नाम का मतलब
उड़ाने वाली हवाएं (कसम खाई गई हवाओं के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अज़-ज़ारियात में कयामत के यकीन, इब्राहीम अलैहिस्सलाम के मेहमान फरिश्तों का ज़िक्र और रिज़्क की ज़मानत की ताकीद है।
फ़ज़ीलत / सार
इसमें अल्लाह का यह मशहूर वादा है कि हर इंसान की रोज़ी की ज़मानत आसमान में लिखी जा चुकी है, जो रिज़्क की फिक्र को कम करने वाली तसल्ली है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلذَّٰرِيَـٰتِ ذَرْوًۭا
وَٱلذَّٰرِيَـٰتِ
क़सम है उन हवाओं की जो बिखेरने वाली हैं
ذَرْوًۭا
उड़ा कर
गवाह है (हवाएँ) जो गर्द-ग़ुबार उड़ाती फिरती है;
तफ़्सीर:
अल्लाह उन हवाओं की क़सम खाता है, जो धूल उड़ाती हैं।
आयत 2
فَٱلْحَـٰمِلَـٰتِ وِقْرًۭا
فَٱلْحَـٰمِلَـٰتِ
फिर उठाने वालियां हैं
وِقْرًۭا
बोझ को
फिर बोझ उठाती है;
तफ़्सीर:
और उन बादलों की क़सम खाता है, जो प्रचुर मात्रा में पानी उठाए होते हैं।
आयत 3
فَٱلْجَـٰرِيَـٰتِ يُسْرًۭا
فَٱلْجَـٰرِيَـٰتِ
फिर चलने वालियां हैं
يُسْرًۭا
आसानी से
फिर नरमी से चलती है;
तफ़्सीर:
और उन नावों की क़सम खाता है, जो समुद्र में आसानी से चलती हैं।
आयत 4
فَٱلْمُقَسِّمَـٰتِ أَمْرًا
فَٱلْمُقَسِّمَـٰتِ
फिर तक़्सीम करने वालियां हैं
أَمْرًا
काम को
फिर मामले को अलग-अलग करती है;
तफ़्सीर:
और उन फ़रिश्तों की क़सम खाता है, जो बंदों के मामलों में से उस चीज़ को विभाजित करते हैं, जिसे विभाजित करने का अल्लाह ने उन्हें आदेश दिया है।
आयत 5
إِنَّمَا تُوعَدُونَ لَصَادِقٌۭ
إِنَّمَا
बेशक जो
تُوعَدُونَ
तुम वादा किए जाते हो
لَصَادِقٌۭ
अलबत्ता सच्चा है
निश्चय ही तुमसे जिस चीज़ का वादा किया जाता है, वह सत्य है;
तफ़्सीर:
निःसंदेह तुम्हारा पालनहार तुमसे जिस हिसाब और बदले का वादा करता है, वह निश्चय सत्य है, उसमें कोई संदेह नहीं है।
आयत 6
وَإِنَّ ٱلدِّينَ لَوَٰقِعٌۭ
وَإِنَّ
और बेशक
ٱلدِّينَ
बदले(का दिन)
لَوَٰقِعٌۭ
अलबत्ता वाक़ेअ होने वाला है
और (कर्मों का) बदला अवश्य सामने आकर रहेगा
तफ़्सीर:
निःसंदेह क़ियामत के दिन बंदों का हिसाब अनिवार्य रूप से घटित होने वाला है।
आयत 7
وَٱلسَّمَآءِ ذَاتِ ٱلْحُبُكِ
وَٱلسَّمَآءِ
क़सम है आसमान की
ذَاتِ
full of
ٱلْحُبُكِ
रास्तों वाले
गवाह है धारियोंवाला आकाश।
तफ़्सीर:
और अल्लाह सुंदर रचना तथा रास्तों वाले आसमान की क़सम खाता है।
आयत 8
إِنَّكُمْ لَفِى قَوْلٍۢ مُّخْتَلِفٍۢ
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
لَفِى
(are) surely in
قَوْلٍۢ
अलबत्ता एक बात में हो
مُّخْتَلِفٍۢ
मुख़्तलिफ़
निश्चय ही तुम उस बात में पड़े हुए हो जिनमें कथन भिन्न-भिन्न है
तफ़्सीर:
निश्चय (ऐ मक्का वालो!) तुम एक विरोधाभासी और परस्पर विरोधी बात में पड़े हो। कभी तुम कहते हो : क़ुरआन जादू है, तो कभी कहते हो कि काव्य (शे'र) है। इसी तरह कभी कहते हो कि मुहम्मद जादूगर हैं, तो कभी कहते हो कि कवि (शा'इर) हैं।
आयत 9
يُؤْفَكُ عَنْهُ مَنْ أُفِكَ
يُؤْفَكُ
फेरा जाता है
عَنْهُ
उससे
مَنْ
जो
أُفِكَ
फेरा गया
इसमें कोई सरफिरा ही विमुख होता है
तफ़्सीर:
क़ुरआन तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर ईमान लाने से वही फेरा जाता है, जो अल्लाह के ज्ञान में उससे फेर दिया गया है; क्योंकि अल्लाह को पता है कि वह ईमान नहीं लाएगा, इसलिए उसे हिदायत की तौफ़ीक़ नहीं देता।
आयत 10
قُتِلَ ٱلْخَرَّٰصُونَ
قُتِلَ
मारे गए
ٱلْخَرَّٰصُونَ
अंदाज़े लगाने वाले
मारे जाएँ अटकल दौड़ानेवाले;
तफ़्सीर:
ये झूठे लोग शापित किए गए, जिन्होंने क़ुरआन तथा अपने नबी के बारे में जो कहा वह कहा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कसमों के साथ कयामत के यकीनी होने का ऐलान है। यह हमें सिखाता है कि जो बातें आज झूठी लगती हैं, वक्त आने पर सच साबित होती हैं, इसलिए कयामत के इनकार से बचना चाहिए।
आयत 11
ٱلَّذِينَ هُمْ فِى غَمْرَةٍۢ سَاهُونَ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
هُمْ
वो
فِى
(are) in
غَمْرَةٍۢ
ग़फ़्लत में
سَاهُونَ
भूले हुए हैं
जो ग़फ़लत में पड़े हुए हैं भूले हुए
तफ़्सीर:
जो लोग अज्ञान में हैं, आख़िरत के घर से ग़ाफ़िल हैं। उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं है।
आयत 12
يَسْـَٔلُونَ أَيَّانَ يَوْمُ ٱلدِّينِ
يَسْـَٔلُونَ
वो सवाल करते हैं
أَيَّانَ
कब होगा
يَوْمُ
दिन
ٱلدِّينِ
बदले का
पूछते है, "बदले का दिन कब आएगा?"
तफ़्सीर:
वे पूछते हैं : बदले का दिन कब है? जबकि वे उसके लिए काम नहीं करते हैं।
आयत 13
يَوْمَ هُمْ عَلَى ٱلنَّارِ يُفْتَنُونَ
يَوْمَ
उस रोज़
هُمْ
वो
عَلَى
over
ٱلنَّارِ
आग पर
يُفْتَنُونَ
वो तपाए जाऐंगे
जिस दिन वे आग पर तपाए जाएँगे,
तफ़्सीर:
अल्लाह उन्हें उनके प्रश्न का उत्तर देता है : जिस दिन वे आग पर यातना दिए जाएँगे।
आयत 14
ذُوقُوا۟ فِتْنَتَكُمْ هَـٰذَا ٱلَّذِى كُنتُم بِهِۦ تَسْتَعْجِلُونَ
ذُوقُوا۟
चखो
فِتْنَتَكُمْ
अज़ाब अपना
هَـٰذَا
ये है
ٱلَّذِى
वो जो
كُنتُم
थे तुम
بِهِۦ
जिसे
تَسْتَعْجِلُونَ
तुम जल्दी तलब करते
"चखों मज़ा. अपने फ़ितने (उपद्रव) का! यहीं है जिसके लिए तुम जल्दी मचा रहे थे।"
तफ़्सीर:
उनसे कहा जाएगा : तुम अपनी यातना का स्वाद चखो। यह वही (यातना) है, जिसे तुम उपहास के तौर पर जल्दी लाने के लिए कह रहे थे, जब तुम्हें इससे डराया जाता था।
आयत 15
إِنَّ ٱلْمُتَّقِينَ فِى جَنَّـٰتٍۢ وَعُيُونٍ
إِنَّ
बेशक
ٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोग
فِى
(will be) in
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात में
وَعُيُونٍ
और चश्मों में होंगे
निश्चय ही डर रखनेवाले बाग़ों और स्रोतों में होंगे
तफ़्सीर:
निश्चय जो लोग अपने रब से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से दूर रहकर, डरने वाले हैं, क़ियामत के दिन बगीचों तथा बहते जल स्रोतों में होंगे।
आयत 16
ءَاخِذِينَ مَآ ءَاتَىٰهُمْ رَبُّهُمْ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَبْلَ ذَٰلِكَ مُحْسِنِينَ
ءَاخِذِينَ
लेने वाले होंगे
مَآ
जो
ءَاتَىٰهُمْ
देगा उन्हें
رَبُّهُمْ ۚ
रब उनका
إِنَّهُمْ
बेशक वो
كَانُوا۟
थे वो
قَبْلَ
क़ब्ल
ذَٰلِكَ
इसके
مُحْسِنِينَ
नेकोकार
जो कुछ उनके रब ने उन्हें दिया, वे उसे ले रहे होंगे। निस्संदेह वे इससे पहले उत्तमकारों में से थे
तफ़्सीर:
जो कुछ उनका रब उन्हें सम्माननीय प्रतिफल प्रदान करेगा, उसे लेने वाले होंगे। निश्चय वे इस सम्माननीय प्रतिफल से पहले दुनिया में अच्छे कार्य करने वाले थे।
आयत 17
كَانُوا۟ قَلِيلًۭا مِّنَ ٱلَّيْلِ مَا يَهْجَعُونَ
كَانُوا۟
थे वो
قَلِيلًۭا
कम ही
مِّنَ
of
ٱلَّيْلِ
रात को
مَا
जो
يَهْجَعُونَ
वो सोते थे
रातों को थोड़ा ही सोते थे,
तफ़्सीर:
वे रात में उठकर नमाज़ पढ़ा करते थे। रात का बहुत कम भाग सोकर बिताते थे।
आयत 18
وَبِٱلْأَسْحَارِ هُمْ يَسْتَغْفِرُونَ
وَبِٱلْأَسْحَارِ
और सहरी के वक़्त
هُمْ
वो
يَسْتَغْفِرُونَ
वो असतग़फ़ार करते थे
और वही प्रातः की घड़ियों में क्षमा की प्रार्थना करते थे
तफ़्सीर:
तथा रात की आखिरी घड़ियों में अल्लाह से अपने गुनाहों की क्षमा माँगते थे।
आयत 19
وَفِىٓ أَمْوَٰلِهِمْ حَقٌّۭ لِّلسَّآئِلِ وَٱلْمَحْرُومِ
وَفِىٓ
And in
أَمْوَٰلِهِمْ
और उनके मालों में
حَقٌّۭ
हक़ था
لِّلسَّآئِلِ
वास्ते सवाली
وَٱلْمَحْرُومِ
और महरूम के
और उनके मालों में माँगनेवाले और धनहीन का हक़ था
तफ़्सीर:
तथा उनके धन में माँगने वाले के लिए तथा उसके लिए जो उनसे नहीं माँगता, जो किसी भी कारण से जीविका से वंचित है, एक हक़ (भाग) था, जिसे वे स्वेच्छा से देते थे।
आयत 20
وَفِى ٱلْأَرْضِ ءَايَـٰتٌۭ لِّلْمُوقِنِينَ
وَفِى
And in
ٱلْأَرْضِ
और ज़मीन में
ءَايَـٰتٌۭ
निशानियाँ हैं
لِّلْمُوقِنِينَ
यक़ीन करने वालों के लिए
और धरती में विश्वास करनेवालों के लिए बहुत-सी निशानियाँ है,
तफ़्सीर:
तथा धरती में और उसमें अल्लाह के रखे हुए पहाड़ों, समुद्रों, नदियों, पेड़ों, पौधों और जानवरों में, उन लोगों के लिए अल्लाह की शक्ति के कई संकेत हैं, जो पूर्ण विश्वास रखने वाले हैं कि अल्लाह ही स्रष्टा और रूप बनाने वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मुत्तकीन की सिफात (रात की इबादत, सहर के वक्त इस्तिग़फार) का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि रात के आखिरी हिस्से में माफी मांगना और सुबह से पहले उठना नेक बंदों की आदत है।
आयत 21
وَفِىٓ أَنفُسِكُمْ ۚ أَفَلَا تُبْصِرُونَ
وَفِىٓ
And in
أَنفُسِكُمْ ۚ
और तुम्हारे नफ़्सों में भी
أَفَلَا
क्या भला नहीं
تُبْصِرُونَ
तुम देखते
और ,स्वयं तुम्हारे अपने आप में भी। तो क्या तुम देखते नहीं?
तफ़्सीर:
और खुद तुम्हारे अंदर भी (ऐ लोगो!) अल्लाह की शक्ति की बहुत-सी निशानियाँ हैं। तो क्या तुम नहीं देखते कि विचार करो?!
आयत 22
وَفِى ٱلسَّمَآءِ رِزْقُكُمْ وَمَا تُوعَدُونَ
وَفِى
And in
ٱلسَّمَآءِ
और आसमान में
رِزْقُكُمْ
रिज़्क़ है तुम्हारा
وَمَا
और जो
تُوعَدُونَ
तुम वादा किए जाते हो
और आकाश मे ही तुम्हारी रोज़ी है और वह चीज़ भी जिसका तुमसे वादा किया जा रहा है
तफ़्सीर:
और आसमान ही में तुम्हारी सांसारिक और धार्मिक जीविका है, तथा उसी में वह भी है जो तुमसे अच्छे या बुरे का वादा किया जाता है।
आयत 23
فَوَرَبِّ ٱلسَّمَآءِ وَٱلْأَرْضِ إِنَّهُۥ لَحَقٌّۭ مِّثْلَ مَآ أَنَّكُمْ تَنطِقُونَ
فَوَرَبِّ
पस क़सम है रब की
ٱلسَّمَآءِ
आसमान
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन के
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَحَقٌّۭ
अलबत्ता हक़ है
مِّثْلَ
मानिन्द
مَآ
उसके जो
أَنَّكُمْ
बेशक तुम
تَنطِقُونَ
तुम बोलते हो
अतः सौगन्ध है आकाश और धरती के रब की। निश्चय ही वह सत्य बात है ऐसे ही जैसे तुम बोलते हो
तफ़्सीर:
आकाश और धरती के पालनहार की क़सम! निःसंदेह मरने के बाद पुनर्जीवन निश्चय सत्य है, जिसके बारे में कोई संदेह नहीं है। बिलकुल वैसे ही, जैसे जब तुम बोलते हो, तो तुम्हारे बोलने में कोई संदेह नहीं होता।
आयत 24
هَلْ أَتَىٰكَ حَدِيثُ ضَيْفِ إِبْرَٰهِيمَ ٱلْمُكْرَمِينَ
هَلْ
क्या
أَتَىٰكَ
आई आपके पास
حَدِيثُ
ख़बर
ضَيْفِ
मेहमानों की
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम के
ٱلْمُكْرَمِينَ
जो मोअज़्ज़िज़ थे
क्या इबराईम के प्रतिष्ठित अतिथियों का वृतान्त तुम तक पहँचा?
तफ़्सीर:
क्या (ऐ रसूल!) आपके पास इबराहीम अलैहिस्सलाम के मेहमानों की खबर आई है, जो फरिश्तों में से थे, जिन्हें इबराहीम अलैहिस्सलाम ने सम्मान दिया था?
आयत 25
إِذْ دَخَلُوا۟ عَلَيْهِ فَقَالُوا۟ سَلَـٰمًۭا ۖ قَالَ سَلَـٰمٌۭ قَوْمٌۭ مُّنكَرُونَ
إِذْ
जब
دَخَلُوا۟
वो दाख़िल हुए
عَلَيْهِ
उस पर
فَقَالُوا۟
तो उन्होंने कहा
سَلَـٰمًۭا ۖ
सलाम हो
قَالَ
उसने कहा
سَلَـٰمٌۭ
सलाम हो
قَوْمٌۭ
लोग हो
مُّنكَرُونَ
अजनबी
जब वे उसके पास आए तो कहा, "सलाम है तुमपर!" उसने भी कहा, "सलाम है आप लोगों पर भी!" (और जी में कहा) "ये तो अपरिचित लोग हैं।"
तफ़्सीर:
जब वे इबराहीम अलैहिस्सलाम के पास आए, तो उन्हें सलाम किया, तो इबराहीम अलैहिस्सलाम ने उनके जवाब में सलाम कहा और अपने दिल में कहा : ये ऐसे लोग हैं, जिन्हें हम नहीं जानते।
आयत 26
فَرَاغَ إِلَىٰٓ أَهْلِهِۦ فَجَآءَ بِعِجْلٍۢ سَمِينٍۢ
فَرَاغَ
फिर वो गया
إِلَىٰٓ
to
أَهْلِهِۦ
तरफ़ अपने घर वालों के
فَجَآءَ
पस वो ले आया
بِعِجْلٍۢ
एक बछड़ा (भुना हुआ)
سَمِينٍۢ
मोटा ताज़ा
फिर वह चुपके से अपने घरवालों के पास गया और एक मोटा-ताज़ा बछड़ा (का भूना हुआ मांस) ले आया
तफ़्सीर:
फिर वह चुपके से अपने घर वालों के पास गए और उनके पास से (भुना हुआ) मोटा-ताज़ा पूरा बछड़ा ले आए; उन्होंने यह सोचा कि वे इनसान हैं।
आयत 27
فَقَرَّبَهُۥٓ إِلَيْهِمْ قَالَ أَلَا تَأْكُلُونَ
فَقَرَّبَهُۥٓ
फिर उसने क़रीब किया उसे
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
قَالَ
उसने कहा
أَلَا
क्या नहीं
تَأْكُلُونَ
तुम खाते
और उसे उनके सामने पेश किया। कहा, "क्या आप खाते नहीं?"
तफ़्सीर:
फिर बछड़े को उनके सामने रख दिया और उनसे नम्रता से कहा : क्या तुम उस भोजन को नहीं खाते, जो तुम्हें पेश किया गया है?
आयत 28
فَأَوْجَسَ مِنْهُمْ خِيفَةًۭ ۖ قَالُوا۟ لَا تَخَفْ ۖ وَبَشَّرُوهُ بِغُلَـٰمٍ عَلِيمٍۢ
فَأَوْجَسَ
तो उसने महसूस किया
مِنْهُمْ
उनसे
خِيفَةًۭ ۖ
ख़ौफ़
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لَا
(Do) not
تَخَفْ ۖ
ना तुम डरो
وَبَشَّرُوهُ
और उन्होंने ख़ुशख़बरी दी उसे
بِغُلَـٰمٍ
एक लड़के
عَلِيمٍۢ
बहुत इल्म वाले की
फिर उसने दिल में उनसे डर महसूस किया। उन्होंने कहा, "डरिए नहीं।" और उन्होंने उसे एक ज्ञानवान लड़के की मंगल-सूचना दी
तफ़्सीर:
जब उन्होंने कुछ नहीं खाया, तो इबराहीम अलैहिस्सलाम ने अपने दिल में उनसे भय महसूस किया, जिसे वे समझ गए। अतः उन्हें संतोष देते हुए कहा : डरिए नहीं, हम अल्लाह के संदेशवाहक हैं। और उन्हें प्रसन्नता भरी खबर सुनाई, कि उनके यहाँ एक बड़ा ज्ञानी बालक पैदा होगा। यहाँ जिस बच्चे की खुशख़बरी दी गई है, वह इसहाक़ अलैहिस्सलाम हैं।
आयत 29
فَأَقْبَلَتِ ٱمْرَأَتُهُۥ فِى صَرَّةٍۢ فَصَكَّتْ وَجْهَهَا وَقَالَتْ عَجُوزٌ عَقِيمٌۭ
فَأَقْبَلَتِ
तो आगे बढ़ी
ٱمْرَأَتُهُۥ
बीवी उसकी
فِى
with
صَرَّةٍۢ
एक चीख़ के साथ
فَصَكَّتْ
तो उसने हाथ मारा
وَجْهَهَا
अपने चेहरे पर
وَقَالَتْ
और वो कहने लगी
عَجُوزٌ
बुढ़िया
عَقِيمٌۭ
बाँझ
इसपर उसकी स्त्री (चकित होकर) आगे बढ़ी और उसने अपना मुँह पीट लिया और कहने लगी, "एक बूढ़ी बाँझ (के यहाँ बच्चा पैदा होगा)!"
तफ़्सीर:
जब उनकी पत्नी ने खुशख़बरी सुनी, तो खुशी से चिल्लाती हुई आई। उसने अपना चेहरा पीट लिया और आश्चर्य से कहा : क्या एक बूढ़ी औरत बच्चा जनेगी, जबकि वह मूल रूप से बाँझ है!
आयत 30
قَالُوا۟ كَذَٰلِكِ قَالَ رَبُّكِ ۖ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْحَكِيمُ ٱلْعَلِيمُ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
كَذَٰلِكِ
इसी तरह होगा
قَالَ
फ़रमाया है
رَبُّكِ ۖ
तेरे रब ने
إِنَّهُۥ
बेशक वो
هُوَ
वो ही है
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिकमत वाला
ٱلْعَلِيمُ
बहुत इल्म वाला
उन्होंने कहा, "ऐसी ही तेरे रब ने कहा है। निश्चय ही वह बड़ा तत्वदर्शी, ज्ञानवान है।"
तफ़्सीर:
फ़रिश्तों ने उनसे कहा : जो कुछ हमने तुम्हें बताया है, वह तुम्हारे रब ने कहा है।और उसकी बात को कोई टालने वाला नहीं है। निश्चय वह अपनी रचना और नियति में पूर्ण हिकमत वाला, अपनी सृष्टि और उनके लिए उपयुक्त चीज़ों (उनके हितों) को खूब जानने वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इब्राहीम अलैहिस्सलाम के मेहमान फरिश्तों का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि मेहमान की खिदमत दिल खोलकर करना अच्छे किरदार की निशानी है।
आयत 31
۞ قَالَ فَمَا خَطْبُكُمْ أَيُّهَا ٱلْمُرْسَلُونَ
۞ قَالَ
उसने कहा
فَمَا
तो क्या
خَطْبُكُمْ
मामला है तुम्हारा
أَيُّهَا
O messengers
ٱلْمُرْسَلُونَ
ऐ भेजे जाने वालो(फ़रिश्तो)
उसने कहा, "ऐ (अल्लाह के भेजे हुए) दूतों, तुम्हारे सामने क्या मुहिम है?"
तफ़्सीर:
इबराहीम अलैहिस्सलाम ने फ़रिश्तों से कहा : तुम्हारा क्या मामला है और तुम किस उद्देश्य से आए हो?
आयत 32
قَالُوٓا۟ إِنَّآ أُرْسِلْنَآ إِلَىٰ قَوْمٍۢ مُّجْرِمِينَ
قَالُوٓا۟
उन्होंने कहा
إِنَّآ
बेशक हम
أُرْسِلْنَآ
भेजे गए हम
إِلَىٰ
to
قَوْمٍۢ
तरफ़ उन लोगों के
مُّجْرِمِينَ
जो मुजरिम हैं
उन्होंने कहा, "हम एक अपराधी क़ौम की ओर भेजे गए है;
तफ़्सीर:
फ़रिश्तों ने उनके जवाब में कहा : अल्लाह ने हमें कुछ अपराधी लोगों की ओर भेजा है, जो घिनौने पाप करते हैं।
आयत 33
لِنُرْسِلَ عَلَيْهِمْ حِجَارَةًۭ مِّن طِينٍۢ
لِنُرْسِلَ
ताकि हम भेजें
عَلَيْهِمْ
उन पर
حِجَارَةًۭ
पत्थर
مِّن
of
طِينٍۢ
मिट्टी के
"ताकि उनके ऊपर मिट्टी के पत्थर (कंकड़) बरसाएँ,
तफ़्सीर:
ताकि हम उनपर कठोर मिट्टी के पत्थर बरसाएँ।
आयत 34
مُّسَوَّمَةً عِندَ رَبِّكَ لِلْمُسْرِفِينَ
مُّسَوَّمَةً
निशानज़दा
عِندَ
by your Lord
رَبِّكَ
तेरे रब के यहाँ से
لِلْمُسْرِفِينَ
हद से बढ़ने वालों के लिए
जो आपके रब के यहाँ सीमा का अतिक्रमण करनेवालों के लिए चिन्हित है।"
तफ़्सीर:
जो (ऐ इबारहीम!) आपके पालनहार के पास चिह्नित हैं, जिन्हें अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करने वालों, कुफ़्र और पापों में अतिशयोक्ति करने वालों पर बरसाया जाएगा।
आयत 35
فَأَخْرَجْنَا مَن كَانَ فِيهَا مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
فَأَخْرَجْنَا
तो निकाल लिया हमने
مَن
जो कोई
كَانَ
था
فِيهَا
उसमें
مِنَ
of
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों में से
फिर वहाँ जो ईमानवाले थे, उन्हें हमने निकाल लिया;
तफ़्सीर:
चुनाँचे लूत (अलैहिस्सलाम) की बस्ती में जो ईमान वाले थे, हमने उन्हें निकाल लिया, ताकि वे उस यातना की चपेट में न आएँ, जो उन अपराधियों पर आने वाली थी।
आयत 36
فَمَا وَجَدْنَا فِيهَا غَيْرَ بَيْتٍۢ مِّنَ ٱلْمُسْلِمِينَ
فَمَا
तो ना
وَجَدْنَا
पाया हमने
فِيهَا
उसमें
غَيْرَ
सिवाए
بَيْتٍۢ
एक घर के
مِّنَ
of
ٱلْمُسْلِمِينَ
मुसलमानों में से
किन्तु हमने वहाँ एक घर के अतिरिक्त मुसलमानों (आज्ञाकारियों) का और कोई घर न पाया
तफ़्सीर:
तो हमने उनकी इस बस्ती में मुसलमानों का केवल एक घर पाया। वे लूत अलैहिस्सलाम के घर के लोग थे।
आयत 37
وَتَرَكْنَا فِيهَآ ءَايَةًۭ لِّلَّذِينَ يَخَافُونَ ٱلْعَذَابَ ٱلْأَلِيمَ
وَتَرَكْنَا
और छोड़ दी हमने
فِيهَآ
उसमें
ءَايَةًۭ
एक निशानी
لِّلَّذِينَ
उन लोगों के लिए जो
يَخَافُونَ
डरते हैं
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब
ٱلْأَلِيمَ
दर्दनाक से
इसके पश्चात हमने वहाँ उन लोगों के लिए एक निशानी छोड़ दी, जो दुखद यातना से डरते है
तफ़्सीर:
और हमने लूत (अलैहिस्सलाम) की बस्ती में यातना के कुछ निशान छोड़ दिए, जो उनपर यातना उतरने का पता देते हैं; ताकि इससे वह व्यक्ति सीख ग्रहण करे, जो उनपर आने वाली दर्दनाक यातना से डरता है। अतः वह उनके जैसा काम न करे ताकि उस यातना से बच सके।
आयत 38
وَفِى مُوسَىٰٓ إِذْ أَرْسَلْنَـٰهُ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ بِسُلْطَـٰنٍۢ مُّبِينٍۢ
وَفِى
And in
مُوسَىٰٓ
और मूसा में(निशानी है)
إِذْ
जब
أَرْسَلْنَـٰهُ
भेजा हमने उसे
إِلَىٰ
to
فِرْعَوْنَ
तरफ़ फ़िरऔन के
بِسُلْطَـٰنٍۢ
साथ दलील
مُّبِينٍۢ
खुली के
और मूसा के वृतान्त में भी (निशानी है) जब हमने फ़िरऔन के पास के स्पष्ट प्रमाण के साथ भेजा,
तफ़्सीर:
और मूसा (की कहानी) में, जब हमने उन्हें स्पष्ट प्रमाणों के साथ फ़िरऔन की ओर भेजा, उसके लिए एक निशानी है, जो दर्दनाक यातना से डरता है।
आयत 39
فَتَوَلَّىٰ بِرُكْنِهِۦ وَقَالَ سَـٰحِرٌ أَوْ مَجْنُونٌۭ
فَتَوَلَّىٰ
तो उसने मुँह मोड़ लिया
بِرُكْنِهِۦ
बवजह अपनी क़ुव्वत के
وَقَالَ
और वो कहने लगा
سَـٰحِرٌ
जादूगर है
أَوْ
या
مَجْنُونٌۭ
मजनून
किन्तु उसने अपनी शक्ति के कारण मुँह फेर लिया और कहा, "जादूगर है या दीवाना।"
तफ़्सीर:
तो फ़िरऔन ने अपनी शक्ति और सेना के घमंड में आकर सत्य से मुँह फेर लिया और मूसा अलैहिस्सलाम के बारे में कहने लगा : वह जादूगर है, जो लोगों पर जादू कर देता है, या पागल है, जो ऐसी बात कहता है जिसे वह नहीं समझता।
आयत 40
فَأَخَذْنَـٰهُ وَجُنُودَهُۥ فَنَبَذْنَـٰهُمْ فِى ٱلْيَمِّ وَهُوَ مُلِيمٌۭ
فَأَخَذْنَـٰهُ
तो पकड़ लिया हमने उसे
وَجُنُودَهُۥ
और उसके लश्करों को
فَنَبَذْنَـٰهُمْ
तो फ़ेंक दिया हमने उन्हें
فِى
into
ٱلْيَمِّ
समुन्दर में
وَهُوَ
और वो
مُلِيمٌۭ
मलामत ज़दा था
अन्ततः हमने उसे और उसकी सेनाओं को पकड़ लिया और उन्हें गहरे पानी में फेंक दिया, इस दशा में कि वह निन्दनीय था
तफ़्सीर:
तो हमने उसे और उसके सभी सैनिकों को पकड़ लिया, फिर उन्हें समुद्र में फेंक दिया और वे डूब गए और नष्ट हो गए। दरअसल फ़िरऔन ऐसे काम करने वाला था, जो भर्त्सना के योग्य थे, जैसे रसूलों को झुठलाना और खुद पूज्य होने का दावा करना।
आज की ज़िंदगी में सबक़
लूत, मूसा-फिरऔन, आद, समूद कौमों का मुख्तसर ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि हर सरकश कौम का अंजाम तबाही रहा, यह हमें इबरत के लिए काफी है।
आयत 41
وَفِى عَادٍ إِذْ أَرْسَلْنَا عَلَيْهِمُ ٱلرِّيحَ ٱلْعَقِيمَ
وَفِى
And in
عَادٍ
और आद में (निशानी है)
إِذْ
जब
أَرْسَلْنَا
भेजा हमने
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلرِّيحَ
हवा
ٱلْعَقِيمَ
बाँझ को
और आद में भी (तुम्हारे लिए निशानी है) जबकि हमने उनपर अशुभ वायु चला दी
तफ़्सीर:
और हूद (अलैहिस्सलाम) की जाति आद में उसके लिए एक निशानी है जो दर्दनाक अज़ाब से डरता है, जब हमने उनपर एक ऐसी हवा भेजी, जो न बारिश रखती थी और न ही पेड़ों को परागित करती थी, (दरअसल) उसमें कोई बरकत ही न थी।
आयत 42
مَا تَذَرُ مِن شَىْءٍ أَتَتْ عَلَيْهِ إِلَّا جَعَلَتْهُ كَٱلرَّمِيمِ
مَا
ना
تَذَرُ
उसने छोड़ा
مِن
any
شَىْءٍ
किसी चीज़ को
أَتَتْ
वो आई
عَلَيْهِ
जिस पर
إِلَّا
मगर
جَعَلَتْهُ
उसने कर दिया उसे
كَٱلرَّمِيمِ
बोसीदा हड्डी की तरह
वह जिस चीज़ पर से गुज़री उसे उसने जीर्ण-शीर्ण करके रख दिया
तफ़्सीर:
वह प्राणी या धन या उनके अलावा जिस चीज़ पर से भी गुज़रती, उसे नष्ट कर देती तथा उसे उस चीज़ की तरह करके छोड़ती, जो जीर्ण-शीर्ण हो।
आयत 43
وَفِى ثَمُودَ إِذْ قِيلَ لَهُمْ تَمَتَّعُوا۟ حَتَّىٰ حِينٍۢ
وَفِى
And in
ثَمُودَ
और समूद में (निशानी है)
إِذْ
जब
قِيلَ
कहा गया
لَهُمْ
उनसे
تَمَتَّعُوا۟
तुम फ़ायदा उठा लो
حَتَّىٰ
for
حِينٍۢ
एक वक़्त तक
और समुद्र में भी (तुम्हारे लिए निशानी है) जबकि उनसे कहा गया, "एक समय तक मज़े कर लो!"
तफ़्सीर:
तथा सालेह (अलैहिस्सलाम) की जाति समूद में दुखदायी यातना से डरने वाले के लिए एक निशानी है, जब उन लोगों से कहा गया : अपना निर्धारित समय समाप्त होने से पहले अपने जीवन का आनंद ले लो।
आयत 44
فَعَتَوْا۟ عَنْ أَمْرِ رَبِّهِمْ فَأَخَذَتْهُمُ ٱلصَّـٰعِقَةُ وَهُمْ يَنظُرُونَ
فَعَتَوْا۟
तो उन्होंने सरकशी की
عَنْ
against
أَمْرِ
हुक्म से
رَبِّهِمْ
अपने रब के
فَأَخَذَتْهُمُ
तो पकड़ लिया उन्हें
ٱلصَّـٰعِقَةُ
बिजली की कड़क ने
وَهُمْ
इस हाल में कि वो
يَنظُرُونَ
वो देख रहे थे
किन्तु उन्होंने अपने रब के आदेश की अवहेलना की; फिर कड़क ने उन्हें आ लिया और वे देखते रहे
तफ़्सीर:
तो उन्होंने अपने रब के आदेश को मानने से अभिमान किया और उनके घमंड और अहंकार ने उन्हें ईमान और आज्ञापालन से रोक दिया। चुनाँचे यातना की कड़क ने उन्हें पकड़ लिया, जबकि वे उसके आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। क्योंकि उसके आने से तीन दिन पहले ही उन्हें उसकी धमकी दे दी गई थी।
आयत 45
فَمَا ٱسْتَطَـٰعُوا۟ مِن قِيَامٍۢ وَمَا كَانُوا۟ مُنتَصِرِينَ
فَمَا
तो ना
ٱسْتَطَـٰعُوا۟
वो इस्तिताअत रखते थे
مِن
[of]
قِيَامٍۢ
खड़े होने की
وَمَا
और ना
كَانُوا۟
थे वो
مُنتَصِرِينَ
बदला लेने वाले
फिर वे न खड़े ही हो सके और न अपना बचाव ही कर सके
तफ़्सीर:
फिर वे अपने ऊपर उतरने वाली यातना को दूर करने में सक्षम नहीं हुए और न ही उनके पास कोई ऐसी शक्ति थी, जिसके द्वारा वे अपना बचाव कर सकें।
आयत 46
وَقَوْمَ نُوحٍۢ مِّن قَبْلُ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَوْمًۭا فَـٰسِقِينَ
وَقَوْمَ
और क़ौमे
نُوحٍۢ
नूह
مِّن
before
قَبْلُ ۖ
इससे क़ब्ल
إِنَّهُمْ
बेशक वो
كَانُوا۟
थे वो
قَوْمًۭا
लोग
فَـٰسِقِينَ
फ़ासिक़
और इससे पहले नूह की क़ौम को भी पकड़ा। निश्चय ही वे अवज्ञाकारी लोग थे
तफ़्सीर:
इन उल्लिखित लोगों से पहले, हमने नूह अलैहिस्सलाम की जाति को डुबोकर नष्ट कर दिया। निश्चय वे अल्लाह की आज्ञाकारिता से बाहर निकलने वाले लोग थे। इसलिए वे उसकी सज़ा के पात्र थे।
आयत 47
وَٱلسَّمَآءَ بَنَيْنَـٰهَا بِأَيْي۟دٍۢ وَإِنَّا لَمُوسِعُونَ
وَٱلسَّمَآءَ
और आसमान
بَنَيْنَـٰهَا
बनाया हमने उसे
بِأَيْي۟دٍۢ
साथ क़ुव्वत के
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَمُوسِعُونَ
अलबत्ता वुसअत देने वाले हैं
आकाश को हमने अपने हाथ के बल से बनाया और हम बड़ी समाई रखनेवाले है
तफ़्सीर:
और आकाश को हमने बनाया और उसके निर्माण को शक्ति के साथ मज़बूत किया और निश्चय हम उसके किनारों को विस्तारित करने वाले हैं।
आयत 48
وَٱلْأَرْضَ فَرَشْنَـٰهَا فَنِعْمَ ٱلْمَـٰهِدُونَ
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
فَرَشْنَـٰهَا
बिछाया हमने उसे
فَنِعْمَ
तो कितने अच्छे
ٱلْمَـٰهِدُونَ
हमवार करने वाले हैं
और धरती को हमने बिछाया, तो हम क्या ही ख़ूब बिछानेवाले है
तफ़्सीर:
हमने धरती को उस पर रहने वालों के लिए उनके लिए बिछौने की तरह बिछा दिया। तो हम क्या ही खूब बिछाने वाले हैं, जब हमने उनके लिए उसे बिछाया।
आयत 49
وَمِن كُلِّ شَىْءٍ خَلَقْنَا زَوْجَيْنِ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ
وَمِن
And of
كُلِّ
every
شَىْءٍ
और हर चीज़ से
خَلَقْنَا
बनाए हमने
زَوْجَيْنِ
जोड़े
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ो
और हमने हर चीज़ के जोड़े बनाए, ताकि तुम ध्यान दो
तफ़्सीर:
और हमने हर चीज़ से दो प्रकार पैदा किए; जैसे नर और नारी, आकाश और धरती तथा जल और थल; ताकि तुम अल्लाह के एकेश्वरवाद को समझो, जिसने हर चीज़ से दो क़िस्में बनाईं, तथा उसकी शक्ति को याद करो।
आयत 50
فَفِرُّوٓا۟ إِلَى ٱللَّهِ ۖ إِنِّى لَكُم مِّنْهُ نَذِيرٌۭ مُّبِينٌۭ
فَفِرُّوٓا۟
पस दौड़ो
إِلَى
to
ٱللَّهِ ۖ
तरफ़ अल्लाह के
إِنِّى
बेशक मैं
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنْهُ
उसकी तरफ़ से
نَذِيرٌۭ
डराने वाला हूँ
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
अतः अल्लाह की ओर दौड़ो। मैं उसकी ओर से तुम्हारे लिए एक प्रत्यक्ष सावधान करनेवाला हूँ
तफ़्सीर:
तो तुम अल्लाह की आज्ञा का पालन करके और उसकी अवज्ञा से दूर रहकर, उसकी सज़ा से भागते हुए उसके सवाब की ओर दौड़ो। निश्चय (ऐ लोगो!) मैं तुम्हें उसकी सज़ा से स्पष्ट रूप से डराने वाला हूँ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह की कुदरत की निशानियों (आसमान, ज़मीन) का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह की तरफ भागना (रुजू करना) ही असली नजात का रास्ता है।
आयत 51
وَلَا تَجْعَلُوا۟ مَعَ ٱللَّهِ إِلَـٰهًا ءَاخَرَ ۖ إِنِّى لَكُم مِّنْهُ نَذِيرٌۭ مُّبِينٌۭ
وَلَا
और ना
تَجْعَلُوا۟
तुम बनाओ
مَعَ
साथ
ٱللَّهِ
अल्लाह के
إِلَـٰهًا
इलाह
ءَاخَرَ ۖ
कोई दूसरा
إِنِّى
बेशक मैं
لَكُم
तुम्हारे लिए
مِّنْهُ
उसकी तरफ़ से
نَذِيرٌۭ
डराने वाला हूँ
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
और अल्लाह के साथ कोई दूसरा पूज्य-प्रभु न ठहराओ। मैं उसकी ओर से तुम्हारे लिए एक प्रत्यक्ष सावधान करनेवाला हूँ
तफ़्सीर:
और तुम अल्लाह के साथ कोई दूसरा पूज्य न बनाओ कि अल्लाह को छोड़कर उसकी इबादत करने लगो। मैं तुम्हारे लिए उसकी ओर से खुले तौर पर डराने वाला हूँ।
आयत 52
كَذَٰلِكَ مَآ أَتَى ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِم مِّن رَّسُولٍ إِلَّا قَالُوا۟ سَاحِرٌ أَوْ مَجْنُونٌ
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
مَآ
नहीं
أَتَى
आया
ٱلَّذِينَ
उनके पास जो
مِن
before them
قَبْلِهِم
उनसे पहले थे
مِّن
any
رَّسُولٍ
कोई रसूल
إِلَّا
मगर
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
سَاحِرٌ
जादूगर है
أَوْ
या
مَجْنُونٌ
मजनून
इसी तरह उन लोगों के पास भी, जो उनसे पहले गुज़र चुके है, जो भी रसूल आया तो उन्होंने बस यही कहा, "जादूगर है या दीवाना!"
तफ़्सीर:
जिस तरह मक्का के लोगों ने झुठलाया है, उसी तरह पिछले समुदायों ने भी झुठलाया। चुनाँचे उनके पास अल्लाह की ओर से जो भी रसूल आया, उन्होंने उसके बारे में कहा : वह एक जादूगर है, या एक पागल है।
आयत 53
أَتَوَاصَوْا۟ بِهِۦ ۚ بَلْ هُمْ قَوْمٌۭ طَاغُونَ
أَتَوَاصَوْا۟
क्या वो एक दूसरे को वसीयत करते हैं
بِهِۦ ۚ
इसकी
بَلْ
बल्कि
هُمْ
वो
قَوْمٌۭ
लोग हैं
طَاغُونَ
सरकश
क्या उन्होंने एक-दूसरे को इसकी वसीयत कर रखी है? नहीं, बल्कि वे है ही सरकश लोग
तफ़्सीर:
क्या पहले के काफिरों और उनमें से बाद के लोगों ने रसूलों को झुठलाने की एक-दूसरे को वसीयत कर रखी है?! नहीं, बल्कि उनकी सरकशी ने उन्हें इसपर एकमत किया है।
आयत 54
فَتَوَلَّ عَنْهُمْ فَمَآ أَنتَ بِمَلُومٍۢ
فَتَوَلَّ
पस मुँह मोड़ लीजिए
عَنْهُمْ
उनसे
فَمَآ
पस नहीं
أَنتَ
आप
بِمَلُومٍۢ
क़ाबिले मलामत
अतः उनसे मुँह फेर लो अब तुमपर कोई मलामत नहीं
तफ़्सीर:
तो (ऐ रसूल!) आप इन झुठलाने वालों से किनारा कर लें। आपपर कोई दोष नहीं है। क्योंकि आप जो कुछ देकर उनके पास भेजे गए थे, वह आपने उन्हें पहुँचा दिया।
आयत 55
وَذَكِّرْ فَإِنَّ ٱلذِّكْرَىٰ تَنفَعُ ٱلْمُؤْمِنِينَ
وَذَكِّرْ
और नसीहत कीजिए
فَإِنَّ
पस बेशक
ٱلذِّكْرَىٰ
नसीहत
تَنفَعُ
वो फ़ायदा देती है
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों को
और याद दिलाते रहो, क्योंकि याद दिलाना ईमानवालों को लाभ पहुँचाता है
तफ़्सीर:
तथा आपका उनसे किनारा करना, आपको उन्हें उपदेश करने और याद दिलाने से न रोके। अतः आप उन्हें उपदेश करें और याद दिलाते रहें। क्योंकि याद दिलाने से अल्लाह पर ईमान रखने वालों को लाभ होता है।
आयत 56
وَمَا خَلَقْتُ ٱلْجِنَّ وَٱلْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ
وَمَا
और नहीं
خَلَقْتُ
पैदा किया मैं ने
ٱلْجِنَّ
जिन्नों
وَٱلْإِنسَ
और इन्सानों को
إِلَّا
मगर
لِيَعْبُدُونِ
इस लिए कि वो इबादत करें मेरी
मैंने तो जिन्नों और मनुष्यों को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी बन्दगी करे
तफ़्सीर:
मैंने जिन्नों और इंसानों को केवल अपनी इबादत के लिए पैदा किया, मैंने उन्हें इसलिए नहीं पैदा किया कि वे किसी को मेरा साझी बनाएँ।
आयत 57
مَآ أُرِيدُ مِنْهُم مِّن رِّزْقٍۢ وَمَآ أُرِيدُ أَن يُطْعِمُونِ
مَآ
नहीं
أُرِيدُ
मैं चाहता
مِنْهُم
उनसे
مِّن
any
رِّزْقٍۢ
कोई रिज़्क़
وَمَآ
और नहीं
أُرِيدُ
मैं चाहता
أَن
कि
يُطْعِمُونِ
वो खिलाऐ मुझे
मैं उनसे कोई रोज़ी नहीं चाहता और न यह चाहता हूँ कि वे मुझे खिलाएँ
तफ़्सीर:
मैं उनसे कोई रोज़ी नहीं चाहता और न मैं उनसे यह चाहता हूँ कि वे मुझे खिलाएँ।
आयत 58
إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلرَّزَّاقُ ذُو ٱلْقُوَّةِ ٱلْمَتِينُ
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
هُوَ
वो ही है
ٱلرَّزَّاقُ
ख़ूब रिज़्क़ देने वाला
ذُو
Possessor
ٱلْقُوَّةِ
क़ुव्वत वाला
ٱلْمَتِينُ
निहायत मज़बूत
निश्चय ही अल्लाह ही है रोज़ी देनेवाला, शक्तिशाली, दृढ़
तफ़्सीर:
निःसंदेह अल्लाह ही अपने बंदों को रोज़ी देने वाला है। सभी लोग उसकी रोज़ी के मोहताज हैं। वह बड़ा शक्तिशाली, अत्यंत मज़बूत है, जिसे कोई पराजित नहीं कर सकता। जबकि सभी जिन्न और इनसान उसकी शक्ति के अधीन हैं।
आयत 59
فَإِنَّ لِلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ ذَنُوبًۭا مِّثْلَ ذَنُوبِ أَصْحَـٰبِهِمْ فَلَا يَسْتَعْجِلُونِ
فَإِنَّ
तो बेशक
لِلَّذِينَ
उनके लिए जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
ذَنُوبًۭا
हिस्सा है
مِّثْلَ
मानिन्द
ذَنُوبِ
हिस्से के
أَصْحَـٰبِهِمْ
उनके साथियों के
فَلَا
पस ना
يَسْتَعْجِلُونِ
वो जल्दी तलब करें मुझसे
अतः जिन लोगों ने ज़ुल्म किया है उनके लिए एक नियत पैमाना है; जैसा उनके साथियों का नियत पैमाना था। अतः वे मुझसे जल्दी न मचाएँ!
तफ़्सीर:
निश्चय उन लोगों के लिए जिन्होंने (ऐ रसूल!) आपको झुठलाकर खुद पर अत्याचार किया, उनके पिछले साथियों के हिस्से की तरह यातना का एक हिस्सा है, जिसकी एक निश्चित अवधि है। इसलिए, वे मुझसे उसे उसके समय से पहले जल्दी लाने का मुतालबा न करें।
आयत 60
فَوَيْلٌۭ لِّلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِن يَوْمِهِمُ ٱلَّذِى يُوعَدُونَ
فَوَيْلٌۭ
पस हलाकत है
لِّلَّذِينَ
उनके लिए जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
مِن
from
يَوْمِهِمُ
उनके उस दिन से
ٱلَّذِى
जिसका
يُوعَدُونَ
वो वादा दिए जाते हैं
अतः इनकार करनेवालों के लिए बड़ी खराबी है, उनके उस दिन के कारण जिसकी उन्हें धमकी दी जा रही है
तफ़्सीर:
फिर उन लोगों के लिए जिन्होंने अल्लाह का इनकार किया और अपने रसूल को झुठलाया, क़ियामत के दिन बड़ा विनाश और घाटा है, जिसमें उन्हें सज़ा देने का वादा किया जाता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
तौहीद की दावत और रिज़्क की ज़मानत के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि रिज़्क की ज़मानत अल्लाह ने खुद ली है, इसलिए फिक्र में हद से आगे बढ़ने की बजाय अपनी इबादत पर तवज्जो देनी चाहिए।
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