नाम का मतलब
निश्चित होने वाली घटना (कयामत, जिसके आने में कोई शक नहीं)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-वाकिया में कयामत के दिन इंसानों के तीन गिरोहों (साबिक़ून, असहाबे-यमीन, असहाबे-शिमाल) में बंटने का ज़िक्र है, साथ ही जन्नत-दोज़ख़ की नेमतों-अज़ाब का तफ्सीली बयान है।
फ़ज़ीलत / सार
नबी ﷺ ने फरमाया कि जो शख्स इस सूरह को रोज़ाना रात में पढ़े, उसे कभी फाका (माली तंगी) नहीं छूएगा — इसे रोज़ी में बरकत की सूरह भी माना जाता है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ إِذَا وَقَعَتِ ٱلْوَاقِعَةُ
إِذَا
जब
وَقَعَتِ
वाक़ेअ हो जाएगी
ٱلْوَاقِعَةُ
वाक़ेअ होने वाली
जब घटित होनेवाली (घड़ी) घटित हो जाएगी;
तफ़्सीर:
जब अनिवार्य रूप से क़ियामत घटित हो जाएगी।
आयत 2
لَيْسَ لِوَقْعَتِهَا كَاذِبَةٌ
لَيْسَ
नहीं है
لِوَقْعَتِهَا
उसका वाक़ेअ होना
كَاذِبَةٌ
कोई झूठ
उसके घटित होने में कुछ भी झुठ नहीं;
तफ़्सीर:
कोई प्राणी ऐसा नहीं होगा, जो उसका इनकार करे, जैसे दुनिया में इनकार कर देता था।
आयत 3
خَافِضَةٌۭ رَّافِعَةٌ
خَافِضَةٌۭ
पस्त करने वाली है
رَّافِعَةٌ
बुलन्द करने वाली है
पस्त करनेवाली होगी, ऊँचा करनेवाली थी;
तफ़्सीर:
वह पापी काफ़िरों को जहन्नम में दाखिल करके उन्हें नीचा करने वाली, और पुनीत ईमान वालों को जन्नत में दाखिल करके उन्हें ऊँचा करने वाली होगी।
आयत 4
إِذَا رُجَّتِ ٱلْأَرْضُ رَجًّۭا
إِذَا
जब
رُجَّتِ
हिलाई जाएगी
ٱلْأَرْضُ
ज़मीन
رَجًّۭا
सख़्त हिलाया जाना
जब धरती थरथराकर काँप उठेगी;
तफ़्सीर:
जब धरती को बहुत ज़ोर से हिलाया जाएगा।
आयत 5
وَبُسَّتِ ٱلْجِبَالُ بَسًّۭا
وَبُسَّتِ
और रेज़ा-रेज़ा कर दिए जाऐंगे
ٱلْجِبَالُ
पहाड़
بَسًّۭا
रेज़ा-रेज़ा किए जाना
और पहाड़ टूटकर चूर्ण-विचुर्ण हो जाएँगे
तफ़्सीर:
और पहाड़ बिलकुल महीन-महीन कर दिए जाएँगे।
आयत 6
فَكَانَتْ هَبَآءًۭ مُّنۢبَثًّۭا
فَكَانَتْ
तो हो जाऐंगे वो
هَبَآءًۭ
गर्द-ओ-ग़ुबार
مُّنۢبَثًّۭا
मुन्तशिर
कि वे बिखरे हुए धूल होकर रह जाएँगे
तफ़्सीर:
सो वे चकना चूर होने के कारण बिखरी हुई धूल बन जाएँगे, जिसमें स्थिरता नहीं होगी।
आयत 7
وَكُنتُمْ أَزْوَٰجًۭا ثَلَـٰثَةًۭ
وَكُنتُمْ
और हो जाओगे तुम
أَزْوَٰجًۭا
जमाअतों में
ثَلَـٰثَةًۭ
तीन
और तुम लोग तीन प्रकार के हो जाओगे -
तफ़्सीर:
और तुम उस दिन तीन प्रकार के लोग हो जाओगे।
आयत 8
فَأَصْحَـٰبُ ٱلْمَيْمَنَةِ مَآ أَصْحَـٰبُ ٱلْمَيْمَنَةِ
فَأَصْحَـٰبُ
Then (the) companions
ٱلْمَيْمَنَةِ
पस दाऐं हाथ वाले
مَآ
क्या हैं
أَصْحَـٰبُ
(are the) companions
ٱلْمَيْمَنَةِ
दाऐं हाथ वाले
तो दाहिने हाथ वाले (सौभाग्यशाली), कैसे होंगे दाहिने हाथ वाले!
तफ़्सीर:
तो दाहिने हाथ वाले, जो अपने कर्मपत्र दाहिने हाथ से लेंगे। उनका पद कितना ऊँचा और महान है!
आयत 9
وَأَصْحَـٰبُ ٱلْمَشْـَٔمَةِ مَآ أَصْحَـٰبُ ٱلْمَشْـَٔمَةِ
وَأَصْحَـٰبُ
And (the) companions
ٱلْمَشْـَٔمَةِ
और बाऐं हाथ वाले
مَآ
क्या हैं
أَصْحَـٰبُ
(are the) companions
ٱلْمَشْـَٔمَةِ
बाएँ हाथ वाले
और बाएँ हाथ वाले (दुर्भाग्यशाली), कैसे होंगे बाएँ हाथ वाले!
तफ़्सीर:
और बाएँ हाथ वाले, जो अपने कर्मपत्र बाएँ हाथ से लेंगे। उनकी स्थिति कितनी हीन और बदतर है!
आयत 10
وَٱلسَّـٰبِقُونَ ٱلسَّـٰبِقُونَ
وَٱلسَّـٰبِقُونَ
और आगे बढ़ने वाले
ٱلسَّـٰبِقُونَ
तो आगे बढ़ने वाले हैं
और आगे बढ़ जानेवाले तो आगे बढ़ जानेवाले ही है
तफ़्सीर:
और जो लोग दुनिया में नेक काम करने में पहल करने वाले हैं, वही लोग आख़िरत में जन्नत में प्रवेश करने में दूसरों से आगे रहने वाले हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के दिन इंसानों के तीन गिरोहों में बंटने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कयामत के दिन हर इंसान अपने अमल के मुताबिक एक गिरोह में शामिल होगा, इसलिए आज ही सही रास्ता चुनने की कोशिश करनी चाहिए।
आयत 11
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلْمُقَرَّبُونَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लेग हैं
ٱلْمُقَرَّبُونَ
जो मुक़र्रब हैं
वही (अल्लाह के) निकटवर्ती है;
तफ़्सीर:
यही लोग अल्लाह की (विशेष) निकटता प्राप्त किए हुए हैं।
आयत 12
فِى جَنَّـٰتِ ٱلنَّعِيمِ
فِى
In
جَنَّـٰتِ
बाग़ात में
ٱلنَّعِيمِ
नेअमतों वाले
नेमत भरी जन्नतों में होंगे;
तफ़्सीर:
वे नेमत के बाग़ों में विभिन्न प्रकार की नेमतों का आनंद लेते होंगे।
आयत 13
ثُلَّةٌۭ مِّنَ ٱلْأَوَّلِينَ
ثُلَّةٌۭ
एक बड़ा गिरोह
مِّنَ
of
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों में से
अगलों में से तो बहुत-से होंगे,
तफ़्सीर:
इस उम्मत (के अगले लोगों) में से और पिछली उम्मतों में से एक समूह होगा।
आयत 14
وَقَلِيلٌۭ مِّنَ ٱلْـَٔاخِرِينَ
وَقَلِيلٌۭ
और बहुत थोड़े
مِّنَ
of
ٱلْـَٔاخِرِينَ
पिछलों में से
किन्तु पिछलों में से कम ही
तफ़्सीर:
और आखिरी ज़माने के थोड़े लोग ही आगे रहने वाले समीपवर्ती लोगों में से होंगे।
आयत 15
عَلَىٰ سُرُرٍۢ مَّوْضُونَةٍۢ
عَلَىٰ
On
سُرُرٍۢ
तख़्तों पर होंगे
مَّوْضُونَةٍۢ
सोने के तारों से बने हुए
जड़ित तख़्तो पर;
तफ़्सीर:
सोने से बुने हुए पलंगों पर।
आयत 16
مُّتَّكِـِٔينَ عَلَيْهَا مُتَقَـٰبِلِينَ
مُّتَّكِـِٔينَ
तकिया लगाए हुए होंगे
عَلَيْهَا
उन पर
مُتَقَـٰبِلِينَ
आमने-सामने
तकिया लगाए आमने-सामने होंगे;
तफ़्सीर:
इन पलंगों पर तकिया लगाए आमने-सामने बैठे होंगे। उनमें से कोई दूसरे की पीठ को नहीं देखेगा।
आयत 17
يَطُوفُ عَلَيْهِمْ وِلْدَٰنٌۭ مُّخَلَّدُونَ
يَطُوفُ
गर्दिश कर रहे होंगे
عَلَيْهِمْ
उन पर
وِلْدَٰنٌۭ
लड़के
مُّخَلَّدُونَ
हमेशा रहने वाले
उनके पास किशोर होंगे जो सदैव किशोरावस्था ही में रहेंगे,
तफ़्सीर:
उनके पास उनकी सेवा के लिए ऐसे बालक घूम रहे होंगे, जो न कभी बूढ़े होंगे और न मरेंगे।
आयत 18
بِأَكْوَابٍۢ وَأَبَارِيقَ وَكَأْسٍۢ مِّن مَّعِينٍۢ
بِأَكْوَابٍۢ
साथ प्यालों
وَأَبَارِيقَ
और सुराहियों के
وَكَأْسٍۢ
और साग़र
مِّن
from
مَّعِينٍۢ
बहती शराब के
प्याले और आफ़ताबे (जग) और विशुद्ध पेय से भरा हुआ पात्र लिए फिर रहे होंगे
तफ़्सीर:
वे उनके आस-पास ऐसे प्यालों के साथ जिनके दस्ते नहीं होते, ऐसी सुराहियों के साथ जिनके दस्ते होते हैं और छलकते जाम लेकर फिर रहे होंगे, जो जन्नत में बहने वाली शराब के होंगे, जिनके सोते कभी बंद नहीं होंगे।
आयत 19
لَّا يُصَدَّعُونَ عَنْهَا وَلَا يُنزِفُونَ
لَّا
Not
يُصَدَّعُونَ
ना वो सर दर्द में मुब्तिला किए जाऐंगे
عَنْهَا
उससे
وَلَا
और ना
يُنزِفُونَ
वो बहकेंगे
- जिस (के पीने) से न तो उन्हें सिर दर्द होगा और न उनकी बुद्धि में विकार आएगा
तफ़्सीर:
वह मदिरा दुनिया की मदिरा की तरह नहीं होगी। क्योंकि उसके पीने वाले को न सिर दर्द होगा और न ही उसकी बुद्धि प्रभावित होगी।
आयत 20
وَفَـٰكِهَةٍۢ مِّمَّا يَتَخَيَّرُونَ
وَفَـٰكِهَةٍۢ
और फल
مِّمَّا
उसमें से जो
يَتَخَيَّرُونَ
वो पसंद करेंगे
और स्वादिष्ट॥ फल जो वे पसन्द करें;
तफ़्सीर:
और ये बालक उनके पास उनकी पसंद के फल लेकर फिर रहे होंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
साबिक़ून (नेकी में आगे बढ़ने वालों) की नेमतों का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि नेकी में सबसे आगे बढ़ने की कोशिश करने वालों को सबसे बड़ा मर्तबा मिलता है।
आयत 21
وَلَحْمِ طَيْرٍۢ مِّمَّا يَشْتَهُونَ
وَلَحْمِ
और गोश्त
طَيْرٍۢ
परिन्दों का
مِّمَّا
उसमें से जो
يَشْتَهُونَ
वो ख़्वाहिश करेंगे
और पक्षी का मांस जो वे चाह;
तफ़्सीर:
तथा पक्षियों का मांस लेकर फिर रहे होंगे, जिसकी वे इच्छा रखते हैं।
आयत 22
وَحُورٌ عِينٌۭ
وَحُورٌ
और गोरी औरतें
عِينٌۭ
बड़ी आँखों वाली
और बड़ी आँखोंवाली हूरें,
तफ़्सीर:
और उनके लिए जन्नत में बड़ी आँखों वाली सुंदर स्त्रियाँ होंगी।
आयत 23
كَأَمْثَـٰلِ ٱللُّؤْلُؤِ ٱلْمَكْنُونِ
كَأَمْثَـٰلِ
जैसे
ٱللُّؤْلُؤِ
मोती
ٱلْمَكْنُونِ
छुपे हुए
मानो छिपाए हुए मोती हो
तफ़्सीर:
सीपियों में संरक्षित मोतियों की तरह।
आयत 24
جَزَآءًۢ بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
جَزَآءًۢ
बदला है
بِمَا
उसका जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
यह सब उसके बदले में उन्हें प्राप्त होगा जो कुछ वे करते रहे
तफ़्सीर:
उनके लिए उन अच्छे कर्मों के प्रतिफल के तौर पर जो वे दुनिया में किया करते थे।
आयत 25
لَا يَسْمَعُونَ فِيهَا لَغْوًۭا وَلَا تَأْثِيمًا
لَا
Not
يَسْمَعُونَ
ना वो सुनेंगे
فِيهَا
उसमें
لَغْوًۭا
कोई लग़्व बात
وَلَا
और ना
تَأْثِيمًا
कोई गुनाह की बात
उसमें वे न कोई व्यर्थ बात सुनेंगे और न गुनाह की बात;
तफ़्सीर:
वे जन्नत में अश्लील बातें नहीं सुनेंगे, और न ही कोई ऐसी बात जिसके कहने वाले को पाप लगे।
आयत 26
إِلَّا قِيلًۭا سَلَـٰمًۭا سَلَـٰمًۭا
إِلَّا
मगर
قِيلًۭا
कहना
سَلَـٰمًۭا
सलाम
سَلَـٰمًۭا
सलाम
सिवाय इस बात के कि "सलाम हो, सलाम हो!"
तफ़्सीर:
वे केवल अपने आपपर फ़रिश्तों का सलाम और उनका आपस में एक-दूसरे को सलाम करना सुनेंगे।
आयत 27
وَأَصْحَـٰبُ ٱلْيَمِينِ مَآ أَصْحَـٰبُ ٱلْيَمِينِ
وَأَصْحَـٰبُ
And (the) companions
ٱلْيَمِينِ
और दाऐं हाथ वाले
مَآ
क्या हैं
أَصْحَـٰبُ
(are the) companions
ٱلْيَمِينِ
दाऐं हाथ वाले
रहे सौभाग्यशाली लोग, तो सौभाग्यशालियों का क्या कहना!
तफ़्सीर:
और दाहिने हाथ वाले - जो अपने कर्मपत्र अपने दाहिने हाथ में दिए जाएँगे - अल्लाह के निकट उनकी स्थिति और उनका पद कितना महान है!
आयत 28
فِى سِدْرٍۢ مَّخْضُودٍۢ
فِى
Among
سِدْرٍۢ
बेरियों में
مَّخْضُودٍۢ
बग़ैर काँटों के
वे वहाँ होंगे जहाँ बिन काँटों के बेर होंगे;
तफ़्सीर:
(वे) ऐसी बेरियों में होंगे जिनके काँटे काटे हुए हैं, उनमें कोई कष्ट नहीं है।
आयत 29
وَطَلْحٍۢ مَّنضُودٍۢ
وَطَلْحٍۢ
और केलों में
مَّنضُودٍۢ
तह ब तह
और गुच्छेदार केले;
तफ़्सीर:
और परत दर परत लगे हुए केलों में।
आयत 30
وَظِلٍّۢ مَّمْدُودٍۢ
وَظِلٍّۢ
और सायों में
مَّمْدُودٍۢ
लम्बे
दूर तक फैली हुई छाँव;
तफ़्सीर:
और ऐसी छाया में जो अच्छी तरह फैली हुई, निरंतर रहने वाली है, जो कभी समाप्त न होगी।
आज की ज़िंदगी में सबक़
असहाबे-यमीन (दाएं वालों) की नेमतों का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि औसत नेक ज़िंदगी गुज़ारने वालों को भी जन्नत की खूबसूरत नेमतें मिलेंगी, मायूस नहीं होना चाहिए।
आयत 31
وَمَآءٍۢ مَّسْكُوبٍۢ
وَمَآءٍۢ
और पानी में
مَّسْكُوبٍۢ
बहते हुए
बहता हुआ पानी;
तफ़्सीर:
और सदा बहते पानी में।
आयत 32
وَفَـٰكِهَةٍۢ كَثِيرَةٍۢ
وَفَـٰكِهَةٍۢ
और फलों में
كَثِيرَةٍۢ
बकसरत
बहुत-सा स्वादिष्ट; फल,
तफ़्सीर:
तथा ढेर सारे फलों में जो सीमित नहीं हैं।
आयत 33
لَّا مَقْطُوعَةٍۢ وَلَا مَمْنُوعَةٍۢ
لَّا
ना
مَقْطُوعَةٍۢ
ख़त्म होने वाले
وَلَا
और ना
مَمْنُوعَةٍۢ
रोके जाने वाले
जिसका सिलसिला टूटनेवाला न होगा और न उसपर कोई रोक-टोक होगी
तफ़्सीर:
ये फल उनके पास से कभी समाप्त नहीं होंगे। क्योंकि उनका कोई मौसम नहीं होगा। तथा जब भी वे उन्हें लेना चाहेंगे, उसमें कोई बाधा नहीं होगी।
आयत 34
وَفُرُشٍۢ مَّرْفُوعَةٍ
وَفُرُشٍۢ
और नशिस्तगाहों में
مَّرْفُوعَةٍ
ऊँची
उच्चकोटि के बिछौने होंगे;
तफ़्सीर:
और पलंगों पर लगे ऊँचे बिस्तरों पर (होंगे)।
आयत 35
إِنَّآ أَنشَأْنَـٰهُنَّ إِنشَآءًۭ
إِنَّآ
बेशक हम
أَنشَأْنَـٰهُنَّ
पैदा किया हमने उन्हें
إِنشَآءًۭ
नए सिरे से पैदा करना
(और वहाँ उनकी पत्नियों को) निश्चय ही हमने एक विशेष उठान पर उठान पर उठाया
तफ़्सीर:
हमने उपर्युक्त हूरों को असामान्य तरीके से बनाया है।
आयत 36
فَجَعَلْنَـٰهُنَّ أَبْكَارًا
فَجَعَلْنَـٰهُنَّ
तो बनाया हमने उन्हें
أَبْكَارًا
कुँवारियाँ
और हमने उन्हे कुँवारियाँ बनाया;
तफ़्सीर:
चुनाँचे हमने उन्हें कुँवारियाँ बनाया, जिन्हें पहले छुआ नहीं गया।
आयत 37
عُرُبًا أَتْرَابًۭا
عُرُبًا
ख़ाविन्दों की प्यारियाँ
أَتْرَابًۭا
हम उमर
प्रेम दर्शानेवाली और समायु;
तफ़्सीर:
जो अपने पतियों को प्रिय और समान उम्र वाली हैं।
आयत 38
لِّأَصْحَـٰبِ ٱلْيَمِينِ
لِّأَصْحَـٰبِ
For (the) companions
ٱلْيَمِينِ
दाऐं हाथ वालों के लिए
सौभाग्यशाली लोगों के लिए;
तफ़्सीर:
हमने उन्हें दाहिने हाथ वालों के लिए बनाया है, जिन्हें उनके सौभाग्यशाली होने की निशानी के तौर पर दाईं ओर ले जाया जाएगा।
आयत 39
ثُلَّةٌۭ مِّنَ ٱلْأَوَّلِينَ
ثُلَّةٌۭ
एक बड़ा गिरोह होगा
مِّنَ
of
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों में से
वे अगलों में से भी अधिक होगे
तफ़्सीर:
वे पिछले नबियों की उम्मतों में से एक समूह हैं।
आयत 40
وَثُلَّةٌۭ مِّنَ ٱلْـَٔاخِرِينَ
وَثُلَّةٌۭ
और एक बड़ा गिरोह होगा
مِّنَ
of
ٱلْـَٔاخِرِينَ
पिछलों में से
और पिछलों में से भी अधिक होंगे
तफ़्सीर:
तथा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उम्मत में से एक समूह हैं, जो किअंतिम उम्मत है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जन्नत के बाग़ों का मज़ीद ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि जन्नत की नेमतें दुनिया के तसव्वुर से कहीं ज़्यादा हैं, इनकी तलाश में मेहनत करनी चाहिए।
आयत 41
وَأَصْحَـٰبُ ٱلشِّمَالِ مَآ أَصْحَـٰبُ ٱلشِّمَالِ
وَأَصْحَـٰبُ
And (the) companions
ٱلشِّمَالِ
और बाऐं हाथ वाले
مَآ
क्या हैं
أَصْحَـٰبُ
(are the) companions
ٱلشِّمَالِ
बाऐं हाथ वाले
रहे दुर्भाग्यशाली लोग, तो कैसे होंगे दुर्भाग्यशाली लोग!
तफ़्सीर:
और बाएँ हाथ वाले - जो अपने कर्मपत्र अपने बाएँ हाथ में दिए जाएँगे - उनकी स्थिति और उनका परिणाम कितना खराब है!
आयत 42
فِى سَمُومٍۢ وَحَمِيمٍۢ
فِى
In
سَمُومٍۢ
सख़्त गर्म हवा में
وَحَمِيمٍۢ
और खौलते पानी में
गर्म हवा और खौलते हुए पानी में होंगे;
तफ़्सीर:
(वे) बहुत गर्म हवा में और बहुत गर्म पानी में (होंगे)।
आयत 43
وَظِلٍّۢ مِّن يَحْمُومٍۢ
وَظِلٍّۢ
और साये में
مِّن
of
يَحْمُومٍۢ
सख़्त सियाह धुऐं के
और काले धुएँ की छाँव में,
तफ़्सीर:
और काले धुएँ की छाया में होंगे।
आयत 44
لَّا بَارِدٍۢ وَلَا كَرِيمٍ
لَّا
ना
بَارِدٍۢ
ठंडा
وَلَا
और ना
كَرِيمٍ
उम्दा
जो न ठंडी होगी और न उत्तम और लाभप्रद
तफ़्सीर:
जो न चलते हुए सुहावनी होगी और न अच्छा दिखने वाली होगी।
आयत 45
إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَبْلَ ذَٰلِكَ مُتْرَفِينَ
إِنَّهُمْ
बेशक वो
كَانُوا۟
थे वो
قَبْلَ
पहले
ذَٰلِكَ
इससे
مُتْرَفِينَ
ख़ुशहाल
वे इससे पहले सुख-सम्पन्न थे;
तफ़्सीर:
वे इस यातना तक पहुँचने से पहले, दुनिया की सुख-सुविधाओं का आनंद ले रहे थे, उन्हें अपनी इच्छाओं की पूर्ति के सिवा किसी चीज़ की परवाह नहीं थी।
आयत 46
وَكَانُوا۟ يُصِرُّونَ عَلَى ٱلْحِنثِ ٱلْعَظِيمِ
وَكَانُوا۟
और थे वो
يُصِرُّونَ
वो इसरार करते
عَلَى
in
ٱلْحِنثِ
गुनाह पर
ٱلْعَظِيمِ
बहुत बड़े
और बड़े गुनाह पर अड़े रहते थे
तफ़्सीर:
और वे अल्लाह का इनकार करने और उसे छोड़कर मूर्तियों की पूजा करने पर अड़े रहते थे।
आयत 47
وَكَانُوا۟ يَقُولُونَ أَئِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًۭا وَعِظَـٰمًا أَءِنَّا لَمَبْعُوثُونَ
وَكَانُوا۟
और थे वो
يَقُولُونَ
वो कहा करते
أَئِذَا
क्या जब
مِتْنَا
मर जाऐंगे हम
وَكُنَّا
और हो जाऐंगे हम
تُرَابًۭا
मिट्टी
وَعِظَـٰمًا
और हड्डियाँ
أَءِنَّا
क्या बेशक बम
لَمَبْعُوثُونَ
अलबत्ता दोबारा उठाए जाने वाले हैं
कहते थे, "क्या जब हम मर जाएँगे और मिट्टी और हड्डियाँ होकर रहे जाएँगे, तो क्या हम वास्तव में उठाए जाएँगे?
तफ़्सीर:
और वे मरने के बाद पुनः जीवित किए जाने का इनकार करते थे। चुनाँचे उसका मज़ाक उड़ाते हुए और उसे असंभव समझते हुए कहते थे : क्या जब हम मर जाएँगे तथा मिट्टी और सड़ी हुई हड्डियाँ बन जाएँगे, तो क्या हम उसके बाद फिर से जीवित करके उठाए जाएँगे?!
आयत 48
أَوَءَابَآؤُنَا ٱلْأَوَّلُونَ
أَوَءَابَآؤُنَا
क्या भला आबा ओ अजदाद हमारे
ٱلْأَوَّلُونَ
पहले (भी)
"और क्या हमारे पहले के बाप-दादा भी?"
तफ़्सीर:
और क्या हमारे पहले बाप-दादा भी उठाए जाएँगे, जो हमसे पहले मर गए?!
आयत 49
قُلْ إِنَّ ٱلْأَوَّلِينَ وَٱلْـَٔاخِرِينَ
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّ
बेशक
ٱلْأَوَّلِينَ
पहले
وَٱلْـَٔاخِرِينَ
और पिछले
कह दो, "निश्चय ही अगले और पिछले भी
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन पुनर्जीवन का इनकार करने वाले लोगों से कह दें : निःसंदेह अगले और पिछले (सभी) लोग।
आयत 50
لَمَجْمُوعُونَ إِلَىٰ مِيقَـٰتِ يَوْمٍۢ مَّعْلُومٍۢ
لَمَجْمُوعُونَ
अलबत्ता जमा किए जाने वाले हैं
إِلَىٰ
for
مِيقَـٰتِ
एक मुक़र्रर वक़्त पर
يَوْمٍۢ
(of) a Day
مَّعْلُومٍۢ
मालूम दिन के
एक नियत समय पर इकट्ठे कर दिए जाएँगे, जिसका दिन ज्ञात और नियत है
तफ़्सीर:
क़ियामत के दिन हिसाब और बदले के लिए निश्चित रूप से एकत्र किए जाएँगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
असहाबे-शिमाल (बाएं वालों) के अंजाम का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि गुनाहों पर मुसिर रहने वालों का अंजाम बहुत संगीन होगा, इससे डरना चाहिए।
आयत 51
ثُمَّ إِنَّكُمْ أَيُّهَا ٱلضَّآلُّونَ ٱلْمُكَذِّبُونَ
ثُمَّ
फिर
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
أَيُّهَا
ऐ
ٱلضَّآلُّونَ
गुमराहो
ٱلْمُكَذِّبُونَ
झुठलाने वालो
"फिर तुम ऐ गुमराहो, झुठलानेवालो!
तफ़्सीर:
फिर निःसंदेह (ऐ मरणोपरांत पुनः जीवित किए जाने का इनकार करने वालो! सीधे मार्ग से भटके हुए लोगो!) तुम निश्चय क़ियामत के दिन ज़क़्क़ूम (थूहड़) के वृक्ष का फल खाने वाले हो, जो कि सबसे बुरा और सबसे गंदा फल है।
आयत 52
لَـَٔاكِلُونَ مِن شَجَرٍۢ مِّن زَقُّومٍۢ
لَـَٔاكِلُونَ
अलबत्ता खाने वाले हो
مِن
from
شَجَرٍۢ
एक दरख़्त से
مِّن
of
زَقُّومٍۢ
ज़क़्क़ूम के
ज़क्कूम के वृक्ष में से खाओंगे;
तफ़्सीर:
फिर निःसंदेह (ऐ मरणोपरांत पुनः जीवित किए जाने का इनकार करने वालो! सीधे मार्ग से भटके हुए लोगो!) तुम निश्चय क़ियामत के दिन ज़क़्क़ूम (थूहड़) के वृक्ष का फल खाने वाले हो, जो कि सबसे बुरा और सबसे गंदा फल है।
आयत 53
فَمَالِـُٔونَ مِنْهَا ٱلْبُطُونَ
فَمَالِـُٔونَ
फिर भरने वाले हो
مِنْهَا
उससे
ٱلْبُطُونَ
पेटों को
"और उसी से पेट भरोगे;
तफ़्सीर:
फिर उस कड़वे पेड़ (के फल) से अपने खाली पेट भरने वाले हो।
आयत 54
فَشَـٰرِبُونَ عَلَيْهِ مِنَ ٱلْحَمِيمِ
فَشَـٰرِبُونَ
फिर पीने वाले हो
عَلَيْهِ
उस पर
مِنَ
[from]
ٱلْحَمِيمِ
खौलते पानी से
"और उसके ऊपर से खौलता हुआ पानी पीओगे;
तफ़्सीर:
फिर उसपर अत्यधिक गर्म (खौलता हुआ) पानी पीने वाले हो।
आयत 55
فَشَـٰرِبُونَ شُرْبَ ٱلْهِيمِ
فَشَـٰرِبُونَ
फिर पीने वाले हो
شُرْبَ
पीना
ٱلْهِيمِ
प्यासे ऊँट (जैसा)
"और तौस लगे ऊँट की तरह पीओगे।"
तफ़्सीर:
फिर उसे बहुत ज़्यादा पीने वाले हो, जिस तरह न बुझने वाले प्यास के रोग से पीड़ित ऊँट पीता चला जाता है।
आयत 56
هَـٰذَا نُزُلُهُمْ يَوْمَ ٱلدِّينِ
هَـٰذَا
ये होगी
نُزُلُهُمْ
महमानी उनकी
يَوْمَ
दिन
ٱلدِّينِ
बदले के
यह बदला दिए जाने के दिन उनका पहला सत्कार होगा
तफ़्सीर:
यह उल्लेख किया गया कड़वा भोजन और गर्म पानी उनका आतिथ्य है, जिसके साथ बदले के दिन उनका स्वागत किया जाएगा।
आयत 57
نَحْنُ خَلَقْنَـٰكُمْ فَلَوْلَا تُصَدِّقُونَ
نَحْنُ
हमने
خَلَقْنَـٰكُمْ
पैदा किया हमने तुम्हें
فَلَوْلَا
पस क्यों नहीं
تُصَدِّقُونَ
तुम तस्दीक़ करते
हमने तुम्हें पैदा किया; फिर तुम सच क्यों नहीं मानते?
तफ़्सीर:
हम ही ने (ऐ झुठलाने वालो!) तुम्हें पैदा किया, जबकि तुम कुछ नहीं थे। फिर तुम क्यों सच नहीं मानते कि हम तुम्हारी मृत्यु के बाद तुम्हें दोबारा जीवित करके उठाएँगे?!
आयत 58
أَفَرَءَيْتُم مَّا تُمْنُونَ
أَفَرَءَيْتُم
क्या भला देखा तुमने
مَّا
जो
تُمْنُونَ
मनी तुम टपकाते हो
तो क्या तुमने विचार किया जो चीज़ तुम टपकाते हो?
तफ़्सीर:
तो क्या (ऐ लोगो!) तुमने उस वीर्य पर विचार किया, जो तुम अपनी स्त्रियों के गर्भाशयों में टपकाते हो?!
आयत 59
ءَأَنتُمْ تَخْلُقُونَهُۥٓ أَمْ نَحْنُ ٱلْخَـٰلِقُونَ
ءَأَنتُمْ
क्या तुम
تَخْلُقُونَهُۥٓ
तुम पैदा करते हो उसे
أَمْ
या
نَحْنُ
हम हैं
ٱلْخَـٰلِقُونَ
पैदा करने वाले
क्या तुम उसे आकार देते हो, या हम है आकार देनेवाले?
तफ़्सीर:
क्या तुम उस वीर्य को पैदा करते हो या हम ही उसे पैदा करते हैं?!
आयत 60
نَحْنُ قَدَّرْنَا بَيْنَكُمُ ٱلْمَوْتَ وَمَا نَحْنُ بِمَسْبُوقِينَ
نَحْنُ
हमने
قَدَّرْنَا
मुक़द्दर किया हमने
بَيْنَكُمُ
दर्मियान तुम्हारे
ٱلْمَوْتَ
मौत को
وَمَا
और नहीं हैं
نَحْنُ
हम
بِمَسْبُوقِينَ
आजिज़
हमने तुम्हारे बीच मृत्यु को नियत किया है और हमारे बस से यह बाहर नहीं है
तफ़्सीर:
हम ही ने तुम्हारे बीच मृत्यु का समय निश्चित किया है। चुनाँचे तुममें से प्रत्येक व्यक्ति का एक निर्धारित समय है, जिससे वह न आगे बढ़ सकता है और न ही देर कर सकता है। और हम असमर्थ नहीं हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इंसान की तख्लीक पर दलील का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि जो अल्लाह हमें पहली बार बना सकता है, वह हमें दोबारा भी ज़िंदा कर सकता है।
आयत 61
عَلَىٰٓ أَن نُّبَدِّلَ أَمْثَـٰلَكُمْ وَنُنشِئَكُمْ فِى مَا لَا تَعْلَمُونَ
عَلَىٰٓ
इस पर
أَن
कि
نُّبَدِّلَ
हम बदल डालें
أَمْثَـٰلَكُمْ
तुम जैसों को
وَنُنشِئَكُمْ
और हम नए सिरे से पैदा करदें तुम्हें
فِى
in
مَا
ऐसी सूरत में जो
لَا
not
تَعْلَمُونَ
तुम नहीं जानते
कि हम तुम्हारे जैसों को बदल दें और तुम्हें ऐसी हालत में उठा खड़ा करें जिसे तुम जानते नहीं
तफ़्सीर:
कि हम तुम्हारी वर्तमान रचना और रूप को, जिसे तुम जानते हो, बदल दें और तुम्हें ऐसी रचना और रूप में पैदा कर दें, जिसे तुम नहीं जानते।
आयत 62
وَلَقَدْ عَلِمْتُمُ ٱلنَّشْأَةَ ٱلْأُولَىٰ فَلَوْلَا تَذَكَّرُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
عَلِمْتُمُ
जान लिया तुमने
ٱلنَّشْأَةَ
पैदाइश
ٱلْأُولَىٰ
पहली को
فَلَوْلَا
तो क्यों नहीं
تَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ते
तुम तो पहली पैदाइश को जान चुके हो, फिर तुम ध्यान क्यों नहीं देते?
तफ़्सीर:
निश्चय तुम तो यह जान चुके हो कि हमने तुम्हें पहली बार कैसे पैदा किया, फिर तुम विचार क्यों नहीं करते और जानते कि जिसने तुम्हें पहली बार पैदा किया है, वह तुम्हारी मृत्यु के बाद तुम्हें पुनर्जीवित करने में सक्षम है?!
आयत 63
أَفَرَءَيْتُم مَّا تَحْرُثُونَ
أَفَرَءَيْتُم
क्या भला देखा तुमने
مَّا
जो
تَحْرُثُونَ
तुम बोते हो
फिर क्या तुमने देखा तो कुछ तुम खेती करते हो?
तफ़्सीर:
फिर क्या तुमने उस बीज पर विचार किया जो तुम धरती में डालते हो?!
आयत 64
ءَأَنتُمْ تَزْرَعُونَهُۥٓ أَمْ نَحْنُ ٱلزَّٰرِعُونَ
ءَأَنتُمْ
क्या तुम
تَزْرَعُونَهُۥٓ
उगाते हो उसे
أَمْ
या
نَحْنُ
हम हैं
ٱلزَّٰرِعُونَ
उगाने वाले
क्या उसे तुम उगाते हो या हम उसे उगाते है?
तफ़्सीर:
क्या तुम उस बीज को उगाते हो, या हम ही हैं जो उसे उगाते हैं?!
आयत 65
لَوْ نَشَآءُ لَجَعَلْنَـٰهُ حُطَـٰمًۭا فَظَلْتُمْ تَفَكَّهُونَ
لَوْ
अगर
نَشَآءُ
हम चाहें
لَجَعَلْنَـٰهُ
अलबत्ता कर दें हम उसे
حُطَـٰمًۭا
चूरा-चूरा
فَظَلْتُمْ
तो रह जाओ तुम
تَفَكَّهُونَ
तुम बातें बनाते
यदि हम चाहें तो उसे चूर-चूर कर दें। फिर तुम बातें बनाते रह जाओ
तफ़्सीर:
यदि हम उस खेती को चूर-चूर करना चाहें, तो उसके पकने और काटे जाने के निकट होने के बाद, अवश्य उसे चूर-चूर कर दें। फिर उसके बाद तुम उसे पहुँचने वाली आपदा पर आश्चर्य करते रह जाओ।
आयत 66
إِنَّا لَمُغْرَمُونَ
إِنَّا
बेशक हम
لَمُغْرَمُونَ
अलबत्ता तावान डाले गए हैं
कि "हमपर उलटा डाँड पड़ गया,
तफ़्सीर:
तुम कहने लगो : हमने जो कुछ खर्च किया था, उसकी हानि के द्वारा हमें दंडित किया गया है।
आयत 67
بَلْ نَحْنُ مَحْرُومُونَ
بَلْ
बल्कि
نَحْنُ
हम तो
مَحْرُومُونَ
महरूम कर दिए गए हैं
बल्कि हम वंचित होकर रह गए!"
तफ़्सीर:
बल्कि हम रोज़ी से वंचित कर दिए गए हैं।
आयत 68
أَفَرَءَيْتُمُ ٱلْمَآءَ ٱلَّذِى تَشْرَبُونَ
أَفَرَءَيْتُمُ
क्या भला देखा तुमने
ٱلْمَآءَ
पानी को
ٱلَّذِى
वो जो
تَشْرَبُونَ
तुम पीते हो
फिर क्या तुमने उस पानी को देखा जिसे तुम पीते हो?
तफ़्सीर:
फिर क्या तुमने उस पानी पर विचार किया, जो तुम प्यास लगने पर पीते हो?!
आयत 69
ءَأَنتُمْ أَنزَلْتُمُوهُ مِنَ ٱلْمُزْنِ أَمْ نَحْنُ ٱلْمُنزِلُونَ
ءَأَنتُمْ
क्या तुम
أَنزَلْتُمُوهُ
उतारते हो तुम उसे
مِنَ
from
ٱلْمُزْنِ
बादल से
أَمْ
या
نَحْنُ
हम हैं
ٱلْمُنزِلُونَ
उतारने वाले
क्या उसे बादलों से तुमने पानी बरसाया या बरसानेवाले हम है?
तफ़्सीर:
क्या तुमने उसे आसमान में बादलों से उतारा है, या हम ही ने उसे उतारा है?!
आयत 70
لَوْ نَشَآءُ جَعَلْنَـٰهُ أُجَاجًۭا فَلَوْلَا تَشْكُرُونَ
لَوْ
अगर
نَشَآءُ
हम चाहें
جَعَلْنَـٰهُ
बनादें हम उसे
أُجَاجًۭا
सख़्त खारा
فَلَوْلَا
पस क्यों नहीं
تَشْكُرُونَ
तुम शुक्र करते
यदि हम चाहें तो उसे अत्यन्त खारा बनाकर रख दें। फिर तुम कृतज्ञता क्यों नहीं दिखाते?
तफ़्सीर:
अगर हम उस पानी को अत्यंत खारा बनाना चाहें कि वह पीने या पानी देने के काम न आए, तो हम उसे अत्यंत खारा बना दें। फिर तुम अल्लाह का शुक्र अदा क्यों नहीं करते कि उसने तुमपर दया करते हुए मीठा पानी उतारा है?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
खेती और पानी की नेमत का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि खाना उगाना और पानी बरसाना दोनों अल्लाह के इख्तियार में हैं, इंसान सिर्फ ज़रिया है, इस पर गौर करना चाहिए।
आयत 71
أَفَرَءَيْتُمُ ٱلنَّارَ ٱلَّتِى تُورُونَ
أَفَرَءَيْتُمُ
क्या फिर देखा तुमने
ٱلنَّارَ
आग को
ٱلَّتِى
वो जो
تُورُونَ
तुम सुलगाते हो
फिर क्या तुमने उस आग को देखा जिसे तुम सुलगाते हो?
तफ़्सीर:
फिर क्या तुमने उस आग पर विचार किया जिसे तुम अपने फायदे के लिए जलाते हो?!
आयत 72
ءَأَنتُمْ أَنشَأْتُمْ شَجَرَتَهَآ أَمْ نَحْنُ ٱلْمُنشِـُٔونَ
ءَأَنتُمْ
क्या तुमने
أَنشَأْتُمْ
पैदा किया तुमने
شَجَرَتَهَآ
दरख़्त उसका
أَمْ
या
نَحْنُ
हम हैं
ٱلْمُنشِـُٔونَ
पैदा करने वाले
क्या तुमने उसके वृक्ष को पैदा किया है या पैदा करनेवाले हम है?
तफ़्सीर:
क्या तुमने उस पेड़ को पैदा किया है, जिससे आग जलाई जाती है, या हम ही ने उसे तुमपर दया के स्वरूप पैदा किया है?!
आयत 73
نَحْنُ جَعَلْنَـٰهَا تَذْكِرَةًۭ وَمَتَـٰعًۭا لِّلْمُقْوِينَ
نَحْنُ
हमने
جَعَلْنَـٰهَا
बनाया हमने उसे
تَذْكِرَةًۭ
एक नसीहत
وَمَتَـٰعًۭا
और फ़ायदे की चीज़
لِّلْمُقْوِينَ
मुसाफ़िरों के लिए
हमने उसे एक अनुस्मृति और मरुभुमि के मुसाफ़िरों और ज़रूरतमन्दों के लिए लाभप्रद बनाया
तफ़्सीर:
हमने इस आग को तुम्हारे लिए आख़िरत की आग की याद दिलाने के लिए एक अनुस्मारक बना दिया है, तथा हमने इसे तुम्हारे यात्रियों के लिए एक लाभ बना दिया है।
आयत 74
فَسَبِّحْ بِٱسْمِ رَبِّكَ ٱلْعَظِيمِ
فَسَبِّحْ
पस तस्बीह कीजिए
بِٱسْمِ
नाम की
رَبِّكَ
अपने रब की
ٱلْعَظِيمِ
जो निहायत अज़मत वाला है
अतः तुम अपने महान रब के नाम की तसबीह करो
तफ़्सीर:
अतः (ऐ रसूल) आप अपने महान पालनहार को उन चीज़ों से पवित्र ठहराएँ , जो उसके योग्य नहीं हैं।
आयत 75
۞ فَلَآ أُقْسِمُ بِمَوَٰقِعِ ٱلنُّجُومِ
۞ فَلَآ
पस नहीं
أُقْسِمُ
मैं क़सम खाता हूँ
بِمَوَٰقِعِ
गिरने की जगहों की
ٱلنُّجُومِ
सितारों के
अतः नहीं! मैं क़समों खाता हूँ सितारों की स्थितियों की -
तफ़्सीर:
अल्लाह ने सितारों के स्थानों और उनके गिरने की जगहों की क़सम खाई है।
आयत 76
وَإِنَّهُۥ لَقَسَمٌۭ لَّوْ تَعْلَمُونَ عَظِيمٌ
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
لَقَسَمٌۭ
अलबत्ता क़सम है
لَّوْ
अगर
تَعْلَمُونَ
तुम जानते हो
عَظِيمٌ
बहुत बड़ी
और यह बहुत बड़ी गवाही है, यदि तुम जानो -
तफ़्सीर:
और निःसंदेह इन स्थानों की क़सम खाना (यदि तुम उसकी महानता जानते हो) बहुत बड़ी बात है; क्योंकि इनके अंदर अनगिनत निशानियाँ और पाठ मौजूद हैं।
आयत 77
إِنَّهُۥ لَقُرْءَانٌۭ كَرِيمٌۭ
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَقُرْءَانٌۭ
यक़ीनन क़ुरआन है
كَرِيمٌۭ
इज़्ज़त वाला
निश्चय ही यह प्रतिष्ठित क़ुरआन है
तफ़्सीर:
निश्चय (ऐ लोगो!) तुम्हारे सामने पढ़ा जाने वाला यह क़ुरआन, एक सम्मानित एवं प्रतिष्ठित क़ुरआन है। क्योंकि इसमें महान लाभ निहित हैं।
आयत 78
فِى كِتَـٰبٍۢ مَّكْنُونٍۢ
فِى
In
كِتَـٰبٍۢ
एक किताब में
مَّكْنُونٍۢ
महफ़ूज़
एक सुरक्षित किताब में अंकित है।
तफ़्सीर:
एक ऐसी किताब में अंकित है, जो लोगों की निगाहों से सुरक्षित है। और वह 'लौहे महफ़ूज़' है।
आयत 79
لَّا يَمَسُّهُۥٓ إِلَّا ٱلْمُطَهَّرُونَ
لَّا
None
يَمَسُّهُۥٓ
नहीं छूते उसे
إِلَّا
मगर
ٱلْمُطَهَّرُونَ
जो बहुत पाक हैं
उसे केवल पाक-साफ़ व्यक्ति ही हाथ लगाते है
तफ़्सीर:
उसे केवल वे फरिशते छूते हैं, जो गुनाहों और दोषों से पवित्र किए गए हैं।
आयत 80
تَنزِيلٌۭ مِّن رَّبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
تَنزِيلٌۭ
नाज़िल करदा है
مِّن
from
رَّبِّ
रब की तरफ़ से
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों के
उसका अवतरण सारे संसार के रब की ओर से है।
तफ़्सीर:
यह सारी सृष्टि के पालनहार की ओर से उसके नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर उतारा गया है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
आग और कुरआन की इज़्ज़त का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि कुरआन को पाकीज़गी और अदब के साथ छूना और पढ़ना चाहिए।
आयत 81
أَفَبِهَـٰذَا ٱلْحَدِيثِ أَنتُم مُّدْهِنُونَ
أَفَبِهَـٰذَا
क्या भला इस
ٱلْحَدِيثِ
बात से
أَنتُم
तुम
مُّدْهِنُونَ
बेपरवाई करने वाले हो
फिर क्या तुम उस वाणी के प्रति उपेक्षा दर्शाते हो?
तफ़्सीर:
तो फिर क्या (ऐ मुश्रिको!) तुम इस वाणी को झुठलाने वाले हो, उसकी पुष्टि करने वाले नहीं हो?!
आयत 82
وَتَجْعَلُونَ رِزْقَكُمْ أَنَّكُمْ تُكَذِّبُونَ
وَتَجْعَلُونَ
और तुम बनाते हो
رِزْقَكُمْ
हिस्सा अपना
أَنَّكُمْ
ये कि तुम
تُكَذِّبُونَ
तुम झुठलाते हो
और तुम इसको अपनी वृत्ति बना रहे हो कि झुठलाते हो?
तफ़्सीर:
और तुम अल्लाह की दी हुई नेमतों पर उसका शुक्र इस तरह अदा करते हो कि उन्हें झुठला देते हो। इसलिए बारिश का श्रेय नक्षत्र को देते हो और कहते हो : हमपर अमुक और अमुक नक्षत्र के कारण बारिश हुई?!
आयत 83
فَلَوْلَآ إِذَا بَلَغَتِ ٱلْحُلْقُومَ
فَلَوْلَآ
पस क्यों नहीं
إِذَا
जब
بَلَغَتِ
पहुँच जाती है (जान)
ٱلْحُلْقُومَ
हलक़ को
फिर ऐसा क्यों नहीं होता, जबकि प्राण कंठ को आ लगते है
तफ़्सीर:
फिर क्यों नहीं जब रूह (आत्मा) गले को पहुँचती है।
आयत 84
وَأَنتُمْ حِينَئِذٍۢ تَنظُرُونَ
وَأَنتُمْ
और तुम
حِينَئِذٍۢ
उस वक़्त
تَنظُرُونَ
तुम देख रहे होते हो
और उस समय तुम देख रहे होते हो -
तफ़्सीर:
और उस समय तुम अपने सामने मरने वाले को देख रहे होते हो।
आयत 85
وَنَحْنُ أَقْرَبُ إِلَيْهِ مِنكُمْ وَلَـٰكِن لَّا تُبْصِرُونَ
وَنَحْنُ
और हम
أَقْرَبُ
ज़्यादा क़रीब होते हैं
إِلَيْهِ
उसके
مِنكُمْ
तुम से
وَلَـٰكِن
और लेकिन
لَّا
नहीं
تُبْصِرُونَ
तुम देखते
और हम तुम्हारी अपेक्षा उससे अधिक निकट होते है। किन्तु तुम देखते नहीं –
तफ़्सीर:
और हम अपने ज्ञान और सामर्थ्य से और अपने फ़रिश्तों के माध्यम से, तुम्हारे मरने वाले के तुमसे अधिक निकट होते हैं, लेकिन तुम इन फ़रिश्तों को नहीं देखते।
आयत 86
فَلَوْلَآ إِن كُنتُمْ غَيْرَ مَدِينِينَ
فَلَوْلَآ
पस क्यों नहीं
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
غَيْرَ
not
مَدِينِينَ
नहीं बदला दिए जाने वाले
फिर ऐसा क्यों नहीं होता कि यदि तुम अधीन नहीं हो
तफ़्सीर:
फिर क्यों नहीं (यदि तुम, अपने दावे के अनुसार, अपने कर्मों का बदला दिए जाने के लिए उठाए जाने वाले नहीं हो)
आयत 87
تَرْجِعُونَهَآ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
تَرْجِعُونَهَآ
तुम लौटाते उसे
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
तो उसे (प्राण को) लौटा दो, यदि तुम सच्चे हो
तफ़्सीर:
इस आत्मा को वापस ले आते, जो तुम्हारे मरने वाले के शरीर से निकली है, यदि तुम सच्चे हो?! हालाँकि तुम ऐसा नहीं कर सकते।
आयत 88
فَأَمَّآ إِن كَانَ مِنَ ٱلْمُقَرَّبِينَ
فَأَمَّآ
पस लेकिन
إِن
अगर
كَانَ
है वो
مِنَ
of
ٱلْمُقَرَّبِينَ
मुक़र्रबीन में से
फिर यदि वह (अल्लाह के) निकटवर्तियों में से है;
तफ़्सीर:
फिर अगर वह मरने वाला व्यक्ति अच्छे कामों में पहल करने वालों में से है।
आयत 89
فَرَوْحٌۭ وَرَيْحَانٌۭ وَجَنَّتُ نَعِيمٍۢ
فَرَوْحٌۭ
तो राहत है
وَرَيْحَانٌۭ
और उम्दा रिज़्क़ है
وَجَنَّتُ
और जन्नत
نَعِيمٍۢ
नेअमतों वाली
तो (उसके लिए) आराम, सुख-सामग्री और सुगंध है, और नेमतवाला बाग़ है
तफ़्सीर:
तो उसके लिए ऐसा आराम जिसके बाद कोई थकान नहीं, उत्तम रोज़ी और दया है, तथा उसके लिए ऐसी जन्नत है, जिसमें वह अपनी मनचाही चीज़ों का आनंद लेगा।
आयत 90
وَأَمَّآ إِن كَانَ مِنْ أَصْحَـٰبِ ٱلْيَمِينِ
وَأَمَّآ
और लेकिन
إِن
अगर
كَانَ
है वो
مِنْ
of
أَصْحَـٰبِ
(the) companions
ٱلْيَمِينِ
दाऐं जानिब वालों में से
और यदि वह भाग्यशालियों में से है,
तफ़्सीर:
और अगर वह मृतक दाहिने हाथ वालों में से है, तो उनकी चिंता न करें। क्योंकि उनके लिए सुरक्षा और शांति है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मौत के वक्त के मंज़र का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि मौत के वक्त हर इंसान की असली हैसियत ज़ाहिर हो जाती है, इसलिए इसकी तैयारी पहले से करनी चाहिए।
आयत 91
فَسَلَـٰمٌۭ لَّكَ مِنْ أَصْحَـٰبِ ٱلْيَمِينِ
فَسَلَـٰمٌۭ
तो सलाम है
لَّكَ
तेरे लिए
مِنْ
[from]
أَصْحَـٰبِ
(the) companions
ٱلْيَمِينِ
(कि तुम)दाऐं जानिब वालों में से हो
तो "सलाम है तुम्हें कि तुम सौभाग्यशाली में से हो।"
तफ़्सीर:
और अगर वह मृतक दाहिने हाथ वालों में से है, तो उनकी चिंता न करें। क्योंकि उनके लिए सुरक्षा और शांति है।
आयत 92
وَأَمَّآ إِن كَانَ مِنَ ٱلْمُكَذِّبِينَ ٱلضَّآلِّينَ
وَأَمَّآ
और लेकिन
إِن
अगर
كَانَ
है वो
مِنَ
of
ٱلْمُكَذِّبِينَ
झुठलाने वालों में से
ٱلضَّآلِّينَ
गुमराह लोगों में से
किन्तु यदि वह झुठलानेवालों, गुमराहों में से है;
तफ़्सीर:
और अगर वह मृतक अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लाए हुए धर्म को झुठलाने वालों और सीधे मार्ग से भटके हुए लोगों में से है।
आयत 93
فَنُزُلٌۭ مِّنْ حَمِيمٍۢ
فَنُزُلٌۭ
तो महमानी है
مِّنْ
of
حَمِيمٍۢ
खौलते पानी से
तो उसका पहला सत्कार खौलते हुए पानी से होगा
तफ़्सीर:
तो उसका आतिथ्य जिसके साथ उसका स्वागत किया जाएगा, अत्यंत गर्म पानी है।
आयत 94
وَتَصْلِيَةُ جَحِيمٍ
وَتَصْلِيَةُ
और जलना है
جَحِيمٍ
जहन्नम में
फिर भड़कती हुई आग में उन्हें झोंका जाना है
तफ़्सीर:
और उसे जहन्नम की आग में जलना है।
आयत 95
إِنَّ هَـٰذَا لَهُوَ حَقُّ ٱلْيَقِينِ
إِنَّ
बेशक
هَـٰذَا
ये
لَهُوَ
अलबत्ता वो ही है
حَقُّ
जो हक़ है
ٱلْيَقِينِ
यक़ीनी
निस्संदेह यही विश्वसनीय सत्य है
तफ़्सीर:
निःसंदेह यह जो हमने (ऐ रसूल!) आपके सामने बयान किया है, यही निश्चित सत्य है, जो निर्विवाद एवं संदेह रहित है।
आयत 96
فَسَبِّحْ بِٱسْمِ رَبِّكَ ٱلْعَظِيمِ
فَسَبِّحْ
पस तस्बीह कीजिए
بِٱسْمِ
नाम की
رَبِّكَ
अपने रब की
ٱلْعَظِيمِ
जो निहायत अज़मत वाला है
अतः तुम अपने महान रब की तसबीह करो
तफ़्सीर:
अतः आप अपने महान रब के नाम की पवित्रता का गुणगान कीजिए तथा उसे हर प्रकार के दोषों और त्रुटियों से पाक ठहराईये।
आज की ज़िंदगी में सबक़
तीन गिरोहों के आखिरी अंजाम के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि यकीन (मौत, कयामत) की तस्दीक करने वाले ही असली कामयाब हैं, इस पर पूरा भरोसा रखना चाहिए।
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