नाम का मतलब
तूर पहाड़ (मूसा अलैहिस्सलाम से हमकलामी वाला पहाड़)
पृष्ठभूमि
सूरह अत-तूर में कयामत के दिन के मंज़र, जन्नत की नेमतों और कुफ्फार के ऐतराज़ात का जवाब है। इसका नाम उस पहाड़ के नाम पर है जहां अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम से कलाम किया था।
फ़ज़ीलत / सार
कहा जाता है कि इस सूरह की तिलावत सुनकर एक मशहूर सहाबी का दिल इस्लाम की तरफ मायल हुआ था।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلطُّورِ
وَٱلطُّورِ
क़सम है तूर की
गवाह है तूर पर्वत,
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उस पर्वत की क़सम खाई है, जिसपर उसने मूसा अलैहिस्सलाम से बात की थी।
आयत 2
وَكِتَـٰبٍۢ مَّسْطُورٍۢ
وَكِتَـٰبٍۢ
और किताब
مَّسْطُورٍۢ
लिखी हुई की
और लिखी हुई किताब;
तफ़्सीर:
और उस किताब की क़सम खाई है, जो लिखी हुई है।
आयत 3
فِى رَقٍّۢ مَّنشُورٍۢ
فِى
In
رَقٍّۢ
वर्क़ में
مَّنشُورٍۢ
खुले हुए
फैले हुए झिल्ली के पन्ने में
तफ़्सीर:
ऐसे पन्ने में जो खुला हुआ है, जैसै कि आकाश से उतरने वाली पुस्तकें।
आयत 4
وَٱلْبَيْتِ ٱلْمَعْمُورِ
وَٱلْبَيْتِ
और घर की
ٱلْمَعْمُورِ
जो आबाद है
और बसा हुआ घर;
तफ़्सीर:
और उस घर की क़सम खाई है, जिसे फ़रिश्ते आकाश में अल्लाह की इबादत से आबाद रखते हैं।
आयत 5
وَٱلسَّقْفِ ٱلْمَرْفُوعِ
وَٱلسَّقْفِ
और छत की
ٱلْمَرْفُوعِ
जो ऊँची उठाई गई है
और ऊँची छत;
तफ़्सीर:
और ऊँचे आकाश की क़सम खाई है, जो धरती की छत है।
आयत 6
وَٱلْبَحْرِ ٱلْمَسْجُورِ
وَٱلْبَحْرِ
और समुन्दर की
ٱلْمَسْجُورِ
भड़काया हुआ है
और उफनता समुद्र
तफ़्सीर:
और जल से भरे हुए समुद्र की क़सम खाई है।
आयत 7
إِنَّ عَذَابَ رَبِّكَ لَوَٰقِعٌۭ
إِنَّ
बेशक
عَذَابَ
अज़ाब
رَبِّكَ
आपके रब का
لَوَٰقِعٌۭ
यक़ीनन वाक़ेअ होने वाला है
कि तेरे रब की यातना अवश्य घटित होकर रहेगी;
तफ़्सीर:
निश्चय (ऐ रसूल!) आपके रब की यातना काफ़िरों पर अवश्य घटित होने वाली है।
आयत 8
مَّا لَهُۥ مِن دَافِعٍۢ
مَّا
नहीं
لَهُۥ
उसे
مِن
कोई
دَافِعٍۢ
कोई दूर करने वाला
जिसे टालनेवाला कोई नहीं;
तफ़्सीर:
जिसे न कोई उनसे टालने वाला है, और न ही उन्हें उसके उनपर घटित होने से कोई बचाने वाला है।
आयत 9
يَوْمَ تَمُورُ ٱلسَّمَآءُ مَوْرًۭا
يَوْمَ
जिस दिन
تَمُورُ
लरज़ेगा
ٱلسَّمَآءُ
आसमान
مَوْرًۭا
सख़्त लरज़ना
जिस दिल आकाश बुरी तरह डगमगाएगा;
तफ़्सीर:
जिस दिन आकाश, क़ियामत का संकेत देते हुए, बुरी तरह डगमगाएगा और हिले-डुलेगा।
आयत 10
وَتَسِيرُ ٱلْجِبَالُ سَيْرًۭا
وَتَسِيرُ
और चलेंगे
ٱلْجِبَالُ
पहाड़
سَيْرًۭا
बहुत चलना
और पहाड़ चलते-फिरते होंगे;
तफ़्सीर:
और पहाड़ अपनी जगहों से चल पड़ेंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कसमों के साथ अज़ाब के यकीनी होने का ऐलान है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह के अज़ाब को टाला नहीं जा सकता, इससे बचने की तैयारी ज़रूरी है।
आयत 11
فَوَيْلٌۭ يَوْمَئِذٍۢ لِّلْمُكَذِّبِينَ
فَوَيْلٌۭ
पस हलाकत है
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
لِّلْمُكَذِّبِينَ
झुटलाने वालों के लिए
तो तबाही है उस दिन, झुठलानेवालों के लिए;
तफ़्सीर:
तो उस दिन विनाश और घाटा है, उस सज़ा को झुठलाने वालों के लिए जिसका अल्लाह ने काफ़िरों से वादा किया है।
आयत 12
ٱلَّذِينَ هُمْ فِى خَوْضٍۢ يَلْعَبُونَ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
هُمْ
वो
فِى
in
خَوْضٍۢ
बहस में
يَلْعَبُونَ
वो खेल रहे हैं
जो बात बनाने में लगे हुए खेल रहे है
तफ़्सीर:
जो व्यर्थ और निरर्थक बातों में पड़े खेल रहे हैं। उन्हें दोबारा जीवित और एकत्र किए जाने की कोई परवाह नहीं हैं।
आयत 13
يَوْمَ يُدَعُّونَ إِلَىٰ نَارِ جَهَنَّمَ دَعًّا
يَوْمَ
जिस दिन
يُدَعُّونَ
वो ढकेले जाऐंगे
إِلَىٰ
(in)to
نَارِ
तरफ़ आग के
جَهَنَّمَ
जहन्नम की
دَعًّا
सख़्त ढकेले जाना
जिस दिन वे धक्के दे-देकर जहन्नम की ओर ढकेले जाएँगे
तफ़्सीर:
जिस दिन उन्हें बल और कठोरता के साथ जहन्नम की आग में धकेला जाएगा।
आयत 14
هَـٰذِهِ ٱلنَّارُ ٱلَّتِى كُنتُم بِهَا تُكَذِّبُونَ
هَـٰذِهِ
ये है
ٱلنَّارُ
आग
ٱلَّتِى
वो जो
كُنتُم
थे तुम
بِهَا
उसको
تُكَذِّبُونَ
तुम झुठलाते
(कहा जाएगा), "यही है वह आग जिसे तुम झुठलाते थे
तफ़्सीर:
और उन्हें डाँटते हुए कहा जाएगा : यही है वह आग, जिसे तुम झुठलाते थे जब तुम्हारे रसूल तुम्हें उससे डराते थे।
आयत 15
أَفَسِحْرٌ هَـٰذَآ أَمْ أَنتُمْ لَا تُبْصِرُونَ
أَفَسِحْرٌ
क्या भला जादू है
هَـٰذَآ
ये
أَمْ
या
أَنتُمْ
तुम
لَا
(do) not
تُبْصِرُونَ
नहीं तुम देखते
"अब भला (बताओ) यह कोई जादू है या तुम्हे सुझाई नहीं देता?
तफ़्सीर:
तो क्या यह अज़ाब जिसे तुमने देखा है, जादू है?! या तुम उसे देखते ही नहीं हो?!
आयत 16
ٱصْلَوْهَا فَٱصْبِرُوٓا۟ أَوْ لَا تَصْبِرُوا۟ سَوَآءٌ عَلَيْكُمْ ۖ إِنَّمَا تُجْزَوْنَ مَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
ٱصْلَوْهَا
जलो उसमें
فَٱصْبِرُوٓا۟
पस सब्र करो
أَوْ
या
لَا
(do) not
تَصْبِرُوا۟
ना तुम सब्र करो
سَوَآءٌ
बराबर है
عَلَيْكُمْ ۖ
तुम पर
إِنَّمَا
बेशक
تُجْزَوْنَ
तुम बदला दिए जाते हो
مَا
उसका जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते
"जाओ, झुलसो उसमें! अब धैर्य से काम लो या धैर्य से काम न लो; तुम्हारे लिए बराबर है। तुम वही बदला पा रहे हो, जो तुम करते रहे थे।"
तफ़्सीर:
इस आग की गर्मी का स्वाद चखो और उसे भुगतो। उसकी गर्मी को सहने में धैर्य से काम लो या उसके साथ धैर्य मत रखो, तुम्हारे लिए धैर्य रखना और न रखना दोनों बराबर हैं। आज तुम्हें केवल उसी का बदला दिया जाएगा, जो तुम दुनिया में कुफ़्र और पाप किया करते थे।
आयत 17
إِنَّ ٱلْمُتَّقِينَ فِى جَنَّـٰتٍۢ وَنَعِيمٍۢ
إِنَّ
बेशक
ٱلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोग
فِى
(will be) in
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात में
وَنَعِيمٍۢ
और नेअमतों में होंगे
निश्चय ही डर रखनेवाले बाग़ों और नेमतों में होंगे
तफ़्सीर:
निश्चय अपने रब से - उसकी आज्ञाओं का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर - डरने वाले लोग बागों और बड़ी नेमतों में होंगे, जो कभी ख़त्म नहीं होंगी।
आयत 18
فَـٰكِهِينَ بِمَآ ءَاتَىٰهُمْ رَبُّهُمْ وَوَقَىٰهُمْ رَبُّهُمْ عَذَابَ ٱلْجَحِيمِ
فَـٰكِهِينَ
मज़े करने वाले होंगे
بِمَآ
साथ उसके जो
ءَاتَىٰهُمْ
अता किया उन्हें
رَبُّهُمْ
उनके रब ने
وَوَقَىٰهُمْ
और बचा लेगा उन्हें
رَبُّهُمْ
रब उनका
عَذَابَ
अज़ाब से
ٱلْجَحِيمِ
जहन्नम के
जो कुछ उनके रब ने उन्हें दिया होगा, उसका आनन्द ले रहे होंगे और इस बात से कि उनके रब ने उन्हें भड़कती हुई आग से बचा लिया -
तफ़्सीर:
वे अपने पालनहार के प्रदान की हुई खाने-पीने की चीज़ों और पत्नियों के सुख का आनंद उठा रहे होंगे। और उनके रब ने उन्हें जहन्नम की यातना से बचा लिया; इस तरह वे अपने इच्छित सुख प्राप्त करके और विपत्तियों से मुक्ति हासिल करके सफल हो गए।
आयत 19
كُلُوا۟ وَٱشْرَبُوا۟ هَنِيٓـًٔۢا بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
كُلُوا۟
खाओ
وَٱشْرَبُوا۟
और पियो
هَنِيٓـًٔۢا
मज़े से
بِمَا
बवजह उसके जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते
"मज़े से खाओ और पियो उन कर्मों के बदले में जो तुम करते रहे हो।"
तफ़्सीर:
और उनसे कहा जाएगा : तुम्हारा जो दिल चाहे, मज़े से खाओ-पिओ। जो कुछ तुम खाते-पीते हो, उससे तुम्हें किसी नुकसान या तकलीफ़ का डर नहीं है। यह दुनिया में तुम्हारे अच्छे कर्मों का बदला है।
आयत 20
مُتَّكِـِٔينَ عَلَىٰ سُرُرٍۢ مَّصْفُوفَةٍۢ ۖ وَزَوَّجْنَـٰهُم بِحُورٍ عِينٍۢ
مُتَّكِـِٔينَ
तकिया लगाए हुए होंगे
عَلَىٰ
on
سُرُرٍۢ
तख़्तों पर
مَّصْفُوفَةٍۢ ۖ
क़तार में रखे हुए
وَزَوَّجْنَـٰهُم
और ब्याह देंगे हम उन्हें
بِحُورٍ
साथ गोरी औरतों के
عِينٍۢ
बड़ी आँखों वाली
- पंक्तिबद्ध तख़्तो पर तकिया लगाए हुए होंगे और हम बड़ी आँखोंवाली हूरों (परम रूपवती स्त्रियों) से उनका विवाह कर देंगे
तफ़्सीर:
सजे-सजाए तख़्तों पर तकिया लगाए हुए होंगे, जो एक-दूसरे के सामने बिछे होंगे और हम उनका विवाह बड़ी-बड़ी आँखों वाली गोरी स्त्रियों से कर देंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन के मंज़र और जन्नत की नेमतों का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि जन्नत की नेमतों की उम्मीद हमें नेक अमल की तरफ मुतवज्जह रखनी चाहिए।
आयत 21
وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَٱتَّبَعَتْهُمْ ذُرِّيَّتُهُم بِإِيمَـٰنٍ أَلْحَقْنَا بِهِمْ ذُرِّيَّتَهُمْ وَمَآ أَلَتْنَـٰهُم مِّنْ عَمَلِهِم مِّن شَىْءٍۢ ۚ كُلُّ ٱمْرِئٍۭ بِمَا كَسَبَ رَهِينٌۭ
وَٱلَّذِينَ
और वो लोग जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَٱتَّبَعَتْهُمْ
और पैरवी की उनकी
ذُرِّيَّتُهُم
उनकी औलाद ने
بِإِيمَـٰنٍ
साथ ईमान के
أَلْحَقْنَا
मिला देंगे हम
بِهِمْ
साथ उनके
ذُرِّيَّتَهُمْ
उनकी औलाद को
وَمَآ
और ना
أَلَتْنَـٰهُم
कमी करेंगे हम उनसे
مِّنْ
of
عَمَلِهِم
उनके अमल में से
مِّن
(in) any
شَىْءٍۢ ۚ
कुछ भी
كُلُّ
हर
ٱمْرِئٍۭ
शख़्स
بِمَا
बवजह उसके जो
كَسَبَ
उसने कमाई की
رَهِينٌۭ
रेहन/गिरवी है
जो लोग ईमान लाए और उनकी सन्तान ने भी ईमान के साथ उसका अनुसरण किया, उनकी सन्तान को भी हम उनसे मिला देंगे, और उनके कर्म में से कुछ भी कम करके उन्हें नहीं देंगे। हर व्यक्ति अपनी कमाई के बदले में बन्धक है
तफ़्सीर:
जो लोग ईमान लाए और उनकी संतान ने भी ईमान में उनका अनुसरण किया, हम उनकी संतान को उनके साथ मिला देंगे, ताकि उनकी आँखों को सुकून मिले, भले ही वे उनके कामों (के स्तर) तक न पहुँचें हों। तथा हम उनके कामों के प्रतिफल में कुछ भी कमी नहीं करेंगे। हर इनसान अपने किए हुए बुरे काम के बदले बंधक है। कोई अन्य व्यक्ति उसकी ओर से उसके काम का कुछ भी बोझ नहीं उठाएगा।
आयत 22
وَأَمْدَدْنَـٰهُم بِفَـٰكِهَةٍۢ وَلَحْمٍۢ مِّمَّا يَشْتَهُونَ
وَأَمْدَدْنَـٰهُم
और हम दिए चले जाऐंगे उन्हें
بِفَـٰكِهَةٍۢ
फल
وَلَحْمٍۢ
और गोश्त
مِّمَّا
उसमें से जो
يَشْتَهُونَ
वो ख़्वाहिश करेंगे
और हम उन्हें मेवे और मांस, जिसकी वे इच्छा करेंगे दिए चले जाएँगे
तफ़्सीर:
और हम इन जन्नत वालों को तरह-तरह के फल देंगे, तथा वे जो भी मांस चाहेंगे, हम उन्हें प्रदान करेंगे।
आयत 23
يَتَنَـٰزَعُونَ فِيهَا كَأْسًۭا لَّا لَغْوٌۭ فِيهَا وَلَا تَأْثِيمٌۭ
يَتَنَـٰزَعُونَ
वो एक दूसरे से छीना-झपटी करेंगे
فِيهَا
उसमें
كَأْسًۭا
जामे शराब पर
لَّا
no
لَغْوٌۭ
ना कोई बेहूदा गोई होगी
فِيهَا
उसमें
وَلَا
और ना
تَأْثِيمٌۭ
कोई गुनाह(की बात)
वे वहाँ आपस में प्याले हाथोंहाथ ले रहे होंगे, जिसमें न कोई बेहूदगी होगी और न गुनाह पर उभारनेवाली कोई बात,
तफ़्सीर:
वे जन्नत में ऐसा प्याला पिएँगे, जिसके पीने से वह ग़लत बात और पाप नहीं होगा, जो दुनिया में नशे के कारण होता है।
आयत 24
۞ وَيَطُوفُ عَلَيْهِمْ غِلْمَانٌۭ لَّهُمْ كَأَنَّهُمْ لُؤْلُؤٌۭ مَّكْنُونٌۭ
۞ وَيَطُوفُ
और घूम रहे होंगे
عَلَيْهِمْ
उन पर
غِلْمَانٌۭ
नौउम्र ख़ादिम
لَّهُمْ
उनके लिए
كَأَنَّهُمْ
गोया कि वो
لُؤْلُؤٌۭ
मोती हैं
مَّكْنُونٌۭ
छुपाए हुए
और उनकी सेवा में सुरक्षित मोतियों के सदृश किशोर दौड़ते फिरते होंगे, जो ख़ास उन्हीं (की सेवा) के लिए होंगे
तफ़्सीर:
और उनके इर्द-गिर्द ऐसे बच्चे चक्कर लगा रहे होंगे, जो उनकी सेवा के लिए नियुक्त होंगे, जो अपनी त्वचा की शुद्धता और उसकी सफेदी में गोया सीपियों में सुरक्षित मोती लग रहे होंगे।
आयत 25
وَأَقْبَلَ بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍۢ يَتَسَآءَلُونَ
وَأَقْبَلَ
और मुतावज्जह होंगे
بَعْضُهُمْ
बाज़ उनके
عَلَىٰ
to
بَعْضٍۢ
बाज़ पर
يَتَسَآءَلُونَ
वो एक दूसरे से सवाल करेंगे
उनमें से कुछ व्यक्ति कुछ व्यक्तियों की ओर हाल पूछते हुए रुख़ करेंगे,
तफ़्सीर:
और जन्नत के कुछ लोग कुछ दूसरों की ओर मुतवज्जह होकर, एक-दूसरे से दुनिया में उनकी स्थिति के बारे में पूछ रहे होंगे।
आयत 26
قَالُوٓا۟ إِنَّا كُنَّا قَبْلُ فِىٓ أَهْلِنَا مُشْفِقِينَ
قَالُوٓا۟
वो कहेंगे
إِنَّا
बेशक हम
كُنَّا
थे हम
قَبْلُ
इससे पहले
فِىٓ
among
أَهْلِنَا
अपन घर वालों में
مُشْفِقِينَ
डरने वाले
कहेंगे, "निश्चय ही हम पहले अपने घरवालों में डरते रहे है,
तफ़्सीर:
तो वे उन्हें जवाब देंगे : निःसंदेह हम दुनिया में अपने घरवालों के बीच अल्लाह की यातना से डरने वाले थे।
आयत 27
فَمَنَّ ٱللَّهُ عَلَيْنَا وَوَقَىٰنَا عَذَابَ ٱلسَّمُومِ
فَمَنَّ
पस एहसान किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَيْنَا
हम पर
وَوَقَىٰنَا
और उसने बचा लिया हमें
عَذَابَ
अज़ाब से
ٱلسَّمُومِ
लू/ निहायत गर्म हवा के
"अन्ततः अल्लाह ने हमपर एहसास किया और हमें गर्म विषैली वायु की यातना से बचा लिया
तफ़्सीर:
फिर अल्लाह ने हमपर उपकार करके हमें इस्लाम का मार्गदर्शन प्रदान किया और हमें अत्यधिक गर्मी वाली यातना से बचा लिया।
आयत 28
إِنَّا كُنَّا مِن قَبْلُ نَدْعُوهُ ۖ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْبَرُّ ٱلرَّحِيمُ
إِنَّا
बेशक हम
كُنَّا
थे हम
مِن
before
قَبْلُ
इससे पहले
نَدْعُوهُ ۖ
हम पुकारते उसको
إِنَّهُۥ
बेशक वो
هُوَ
वो ही है
ٱلْبَرُّ
बहुत एहसान करने वाला
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला
"इससे पहले हम उसे पुकारते रहे है। निश्चय ही वह सदव्यवहार करनेवाला, अत्यन्त दयावान है।"
तफ़्सीर:
हम दुनिया के जीवन में उसी की इबादत करते थे और उससे प्रार्थना करते थे कि हमें आग की यातना से बचा ले। निःसंदेह वही उपकार करने वाला, अपने बंदों से किए हुए अपने वादे में सच्चा और उनपर दया करने वाला है। यह हमपर उसके उपकार और दया ही में से है कि उसने हमें ईमान का मार्गदर्शन प्रदान किया, तथा हमें जन्नत में दाखिल किया और जहन्नम की आग से दूर रखा।
आयत 29
فَذَكِّرْ فَمَآ أَنتَ بِنِعْمَتِ رَبِّكَ بِكَاهِنٍۢ وَلَا مَجْنُونٍ
فَذَكِّرْ
पस नसीहत कीजिए
فَمَآ
पस नहीं
أَنتَ
आप
بِنِعْمَتِ
फ़ज़ल से
رَبِّكَ
अपने रब के
بِكَاهِنٍۢ
कोई काहिन
وَلَا
और ना
مَجْنُونٍ
मजनून
अतः तुम याद दिलाते रहो। अपने रब की अनुकम्पा से न तुम काहिन (ढोंगी भविष्यवक्ता) हो और न दीवाना
तफ़्सीर:
तो (ऐ रसूल!) आप क़ुरआन के द्वारा नसीहत करें। क्योंकि अल्लाह ने आपको जो ईमान और विवेक दिया है, उसके कारण आप न किसी तरह काहिन हैं कि आपके पास कोई मुवक्किल जिन्न है और न ही आप कोई दीवाना हैं।
आयत 30
أَمْ يَقُولُونَ شَاعِرٌۭ نَّتَرَبَّصُ بِهِۦ رَيْبَ ٱلْمَنُونِ
أَمْ
या
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
شَاعِرٌۭ
एक शायर है
نَّتَرَبَّصُ
हम इन्तिज़ार कर रहें हैं
بِهِۦ
उसके बारे में
رَيْبَ
a misfortune of time
ٱلْمَنُونِ
गर्दिशे ज़माना (मौत) का
या वे कहते है, "वह कवि है जिसके लिए हम काल-चक्र की प्रतीक्षा कर रहे है?"
तफ़्सीर:
या क्या ये झुठलाने वाले कहते हैं : मुहम्मद एक रसूल नहीं हैं, बल्कि वह एक शा'इर हैं, जिनके बारे में हम इस बात की प्रतीक्षा करते हैं कि मौत उन्हें उचक ले और हम उनसे आराम पा जाएँ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
औलाद के जन्नत में मिलाप और कुफ्फार के ऐतराज़ात के जवाब का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि नेक औलाद और नेक वालिदैन आखिरत में एक साथ जन्नत में मिलेंगे, यह नेक अमल की तरगीब देता है।
आयत 31
قُلْ تَرَبَّصُوا۟ فَإِنِّى مَعَكُم مِّنَ ٱلْمُتَرَبِّصِينَ
قُلْ
कह दीजिए
تَرَبَّصُوا۟
इन्तिज़ार करो
فَإِنِّى
पस बेशक मैं
مَعَكُم
साथ तुम्हारे
مِّنَ
among
ٱلْمُتَرَبِّصِينَ
इन्तिज़ार करने वालों में से हूँ
कह दो, "प्रतीक्षा करो! मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करता हूँ।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : तुम मेरी मौत की प्रतीक्षा करो और मैं उस यातना की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जो तुम्हारे मेरा इनकार करने के कारण तुमपर आने वाली है।
आयत 32
أَمْ تَأْمُرُهُمْ أَحْلَـٰمُهُم بِهَـٰذَآ ۚ أَمْ هُمْ قَوْمٌۭ طَاغُونَ
أَمْ
या
تَأْمُرُهُمْ
हुक्म देती हैं उन्हें
أَحْلَـٰمُهُم
अक़्लें उनकी
بِهَـٰذَآ ۚ
उसका
أَمْ
या
هُمْ
वो
قَوْمٌۭ
लोग हैं
طَاغُونَ
सरकश
या उनकी बुद्धियाँ यही आदेश दे रही है, या वे ही है सरकश लोग?
तफ़्सीर:
बल्कि, क्या उनकी बुद्धियाँ उन्हें यह कहने का आदेश देती हैं कि वह एक काहिन और एक पागल हैं?! चुनाँचे वे (आपके अंदर) ऐसी बातें जमा करते हैं, जो एक व्यक्ति के अंदर जमा नहीं हो सकतीं। बल्कि, दरअसल वे ऐसे लोग हैं जो सीमाओं को पार करने वाले हैं। इसलिए वे शरीयत या तर्क की ओर वापस नहीं आते हैं।
आयत 33
أَمْ يَقُولُونَ تَقَوَّلَهُۥ ۚ بَل لَّا يُؤْمِنُونَ
أَمْ
या
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
تَقَوَّلَهُۥ ۚ
उसने गढ़ लिया उसे
بَل
बल्कि
لَّا
not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाते
या वे कहते है, "उसने उस (क़ुरआन) को स्वयं ही कह लिया है?" नहीं, बल्कि वे ईमान नहीं लाते
तफ़्सीर:
क्या वे कहते हैं कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस क़ुरआन को अपनी ओर से गढ़ लिया है और उनकी ओर उसकी वह़्य (प्रकाशना) नहीं की गई है?! आपने उसे अपनी ओर से नहीं गढ़ा। बल्कि ये क़ुरआन पर ईमान लाने से अभिमान करते हैं। इसलिए वे कहते हैं : मुहम्मद ने इसे गढ़ लिया है।
आयत 34
فَلْيَأْتُوا۟ بِحَدِيثٍۢ مِّثْلِهِۦٓ إِن كَانُوا۟ صَـٰدِقِينَ
فَلْيَأْتُوا۟
पस चाहिए कि वो लाऐं
بِحَدِيثٍۢ
कोई बात
مِّثْلِهِۦٓ
इस जैसी
إِن
अगर
كَانُوا۟
हैं वो
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
अच्छा यदि वे सच्चे है तो उन्हें उस जैसी वाणी ले आनी चाहिए
तफ़्सीर:
तो वे इस क़ुरआन जैसी एक बात ही ले आएँ, भले ही वह गढ़ी गई हो, यदि वे अपने इस दावे में सच्चे हैं कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इसे अपनी ओर से गढ़ लिया है।
आयत 35
أَمْ خُلِقُوا۟ مِنْ غَيْرِ شَىْءٍ أَمْ هُمُ ٱلْخَـٰلِقُونَ
أَمْ
या
خُلِقُوا۟
वो पैदा किए गए
مِنْ
of
غَيْرِ
बग़ैर
شَىْءٍ
किसी चीज़ के
أَمْ
या
هُمُ
वो
ٱلْخَـٰلِقُونَ
पैदा करने वाले हैं
या वे बिना किसी चीज़ के पैदा हो गए? या वे स्वयं ही अपने स्रष्टाँ है?
तफ़्सीर:
क्या वे बिना किसी पैदा करने वाले के पैदा हो गए हैं?! या वे अपने आपको ख़ुद पैदा करने वाले है?! सृष्टिकर्ता के बिना सृष्टि का अस्तित्व संभव नहीं है, तथा कोई सृष्टि कोई चीज़ पैदा नहीं कर सकती। फिर वे अपने सृष्टिकर्ता की पूजा क्यों नहीं करते?!
आयत 36
أَمْ خَلَقُوا۟ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ ۚ بَل لَّا يُوقِنُونَ
أَمْ
या
خَلَقُوا۟
उन्होंने पैदा किया
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ ۚ
और ज़मीन को
بَل
बल्कि
لَّا
not
يُوقِنُونَ
नहीं वो यक़ीन करते
या उन्होंने आकाशों और धरती को पैदा किया?
तफ़्सीर:
या उन्होंने आकाशों और धरती को पैदा किया है?! बल्कि उन्हें यक़ीन नहीं है कि अल्लाह ही उनका पैदा करने वाला है। क्योंकि अगर उन्हें इसका यक़ीन होता, तो वे अवश्य अल्लाह को एक मानते और उसके रसूल पर ईमान लाते।
आयत 37
أَمْ عِندَهُمْ خَزَآئِنُ رَبِّكَ أَمْ هُمُ ٱلْمُصَۣيْطِرُونَ
أَمْ
या
عِندَهُمْ
उनके पास
خَزَآئِنُ
ख़ज़ाने हैं
رَبِّكَ
आपके रब के
أَمْ
या
هُمُ
वो
ٱلْمُصَۣيْطِرُونَ
निगहबान हैं
या उनके पास तुम्हारे रब के खज़ाने है? या वही उनके परिरक्षक है?
तफ़्सीर:
या क्या उनके पास आपके पालनहार की रोज़ी के खज़ाने हैं, जो वे जिसे चाहें उसे प्रदान करें, या (उनके पास) नुबुव्वत के खज़ाने हैं, जो वे जिसे चाहें प्रदान करें और जिसे चाहें उससे वंचित कर दें?! या वही सत्तावादी हैं जो अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं ?!
आयत 38
أَمْ لَهُمْ سُلَّمٌۭ يَسْتَمِعُونَ فِيهِ ۖ فَلْيَأْتِ مُسْتَمِعُهُم بِسُلْطَـٰنٍۢ مُّبِينٍ
أَمْ
या
لَهُمْ
उनके लिए
سُلَّمٌۭ
कोई सीढ़ी है
يَسْتَمِعُونَ
वो ग़ौर से सुनते हों
فِيهِ ۖ
उसमें (चढ़ कर)
فَلْيَأْتِ
पस चाहिए कि लाए
مُسْتَمِعُهُم
उनका सुनने वाला
بِسُلْطَـٰنٍۢ
कोई दलील
مُّبِينٍ
खुली
या उनके पास कोई सीढ़ी है जिसपर चढ़कर वे (कान लगाकर) सुन लेते है? फिर उनमें से जिसने सुन लिया हो तो वह ले आए स्पष्ट प्रमाण
तफ़्सीर:
क्या उनके पास कोई सीढ़ी है, जिसके साथ आकाश पर चढ़कर वे उसमें अल्लाह की वह़्य (प्रकाशना) को सुनते हैं जो वह़्य करता है कि वे सत्य पर हैं?! तो उनमें से जिसने वह वह़्य सुनी है, वह कोई स्पष्ट प्रमाण लाए, जो तुम्हारी इस बात में पुष्टि करे जो तुम दावा करते हो कि तुम सत्य पर हो।
आयत 39
أَمْ لَهُ ٱلْبَنَـٰتُ وَلَكُمُ ٱلْبَنُونَ
أَمْ
या
لَهُ
उसके लिए हैं
ٱلْبَنَـٰتُ
बेटियाँ
وَلَكُمُ
और तुम्हारे लिए हैं
ٱلْبَنُونَ
बेटे
या उस (अल्लाह) के लिए बेटियाँ है और तुम्हारे अपने लिए बेटे?
तफ़्सीर:
या उस पवित्र अल्लाह के लिए बेटियाँ हैं, जिन्हें तुम (अपने लिए) नापसंद करते हो, और तुम्हारे लिए बेटे हैं, जिन्हें तुम पसंद करते हो?!
आयत 40
أَمْ تَسْـَٔلُهُمْ أَجْرًۭا فَهُم مِّن مَّغْرَمٍۢ مُّثْقَلُونَ
أَمْ
या
تَسْـَٔلُهُمْ
आप माँगते हैं उनसे
أَجْرًۭا
कोई अजर
فَهُم
तो वो
مِّن
from
مَّغْرَمٍۢ
तावान से
مُّثْقَلُونَ
बोझल हैं
या तुम उनसे कोई पारिश्रामिक माँगते हो कि वे तावान के बोझ से दबे जा रहे है?
तफ़्सीर:
या क्या (ऐ रसूल!) आप उनसे उन्हें अपने पालनहार का संदेश पहुँचाने पर पारिश्रमिक माँगते हैं?! जिसके कारण उनपर इतना बोझ पड़ जाता है कि वे वहन नहीं कर सकते।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुफ्फार के कुरआन पर ऐतराज़ात के रद्द का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि बेबुनियाद ऐतराज़ात से घबराने की बजाय दलील और सब्र से जवाब देना चाहिए।
आयत 41
أَمْ عِندَهُمُ ٱلْغَيْبُ فَهُمْ يَكْتُبُونَ
أَمْ
या
عِندَهُمُ
उनके पास
ٱلْغَيْبُ
ग़ैब है
فَهُمْ
तो वो
يَكْتُبُونَ
वो लिख रहे हैं
या उनके पास परोक्ष (स्पष्ट) है जिसके आधार पर वे लिए रहे हो?
तफ़्सीर:
या क्या उनके पास ग़ैब (परोक्ष) का ज्ञान है। इसलिए वे जिन ग़ैब की बातों से अवगत होते हैं, उन्हें लोगों के लिए लिखते हैं, फिर उनमें से जो चाहते हैं, उन्हें बताते हैं?!
आयत 42
أَمْ يُرِيدُونَ كَيْدًۭا ۖ فَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ هُمُ ٱلْمَكِيدُونَ
أَمْ
या
يُرِيدُونَ
वो इरादा करते हैं
كَيْدًۭا ۖ
एक चाल का
فَٱلَّذِينَ
तो वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
هُمُ
वो ही
ٱلْمَكِيدُونَ
चाल में आने वाले हैं
या वे कोई चाल चलना चाहते है? तो जिन लोगों ने इनकार किया वही चाल की लपेट में आनेवाले है
तफ़्सीर:
या ये झुठलाने वाले आपके तथा आपके धर्म के साथ कोई चाल चलना चाहते हैं?! तो आप अल्लाह पर भरोसा रखें। क्योंकि जिन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल का इनकार किया, वही लोग चाल की चपेट में आने वाले हैं, न कि आप।
आयत 43
أَمْ لَهُمْ إِلَـٰهٌ غَيْرُ ٱللَّهِ ۚ سُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ عَمَّا يُشْرِكُونَ
أَمْ
या
لَهُمْ
उनके लिए
إِلَـٰهٌ
कोई इलाह है
غَيْرُ
सिवाए
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के
سُبْحَـٰنَ
पाक है
ٱللَّهِ
अल्लाह
عَمَّا
उससे जो
يُشْرِكُونَ
वो शरीक ठहराते हैं
या अल्लाह के अतिरिक्त उनका कोई और पूज्य-प्रभु है? अल्लाह महान और उच्च है उससे जो वे साझी ठहराते है
तफ़्सीर:
या उनका अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य है?! अल्लाह उस साझी से पाक एवं पवित्र है, जिसे वे उसके साथ संबंधित करते हैं। उपर्युक्त सभी बातें कभी घटित नहीं हुईं और किसी भी स्थिति में उनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
आयत 44
وَإِن يَرَوْا۟ كِسْفًۭا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ سَاقِطًۭا يَقُولُوا۟ سَحَابٌۭ مَّرْكُومٌۭ
وَإِن
और अगर
يَرَوْا۟
वो देखें
كِسْفًۭا
कोई टुकड़ा
مِّنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
سَاقِطًۭا
गिरने वाला
يَقُولُوا۟
वो कहेंगे
سَحَابٌۭ
बादल हैं
مَّرْكُومٌۭ
तह-ब-तह
यदि वे आकाश का कोई टुकटा गिरता हुआ देखें तो कहेंगे, "यह तो परत पर परत बादल है!"
तफ़्सीर:
और अगर वे आसमान से कोई टुकड़ा गिरता हुआ देख लें, तो उसके बारे में कहेंगे : यह एक बादल है जो हमेशा की तरह परत पर परत है। इसलिए वे सीख ग्रहण नहीं करते और न ईमान लाते हैं।
आयत 45
فَذَرْهُمْ حَتَّىٰ يُلَـٰقُوا۟ يَوْمَهُمُ ٱلَّذِى فِيهِ يُصْعَقُونَ
فَذَرْهُمْ
पस छोड़ दो उन्हें
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يُلَـٰقُوا۟
वो जा मिलें
يَوْمَهُمُ
अपने (उस) दिन से
ٱلَّذِى
वो जो
فِيهِ
उसमें
يُصْعَقُونَ
वो बेहोश किए जाऐंगे
अतः छोडो उन्हें, यहाँ तक कि वे अपने उस दिन का सामना करें जिसमें उनपर वज्रपात होगा;
तफ़्सीर:
अतः (ऐ रसूल!) आप उन्हें उनके हठ और इनकार में छोड़ दें, यहाँ तक कि वे अपने उस दिन से जा मिलें, जिसमें उन्हें यातना दी जाएगी और वह क़ियामत का दिन है।
आयत 46
يَوْمَ لَا يُغْنِى عَنْهُمْ كَيْدُهُمْ شَيْـًۭٔا وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ
يَوْمَ
जिस दिन
لَا
not
يُغْنِى
ना काम आएगी
عَنْهُمْ
उन्हें
كَيْدُهُمْ
चाल उनकी
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يُنصَرُونَ
वो मदद दिए जाऐंगे
जिस दिन उनकी चाल उनके कुछ भी काम न आएगी और न उन्हें कोई सहायता ही मिलेगी;
तफ़्सीर:
जिस दिन उनकी चाल उन्हें थोड़ा या ज़्यादा कुछ भी फ़ायदा न देगी, और न उन्हें यातना से बचाकर उनकी मदद की जाएगी।
आयत 47
وَإِنَّ لِلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ عَذَابًۭا دُونَ ذَٰلِكَ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
وَإِنَّ
और बेशक
لِلَّذِينَ
उनके लिए जिन्होंने
ظَلَمُوا۟
ज़ुल्म किया
عَذَابًۭا
एक अज़ाब है
دُونَ
अलावा
ذَٰلِكَ
उसके
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَهُمْ
अक्सर उनके
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
और निश्चय ही जिन लोगों ने ज़ुल्म किया उनके लिए एक यातना है उससे हटकर भी, परन्तु उनमें से अधिकतर जानते नहीं
तफ़्सीर:
और निश्चय जिन लोगों ने शिर्क और गुनाह के द्वारा अपने ऊपर अत्याचार किया, उनके लिए आख़िरत की यातना से पहले भी एक यातना है; दुनिया में क़त्ल और क़ैद की यातना और बरज़ख़ में क़ब्र की यातना। लेकिन उनमें से अधिकतर लोग यह नहीं जानते हैं। इसलिए वे अपने कुफ़्र पर जमे रहते हैं।
आयत 48
وَٱصْبِرْ لِحُكْمِ رَبِّكَ فَإِنَّكَ بِأَعْيُنِنَا ۖ وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ حِينَ تَقُومُ
وَٱصْبِرْ
और सब्र कीजिए
لِحُكْمِ
हुक्म के लिए
رَبِّكَ
अपने रब के
فَإِنَّكَ
पस बेशक आप
بِأَعْيُنِنَا ۖ
हमारी निगाहों के सामने हैं
وَسَبِّحْ
और तस्बीह कीजिए
بِحَمْدِ
साथ तारीफ़ के
رَبِّكَ
अपने रब की
حِينَ
जिस वक़्त
تَقُومُ
आप खड़े होते हैं
अपने रब का फ़ैसला आने तक धैर्य से काम लो, तुम तो हमारी आँखों में हो, और जब उठो तो अपने रब का गुणगान करो;
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आप अपने रब का निर्णय और उसका शरई आदेश आने तक सब्र करें। आप हमारी निगाहों के सामने और हमारी सुरक्षा में हैं। तथा जब आप नींद से जागें, तो अपने रब की प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता बयान करें।
आयत 49
وَمِنَ ٱلَّيْلِ فَسَبِّحْهُ وَإِدْبَـٰرَ ٱلنُّجُومِ
وَمِنَ
And of
ٱلَّيْلِ
और रात को
فَسَبِّحْهُ
पस तस्बीह कीजिए उसकी
وَإِدْبَـٰرَ
और पलटने के बाद
ٱلنُّجُومِ
सितारों के
रात की कुछ घड़ियों में भी उसकी तसबीह करो, और सितारों के पीठ फेरने के समय (प्रातःकाल) भी
तफ़्सीर:
और रात की कुछ घड़ियों में भी उसकी पवित्रता बयान करें और उसके लिए नमाज़ पढ़ें, तथा जब प्रातःकाल की सफ़ेदी के कारण सितारे फीके पड़कर ओझल हो जाएँ, तो फ़ज्र की नमाज़ पढ़ें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नबी ﷺ को सब्र और तस्बीह की तलक़ीन के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि मुखालिफत के बावजूद सब्र करना और अल्लाह की तस्बीह में मशगूल रहना दिल को सुकून देता है।
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