नाम का मतलब
जमा होना / जिलावतन होना (बनी नज़ीर यहूदी कबीले के मदीने से निकाले जाने से)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-हश्र बनी नज़ीर यहूदी कबीले के मदीने से जिलावतन (निकाले) किए जाने के वाकिये पर नाज़िल हुई। इसके आखिर में अल्लाह के खूबसूरत नामों का तफ्सीली ज़िक्र है।
फ़ज़ीलत / सार
इस सूरह के आखिर में अल्लाह के कई खूबसूरत नाम एक साथ बयान हुए हैं, जिनकी तिलावत दिल को खास सुकून देती है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ سَبَّحَ لِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ ۖ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
سَبَّحَ
तस्बीह की है
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
مَا
उस चीज़ ने जो
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में है
وَمَا
और जो
فِى
(is) in
ٱلْأَرْضِ ۖ
ज़मीन में है
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिकमत वाला
अल्लाह की तसबीह की है हर उस चीज़ ने जो आकाशों और धरती में है, और वही प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
आकाशों में और धरती पर जो भी प्राणी हैं, सब अल्लाह की महानता का वर्णन करते हैं तथा हर उस चीज़ से उसे पवित्र ठहराते हैं, जो उसकी महिमा के योग्य नहीं है। तथा वह प्रभुत्वशाली है, जिसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता, अपनी रचना, शरीयत और निर्णय (तक़दीर) में हिकमत वाला है।
आयत 2
هُوَ ٱلَّذِىٓ أَخْرَجَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ مِن دِيَـٰرِهِمْ لِأَوَّلِ ٱلْحَشْرِ ۚ مَا ظَنَنتُمْ أَن يَخْرُجُوا۟ ۖ وَظَنُّوٓا۟ أَنَّهُم مَّانِعَتُهُمْ حُصُونُهُم مِّنَ ٱللَّهِ فَأَتَىٰهُمُ ٱللَّهُ مِنْ حَيْثُ لَمْ يَحْتَسِبُوا۟ ۖ وَقَذَفَ فِى قُلُوبِهِمُ ٱلرُّعْبَ ۚ يُخْرِبُونَ بُيُوتَهُم بِأَيْدِيهِمْ وَأَيْدِى ٱلْمُؤْمِنِينَ فَٱعْتَبِرُوا۟ يَـٰٓأُو۟لِى ٱلْأَبْصَـٰرِ
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِىٓ
जिसने
أَخْرَجَ
निकाल दिया
ٱلَّذِينَ
उन लोगों को जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
مِنْ
from
أَهْلِ
(the) People
ٱلْكِتَـٰبِ
एहले किताब में से
مِن
from
دِيَـٰرِهِمْ
उनके घरों से
لِأَوَّلِ
at (the) first
ٱلْحَشْرِ ۚ
पहले हशर /इकट्ठ में
مَا
नहीं
ظَنَنتُمْ
गुमान किया तुमने
أَن
कि
يَخْرُجُوا۟ ۖ
वो निकल जाऐंगे
وَظَنُّوٓا۟
और वो समझ रहे थे
أَنَّهُم
कि बेशक वो
مَّانِعَتُهُمْ
बचाने वाले हैं उन्हें
حُصُونُهُم
क़िले उनके
مِّنَ
against
ٱللَّهِ
अल्लाह से
فَأَتَىٰهُمُ
पस आया उनके पास
ٱللَّهُ
अल्लाह
مِنْ
from
حَيْثُ
जहाँ से
لَمْ
नहीं
يَحْتَسِبُوا۟ ۖ
उन्होंने गुमान किया
وَقَذَفَ
और उसने डाल दिया
فِى
into
قُلُوبِهِمُ
उनके दिलों में
ٱلرُّعْبَ ۚ
रोब
يُخْرِبُونَ
वो बरबाद कर रहे थे
بُيُوتَهُم
अपने घरों को
بِأَيْدِيهِمْ
अपने हाथों से
وَأَيْدِى
और हाथों से
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों के
فَٱعْتَبِرُوا۟
पस इब्रत पकड़ो
يَـٰٓأُو۟لِى
O those endowed
ٱلْأَبْصَـٰرِ
ऐ आँखों वालो
वही है जिसने किताबवालों में से उन लोगों को जिन्होंने इनकार किया, उनके घरों से पहले ही जमावड़े में निकल बाहर किया। तुम्हें गुमान न था कि उनकी गढ़ियाँ अल्लाह से उन्हें बचा लेंगी। किन्तु अल्लाह उनपर वहाँ से आया जिसका उन्हें गुमान भी न था। और उसने उनके दिलों में रोब डाल दिया कि वे अपने घरों को स्वयं अपने हाथों और ईमानवालों के हाथों भी उजाड़ने लगे। अतः शिक्षा ग्रहण करो, ऐ दृष्टि रखनेवालो!
तफ़्सीर:
वही है, जिसने अल्लाह के साथ कुफ़्र करने और उसके रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को झुठलाने वाले बनी नज़ीर को, मदीना में स्थित उनके घरों से, मदीना से शाम (लेवांत) की ओर उनके पहले ही देश-निकाला के समय निष्कासित कर दिया। ये तौरात वाले यहूदियों में से थे। यह उनके अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ देने और उसपर मुश्रिकों के साथ हो जाने के बाद हुआ। अल्लाह ने उन्हें शाम की ओर निकाल दिया। जबकि वे इस क़दर शक्तिशाली और ताक़तवर थे कि तुमने (ऐ मोमिनो!) सोचा भी नहीं था कि उन्हें कभी अपने घरों से निकलना पड़ेगा। और वे खुद भी समझ रहे थे कि उनके बनाए हुए क़िले उन्हें अल्लाह की पकड़ और यातना से बचा लेंगे। लेकिन अल्लाह की पकड़ उनके पास वहाँ से आई, जहाँ से आने का उन्हें अनुमान नहीं था। चुनाँचे अल्लाह ने अपने रसूल को उनसे युद्ध करने और उन्हें उनके घरों से निकाल बाहर करने का आदेश दे दिया। साथ ही अल्लाह ने उनके दिलों में अत्यधिक भय डाल दिया। वे अपने घरों को अंदर से अपने ही हाथों से विध्वंस कर रहे थे, ताकि मुसलमान उनसे लाभ न उठा सकें तथा मुसलमान उन्हें बाहर से विध्वंस कर रहे थे। अतः ऐ समझ-बूझ रखने वालो! इन लोगों को इनके कुफ़्र के कारण जिस चीज़ का सामना करना पड़ा, उससे सीख ग्रहण करो। इसलिए उनकी तरह मत बनो, अन्यथा उन्हीं के जैसे बदले और सज़ा का सामना करना पड़ेगा।
आयत 3
وَلَوْلَآ أَن كَتَبَ ٱللَّهُ عَلَيْهِمُ ٱلْجَلَآءَ لَعَذَّبَهُمْ فِى ٱلدُّنْيَا ۖ وَلَهُمْ فِى ٱلْـَٔاخِرَةِ عَذَابُ ٱلنَّارِ
وَلَوْلَآ
और अगर ना होती
أَن
ये बात कि
كَتَبَ
लिख दी
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَيْهِمُ
उन पर
ٱلْجَلَآءَ
जिला वतनी
لَعَذَّبَهُمْ
अलबत्ता वो अज़ाब देता उन्हें
فِى
in
ٱلدُّنْيَا ۖ
दुनिया में
وَلَهُمْ
और उनके लिए
فِى
in
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत में
عَذَابُ
अज़ाब है
ٱلنَّارِ
आग का
यदि अल्लाह ने उनके लिए देश निकाला न लिख दिया होता तो दुनिया में ही वह उन्हें अवश्य यातना दे देता, और आख़िरत में तो उनके लिए आग की यातना है ही
तफ़्सीर:
और अगर अल्लाह ने उनपर उन्हें उनके घरों से बाहर निकाल दिया जाना न लिख दिया होता, तो निश्चय वह दुनिया में उन्हें क़त्ल और क़ैद की सज़ा देता, और उनके लिए आख़िरत में आग की यातना है, जो उनकी प्रतीक्षा कर रही है, जिसमें वे हमेशा के लिए रहेंगे।
आयत 4
ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ شَآقُّوا۟ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ ۖ وَمَن يُشَآقِّ ٱللَّهَ فَإِنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلْعِقَابِ
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّهُمْ
बवजह उसके कि वो
شَآقُّوا۟
उन्होंने मुख़ालिफ़त की
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَرَسُولَهُۥ ۖ
और उसके रसूल की
وَمَن
और जो
يُشَآقِّ
मुख़ालिफ़त करेगा
ٱللَّهَ
अल्लाह की
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
شَدِيدُ
सख़्त
ٱلْعِقَابِ
सज़ा वाला है
यह इसलिए कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का मुक़ाला करने की कोशिश की। और जो कोई अल्लाह का मुक़ाबला करता है तो निश्चय ही अल्लाह की यातना बहुत कठोर है
तफ़्सीर:
यह जो उनके साथ हुआ, वह इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने कुफ़्र करके और प्रतिज्ञाएँ तोड़कर अल्लाह का विरोध किया और उसके रसूल का विरोध किया। और जो अल्लाह का विरोध करे, तो अल्लाह बहुत कड़ी सज़ा देने वाला है। इसलिए उसे उसकी कड़ी सज़ा मिलकर रहेगी।
आयत 5
مَا قَطَعْتُم مِّن لِّينَةٍ أَوْ تَرَكْتُمُوهَا قَآئِمَةً عَلَىٰٓ أُصُولِهَا فَبِإِذْنِ ٱللَّهِ وَلِيُخْزِىَ ٱلْفَـٰسِقِينَ
مَا
जो भी
قَطَعْتُم
काटा तुमने
مِّن
of
لِّينَةٍ
खजूर का दरख़्त
أَوْ
या
تَرَكْتُمُوهَا
छोड़ दिया तुमने उसे
قَآئِمَةً
खड़ा
عَلَىٰٓ
on
أُصُولِهَا
उसकी जड़ों पर
فَبِإِذْنِ
it (was) by the permission
ٱللَّهِ
तो अल्लाह के इज़्न से था
وَلِيُخْزِىَ
और ताकि वो रुस्वा करे
ٱلْفَـٰسِقِينَ
फ़ासिक़ों को
तुमने खजूर के जो वृक्ष काटे या उन्हें उनकी जड़ों पर खड़ा छोड़ दिया तो यह अल्लाह ही की अनुज्ञा से हुआ (ताकि ईमानवालों के लिए आसानी पैदा करे) और इसलिए कि वह अवज्ञाकारियों को रुसवा करे
तफ़्सीर:
तुमने (ऐ मोमिनो के समुदाय) बनी नज़ीर के युद्ध के दौरान, अल्लाह के दुश्मनों को भड़काने के लिए जो भी खजूर के पेड़ काटे या जो पेड़ उनके तनों पर खड़े छोड़ दिए ताकि उनसे लाभ उठाओ, वह अल्लाह के आदेश से था। वह धरती में बिगाड़ पैदा करना नहीं था, जैसा कि उन्होंने दावा किया है। यह सब इसलिए हुआ ताकि अल्लाह अपनी अवज्ञा से निकल जाने वाले उन यहूदियों को अपमानित करे, जिन्होंने वचन तोड़ा और वफादारी के रास्ते को त्यागकर विश्वासघात का रास्ता चुना।
आयत 6
وَمَآ أَفَآءَ ٱللَّهُ عَلَىٰ رَسُولِهِۦ مِنْهُمْ فَمَآ أَوْجَفْتُمْ عَلَيْهِ مِنْ خَيْلٍۢ وَلَا رِكَابٍۢ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ يُسَلِّطُ رُسُلَهُۥ عَلَىٰ مَن يَشَآءُ ۚ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ
وَمَآ
और जो
أَفَآءَ
लौटाया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَىٰ
to
رَسُولِهِۦ
अपने रसूल पर
مِنْهُمْ
उनमें से
فَمَآ
पस नहीं
أَوْجَفْتُمْ
दौड़ाए तुमने
عَلَيْهِ
उस पर
مِنْ
of
خَيْلٍۢ
कोई घोड़े
وَلَا
और ना
رِكَابٍۢ
ऊँट
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
ٱللَّهَ
अल्लाह
يُسَلِّطُ
वो मुसल्लत करता है
رُسُلَهُۥ
अपने रसूलों को
عَلَىٰ
ऊपर
مَن
जिसके
يَشَآءُ ۚ
वो चाहता है
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌۭ
ख़ूब क़ुदरत रखने वाला है
और अल्लाह ने उनसे लेकर अपने रसूल की ओर जो कुछ पलटाया, उसके लिए न तो तुमने घोड़े दौड़ाए और न ऊँट। किन्तु अल्लाह अपने रसूलों को जिसपर चाहता है प्रभुत्व प्रदान कर देता है। अल्लाह को तो हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्ति है
तफ़्सीर:
और अल्लाह ने बनी नज़ीर की संपत्ति में से अपने रसूल को जो कुछ दिया, तो उसे पाने के लिए तुमने घोड़े और ऊँट नहीं दौड़ाए और तुम्हें उसके लिए कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा। लेकिन अल्लाह अपने रसूल को जिसपर चाहता है, प्रभुत्व प्रदान कर देता है। चुनाँचे उसने अपने रसूल को बनी नज़ीर पर प्रभुत्व प्रदान कर दिया। इसलिए आपने बिना युद्ध किए उनके नगर पर विजय प्राप्त कर ली। और अल्लाह हर चीज़ का सामर्थ्य रखता है। उसे कोई चीज़ विवश नहीं कर सकती।
आयत 7
مَّآ أَفَآءَ ٱللَّهُ عَلَىٰ رَسُولِهِۦ مِنْ أَهْلِ ٱلْقُرَىٰ فَلِلَّهِ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِى ٱلْقُرْبَىٰ وَٱلْيَتَـٰمَىٰ وَٱلْمَسَـٰكِينِ وَٱبْنِ ٱلسَّبِيلِ كَىْ لَا يَكُونَ دُولَةًۢ بَيْنَ ٱلْأَغْنِيَآءِ مِنكُمْ ۚ وَمَآ ءَاتَىٰكُمُ ٱلرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَىٰكُمْ عَنْهُ فَٱنتَهُوا۟ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلْعِقَابِ
مَّآ
जो
أَفَآءَ
लौटाया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَىٰ
to
رَسُولِهِۦ
अपने रसूल पर
مِنْ
from
أَهْلِ
(the) people
ٱلْقُرَىٰ
बस्ती वालों में से
فَلِلَّهِ
पस अल्लाह के लिए है
وَلِلرَّسُولِ
और रसूल के लिए
وَلِذِى
and for those
ٱلْقُرْبَىٰ
और क़राबतदारों के लिए
وَٱلْيَتَـٰمَىٰ
और यतीमों
وَٱلْمَسَـٰكِينِ
और मिसकीनों
وَٱبْنِ
and
ٱلسَّبِيلِ
और मुसाफ़िरों के लिए
كَىْ
that
لَا
ताकि ना
يَكُونَ
हो वो
دُولَةًۢ
गर्दिश करने वाला
بَيْنَ
दर्मियान
ٱلْأَغْنِيَآءِ
दौलतमन्दों के
مِنكُمْ ۚ
तुम में से
وَمَآ
और जो
ءَاتَىٰكُمُ
दें तुम्हें
ٱلرَّسُولُ
रसूल
فَخُذُوهُ
पस ले लो उसे
وَمَا
और जिस चीज़ से
نَهَىٰكُمْ
वो रोकें तुम्हें
عَنْهُ
उससे
فَٱنتَهُوا۟ ۚ
पस रुक जाओ
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ ۖ
अल्लाह से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
شَدِيدُ
सख़्त
ٱلْعِقَابِ
सज़ा वाला है
जो कुछ अल्लाह ने अपने रसूल की ओर बस्तियोंवालों से लेकर पलटाया वह अल्लाह और रसूल और (मुहताज) नातेदार और अनाथों और मुहताजों और मुसाफ़िर के लिए है, ताकि वह (माल) तुम्हारे मालदारों ही के बीच चक्कर न लगाता रहे - रसूल जो कुछ तुम्हें दे उसे ले लो और जिस चीज़ से तुम्हें रोक दे उससे रुक जाओ, और अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह की यातना बहुत कठोर है। -
तफ़्सीर:
अल्लाह ने अपने रसूल को बस्तियों वालों की संपत्ति में से जो कुछ बिना युद्ध किए दिया है, वह अल्लाह के लिए है, वह जिसे चाहे प्रदान करे, तथा उसके रसूल के लिए है जो उनके स्वामित्व में है, तथा बनी हाशिम और बनी मुत्तलिब में से आपके रिश्तेदारों के लिए है; उनके लिए उसके मुआवज़े के रूप में है जो उन्हें दान से रोक दिया गया है, तथा अनाथों के लिए, ग़रीबों के लिए और उस पथिक के लिए है जिसका खर्च समाप्त हो गया हो। यह आदेश इसलिए दिया गया है, ताकि ऐसा न हो कि धन केवल अमीरों के बीच घूमता रहे और ग़रीब लोग उससे वंचित रह जाएँ। और रसूल तुम्हें बिना युद्ध के प्राप्त होने वाले धन में से जो कुछ दें, उसे (ऐ ईमान वालो!) ले लो और जिससे तुम्हें रोक दें, उससे रुक जाओ। और अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करते हुए और उसके निषेधों से बचते हुए, डरते रहो। निश्चय अल्लाह बहुत कठोर सज़ा देने वाला है। अतः उसकी सज़ा से बचो।
आयत 8
لِلْفُقَرَآءِ ٱلْمُهَـٰجِرِينَ ٱلَّذِينَ أُخْرِجُوا۟ مِن دِيَـٰرِهِمْ وَأَمْوَٰلِهِمْ يَبْتَغُونَ فَضْلًۭا مِّنَ ٱللَّهِ وَرِضْوَٰنًۭا وَيَنصُرُونَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥٓ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلصَّـٰدِقُونَ
لِلْفُقَرَآءِ
(माले फ़य)फ़ुक़रा के लिए है
ٱلْمُهَـٰجِرِينَ
जो मुहाजिर हैं
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
أُخْرِجُوا۟
निकाले गए
مِن
from
دِيَـٰرِهِمْ
अपने घरों से
وَأَمْوَٰلِهِمْ
और अपने मालों से
يَبْتَغُونَ
वो चाहते हैं
فَضْلًۭا
फ़ज़ल
مِّنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह का
وَرِضْوَٰنًۭا
और रज़ामन्दी
وَيَنصُرُونَ
और वो मदद करते हैं
ٱللَّهَ
अल्लाह की
وَرَسُولَهُۥٓ ۚ
और उसके रसूल की
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلصَّـٰدِقُونَ
जो सच्चे हैं
वह ग़रीब मुहाजिरों के लिए है, जो अपने घरों और अपने मालों से इस हालत में निकाल बाहर किए गए है कि वे अल्लाह का उदार अनुग्रह और उसकी प्रसन्नता की तलाश में है और अल्लाह और उसके रसूल की सहायता कर रहे है, और वही वास्तव में सच्चे है
तफ़्सीर:
इस धन का कुछ हिस्सा अल्लाह की ख़ातिर घर-बार छोड़ने वाले उन ग़रीबों पर खर्च किया जाएगा, जो अपने धनों और बाल-बच्चों को छोड़ने के लिए मजबूर किए गए। वे आशा करते हैं कि अल्लाह उन्हें इस दुनिया में जीविका और आख़िरत में अपनी प्रसन्नता प्रदान करेगा। वे अल्लाह के रास्ते में जिहाद करके अल्लाह की मदद तथा उसके रसूल की मदद करते हैं। जो इन गुणों से विशिष्ट हैं, वही लोग वास्तव में ईमान में दृढ़ हैं।
आयत 9
وَٱلَّذِينَ تَبَوَّءُو ٱلدَّارَ وَٱلْإِيمَـٰنَ مِن قَبْلِهِمْ يُحِبُّونَ مَنْ هَاجَرَ إِلَيْهِمْ وَلَا يَجِدُونَ فِى صُدُورِهِمْ حَاجَةًۭ مِّمَّآ أُوتُوا۟ وَيُؤْثِرُونَ عَلَىٰٓ أَنفُسِهِمْ وَلَوْ كَانَ بِهِمْ خَصَاصَةٌۭ ۚ وَمَن يُوقَ شُحَّ نَفْسِهِۦ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ
وَٱلَّذِينَ
और(अंसार के लिए भी)जिन्होंने
تَبَوَّءُو
जगह बनाई
ٱلدَّارَ
उस घर (मदीना) में
وَٱلْإِيمَـٰنَ
और ईमान में
مِن
from
قَبْلِهِمْ
उनसे पहले
يُحِبُّونَ
वो मुहब्बत रखते हैं
مَنْ
उससे जो
هَاجَرَ
हिजरत करे
إِلَيْهِمْ
तरफ़ उनके
وَلَا
और नहीं
يَجِدُونَ
वो पाते
فِى
in
صُدُورِهِمْ
अपने सीनों में
حَاجَةًۭ
कोई हाजत
مِّمَّآ
उस चीज़ की जो
أُوتُوا۟
वो दिए गए
وَيُؤْثِرُونَ
और वो तरजीह देते हैं
عَلَىٰٓ
over
أَنفُسِهِمْ
अपने नफ़्सों पर
وَلَوْ
और अगरचे
كَانَ
हो
بِهِمْ
उन्हें
خَصَاصَةٌۭ ۚ
सख़्त हाजत
وَمَن
और जो कोई
يُوقَ
बचा लिया गया
شُحَّ
बुख़्ल से
نَفْسِهِۦ
अपने नफ़्स के
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلْمُفْلِحُونَ
जो फ़लाह पाने वाले हैं
और उनके लिए जो उनसे पहले ही से हिजरत के घर (मदीना) में ठिकाना बनाए हुए है और ईमान पर जमे हुए है, वे उनसे प्रेम करते है जो हिजरत करके उनके यहाँ आए है और जो कुछ भी उन्हें दिया गया उससे वे अपने सीनों में कोई खटक नहीं पाते और वे उन्हें अपने मुक़ाबले में प्राथमिकता देते है, यद्यपि अपनी जगह वे स्वयं मुहताज ही हों। और जो अपने मन के लोभ और कृपणता से बचा लिया जाए ऐसे लोग ही सफल है
तफ़्सीर:
और वे अंसार, जो मुहाजिरों से पहले से मदीना में निवास करते थे तथा उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान को चुन लिया था, वे उन लोगों से प्रेम करते हैं, जो मक्का से हिजरत करके उनके यहाँ आए हैं। तथा अपने दिलों में अल्लाह के रास्ते में हिजरत करने वाले लोगों के बारे में कोई क्रोध तथा ईर्ष्या नहीं पाते, जब मुहाजिरों को बिना युद्ध के प्राप्त होने वाले धन में से कुछ दिया जाता है और उन्हें नहीं दिया जाता। और वे सांसारिक फायदों के मामले में, मुहाजिरों को खुद से आगे रखते हैं, यद्यपि खुद ग़रीब और ज़रूरतमंद हों। और जिसके दिल को अल्लाह धन की लालच से बचा ले, और वह उसे अल्लाह की राह में खर्च करने लगे, तो ऐसे ही लोग हैं जो अपनी आकांक्षाओं की प्राप्ति और जिस चीज़ से डरते हैं उससे मुक्ति में सफल होने वाले हैं।
आयत 10
وَٱلَّذِينَ جَآءُو مِنۢ بَعْدِهِمْ يَقُولُونَ رَبَّنَا ٱغْفِرْ لَنَا وَلِإِخْوَٰنِنَا ٱلَّذِينَ سَبَقُونَا بِٱلْإِيمَـٰنِ وَلَا تَجْعَلْ فِى قُلُوبِنَا غِلًّۭا لِّلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ رَبَّنَآ إِنَّكَ رَءُوفٌۭ رَّحِيمٌ
وَٱلَّذِينَ
और (उनके लिए भी) जो
جَآءُو
आए
مِنۢ
from
بَعْدِهِمْ
उनके बाद
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
ٱغْفِرْ
बख़्शदे
لَنَا
हमें
وَلِإِخْوَٰنِنَا
और हमारे भाईयों को
ٱلَّذِينَ
वो जो
سَبَقُونَا
सबक़त ले गए हमसे
بِٱلْإِيمَـٰنِ
ईमान में
وَلَا
और ना
تَجْعَلْ
तू रख
فِى
in
قُلُوبِنَا
हमारे दिलों मे
غِلًّۭا
कीना/कुदूरत
لِّلَّذِينَ
उन लोगों के लिए जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
رَبَّنَآ
ऐ हमार रब
إِنَّكَ
बेशक तू
رَءُوفٌۭ
बहुत शफ़्क़त करने वाला है
رَّحِيمٌ
निहायत रहम करने वाला है
और (इस माल में उनका भी हिस्सा है) जो उनके बाद आए, वे कहते है, "ऐ हमारे रब! हमें क्षमा कर दे और हमारे उन भाइयों को भी जो ईमानलाने में हमसे अग्रसर रहे और हमारे दिलों में ईमानवालों के लिए कोई विद्वेष न रख। ऐ हमारे रब! तू निश्चय ही बड़ा करुणामय, अत्यन्त दयावान है।"
तफ़्सीर:
और जो इन लोगों के बाद आए और क़ियामत के दिन तक भलाई के साथ उनका अनुसरण किया, वे कहते हैं : ऐ हमारे पालनहार! हमें क्षमा कर दे और हमारे उन इस्लामी भाइयों को भी क्षमा कर दे, जो हमसे पहले अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाए हैं। तथा हमारे दिलों में किसी मोमिन के प्रति घृणा तथा द्वेष न रख। ऐ हामारे पालनहार! निश्चय तू अपने बंदों के प्रति बहुत स्नेहक, उनपर अत्यंत दयालु है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
बनी नज़ीर के जिलावतन होने और माल-ए-फै की तक़सीम का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि ईमान वालों की आपसी मदद और ईसार (दूसरों को तरजीह देना) एक बड़ी सिफत है।
आयत 11
۞ أَلَمْ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ نَافَقُوا۟ يَقُولُونَ لِإِخْوَٰنِهِمُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ لَئِنْ أُخْرِجْتُمْ لَنَخْرُجَنَّ مَعَكُمْ وَلَا نُطِيعُ فِيكُمْ أَحَدًا أَبَدًۭا وَإِن قُوتِلْتُمْ لَنَنصُرَنَّكُمْ وَٱللَّهُ يَشْهَدُ إِنَّهُمْ لَكَـٰذِبُونَ
۞ أَلَمْ
क्या नहीं
تَرَ
आपने देखा
إِلَى
[to]
ٱلَّذِينَ
तरफ़ उनके जिन्होंने
نَافَقُوا۟
मुनाफ़िक़त की
يَقُولُونَ
वो कहते हैं
لِإِخْوَٰنِهِمُ
अपने भाईयों से
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
مِنْ
among
أَهْلِ
the People
ٱلْكِتَـٰبِ
एहले किताब में से
لَئِنْ
अलबत्ता अगर
أُخْرِجْتُمْ
निकाले गए तुम
لَنَخْرُجَنَّ
अलबत्ता हम ज़रूर निकलेंगे
مَعَكُمْ
साथ तुम्हारे
وَلَا
और ना
نُطِيعُ
हम इताअत करेंगे
فِيكُمْ
तुम्हारे मामले में
أَحَدًا
किसी एक की
أَبَدًۭا
कभी भी
وَإِن
और अगर
قُوتِلْتُمْ
जंग की गई तुमसे
لَنَنصُرَنَّكُمْ
अलबत्ता हम ज़रूर मदद करेंगे तुम्हारी
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
يَشْهَدُ
वो गवाही देता है
إِنَّهُمْ
बेशक वो
لَكَـٰذِبُونَ
अलबत्ता झूठे हैं
क्या तुमने उन लोगों को नहीं देखा जिन्होंने कपटाचार की नीति अपनाई हैं, वे अपने किताबवाले उन भाइयों से, जो इनकार की नीति अपनाए हुए है, कहते है, "यदि तुम्हें निकाला गया तो हम भी अवश्य ही तुम्हारे साथ निकल जाएँगे और तुम्हारे मामले में किसी की बात कभी भी नहीं मानेंगे। और यदि तुमसे युद्ध किया गया तो हम अवश्य तुम्हारी सहायता करेंगे।" किन्तु अल्लाह गवाही देता है कि वे बिलकुल झूठे है
तफ़्सीर:
क्या (ऐ रसूल) आपने उन लोगों को नहीं देखा, जिन्होंने कुफ़्र को छिपाया और ईमान का प्रदर्शन किया कि वे विकृत तौरात को मानने वाले यहूदियों में से अपने काफ़िर भाइयों से कहते हैं : अपने घरों के अंदर डटे रहो, हम तुम्हारी सहायता से पीछे नहीं हटेंगे और तुम्हें असहाय नहीं छोड़ेंगे। यदि मुसलमानों ने तुम्हें यहाँ से बाहर निकाल दिया, तो हम भी तुम्हारे साथ एकजुटता दिखाते हुए निकल खड़े होंगे। तथा हम किसी की भी बात नहीं मानेंगे, जो हमें तुम्हारे साथ बाहर जाने से रोकना चाहेगा। और अगर मुसलमानों ने तुमसे युद्ध किया, तो हम उनके विरुद्ध तुम्हारी मदद करेंगे। हालाँकि अल्लाह गवाही देता है कि निःसंदेह मुनाफ़िक़ अपने इस दावे में झूठे हैं कि यदि यहूदियों को निकाला गया तो वे उनके साथ निकल खड़े होंगे और यदि उनसे युद्ध किया गया तो वे उनकी ओर से युद्ध करेंगे।
आयत 12
لَئِنْ أُخْرِجُوا۟ لَا يَخْرُجُونَ مَعَهُمْ وَلَئِن قُوتِلُوا۟ لَا يَنصُرُونَهُمْ وَلَئِن نَّصَرُوهُمْ لَيُوَلُّنَّ ٱلْأَدْبَـٰرَ ثُمَّ لَا يُنصَرُونَ
لَئِنْ
अलबत्ता अगर
أُخْرِجُوا۟
वो निकाले गए
لَا
not
يَخْرُجُونَ
नहीं वो निकलेंगे
مَعَهُمْ
साथ उनके
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
قُوتِلُوا۟
वो जंग किए गए
لَا
not
يَنصُرُونَهُمْ
नहीं वो मदद करेंगे उनकी
وَلَئِن
और अलबत्ता अगर
نَّصَرُوهُمْ
उन्होंने मदद की भी उनकी
لَيُوَلُّنَّ
अलबत्ता वो ज़रूर फेर लेंगे
ٱلْأَدْبَـٰرَ
पुश्तें
ثُمَّ
फिर
لَا
not
يُنصَرُونَ
ना वो मदद किए जाऐंगे
यदि वे निकाले गए तो वे उनके साथ नहीं निकलेंगे और यदि उनसे युद्ध हुआ तो वे उनकी सहायता कदापि न करेंगे और यदि उनकी सहायता करें भी तो पीठ फेंर जाएँगे। फिर उन्हें कोई सहायता प्राप्त न होगी
तफ़्सीर:
अगर मुसलमानों ने यहूदियों को निकाल दिया, तो वे उनके साथ नहीं निकलेंगे। और अगर मुसलमानों ने उनसे युद्ध किया, तो वे उनकी सहायता और मदद नहीं करेंगे। और अगर उनकी मदद और सहायता करने के लिए निकले भी, तो उनसे पीठ फेरकर भाग खड़े होंगे। फिर इसके बाद मुनाफ़िक़ों की मदद नहीं की जाएगी, बल्कि अल्लाह उन्हें अपमानित और तिरस्कृत करेगा।
आयत 13
لَأَنتُمْ أَشَدُّ رَهْبَةًۭ فِى صُدُورِهِم مِّنَ ٱللَّهِ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌۭ لَّا يَفْقَهُونَ
لَأَنتُمْ
अलबत्ता तुम
أَشَدُّ
ज़्यादा सख़्त हो
رَهْبَةًۭ
रोब में
فِى
in
صُدُورِهِم
उनके सीनों में
مِّنَ
than
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह से (बढ़) कर
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّهُمْ
बवजह उसके कि वो
قَوْمٌۭ
एक क़ौम हैं
لَّا
(who do) not
يَفْقَهُونَ
नहीं वो समझते
उनके दिलों में अल्लाह से बढ़कर तुम्हारा भय समाया हुआ है। यह इसलिए कि वे ऐसे लोग है जो समझते नहीं
तफ़्सीर:
निश्चय मुनाफ़िकों और यहूदियों के दिलों में (ऐ मोमिनो) तुम्हारा भय अल्लाह (के भय) से अधिक है। और यह (अर्थात् उनका तुमसे अत्यधिक डरना और अल्लाह का डर कमज़ोर होना) इस कारण है कि वे ऐसे लोग हैं, जो कुछ नहीं समझते। क्योंकि यदि वे समझते होते, तो उन्हें पता होता कि अल्लाह डरने और भयभीत होने के अधिक योग्य है। क्योंकि उसी ने तुम्हें उनपर प्रभुत्व प्रदान किया है।
आयत 14
لَا يُقَـٰتِلُونَكُمْ جَمِيعًا إِلَّا فِى قُرًۭى مُّحَصَّنَةٍ أَوْ مِن وَرَآءِ جُدُرٍۭ ۚ بَأْسُهُم بَيْنَهُمْ شَدِيدٌۭ ۚ تَحْسَبُهُمْ جَمِيعًۭا وَقُلُوبُهُمْ شَتَّىٰ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌۭ لَّا يَعْقِلُونَ
لَا
Not
يُقَـٰتِلُونَكُمْ
नहीं वो जंग करेंगे तुमसे
جَمِيعًا
इकट्ठे
إِلَّا
मगर
فِى
in
قُرًۭى
बस्तियों में
مُّحَصَّنَةٍ
क़िला बन्द हो कर
أَوْ
या
مِن
from
وَرَآءِ
पीछे से
جُدُرٍۭ ۚ
दीवारों के
بَأْسُهُم
उनकी जंग
بَيْنَهُمْ
आपस में
شَدِيدٌۭ ۚ
शदीद है
تَحْسَبُهُمْ
तुम समझते हो उन्हें
جَمِيعًۭا
इकट्ठा
وَقُلُوبُهُمْ
जबकि दिल उनके
شَتَّىٰ ۚ
फटे हुए हैं
ذَٰلِكَ
ये
بِأَنَّهُمْ
बवजह उसके कि वो
قَوْمٌۭ
एक क़ौम हैं
لَّا
not
يَعْقِلُونَ
नहीं वो अक़्ल रखते
वे इकट्ठे होकर भी तुमसे (खुले मैदान में) नहीं लड़ेगे, क़िलाबन्द बस्तियों या दीवारों के पीछ हों तो यह और बात है। उनकी आपस में सख़्त लड़ाई है। तुम उन्हें इकट्ठा समझते हो! हालाँकि उनके दिल फटे हुए है। यह इसलिए कि वे ऐसे लोग है जो बुद्धि से काम नहीं लेते
तफ़्सीर:
यहूदी तुमसे (ऐ मोमिनो) इकट्ठे होकर युद्ध नहीं करेंगे, परंतु क़िलेबंद बस्तियों में या दीवारों के पीछे से। क्योंकि वे अपनी कायरता के कारण तुम्हारा सामना नहीं कर सकते। उनके बीच दुश्मनी के कारण उनकी आपस की लड़ाई बहुत सख़्त है। आप समझते हैं कि वे एकजुट हैं और उनके अंदर एकता है, जबकि सच्चाई यह है कि उनके दिल अलग-अलग हैं। यह विभेद और दुश्मनी इस कारण है कि वे बुद्धि नहीं रखते। क्योंकि यदि वे बुद्धि रखते, तो सत्य को जानते और उसका पालन करते और उसके बारे में विभेद न करते।
आयत 15
كَمَثَلِ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ قَرِيبًۭا ۖ ذَاقُوا۟ وَبَالَ أَمْرِهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
كَمَثَلِ
मानिन्द मिसाल
ٱلَّذِينَ
उनके जो
مِن
from
قَبْلِهِمْ
उनसे पहले थे
قَرِيبًۭا ۖ
क़रीब ही
ذَاقُوا۟
उन्होंने चखा
وَبَالَ
वबाल
أَمْرِهِمْ
अपने काम का
وَلَهُمْ
और उनके लिए है
عَذَابٌ
अज़ाब
أَلِيمٌۭ
दर्दनाक
उनकी हालत उन्हीं लोगों जैसी है जो उनसे पहले निकट काल में अपने किए के वबाल का मज़ा चख चुके है, और उनके लिए दुखद यातना भी है
तफ़्सीर:
इन यहूदियों का उदाहरण उनके कुफ़्र तथा यातना ग्रस्त होने में, ठीक उसी तरह है, जैसे हाल ही में उन लोगों का था जो इनसे पहले मक्का के बहुदेववादियों में से थे। चुनाँचे उन्होंने अपने कुफ़्र का बुरा परिणाम चख लिया और बद्र के दिन उनमें से कुछ लोग मारे गए और कुछ लोग पकड़ लिए गए। तथा आख़िरत में उनके लिए दर्दनाक यातना है।
आयत 16
كَمَثَلِ ٱلشَّيْطَـٰنِ إِذْ قَالَ لِلْإِنسَـٰنِ ٱكْفُرْ فَلَمَّا كَفَرَ قَالَ إِنِّى بَرِىٓءٌۭ مِّنكَ إِنِّىٓ أَخَافُ ٱللَّهَ رَبَّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
كَمَثَلِ
जैसे मिसाल
ٱلشَّيْطَـٰنِ
शैतान की
إِذْ
जब
قَالَ
वो कहता है
لِلْإِنسَـٰنِ
इन्सान से
ٱكْفُرْ
कुफ़्र करो
فَلَمَّا
तो जब
كَفَرَ
वो कुफ़्र करता है
قَالَ
वो कहता है
إِنِّى
बेशक मैं
بَرِىٓءٌۭ
बरी उज़-ज़िम्मा हूँ
مِّنكَ
तुझसे
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَخَافُ
मैं डरता हूँ
ٱللَّهَ
अल्लाह से
رَبَّ
जो रब है
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों का
इनकी मिसाल शैतान जैसी है कि जब उसने मनुष्य से कहा, "क़ुफ़्र कर!" फिर जब वह कुफ़्र कर बैठा तो कहने लगा, "मैं तुम्हारी ज़िम्मेदारी से बरी हूँ। मैं तो सारे संसार के रब अल्लाह से डरता हूँ।"
तफ़्सीर:
मुनाफ़िक़ों की बात सुनने के मामले में इन (यहूदियों) का उदाहरण शैतान की तरह है जब वह इनसान के लिए कुफ़्र करने को सुंदर बनाकर पेश करता है, फिर जब वह उसके लिए कुफ़्र को शोभित करने के कारण कुफ़्र कर बैठता है, तो कहता है : मैं तुम्हारे इस कुफ़्र करने से बरी हूँ। मैं प्राणियों के पालनहार अल्लाह से डरता हूँ।
आयत 17
فَكَانَ عَـٰقِبَتَهُمَآ أَنَّهُمَا فِى ٱلنَّارِ خَـٰلِدَيْنِ فِيهَا ۚ وَذَٰلِكَ جَزَٰٓؤُا۟ ٱلظَّـٰلِمِينَ
فَكَانَ
पस हुआ
عَـٰقِبَتَهُمَآ
अंजाम उन दोनों का
أَنَّهُمَا
कि बेशक वो दोनों
فِى
(will be) in
ٱلنَّارِ
आग में होंगे
خَـٰلِدَيْنِ
दोनों हमेशा रहने वाले
فِيهَا ۚ
उसमें
وَذَٰلِكَ
और यही है
جَزَٰٓؤُا۟
बदला
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों का
फिर उन दोनों का परिणाम यह हुआ कि दोनों आग में गए, जहाँ सदैव रहेंगे। और ज़ालिमों का यही बदला है
तफ़्सीर:
अतः शैतान और उसकी बात मानने वाले इनसान, दोनों का अंतिम परिणाम यह हुआ कि दोनों क़ियामत के दिन जहन्नम में जाएँगे, जिसमें हमेशा के लिए रहेंगे। और यह प्रतिफल जो उन दोनों की प्रतीक्षा कर रहा है, यही उन लोगों का बदला है, जो अल्लाह की मर्यादाओं को लांघ कर अपने आपपर अत्याचार करने वाले हैं।
आयत 18
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ ٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَلْتَنظُرْ نَفْسٌۭ مَّا قَدَّمَتْ لِغَدٍۢ ۖ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ خَبِيرٌۢ بِمَا تَعْمَلُونَ
يَـٰٓأَيُّهَا
O
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
ٱتَّقُوا۟
डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
وَلْتَنظُرْ
और ज़रूर देखे
نَفْسٌۭ
हर नफ़्स
مَّا
जो
قَدَّمَتْ
उसने आगे भेजा
لِغَدٍۢ ۖ
कल के लिए
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ ۚ
अल्लाह से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
خَبِيرٌۢ
ख़ूब बाख़बर है
بِمَا
उससे जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह का डर रखो। और प्रत्येक व्यक्ति को यह देखना चाहिए कि उसने कल के लिए क्या भेजा है। और अल्लाह का डर रखो। जो कुछ भी तुम करते हो निश्चय ही अल्लाह उसकी पूरी ख़बर रखता है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो! अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करते हुए और उसके निषेधों से बचते हुए, डरते रहो। और हर आदमी यह विचार करे कि उसने क़ियामत के दिन के लिए क्या नेक कार्य आगे भेजा है। तथा अल्लाह से डरो। निश्चय वह तुम्हारे कर्मों से अच्छी तरह अवगत है। उससे तुम्हारा कोई कार्य छिपा नहीं है। और वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों का बदला देगा।
आयत 19
وَلَا تَكُونُوا۟ كَٱلَّذِينَ نَسُوا۟ ٱللَّهَ فَأَنسَىٰهُمْ أَنفُسَهُمْ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْفَـٰسِقُونَ
وَلَا
और ना
تَكُونُوا۟
तुम हो जाओ
كَٱلَّذِينَ
उनकी तरह जिन्होंने
نَسُوا۟
भुला दिया
ٱللَّهَ
अल्लाह को
فَأَنسَىٰهُمْ
तो उसने भुला दिया उन्हें
أَنفُسَهُمْ ۚ
उनके नफ़्स
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग है
هُمُ
वो
ٱلْفَـٰسِقُونَ
जो फ़ासिक़ हैं
और उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने अल्लाह को भुला दिया। तो उसने भी ऐसा किया कि वे स्वयं अपने आपको भूल बैठे। वही अवज्ञाकारी है
तफ़्सीर:
और उन लोगों की तरह न हो जाओ, जिन्होंने अल्लाह को, उसके आदेशों का पालन करना और उसके निषेधों से बचना छोड़कर, भुला दिया। तो अल्लाह ने उन्हें ऐसा कर दिया कि वे अपने आप ही को भूल गए। चुनाँचे उन्होंने अपने आपको अल्लाह के क्रोध और उसके दंड से बचाने के लिए कार्य नहीं किया। यही लोग, जिन्होंने अल्लाह को भुला दिया - चुनाँचे उसके आदेश का पालन नहीं किया और उसके निषेध से नहीं बचे - अल्लाह की आज्ञाकारिता से बाहर निकलने वाले हैं।
आयत 20
لَا يَسْتَوِىٓ أَصْحَـٰبُ ٱلنَّارِ وَأَصْحَـٰبُ ٱلْجَنَّةِ ۚ أَصْحَـٰبُ ٱلْجَنَّةِ هُمُ ٱلْفَآئِزُونَ
لَا
Not
يَسْتَوِىٓ
नहीं बराबर हो सकते
أَصْحَـٰبُ
साथी
ٱلنَّارِ
आग के
وَأَصْحَـٰبُ
और साथी
ٱلْجَنَّةِ ۚ
जन्नत के
أَصْحَـٰبُ
साथी
ٱلْجَنَّةِ
जन्नत के
هُمُ
वो ही हैं
ٱلْفَآئِزُونَ
जो कामयाब होने वाले हैं
आगवाले और बाग़वाले (जहन्नमवाले और जन्नतवाले) कभी समान नहीं हो सकते। बाग़वाले ही सफ़ल है
तफ़्सीर:
जहन्नम वाले और जन्नत वाले बराबर नहीं हो सकते। बल्कि जैसे दुनिया में उनके कर्म अलग-अलग थे, वैसे ही आख़िरत में उनके प्रतिफल अलग-अलग होंगे। जन्नत वाले लोग ही अपनी इच्छित चीज़ों को प्राप्त करने और अपने भय की चीज़ों से बचने में सफल लोग हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मुनाफिकों के दोहरे रवैये का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि सिर्फ ज़बानी साथ देने का वादा करना और मौके पर धोखा दे जाना मुनाफिक की निशानी है।
आयत 21
لَوْ أَنزَلْنَا هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانَ عَلَىٰ جَبَلٍۢ لَّرَأَيْتَهُۥ خَـٰشِعًۭا مُّتَصَدِّعًۭا مِّنْ خَشْيَةِ ٱللَّهِ ۚ وَتِلْكَ ٱلْأَمْثَـٰلُ نَضْرِبُهَا لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ
لَوْ
अगर
أَنزَلْنَا
नाज़िल करते हम
هَـٰذَا
इस
ٱلْقُرْءَانَ
क़ुरआन को
عَلَىٰ
ऊपर
جَبَلٍۢ
किसी पहाड़ पर
لَّرَأَيْتَهُۥ
अलबत्ता देखते आप उसे
خَـٰشِعًۭا
दबा हुआ
مُّتَصَدِّعًۭا
फटने वाला
مِّنْ
from
خَشْيَةِ
ख़ौफ़ से
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के
وَتِلْكَ
और ये
ٱلْأَمْثَـٰلُ
मिसालें हैं
نَضْرِبُهَا
हम बयान करते हैं उन्हें
لِلنَّاسِ
लोगों के लिए
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَتَفَكَّرُونَ
ग़ौरो फ़िक्र करें
यदि हमने इस क़ुरआन को किसी पर्वत पर भी उतार दिया होता तो तुम अवश्य देखते कि अल्लाह के भय से वह दबा हुआ और फटा जाता है। ये मिशालें लोगों के लिए हम इसलिए पेश करते है कि वे सोच-विचार करें
तफ़्सीर:
अगर हमने इस क़ुरआन को किसी पहाड़ पर उतारा होता, तो (ऐ रसूल!) आप देखते कि वह पहाड़ अपनी कठोरता के बावजूद, अल्लाह के भय की गंभीरता से दब कर टूट जाता; क्योंकि उसमें निरोधात्मक उपदेश और कड़ी चेतावनियाँ हैं। ये उदाहरण हम लोगों के लिए इसलिए बयान करते हैं, ताकि वे अपनी बुद्धियों से काम लें और इस क़ुरआन की आयतों में जो उपदेश और शिक्षाएँ हैं, उनसे सीख प्राप्त करें।
आयत 22
هُوَ ٱللَّهُ ٱلَّذِى لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ عَـٰلِمُ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَـٰدَةِ ۖ هُوَ ٱلرَّحْمَـٰنُ ٱلرَّحِيمُ
هُوَ
वो
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّذِى
वो ही है जो
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ ۖ
वो ही
عَـٰلِمُ
जानने वाला है
ٱلْغَيْبِ
ग़ैब
وَٱلشَّهَـٰدَةِ ۖ
और हाज़िर का
هُوَ
वो
ٱلرَّحْمَـٰنُ
बहुत मेहरबान है
ٱلرَّحِيمُ
निहायत रहम करने वाला है
वही अल्लाह है जिसके सिवा कोई पूज्य-प्रभु नहीं, परोक्ष और प्रत्यक्ष को जानता है। वह बड़ा कृपाशील, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
वही अल्लाह है, जिसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह परोक्ष तथा प्रत्यक्ष का जानने वाला है, उसमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है। वह दुनिया तथा आख़िरत में अत्यंत दयावान् और असीम दया करने वाला है, उसकी दया सभी लोकों पर विस्तारित है, वह बादशाह है, हर कमी से पाक और पवित्र है, हर दोष से रहित है। स्पष्ट निशानियों (चमत्कारों) के द्वारा अपने रसूलों की पुष्टि करने वाला है, अपने बंदों के कर्मों पर निरीक्षक है, सब पर प्रभुत्वशाली है, जिसपर कोई विजय प्राप्त नहीं कर सकता, शक्तिशाली है जिसने हर वस्तु को अपनी शक्ति से वशीभूत कर रखा है, बहुत बड़ाई वाला है। अल्लाह उन मूर्तियों आदि से पवित्र है, जिन्हें मुश्रिक लोग उसके साथ साझी बनाते हैं।
आयत 23
هُوَ ٱللَّهُ ٱلَّذِى لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ٱلْمَلِكُ ٱلْقُدُّوسُ ٱلسَّلَـٰمُ ٱلْمُؤْمِنُ ٱلْمُهَيْمِنُ ٱلْعَزِيزُ ٱلْجَبَّارُ ٱلْمُتَكَبِّرُ ۚ سُبْحَـٰنَ ٱللَّهِ عَمَّا يُشْرِكُونَ
هُوَ
वो
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلَّذِى
वो ही है
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ
वो ही
ٱلْمَلِكُ
जो बादशाह है
ٱلْقُدُّوسُ
निहायत पाक है
ٱلسَّلَـٰمُ
सलामती वाला है
ٱلْمُؤْمِنُ
अमन देने वाला है
ٱلْمُهَيْمِنُ
निगहबान है
ٱلْعَزِيزُ
सब पर ग़ालिब है
ٱلْجَبَّارُ
ज़बरदस्त ज़ोर आवर है
ٱلْمُتَكَبِّرُ ۚ
बेहद बड़ाई वाला है
سُبْحَـٰنَ
पाक है
ٱللَّهِ
अल्लाह
عَمَّا
उससे जो
يُشْرِكُونَ
वो शरीक ठहराते हैं
वही अल्लाह है जिसके सिवा कोई पूज्य नहीं। बादशाह है अत्यन्त पवित्र, सर्वथा सलामती, निश्चिन्तता प्रदान करनेवाला, संरक्षक, प्रभुत्वशाली, प्रभावशाली (टुटे हुए को जोड़नेवाला), अपनी बड़ाई प्रकट करनेवाला। महान और उच्च है अल्लाह उस शिर्क से जो वे करते है
तफ़्सीर:
वही अल्लाह है, जिसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, वह परोक्ष तथा प्रत्यक्ष का जानने वाला है, उसमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है। वह दुनिया तथा आख़िरत में अत्यंत दयावान् और असीम दया करने वाला है, उसकी दया सभी लोकों पर विस्तारित है, वह बादशाह है, हर कमी से पाक और पवित्र है, हर दोष से रहित है। स्पष्ट निशानियों (चमत्कारों) के द्वारा अपने रसूलों की पुष्टि करने वाला है, अपने बंदों के कर्मों पर निरीक्षक है, सब पर प्रभुत्वशाली है, जिसपर कोई विजय प्राप्त नहीं कर सकता, शक्तिशाली है जिसने हर वस्तु को अपनी शक्ति से वशीभूत कर रखा है, बहुत बड़ाई वाला है। अल्लाह उन मूर्तियों आदि से पवित्र है, जिन्हें मुश्रिक लोग उसके साथ साझी बनाते हैं।
आयत 24
هُوَ ٱللَّهُ ٱلْخَـٰلِقُ ٱلْبَارِئُ ٱلْمُصَوِّرُ ۖ لَهُ ٱلْأَسْمَآءُ ٱلْحُسْنَىٰ ۚ يُسَبِّحُ لَهُۥ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
هُوَ
वो
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلْخَـٰلِقُ
जो पैदा करने वाला है
ٱلْبَارِئُ
वुजूद में लाने वाला है
ٱلْمُصَوِّرُ ۖ
सूरत बनाने वाला है
لَهُ
उसके लिए हैं
ٱلْأَسْمَآءُ
नाम
ٱلْحُسْنَىٰ ۚ
अच्छे-अच्छे
يُسَبِّحُ
तस्बीह करती है
لَهُۥ
उसके लिए
مَا
(हर वो चीज़) जो
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ ۖ
और ज़मीन में है
وَهُوَ
और वो
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त है
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिकमत वाला है
वही अल्लाह है जो संरचना का प्रारूपक है, अस्तित्व प्रदान करनेवाला, रूप देनेवाला है। उसी के लिए अच्छे नाम है। जो चीज़ भी आकाशों और धरती में है, उसी की तसबीह कर रही है। और वह प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
वही अल्लाह रचयिता है, जिसने हर चीज़ की रचना की। वह चीज़ों को अस्तित्व प्रदान करनेवाला है, वह जैसा चाहता है, उसके अनुसार अपनी मखलूक़ात को रूप देने वाला है। उस महिमावान के सबसे सुंदर नाम हैं जो उसकी सर्वोच्च विशेषताओं पर आधारित हैं। हर वह चीज़ जो आकाशों और धरती में है उसके हर कमी से पवित्र और उत्कृष्ट होने का वर्णन करती है, वह प्रभुत्वशाली है, जिसपर कोई विजय प्राप्त नहीं कर सकता, वह अपनी रचना, विधान और निर्णय में ह़िकमत वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह के खूबसूरत नामों के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह के नामों पर गौर करना और उनके ज़रिए दुआ मांगना दिल को सुकून और मारिफत देता है।
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