सूरह अन-नज्म سورة النجم
मक्की 62 आयतें
नाम का मतलब
तारा (कसम खाए गए तारे के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अन-नज्म में नबी ﷺ के मेराज के वाकिये और वही की सच्चाई का ज़िक्र है। यह वह सूरह है जिसे नबी ﷺ ने खुले आम काबा के पास पढ़ा और उसमें सजदे की आयत पर सजदा किया।
फ़ज़ीलत / सार
यह उन शुरुआती सूरतों में से है जिसे नबी ﷺ ने काबा के पास खुलेआम पढ़ा था, और सुनने वाले कुछ मुशरिकों ने भी सजदा किया था।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلنَّجْمِ إِذَا هَوَىٰ
وَٱلنَّجْمِ
क़सम है सितारे की
إِذَا
जब
هَوَىٰ
वो गिरे
गवाह है तारा, जब वह नीचे को आए
तफ़्सीर:
अल्लाह ने सितारे की क़सम खाई है, जब वह गिरे।
आयत 2
مَا ضَلَّ صَاحِبُكُمْ وَمَا غَوَىٰ
مَا
नहीं
ضَلَّ
राह भूला
صَاحِبُكُمْ
साथी तुम्हारा
وَمَا
और ना ही
غَوَىٰ
वो बहका
तुम्हारी साथी (मुहम्मह सल्ल॰) न गुमराह हुआ और न बहका;
तफ़्सीर:
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम न हिदायत के रास्ते से भठके हैं और न टेढ़ी राह पर चले हैं, बल्कि वह सीधे रास्ते पर क़ायम हैं।
आयत 3
وَمَا يَنطِقُ عَنِ ٱلْهَوَىٰٓ
وَمَا
और नहीं
يَنطِقُ
वो बोलता
عَنِ
from
ٱلْهَوَىٰٓ
ख़्वाहिशे नफ़्स से
और न वह अपनी इच्छा से बोलता है;
तफ़्सीर:
और वह इस क़ुरआन को अपनी इच्छा से नहीं बोलते हैं।
आयत 4
إِنْ هُوَ إِلَّا وَحْىٌۭ يُوحَىٰ
إِنْ
नहीं
هُوَ
वो
إِلَّا
मगर
وَحْىٌۭ
एक वही
يُوحَىٰ
जो वही की जाती है
वह तो बस एक प्रकाशना है, जो की जा रही है
तफ़्सीर:
यह क़ुरआन तो केवल वह़्य (प्रकाशना) है, जिसे अल्लाह जिबरील अलैहिस्सलाम के माध्यम से आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उतारता है।
आयत 5
عَلَّمَهُۥ شَدِيدُ ٱلْقُوَىٰ
عَلَّمَهُۥ
सिखाया उसे
شَدِيدُ
बहुत ज़बरदस्त
ٱلْقُوَىٰ
क़ुव्वत वाले ने
उसे बड़ी शक्तियोंवाले ने सिखाया,
तफ़्सीर:
उसे आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को एक बहुत मज़बूत शक्ति वाले फ़रिश्ते अर्थात् जिबरील अलैहिस्सलाम ने सिखाया है।
आयत 6
ذُو مِرَّةٍۢ فَٱسْتَوَىٰ
ذُو
Possessor of soundness
مِرَّةٍۢ
जो बड़ा ज़ोर आवर है
فَٱسْتَوَىٰ
फेर वो सीधा खड़ा हो गया
स्थिर रीतिवाले ने।
तफ़्सीर:
जिबरील अलैहिस्सलाम अच्छी आकृति वाले हैं। चुनाँचे वह अपने उस मूल स्वरूप में जिसमें अल्लाह ने उन्हें बनाया है, नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सामने प्रकट हुए।
आयत 7
وَهُوَ بِٱلْأُفُقِ ٱلْأَعْلَىٰ
وَهُوَ
और वो
بِٱلْأُفُقِ
किनारे पर था
ٱلْأَعْلَىٰ
बुलन्द
अतः वह भरपूर हुआ, इस हाल में कि वह क्षितिज के उच्चतम छोर पर है
तफ़्सीर:
और जिबरील अलैहिस्सलाम आकाश के सब से ऊँचे क्षितिज (किनारे) पर थे।
आयत 8
ثُمَّ دَنَا فَتَدَلَّىٰ
ثُمَّ
फिर
دَنَا
वो क़रीब हुआ
فَتَدَلَّىٰ
पस वो उतर आया
फिर वह निकट हुआ और उतर गया
तफ़्सीर:
फिर जिबरील अलैहिस्सलाम नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के निकट आए, सो वह आपके और भी करीब हो गए।
आयत 9
فَكَانَ قَابَ قَوْسَيْنِ أَوْ أَدْنَىٰ
فَكَانَ
तो वो हो गया
قَابَ
बक़द्र
قَوْسَيْنِ
दो कमानों के
أَوْ
या
أَدْنَىٰ
उससे ज़्यादा क़रीब
अब दो कमानों के बराबर या उससे भी अधिक निकट हो गया
तफ़्सीर:
फिर आपसे उनकी निकटता दो कमानों के बराबर थी या वह उससे भी अधिक निकट थे।
आयत 10
فَأَوْحَىٰٓ إِلَىٰ عَبْدِهِۦ مَآ أَوْحَىٰ
فَأَوْحَىٰٓ
तो उसने वही पहुँचाई
إِلَىٰ
to
عَبْدِهِۦ
उस(अल्लाह) के बन्दे की तरफ़
مَآ
जो
أَوْحَىٰ
उसने वही पहुँचाई
तब उसने अपने बन्दे की ओर प्रकाशना की, जो कुछ प्रकाशना की।
तफ़्सीर:
फिर जिबरील ने अल्लाह के बंदे मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ओर वह़्य की, जो भी वह़्य की।
आज की ज़िंदगी में सबक़
वही की सच्चाई और मेराज के वाकिये का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि नबी ﷺ अपनी मर्ज़ी से नहीं बोलते थे, बल्कि जो वही आती थी वही पहुंचाते थे, इस पर पूरा यकीन रखना चाहिए।
आयत 11
مَا كَذَبَ ٱلْفُؤَادُ مَا رَأَىٰٓ
مَا
नहीं
كَذَبَ
झूठ बोला
ٱلْفُؤَادُ
दिल ने
مَا
जो कुछ
رَأَىٰٓ
उसने देखा
दिल ने कोई धोखा नहीं दिया, जो कुछ उसने देखा;
तफ़्सीर:
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दिल ने उसे झूठ नहीं कहा जो आपकी आँखों ने देखा।
आयत 12
أَفَتُمَـٰرُونَهُۥ عَلَىٰ مَا يَرَىٰ
أَفَتُمَـٰرُونَهُۥ
क्या फिर तुम झगड़ते हो उससे
عَلَىٰ
about
مَا
ऊपर उसके जो
يَرَىٰ
वो देखता है
अब क्या तुम उस चीज़ पर झगड़ते हो, जिसे वह देख रहा है? -
तफ़्सीर:
फिर क्या (ऐ मुश्रिको!) तुम मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से उस चीज़ के बारे में झगड़ते हो, जो अल्लाह ने उन्हें 'इसरा' की रात को दिखाया?!
आयत 13
وَلَقَدْ رَءَاهُ نَزْلَةً أُخْرَىٰ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
رَءَاهُ
उसने देखा उसे
نَزْلَةً
एक बार उतरते
أُخْرَىٰ
और भी
और निश्चय ही वह उसे एक बार और
तफ़्सीर:
हालाँकि निश्चय मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जिबरील को उनके असली रूप में एक और बार 'इसरा' की रात में देखा है।
आयत 14
عِندَ سِدْرَةِ ٱلْمُنتَهَىٰ
عِندَ
पास
سِدْرَةِ
(the) Lote Tree
ٱلْمُنتَهَىٰ
सिदरतुल मुन्तहा के
'सिदरतुल मुन्तहा' (परली सीमा के बेर) के पास उतरते देख चुका है
तफ़्सीर:
सिदरतुल मुनतहा' के पास। 'सिदरतुल मुनतहा' एक बहुत ही बड़ा पेड़ है, जो सातवें आसमान में है।
आयत 15
عِندَهَا جَنَّةُ ٱلْمَأْوَىٰٓ
عِندَهَا
उसी के पास है
جَنَّةُ
(is the) Garden
ٱلْمَأْوَىٰٓ
जन्नतुल मावा
उसी के निकट 'जन्नतुल मावा' (ठिकानेवाली जन्नत) है। -
तफ़्सीर:
इसी पेड़ के पास 'जन्नतुल मावा' है।
आयत 16
إِذْ يَغْشَى ٱلسِّدْرَةَ مَا يَغْشَىٰ
إِذْ
जब
يَغْشَى
छा रहा था
ٱلسِّدْرَةَ
बेरी के दरख़्त पर
مَا
जो कुछ
يَغْشَىٰ
छा रहा था
जबकि छा रहा था उस बेर पर, जो कुछ छा रहा था
तफ़्सीर:
जब 'सिदरा' पर अल्लाह के आदेश से एक महान वस्तु छा रही थी, जिसकी वास्तविकता केवल अल्लाह ही जानता है।
आयत 17
مَا زَاغَ ٱلْبَصَرُ وَمَا طَغَىٰ
مَا
ना
زَاغَ
कजी की
ٱلْبَصَرُ
निगाह ने
وَمَا
और ना
طَغَىٰ
वो हद से बढ़ी
निगाह न तो टेढ़ी हुइ और न हद से आगे बढ़ी
तफ़्सीर:
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की निगाह दाएँ-बाएँ नहीं गई और न उस सीमा से आगे बढ़ी, जो उनके लिए निर्धारित की गई थी।
आयत 18
لَقَدْ رَأَىٰ مِنْ ءَايَـٰتِ رَبِّهِ ٱلْكُبْرَىٰٓ
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
رَأَىٰ
उसने देखीं
مِنْ
of
ءَايَـٰتِ
निशानियाँ
رَبِّهِ
अपने रब की
ٱلْكُبْرَىٰٓ
बड़ी-बड़ी
निश्चय ही उसने अपने रब की बड़ी-बड़ी निशानियाँ देखीं
तफ़्सीर:
मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने 'मे'राज' की रात अपने पालनहार की कुछ बड़ी-बड़ी निशानियाँ देखीं, जो उसकी शक्ति का संकेत देती हैं। चुनाँचे आपने जन्नत, जहन्नम और अन्य कई चीज़ें देखीं।
आयत 19
أَفَرَءَيْتُمُ ٱللَّـٰتَ وَٱلْعُزَّىٰ
أَفَرَءَيْتُمُ
क्या फिर देखा तुमने
ٱللَّـٰتَ
लात
وَٱلْعُزَّىٰ
और उज़्ज़ा को
तो क्या तुमने लात और उज़्ज़ा
तफ़्सीर:
फिर क्या (ऐ मुश्रिको!) तुमने इन मूर्तियों : लात और उज़्ज़ा के बारे में सोचा, जिन्हें तुम अल्लाह के अलावा पूजते हो?!
आयत 20
وَمَنَوٰةَ ٱلثَّالِثَةَ ٱلْأُخْرَىٰٓ
وَمَنَوٰةَ
और मनात
ٱلثَّالِثَةَ
तीसरी
ٱلْأُخْرَىٰٓ
एक और को
और तीसरी एक और (देवी) मनात पर विचार किया?
तफ़्सीर:
तथा (क्या तुमने) अपनी मूर्तियों में से एक तीसरी मूर्ति मनात पर (विचार किया?)।मुझे बताओ कि क्या ये तुम्हारे लिए किसी लाभ या हानि की मालिक हैं?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
मेराज के मोजिज़ात और बुतों की हकीकत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि झूठे मआबूदों के नाम रखने से वह हकीकत में कुछ नहीं बन जाते, सिर्फ नाम से ताकत नहीं आती।
आयत 21
أَلَكُمُ ٱلذَّكَرُ وَلَهُ ٱلْأُنثَىٰ
أَلَكُمُ
क्या तुम्हारे लिए हैं
ٱلذَّكَرُ
लड़के
وَلَهُ
और उसके लिए हैं
ٱلْأُنثَىٰ
लड़कियाँ
क्या तुम्हारे लिए तो बेटे है उनके लिए बेटियाँ?
तफ़्सीर:
क्या (ऐ मुश्रिको!) तुम्हारे लिए लड़का है, जो तुम्हें पसंद है और पवित्र अल्लाह के लिए लड़की है, जिसे तुम नापसंद करते हो?!
आयत 22
تِلْكَ إِذًۭا قِسْمَةٌۭ ضِيزَىٰٓ
تِلْكَ
ये
إِذًۭا
तब
قِسْمَةٌۭ
एक तक़सीम है
ضِيزَىٰٓ
ना इन्साफ़ी की
तब तो यह बहुत बेढ़ंगा और अन्यायपूर्ण बँटवारा हुआ!
तफ़्सीर:
यह बँटवारा जो तुमने अपनी इच्छाओं के अनुसार किया है, एक अनुचित (अन्यायपूर्ण) बँटवारा है।
आयत 23
إِنْ هِىَ إِلَّآ أَسْمَآءٌۭ سَمَّيْتُمُوهَآ أَنتُمْ وَءَابَآؤُكُم مَّآ أَنزَلَ ٱللَّهُ بِهَا مِن سُلْطَـٰنٍ ۚ إِن يَتَّبِعُونَ إِلَّا ٱلظَّنَّ وَمَا تَهْوَى ٱلْأَنفُسُ ۖ وَلَقَدْ جَآءَهُم مِّن رَّبِّهِمُ ٱلْهُدَىٰٓ
إِنْ
नहीं
هِىَ
वो
إِلَّآ
मगर
أَسْمَآءٌۭ
कुछ नाम हैं
سَمَّيْتُمُوهَآ
नाम रखे तुमने उनके
أَنتُمْ
तुमने
وَءَابَآؤُكُم
और तुम्हारे आबा ओ अजदाद ने
مَّآ
नहीं
أَنزَلَ
नाज़िल की
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
بِهَا
उनकी
مِن
any
سُلْطَـٰنٍ ۚ
कोई दलील
إِن
नहीं
يَتَّبِعُونَ
वो पैरवी करते
إِلَّا
मगर
ٱلظَّنَّ
गुमान की
وَمَا
और उसकी जो
تَهْوَى
ख़्वाहिश करते हैं
ٱلْأَنفُسُ ۖ
नफ़्स
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
جَآءَهُم
आई उनके पास
مِّن
from
رَّبِّهِمُ
उनके रब की तरफ़ से
ٱلْهُدَىٰٓ
हिदायत
वे तो बस कुछ नाम है जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने रख लिए है। अल्लाह ने उनके लिए कोई सनद नहीं उतारी। वे तो केवल अटकल के पीछे चले रहे है और उनके पीछे जो उनके मन की इच्छा होती है। हालाँकि उनके पास उनके रब की ओर से मार्गदर्शन आ चुका है
तफ़्सीर:
ये मूर्तियाँ कुछ अर्थहीन नामों के सिवा कुछ नहीं हैं। इनके अंदर पूज्य होने की कोई विशेषता नहीं पाई जाती। तुमने और तुम्हारे बाप-दादाओं ने अपनी ओर से इनके नाम रख लिए हैं, अल्लाह ने इनका कोई प्रमाण नहीं उतारा। ये मुश्रिक लोग अपनी आस्था में केवल अटकल का और उन चीज़ों का अनुसरण कर रहे हैं, जो उनके मन की इच्छा होती है, जिसे शैतान ने उनके दिलों में सुंदर बना दिया है। जबकि निश्चय उनके पास उनके पालनहार की ओर से उसके नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के माध्यम से मार्गदर्शन आ चुका है, परंतु उन्होंने उसे नहीं अपनाया।
आयत 24
أَمْ لِلْإِنسَـٰنِ مَا تَمَنَّىٰ
أَمْ
क्या है
لِلْإِنسَـٰنِ
इन्सान को
مَا
जो
تَمَنَّىٰ
वो तमन्ना करे
(क्या उनकी देवियाँ उन्हें लाभ पहुँचा सकती है) या मनुष्य वह कुछ पा लेगा, जिसकी वह कामना करता है?
तफ़्सीर:
क्या इनसान के लिए वह कुछ है जिसकी वह कामना करे कि मूर्तियाँ अल्लाह के पास सिफ़ारिश करेंगी?!
आयत 25
فَلِلَّهِ ٱلْـَٔاخِرَةُ وَٱلْأُولَىٰ
فَلِلَّهِ
तो अल्लाह ही के लिए है
ٱلْـَٔاخِرَةُ
आख़िरत
وَٱلْأُولَىٰ
और पहली (दुनिया)
आख़िरत और दुनिया का मालिक तो अल्लाह ही है
तफ़्सीर:
नहीं, उसके लिए वह कुछ नहीं है, जिसकी वह कामना करे। क्योंकि दुनिया और आख़िरत केवल अल्लाह के हाथ में हैं। वह उन दोनों में से जो चाहता है, देता है और जो चाहता है, रोक लेता है।
आयत 26
۞ وَكَم مِّن مَّلَكٍۢ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ لَا تُغْنِى شَفَـٰعَتُهُمْ شَيْـًٔا إِلَّا مِنۢ بَعْدِ أَن يَأْذَنَ ٱللَّهُ لِمَن يَشَآءُ وَيَرْضَىٰٓ
۞ وَكَم
और कितने ही
مِّن
of
مَّلَكٍۢ
फ़रिश्ते हैं
فِى
in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
لَا
not
تُغْنِى
ना काम आएगी
شَفَـٰعَتُهُمْ
सिफ़ारिश उनकी
شَيْـًٔا
कुछ भी
إِلَّا
मगर
مِنۢ
after
بَعْدِ
इसके बाद
أَن
कि
يَأْذَنَ
इजाज़त दे
ٱللَّهُ
अल्लाह
لِمَن
जिसके लिए
يَشَآءُ
वो चाहे
وَيَرْضَىٰٓ
और वो राज़ी हो जाए
आकाशों में कितने ही फ़रिश्ते है, उनकी सिफ़ारिश कुछ काम नहीं आएगी; यदि काम आ सकती है तो इसके पश्चात ही कि अल्लाह अनुमति दे, जिसे चाहे और पसन्द करे।
तफ़्सीर:
और आकाशों में कितने ही फ़रिश्ते हैं, जिनकी सिफ़ारिश से कोई फ़ायदा नहीं होता, यदि वे किसी के लिए सिफ़ारिश करना चाहें, परंतु इसके बाद कि अल्लाह उनमें से जिसके लिए चाहे सिफ़ारिश करने की अनुमति प्रदान कर दे और जिस के लिए सिफ़ारिश की जाती है, उससे संतुष्ट हो जाए। अतः अल्लाह उसे सिफ़ारिश करने की अनुमति हरगिज़ नहीं देगा, जिसने अल्लाह का साझी ठहराया है और जिसकी वह सिफ़ारिश कर रहा है, उससे वह संतुष्ट नहीं होगा यदि वह अल्लाह को छोड़कर किसी और की उपासना करता है।
आयत 27
إِنَّ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ لَيُسَمُّونَ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ تَسْمِيَةَ ٱلْأُنثَىٰ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाते
بِٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत पर
لَيُسَمُّونَ
अलबत्ता वो नाम रखते हैं
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ
फ़रिश्तों के
تَسْمِيَةَ
नाम
ٱلْأُنثَىٰ
औरतों जैसे
जो लोग आख़िरत को नहीं मानते, वे फ़रिश्तों के देवियों के नाम से अभिहित करते है,
तफ़्सीर:
जो लोग आख़िरत में दोबारा जीवित किए जाने पर ईमान नहीं रखते, वे फ़रिश्तों को स्त्रियों का नाम देते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि वे अल्लाह की पुत्रियाँ हैं। अल्लाह उनकी इस बात से बहुत ऊँचा है।
आयत 28
وَمَا لَهُم بِهِۦ مِنْ عِلْمٍ ۖ إِن يَتَّبِعُونَ إِلَّا ٱلظَّنَّ ۖ وَإِنَّ ٱلظَّنَّ لَا يُغْنِى مِنَ ٱلْحَقِّ شَيْـًۭٔا
وَمَا
और नहीं
لَهُم
उन्हें
بِهِۦ
उसका
مِنْ
any
عِلْمٍ ۖ
कोई इल्म
إِن
नहीं
يَتَّبِعُونَ
वो पैरवी करते
إِلَّا
मगर
ٱلظَّنَّ ۖ
गुमान की
وَإِنَّ
और बेशक
ٱلظَّنَّ
गुमान
لَا
(does) not
يُغْنِى
नहीं वो काम आता
مِنَ
against
ٱلْحَقِّ
हक़ के (मुक़ाबले पर)
شَيْـًۭٔا
कुछ भी
हालाँकि इस विषय में उन्हें कोई ज्ञान नहीं। वे केवल अटकल के पीछे चलते है, हालाँकि सत्य से जो लाभ पहुँचता है वह अटकल से कदापि नहीं पहुँच सकता।
तफ़्सीर:
हालाँकि उनके पास फ़रिश्तों को स्त्रियों के नाम देने के बारे में कोई ज्ञान नहीं है, जिसका वे सहारा ले सकें। वे इस मामले में केवल अटकल और भ्रम का पालन करते हैं। और अटकल सत्य के मुक़ाबले में कुछ भी लाभ नहीं देता कि उसका स्थान ले सके।
आयत 29
فَأَعْرِضْ عَن مَّن تَوَلَّىٰ عَن ذِكْرِنَا وَلَمْ يُرِدْ إِلَّا ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا
فَأَعْرِضْ
तो ऐराज़ कीजिए
عَن
उससे
مَّن
जो
تَوَلَّىٰ
मुँह मोड़े
عَن
from
ذِكْرِنَا
हमारे ज़िक्र से
وَلَمْ
और ना
يُرِدْ
वो चाहे
إِلَّا
मगर
ٱلْحَيَوٰةَ
ज़िन्दगी
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
अतः तुम उसको ध्यान में न लाओ जो हमारे ज़िक्र से मुँह मोड़ता है और सांसारिक जीवन के सिवा उसने कुछ नहीं चाहा
तफ़्सीर:
तो (ऐ रसूल!) आप उस व्यक्ति से मुँह फेर लें, जिसने अल्लाह की याद से मुँह मोड़ लिया और उसकी परवाह नहीं की, तथा उसने दुनिया के जीवन के सिवा कुछ नहीं चाहा। अतः वह अपनी आख़िरत के लिए काम नहीं करता है; क्योंकि वह उसपर ईमान नहीं रखता।
आयत 30
ذَٰلِكَ مَبْلَغُهُم مِّنَ ٱلْعِلْمِ ۚ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِمَن ضَلَّ عَن سَبِيلِهِۦ وَهُوَ أَعْلَمُ بِمَنِ ٱهْتَدَىٰ
ذَٰلِكَ
यही
مَبْلَغُهُم
इन्तिहा है उनकी
مِّنَ
of
ٱلْعِلْمِ ۚ
इल्म में
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
هُوَ
वो
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِمَن
उसे जो
ضَلَّ
भटक गया
عَن
from
سَبِيلِهِۦ
उसके रास्ते से
وَهُوَ
और वो
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِمَنِ
उसे जो
ٱهْتَدَىٰ
हिदायत पा गया
ऐसे लोगों के ज्ञान की पहुँच बस यहीं तक है। निश्चय ही तुम्हारा रब ही उसे भली-भाँति जानता है जो उसके मार्ग से भटक गया और वही उसे भी भली-भाँति जानता है जिसने सीधा मार्ग अपनाया
तफ़्सीर:
वह जो ये बहुदेववादी कहते हैं (यानी फ़रिश्तों को स्त्रियों का नाम देना) यही उनके ज्ञान की सीमा है जिस तक वे पहुँचते हैं; क्योंकि वे अज्ञानी हैं। वे निश्चितता (यक़ीन) तक नहीं पहुँचे हैं। निश्चय आपका रब ही (ऐ रसूल!) उसे अधकि जानने वाला है, जो सत्य के मार्ग से भटक गया तथा वही उसे (भी) ज़्यादा जानने वाला है, जो उसके मार्ग पर चला। उससे इनमें से कुछ भी छिपा नहीं है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
फरिश्तों को बेटियां कहने की गलत बात का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि गैब की बातों पर बगैर इल्म के राय बनाना गलत है, सिर्फ अंदाज़े पर अमल नहीं करना चाहिए।
आयत 31
وَلِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ لِيَجْزِىَ ٱلَّذِينَ أَسَـٰٓـُٔوا۟ بِمَا عَمِلُوا۟ وَيَجْزِىَ ٱلَّذِينَ أَحْسَنُوا۟ بِٱلْحُسْنَى
وَلِلَّهِ
और अल्लाह ही के लिए है
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में है
لِيَجْزِىَ
ताकि वो बदला दे
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
أَسَـٰٓـُٔوا۟
बुरा किया
بِمَا
बवजह उसके जो
عَمِلُوا۟
उन्होंने अमल किए
وَيَجْزِىَ
और वो बदला दे
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
أَحْسَنُوا۟
अच्छा किया
بِٱلْحُسْنَى
साथ भलाई के
अल्लाह ही का है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है, ताकि जिन लोगों ने बुराई की वह उन्हें उनके किए का बदला दे। और जिन लोगों ने भलाई की उन्हें अच्छा बदला दे;
तफ़्सीर:
आकाशों की सारी चीज़ें और धरती की सारी चीज़ें अल्लाह ही की हैं, वही उनका मालिक, सृजनहार और प्रबंधन कर्ता है। ताकि अल्लाह दुनिया में बुराई करने वालों को वह सज़ा दे, जिसके वे योग्य हैं और अच्छे कार्य करने वाले मोमिनों को जन्नत प्रदान करे।
आयत 32
ٱلَّذِينَ يَجْتَنِبُونَ كَبَـٰٓئِرَ ٱلْإِثْمِ وَٱلْفَوَٰحِشَ إِلَّا ٱللَّمَمَ ۚ إِنَّ رَبَّكَ وَٰسِعُ ٱلْمَغْفِرَةِ ۚ هُوَ أَعْلَمُ بِكُمْ إِذْ أَنشَأَكُم مِّنَ ٱلْأَرْضِ وَإِذْ أَنتُمْ أَجِنَّةٌۭ فِى بُطُونِ أُمَّهَـٰتِكُمْ ۖ فَلَا تُزَكُّوٓا۟ أَنفُسَكُمْ ۖ هُوَ أَعْلَمُ بِمَنِ ٱتَّقَىٰٓ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يَجْتَنِبُونَ
इज्तिनाब करते हैं
كَبَـٰٓئِرَ
कबीरा
ٱلْإِثْمِ
गुनाहों से
وَٱلْفَوَٰحِشَ
और बेहयाई से
إِلَّا
सिवाए
ٱللَّمَمَ ۚ
छोटे गुनाहों के
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
وَٰسِعُ
वसीअ
ٱلْمَغْفِرَةِ ۚ
मग़्फ़िरत वाला है
هُوَ
वो
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِكُمْ
तुम्हें
إِذْ
जब
أَنشَأَكُم
उसने पैदा किया तुम्हें
مِّنَ
from
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन से
وَإِذْ
और जब
أَنتُمْ
तुम
أَجِنَّةٌۭ
जनीन थे
فِى
in
بُطُونِ
पेटों में
أُمَّهَـٰتِكُمْ ۖ
अपनी माओं के
فَلَا
पस ना
تُزَكُّوٓا۟
तुम पाक ठहराओ
أَنفُسَكُمْ ۖ
अपने नफ़्सों को
هُوَ
वो
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِمَنِ
उसे जिसने
ٱتَّقَىٰٓ
तक़्वा इख़्तियार किया
वे लोग जो बड़े गुनाहों और अश्लील कर्मों से बचते है, यह और बात है कि संयोगबश कोई छोटी बुराई उनसे हो जाए। निश्चय ही तुम्हारा रब क्षमाशीलता मे बड़ा व्यापक है। वह तुम्हें उस समय से भली-भाँति जानता है, जबकि उसने तुम्हें धरती से पैदा किया और जबकि तुम अपनी माँओ के पेटों में भ्रुण अवस्था में थे। अतः अपने मन की पवित्रता और निखार का दावा न करो। वह उस व्यक्ति को भली-भाँति जानता है, जिसने डर रखा
तफ़्सीर:
जो लोग छोटे-मोटे पापों के सिवाय, बड़े गुनाहों और अवज्ञा के घृणित कार्यों से दूर रहते हैं, तो बड़े पापों को त्यागने और अधिक से अधिक नेकी के काम करने के कारण ये (छोटे पाप) क्षमा कर दिए जात हैं। निश्चय आपका पालनहार (ऐ रसूल!) व्यापक रूप से माफ़ करने वाला है, वह अपने बंदों के पापों को क्षमा कर देता है जब भी वे उनसे तौबा करें। वह महिमावान तुम्हारी स्थितियों और तुम्हारे मामलों को अधिक जानने वाला है, जब उसने तुम्हारे पिता आदम अैलहिस्सलाम को मिट्टी से पैदा किया और जब तुम अपनी माताओं के पेटों में गर्भावस्था में थे, चरण दर चरण तुम्हारी रचना की जाती थी। उससे इसमें से कोई बात छिपी नहीं है। अतः अपनी परहेज़गारी के साथ अपनी प्रशंसा न करो। क्योंकि अल्लाह अधिक जानने वाला है कि तुममें से कौन उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई बातों से बचकर उससे डरता है।
आयत 33
أَفَرَءَيْتَ ٱلَّذِى تَوَلَّىٰ
أَفَرَءَيْتَ
क्या भला देखा आपने
ٱلَّذِى
उसे जो
تَوَلَّىٰ
मुँह मोड़ गया
क्या तुमने उस व्यक्ति को देखा जिसने मुँह फेरा,
तफ़्सीर:
क्या आपने उस व्यक्ति की दुर्दशा देखी है, जिसने इस्लाम से निकट होने के बाद उससे मुँह मोड़ लिया?!
आयत 34
وَأَعْطَىٰ قَلِيلًۭا وَأَكْدَىٰٓ
وَأَعْطَىٰ
और उसने दिया
قَلِيلًۭا
थोड़ा सा
وَأَكْدَىٰٓ
और उसने रोक लिया
और थोड़ा-सा देकर रुक गया;
तफ़्सीर:
और उसने थोड़ा-सा माल दिया, फिर रोक लिया; क्योंकि कंजूसी उसका स्वभाव है, फिर भी वह अपनी पवित्रता बयान करता है।
आयत 35
أَعِندَهُۥ عِلْمُ ٱلْغَيْبِ فَهُوَ يَرَىٰٓ
أَعِندَهُۥ
क्या उसके पास
عِلْمُ
इल्म है
ٱلْغَيْبِ
ग़ैब का
فَهُوَ
तो वो
يَرَىٰٓ
वो देख रहा है
क्या उसके पास परोक्ष का ज्ञान है कि वह देख रहा है;
तफ़्सीर:
क्या उसके पास परोक्ष (ग़ैब) का ज्ञान है कि वह सब कुछ देख रहा है और ग़ैब की बात बता रहा है?!
आयत 36
أَمْ لَمْ يُنَبَّأْ بِمَا فِى صُحُفِ مُوسَىٰ
أَمْ
या
لَمْ
नहीं
يُنَبَّأْ
वो ख़बर दिया गया
بِمَا
उसकी जो
فِى
(was) in
صُحُفِ
सहीफ़ों में है
مُوسَىٰ
मूसा के
या उसको उन बातों की ख़बर नहीं पहुँची, जो मूसा की किताबों में है
तफ़्सीर:
या वह अल्लाह के बारे में झूठ बोलने वाला है?! या क्या अल्लाह पर झूठ गढ़ने वाले इस व्यक्ति को उन बातों की जानकारी नहीं दी गई, जो उन पहले शास्त्रों में हैं, जिन्हें अल्लाह ने मूसा अलैहिस्सलाम पर उतारा था?!
आयत 37
وَإِبْرَٰهِيمَ ٱلَّذِى وَفَّىٰٓ
وَإِبْرَٰهِيمَ
और इब्राहीम के
ٱلَّذِى
जिसने
وَفَّىٰٓ
वफ़ा की
और इबराहीम की (किताबों में है), जिसने अल्लाह की बन्दगी का) पूरा-पूरा हक़ अदा कर दिया?
तफ़्सीर:
और इबराहीम अलैहिस्सलाम के शास्त्रों (में हैं), जिसने वह सब कुछ करके दिखाया जो उसके प्रभु ने उसे सौंपा और उसे पूरा किया।
आयत 38
أَلَّا تَزِرُ وَازِرَةٌۭ وِزْرَ أُخْرَىٰ
أَلَّا
कि ना
تَزِرُ
बोझ उठाएगी
وَازِرَةٌۭ
कोई बोझ उठाने वाली
وِزْرَ
बोझ
أُخْرَىٰ
किसी दूसरे की
यह कि कोई बोझ उठानेवाला किसी दूसरे का बोझ न उठाएगा;
तफ़्सीर:
कि कोई इनसान किसी अन्य व्यक्ति के पाप को वहन नहीं करेगा।
आयत 39
وَأَن لَّيْسَ لِلْإِنسَـٰنِ إِلَّا مَا سَعَىٰ
وَأَن
और ये कि
لَّيْسَ
नहीं है
لِلْإِنسَـٰنِ
इन्सान के लिए
إِلَّا
मगर
مَا
जो
سَعَىٰ
उसने कोशिश की
और यह कि मनुष्य के लिए बस वही है जिसके लिए उसने प्रयास किया;
तफ़्सीर:
और यह कि इनसान के लिए केवल अपने उसी कार्य का सवाब है, जो उसने किया।
आयत 40
وَأَنَّ سَعْيَهُۥ سَوْفَ يُرَىٰ
وَأَنَّ
और ये कि
سَعْيَهُۥ
कोशिश उसकी
سَوْفَ
अनक़रीब
يُرَىٰ
वो देखी जाएगी
और यह कि उसका प्रयास शीघ्र ही देखा जाएगा।
तफ़्सीर:
और यह कि उसका अमल जल्द ही क़ियामत के दिन देखा जाएगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
छोटे गुनाहों से बचने वालों की तारीफ और हर इंसान के अपनी कोशिश का हकदार होने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि हर इंसान को अपनी मेहनत और कोशिश का ही फल मिलेगा, दूसरे का बोझ किसी और पर नहीं डाला जाएगा।
आयत 41
ثُمَّ يُجْزَىٰهُ ٱلْجَزَآءَ ٱلْأَوْفَىٰ
ثُمَّ
फिर
يُجْزَىٰهُ
बदला दिया जाएगा उसे
ٱلْجَزَآءَ
बदला
ٱلْأَوْفَىٰ
पूरा-पूरा
फिर उसे पूरा बदला दिया जाएगा;
तफ़्सीर:
फिर उसे उसके कार्य का बदला कोई कमी किए बिना पूरा-पूरा दिया जाएगा।
आयत 42
وَأَنَّ إِلَىٰ رَبِّكَ ٱلْمُنتَهَىٰ
وَأَنَّ
और बेशक
إِلَىٰ
to
رَبِّكَ
आपके रब की तरफ़ ही
ٱلْمُنتَهَىٰ
इन्तिहा है
और यह कि अन्त में पहुँचना तुम्हारे रब ही की ओर है;
तफ़्सीर:
और यह कि सारे बंदों को अपनी मृत्यु के बाद (ऐ रसूल!) तेरे पालनहार ही की ओर लौटकर जाना है।
आयत 43
وَأَنَّهُۥ هُوَ أَضْحَكَ وَأَبْكَىٰ
وَأَنَّهُۥ
और बेशक वो
هُوَ
वो ही है
أَضْحَكَ
जिसने हँसाया
وَأَبْكَىٰ
और उसने रुलाया
और यह कि वही है जो हँसाता और रुलाता है;
तफ़्सीर:
और यह कि वही है, जो जिसे चाहता है खुशी देकर हँसाता है और जिसे चाहता है दुःख देकर रुलाता है।
आयत 44
وَأَنَّهُۥ هُوَ أَمَاتَ وَأَحْيَا
وَأَنَّهُۥ
और बेशक वो
هُوَ
वो ही है
أَمَاتَ
जिसने मौत दी
وَأَحْيَا
और उसने ज़िन्दा किया
और यह कि वही जो मारता और जिलाता है;
तफ़्सीर:
और यह कि वही है, जिसने दुनिया में ज़िंदा लोगों को मौत दी और क़ियामत के दिन मरे हुए लोगों को फिर से ज़िंदा करेगा।
आयत 45
وَأَنَّهُۥ خَلَقَ ٱلزَّوْجَيْنِ ٱلذَّكَرَ وَٱلْأُنثَىٰ
وَأَنَّهُۥ
और बेशक वो ही है
خَلَقَ
जिसने पैदा किया
ٱلزَّوْجَيْنِ
जोड़ों को
ٱلذَّكَرَ
नर
وَٱلْأُنثَىٰ
और मादा को
और यह कि वही है जिसने नर और मादा के जोड़े पैदा किए,
तफ़्सीर:
और यह कि उसी ने दोनों प्रकार : नर और मादा बनाए।
आयत 46
مِن نُّطْفَةٍ إِذَا تُمْنَىٰ
مِن
From
نُّطْفَةٍ
नुत्फ़े से
إِذَا
जब
تُمْنَىٰ
वो टपकाया जाता है
एक बूँद से, जब वह टपकाई जाती है;
तफ़्सीर:
एक बूँद (वीर्य) से, जब वह गर्भाशय में डाली जाती है।
आयत 47
وَأَنَّ عَلَيْهِ ٱلنَّشْأَةَ ٱلْأُخْرَىٰ
وَأَنَّ
और बेशक
عَلَيْهِ
उसी के ज़िम्मे है
ٱلنَّشْأَةَ
पैदाइश
ٱلْأُخْرَىٰ
दूसरी मरतबा
और यह कि उसी के ज़िम्मे दोबारा उठाना भी है;
तफ़्सीर:
और यह कि उसी के ज़िम्मे उन दोनों को उनकी मृत्यु के बाद दोबारा पैदा करके उठाना है।
आयत 48
وَأَنَّهُۥ هُوَ أَغْنَىٰ وَأَقْنَىٰ
وَأَنَّهُۥ
और बेशक वो
هُوَ
वो ही है
أَغْنَىٰ
जिसने ग़नी किया
وَأَقْنَىٰ
और उसने मालदार बनाया
और यह कि वही है जिसने धनी और पूँजीपति बनाया;
तफ़्सीर:
और यह कि उसी ने अपने बंदों में से जिसे चाहा माल देकर धनी बनाया और ऐसा धन दिया जिसे लोग अपने पास कोष बनाकर रखते हैं।
आयत 49
وَأَنَّهُۥ هُوَ رَبُّ ٱلشِّعْرَىٰ
وَأَنَّهُۥ
और बेशक वो
هُوَ
वो ही है
رَبُّ
रब
ٱلشِّعْرَىٰ
शिअरा (सितारे) का
और यह कि वही है जो शेअरा (नामक तारे) का रब है
तफ़्सीर:
और यह कि वही 'शे'रा' का रब है। यह एक तारा है, जिसे कुछ बहुदेववादी अल्लाह के अलावा पूजते थे।
आयत 50
وَأَنَّهُۥٓ أَهْلَكَ عَادًا ٱلْأُولَىٰ
وَأَنَّهُۥٓ
और बेशक वो ही है
أَهْلَكَ
जिसने हलाक किया
عَادًا
आदे
ٱلْأُولَىٰ
ऊला को
और यह कि वही है उसी ने प्राचीन आद को विनष्ट किया;
तफ़्सीर:
और यह कि उसी ने प्रथम 'आद' अर्थात् हूद अलैहिस्सलाम की जाति को विनष्ट किया, जब वे अपने कुफ़्र पर अडिग हो गए।
आज की ज़िंदगी में सबक़
पिछली कौमों (आद, समूद, नूह की कौम) के अंजाम का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि सरकशी और नाफरमानी का अंजाम हर दौर में एक जैसा रहा है।
आयत 51
وَثَمُودَا۟ فَمَآ أَبْقَىٰ
وَثَمُودَا۟
और समूद को
فَمَآ
पस ना
أَبْقَىٰ
उसने बाक़ी छोड़ा
और समूद को भी। फिर किसी को बाक़ी न छोड़ा।
तफ़्सीर:
और सालेह अलैहिस्सलाम की जाति समूद को विनष्ट किया, फिर उनमें से किसी को बाक़ी न छोड़ा।
आयत 52
وَقَوْمَ نُوحٍۢ مِّن قَبْلُ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ هُمْ أَظْلَمَ وَأَطْغَىٰ
وَقَوْمَ
और क़ौमे
نُوحٍۢ
नूह को
مِّن
before
قَبْلُ ۖ
उससे क़ब्ल
إِنَّهُمْ
बेशक वो
كَانُوا۟
थे वो
هُمْ
वो
أَظْلَمَ
बहुत ज़ालिम
وَأَطْغَىٰ
और ज़्यादा सरकश
और उससे पहले नूह की क़ौम को भी। बेशक वे ज़ालिम और सरकश थे
तफ़्सीर:
तथा आद एवं समूद से पहले नूह अलैहिस्सलाम की जाति को विनष्ट किया। निश्चय नूह अलैहिस्सलाम की जाति के लोग आद और समूद से अधिक अत्याचारी और अधिक सरकश थे। क्योंकि नूह अलैहिस्सलाम उनके बीच साढ़े नौ सौ साल तक रहे और उन्हें अल्लाह की तौहीद (एकेश्वरवाद) की ओर बुलाते रहे, लेकिन उन्होंने उन की एक न सुनी।
आयत 53
وَٱلْمُؤْتَفِكَةَ أَهْوَىٰ
وَٱلْمُؤْتَفِكَةَ
और उलट जाने वाली बस्ती को
أَهْوَىٰ
उसने नीचे दे मारा
उलट जानेवाली बस्ती को भी फेंक दिया।
तफ़्सीर:
तथा लूत अलैहिस्सलाम की जाति के लोगों की बस्तियों को आकाश में उठाया, फिर उन्हें उलट दिया, फिर उन्हें धरती पर गिरा दिया।
आयत 54
فَغَشَّىٰهَا مَا غَشَّىٰ
فَغَشَّىٰهَا
तो ढाँप लिया उन्हें
مَا
जिसने
غَشَّىٰ
ढाँपा
तो ढँक लिया उसे जिस चीज़ ने ढँक लिया;
तफ़्सीर:
तो उसने उन्हें आकाश की ओर उठाकर ज़मीन पर गिराने के बाद, उन्हें पत्थरों की बारिश से ढाँप दिया।
आयत 55
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكَ تَتَمَارَىٰ
فَبِأَىِّ
पस कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों पर
رَبِّكَ
अपने रब की
تَتَمَارَىٰ
तुम शक करते हो
फिर तू अपने रब के चमत्कारों में से किस-किस के विषय में संदेह करेगा?
तफ़्सीर:
तो ऐ इनसान! तू अपने पालनहार की शक्ति को दर्शाने वाली किन-किन निशानियों के बारे में झगड़ता रहेगा और उनसे उपदेश ग्रहण नहीं करेगा?!
आयत 56
هَـٰذَا نَذِيرٌۭ مِّنَ ٱلنُّذُرِ ٱلْأُولَىٰٓ
هَـٰذَا
ये
نَذِيرٌۭ
एक डराने वाला है
مِّنَ
from
ٱلنُّذُرِ
डराने वालों में से
ٱلْأُولَىٰٓ
पहले
यह पहले के सावधान-कर्ताओं के सदृश एक सावधान करनेवाला है
तफ़्सीर:
तुम्हारी ओर भेजा गया यह रसूल पहले रसूलों ही के वर्ग से एक (रसूल) है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
लूत की बस्तियों का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह की कौन सी नेमत है जिसमें हम शक करें, हर नेमत उसी की तरफ से है।
आयत 57
أَزِفَتِ ٱلْـَٔازِفَةُ
أَزِفَتِ
नज़दीक आ गई
ٱلْـَٔازِفَةُ
नज़दीक आने वाली
निकट आनेवाली (क़ियामत की घड़ी) निकट आ गई
तफ़्सीर:
निकट आने वाली क़ियामत निकट आ गई है।
आयत 58
لَيْسَ لَهَا مِن دُونِ ٱللَّهِ كَاشِفَةٌ
لَيْسَ
नहीं
لَهَا
उसके लिए
مِن
besides
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
كَاشِفَةٌ
कोई हटाने वाला
अल्लाह के सिवा कोई नहीं जो उसे प्रकट कर दे
तफ़्सीर:
अल्लाह के सिवा उसे कोई हटाने वाला और उसकी सूचना रखने वाला नहीं है।
आयत 59
أَفَمِنْ هَـٰذَا ٱلْحَدِيثِ تَعْجَبُونَ
أَفَمِنْ
क्या भला
هَـٰذَا
इस
ٱلْحَدِيثِ
बात से
تَعْجَبُونَ
तुम ताअज्जुब करते हो
अब क्या तुम इस वाणी पर आश्चर्य करते हो;
तफ़्सीर:
तो क्या तुम इस बात पर आश्चर्य करते हो कि यह क़ुरआन, जो तुम्हारे सामने पढ़ा जाता है, अल्लाह की ओर से है ?!
आयत 60
وَتَضْحَكُونَ وَلَا تَبْكُونَ
وَتَضْحَكُونَ
और तुम हँसते हो
وَلَا
and (do) not
تَبْكُونَ
और नहीं तुम रोते
और हँसते हो और रोते नहीं?
तफ़्सीर:
और उसका ठट्ठा करते हुए उसपर हँसते हो और उसके उपदेशों को सुनकर रोते नहीं हो?!
आयत 61
وَأَنتُمْ سَـٰمِدُونَ
وَأَنتُمْ
और तुम
سَـٰمِدُونَ
ग़ाफ़िल हो
जबकि तुम घमंडी और ग़ाफिल हो
तफ़्सीर:
और तुम उससे ग़ाफ़िल हो, उसकी परवाह नहीं करते?!
आयत 62
فَٱسْجُدُوا۟ لِلَّهِ وَٱعْبُدُوا۟ ۩
فَٱسْجُدُوا۟
पस सजदा करो
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
وَٱعْبُدُوا۟ ۩
और इबादत करो
अतः अल्लाह को सजदा करो और बन्दगी करो
तफ़्सीर:
अतः केवल अल्लाह को सजदा करो और इबादत को उसी के लिए विशुद्ध करो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के करीब आने और सजदे की ताकीद के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि कयामत करीब है, इसलिए हंसी-मज़ाक में वक्त गुज़ारने की बजाय अल्लाह के सामने सजदा और इबादत में मशगूल रहना चाहिए।
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