सूरह अल-अनआम سورة الأنعام
मक्की 165 आयतें
नाम का मतलब
चौपाए / मवेशी (जिन जानवरों को मुशरिक अल्लाह के नाम पर या गैर-अल्लाह के नाम पर वक्फ करते थे, उनका ज़िक्र)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-अनआम मक्का के आखिरी दौर में एक ही मरतबे में मुकम्मल नाज़िल हुई बताई जाती है। इसमें तौहीद (अल्लाह की वहदानियत) और मुशरिकों के बातिल अकीदों का जोरदार रद्द किया गया है। इसका नाम उन जानवरों की तरफ इशारा करता है जिन्हें जाहिलियत के दौर के लोग गलत रस्मों के तहत अल्लाह के नाम पर मखसूस या हराम कर लेते थे। यह सूरह अल्लाह की कुदरत की निशानियों और आखिरत के यकीन को मजबूत करने पर खास तवज्जो देती है।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह तौहीद के मौज़ू पर सबसे मुफस्सल सूरतों में से एक मानी जाती है और इसे एक ही बार में मुकम्मल नाज़िल होने की वजह से खास अहमियत हासिल है। इसमें अल्लाह की वहदानियत के मज़बूत दलाइल की भरमार है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ وَجَعَلَ ٱلظُّلُمَـٰتِ وَٱلنُّورَ ۖ ثُمَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِرَبِّهِمْ يَعْدِلُونَ
ٱلْحَمْدُ
सब तारीफ़
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए है
ٱلَّذِى
वो जिसने
خَلَقَ
पैदा किया
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
وَجَعَلَ
और उसने बनाया
ٱلظُّلُمَـٰتِ
अँधेरों
وَٱلنُّورَ ۖ
और रोशनी को
ثُمَّ
फिर
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
بِرَبِّهِمْ
साथ अपने रब के
يَعْدِلُونَ
वो बराबर क़रार देते हैं
प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने आकाशों और धरती को पैदा किया और अँधरों और उजाले का विधान किया; फिर भी इनकार करनेवाले लोग दूसरों को अपने रब के समकक्ष ठहराते है
तफ़्सीर:
परम पूर्णता से विशिष्ट करना और प्रेम के साथ सर्वोच्च सद्गुणों द्वारा प्रशंसा, उस अल्लाह के लिए साबित है, जिसने बिना किसी पूर्व उदाहरण के आकाशों तथा धरती की रचना की, तथा रात और दिन की रचना की, जो एक-दूसरे के बाद आते रहते हैं। चुनाँचे उसने रात को अँधेरी और दिन को प्रकाशमान बनाया। इसके बावजूद, जिन लोगों ने कुफ़्र किया, वे उसके अलावा को उसके बराबर ठहराते हैं और उसे उसका साझीदार बना लेते हैं।
आयत 2
هُوَ ٱلَّذِى خَلَقَكُم مِّن طِينٍۢ ثُمَّ قَضَىٰٓ أَجَلًۭا ۖ وَأَجَلٌۭ مُّسَمًّى عِندَهُۥ ۖ ثُمَّ أَنتُمْ تَمْتَرُونَ
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
خَلَقَكُم
पैदा किया तुम्हें
مِّن
from
طِينٍۢ
मिट्टी से
ثُمَّ
फिर
قَضَىٰٓ
उस ने मुक़र्रर की
أَجَلًۭا ۖ
एक मुद्दत
وَأَجَلٌۭ
और एक (और) मुद्दत
مُّسَمًّى
मुक़र्रर है
عِندَهُۥ ۖ
उसके यहाँ
ثُمَّ
फिर (भी)
أَنتُمْ
तुम
تَمْتَرُونَ
तुम शक करते हो
वही है जिसने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया, फिर (जीवन की) एक अवधि निश्चित कर दी और उसके यहाँ (क़ियामत की) एक अवधि और निश्चित है; फिर भी तुम संदेह करते हो!
तफ़्सीर:
वही महिमावान है, जिसने - ऐ लोगो! - तुम्हें मिट्टी से पैदा किया, जब उसने तुम्हारे पिता आदम अलैहिस्सलाम की रचना मिट्टी से की। फिर उसने तुम्हारे इस दुनिया के जीवन में रहने के लिए एक अवधि निर्धारित की। तथा उसने एक और अवधि क़ियामत के दिन तुम्हें पुनर्जीवित करने के लिए निर्धारित की, जिसे केवल वही जानता है। फिर भी तुम उस महिमावान् के पुनर्जीवित करने की क्षमता पर संदेह करते हो।
आयत 3
وَهُوَ ٱللَّهُ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَفِى ٱلْأَرْضِ ۖ يَعْلَمُ سِرَّكُمْ وَجَهْرَكُمْ وَيَعْلَمُ مَا تَكْسِبُونَ
وَهُوَ
और वो है
ٱللَّهُ
अल्लाह
فِى
in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَفِى
and in
ٱلْأَرْضِ ۖ
और ज़मीन में
يَعْلَمُ
वो जानता है
سِرَّكُمْ
पोशीदा तुम्हारा
وَجَهْرَكُمْ
और ज़ाहिर तुम्हारा
وَيَعْلَمُ
और वो जानता है
مَا
जो
تَكْسِبُونَ
तुम कमाते हो
वही अल्लाह है, आकाशों में भी और धरती में भी। वह तुम्हारी छिपी और तुम्हारी खुली बातों को जानता है, और जो कुछ तुम कमाते हो, वह उससे भी अवगत है
तफ़्सीर:
आकाशों तथा धरती में वही महिमावान् सत्य पूज्य है, उससे कोई चीज़ छिपी नहीं है। वह तुम्हारे छिपे एवं खुले इरादों, बातों और कर्मों को जानता है, और वह तुम्हें उनका बदला देगा।
आयत 4
وَمَا تَأْتِيهِم مِّنْ ءَايَةٍۢ مِّنْ ءَايَـٰتِ رَبِّهِمْ إِلَّا كَانُوا۟ عَنْهَا مُعْرِضِينَ
وَمَا
और नहीं
تَأْتِيهِم
आती उनके पास
مِّنْ
[of]
ءَايَةٍۢ
कोई निशानी
مِّنْ
from
ءَايَـٰتِ
निशानियों में से
رَبِّهِمْ
उनके रब की
إِلَّا
मगर
كَانُوا۟
हैं वो
عَنْهَا
उनसे
مُعْرِضِينَ
ऐराज़ करने वाले
हाल यह है कि उनके रब की निशानियों में से कोई निशानी भी उनके पास ऐसी नहीं आई, जिससे उन्होंने मुँह न मोड़ लिया हो
तफ़्सीर:
मुश्रिकों के पास उनके रब की ओर से जो भी प्रमाण आया, उन्होंने उसकी परवाह न करते हुए उसे छोड़ दिया। चुनाँचे उनके पास अल्लाह की तौहीद (एकेश्वरवाद) को प्रमाणित करने वाले स्पष्ट तर्क और खुले प्रमाण आए, तथा उनके पास उसके रसूलों की सच्चाई को इंगित करने वाली निशानियाँ आईं, इसके बावजूद भी वे उनकी परवाह किए बिना उनसे विमुख हो गए।
आयत 5
فَقَدْ كَذَّبُوا۟ بِٱلْحَقِّ لَمَّا جَآءَهُمْ ۖ فَسَوْفَ يَأْتِيهِمْ أَنۢبَـٰٓؤُا۟ مَا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ
فَقَدْ
पस तहक़ीक़
كَذَّبُوا۟
उन्होंने झुठलाया
بِٱلْحَقِّ
हक़ को
لَمَّا
जब
جَآءَهُمْ ۖ
वो आया उनके पास
فَسَوْفَ
पस अनक़रीब
يَأْتِيهِمْ
आऐंगी उनके पास
أَنۢبَـٰٓؤُا۟
ख़बरें
مَا
उसकी जो
كَانُوا۟
थे वो
بِهِۦ
जिसका
يَسْتَهْزِءُونَ
वो मज़ाक़ उड़ाते
उन्होंने सत्य को झुठला दिया, जबकि वह उनके पास आया। अतः जिस चीज़ को वे हँसी उड़ाते रहे हैं, जल्द ही उसके सम्बन्ध में उन्हें ख़बरे मिल जाएगी
तफ़्सीर:
यदि उन्होंने उन स्पष्ट तर्कों और खुले प्रमाणों से मुँह मोड़ लिया, तो निःसंदेह वे उससे भी अधिक स्पष्ट चीज़ से मुँह मोड़ चुके हैं। क्योंकि उन्होंने उस क़ुरआन को झुठलाया है, जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लेकर आए। और जब वे क़ियामत के दिन यातना को देख लेंगे, तो उनकी समझ में आ जाएगा कि जिसका वे उपहास किया करते थे, वही सत्य है।
आयत 6
أَلَمْ يَرَوْا۟ كَمْ أَهْلَكْنَا مِن قَبْلِهِم مِّن قَرْنٍۢ مَّكَّنَّـٰهُمْ فِى ٱلْأَرْضِ مَا لَمْ نُمَكِّن لَّكُمْ وَأَرْسَلْنَا ٱلسَّمَآءَ عَلَيْهِم مِّدْرَارًۭا وَجَعَلْنَا ٱلْأَنْهَـٰرَ تَجْرِى مِن تَحْتِهِمْ فَأَهْلَكْنَـٰهُم بِذُنُوبِهِمْ وَأَنشَأْنَا مِنۢ بَعْدِهِمْ قَرْنًا ءَاخَرِينَ
أَلَمْ
क्या नहीं
يَرَوْا۟
उन्होंने देखा
كَمْ
कितनी ही
أَهْلَكْنَا
हलाक कर दीं हमने
مِن
from
قَبْلِهِم
उनसे पहले
مِّن
of
قَرْنٍۢ
क़ौमें
مَّكَّنَّـٰهُمْ
क़ुदरत दी थी हम ने उन्हें
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
مَا
वो जो
لَمْ
नहीं
نُمَكِّن
हमने क़ुदरत दी
لَّكُمْ
तुम्हें
وَأَرْسَلْنَا
और भेजा हमने
ٱلسَّمَآءَ
आसमान को
عَلَيْهِم
उन पर
مِّدْرَارًۭا
बहुत बरसने वाला
وَجَعَلْنَا
और बनाईं हमने
ٱلْأَنْهَـٰرَ
नहरें
تَجْرِى
जो बहती थीं
مِن
from
تَحْتِهِمْ
उनके नीचे से
فَأَهْلَكْنَـٰهُم
पस हलाक कर दिया हमने उन्हें
بِذُنُوبِهِمْ
बवजह उनके गुनाहों के
وَأَنشَأْنَا
और उठाईं हमने
مِنۢ
from
بَعْدِهِمْ
बाद उनके
قَرْنًا
क़ौमें
ءَاخَرِينَ
दूसरी
क्या उन्होंने नहीं देखा कि उनसे पहले कितने ही गिरोहों को हम विनष्ट कर चुके है। उन्हें हमने धरती में ऐसा जमाव प्रदान किया था, जो तुम्हें नहीं प्रदान किया। और उनपर हमने आकाश को ख़ूब बरसता छोड़ दिया और उनके नीचे नहरें बहाई। फिर हमने आकाश को ख़ूब बरसता छोड़ दिया और उनके नीचे नहरें बहाई। फिर हमने उन्हें उनके गुनाहों के कारण विनष्ट़ कर दिया और उनके पश्चात दूसरे गिरोहों को उठाया
तफ़्सीर:
क्या इन काफ़िरों को अत्याचारी समुदायों को नष्ट करने में अल्लाह के तरीक़े का पता नहीं?! अल्लाह ने इनसे पहले बहुत-से समुदायों को नष्ट कर दिया, जिन्हें उसने शक्ति तथा धरती पर जीवित रहने के ऐसे साधन दिए थे, जो इन काफ़िरों को नहीं दिए। तथा उनपर लगातार बारिश बरसाई और उनके लिए ऐसी नहरें प्रवाहित कीं जो उनके घरों के नीचे से बहती थीं। परंतु उन्होंने अल्लाह की अवज्ञा की, तो अल्लाह ने उनके द्वारा किए गए पापों के कारण उन्हें नष्ट कर दिया, और उनके बाद अन्य समुदायों को पैदा किया।
आयत 7
وَلَوْ نَزَّلْنَا عَلَيْكَ كِتَـٰبًۭا فِى قِرْطَاسٍۢ فَلَمَسُوهُ بِأَيْدِيهِمْ لَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ إِنْ هَـٰذَآ إِلَّا سِحْرٌۭ مُّبِينٌۭ
وَلَوْ
और अगर
نَزَّلْنَا
नाज़िल करते हम
عَلَيْكَ
आप पर
كِتَـٰبًۭا
एक किताब
فِى
in
قِرْطَاسٍۢ
काग़ज़ में
فَلَمَسُوهُ
फिर वो छू लेते उसे
بِأَيْدِيهِمْ
अपने हाथों से
لَقَالَ
अलबत्ता कहते
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
إِنْ
नहीं है
هَـٰذَآ
ये
إِلَّا
मगर
سِحْرٌۭ
जादू
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला/वाज़ेह
और यदि हम तुम्हारे ऊपर काग़ज़ में लिखी-लिखाई किताब भी उतार देते और उसे लोग अपने हाथों से छू भी लेते तब भी, जिन्होंने इनकार किया है, वे यही कहते, "यह तो बस एक खुला जादू हैं।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) यदि हम आपपर काग़ज़ में लिखी हुई कोई पुस्तक उतार दें और वे उसे अपनी आँखों से देख लें तथा पुस्तक को अपने हाथों से छूकर उसके बार में सुनिश्चित कर लें; तो भी वे अपने इनकार और हठ (दुराग्रह) के कारण उसपर हरगिज़ ईमान नहीं लाएँगे, और निश्चय यही कहेंगे : जो कुछ तुम लाए हो वह तो जादू के सिवा कुछ नहीं है। अतः हम उसपर कदापि ईमान नहीं लाएँगे।
आयत 8
وَقَالُوا۟ لَوْلَآ أُنزِلَ عَلَيْهِ مَلَكٌۭ ۖ وَلَوْ أَنزَلْنَا مَلَكًۭا لَّقُضِىَ ٱلْأَمْرُ ثُمَّ لَا يُنظَرُونَ
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
لَوْلَآ
क्यों नहीं
أُنزِلَ
उतारा गया
عَلَيْهِ
उस पर
مَلَكٌۭ ۖ
कोई फ़रिश्ता
وَلَوْ
और अगर
أَنزَلْنَا
उतारते हम
مَلَكًۭا
कोई फ़रिश्ता
لَّقُضِىَ
अलबत्ता फ़ैसला कर दिया जाता
ٱلْأَمْرُ
मामले का
ثُمَّ
फिर
لَا
no
يُنظَرُونَ
ना वो मोहलत दिए जाते
उनका तो कहना है, "इस (नबी) पर कोई फ़रिश्ता (खुले रूप में) क्यों नहीं उतारा गया?" हालाँकि यदि हम फ़रिश्ता उतारते तो फ़ैसला हो चुका होता। फिर उन्हें कोई मुहल्लत न मिलती
तफ़्सीर:
और इन काफिरों ने कहा : यदि अल्लाह ने मुहम्मद के साथ कोई फ़रिश्ता उतारा होता, जो हमसे बात करता और गवाही देता कि वह एक रसूल हैं, तो हम अवश्य ईमान ले आते। और यदि हमने उनके चाहने के अनुसार कोई फ़रिश्ता उतारा होता, तो निश्चय हम उन्हें नष्ट कर देते यदि वे ईमान नहीं लाते, और यदि वे उतरते तो उन्हें तौबा करने का समय नहीं दिया जाता।
आयत 9
وَلَوْ جَعَلْنَـٰهُ مَلَكًۭا لَّجَعَلْنَـٰهُ رَجُلًۭا وَلَلَبَسْنَا عَلَيْهِم مَّا يَلْبِسُونَ
وَلَوْ
और अगर
جَعَلْنَـٰهُ
बनाते हम उसे
مَلَكًۭا
एक फ़रिश्ता
لَّجَعَلْنَـٰهُ
अलबत्ता बनाते हम उसे
رَجُلًۭا
आदमी ही
وَلَلَبَسْنَا
और अलबत्ता मुशतबा कर देते हम
عَلَيْهِم
उन पर
مَّا
जो
يَلْبِسُونَ
वो शुबह करते हैं
यह बात भी है कि यदि हम उसे (नबी को) फ़रिश्ता बना देते तो उसे आदमी ही (के रूप का) बनाते। इस प्रकार उन्हें उसी सन्देह में डाल देते, जिस सन्देह में वे इस समय पड़े हुए है
तफ़्सीर:
यदि हम उनकी ओर भेजे हुए रसूल को फ़रिश्ता बनाते, तो निश्चय हम उसे मनुष्य का रूप देते, ताकि वे उसकी बात सुन सकें और उससे ग्रहण कर सकें; क्योंकि वे फ़रिश्ते के साथ ऐसा नहीं कर सकते हैं यदि वह अपने उस रूप में हो जिसपर अल्लाह ने उसे बनाया है। और यदि हम उसे किसी आदमी के रूप में बनाते, तो अवश्य उसका मामला उनके लिए संदिग्ध हो जाता।
आयत 10
وَلَقَدِ ٱسْتُهْزِئَ بِرُسُلٍۢ مِّن قَبْلِكَ فَحَاقَ بِٱلَّذِينَ سَخِرُوا۟ مِنْهُم مَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ
وَلَقَدِ
और अलबत्ता तहक़ीक़
ٱسْتُهْزِئَ
मज़ाक़ उड़ाया गया
بِرُسُلٍۢ
कई रसूलों का
مِّن
from
قَبْلِكَ
आप से पहले
فَحَاقَ
तो घेर लिया
بِٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
سَخِرُوا۟
तमस्ख़र किया
مِنْهُم
उनमें से
مَّا
उसने जो
كَانُوا۟
थे वो
بِهِۦ
जिसका
يَسْتَهْزِءُونَ
वो मज़ाक़ उड़ाते
तुमसे पहले कितने ही रसूलों की हँसी उड़ाई जा चुकी है। अन्ततः जिन लोगों ने उनकी हँसी उड़ाई थी, उन्हें उसी न आ घेरा जिस बात पर वे हँसी उड़ाते थे
तफ़्सीर:
यदि ये लोग आपके साथ एक फ़रिश्ता उतारने की माँग करके उपहास करते हैं, तो निश्चय आपसे पहले कई समुदायों ने अपने रसूलों का उपहास किया था। तो उन्हें उस यातना ने घेर लिया, जिसका वे इनकार करते थे, और उससे डराए जाने पर उसका मज़ाक उड़ाते थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सूरह की शुरुआत तौहीद की दावत और मुशरिकों के इनकार के ज़िक्र से होती है। यह हमें सिखाता है कि अल्लाह की कुदरत की निशानियां हर तरफ मौजूद हैं, बस उन पर गौर करने की ज़रूरत है। आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हमें कायनात को देखकर गफलत की बजाय शुक्रगुज़ार होना चाहिए। यही सबक हमें अपनी रोज़मर्रा की नेमतों को नज़रअंदाज़ न करने की तरफ बुलाता है।
आयत 11
قُلْ سِيرُوا۟ فِى ٱلْأَرْضِ ثُمَّ ٱنظُرُوا۟ كَيْفَ كَانَ عَـٰقِبَةُ ٱلْمُكَذِّبِينَ
قُلْ
कह दीजिए
سِيرُوا۟
चलो फिरो
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
ثُمَّ
फिर
ٱنظُرُوا۟
देखो
كَيْفَ
किस तरह
كَانَ
हुआ
عَـٰقِبَةُ
अंजाम
ٱلْمُكَذِّبِينَ
झुठलाने वालों का
कहो, "धरती में चल-फिरकर देखो कि झुठलानेवालों का क्या परिणाम हुआ!"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन उपहास करने वाले झुठलाने वाले लोगों से कह दें : धरती में चलो-फिरो, फिर विचार करो कि अल्लाह के रसूलों को झुठलाने वालों का अंत कैसे हुआ। निश्चय उनपर अल्लाह की यातना उतरी इसके उपरांत कि वे अति शक्तिशाली और अजेय थे।
आयत 12
قُل لِّمَن مَّا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ قُل لِّلَّهِ ۚ كَتَبَ عَلَىٰ نَفْسِهِ ٱلرَّحْمَةَ ۚ لَيَجْمَعَنَّكُمْ إِلَىٰ يَوْمِ ٱلْقِيَـٰمَةِ لَا رَيْبَ فِيهِ ۚ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
قُل
कह दीजिए
لِّمَن
किस के लिए है
مَّا
जो कुछ
فِى
(is) in
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों में
وَٱلْأَرْضِ ۖ
और ज़मीन में है
قُل
कह दीजिए
لِّلَّهِ ۚ
अल्लाह ही के लिए है
كَتَبَ
उस ने लिख दी
عَلَىٰ
upon
نَفْسِهِ
अपने नफ़्स पर
ٱلرَّحْمَةَ ۚ
रहमत
لَيَجْمَعَنَّكُمْ
अलबत्ता वो ज़रूर जमा करेगा तुम्हें
إِلَىٰ
on
يَوْمِ
तरफ़ दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
لَا
(there is) no
رَيْبَ
नहीं कोई शक
فِيهِ ۚ
उसमें
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
خَسِرُوٓا۟
नुक़सान में डाला
أَنفُسَهُمْ
अपने नफ़्सों को
فَهُمْ
पस वो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाऐंगे
कहो, "आकाशों और धरती में जो कुछ है किसका है?" कह दो, "अल्लाह ही का है।" उसने दयालुता को अपने ऊपर अनिवार्य कर दिया है। निश्चय ही वह तुम्हें क़ियामत के दिन इकट्ठा करेगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है। जिन लोगों ने अपने-आपको घाटे में डाला है, वही है जो ईमान नहीं लाते
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) उनसे पूछिए : आकाशों तथा धरती की बादशाही और जो कुछ उन दोनों के बीच है, उसकी बादशाही किसकी है? आप कह दें : उन सब की बादशाही अल्लाह की है। उसने अपने बंदों पर अनुग्रह करते हुए अपने ऊपर दया करना लिख दिया है। इसलिए वह उन्हें यातना देने में जल्दी नहीं करता। यहाँ तक कि अगर उन्होंने तौबा नहीं की तो अल्लाह उन सभी को क़ियामत के दिन इकट्ठा करेगा, जिस दिन के बारे में कोई संदेह नहीं है। जिन लोगों ने अल्लाह का इनकार कर अपने आपको घाटे में डाला, वे ईमान नहीं लाते हैं, कि ख़ुद को घाटे से बचा सकें।
आयत 13
۞ وَلَهُۥ مَا سَكَنَ فِى ٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ ۚ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ
۞ وَلَهُۥ
और उसी के लिए है
مَا
जो
سَكَنَ
साकिन है (ठहरा हुआ)
فِى
in
ٱلَّيْلِ
रात में
وَٱلنَّهَارِ ۚ
और दिन में
وَهُوَ
और वो
ٱلسَّمِيعُ
खूब सुनने वाला है
ٱلْعَلِيمُ
खूब जानने वाला है
हाँ, उसी का है जो भी रात में ठहरता है और दिन में (गतिशील होता है), और वह सब कुछ सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
रात और दिन में जो कुछ बस रहा है, सबका मालिक अकेला अल्लाह है। तथा वह उनकी बातों को सुनने वाला, उनके कर्मों को जानने वाला है और वह उन्हें उनका प्रतिफल देगा।
आयत 14
قُلْ أَغَيْرَ ٱللَّهِ أَتَّخِذُ وَلِيًّۭا فَاطِرِ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَهُوَ يُطْعِمُ وَلَا يُطْعَمُ ۗ قُلْ إِنِّىٓ أُمِرْتُ أَنْ أَكُونَ أَوَّلَ مَنْ أَسْلَمَ ۖ وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ
قُلْ
कह दीजिए
أَغَيْرَ
क्या सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
أَتَّخِذُ
मैं बना लूँ
وَلِيًّۭا
कोई दोस्त
فَاطِرِ
पैदा करने वाला है
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन का
وَهُوَ
और वो
يُطْعِمُ
वो खिलाता है
وَلَا
और नहीं
يُطْعَمُ ۗ
वो खिलाया जाता
قُلْ
कह दीजिए
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أُمِرْتُ
हुक्म दिया गया हूँ मैं
أَنْ
कि
أَكُونَ
मैं हो जाऊँ
أَوَّلَ
सबसे पहला
مَنْ
जो
أَسْلَمَ ۖ
इस्लाम लाया
وَلَا
और ना
تَكُونَنَّ
हरगिज़ आप हों
مِنَ
of
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकीन में से
कहो, "क्या मैं आकाशों और धरती को पैदा करनेवाले अल्लाह के सिवा किसी और को संरक्षक बना लूँ? उसका हाल यह है कि वह खिलाता है और स्वयं नहीं खाता।" कहो, "मुझे आदेश हुआ है कि सबसे पहले मैं उसके आगे झुक जाऊँ। और (यह कि) तुम बहुदेववादियों में कदापि सम्मिलित न होना।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उन मुश्रिकों से कह दें, जो अल्लाह के साथ उसके अलावा मूर्तियों और अन्य चीज़ों की पूजा करते हैं : क्या यह बात विवेक संगत है कि मैं अल्लाह के अलावा किसी अन्य को सहायक बना लूँ, जिससे प्रेम करूँ और सहायता माँगूँ?! जबकि वह अल्लाह ही है, जिसने आकाशों और धरती को बिना किसी पूर्व उदाहरण के बनाया, चुनाँचे उससे पहले उन्हें किसी ने नहीं बनाया। तथा वही है, जो अपने बंदों में से जिसे चाहता है, जीविका प्रदान करता है। तथा उसके बंदों में से कोई भी उसे जीविका नहीं देता। क्योंकि वह अपने बंदों से बे-नियाज़ है (उसे किसी की आवश्यकता नहीं), जबकि उसके बंदे उसके ज़रूरतमंद हैं। (ऐ रसूल!) आप कह दें कि मेरे पालनहार ने मुझे आदेश दिया है कि मैं इस उम्मत में से सबसे पहले उसका आज्ञाकारी बन जाऊँ और मुझे उन लोगों में शामिल होने से रोका है, जो उसके साथ दूसरों को शरीक बनाते हैं।
आयत 15
قُلْ إِنِّىٓ أَخَافُ إِنْ عَصَيْتُ رَبِّى عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍۢ
قُلْ
कह दीजिए
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَخَافُ
मैं डरता हूँ
إِنْ
अगर
عَصَيْتُ
नाफ़रमानी की मैंने
رَبِّى
अपने रब की
عَذَابَ
अज़ाब से
يَوْمٍ
(of) a Day
عَظِيمٍۢ
बड़े दिन के
कहो, "यदि मैं अपने रब की अवज्ञा करूँ, तो उस स्थिति में मुझे एक बड़े (भयानक) दिन की यातना का डर है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दें : मुझे डर है कि अगर मैं उन चीज़ों को करके जो अल्लाह ने मुझपर हराम की हैं, जैसे शिर्क इत्यादि, या उन चीज़ों को त्याग करके जिनका अल्लाह ने मुझे आदेश दिया है, जैसे ईमान और आज्ञाकारिता के अन्य कार्य, अल्लाह की अवज्ञा करूँ, तो वह मुझे क़ियामत के दिन बहुत बड़ी यातना देगा।
आयत 16
مَّن يُصْرَفْ عَنْهُ يَوْمَئِذٍۢ فَقَدْ رَحِمَهُۥ ۚ وَذَٰلِكَ ٱلْفَوْزُ ٱلْمُبِينُ
مَّن
जो कोई
يُصْرَفْ
फेर दिया गया
عَنْهُ
उस से (अज़ाब)
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
رَحِمَهُۥ ۚ
उसने रहम किया उस पर
وَذَٰلِكَ
और यही है
ٱلْفَوْزُ
कामयाबी
ٱلْمُبِينُ
खुली/वाज़ेह
उस दिन वह जिसपर से टल गई, उसपर अल्लाह ने दया की, और यही स्पष्ट सफलता है
तफ़्सीर:
जिस व्यक्ति से अल्लाह क़ियामत के दिन उस यातना को दूर कर देता है, तो निश्चय वह अपने आप पर अल्लाह की दया के साथ सफल हो गया, तथा यातना से यह मुक्ति ही वह स्पष्ट सफलता है, जिसके बराबर कोई सफलता नहीं है।
आयत 17
وَإِن يَمْسَسْكَ ٱللَّهُ بِضُرٍّۢ فَلَا كَاشِفَ لَهُۥٓ إِلَّا هُوَ ۖ وَإِن يَمْسَسْكَ بِخَيْرٍۢ فَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌۭ
وَإِن
और अगर
يَمْسَسْكَ
पहुँचाए आपको
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِضُرٍّۢ
कोई नुक़सान
فَلَا
तो नहीं
كَاشِفَ
कोई दूर करने वाला
لَهُۥٓ
उसे
إِلَّا
मगर
هُوَ ۖ
वो ही
وَإِن
और अगर
يَمْسَسْكَ
वो पहुँचाए आपको
بِخَيْرٍۢ
कोई भलाई
فَهُوَ
तो वो
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌۭ
ख़ूब क़ुदरत रखने वाला है
और यदि अल्लाह तुम्हें कोई कष्ट पहुँचाए तो उसके अतिरिक्त उसे कोई दूर करनेवाला नहीं है और यदि वह तुम्हें कोई भलाई पहुँचाए तो उसे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
(ऐ आदम के बेटे!) यदि अल्लाह की ओर से तुमपर कोई विपत्ति आ पड़े, तो अल्लाह के अलावा कोई भी उस विपत्ति को तुमसे टालने वाला नहीं है, और यदि उसकी ओर से तुम्हें कोई भलाई पहुँचे, तो उसके अनुग्रह को कोई हटाने वाला नहीं है। क्योंकि वह सब कुछ करने में सक्षम है, उसे कोई चीज़ विवश नहीं कर सकती।
आयत 18
وَهُوَ ٱلْقَاهِرُ فَوْقَ عِبَادِهِۦ ۚ وَهُوَ ٱلْحَكِيمُ ٱلْخَبِيرُ
وَهُوَ
और वो
ٱلْقَاهِرُ
ग़लबा रखने वाला है
فَوْقَ
ऊपर
عِبَادِهِۦ ۚ
अपने बन्दों के
وَهُوَ
और वो
ٱلْحَكِيمُ
बहुत हिकमत वाला है
ٱلْخَبِيرُ
ख़ूब बाख़बर है
उसे अपने बन्दों पर पूर्ण अधिकार प्राप्त है। और वह तत्वदर्शी, ख़बर रखनेवाला है
तफ़्सीर:
वह अपने बंदों पर ग़ालिब (हावी) और उन्हें अपने अधीन रखने वाला है, हर प्रकार से उनसे ऊपर है। उसे कोई चीज़ विवश नहीं कर सकती और न कोई उसे पराजित कर सकता है। हर कोई उसके अधीन है। वह अपने बंदों के ऊपर है जैसा कि उसकी महिमा के योग्य है। वह अपनी रचना, प्रबंधन और विधान में पूर्ण हिकमत वाला, हर चीज़ की ख़बर रखने वाला है। अतः उससे कुछ भी छिपा नहीं है।
आयत 19
قُلْ أَىُّ شَىْءٍ أَكْبَرُ شَهَـٰدَةًۭ ۖ قُلِ ٱللَّهُ ۖ شَهِيدٌۢ بَيْنِى وَبَيْنَكُمْ ۚ وَأُوحِىَ إِلَىَّ هَـٰذَا ٱلْقُرْءَانُ لِأُنذِرَكُم بِهِۦ وَمَنۢ بَلَغَ ۚ أَئِنَّكُمْ لَتَشْهَدُونَ أَنَّ مَعَ ٱللَّهِ ءَالِهَةً أُخْرَىٰ ۚ قُل لَّآ أَشْهَدُ ۚ قُلْ إِنَّمَا هُوَ إِلَـٰهٌۭ وَٰحِدٌۭ وَإِنَّنِى بَرِىٓءٌۭ مِّمَّا تُشْرِكُونَ
قُلْ
कह दीजिए
أَىُّ
कौन सी
شَىْءٍ
चीज़ है
أَكْبَرُ
सबसे बड़ी
شَهَـٰدَةًۭ ۖ
गवाही में
قُلِ
कह दीजिए
ٱللَّهُ ۖ
अल्लाह
شَهِيدٌۢ
गवाह है
بَيْنِى
दर्मियान मेरे
وَبَيْنَكُمْ ۚ
और दर्मियान तुम्हारे
وَأُوحِىَ
और वही किया गया
إِلَىَّ
मेरी तरफ़
هَـٰذَا
ये
ٱلْقُرْءَانُ
क़ुरआन
لِأُنذِرَكُم
ताकि मैं डराऊँ तुम्हें
بِهِۦ
साथ इसके
وَمَنۢ
और जिसे
بَلَغَ ۚ
ये पहुँचे
أَئِنَّكُمْ
क्या बेशक तुम
لَتَشْهَدُونَ
अलबत्ता तुम गवाही देते हो
أَنَّ
बेशक
مَعَ
साथ
ٱللَّهِ
अल्लाह के
ءَالِهَةً
इलाह हैं
أُخْرَىٰ ۚ
दूसरे
قُل
कह दीजिए
لَّآ
Not
أَشْهَدُ ۚ
नहीं मैं गवाही देता
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّمَا
बेशक
هُوَ
वो
إِلَـٰهٌۭ
इलाह है
وَٰحِدٌۭ
एक ही
وَإِنَّنِى
और बेशक मैं
بَرِىٓءٌۭ
बरी-उज़-ज़िम्मा हूँ
مِّمَّا
उससे जो
تُشْرِكُونَ
तुम शिर्क करते हो
कहो, "किस चीज़ की गवाही सबसे बड़ी है?" कहो, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह गवाह है। और यह क़ुरआन मेरी ओर वह्यी (प्रकाशना) किया गया है, ताकि मैं इसके द्वारा तुम्हें सचेत कर दूँ। और जिस किसी को यह अल्लाह के साथ दूसरे पूज्य भी है?" तुम कह दो, "मैं तो इसकी गवाही नहीं देता।" कह दो, "वह तो बस अकेला पूज्य है। और तुम जो उसका साझी ठहराते हो, उससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उन मुश्रिकों से, जो आपको झुठलाते हैं, कह दें : मेरी सच्चाई की सबसे महान और सबसे बड़ी गवाही कौन-सी चीज़ है? आप कह दें कि अल्लाह मेरी सच्चाई की सबसे बड़ी गवाही और सबसे महान चीज़ है, वह मेरे और तुम्हारे बीच गवाह है, वह जानता है जो कुछ मैं तुम्हारे पास लेकर आया हूँ और तुम उसका क्या जवाब दोगे। अल्लाह ने मेरी ओर इस क़ुरआन की वह़्य की है, ताकि मैं इसके द्वारा तुम्हें डराऊँ, तथा मैं इससे उन मनुष्यों और जिन्नों को डराऊँ, जिन तक यह (क़ुरआन) पहुँचे। (ऐ मुश्रिकों!) निःसंदेह तुम मानते हो कि अल्लाह के साथ और भी पूज्य हैं। (ऐ रसूल!) आप कह दें : मैं उसकी गवाही नहीं देता, जो तुमने स्वीकारा है, क्योंकि वह असत्य है। अल्लाह तो केवल एक ही पूज्य है, जिसका कोई शरीक नहीं, तथा मैं हर उस चीज़ से बरी हूँ, जो तुम उसके साथ शरीक ठहराते हो।
आयत 20
ٱلَّذِينَ ءَاتَيْنَـٰهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ يَعْرِفُونَهُۥ كَمَا يَعْرِفُونَ أَبْنَآءَهُمُ ۘ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
ءَاتَيْنَـٰهُمُ
दी हमने उन्हें
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
يَعْرِفُونَهُۥ
वो पहचानते हैं उसे
كَمَا
जैसा कि
يَعْرِفُونَ
वो पहचानते हैं
أَبْنَآءَهُمُ ۘ
अपने बेटों को
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
خَسِرُوٓا۟
ख़सारे में डाला
أَنفُسَهُمْ
अपने नफ़्सों को
فَهُمْ
तो वो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाते
जिन लोगों को हमने किताब दी है, वे उसे इस प्रकार पहचानते है, जिस प्रकार अपने बेटों को पहचानते है। जिन लोगों ने अपने आपको घाटे में डाला है, वही ईमान नहीं लाते
तफ़्सीर:
जिन यहूदियों को हमने तौरात दिया और जिन ईसाइयों को हमने इंजील दिया, वे पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को पूर्ण रूप से जानते हैं, जैसे वे अपने बच्चों को दूसरों के बच्चों के बीच से पहचान लेते हैं। अतः वे लोग जिन्होंने स्वयं को आग (नरक) में डालकर अपने आपको घाटे में डाला है, वे ईमान नहीं लाएँगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
यहां कयामत के यकीन और रसूलों को झुठलाने वालों का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि जो लोग हक बात को झुठलाते हैं, आखिरकार उन्हें पछतावा होता है। हमें हक बात कबूल करने में जल्दबाज़ी और ज़िद से बचना चाहिए, चाहे वह किसी से भी आए।
आयत 21
وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا أَوْ كَذَّبَ بِـَٔايَـٰتِهِۦٓ ۗ إِنَّهُۥ لَا يُفْلِحُ ٱلظَّـٰلِمُونَ
وَمَنْ
और कौन
أَظْلَمُ
बड़ा ज़ालिम है
مِمَّنِ
उससे जो
ٱفْتَرَىٰ
गढ़ ले
عَلَى
against
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
كَذِبًا
झूठ
أَوْ
या
كَذَّبَ
झुठलाए
بِـَٔايَـٰتِهِۦٓ ۗ
उसकी आयात को
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَا
not
يُفْلِحُ
नहीं वो फ़लाह पाऐंगे
ٱلظَّـٰلِمُونَ
जो ज़ालिम हैं
और उससे बढ़कर अत्याचारी कौन होगा, जो अल्लाह पर झूठ गढ़े या उसकी आयतों को झुठलाए। निस्सन्देह अत्याचारी कभी सफल नहीं हो सकते
तफ़्सीर:
जिसने अल्लाह का कोई साझी ठहराया और उसके साथ उसकी इबादत की, अथवा अल्लाह की उन आयतों को झुठलाया, जो उसने अपने रसूल पर उतारीं, उससे बड़ा अत्याचारी कोई नहीं। अल्लाह की ओर साझी की निस्बत करके और उसकी आयतों को झुठलाकर अत्याचार करने वाले लोग कभी सफल नहीं होंगे, यदि उन्होंने तौबा न की।
आयत 22
وَيَوْمَ نَحْشُرُهُمْ جَمِيعًۭا ثُمَّ نَقُولُ لِلَّذِينَ أَشْرَكُوٓا۟ أَيْنَ شُرَكَآؤُكُمُ ٱلَّذِينَ كُنتُمْ تَزْعُمُونَ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
نَحْشُرُهُمْ
हम इकट्ठा करेंगे उनको
جَمِيعًۭا
सबके सब को
ثُمَّ
फिर
نَقُولُ
हम कहेंगे
لِلَّذِينَ
उन से जिन्होंने
أَشْرَكُوٓا۟
शिर्क किया
أَيْنَ
कहाँ हैं
شُرَكَآؤُكُمُ
शरीक तुम्हारे
ٱلَّذِينَ
वो जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَزْعُمُونَ
तुम दावा करते
और उस दिन को याद करो जब हम सबको इकट्ठा करेंगे; फिर बहुदेववादियों से पूछेंगे, "कहाँ है तुम्हारे ठहराए हुए साझीदार, जिनका तुम दावा किया करते थे?"
तफ़्सीर:
और क़ियामत के दिन को याद करें, जब हम उन सबको इकट्ठा करेंगे, उनमें से किसी को भी नहीं छोड़ेंगे, फिर हम उन लोगों से जिन्होंने अल्लाह के साथ उसके अलावा की पूजा की, उन्हें फटकार लगाते हुए कहेंगे : तुम्हारे वे साझी कहाँ हैं, जिन्हें तुम झूठा दावा करते थे कि वे अल्लाह के साझी हैं?!
आयत 23
ثُمَّ لَمْ تَكُن فِتْنَتُهُمْ إِلَّآ أَن قَالُوا۟ وَٱللَّهِ رَبِّنَا مَا كُنَّا مُشْرِكِينَ
ثُمَّ
फिर
لَمْ
नहीं
تَكُن
होगा
فِتْنَتُهُمْ
उज़र उनका
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
قَالُوا۟
वो कहेंगे
وَٱللَّهِ
क़सम है अल्लाह की
رَبِّنَا
जो रब है हमारा
مَا
ना
كُنَّا
थे हम
مُشْرِكِينَ
शिर्क करने वाले
फिर उनका कोई फ़िला (उपद्रव) शेष न रहेगा। सिवाय इसके कि वे कहेंगे, "अपने रब अल्लाह की सौगन्ध! हम बहुदेववादी न थे।"
तफ़्सीर:
इस परीक्षा के बाद उनका इसके सिवा कोई बहाना न होगा कि वे अपने पूज्यों से किनारा कर लेंगे और झूठ-मूठ कहेंगे : अल्लाह की क़सम! जो हमारा पालनहार है, हम दुनिया में तेरे साथ शिर्क करने वाले नहीं थे, बल्कि हम तुझपर ईमान रखने वाले, तुझे एकमात्र पूज्य मानने वाले थे।
आयत 24
ٱنظُرْ كَيْفَ كَذَبُوا۟ عَلَىٰٓ أَنفُسِهِمْ ۚ وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَفْتَرُونَ
ٱنظُرْ
देखिए
كَيْفَ
किस तरह
كَذَبُوا۟
उन्होंने झूठ बोला
عَلَىٰٓ
against
أَنفُسِهِمْ ۚ
अपने नफ़्सों पर
وَضَلَّ
और गुम हो गए
عَنْهُم
उनसे
مَّا
जो
كَانُوا۟
थे वो
يَفْتَرُونَ
वो गढ़ते
देखो, कैसा वे अपने विषय में झूठ बोले। और वह गुम होकर रह गया जो वे घड़ा करते थे
तफ़्सीर:
(ऐ मुहम्मद!) देखो कैसे इन लोगों ने अपने बारे में शिर्क का इनकार करके खुद से झूठ बोला, तथा ये अपने सांसारिक जीवन में अल्लाह के साथ जो साझी गढ़ा करते थे, वे इनसे ग़ायब हो गए और इन्हें असहाय छोड़ गए।
आयत 25
وَمِنْهُم مَّن يَسْتَمِعُ إِلَيْكَ ۖ وَجَعَلْنَا عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ أَكِنَّةً أَن يَفْقَهُوهُ وَفِىٓ ءَاذَانِهِمْ وَقْرًۭا ۚ وَإِن يَرَوْا۟ كُلَّ ءَايَةٍۢ لَّا يُؤْمِنُوا۟ بِهَا ۚ حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءُوكَ يُجَـٰدِلُونَكَ يَقُولُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ إِنْ هَـٰذَآ إِلَّآ أَسَـٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ
وَمِنْهُم
और उनमें से कोई है
مَّن
जो
يَسْتَمِعُ
कान लगाता है
إِلَيْكَ ۖ
तरफ़ आपके
وَجَعَلْنَا
और डाल दिए हमने
عَلَىٰ
over
قُلُوبِهِمْ
उनके दिलों पर
أَكِنَّةً
पर्दे
أَن
कि
يَفْقَهُوهُ
वो समझ सकें उसे (ना)
وَفِىٓ
and in
ءَاذَانِهِمْ
और उनके कानों में
وَقْرًۭا ۚ
बोझ है
وَإِن
और अगर
يَرَوْا۟
वो देख लें
كُلَّ
हर
ءَايَةٍۢ
निशानी
لَّا
not
يُؤْمِنُوا۟
ना वो ईमान लाऐंगे
بِهَا ۚ
उस पर
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
جَآءُوكَ
वो आते हैं आपके पास
يُجَـٰدِلُونَكَ
वो झगड़ा करते हैं आपसे
يَقُولُ
कहते हैं
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَفَرُوٓا۟
कुफ़्र किया
إِنْ
नहीं
هَـٰذَآ
ये
إِلَّآ
मगर
أَسَـٰطِيرُ
कहानियाँ
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों की
और उनमें कुछ लोग ऐसे है जो तुम्हारी ओर कान लगाते है, हालाँकि हमने तो उनके दिलों पर परदे डाल रखे है कि वे उसे समझ न सकें और उनके कानों में बोझ डाल दिया है। और वे चाहे प्रत्येक निशानी देख लें तब भी उसे मानेंगे नहीं; यहाँ तक कि जब वे तुम्हारे पास आकर तुमसे झगड़ते है, तो अविश्वास की नीति अपनानेवाले कहते है, "यह तो बस पहले को लोगों की गाथाएँ है।"
तफ़्सीर:
ऐ रसूल! जब आप क़ुरआन पढ़ते हैं, तो मुश्रिकों में से कुछ लोग आपकी तरफ़ कान लगाकर सुनते हैं, लेकिन वे जो कुछ सुनते हैं उससे लाभ नहीं उठाते; क्योंकि हमने उनके दिलों पर, उनके हठ और उनके मुँह फेरने के कारण, परदे डाल दिए हैं, ताकि वे क़ुरआन को ना समझ सकें और हमने उनके कानों में लाभप्रद सुनवाई से बहरापन रखा है। वे चाहे कितने ही स्पष्ट प्रमाण और स्पष्ट तर्क देख लें, उनपर ईमान नहीं लाएँगे, यहाँ तक कि जब वे आपके पास आते हैं, आपसे झूठ के साथ सत्य के बारे में झगड़ते हैं। वे कहते हैं : जो कुछ आप लेकर आए हैं, वह पहले लोगों की किताबों से लिया गया है।
आयत 26
وَهُمْ يَنْهَوْنَ عَنْهُ وَيَنْـَٔوْنَ عَنْهُ ۖ وَإِن يُهْلِكُونَ إِلَّآ أَنفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ
وَهُمْ
और वो
يَنْهَوْنَ
वो रोकते हैं
عَنْهُ
उससे
وَيَنْـَٔوْنَ
और वो दूर रहते हैं
عَنْهُ ۖ
उससे
وَإِن
और नहीं
يُهْلِكُونَ
वो हलाक करते
إِلَّآ
मगर
أَنفُسَهُمْ
अपने नफ़्सों को
وَمَا
और नहीं
يَشْعُرُونَ
वो शऊर रखते
और वे उससे दूसरों को रोकते है और स्वयं भी उससे दूर रहते है। वे तो बस अपने आपको ही विनष्ट कर रहे है, किन्तु उन्हें इसका एहसास नहीं
तफ़्सीर:
वे लोगों को रसूल पर ईमान लाने से मना करते हैं, और खुद भी उससे दूर रहते हैं। चुनाँचे जो व्यक्ति उससे लाभ उठाना चाहता है उसे लाभ नहीं उठाने देते और न ही वे स्वयं उससे लाभ उठाते हैं। और वे ऐसा करके केवल स्वयं को विनष्ट करते हैं। परंतु वे जानते ही नहीं कि वे जो कुछ कर रहे हैं, वह स्वयं का विनाश है।
आयत 27
وَلَوْ تَرَىٰٓ إِذْ وُقِفُوا۟ عَلَى ٱلنَّارِ فَقَالُوا۟ يَـٰلَيْتَنَا نُرَدُّ وَلَا نُكَذِّبَ بِـَٔايَـٰتِ رَبِّنَا وَنَكُونَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
وَلَوْ
और काश
تَرَىٰٓ
आप देखें
إِذْ
जब
وُقِفُوا۟
वो खड़े किए जाऐंगे
عَلَى
by
ٱلنَّارِ
ऊपर आग के
فَقَالُوا۟
तो वो कहेंगे
يَـٰلَيْتَنَا
ऐ काश हम
نُرَدُّ
हम लौटाए जाऐं
وَلَا
और ना
نُكَذِّبَ
हम झुठलाऐं
بِـَٔايَـٰتِ
आयात को
رَبِّنَا
अपने रब की
وَنَكُونَ
और हम हों
مِنَ
among
ٱلْمُؤْمِنِينَ
मोमिनों मे से
और यदि तुम उस समय देख सकते, जब वे आग के निकट खड़े किए जाएँगे और कहेंगे, "काश! क्या ही अच्छा होता कि हम फिर लौटा दिए जाएँ (कि माने) और अपने रब की आयतों को न झुठलाएँ और माननेवालों में हो जाएँ।"
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) यदि आप देखें, जब वे क़ियामत के दिन आग पर पेश किए जाएँगे, तो वे पछताते हुए कहेंगे : ऐ काश! हम दुनिया के जीवन में लौटा दिए जाएँ और अल्लाह की आयतों को न झुठलाएँ, और हम अल्लाह पर ईमान लाने वालों में से हो जाएँ - तो आप उनकी बुरी स्थिति का आश्चर्यपूर्ण दृश्य देखेंगे।
आयत 28
بَلْ بَدَا لَهُم مَّا كَانُوا۟ يُخْفُونَ مِن قَبْلُ ۖ وَلَوْ رُدُّوا۟ لَعَادُوا۟ لِمَا نُهُوا۟ عَنْهُ وَإِنَّهُمْ لَكَـٰذِبُونَ
بَلْ
बल्कि
بَدَا
ज़ाहिर हो गया
لَهُم
उनके लिए
مَّا
जो
كَانُوا۟
थे वो
يُخْفُونَ
वो छुपाते
مِن
from
قَبْلُ ۖ
इससे क़ब्ल
وَلَوْ
और अगर
رُدُّوا۟
वो लौटाए जाऐं
لَعَادُوا۟
अलबत्ता फिर करेंगे
لِمَا
उसी को जो
نُهُوا۟
वो रोके गए थे
عَنْهُ
जिससे
وَإِنَّهُمْ
और बेशक वो
لَكَـٰذِبُونَ
अलबत्ता झूठे हैं
कुछ नहीं, बल्कि जो कुछ वे पहले छिपाया करते थे, वह उनके सामने आ गया। और यदि वे लौटा भी दिए जाएँ, तो फिर वही कुछ करने लगेंगे जिससे उन्हें रोका गया था। निश्चय ही वे झूठे है
तफ़्सीर:
बात ऐसी नहीं है जो उन्होंने कही है कि यदि उन्हें वापस भेज दिया जाए, तो वे अवश्य ईमान ले आएँगे, बल्कि उनके सामने वह स्पष्ट हो गया जो वे अपने कथन : (والله ربنا ما كنا مشركين) ''अल्लाह की क़सम! जो हमारा पालनहार है, हम मुश्रिक न थे।'' से छिपा रहे थे, जब उनके अंगों ने उनके खिलाफ़ गवाही दी। और यदि मान लिया जाए कि वे दुनिया में वापस लौट गए, तो निश्चय वे उसी कुफ़्र एवं शिर्क की ओर लौटेंगे, जिससे उन्हें रोका गया है और वे अपने इस वादे में झूठे हैं कि यदि वे वापस लौट गए तो ईमान लाएँगे।
आयत 29
وَقَالُوٓا۟ إِنْ هِىَ إِلَّا حَيَاتُنَا ٱلدُّنْيَا وَمَا نَحْنُ بِمَبْعُوثِينَ
وَقَالُوٓا۟
और उन्होंने कहा
إِنْ
नहीं
هِىَ
ये
إِلَّا
मगर
حَيَاتُنَا
ज़िन्दगी हमारी
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
وَمَا
और नहीं
نَحْنُ
हम
بِمَبْعُوثِينَ
उठाए जाने वाले
और वे कहते है, "जो कुछ है बस यही हमारा सांसारिक जीवन है; हम कोई फिर उठाए जानेवाले नहीं हैं।"
तफ़्सीर:
और इन बहुदेववादियों ने कहा : इस जीवन के सिवा और कोई जीवन नहीं है, जिसमें हम रहते हैं और हम हिसाब के लिए उठाए जाने वाले नहीं हैं।
आयत 30
وَلَوْ تَرَىٰٓ إِذْ وُقِفُوا۟ عَلَىٰ رَبِّهِمْ ۚ قَالَ أَلَيْسَ هَـٰذَا بِٱلْحَقِّ ۚ قَالُوا۟ بَلَىٰ وَرَبِّنَا ۚ قَالَ فَذُوقُوا۟ ٱلْعَذَابَ بِمَا كُنتُمْ تَكْفُرُونَ
وَلَوْ
और काश
تَرَىٰٓ
आप देखें
إِذْ
जब
وُقِفُوا۟
वो खड़े किए जाऐंगे
عَلَىٰ
before
رَبِّهِمْ ۚ
अपने रब के सामने
قَالَ
वो फ़रमाएगा
أَلَيْسَ
क्या नहीं है
هَـٰذَا
ये
بِٱلْحَقِّ ۚ
हक़
قَالُوا۟
वो कहेंगे
بَلَىٰ
क्यों नहीं
وَرَبِّنَا ۚ
क़सम है हमारे रब की
قَالَ
वो फ़रमाएगा
فَذُوقُوا۟
पस चखो
ٱلْعَذَابَ
अज़ाब
بِمَا
बवजह उसके जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَكْفُرُونَ
तुम कुफ़्र करते
और यदि तुम देख सकते जब वे अपने रब के सामने खड़े किेए जाएँगे! वह कहेगा, "क्या यह यर्थाथ नहीं है?" कहेंगे, "क्यों नही, हमारे रब की क़सम!" वह कहेगा, "अच्छा तो उस इनकार के बदले जो तुम करते रहें हो, यातना का मज़ा चखो।"
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) यदि आप उस समय देखें, जब (मरणोपरांत) पुनर्जीवन का इनकार करने वाले अपने रब के सामने खड़े किए जाएँगे, तो आप उनकी बुरी स्थिति का आश्चर्यजनक दृश्य देखेंगे, जब अल्लाह उनसे कहेगा : क्या यह पुनर्जीवन जिसे तुम झुठलाया करते थे, एक निश्चित सत्य नहीं है, जिसमें कोई शक या संदेह नहीं?! वे कहेंगे : हम अपने उस रब की क़सम खाते हैं, जिसने हमें बनाया है, कि निःसंदेह यह एक निश्चित सत्य है, जिसमें कोई संदेह नहीं। उस समय अल्लाह उनसे कहेगा : तुम इस दिन का इनकार करने के कारण यातना का स्वाद चखो; क्योंकि तुम दुनिया के जीवन में इसे झुठलाया करते थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इस हिस्से में कयामत के दिन के मंज़र का ज़िक्र है, जब इनकार करने वाले भी हकीकत तस्लीम करने पर मजबूर होंगे। यह सबक हमें सिखाता है कि दुनिया की ज़िंदगी अस्थायी है, इसलिए हर फैसला आखिरत को ध्यान में रखकर लेना चाहिए।
आयत 31
قَدْ خَسِرَ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِلِقَآءِ ٱللَّهِ ۖ حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءَتْهُمُ ٱلسَّاعَةُ بَغْتَةًۭ قَالُوا۟ يَـٰحَسْرَتَنَا عَلَىٰ مَا فَرَّطْنَا فِيهَا وَهُمْ يَحْمِلُونَ أَوْزَارَهُمْ عَلَىٰ ظُهُورِهِمْ ۚ أَلَا سَآءَ مَا يَزِرُونَ
قَدْ
तहक़ीक़
خَسِرَ
ख़सारे में रहे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِلِقَآءِ
मुलाक़ात को
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह कि
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
جَآءَتْهُمُ
आ जाएगी उनके पास
ٱلسَّاعَةُ
घड़ी (क़यामत की)
بَغْتَةًۭ
अचानक
قَالُوا۟
वो कहेंगे
يَـٰحَسْرَتَنَا
हाय अफ़सोस हमारा
عَلَىٰ
उस पर
مَا
जो
فَرَّطْنَا
कमी-कोताही की हमने
فِيهَا
उस के बारे में
وَهُمْ
और वो
يَحْمِلُونَ
वो उठाऐंगे
أَوْزَارَهُمْ
बोझ अपने
عَلَىٰ
on
ظُهُورِهِمْ ۚ
अपनी पुश्तों पर
أَلَا
ख़बरदार
سَآءَ
कितना बुरा है
مَا
जो
يَزِرُونَ
बोझ वो उठाऐंगे
वे लोग घाटे में पड़े, जिन्होंने अल्लाह से मिलने को झुठलाया, यहाँ तक कि जब अचानक उनपर वह घड़ी आ जाएगी तो वे कहेंगे, "हाय! अफ़सोस, उस कोताही पर जो इसके विषय में हमसे हुई।" और हाल यह होगा कि वे अपने बोझ अपनी पीठों पर उठाए होंगे। देखो, कितना बुरा बोझ है जो ये उठाए हुए है!
तफ़्सीर:
निश्चय वे लोग घाटे में रहे, जिन्होंने क़ियामत के दिन दोबारा जीवित किए जाने को झुठलाया और अल्लाह के सामने खड़े होने को असंभव समझा, यहाँ तक कि जब बिना पूर्व ज्ञान के उनके पास अचानक क़ियामत आ पहुँचेगी, तो पछतावे की तीव्रता से कहेंगे : हाय हमारा अफसोस और हमारी निराशा! कि हमने अल्लाह के पक्ष में, उसके साथ कुफ़्र करके और क़ियामत के दिन के लिए तैयारी न करके, बड़ी कोताही की। और वे अपने पापों को अपनी पीठों पर उठाए होंगे। सुन लो! बहुत बुरा है, जो वे उन पापों का बोझ उठाएँगे।
आयत 32
وَمَا ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَآ إِلَّا لَعِبٌۭ وَلَهْوٌۭ ۖ وَلَلدَّارُ ٱلْـَٔاخِرَةُ خَيْرٌۭ لِّلَّذِينَ يَتَّقُونَ ۗ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
وَمَا
और नहीं
ٱلْحَيَوٰةُ
ज़िन्दगी
ٱلدُّنْيَآ
दुनिया की
إِلَّا
मगर
لَعِبٌۭ
खेल
وَلَهْوٌۭ ۖ
और तमाशा
وَلَلدَّارُ
और अलबत्ता घर
ٱلْـَٔاخِرَةُ
आख़िरत का
خَيْرٌۭ
बेहतर है
لِّلَّذِينَ
उनके लिए जो
يَتَّقُونَ ۗ
तक़वा करते हैं
أَفَلَا
क्या भला नहीं
تَعْقِلُونَ
तुम अक़्ल से काम लेते
सांसारिक जीवन तो एक खेल और तमाशे (ग़फलत) के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है जबकि आख़िरत का घर उन लोगों के लिए अच्छा है, जो डर रखते है। तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते?
तफ़्सीर:
इस संसार का जीवन जिसके प्रति तुम्हारा झुकाव है, उस व्यक्ति के लिए खेल-कूद और धोखे के सिवा कुछ नहीं है, जो इसमें अल्लाह को प्रसन्न करने वाला काम नहीं करता है। रही बात आख़िरत के घर की, तो यह उन लोगों के लिए बेहतर है, जो अल्लाह से डरते हैं, अतएव उसके ईमान और आज्ञाकारिता के आदेश का पालन करते हैं, तथा उसके शिर्क और अवज्ञा के निषेध से बचते हैं। तो क्या (ऐ बहुदेववादियो!) तुम इस बात को नहीं समझते?! ताकि तुम ईमान लाओ और अच्छे कर्म करो।
आयत 33
قَدْ نَعْلَمُ إِنَّهُۥ لَيَحْزُنُكَ ٱلَّذِى يَقُولُونَ ۖ فَإِنَّهُمْ لَا يُكَذِّبُونَكَ وَلَـٰكِنَّ ٱلظَّـٰلِمِينَ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ يَجْحَدُونَ
قَدْ
तहक़ीक़
نَعْلَمُ
हम जानते हैं
إِنَّهُۥ
कि बेशक वो
لَيَحْزُنُكَ
अलबत्ता ग़मगीन करता है आपको
ٱلَّذِى
जो
يَقُولُونَ ۖ
वो कहते हैं
فَإِنَّهُمْ
पस बेशक वो
لَا
(do) not
يُكَذِّبُونَكَ
नहीं वो झुठलाते आपको
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिम
بِـَٔايَـٰتِ
the Verses
ٱللَّهِ
अल्लाह की आयात का ही
يَجْحَدُونَ
वो इन्कार करते हैं
हमें मालूम है, जो कुछ वे कहते है उससे तुम्हें दुख पहुँचता है। तो वे वास्तव में तुम्हें नहीं झुठलाते, बल्कि उन अत्याचारियो को तो अल्लाह की आयतों से इनकार है
तफ़्सीर:
हम जानते हैं कि (ऐ रसूल!) आपको इस बात से बड़ा दुख होता है कि वे ज़ाहिरी तौर पर आपको झुठलाते हैं। इसलिए आप जान लें कि वे आपको अपने दिल से नहीं झुठलाते; क्योंकि वे आपकी सच्चाई तथा अमानत-दारी को जानते हैं। लेकिन वे अत्याचारी लोग हैं, जो बाह्य रूप से आपकी आज्ञा का खंडन करते हैं, जबकि वे अपने दिल में उसपर विश्वास करते हैं।
आयत 34
وَلَقَدْ كُذِّبَتْ رُسُلٌۭ مِّن قَبْلِكَ فَصَبَرُوا۟ عَلَىٰ مَا كُذِّبُوا۟ وَأُوذُوا۟ حَتَّىٰٓ أَتَىٰهُمْ نَصْرُنَا ۚ وَلَا مُبَدِّلَ لِكَلِمَـٰتِ ٱللَّهِ ۚ وَلَقَدْ جَآءَكَ مِن نَّبَإِى۟ ٱلْمُرْسَلِينَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता
كُذِّبَتْ
झुठलाए गए
رُسُلٌۭ
कई रसूल
مِّن
from
قَبْلِكَ
आप से पहले
فَصَبَرُوا۟
पस उन्होंने सब्र किया
عَلَىٰ
over
مَا
उस पर जो
كُذِّبُوا۟
वो झुठलाए गए
وَأُوذُوا۟
और वो सताए गए
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
أَتَىٰهُمْ
आ गई उनके पास
نَصْرُنَا ۚ
मदद हमारी
وَلَا
और नहीं
مُبَدِّلَ
कोई बदलने वाला
لِكَلِمَـٰتِ
कलिमात को
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
جَآءَكَ
आ गईं आपके पास
مِن
of
نَّبَإِى۟
ख़बरें
ٱلْمُرْسَلِينَ
रसूलों की
तुमसे पहले भी बहुत-से रसूल झुठलाए जा चुके है, तो वे अपने झुठलाए जाने और कष्ट पहुँचाए जाने पर धैर्य से काम लेते रहे, यहाँ तक कि उन्हें हमारी सहायता पहुँच गई। कोई नहीं जो अल्लाह की बातों को बदल सके। तुम्हारे पास तो रसूलों की कुछ ख़बरें पहुँच ही चुकी है
तफ़्सीर:
आप यह न समझें कि यह इनकार केवल उसी चीज़ के साथ खास है, जो आप लाए हैं। बल्कि तथ्य यह है कि आपसे पहले भी कई रसूलों को झुठलाया गया तथा उनकी क़ौम के लोगों ने उन्हें कष्ट पहुँचाया। तो उन्होंने उसका सामना, अल्लाह की ओर बुलाने और उसके रास्ते में जिहाद करने पर सब्र के साथ किया, यहाँ तक कि उनके पास अल्लाह की ओर से सहायता आ पहुँची। तथा अल्लाह ने जो विजय लिख दिया है और अपने रसूलों से उसका वादा किया है, उसे कोई बदलने वाला नहीं। और (ऐ रसूल!) आपके पास आपसे पहले रसूलों के समाचार आ चुके हैं और जिस चीज़ का उन्हें उनकी जातियों की ओर से सामना हुआ और जो अल्लाह ने उन्हें उनके दुश्मनों पर उनको विनष्ट करके विजय प्रदान किया।
आयत 35
وَإِن كَانَ كَبُرَ عَلَيْكَ إِعْرَاضُهُمْ فَإِنِ ٱسْتَطَعْتَ أَن تَبْتَغِىَ نَفَقًۭا فِى ٱلْأَرْضِ أَوْ سُلَّمًۭا فِى ٱلسَّمَآءِ فَتَأْتِيَهُم بِـَٔايَةٍۢ ۚ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ لَجَمَعَهُمْ عَلَى ٱلْهُدَىٰ ۚ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلْجَـٰهِلِينَ
وَإِن
और अगर
كَانَ
है
كَبُرَ
भारी
عَلَيْكَ
आप पर
إِعْرَاضُهُمْ
ऐराज़ करना उनका
فَإِنِ
फिर अगर
ٱسْتَطَعْتَ
इस्तिताअत रखते हैं आप
أَن
कि
تَبْتَغِىَ
आप तलाश करें
نَفَقًۭا
एक सुरंग
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
أَوْ
या
سُلَّمًۭا
एक सीढ़ी
فِى
into
ٱلسَّمَآءِ
आसमान में
فَتَأْتِيَهُم
तो आप ले आऐं उनके पास
بِـَٔايَةٍۢ ۚ
कोई निशानी
وَلَوْ
और अगर
شَآءَ
चाहता
ٱللَّهُ
अल्लाह
لَجَمَعَهُمْ
अलबत्ता वो जमा कर देता उन्हें
عَلَى
on
ٱلْهُدَىٰ ۚ
हिदायत पर
فَلَا
पस ना
تَكُونَنَّ
हरगिज़ आप हों
مِنَ
of
ٱلْجَـٰهِلِينَ
नादानों में से
और यदि उनकी विमुखता तुम्हारे लिए असहनीय है, तो यदि तुमसे हो सके कि धरती में कोई सुरंग या आकाश में कोई सीढ़ी ढूँढ़ निकालो और उनके पास कोई निशानी ले आओ, तो (ऐसा कर देखो), यदि अल्लाह चाहता तो उन सबको सीधे मार्ग पर इकट्ठा कर देता। अतः तुम उजड्ड और नादान न बनना
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उनके पास जो सत्य लाए हैं, यदि उससे उनका मुँह फेरना और झुठलाना आपके लिए कठिन प्रतीत हो रहा है, तो यदि आप धरती में कोई सुरंग अथवा आकाश की ओर कोई सीढ़ी तलाश करने में सक्षम हो जाएँ, फिर आप उनके पास उसके अलावा कोई तर्क और प्रमाण ले आएँ, जिसके साथ हमने आपका समर्थन किया है, तो ले आएँ। और यदि अल्लाह उन्हें उस मार्गदर्शन पर एकत्र करना चाहता, जो आप लेकर आए हैं, तो उन्हें अवश्य एकत्र कर देता। लेकिन उसने किसी व्यापक हिकमत के कारण ऐसा नहीं चाहा। इसलिए आप इस तथ्य से अनजान मत बनें, कि इस बात पर अफ़सोस करते-करते आपकी जान जाती रहे कि वे ईमान नहीं लाए।
आयत 36
۞ إِنَّمَا يَسْتَجِيبُ ٱلَّذِينَ يَسْمَعُونَ ۘ وَٱلْمَوْتَىٰ يَبْعَثُهُمُ ٱللَّهُ ثُمَّ إِلَيْهِ يُرْجَعُونَ
۞ إِنَّمَا
बेशक
يَسْتَجِيبُ
क़ुबूल करते हैं
ٱلَّذِينَ
वही जो
يَسْمَعُونَ ۘ
सुनते हैं
وَٱلْمَوْتَىٰ
और मुर्दे
يَبْعَثُهُمُ
उठाएगा उन्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
ثُمَّ
फिर
إِلَيْهِ
उसी की तरफ़
يُرْجَعُونَ
वो लौटाए जाऐंगे
मानते हो वही लोग है जो सुनते है, रहे मुर्दे, तो अल्लाह उन्हें (क़ियामत के दिन) उठा खड़ा करेगा; फिर वे उसी के ओर पलटेंगे
तफ़्सीर:
आपकी लाई बातों को स्वीकार करते हुए केवल वही आपको उत्तर देंगे, जो लोग बात को सुनते और समझते हैं, और काफिर लोग तो मरे हुए हैं जिनका उनसे कोई लेना-देना नहीं है। क्योंकि उनके दिल मर चुके हैं। और मरे हुओं को अल्लाह क़ियामत के दिन पुनर्जीवित करके उठाएगा, फिर वे उसी अकेले की ओर लौटाए जाएँगे, ताकि वह उन्हें उनके किए का बदला दे।
आयत 37
وَقَالُوا۟ لَوْلَا نُزِّلَ عَلَيْهِ ءَايَةٌۭ مِّن رَّبِّهِۦ ۚ قُلْ إِنَّ ٱللَّهَ قَادِرٌ عَلَىٰٓ أَن يُنَزِّلَ ءَايَةًۭ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
وَقَالُوا۟
और वो कहते हैं
لَوْلَا
क्यों ना
نُزِّلَ
नाज़िल की गई
عَلَيْهِ
उस पर
ءَايَةٌۭ
कोई निशानी
مِّن
from
رَّبِّهِۦ ۚ
उसके रब की तरफ़ से
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
قَادِرٌ
क़ादिर है
عَلَىٰٓ
इस पर
أَن
कि
يُنَزِّلَ
वो नाज़िल करे
ءَايَةًۭ
कोई निशानी
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَهُمْ
अक्सर उनके
لَا
(do) not
يَعْلَمُونَ
नहीं वो इल्म रखते
वे यह भी कहते है, "उस (नबी) पर उसके रब की ओर से कोई निशानी क्यों नहीं उतारी गई?" कह दो, "अल्लाह को तो इसकी सामर्थ्य प्राप्त है कि कोई निशानी उतार दे; परन्तु उनमें से अधिकतर लोग नहीं जानते।"
तफ़्सीर:
और मुश्रिकों ने हठ दिखाते हुए और ईमान लाने में टाल-मटोल करते हुए कहा : मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर कोई चमत्कारी निशानी क्यों नहीं उतारी गई, जो उसके पालनहार की ओर से उस चीज़ में उसकी सच्चाई का प्रमाण होती, जो वह लेकर आए हैं? (ऐ रसूल!) आप कह दें : अल्लाह तआला ऐसी निशानी उतारने में सक्षम है जैसा कि वे चाहते हैं, लेकिन निशानी उतारने की माँग करने वाले इन बहुदेववादियों में से अधिकांश लोग यह नहीं जानते हैं कि निशानियों का उतारना अल्लाह की अपनी हिकमत के अनुसार होता है, न कि उनके माँग करने के अनुसार। क्योंकि यदि अल्लाह ने निशानियों को उतार दिया, फिर वे ईमान न लाए, तो अल्लाह उन्हें अवश्य विनष्ट कर देगा।
आयत 38
وَمَا مِن دَآبَّةٍۢ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا طَـٰٓئِرٍۢ يَطِيرُ بِجَنَاحَيْهِ إِلَّآ أُمَمٌ أَمْثَالُكُم ۚ مَّا فَرَّطْنَا فِى ٱلْكِتَـٰبِ مِن شَىْءٍۢ ۚ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّهِمْ يُحْشَرُونَ
وَمَا
और नहीं
مِن
[of]
دَآبَّةٍۢ
कोई जानदार
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَلَا
और ना
طَـٰٓئِرٍۢ
कोई परिन्दा
يَطِيرُ
जो उड़ता हो
بِجَنَاحَيْهِ
साथ अपने दो परों के
إِلَّآ
मगर
أُمَمٌ
गिरोह हैं
أَمْثَالُكُم ۚ
तुम्हारी ही तरह
مَّا
नहीं
فَرَّطْنَا
कमी की हमने
فِى
in
ٱلْكِتَـٰبِ
किताब में
مِن
[of]
شَىْءٍۢ ۚ
किसी चीज़ की
ثُمَّ
फिर
إِلَىٰ
to
رَبِّهِمْ
तरफ़ अपने रब के
يُحْشَرُونَ
वो इकट्ठे किए जाऐंगे
धरती में चलने-फिरनेवाला कोई भी प्राणी हो या अपने दो परो से उड़नवाला कोई पक्षी, ये सब तुम्हारी ही तरह के गिरोह है। हमने किताब में कोई भी चीज़ नहीं छोड़ी है। फिर वे अपने रब की ओर इकट्ठे किए जाएँगे
तफ़्सीर:
धरती के ऊपर चलने वाला न कोई जानवर है और न आकाश में उड़ने वाला कोई पक्षी है, परंतु सब सृष्टि और जीविका में (ऐ आदम की संतान!) तुम्हारी तरह जातियाँ हैं। हमने 'लौहे महफूज़' में कुछ भी नहीं छोड़ा परंतु उसे साबित (अंकित) कर दिया, और सबका ज्ञान अल्लाह के पास है। फिर क़ियामत के दिन वे अपने रब के पास ही फ़ैसले के लिए एकत्र किए जाएँगे, तो वह हर एक को वह प्रतिफल देगा जिसका वह हक़दार है।
आयत 39
وَٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا صُمٌّۭ وَبُكْمٌۭ فِى ٱلظُّلُمَـٰتِ ۗ مَن يَشَإِ ٱللَّهُ يُضْلِلْهُ وَمَن يَشَأْ يَجْعَلْهُ عَلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात को
صُمٌّۭ
बहरे
وَبُكْمٌۭ
और गूँगे हैं
فِى
in
ٱلظُّلُمَـٰتِ ۗ
अँधेरों में हैं
مَن
जिसको
يَشَإِ
चाहता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
يُضْلِلْهُ
भटका देता है उसे
وَمَن
और जिसको
يَشَأْ
वो चाहता है
يَجْعَلْهُ
वो कर देता है उसे
عَلَىٰ
on
صِرَٰطٍۢ
ऊपर रास्ते
مُّسْتَقِيمٍۢ
सीधे के
जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया, वे बहरे और गूँगे है, अँधेरों में पड़े हुए हैं। अल्लाह जिसे चाहे भटकने दे और जिसे चाहे सीधे मार्ग पर लगा दे
तफ़्सीर:
जिन लोगों ने हमारी आयतों (निशानियों) को झुठलाया, वे उन बहरों के समान हैं जो सुनते नहीं, और गूँगों के समान हैं जो बोलते नहीं, इसके उपरांत वे अँधेरों में पड़े हुए हैं, उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता। तो जिसकी ऐसी दशा है, वह मार्गदर्शन कैसे प्राप्त कर सकता है?! अल्लाह लोगों में से जिसे पथभ्रष्ट करना चाहता है, उसे पथभ्रष्ट कर देता है, और जिसे मार्गदर्शन प्रदान करना चाहता है, उसका मार्गदर्शन करते हुए उसे सीधे मार्ग पर लगा देता है, जिसमें कोई टेढ़ापन नहीं होता।
आयत 40
قُلْ أَرَءَيْتَكُمْ إِنْ أَتَىٰكُمْ عَذَابُ ٱللَّهِ أَوْ أَتَتْكُمُ ٱلسَّاعَةُ أَغَيْرَ ٱللَّهِ تَدْعُونَ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
قُلْ
कह दीजिए
أَرَءَيْتَكُمْ
क्या ग़ौर किया तुमने
إِنْ
अगर
أَتَىٰكُمْ
आ जाए तुम्हारे पास
عَذَابُ
अज़ाब
ٱللَّهِ
अल्लाह का
أَوْ
या
أَتَتْكُمُ
आ जाए तुम्हारे पास
ٱلسَّاعَةُ
घड़ी (क़यामत की)
أَغَيْرَ
क्या ग़ैर
ٱللَّهِ
अल्लाह को
تَدْعُونَ
तुम पुकारोगे
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
कहो, "क्या तुमने यह भी सोचा कि यदि तुमपर अल्लाह की यातना आ पड़े या वह घड़ी तुम्हारे सामने आ जाए, तो क्या अल्लाह के सिवा किसी और को पुकारोगे? बोलो, यदि तुम सच्चे हो?
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन मुश्रिकों से कह दें : मुझे बताओ यदि तुम्हारे पास अल्लाह की ओर से कोई यातना आ जाए अथवा तुमपर वह क़ियामत आ जाए, जिसका तुमसे वादा किया गया है कि वह आने वाली है; तो क्या उस समय तुम अल्लाह के सिवा किसी और को पुकारोगे, ताकि वह तुमपर आने वाली विपत्ति और संकट को दूर करे? (बताओ) यदि तुम इस दावे में सच्चे हो कि तुम्हारे पूज्य लाभ पहुँचाते हैं या नुकसान को दूर करते हैं?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
नबियों का मज़ाक उड़ाए जाने और उन पर सब्र करने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि जब हक बात पर लोग मज़ाक उड़ाएं, तो सब्र और स्थिरता बनाए रखनी चाहिए, यह हर दौर के भलाई फैलाने वाले का इम्तिहान रहा है।
आयत 41
بَلْ إِيَّاهُ تَدْعُونَ فَيَكْشِفُ مَا تَدْعُونَ إِلَيْهِ إِن شَآءَ وَتَنسَوْنَ مَا تُشْرِكُونَ
بَلْ
बल्कि
إِيَّاهُ
सिर्फ़ उसी को
تَدْعُونَ
तुम पुकारोगे
فَيَكْشِفُ
फिर वो खोल देगा
مَا
उसे जो
تَدْعُونَ
तुम पुकारोगे
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
إِن
अगर
شَآءَ
वो चाहे
وَتَنسَوْنَ
और तुम भूल जाओगे
مَا
जिन्हें
تُشْرِكُونَ
तुम शरीक ठहराते हो
"बल्कि तुम उसी को पुकारते हो - फिर जिसके लिए तुम उसे पुकारते हो, वह चाहता है तो उसे दूर कर देता है - और उन्हें भूल जाते हो जिन्हें साझीदार ठहराते हो।"
तफ़्सीर:
सच तो यह है कि उस समय तुम उस अल्लाह के अलावा किसी और को नहीं पुकारोगे, जिसने तुम्हें पैदा किया है, फिर यदि वह चाहेगा तो तुम से विपत्ति को दूर कर देगा और तुम्हारी हानि को हटा देगा। क्योंकि वही उसका ज़िम्मेदार और उसे करने में सक्षम है। रही बात तुम्हारे उन पूज्यों की, जिन्हें तुमने अल्लाह के साथ साझी बनाया है, तो तुम उन्हें छोड़ दोगे; क्योंकि तुम्हें मालूम है कि उनसे न कोई लाभ होता है और न ही हानि।
आयत 42
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَآ إِلَىٰٓ أُمَمٍۢ مِّن قَبْلِكَ فَأَخَذْنَـٰهُم بِٱلْبَأْسَآءِ وَٱلضَّرَّآءِ لَعَلَّهُمْ يَتَضَرَّعُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
أَرْسَلْنَآ
भेजा हमने
إِلَىٰٓ
to
أُمَمٍۢ
तरफ़ उम्मतों के
مِّن
from
قَبْلِكَ
आप से क़ब्ल
فَأَخَذْنَـٰهُم
पस पकड़ लिया हमने उन्हें
بِٱلْبَأْسَآءِ
साथ तंगी
وَٱلضَّرَّآءِ
और तकलीफ़ के
لَعَلَّهُمْ
शायद कि वो
يَتَضَرَّعُونَ
वो आजिज़ी करें
तुमसे पहले कितने ही समुदायों की ओर हमने रसूल भेजे कि उन्हें तंगियों और मुसीबतों में डाला, ताकि वे विनम्र हों
तफ़्सीर:
और हमने (ऐ रसूल!) आपसे पहले कई समुदायों की ओर रसूल भेजे, लेकिन उन्होंने उन्हें झुठला दिया और वे जो कुछ उनके पास लेकर आए थे उससे मुँह फेर लिया, तो हमने उन्हें ग़रीबी जैसी कठिनाइयों के साथ, तथा बीमारी जैसी उनके शरीर को नुक़सान पहुँचाने वाली चीज़ों के साथ दंडित किया, ताकि वे अपने पालनहार के प्रति समर्पित हो जाएँ और उसके लिए विनम्र हो जाएँ।
आयत 43
فَلَوْلَآ إِذْ جَآءَهُم بَأْسُنَا تَضَرَّعُوا۟ وَلَـٰكِن قَسَتْ قُلُوبُهُمْ وَزَيَّنَ لَهُمُ ٱلشَّيْطَـٰنُ مَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
فَلَوْلَآ
फिर क्यूँ ना
إِذْ
जब
جَآءَهُم
आया उनके पास
بَأْسُنَا
अज़ाब हमारा
تَضَرَّعُوا۟
उन्होंने आजिज़ी की
وَلَـٰكِن
और लेकिन
قَسَتْ
सख़्त हो गए
قُلُوبُهُمْ
दिल उनके
وَزَيَّنَ
और मुज़य्यन कर दिया
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान ने
مَا
जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
जब हमारी ओर से उनपर सख्ती आई तो फिर क्यों न विनम्र हुए? परन्तु उनके हृदय तो कठोर हो गए थे और जो कुछ वे करते थे शैतान ने उसे उनके लिए मोहक बना दिया
तफ़्सीर:
यदि उनपर हमारी विपत्ति आने के समय, वे अल्लाह के प्रति विनम्र हो जाते और उसके अधीन हो जाते, ताकि वह उन पर से विपत्ति को दूर कर दे, तो हम अवश्य उनपर दया करते, परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया, बल्कि उनके दिल कठोर हो गए। चुनाँचे उन्होंने न सीख प्राप्त की और न उपदेश ग्रहण किया, तथा शैतान ने उनके लिए उसे सुशोभित कर दिया, जो कुफ्र तथा पाप वे किया करते थे। इसलिए वे उसी पर बने रहे जिसपर वे क़ायम थे।
आयत 44
فَلَمَّا نَسُوا۟ مَا ذُكِّرُوا۟ بِهِۦ فَتَحْنَا عَلَيْهِمْ أَبْوَٰبَ كُلِّ شَىْءٍ حَتَّىٰٓ إِذَا فَرِحُوا۟ بِمَآ أُوتُوٓا۟ أَخَذْنَـٰهُم بَغْتَةًۭ فَإِذَا هُم مُّبْلِسُونَ
فَلَمَّا
फिर जब
نَسُوا۟
वो भूल गए
مَا
जो कुछ
ذُكِّرُوا۟
वो नसीहत किए गए थे
بِهِۦ
जिसकी
فَتَحْنَا
खोल दिए हमने
عَلَيْهِمْ
उन पर
أَبْوَٰبَ
दरवाज़े
كُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ के
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
فَرِحُوا۟
वो ख़ुश हो गए
بِمَآ
उस पर जो
أُوتُوٓا۟
वो दिए गए थे
أَخَذْنَـٰهُم
पकड़ लिया हमने उन्हें
بَغْتَةًۭ
अचानक
فَإِذَا
तो उस वक़्त
هُم
वो
مُّبْلِسُونَ
मायूस होने वाले थे
फिर जब उसे उन्होंने भुला दिया जो उन्हें याद दिलाई गई थी, तो हमने उनपर हर चीज़ के दरवाज़े खोल दिए; यहाँ तक कि जो कुछ उन्हें मिला था, जब वे उसमें मग्न हो गए तो अचानक हमने उन्हें पकड़ लिया, तो क्या देखते है कि वे बिल्कुल निराश होकर रह गए
तफ़्सीर:
जब उन्होंने गंभीर गरीबी तथा बीमारी के द्वारा उपदेश किए जाने को छोड़ दिया और अल्लाह के आदेशों के अनुसार काम नहीं किया, तो हमने उन्हें ढील देते हुए उनके लिए रोज़ी के द्वार खोल दिए, ग़रीबी के बाद उन्हें समृद्ध कर दिया और बीमारी के बाद उनके शरीर को स्वस्थ कर दिया, यहाँ तक कि जब वे अहंकार से ग्रस्त हो गए और उन्हें जो सुख-सुविधा प्राप्त था उसपर मगन हो गए, उनपर अचानक हमारी यातना आ गई, तो सहसा वे चकित और उस चीज़ से निराश थे, जिसकी वे आशा करते थे।
आयत 45
فَقُطِعَ دَابِرُ ٱلْقَوْمِ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوا۟ ۚ وَٱلْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
فَقُطِعَ
पस काट दी गई
دَابِرُ
जड़
ٱلْقَوْمِ
उस क़ौम की
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
ظَلَمُوا۟ ۚ
ज़ुल्म किया
وَٱلْحَمْدُ
और सब तारीफ़
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए है
رَبِّ
जो रब है
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों का
इस प्रकार अत्याचारी लोगों की जड़ काटकर रख दी गई। प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है, जो सारे संसार का रब है
तफ़्सीर:
काफिरों का पूरी तरह से सर्वनाश करके उनकी जड़ काट दी गई, और अल्लाह के रसूलों को विजय प्राप्त हुआ। और हर प्रकार का आभार और प्रशंसा अकेले अल्लाह के लिए है, जो सारे संसारों का रब है कि उसने अपने शत्रुओं का नाश किया और अपने दोस्तों की सहायता की।
आयत 46
قُلْ أَرَءَيْتُمْ إِنْ أَخَذَ ٱللَّهُ سَمْعَكُمْ وَأَبْصَـٰرَكُمْ وَخَتَمَ عَلَىٰ قُلُوبِكُم مَّنْ إِلَـٰهٌ غَيْرُ ٱللَّهِ يَأْتِيكُم بِهِ ۗ ٱنظُرْ كَيْفَ نُصَرِّفُ ٱلْـَٔايَـٰتِ ثُمَّ هُمْ يَصْدِفُونَ
قُلْ
कह दीजिए
أَرَءَيْتُمْ
क्या ग़ौर किया तुमने
إِنْ
अगर
أَخَذَ
ले जाए
ٱللَّهُ
अल्लाह
سَمْعَكُمْ
कान तुम्हारे
وَأَبْصَـٰرَكُمْ
और आँखें तुम्हारी
وَخَتَمَ
और वो मोहर लगा दे
عَلَىٰ
[on]
قُلُوبِكُم
तुम्हारे दिलों पर
مَّنْ
कौन है
إِلَـٰهٌ
इलाह
غَيْرُ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
يَأْتِيكُم
जो लाए तुम्हारे पास
بِهِ ۗ
उसे
ٱنظُرْ
देखो
كَيْفَ
किस तरह
نُصَرِّفُ
हम फेर-फेर कर लाते हैं
ٱلْـَٔايَـٰتِ
आयात को
ثُمَّ
फिर
هُمْ
वो
يَصْدِفُونَ
वो ऐराज़ करते हैं
कहो, "क्या तुमने यह भी सोचा कि यदि अल्लाह तुम्हारे सुनने की और तुम्हारी देखने की शक्ति छीन ले और तुम्हारे दिलों पर ठप्पा लगा दे, तो अल्लाह के सिवा कौन पूज्य है जो तुम्हें ये चीज़े लाकर दे?" देखो, किस प्रकार हम तरह-तरह से अपनी निशानियाँ बयान करते है! फिर भी वे किनारा ही खींचते जाते है
तफ़्सीर:
ऐ रसूल! आप इन मुश्रिकों से कह दें : मुझे बताओ कि यदि अल्लाह तुमसे सुनने की शक्ति छीनकर तुम्हें बहरा कर दे, तुम्हारी दृष्टि छीनकर तुम्हें अंधा कर दे, और तुम्हारे दिलों पर मुहर लगा दे, फिर तुम कुछ भी न समझ सको; तो कौन-सा सत्य पूज्य है, जो तुम्हें ये खोई हुई चीज़ें वापस ला दे? ऐ रसूल! ग़ौर करें कि कैसे हम इन्हें विभिन्न प्रकार के प्रमाण दिखलाते हैं, फिर ये उनसे मुँह मोड़ लेते हैं!
आयत 47
قُلْ أَرَءَيْتَكُمْ إِنْ أَتَىٰكُمْ عَذَابُ ٱللَّهِ بَغْتَةً أَوْ جَهْرَةً هَلْ يُهْلَكُ إِلَّا ٱلْقَوْمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ
قُلْ
कह दीजिए
أَرَءَيْتَكُمْ
क्या ग़ौर किया तुमने
إِنْ
अगर
أَتَىٰكُمْ
आए तुम्हारे पास
عَذَابُ
अज़ाब
ٱللَّهِ
अल्लाह का
بَغْتَةً
अचानक
أَوْ
या
جَهْرَةً
ऐलानिया
هَلْ
नहीं
يُهْلَكُ
हलाक किए जाऐंगे
إِلَّا
मगर
ٱلْقَوْمُ
लोग
ٱلظَّـٰلِمُونَ
जो ज़ालिम हैं
कहो, "क्या तुमने यह भी सोचा कि यदि तुमपर अचानक या प्रत्यक्षतः अल्लाह की यातना आ जाए, तो क्या अत्याचारी लोगों के सिवा कोई और विनष्ट होगा?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इनसे कह दें : मुझे बताओ कि यदि तुमपर अल्लाह की यातना तुम्हें उसका एहसास हुए बिना अचानक आ जाए, अथवा वह तुमपर खुल्लम-खुल्ला सबके देखते हुए आ जाए, तो उस यातना के शिकार केवल वही लोग होंगे, जो अल्लाह के साथ कुफ़्र करके तथा उसके रसूलों को झुठलाकर अपने ऊपर अत्याचार करने वाले हैं।
आयत 48
وَمَا نُرْسِلُ ٱلْمُرْسَلِينَ إِلَّا مُبَشِّرِينَ وَمُنذِرِينَ ۖ فَمَنْ ءَامَنَ وَأَصْلَحَ فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
وَمَا
और नहीं
نُرْسِلُ
हम भेजते
ٱلْمُرْسَلِينَ
रसूलों को
إِلَّا
मगर
مُبَشِّرِينَ
ख़ुशख़बरी देने वाले
وَمُنذِرِينَ ۖ
और डराने वाले (बनाकर)
فَمَنْ
पस जो कोई
ءَامَنَ
ईमान लाया
وَأَصْلَحَ
और उसने इस्लाह कर ली
فَلَا
तो ना
خَوْفٌ
कोई ख़ौफ़ होगा
عَلَيْهِمْ
उन पर
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يَحْزَنُونَ
वो ग़मगीन होंगे
हम रसूलों को केवल शुभ-सूचना देनेवाले और सचेतकर्ता बनाकर भेजते रहे है। फिर जो ईमान लाए और सुधर जाए, तो ऐसे लोगों के लिए न कोई भय है और न वे कभी दुखी होंगे
तफ़्सीर:
हम अपने रसूलों में से जिन्हें भेजते हैं, उन्हें केवल इसलिए भेजते हैं कि वे ईमान और आज्ञाकारिता वालों को उस स्थायी नेमत की शुभ सूचना दें, जो न कभी ख़त्म होगी और न बाधित होगी, एवं काफिरों तथा पापियों को हमारी कठोर यातना से डराएँ। फिर जो व्यक्ति रसूलों पर ईमान लाए और अपने कर्मों को ठीक कर ले, तो उनपर उस बारे में कोई भय नहीं, जो आख़िरत में उन्हें प्राप्त होगा और न ही वे उसपर दुखी एवं शोकग्रस्त होंगे, जो सांसारिक सुखों में से उनसे छूट गया है।
आयत 49
وَٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا يَمَسُّهُمُ ٱلْعَذَابُ بِمَا كَانُوا۟ يَفْسُقُونَ
وَٱلَّذِينَ
और वो जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात को
يَمَسُّهُمُ
छुऐगा उन्हें
ٱلْعَذَابُ
अज़ाब
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَفْسُقُونَ
वो नाफ़रमानी करते
रहे वे लोग, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया, उन्हें यातना पहुँचकर रहेगी, क्योंकि वे अवज्ञा करते रहे है
तफ़्सीर:
और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया, वे अल्लाह की आज्ञाकारिता से निकल जाने के कारण यातना से पीड़ित होंगे।
आयत 50
قُل لَّآ أَقُولُ لَكُمْ عِندِى خَزَآئِنُ ٱللَّهِ وَلَآ أَعْلَمُ ٱلْغَيْبَ وَلَآ أَقُولُ لَكُمْ إِنِّى مَلَكٌ ۖ إِنْ أَتَّبِعُ إِلَّا مَا يُوحَىٰٓ إِلَىَّ ۚ قُلْ هَلْ يَسْتَوِى ٱلْأَعْمَىٰ وَٱلْبَصِيرُ ۚ أَفَلَا تَتَفَكَّرُونَ
قُل
कह दीजिए
لَّآ
Not
أَقُولُ
नहीं मैं कहता
لَكُمْ
तुमसे
عِندِى
मेरे पास
خَزَآئِنُ
ख़ज़ाने हैं
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَلَآ
और नहीं
أَعْلَمُ
मै जानता
ٱلْغَيْبَ
ग़ैब को
وَلَآ
और नहीं
أَقُولُ
मैं कहता
لَكُمْ
तुमसे
إِنِّى
बेशक मैं
مَلَكٌ ۖ
फ़रिश्ता हूँ
إِنْ
नहीं
أَتَّبِعُ
मैं पैरवी करता
إِلَّا
मगर
مَا
उसकी जो
يُوحَىٰٓ
वही की जाती है
إِلَىَّ ۚ
तरफ़ मेरे
قُلْ
कह दीजिए
هَلْ
क्या
يَسْتَوِى
बराबर हो सकता है
ٱلْأَعْمَىٰ
अँधा
وَٱلْبَصِيرُ ۚ
और देखने वाला
أَفَلَا
क्या फिर नहीं
تَتَفَكَّرُونَ
तुम ग़ौरो फ़िक्र करते
कह दो, "मैं तुमसे यह नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने है, और न मैं परोक्ष का ज्ञान रखता हूँ, और न मैं तुमसे कहता हूँ कि मैं कोई फ़रिश्ता हूँ। मैं तो बस उसी का अनुपालन करता हूँ जो मेरी ओर वह्यं की जाती है।" कहो, "क्या अंधा और आँखोंवाला दोनों बराबर हो जाएँगे? क्या तुम सोच-विचार से काम नहीं लेते?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन मुश्रिकों से कह दें : मैं तुमसे नहीं कहता : मेरे पास अल्लाह की रोज़ी के ख़ज़ाने हैं, इसलिए मैं उन्हें अपनी इच्छानुसार ख़र्च करता हूँ। और न ही मैं तुमसे यह कहता हूँ : मुझे ग़ैब का ज्ञान है, सिवाय उस वह़्य के जिससे अल्लाह ने मुझे सूचित किया है। और न मैं तुमसे यह कहता हूँ : मैं फ़रिश्तों में से एक फ़रिश्ता हूँ। क्योंकि मैं अल्लाह का रसूल हूँ। मैं केवल उसी का अनुसरण करता हूँ, जो मेरी ओर वह़्य (प्रकाशना) की जाती है। मैं उसका दावा नहीं करता, जिसका मुझे अधिकार नहीं। (ऐ रसूल!) उनसे कह दें : क्या वह काफ़िर जिसकी अन्तर्दृष्टि सत्य से अंधी हो गई है, और वह मोमिन जिसने सत्य को देखा और उसपर ईमान लाया, क्या दोनों बराबर हो सकते हैं? तो क्या (ऐ मुश्रिको!) तुम अपनी बुद्धियों से अपने चारों ओर फैली हुई निशानियों पर ग़ौर नहीं करते।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मुसीबत में अल्लाह को याद करने और आराम में उसे भूल जाने की इंसानी फितरत बताई गई है। यह सबक हमें सिखाता है कि तकलीफ के वक्त अल्लाह की तरफ लौटना फितरी है, मगर आराम में भी उसे याद रखना असली ईमान की निशानी है।
आयत 51
وَأَنذِرْ بِهِ ٱلَّذِينَ يَخَافُونَ أَن يُحْشَرُوٓا۟ إِلَىٰ رَبِّهِمْ ۙ لَيْسَ لَهُم مِّن دُونِهِۦ وَلِىٌّۭ وَلَا شَفِيعٌۭ لَّعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ
وَأَنذِرْ
और डराइए
بِهِ
साथ उसके
ٱلَّذِينَ
उनको जो
يَخَافُونَ
ख़ौफ़ खाते हैं
أَن
कि
يُحْشَرُوٓا۟
वो इकट्ठे किए जाऐंगे
إِلَىٰ
to
رَبِّهِمْ ۙ
तरफ़ अपने रब के
لَيْسَ
नहीं (होगा)
لَهُم
उनके लिए
مِّن
of
دُونِهِۦ
उसके सिवा
وَلِىٌّۭ
कोई दोस्त
وَلَا
और ना
شَفِيعٌۭ
कोई सिफ़ारिशी
لَّعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَتَّقُونَ
वो बच जाऐं
और तुम इसके द्वारा उन लोगों को सचेत कर दो, जिन्हें इस बात का भय है कि वे अपने रब के पास इस हाल में इकट्ठा किए जाएँगे कि उसके सिवा न तो उसका कोई समर्थक होगा और न कोई सिफ़ारिश करनेवाला, ताकि वे बचें
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) इस क़ुरआन के द्वारा उन लोगों को डराएँ, जो इस बात का भय रखते हैं कि वे क़ियामत के दिन अपने रब के पास एकत्र किए जाएँगे, उनके लिए अल्लाह के अलावा कोई संरक्षक नहीं होगा जो उन्हें लाभ पहुँचाए, और न कोई सिफारिश करने वाला होगा, जो उनसे हानि को दूर कर सके। ताकि वे अल्लाह के आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर उससे डरें। क्योंकि यही लोगो हैं, जो क़ुरआन से लाभान्वित होते हैं।
आयत 52
وَلَا تَطْرُدِ ٱلَّذِينَ يَدْعُونَ رَبَّهُم بِٱلْغَدَوٰةِ وَٱلْعَشِىِّ يُرِيدُونَ وَجْهَهُۥ ۖ مَا عَلَيْكَ مِنْ حِسَابِهِم مِّن شَىْءٍۢ وَمَا مِنْ حِسَابِكَ عَلَيْهِم مِّن شَىْءٍۢ فَتَطْرُدَهُمْ فَتَكُونَ مِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَلَا
और ना
تَطْرُدِ
आप दूर कीजिए
ٱلَّذِينَ
उनको जो
يَدْعُونَ
पुकारते हैं
رَبَّهُم
अपने रब को
بِٱلْغَدَوٰةِ
सुबह
وَٱلْعَشِىِّ
और शाम
يُرِيدُونَ
वो चाहते हैं
وَجْهَهُۥ ۖ
चेहरा उसका
مَا
नहीं
عَلَيْكَ
आप पर
مِنْ
of
حِسَابِهِم
उनके हिसाब में से
مِّن
[of]
شَىْءٍۢ
कोई चीज़
وَمَا
और नहीं
مِنْ
from
حِسَابِكَ
आपके हिसाब में से
عَلَيْهِم
उन पर
مِّن
[of]
شَىْءٍۢ
कोई चीज़
فَتَطْرُدَهُمْ
फिर (अगर) आप दूर करेंगे उन्हें
فَتَكُونَ
तो आप हो जाऐंगे
مِنَ
of
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों में से
और जो लोग अपने रब को उसकी ख़ुशी की चाह में प्रातः और सायंकाल पुकारते रहते है, ऐसे लोगों को दूर न करना। उनके हिसाब की तुमपर कुछ भी ज़िम्मेदारी नहीं है और न तुम्हारे हिसाब की उनपर कोई ज़िम्मेदारी है कि तुम उन्हें दूर करो और फिर हो जाओ अत्याचारियों में से
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उन ग़रीब मुसलमानों को अपनी सभा से दूर न करें, जो दिन की शुरुआत और उसके अंत में हमेशा अल्लाह की उपासना में लगे रहते हैं, उसी के लिए उपासना को विशिष्ट करने वाले होते हैं। आप प्रमुख बहुदेववादियों को लुभाने के लिए उन्हें दूर मत करें। इन ग़रीबों के हिसाब में से आपपर कुछ भी नहीं है। बल्कि उनका हिसाब उनके रब के पास है। तथा आपके हिसाब में से उनपर भी कुछ नहीं है। यदि आपने उन्हें अपनी सभा से दूर किया, तो आप अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करने वालों में से होंगे।
आयत 53
وَكَذَٰلِكَ فَتَنَّا بَعْضَهُم بِبَعْضٍۢ لِّيَقُولُوٓا۟ أَهَـٰٓؤُلَآءِ مَنَّ ٱللَّهُ عَلَيْهِم مِّنۢ بَيْنِنَآ ۗ أَلَيْسَ ٱللَّهُ بِأَعْلَمَ بِٱلشَّـٰكِرِينَ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
فَتَنَّا
आज़माया हमने
بَعْضَهُم
उनके बाज़ को
بِبَعْضٍۢ
साथ बाज़ के
لِّيَقُولُوٓا۟
ताकि वो कहें
أَهَـٰٓؤُلَآءِ
क्या ये हैं वो लोग
مَنَّ
एहसान किया
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَيْهِم
जिन पर
مِّنۢ
from
بَيْنِنَآ ۗ
हमारे दर्मियान में से
أَلَيْسَ
क्या नहीं है
ٱللَّهُ
अल्लाह
بِأَعْلَمَ
ख़ूब जानने वाला
بِٱلشَّـٰكِرِينَ
शुक्र करने वालों को
और इसी प्रकार हमने इनमें से एक को दूसरे के द्वारा आज़माइश में डाला, ताकि वे कहें, "क्या यही वे लोग है, जिनपर अल्लाह न हममें से चुनकर एहसान किया है ?" - क्या अल्लाह कृतज्ञ लोगों से भली-भाँति परिचित नहीं है?
तफ़्सीर:
और इसी तरह हमने उनमें से कुछ का कुछ के साथ परीक्षण किया। चुनाँचे हमने उन्हें सांसारिक सुख-सुविधाओं में भिन्न-भिन्न कर दिया। हमने इसके द्वारा उनका परीक्षण किया ताकि धनवान काफ़िर, ग़रीब ईमान वालों से कहें : क्या यही ग़रीब लोग हैं, जिनपर अल्लाह ने हमारे बीच से मार्गदर्शन प्रदान किया है?! यदि ईमान अच्छा काम होता, तो वे इसमें हमसे पहल नहीं कर पाते, क्योंकि हम पहल करने वाले लोग हैं। क्या अल्लाह उन लोगों के बारे में अधिक जानने वाला नहीं है जो उसकी नेमतों के लिए आभारी हैं, इसलिए वह उन्हें ईमान का सामर्थ्य प्रदान करता है, तथा उनकी नाशुक्री करने वालों के बारे में अधिक जानने वाला नहीं है, इसलिए वह उन्हें विफल कर देता है, चुनाँचे वे ईमान नहीं लाते?! क्यों नहीं, निःसंदेह अल्लाह उन्हें सबसे अधिक जानने वाला है।
आयत 54
وَإِذَا جَآءَكَ ٱلَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِـَٔايَـٰتِنَا فَقُلْ سَلَـٰمٌ عَلَيْكُمْ ۖ كَتَبَ رَبُّكُمْ عَلَىٰ نَفْسِهِ ٱلرَّحْمَةَ ۖ أَنَّهُۥ مَنْ عَمِلَ مِنكُمْ سُوٓءًۢا بِجَهَـٰلَةٍۢ ثُمَّ تَابَ مِنۢ بَعْدِهِۦ وَأَصْلَحَ فَأَنَّهُۥ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
وَإِذَا
और जब
جَآءَكَ
आऐं आपके पास
ٱلَّذِينَ
वो जो
يُؤْمِنُونَ
ईमान लाते हैं
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात पर
فَقُلْ
पस कह दीजिए
سَلَـٰمٌ
सलाम हो
عَلَيْكُمْ ۖ
तुम पर
كَتَبَ
लिख दी
رَبُّكُمْ
तुम्हारे रब ने
عَلَىٰ
upon
نَفْسِهِ
अपने नफ़्स पर
ٱلرَّحْمَةَ ۖ
रहमत
أَنَّهُۥ
कि बेशक वो
مَنْ
जो
عَمِلَ
अमल करे
مِنكُمْ
तुम में से
سُوٓءًۢا
बुरे
بِجَهَـٰلَةٍۢ
बवजह जहालत के
ثُمَّ
फिर
تَابَ
वो तौबा कर ले
مِنۢ
from
بَعْدِهِۦ
बाद उसके
وَأَصْلَحَ
और वो इस्लाह कर ले
فَأَنَّهُۥ
तो बेशक वो
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
और जब तुम्हारे पास वे लोग आएँ, जो हमारी आयतों को मानते है, तो कहो, "सलाम हो तुमपर! तुम्हारे रब ने दयालुता को अपने ऊपर अनिवार्य कर लिया है कि तुममें से जो कोई नासमझी से कोई बुराई कर बैठे, फिर उसके बाद पलट आए और अपना सुधार कर तो यह है वह बड़ा क्षमाशील, दयावान है।"
तफ़्सीर:
जब (ऐ रसूल!) आपके पास वे लोग आएँ, जो हमारी उन आयतों पर ईमान रखते हैं, जो आपके लाए हुए संदेश की सच्चाई की गवाही देती हैं, तो उनके सम्मान में उन्हें सलाम कहें और उन्हें अल्लाह की दया की विशालता की खुशख़बरी दें। क्योंकि अल्लाह ने अपने अनुग्रह से दया करना अपने ऊपर अनिवार्य कर लिया है। अतः तुममें से जो कोई भी अज्ञानता और मूर्खता की स्थिति में पाप कर बैठे, फिर वह उसे करने के बाद तौबा कर ले और अपने कर्मों को सुधार ले, तो निश्चय अल्लाह उसके किए हुए पाप को क्षमा कर देगा। क्योंकि अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला, तथा उनपर दया करने वाला है।
आयत 55
وَكَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ ٱلْـَٔايَـٰتِ وَلِتَسْتَبِينَ سَبِيلُ ٱلْمُجْرِمِينَ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
نُفَصِّلُ
हम खोल-खोल कर बयान करते हैं
ٱلْـَٔايَـٰتِ
आयात को
وَلِتَسْتَبِينَ
और ताकि वाज़ेह हो जाए
سَبِيلُ
रास्ता
ٱلْمُجْرِمِينَ
मुजरिमों का
इसी प्रकार हम अपनी आयतें खोल-खोलकर बयान करते है (ताकि तुम हर ज़रूरी बात जान लो) और इसलिए कि अपराधियों का मार्ग स्पष्ट हो जाए
तफ़्सीर:
जिस प्रकार हमने आपके लिए वे बातें स्पष्ट कीं, जिनका उल्लेख किया गया, उसी तरह हम असत्यवादियों के खिलाफ़ अपने प्रमाणों और तर्कों को स्पष्ट रूप से वर्णन करते हैं, तथा अपराधियों के मार्ग और उनके दृष्टिकोण को स्पष्ट करने के लिए; ताकि उससे बचा जा सके और सावधान रहा जाए।
आयत 56
قُلْ إِنِّى نُهِيتُ أَنْ أَعْبُدَ ٱلَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ ۚ قُل لَّآ أَتَّبِعُ أَهْوَآءَكُمْ ۙ قَدْ ضَلَلْتُ إِذًۭا وَمَآ أَنَا۠ مِنَ ٱلْمُهْتَدِينَ
قُلْ
कह दीजिए
إِنِّى
बेशक मैं
نُهِيتُ
रोका गया हूँ मैं
أَنْ
कि
أَعْبُدَ
मैं इबादत करूँ
ٱلَّذِينَ
उनकी जिन्हें
تَدْعُونَ
तुम पुकारते हो
مِن
from
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के
قُل
कह दीजिए
لَّآ
Not
أَتَّبِعُ
नहीं मैं पैरवी करूँगा
أَهْوَآءَكُمْ ۙ
तुम्हारी ख़्वाहिशात की
قَدْ
तहक़ीक़
ضَلَلْتُ
मैं भटक गया
إِذًۭا
तब
وَمَآ
और नहीं (हूँगा)
أَنَا۠
मैं
مِنَ
from
ٱلْمُهْتَدِينَ
हिदायत पाने वालों में से
कह दो, "तुम लोग अल्लाह से हटकर जिन्हें पुकारते हो, उनकी बन्दगी करने से मुझे रोका गया है।" कहो, "मैं तुम्हारी इच्छाओं का अनुपालन नहीं करता, क्योंकि तब तो मैं मार्ग से भटक गया और मार्ग पानेवालों में से न रहा।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दें : अल्लाह ने मुझे उनकी इबादत करने से मना कर दिया है जिनकी तुम अल्लाह के अलावा पूजा करते हो। (ऐ रसूल!) आप कह दें : मैं अल्लाह के अलावा किसी और की पूजा करने में तुम्हारी इच्छाओं का पालन नहीं करता। क्योंकि अगर मैं इस बारे में तुम्हारी इच्छाओं का पालन करू, तो मैं सत्य के मार्ग से भटका हुआ हूँगा, मैं उसकी ओर मार्गदर्शन नहीं पा सकूँगा। और यही हर उस व्यक्ति का मामला है, जो अल्लाह की ओर से किसी प्रमाण के बिना अपनी इच्छा का पालन करता है।
आयत 57
قُلْ إِنِّى عَلَىٰ بَيِّنَةٍۢ مِّن رَّبِّى وَكَذَّبْتُم بِهِۦ ۚ مَا عِندِى مَا تَسْتَعْجِلُونَ بِهِۦٓ ۚ إِنِ ٱلْحُكْمُ إِلَّا لِلَّهِ ۖ يَقُصُّ ٱلْحَقَّ ۖ وَهُوَ خَيْرُ ٱلْفَـٰصِلِينَ
قُلْ
कह दीजिए
إِنِّى
बेशक मैं
عَلَىٰ
on
بَيِّنَةٍۢ
एक वाज़ेह दलील पर हूँ
مِّن
from
رَّبِّى
अपने रब की तरफ़ से
وَكَذَّبْتُم
और झुठलाया तुमने
بِهِۦ ۚ
उसे
مَا
नहीं
عِندِى
मेरे पास
مَا
वो जो
تَسْتَعْجِلُونَ
तुम जल्द तलब कर रहे हो
بِهِۦٓ ۚ
उसको
إِنِ
नहीं
ٱلْحُكْمُ
हुक्म
إِلَّا
मगर
لِلَّهِ ۖ
अल्लाह ही का
يَقُصُّ
वो बयान करता है
ٱلْحَقَّ ۖ
हक़ को
وَهُوَ
और वो
خَيْرُ
बेहतर है
ٱلْفَـٰصِلِينَ
सब फ़ैसला करने वालों से
कह दो, "मैं अपने रब की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण पर क़ायम हूँ और तुमने उसे झुठला दिया है। जिस चीज़ के लिए तुम जल्दी मचा रहे हो, वह कोई मेरे पास तो नहीं है। निर्णय का सारा अधिकार अल्लाह ही को है, वही सच्ची बात बयान करता है और वही सबसे अच्छा निर्णायक है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन मुश्रिकों से कह दें : मैं अपने रब की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण पर क़ायम हूँ, न कि मन की इच्छा पर। और तुमने इस प्रमाण को झुठला दिया है। मेरे पास वह यातना नहीं है, जिसके लिए तुम जल्दी मचा रहे हो और न ही चमत्कारी निशानियाँ जो तुमने माँगी हैं। बल्कि वह केवल अल्लाह के हाथ में है। क्योंकि निर्णय करना (जिसमें वह भी शामिल है जिसकी तुमने माँग की है) केवल अल्लाह का अधिकार है। वह सत्य कहता है और उसके द्वारा फैसला करता है। और वह महिमावान सबसे अच्छा है, जिसने सत्यवादियों और असत्यवादियों को खोलकर बयान किया और उनके बीच अंतर स्पष्ट किया।
आयत 58
قُل لَّوْ أَنَّ عِندِى مَا تَسْتَعْجِلُونَ بِهِۦ لَقُضِىَ ٱلْأَمْرُ بَيْنِى وَبَيْنَكُمْ ۗ وَٱللَّهُ أَعْلَمُ بِٱلظَّـٰلِمِينَ
قُل
कह दीजिए
لَّوْ
अगर
أَنَّ
बेशक
عِندِى
मेरे पास (होता)
مَا
वो जो
تَسْتَعْجِلُونَ
तुम जल्द तलब कर रहे हो
بِهِۦ
उसे
لَقُضِىَ
अलबत्ता फ़ैसला कर दिया जाता
ٱلْأَمْرُ
मामले का
بَيْنِى
दर्मियान मेरे
وَبَيْنَكُمْ ۗ
और दर्मियान तुम्हारे
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
أَعْلَمُ
ख़ूब जानता है
بِٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों को
कह दो, "जिस चीज़ की तुम्हें जल्दी पड़ी हुई है, यदि कहीं वह चीज़ मेरे पास होती तो मेरे और तुम्हारे बीच कभी का फ़ैसला हो चुका होता। और अल्लाह अत्याचारियों को भली-भाती जानता है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : यदि मेरे पास और मेरे अधिकार में वह यातना होती जिसके लिए तुम जल्दी कर रहे हो, तो मैं उसे तुमपर अवश्य उतार देता। और उस समय मेरे और तुम्हारे बीच मामले का फैसला कर दिया जाता। (लेकिन मामला अल्लाह के अधिकार में है) और अल्लाह अत्याचारियों को अधिक जानता है कि वह उन्हें कितनी मोहलत देगा और कब उन्हें दंडित करेगा।
आयत 59
۞ وَعِندَهُۥ مَفَاتِحُ ٱلْغَيْبِ لَا يَعْلَمُهَآ إِلَّا هُوَ ۚ وَيَعْلَمُ مَا فِى ٱلْبَرِّ وَٱلْبَحْرِ ۚ وَمَا تَسْقُطُ مِن وَرَقَةٍ إِلَّا يَعْلَمُهَا وَلَا حَبَّةٍۢ فِى ظُلُمَـٰتِ ٱلْأَرْضِ وَلَا رَطْبٍۢ وَلَا يَابِسٍ إِلَّا فِى كِتَـٰبٍۢ مُّبِينٍۢ
۞ وَعِندَهُۥ
और उसी के पास हैं
مَفَاتِحُ
चाबियाँ
ٱلْغَيْبِ
ग़ैब की
لَا
no (one)
يَعْلَمُهَآ
नहीं जानता उन्हें
إِلَّا
मगर
هُوَ ۚ
वो ही
وَيَعْلَمُ
और वो जानता है
مَا
जो
فِى
(is) in
ٱلْبَرِّ
ख़ुश्की में है
وَٱلْبَحْرِ ۚ
और समुन्दर में
وَمَا
और नहीं
تَسْقُطُ
गिरता
مِن
of
وَرَقَةٍ
कोई पत्ता
إِلَّا
मगर
يَعْلَمُهَا
वो जानता है उसे
وَلَا
और ना
حَبَّةٍۢ
कोई दाना
فِى
in
ظُلُمَـٰتِ
अँधेरों में
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन के
وَلَا
और ना
رَطْبٍۢ
कोई तर
وَلَا
और ना
يَابِسٍ
कोई ख़ुश्क
إِلَّا
मगर
فِى
(is) in
كِتَـٰبٍۢ
एक किताब में है
مُّبِينٍۢ
वाज़ेह
उसी के पास परोक्ष की कुंजियाँ है, जिन्हें उसके सिवा कोई नहीं जानता। जल और थल में जो कुछ है, उसे वह जानता है। और जो पत्ता भी गिरता है, उसे वह निश्चय ही जानता है। और धरती के अँधेरों में कोई दाना हो और कोई भी आर्द्र (गीली) और शुष्क (सूखी) चीज़ हो, निश्चय ही एक स्पष्ट किताब में मौजूद है
तफ़्सीर:
केवल अल्लाह ही के पास ग़ैब (परोक्ष) के खज़ाने हैं, जिन्हें उसके अलावा कोई और नहीं जानता। भूमि पर जो भी मख़्लूक़ात जैसे जानवर, पौधे और निर्जीव चीज़ें हैं, वह उन्हें जानता है, तथा वह जानता है जो कुछ समुद्र में जानवर, पौधे और निर्जीव चीज़ें हैं। तथा न कहीं कोई पत्ता गिरता है, और न ज़मीन में छिपा हुआ कोई दाना है, और न कोई गीली चीज़ है और न कोई सूखी चीज़, परंतु वह एक स्पष्ट पुस्तक अर्थात् 'लौह़े महफ़ूज़' में अंकित (संरक्षित) है।
आयत 60
وَهُوَ ٱلَّذِى يَتَوَفَّىٰكُم بِٱلَّيْلِ وَيَعْلَمُ مَا جَرَحْتُم بِٱلنَّهَارِ ثُمَّ يَبْعَثُكُمْ فِيهِ لِيُقْضَىٰٓ أَجَلٌۭ مُّسَمًّۭى ۖ ثُمَّ إِلَيْهِ مَرْجِعُكُمْ ثُمَّ يُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जो
يَتَوَفَّىٰكُم
फ़ौत करता है तुम्हें
بِٱلَّيْلِ
रात को
وَيَعْلَمُ
और वो जानता है
مَا
जो
جَرَحْتُم
कमाई करते हो तुम
بِٱلنَّهَارِ
दिन को
ثُمَّ
फिर
يَبْعَثُكُمْ
वो उठाता है तुम्हें
فِيهِ
उसमें
لِيُقْضَىٰٓ
ताकि पूरा किया जाए
أَجَلٌۭ
वक़्त
مُّسَمًّۭى ۖ
मुक़र्रर
ثُمَّ
फिर
إِلَيْهِ
उसी की तरफ़
مَرْجِعُكُمْ
लौटना है तुम्हारा
ثُمَّ
फिर
يُنَبِّئُكُم
वो बताएगा तुम्हें
بِمَا
जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते
और वही है जो रात को तुम्हें मौत देता है और दिन में जो कुछ तुमने किया उसे जानता है। फिर वह इसलिए तुम्हें उठाता है, ताकि निश्चित अवधि पूरा हो जाए; फिर उसी की ओर तुम्हें लौटना है, फिर वह तुम्हें बता देगा जो कुछ तुम करते रहे हो
तफ़्सीर:
अल्लाह ही है जो सोते समय तुम्हारी आत्माओं को अस्थायी रूप से क़ब्ज़ कर लेता है, और वह जानता है कि तुमने दिन के दौरान अपनी सक्रियता के समय क्या कमाया है। फिर वह सोते समय तुम्हारी आत्माओं को क़ब्ज़ करने के बाद दिन में तुम्हें उठा देता है ताकि तुम अपने काम कर सको, यहाँ तक कि अल्लाह के यहाँ तुम्हारे जीवन की निर्धारित अवधि समाप्त हो जाएगी। फिर क़ियामत के दिन पुनः जीवित किए जाने के उपरांत तुम्हें उसी अकेले की ओर लौटना है। फिर वह तुम्हें बताएगा जो कुछ तुम अपने दुनिया के जीवन में किया करते थे और तुम्हें उसका बदला देगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
गरीब और कमज़ोर ईमान वालों की इज़्ज़त का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि समाज में हैसियत या माली हालत देखकर किसी को कमतर समझना गलत है, अल्लाह के यहां तक़वा (नेकी) ही असली मेयार है।
आयत 61
وَهُوَ ٱلْقَاهِرُ فَوْقَ عِبَادِهِۦ ۖ وَيُرْسِلُ عَلَيْكُمْ حَفَظَةً حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءَ أَحَدَكُمُ ٱلْمَوْتُ تَوَفَّتْهُ رُسُلُنَا وَهُمْ لَا يُفَرِّطُونَ
وَهُوَ
और वो
ٱلْقَاهِرُ
ग़ालिब है
فَوْقَ
ऊपर
عِبَادِهِۦ ۖ
अपने बन्दों के
وَيُرْسِلُ
और वो भेजता है
عَلَيْكُمْ
तुम पर
حَفَظَةً
निगेहबान
حَتَّىٰٓ
यहाँ तक कि
إِذَا
जब
جَآءَ
आती है
أَحَدَكُمُ
तुम में से किसी एक को
ٱلْمَوْتُ
मौत
تَوَفَّتْهُ
फ़ौत करते हैं उसे
رُسُلُنَا
हमारे भेजे हुए
وَهُمْ
और वो
لَا
(do) not
يُفَرِّطُونَ
नहीं वो कमी-कोताही करते
और वही अपने बन्दों पर पूरा-पूरा क़ाबू रखनेवाला है और वह तुमपर निगरानी करनेवाले को नियुक्त करके भेजता है, यहाँ तक कि जब तुममें से किसी की मृत्यु आ जाती है, जो हमारे भेजे हुए कार्यकर्त्ता उसे अपने क़ब्ज़े में कर लेते है और वे कोई कोताही नहीं करते
तफ़्सीर:
अल्लाह अपने बंदों पर ग़ालिब (हावी); उन्हें अपने अधीन रखने वाला है, हर प्रकार से उनसे ऊपर है। हर चीज़ उसके अधीनस्थ है। वह अपनी महिमा के योग्य अपने बंदों के ऊपर है। और (ऐ लोगो!) वह तुमपर सम्मानित फरिश्तों को भेजता है, जो तुम्हारे कामों को गिनकर रखते हैं यहाँ तक कि तुममें से किसी की अवधि, मृत्यु के फरिश्ते और उसके सहायकों द्वारा उसकी रूह़ क़ब्ज़ कर लेने के साथ समाप्त हो जाएगी। और वे उस काम में कोताही नहीं करते हैं जो उन्हें करने का आदेश दिया गया है।
आयत 62
ثُمَّ رُدُّوٓا۟ إِلَى ٱللَّهِ مَوْلَىٰهُمُ ٱلْحَقِّ ۚ أَلَا لَهُ ٱلْحُكْمُ وَهُوَ أَسْرَعُ ٱلْحَـٰسِبِينَ
ثُمَّ
फिर
رُدُّوٓا۟
वो लौटाए जाते हैं
إِلَى
to
ٱللَّهِ
तरफ़ अल्लाह के
مَوْلَىٰهُمُ
जो मौला है उनका
ٱلْحَقِّ ۚ
हक़ीक़ी
أَلَا
ख़बरदार
لَهُ
उसी के लिए है
ٱلْحُكْمُ
फ़ैसला
وَهُوَ
और वो
أَسْرَعُ
ज़्यादा जल्द है (हिसाब में)
ٱلْحَـٰسِبِينَ
सब हिसाब लेने वालों में
फिर सब अल्लाह की ओर, जो उसका वास्तविक स्वामी है, लौट जाएँगे। जान लो, निर्णय का अधिकार उसी को है और वह बहुत जल्द हिसाब लेनेवाला है
तफ़्सीर:
फिर वे सभी लोग जिनके प्राण निकाल लिए गए हैं, अपने वास्तविक स्वामी अल्लाह की ओर लौटाए जाएँगे, ताकि वह उन्हें उनके कर्मों का बदला दे। उनके बीच उसी का प्रभावी फैसला और न्यायपूर्ण निर्णय है, और वही सबसे तेज़ी से तुम्हें गिनने वाला और तुम्हारे कर्मों का हिसाब रखने वाला है।
आयत 63
قُلْ مَن يُنَجِّيكُم مِّن ظُلُمَـٰتِ ٱلْبَرِّ وَٱلْبَحْرِ تَدْعُونَهُۥ تَضَرُّعًۭا وَخُفْيَةًۭ لَّئِنْ أَنجَىٰنَا مِنْ هَـٰذِهِۦ لَنَكُونَنَّ مِنَ ٱلشَّـٰكِرِينَ
قُلْ
कह दीजिए
مَن
कौन
يُنَجِّيكُم
निजात देता है तुम्हें
مِّن
from
ظُلُمَـٰتِ
अँधेरों से
ٱلْبَرِّ
खुश्की
وَٱلْبَحْرِ
और समुन्दर के
تَدْعُونَهُۥ
तुम पुकारते हो उसे
تَضَرُّعًۭا
गिड़-गिड़ा कर
وَخُفْيَةًۭ
और चुपके-चुपके
لَّئِنْ
अलबत्ता अगर
أَنجَىٰنَا
उसने निजात दी हमें
مِنْ
from
هَـٰذِهِۦ
इससे
لَنَكُونَنَّ
अलबत्ता हम ज़रूर हो जाऐगे
مِنَ
from
ٱلشَّـٰكِرِينَ
शुक्र करने वालों में से
कहो, "कौन है जो थल और जल के अँधेरो से तुम्हे छुटकारा देता है, जिसे तुम गिड़गिड़ाते हुए और चुपके-चुपके पुकारने लगते हो कि यदि हमें इससे बचा लिया तो हम अवश्य की कृतज्ञ हो जाएँगे?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन मुश्रिकों से पूछें : तुम्हें थल और समुद्र के अँधेरों में मिलने वाले खतरों से कौन बचाता और छुटकारा देता है? तुम उसी अकेले को गिड़गिड़ाते हुए विनयपूर्वक गुप्त रूप से तथा खुले तौर पर पुकारते हो : यदि हमारा पालनहार हमें इन विपत्तियों से छुटकारा प्रदान कर दे, तो हम अवश्य अपने ऊपर उसकी नेमतों के लिए आभार प्रकट करते हुए उसके सिवा किसी और की पूजा नहीं करेंगे।
आयत 64
قُلِ ٱللَّهُ يُنَجِّيكُم مِّنْهَا وَمِن كُلِّ كَرْبٍۢ ثُمَّ أَنتُمْ تُشْرِكُونَ
قُلِ
कह दीजिए
ٱللَّهُ
अल्लाह
يُنَجِّيكُم
वो निजात देता है तुम्हें
مِّنْهَا
उस से
وَمِن
and from
كُلِّ
every
كَرْبٍۢ
और हर मुसीबत से
ثُمَّ
फिर
أَنتُمْ
तुम
تُشْرِكُونَ
तुम शरीक बनाते हो
कहो, "अल्लाह तुम्हें इनसे और हरके बेचैनी और पीड़ा से छुटकारा देता है, लेकिन फिर तुम उसका साझीदार ठहराने लगते हो।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) इनसे कह दें : अल्लाह ही है जो तुम्हें उससे बचाता है, तथा तुम्हें हर संकट से छुटकारा देता है। फिर तुम उसके उपरांत (भी) समृद्धि के समय उसके साथ दूसरों को साझी बनाते हो। तो जो तुम कर रहे हो उससे बड़ा अत्याचार (अन्याय) क्या है?!
आयत 65
قُلْ هُوَ ٱلْقَادِرُ عَلَىٰٓ أَن يَبْعَثَ عَلَيْكُمْ عَذَابًۭا مِّن فَوْقِكُمْ أَوْ مِن تَحْتِ أَرْجُلِكُمْ أَوْ يَلْبِسَكُمْ شِيَعًۭا وَيُذِيقَ بَعْضَكُم بَأْسَ بَعْضٍ ۗ ٱنظُرْ كَيْفَ نُصَرِّفُ ٱلْـَٔايَـٰتِ لَعَلَّهُمْ يَفْقَهُونَ
قُلْ
कह दीजिए
هُوَ
वो
ٱلْقَادِرُ
क़ादिर है
عَلَىٰٓ
इस पर
أَن
कि
يَبْعَثَ
वो भेजे
عَلَيْكُمْ
तुम पर
عَذَابًۭا
अज़ाब
مِّن
from
فَوْقِكُمْ
तुम्हारे ऊपर से
أَوْ
या
مِن
from
تَحْتِ
नीचे से
أَرْجُلِكُمْ
तुम्हारे पाँव के
أَوْ
या
يَلْبِسَكُمْ
वो लड़ा दे तुम्हें
شِيَعًۭا
गिरोहों में
وَيُذِيقَ
और चखा दे
بَعْضَكُم
तुम्हारे बाज़ को
بَأْسَ
क़ुव्वत
بَعْضٍ ۗ
बाज़ की
ٱنظُرْ
देखो
كَيْفَ
किस तरह
نُصَرِّفُ
हम फेर-फेर कर बयान करते हैं
ٱلْـَٔايَـٰتِ
आयात
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَفْقَهُونَ
वो समझें
कहो, "वह इसकी सामर्थ्य रखता है कि तुमपर तुम्हारे ऊपर से या तुम्हारे पैरों के नीचे से कोई यातना भेज दे या तुम्हें टोलियों में बाँटकर परस्पर भिड़ा दे और एक को दूसरे की लड़ाई का मज़ा चखाए।" देखो, हम आयतों को कैसे, तरह-तरह से, बयान करते है, ताकि वे समझे
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इनसे कह दें : अल्लाह ही इस बात का सामर्थ्य रखता है कि तुमपर ऐसी यातना भेज दे, जो पत्थर, वज्र और बाढ़ की तरह तुम्हारे पास तुम्हारे ऊपर से आए, या वह तुम्हारे पास तुम्हारे नीचे से आए जैसे भूकंप और धरती में धंसना, या वह तुम्हारे दिलों में द्वन्द्व (असहमति) पैदा कर दे, तो तुममें से हर व्यक्ति अपनी इच्छा का पालन करने लगे, फिर तुम एक-दूसरे से लड़ने लगो। (ऐ पैग़ंबर!) ग़ौर कीजिए कैसे हम उनके लिए प्रमाणों और सबूतों में विविधता लाते हैं और उन्हें स्पष्ट करते हैं ताकि वे समझ सकें कि जो कुछ आप लाए हैं, वह सच है और जो उनके पास है वह झूठा है।
आयत 66
وَكَذَّبَ بِهِۦ قَوْمُكَ وَهُوَ ٱلْحَقُّ ۚ قُل لَّسْتُ عَلَيْكُم بِوَكِيلٍۢ
وَكَذَّبَ
और झुठला दिया
بِهِۦ
उसे
قَوْمُكَ
आपकी क़ौम ने
وَهُوَ
हालाँकि वो
ٱلْحَقُّ ۚ
हक़ है
قُل
कह दीजिए
لَّسْتُ
नहीं हूँ मैं
عَلَيْكُم
तुम पर
بِوَكِيلٍۢ
कोई ज़िम्मेदार
तुम्हारी क़ौम ने तो उसे झुठला दिया, हालाँकि वह सत्य है। कह दो, मैं "तुमपर कोई संरक्षक नियुक्त नहीं हूँ
तफ़्सीर:
आपकी जाति ने इस क़ुरआन को झुठला दिया, हालाँकि वह सत्य है जिसके अल्लाह की ओर से होने में कोई संदेह नहीं। (ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : मुझे तुम्हारी निगरानी रखने का काम नहीं सौंपा गया है। मैं तो केवल तुम्हें एक कठोर यातना से पहले डराने वाला हूँ।
आयत 67
لِّكُلِّ نَبَإٍۢ مُّسْتَقَرٌّۭ ۚ وَسَوْفَ تَعْلَمُونَ
لِّكُلِّ
वास्ते हर
نَبَإٍۢ
ख़बर के
مُّسْتَقَرٌّۭ ۚ
एक वक़्त मुक़र्रर है
وَسَوْفَ
और अनक़रीब
تَعْلَمُونَ
तुम जान लोगे
"हर ख़बर का एक निश्चित समय है और शीघ्र ही तुम्हें ज्ञात हो जाएगा।"
तफ़्सीर:
हर सूचना का एक समय है, जिसमें वह स्थिर हो जाता है और एक अंत है, जहाँ वह समाप्त हो जाता है, और इसी में से तुम्हारे अंजाम और परिणाम की सूचना है। इसलिए जब तुम क़ियामत के दिन उठाए जाओगे, तुम्हें उसका पता चल जाएगा।
आयत 68
وَإِذَا رَأَيْتَ ٱلَّذِينَ يَخُوضُونَ فِىٓ ءَايَـٰتِنَا فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ حَتَّىٰ يَخُوضُوا۟ فِى حَدِيثٍ غَيْرِهِۦ ۚ وَإِمَّا يُنسِيَنَّكَ ٱلشَّيْطَـٰنُ فَلَا تَقْعُدْ بَعْدَ ٱلذِّكْرَىٰ مَعَ ٱلْقَوْمِ ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَإِذَا
और जब
رَأَيْتَ
देखें आप
ٱلَّذِينَ
उन लोगों को
يَخُوضُونَ
जो मशग़ूल होते हैं
فِىٓ
about
ءَايَـٰتِنَا
हमारी आयात में
فَأَعْرِضْ
तो ऐराज़ कीजिए
عَنْهُمْ
उनसे
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَخُوضُوا۟
वो मशग़ूल हो जाऐं
فِى
in
حَدِيثٍ
किसी बात में
غَيْرِهِۦ ۚ
सिवाय उसके
وَإِمَّا
और अगर
يُنسِيَنَّكَ
भुला दे आपको
ٱلشَّيْطَـٰنُ
शैतान
فَلَا
तो ना
تَقْعُدْ
आप बैठिए
بَعْدَ
बाद
ٱلذِّكْرَىٰ
याद आने के
مَعَ
with
ٱلْقَوْمِ
साथ उन लोगों के
ٱلظَّـٰلِمِينَ
जो ज़ालिम हैं
और जब तुम उन लोगों को देखो, जो हमारी आयतों पर नुक्ताचीनी करने में लगे हुए है, तो उनसे मुँह फेर लो, ताकि वे किसी दूसरी बात में लग जाएँ। और यदि कभी शैतान तुम्हें भुलावे में डाल दे, तो याद आ जाने के बाद उन अत्याचारियों के पास न बैठो
तफ़्सीर:
जब (ऐ रसूल!) आप मुश्रिकों को देखें कि वे हमारी आयतों के विषय में व्यंग्य और उपहास के साथ बात करते हैं, तो आप उनसे दूर रहें यहाँ तक कि वे हमारी आयतों के उपहास और व्यंग्य से मुक्त बातचीत में लग जाएँ। यदि शैतान आपको भुला दे और आप उनके साथ बैठ जाएँ, फिर आपको याद आ जाए, तो उनकी सभा को छोड़ दें और इन ज़्यादती करने वालों के साथ न बैठें।
आयत 69
وَمَا عَلَى ٱلَّذِينَ يَتَّقُونَ مِنْ حِسَابِهِم مِّن شَىْءٍۢ وَلَـٰكِن ذِكْرَىٰ لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ
وَمَا
और नहीं
عَلَى
(is) on
ٱلَّذِينَ
उनके ज़िम्मे
يَتَّقُونَ
जो तक़वा करते हैं
مِنْ
of
حِسَابِهِم
उनके हिसाब में से
مِّن
[of]
شَىْءٍۢ
कोई चीज़
وَلَـٰكِن
और लेकिन
ذِكْرَىٰ
याद दिहानी है
لَعَلَّهُمْ
ताकि वो
يَتَّقُونَ
वो तक़वा करें
उनके हिसाब के प्रति तो उन लोगो पर कुछ भी ज़िम्मेदारी नहीं, जो डर रखते है। यदि है तो बस याद दिलाने की; ताकि वे डरें
तफ़्सीर:
जो लोग अल्लाह के आदेशों का पालन करने और उसके निषेधों से बचने के द्वारा उससे डरते हैं, उनके ज़िम्मे इन अत्याचारियों के हिसाब में से कोई चीज़ नहीं है। बल्कि उनकी ज़िम्मेदारी केवल उन्हें उन बुराइयों से रोकना है जो वे करते हैं, ताकि उनके हृदय में अल्लाह का डर पैदा हो जाए, फिर वे अल्लाह के आदेशों का पालन करें और उसके निषेधों से बचें।
आयत 70
وَذَرِ ٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُوا۟ دِينَهُمْ لَعِبًۭا وَلَهْوًۭا وَغَرَّتْهُمُ ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَا ۚ وَذَكِّرْ بِهِۦٓ أَن تُبْسَلَ نَفْسٌۢ بِمَا كَسَبَتْ لَيْسَ لَهَا مِن دُونِ ٱللَّهِ وَلِىٌّۭ وَلَا شَفِيعٌۭ وَإِن تَعْدِلْ كُلَّ عَدْلٍۢ لَّا يُؤْخَذْ مِنْهَآ ۗ أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ أُبْسِلُوا۟ بِمَا كَسَبُوا۟ ۖ لَهُمْ شَرَابٌۭ مِّنْ حَمِيمٍۢ وَعَذَابٌ أَلِيمٌۢ بِمَا كَانُوا۟ يَكْفُرُونَ
وَذَرِ
और छोड़ दीजिए
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
ٱتَّخَذُوا۟
बना लिया है
دِينَهُمْ
अपने दीन को
لَعِبًۭا
खेल
وَلَهْوًۭا
और तमाशा
وَغَرَّتْهُمُ
और धोखे में डाल दिया उन्हें
ٱلْحَيَوٰةُ
ज़िन्दगी ने
ٱلدُّنْيَا ۚ
दुनिया की
وَذَكِّرْ
और नसीहत कीजिए
بِهِۦٓ
साथ उसके
أَن
कि
تُبْسَلَ
(ना) हलाक किया जाए
نَفْسٌۢ
कोई नफ़्स
بِمَا
बवजह उसके जो
كَسَبَتْ
उसने कमाई की
لَيْسَ
नहीं है
لَهَا
उसके लिए
مِن
from
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَلِىٌّۭ
कोई दोस्त
وَلَا
और ना
شَفِيعٌۭ
कोई सिफ़ारिशी
وَإِن
और अगर
تَعْدِلْ
वो बदला दे
كُلَّ
हर तरह का
عَدْلٍۢ
बदला
لَّا
not
يُؤْخَذْ
ना लिया जाएगा
مِنْهَآ ۗ
उससे
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
ٱلَّذِينَ
वो जो
أُبْسِلُوا۟
हलाक कर दिए गए
بِمَا
बवजह उसके जो
كَسَبُوا۟ ۖ
उन्होंने कमाया
لَهُمْ
उनके लिए
شَرَابٌۭ
पीना
مِّنْ
of
حَمِيمٍۢ
खौलते हुए पानी से
وَعَذَابٌ
और अज़ाब
أَلِيمٌۢ
दर्दनाक
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَكْفُرُونَ
वो कुफ़्र करते
छोड़ो उन लोगों को, जिन्होंने अपने धर्म को खेल और तमाशा बना लिया है और उन्हें सांसारिक जीवन ने धोखे में डाल रखा है। और इसके द्वारा उन्हें नसीहत करते रहो कि कहीं ऐसा न हो कि कोई अपनी कमाई के कारण तबाही में पड़ जाए। अल्लाह से हटकर कोई भी नहीं, जो उसका समर्थक और सिफ़ारिश करनेवाला हो सके और यदि वह छुटकारा पाने के लिए बदले के रूप में हर सम्भव चीज़ देने लगे, तो भी वह उससे न लिया जाए। ऐसे ही लोग है, जो अपनी कमाई के कारण तबाही में पड गए। उनके लिए पीने को खौलता हुआ पानी है और दुखद यातना भी; क्योंकि वे इनकार करते रहे थे
तफ़्सीर:
और ऐ रसूल! इन मुश्रिकों को छोड़ दें, जिन्होंने अपने धर्म को खेल-कूद और मनोरंजन बना लिया कि वे उसका मज़ाक उड़ाते और उपहास करते हैं, और इस दुनिया के जीवन ने उन्हें अपने नश्वर सुखों के साथ धोखे में डाल रखा है। (ऐ नबी!) क़ुरआन के साथ लोगों को उपदेश दें ताकि कोई भी प्राणी अपनी कमाई हुई बुराइयों के कारण विनाश की ओर न जाए, उसके लिए मदद माँगने के लिए अल्लाह के अलावा कोई सहयोगी न हो, और क़ियामत के दिन उससे अल्लाह की यातना को रोकने के लिए कोई सिफ़ारिश करने वाला न हो। तथा यदि वह कोई भी छुड़ौती देकर अल्लाह की यातना से छुटकारा लेना चाहे, तो वह उससे स्वीकार नहीं की जाएगी। यही लोग हैं, जो अपने पापों के कारण अपने आपके विनाश के हवाले कर दिए गए। उन्हें क़ियामत के दिन उनके कुफ़्र के कारण अत्यंत गरम पेय पिलाया जाएगा और दर्दनाक यातना दी जाएगी।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह की निगरानी और बेकार बहसों-मजाक से किनारा करने की ताकीद है। यह सबक हमें सिखाता है कि बेफायदा मुनाकशों और मजाक-मस्खरी वाली महफिलों से दूर रहना बेहतर है।
आयत 71
قُلْ أَنَدْعُوا۟ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَنفَعُنَا وَلَا يَضُرُّنَا وَنُرَدُّ عَلَىٰٓ أَعْقَابِنَا بَعْدَ إِذْ هَدَىٰنَا ٱللَّهُ كَٱلَّذِى ٱسْتَهْوَتْهُ ٱلشَّيَـٰطِينُ فِى ٱلْأَرْضِ حَيْرَانَ لَهُۥٓ أَصْحَـٰبٌۭ يَدْعُونَهُۥٓ إِلَى ٱلْهُدَى ٱئْتِنَا ۗ قُلْ إِنَّ هُدَى ٱللَّهِ هُوَ ٱلْهُدَىٰ ۖ وَأُمِرْنَا لِنُسْلِمَ لِرَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
قُلْ
कह दीजिए
أَنَدْعُوا۟
क्या हम पुकारें
مِن
from
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
مَا
उसको जो
لَا
not
يَنفَعُنَا
नहीं वो नफ़ा दे सकता हमें
وَلَا
और ना ही
يَضُرُّنَا
वो नुक़सान दे सकता है हमें
وَنُرَدُّ
और हम फेर दिए जाऐंगे
عَلَىٰٓ
on
أَعْقَابِنَا
अपनी एड़ियों पर
بَعْدَ
बाद उसके
إِذْ
जब
هَدَىٰنَا
हिदायत दी हमें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
كَٱلَّذِى
उस शख़्स की तरह
ٱسْتَهْوَتْهُ
बहका दिया उसे
ٱلشَّيَـٰطِينُ
शैतानों ने
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
حَيْرَانَ
हैरान कर के
لَهُۥٓ
उसके
أَصْحَـٰبٌۭ
कुछ साथी हैं
يَدْعُونَهُۥٓ
वो पुकारते हैं उसे
إِلَى
तरफ़
ٱلْهُدَى
हिदायत के
ٱئْتِنَا ۗ
आ जाओ हमारे पास
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّ
बेशक
هُدَى
हिदायत
ٱللَّهِ
अल्लाह की
هُوَ
वो ही
ٱلْهُدَىٰ ۖ
हिदायत है (असल)
وَأُمِرْنَا
और हुक्म दिए गए हम
لِنُسْلِمَ
ताकि हम फ़रमाबरदार हो जाऐं
لِرَبِّ
to (the) Lord
ٱلْعَـٰلَمِينَ
रब्बुल आलमीन के लिए
कहो, "क्या हम अल्लाह को छोड़कर उसे पुकारने लग जाएँ जो न तो हमें लाभ पहुँचा सके और न हमें हानि पहुँचा सके और हम उलटे पाँव फिर जाएँ, जबकि अल्लाह ने हमें मार्ग पर लगा दिया है? - उस व्यक्ति की तरह जिसे शैतानों ने धरती पर भटका दिया हो और वह हैरान होकर रह गया हो। उसके कुछ साथी हो, जो उसे मार्ग की ओर बुला रहे हो कि हमारे पास चला आ!" कह दो, "मार्गदर्शन केवल अल्लाह का मार्गदर्शन है और हमें इसी बात का आदेश हुआ है कि हम सारे संसार के स्वामी को समर्पित हो जाएँ।"
तफ़्सीर:
ऐ रसूल! आप इन मुश्रिकों से कह दें : क्या हम अल्लाह को छोड़कर ऐसी मूर्तियों की पूजा करने लगें, जो न किसी लाभ की मालिक हैं, कि हमें लाभ पहुँचाए और न किसी नुक़सान की मालिक हैं, कि हमें नुक़सान पहुँचा सकें। और हम ईमान से फिर जाएँ इसके बाद कि अल्लाह ने हमें उसका सामर्थ्य प्रदान किया है। फिर हम उस व्यक्ति के समान हो जाएँ, जिसे शैतानों ने पथभ्रष्ट करके चकित छोड़ दिया, उसे कोई रास्ता नहीं मिल रहा, तथा सीधे मार्ग पर उसके कुछ साथी हैं जो उसे सत्य की ओर बुलाते हैं, परंतु वह उनके बुलावे को स्वीकार करने से इनकार करता है। (ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : अल्लाह का मार्गदर्शन ही सच्चा मार्गदर्शन है, और अल्लाह ने हमें आदेश दिया है कि हम उसके आगे झुक जाएँ, उसी को एकमात्र पूज्य मानें और उसी अकेले की इबादत करें, क्योंकि वही सारे संसारों का रब है।
आयत 72
وَأَنْ أَقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَٱتَّقُوهُ ۚ وَهُوَ ٱلَّذِىٓ إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ
وَأَنْ
और ये कि
أَقِيمُوا۟
क़ायम करो
ٱلصَّلَوٰةَ
नमाज़
وَٱتَّقُوهُ ۚ
और डरो उससे
وَهُوَ
और वो
ٱلَّذِىٓ
वो ही है
إِلَيْهِ
जिसकी तरफ़
تُحْشَرُونَ
तुम इकट्ठे किए जाओगे
और यह कि "नमाज़ क़ायम करो और उसका डर रखो। वही है, जिसके पास तुम इकट्ठे किए जाओगे,
तफ़्सीर:
उसने हमें सबसे उत्तम तरीक़े से नमाज़ स्थापित करने का आदेश दिया है, तथा उसने हमें अल्लाह के आदेशों का पालन करते हुए और उसके निषेधों से बचते हुए तक़वा अपनाने का आदेश दिया है, क्योंकि वही अकेला है जिसकी ओर क़ियामत के दिन सारे बंदे एकत्र किए जाएँगे, ताकि वह उन्हें उनके कर्मों का बदला दे।
आयत 73
وَهُوَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ بِٱلْحَقِّ ۖ وَيَوْمَ يَقُولُ كُن فَيَكُونُ ۚ قَوْلُهُ ٱلْحَقُّ ۚ وَلَهُ ٱلْمُلْكُ يَوْمَ يُنفَخُ فِى ٱلصُّورِ ۚ عَـٰلِمُ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَـٰدَةِ ۚ وَهُوَ ٱلْحَكِيمُ ٱلْخَبِيرُ
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
خَلَقَ
पैदा किया
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों को
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
بِٱلْحَقِّ ۖ
साथ हक़ के
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يَقُولُ
वो कहेगा
كُن
हो जा
فَيَكُونُ ۚ
तो वो हो जाएगा
قَوْلُهُ
उसकी बात ही
ٱلْحَقُّ ۚ
सच्ची है
وَلَهُ
और उसी के लिए है
ٱلْمُلْكُ
बादशाहत
يَوْمَ
जिस दिन
يُنفَخُ
फूँका जाएगा
فِى
in
ٱلصُّورِ ۚ
सूर में
عَـٰلِمُ
जानने वाला है
ٱلْغَيْبِ
ग़ैब का
وَٱلشَّهَـٰدَةِ ۚ
और हाज़िर का
وَهُوَ
और वो
ٱلْحَكِيمُ
बहुत हिकमत वाला है
ٱلْخَبِيرُ
ख़ूब ख़बर रखने वाला है
"और वही है जिसने आकाशों और धरती को हक़ के साथ पैदा किया। और जिस समय वह किसी चीज़ को कहे, 'हो जा', तो वह उसी समय वह हो जाती है। उसकी बात सर्वथा सत्य है और जिस दिन 'सूर' (नरसिंघा) में फूँक मारी जाएगी, राज्य उसी का होगा। वह सभी छिपी और खुली चीज़ का जाननेवाला है, और वही तत्वदर्शी, ख़बर रखनेवाला है।"
तफ़्सीर:
उसी महिमावान ने आकाशों तथा धरती को सत्य के साथ पैदा किया, (तथा उस दिन को याद करो) जिस दिन अल्लाह किसी वस्तु से कहेगा 'हो जा', तो वह हो जाएगी। जब वह क़ियामत के दिन कहेगा : उठ खड़े हो, तो सबके सब उठ खड़े होंगे। उसकी बात सत्य है, जो अनिवार्य रूप से होकर रहेगी और क़ियामत के दिन अकेले उसी महिमावान का राज्य होगा, जब इसराफील नरसिंघा में दूसरी बार फूँकेंगे। वह परोक्ष तथा प्रत्यक्ष का ज्ञानी है और वह अपनी रचना तथा प्रबंधन में हिकमत वाला है, हर चीज़ की ख़बर रखने वाला है, जिससे कोई भी चीज़ छिपी नहीं है। अतः उसके लिए, चीजों के अंदरूनी हिस्से उनके प्रत्यक्ष हिस्सों के समान हैं।
आयत 74
۞ وَإِذْ قَالَ إِبْرَٰهِيمُ لِأَبِيهِ ءَازَرَ أَتَتَّخِذُ أَصْنَامًا ءَالِهَةً ۖ إِنِّىٓ أَرَىٰكَ وَقَوْمَكَ فِى ضَلَـٰلٍۢ مُّبِينٍۢ
۞ وَإِذْ
और जब
قَالَ
कहा
إِبْرَٰهِيمُ
इब्राहीम ने
لِأَبِيهِ
अपने बाप
ءَازَرَ
आज़र को
أَتَتَّخِذُ
क्या तू बनाता है
أَصْنَامًا
बुतों को
ءَالِهَةً ۖ
इलाह
إِنِّىٓ
बेशक मैं
أَرَىٰكَ
मैं देखता हूँ तुझे
وَقَوْمَكَ
और तेरी क़ौम को
فِى
in
ضَلَـٰلٍۢ
गुमराही में
مُّبِينٍۢ
खुली
और याद करो, जब इबराहीम ने अपने बाप आज़र से कहा था, "क्या तुम मूर्तियों को पूज्य बनाते हो? मैं तो तुम्हें और तुम्हारी क़ौम को खुली गुमराही में पड़ा देख रहा हूँ।"
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) उस समय को याद करें, जब इबराहीम अलैहिस्सलाम ने अपने मुश्रिक पिता आज़र से कहा : ऐ मेरे पिता जी! क्या आप मूर्तियों को पूज्य बनाकर अल्लाह के अलावा उनकी पूजा करते हैं?! मैं आपको और आपकी जाति के लोगों को, जो मूर्तियों की पूजा करने वाले हैं, तुम्हारे अल्लाह के अलावा की पूजा करने के कारण सत्य के मार्ग से खुली गुमराही और भ्रम में देखता हूँ। क्योंकि वही महिमावान अकेला सत्य पूज्य है और उसके सिवा दूसरे असत्य पूज्य हैं।
आयत 75
وَكَذَٰلِكَ نُرِىٓ إِبْرَٰهِيمَ مَلَكُوتَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَلِيَكُونَ مِنَ ٱلْمُوقِنِينَ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
نُرِىٓ
हम दिखाते थे
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम को
مَلَكُوتَ
बादशाहत
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ
और ज़मीन की
وَلِيَكُونَ
और ताकि वो हो जाए
مِنَ
among
ٱلْمُوقِنِينَ
यक़ीन करने वालों में से
और इस प्रकार हम इबराहीम को आकाशों और धरती का राज्य दिखाने लगे (ताकि उसके ज्ञान का विस्तार हो) और इसलिए कि उसे विश्वास हो
तफ़्सीर:
जिस प्रकार हमने उन्हें उनके पिता तथा उनकी जाति की पथभ्रष्टता दिखाई, वैसे ही हम उन्हें आकाशों और धरती का विशाल राज्य दिखाते हैं; ताकि वह उस विशाल राज्य से अल्लाह की एकता और उसी अकेले के एकमात्र इबादत के योग्य होने पर प्रमाण प्रस्तुत करें; ताकि उन्हें परिपूर्ण विश्वास हो जाए कि अल्लाह एक है, उसका कोई साझी नहीं, और यह कि वह हर चीज़ करने में सक्षम है।
आयत 76
فَلَمَّا جَنَّ عَلَيْهِ ٱلَّيْلُ رَءَا كَوْكَبًۭا ۖ قَالَ هَـٰذَا رَبِّى ۖ فَلَمَّآ أَفَلَ قَالَ لَآ أُحِبُّ ٱلْـَٔافِلِينَ
فَلَمَّا
फिर जब
جَنَّ
छा गई
عَلَيْهِ
उस पर
ٱلَّيْلُ
रात
رَءَا
उसने देखा
كَوْكَبًۭا ۖ
एक सितारा
قَالَ
उसने कहा
هَـٰذَا
ये
رَبِّى ۖ
मेरा रब है
فَلَمَّآ
फिर जब
أَفَلَ
वो छुप गया
قَالَ
कहा
لَآ
Not
أُحِبُّ
नहीं मैं पसंद करता
ٱلْـَٔافِلِينَ
छुपने वालों को
अतएवः जब रात उसपर छा गई, तो उसने एक तारा देखा। उसने कहा, "इसे मेरा रब ठहराते हो!" फिर जब वह छिप गया तो बोला, "छिप जानेवालों से मैं प्रेम नहीं करता।"
तफ़्सीर:
जब उनपर रात अंधेरी हो गई, तो उन्होंने एक तारा देखा। कहने लगे : यह मेरा रब है। फिर जब तारा ग़ायब हो गया, तो उन्होंने कहा : मैं ग़ायब होने वाले को पसंद नहीं करता। क्योंकि सच्चा पूज्य मौजूद रहने वाला होता है, ग़ायब नहीं होता।
आयत 77
فَلَمَّا رَءَا ٱلْقَمَرَ بَازِغًۭا قَالَ هَـٰذَا رَبِّى ۖ فَلَمَّآ أَفَلَ قَالَ لَئِن لَّمْ يَهْدِنِى رَبِّى لَأَكُونَنَّ مِنَ ٱلْقَوْمِ ٱلضَّآلِّينَ
فَلَمَّا
फिर जब
رَءَا
उसने देखा
ٱلْقَمَرَ
चाँद को
بَازِغًۭا
चमकता हुआ
قَالَ
उसने कहा
هَـٰذَا
ये
رَبِّى ۖ
मेरा रब है
فَلَمَّآ
फिर जब
أَفَلَ
वो छुप गया
قَالَ
उसने कहा
لَئِن
अलबत्ता अगर
لَّمْ
ना
يَهْدِنِى
हिदायत दी मुझे
رَبِّى
मेरे रब ने
لَأَكُونَنَّ
अलबत्ता मैं ज़रूर हो जाऊँगा
مِنَ
among
ٱلْقَوْمِ
उन लोगों में से
ٱلضَّآلِّينَ
जो गुमराह हैं
फिर जब उसने चाँद को चमकता हुआ देखा, तो कहा, "इसको मेरा रब ठहराते हो!" फिर जब वह छिप गया, तो कहा, "यदि मेरा रब मुझे मार्ग न दिखाता तो मैं भी पथभ्रष्ट! लोगों में सम्मिलित हो जाता।"
तफ़्सीर:
जब उन्होंने चाँद को उगते देखा, तो कहा : यह मेरा रब है। फिर जब वह ग़ायब हो गया, तो उन्होंने कहा : यदि अल्लाह ने मुझे अपने एकेश्वरवाद और एकमात्र अपनी इबादत की तौफीक़ न दी, तो निश्चय मैं उन लोगों में से हो जाऊँगा, जो उसके सत्य धर्म से दूर हैं।
आयत 78
فَلَمَّا رَءَا ٱلشَّمْسَ بَازِغَةًۭ قَالَ هَـٰذَا رَبِّى هَـٰذَآ أَكْبَرُ ۖ فَلَمَّآ أَفَلَتْ قَالَ يَـٰقَوْمِ إِنِّى بَرِىٓءٌۭ مِّمَّا تُشْرِكُونَ
فَلَمَّا
फिर जब
رَءَا
उसने देखा
ٱلشَّمْسَ
सूरज को
بَازِغَةًۭ
चमकता हुआ
قَالَ
कहा
هَـٰذَا
ये
رَبِّى
मेरा रब है
هَـٰذَآ
ये
أَكْبَرُ ۖ
सबसे बड़ा है
فَلَمَّآ
फिर जब
أَفَلَتْ
वो छुप गया
قَالَ
उसने कहा
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
إِنِّى
बेशक मैं
بَرِىٓءٌۭ
बरी-उज़-ज़िम्मा हूँ
مِّمَّا
उससे जो
تُشْرِكُونَ
तुम शरीक ठहराते हो
फिर जब उसने सूर्य को चमकता हुआ देखा, तो कहा, "इसे मेरा रब ठहराते हो! यह तो बहुत बड़ा है।" फिर जब वह भी छिप गया, तो कहा, "ऐ मेरी क़ौन के लोगो! मैं विरक्त हूँ उनसे जिनको तुम साझी ठहराते हो
तफ़्सीर:
जब उन्होंने सूरज को उगते हुए देखा, तो कहा : यह उगने वाला (सूरज) मेरा रब है। यह उगने वाला, तारे और चाँद से बड़ा है। लेकिन जब वह भी ग़ायब हो गया, तो कहने लगे : ऐ मेरी जाति के लोगो! मैं उससे बरी हूँ, जो तुम अल्लाह के साथ शरीक ठहराते हो।
आयत 79
إِنِّى وَجَّهْتُ وَجْهِىَ لِلَّذِى فَطَرَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ حَنِيفًۭا ۖ وَمَآ أَنَا۠ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ
إِنِّى
बेशक मैं
وَجَّهْتُ
रुख़ कर लिया मैंने
وَجْهِىَ
अपने चेहरे का
لِلَّذِى
उसके लिए जिसने
فَطَرَ
पैदा किया
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضَ
और ज़मीन को
حَنِيفًۭا ۖ
यकसू होकर
وَمَآ
और नहीं
أَنَا۠
मैं
مِنَ
of
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकीन में से
"मैंने तो एकाग्र होकर अपना मुख उसकी ओर कर लिया है, जिसने आकाशों और धरती को पैदा किया। और मैं साझी ठहरानेवालों में से नहीं।"
तफ़्सीर:
मैंने अपने धर्म (धार्मिकता) को उस अस्तित्व के लिए विशुद्ध कर दिया, जिसने बिना किसी पूर्व उदाहरण के आकाशों तथा धरती की रचना की है, शिर्क से विमुख होकर शुद्ध एकेश्वरवाद की ओर रुख करते हुए, तथा मैं उन बहुदेववादियों में से नहीं हूँ, जो अल्लाह के साथ उसके अलावा की पूजा करते हैं।
आयत 80
وَحَآجَّهُۥ قَوْمُهُۥ ۚ قَالَ أَتُحَـٰٓجُّوٓنِّى فِى ٱللَّهِ وَقَدْ هَدَىٰنِ ۚ وَلَآ أَخَافُ مَا تُشْرِكُونَ بِهِۦٓ إِلَّآ أَن يَشَآءَ رَبِّى شَيْـًۭٔا ۗ وَسِعَ رَبِّى كُلَّ شَىْءٍ عِلْمًا ۗ أَفَلَا تَتَذَكَّرُونَ
وَحَآجَّهُۥ
और झगड़ा किया उससे
قَوْمُهُۥ ۚ
उसकी क़ौम ने
قَالَ
उसने कहा
أَتُحَـٰٓجُّوٓنِّى
क्या तुम झगड़ते हो मुझसे
فِى
concerning
ٱللَّهِ
अल्लाह के बारे में
وَقَدْ
हालाँकि तहक़ीक़
هَدَىٰنِ ۚ
उसने हिदायत दी मुझे
وَلَآ
और नहीं
أَخَافُ
मैं डरता (उन से)
مَا
जिनको
تُشْرِكُونَ
तुम शरीक ठहराते हो
بِهِۦٓ
साथ उसके
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
يَشَآءَ
चाहे
رَبِّى
रब मेरा
شَيْـًۭٔا ۗ
कोई चीज़
وَسِعَ
अहाता कर रखा है
رَبِّى
मेरे रब ने
كُلَّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ का
عِلْمًا ۗ
इल्म के ऐतबार से
أَفَلَا
क्या भला नहीं
تَتَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ते
उसकी क़ौम के लोग उससे झगड़ने लगे। उसने कहा, "क्या तुम मुझसे अल्लाह के विषय में झगड़ते हो? जबकि उसने मुझे मार्ग दिखा दिया है। मैं उनसे नहीं डरता, जिन्हें तुम उसका सहभागी ठहराते हो, बल्कि मेरा रब जो कुछ चाहता है वही पूरा होकर रहता है। प्रत्येक वस्तु मेरे रब की ज्ञान-परिधि के भीतर है। फिर क्या तुम चेतोगे नहीं?
तफ़्सीर:
और उनकी मुश्रिक जाति ने अल्लाह की तौहीद (एकेश्वरवाद) के बारे में उनके साथ झगड़ा किया और उन्हें अपनी मूर्तियों से डराया, तो इबराहीम अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा : क्या तुम मुझसे अल्लाह के एकेश्वरवाद और एकमात्र उसी की इबादत करने के बारे में झगड़ते हो, हालाँकि मेरे पालनहार ने मुझे इसकी तौफ़ीक़ दी है, तथा मैं तुम्हारी मूर्तियों से नहीं डरता, क्योंकि वे न किसी हानि की मालिक हैं कि मुझे हानि पहुँचा सकें और न किसी लाभ की मालिक हैं कि मुझे लाभ पहुँचा सकें, सिवाय इसके कि अल्लाह चाहे। क्योंकि अल्लाह जो चाहे वह होकर रहने वाला है। और अल्लाह के हर चीज़ को जानने के साथ, धरती पर या आकाश में कुछ भी उससे छिपा नहीं है। तो क्या (ऐ मेरी जाति के लोगो!) तुम यह नहीं सोचते कि तुम अल्लाह के साथ कुफ़्र और शिर्क में पड़े हो, कि तुम अकेले अल्लाह पर ईमान ले आओ?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
इब्राहीम अलैहिस्सलाम के तौहीद की तलाश के वाकिये का ज़िक्र है, जिन्होंने सूरज-चांद-सितारों को देखकर गौर-ओ-फिक्र से हक तक पहुंचे। यह हमें सिखाता है कि सच्चाई की तलाश में गौर-ओ-फिक्र करना और अंधी तकलीद से बचना अक्लमंदी की निशानी है।
आयत 81
وَكَيْفَ أَخَافُ مَآ أَشْرَكْتُمْ وَلَا تَخَافُونَ أَنَّكُمْ أَشْرَكْتُم بِٱللَّهِ مَا لَمْ يُنَزِّلْ بِهِۦ عَلَيْكُمْ سُلْطَـٰنًۭا ۚ فَأَىُّ ٱلْفَرِيقَيْنِ أَحَقُّ بِٱلْأَمْنِ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
وَكَيْفَ
और क्यों कर
أَخَافُ
मैं डरूँ
مَآ
उससे जिसको
أَشْرَكْتُمْ
शरीक बनाया तुमने
وَلَا
जबकि नहीं
تَخَافُونَ
तुम डरते
أَنَّكُمْ
कि बेशक तुम
أَشْرَكْتُم
शरीक बनाया तुमने
بِٱللَّهِ
अल्लाह का
مَا
उसे जो
لَمْ
नहीं
يُنَزِّلْ
उसने नाज़िल की
بِهِۦ
जिसकी
عَلَيْكُمْ
तुम पर
سُلْطَـٰنًۭا ۚ
कोई दलील
فَأَىُّ
तो कौन सा
ٱلْفَرِيقَيْنِ
दोनों गिरोहों में से
أَحَقُّ
ज़्यादा हक़दार है
بِٱلْأَمْنِ ۖ
अमन का
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
تَعْلَمُونَ
तुम जानते
"और मैं तुम्हारे ठहराए हुए साझीदारो से कैसे डरूँ, जबकि तुम इस बात से नहीं डरते कि तुमने उसे अल्लाह का सहभागी उस चीज़ को ठहराया है, जिसका उसने तुमपर कोई प्रमाण अवतरित नहीं किया? अब दोनों फ़रीकों में से कौन अधिक निश्चिन्त रहने का अधिकारी है? बताओ यदि तुम जानते हो
तफ़्सीर:
मैं उन मूर्तियों से कैसे डर सकता हूँ, जिनकी तुम अल्लाह के अलावा पूजा करते हो, जबकि तुम्हें अल्लाह के साथ शिर्क करते हुए डर नहीं लगता, जब तुम बिना किसी प्रमाण के अल्लाह के साथ उन चीज़ों को साझी बनाते हो जिन्हें उसने पैदा किया है?! तो दोनों दलों अर्थात् : एकेश्वरवादियों के दल और बहुदेववादियों के दल में से : कौन-सा दल शांति और सुरक्षा के अधिक योग्य है? यदि तुम उनमें से अधिक योग्य को जानते हो, तो उसका अनुसरण करो। और उनमें से अधिक योग्य - बिना किसी संदेह के - एकेश्वरवादी मोमिनों का दल है।
आयत 82
ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَلَمْ يَلْبِسُوٓا۟ إِيمَـٰنَهُم بِظُلْمٍ أُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمُ ٱلْأَمْنُ وَهُم مُّهْتَدُونَ
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए
وَلَمْ
और नहीं
يَلْبِسُوٓا۟
उन्होंने मिलाया
إِيمَـٰنَهُم
अपने ईमान को
بِظُلْمٍ
साथ ज़ुल्म के
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
لَهُمُ
उनके लिए
ٱلْأَمْنُ
अमन है
وَهُم
और वो ही
مُّهْتَدُونَ
हिदायत याफ़्ता हैं
"जो लोग ईमान लाए और अपने ईमान में किसी (शिर्क) ज़ुल्म की मिलावट नहीं की, वही लोग है जो भय मुक्त है और वही सीधे मार्ग पर हैं।"
तफ़्सीर:
जो लोग अल्लाह पर ईमान लाए तथा उसके बनाए हुए नियमों का पालन किया, और अपने ईमान के साथ शिर्क की मिलावट नहीं की, वही लोग सफल हैं, उन्हें उनके पालनहार ने हिदायत के मार्ग पर चलने की तौफ़ीक दी है।
आयत 83
وَتِلْكَ حُجَّتُنَآ ءَاتَيْنَـٰهَآ إِبْرَٰهِيمَ عَلَىٰ قَوْمِهِۦ ۚ نَرْفَعُ دَرَجَـٰتٍۢ مَّن نَّشَآءُ ۗ إِنَّ رَبَّكَ حَكِيمٌ عَلِيمٌۭ
وَتِلْكَ
और ये है
حُجَّتُنَآ
हुज्जत हमारी
ءَاتَيْنَـٰهَآ
दिया था हमने उसे
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम को
عَلَىٰ
against
قَوْمِهِۦ ۚ
उसकी क़ौम के ख़िलाफ़
نَرْفَعُ
हम बुलन्द करते हैं
دَرَجَـٰتٍۢ
दरजात
مَّن
जिसके
نَّشَآءُ ۗ
हम चाहते हैं
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
حَكِيمٌ
बहुत हिकमत वाला है
عَلِيمٌۭ
बहुत इल्म वाला है
यह है हमारा वह तर्क जो हमने इबराहीम को उसकी अपनी क़ौम के मुक़ाबले में प्रदान किया था। हम जिसे चाहते है दर्जों (श्रेणियों) में ऊँचा कर देते हैं। निस्संदेह तुम्हारा रब तत्वदर्शी, सर्वज्ञ है
तफ़्सीर:
यह तर्क, अर्थात् अल्लाह का कथन : ( ... فَأَيُّ الْفَرِيقَيْنِ أَحَقُّ بِالْأَمْنِ) ''तो दोनों पक्षों में से कौन सुरक्षा के अधिक योग्य है।'', जिसके द्वारा इबराहीम ने अपनी जाति को पराजित किया, यहाँ तक कि उनका तर्क समाप्त हो गया, यही हमारा तर्क है, जिसकी हमने उन्हें अपनी जाति के साथ बहस करने के लिए तौफ़ीक़ दी और उन्हें वह प्रदान किया। हम दुनिया तथा आख़िरत में अपने बंदों में से जिसे चाहते हैं, पदों में ऊँचा कर देते हैं। (ऐ रसूल!) आपका पालनहार अपनी रचना और प्रबंधन में पूर्ण हिकमत वाला, अपने बंदों को जानने वाला है।
आयत 84
وَوَهَبْنَا لَهُۥٓ إِسْحَـٰقَ وَيَعْقُوبَ ۚ كُلًّا هَدَيْنَا ۚ وَنُوحًا هَدَيْنَا مِن قَبْلُ ۖ وَمِن ذُرِّيَّتِهِۦ دَاوُۥدَ وَسُلَيْمَـٰنَ وَأَيُّوبَ وَيُوسُفَ وَمُوسَىٰ وَهَـٰرُونَ ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ
وَوَهَبْنَا
और अता किए हमने
لَهُۥٓ
उसे
إِسْحَـٰقَ
इसहाक़
وَيَعْقُوبَ ۚ
और याक़ूब
كُلًّا
हर एक को
هَدَيْنَا ۚ
हिदायत दी हमने
وَنُوحًا
और नूह को
هَدَيْنَا
हिदायत दी हमने
مِن
from
قَبْلُ ۖ
इससे क़ब्ल
وَمِن
and of
ذُرِّيَّتِهِۦ
और उसकी औलाद में से
دَاوُۥدَ
दाऊद
وَسُلَيْمَـٰنَ
और सुलेमान
وَأَيُّوبَ
और अय्यूब
وَيُوسُفَ
और यूसुफ़
وَمُوسَىٰ
और मूसा
وَهَـٰرُونَ ۚ
और हारून को
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
نَجْزِى
हम बदला देते हैं
ٱلْمُحْسِنِينَ
एहसान करने वालों को
और हमने उसे (इबराहीम को) इसहाक़ और याक़ूब दिए; हर एक को मार्ग दिखाया - और नूह को हमने इससे पहले मार्ग दिखाया था, और उसकी सन्तान में दाऊद, सुलैमान, अय्यूब, यूसुफ़, मूसा और हारून को भी - और इस प्रकार हम शुभ-सुन्दर कर्म करनेवालों को बदला देते है -
तफ़्सीर:
हमने इबराहीम को बेटे के रूप में इसहाक़ तथा पोते के रूप में याक़ूब प्रदान किए और उन दोनों में से हर एक को सीधा मार्ग दिखाया, तथा हमने उनसे पहले नूह़ को हिदयात की तौफ़ीक़ दी और नूह के वंश में से दाऊद और उनके पुत्र सुलैमान, अय्यूब, यूसुफ़, मूसा तथा उनके भाई हारून अलैहिमुस्सलाम को भी सीधे मार्ग पर चलने की तौफीक़ दी। और जिस प्रकार हमने नबियों को उनके अच्छे कर्म का बदला दिया, उसी प्रकार हम अच्छे कर्म करने वालों को उनके अच्छे कर्म का बदला देते हैं।
आयत 85
وَزَكَرِيَّا وَيَحْيَىٰ وَعِيسَىٰ وَإِلْيَاسَ ۖ كُلٌّۭ مِّنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ
وَزَكَرِيَّا
और ज़करिया
وَيَحْيَىٰ
और यहया
وَعِيسَىٰ
और ईसा
وَإِلْيَاسَ ۖ
और इलयास
كُلٌّۭ
सबके सब
مِّنَ
of
ٱلصَّـٰلِحِينَ
नेक लोगों में से थे
और ज़करिया, यह्या , ईसा और इलयास को भी (मार्ग दिखलाया) । इनमें का हर एक योग्य और नेक था
तफ़्सीर:
और इसी प्रकार हमने ज़करिया, यह़्या, ईसा बिन मरयम और इलयास अलैहिमुस्सलाम को भी सीधे मार्ग की तौफ़ीक़ दी। और ये सभी ईश्दूत सदाचारियों में से थे, जिन्हें अल्लाह ने रसूलों के रूप में चुन लिया था।
आयत 86
وَإِسْمَـٰعِيلَ وَٱلْيَسَعَ وَيُونُسَ وَلُوطًۭا ۚ وَكُلًّۭا فَضَّلْنَا عَلَى ٱلْعَـٰلَمِينَ
وَإِسْمَـٰعِيلَ
और इस्माईल
وَٱلْيَسَعَ
और अल यसअ
وَيُونُسَ
और यूनुस
وَلُوطًۭا ۚ
और लूत
وَكُلًّۭا
और हर एक को
فَضَّلْنَا
फ़ज़ीलत दी हमने
عَلَى
over
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों पर
और इसमाईल, अलयसअ, यूनुस और लूत को भी। इनमें से हर एक को हमने संसार के मुक़ाबले में श्रेष्ठता प्रदान की
तफ़्सीर:
और इसी प्रकार हमने इसमाईल, अल-यसअ, यूनुस तथा लूत अलैहिमुस्सलाम को तौफ़ीक़ दी, और इन सभी नबियों को, जिनमें सबसे ऊपर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं, (उनके समय के) समस्त लोगों पर श्रेष्ठता प्रदान की।
आयत 87
وَمِنْ ءَابَآئِهِمْ وَذُرِّيَّـٰتِهِمْ وَإِخْوَٰنِهِمْ ۖ وَٱجْتَبَيْنَـٰهُمْ وَهَدَيْنَـٰهُمْ إِلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ
وَمِنْ
And from
ءَابَآئِهِمْ
और उनके आबा ओ अजदाद में से
وَذُرِّيَّـٰتِهِمْ
और उनकी औलादों में से
وَإِخْوَٰنِهِمْ ۖ
और उनके भाईयों में से
وَٱجْتَبَيْنَـٰهُمْ
और चुन लिया हमने उन्हें
وَهَدَيْنَـٰهُمْ
और हिदायत दी हमने उन्हें
إِلَىٰ
to
صِرَٰطٍۢ
तरफ़ रास्ते
مُّسْتَقِيمٍۢ
सीधे के
और उनके बाप-दादा और उनकी सन्तान और उनके भाई-बन्धुओं में भी कितने ही लोगों को (मार्ग दिखाया) । और हमने उन्हें चुन लिया और उन्हें सीधे मार्ग की ओर चलाया
तफ़्सीर:
हमने उनके कुछ पिताओं, उनकी कुछ संतानों तथा उनके कुछ भाइयों को अपनी इच्छा के अनुसार तौफ़ीक़ दी और उन्हें चुन लिया तथा उन्हें उस सीधे मार्ग पर चलने का सामर्थ्य प्रदान किया, जो कि अल्लाह के एकेश्वरवाद और उसकी आज्ञाकारिता का मार्ग है।
आयत 88
ذَٰلِكَ هُدَى ٱللَّهِ يَهْدِى بِهِۦ مَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦ ۚ وَلَوْ أَشْرَكُوا۟ لَحَبِطَ عَنْهُم مَّا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
ذَٰلِكَ
ये
هُدَى
हिदायत है
ٱللَّهِ
अल्लाह की
يَهْدِى
वो हिदायत देता है
بِهِۦ
साथ इसके
مَن
जिसे
يَشَآءُ
वो चाहता है
مِنْ
of
عِبَادِهِۦ ۚ
अपने बन्दों में से
وَلَوْ
और अगर
أَشْرَكُوا۟
वो शिर्क करते
لَحَبِطَ
अलबत्ता ज़ाया हो जाते
عَنْهُم
उनसे
مَّا
जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
यह अल्लाह का मार्गदर्शन है, जिसके द्वारा वह अपने बन्दों में से जिसको चाहता है मार्ग दिखाता है, और यदि उन लोगों ने कहीं अल्लाह का साझी ठहराया होता, तो उनका सब किया-धरा अकारथ हो जाता
तफ़्सीर:
यह तौफ़ीक़ (सफलता) जो उन्हें प्राप्त हुई, यह अल्लाह की तौफ़ीक़ है। वह अपने बंदों में से जिसे चाहता है तौफ़ीक़ देता है। और यदि ये लोग अल्लाह के साथ उसके अलावा को साझी बनाते, तो उनका कार्य व्यर्थ (अमान्य) हो जाता; क्योंकि शिर्क नेक कार्य को नष्ट (अमान्य) कर देने वाला है।
आयत 89
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ ءَاتَيْنَـٰهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ وَٱلْحُكْمَ وَٱلنُّبُوَّةَ ۚ فَإِن يَكْفُرْ بِهَا هَـٰٓؤُلَآءِ فَقَدْ وَكَّلْنَا بِهَا قَوْمًۭا لَّيْسُوا۟ بِهَا بِكَـٰفِرِينَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही लोग हैं
ٱلَّذِينَ
वो जो
ءَاتَيْنَـٰهُمُ
दी हमने उन्हें
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
وَٱلْحُكْمَ
और हिकमत
وَٱلنُّبُوَّةَ ۚ
और नबुव्वत
فَإِن
फिर अगर
يَكْفُرْ
कुफ़्र करते हैं
بِهَا
उसका
هَـٰٓؤُلَآءِ
ये लोग
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
وَكَّلْنَا
मुक़र्रर कर दिया हमने
بِهَا
साथ उसके
قَوْمًۭا
एक क़ौम को
لَّيْسُوا۟
नहीं हैं वो
بِهَا
उसका
بِكَـٰفِرِينَ
इन्कार करने वाले
वे ऐसे लोग है जिन्हें हमने किताब और निर्णय-शक्ति और पैग़म्बरी प्रदान की थी (उसी प्रकार हमने मुहम्मद को भी किताब, निर्णय-शक्ति और पैग़म्बरी दी है) । फिर यदि ये लोग इसे मारने से इनकार करें, तो अब हमने इसको ऐसे लोगों को सौंपा है जो इसका इनकार नहीं करते
तफ़्सीर:
ये उपर्युक्त नबी गण ही वे लोग हैं, जिन्हें हमने किताबें प्रदान कीं, उन्हें हिकमत प्रदान की तथा उन्हें नुबुव्वत (पैगंबरी) प्रदान की। यदि आपकी जाति उसका इनकार करे, जो हमने इन्हें इन तीन चीज़ों में से प्रदान किया है, तो हमने उनके लिए ऐसे लोगों को तैयार कर रखा है, जो इनका इनकार करने वाले नहीं हैं, बल्कि वे इनपर ईमान लाने वाले और मज़बूती से उनका पालन करने वाले हैं। और वे मुहाजिर एवं अनसार तथा वे लोग हैं, जो क़ियामत के दिन तक अच्छे ढंग से उनका अनुसरण करने वाले हैं।
आयत 90
أُو۟لَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ هَدَى ٱللَّهُ ۖ فَبِهُدَىٰهُمُ ٱقْتَدِهْ ۗ قُل لَّآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا ۖ إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرَىٰ لِلْعَـٰلَمِينَ
أُو۟لَـٰٓئِكَ
यही वो लोग हैं
ٱلَّذِينَ
जिन्हें
هَدَى
हिदायत दी
ٱللَّهُ ۖ
अल्लाह ने
فَبِهُدَىٰهُمُ
पस उनकी हिदायत की
ٱقْتَدِهْ ۗ
आप पैरवी कीजिए
قُل
कह दीजिए
لَّآ
Not
أَسْـَٔلُكُمْ
नहीं मैं सवाल करता तुमसे
عَلَيْهِ
उस पर
أَجْرًا ۖ
किसी अजर का
إِنْ
नहीं
هُوَ
वो
إِلَّا
मगर
ذِكْرَىٰ
एक नसीहत
لِلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों के लिए
वे (पिछले पैग़म्बर) ऐसे लोग थे, जिन्हें अल्लाह ने मार्ग दिखाया था, तो तुम उन्हीं के मार्ग का अनुसरण करो। कह दो, "मैं तुमसे उसका कोई प्रतिदान नहीं माँगता। वह तो सम्पूर्ण संसार के लिए बस एक प्रबोध है।"
तफ़्सीर:
ये नबी गण तथा उनके साथ जिनका ज़िक्र हुआ, जैसे उनके पिता, उनके बेटे और उनके भाई, वही वास्तव में मार्गदर्शन पाने वाले हैं। इसलिए आप उनका अनुसरण करें और उन्हें अपना आदर्श बनाएँ। और (ऐ रसूल!) आप अपनी जाति से कह दें : मैं तुमसे इस क़ुरआन को पहुँचाने का कोई बदला नहीं माँगता। क्योंकि क़ुरआन मानवजाति और जिन्नों के लिए उसके द्वारा सीधे रास्ते और सही मार्ग पर मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए एक उपदेश के अलावा और कुछ नहीं है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कई नबियों की फेहरिस्त और हिदायत की ज़ंजीर का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि हर नबी की तालीम एक ही सिलसिले की कड़ी थी, इसलिए किसी नबी के दरमियान फर्क करना गलत है।
आयत 91
وَمَا قَدَرُوا۟ ٱللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِۦٓ إِذْ قَالُوا۟ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ عَلَىٰ بَشَرٍۢ مِّن شَىْءٍۢ ۗ قُلْ مَنْ أَنزَلَ ٱلْكِتَـٰبَ ٱلَّذِى جَآءَ بِهِۦ مُوسَىٰ نُورًۭا وَهُدًۭى لِّلنَّاسِ ۖ تَجْعَلُونَهُۥ قَرَاطِيسَ تُبْدُونَهَا وَتُخْفُونَ كَثِيرًۭا ۖ وَعُلِّمْتُم مَّا لَمْ تَعْلَمُوٓا۟ أَنتُمْ وَلَآ ءَابَآؤُكُمْ ۖ قُلِ ٱللَّهُ ۖ ثُمَّ ذَرْهُمْ فِى خَوْضِهِمْ يَلْعَبُونَ
وَمَا
और नहीं
قَدَرُوا۟
उन्होंने क़द्र की
ٱللَّهَ
अल्लाह की
حَقَّ
जिस तरह हक़ है
قَدْرِهِۦٓ
उसकी क़द्र करने का
إِذْ
जब
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
مَآ
नहीं
أَنزَلَ
नाज़िल की
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
عَلَىٰ
on
بَشَرٍۢ
किसी इन्सान पर
مِّن
[of]
شَىْءٍۢ ۗ
कोई चीज़
قُلْ
कह दीजिए
مَنْ
किसने
أَنزَلَ
नाज़िल की
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
ٱلَّذِى
वो जो
جَآءَ
लाए
بِهِۦ
उसे
مُوسَىٰ
मूसा
نُورًۭا
नूर
وَهُدًۭى
और हिदायत थी
لِّلنَّاسِ ۖ
लोगों के लिए
تَجْعَلُونَهُۥ
तुम बना देते हो उसे
قَرَاطِيسَ
वर्क़-वर्क़
تُبْدُونَهَا
तुम ज़ाहिर करते हो उसे
وَتُخْفُونَ
और तुम छुपाते हो
كَثِيرًۭا ۖ
बहुत सा
وَعُلِّمْتُم
और सिखाए गए हो तुम
مَّا
जो
لَمْ
नहीं
تَعْلَمُوٓا۟
तुम जानते थे
أَنتُمْ
तुम
وَلَآ
और ना
ءَابَآؤُكُمْ ۖ
आबा ओ अजदाद तुम्हारे
قُلِ
कह दीजिए
ٱللَّهُ ۖ
अल्लाह ने (उतारा है)
ثُمَّ
फिर
ذَرْهُمْ
छोड़ दीजिए उन्हें
فِى
in
خَوْضِهِمْ
अपनी बहस में
يَلْعَبُونَ
वो खेलते फिरें
उन्होंने अल्लाह की क़द्र न जानी, जैसी उसकी क़द्र जाननी चाहिए थी, जबकि उन्होंने कहा, "अल्लाह ने किसी मनुष्य पर कुछ अवतरित ही नहीं किया है।" कहो, "फिर यह किताब किसने अवतरित की, जो मूसा लोगों के लिए प्रकाश और मार्गदर्शन के रूप में लाया था, जिसे तुम पन्ना-पन्ना करके रखते हो? उन्हें दिखाते भी हो, परन्तु बहुत-सा छिपा जाते हो। और तुम्हें वह ज्ञान दिया गया, जिसे न तुम जानते थे और न तुम्हारे बाप-दादा ही।" कह दो, "अल्लाह ही ने," फिर उन्हें छोड़ो कि वे अपनी नुक्ताचीनियों से खेलते रहें
तफ़्सीर:
मुश्रिकों ने अल्लाह का उसकी महिमा के योग्य सम्मान नहीं किया, जब उन्होंने अपने नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कहा कि अल्लाह ने किसी इनसान पर कोई वह़्य नहीं उतारी। (ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : मूसा पर तौरात किसने उतारी, जो उनकी जाति के लिए प्रकाश, मार्गदर्शन तथा निर्देश पर आधारित थी?! जिसे यहूदी पत्रों में संचय करते हैं, उनमें से वे केवल उन्हीं बातों को ज़ाहिर करते हैं, जो उनकी इच्छाओं के अनुसार होती हैं, और जो उनके विपरीत होती हैं, उन्हें छिपाते हैं, जैसे कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का वर्णन। और (ऐ अरब वासियो!) तुम्हें क़ुरआन से वे बातें सिखाई गई हैं, जो न तो तुम और न तुम्हारे पूर्वज पहले से जानते थे। (ऐ रसूल!) उनसे कह दें कि उसे अल्लाह ने उतारा है। फिर उन्हें उनकी अज्ञानता और पथभ्रष्टता में छोड़ दें, मज़ाक़ उड़ाएँ और ठट्ठा करें यहाँ तक कि उनके पास निश्चितता (अर्थात् मौत) आ जाए।
आयत 92
وَهَـٰذَا كِتَـٰبٌ أَنزَلْنَـٰهُ مُبَارَكٌۭ مُّصَدِّقُ ٱلَّذِى بَيْنَ يَدَيْهِ وَلِتُنذِرَ أُمَّ ٱلْقُرَىٰ وَمَنْ حَوْلَهَا ۚ وَٱلَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ يُؤْمِنُونَ بِهِۦ ۖ وَهُمْ عَلَىٰ صَلَاتِهِمْ يُحَافِظُونَ
وَهَـٰذَا
और ये
كِتَـٰبٌ
किताब है
أَنزَلْنَـٰهُ
नाज़िल किया हमने उसे
مُبَارَكٌۭ
बरकत वाली
مُّصَدِّقُ
तसदीक़ करने वाली
ٱلَّذِى
उसकी जो
بَيْنَ
(came) before
يَدَيْهِ
इससे पहले है
وَلِتُنذِرَ
और ताकि आप डराऐं
أُمَّ
(the) mother
ٱلْقُرَىٰ
अहले मक्का को
وَمَنْ
और जो
حَوْلَهَا ۚ
उसके इर्द-गिर्द हैं
وَٱلَّذِينَ
और वो जो
يُؤْمِنُونَ
ईमान रखते हैं
بِٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत पर
يُؤْمِنُونَ
वो ईमान लाते हैं
بِهِۦ ۖ
उस पर
وَهُمْ
और वो
عَلَىٰ
over
صَلَاتِهِمْ
अपनी नमाज़ की
يُحَافِظُونَ
वो हिफ़ाज़त करते हैं
यह किताब है जिसे हमने उतारा है; बरकतवाली है; अपने से पहले की पुष्टि में है (ताकि तुम शुभ-सूचना दो) और ताकि तुम केन्द्रीय बस्ती (मक्का) और उसके चतुर्दिक बसनेवाले लोगों को सचेत करो और जो लोग आख़िरत पर ईमान रखते है, वे इसपर भी ईमान लाते है। और वे अपनी नमाज़ की रक्षा करते है
तफ़्सीर:
यह क़ुरआन एक पुस्तक है, जिसे हमने (ऐ नबी!) आपपर उतारा है। यह एक बरकत वाली किताब है, जो अपने से पूर्व उरतने वाली आसमानी किताबों की पुष्टि करने वाली है। ताकि आप इसके साथ मक्का के लोगों और धरती के पूर्व और पश्चिम के सभी लोगों को सचेत करें ताकि उन्हें मार्गदर्शन प्राप्त हो। तथा जो लोग आख़िरत पर ईमान रखते हैं, वे इस क़ुरआन पर ईमान लाते हैं, उसकी शिक्षाओं पर अमल करते हैं और अपनी नमाज़ की, उसके अरकान (स्तंभों), फ़राइज़ (दायित्वों) और मुसतह़ब्बात (वांछनीय चीज़ों) को शरीयत द्वारा निर्धारित समय पर स्थापित करके, रक्षा करते हैं।
आयत 93
وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا أَوْ قَالَ أُوحِىَ إِلَىَّ وَلَمْ يُوحَ إِلَيْهِ شَىْءٌۭ وَمَن قَالَ سَأُنزِلُ مِثْلَ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ ۗ وَلَوْ تَرَىٰٓ إِذِ ٱلظَّـٰلِمُونَ فِى غَمَرَٰتِ ٱلْمَوْتِ وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ بَاسِطُوٓا۟ أَيْدِيهِمْ أَخْرِجُوٓا۟ أَنفُسَكُمُ ۖ ٱلْيَوْمَ تُجْزَوْنَ عَذَابَ ٱلْهُونِ بِمَا كُنتُمْ تَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ غَيْرَ ٱلْحَقِّ وَكُنتُمْ عَنْ ءَايَـٰتِهِۦ تَسْتَكْبِرُونَ
وَمَنْ
और कौन
أَظْلَمُ
बड़ा ज़ालिम है
مِمَّنِ
उससे जो
ٱفْتَرَىٰ
गढ़ ले
عَلَى
about
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
كَذِبًا
झूठ
أَوْ
या
قَالَ
वो कहे
أُوحِىَ
वही की गई
إِلَىَّ
तरफ़ मेरे
وَلَمْ
हालाँकि नहीं
يُوحَ
वही की गई
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
شَىْءٌۭ
कोई चीज़
وَمَن
और जो
قَالَ
कहे
سَأُنزِلُ
ज़रूर मैं नाज़िल करुँगा
مِثْلَ
मानिन्द
مَآ
उसके जो
أَنزَلَ
नाज़िल किया
ٱللَّهُ ۗ
अल्लाह ने
وَلَوْ
और काश
تَرَىٰٓ
आप देखें
إِذِ
जब
ٱلظَّـٰلِمُونَ
ज़ालिम
فِى
(are) in
غَمَرَٰتِ
सख़्तियों में होंगे
ٱلْمَوْتِ
मौत की
وَٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
और फ़रिश्ते
بَاسِطُوٓا۟
फैलाए हुए होंगे
أَيْدِيهِمْ
अपने हाथों को
أَخْرِجُوٓا۟
निकालो
أَنفُسَكُمُ ۖ
जानें अपनी
ٱلْيَوْمَ
आज
تُجْزَوْنَ
तुम बदला दिए जाओगे
عَذَابَ
अज़ाब
ٱلْهُونِ
रुस्वाई का
بِمَا
बवजह उसके जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَقُولُونَ
तुम कहते
عَلَى
against
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
غَيْرَ
other than
ٱلْحَقِّ
नाहक़
وَكُنتُمْ
और थे तुम
عَنْ
towards
ءَايَـٰتِهِۦ
उसकी आयात से
تَسْتَكْبِرُونَ
तुम तकब्बुर करते
और उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी कौन होगा, जो अल्लाह पर मिथ्यारोपण करे या यह कहे कि "मेरी ओर प्रकाशना (वह्य,) की गई है," हालाँकि उसकी ओर भी प्रकाशना न की गई हो। और वह व्यक्ति से (बढ़कर अत्याचारी कौन होगा) जो यह कहे कि "मैं भी ऐसी चीज़ उतार दूँगा, जैसी अल्लाह ने उतारी है।" और यदि तुम देख सकते, तुम अत्याचारी मृत्यु-यातनाओं में होते है और फ़रिश्ते अपने हाथ बढ़ा रहे होते है कि "निकालो अपने प्राण! आज तुम्हें अपमानजनक यातना दी जाएगी, क्योंकि तुम अल्लाह के प्रति झूठ बका करते थे और उसकी आयतों के मुक़ाबले में अकड़ते थे।"
तफ़्सीर:
उससे बड़ा अत्याचारी कोई नहीं, जिसने यह कहते हुए अल्लाह के विरुद्ध झूठ गढ़ा कि : अल्लाह ने किसी मनुष्य पर कोई चीज़ नहीं उतारी। या उसने झूठ कहा : अल्लाह ने उसकी ओर वह़्य की है, जबकि अल्लाह ने उसकी ओर कोई वह़्य नहीं भेजी। या उसने यह कहा : अल्लाह ने जो क़ुरआन उतारा है, मैं भी वैसा ही उतार दूँगा। और काश! (ऐ रसूल!) आप उस समय को देखें, जब ये अत्याचारी लोग मौत की पीड़ा से ग्रस्त होते हैं और फ़रिश्ते प्रताड़ना और मार-पीट के साथ उनकी ओर हाथ बढ़ाए होते हैं, उन्हें डाँटते हुए कहते हैं : अपने प्राण निकालो, क्योंकि हम उन्हें क़ब्ज़ करने वाले हैं। आज के दिन तुम्हें ऐसी यातना दी जाएगी, जो तुम्हें अपमानित और तिरस्कृत कर देगी। इसका कारण यह है कि तुम नुबुव्वत, वह़्य और अल्लाह की उतारी हुई किताब की तरह उतारने का दावा करके अल्लाह पर झूठ गढ़ते थे, तथा इस कारण कि तुम अल्लाह की आयतों पर ईमान लाने से अहंकार करते थे। (ऐ नबी!) यदि आप यह दृश्य देखें, तो आपको एक भयानक चीज़ दिखाई देगी।
आयत 94
وَلَقَدْ جِئْتُمُونَا فُرَٰدَىٰ كَمَا خَلَقْنَـٰكُمْ أَوَّلَ مَرَّةٍۢ وَتَرَكْتُم مَّا خَوَّلْنَـٰكُمْ وَرَآءَ ظُهُورِكُمْ ۖ وَمَا نَرَىٰ مَعَكُمْ شُفَعَآءَكُمُ ٱلَّذِينَ زَعَمْتُمْ أَنَّهُمْ فِيكُمْ شُرَكَـٰٓؤُا۟ ۚ لَقَد تَّقَطَّعَ بَيْنَكُمْ وَضَلَّ عَنكُم مَّا كُنتُمْ تَزْعُمُونَ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
جِئْتُمُونَا
आ गए तुम हमारे पास
فُرَٰدَىٰ
अकेले-अकेले
كَمَا
जैसा कि
خَلَقْنَـٰكُمْ
पैदा किया था हमने तुम्हें
أَوَّلَ
पहली
مَرَّةٍۢ
बार
وَتَرَكْتُم
और छोड़ आए तुम
مَّا
जो
خَوَّلْنَـٰكُمْ
दिया हमने तुम्हें
وَرَآءَ
पीछे
ظُهُورِكُمْ ۖ
अपनी पुश्तों के
وَمَا
और नहीं
نَرَىٰ
हम देखते
مَعَكُمْ
साथ तुम्हारे
شُفَعَآءَكُمُ
तुम्हारे सिफ़ारिशियों को
ٱلَّذِينَ
वो जो
زَعَمْتُمْ
गुमान किया था तुमने
أَنَّهُمْ
कि बेशक वो
فِيكُمْ
तुम में
شُرَكَـٰٓؤُا۟ ۚ
शरीक हैं
لَقَد
अलबत्ता तहक़ीक़
تَّقَطَّعَ
कट गया (ताल्लुक़)
بَيْنَكُمْ
तुम्हारे दर्मियान
وَضَلَّ
और गुम हो गया
عَنكُم
तुमसे
مَّا
वो जो
كُنتُمْ
थे तुम
تَزْعُمُونَ
तुम गुमान करते
और निश्चय ही तुम उसी प्रकार एक-एक करके हमारे पास आ गए, जिस प्रकार हमने तुम्हें पहली बार पैदा किया था। और जो कुछ हमने तुम्हें दे रखा था, उसे अपने पीछे छोड़ आए और हम तुम्हारे साथ तुम्हारे उन सिफ़ारिशियों को भी नहीं देख रहे हैं, जिनके विषय में तुम दावे से कहते थे, "वे तुम्हारे मामले में शरीक है।" तुम्हारे पारस्परिक सम्बन्ध टूट चुके है और वे सब तुमसे गुम होकर रह गए, जो दावे तुम किया करते थे
तफ़्सीर:
(मरने के बाद) दोबारा उठाए जाने के दिन उनसे कहा जाएगा : आज के दिन तुम हमारे पास अकेले आए हो, न तो तुम्हारे पास धन है और न ही सरदारी। जैसे हमने तुम्हें पहली बार नंगे पाँव, नंगे शरीर और खतनारहित पैदा किया था। और जो कुछ हमने तुम्हें दिया था, वह तुमने अपनी इच्छा के विरुद्ध संसार में छोड़ दिया। और हम आज तुम्हारे साथ तुम्हारे उन पूज्यों को नहीं देखते हैं, जिन्हें तुमने अपने लिए मध्यस्थ (सिफारिशी) होने का दावा किया था, तथा तुमने दावा किया था कि वे इबादत के योग्य होने में अल्लाह के साझी हैं। निश्चय तुम्हारे बीच का संबंध टूट गया, तथा जो कुछ तुम उनकी सिफारिश का दावा करते थे और यह कि वे अल्लाह के साझी हैं, वह (भ्रम) तुमसे दूर हो गया।
आयत 95
۞ إِنَّ ٱللَّهَ فَالِقُ ٱلْحَبِّ وَٱلنَّوَىٰ ۖ يُخْرِجُ ٱلْحَىَّ مِنَ ٱلْمَيِّتِ وَمُخْرِجُ ٱلْمَيِّتِ مِنَ ٱلْحَىِّ ۚ ذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ ۖ فَأَنَّىٰ تُؤْفَكُونَ
۞ إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
فَالِقُ
फाड़ने वाला है
ٱلْحَبِّ
दाने
وَٱلنَّوَىٰ ۖ
और गुठली को
يُخْرِجُ
वो निकालता है
ٱلْحَىَّ
ज़िन्दा को
مِنَ
from
ٱلْمَيِّتِ
मुर्दा से
وَمُخْرِجُ
और निकालने वाला है
ٱلْمَيِّتِ
मुर्दा को
مِنَ
from
ٱلْحَىِّ ۚ
ज़िन्दा से
ذَٰلِكُمُ
ये है
ٱللَّهُ ۖ
अल्लाह
فَأَنَّىٰ
तो कहाँ से
تُؤْفَكُونَ
तुम फेरे जाते हो
निश्चय ही अल्लाह दाने और गुठली को फाड़ निकालता है, सजीव को निर्जीव से निकालता है और निर्जीव को सजीव से निकालनेवाला है। वही अल्लाह है - फिर तुम कहाँ औंधे हुए जाते हो? -
तफ़्सीर:
निःसंदेह केवल अल्लाह ही है जो दाने को फाड़ता है, तो उससे फसलें निकलती हैं, तथा गुठली को फाड़ता है, तो उससे पेड़ निकलते हैं, जैसे खजूर के पेड़,अंगूर आदि। वह सजीव को निर्जीव से निकालता है; जैसे मनुष्य और बाकी जानदार को वीर्य से निकालता है। तथा निर्जीव को सजीव से निकालता है; जैसे वीर्य को मनुष्य से तथा अंडे को मुर्गी से निकालता है। यह सब जो करता है, वही अल्लाह है जिसने तुम्हें पैदा किया है। फिर (ऐ मुश्रिको!) तुम सत्य से कैसे फेर दिए जाते हो, जबकि तुम अल्लाह की अद्भुत रचना का मुशाहदा करते हो?!
आयत 96
فَالِقُ ٱلْإِصْبَاحِ وَجَعَلَ ٱلَّيْلَ سَكَنًۭا وَٱلشَّمْسَ وَٱلْقَمَرَ حُسْبَانًۭا ۚ ذَٰلِكَ تَقْدِيرُ ٱلْعَزِيزِ ٱلْعَلِيمِ
فَالِقُ
फाड़ने वाला है
ٱلْإِصْبَاحِ
सुबह का
وَجَعَلَ
और उसने बनाया
ٱلَّيْلَ
रात को
سَكَنًۭا
बाइसे सुकून
وَٱلشَّمْسَ
और सूरज
وَٱلْقَمَرَ
और चाँद को
حُسْبَانًۭا ۚ
हिसाब का ज़रिया
ذَٰلِكَ
ये
تَقْدِيرُ
अन्दाज़ा है
ٱلْعَزِيزِ
बहुत ज़बरदस्त का
ٱلْعَلِيمِ
बहुत इल्म वाले का
पौ फाड़ता है, और उसी ने रात को आराम के लिए बनाया और सूर्य और चन्द्रमा को (समय के) हिसाब का साधन ठहराया। यह बड़े शक्तिमान, सर्वज्ञ का ठहराया हुआ परिणाम है
तफ़्सीर:
वही महिमावान और सर्वशक्तिमान (अल्लाह) है, जो रात के अंधेरे से सुबह के प्रकाश को फाड़ निकालता है, और वही है जिसने रात को लोगों के आराम करने का स्थान बनाया जिसमें वे आजीविका की तलाश में गतिविधि से स्थिर हो जाते हैं; ताकि वे दिन में उसकी खोज में अपनी थकान से आराम करें। तथा वही है जिसने सूरज और चाँद को एक पूर्वनिर्धारित गणना के अनुसार चलाया। यह उल्लिखित अद्भुत रचना उस प्रभुत्वशाली अस्तित्व का निर्धारित किया हुआ है, जिसे कोई पराजित नहीं कर सकता, वह अपनी रचना के बारे में और उनके हितों को जानने वाला है।
आयत 97
وَهُوَ ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُمُ ٱلنُّجُومَ لِتَهْتَدُوا۟ بِهَا فِى ظُلُمَـٰتِ ٱلْبَرِّ وَٱلْبَحْرِ ۗ قَدْ فَصَّلْنَا ٱلْـَٔايَـٰتِ لِقَوْمٍۢ يَعْلَمُونَ
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
جَعَلَ
बनाए
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلنُّجُومَ
सितारे
لِتَهْتَدُوا۟
ताकि तुम राह पाओ
بِهَا
उनके ज़रिए
فِى
in
ظُلُمَـٰتِ
तारीकियों में
ٱلْبَرِّ
खुश्की की
وَٱلْبَحْرِ ۗ
और समुन्दर की
قَدْ
तहक़ीक
فَصَّلْنَا
खोल कर बयान कर दीं हमने
ٱلْـَٔايَـٰتِ
आयात
لِقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَعْلَمُونَ
जो इल्म रखते हैं
और वही है जिसने तुम्हारे लिए तारे बनाए, ताकि तुम उनके द्वारा स्थल और समुद्र के अंधकारों में मार्ग पा सको। जो लोग जानना चाहे उनके लिए हमने निशानियाँ खोल-खोलकर बयान कर दी है
तफ़्सीर:
वही महिमावान और सर्वशक्तिमान (अल्लाह) है, जिसने (ऐ आदम की संतान!) तुम्हारे लिए आकाश में तारे बनाए, ताकि तुम अपनी यात्राओं में मार्ग पा सको यदि थल और समुद्र में तुमपर रास्ता संदिग्ध हो जाए। निश्चय हमने अपनी क्षमता को दर्शाने वाले प्रमाणों और सबूतों को उन लोगों के लिए स्पष्ट कर दिए हैं, जो उनपर विचार करते हैं, फिर उनसे लाभ उठाते हैं।
आयत 98
وَهُوَ ٱلَّذِىٓ أَنشَأَكُم مِّن نَّفْسٍۢ وَٰحِدَةٍۢ فَمُسْتَقَرٌّۭ وَمُسْتَوْدَعٌۭ ۗ قَدْ فَصَّلْنَا ٱلْـَٔايَـٰتِ لِقَوْمٍۢ يَفْقَهُونَ
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِىٓ
जिसने
أَنشَأَكُم
पैदा किया तुम्हें
مِّن
from
نَّفْسٍۢ
a soul
وَٰحِدَةٍۢ
एक जान से
فَمُسْتَقَرٌّۭ
फिर एक रहने की जगह
وَمُسْتَوْدَعٌۭ ۗ
और एक सुपुर्द किए जाने की जगह है
قَدْ
तहक़ीक़
فَصَّلْنَا
खोल कर बयान कर दीं हमने
ٱلْـَٔايَـٰتِ
आयात
لِقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَفْقَهُونَ
जो समझते हों
और वही तो है, जिसने तुम्हें अकेली जान पैदा किया। अतः एक अवधि तक ठहरना है और फिर सौंप देना है। उन लोगों के लिए, जो समझे हमने निशानियाँ खोल-खोलकर बयान कर दी है
तफ़्सीर:
वही महिमावान और सर्वशक्तिमान (अल्लाह) है, जिसने तुम्हें एक आत्मा से पैदा किया जो तुम्हारे पिता आदम की आत्मा है। क्योंकि उसने तुम्हारी रचना का आरंभ तुम्हारे पिता आदम को मिट्टी से पैदा करके किया, फिर उनसे तुम्हें पैदा किया। तथा तुम्हारे लिए ठहरने का स्थान बनाया, जैसे तुम्हारी माँओं के गर्भ और तुम्हारे सौंपे जाने की जगह बनाई, जैसे तुम्हारे बापों की पीठ। हमने आयतों (निशानियों) को उन लोगों के लिए स्पष्ट कर दिया है जो अल्लाह की वाणी को समझते हैं।
आयत 99
وَهُوَ ٱلَّذِىٓ أَنزَلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۭ فَأَخْرَجْنَا بِهِۦ نَبَاتَ كُلِّ شَىْءٍۢ فَأَخْرَجْنَا مِنْهُ خَضِرًۭا نُّخْرِجُ مِنْهُ حَبًّۭا مُّتَرَاكِبًۭا وَمِنَ ٱلنَّخْلِ مِن طَلْعِهَا قِنْوَانٌۭ دَانِيَةٌۭ وَجَنَّـٰتٍۢ مِّنْ أَعْنَابٍۢ وَٱلزَّيْتُونَ وَٱلرُّمَّانَ مُشْتَبِهًۭا وَغَيْرَ مُتَشَـٰبِهٍ ۗ ٱنظُرُوٓا۟ إِلَىٰ ثَمَرِهِۦٓ إِذَآ أَثْمَرَ وَيَنْعِهِۦٓ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكُمْ لَـَٔايَـٰتٍۢ لِّقَوْمٍۢ يُؤْمِنُونَ
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِىٓ
जिसने
أَنزَلَ
उतारा
مِنَ
from
ٱلسَّمَآءِ
आसमान से
مَآءًۭ
पानी
فَأَخْرَجْنَا
फिर निकाली हमने
بِهِۦ
साथ उसके
نَبَاتَ
पैदावार
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ की
فَأَخْرَجْنَا
फिर निकाला हमने
مِنْهُ
उससे
خَضِرًۭا
सब्ज़ा
نُّخْرِجُ
हम निकालते हैं
مِنْهُ
उससे
حَبًّۭا
दाने
مُّتَرَاكِبًۭا
तह-ब-तह
وَمِنَ
And from
ٱلنَّخْلِ
और खजूरों से
مِن
from
طَلْعِهَا
उनकेशगूफ़ों से
قِنْوَانٌۭ
ख़ोशे
دَانِيَةٌۭ
झुके हुए
وَجَنَّـٰتٍۢ
और बाग़ात
مِّنْ
of
أَعْنَابٍۢ
अंगूरों के
وَٱلزَّيْتُونَ
और ज़ैतून
وَٱلرُّمَّانَ
और अनार के
مُشْتَبِهًۭا
मिलते-जुलते
وَغَيْرَ
और नहीं भी
مُتَشَـٰبِهٍ ۗ
मिलते-जुलते
ٱنظُرُوٓا۟
देखो
إِلَىٰ
तरफ़
ثَمَرِهِۦٓ
उसके फल के
إِذَآ
जब
أَثْمَرَ
वो फल लाए
وَيَنْعِهِۦٓ ۚ
और उसके पकने के
إِنَّ
बेशक
فِى
in
ذَٰلِكُمْ
इसमें
لَـَٔايَـٰتٍۢ
अलबत्ता निशानियाँ हैं
لِّقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يُؤْمِنُونَ
जो ईमान रखते हों
और वही है जिसने आकाश से पानी बरसाया, फिर हमने उसके द्वारा हर प्रकार की वनस्पति उगाई; फिर उससे हमने हरी-भरी पत्तियाँ निकाली और तने विकसित किए, जिससे हम तले-ऊपर चढे हुए दान निकालते है - और खजूर के गाभे से झुके पड़ते गुच्छे भी - और अंगूर, ज़ैतून और अनार के बाग़ लगाए, जो एक-दूसरे से भिन्न भी होते है। उसके फल को देखा, जब वह फलता है और उसके पकने को भी देखो! निस्संदेह ईमान लानेवाले लोगों को लिए इनमें बड़ी निशानियाँ है
तफ़्सीर:
वही महिमावान और सर्वशक्तिमान (अल्लाह) है, जिसने आकाश से बारिश का पानी उतारा, तो हमने उसके द्वारा हर प्रकार के पौधे उगाए। फिर हमने पौधे से फसल तथा हरे-भरे वृक्ष निकाले, जिसमें से हम तह-ब-तह चढ़े हुए दाने निकालते हैं, जैसे कि बालियों में होता है। तथा खजूर के गाभे से निकलने वाले उसके गुच्छे पास ही होते हैं, जिन्हें खड़ा हुआ और बैठा हुआ व्यक्ति तोड़ सकता है। और हमने अंगूर के बाग़ निकाले, तथा ज़ैतून और अनार निकाले, जिनके पत्ते एक जैसे और फल भिन्न-भिन्न होते हैं। (ऐ लोगो!) उसके फल को देखो, जब वह पहली बार प्रकट होता है, और जब वह पकता है। निःसंदेह इसमें अल्लाह पर ईमान रखने वाले लोगों के लिए अल्लाह की शक्ति के स्पष्ट प्रमाण हैं। क्योंकि वही लोग इन प्रमाणों और सबूतों से लाभ उठाते हैं।
आयत 100
وَجَعَلُوا۟ لِلَّهِ شُرَكَآءَ ٱلْجِنَّ وَخَلَقَهُمْ ۖ وَخَرَقُوا۟ لَهُۥ بَنِينَ وَبَنَـٰتٍۭ بِغَيْرِ عِلْمٍۢ ۚ سُبْحَـٰنَهُۥ وَتَعَـٰلَىٰ عَمَّا يَصِفُونَ
وَجَعَلُوا۟
और उन्होंने बना लिया
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
شُرَكَآءَ
शरीक
ٱلْجِنَّ
जिन्नों को
وَخَلَقَهُمْ ۖ
हालाँकि उसने पैदा किया उन्हें
وَخَرَقُوا۟
और उन्होंने गढ़ लिए
لَهُۥ
उसके लिए
بَنِينَ
बेटे
وَبَنَـٰتٍۭ
और बेटियाँ
بِغَيْرِ
बग़ैर
عِلْمٍۢ ۚ
इल्म के
سُبْحَـٰنَهُۥ
पाक है वो
وَتَعَـٰلَىٰ
और बुलन्दतर है
عَمَّا
उससे जो
يَصِفُونَ
वो वस्फ़ बयान करते हैं
और लोगों ने जिन्नों को अल्लाह का साझी ठहरा रखा है; हालाँकि उन्हें उसी ने पैदा किया है। और बेजाने-बूझे उनके लिए बेटे और बेटियाँ घड़ ली है। यह उसकी महिमा के प्रतिकूल है! यह उन बातों से उच्च है, जो वे बयान करते है!
तफ़्सीर:
मुश्रिकों ने जिन्नों को इबादत में अल्लाह का साझीदार बना लिया, जब उन्होंने यह मान लिया कि वे लाभ और हानि पहुँचाते हैं। जबकि अल्लाह ही ने उन्हें बनाया है, उसके अलावा किसी और ने उन्हें नहीं बनाया। इसलिए वही इस बात का अधिक योग्य है कि उसकी इबादत की जाए। तथा उन्होंने (अल्लाह के लिए) बेटे गढ़ लिए, जैसा कि यहूदियों ने उज़ैर के साथ और ईसाइयों ने ईसा के साथ किया। और बेटियाँ गढ़ लीं, जैसा कि मुश्रिकों ने फरिश्तों के साथ किया। अल्लाह तआला उससे बहुत पवित्र और सर्वोच्च है, जो झूठे लोग उसके बारे में वर्णन करते हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन की अज़मत और कायनात के मुनज़्ज़म निज़ाम का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कायनात का हर निज़ाम बा-मकसद और मुनज़्ज़म है, इससे अल्लाह की हिकमत का पता चलता है।
आयत 101
بَدِيعُ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۖ أَنَّىٰ يَكُونُ لَهُۥ وَلَدٌۭ وَلَمْ تَكُن لَّهُۥ صَـٰحِبَةٌۭ ۖ وَخَلَقَ كُلَّ شَىْءٍۢ ۖ وَهُوَ بِكُلِّ شَىْءٍ عَلِيمٌۭ
بَدِيعُ
मूजिद है
ٱلسَّمَـٰوَٰتِ
आसमानों
وَٱلْأَرْضِ ۖ
और ज़मीन का
أَنَّىٰ
क्यों कर
يَكُونُ
हो सकती है
لَهُۥ
उसकी
وَلَدٌۭ
कोई औलाद
وَلَمْ
हालाँकि नहीं
تَكُن
है
لَّهُۥ
उसकी
صَـٰحِبَةٌۭ ۖ
कोई बीवी
وَخَلَقَ
और उसने पैदा किया
كُلَّ
हर
شَىْءٍۢ ۖ
चीज़ को
وَهُوَ
और वो
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍ
चीज़ को
عَلِيمٌۭ
ख़ूब जानने वाला है
वह आकाशों और धरती का सर्वप्रथम पैदा करनेवाला है। उसका कोई बेटा कैसे हो सकता है, जबकि उसकी पत्नी ही नहीं? और उसी ने हर चीज़ को पैदा किया है और उसे हर चीज़ का ज्ञान है
तफ़्सीर:
वही महिमावान और सर्वशक्तिमान आकाशों तथा धरती को बिना किसी पूर्व उदाहरण के बनाने वाला है। उसकी संतान कैसे होगी, जबकि उसकी कोई पत्नी ही नहीं?! तथा उसी ने सब कुछ पैदा किया है और वह हर चीज़ का ज्ञान रखने वाला है, कोई चीज़ उससे छिपी नहीं है।
आयत 102
ذَٰلِكُمُ ٱللَّهُ رَبُّكُمْ ۖ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ خَـٰلِقُ كُلِّ شَىْءٍۢ فَٱعْبُدُوهُ ۚ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ وَكِيلٌۭ
ذَٰلِكُمُ
ये है
ٱللَّهُ
अल्लाह
رَبُّكُمْ ۖ
रब तुम्हारा
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ ۖ
वो ही
خَـٰلِقُ
पैदा करने वाला है
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ का
فَٱعْبُدُوهُ ۚ
पस इबादत करो उसकी
وَهُوَ
और वो
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
وَكِيلٌۭ
कारसाज़ है
वही अल्लाह तुम्हारा रब; उसके सिवा कोई पूज्य नहीं; हर चीज़ का स्रष्टा है; अतः तुम उसी की बन्दगी करो। वही हर चीज़ का ज़िम्मेदार है
तफ़्सीर:
(ऐ लोगो!) यह अल्लाह, जो इन गुणों से विशेषित हैं, वही तुम्हारा रब है। अतः उसके अलावा तुम्हारा कोई रब नहीं, और न ही उसके अलावा कोई सच्चा पूज्य है। तथा वही हर चीज़ का अविष्कारक है। इसलिए केवल उसी की इबादत करो। क्योंकि वही इबादत के योग्य है और वह हर चीज़ का संरक्षक है।
आयत 103
لَّا تُدْرِكُهُ ٱلْأَبْصَـٰرُ وَهُوَ يُدْرِكُ ٱلْأَبْصَـٰرَ ۖ وَهُوَ ٱللَّطِيفُ ٱلْخَبِيرُ
لَّا
Not (can)
تُدْرِكُهُ
नहीं पा सकतीं उसे
ٱلْأَبْصَـٰرُ
निगाहें
وَهُوَ
और वो
يُدْرِكُ
वो पा लेता है
ٱلْأَبْصَـٰرَ ۖ
निगाहों को
وَهُوَ
और वो
ٱللَّطِيفُ
बहुत बारीक बीन है
ٱلْخَبِيرُ
ख़ूब बाख़बर है
निगाहें उसे नहीं पा सकतीं, बल्कि वही निगाहों को पा लेता है। वह अत्यन्त सूक्ष्म (एवं सूक्ष्मदर्शी) ख़बर रखनेवाला है
तफ़्सीर:
उसे निगाहें नहीं पातीं, परंतु वह महिमावान सब निगाहों को पाता है और उन्हें घेरे हुए है। तथा वह अपने नेक बंदों के प्रति दयालु, उनकी ख़बर रखने वाला है।
आयत 104
قَدْ جَآءَكُم بَصَآئِرُ مِن رَّبِّكُمْ ۖ فَمَنْ أَبْصَرَ فَلِنَفْسِهِۦ ۖ وَمَنْ عَمِىَ فَعَلَيْهَا ۚ وَمَآ أَنَا۠ عَلَيْكُم بِحَفِيظٍۢ
قَدْ
तहक़ीक़
جَآءَكُم
आ गईं तुम्हारे पास
بَصَآئِرُ
खुली दलीलें
مِن
from
رَّبِّكُمْ ۖ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
فَمَنْ
तो जिसने
أَبْصَرَ
देख लिया
فَلِنَفْسِهِۦ ۖ
तो उसके अपने लिए है
وَمَنْ
और जो
عَمِىَ
अँधा हुआ
فَعَلَيْهَا ۚ
तो उसी पर है
وَمَآ
और नहीं
أَنَا۠
मैं
عَلَيْكُم
तुम पर
بِحَفِيظٍۢ
कोई निगरान
तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से आँख खोल देनेवाले प्रमाण आ चुके है; तो जिस किसी ने देखा, अपना ही भला किया और जो अंधा बना रहा, तो वह अपने ही को हानि पहुँचाएगा। और मैं तुमपर कोई नियुक्त रखवाला नहीं हूँ
तफ़्सीर:
(ऐ लोगो!) तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से स्पष्ट तर्क और खुले प्रमाण आ चुके हैं। तो जिसने उन्हें समझा और मान लिया, तो उसका लाभ उसी को मिलेगा, और जो उनसे अंधा बन गया, न उन्हें समझा और न उन्हें स्वीकार किया, तो उसका नुकसान उसी तक सीमित है। और मैं तुमपर कोई निगरानी करने वाला नहीं हूँ कि तुम्हारे कार्यों की गणना करूँ। मैं तो केवल अपने रब की ओर से एक रसूल हूँ, और वही तुम्हारा निरीक्षक है।
आयत 105
وَكَذَٰلِكَ نُصَرِّفُ ٱلْـَٔايَـٰتِ وَلِيَقُولُوا۟ دَرَسْتَ وَلِنُبَيِّنَهُۥ لِقَوْمٍۢ يَعْلَمُونَ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
نُصَرِّفُ
हम फेर-फेर कर लाते हैं
ٱلْـَٔايَـٰتِ
आयात को
وَلِيَقُولُوا۟
और ताकि वो कहें
دَرَسْتَ
पढ़ लिया है तूने
وَلِنُبَيِّنَهُۥ
और ताकि हम बयान करें उसे
لِقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَعْلَمُونَ
जो इल्म रखते हैं
और इसी प्रकार हम अपनी आयतें विभिन्न ढंग से बयान करते है (कि वे सुने) और इसलिए कि वे कह लें, "(ऐ मुहम्मद!) तुमनेकहीं से पढ़-पढ़ा लिया है।" और इसलिए भी कि हम उनके लिए जो जानना चाहें, सत्य को स्पष्ट कर दें
तफ़्सीर:
जिस तरह हमने अल्लाह की शक्ति के प्रमाणों और दलीलों को विविध तरीक़े से बयान किया है, उसी तरह हम वादे, धमकी तथा उपदेश से संबंधित आयतों में विविधता लाते हैं। तथा मुश्रिक लोग कहेंगे कि यह कोई वह़्य नहीं हैं, बल्कि तुमने इसे अपने से पहले किताब वाले लोगों से पढ़ा है। और ताकि हम मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उम्मत में से ईमान वालों के लिए इन आयतों में विविधता लाकर लोगों के लिए सत्य को स्पष्ट कर दें। क्योंकि वही लोग हैं जो सत्य को स्वीकार करते हैं और उसका पालन करते हैं।
आयत 106
ٱتَّبِعْ مَآ أُوحِىَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ ۖ لَآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ وَأَعْرِضْ عَنِ ٱلْمُشْرِكِينَ
ٱتَّبِعْ
पैरवी कीजिए
مَآ
उसकी जो
أُوحِىَ
वही किया गया
إِلَيْكَ
तरफ़ आपके
مِن
from
رَّبِّكَ ۖ
आपके रब की तरफ़ से
لَآ
नहीं
إِلَـٰهَ
कोई इलाह (बरहक़)
إِلَّا
मगर
هُوَ ۖ
वो ही
وَأَعْرِضْ
और ऐराज़ कीजिए
عَنِ
from
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकीन से
तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारी तरफ़ जो वह्यो की गई है, उसी का अनुसरण किए जाओ, उसके सिवा कोई पूज्य नहीं और बहुदेववादियों (की कुनीति) पर ध्यान न दो
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप उस सत्य का पालन करें, जो आपका पालनहार आपकी ओर वह़्य करता है। क्योंकि उस महिमावान के अलावा कोई सत्य पूज्य नहीं। तथा आप काफ़िरों और उनके हठ पर ध्यान न दें। क्योंकि उनका मामला अल्लाह के हवाले है।
आयत 107
وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ مَآ أَشْرَكُوا۟ ۗ وَمَا جَعَلْنَـٰكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًۭا ۖ وَمَآ أَنتَ عَلَيْهِم بِوَكِيلٍۢ
وَلَوْ
और अगर
شَآءَ
चाहता
ٱللَّهُ
अल्लाह
مَآ
ना
أَشْرَكُوا۟ ۗ
वो शिर्क करते
وَمَا
और नहीं
جَعَلْنَـٰكَ
बनाया हमने आपको
عَلَيْهِمْ
उन पर
حَفِيظًۭا ۖ
मुहाफ़िज़
وَمَآ
और नहीं
أَنتَ
आप
عَلَيْهِم
उन पर
بِوَكِيلٍۢ
कोई कारसाज़
यदि अल्लाह चाहता तो वे (उसका) साझी न ठहराते। तुम्हें हमने उनपर कोई नियुक्त संरक्षक तो नहीं बनाया है और न तुम उनके कोई ज़िम्मेदार ही हो
तफ़्सीर:
यदि अल्लाह की इच्छा होती कि वे उसके साथ किसी को साझी न बनाएँ, तो वे उसके साथ किसी को भी साझी न बनाते। तथा (ऐ रसूल!) हमने आपको उनपर निरीक्षक नहीं बनाया कि आप उनके कार्यों की गणना करें, तथा आप उनके प्रभारी नहीं हैं। आप तो केवल एक रसूल हैं और आपका दायित्व केवल अल्लाह के संदेश को पहुँचा देना है।
आयत 108
وَلَا تَسُبُّوا۟ ٱلَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ فَيَسُبُّوا۟ ٱللَّهَ عَدْوًۢا بِغَيْرِ عِلْمٍۢ ۗ كَذَٰلِكَ زَيَّنَّا لِكُلِّ أُمَّةٍ عَمَلَهُمْ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّهِم مَّرْجِعُهُمْ فَيُنَبِّئُهُم بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
وَلَا
और ना
تَسُبُّوا۟
तुम गाली दो
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्हें
يَدْعُونَ
वो पुकारते हैं
مِن
from
دُونِ
सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
فَيَسُبُّوا۟
तो वो गाली देंगे
ٱللَّهَ
अल्लाह को
عَدْوًۢا
ज़्यादती करके
بِغَيْرِ
बग़ैर
عِلْمٍۢ ۗ
इल्म के
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
زَيَّنَّا
मुज़य्यन कर दिए हमने
لِكُلِّ
वास्ते हर
أُمَّةٍ
उम्मत के
عَمَلَهُمْ
अमल उनके
ثُمَّ
फिर
إِلَىٰ
to
رَبِّهِم
तरफ़ अपने रब के
مَّرْجِعُهُمْ
लौटना है उनका
فَيُنَبِّئُهُم
फिर वो बता देगा उन्हें
بِمَا
वो जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
अल्लाह के सिवा जिन्हें ये पुकारते है, तुम उनके प्रति अपशब्द का प्रयोग न करो। ऐसा न हो कि वे हद से आगे बढ़कर अज्ञान वश अल्लाह के प्रति अपशब्द का प्रयोग करने लगें। इसी प्रकार हमने हर गिरोह के लिए उसके कर्म को सुहावना बना दिया है। फिर उन्हें अपने रब की ही ओर लौटना है। उस समय वह उन्हें बता देगा. जो कुछ वे करते रहे होंगे
तफ़्सीर:
ऐ मोमिनो! उन मूर्तियों को बुरा न कहो, जिन्हें बहुदेववादी अल्लाह के साथ पूजते हैं। भले ही वे सबसे तुच्छ तथा बुरा कहे जाने के सबसे योग्य हों। ताकि ऐसा न हो कि बहुदेववादी अल्लाह के प्रति सीमा से आगे बढ़ते हुए (मर्यादा का उल्लंघन करते हुए) और उस चीज़ से अज्ञानता के कारण जो उस महिमावान के योग्य है, उसे बुरा कहने लगें। जिस तरह इन लोगों के लिए उनकी पथभ्रष्टता को सुशोभित कर दिया गया है, उसी तरह हमने हर जाति के लिए उसके कर्म को सुशोभित कर दिया, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। चुनाँचे उन्होंने वही किया, जिसे हमने उनके लिए सुंदर बना दिया था। फिर क़ियामत के दिन उन्हें अपने रब ही की ओर लौटकर जाना है। तो वह उन्हें बताएगा जो कुछ वे दुनिया में किया करते थे और उन्हें उसका बदला देगा।
आयत 109
وَأَقْسَمُوا۟ بِٱللَّهِ جَهْدَ أَيْمَـٰنِهِمْ لَئِن جَآءَتْهُمْ ءَايَةٌۭ لَّيُؤْمِنُنَّ بِهَا ۚ قُلْ إِنَّمَا ٱلْـَٔايَـٰتُ عِندَ ٱللَّهِ ۖ وَمَا يُشْعِرُكُمْ أَنَّهَآ إِذَا جَآءَتْ لَا يُؤْمِنُونَ
وَأَقْسَمُوا۟
और उन्होंने क़समें खाईं
بِٱللَّهِ
अल्लाह की
جَهْدَ
पक्की
أَيْمَـٰنِهِمْ
क़समें अपनी
لَئِن
अलबत्ता अगर
جَآءَتْهُمْ
आई उनके पास
ءَايَةٌۭ
कोई निशानी
لَّيُؤْمِنُنَّ
अलबत्ता वो ज़रूर ईमान लाऐंगे
بِهَا ۚ
उस पर
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّمَا
बेशक
ٱلْـَٔايَـٰتُ
निशानियाँ
عِندَ
(are) with
ٱللَّهِ ۖ
पास हैं अल्लाह के
وَمَا
और क्या चीज़
يُشْعِرُكُمْ
आगाह करे तुम्हें
أَنَّهَآ
कि बेशक वो
إِذَا
जब
جَآءَتْ
वो आ जाऐंगी
لَا
not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाऐंगे
वे लोग तो अल्लाह की कड़ी-कड़ी क़समें खाते है कि यदि उनके पास कोई निशानी आ जाए, तो उसपर वे अवश्य ईमान लाएँगे। कह दो, "निशानियाँ तो अल्लाह ही के पास है।" और तुम्हें क्या पता कि जब वे आ जाएँगी तो भी वे ईमान नहीं लाएँगे
तफ़्सीर:
बहुदेववादियों ने अपनी सबसे मज़बूत शपथ लेते हुए अल्लाह की क़सम खाई : निःसंदेह यदि मुहम्मद उनके पास उन निशानियों में से कोई निशानी लेकर आए, जिनका उन्होंने सुझाव दिया है, तो वे अवश्य ही उसपर ईमान ले आएँगे। (ऐ रसूल!) आप उनसे कह दें : निशानियाँ मेरे पास नहीं हैं कि मैं उन्हें उतार दूँ। बल्कि वे अल्लाह के पास हैं, वह जब चाहे उन्हें उतारता है। और (ऐ मोमिनो!) तुम्हें क्या मालूम कि जब ये निशानियाँ उनके प्रस्ताव के अनुसार आ जाएँ, वे उनपर ईमान नहीं लाएँगे? बल्कि वे अपने हठ और इनकार पर बने रहेंगे; क्योंकि वे मार्गदर्शन नहीं चाहते हैं।
आयत 110
وَنُقَلِّبُ أَفْـِٔدَتَهُمْ وَأَبْصَـٰرَهُمْ كَمَا لَمْ يُؤْمِنُوا۟ بِهِۦٓ أَوَّلَ مَرَّةٍۢ وَنَذَرُهُمْ فِى طُغْيَـٰنِهِمْ يَعْمَهُونَ
وَنُقَلِّبُ
और हम फेर देंगे
أَفْـِٔدَتَهُمْ
उनके दिलों को
وَأَبْصَـٰرَهُمْ
और उनकी निगाहों को
كَمَا
जैसा कि
لَمْ
नहीं
يُؤْمِنُوا۟
वो ईमान लाए
بِهِۦٓ
उस पर
أَوَّلَ
पहली
مَرَّةٍۢ
बार
وَنَذَرُهُمْ
और हम छोड़ देंगे उन्हें
فِى
in
طُغْيَـٰنِهِمْ
उनकी सरकशी में
يَعْمَهُونَ
वो भटकते फिरेंगे
और हम उनके दिलों और निगाहों को फेर देंगे, जिस प्रकार वे पहली बार ईमान नहीं लाए थे। और हम उन्हें छोड़ देंगे कि वे अपनी सरकशी में भटकते रहें
तफ़्सीर:
हम उनके दिलों और उनकी आँखों को, उनके तथा सच्चाई के मार्ग पर चलने के बीच रुकावट डालकर फेर देंगे, जैसे हम उनके हठ के कारण पहली बार उनके और क़ुरआन पर ईमान लाने के बीच रुकावट बन गए थे। तथा हम उन्हें उनकी गुमराही और अपने रब के विरुद्ध सरकशी (विद्रोह) में भ्रमित भटकता छोड़ देंगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दिलों के फिरने और ज़िद्दी रवैये का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि हक बात बार-बार समझाने पर भी जो दिल से इनकार पर अड़ा रहे, उसे ज़बरदस्ती नहीं मनवाया जा सकता, हमें अपनी तरफ से हक पहुंचाने की कोशिश जारी रखनी चाहिए।
आयत 111
۞ وَلَوْ أَنَّنَا نَزَّلْنَآ إِلَيْهِمُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ وَكَلَّمَهُمُ ٱلْمَوْتَىٰ وَحَشَرْنَا عَلَيْهِمْ كُلَّ شَىْءٍۢ قُبُلًۭا مَّا كَانُوا۟ لِيُؤْمِنُوٓا۟ إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ يَجْهَلُونَ
۞ وَلَوْ
और अगर
أَنَّنَا
बेशक हम
نَزَّلْنَآ
उतारते हम
إِلَيْهِمُ
तरफ़ उनके
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ
फ़रिश्ते
وَكَلَّمَهُمُ
और कलाम करते उनसे
ٱلْمَوْتَىٰ
मुर्दे
وَحَشَرْنَا
और इकट्ठा कर लाते हम
عَلَيْهِمْ
उन पर
كُلَّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ को
قُبُلًۭا
सामने
مَّا
ना
كَانُوا۟
थे वो
لِيُؤْمِنُوٓا۟
कि वो ईमान ले आते
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
يَشَآءَ
चाहता
ٱللَّهُ
अल्लाह
وَلَـٰكِنَّ
और लेकिन
أَكْثَرَهُمْ
अक्सर उनके
يَجْهَلُونَ
वो जहालत बरतते हैं
यदि हम उनकी ओर फ़रिश्ते भी उतार देते और मुर्दें भी उनसे बातें करने लगते और प्रत्येक चीज़ उनके सामने लाकर इकट्ठा कर देते, तो भी वे ईमान न लाते, बल्कि अल्लाह ही का चाहा क्रियान्वित है। परन्तु उनमें से अधिकतर लोग अज्ञानता से काम लेते है
तफ़्सीर:
यदि हम उन्हें जवाब देते हुए उनकी प्रस्तावित चीज़ को ले आते, चुनाँचे हम उनके पास फ़रिश्ते उतार देते और वे उन्हें अपनी आँखों से देख लेते, तथा मरे हुए लोग उनसे बातें करते और आप जो कुछ लेकर आए हैं उसमें उन्हें आपकी सच्चाई की ख़बर देते, एवं हम उनके लिए वह सब कुछ इकट्ठा कर देते, जो उन्होंने सुझाव दिया था, जिन्हें वे आमने-सामने देख लेते; तो भी वे उस चीज़ पर ईमान न लाते जो आप लेकर आए हैं, परंतु यह कि अल्लाह उनमें से जिसे मार्गदर्शन दिखाना चाहे। लेकिन उनमें से अधिकतर लोग इस बात से अनजान हैं। इसलिए वे अल्लाह का सहारा नहीं लेते ताकि वह उन्हें मार्गदर्शन का सामर्थ्य प्रदान करे।
आयत 112
وَكَذَٰلِكَ جَعَلْنَا لِكُلِّ نَبِىٍّ عَدُوًّۭا شَيَـٰطِينَ ٱلْإِنسِ وَٱلْجِنِّ يُوحِى بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍۢ زُخْرُفَ ٱلْقَوْلِ غُرُورًۭا ۚ وَلَوْ شَآءَ رَبُّكَ مَا فَعَلُوهُ ۖ فَذَرْهُمْ وَمَا يَفْتَرُونَ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
جَعَلْنَا
बनाए हमने
لِكُلِّ
for every
نَبِىٍّ
हर नबी के लिए
عَدُوًّۭا
दुश्मन
شَيَـٰطِينَ
शयातीन
ٱلْإِنسِ
इन्सानों
وَٱلْجِنِّ
और जिन्नों (में से)
يُوحِى
डालता है
بَعْضُهُمْ
बाज़ उनका
إِلَىٰ
to
بَعْضٍۢ
तरफ़ बाज़ के
زُخْرُفَ
मुलम्मा की हुई
ٱلْقَوْلِ
बात
غُرُورًۭا ۚ
धोखा देने के लिए
وَلَوْ
और अगर
شَآءَ
चाहता
رَبُّكَ
रब आपका
مَا
ना
فَعَلُوهُ ۖ
वो करते उसे
فَذَرْهُمْ
पस छोड़ दीजिए उन्हें
وَمَا
और जो
يَفْتَرُونَ
वो झूठ गढ़ते हैं
और इसी प्रकार हमने मनुष्यों और जिन्नों में से शैतानों को प्रत्येक नबी का शत्रु बनाया, जो चिकनी-चुपड़ी बात एक-दूसरे के मन में डालकर धोखा देते थे - यदि तुम्हारा रब चाहता तो वे ऐसा न कर सकते। अब छोड़ो उन्हें और उनके मिथ्यारोपण को। -
तफ़्सीर:
जिस प्रकार हमने इन बहुदेववादियों की शत्रुता के साथ आपकी परीक्षा ली, उसी प्रकार हमने आपसे पहले के हर नबी की परीक्षा ली। चुनाँचे हमने उनमें से प्रत्येक नबी के लिए सरकश मनुष्यों में से कुछ दुश्मन एवं सरकश जिन्नों में से कुछ दुश्मन बना दिए, जो एक-दूसरे के दिल में बुरी बातें डालते हैं, चुनाँचे वे उन्हें धोखा देने के लिए उनके लिए झूठ को सुशोभित करके प्रस्तुत करते हैं। और यदि अल्लाह चाहता कि वे ऐसा न करें, तो वे ऐसा नहीं करते। लेकिन अल्लाह ने परीक्षण के तौर पर उनके लिए ऐसा चाहा था। अतः आप उन्हें और जो कुछ वे कुफ़्र और झूठ गढ़ते हैं, उसे छोड़ दें और उनकी परवाह न करें।
आयत 113
وَلِتَصْغَىٰٓ إِلَيْهِ أَفْـِٔدَةُ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ وَلِيَرْضَوْهُ وَلِيَقْتَرِفُوا۟ مَا هُم مُّقْتَرِفُونَ
وَلِتَصْغَىٰٓ
और ताकि माइल हों
إِلَيْهِ
तरफ़ उसके
أَفْـِٔدَةُ
दिल
ٱلَّذِينَ
उनके जो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाते
بِٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत पर
وَلِيَرْضَوْهُ
और ताकि वो राज़ी हों उससे
وَلِيَقْتَرِفُوا۟
और ताकि वो कमाई करें
مَا
जो
هُم
वो
مُّقْتَرِفُونَ
कमाई करने वाले हैं
और ताकि जो लोग परलोक को नहीं मानते, उनके दिल उसकी ओर झुकें और ताकि वे उसे पसन्द कर लें, और ताकि जो कमाई उन्हें करनी है कर लें
तफ़्सीर:
और ताकि उन लोगों के दिल जो आख़िरत पर ईमान नहीं रखते उस (बुरी) बात की ओर झुक जाएँ, जो वे एक-दूसरे के दिलों में डालते हैं, और ताकि वे लोग उसे अपने लिए स्वीकार कर लें और उसे अपने लिए पसंद कर लें, और ताकि वे भी वही अवज्ञा और पाप करने लग जाएँ, जो ये लोग करने वाले हैं।
आयत 114
أَفَغَيْرَ ٱللَّهِ أَبْتَغِى حَكَمًۭا وَهُوَ ٱلَّذِىٓ أَنزَلَ إِلَيْكُمُ ٱلْكِتَـٰبَ مُفَصَّلًۭا ۚ وَٱلَّذِينَ ءَاتَيْنَـٰهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ يَعْلَمُونَ أَنَّهُۥ مُنَزَّلٌۭ مِّن رَّبِّكَ بِٱلْحَقِّ ۖ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ ٱلْمُمْتَرِينَ
أَفَغَيْرَ
क्या फिर सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
أَبْتَغِى
मैं तलाश करूँ
حَكَمًۭا
कोई फ़ैसला करने वाला
وَهُوَ
हालाँकि वो ही है
ٱلَّذِىٓ
जिसने
أَنزَلَ
नाज़िल की
إِلَيْكُمُ
तरफ़ तुम्हारे
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
مُفَصَّلًۭا ۚ
मुफ़स्सिल
وَٱلَّذِينَ
और वो लोग जो
ءَاتَيْنَـٰهُمُ
दी हमने उन्हें
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
يَعْلَمُونَ
वो जानते हैं
أَنَّهُۥ
कि बेशक वो
مُنَزَّلٌۭ
नाज़िल करदा है
مِّن
from
رَّبِّكَ
आपके रब की तरफ़ से
بِٱلْحَقِّ ۖ
साथ हक़ के
فَلَا
so (do) not
تَكُونَنَّ
पस हरगिज़ ना आप हों
مِنَ
among
ٱلْمُمْتَرِينَ
शक करने वालों में से
अब क्या मैं अल्लाह के सिवा कोई और निर्णायक ढूढूँ? हालाँकि वही है जिसने तुम्हारी ओर किताब अवतरित की है, जिसमें बातें खोल-खोलकर बता दी गई है और जिन लोगों को हमने किताब प्रदान की थी, वे भी जानते है कि यह तुम्हारे रब की ओर से हक़ के साथ अवतरित हुई है, तो तुम कदापि सन्देह में न पड़ना
तफ़्सीर:
ऐ रसूल! आप इन बहुदेववादियों से, जो अल्लाह के साथ उसके अलावा को पूजते हैं, कह दें : क्या यह तर्कसंगत है कि मैं अपने और तुम्हारे बीच अल्लाह के अलावा किसी अन्य को न्यायकर्ता स्वीकार करूं? जबकि अल्लाह ही है, जिसने तुम्हारे ऊपर क़ुरआन को अवतरित किया है जो हर चीज़ को पूर्ण रूप से स्पष्ट करने वाला है। तथा यहूदी लोग जिन्हें हमने तौरात दी और ईसाई लोग जिन्हें हमने इंजील प्रदान की, इस तथ्य को जानते हैं कि क़ुरआन आपपर सत्य के साथ उतारा गया है। क्योंकि उन्होंने अपनी पुस्तकों में इसके प्रमाण पाए हैं। अतः आप उसपर शक करने वालों में से न बनें, जो हमने आपकी ओर वह़्य की है।
आयत 115
وَتَمَّتْ كَلِمَتُ رَبِّكَ صِدْقًۭا وَعَدْلًۭا ۚ لَّا مُبَدِّلَ لِكَلِمَـٰتِهِۦ ۚ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْعَلِيمُ
وَتَمَّتْ
और पूरी हो गई
كَلِمَتُ
बात
رَبِّكَ
आपके रब की
صِدْقًۭا
सच
وَعَدْلًۭا ۚ
और इन्साफ़ की
لَّا
No
مُبَدِّلَ
नहीं कोई बदलने वाला
لِكَلِمَـٰتِهِۦ ۚ
उसके कलिमात को
وَهُوَ
और वो
ٱلسَّمِيعُ
ख़ूब सुनने वाला है
ٱلْعَلِيمُ
ख़ूब जानने वाला है
तुम्हारे रब की बात सच्चाई और इनसाफ़ के साथ पूरी हुई, कोई नहीं जो उसकी बातों को बदल सकें, और वह सुनता, जानता है
तफ़्सीर:
क़ुरआन बातों और ख़बरों में सत्य की पराकाष्ठा को पहुँचा हुआ है। उसकी बातों को कोई बदलने वाला नहीं। वह अपने बंदों की बातों को सुनने वाला, उन्हें जानने वाला है। इसलिए उनमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है, और वह उन लोगों को बदला देगा जो उसकी बातों को बदलने की चेष्टा करते हैं।
आयत 116
وَإِن تُطِعْ أَكْثَرَ مَن فِى ٱلْأَرْضِ يُضِلُّوكَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ ۚ إِن يَتَّبِعُونَ إِلَّا ٱلظَّنَّ وَإِنْ هُمْ إِلَّا يَخْرُصُونَ
وَإِن
और अगर
تُطِعْ
आप इताअत करें
أَكْثَرَ
अक्सरियत की
مَن
जो
فِى
(those) in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में है
يُضِلُّوكَ
वो भटका देंगे आपको
عَن
from
سَبِيلِ
(the) way
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह के रास्ते से
إِن
नहीं
يَتَّبِعُونَ
वो पैरवी करते
إِلَّا
मगर
ٱلظَّنَّ
गुमान की
وَإِنْ
और नहीं
هُمْ
वो
إِلَّا
मगर
يَخْرُصُونَ
वो क़यास आराइयाँ करते हैं
और धरती में अधिकतर लोग ऐसे है, यदि तुम उनके कहने पर चले तो वे अल्लाह के मार्ग से तुम्हें भटका देंगे। वे तो केवल अटकल के पीछे चलते है और वे निरे अटकल ही दौड़ाते है
तफ़्सीर:
यदि मान लिया जाए कि (ऐ रसूल!) आपने पृथ्वी पर रहने वाले अधिकांश लोगों का पालन किया, तो वे आपको अल्लाह के धर्म से गुमराह कर देंगे। क्योंकि यह अल्लाह की सुन्नत (परंपरा) रही है कि सत्य कम लोगों के पास होता है। जबकि अधिकांश लोग केवल अनुमान का पालन करते हैं जिसका कोई आधार नहीं होता। क्योंकि उन्हें यह गुमान था कि उनके पूज्य उन्हें अल्लाह के निकट कर देते हैं। हालाँकि वे इसके बारे में झूठ बोलते हैं।
आयत 117
إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ مَن يَضِلُّ عَن سَبِيلِهِۦ ۖ وَهُوَ أَعْلَمُ بِٱلْمُهْتَدِينَ
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
هُوَ
वो
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
مَن
who
يَضِلُّ
कौन भटका हुआ है
عَن
from
سَبِيلِهِۦ ۖ
उसके रास्ते से
وَهُوَ
और वो
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِٱلْمُهْتَدِينَ
हिदायत पाने वालों को
निस्संदेह तुम्हारा रब उसे भली-भाँति जानता है, जो उसके मार्ग से भटकता और वह उन्हें भी जानता है, जो सीधे मार्ग पर है
तफ़्सीर:
निःसंदेह (ऐ रसूल!) आपका पालनहार उसे सबसे अधिक जानता है जो उसके मार्ग से भटक जाता है, तथा वह उन लोगों को भी सबसे अधिक जानने वाला है जो उसके मार्ग पर निर्देशित हैं, उनमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है।
आयत 118
فَكُلُوا۟ مِمَّا ذُكِرَ ٱسْمُ ٱللَّهِ عَلَيْهِ إِن كُنتُم بِـَٔايَـٰتِهِۦ مُؤْمِنِينَ
فَكُلُوا۟
पस खाओ
مِمَّا
उसमें से जो
ذُكِرَ
ज़िक्र किया गया
ٱسْمُ
नाम
ٱللَّهِ
अल्लाह का
عَلَيْهِ
उस पर
إِن
अगर
كُنتُم
हो तुम
بِـَٔايَـٰتِهِۦ
उसकी आयात पर
مُؤْمِنِينَ
ईमान लाने वाले
अतः जिसपर अल्लाह का नाम लिया गया हो, उसे खाओ; यदि तुम उसकी आयतों को मानते हो
तफ़्सीर:
तो (ऐ लोगो!) उस पशु में से खाओ, जिसपर ज़बह़ करते समय अल्लाह का नाम लिया गया है, यदि तुम वास्तव में उसके स्पष्ट प्रमाणों पर ईमान रखने वाले हो।
आयत 119
وَمَا لَكُمْ أَلَّا تَأْكُلُوا۟ مِمَّا ذُكِرَ ٱسْمُ ٱللَّهِ عَلَيْهِ وَقَدْ فَصَّلَ لَكُم مَّا حَرَّمَ عَلَيْكُمْ إِلَّا مَا ٱضْطُرِرْتُمْ إِلَيْهِ ۗ وَإِنَّ كَثِيرًۭا لَّيُضِلُّونَ بِأَهْوَآئِهِم بِغَيْرِ عِلْمٍ ۗ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِٱلْمُعْتَدِينَ
وَمَا
और क्या है
لَكُمْ
तुम्हें
أَلَّا
कि नहीं
تَأْكُلُوا۟
तुम खाते
مِمَّا
उसमें से जो
ذُكِرَ
ज़िक्र किया गया
ٱسْمُ
नाम
ٱللَّهِ
अल्लाह का
عَلَيْهِ
उस पर
وَقَدْ
हालाँकि तहक़ीक़
فَصَّلَ
उसने खोलकर बयान किया
لَكُم
तुम्हारे लिए
مَّا
जो
حَرَّمَ
उसने हराम किया
عَلَيْكُمْ
तुम पर
إِلَّا
मगर
مَا
वो जो
ٱضْطُرِرْتُمْ
मजबूर कर दिए जाओ तुम
إِلَيْهِ ۗ
तरफ़ उसके
وَإِنَّ
और बेशक
كَثِيرًۭا
अक्सर लोग
لَّيُضِلُّونَ
अलबत्ता वो गुमराह करते हैं
بِأَهْوَآئِهِم
अपनी ख़्वाहिशात के ज़रिए
بِغَيْرِ
बग़ैर
عِلْمٍ ۗ
इल्म के
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
هُوَ
वो
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानने वाला है
بِٱلْمُعْتَدِينَ
हद से तजावुज़ करने वालों को
और क्या आपत्ति है कि तुम उसे न खाओ, जिसपर अल्लाह का नाम लिया गया हो, बल्कि जो कुछ चीज़े उसने तुम्हारे लिए हराम कर दी है, उनको उसने विस्तारपूर्वक तुम्हे बता दिया है। यह और बात है कि उसके लिए कभी तुम्हें विवश होना पड़े। परन्तु अधिकतर लोग तो ज्ञान के बिना केवल अपनी इच्छाओं (ग़लत विचारों) के द्वारा पथभ्रष्टो करते रहते है। निस्सन्देह तुम्हारा रब मर्यादाहीन लोगों को भली-भाँति जानता है
तफ़्सीर:
(ऐ ईमान वालो!) अल्लाह के नाम पर ज़बह किए हुए जानवर को खाने से तुम्हें कौन-सी चीज़ रोकती है, जबकि अल्लाह ने तुम्हारे लिए वे चीज़ें स्पष्ट रूप से बयान कर दी हैं, जो उसने तुमपर हराम की हैं। अतः तुम्हारे लिए उन्हें छोड़ देना अनिवार्य है, यह और बात है कि ज़रूरत तुम्हें उन्हें खाने पर मजबूर कर दे। क्योंकि ज़रूरत निषिद्ध चीज़ को अनुमेय कर देती है। निःसंदेह बहुत-से बहुदेववादी अज्ञानतावश अपने भ्रष्ट विचारों के कारण अपने अनुयायियों को सत्य से दूर रखते हैं। क्योंकि वे उस चीज़ को वैध ठहराते हैं, जो अल्लाह ने उनपर हराम की है, जैसे मृत जानवर आदि, और उस चीज़ को हराम ठहराते हैं, जो अल्लाह ने उनके लिए हलाल की है, जैसे बह़ीरा, वसीला और ह़ामी इत्यादि। निःसंदेह आपका रब (ऐ रसूल!) उन लोगों को अधिक जानता है, जो अल्लाह की सीमाओं का उल्लंघन करने वाले हैं और वह उन्हें अपनी सीमाओं का उल्लंघन करने का बदला देगा।
आयत 120
وَذَرُوا۟ ظَـٰهِرَ ٱلْإِثْمِ وَبَاطِنَهُۥٓ ۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ يَكْسِبُونَ ٱلْإِثْمَ سَيُجْزَوْنَ بِمَا كَانُوا۟ يَقْتَرِفُونَ
وَذَرُوا۟
और छोड़ दो
ظَـٰهِرَ
ज़ाहिरी
ٱلْإِثْمِ
गुनाह को
وَبَاطِنَهُۥٓ ۚ
और उसके छुपे को
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो लोग जो
يَكْسِبُونَ
कमाते है
ٱلْإِثْمَ
गुनाह
سَيُجْزَوْنَ
अनक़रीब वो बदला दिए जाऐंगे
بِمَا
उसका जो
كَانُوا۟
थे वो
يَقْتَرِفُونَ
वो कमाई करते
छोड़ो खुले गुनाह को भी और छिपे को भी। निश्चय ही गुनाह कमानेवालों को उसका बदला दिया जाएगा, जिस कमाई में वे लगे रहे होंगे
तफ़्सीर:
(ऐ लोगो!) प्रत्यक्ष रूप से और गुप्त रूप से पाप करना छोड़ दो। निःसंदेह जो लोग गुप्त रूप से या खुले रूप से पाप करते हैं, शीघ्र ही अल्लाह उन्हें उनके किए हुए पाप का बदला देगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
हलाल-हराम खाने-पीने में गुलू (हद से तजावुज़) से बचने की ताकीद है। यह हमें सिखाता है कि खाने-पीने के मामलों में बेबुनियाद पाबंदियां लगाना या हद से आगे बढ़ना दोनों गलत है, अल्लाह के बताए हलाल-हराम पर ही अमल करना चाहिए।
आयत 121
وَلَا تَأْكُلُوا۟ مِمَّا لَمْ يُذْكَرِ ٱسْمُ ٱللَّهِ عَلَيْهِ وَإِنَّهُۥ لَفِسْقٌۭ ۗ وَإِنَّ ٱلشَّيَـٰطِينَ لَيُوحُونَ إِلَىٰٓ أَوْلِيَآئِهِمْ لِيُجَـٰدِلُوكُمْ ۖ وَإِنْ أَطَعْتُمُوهُمْ إِنَّكُمْ لَمُشْرِكُونَ
وَلَا
और ना
تَأْكُلُوا۟
तुम खाओ
مِمَّا
उसमें से जो
لَمْ
नहीं
يُذْكَرِ
ज़िक्र किया गया
ٱسْمُ
नाम
ٱللَّهِ
अल्लाह का
عَلَيْهِ
उस पर
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
لَفِسْقٌۭ ۗ
अलबत्ता गुनाह है
وَإِنَّ
और बेशक
ٱلشَّيَـٰطِينَ
शयातीन
لَيُوحُونَ
अलबत्ता वो इल्क़ा करते हैं
إِلَىٰٓ
to
أَوْلِيَآئِهِمْ
तरफ़ अपने दोस्तों के
لِيُجَـٰدِلُوكُمْ ۖ
ताकि वो झगड़ें तुमसे
وَإِنْ
और अगर
أَطَعْتُمُوهُمْ
इताअत की तुमने उनकी
إِنَّكُمْ
बेशक तुम
لَمُشْرِكُونَ
अलबत्ता मुशरिक होगे
और उसे न खाओं जिसपर अल्लाह का नाम न लिया गया हो। निश्चय ही वह तो आज्ञा का उल्लंघन है। शैतान तो अपने मित्रों के दिलों में डालते है कि वे तुमसे झगड़े। यदि तुमने उनकी बात मान ली तो निश्चय ही तुम बहुदेववादी होगे
तफ़्सीर:
(ऐ मुसलमानो!) उस जानवर का मांस न खाओ, जिसपर अल्लाह का नाम नहीं लिया गया है, चाहे उसपर अल्लाह के सिवा किसी और का नाम लिया गया है या नहीं। क्योंकि उसमें से खाना निश्चित रूप से अल्लाह की आज्ञाकारिता से निकलकर उसकी अवज्ञा में प्रस्थान है। निःसंदेह शैतान अपने दोस्तों के मन में संशय डालते रहते हैं, ताकि वे तुमसे मृत मांस खाने के बारे में बहस करें। और यदि (ऐ मुसलमानो!) तुमने - मृत मांस को अनुमेय करने हेतु - उनके डाले जाने वाले संदेहों को स्वीकार कर लिया, तो तुम और वे बहुदेववाद में समान हैं।
आयत 122
أَوَمَن كَانَ مَيْتًۭا فَأَحْيَيْنَـٰهُ وَجَعَلْنَا لَهُۥ نُورًۭا يَمْشِى بِهِۦ فِى ٱلنَّاسِ كَمَن مَّثَلُهُۥ فِى ٱلظُّلُمَـٰتِ لَيْسَ بِخَارِجٍۢ مِّنْهَا ۚ كَذَٰلِكَ زُيِّنَ لِلْكَـٰفِرِينَ مَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
أَوَمَن
क्या भला जो
كَانَ
था
مَيْتًۭا
मुर्दा
فَأَحْيَيْنَـٰهُ
तो ज़िन्दा किया हमने उसे
وَجَعَلْنَا
और बनाया हमने
لَهُۥ
उसके लिए
نُورًۭا
एक नूर
يَمْشِى
वो चलता है
بِهِۦ
साथ उसके
فِى
among
ٱلنَّاسِ
लोगों में
كَمَن
like (one) who
مَّثَلُهُۥ
उसकी तरह हो सकता है जो
فِى
(is) in
ٱلظُّلُمَـٰتِ
अँधेरों में है
لَيْسَ
नहीं है
بِخَارِجٍۢ
निकलने वाला
مِّنْهَا ۚ
उन से
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
زُيِّنَ
मुज़य्यन कर दिया गया है
لِلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों के लिए
مَا
जो
كَانُوا۟
हैं वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
क्या वह व्यक्ति जो पहले मुर्दा था, फिर उसे हमने जीवित किया और उसके लिए एक प्रकाश उपलब्ध किया जिसको लिए हुए वह लोगों के बीच चलता-फिरता है, उस व्यक्ति को तरह हो सकता है जो अँधेरों में पड़ा हुआ हो, उससे कदापि निकलनेवाला न हो? ऐसे ही इनकार करनेवालों के कर्म उनके लिए सुहाबने बनाए गए है
तफ़्सीर:
क्या वह व्यक्ति, जो अल्लाह के उसे हिदायत देने से पहले मुर्दा था (क्योंकि वह कुफ़्र, अज्ञानता और पापों में लिप्त था), फिर हमने उसको ईमान, ज्ञान और आज्ञाकारिता का मार्गदर्शन प्रदान करके जीवित किया : उस आदमी के बराबर है, जो कुफ़्र, अज्ञानता और पापों के अंधेरों में पड़ा है जिनसे वह बाहर नहीं निकल सकता, उसके लिए सारे रास्ते भ्रमित और अंधेरे हो गए हैं?! जिस प्रकार इन मुश्रिकों के लिए उनका शिर्क पर क़ायम रहना तथा मृत जानवर का मांस खाना और झूठ के साथ बहस करना सुंदर बना दिया गया है, उसी प्रकार काफिरों के लिए उन पापों को सुंदर बना दिया गया है, जो वे किया करते थे, ताकि क़ियामत के दिन उन्हें उनके बदले में दर्दनाक यातना दी जाए।
आयत 123
وَكَذَٰلِكَ جَعَلْنَا فِى كُلِّ قَرْيَةٍ أَكَـٰبِرَ مُجْرِمِيهَا لِيَمْكُرُوا۟ فِيهَا ۖ وَمَا يَمْكُرُونَ إِلَّا بِأَنفُسِهِمْ وَمَا يَشْعُرُونَ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
جَعَلْنَا
बना दिया हमने
فِى
in
كُلِّ
every
قَرْيَةٍ
हर बस्ती में
أَكَـٰبِرَ
बड़ों को
مُجْرِمِيهَا
मुजरिम उसके
لِيَمْكُرُوا۟
ताकि वो मकर करें
فِيهَا ۖ
उसमें
وَمَا
और नहीं
يَمْكُرُونَ
वो मकर करते
إِلَّا
मगर
بِأَنفُسِهِمْ
अपने नफ़्सों से
وَمَا
और नहीं
يَشْعُرُونَ
वो शऊर रखते
और इसी प्रकार हमने प्रत्येक बस्ती में उसके बड़े-बड़े अपराधियों को लगा दिया है कि ले वहाँ चालें चले। वे अपने ही विरुद्ध चालें चलते है, किन्तु उन्हें इसका एहसास नहीं
तफ़्सीर:
जिस प्रकार मक्का में हुआ कि बहुदेववादियों के प्रमुखों ने अल्लाह के रास्ते से रोकने का काम किया, उसी तरह हमने हर बस्ती में सरदार और महापुरुष बनाए, जो शैतान के मार्ग की ओर बुलाने तथा रसूलों और उनके अनुयायियों से लड़ने की खातिर अपनी चालें चलते हैं। हालाँकि तथ्य यह है कि उनकी चालें खुद उन्हीं पर लौट आती हैं, लेकिन वे अपनी अज्ञानता और इच्छाओं का अनुसरण करने के कारण इसे महसूस नहीं करते हैं।
आयत 124
وَإِذَا جَآءَتْهُمْ ءَايَةٌۭ قَالُوا۟ لَن نُّؤْمِنَ حَتَّىٰ نُؤْتَىٰ مِثْلَ مَآ أُوتِىَ رُسُلُ ٱللَّهِ ۘ ٱللَّهُ أَعْلَمُ حَيْثُ يَجْعَلُ رِسَالَتَهُۥ ۗ سَيُصِيبُ ٱلَّذِينَ أَجْرَمُوا۟ صَغَارٌ عِندَ ٱللَّهِ وَعَذَابٌۭ شَدِيدٌۢ بِمَا كَانُوا۟ يَمْكُرُونَ
وَإِذَا
और जब
جَآءَتْهُمْ
आती है उनके पास
ءَايَةٌۭ
कोई निशानी
قَالُوا۟
वो कहते हैं
لَن
हरगिज़ नहीं
نُّؤْمِنَ
हम ईमान लाऐंगे
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
نُؤْتَىٰ
हम दिए जाऐं
مِثْلَ
मानिन्द उसके
مَآ
जो
أُوتِىَ
दिया गया
رُسُلُ
(to the) Messengers
ٱللَّهِ ۘ
अल्लाह के रसूलों को
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
حَيْثُ
जहाँ
يَجْعَلُ
वो रखता है
رِسَالَتَهُۥ ۗ
अपनी रिसालत को
سَيُصِيبُ
अनक़रीब पहुँचेगी
ٱلَّذِينَ
उनको जिन्होंने
أَجْرَمُوا۟
जुर्म किए
صَغَارٌ
ज़िल्लत
عِندَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह के यहाँ
وَعَذَابٌۭ
और अज़ाब
شَدِيدٌۢ
शदीद
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَمْكُرُونَ
मकर करते
और जब उनके पास कोई आयत (निशानी) आता है, तो वे कहते है, "हम कदापि नहीं मानेंगे, जब तक कि वैसी ही चीज़ हमें न दी जाए जो अल्लाह के रसूलों को दी गई हैं।" अल्लाह भली-भाँति उस (के औचित्य) को जानता है, जिसमें वह अपनी पैग़म्बरी रखता है। अपराधियों को शीघ्र ही अल्लाह के यहाँ बड़े अपमान और कठोर यातना का सामना करना पड़ेगा, उस चाल के कारण जो वे चलते रहे है
तफ़्सीर:
जब काफ़िरों के प्रमुखों के पास अल्लाह द्वारा उसके नबी पर उतारी हुई निशानियों में से कोई निशानी आती है, तो वे कहते हैं : हम कदापि ईमान नहीं लाएँगे, यहाँ तक कि अल्लाह हमें भी उसी जैसा प्रदान कर दे, जो उसने निबयों को नुबुव्वत तथा रिसालत प्रदान की है। तो अल्लाह ने उन्हें उत्तर दिया कि वह उसे अधिक जानने वाला है जो रिसालत (पैग़ंबरी) के लिए योग्य है और उसके बोझ को उठा सकता है। इसलिए वह उसे नुबुव्वत तथा रिसालत के लिए विशिष्ट कर लेता है। शीघ्र ही इन सरकशों को उनके सत्य से अभिमान के कारण अपमान और तिरस्कार, तथा उनकी चालबाज़ी (छल) के कारण कड़ी यातना का सामना करना पड़ेगा।
आयत 125
فَمَن يُرِدِ ٱللَّهُ أَن يَهْدِيَهُۥ يَشْرَحْ صَدْرَهُۥ لِلْإِسْلَـٰمِ ۖ وَمَن يُرِدْ أَن يُضِلَّهُۥ يَجْعَلْ صَدْرَهُۥ ضَيِّقًا حَرَجًۭا كَأَنَّمَا يَصَّعَّدُ فِى ٱلسَّمَآءِ ۚ كَذَٰلِكَ يَجْعَلُ ٱللَّهُ ٱلرِّجْسَ عَلَى ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ
فَمَن
पस जिसे
يُرِدِ
चाहता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَن
कि
يَهْدِيَهُۥ
वो हिदायत दे उसे
يَشْرَحْ
खोल देता है
صَدْرَهُۥ
सीना उसका
لِلْإِسْلَـٰمِ ۖ
इस्लाम के लिए
وَمَن
और जिसे
يُرِدْ
वो चाहता है
أَن
कि
يُضِلَّهُۥ
वो गुमराह कर दे उसे
يَجْعَلْ
वो कर देता है
صَدْرَهُۥ
सीना उसका
ضَيِّقًا
तंग
حَرَجًۭا
घुटा हुआ
كَأَنَّمَا
गोया कि
يَصَّعَّدُ
वो चढ़ता है
فِى
into
ٱلسَّمَآءِ ۚ
आसमान में
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
يَجْعَلُ
डालता है
ٱللَّهُ
अल्लाह
ٱلرِّجْسَ
नजासत को
عَلَى
on
ٱلَّذِينَ
ऊपर उनके जो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाते
अतः (वास्तविकता यह है कि) जिसे अल्लाह सीधे मार्ग पर लाना चाहता है, उसका सीना इस्लाम के लिए खोल देता है। और जिसे गुमराही में पड़ा रहने देता चाहता है, उसके सीने को तंग और भिंचा हुआ कर देता है; मानो वह आकाश में चढ़ रहा है। इस तरह अल्लाह उन लोगों पर गन्दगी डाल देता है, जो ईमान नहीं लाते
तफ़्सीर:
जिस व्यक्ति को अल्लाह हिदायत के मार्ग पर ले जाना चाहता है, उसके सीने को खोल देता है तथा उसे इस्लाम स्वीकार करने के लिए तैयार कर देता है। और जिसे वह विफल करना चाहता है और उसे हिदायत की तौफ़ीक़ नहीं देना चाहता, उसके सीने को सच्चाई को स्वीकार करने से बहुत संकीर्ण कर देता है, ताकि उसके हृदय में सत्य का प्रवेश असंभव हो जाए। जिस तरह कि उसका आसमान की ओर चढ़ना असंभव है और वह स्वयं ऐसा करने में असमर्थ है। तथा जैसे अल्लाह ने पथभ्रष्ट व्यक्ति की स्थिति को इस तरह की गंभीर संकट की स्थिति बना दी है, उसी तरह वह उन लोगों को यातना से ग्रस्त करता है, जो उसपर ईमान नहीं लाते।
आयत 126
وَهَـٰذَا صِرَٰطُ رَبِّكَ مُسْتَقِيمًۭا ۗ قَدْ فَصَّلْنَا ٱلْـَٔايَـٰتِ لِقَوْمٍۢ يَذَّكَّرُونَ
وَهَـٰذَا
और ये
صِرَٰطُ
रास्ता है
رَبِّكَ
आपके रब का
مُسْتَقِيمًۭا ۗ
सीधा
قَدْ
तहक़ीक़
فَصَّلْنَا
खोल कर बयान कीं हमने
ٱلْـَٔايَـٰتِ
आयात
لِقَوْمٍۢ
उन लोगों के लिए
يَذَّكَّرُونَ
जो नसीहत क़ुबूल करते हैं
और यह तुम्हारे रब का रास्ता है, बिल्कुल सीधा। हमने निशानियाँ, ध्यान देनेवालों के लिए खोल-खोलकर बयान कर दी है
तफ़्सीर:
यह धर्म जो हमने (ऐ रसूल!) आपके लिए निर्धारित किया है, अल्लाह का वह सीधा मार्ग है, जिसमें कोई टेढ़ापन नहीं। हमने उसके लिए निशानियाँ स्पष्ट कर दी हैं, जिसके पास समझ-बूझ है जिसके द्वारा वह अल्लाह के बारे में समझ सकता है।
आयत 127
۞ لَهُمْ دَارُ ٱلسَّلَـٰمِ عِندَ رَبِّهِمْ ۖ وَهُوَ وَلِيُّهُم بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
۞ لَهُمْ
उनके लिए
دَارُ
घर है
ٱلسَّلَـٰمِ
सलामती का
عِندَ
with
رَبِّهِمْ ۖ
पास उनके रब के
وَهُوَ
और वो
وَلِيُّهُم
दोस्त है उनका
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते
उनके लिए उनके रब के यहाँ सलामती का घर है और वह उनका संरक्षक मित्र है, उन कामों के कारण जो वे करते रहे है
तफ़्सीर:
उनके लिए एक घर है, जिसमें वे हर नुक़सान से सुरक्षित रहेंगे। यह घर जन्नत है। तथा अल्लाह उनका सहायक और समर्थक है, उनके उन अच्छे कामों के बदले जो वे किया करते थे।
आयत 128
وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ جَمِيعًۭا يَـٰمَعْشَرَ ٱلْجِنِّ قَدِ ٱسْتَكْثَرْتُم مِّنَ ٱلْإِنسِ ۖ وَقَالَ أَوْلِيَآؤُهُم مِّنَ ٱلْإِنسِ رَبَّنَا ٱسْتَمْتَعَ بَعْضُنَا بِبَعْضٍۢ وَبَلَغْنَآ أَجَلَنَا ٱلَّذِىٓ أَجَّلْتَ لَنَا ۚ قَالَ ٱلنَّارُ مَثْوَىٰكُمْ خَـٰلِدِينَ فِيهَآ إِلَّا مَا شَآءَ ٱللَّهُ ۗ إِنَّ رَبَّكَ حَكِيمٌ عَلِيمٌۭ
وَيَوْمَ
और जिस दिन
يَحْشُرُهُمْ
वो इकट्ठा करेगा उनको
جَمِيعًۭا
सबके सबको
يَـٰمَعْشَرَ
ऐ गिरोह (तो फ़रमाएगा)
ٱلْجِنِّ
जिन्नों के
قَدِ
तहक़ीक़
ٱسْتَكْثَرْتُم
बहुत ज़्यादा ले लिए तुमने
مِّنَ
of
ٱلْإِنسِ ۖ
इन्सानों में से
وَقَالَ
और कहेंगे
أَوْلِيَآؤُهُم
दोस्त उनके
مِّنَ
among
ٱلْإِنسِ
इन्सानों में से
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
ٱسْتَمْتَعَ
फ़ायदा उठाया
بَعْضُنَا
बाज़ हमारे ने
بِبَعْضٍۢ
बाज़ का
وَبَلَغْنَآ
और पहुँचे हम
أَجَلَنَا
अपनी मुद्दत को
ٱلَّذِىٓ
वो जो
أَجَّلْتَ
मुक़र्रर की तूने
لَنَا ۚ
हमारे लिए
قَالَ
वो फ़रमाएगा
ٱلنَّارُ
आग
مَثْوَىٰكُمْ
ठिकाना है तुम्हारा
خَـٰلِدِينَ
हमेशा रहने वाले हो
فِيهَآ
उसमें
إِلَّا
मगर
مَا
जो
شَآءَ
चाहे
ٱللَّهُ ۗ
अल्लाह
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
حَكِيمٌ
बहुत हिकमत वाला है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब इल्म वाला है
और उस दिन को याद करो, जब वह उन सबको घेरकर इकट्ठा करेगा, (कहेगा), "ऐ जिन्नों के गिरोह! तुमने तो मनुष्यों पर ख़ूब हाथ साफ किया।" और मनुष्यों में से जो उनके साथी रहे होंगे, कहेंग, "ऐ हमारे रब! हमने आपस में एक-दूसरे से लाभ उठाया और अपने उस नियत समय को पहुँच गए, जो तूने हमारे लिए ठहराया था।" वह कहेगा, "आग (नरक) तुम्हारा ठिकाना है, उसमें तुम्हें सदैव रहना है।" अल्लाह का चाहा ही क्रियान्वित है। निश्चय ही तुम्हारा रब तत्वदर्शी, सर्वज्ञ है
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) याद करें, जिस दिन अल्लाह मानव जाति और जिन्नों को इकट्ठा करेगा, फिर अल्लाह कहेगा : ऐ जिन्नों के समूह! तुमने इनसानों को खूब गुमराह किया तथा उन्हें अल्लाह के मार्ग से रोक दिया। इसपर इनसानों में से उनके अनुयायी अपने रब को जवाब देते हुए कहेंगे : ऐ हमारे रब! हममें से प्रत्येक ने अपने साथी से लाभ उठाया है। चुनाँचे जिन्न ने इनसान की आज्ञाकारिता का लाभ उठाया, और इनसान ने अपनी इच्छाओं की पूर्ति का लाभ उठाया। और हम उस अवधि तक पहुँच गए, जो तूने हमारे लिए नियत कर रखी थी। तो अब यह क़ियामत का दिन है। अल्लाह कहेगा : आग ही तुम्हारा ठिकाना है, जिसमें तुम हमेशा रहोगे, सिवाय उसके जो अल्लाह चाहे, जो कि उनके क़ब्रों से उठने से लेकर उनके अपने गंतव्य जहन्नम की ओर जाने के बीच की अवधि है। यही वह अवधि है, जिसको अल्लाह ने उनके हमेशा जहन्नम में रहने से अलग किया है। निश्चय ही आपका रब (ऐ रसूल!) अपनी तक़दीर तथा प्रबंधन में पूर्ण हिकमत वाला, अपने बंदों और उनमें से उन लोगों के बारे में सब कुछ जानने वाला है जो यातना के योग्य हैं।
आयत 129
وَكَذَٰلِكَ نُوَلِّى بَعْضَ ٱلظَّـٰلِمِينَ بَعْضًۢا بِمَا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
نُوَلِّى
हम मुसल्लत कर देते हैं
بَعْضَ
बाज़
ٱلظَّـٰلِمِينَ
ज़ालिमों को
بَعْضًۢا
बाज़ पर
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَكْسِبُونَ
वो कमाई करते
इसी प्रकार हम अत्याचारियों को एक-दूसरे के लिए (नरक का) साथी बना देंगे, उस कमाई के कारण जो वे करते रहे थे
तफ़्सीर:
जिस प्रकार हमने सरकश जिन्नों को कुछ इनसानों का दोस्त बना दिया और उन्हें उनपर हावी कर दिया, ताकि वे उन्हें पथभ्रष्ट करते रहें, उसी प्रकार हम प्रत्येक अत्याचारी को एक अत्याचारी का दोस्त बना देते हैं, जो उसे बुराई करने पर उभारता और उसके लिए प्रेरित करता है, तथा उसे भलाई से नफरत दिलाता और उसके प्रति उसमें अरुचि पैदा करता है। यह दरअसल उन पापों के प्रतिफल के रूप में है, जो वे कमाया करते थे।
आयत 130
يَـٰمَعْشَرَ ٱلْجِنِّ وَٱلْإِنسِ أَلَمْ يَأْتِكُمْ رُسُلٌۭ مِّنكُمْ يَقُصُّونَ عَلَيْكُمْ ءَايَـٰتِى وَيُنذِرُونَكُمْ لِقَآءَ يَوْمِكُمْ هَـٰذَا ۚ قَالُوا۟ شَهِدْنَا عَلَىٰٓ أَنفُسِنَا ۖ وَغَرَّتْهُمُ ٱلْحَيَوٰةُ ٱلدُّنْيَا وَشَهِدُوا۟ عَلَىٰٓ أَنفُسِهِمْ أَنَّهُمْ كَانُوا۟ كَـٰفِرِينَ
يَـٰمَعْشَرَ
ऐ गिरोह
ٱلْجِنِّ
जिन्नों के
وَٱلْإِنسِ
और इन्सानों के
أَلَمْ
क्या नहीं
يَأْتِكُمْ
आए तुम्हारे पास
رُسُلٌۭ
कुछ रसूल
مِّنكُمْ
तुम में से
يَقُصُّونَ
जो बयान करते
عَلَيْكُمْ
तुम पर
ءَايَـٰتِى
आयात मेरी
وَيُنذِرُونَكُمْ
और वो डराते तुम्हें
لِقَآءَ
मुलाक़ात से
يَوْمِكُمْ
(of) your day
هَـٰذَا ۚ
तुम्हारे इस दिन की
قَالُوا۟
वो कहेंगे
شَهِدْنَا
गवाही देते हैं हम
عَلَىٰٓ
against
أَنفُسِنَا ۖ
अपने नफ़्सों पर
وَغَرَّتْهُمُ
और धोखे में डाला उन्हें
ٱلْحَيَوٰةُ
ज़िन्दगी ने
ٱلدُّنْيَا
दुनिया की
وَشَهِدُوا۟
और वो गवाही देंगे
عَلَىٰٓ
against
أَنفُسِهِمْ
अपने नफ़्सों पर
أَنَّهُمْ
कि बेशक वो
كَانُوا۟
थे वो
كَـٰفِرِينَ
काफ़िर
"ऐ जिन्नों और मनुष्यों के गिरोह! क्या तुम्हारे पास तुम्हीं में से रसूल नहीं आए थे, जो तुम्हें मेरी आयतें सुनाते और इस दिन के पेश आने से तुम्हें डराते थे?" वे कहेंगे, "क्यों नहीं! (रसूल तो आए थे) हम स्वयं अपने विरुद्ध गवाह है।" उन्हें तो सांसारिक जीवन ने धोखे में रखा। मगर अब वे स्वयं अपने विरुद्ध गवाही देने लगे कि वे इनकार करनेवाले थे
तफ़्सीर:
हम क़ियामत के दिन उनसे कहेंगे : ऐ इनसानों और जिन्नों के समूह! क्या तुम्हारे पास तुम्हारे ही वर्ग (मानव जाति) से रसूल नहीं आए, जो तुम्हें वह पढ़कर सुनाते हों जो अल्लाह ने उनपर अवतरित किया है, और तुम्हें इस दिन के भेंट अर्थात् क़ियामत के दिन से डराते हों? वे कहेंगे : बिलकुल आए थे। आज हम अपने विरुद्ध इक़रार करते हैं कि तेरे रसूलों ने हमें संदेश पहुँचा दिया, तथा हम इस दिन के भेंट का भी इक़रार करते हैं। परंतु हमने तेरे रसूलों को झुठला दिया था तथा इस दिन के भेंट के बारे में उनकी बात को अस्वीकार कर दिया था। दरअसल, इस दुनिया के जीवन ने उन्हें अपने अलंकरण, शोभा और क्षणभंगुर आनंद के साथ धोखा दिया, तथा वे स्वयं ही स्वीकार करेंगे कि वे दुनिया में अल्लाह तथा उसके रसूलों का इनकार करने वाले थे। हालाँकि इस स्वीकारोक्ति और ईमान से उन्हें कुछ भी लाभ नहीं होगा, क्योंकि उसका समय समाप्त हो चुका।
आज की ज़िंदगी में सबक़
शैतान के दोस्त बनने से खबरदार किया गया है। यह सबक हमें सिखाता है कि बुरी सोहबत और वसवसे इंसान को गुमराह कर देते हैं, इसलिए अच्छी सोहबत का चुनाव ज़रूरी है।
आयत 131
ذَٰلِكَ أَن لَّمْ يَكُن رَّبُّكَ مُهْلِكَ ٱلْقُرَىٰ بِظُلْمٍۢ وَأَهْلُهَا غَـٰفِلُونَ
ذَٰلِكَ
ये (इस लिए)
أَن
कि
لَّمْ
नहीं
يَكُن
है
رَّبُّكَ
रब आपका
مُهْلِكَ
हलाक करने वाला
ٱلْقُرَىٰ
बस्तियों को
بِظُلْمٍۢ
साथ ज़ुल्म के
وَأَهْلُهَا
जब कि हों उनके रहने वाले
غَـٰفِلُونَ
ग़ाफ़िल
यह जान लो कि तुम्हारा रब ज़ुल्म करके बस्तियों को विनष्ट करनेवाला न था, जबकि उनके निवासी बेसुध रहे हों
तफ़्सीर:
इनसानों तथा जिन्नों की ओर रसूल भेजकर इसलिए हुज्जत तमाम कर दी गई, ताकि किसी को उसके गुनाह की सज़ा इस हाल में न दी जाए कि उसकी ओर कोई रसूल न भेजा गया हो और उसके पास धर्म का संदेश न पहुँचा हो। अतः हमने किसी समुदाय को उसके पास रसूल भेजने के बाद ही दंडित किया।
आयत 132
وَلِكُلٍّۢ دَرَجَـٰتٌۭ مِّمَّا عَمِلُوا۟ ۚ وَمَا رَبُّكَ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا يَعْمَلُونَ
وَلِكُلٍّۢ
और हर एक के लिए
دَرَجَـٰتٌۭ
दरजात हैं
مِّمَّا
उसमें से जो
عَمِلُوا۟ ۚ
उन्होंने अमल किए
وَمَا
और नहीं
رَبُّكَ
रब आपका
بِغَـٰفِلٍ
ग़ाफ़िल
عَمَّا
उससे जो
يَعْمَلُونَ
वो अमल करते हैं
सभी के दर्जें उनके कर्मों के अनुसार है। और जो कुछ वे करते है, उससे तुम्हारा रब अनभिज्ञ नहीं है
तफ़्सीर:
उनमें से प्रत्येक के लिए अपने कर्मों के अनुसार दरजे हैं। अतः थोड़ी-बहुत बुराई करने वाला और अधिक बुराई करने वाला, दोनों बराबर नहीं हो सकते तथा अनुसरण करने वाला और जिसका अनुसरण किया गया है, दोनों बराबर नहीं हो सकते। जैसे कि सभी अच्छे कार्य करने वालों का बदला बराबर नहीं हो सकता। तथा आपका पालनहार उससे अनजान नहीं है जो कुछ वे कर रहे थे, बल्कि वह उसके बारे में जानता है, उससे कुछ भी छिपा नहीं है, और वह उन्हें उनके कार्यों का बदला देगा।
आयत 133
وَرَبُّكَ ٱلْغَنِىُّ ذُو ٱلرَّحْمَةِ ۚ إِن يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ وَيَسْتَخْلِفْ مِنۢ بَعْدِكُم مَّا يَشَآءُ كَمَآ أَنشَأَكُم مِّن ذُرِّيَّةِ قَوْمٍ ءَاخَرِينَ
وَرَبُّكَ
और रब आपका
ٱلْغَنِىُّ
बहुत बेनियाज़ है
ذُو
(the) Possessor
ٱلرَّحْمَةِ ۚ
रहमत वाला है
إِن
अगर
يَشَأْ
वो चाहे
يُذْهِبْكُمْ
वो ले जाए तुम सबको
وَيَسْتَخْلِفْ
और वो जानशीन बना दे
مِنۢ
from
بَعْدِكُم
तुम्हारे बाद
مَّا
जिसको
يَشَآءُ
वो चाहे
كَمَآ
जैसा कि
أَنشَأَكُم
उसने उठाया तुम्हें
مِّن
from
ذُرِّيَّةِ
नस्ल से
قَوْمٍ
(of) people
ءَاخَرِينَ
दूसरी क़ौम की
तुम्हारा रब निस्पृह, दयावान है। यदि वह चाहे तो तुम्हें (दुनिया से) ले जाए और तुम्हारे स्थान पर जिसको चाहे तुम्हारे बाद ले आए, जिस प्रकार उसने तुम्हें कुछ और लोगों की सन्तति से उठाया है
तफ़्सीर:
और (ऐ रसूल!) आपका रब अपने बंदों से बेनियाज़ है। उसे न उनकी आवश्यकता है, न उनकी इबादत की, और न ही उनके इनकार से उसे कोई नुक़सान होता है। वह उनसे अपनी इस बेनियाज़ी के बावजूद, उनपर दया करता है। यदि वह (ऐ अवज्ञाकारी बंदो!) तुम्हें नष्ट करना चाहे, तो अपनी यातना भेजकर तुम्हें जड़ से उखाड़ फेंके और तुम्हें विनष्ट करने के बाद अपनी इच्छा के अनुसार ऐसे लोगों को ले आए, जो उसपर ईमान रखें और उसकी आज्ञा मानें। जैसा कि उसने तुम्हें अन्य लोगों के वंश से पैदा किया जो तुमसे पहले थे।
आयत 134
إِنَّ مَا تُوعَدُونَ لَـَٔاتٍۢ ۖ وَمَآ أَنتُم بِمُعْجِزِينَ
إِنَّ
बेशक
مَا
जो
تُوعَدُونَ
तुम वादा दिए जाते हो
لَـَٔاتٍۢ ۖ
अलबत्ता आने वाला है
وَمَآ
और नहीं
أَنتُم
तुम
بِمُعْجِزِينَ
आजिज़ करने वाले
जिस चीज़ का तुमसे वादा किया जाता है, उसे अवश्य आना है और तुममें उसे मात करने की सामर्थ्य नहीं
तफ़्सीर:
(ऐ काफ़िरो!) तुमसे जिस पुनर्जीवन, दोबारा उठाए जाने, हिसाब-किताब और सज़ा का वादा किया जा रहा है, वह अनिवार्य रूप से आने वाला है और तुम अपने पालनहार की पकड़ से भागकर नहीं निकल सकते। क्योंकि वह तुम्हारे माथे की लट को पकड़े हुए है और तुम्हें अपनी यातना से दंडित करने वाला है।
आयत 135
قُلْ يَـٰقَوْمِ ٱعْمَلُوا۟ عَلَىٰ مَكَانَتِكُمْ إِنِّى عَامِلٌۭ ۖ فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ مَن تَكُونُ لَهُۥ عَـٰقِبَةُ ٱلدَّارِ ۗ إِنَّهُۥ لَا يُفْلِحُ ٱلظَّـٰلِمُونَ
قُلْ
कह दीजिए
يَـٰقَوْمِ
ऐ मेरी क़ौम
ٱعْمَلُوا۟
अमल करो
عَلَىٰ
on
مَكَانَتِكُمْ
अपनी जगह पर
إِنِّى
बेशक मैं
عَامِلٌۭ ۖ
अमल करने वाला हूँ
فَسَوْفَ
पस अनक़रीब
تَعْلَمُونَ
तुम जान लोगे
مَن
कौन
تَكُونُ
है
لَهُۥ
जिसके लिए
عَـٰقِبَةُ
अंजाम है
ٱلدَّارِ ۗ
घर का (आख़िरत के)
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَا
(will) not
يُفْلِحُ
नहीं वो फ़लाह पाते
ٱلظَّـٰلِمُونَ
जो ज़ालिम हैं
कह दो, "ऐ मेरी क़ौम के लोगो! तुम अपनी जगह कर्म करते रहो, मैं भी अपनी जगह कर्मशील हूँ। शीघ्र ही तुम्हें मालूम हो जाएगा कि घर (लोक-परलोक) का परिणाम किसके हित में होता है। निश्चय ही अत्याचारी सफल नहीं होते।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : ऐ मेरे समुदाय के लोगो! अपने मार्ग पर और जिस कुफ़्र तथा पथभ्रष्टता में पड़े हो, उस पर अडिग रहो। मैंने स्पष्ट रूप से संदेश पहुँचाकर तुमपर हुज्जत तमाम कर दी और प्रमाण स्थापित कर दिया। अतः मुझे तुम्हारे कुफ़्र तथा पथभ्रष्टता की कोई परवाह नहीं है। बल्कि मैं जिस सत्य पर क़ायम हूँ उसपर अडिग रहूँगा। फिर तुम्हें शीघ्र ही मालूम हो जाएगा कि किसे दुनिया में विजय प्राप्त होती है, कौन धरती का वारिस होता है तथा किसे आख़िरत की खुशियाँ प्राप्त होती हैं। निश्चित रूप से बहुदेववादियों को न तो इस दुनिया में सफलता प्राप्त होगी, और न ही आख़िरत में। बल्कि उनका परिणाम घाटा एवं नुक़सान है, भले ही उन्होंने इस दुनिया में जो कुछ आनंद लिया हो, उसका आनंद लिया।
आयत 136
وَجَعَلُوا۟ لِلَّهِ مِمَّا ذَرَأَ مِنَ ٱلْحَرْثِ وَٱلْأَنْعَـٰمِ نَصِيبًۭا فَقَالُوا۟ هَـٰذَا لِلَّهِ بِزَعْمِهِمْ وَهَـٰذَا لِشُرَكَآئِنَا ۖ فَمَا كَانَ لِشُرَكَآئِهِمْ فَلَا يَصِلُ إِلَى ٱللَّهِ ۖ وَمَا كَانَ لِلَّهِ فَهُوَ يَصِلُ إِلَىٰ شُرَكَآئِهِمْ ۗ سَآءَ مَا يَحْكُمُونَ
وَجَعَلُوا۟
और उन्होंने मुक़र्रर कर लिया
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
مِمَّا
उसमें से जो
ذَرَأَ
उसने पैदा किया
مِنَ
of
ٱلْحَرْثِ
खेती से
وَٱلْأَنْعَـٰمِ
और मवेशियों से
نَصِيبًۭا
एक हिस्सा
فَقَالُوا۟
तो उन्होंने कहा
هَـٰذَا
ये
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए है
بِزَعْمِهِمْ
उनके गुमान के मुताबिक़
وَهَـٰذَا
और ये
لِشُرَكَآئِنَا ۖ
हमारे शरीकों के लिए है
فَمَا
पस जो (हिस्सा)
كَانَ
है
لِشُرَكَآئِهِمْ
उनके शरीकों के लिए
فَلَا
तो नहीं
يَصِلُ
वो पहुँचता
إِلَى
[to]
ٱللَّهِ ۖ
तरफ़ अल्लाह के
وَمَا
और जो
كَانَ
है
لِلَّهِ
अल्लाह के लिए
فَهُوَ
तो वो
يَصِلُ
वो पहुँच जाता है
إِلَىٰ
[to]
شُرَكَآئِهِمْ ۗ
तरफ़ उनके शरीकों के
سَآءَ
कितना बुरा है
مَا
जो
يَحْكُمُونَ
वो फ़ैसला करते हैं
उन्होंने अल्लाह के लिए स्वयं उसी की पैदा की हुई खेती और चौपायों में से एक भाग निश्चित किया है और अपने ख़याल से कहते है, "यह किस्सा अल्लाह का है और यह हमारे ठहराए हुए साझीदारों का है।" फिर जो उनके साझीदारों का (हिस्सा) है, वह अल्लाह को नहीं पहुँचता, परन्तु जो अल्लाह का है, वह उनके साझीदारों को पहुँच जाता है। कितना बुरा है, जो फ़ैसला वे करते है!
तफ़्सीर:
अल्लाह के साथ शिर्क करने वालों ने यह तरीक़ा निकाला कि अल्लाह की पैदा की हुई फसलों और मवेशियों में से उसके लिए एक हिस्सा निर्धारित कर दिया और यह दावा किया कि वह (हिस्सा) अल्लाह का है, और दूसरा हिस्सा उनकी मूर्तियों और थानों के लिए है। फिर उन्होंने जो हिस्सा अपने साझियों के लिए आवंटित किया है, वह उन मसरफ़ों तक नहीं पहुँचता, जिनमें ख़र्च करना अल्लाह ने धर्मसंगत बनाया है, जैसे ग़रीब और मिसकीन लोग। तथा उन्होंने जो हिस्सा अल्लाह के लिए निर्धारित किया है, वह उनके साझियों यानी मूर्तियों को पहुँच जाता है, वह उनके हितों में खर्च किया जा सकता है। उनका यह निर्णय और विभाजन बहुत बुरा है।
आयत 137
وَكَذَٰلِكَ زَيَّنَ لِكَثِيرٍۢ مِّنَ ٱلْمُشْرِكِينَ قَتْلَ أَوْلَـٰدِهِمْ شُرَكَآؤُهُمْ لِيُرْدُوهُمْ وَلِيَلْبِسُوا۟ عَلَيْهِمْ دِينَهُمْ ۖ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ مَا فَعَلُوهُ ۖ فَذَرْهُمْ وَمَا يَفْتَرُونَ
وَكَذَٰلِكَ
और इसी तरह
زَيَّنَ
मुज़य्यन कर दिया
لِكَثِيرٍۢ
अक्सरियत के लिए
مِّنَ
of
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकीन में से
قَتْلَ
क़त्ल करना
أَوْلَـٰدِهِمْ
अपनी औलाद का
شُرَكَآؤُهُمْ
उनके शरीकों ने
لِيُرْدُوهُمْ
ताकि वो हलाकत में डालें उन्हें
وَلِيَلْبِسُوا۟
और ताकि वो मुश्तबा कर दें
عَلَيْهِمْ
उन पर
دِينَهُمْ ۖ
उनके दीन को
وَلَوْ
और अगर
شَآءَ
चाहता
ٱللَّهُ
अल्लाह
مَا
ना
فَعَلُوهُ ۖ
वो करते उसे
فَذَرْهُمْ
पस छोड़ दीजिए उन्हें
وَمَا
और जो कुछ
يَفْتَرُونَ
वो झूठ गढ़ते हैं
इसी प्रकार बहुत-से बहुदेववादियों के लिए उनके लिए साझीदारों ने उनकी अपनी सन्तान की हत्या को सुहाना बना दिया है, ताकि उन्हें विनष्ट कर दें और उनके लिए उनके धर्म को संदिग्ध बना दें। यदि अल्लाह चाहता तो वे ऐसा न करते; तो छोड़ दो उन्हें और उनके झूठ घड़ने को
तफ़्सीर:
जिस तरह शैतान ने बहुदेववादियों के लिए इस अन्यायपूर्ण निर्णय को सुंदर बना दिया है, उसी तरह बहुत-से बहुदेववादियों के लिए उनके साझी शैतानों ने यह सुशोभित किया है कि वे गरीबी के डर से अपने बच्चों की हत्या कर दें; ताकि वह उनसे उस आत्मा की हत्या कराकर उन्हें नष्ट कर दे, जिसकी नाहक़ हत्या करना अल्लाह ने निषिद्ध ठहराया है, और ताकि वह उनपर उनके धर्म को गड्डमड्ड कर दे, फिर वे यह न जान सकें कि क्या वैध है और क्या अवैध। और यदि अल्लाह चाहता कि वे ऐसा न करें, तो वे ऐसा नहीं करते, परंतु अल्लाह ने अपनी व्यापक हिकमत के तहत ऐसा ही चाहा। अतः (ऐ रसूल!) आप इन बहुदेववादियों तथा अल्लाह पर इनके मिथ्यारोपण को छोड़ दें। क्योंकि इससे आपको कोई नुक़सान नहीं होगा, और उनका मामला अल्लाह को सौंप दें।
आयत 138
وَقَالُوا۟ هَـٰذِهِۦٓ أَنْعَـٰمٌۭ وَحَرْثٌ حِجْرٌۭ لَّا يَطْعَمُهَآ إِلَّا مَن نَّشَآءُ بِزَعْمِهِمْ وَأَنْعَـٰمٌ حُرِّمَتْ ظُهُورُهَا وَأَنْعَـٰمٌۭ لَّا يَذْكُرُونَ ٱسْمَ ٱللَّهِ عَلَيْهَا ٱفْتِرَآءً عَلَيْهِ ۚ سَيَجْزِيهِم بِمَا كَانُوا۟ يَفْتَرُونَ
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
هَـٰذِهِۦٓ
ये
أَنْعَـٰمٌۭ
मवेशी
وَحَرْثٌ
और खेती
حِجْرٌۭ
ममनूअ हैं
لَّا
no (one)
يَطْعَمُهَآ
नहीं खा सकता उन्हें
إِلَّا
मगर
مَن
वो जिसे
نَّشَآءُ
हम चाहें
بِزَعْمِهِمْ
उनके गुमान के मुताबिक़
وَأَنْعَـٰمٌ
और कुछ मवेशी
حُرِّمَتْ
हराम की गईं
ظُهُورُهَا
पुश्तें उनकी
وَأَنْعَـٰمٌۭ
और कुछ मवेशी
لَّا
not
يَذْكُرُونَ
नहीं वो ज़िक्र करते
ٱسْمَ
नाम
ٱللَّهِ
अल्लाह का
عَلَيْهَا
उन पर
ٱفْتِرَآءً
झूठ गढ़ते हुए
عَلَيْهِ ۚ
उस पर
سَيَجْزِيهِم
अनक़रीब वो बदला देगा उन्हें
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَفْتَرُونَ
वो झूठ गढ़ते
और वे कहते है, "ये जानवर और खेती वर्जित और सुरक्षित है। इन्हें तो केवल वही खा सकता है, जिसे हम चाहें।" - ऐसा वे स्वयं अपने ख़याल से कहते है - और कुछ चौपाए ऐसे है, जिनकी पीठों को (सवारी के लिए) हराम ठहरा लिया है और कुछ जानवर ऐसे है जिनपर अल्लाह का नाम नहीं लेते। यह यह उन्होंने अल्लाह पर झूठ घड़ा है, और वह शीघ्र ही उन्हें उनके झूठ घड़ने का बदला देगा
तफ़्सीर:
तथा बहुदेववादियों ने कहा : ये पशुधन और फसलें निषिद्ध हैं, जिनमें से केवल वही खा सकते हैं, जिन्हें वे चाहें, जैसे मूर्तियों के सेवक आदि। यह उनका अपना ख़याल और घड़ी हुई बात है। और (उन्होंने यह भी कहा कि) ये ऐसे मवेशी हैं जिनकी पीठें हराम (वर्जित) हैं; न उनकी सवारी की जाएगी और न ही उनपर बोझ लादा जाएगा। इन जानवरों से मुराद बहीरा (वह ऊँटनी जिसके पाँच बच्चे हो जाएँ और उसका कान चीरकर उसे छोड़ दिया जाए), साइबा (वह ऊँटनी जिसे मूर्तियों के लिए छोड़ दिया जाए) और हामी (वह नर ऊँट जिसकी नस्ल से दस बच्चे पैदा हो जाएँ और उसे आज़ाद कर दिया जाए) हैं। इन जानवरों को ज़बह करते समय वे अल्लाह का नाम लेने के बजाय अपनी मूर्तियों का नाम लेते थे। उन्होंने यह सब अल्लाह के विरुद्ध यह झूठ गढ़ते हुए किया कि यह उसकी ओर से है। अल्लाह शीघ्र ही उन्हें अपनी यातना से दंडित करेगा, क्योंकि वे अल्लाह पर झूठे आरोप लगाते थे।
आयत 139
وَقَالُوا۟ مَا فِى بُطُونِ هَـٰذِهِ ٱلْأَنْعَـٰمِ خَالِصَةٌۭ لِّذُكُورِنَا وَمُحَرَّمٌ عَلَىٰٓ أَزْوَٰجِنَا ۖ وَإِن يَكُن مَّيْتَةًۭ فَهُمْ فِيهِ شُرَكَآءُ ۚ سَيَجْزِيهِمْ وَصْفَهُمْ ۚ إِنَّهُۥ حَكِيمٌ عَلِيمٌۭ
وَقَالُوا۟
और उन्होंने कहा
مَا
जो कुछ
فِى
(is) in
بُطُونِ
पेटों में है
هَـٰذِهِ
उन
ٱلْأَنْعَـٰمِ
मवेशियों के
خَالِصَةٌۭ
ख़ालिस है (वो)
لِّذُكُورِنَا
हमारे मर्दों के लिए
وَمُحَرَّمٌ
और हराम किया गया है
عَلَىٰٓ
on
أَزْوَٰجِنَا ۖ
हमारी बीवियों पर
وَإِن
और अगर
يَكُن
हो वो
مَّيْتَةًۭ
मुरदार
فَهُمْ
तो वो
فِيهِ
उसमें
شُرَكَآءُ ۚ
सब शरीक हैं
سَيَجْزِيهِمْ
अनक़रीब वो बदला देगा उन्हें
وَصْفَهُمْ ۚ
उनके बयान का
إِنَّهُۥ
बेशक वो
حَكِيمٌ
बहुत हिकमत वाला है
عَلِيمٌۭ
ख़ूब इल्म वाला है
और वे कहते है, "जो कुछ इन जानवरों के पेट में है वह बिल्कुल हमारे पुरुषों ही के लिए है और वह हमारी पत्नियों के लिए वर्जित है। परन्तु यदि वह मुर्दा हो, तो वे सब उसमें शरीक है।" शीघ्र ही वह उन्हें उनके ऐसा कहने का बदला देगा। निस्संदेह वह तत्वदर्शी, सर्वज्ञ है
तफ़्सीर:
उन्होंने यह भी कहा कि इन 'साइबा' एवं 'बहीरा' आदि जानवरों के पेट में जो बच्चे हैं, यदि वह जीवित पैदा हुआ है, तो वह हमारे पुरुषों के लिए अनुमेय और हमारी महिलाओं के लिए निषिद्ध है, और यदि उनके पेट में जो बच्चे हैं मृत पैदा हों, तो उसे पुरुष एवं महिला सब खा सकते हैं। शीघ्र ही अल्लाह उन्हें उनके ऐसा कहने का वह बदला देगा जिसके वे योग्य हैं। वह अपने विधान तथा अपनी सृष्टि के मामलों के प्रबंधन में पूर्ण हिकमत वाला, उनके बारे में सब कुछ जानने वाला है।
आयत 140
قَدْ خَسِرَ ٱلَّذِينَ قَتَلُوٓا۟ أَوْلَـٰدَهُمْ سَفَهًۢا بِغَيْرِ عِلْمٍۢ وَحَرَّمُوا۟ مَا رَزَقَهُمُ ٱللَّهُ ٱفْتِرَآءً عَلَى ٱللَّهِ ۚ قَدْ ضَلُّوا۟ وَمَا كَانُوا۟ مُهْتَدِينَ
قَدْ
तहक़ीक़
خَسِرَ
ख़सारे में रहे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
قَتَلُوٓا۟
क़त्ल किया
أَوْلَـٰدَهُمْ
अपनी औलाद को
سَفَهًۢا
नादानी से
بِغَيْرِ
बग़ैर
عِلْمٍۢ
इल्म के
وَحَرَّمُوا۟
और हराम क़रार दिया
مَا
उसको जो
رَزَقَهُمُ
रिज़्क़ दिया उनको
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
ٱفْتِرَآءً
झूठ गढ़ते हुए
عَلَى
against
ٱللَّهِ ۚ
अल्लाह पर
قَدْ
तहक़ीक़
ضَلُّوا۟
वो भटक गए
وَمَا
और ना
كَانُوا۟
थे वो
مُهْتَدِينَ
हिदायत पाने वाले
वे लोग कुछ जाने-बूझे बिना घाटे में रहे, जिन्होंने मूर्खता के कारण अपनी सन्तान की हत्या की और जो कुछ अल्लाह ने उन्हें प्रदान किया था, उसे अल्लाह पर झूठ घड़कर हराम ठहरा दिया। वास्तव में वे भटक गए और वे सीधा मार्ग पानेवाले न हुए
तफ़्सीर:
वे लोग नष्ट हो गए, जिन्होंने अपनी नासमझी एवं अज्ञानता के कारण अपनी संतान की हत्या की और अल्लाह के दिए हुए जानवरों को, झूठे तौर पर अल्लाह की ओर निसबत करके हराम ठहरा लिया। निश्चय वे सीधे रास्ते से दूर हो गए और वे उस पर निर्देशित नहीं थे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जाहिली दौर की औलाद-कत्ल जैसी रस्मों की मज़म्मत की गई है। यह हमें सिखाता है कि औलाद अल्लाह की नेमत है, माली तंगी या फुज़ूल रस्मों की वजह से उनके हक मारना सख्त गुनाह है।
आयत 141
۞ وَهُوَ ٱلَّذِىٓ أَنشَأَ جَنَّـٰتٍۢ مَّعْرُوشَـٰتٍۢ وَغَيْرَ مَعْرُوشَـٰتٍۢ وَٱلنَّخْلَ وَٱلزَّرْعَ مُخْتَلِفًا أُكُلُهُۥ وَٱلزَّيْتُونَ وَٱلرُّمَّانَ مُتَشَـٰبِهًۭا وَغَيْرَ مُتَشَـٰبِهٍۢ ۚ كُلُوا۟ مِن ثَمَرِهِۦٓ إِذَآ أَثْمَرَ وَءَاتُوا۟ حَقَّهُۥ يَوْمَ حَصَادِهِۦ ۖ وَلَا تُسْرِفُوٓا۟ ۚ إِنَّهُۥ لَا يُحِبُّ ٱلْمُسْرِفِينَ
۞ وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِىٓ
जिसने
أَنشَأَ
पैदा किए
جَنَّـٰتٍۢ
बाग़ात
مَّعْرُوشَـٰتٍۢ
छतरियों पर चढ़ाए हुए
وَغَيْرَ
और बग़ैर
مَعْرُوشَـٰتٍۢ
छतरियों पर चढ़ाए हुए
وَٱلنَّخْلَ
और खजूर के दरख़्त
وَٱلزَّرْعَ
और खेती
مُخْتَلِفًا
मुख़्तलिफ़ हैं
أُكُلُهُۥ
फल उसके
وَٱلزَّيْتُونَ
और ज़ैतून
وَٱلرُّمَّانَ
और अनार
مُتَشَـٰبِهًۭا
आपस में मिलते-जुलते
وَغَيْرَ
और ना
مُتَشَـٰبِهٍۢ ۚ
मिलते-जुलते
كُلُوا۟
खाओ
مِن
of
ثَمَرِهِۦٓ
उसके फल में से
إِذَآ
जब
أَثْمَرَ
वो फल लाए
وَءَاتُوا۟
और दो
حَقَّهُۥ
हक़ उसका
يَوْمَ
दिन
حَصَادِهِۦ ۖ
उसकी कटाई के
وَلَا
और ना
تُسْرِفُوٓا۟ ۚ
तुम इसराफ़ करो
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَا
(does) not
يُحِبُّ
नहीं वो पसंद करता
ٱلْمُسْرِفِينَ
इसराफ़ करने वालों को
और वही है जिसने बाग़ पैदा किए; कुछ जालियों पर चढ़ाए जाते है और कुछ नहीं चढ़ाए जाते और खजूर और खेती भी जिनकी पैदावार विभिन्न प्रकार की होती है, और ज़ैतून और अनार जो एक-दूसरे से मिलते-जुलते भी है और नहीं भी मिलते है। जब वह फल दे, तो उसका फल खाओ और उसका हक़ अदा करो जो उस (फ़सल) की कटाई के दिन वाजिब होता है। और हद से आगे न बढ़ो, क्योंकि वह हद से आगे बढ़नेवालों को पसन्द नहीं करता
तफ़्सीर:
और अल्लाह ही है, जिसने बिना तने वाले बाग़ पैदा किए, जो धरती पर बिछे हुए होते हैं, और तनों वाले बाग़ पैदा किए, जो धरती से ऊपर उठे हुए होते हैं। तथा उसी ने खजूर के पेड़ पैदा किए। और उसी ने फसलों को पैदा किया, जिनके फल आकार एवं स्वाद में विभिन्न प्रकार के होते हैं। तथा उसी ने ज़ैतून और अनार पैदा किए, जिनके पत्ते एक जैसे होते हैं, लेकिन फलों का स्वाद अलग-अलग होता है। (ऐ लोगो!) जब वह फल दे, तो उसका फल खाओ और उसकी कटाई के दिन उसकी ज़कात अदा करो। और खाने तथा खर्च करने के मामले में शरीयत की सीमाओं का उल्लंघन न करो। क्योंकि अल्लाह उन लोगों से प्यार नहीं करता जो उनमें या उनके अलावा में उसकी सीमाओं का उल्लंघन करने वाले हैं, बल्कि उनसे नफ़रत करता है। निश्चय जिसने इन सारी चीज़ों को पैदा किया, उसी ने उन्हें अपने बंदों के लिए अनुमेय किया है। अतः बहुदेववादियों को उन्हें हराम ठहराने का कोई अधिकार नहीं है।
आयत 142
وَمِنَ ٱلْأَنْعَـٰمِ حَمُولَةًۭ وَفَرْشًۭا ۚ كُلُوا۟ مِمَّا رَزَقَكُمُ ٱللَّهُ وَلَا تَتَّبِعُوا۟ خُطُوَٰتِ ٱلشَّيْطَـٰنِ ۚ إِنَّهُۥ لَكُمْ عَدُوٌّۭ مُّبِينٌۭ
وَمِنَ
And of
ٱلْأَنْعَـٰمِ
और मवेशियों में से हैं
حَمُولَةًۭ
कुछ बोझ उठाने वाले
وَفَرْشًۭا ۚ
और कुछ ज़मीन से लगे हुए
كُلُوا۟
खाओ
مِمَّا
उसमें से जो
رَزَقَكُمُ
रिज़्क़ दिया तुम्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
وَلَا
और ना
تَتَّبِعُوا۟
तुम पैरवी करो
خُطُوَٰتِ
क़दमों की
ٱلشَّيْطَـٰنِ ۚ
शैतान के
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
عَدُوٌّۭ
दुश्मन है
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
और चौपायों में से कुछ बोझ उठानेवाले बड़े और कुछ छोटे जानवर पैदा किए। अल्लाह ने जो कुछ तुम्हें दिया है, उसमें से खाओ और शैतान के क़दमों पर न चलो। निश्चय ही वह तुम्हारा खुला हुआ शत्रु है
तफ़्सीर:
उसी ने तुम्हारे लिए कुछ ऐसे जानवर पैदा किए, जो सामान लादे जाने के लिए उपयुक्त हैं, जैसे बड़े ऊँट, तथा कुछ ऐसे जानवर पैदा किए, जो उसके लिए उपयुक्त नहीं हैं, जैसे छोटे ऊँट और भेड़-बकरियाँ। (ऐ लोगो!) अल्लाह की दी हुई इन चीज़ों में से उन वस्तुओं को खाओ जो उसने तुम्हारे लिए हलाल की हैं, तथा हराम चीज़ों को हलाल करने एवं हलाल चीज़ों को हराम ठहराने के विषय में शैतान के चरणों का पालन न करो, जैसा कि बहुदेववादी करते हैं। निश्चय शैतान - ऐ लोगो! - तुम्हारा स्पष्ट दुश्मनी वाला दुश्मन है। क्योंकि वह चाहता है कि तुम इस तरह करके अल्लाह की अवज्ञा करो।
आयत 143
ثَمَـٰنِيَةَ أَزْوَٰجٍۢ ۖ مِّنَ ٱلضَّأْنِ ٱثْنَيْنِ وَمِنَ ٱلْمَعْزِ ٱثْنَيْنِ ۗ قُلْ ءَآلذَّكَرَيْنِ حَرَّمَ أَمِ ٱلْأُنثَيَيْنِ أَمَّا ٱشْتَمَلَتْ عَلَيْهِ أَرْحَامُ ٱلْأُنثَيَيْنِ ۖ نَبِّـُٔونِى بِعِلْمٍ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
ثَمَـٰنِيَةَ
आठ
أَزْوَٰجٍۢ ۖ
क़िस्में हैं
مِّنَ
of
ٱلضَّأْنِ
भेड़ में से
ٱثْنَيْنِ
दो
وَمِنَ
and of
ٱلْمَعْزِ
और बकरी में से
ٱثْنَيْنِ ۗ
दो
قُلْ
कह दीजिए
ءَآلذَّكَرَيْنِ
क्या दो नर
حَرَّمَ
उसने हराम किए
أَمِ
या
ٱلْأُنثَيَيْنِ
दो मादा
أَمَّا
या वो जो
ٱشْتَمَلَتْ
मुश्तमिल हैं
عَلَيْهِ
उस पर
أَرْحَامُ
रहम
ٱلْأُنثَيَيْنِ ۖ
दोनों मादा के
نَبِّـُٔونِى
बताओ मुझे
بِعِلْمٍ
साथ इल्म के
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
आठ नर-मादा पैदा किए - दो भेड़ की जाति से और दो बकरी की जाति से - कहो, "क्या उसने दोनों नर हराम किए है या दोनों मादा को? या उसको जो इन दोनों मादा के पेट में हो? किसी ज्ञान के आधार पर मुझे बताओ, यदि तुम सच्चे हो।"
तफ़्सीर:
उसने तुम्हारे लिए पशुओं के आठ प्रकार पैदा किए; भेड़ में से दो : एक नर और एक मादा, तथा बकरी में से दो। (ऐ रसूल!) बहुदेववादियों से पूछें : क्या अल्लाह ने उन दोनों में से नर को उनके नर होने के कारण हराम किया है? यदि वे जवाब दें : हाँ, तो उनसे कहें : फिर तुम मादाओं को क्यों हराम कहते हो? या कि उसने मादाओं को स्त्रीत्व के कारण हराम किया है? यदि वे कहें : हाँ, तो आप उनसे कहें : फिर तुम नरों को क्यों हराम ठहराते हो? या कि उसने दोनों मादाओं के गर्भ में जो कुछ है इस कारण हराम किया है कि वह गर्भ में है? यदि वे कहें : हाँ, तो आप उनसे कहें : तुम कभी नर को हराम ठहराकर और कभी मादा को हराम करके गर्भ में जो कुछ है उसके बीच अंतर क्यों करते हो? ऐ बहुदेववादियो! यदि तुम अपने इस दावे में सच्चे हो कि इसका निषेध अल्लाह की ओर से है, तो मुझे उस सच्चे ज्ञान के बारे में बताओ, जिसे तुम अपना आधार बनाते हो।
आयत 144
وَمِنَ ٱلْإِبِلِ ٱثْنَيْنِ وَمِنَ ٱلْبَقَرِ ٱثْنَيْنِ ۗ قُلْ ءَآلذَّكَرَيْنِ حَرَّمَ أَمِ ٱلْأُنثَيَيْنِ أَمَّا ٱشْتَمَلَتْ عَلَيْهِ أَرْحَامُ ٱلْأُنثَيَيْنِ ۖ أَمْ كُنتُمْ شُهَدَآءَ إِذْ وَصَّىٰكُمُ ٱللَّهُ بِهَـٰذَا ۚ فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًۭا لِّيُضِلَّ ٱلنَّاسَ بِغَيْرِ عِلْمٍ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلظَّـٰلِمِينَ
وَمِنَ
And of
ٱلْإِبِلِ
और ऊँट में से
ٱثْنَيْنِ
दो
وَمِنَ
and of
ٱلْبَقَرِ
और गाय में से
ٱثْنَيْنِ ۗ
दो
قُلْ
कह दीजिए
ءَآلذَّكَرَيْنِ
क्या दो नर
حَرَّمَ
उसने हराम किए
أَمِ
या
ٱلْأُنثَيَيْنِ
दो मादा
أَمَّا
या वो जो
ٱشْتَمَلَتْ
मुश्तमिल हैं
عَلَيْهِ
जिस पर
أَرْحَامُ
रहम
ٱلْأُنثَيَيْنِ ۖ
दोनों मादा के
أَمْ
या
كُنتُمْ
थे तुम
شُهَدَآءَ
गवाह
إِذْ
जब
وَصَّىٰكُمُ
ताकीद की तुम्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
بِهَـٰذَا ۚ
उसकी
فَمَنْ
तो कौन
أَظْلَمُ
बड़ा ज़ालिम है
مِمَّنِ
उस से जो
ٱفْتَرَىٰ
गढ़ ले
عَلَى
against
ٱللَّهِ
अल्लाह पर
كَذِبًۭا
झूठ
لِّيُضِلَّ
ताकि वो भटका दे
ٱلنَّاسَ
लोगों को
بِغَيْرِ
बग़ैर
عِلْمٍ ۗ
इल्म के
إِنَّ
बेशक वो
ٱللَّهَ
अल्लाह
لَا
(does) not
يَهْدِى
नही वो हिदायत देता
ٱلْقَوْمَ
उन लोगों को
ٱلظَّـٰلِمِينَ
जो ज़ालिम हैं
और दो ऊँट की जाति से और दो गाय की जाति से, कहो, "क्या उसने दोनों नर हराम किए है या दोनों मादा को? या उसको जो इन दोनों मादा के पेट में हो? या, तुम उपस्थित थे, जब अल्लाह ने तुम्हें इसका आदेश दिया था? फिर उस व्यक्ति से बढ़कर अत्याचारी कौन होगा जो लोगों को पथभ्रष्ट करने के लिए अज्ञानता-पूर्वक अल्लाह पर झूठ घड़े? निश्चय ही, अल्लाह अत्याचारी लोगों को मार्ग नहीं दिखाता।"
तफ़्सीर:
आठ प्रकार के पशुओं में से शेष इस तरह हैं : ऊँटों के दो प्रकार और गायों के दो प्रकार। (ऐ रसूल!) बहुदेववादियों से पूछें : अल्लाह ने इनमें से जिसे हराम ठहराया है, क्या उसे नर होने के कारण या मादा होने के कारण या फिर गर्भ में होने के कारण हराम क्या है? (ऐ बहुदेववादियो!) क्या तुम (अपने दावे के अनुसार) उस समय उपस्थित थे जब अल्लाह ने तुम्हारे इन हराम ठहराए हुए जानवरों को हराम ठहराने की तुम्हें ताकीद की थी?! अतः उससे बड़ा अत्याचारी और उससे बड़ा अपराधी कोई नहीं, जिसने अल्लाह पर झूठा आरोप लगाया और उसकी ओर उस चीज़ को हराम करने का काम मनसूब किया, जिसे उसने हराम नहीं किया; उसने ऐसा इसलिए किया ताकि लोगों को बिना किसी ज्ञान के सीधे रास्ते से भटका दे। निश्चय अल्लाह उन ज़ालिमों को मार्गदर्शन की तौफ़ीक़ प्रदान नहीं करता, जो अल्लाह पर झूठा आरोप लगाते हैं।
आयत 145
قُل لَّآ أَجِدُ فِى مَآ أُوحِىَ إِلَىَّ مُحَرَّمًا عَلَىٰ طَاعِمٍۢ يَطْعَمُهُۥٓ إِلَّآ أَن يَكُونَ مَيْتَةً أَوْ دَمًۭا مَّسْفُوحًا أَوْ لَحْمَ خِنزِيرٍۢ فَإِنَّهُۥ رِجْسٌ أَوْ فِسْقًا أُهِلَّ لِغَيْرِ ٱللَّهِ بِهِۦ ۚ فَمَنِ ٱضْطُرَّ غَيْرَ بَاغٍۢ وَلَا عَادٍۢ فَإِنَّ رَبَّكَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
قُل
कह दीजिए
لَّآ
Not
أَجِدُ
नही मैं पाता
فِى
in
مَآ
उससे जो
أُوحِىَ
वही की गई
إِلَىَّ
मेरी तरफ़
مُحَرَّمًا
हराम की गई (कोई चीज़)
عَلَىٰ
to
طَاعِمٍۢ
किसी खाने वाले पर
يَطْعَمُهُۥٓ
जिसे वो खाए
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
يَكُونَ
वो हो
مَيْتَةً
मुरदार
أَوْ
या
دَمًۭا
ख़ून
مَّسْفُوحًا
बहाया हुआ
أَوْ
या
لَحْمَ
गोश्त
خِنزِيرٍۢ
ख़िन्ज़ीर का
فَإِنَّهُۥ
तो बेशक वो
رِجْسٌ
नापाक है
أَوْ
या (हो वो)
فِسْقًا
नाफ़रमानी
أُهِلَّ
कि पुकारा गया
لِغَيْرِ
वास्ते ग़ैर
ٱللَّهِ
अल्लाह के
بِهِۦ ۚ
जिसे
فَمَنِ
तो जो कोई
ٱضْطُرَّ
मजबूर किया गया
غَيْرَ
ना
بَاغٍۢ
सरकशी करने वाला है
وَلَا
और ना
عَادٍۢ
हद से बढ़ने वाला
فَإِنَّ
तो बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
कह दो, "जो कुछ मेरी ओर प्रकाशना की गई है, उसमें तो मैं नहीं पाता कि किसी खानेवाले पर उसका कोई खाना हराम किया गया हो, सिवाय इसके लिए वह मुरदार हो, यह बहता हुआ रक्त हो या ,सुअर का मांस हो - कि वह निश्चय ही नापाक है - या वह चीज़ जो मर्यादा से हटी हुई हो, जिसपर अल्लाह के अतिरिक्त किसी और का नाम लिया गया हो। इसपर भी जो बहुत विवश और लाचार हो जाए; परन्तु वह अवज्ञाकारी न हो और न हद से आगे बढ़नेवाला हो, तो निश्चय ही तुम्हारा रब अत्यन्त क्षमाशील, दयाबान है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दें कि अल्लाह ने मुझपर जो वह़्य उतारी है, उसमें जिन हराम (निषिद्ध) वस्तुओं का उल्लेख है, वे केवल यह हैं : वह हलाल जानवर जो ज़बह किए बिना मर जाए, बहता खून, सूअर का मांस कि वह अशुद्ध और निषिद्ध है, वह जानवर जिसे अल्लाह के नाम के अलावा पर ज़बह किया गया हो, जैसेकि वह जानवर जिसे उनकी मूर्तियों के नाम पर ज़बह किया गया हो। परंतु जो व्यक्ति सख़्त भूख के कारण इन हराम चीज़ों मे से खाने के लिए मजबूर हो जाए, जबकि उसका उद्देश्य उन्हें खाने का आनंद लेना न हो तथा ज़रूरत से अधिक न खाए, तो इसमें उस पर कोई पाप नहीं है। निःसंदेह (ऐ रसूल!) आपका पालनहार मजबूर को क्षमा करने वाला है, यदि वह इनमें से खा ले, तथा उसपर दयालु है।
आयत 146
وَعَلَى ٱلَّذِينَ هَادُوا۟ حَرَّمْنَا كُلَّ ذِى ظُفُرٍۢ ۖ وَمِنَ ٱلْبَقَرِ وَٱلْغَنَمِ حَرَّمْنَا عَلَيْهِمْ شُحُومَهُمَآ إِلَّا مَا حَمَلَتْ ظُهُورُهُمَآ أَوِ ٱلْحَوَايَآ أَوْ مَا ٱخْتَلَطَ بِعَظْمٍۢ ۚ ذَٰلِكَ جَزَيْنَـٰهُم بِبَغْيِهِمْ ۖ وَإِنَّا لَصَـٰدِقُونَ
وَعَلَى
And to
ٱلَّذِينَ
और उन लोगों पर जो
هَادُوا۟
यहूदी बन गए
حَرَّمْنَا
हराम कर दिया हमने
كُلَّ
हर
ذِى
(animal) with
ظُفُرٍۢ ۖ
नाख़ून वाला (जानवर)
وَمِنَ
and of
ٱلْبَقَرِ
और गाय में से
وَٱلْغَنَمِ
और बकरी में से
حَرَّمْنَا
हराम की हमने
عَلَيْهِمْ
उन पर
شُحُومَهُمَآ
चरबियाँ इन दोनों की
إِلَّا
मगर
مَا
जो
حَمَلَتْ
उठाया हो
ظُهُورُهُمَآ
उन दोनों की पुश्तों ने
أَوِ
या
ٱلْحَوَايَآ
आँतों ने
أَوْ
या
مَا
जो
ٱخْتَلَطَ
मिल जाए
بِعَظْمٍۢ ۚ
साथ हड्डी के
ذَٰلِكَ
ये
جَزَيْنَـٰهُم
बदला दिया हमने उन्हें
بِبَغْيِهِمْ ۖ
बवजह उनकी सरकशी के
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَصَـٰدِقُونَ
अलबत्ता सच्चे हैं
और उन लोगों के लिए जो यहूदी हुए हमने नाख़ूनवाला जानवर हराम किया और गाय और बकरी में से इन दोनों की चरबियाँ उनके लिए हराम कर दी थीं, सिवाय उस (चर्बी) के जो उन दोनों की पीठों या आँखों से लगी हुई या हड़्डी से मिली हुई हो। यह बात ध्यान में रखो। हमने उन्हें उनकी सरकशी का बदला दिया था और निश्चय ही हम सच्चे है
तफ़्सीर:
और हमने यहूदियों पर उन तमाम जानवरों को हराम कर दिया था, जिनकी उंगलियाँ अलग-अलग न हों, जैसे ऊँट तथा शुतुरमुर्ग़ आदि। तथा हमने उनपर गाय और बकरी की चर्बी को भी हराम कर दिया था, सिवाय उसके जो उनकी पीठ या आँत से लगी हो, या जो हड्डियों के साथ मिश्रित हो, जैसे नितंब और पहलू की चर्बी। हमने उनके अत्याचार के बदले के तौर पर, इन चीज़ों को उनपर हराम किया था। निःसंदेह हम जो कुछ भी बताते हैं, निश्चय उसमें सच्चे हैं।
आयत 147
فَإِن كَذَّبُوكَ فَقُل رَّبُّكُمْ ذُو رَحْمَةٍۢ وَٰسِعَةٍۢ وَلَا يُرَدُّ بَأْسُهُۥ عَنِ ٱلْقَوْمِ ٱلْمُجْرِمِينَ
فَإِن
फिर अगर
كَذَّبُوكَ
वो झुठलाऐं आपको
فَقُل
तो कह दीजिए
رَّبُّكُمْ
रब तुम्हारा
ذُو
(is the) Possessor
رَحْمَةٍۢ
(of) Mercy
وَٰسِعَةٍۢ
वसीअ रहमत वाला है
وَلَا
और नहीं
يُرَدُّ
फेरा जा सकता
بَأْسُهُۥ
अज़ाब उसका
عَنِ
from
ٱلْقَوْمِ
उन लोगों से
ٱلْمُجْرِمِينَ
जो मुजरिम हैं
फिर यदि वे तुम्हें झुठलाएँ तो कह दो, "तुम्हारा रब व्यापक दयालुतावाला है और अपराधियों से उसकी यातना नहीं फिरती।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) यदि वे आपको झुठलाएँ और जो कुछ आप अपने रब के पास से लाए हैं, उसे न मानें, तो उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए कह दें : तुम्हारा पालनहार बहुत दयालु है, और तुम्हारे प्रति उसकी दया में से उसका तुम्हें मोहलत देना और तुम्हें सज़ा देने में जल्दी न करना है। तथा उन्हें डराते हुए कह दें : जो लोग अवज्ञा और कुकर्म करते हैं, उनसे उसकी यातना टलती नहीं है।
आयत 148
سَيَقُولُ ٱلَّذِينَ أَشْرَكُوا۟ لَوْ شَآءَ ٱللَّهُ مَآ أَشْرَكْنَا وَلَآ ءَابَآؤُنَا وَلَا حَرَّمْنَا مِن شَىْءٍۢ ۚ كَذَٰلِكَ كَذَّبَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ حَتَّىٰ ذَاقُوا۟ بَأْسَنَا ۗ قُلْ هَلْ عِندَكُم مِّنْ عِلْمٍۢ فَتُخْرِجُوهُ لَنَآ ۖ إِن تَتَّبِعُونَ إِلَّا ٱلظَّنَّ وَإِنْ أَنتُمْ إِلَّا تَخْرُصُونَ
سَيَقُولُ
अनक़रीब कहेंगे
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
أَشْرَكُوا۟
शिर्क किया
لَوْ
अगर
شَآءَ
चाहता
ٱللَّهُ
अल्लाह
مَآ
ना
أَشْرَكْنَا
शिर्क करते हम
وَلَآ
और ना
ءَابَآؤُنَا
आबा ओ अजदाद हमारे
وَلَا
और ना
حَرَّمْنَا
हराम करते हम
مِن
[of]
شَىْءٍۢ ۚ
कोई चीज़
كَذَٰلِكَ
इसी तरह
كَذَّبَ
झुठलाया
ٱلَّذِينَ
उन्होंने जो
مِن
(were from)
قَبْلِهِمْ
उनसे पहले थे
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
ذَاقُوا۟
उन्होंने चख लिया
بَأْسَنَا ۗ
अज़ाब हमारा
قُلْ
कह दीजिए
هَلْ
क्या है
عِندَكُم
पास तुम्हारे
مِّنْ
[of]
عِلْمٍۢ
कोई इल्म
فَتُخْرِجُوهُ
पस तुम निकालो उसे
لَنَآ ۖ
हमारे लिए
إِن
नहीं
تَتَّبِعُونَ
तुम पैरवी करते
إِلَّا
मगर
ٱلظَّنَّ
ज़न/गुमान की
وَإِنْ
और नहीं
أَنتُمْ
तुम
إِلَّا
मगर
تَخْرُصُونَ
तुम क़यास आराइयाँ करते
बहुदेववादी कहेंगे, "यदि अल्लाह चाहता तो न हम साझीदार ठहराते और न हमारे पूर्वज ही; और न हम किसी चीज़ को (बिना अल्लाह के आदेश के) हराम ठहराते।" ऐसे ही उनसे पहले के लोगों ने भी झुठलाया था, यहाँ तक की उन्हें हमारी यातना का मज़ा चखना पड़ा। कहो, "क्या तुम्हारे पास कोई ज्ञान है कि उसे हमारे पास पेश करो? तुम लोग केवल गुमान पर चलते हो और निरे अटकल से काम लेते हो।"
तफ़्सीर:
बहुदेववादी लोग, अल्लाह के साथ अपने साझी बनाने की वैधता पर, अल्लाह की इच्छा और उसकी तक़दीर (नियति) को प्रमाण बनाते हुए कहेंगे : यदि अल्लाह चाहता कि हम और हमारे पूर्वज अल्लाह के साथ साझी न बनाएँ, तो हम उसके साथ साझी न बनाते। और यदि अल्लाह चाहता कि हम उस चीज़ को हराम न ठहराएँ जो हमने अपने ऊपर हराम ठहराया है, तो हम उसे हराम न ठहराते। इन लोगों के अमान्य तर्क के समान ही के साथ, उन लोगों ने भी अपने रसूलों को झुठलाया जो इनसे पहले थे, उन्होंने कहा : यदि अल्लाह चाहता कि हम उन्हें न झुठलाएँ, तो हम उन्हें कभी न झुठलाते। तथा वे निरंतर इस इनकार पर बने रहे यहाँ तक कि उन्होंने हमारी उस यातना का स्वाद चख लिया जो हमने उनपर उतारी। (ऐ रसूल!) आप इन मुश्रिकों से कह दें : क्या तुम्हारे पास कोई सबूत है जो इंगित करता है कि अल्लाह तुमसे प्रसन्न है कि तुम उसके साथ साझी ठहराओ तथा उसके हराम किए हुए को हलाल ठहरा लो और उसके हलाल किए हुए को हराम ठहरा दो? क्योंकि मात्र तुमसे इसका होना, इस बात का प्रमाण नहीं है कि वह तुमसे संतुष्ट है। क्योंकि इस विषय में तुम केवल अनुमान का पालन करते हो, और अनुमान से सत्य का कुछ भी लाभ नहीं होता है, और तुम केवल झूठ बोलते हो।
आयत 149
قُلْ فَلِلَّهِ ٱلْحُجَّةُ ٱلْبَـٰلِغَةُ ۖ فَلَوْ شَآءَ لَهَدَىٰكُمْ أَجْمَعِينَ
قُلْ
कह दीजिए
فَلِلَّهِ
पस अल्लाह ही के लिए है
ٱلْحُجَّةُ
हुज्जत
ٱلْبَـٰلِغَةُ ۖ
पहुँचने वाली
فَلَوْ
फिर अगर
شَآءَ
वो चाहता
لَهَدَىٰكُمْ
अलबत्ता हिदायत दे देता तुम्हें
أَجْمَعِينَ
सबके-सबको
कह दो, "पूर्ण तर्क तो अल्लाह ही का है। अतः यदि वह चाहता तो तुम सबको सीधा मार्ग दिखा देता।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप मुश्रिकों से कह दें : यदि तुम्हारे पास इन कमज़ोर तर्कों के अलावा कोई तर्क नहीं है, तो (सुन लो कि) अल्लाह के पास निश्चित तर्क है जिस पर तुम्हारे द्वारा प्रस्तुत किए गए बहाने कट जाते हैं, और उसके द्वारा तुम्हारे संदेह जिनका तुम सहारा लेते हो निराकृत हो जाते हैं। अतः (ऐ बहुदेववादियो!) यदि अल्लाह तुम सभी को सत्य की तौफ़ीक़ देना चाहता, तो तुम सब को उसकी तौफ़ीक़ प्रदान कर देता।
आयत 150
قُلْ هَلُمَّ شُهَدَآءَكُمُ ٱلَّذِينَ يَشْهَدُونَ أَنَّ ٱللَّهَ حَرَّمَ هَـٰذَا ۖ فَإِن شَهِدُوا۟ فَلَا تَشْهَدْ مَعَهُمْ ۚ وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَآءَ ٱلَّذِينَ كَذَّبُوا۟ بِـَٔايَـٰتِنَا وَٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ وَهُم بِرَبِّهِمْ يَعْدِلُونَ
قُلْ
कह दीजिए
هَلُمَّ
हाज़िर करो
شُهَدَآءَكُمُ
अपने गवाहों को
ٱلَّذِينَ
उनको जो
يَشْهَدُونَ
गवाही देते हैं
أَنَّ
कि बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह ने
حَرَّمَ
हराम किया है
هَـٰذَا ۖ
उसे
فَإِن
फिर अगर
شَهِدُوا۟
वो गवाही दे दें
فَلَا
तो ना
تَشْهَدْ
आप गवाही दें
مَعَهُمْ ۚ
साथ उनके
وَلَا
और ना
تَتَّبِعْ
आप पैरवी करें
أَهْوَآءَ
ख़्वाहिशात की
ٱلَّذِينَ
उनकी जिन्होंने
كَذَّبُوا۟
झुठलाया
بِـَٔايَـٰتِنَا
हमारी आयात को
وَٱلَّذِينَ
और (ना) उनकी जो
لَا
(do) not
يُؤْمِنُونَ
नहीं वो ईमान लाते
بِٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत पर
وَهُم
और वो
بِرَبِّهِمْ
साथ अपने रब के
يَعْدِلُونَ
वो बराबर क़रार देते हैं
कह दो, "अपने उन गवाहों को लाओ, जो इसकी गवाही दें कि अल्लाह ने इसे हराम किया है।" फिर यदि वे गवाही दें तो तुम उनके साथ गवाही न देना, औऱ उन लोगों की इच्छाओं का अनुसरण न करना जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और जो आख़िरत को नहीं मानते और (जिनका) हाल यह है कि वे दूसरो को अपने रब के समकक्ष ठहराते है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) इन मुश्रिकों से, जो अल्लाह के हलाल किए हुए को हराम करते हैं और दावा करते हैं कि अल्लाह ही ने इसे हराम किया है, कह दें : तुम अपने गवाहों को प्रस्तुत करो, जो यह गवाही दें कि अल्लाह ने इन वस्तुओं को हराम किया है, जिन्हें तुमने हराम ठहरा लिया है। यदि वे बिना ज्ञान के गवाही दें कि अल्लाह ने उन्हें हराम किया है, तो (ऐ रसूल!) आप उनकी गवाही में उनको सच्चा न मानें; क्योंकि यह झूठी गवाही है। तथा आप उन लोगों की इच्छाओं का पालन न करें, जो अपनी इच्छाओं को ही निर्णायक मानते हैं। क्योंकि उन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया है जब उन्होंने उस चीज़ को हराम ठहरा दिया जिसे अल्लाह ने उनके लिए हलाल किया था। तथा आप उनका अनुसरण न करें, जो आख़िरत पर ईमान नहीं रखते और वे अपने रब के साथ साझी बनाते हैं। चुनाँचे उसके अलावा को उसके बराबर (समकक्ष) ठहराते हैं। और जिसका अपने पालनहार के साथ यह रवैया हो उसका अनुसरण कैसे किया जा सकता है?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
खेती और मवेशियों में फुज़ूल पाबंदियां लगाने की मज़म्मत है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह की दी नेमतों को अपनी मनमानी रस्मों से हराम-हलाल करना गलत है, हर फैसला अल्लाह के हुक्म के मुताबिक होना चाहिए।
आयत 151
۞ قُلْ تَعَالَوْا۟ أَتْلُ مَا حَرَّمَ رَبُّكُمْ عَلَيْكُمْ ۖ أَلَّا تُشْرِكُوا۟ بِهِۦ شَيْـًۭٔا ۖ وَبِٱلْوَٰلِدَيْنِ إِحْسَـٰنًۭا ۖ وَلَا تَقْتُلُوٓا۟ أَوْلَـٰدَكُم مِّنْ إِمْلَـٰقٍۢ ۖ نَّحْنُ نَرْزُقُكُمْ وَإِيَّاهُمْ ۖ وَلَا تَقْرَبُوا۟ ٱلْفَوَٰحِشَ مَا ظَهَرَ مِنْهَا وَمَا بَطَنَ ۖ وَلَا تَقْتُلُوا۟ ٱلنَّفْسَ ٱلَّتِى حَرَّمَ ٱللَّهُ إِلَّا بِٱلْحَقِّ ۚ ذَٰلِكُمْ وَصَّىٰكُم بِهِۦ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
۞ قُلْ
कह दीजिए
تَعَالَوْا۟
आओ
أَتْلُ
मैं पढ़ सुनाऊँ
مَا
जो
حَرَّمَ
हराम किया
رَبُّكُمْ
तुम्हारे रब ने
عَلَيْكُمْ ۖ
तुम पर
أَلَّا
कि ना
تُشْرِكُوا۟
तुम शरीक ठहराओ
بِهِۦ
साथ उसके
شَيْـًۭٔا ۖ
किसी चीज़ को
وَبِٱلْوَٰلِدَيْنِ
और साथ वालिदैन के
إِحْسَـٰنًۭا ۖ
एहसान करना
وَلَا
और ना
تَقْتُلُوٓا۟
तुम क़त्ल करो
أَوْلَـٰدَكُم
अपनी औलाद को
مِّنْ
(out) of
إِمْلَـٰقٍۢ ۖ
तंगदस्ती (के डर) से
نَّحْنُ
हम
نَرْزُقُكُمْ
हम रिज़्क़ देते हैं तुम्हें
وَإِيَّاهُمْ ۖ
और उन्हें भी
وَلَا
और ना
تَقْرَبُوا۟
तुम क़रीब जाओ
ٱلْفَوَٰحِشَ
बेहयाई के कामों के
مَا
जो
ظَهَرَ
ज़ाहिर हों
مِنْهَا
उनमें से
وَمَا
और जो
بَطَنَ ۖ
छुपे हों
وَلَا
और ना
تَقْتُلُوا۟
तुम क़त्ल करो
ٱلنَّفْسَ
उस जान को
ٱلَّتِى
वो जो
حَرَّمَ
हराम की
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
إِلَّا
मगर
بِٱلْحَقِّ ۚ
साथ हक़ के
ذَٰلِكُمْ
ये है
وَصَّىٰكُم
उसने ताकीद की है तुम्हें
بِهِۦ
जिसकी
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَعْقِلُونَ
अक़्ल से काम लो
कह दो, "आओ, मैं तुम्हें सुनाऊँ कि तुम्हारे रब ने तुम्हारे ऊपर क्या पाबन्दियाँ लगाई है: यह कि किसी चीज़ को उसका साझीदार न ठहराओ और माँ-बाप के साथ सद्व्य वहार करो और निर्धनता के कारण अपनी सन्तान की हत्या न करो; हम तुम्हें भी रोज़ी देते है और उन्हें भी। और अश्लील बातों के निकट न जाओ, चाहे वे खुली हुई हों या छिपी हुई हो। और किसी जीव की, जिसे अल्लाह ने आदरणीय ठहराया है, हत्या न करो। यह और बात है कि हक़ के लिए ऐसा करना पड़े। ये बाते है, जिनकी ताकीद उसने तुम्हें की है, शायद कि तुम बुद्धि से काम लो।
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) लोगों से कह दें : आओ, मैं तुम्हें पढ़कर सुनाऊँ कि अल्लाह ने क्या-क्या हराम किया है। अल्लाह ने तुमपर हराम किया है कि तुम उसकी सृष्टि में से किसी वस्तु को उसके साथ साझी बनाओ, और अपने माता-पिता की अवज्ञा करो। बल्कि तुमपर अनिवार्य है कि उनके साथ अच्छा व्यवहार करो। तथा उसने तुमपर हराम किया है कि तुम गरीबी के कारण अपनी संतानों की हत्या करो, जैसे जाहिलियत के युग में लोग किया करते थे। हम ही तुम्हें जीविका प्रदान करते हैं और उन्हें भी जीविका प्रदान करते हैं। तथा उसने निर्लज्जता (दुराचार) के निकट भी जाने को हराम किया है, चाहे वह खुली हो अथवा छिपी। और यह भी हराम किया है कि तुम उस प्राणी की हत्या करो, जिसकी हत्या करना अल्लाह ने हराम किया है, सिवाय इसके कि उसका कोई उचित कारण हो, जैसे कि शादीशुदा होने के बाद व्यभिचार, और इस्लाम के बाद धर्मत्याग। अल्लाह ने तुम्हें इन उक्त बातों की ताकीद की है, ताकि तुम अल्लाह के आदेशों और निषेधों को समझो।
आयत 152
وَلَا تَقْرَبُوا۟ مَالَ ٱلْيَتِيمِ إِلَّا بِٱلَّتِى هِىَ أَحْسَنُ حَتَّىٰ يَبْلُغَ أَشُدَّهُۥ ۖ وَأَوْفُوا۟ ٱلْكَيْلَ وَٱلْمِيزَانَ بِٱلْقِسْطِ ۖ لَا نُكَلِّفُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا ۖ وَإِذَا قُلْتُمْ فَٱعْدِلُوا۟ وَلَوْ كَانَ ذَا قُرْبَىٰ ۖ وَبِعَهْدِ ٱللَّهِ أَوْفُوا۟ ۚ ذَٰلِكُمْ وَصَّىٰكُم بِهِۦ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ
وَلَا
और ना
تَقْرَبُوا۟
तुम क़रीब जाओ
مَالَ
माले
ٱلْيَتِيمِ
यतीम के
إِلَّا
मगर
بِٱلَّتِى
साथ (उस तरीक़े के) जो
هِىَ
वो
أَحْسَنُ
अच्छा है
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
يَبْلُغَ
वो पहुँच जाए
أَشُدَّهُۥ ۖ
अपनी जवानी को
وَأَوْفُوا۟
और पूरा करो
ٱلْكَيْلَ
नाप
وَٱلْمِيزَانَ
और तौल को
بِٱلْقِسْطِ ۖ
साथ इन्साफ़ के
لَا
Not
نُكَلِّفُ
नहीं हम तकलीफ़ देते
نَفْسًا
किसी नफ़्स को
إِلَّا
मगर
وُسْعَهَا ۖ
उसकी वुसअत के मुताबिक़
وَإِذَا
और जब
قُلْتُمْ
बात करो तुम
فَٱعْدِلُوا۟
तो अदल करो
وَلَوْ
और अगरचे
كَانَ
हो वो
ذَا
(one of)
قُرْبَىٰ ۖ
क़रीबी रिश्तेदार
وَبِعَهْدِ
और अहद को
ٱللَّهِ
अल्लाह के
أَوْفُوا۟ ۚ
पूरा करो
ذَٰلِكُمْ
ये वो है
وَصَّىٰكُم
उसने ताकीद की है तुम्हें
بِهِۦ
जिसकी
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ो
"और अनाथ के धन को हाथ न लगाओ, किन्तु ऐसे तरीक़े से जो उत्तम हो, यहाँ तक कि वह अपनी युवावस्था को पहुँच जाए। और इनसाफ़ के साथ पूरा-पूरा नापो और तौलो। हम किसी व्यक्ति पर उसी काम की ज़िम्मेदारी का बोझ डालते हैं जो उसकी सामर्थ्य में हो। और जब बात कहो, तो न्याय की कहो, चाहे मामला अपने नातेदार ही का क्यों न हो, और अल्लाह की प्रतिज्ञा को पूरा करो। ये बातें हैं, जिनकी उसने तुम्हें ताकीद की है। आशा है तुम ध्यान रखोगे
तफ़्सीर:
तथा उसने यतीम (जिसने व्यस्क होने से पहले अपने पिता को खो दिया हो) के माल में हाथ लगाने को हराम करार दिया है, सिवाय इसके कि ऐसा कुछ किया जाए जिसमें उसके लिए बेहतरी और लाभ तथा उसके धन में वृद्धि हो। यह निषेध उस समय तक है, जब तक कि वह व्यस्क न हो जाए तथा उसके अंदर परिपक्वता महसूस न की जाए। तथा उसने तुम्हारे लिए नाप-तौल में कमी करने को भी हराम किया है। अतः तुम्हें लेने और देने में तथा खरीदने-बेचने में न्याय से काम लेना चाहिए। हम किसी प्राणी पर उसकी क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालते। अतः नाप-तौल आदि में जिस (मा'मूली) कमी या बेशी से बचना संभव नहीं है, उसमें कोई पकड़ नहीं होगी। और उसने तुमपर, किसी रिश्तेदार या मित्र का पक्ष लेते हुए किसी समाचार या गवाही में ऐसी बात कहना हराम किया है, जो सत्य नहीं है। और यदि तुमने अल्लाह से या अल्लाह के नाम पर किसी से वादा किया हो, तो उसे तोड़ना भी तुमपर हराम है। बल्कि तुम्हारे लिए उसे पूरा करना अनिवार्य है। अल्लाह ने तुम्हें उक्त बातों का निश्चित रूप से पालन करने का आदेश दिया है, ताकि तुम अपने मामले के परिणाम को याद रखो।
आयत 153
وَأَنَّ هَـٰذَا صِرَٰطِى مُسْتَقِيمًۭا فَٱتَّبِعُوهُ ۖ وَلَا تَتَّبِعُوا۟ ٱلسُّبُلَ فَتَفَرَّقَ بِكُمْ عَن سَبِيلِهِۦ ۚ ذَٰلِكُمْ وَصَّىٰكُم بِهِۦ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ
وَأَنَّ
और बेशक
هَـٰذَا
ये
صِرَٰطِى
रास्ता है मेरा
مُسْتَقِيمًۭا
सीधा
فَٱتَّبِعُوهُ ۖ
पस पैरवी करो इसकी
وَلَا
और ना
تَتَّبِعُوا۟
तुम पैरवी करो
ٱلسُّبُلَ
रास्तों की
فَتَفَرَّقَ
पस वो जुदा कर देंगे
بِكُمْ
तुम्हें
عَن
from
سَبِيلِهِۦ ۚ
उसके रास्ते से
ذَٰلِكُمْ
ये है
وَصَّىٰكُم
उसने ताकीद की है तुम्हें
بِهِۦ
जिसकी
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تَتَّقُونَ
तुम तक़वा इख़्तियार करो
और यह कि यही मेरा सीधा मार्ग है, तो तुम इसी पर चलो और दूसरे मार्गों पर न चलो कि वे तुम्हें उसके मार्ग से हटाकर इधर-उधर कर देंगे। यह वह बात है जिसकी उसने तुम्हें ताकीद की है, ताकि तुम (पथभ्रष्ट ता से) बचो
तफ़्सीर:
तथा उसने तुम्हारे लिए गुमराही के रास्तों पर चलना हराम ठहराया है। बल्कि, तुम्हें अल्लाह के सीधे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए, जिसमें कोई टेढ़ापन नहीं है। गुमराही के रास्ते तुम्हें अलगाव और सत्य के मार्ग से दूरी की ओर ले जाते हैं। अल्लाह के सीधे मार्ग पर चलना ही है वह तथ्य है जिसकी अल्लाह ने तुम्हें ताकीद की है; ताकि तुम अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके एवं उसकी मना की हुई बातों से दूर रहकर, डरो।
आयत 154
ثُمَّ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَـٰبَ تَمَامًا عَلَى ٱلَّذِىٓ أَحْسَنَ وَتَفْصِيلًۭا لِّكُلِّ شَىْءٍۢ وَهُدًۭى وَرَحْمَةًۭ لَّعَلَّهُم بِلِقَآءِ رَبِّهِمْ يُؤْمِنُونَ
ثُمَّ
फिर
ءَاتَيْنَا
दी हमने
مُوسَى
मूसा को
ٱلْكِتَـٰبَ
किताब
تَمَامًا
पूरी करने के लिए (नेअमत)
عَلَى
on
ٱلَّذِىٓ
उस पर जिसने
أَحْسَنَ
नेकी की
وَتَفْصِيلًۭا
और खोल कर बयान करने के लिए
لِّكُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ को
وَهُدًۭى
और हिदायत
وَرَحْمَةًۭ
और रहमत है
لَّعَلَّهُم
ताकि वो
بِلِقَآءِ
मुलाक़ात पर
رَبِّهِمْ
अपने रब की
يُؤْمِنُونَ
वो ईमान लाऐं
फिर (देखो) हमने मूसा को किताब दी थी, (धर्म को) पूर्णता प्रदान करने के लिए, जिसे उसने उत्तम रीति से ग्रहण किया था; और हर चीज़ को स्पष्ट‍ रूप से बयान करने, मार्गदर्शन देने और दया करने के लिए, ताकि वे लोग अपने रब से मिलने पर ईमान लाएँ
तफ़्सीर:
फिर जो कुछ उल्लेख किया गया उससे सूचित करने के बाद, हम यह बताते हैं कि हमने मूसा को, उनके अच्छे काम के लिए बदला के रूप में अनुग्रह को पूरा करने के लिए, धर्म में उनकी ज़रूरत की हर चीज़ की व्याख्या के रूप में, तथा सच्चाई के सबूत और दया के रूप में, तौरात प्रदान की, इस उम्मीद में कि वे क़ियामत के दिन अपने पालनहार से मिलने पर ईमान लाएँ, ताकि वे नेक कामों के साथ उसके लिए तैयारी करें।
आयत 155
وَهَـٰذَا كِتَـٰبٌ أَنزَلْنَـٰهُ مُبَارَكٌۭ فَٱتَّبِعُوهُ وَٱتَّقُوا۟ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
وَهَـٰذَا
और ये
كِتَـٰبٌ
किताब
أَنزَلْنَـٰهُ
नाज़िल किया हमने इसे
مُبَارَكٌۭ
बाबरकत है
فَٱتَّبِعُوهُ
पस पैरवी करो इसकी
وَٱتَّقُوا۟
और तक़वा इख़्तियार करो
لَعَلَّكُمْ
ताकि तुम
تُرْحَمُونَ
तुम रहम किए जाओ
और यह किताब भी हमने उतारी है, जो बरकतवाली है; तो तुम इसका अनुसरण करो और डर रखो, ताकि तुमपर दया की जाए,
तफ़्सीर:
यह क़ुरआन एक महान किताब है, जिसे हमने अवतरित किया है, बड़ी बरकत वाली है। क्योंकि इसमें धार्मिक और सांसारिक लाभों का उल्लेख है। अतः जो कुछ उसमें अवतरित हुआ है, उसका पालन करो और उसका उल्लंघन करने से सावधान रहो, इस आशा से कि तुम पर दया की जाए।
आयत 156
أَن تَقُولُوٓا۟ إِنَّمَآ أُنزِلَ ٱلْكِتَـٰبُ عَلَىٰ طَآئِفَتَيْنِ مِن قَبْلِنَا وَإِن كُنَّا عَن دِرَاسَتِهِمْ لَغَـٰفِلِينَ
أَن
ताकि
تَقُولُوٓا۟
तुम कहो (ना)
إِنَّمَآ
बेशक
أُنزِلَ
नाज़िल की गई
ٱلْكِتَـٰبُ
किताब
عَلَىٰ
on
طَآئِفَتَيْنِ
ऊपर दो गिरोहों के
مِن
from
قَبْلِنَا
हम से पहले
وَإِن
और बेशक
كُنَّا
थे हम
عَن
about
دِرَاسَتِهِمْ
पढ़ने पढ़ाने से उनके
لَغَـٰفِلِينَ
अलबत्ता ग़ाफिल
कि कहीं ऐसा न हो कि तुम कहने लगो, "किताब तो केवल हमसे पहले के दो गिरोहों पर उतारी गई थी और हमें तो उनके पढ़ने-पढ़ाने की ख़बर तक न थी।"
तफ़्सीर:
ऐसा न हो कि (ऐ अरब के बहुदेववादियो!) तुम कहो : अल्लाह ने तौरात और इंजील तो हमसे पहले यहूदियों और ईसाइयों पर उतारी थी, और उसने हमपर कोई किताब नहीं उतारी। तथा हम उनकी किताबें पढ़ना नहीं जानते। क्योंकि वे उनकी भाषा में हैं, हमारी भाषा में नहीं हैं।
आयत 157
أَوْ تَقُولُوا۟ لَوْ أَنَّآ أُنزِلَ عَلَيْنَا ٱلْكِتَـٰبُ لَكُنَّآ أَهْدَىٰ مِنْهُمْ ۚ فَقَدْ جَآءَكُم بَيِّنَةٌۭ مِّن رَّبِّكُمْ وَهُدًۭى وَرَحْمَةٌۭ ۚ فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّن كَذَّبَ بِـَٔايَـٰتِ ٱللَّهِ وَصَدَفَ عَنْهَا ۗ سَنَجْزِى ٱلَّذِينَ يَصْدِفُونَ عَنْ ءَايَـٰتِنَا سُوٓءَ ٱلْعَذَابِ بِمَا كَانُوا۟ يَصْدِفُونَ
أَوْ
या
تَقُولُوا۟
तुम कहो
لَوْ
अगर
أَنَّآ
बेशक हम
أُنزِلَ
नाज़िल की जाती
عَلَيْنَا
हम पर
ٱلْكِتَـٰبُ
किताब
لَكُنَّآ
अलबत्ता होते हम
أَهْدَىٰ
ज़्यादा हिदायत याफ़्ता
مِنْهُمْ ۚ
उनसे
فَقَدْ
पस तहक़ीक़
جَآءَكُم
आ गई है तुम्हारे पास
بَيِّنَةٌۭ
खुली दलील
مِّن
from
رَّبِّكُمْ
तुम्हारे रब की तरफ़ से
وَهُدًۭى
और हिदायत
وَرَحْمَةٌۭ ۚ
और रहमत
فَمَنْ
तो कौन
أَظْلَمُ
बड़ा ज़ालिम है
مِمَّن
उससे जो
كَذَّبَ
झुठलाए
بِـَٔايَـٰتِ
[with] (the) Verses
ٱللَّهِ
अल्लाह की आयात को
وَصَدَفَ
और वो ऐराज़ करे
عَنْهَا ۗ
उनसे
سَنَجْزِى
अनक़रीब हम बदला देंगे
ٱلَّذِينَ
उनको जो
يَصْدِفُونَ
ऐराज़ करते हैं
عَنْ
from
ءَايَـٰتِنَا
हमारी आयात से
سُوٓءَ
बुरे
ٱلْعَذَابِ
अज़ाब का
بِمَا
बवजह उसके जो
كَانُوا۟
थे वो
يَصْدِفُونَ
वो ऐराज़ करते
या यह कहने लगो, "यदि हमपर किताब उतारी गई होती तो हम उनसे बढकर सीधे मार्ग पर होते।" तो अब तुम्हारे पास रब की ओर से एक स्पष्ट प्रमाण, मार्गदर्शन और दयालुता आ चुकी है। अब उससे बढ़कर अत्याचारी कौन होगा जो अल्लाह की आयतों को झुठलाए और दूसरों को उनसे फेरे? जो लोग हमारी आयतों से रोकते हैं, उन्हें हम इस रोकने के कारण जल्द बुरी यातना देंगे
तफ़्सीर:
तथा ऐसा न हो कि तुम कहो : यदि अल्लाह यहूदियों तथा ईसाइयों की तरह हमारे ऊपर भी कोई किताब उतारता, तो हम उनसे अधिक सीधे मार्ग पर चलने वाले होते!! तो अब तुम्हारे पास एक किताब आ चुकी है, जिसे अल्लाह ने तुम्हारे नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर तुम्हारी भाषा में अवतरित की है। यह किताब एक स्पष्ट तर्क, तथा सत्य की ओर मार्गदर्शन और उम्मत के लिए दया है। अतः तुम अनर्गल बहाने मत बनाओ और झूठे कारणों का सहारा न लो। उससे बड़ा अत्याचारी कोई नहीं, जो अल्लाह की आयतों को झुठलाए और उनसे मुँह फेर ले। शीघ्र ही हम उन लोगों को कड़ी सज़ा देंगे जो हमारी आयतों से मुँह फेर लेते हैं, उन्हें उनके मुँह मोड़ने के बदले के तौर पर जहन्नम की आग में दाखिल करके।
आयत 158
هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّآ أَن تَأْتِيَهُمُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ أَوْ يَأْتِىَ رَبُّكَ أَوْ يَأْتِىَ بَعْضُ ءَايَـٰتِ رَبِّكَ ۗ يَوْمَ يَأْتِى بَعْضُ ءَايَـٰتِ رَبِّكَ لَا يَنفَعُ نَفْسًا إِيمَـٰنُهَا لَمْ تَكُنْ ءَامَنَتْ مِن قَبْلُ أَوْ كَسَبَتْ فِىٓ إِيمَـٰنِهَا خَيْرًۭا ۗ قُلِ ٱنتَظِرُوٓا۟ إِنَّا مُنتَظِرُونَ
هَلْ
नहीं
يَنظُرُونَ
वो इन्तिज़ार करते
إِلَّآ
मगर
أَن
ये कि
تَأْتِيَهُمُ
आऐं उनके पास
ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ
फ़रिश्ते
أَوْ
या
يَأْتِىَ
आ जाए
رَبُّكَ
रब आपका
أَوْ
या
يَأْتِىَ
आ जाऐं
بَعْضُ
बाज़
ءَايَـٰتِ
आयात/निशानियाँ
رَبِّكَ ۗ
आपके रब की
يَوْمَ
जिस दिन
يَأْتِى
आ गईं
بَعْضُ
बाज़
ءَايَـٰتِ
आयात/निशानियाँ
رَبِّكَ
आपके रब की
لَا
not
يَنفَعُ
ना नफ़ा देगा
نَفْسًا
किसी नफ़्स को
إِيمَـٰنُهَا
ईमान उसका
لَمْ
नहीं (कि)
تَكُنْ
था वो
ءَامَنَتْ
ईमान लाया
مِن
from
قَبْلُ
उससे पहले
أَوْ
या
كَسَبَتْ
(नहीं) कमाई थी उसने
فِىٓ
through
إِيمَـٰنِهَا
अपने ईमान में
خَيْرًۭا ۗ
कोई भलाई/नेकी
قُلِ
कह दीजिए
ٱنتَظِرُوٓا۟
इन्तिज़ार करो
إِنَّا
बेशक हम भी
مُنتَظِرُونَ
इन्तिज़ार करने वाले हैं
क्या ये लोग केवल इसी की प्रतीक्षा कर रहे है कि उनके पास फ़रिश्ते आ जाएँ या स्वयं तुम्हारा रब की कोई निशानी आ जाएगी, फिर किसी ऐसे व्यक्ति को उसका ईमान कुछ लाभ न पहुँचाएगा जो पहले ईमान न लाया हो या जिसने अपने ईमान में कोई भलाई न कमाई हो। कह दो, ?"तुम भी प्रतीक्षा करो, हम भी प्रतीक्षा करते है।"
तफ़्सीर:
ये झुठलाने वाले केवल इस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि मौत का फ़रिश्ता तथा उसके सहायक दुनिया में उनके प्राणों को निकालने के लिए उनके पास आ जाएँ, या आख़िरत में निर्णय के दिन आपका रब उनके बीच फैसला करने के लिए आ जाए, या क़ियामत का पता देने वाली तुम्हारे रब की कुछ निशानियाँ आ जाएँ। जिस दिन तुम्हारे रब की कोई निशानी आएगी (जैसे पश्चिम से सूरज का उगना) तो किसी काफ़िर को उसके ईमान लाने से कोई फायदा नहीं होगा, और न ही किसी मोमिन को, जिसने उससे पहले भलाई नहीं की, उसका अमल लाभ देगा। (ऐ रसूल!) आप इन झुठलाने वाले मुश्रिकों से कह दें : तुम इन चीज़ों में से एक की प्रतीक्षा करो, हम (भी) प्रतीक्षा करने वाले हैं।
आयत 159
إِنَّ ٱلَّذِينَ فَرَّقُوا۟ دِينَهُمْ وَكَانُوا۟ شِيَعًۭا لَّسْتَ مِنْهُمْ فِى شَىْءٍ ۚ إِنَّمَآ أَمْرُهُمْ إِلَى ٱللَّهِ ثُمَّ يُنَبِّئُهُم بِمَا كَانُوا۟ يَفْعَلُونَ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जिन्होंने
فَرَّقُوا۟
फिरक़ा-फ़िरक़ा कर दिया
دِينَهُمْ
अपने दीन को
وَكَانُوا۟
और हो गए वो
شِيَعًۭا
गिरोह-गिरोह
لَّسْتَ
नहीं आप
مِنْهُمْ
उनसे
فِى
in
شَىْءٍ ۚ
किसी चीज़ में
إِنَّمَآ
बेशक
أَمْرُهُمْ
मामला उनका
إِلَى
(is) with
ٱللَّهِ
तरफ़ अल्लाह के है
ثُمَّ
फिर
يُنَبِّئُهُم
वो बता देगा उन्हें
بِمَا
वो जो
كَانُوا۟
थे वो
يَفْعَلُونَ
वो करते
जिन लोगों ने अपने धर्म के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और स्वयं गिरोहों में बँट गए, तुम्हारा उनसे कोई सम्बन्ध नहीं। उनका मामला तो बस अल्लाह के हवाले है। फिर वह उन्हें बता देगा जो कुछ वे किया करते थे
तफ़्सीर:
जिन यहूदियों एवं ईसाइयों ने अपने धर्म के टुकड़े-टुकड़े कर लिए, चुनाँचे उन्होंने उसमें से कुछ को अपनाया और कुछ को छोड़ दिया तथा वे अलग-अलग संप्रदाय हो गए, उनसे (ऐ रसूल!) आपका कोई संबंध नहीं है। क्योंकि वे जिस पथभ्रष्टता में पड़े हुए हैं, आप उससे बरी हैं। आपका दायित्व केवल उन्हें सचेत करना है। उनका मामला तो अल्लाह ही के हवाले है। फिर वह क़ियामत के दिन उन्हें बताएगा कि वे दुनिया में क्या कर रहे थे और उन्हें उसपर बदला देगा।
आयत 160
مَن جَآءَ بِٱلْحَسَنَةِ فَلَهُۥ عَشْرُ أَمْثَالِهَا ۖ وَمَن جَآءَ بِٱلسَّيِّئَةِ فَلَا يُجْزَىٰٓ إِلَّا مِثْلَهَا وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
مَن
जो कोई
جَآءَ
लाया
بِٱلْحَسَنَةِ
नेकी को
فَلَهُۥ
तो उसके लिए
عَشْرُ
दस हैं
أَمْثَالِهَا ۖ
मिसल उसके
وَمَن
और जो कोई
جَآءَ
लाया
بِٱلسَّيِّئَةِ
बुराई को
فَلَا
तो ना
يُجْزَىٰٓ
वो बदला दिया जाएगा
إِلَّا
मगर
مِثْلَهَا
मानिन्द उसी के
وَهُمْ
और वो
لَا
will not
يُظْلَمُونَ
ना वो ज़ुल्म किए जाऐंगे
जो कोई अच्छा चरित्र लेकर आएगा उसे उसका दस गुना बदला मिलेगा और जो व्यक्ति बुरा चरित्र लेकर आएगा, उसे उसका बस उतना ही बदला मिलेगा, उनके साथ कोई अन्याय न होगा
तफ़्सीर:
जो मोमिन क़ियामत के दिन एक नेकी के साथ आएगा, अल्लाह उसकी एक नेकी को बढ़ाकर दस नेकियाँ कर देगा, परंतु जो एक पाप के साथ आएगा, उसे उसके पाप के समान ही सज़ा दी जाएगी, उससे ज़्यादा सज़ा नहीं दी जाएगी। तथा क़ियामत के दिन उनकी नेकियों का सवाब घटाकर, या उनके गुनाहों की सज़ा बढ़ाकर उनपर कोई अत्याचार नहीं किया जाएगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
इस हिस्से में दस बुनियादी नसीहतें (शिर्क से बचना, वालिदैन से नेकी, औलाद का कत्ल न करना, बेहयाई से दूरी, इंसाफ से तौलना वगैरह) दी गई हैं। यह हमें सिखाता है कि यह बुनियादी उसूल आज भी हर दौर के लिए रहनुमा हैं।
आयत 161
قُلْ إِنَّنِى هَدَىٰنِى رَبِّىٓ إِلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ دِينًۭا قِيَمًۭا مِّلَّةَ إِبْرَٰهِيمَ حَنِيفًۭا ۚ وَمَا كَانَ مِنَ ٱلْمُشْرِكِينَ
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّنِى
बेशक मैं
هَدَىٰنِى
हिदायत दी मुझे
رَبِّىٓ
मेरे रब ने
إِلَىٰ
to
صِرَٰطٍۢ
तरफ़ रास्ते
مُّسْتَقِيمٍۢ
सीधे के
دِينًۭا
दीन
قِيَمًۭا
दुरुस्त की
مِّلَّةَ
जो मिल्लत है
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम की
حَنِيفًۭا ۚ
जो यकसू था
وَمَا
और ना
كَانَ
था वो
مِنَ
from
ٱلْمُشْرِكِينَ
मुशरिकीन में से
कहो, "मेरे रब ने मुझे सीधा मार्ग दिखा दिया है, बिल्कुल ठीक धर्म, इबराहीम के पंथ की ओर जो सबसे कटकर एक (अल्लाह) का हो गया था और वह बहुदेववादियों में से न था।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) इन झुठलाने वाले मुश्रिकों से कह दें : मेरे रब ने मुझे एक सीधे मार्ग पर निर्देशित किया है, जो उस धर्म का मार्ग है जो दुनिया और आख़िरत के हितों पर आधारित है, और यही इबराहीम अलैहिस्सलाम का धर्म है जो सत्य की ओर झुके हुए थे और कभी भी मुश्रिकों में से नहीं थे।
आयत 162
قُلْ إِنَّ صَلَاتِى وَنُسُكِى وَمَحْيَاىَ وَمَمَاتِى لِلَّهِ رَبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّ
बेशक
صَلَاتِى
मेरी नमाज़
وَنُسُكِى
और मेरी क़ुर्बानी
وَمَحْيَاىَ
और मेरा जीना
وَمَمَاتِى
और मेरा मरना
لِلَّهِ
अल्लाह ही के लिए है
رَبِّ
जो रब है
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों का
कहो, "मेरी नमाज़ और मेरी क़ुरबानी और मेरा जीना और मेरा मरना सब अल्लाह के लिए है, जो सारे संसार का रब है
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप कह दें : निश्चय ही मेरी नमाज़, मेरा अल्लाह के लिए तथा उसके नाम पर जानवर ज़बह करना, मेरा जीवन तथा मेरी मृत्यु, सब कुछ केवल सारी सृष्टि के पालनहार अल्लाह के लिए है, किसी और का इसमें कोई हिस्सा नहीं है।
आयत 163
لَا شَرِيكَ لَهُۥ ۖ وَبِذَٰلِكَ أُمِرْتُ وَأَنَا۠ أَوَّلُ ٱلْمُسْلِمِينَ
لَا
No
شَرِيكَ
नहीं कोई शरीक
لَهُۥ ۖ
उसका
وَبِذَٰلِكَ
और इसी का
أُمِرْتُ
हुक्म दिया गया हूँ मैं
وَأَنَا۠
और मैं
أَوَّلُ
सबसे पहला हूँ
ٱلْمُسْلِمِينَ
मुसलमानों में
"उसका कोई साझी नहीं है। मुझे तो इसी का आदेश मिला है और सबसे पहला मुस्लिम (आज्ञाकारी) मैं हूँ।"
तफ़्सीर:
उस महिमावान अल्लाह का कोई साझी नहीं और न ही उसके सिवा कोई सत्य पूज्य है। इसी बहुदेववाद से पवित्र तौहीद (एकेश्वरवाद) का अल्लाह ने मुझे आदेश दिया है। तथा मैं उसके सामने आत्मसमर्पण करने वाला इस उम्मत का सबसे पहला व्यक्ति हूँ।
आयत 164
قُلْ أَغَيْرَ ٱللَّهِ أَبْغِى رَبًّۭا وَهُوَ رَبُّ كُلِّ شَىْءٍۢ ۚ وَلَا تَكْسِبُ كُلُّ نَفْسٍ إِلَّا عَلَيْهَا ۚ وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌۭ وِزْرَ أُخْرَىٰ ۚ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّكُم مَّرْجِعُكُمْ فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ فِيهِ تَخْتَلِفُونَ
قُلْ
कह दीजिए
أَغَيْرَ
क्या सिवाय
ٱللَّهِ
अल्लाह के
أَبْغِى
मैं तलाश करूँ
رَبًّۭا
कोई रब
وَهُوَ
हालाँकि वो
رَبُّ
रब है
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ ۚ
चीज़ का
وَلَا
और नहीं
تَكْسِبُ
कमाता
كُلُّ
every
نَفْسٍ
कोई नफ़्स
إِلَّا
मगर
عَلَيْهَا ۚ
उसी पर है (वबाल)
وَلَا
और नहीं
تَزِرُ
बोझ उठाएगी
وَازِرَةٌۭ
कोई बोझ उठाने वाली
وِزْرَ
बोझ
أُخْرَىٰ ۚ
दूसरी का
ثُمَّ
फिर
إِلَىٰ
to
رَبِّكُم
तरफ़ अपने रब के
مَّرْجِعُكُمْ
लौटना है तुम्हारा
فَيُنَبِّئُكُم
फिर वो बताएगा तुम्हें
بِمَا
वो जो
كُنتُمْ
थे तुम
فِيهِ
जिस में
تَخْتَلِفُونَ
तुम इख़्तिलाफ़ करते
कहो, "क्या मैं अल्लाह से भिन्न कोई और रब ढूढूँ, जबकि हर चीज़ का रब वही है!" और यह कि प्रत्येक व्यक्ति जो कुछ कमाता है, उसका फल वही भोगेगा; कोई बोझ उठानेवाला किसी दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा। फिर तुम्हें अपने रब की ओर लौटकर जाना है। उस समय वह तुम्हें बता देगा, जिसमें परस्पर तुम्हारा मतभेद और झगड़ा था
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) इन मुश्रिकों से कह दें : क्या मैं अल्लाह के अतिरिक्त कोई अन्य पालनहार तलाश करूँ, हालाँकि वह महिमावान हर चीज़ का पालनहार है?! वही उन पूज्यों का भी पालनहार है, जिनकी तुम उसके सिवा पूजा करते हो। तथा कोई निर्दोष व्यक्ति किसी दूसरे के गुनाह का बोझ नहीं उठाएगा। फिर क़ियामत के दिन तुम सब को केवल अपने पालनहार ही के पास लौटना है। तब वह तुम्हें धर्म के उन सारे विषयों के बारे में बताएगा, जिनको ले कर तुम मतभेद किया करते थे।
आयत 165
وَهُوَ ٱلَّذِى جَعَلَكُمْ خَلَـٰٓئِفَ ٱلْأَرْضِ وَرَفَعَ بَعْضَكُمْ فَوْقَ بَعْضٍۢ دَرَجَـٰتٍۢ لِّيَبْلُوَكُمْ فِى مَآ ءَاتَىٰكُمْ ۗ إِنَّ رَبَّكَ سَرِيعُ ٱلْعِقَابِ وَإِنَّهُۥ لَغَفُورٌۭ رَّحِيمٌۢ
وَهُوَ
और वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
جَعَلَكُمْ
बनाया तुम्हें
خَلَـٰٓئِفَ
जानशीन
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन का
وَرَفَعَ
और बुलन्द किया
بَعْضَكُمْ
तुम्हारे बाज़ को
فَوْقَ
ऊपर
بَعْضٍۢ
बाज़ के
دَرَجَـٰتٍۢ
दरजात में
لِّيَبْلُوَكُمْ
ताकि वो आज़माए तुम्हें
فِى
in
مَآ
उसमें जो
ءَاتَىٰكُمْ ۗ
उसने दिया तुम्हें
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
سَرِيعُ
जल्द देने वाला है
ٱلْعِقَابِ
सज़ा
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
لَغَفُورٌۭ
अलबत्ता बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۢ
बहुत रहम करने वाला है
वही है जिसने तुम्हें धरती में धरती में ख़लीफ़ा (अधिकारी, उत्ताराधिकारी) बनाया और तुममें से कुछ लोगों के दर्जे कुछ लोगों की अपेक्षा ऊँचे रखे, ताकि जो कुछ उसने तुमको दिया है उसमें वह तम्हारी ले। निस्संदेह तुम्हारा रब जल्द सज़ा देनेवाला है। और निश्चय ही वही बड़ा क्षमाशील, दयावान है
तफ़्सीर:
और अल्लाह ही है जिसने तुम्हें उन लोगों का उत्तराधिकारी बनाया जो धरती पर तुमसे पहले थे; ताकि तुम उसे आबाद करो। तथा उसने तुम में से कुछ को रचना और जीविका में दूसरों की अपेक्षा में ऊँचे दरजे प्रदान किए; ताकि जो कुछ उसने तुम्हें दिया है, उसमें तुम्हारी परीक्षा ले। निःसंदेह (ऐ रसूल!) आपका पालनहार बहुत शीघ्र दंड देने वाला है, क्योंकि हर आने वाली चीज़ क़रीब है। तथा वह अपने बंदों में से तौबा करने वाले को क्षमा करने वाला तथा उसपर दया करने वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
सूरह के इख्तिताम में साफ पैगाम है कि हमारी नमाज़, कुर्बानी, ज़िंदगी और मौत सब अल्लाह के लिए होनी चाहिए। यह सबक हमें सिखाता है कि यही असली तौहीद है — हर छोटे-बड़े काम को अल्लाह की रज़ा के लिए करना।
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