नाम का मतलब
रहमान (अल्लाह की सिफत, बहुत मेहरबान)
पृष्ठभूमि
सूरह अर-रहमान में अल्लाह की बेशुमार नेमतों का ज़िक्र बार-बार दोहराए गए एक जुमले के साथ है: तो तुम दोनों (जिन्न-इंसान) अपने रब की किन-किन नेमतों को झुठलाओगे। इसे कुरआन की दुल्हन भी कहा जाता है।
फ़ज़ीलत / सार
इस सूरह को अरूसुल-कुरआन (कुरआन की दुल्हन) कहा जाता है, क्योंकि इसमें अल्लाह की नेमतों का ज़िक्र बहुत ही खूबसूरत और असरदार अंदाज़ में दोहराया गया है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ ٱلرَّحْمَـٰنُ
ٱلرَّحْمَـٰنُ
रहमान
रहमान ने
तफ़्सीर:
अर-रहमान' व्यापक दया वाला।
आयत 2
عَلَّمَ ٱلْقُرْءَانَ
عَلَّمَ
उसने तालीम दी
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरआन की
क़ुरआन सिखाया;
तफ़्सीर:
उसने लोगों को क़ुरआन सिखाया, उसका याद करना आसान करके और उसके अर्थ को समझना सुगम बनाकर।
आयत 3
خَلَقَ ٱلْإِنسَـٰنَ
خَلَقَ
उसने पैदा किया
ٱلْإِنسَـٰنَ
इन्सान को
उसी ने मनुष्य को पैदा किया;
तफ़्सीर:
उसने इनसान को ठीक-ठाक बनाया और उसे अच्छी शक्ल-सूरत दी।
आयत 4
عَلَّمَهُ ٱلْبَيَانَ
عَلَّمَهُ
सिखाया उसे
ٱلْبَيَانَ
बोलना
उसे बोलना सिखाया;
तफ़्सीर:
उसे सिखाया कि अपने दिल की बात को मौखिक और लिखित रूप में कैसे व्यक्त करे।
आयत 5
ٱلشَّمْسُ وَٱلْقَمَرُ بِحُسْبَانٍۢ
ٱلشَّمْسُ
सूरज
وَٱلْقَمَرُ
और चाँद
بِحُسْبَانٍۢ
एक हिसाब के साथ हैं
सूर्य और चन्द्रमा एक हिसाब के पाबन्द है;
तफ़्सीर:
सूरज और चाँद दोनों की गति निर्धारित की। दोनों एक सटीक गणना के अनुसार चल रहे हैं; ताकि लोगों को वर्षों की गिनती और हिसाब का ज्ञान प्राप्त हो।
आयत 6
وَٱلنَّجْمُ وَٱلشَّجَرُ يَسْجُدَانِ
وَٱلنَّجْمُ
और सितारे/बेलें
وَٱلشَّجَرُ
और दरख़्त
يَسْجُدَانِ
वो दोनों सजदा कर रहे हैं
और तारे और वृक्ष सजदा करते है;
तफ़्सीर:
और बिना तने वाले पौधे और पेड़ अल्लाह को, उसके आदेश के अधीन होकर और उसके प्रति समर्पित होकर सजदा करते हैं।
आयत 7
وَٱلسَّمَآءَ رَفَعَهَا وَوَضَعَ ٱلْمِيزَانَ
وَٱلسَّمَآءَ
और आसमान
رَفَعَهَا
उसने बुलन्द किया उसे
وَوَضَعَ
और उसने रख दिया
ٱلْمِيزَانَ
मीज़ान
उसने आकाश को ऊँचा किया और संतुलन स्थापित किया -
तफ़्सीर:
तथा उसने आकाश को धरती के ऊपर उसके छत के रूप में ऊँचा किया। तथा धरती पर न्याय को स्थापित किया और अपने बंदों को उसका आदेश दिया।
आयत 8
أَلَّا تَطْغَوْا۟ فِى ٱلْمِيزَانِ
أَلَّا
कि ना
تَطْغَوْا۟
तुम ज़्यादती करो
فِى
in
ٱلْمِيزَانِ
मीज़ान में
कि तुम भी तुला में सीमा का उल्लंघन न करो
तफ़्सीर:
उसने न्याय को इसलिए स्थापित किया, ताकि (ऐ लोगो!) तुम अन्याय न करो और माप-तौल में धोखाधड़ी से काम न लो।
आयत 9
وَأَقِيمُوا۟ ٱلْوَزْنَ بِٱلْقِسْطِ وَلَا تُخْسِرُوا۟ ٱلْمِيزَانَ
وَأَقِيمُوا۟
और क़ायम करो
ٱلْوَزْنَ
वज़्न को
بِٱلْقِسْطِ
साथ इन्साफ़ के
وَلَا
और ना
تُخْسِرُوا۟
तुम कमी करो
ٱلْمِيزَانَ
तोल में
न्याय के साथ ठीक-ठीक तौलो और तौल में कमी न करो। -
तफ़्सीर:
और अपने बीच न्याय के साथ तौल को सीधा रखो और जब तुम दूसरों को नाप या तौलकर दो, तो नाप या तौल में कमी न करो।
आयत 10
وَٱلْأَرْضَ وَضَعَهَا لِلْأَنَامِ
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन
وَضَعَهَا
उसने रख दिया उसे
لِلْأَنَامِ
मख़लूक़ात के लिए
और धरती को उसने सृष्टल प्राणियों के लिए बनाया;
तफ़्सीर:
और उसने धरती को प्राणियों के लिए उसपर रहने योग्य बनाया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन की तालीम और इंसान-जिन्नात की तख्लीक का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कुरआन सीखना और सिखाना अल्लाह की सबसे बड़ी नेमतों में से एक है।
आयत 11
فِيهَا فَـٰكِهَةٌۭ وَٱلنَّخْلُ ذَاتُ ٱلْأَكْمَامِ
فِيهَا
उसमें
فَـٰكِهَةٌۭ
फल हैं
وَٱلنَّخْلُ
और खजूर के दरख़्त
ذَاتُ
having
ٱلْأَكْمَامِ
ख़ोशों वाले
उसमें स्वादिष्ट फल है और खजूर के वृक्ष है, जिनके फल आवरणों में लिपटे हुए है,
तफ़्सीर:
उसमें ऐसे पेड़ हैं जो फल देते हैं, तथा आवरणों वाले खजूर के वृक्ष हैं जिनमें से खजूर बनते हैं।
आयत 12
وَٱلْحَبُّ ذُو ٱلْعَصْفِ وَٱلرَّيْحَانُ
وَٱلْحَبُّ
और ग़ल्ले हैं
ذُو
having
ٱلْعَصْفِ
भुस वाले
وَٱلرَّيْحَانُ
और ख़ुशबूदार फ़ूल हैं
और भुसवाले अनाज भी और सुगंधित बेल-बूटा भी
तफ़्सीर:
और उसमें भूसे वाले अनाज जैसे गेहूँ और जौ हैं, तथा उसमें ऐसे पौधे हैं, जिनकी सुगंध तुम्हें अच्छी लगती है।
आयत 13
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
तो तुम दोनों अपने रब की अनुकम्पाओं में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 14
خَلَقَ ٱلْإِنسَـٰنَ مِن صَلْصَـٰلٍۢ كَٱلْفَخَّارِ
خَلَقَ
उसने पैदा किया
ٱلْإِنسَـٰنَ
इन्सान को
مِن
from
صَلْصَـٰلٍۢ
बजने वाली मिट्टी से
كَٱلْفَخَّارِ
ठीकरी की तरह
उसने मनुष्य को ठीकरी जैसी खनखनाती हुए मिट्टी से पैदा किया;
तफ़्सीर:
उसने आदम अलैहिस्सलाम को पकी हुई मिट्टी की तरह, बजने वाली सूखी मिट्टी से पैदा किया।
आयत 15
وَخَلَقَ ٱلْجَآنَّ مِن مَّارِجٍۢ مِّن نَّارٍۢ
وَخَلَقَ
और उसने पैदा किया
ٱلْجَآنَّ
जिन्न को
مِن
from
مَّارِجٍۢ
शोले से
مِّن
of
نَّارٍۢ
आग के
और जिन्न को उसने आग की लपट से पैदा किया
तफ़्सीर:
और जिन्नों के पिता को धुआँ रहित आग की ज्वाला से पैदा किया।
आयत 16
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
फिर तुम दोनों अपने रब की सामर्थ्यों में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 17
رَبُّ ٱلْمَشْرِقَيْنِ وَرَبُّ ٱلْمَغْرِبَيْنِ
رَبُّ
रब है
ٱلْمَشْرِقَيْنِ
दो मशरिक़ों का
وَرَبُّ
और रब है
ٱلْمَغْرِبَيْنِ
दो मग़रिबों का
वह दो पूर्व का रब है और दो पश्चिम का रब भी।
तफ़्सीर:
वह सर्दी और गर्मी में सूर्य के उदय होने के दोनों स्थानों और उसके अस्त होने के दोनों स्थानों का रब है।
आयत 18
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों का
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
फिर तुम दोनों अपने रब की महानताओं में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 19
مَرَجَ ٱلْبَحْرَيْنِ يَلْتَقِيَانِ
مَرَجَ
उसने छोड़ दिया
ٱلْبَحْرَيْنِ
दो समुन्दरों को
يَلْتَقِيَانِ
वो दोनों बाहम मिलते हैं
उसने दो समुद्रो को प्रवाहित कर दिया, जो आपस में मिल रहे होते है।
तफ़्सीर:
अल्लाह ने खारे और मीठे दो सागरों को मिला दिया, जो आँखों को आपस में मिलते हुए दिखते हैं।
आयत 20
بَيْنَهُمَا بَرْزَخٌۭ لَّا يَبْغِيَانِ
بَيْنَهُمَا
उन दोनों के दर्मियान
بَرْزَخٌۭ
एक पर्दा है
لَّا
not
يَبْغِيَانِ
नहीं वो दोनों तजावुज़ करते
उन दोनों के बीच एक परदा बाधक होता है, जिसका वे अतिक्रमण नहीं करते
तफ़्सीर:
(जबकि) उन दोनों के बीच एक अवरोध है, जो उन्हें एक-दूसरे पर हावी होने से रोकता है; ताकि मीठा पानी, मीठा और नमकीन पानी, नमकीन बना रहे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दो समुंदरों और फल-मेवों की नेमत का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि कायनात में मौजूद हर तवाज़ुन (संतुलन) अल्लाह की हिकमत की निशानी है।
आयत 21
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
तो तुम दोनों अपने रब के चमत्कारों में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 22
يَخْرُجُ مِنْهُمَا ٱللُّؤْلُؤُ وَٱلْمَرْجَانُ
يَخْرُجُ
निकलते हैं
مِنْهُمَا
उन दोनों से
ٱللُّؤْلُؤُ
मोती
وَٱلْمَرْجَانُ
और मूँगे
उन (समुद्रों) से मोती और मूँगा निकलता है।
तफ़्सीर:
दोनों सागरों से छोटे और बड़े मोती निकलते हैं।
आयत 23
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
उपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम दोनों अपने रब के चमत्कारों में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 24
وَلَهُ ٱلْجَوَارِ ٱلْمُنشَـَٔاتُ فِى ٱلْبَحْرِ كَٱلْأَعْلَـٰمِ
وَلَهُ
और उसी के लिए हैं
ٱلْجَوَارِ
जहाज़
ٱلْمُنشَـَٔاتُ
ऊँचे उठने वाले
فِى
in
ٱلْبَحْرِ
समुन्दर में
كَٱلْأَعْلَـٰمِ
ऊँचे पहाड़ों की तरह
उसी के बस में है समुद्र में पहाड़ो की तरह उठे हुए जहाज़
तफ़्सीर:
और केवल उसी पवित्र और महान अल्लाह का अधिकार चलता है, पहाड़ों की तरह समुद्र में चलने वाले जहाज़ों पर।
आयत 25
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
तो तुम दोनों अपने रब की अनुकम्पाओं में से किस-किस को झुठलाओग?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 26
كُلُّ مَنْ عَلَيْهَا فَانٍۢ
كُلُّ
सब
مَنْ
जो
عَلَيْهَا
उस पर हैं
فَانٍۢ
फ़ना होनो वाले हैं
प्रत्येक जो भी इस (धरती) पर है, नाशवान है
तफ़्सीर:
धरती के ऊपर मौजूद सभी प्राणी अनिवार्य रूप से नष्ट होने वाले हैं।
आयत 27
وَيَبْقَىٰ وَجْهُ رَبِّكَ ذُو ٱلْجَلَـٰلِ وَٱلْإِكْرَامِ
وَيَبْقَىٰ
और बाक़ी रहेगा
وَجْهُ
चेहरा
رَبِّكَ
आपके रब का
ذُو
(the) Owner
ٱلْجَلَـٰلِ
बुज़ुर्गी वाला
وَٱلْإِكْرَامِ
और इज़्ज़त वाला
किन्तु तुम्हारे रब का प्रतापवान और उदार स्वरूप शेष रहनेवाला है
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आपके रब का चेहरा, जो महानता और अपने बंदों पर उपकार और कृतज्ञता वाला है, बाक़ी रहेगा। उसपर कभी भी विनाश नहीं आएगा।
आयत 28
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम दोनों अपने रब के चमत्कारों में से किस-किस को झुठलाओगं?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 29
يَسْـَٔلُهُۥ مَن فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ كُلَّ يَوْمٍ هُوَ فِى شَأْنٍۢ
يَسْـَٔلُهُۥ
माँगता है उसी से
مَن
जो भी
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमनों में
وَٱلْأَرْضِ ۚ
और ज़मीन में है
كُلَّ
हर
يَوْمٍ
दिन
هُوَ
वो
فِى
(is) in
شَأْنٍۢ
एक नई शान में है
आकाशों और धरती में जो भी है उसी से माँगता है। उसकी नित्य नई शान है
तफ़्सीर:
आकाशों में जो भी फ़रिश्ते हैं तथा धरती पर जो भी जिन्न और इनसान हैं, सब अपनी ज़रूरतें उसी से माँगते हैं। हर दिन वह अपने बंदों से संबंधित किसी कार्य में होता है; जैसे जीवन देना, मारना, रोज़ी देना, इत्यादि।
आयत 30
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम दोनों अपने रब की अनुकम्पाओं में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आज की ज़िंदगी में सबक़
हर चीज़ के फना होने और सिर्फ अल्लाह की ज़ात के बाकी रहने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि दुनिया की हर चीज़ फानी है, इसलिए इससे दिल न लगाकर बाकी रहने वाली ज़ात पर भरोसा रखना चाहिए।
आयत 31
سَنَفْرُغُ لَكُمْ أَيُّهَ ٱلثَّقَلَانِ
سَنَفْرُغُ
अनक़रीब हम फ़ारिग़ हो जाऐंगे
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
أَيُّهَ
ऐ
ٱلثَّقَلَانِ
दो बोझो (जिन्न व इन्स)
ऐ दोनों बोझों! शीघ्र ही हम तुम्हारे लिए निवृत हुए जाते है
तफ़्सीर:
हम जल्द ही (ऐ जिन्नो और इनसानो!) तुम्हारे हिसाब के लिए फ़ारिग़ होंगे और हर एक को वह सवाब या सज़ा देंगे, जिसका वह हक़दार है।
आयत 32
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
तो तुम दोनों अपने रब की अनुकम्पाओं में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 33
يَـٰمَعْشَرَ ٱلْجِنِّ وَٱلْإِنسِ إِنِ ٱسْتَطَعْتُمْ أَن تَنفُذُوا۟ مِنْ أَقْطَارِ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ فَٱنفُذُوا۟ ۚ لَا تَنفُذُونَ إِلَّا بِسُلْطَـٰنٍۢ
يَـٰمَعْشَرَ
ऐ गिरोह
ٱلْجِنِّ
जिन्नों
وَٱلْإِنسِ
और इन्सानों के
إِنِ
अगर
ٱسْتَطَعْتُمْ
तुम इस्तिताअत रखते हो
أَن
कि
تَنفُذُوا۟
तुम निकल जाओ
مِنْ
[of]
أَقْطَارِ
किनारों से
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन के
فَٱنفُذُوا۟ ۚ
तो निकल जाओ
لَا
Not
تَنفُذُونَ
नहीं तुम निकल सकते
إِلَّا
मगर
بِسُلْطَـٰنٍۢ
साथ एक क़ुव्वत के
ऐ जिन्नों और मनुष्यों के गिरोह! यदि तुममें हो सके कि आकाशों और धरती की सीमाओं को पार कर सको, तो पार कर जाओ; तुम कदापि पार नहीं कर सकते बिना अधिकार-शक्ति के
तफ़्सीर:
जब अल्लाह क़ियामत के दिन जिन्नों और इनसानों को इकट्ठा करेगा, तो कहेगा : ऐ जिन्नों और इनसानों के समूह! अगर तुम अपने लिए आकाशों और धरती के किसी किनारे से भाग निकलने का कोई रास्ता खोज सको, तो ऐसा करो। लेकिन तुम बिना शक्ति और प्रमाण के ऐसा हरगिज़ नहीं कर पाओगे। और तुम्हारे पास वह कहाँ है?
आयत 34
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम दोनों अपने रब की सामर्थ्यों में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 35
يُرْسَلُ عَلَيْكُمَا شُوَاظٌۭ مِّن نَّارٍۢ وَنُحَاسٌۭ فَلَا تَنتَصِرَانِ
يُرْسَلُ
छोड़ दिया जाएगा
عَلَيْكُمَا
तुम दोनों पर
شُوَاظٌۭ
एक शोला
مِّن
of
نَّارٍۢ
आग का
وَنُحَاسٌۭ
और धुवाँ
فَلَا
तो ना
تَنتَصِرَانِ
तुम दोनों मुक़ाबला कर सकोगे
अतः तुम दोनों पर अग्नि-ज्वाला और धुएँवाला अंगारा (पिघला ताँबा) छोड़ दिया जाएगा, फिर तुम मुक़ाबला न कर सकोगे।
तफ़्सीर:
तुम दोनों पर (ऐ जिन्नो और इनसानो!) धुआँ रहित आग का ज्वाला और लौ से मुक्त धुआँ छोड़ा जाएगा, फिर तुम अपने आपको को उससे बचा नहीं पाओगे।
आयत 36
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम दोनों अपने रब की सामर्थ्यों में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 37
فَإِذَا ٱنشَقَّتِ ٱلسَّمَآءُ فَكَانَتْ وَرْدَةًۭ كَٱلدِّهَانِ
فَإِذَا
फिर जब
ٱنشَقَّتِ
फट जाएगा
ٱلسَّمَآءُ
आसमान
فَكَانَتْ
तो वो हो जाएगा
وَرْدَةًۭ
सुर्ख़
كَٱلدِّهَانِ
मानिन्द सुर्ख़ चमड़े के
फिर जब आकाश फट जाएगा और लाल चमड़े की तरह लाल हो जाएगा।
तफ़्सीर:
फिर जब आसमान फट जाएगा, ताकि उससे फ़रिश्ते उतरें, तो वह अपने रंग की चमक में तेल की तरह लाल हो जाएगा।
आयत 38
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
- अतः तुम दोनों अपने रब के चमत्कारों में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 39
فَيَوْمَئِذٍۢ لَّا يُسْـَٔلُ عَن ذَنۢبِهِۦٓ إِنسٌۭ وَلَا جَآنٌّۭ
فَيَوْمَئِذٍۢ
तो उस दिन
لَّا
not
يُسْـَٔلُ
ना पूछा जाएगा
عَن
about
ذَنۢبِهِۦٓ
अपने गुनाह के बारे में
إِنسٌۭ
कोई इन्सान
وَلَا
और ना
جَآنٌّۭ
कोई जिन्न
फिर उस दिन न किसी मनुष्य से उसके गुनाह के विषय में पूछा जाएगा न किसी जिन्न से
तफ़्सीर:
फिर उस महान दिन किसी इनसान या किसी जिन्न से उसके गुनाह के बारे में नहीं पूछा जाएगा। क्योंकि अल्लाह उनके कर्मों को जानता है।
आयत 40
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम दोनों अपने रब के चमत्कारों में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन के हिसाब का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि कयामत के दिन इंसान और जिन्नात दोनों को अपने आमाल का हिसाब देना होगा।
आयत 41
يُعْرَفُ ٱلْمُجْرِمُونَ بِسِيمَـٰهُمْ فَيُؤْخَذُ بِٱلنَّوَٰصِى وَٱلْأَقْدَامِ
يُعْرَفُ
पहचाने जाऐंगे
ٱلْمُجْرِمُونَ
मुजरिम
بِسِيمَـٰهُمْ
अपने चेहरों की अलामत से
فَيُؤْخَذُ
तो वो पकड़े जाऐंगे
بِٱلنَّوَٰصِى
पेशानी के बालों से
وَٱلْأَقْدَامِ
और क़दमों से
अपराधी अपने चहरों से पहचान लिए जाएँगे और उनके माथे के बालों और टाँगों द्वारा पकड़ लिया जाएगा
तफ़्सीर:
क़ियामत के दिन अपराधियों को उनके निशान से पहचाना जाएगा, जो उनके चेहरे का कालापन और उनकी आँखों का नीलापन है। फिर उनके माथे के बालों को उनके पैरों से मिलाकर पकड़ा जाएगा और उन्हें जहन्नम में डाल दिया जाएगा।
आयत 42
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम दोनों अपने रब की सामर्थ्यों में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 43
هَـٰذِهِۦ جَهَنَّمُ ٱلَّتِى يُكَذِّبُ بِهَا ٱلْمُجْرِمُونَ
هَـٰذِهِۦ
ये है
جَهَنَّمُ
जहन्नम
ٱلَّتِى
वो जो
يُكَذِّبُ
झुठलाते थे
بِهَا
उसे
ٱلْمُجْرِمُونَ
मुजरिम
यही वह जहन्नम है जिसे अपराधी लोग झूठ ठहराते रहे है
तफ़्सीर:
और उन्हें फटकारते हुए कहा जाएगा : यह जहन्नम, जिसे अपराधी लोग दुनिया में झुठलाते थे, उनकी आँखों के सामने है और वे इसका इनकार नहीं कर सकते।
आयत 44
يَطُوفُونَ بَيْنَهَا وَبَيْنَ حَمِيمٍ ءَانٍۢ
يَطُوفُونَ
वो गर्दिश करेंगे
بَيْنَهَا
दर्मियान उसके
وَبَيْنَ
और दर्मियान
حَمِيمٍ
सख़्त गर्म पानी
ءَانٍۢ
खौलते हुए के
वे उनके और खौलते हुए पानी के बीच चक्कर लगा रहें होंगे
तफ़्सीर:
वे उसके और अत्यंत गर्म पानी के बीच चक्कर लगा रहे होंगे।
आयत 45
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
फिर तुम दोनों अपने रब के सामर्थ्यों में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 46
وَلِمَنْ خَافَ مَقَامَ رَبِّهِۦ جَنَّتَانِ
وَلِمَنْ
और उसके लिए जो
خَافَ
डरे
مَقَامَ
खड़ा होने से
رَبِّهِۦ
अपने रब के सामने
جَنَّتَانِ
दो बाग़ है
किन्तु जो अपने रब के सामने खड़े होने का डर रखता होगा, उसके लिए दो बाग़ है। -
तफ़्सीर:
जो व्यक्ति आख़िरत में अपने रब के सामने खड़े होने से डरा, अतः वह ईमान लाया और नेक कार्य किया - उसके लिए दो बाग़ हैं।
आयत 47
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
तो तुम दोनों अपने रब की अनुकम्पाओं में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 48
ذَوَاتَآ أَفْنَانٍۢ
ذَوَاتَآ
Having
أَفْنَانٍۢ
दोनों बहुत शाख़ों वाले हैं
घनी डालियोंवाले;
तफ़्सीर:
वे दोनों बाग़ बड़ी-बड़ी, ताज़ी और फलदार शाखाओं वाले हैं।
आयत 49
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम दोनों अपने रब के उपकारों में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 50
فِيهِمَا عَيْنَانِ تَجْرِيَانِ
فِيهِمَا
उन दोनों में
عَيْنَانِ
दो चश्मे हैं
تَجْرِيَانِ
वो दोनों बहते होंगे
उन दोनो (बाग़ो) में दो प्रवाहित स्रोत है।
तफ़्सीर:
उन दोनों बाग़ों में दो जल स्रोत हैं, जो उनके बीच पानी के साथ गुज़रते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दोज़ख़ के अज़ाब का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि गुनाहों का अंजाम बहुत संगीन है, इससे बचने की कोशिश करनी चाहिए।
आयत 51
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम दोनों अपने रब की अनुकम्पाओं में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 52
فِيهِمَا مِن كُلِّ فَـٰكِهَةٍۢ زَوْجَانِ
فِيهِمَا
उन दोनों में
مِن
[of]
كُلِّ
हर
فَـٰكِهَةٍۢ
फल की
زَوْجَانِ
दो क़िस्में हैं
उन दोनों (बाग़ो) मे हर स्वादिष्ट फल की दो-दो किस्में हैं;
तफ़्सीर:
उन दोनों बाग़ों में हर तरह के स्वादिष्ट फलों के दो प्रकार हैं।
आयत 53
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम दोनो रब के चमत्कारों में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 54
مُتَّكِـِٔينَ عَلَىٰ فُرُشٍۭ بَطَآئِنُهَا مِنْ إِسْتَبْرَقٍۢ ۚ وَجَنَى ٱلْجَنَّتَيْنِ دَانٍۢ
مُتَّكِـِٔينَ
तकिया लगाए हुए होंगे
عَلَىٰ
on
فُرُشٍۭ
ऐसे बिस्तरों पर
بَطَآئِنُهَا
अस्तर जिनके
مِنْ
(are) of
إِسْتَبْرَقٍۢ ۚ
मोटे रेशम के होंगे
وَجَنَى
और फल
ٱلْجَنَّتَيْنِ
दोनों बाग़ों के
دَانٍۢ
झुके हुए होंगे
वे ऐसे बिछौनो पर तकिया लगाए हुए होंगे जिनके अस्तर गाढे रेशम के होंगे, और दोनों बाग़ो के फल झुके हुए निकट ही होंगे।
तफ़्सीर:
वे ऐसे बिछौनों पर तकिया लगाए होंगे, जिनके अस्तर मोटे रेशम के होंगे। तथा दोनों बाग़ों से तोड़े जाने वाले फल एवं मेवे बहुत निकट होंगे, जिन्हें आदमी खड़े, बैठे और लेटे हुए तोड़ सकेगा।
आयत 55
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम अपने रब के चमत्कारों में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 56
فِيهِنَّ قَـٰصِرَٰتُ ٱلطَّرْفِ لَمْ يَطْمِثْهُنَّ إِنسٌۭ قَبْلَهُمْ وَلَا جَآنٌّۭ
فِيهِنَّ
उनमें होंगी
قَـٰصِرَٰتُ
झुकाने वालियाँ
ٱلطَّرْفِ
निगाहों को
لَمْ
नहीं
يَطْمِثْهُنَّ
छुआ उन्हें
إِنسٌۭ
किसी इन्सान ने
قَبْلَهُمْ
उन से पहले
وَلَا
और ना
جَآنٌّۭ
किसी जिन्न ने
उन (अनुकम्पाओं) में निगाह बचाए रखनेवाली (सुन्दर) स्त्रियाँ होंगी, जिन्हें उनसे पहले न किसी मनुष्य ने हाथ लगाया और न किसी जिन्न ने
तफ़्सीर:
उनमें ऐसी स्त्रियाँ हैं, जिनकी निगाहें अपने पतियों तक ही सीमित हैं। उन्हें उनके पतियों से पहले किसी जिन्न या इनसान ने हाथ नहीं लगाया।
आयत 57
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
फिर तुम दोनों अपने रब की अनुकम्पाओं में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 58
كَأَنَّهُنَّ ٱلْيَاقُوتُ وَٱلْمَرْجَانُ
كَأَنَّهُنَّ
गोया कि वो हैं
ٱلْيَاقُوتُ
याक़ूत
وَٱلْمَرْجَانُ
और मरजान
मानो वे लाल (याकूत) और प्रवाल (मूँगा) है।
तफ़्सीर:
वे इतनी सुंदर और निखरे हुए रंग की होंगी, मानो माणिक और मूँगा हैं।
आयत 59
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम दोनों अपने रब की अनुकम्पाओं में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 60
هَلْ جَزَآءُ ٱلْإِحْسَـٰنِ إِلَّا ٱلْإِحْسَـٰنُ
هَلْ
नहीं
جَزَآءُ
बदला है
ٱلْإِحْسَـٰنِ
एहसान का
إِلَّا
मगर
ٱلْإِحْسَـٰنُ
एहसान ही
अच्छाई का बदला अच्छाई के सिवा और क्या हो सकता है?
तफ़्सीर:
जिसने अपने रब का आज्ञापालन उत्तम ढंग से किया, उसका बदला इसके सिवा क्या है कि अल्लाह उसे उत्तम प्रतिफल प्रदान करे?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
जन्नत के दो बाग़ों की नेमतों का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि नेक अमल का बदला इतना बड़ा है कि उसका तसव्वुर भी मुश्किल है, यह हमें नेकी की तरफ मुतवज्जह करता है।
आयत 61
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम दोनों अपने रब की अनुकम्पाओं में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 62
وَمِن دُونِهِمَا جَنَّتَانِ
وَمِن
Besides these two
دُونِهِمَا
और उन दोनों के अलावा
جَنَّتَانِ
दो बाग़ हैं
उन दोनों से हटकर दो और बाग़ है।
तफ़्सीर:
तथा इन दोनों पूर्वोक्त बाग़ों के अलावा दो अन्य बाग़ हैं।
आयत 63
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
फिर तुम दोनों अपने रब की अनुकम्पाओं में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 64
مُدْهَآمَّتَانِ
مُدْهَآمَّتَانِ
दोनों गहरे सब्ज़ हैं
गहरे हरित;
तफ़्सीर:
इन दोनों बाग़ों की हरियाली बहुत अधिक है।
आयत 65
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम दोनों अपने रब की अनुकम्पाओं में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 66
فِيهِمَا عَيْنَانِ نَضَّاخَتَانِ
فِيهِمَا
उन दोनों में
عَيْنَانِ
दो चश्मे हैं
نَضَّاخَتَانِ
दोनों जोश मारने वाले
उन दोनों (बाग़ो) में दो स्रोत है जोश मारते हुए
तफ़्सीर:
इन दोनों बाग़ों में दो जल स्रोत हैं, जिनसे बड़ी तेज़ी से पानी उबल रहा है, उनके पानी का उबलना बंद नहीं होता।
आयत 67
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम दोनों अपने रब के चमत्कारों में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 68
فِيهِمَا فَـٰكِهَةٌۭ وَنَخْلٌۭ وَرُمَّانٌۭ
فِيهِمَا
उन दोनों में
فَـٰكِهَةٌۭ
फल हैं
وَنَخْلٌۭ
और खजूर के दरख़्त
وَرُمَّانٌۭ
और अनार हैं
उनमें है स्वादिष्ट फल और खजूर और अनार;
तफ़्सीर:
इन दोनों बाग़ों में बहुत-से फल, बड़े-बड़े खजूर के पेड़ और अनार हैं।
आयत 69
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम दोनों अपने रब की अनुकम्पाओं में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 70
فِيهِنَّ خَيْرَٰتٌ حِسَانٌۭ
فِيهِنَّ
उन में
خَيْرَٰتٌ
नेक औरतें हैं
حِسَانٌۭ
ख़ूबसूरत
उनमें भली और सुन्दर स्त्रियाँ होंगी।
तफ़्सीर:
इन जन्नतों में अच्छी नैतिकता और सुंदर चेहरों वाली स्त्रियाँ हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जन्नत के मज़ीद दो बाग़ों का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह की नेमतों की कोई हद नहीं, हर दर्जे के नेक बंदे के लिए अलग नेमतें रखी गई हैं।
आयत 71
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
तो तुम दोनों अपने रब की अनुकम्पाओं में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 72
حُورٌۭ مَّقْصُورَٰتٌۭ فِى ٱلْخِيَامِ
حُورٌۭ
हूरें
مَّقْصُورَٰتٌۭ
ठहराई हुईं
فِى
in
ٱلْخِيَامِ
ख़ेमों में
हूरें (परम रूपवती स्त्रियाँ) ख़ेमों में रहनेवाली;
तफ़्सीर:
हूरें, जो उनकी रक्षा के लिए खेमों में रखी गई होंगी।
आयत 73
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम दोनों अपने रब के चमत्कारों में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 74
لَمْ يَطْمِثْهُنَّ إِنسٌۭ قَبْلَهُمْ وَلَا جَآنٌّۭ
لَمْ
नहीं
يَطْمِثْهُنَّ
छुआ उन्हें
إِنسٌۭ
किसी इन्सान ने
قَبْلَهُمْ
उनसे पहले
وَلَا
और ना
جَآنٌّۭ
किसी जिन्न ने
जिन्हें उससे पहले न किसी मनुष्य ने हाथ लगाया होगा और न किसी जिन्न ने।
तफ़्सीर:
उनके पतियों से पहले कोई इनसान या जिन्न उनके पास नहीं आया।
आयत 75
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सा
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम दोनों अपने रब की अनुकम्पाओं में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 76
مُتَّكِـِٔينَ عَلَىٰ رَفْرَفٍ خُضْرٍۢ وَعَبْقَرِىٍّ حِسَانٍۢ
مُتَّكِـِٔينَ
तकिया लगाए हुए होंगे
عَلَىٰ
on
رَفْرَفٍ
क़ालीनों पर
خُضْرٍۢ
सब्ज़
وَعَبْقَرِىٍّ
और नादिर
حِسَانٍۢ
ख़ूबसूरत
वे हरे रेशमी गद्दो और उत्कृष्ट् और असाधारण क़ालीनों पर तकिया लगाए होंगे;
तफ़्सीर:
वे हरे गिलाफों वाले तकियों और सुंदर बिछौनों पर टेक लगाए हुए होंगे।
आयत 77
فَبِأَىِّ ءَالَآءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
فَبِأَىِّ
तो कौन सी
ءَالَآءِ
नेअमतों को
رَبِّكُمَا
अपने रब की
تُكَذِّبَانِ
तुम दोनों झुठलाओगे
अतः तुम दोनों अपने रब की अनुकम्पाओं में से किस-किस को झुठलाओगे?
तफ़्सीर:
तो (ऐ जिन्नों और इनसानों के समुदाय!) तुम अपने ऊपर अल्लाह की ढेरों नेमतों में से किस-किस का इनकार करोगे?
आयत 78
تَبَـٰرَكَ ٱسْمُ رَبِّكَ ذِى ٱلْجَلَـٰلِ وَٱلْإِكْرَامِ
تَبَـٰرَكَ
बहुत बाबरकत है
ٱسْمُ
नाम
رَبِّكَ
आपके रब का
ذِى
Owner
ٱلْجَلَـٰلِ
जो बुज़ुर्गी वाला है
وَٱلْإِكْرَامِ
और इज़्ज़त वाला है
बड़ा ही बरकतवाला नाम है तुम्हारे प्रतापवान और उदार रब का
तफ़्सीर:
तुम्हारे पालनहार के नाम की भलाई बहुत अधिक और बड़ी है, जो महानता और अपने बंदों पर उपकार और कृतज्ञता वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जन्नत की नेमतों और अल्लाह की बरकत वाली ज़ात के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि सूरह में बार-बार दोहराया गया सवाल हमें अपनी ज़िंदगी की हर नेमत पर शुक्रगुज़ार होने की याद दिलाता है।
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