रसूल आया। उन्होंने आश्चर्य चकित होकर कहा : एक मानव रसूल का हमारे पास आना बड़ी विचित्र बात है!
आयत 3
أَءِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًۭا ۖ ذَٰلِكَ رَجْعٌۢ بَعِيدٌۭ
أَءِذَا
क्या जब
مِتْنَا
मर जाऐंगे हम
وَكُنَّا
और हो जाऐंगे हम
تُرَابًۭا ۖ
मिट्टी
ذَٰلِكَ
ये
رَجْعٌۢ
पलटना है
بَعِيدٌۭ
बहुत दूर का
"क्या जब हम मर जाएँगे और मिट्टी हो जाएँगे (तो फिर हम जीवि होकर पलटेंगे)? यह पलटना तो बहुत दूर की बात है!"
तफ़्सीर:
क्या जब हम मर गए और मिट्टी हो गए, तो दोबारा जीवित करके उठाए जाएँगे?! यह दोबारा जीवित होना और हमारे शरीर में उनके सड़-गल जाने के बाद जीवन की वापसी एक असंभावित चीज़ है, यह नहीं हो सकता।
आयत 4
قَدْ عَلِمْنَا مَا تَنقُصُ ٱلْأَرْضُ مِنْهُمْ ۖ وَعِندَنَا كِتَـٰبٌ حَفِيظٌۢ
قَدْ
तहक़ीक़
عَلِمْنَا
जान लिया हमने
مَا
जो
تَنقُصُ
कम करती है
ٱلْأَرْضُ
ज़मीन
مِنْهُمْ ۖ
उनमें से
وَعِندَنَا
और हमारे पास
كِتَـٰبٌ
एक किताब है
حَفِيظٌۢ
ख़ूब हिफ़ाज़त करने वाली
हम जानते है कि धरती उनमें जो कुछ कमी करती है और हमारे पास सुरक्षित रखनेवाली एक किताब भी है
तफ़्सीर:
निश्चय हमें मालूम है कि उनकी मृत्यु के बाद धरती उनके शरीर का क्या खाती और नष्ट करती है, उसमें से कुछ भी हमसे छिपा नहीं है। तथा हमारे पास एक पुस्तक है, जो उन सभी चीज़ों को सुरक्षित रखने वाली है, जो अल्लाह उनके जीवन के दौरान और उनकी मृत्यु के बाद उनके लिए निर्धारित करता है।
आयत 5
بَلْ كَذَّبُوا۟ بِٱلْحَقِّ لَمَّا جَآءَهُمْ فَهُمْ فِىٓ أَمْرٍۢ مَّرِيجٍ
بَلْ
बल्कि
كَذَّبُوا۟
उन्होंने झुठलाया
بِٱلْحَقِّ
हक़ को
لَمَّا
जब
جَآءَهُمْ
वो आ गया उनके पास
فَهُمْ
तो वो
فِىٓ
(are) in
أَمْرٍۢ
एक मामले में है
مَّرِيجٍ
उलझे हुए
बल्कि उन्होंने सत्य को झुठला दिया जब वह उनके पास आया। अतः वे एक उलझन भी बात में पड़े हुए है
तफ़्सीर:
बल्कि इन मुश्रिकों ने क़ुरआन को झुठला दिया, जब रसूल उसे उनके पास लेकर आए। अतः वे एक उलझी हुई स्थिति में हैं, उसके बारे में किसी एक चीज़ पर स्थिर नहीं हैं।
आयत 6
أَفَلَمْ يَنظُرُوٓا۟ إِلَى ٱلسَّمَآءِ فَوْقَهُمْ كَيْفَ بَنَيْنَـٰهَا وَزَيَّنَّـٰهَا وَمَا لَهَا مِن فُرُوجٍۢ
أَفَلَمْ
क्या भला नहीं
يَنظُرُوٓا۟
उन्होंने देखा
إِلَى
at
ٱلسَّمَآءِ
तरफ़ आसमान के
فَوْقَهُمْ
अपने ऊपर
كَيْفَ
किस तरह
بَنَيْنَـٰهَا
बनाया हमने उसे
وَزَيَّنَّـٰهَا
और मुज़य्यन किया हमने उसे
وَمَا
और नहीं है
لَهَا
उसमें
مِن
any
فُرُوجٍۢ
कोई शगाफ़
अच्छा तो क्या उन्होंने अपने ऊपर आकाश को नहीं देखा, हमने उसे कैसा बनाया और उसे सजाया। और उसमें कोई दरार नहीं
तफ़्सीर:
क्या इन पुनर्जीवन का इनकार करने वालों ने अपने ऊपर फैले आकाश पर विचार नहीं किया कि हमने कैसे उसकी रचना की और उसे बनाया तथा उसे उन सितारों से सजाया, जो हमने उसमें रखे हैं, तथा उसमें कोई दरारें नहीं हैं, जो उसे दोषपूर्ण बनाती हों?! अतः जिसने इस आकाश को बनाया, वह मरे हुए लोगों को फिर से जीवित करने में असमर्थ नहीं है।
आयत 7
وَٱلْأَرْضَ مَدَدْنَـٰهَا وَأَلْقَيْنَا فِيهَا رَوَٰسِىَ وَأَنۢبَتْنَا فِيهَا مِن كُلِّ زَوْجٍۭ بَهِيجٍۢ
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन
مَدَدْنَـٰهَا
फैलाया हमने उसे
وَأَلْقَيْنَا
और डाले हमने
فِيهَا
उसमें
رَوَٰسِىَ
पहाड़
وَأَنۢبَتْنَا
और उगाए हमने
فِيهَا
उसमें
مِن
of
كُلِّ
हर क़िस्म के
زَوْجٍۭ
जोड़े
بَهِيجٍۢ
बारौनक़
और धरती को हमने फैलाया और उसमे अटल पहाड़ डाल दिए। और हमने उसमें हर प्रकार की सुन्दर चीज़े उगाई,
तफ़्सीर:
और हमने धरती को फैलाकर उसे रहने योग्य बनाया और उसमें मज़बूत पहाड़ गाड़ दिए, ताकि वह हिले-डुले नहीं, और उसमें हर प्रकार के अच्छी दृष्टि वाले पौधे और वृक्ष उगाए।
आयत 8
تَبْصِرَةًۭ وَذِكْرَىٰ لِكُلِّ عَبْدٍۢ مُّنِيبٍۢ
تَبْصِرَةًۭ
बतौर बसीरत
وَذِكْرَىٰ
और नसीहत
لِكُلِّ
for every
عَبْدٍۢ
वास्ते हर बन्दे
مُّنِيبٍۢ
रुजूअ करने वाले के
आँखें खोलने और याद दिलाने के उद्देश्य से, हर बन्दे के लिए जो रुजू करनेवाला हो
तफ़्सीर:
हमने यह सब हर उस बंदे को दिखाने और याद दिलाने के उद्देश्य से पैदा किया, जो आज्ञाकारिता के साथ अपने पालनहार की ओर लौटने वाला है।
आयत 9
وَنَزَّلْنَا مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ مُّبَـٰرَكًۭا فَأَنۢبَتْنَا بِهِۦ جَنَّـٰتٍۢ وَحَبَّ ٱلْحَصِيدِ
وَنَزَّلْنَا
और उतारा हमने
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مَآءًۭ
पानी
مُّبَـٰرَكًۭا
बरकत वाला
فَأَنۢبَتْنَا
फिर उगाए हमने
بِهِۦ
साथ उसके
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात
وَحَبَّ
और अनाज
ٱلْحَصِيدِ
कटी हुई खेती के
और हमने आकाश से बरकतवाला पानी उतारा, फिर उससे बाग़ और फ़सल के अनाज।
तफ़्सीर:
और हमने आकाश से बहुत लाभ और भलाई वाला पानी उतारा, फिर उस पानी से हमने बाग़ उगाए, तथा जौ आदि के दाने उगाए, जिन्हें तुम काटते हो।
आयत 10
وَٱلنَّخْلَ بَاسِقَـٰتٍۢ لَّهَا طَلْعٌۭ نَّضِيدٌۭ
وَٱلنَّخْلَ
और खजूर के दरख़्त
بَاسِقَـٰتٍۢ
बुलन्द व बाला
لَّهَا
उनके लिए
طَلْعٌۭ
ख़ोशे हैं
نَّضِيدٌۭ
तह ब तह/ऊपर नीचे
और ऊँचे-ऊँचे खजूर के वृक्ष उगाए जिनके गुच्छे तह पर तह होते है,
तफ़्सीर:
और उस पानी से लंबे-लंबे ऊँचे खजूर के पेड़ उगाए, जिनके गुच्छे गुथे हुए और एक दूसरे के ऊपर हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के इनकार का जवाब और ज़मीन की तख्लीक का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि ज़मीन पर मौजूद हर चीज़ में गौर करने से कयामत के यकीन को मज़बूती मिलती है।
आयत 11
رِّزْقًۭا لِّلْعِبَادِ ۖ وَأَحْيَيْنَا بِهِۦ بَلْدَةًۭ مَّيْتًۭا ۚ كَذَٰلِكَ ٱلْخُرُوجُ
رِّزْقًۭا
रिज़्क़ है
لِّلْعِبَادِ ۖ
बन्दों के लिए
وَأَحْيَيْنَا
और ज़िन्दा किया हमने
بِهِۦ
साथ उसके
بَلْدَةًۭ
शहर
مَّيْتًۭا ۚ
मुर्दा को
كَذَٰلِكَ
इसी तरह होगा
ٱلْخُرُوجُ
निकलना
बन्दों की रोजी के लिए। और हमने उस (पानी) के द्वारा निर्जीव धरती को जीवन प्रदान किया। इसी प्रकार निकलना भी हैं
तफ़्सीर:
हमने इसमें से जो कुछ उगाया, उसे बंदों की रोज़ी के लिए उगाया, जिससे वे खाते हैं। और इसके साथ हमने एक ऐसे शहर को पुनर्जीवित कर दिया जिसमें कोई वनस्पति नहीं है। जिस तरह हमने इस बारिश से एक वनस्पति रहित शहर को पुनर्जीवित किया, उसी तरह हम मरे हुए लोगों को पुनर्जीवित करेंगे। चुनाँचे वे जीवित होकर बाहर निकलेंगे।
आयत 12
كَذَّبَتْ قَبْلَهُمْ قَوْمُ نُوحٍۢ وَأَصْحَـٰبُ ٱلرَّسِّ وَثَمُودُ
كَذَّبَتْ
झुठलाया
قَبْلَهُمْ
उनसे क़ब्ल
قَوْمُ
क़ौमे
نُوحٍۢ
नूह
وَأَصْحَـٰبُ
and (the) companions
ٱلرَّسِّ
और असहाबे-रस
وَثَمُودُ
और समूद ने
उनसे पहले नूह की क़ौम, 'अर्-रस' वाले, समूद,
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आपको झुठलाने वाले इन लोगों से पहले भी कई समुदाय अपने नबियों को झुठला चुके हैं। चुनाँचे नूह की जाति, कुएँ वालों और समूद ने झुठलाया।
आयत 13
وَعَادٌۭ وَفِرْعَوْنُ وَإِخْوَٰنُ لُوطٍۢ
وَعَادٌۭ
और आद
وَفِرْعَوْنُ
और फ़िरऔन
وَإِخْوَٰنُ
and (the) brothers
لُوطٍۢ
और लूत के भाइयों ने
आद, फ़िरऔन , लूत के भाई,
तफ़्सीर:
तथा आद, फ़िरऔन और लूत की जाति ने झुठलाया।
आयत 14
وَأَصْحَـٰبُ ٱلْأَيْكَةِ وَقَوْمُ تُبَّعٍۢ ۚ كُلٌّۭ كَذَّبَ ٱلرُّسُلَ فَحَقَّ وَعِيدِ
وَأَصْحَـٰبُ
And (the) companions
ٱلْأَيْكَةِ
और असहाबे ऐका(जंगल वालों)
وَقَوْمُ
and (the) people
تُبَّعٍۢ ۚ
और क़ौमे तुब्बअ ने
كُلٌّۭ
सब ने
كَذَّبَ
झुठलाया
ٱلرُّسُلَ
रसूलों को
فَحَقَّ
तो साबित हो गई
وَعِيدِ
वईद मेरी
'अल-ऐका' वाले और तुब्बा के लोग भी झुठला चुके है। प्रत्येक ने रसूलों को झुठलाया। अन्ततः मेरी धमकी सत्यापित होकर रही
तफ़्सीर:
शुऐब अलैहिस्सलाम की जाति 'ऐका' वालों ने और यमन के राजा तुब्ब' की जाति के लोगों ने (अपने रसूल को) झुठलाया। इन सभी जातियों के लोगों ने अल्लाह के उन रसूलों को झुठलाया जिन्हें उसने भेजा था। सो उनपर अल्लाह के अज़ाब का वादा साबित (प्रमाणित) हो गया।
आयत 15
أَفَعَيِينَا بِٱلْخَلْقِ ٱلْأَوَّلِ ۚ بَلْ هُمْ فِى لَبْسٍۢ مِّنْ خَلْقٍۢ جَدِيدٍۢ
أَفَعَيِينَا
क्या भला थक गए हम
بِٱلْخَلْقِ
with the creation
ٱلْأَوَّلِ ۚ
पहली तख़लीक़ से
بَلْ
बल्कि
هُمْ
वो
فِى
(are) in
لَبْسٍۢ
शक में हैं
مِّنْ
about
خَلْقٍۢ
a creation
جَدِيدٍۢ
नई पैदाइश से
क्या हम पहली बार पैदा करने से असमर्थ रहे? नहीं, बल्कि वे एक नई सृष्टि के विषय में सन्देह में पड़े है
तफ़्सीर:
क्या हम तुम्हें पहली बार पैदा करने में असमर्थ रहे थे कि तुम्हें दोबारा जीवित करने में असमर्थ रहेंगे?! बल्कि वे अपनी पहली रचना के बाद दूसरी रचना के बारे में संदेह में पड़े हुए हैं।
आयत 16
وَلَقَدْ خَلَقْنَا ٱلْإِنسَـٰنَ وَنَعْلَمُ مَا تُوَسْوِسُ بِهِۦ نَفْسُهُۥ ۖ وَنَحْنُ أَقْرَبُ إِلَيْهِ مِنْ حَبْلِ ٱلْوَرِيدِ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
خَلَقْنَا
पैदा किया हमने
ٱلْإِنسَـٰنَ
इन्सान को
وَنَعْلَمُ
और हम जानते हैं
مَا
जो
تُوَسْوِسُ
वस्वसा डालता है
بِهِۦ
उसे
نَفْسُهُۥ ۖ
नफ़्स उसका
وَنَحْنُ
और हम
أَقْرَبُ
ज़्यादा क़रीब हैं
إِلَيْهِ
उसके
مِنْ
than
حَبْلِ
(his) jugular vein
ٱلْوَرِيدِ
शह रग से
हमने मनुष्य को पैदा किया है और हम जानते है जो बातें उसके जी में आती है। और हम उससे उसकी गरदन की रग से भी अधिक निकट है
तफ़्सीर:
निःसंदेह हमने इनसान को पैदा किया और हम उन विचारों और ख़यालों से अवगत हैं, जो उसके दिल में आते हैं। और हम उससे उसके गले की उस नस से भी अधिक क़रीब हैं जो दिल से जुड़ी होती है।
आयत 17
إِذْ يَتَلَقَّى ٱلْمُتَلَقِّيَانِ عَنِ ٱلْيَمِينِ وَعَنِ ٱلشِّمَالِ قَعِيدٌۭ
إِذْ
जब
يَتَلَقَّى
ले लेते हैं
ٱلْمُتَلَقِّيَانِ
दो लेने वाले
عَنِ
on
ٱلْيَمِينِ
दाईं तरफ़ से
وَعَنِ
and on
ٱلشِّمَالِ
और बाईं तरफ़ से
قَعِيدٌۭ
बैठे हुए
जब दो प्राप्त करनेवाले (फ़रिशते) प्राप्त कर रहे होते है, दाएँ से और बाएँ से वे लगे बैठे होते है
तफ़्सीर:
जब दो लेने वाले फ़रिश्ते उसके अमल को लेते हैं। उनमें से एक उसके दाहिनी ओर बैठा है, और दूसरा उसके बाईं ओर बैठा है।
आयत 18
مَّا يَلْفِظُ مِن قَوْلٍ إِلَّا لَدَيْهِ رَقِيبٌ عَتِيدٌۭ
مَّا
नहीं
يَلْفِظُ
वो बोलता
مِن
any
قَوْلٍ
कोई बात
إِلَّا
मगर
لَدَيْهِ
उसके पास है
رَقِيبٌ
एक मुहाफ़िज़/निगरान
عَتِيدٌۭ
तैयार
कोई बात उसने कही नहीं कि उसके पास एक निरीक्षक तैयार रहता है
तफ़्सीर:
वह कोई बात नहीं बोलता, परंतु उसके पास एक निरीक्षक फ़रिश्ता उसकी बात लिखने के लिए उपस्थित होता है।
आयत 19
وَجَآءَتْ سَكْرَةُ ٱلْمَوْتِ بِٱلْحَقِّ ۖ ذَٰلِكَ مَا كُنتَ مِنْهُ تَحِيدُ
وَجَآءَتْ
और आ गई
سَكْرَةُ
बेहोशी
ٱلْمَوْتِ
मौत की
بِٱلْحَقِّ ۖ
साथ हक़ के
ذَٰلِكَ
यही है
مَا
वो जो
كُنتَ
था तू
مِنْهُ
उस से
تَحِيدُ
तू भागता
और मौत की बेहोशी ले आई अविश्व नीय चीज़! यही वह चीज़ है जिससे तू कतराता था
तफ़्सीर:
और मौत की सख़्ती उस सच्चाई के साथ आ गई, जिससे बचने का कोई उपाय नहीं है। यही है वह जिससे (ऐ बेख़बर इनसान!) तू कतराता और भागता था।
आयत 20
وَنُفِخَ فِى ٱلصُّورِ ۚ ذَٰلِكَ يَوْمُ ٱلْوَعِيدِ
وَنُفِخَ
और फूँका जाएगा
فِى
[in]
ٱلصُّورِ ۚ
सूर में
ذَٰلِكَ
ये
يَوْمُ
दिन है
ٱلْوَعِيدِ
वादे का
और नरसिंघा फूँक दिया गया। यही है वह दिन जिसकी धमकी दी गई थी
तफ़्सीर:
और सूर (नरसिंघा) में फूँक मारने पर नियुक्त फ़रिश्ते ने दूसरी बार फूँक मार दी। यही क़ियामत का दिन, काफ़िरों और पापियों के लिए यातना की धमकी का दिन है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
पिछली कौमों के इनकार और मौत के यकीनी आने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि मौत से भागा नहीं जा सकता, इसलिए इसकी तैयारी में गफलत नहीं करनी चाहिए।
आयत 21
وَجَآءَتْ كُلُّ نَفْسٍۢ مَّعَهَا سَآئِقٌۭ وَشَهِيدٌۭ
وَجَآءَتْ
और आएगा
كُلُّ
हर
نَفْسٍۢ
नफ़्स
مَّعَهَا
उसके साथ(होगा)
سَآئِقٌۭ
एक हाँकने वाला
وَشَهِيدٌۭ
और एक गवाही देने वाला
हर व्यक्ति इस दशा में आ गया कि उसके साथ एक लानेवाला है और एक गवाही देनेवाला
तफ़्सीर:
और हर व्यक्ति इस हाल में आएगा कि उसके साथ एक फ़रिश्ता उसे हाँकने के लिए और एक फ़रिश्ता उसके विरुद्ध उसके कामों की गवाही देने के लिए होगा।
आयत 22
لَّقَدْ كُنتَ فِى غَفْلَةٍۢ مِّنْ هَـٰذَا فَكَشَفْنَا عَنكَ غِطَآءَكَ فَبَصَرُكَ ٱلْيَوْمَ حَدِيدٌۭ
لَّقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
كُنتَ
था तू
فِى
in
غَفْلَةٍۢ
गफ़लत में
مِّنْ
of
هَـٰذَا
उससे
فَكَشَفْنَا
तो हटा दिया हमने
عَنكَ
तुझ से
غِطَآءَكَ
पर्दा तेरा
فَبَصَرُكَ
तो निगाह तेरी
ٱلْيَوْمَ
आज
حَدِيدٌۭ
बहुत तेज़ है
तू इस चीज़ की ओर से ग़फ़लत में था। अब हमने तुझसे तेरा परदा हटा दिया, तो आज तेरी निगाह बड़ी तेज़ है
तफ़्सीर:
और इस हाँककर लाए गए व्यक्ति से कहा जाएगा : निश्चय तुम दुनिया में इस दिन से बहुत ग़ाफ़िल थे; क्योंकि तुम अपनी इच्छाओं और सुखों से धोखा खा गए थे। अब तुम जिस यातना और पीड़ा को देख रहे हो, उसके द्वारा हमने तुम्हारी गफ़लत का परदा हटा दिया। सो आज तुम्हारी निगाह बड़ी तेज़ है, जिससे तुम उस चीज़ का बोध कर सकते हो, जिससे तुम गफ़लत में पड़े थे।
आयत 23
وَقَالَ قَرِينُهُۥ هَـٰذَا مَا لَدَىَّ عَتِيدٌ
وَقَالَ
और कहेगा
قَرِينُهُۥ
साथी(फ़रिश्ता) उसका
هَـٰذَا
ये है
مَا
जो
لَدَىَّ
मेरे पास है
عَتِيدٌ
तैयार
उसके साथी ने कहा, "यह है (तेरी सजा)! मेरे पास कुछ (सहायता के लिए) मौजूद नहीं।"
तफ़्सीर:
और फ़रिश्तों में से उसपर नियुक्त उसका साथी कहेगा : यह मेरे पास उसके काम का विवरण है, जो बिना किसी कमी-बेशी के मौजूद है।
आयत 24
أَلْقِيَا فِى جَهَنَّمَ كُلَّ كَفَّارٍ عَنِيدٍۢ
أَلْقِيَا
तुम दोनों डाल दो
فِى
in (to)
جَهَنَّمَ
जहन्नम में
كُلَّ
हर
كَفَّارٍ
बहुत नाशुक्रे
عَنِيدٍۢ
बहुत अनाद रखने वाले को
"डाल दो, डाल दो, जहन्नम में! हर अकृतज्ञ द्वेष रखने वाले,
तफ़्सीर:
और अल्लाह हाँककर लाने वाले और गवाही देने वाले, दोनों फ़रिश्तों से कहेगा : हर सत्य के इनकार करने वाले और उससे दुराग्रह रखने वाले को जहन्नम में डाल दो।
आयत 25
مَّنَّاعٍۢ لِّلْخَيْرِ مُعْتَدٍۢ مُّرِيبٍ
مَّنَّاعٍۢ
बहुत रोकने वाले को
لِّلْخَيْرِ
ख़ैर से
مُعْتَدٍۢ
हद से निकलने वाले
مُّرِيبٍ
शक में पड़े हुए को
भलाई से रोकनेवाले, सीमा का अतिक्रमण करनेवाले, सन्देहग्रस्त को
तफ़्सीर:
जो अपने ऊपर अल्लाह के अनिवार्य किए हुए अधिकार को बहुत रोकने वाला, अल्लाह की सीमाओं को लाँघने वाला, उसने वादे या धमकी के बारे में जो सूचना दी है उसमें संदेह करने वाला है।
आयत 26
ٱلَّذِى جَعَلَ مَعَ ٱللَّهِ إِلَـٰهًا ءَاخَرَ فَأَلْقِيَاهُ فِى ٱلْعَذَابِ ٱلشَّدِيدِ
ٱلَّذِى
जिसने
جَعَلَ
बना लिया
مَعَ
साथ
ٱللَّهِ
अल्लाह के
إِلَـٰهًا
एक इलाह
ءَاخَرَ
दूसरा
فَأَلْقِيَاهُ
पस तुम दोनों डाल दो उसे
فِى
in(to)
ٱلْعَذَابِ
the punishment
ٱلشَّدِيدِ
शदीद अज़ाब में
जिसने अल्लाह के साथ किसी दूसरे को पूज्य-प्रभु ठहराया। तो डाल दो उसे कठोर यातना में।"
तफ़्सीर:
जिसने अल्लाह के साथ दूसरा पूज्य बना लिया, जिसे वह उसके साथ इबादत में साझी ठहराता है। अतः तुम दोनों उसे कठोर यातना में डाल दो।
आयत 27
۞ قَالَ قَرِينُهُۥ رَبَّنَا مَآ أَطْغَيْتُهُۥ وَلَـٰكِن كَانَ فِى ضَلَـٰلٍۭ بَعِيدٍۢ
۞ قَالَ
कहेगा
قَرِينُهُۥ
साथी (शैतान) उसका
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
مَآ
नहीं
أَطْغَيْتُهُۥ
सरकश बनाया मैं ने उसे
وَلَـٰكِن
और लेकिन
كَانَ
था वो
فِى
in
ضَلَـٰلٍۭ
गुमराही में
بَعِيدٍۢ
बहुत दूर की
उसका साथी बोला, "ऐ हमारे रब! मैंने उसे सरकश नहीं बनाया, बल्कि वह स्वयं ही परले दरजे की गुमराही में था।"
तफ़्सीर:
शैतानों में से उसका साथी उससे अलगाव प्रकट करते हुए कहेगा : ऐ हमारे पालनहार! मैंने उसे गुमराह नहीं किया था। परंतु वह खुद ही सत्य से परे दूर की गुमराही में पड़ा हुआ था।
आयत 28
قَالَ لَا تَخْتَصِمُوا۟ لَدَىَّ وَقَدْ قَدَّمْتُ إِلَيْكُم بِٱلْوَعِيدِ
قَالَ
वो फ़रमायगा
لَا
(Do) not
تَخْتَصِمُوا۟
ना तुम झगड़ा करो
لَدَىَّ
मेरे पास
وَقَدْ
हालाँकि तहक़ीक़
قَدَّمْتُ
पहले भेज दी मैं ने
إِلَيْكُم
तरफ़ तुम्हारे
بِٱلْوَعِيدِ
वईद
कहा, "मेरे सामने मत झगड़ो। मैं तो तुम्हें पहले ही अपनी धमकी से सावधान कर चुका था। -
तफ़्सीर:
अल्लाह ने कहा : तुम मेरे पास मत झगड़ो। क्योंकि इससे कोई फायदा नहीं है। क्योंकि मैंने तुम्हें दुनिया ही में अपने रसूलों के माध्यम से मेरा इनकार करने वाले और मेरी अवज्ञा करने वाले को सख्त धमकी से सावधान कर दिया था।
आयत 29
مَا يُبَدَّلُ ٱلْقَوْلُ لَدَىَّ وَمَآ أَنَا۠ بِظَلَّـٰمٍۢ لِّلْعَبِيدِ
مَا
नहीं
يُبَدَّلُ
बदली जाती
ٱلْقَوْلُ
बात
لَدَىَّ
मेरे पास
وَمَآ
और नहीं हूँ
أَنَا۠
मैं
بِظَلَّـٰمٍۢ
कोई ज़ुल्म करने वाला
لِّلْعَبِيدِ
बन्दों पर
"मेरे यहाँ बात बदला नहीं करती और न मैं अपने बन्दों पर तनिक भी अत्याचार करता हूँ।"
तफ़्सीर:
मेरे यहाँ बात बदली नहीं जाती और मेरा वादा नहीं टूटता, तथा मैं बंदों पर उनके अच्छे कामों को कम करके या उनके बुरे कामों को बढ़ाकर अत्याचार नहीं करता।बल्कि मैं उन्हें उनके किए का बदला देता हूँ।
आयत 30
يَوْمَ نَقُولُ لِجَهَنَّمَ هَلِ ٱمْتَلَأْتِ وَتَقُولُ هَلْ مِن مَّزِيدٍۢ
يَوْمَ
जिस दिन
نَقُولُ
हम कहेंगे
لِجَهَنَّمَ
जहन्नम से
هَلِ
क्या
ٱمْتَلَأْتِ
भर गई तू
وَتَقُولُ
और वो कहेगी
هَلْ
क्या है
مِن
(there) any
مَّزِيدٍۢ
कुछ मज़ीद
जिस दिन हम जहन्नम से कहेंगे, "क्या तू भर गई?" और वह कहेगी, "क्या अभी और भी कुछ है?"
तफ़्सीर:
जिस दिन हम जहन्नम से कहेंगे : क्या तू उन काफ़िरों और पापियों से भर गया, जो तेरे अंदर डाले गए हैं? तो वह अपने रब को जवाब देगा : क्या कुछ और भी है? उसका यह कहना अपने रब के लिए क्रोध के तौर पर वृद्धि के अनुरोध के लिए होगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दो फरिश्तों (लेखकों) के आमाल लिखने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि हमारा हर कौल-अमल लिखा जा रहा है, इसलिए ज़बान और अमल दोनों में एहतियात बरतनी चाहिए।
आयत 31
وَأُزْلِفَتِ ٱلْجَنَّةُ لِلْمُتَّقِينَ غَيْرَ بَعِيدٍ
وَأُزْلِفَتِ
और क़रीब लाई जाएगी
ٱلْجَنَّةُ
जन्नत
لِلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के लिए
غَيْرَ
not
بَعِيدٍ
कुछ दूर ना होगी
और जन्नत डर रखनेवालों के लिए निकट कर दी गई, कुछ भी दूर न रही
तफ़्सीर:
और जन्नत उन लोगों के लिए निकट कर दी जाएगी, जो अपने पालनहार से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से परहेज़ करके, डरने वाले हैं। चुनाँचे वे उसमें मौजूद नेमतों को देखेंगे, वह उनसे दूर नहीं होगी।
आयत 32
هَـٰذَا مَا تُوعَدُونَ لِكُلِّ أَوَّابٍ حَفِيظٍۢ
هَـٰذَا
ये है
مَا
वो जो
تُوعَدُونَ
तुम वादा किए जाते थे
لِكُلِّ
वास्ते हर
أَوَّابٍ
बहुत रुजूअ करने वाले
حَفِيظٍۢ
बहुत हिफ़ाज़त करने वाले के
"यह है वह चीज़ जिसका तुमसे वादा किया जाता था हर रुजू करनेवाले, बड़ी निगरानी रखनेवाले के लिए; -
तफ़्सीर:
और उनसे कहा जाएगा : यही है जिसका अल्लाह ने तुमसे वादा किया था, हर उस व्यक्ति के लिए जो अपने रब की ओर तौबा के द्वारा बहुत लौटने वाला है, उसके पालनहार ने उसे जिस चीज़ के लिए बाध्य किया है, उसका संरक्षण करने वाला है।
आयत 33
مَّنْ خَشِىَ ٱلرَّحْمَـٰنَ بِٱلْغَيْبِ وَجَآءَ بِقَلْبٍۢ مُّنِيبٍ
مَّنْ
जो
خَشِىَ
डरा
ٱلرَّحْمَـٰنَ
रहमान से
بِٱلْغَيْبِ
ग़ायबाना/ बिन देखे
وَجَآءَ
और वो लाया
بِقَلْبٍۢ
दिल
مُّنِيبٍ
रुजूअ करने वाला
"जो रहमान से डरा परोक्ष में और आया रुजू रहनेवाला हृदय लेकर -
तफ़्सीर:
जो परोक्ष में अल्लाह से डरा, जहाँ उसे अल्लाह के सिवा कोई नहीं देखता, और अल्लाह से ऐसे शुद्ध हृदय के साथ मिला, जो अल्लाह की ओर ध्यान करने वाला और उसकी ओर बहुत ज़्यादा लौटने वाला है।
आयत 34
ٱدْخُلُوهَا بِسَلَـٰمٍۢ ۖ ذَٰلِكَ يَوْمُ ٱلْخُلُودِ
ٱدْخُلُوهَا
दाख़िल हो जाओ उसमें
بِسَلَـٰمٍۢ ۖ
साथ सलामती के
ذَٰلِكَ
ये
يَوْمُ
दिन है
ٱلْخُلُودِ
हमेशगी का
"प्रवेश करो उस (जन्नत) में सलामती के साथ" वह शाश्वत दिवस है
तफ़्सीर:
उनसे कहा जाएगा : जिस चीज़ को तुम नापसंद करते हो, उससे सुरक्षा और सलामती के साथ जन्नत में प्रवेश कर जाओ। यही हमेशा रहने का दिन है, जिसके बाद कोई विनाश नहीं है।
आयत 35
لَهُم مَّا يَشَآءُونَ فِيهَا وَلَدَيْنَا مَزِيدٌۭ
لَهُم
उनके लिए होगा
مَّا
जो
يَشَآءُونَ
वो चाहेंगे
فِيهَا
उसमें
وَلَدَيْنَا
और हमारे पास
مَزِيدٌۭ
मज़ीद है
उनके लिए उसमें वह सब कुछ है जो वे चाहे और हमारे पास उससे अधिक भी है
तफ़्सीर:
उनके लिए उसके अंदर वह सारी अनंत नेमतें होंगी, जो वे चाहेंगे। और हमारे पास इससे भी अधिक ऐसी नेमतें हैं, जिन्हें न किसी आँख ने देखा है, न किसी कान ने सुना है और न किसी मानव हृदय ने कभी सोचा है, और इसी में - सबसे महान - सर्वशक्तिमान अल्लाह का दर्शन शामिल है।
आयत 36
وَكَمْ أَهْلَكْنَا قَبْلَهُم مِّن قَرْنٍ هُمْ أَشَدُّ مِنْهُم بَطْشًۭا فَنَقَّبُوا۟ فِى ٱلْبِلَـٰدِ هَلْ مِن مَّحِيصٍ
وَكَمْ
और कितनी ही
أَهْلَكْنَا
हलाक कीं हमने
قَبْلَهُم
उनसे पहले
مِّن
of
قَرْنٍ
उम्मतें
هُمْ
वो
أَشَدُّ
ज़्यादा शदीद थीं
مِنْهُم
उनसे
بَطْشًۭا
पकड़ में
فَنَقَّبُوا۟
तो उन्होंने छान मारा था
فِى
throughout
ٱلْبِلَـٰدِ
मुल्कों को
هَلْ
क्या है
مِن
any
مَّحِيصٍ
कोई जाए पनाह
उनसे पहले हम कितनी ही नस्लों को विनष्ट कर चुके है। वे लोग शक्ति में उनसे कहीं बढ़-चढ़कर थे। (पनाह की तलाश में) उन्होंने नगरों को छान मारा, कोई है भागने को ठिकाना?
तफ़्सीर:
हमने मक्का के इन झुठलाने वाले मुश्रिकों से पहले कितने ही समुदायों को विनष्ट कर दिया, जो इनसे अधिक शक्तिशाली थे। उन्होंने नगरों को छान मारा, शायद उन्हें यातना से भागने का कोई स्थान मिल जाए, पर उन्हें वह नहीं मिला।
आयत 37
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَذِكْرَىٰ لِمَن كَانَ لَهُۥ قَلْبٌ أَوْ أَلْقَى ٱلسَّمْعَ وَهُوَ شَهِيدٌۭ
إِنَّ
यक़ीनन
فِى
in
ذَٰلِكَ
इसमें
لَذِكْرَىٰ
अलबत्ता नसीहत है
لِمَن
वास्ते उसके जो
كَانَ
हो
لَهُۥ
उसके लिए
قَلْبٌ
दिल
أَوْ
या
أَلْقَى
वो लगाए
ٱلسَّمْعَ
कान
وَهُوَ
जबकि वो
شَهِيدٌۭ
हाज़िर हो
निश्चय ही इसमें उस व्यक्ति के लिए शिक्षा-सामग्री है जिसके पास दिल हो या वह (दिल से) हाजिर रहकर कान लगाए
तफ़्सीर:
पिछले समुदायों के विनाश का जो यह उल्लेख किया गया है, निश्चय ही इसमें उस व्यक्ति के लिए याद-दहानी और उपदेश है, जिसके पास समझने वाला दिल हो, या वह उसपर अपना कान लगाए इस हाल में कि उसका दिल उपस्थित हो, असावधान न हो।
आयत 38
وَلَقَدْ خَلَقْنَا ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا فِى سِتَّةِ أَيَّامٍۢ وَمَا مَسَّنَا مِن لُّغُوبٍۢ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
خَلَقْنَا
पैदा किया हमने
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
وَمَا
और जो
بَيْنَهُمَا
दर्मियान है उन दोनों के
فِى
in
سِتَّةِ
six
أَيَّامٍۢ
छ: दिनों में
وَمَا
और नहीं
مَسَّنَا
छुआ हमें
مِن
any
لُّغُوبٍۢ
किसी थकावट ने
हमने आकाशों और धरती को और जो कुछ उनके बीच है छः दिनों में पैदा कर दिया और हमें कोई थकान न छू सकी
तफ़्सीर:
निश्चय हमने आकाशों और धरती को, तथा जो कुछ आकाशों और धरती के बीच है; छह दिनों में पैदा किया, जबकि हम उन्हें एक पल में बनाने की क्षमता रखते हैं, और हमें कोई थकान नहीं हुई, जैसा कि यहूदी कहते हैं।
आयत 39
فَٱصْبِرْ عَلَىٰ مَا يَقُولُونَ وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ قَبْلَ طُلُوعِ ٱلشَّمْسِ وَقَبْلَ ٱلْغُرُوبِ
فَٱصْبِرْ
पस सब्र कीजिए
عَلَىٰ
ऊपर
مَا
उसके जो
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
وَسَبِّحْ
और तस्बीह कीजिए
بِحَمْدِ
साथ हम्द के
رَبِّكَ
अपने रब की
قَبْلَ
पहले
طُلُوعِ
तुलूअ होने से
ٱلشَّمْسِ
सूरज के
وَقَبْلَ
और पहले
ٱلْغُرُوبِ
ग़ुरूब होने से
अतः जो कुछ वे कहते है उसपर धैर्य से काम लो और अपने रब की प्रशंसा की तसबीह करो; सूर्योदय से पूर्व और सूर्यास्त के पूर्व,
तफ़्सीर:
अतः जो कुछ यहूदी और अन्य लोग कहते हैं, (ऐ रसूल!) आप उसपर धैर्य रखें और अपने रब के लिए, उसकी प्रशंसा करते हुए, सूर्योदय से पहले फ़ज्र की नमाज़ पढ़ें और उसके अस्त होने से पहले अस्र की नमाज़ पढ़ें।
आयत 40
وَمِنَ ٱلَّيْلِ فَسَبِّحْهُ وَأَدْبَـٰرَ ٱلسُّجُودِ
وَمِنَ
And of
ٱلَّيْلِ
और रात में से
فَسَبِّحْهُ
पस तस्बीह कीजिए उसकी
وَأَدْبَـٰرَ
और बाद
ٱلسُّجُودِ
सजदों के
और रात की घड़ियों में फिर उसकी तसबीह करो और सजदों के पश्चात भी
तफ़्सीर:
और रात के कुछ भाग में फिर उसके लिए नमाज़ पढ़ें और नमाज़ों के बाद उसकी पवित्रता (तसबीह) का वर्णन करें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जन्नत की नेमतों और कायनात की तख्लीक में थकान न होने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह की कुदरत को कोई थकान नहीं छूती, यह उसकी अज़मत की बड़ी निशानी है।
आयत 41
وَٱسْتَمِعْ يَوْمَ يُنَادِ ٱلْمُنَادِ مِن مَّكَانٍۢ قَرِيبٍۢ
وَٱسْتَمِعْ
और ग़ौर से सुनिए
يَوْمَ
जिस दिन
يُنَادِ
पुकारेगा
ٱلْمُنَادِ
पुकारने वाला
مِن
from
مَّكَانٍۢ
एक जगह से
قَرِيبٍۢ
क़रीब की
और कान लगाकर सुन लेगा जिस दिन पुकारनेवाला अत्यन्त निकट के स्थान से पुकारेगा,
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) ध्यान से सुनें, जिस दिन सूर में दूसरी बार फूँक मारने पर नियुक्त फ़रिश्ता निकट स्थान से आवाज़ देगा।
आयत 42
يَوْمَ يَسْمَعُونَ ٱلصَّيْحَةَ بِٱلْحَقِّ ۚ ذَٰلِكَ يَوْمُ ٱلْخُرُوجِ
يَوْمَ
जिस दिन
يَسْمَعُونَ
वो सुनेंगे
ٱلصَّيْحَةَ
चिंघाड़ को
بِٱلْحَقِّ ۚ
साथ हक़ के
ذَٰلِكَ
ये होगा
يَوْمُ
दिन
ٱلْخُرُوجِ
निकलने का
जिस दिन लोग भयंकर चीख़ को सत्यतः सुन रहे होंगे। वही दिन होगा निकलने का।-
तफ़्सीर:
जिस दिन सभी लोग दोबारा जीवित होकर उठने की तेज़ आवाज़ को उस सत्य के साथ सुनेंगे जिसमें कोई संदेह नहीं। जिस दिन लोग यह आवाज़ सुनेंगे, वही मरे हुए लोगों के अपनी कब्रों से हिसाब और बदले के लिए निकलने का दिन है।
आयत 43
إِنَّا نَحْنُ نُحْىِۦ وَنُمِيتُ وَإِلَيْنَا ٱلْمَصِيرُ
إِنَّا
बेशक हम
نَحْنُ
हम ही
نُحْىِۦ
हम ज़िन्दा करते हैं
وَنُمِيتُ
और हम मौत देते हैं
وَإِلَيْنَا
और तरफ़ हमारे ही
ٱلْمَصِيرُ
लौटना है
हम ही जीलन प्रदान करते और मृत्यु देते है और हमारी ही ओर अन्ततः आना है। -
तफ़्सीर:
निश्चय हम ही जीवन देते हैं और हम ही मारते हैं। हमारे सिवा न कोई जीवन देने वाला है और न मारने वाला है। और बंदों को क़ियामत के दिन हिसाब और बदले के लिए केवल हमारी ही ओर लौटकर आना है।
आयत 44
يَوْمَ تَشَقَّقُ ٱلْأَرْضُ عَنْهُمْ سِرَاعًۭا ۚ ذَٰلِكَ حَشْرٌ عَلَيْنَا يَسِيرٌۭ
يَوْمَ
जिस दिन
تَشَقَّقُ
शक़ हो जाएगी
ٱلْأَرْضُ
ज़मीन
عَنْهُمْ
उनसे
سِرَاعًۭا ۚ
तेज़ दौड़ने वाले होंगे
ذَٰلِكَ
ये है
حَشْرٌ
इकट्ठा करना / हशर
عَلَيْنَا
हम पर
يَسِيرٌۭ
बहुत आसान
जिस दिन धरती उनपर से फट जाएगी और वे तेजी से निकल पड़ेंगे। यह इकट्ठा करना हमारे लिए अत्यन्त सरल है
तफ़्सीर:
जिस दिन धरती उनसे फटेगी और वे तेज़ी से दौड़ते हुए निकलेंगे। यह एकत्र करना हमारे लिए आसान है।
आयत 45
نَّحْنُ أَعْلَمُ بِمَا يَقُولُونَ ۖ وَمَآ أَنتَ عَلَيْهِم بِجَبَّارٍۢ ۖ فَذَكِّرْ بِٱلْقُرْءَانِ مَن يَخَافُ وَعِيدِ
نَّحْنُ
हम
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानते हैं
بِمَا
उसे जो
يَقُولُونَ ۖ
वो कहते हैं
وَمَآ
और नहीं
أَنتَ
आप
عَلَيْهِم
उन पर
بِجَبَّارٍۢ ۖ
ज़बरदस्ती करने वाले
فَذَكِّرْ
पस नसीहत कीजिए
بِٱلْقُرْءَانِ
साथ क़ुरआन के
مَن
उसे जो
يَخَافُ
डरता हो
وَعِيدِ
मेरी वईद से
हम जानते है जो कुछ वे कहते है, तुम उनपर कोई ज़बरदस्ती करनेवाले तो हो नहीं। अतः तुम क़ुरआन के द्वारा उसे नसीहत करो जो हमारी चेतावनी से डरे
तफ़्सीर:
हम उसे अधिक जानने वाले हैं, जो कुछ ये झुठलाने वाले कहते हैं। और (ऐ रसूल!) आप उनपर कोई थोपे हुए नहीं हैं कि उन्हें ईमान लाने पर मजबूर करें। आप तो केवल उस चीज़ को पहुँचाने वाले हैं, जिसे पहुँचाने का अल्लाह ने आपको आदेश दिया है। अतः आप क़ुरआन के साथ उस व्यक्ति को उपदेश दें, जो काफ़िरों और अवज्ञाकारियों के लिए मेरी धमकी से डरता है; क्योंकि डरने वाला ही याद दिलाए जाने (उपदेश दिए जाने) पर याद करता और उपदेश ग्रहण करता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन कब्रों से निकलने के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि कुरआन के ज़रिए नसीहत करते रहना चाहिए, चाहे कोई माने या न माने, यह हमारा फर्ज़ है।
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