सूरह अल-मुमतहिना سورة الممتحنة
मदनी 13 आयतें
नाम का मतलब
इम्तिहान ली जाने वाली (हिजरत करके आई औरतों के ईमान की जांच से)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-मुम्तहिना में मुशरिकों से दोस्ती के मामले में एहतियात और हिजरत करके आई औरतों के ईमान का इम्तिहान लेने के अहकाम का ज़िक्र है।
फ़ज़ीलत / सार
यह सूरह मुसलमानों को दुश्मनों के साथ ताल्लुक़ात में समझदारी और अपने अकीदे की हिफाज़त की तालीम देती है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَتَّخِذُوا۟ عَدُوِّى وَعَدُوَّكُمْ أَوْلِيَآءَ تُلْقُونَ إِلَيْهِم بِٱلْمَوَدَّةِ وَقَدْ كَفَرُوا۟ بِمَا جَآءَكُم مِّنَ ٱلْحَقِّ يُخْرِجُونَ ٱلرَّسُولَ وَإِيَّاكُمْ ۙ أَن تُؤْمِنُوا۟ بِٱللَّهِ رَبِّكُمْ إِن كُنتُمْ خَرَجْتُمْ جِهَـٰدًۭا فِى سَبِيلِى وَٱبْتِغَآءَ مَرْضَاتِى ۚ تُسِرُّونَ إِلَيْهِم بِٱلْمَوَدَّةِ وَأَنَا۠ أَعْلَمُ بِمَآ أَخْفَيْتُمْ وَمَآ أَعْلَنتُمْ ۚ وَمَن يَفْعَلْهُ مِنكُمْ فَقَدْ ضَلَّ سَوَآءَ ٱلسَّبِيلِ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Do) not
تَتَّخِذُوا۟
ना तुम बनाओ
عَدُوِّى
मेरे दुश्मनों
وَعَدُوَّكُمْ
और अपने दुश्मनों क
أَوْلِيَآءَ
दोस्त
تُلْقُونَ
तुम डालते हो
إِلَيْهِم
तरफ़ उनके
بِٱلْمَوَدَّةِ
दोस्ती (का पैग़ाम)
وَقَدْ
हालाँकि तहक़ीक़
كَفَرُوا۟
उन्होंने इन्कार किया
بِمَا
उसका जो
جَآءَكُم
आया तुम्हारे पास
مِّنَ
of
ٱلْحَقِّ
हक़ में से
يُخْرِجُونَ
वो निकालते हैं
ٱلرَّسُولَ
रसूल को
وَإِيَّاكُمْ ۙ
और तुम्हें
أَن
कि
تُؤْمِنُوا۟
तुम ईमान लाए हो
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
رَبِّكُمْ
जो रब है तुम्हारा
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
خَرَجْتُمْ
निकले तुम
جِهَـٰدًۭا
जिहाद के लिए
فِى
in
سَبِيلِى
मेरे रास्ते में
وَٱبْتِغَآءَ
और चाहने को
مَرْضَاتِى ۚ
रज़ामन्दी मेरी
تُسِرُّونَ
तुम छुपा कर भेजते हो
إِلَيْهِم
तरफ़ उनके
بِٱلْمَوَدَّةِ
दोस्ती (का पैग़ाम)
وَأَنَا۠
और मैं
أَعْلَمُ
ख़ूब जानता हूँ
بِمَآ
उसे जो
أَخْفَيْتُمْ
छुपाया तुमने
وَمَآ
और जो
أَعْلَنتُمْ ۚ
ज़ाहिर किया तुमने
وَمَن
और जो कोई
يَفْعَلْهُ
करेगा उसे
مِنكُمْ
तुम में से
فَقَدْ
तो तहक़ीक़
ضَلَّ
वो भटक गया
سَوَآءَ
सीधे
ٱلسَّبِيلِ
रास्ते से
ऐ ईमान लानेवालो! यदि तुम मेरे मार्ग में जिहाद के लिए और मेरी प्रसन्नता की तलाश में निकले हो तो मेरे शत्रुओं और अपने शत्रुओं को मित्र न बनाओ कि उनके प्रति प्रेम दिखाओं, जबकि तुम्हारे पास जो सत्य आया है उसका वे इनकार कर चुके है। वे रसूल को और तुम्हें इसलिए निर्वासित करते है कि तुम अपने रब - अल्लाह पर ईमान लाए हो। तुम गुप्त रूप से उनसे मित्रता की बातें करते हो। हालाँकि मैं भली-भाँति जानता हूँ जो कुछ तुम छिपाते हो और व्यक्त करते हो। और जो कोई भी तुममें से भटक गया
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो! मेरे दुश्मनों और अपने दुश्मनों को दोस्त न बनाओ कि उनसे मित्रता रखो और उनके प्रति प्रेम दिखाओं, जबकि उन्होंने उस धर्म का इनकार किया है, जो तुम्हारे नबी के द्वारा तुम्हारे पास आया है। वे रसूल को उनके घर से निकालते हैं तथा तुम्हें भी मक्का में तुम्हारे घरों से निकालते हैं। वे तुम्हारे बारे में रिश्ते-नाते का तनिक भी ख़याल नहीं करते। ऐसा केवल इस कारण करते हैं कि तुम अपने पालनहार अल्लाह पर ईमान ले आए हो। यदि तुम मेरे रास्ते में जिहाद के लिए और मेरी प्रसन्नता तलाश करने के लिए निकले हो, तो ऐसा न करो। तुम उनके प्रति स्नेह के तौर पर उन्हें गुप्त रूप से मुसलमानों की सूचनाएँ प्रदान करते हो, जबकि मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तुमने उसमें से क्या छुपाया है और क्या प्रकट किया है। मुझसे उसमें से या किसी और चीज़ में से कुछ भी छिपा नहीं है। और जो कोई भी काफिरों के प्रति दोस्ती और स्नेह का व्यवहार करेगा, तो वह सीधे रास्ते से हट गया, सत्य मार्ग से भटक गया और यथार्थ से अलग हो गया।
आयत 2
إِن يَثْقَفُوكُمْ يَكُونُوا۟ لَكُمْ أَعْدَآءًۭ وَيَبْسُطُوٓا۟ إِلَيْكُمْ أَيْدِيَهُمْ وَأَلْسِنَتَهُم بِٱلسُّوٓءِ وَوَدُّوا۟ لَوْ تَكْفُرُونَ
إِن
अगर
يَثْقَفُوكُمْ
वो पा लें तुम्हें
يَكُونُوا۟
होंगे वो
لَكُمْ
तुम्हारे
أَعْدَآءًۭ
दुश्मन
وَيَبْسُطُوٓا۟
और वो दराज़ करेंगे
إِلَيْكُمْ
तरफ़ तुम्हारे
أَيْدِيَهُمْ
हाथ अपने
وَأَلْسِنَتَهُم
और ज़बानें अपनी
بِٱلسُّوٓءِ
साथ बुराई के
وَوَدُّوا۟
और वो चाहेंगे
لَوْ
काश
تَكْفُرُونَ
तुम कुफ़्र करो
यदि वे तुम्हें पा जाएँ तो तुम्हारे शत्रु हो जाएँ और कष्ट पहुँचाने के लिए तुमपर हाथ और ज़बान चलाएँ। वे तो चाहते है कि काश! तुम भी इनकार करनेवाले हो जाओ
तफ़्सीर:
यदि वे तुम्हें (कहीं) पा जाएँ, तो अपने दिलों में छिपाई हुई दुश्मनी का प्रदर्शन करेंगे, और कष्ट पहुँचाने तथा मार पीट करने के लिए तुम्हारी ओर अपने हाथ बढ़ाएँगे, और गाली-गलौज करने तथा बुरा-भला कहने के लिए अपनी ज़बानों को आज़ाद छोड़ देंगे, और इस बात की कामना करेंगे कि काश तुम भी अल्लाह और उसके रसूल का इनकार करके उनके जैसे हो जाओ।
आयत 3
لَن تَنفَعَكُمْ أَرْحَامُكُمْ وَلَآ أَوْلَـٰدُكُمْ ۚ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ يَفْصِلُ بَيْنَكُمْ ۚ وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌۭ
لَن
हरगिज़ नहीं
تَنفَعَكُمْ
फ़ायदा देंगी तुम्हें
أَرْحَامُكُمْ
रिश्तेदारियाँ तुम्हारी
وَلَآ
और ना
أَوْلَـٰدُكُمْ ۚ
औलाद तुम्हारी
يَوْمَ
दिन
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़यामत के
يَفْصِلُ
वो फ़ैसला करेगा
بَيْنَكُمْ ۚ
दर्मियान तुम्हारे
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
بِمَا
उस जो
تَعْمَلُونَ
तुम अमल करते हो
بَصِيرٌۭ
ख़ूब देखने वाला है
क़ियामत के दिन तुम्हारी नातेदारियाँ कदापि तुम्हें लाभ न पहुँचाएँगी और न तुम्हारी सन्तान ही। उस दिन वह (अल्लाह) तुम्हारे बीच जुदाई डाल देगा। जो कुछ भी तुम करते हो अल्लाह उसे देख रहा होता है
तफ़्सीर:
तुम्हारे रिश्तेदार और तुम्हारे बच्चे तुम्हें कदापि कोई लाभ नहीं देंगे, अगर तुमने उनकी खातिर काफिरों से दोस्ती रखी। क़ियामत के दिन अल्लाह तुम्हारे बीच जुदाई डाल देगा। चुनाँचे जन्नती लोग जन्नत में प्रवेश करेंगे और जहन्नमी लोग जहन्नम में। अतः तुम एक-दूसरे को लाभ नहीं पहुँचा सकोगे और अल्लाह तुम्हारे कर्मों को देख रहा है। उससे तुम्हारा कोई काम छिपा नहीं है और वह तुम्हें उनका बदला देगा।
आयत 4
قَدْ كَانَتْ لَكُمْ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌۭ فِىٓ إِبْرَٰهِيمَ وَٱلَّذِينَ مَعَهُۥٓ إِذْ قَالُوا۟ لِقَوْمِهِمْ إِنَّا بُرَءَٰٓؤُا۟ مِنكُمْ وَمِمَّا تَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ كَفَرْنَا بِكُمْ وَبَدَا بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمُ ٱلْعَدَٰوَةُ وَٱلْبَغْضَآءُ أَبَدًا حَتَّىٰ تُؤْمِنُوا۟ بِٱللَّهِ وَحْدَهُۥٓ إِلَّا قَوْلَ إِبْرَٰهِيمَ لِأَبِيهِ لَأَسْتَغْفِرَنَّ لَكَ وَمَآ أَمْلِكُ لَكَ مِنَ ٱللَّهِ مِن شَىْءٍۢ ۖ رَّبَّنَا عَلَيْكَ تَوَكَّلْنَا وَإِلَيْكَ أَنَبْنَا وَإِلَيْكَ ٱلْمَصِيرُ
قَدْ
तहक़ीक़
كَانَتْ
है
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
أُسْوَةٌ
नमूना
حَسَنَةٌۭ
अच्छा
فِىٓ
in
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम में
وَٱلَّذِينَ
और उन लोगों में जो
مَعَهُۥٓ
उसके साथ थे
إِذْ
जब
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
لِقَوْمِهِمْ
अपनी क़ौम से
إِنَّا
बेशक हम
بُرَءَٰٓؤُا۟
बेज़ार हैं
مِنكُمْ
तुम से
وَمِمَّا
और उनसे जिन्हें
تَعْبُدُونَ
तुम पूजते हो
مِن
from
دُونِ
सिवाए
ٱللَّهِ
अल्लाह के
كَفَرْنَا
इन्कार किया हमने
بِكُمْ
तुम्हारा
وَبَدَا
और ज़ाहिर हो गई
بَيْنَنَا
दर्मियान हमारे
وَبَيْنَكُمُ
और दर्मियान तुम्हारे
ٱلْعَدَٰوَةُ
अदावत
وَٱلْبَغْضَآءُ
और बुग़्ज़
أَبَدًا
हमेशा के लिए
حَتَّىٰ
यहाँ तक कि
تُؤْمِنُوا۟
तुम ईमान लाओ
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
وَحْدَهُۥٓ
अकेले उसी पर
إِلَّا
मगर
قَوْلَ
कहना
إِبْرَٰهِيمَ
इब्राहीम का
لِأَبِيهِ
अपने वालिद से
لَأَسْتَغْفِرَنَّ
अलबत्ता मैं ज़रूर बख़्शिश माँगूँगा
لَكَ
तेरे लिए
وَمَآ
और नहीं
أَمْلِكُ
मैं मालिक
لَكَ
तेरे लिए
مِنَ
from
ٱللَّهِ
अल्लाह से
مِن
of
شَىْءٍۢ ۖ
किसी चीज़ का
رَّبَّنَا
ऐ हमारे रब
عَلَيْكَ
तुझ पर ही
تَوَكَّلْنَا
तवक्कुल किया हमने
وَإِلَيْكَ
और तरफ़ तेरे ही
أَنَبْنَا
रुजूअ किया हमने
وَإِلَيْكَ
और तरफ़ तेरे ही
ٱلْمَصِيرُ
लौटना है
तुम लोगों के लिए इबराहीम में और उन लोगों में जो उसके साथ थे अच्छा आदर्श है, जबकि उन्होंने अपनी क़ौम के लोगों से कह दिया कि "हम तुमसे और अल्लाह से हटकर जिन्हें तुम पूजते हो उनसे विरक्त है। हमने तुम्हारा इनकार किया और हमारे और तुम्हारे बीच सदैव के लिए वैर और विद्वेष प्रकट हो चुका जब तक अकेले अल्लाह पर तुम ईमान न लाओ।" इूबराहीम का अपने बाप से यह कहना अपवाद है कि "मैं आपके लिए क्षमा की प्रार्थना अवश्य करूँगा, यद्यपि अल्लाह के मुक़ाबले में आपके लिए मैं किसी चीज़ पर अधिकार नहीं रखता।" "ऐ हमारे रब! हमने तुझी पर भरोसा किया और तेरी ही ओर रुजू हुए और तेरी ही ओर अन्त में लौटना हैं। -
तफ़्सीर:
तुम्हारे लिए (ऐ मोमिनो!) इबराहीम अलैहिस्सलाम और उन मोमिनों में जो उनके साथ थे, एक अच्छा आदर्श है, जब उन्होंने अपनी काफ़िर जाति से कहा : हम तुमसे तथा उन मूर्तियों से बरी हैं, जिन्हें तुम अल्लाह को छोड़कर पूजते हो। हम उस धर्म को नहीं मानते, जिसपर तुम चल रहे हो, तथा हमारे और तुम्हारे बीच हमेशा के लिए शत्रुता और घृणा प्रकट हो चुकी है, यहाँ तक कि तुम अकेले अल्लाह पर ईमान ले आओ और किसी को उसका साझी न बनाओ। अतः तुम्हें भी चाहिए कि उनकी तरह अपनी काफ़िर जाति से बरी होने का ऐलान कर दो। परंतु इबराहीम अलैहिस्सलाम की इस बात को छोड़कर, जो उन्होंने अपने पिता से कही थी कि : मैं अवश्य अल्लाह से तुम्हारे लिए क्षमा याचना करूँगा। तो तुम इसमें उनका पालन न करो। क्योंकि यह बात उन्होंने अपने पिता से निराश होने से पहले कही थी। अतः किसी मोमिन के लिए जायज़ नहीं है कि वह किसी मुश्रिक के लिए क्षमा माँगे। और मैं तुम्हारा अल्लाह की यातना से कुछ भी बचाव नहीं कर सकता। ऐ हमारे पालनहार! हमने अपने सभी मामलों में केवल तुझी पर भरोसा किया है, और हम तेरी ही ओर तौबा करते हुए लौटे हैं, और तेरी ही ओर क़ियामत के दिन सबको लौटकर आना है।
आयत 5
رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا فِتْنَةًۭ لِّلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَٱغْفِرْ لَنَا رَبَّنَآ ۖ إِنَّكَ أَنتَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ
رَبَّنَا
ऐ हमारे रब
لَا
(do) not
تَجْعَلْنَا
ना तू बना हमें
فِتْنَةًۭ
फ़ितना / आज़माइश
لِّلَّذِينَ
उनके लिए जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
وَٱغْفِرْ
और बख़्शदे
لَنَا
हमें
رَبَّنَآ ۖ
ऐ हमारे रब
إِنَّكَ
बेशक तू
أَنتَ
तू ही है
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त
ٱلْحَكِيمُ
ख़ूब हिकमत वाला
"ऐ हमारे रब! हमें इनकार करनेवालों के लिए फ़ितना न बना और ऐ हमारे रब! हमें क्षमा कर दे। निश्चय ही तू प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।"
तफ़्सीर:
ऐ हमारे पालनहार, तू हमें काफ़िरों के लिए परीक्षण न बना कि उन्हें हमारे ऊपर हावी कर दे और वे कहने लगें : अगर वे सत्य पर होते, तो हम उनपर हावी न किए जाते। तथा ऐ हमारे पालनहार, हमारे गुनाह माफ कर दे। निश्चय तू ही प्रभुत्वशाली है, जिसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता, अपनी रचना, विधान और निर्णय में हिकमत वाला है।
आयत 6
لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِيهِمْ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌۭ لِّمَن كَانَ يَرْجُوا۟ ٱللَّهَ وَٱلْيَوْمَ ٱلْـَٔاخِرَ ۚ وَمَن يَتَوَلَّ فَإِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلْغَنِىُّ ٱلْحَمِيدُ
لَقَدْ
अलबत्ता तहक़ीक़
كَانَ
है
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
فِيهِمْ
उनमें
أُسْوَةٌ
नमूना
حَسَنَةٌۭ
अच्छा
لِّمَن
उसके लिए जो
كَانَ
हो वो
يَرْجُوا۟
वो उम्मीद रखता
ٱللَّهَ
अल्लाह (से मुलाक़ात ) की
وَٱلْيَوْمَ
and the Day
ٱلْـَٔاخِرَ ۚ
और आख़िरी दिन की
وَمَن
और जो कोई
يَتَوَلَّ
मुँह मोड़ जाए
فَإِنَّ
तो बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
هُوَ
वो ही है
ٱلْغَنِىُّ
बहुत बेनियाज़
ٱلْحَمِيدُ
ख़ूब तारीफ़ वाला
निश्चय ही तुम्हारे लिए उनमें अच्छा आदर्श है और हर उस व्यक्ति के लिए जो अल्लाह और अंतिम दिन की आशा रखता हो। और जो कोई मुँह फेरे तो अल्लाह तो निस्पृह, अपने आप में स्वयं प्रशंसित है
तफ़्सीर:
इस उत्तम आदर्श का पालन वही करेगा, जो दुनिया और आख़िरत में अल्लाह से भलाई की आशा रखता है। और जो इस उत्तम आदर्श से मुँह फेरेगा, तो अल्लाह अपने बंदों से बेनियाज़ है, उसे उनके आज्ञापालन की आवश्यकता नहीं है। तथा वह हर हाल में प्रशंसनीय है।
आयत 7
۞ عَسَى ٱللَّهُ أَن يَجْعَلَ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَ ٱلَّذِينَ عَادَيْتُم مِّنْهُم مَّوَدَّةًۭ ۚ وَٱللَّهُ قَدِيرٌۭ ۚ وَٱللَّهُ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
۞ عَسَى
उम्मीद है
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَن
कि
يَجْعَلَ
वो डाल दे
بَيْنَكُمْ
दर्मियान तुम्हारे
وَبَيْنَ
और दर्मियान
ٱلَّذِينَ
उनके जिनसे
عَادَيْتُم
अदावत रखते हो तुम
مِّنْهُم
उनमें से
مَّوَدَّةًۭ ۚ
दोस्ती
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
قَدِيرٌۭ ۚ
ख़ूब क़ुदरत वाला है
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
आशा है कि अल्लाह तुम्हारे और उनके बीच, जिनके बीच, जिनसे तुमने शत्रुता मोल ली है, प्रेम-भाव उत्पन्न कर दे। अल्लाह बड़ी सामर्थ्य रखता है और अल्लाह बहुत क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
आशा है कि अल्लाह (ऐ मोमिनो) तुम्हारे बीच और उन काफ़िरों के बीच, जिनसे तुम बैर रखते हो, प्रेम उत्पन्न कर दे, इस प्रकार वह उन्हें इस्लाम का मार्गदर्शन प्रदान कर दे। फिर वे तुम्हारे इस्लामी भाई बन जाएँ। और अल्लाह बड़ा सामर्थ्यवान् है। वह इस बात का सामर्थ्य रखता है कि उनके दिलों को ईमान की ओर फेर दे। तथा अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 8
لَّا يَنْهَىٰكُمُ ٱللَّهُ عَنِ ٱلَّذِينَ لَمْ يُقَـٰتِلُوكُمْ فِى ٱلدِّينِ وَلَمْ يُخْرِجُوكُم مِّن دِيَـٰرِكُمْ أَن تَبَرُّوهُمْ وَتُقْسِطُوٓا۟ إِلَيْهِمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُقْسِطِينَ
لَّا
Not
يَنْهَىٰكُمُ
नहीं रोकता तुम्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَنِ
from
ٱلَّذِينَ
उन लोगों से
لَمْ
नहीं
يُقَـٰتِلُوكُمْ
उन्होंने जंग की तुमसे
فِى
in
ٱلدِّينِ
दीन के मामले में
وَلَمْ
और नहीं
يُخْرِجُوكُم
उन्होंने निकाला तुम्हें
مِّن
of
دِيَـٰرِكُمْ
तुम्हारे घरों से
أَن
कि
تَبَرُّوهُمْ
तुम नेकी करो उनसे
وَتُقْسِطُوٓا۟
और तुम इन्साफ़ करो
إِلَيْهِمْ ۚ
उनसे
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
يُحِبُّ
वो पसंद करता है
ٱلْمُقْسِطِينَ
इन्साफ़ करने वालों को
अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और न तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला। निस्संदेह अल्लाह न्याय करनेवालों को पसन्द करता है
तफ़्सीर:
अल्लाह तुम्हें उन लोगों से नहीं रोकता, जिन्होंने तुमसे तुम्हारे मुसलमान होने के कारण युद्ध नहीं किया और तुम्हें तुम्हारे घरों से नहीं निकाला, कि तुम उनके साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके बीच न्याय करते हुए उनका तुम्हारे ऊपर जो कुछ हक़ है उसे उन्हें दे दो। निश्चय अल्लाह उन न्याय करने वालों से प्रेम करता है, जो अपने आप में, अपने परिवारों में और जिनके वे ज़िम्मेदार होते हैं, उनके साथ न्याय करते हैं।
आयत 9
إِنَّمَا يَنْهَىٰكُمُ ٱللَّهُ عَنِ ٱلَّذِينَ قَـٰتَلُوكُمْ فِى ٱلدِّينِ وَأَخْرَجُوكُم مِّن دِيَـٰرِكُمْ وَظَـٰهَرُوا۟ عَلَىٰٓ إِخْرَاجِكُمْ أَن تَوَلَّوْهُمْ ۚ وَمَن يَتَوَلَّهُمْ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ
إِنَّمَا
बेशक
يَنْهَىٰكُمُ
रोकता है तुम्हें
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَنِ
from
ٱلَّذِينَ
उनसे जिन्होंने
قَـٰتَلُوكُمْ
जंग की तुमसे
فِى
in
ٱلدِّينِ
दीन के मामले में
وَأَخْرَجُوكُم
और उन्होंने निकाला तुम्हें
مِّن
of
دِيَـٰرِكُمْ
तुम्हारे घरों से
وَظَـٰهَرُوا۟
और उन्होंने एक दूसरे की मदद की
عَلَىٰٓ
in
إِخْرَاجِكُمْ
तुम्हारे निकालने पर
أَن
कि
تَوَلَّوْهُمْ ۚ
तुम दोस्ती करो उनसे
وَمَن
और जो कोई
يَتَوَلَّهُمْ
दोस्ती करेगा उनसे
فَأُو۟لَـٰٓئِكَ
तो यही लोग हैं
هُمُ
वो
ٱلظَّـٰلِمُونَ
जो ज़ालिम हैं
अल्लाह तो तुम्हें केवल उन लोगों से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की। जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम है
तफ़्सीर:
अल्लाह केवल तुम्हें उन लोगों से मना करता है, जिन्होंने तुमसे तुम्हारे ईमान के कारण युद्ध किया, तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाल दिया और तुम्हें बाहर निकालने में सहयोग किया; वह तुम्हें उनसे दोस्ती रखने से रोकता है। और तुममें से जो व्यक्ति उनसे दोस्ती करेगा, तो वही लोग अल्लाह के आदेश के उल्लंघन के कारण स्वयं को विनाश में डालकर अपने आप पर अत्याचार करने वाले हैं।
आयत 10
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ إِذَا جَآءَكُمُ ٱلْمُؤْمِنَـٰتُ مُهَـٰجِرَٰتٍۢ فَٱمْتَحِنُوهُنَّ ۖ ٱللَّهُ أَعْلَمُ بِإِيمَـٰنِهِنَّ ۖ فَإِنْ عَلِمْتُمُوهُنَّ مُؤْمِنَـٰتٍۢ فَلَا تَرْجِعُوهُنَّ إِلَى ٱلْكُفَّارِ ۖ لَا هُنَّ حِلٌّۭ لَّهُمْ وَلَا هُمْ يَحِلُّونَ لَهُنَّ ۖ وَءَاتُوهُم مَّآ أَنفَقُوا۟ ۚ وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ أَن تَنكِحُوهُنَّ إِذَآ ءَاتَيْتُمُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ ۚ وَلَا تُمْسِكُوا۟ بِعِصَمِ ٱلْكَوَافِرِ وَسْـَٔلُوا۟ مَآ أَنفَقْتُمْ وَلْيَسْـَٔلُوا۟ مَآ أَنفَقُوا۟ ۚ ذَٰلِكُمْ حُكْمُ ٱللَّهِ ۖ يَحْكُمُ بَيْنَكُمْ ۚ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌۭ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوٓا۟
ईमान लाए हो
إِذَا
जब
جَآءَكُمُ
आ जाऐं तुम्हारे पास
ٱلْمُؤْمِنَـٰتُ
मोमिन औरतें
مُهَـٰجِرَٰتٍۢ
हिजरत करने वालियाँ
فَٱمْتَحِنُوهُنَّ ۖ
तो इम्तिहान लो उनका
ٱللَّهُ
अल्लाह
أَعْلَمُ
ख़ूब जानता है
بِإِيمَـٰنِهِنَّ ۖ
उनके ईमान को
فَإِنْ
फिर अगर
عَلِمْتُمُوهُنَّ
जान लो तुम उन्हें
مُؤْمِنَـٰتٍۢ
ईमान वालियाँ
فَلَا
तो ना
تَرْجِعُوهُنَّ
तुम लौटाओ उन्हें
إِلَى
to
ٱلْكُفَّارِ ۖ
तरफ़ कुफ़्फ़ार के
لَا
Not
هُنَّ
ना वो
حِلٌّۭ
हलाल हैं
لَّهُمْ
उनके लिए
وَلَا
और ना
هُمْ
वो
يَحِلُّونَ
वो हलाल हो सकते हैं
لَهُنَّ ۖ
उनके लिए
وَءَاتُوهُم
और दो उन्हें
مَّآ
जो
أَنفَقُوا۟ ۚ
उन्होंने ख़र्च किया
وَلَا
और नहीं
جُنَاحَ
कोई गुनाह
عَلَيْكُمْ
तुम पर
أَن
कि
تَنكِحُوهُنَّ
तुम निकाह करो उनसे
إِذَآ
जब
ءَاتَيْتُمُوهُنَّ
दे चुको तुम उन्हें
أُجُورَهُنَّ ۚ
मेहर उनके
وَلَا
और ना
تُمْسِكُوا۟
तुम रोक कर रखो
بِعِصَمِ
इस्मतें
ٱلْكَوَافِرِ
काफ़िर औरतों की
وَسْـَٔلُوا۟
और तुम माँग लो
مَآ
जो
أَنفَقْتُمْ
ख़र्च किया तुमने
وَلْيَسْـَٔلُوا۟
और चाहिए कि वो माँग लें
مَآ
जो
أَنفَقُوا۟ ۚ
उन्होंने ख़र्च किया
ذَٰلِكُمْ
ये
حُكْمُ
फ़ैसला है
ٱللَّهِ ۖ
अल्लाह का
يَحْكُمُ
वो फ़ैसला करता है
بَيْنَكُمْ ۚ
दर्मियान तुम्हारे
وَٱللَّهُ
और अल्लाह
عَلِيمٌ
ख़ूब इल्म वाला है
حَكِيمٌۭ
ख़ूब हिकमत वाला है
ऐ ईमान लानेवालो! जब तुम्हारे पास ईमान की दावेदार स्त्रियाँ हिजरत करके आएँ तो तुम उन्हें जाँच लिया करो। यूँ तो अल्लाह उनके ईमान से भली-भाँति परिचित है। फिर यदि वे तुम्हें ईमानवाली मालूम हो, तो उन्हें इनकार करनेवालों (अधर्मियों) की ओर न लौटाओ। न तो वे स्त्रियाँ उनके लिए वैद्य है और न वे उन स्त्रियों के लिए वैद्य है। और जो कुछ उन्होंने ख़र्च किया हो तुम उन्हें दे दो और इसमें तुम्हारे लिए कोई गुनाह नहीं कि तुम उनसे विवाह कर लो, जबकि तुम उन्हें महर अदा कर दो। और तुम स्वयं भी इनकार करनेवाली स्त्रियों के सतीत्व को अपने अधिकार में न रखो। और जो कुछ तुमने ख़र्च किया हो माँग लो। और उन्हें भी चाहिए कि जो कुछ उन्होंने ख़र्च किया हो माँग ले। यह अल्लाह का आदेश है। वह तुम्हारे बीच फ़ैसला करता है। अल्लाह सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने वालो और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो! जब तुम्हारे पास मोमिन स्त्रियाँ कुफ़्र की धरती से इस्लाम की धरती की ओर हिजरत करके आ जाएँ, तो उन्हें जाँच लिया करो कि उनका ईमान सच्चा है या नहीं। अल्लाह उनके ईमान को अधिक जानता है। उनके दिलों में जो कुछ भी है उससे छिपा नहीं है। अगर परीक्षण के बाद उनकी सच्चाई ज़ाहिर हो जाए और तुम जान लो कि वे मोमिन हैं, तो उन्हें उनके काफ़िर पतियों की ओर न लौटाओ। मोमिन स्त्रियों के लिए वैध नहीं है कि काफ़िरों से निकाह करें तथा काफ़िरों के लिए वैध नहीं है कि मोमिन स्त्रियों से निकाह करें। तथा उनके (काफ़िर) पतियों को वह महर दे दो, जो उन्होंने अपनी स्त्रियों पर खर्च किया था। और (ऐ ईमान वालो!) तुमपर कोई गुनाह नहीं है कि उनकी इद्दत गुज़र जाने के बाद उनसे निकाह कर लो, जब तुम उन्हें उनका महर दे दो। और जिसकी पत्नी काफ़िर हो या इस्लाम से फिर गई हो, तो वह उसे अपने पास न रखे। क्योंकि उसके कुफ़्र के कारण उन दोनों का निकाह बाधित हो गया। और काफ़िरों से अपनी इस्लाम से फिर जाने वाली पत्नियों पर खर्च किया हुआ महर माँग लो, तथा वे भी अपनी इस्लाम ग्रहण करने वाली स्त्रियों पर खर्च किया हुआ महर माँग लें। यह (तुम्हारी तथा उनकी ओर से महर की वापसी) अल्लाह का निर्णय है। वह तुम्हारे बीच जो चाहता है, निर्णय करता है। और अल्लाह अपने बंदों की स्थितियों और उनके कार्यों से खूब अवगत है। उनमें से कोई भी चीज़ उससे छिपी नहीं है। वह अपने बंदों के लिए जो नियम बनाता है, उसमें हिकमत वाला है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
मुशरिकों से दोस्ती में एहतियात और हिजरत करने वाली औरतों के इम्तिहान का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि दुश्मनों से दिली लगाव रखना अकीदे को कमज़ोर कर सकता है, समझदारी से ताल्लुक़ात रखने चाहिए।
आयत 11
وَإِن فَاتَكُمْ شَىْءٌۭ مِّنْ أَزْوَٰجِكُمْ إِلَى ٱلْكُفَّارِ فَعَاقَبْتُمْ فَـَٔاتُوا۟ ٱلَّذِينَ ذَهَبَتْ أَزْوَٰجُهُم مِّثْلَ مَآ أَنفَقُوا۟ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ٱلَّذِىٓ أَنتُم بِهِۦ مُؤْمِنُونَ
وَإِن
और अगर
فَاتَكُمْ
रह जाए तुमसे
شَىْءٌۭ
कोई चीज़ (मेहर)
مِّنْ
of
أَزْوَٰجِكُمْ
तुम्हारी बीवियों की
إِلَى
to
ٱلْكُفَّارِ
तरफ़ कुफ़्फ़ार के
فَعَاقَبْتُمْ
फिर तुम्हारी बारी आए
فَـَٔاتُوا۟
तो दो
ٱلَّذِينَ
उन लोगों को
ذَهَبَتْ
चली गईं
أَزْوَٰجُهُم
बीवियाँ जिनकी
مِّثْلَ
मानिन्द उसके
مَآ
जो
أَنفَقُوا۟ ۚ
उन्होंने ख़र्च किया
وَٱتَّقُوا۟
और डरो
ٱللَّهَ
अल्लाह से
ٱلَّذِىٓ
वो जो हो
أَنتُم
तुम
بِهِۦ
उस पर
مُؤْمِنُونَ
ईमान लाने वाले
और यदि तुम्हारी पत्नि यो (के मह्रों) में से कुछ तुम्हारे हाथ से निकल जाए और इनकार करनेवालों (अधर्मियों) की ओर रह जाए, फिर तुम्हारी नौबत आए, जो जिन लोगों की पत्नियों चली गई है, उन्हें जितना उन्होंने ख़र्च किया हो दे दो। और अल्लाह का डर रखो, जिसपर तुम ईमान रखते हो
तफ़्सीर:
और अगर ऐसा हो कि तुम्हारी कुछ स्त्रियाँ इस्लाम को त्यागकर काफ़िरों की ओर चली जाएँ, और तुम काफ़िरों से उनका महर माँगो और वे उसे न दें। फिर तुम्हें काफ़िरों से ग़नीमत का धन प्राप्त हो, तो इस्लाम को त्यागकर जाने वाली स्त्रियों के पतियों को उनके खर्च किए हुए महर के बराबर धन दे दो। और अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई चीज़ों से बचकर, डरते रहो, जिसपर तुम ईमान रखते हो।
आयत 12
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِىُّ إِذَا جَآءَكَ ٱلْمُؤْمِنَـٰتُ يُبَايِعْنَكَ عَلَىٰٓ أَن لَّا يُشْرِكْنَ بِٱللَّهِ شَيْـًۭٔا وَلَا يَسْرِقْنَ وَلَا يَزْنِينَ وَلَا يَقْتُلْنَ أَوْلَـٰدَهُنَّ وَلَا يَأْتِينَ بِبُهْتَـٰنٍۢ يَفْتَرِينَهُۥ بَيْنَ أَيْدِيهِنَّ وَأَرْجُلِهِنَّ وَلَا يَعْصِينَكَ فِى مَعْرُوفٍۢ ۙ فَبَايِعْهُنَّ وَٱسْتَغْفِرْ لَهُنَّ ٱللَّهَ ۖ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌۭ رَّحِيمٌۭ
يَـٰٓأَيُّهَا
ٱلنَّبِىُّ
नबी
إِذَا
जब
جَآءَكَ
आऐं आपके पास
ٱلْمُؤْمِنَـٰتُ
मोमिन औरतें
يُبَايِعْنَكَ
वो बैत करें आपसे
عَلَىٰٓ
इस (बात) पर
أَن
कि
لَّا
not
يُشْرِكْنَ
नहीं वो शरीक ठहराऐंगी
بِٱللَّهِ
साथ अल्लाह के
شَيْـًۭٔا
किसी चीज़ को
وَلَا
और ना
يَسْرِقْنَ
वो चोरी करेंगी
وَلَا
और ना
يَزْنِينَ
वो ज़िना करेंगी
وَلَا
और ना
يَقْتُلْنَ
वो क़त्ल करेंगी
أَوْلَـٰدَهُنَّ
अपनी औलाद को
وَلَا
और ना
يَأْتِينَ
वो आऐंगी
بِبُهْتَـٰنٍۢ
किसी बोहतान को
يَفْتَرِينَهُۥ
वो गढ़ लें जिसे
بَيْنَ
दर्मियान
أَيْدِيهِنَّ
अपने हाथों
وَأَرْجُلِهِنَّ
और अपने पाँव के
وَلَا
और ना
يَعْصِينَكَ
वो नाफ़रमानी करेंगी आपकी
فِى
in
مَعْرُوفٍۢ ۙ
किसी मारूफ़ में
فَبَايِعْهُنَّ
तो बैत कर लीजिए उनसे
وَٱسْتَغْفِرْ
और बख़्शिश माँगिए
لَهُنَّ
उनके लिए
ٱللَّهَ ۖ
अल्लाह से
إِنَّ
बेशक
ٱللَّهَ
अल्लाह
غَفُورٌۭ
बहुत बख़्शने वाला है
رَّحِيمٌۭ
निहायत रहम करने वाला है
ऐ नबी! जब तुम्हारे पास ईमानवाली स्त्रियाँ आकर तुमसे इसपर 'बैअत' करे कि वे अल्लाह के साथ किसी चीज़ को साझी नहीं ठहराएँगी और न चोरी करेंगी और न व्यभिचार करेंगी, और न अपनी औलाद की हत्या करेंगी और न अपने हाथों और पैरों को बीच कोई आरोप घड़कर लाएँगी. और न किसी भले काम में तुम्हारी अवज्ञा करेंगी, तो उनसे 'बैअत' ले लो और उनके लिए अल्लाह से क्षमा की प्रार्थना करो। निश्चय ही अत्यन्त बहुत क्षमाशील, अत्यन्त दयावान है
तफ़्सीर:
ऐ नबी! जब आपके पास मोमिन स्त्रियाँ इस बात पर बैअत (प्रण) करने के लिए आएँ (जैसे मक्का पर विजय के अवसर पर हुआ था) कि किसी को अल्लाह का साझी नहीं ठहराएँगी, बल्कि केवल उसी की इबादत करेंगी, चोरी नहीं करेंगी, व्यभिचार नहीं करेंगी, जाहिलिय्यत के लोगों की तरह अपनी औलाद की हत्या नहीं करेंगी, व्यभिचार के नतीजे में पैदा होने वाले बच्चे का संबंध अपने पतियों से नहीं जोड़ेंगी, तथा किसी अच्छे कार्य (जैसे मृतक पर रोने-पीटने, बाल मुँडाने और गरीबान फाड़ने से मनाही) में आपकी अवज्ञा नहीं करेंगी : तो आप उनसे बैअत ले लें और उनके आपसे बैअत करने के बाद उनके गुनाहों के लिए अल्लाह से क्षमा माँगें। निश्चय अल्लाह अपने तौबा (क्षमा याचना) करने वाले बंदों को क्षमा करने वाला, उनपर दया करने वाला है।
आयत 13
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَتَوَلَّوْا۟ قَوْمًا غَضِبَ ٱللَّهُ عَلَيْهِمْ قَدْ يَئِسُوا۟ مِنَ ٱلْـَٔاخِرَةِ كَمَا يَئِسَ ٱلْكُفَّارُ مِنْ أَصْحَـٰبِ ٱلْقُبُورِ
يَـٰٓأَيُّهَا
O you
ٱلَّذِينَ
ऐ लोगो जो
ءَامَنُوا۟
ईमान लाए हो
لَا
(Do) not
تَتَوَلَّوْا۟
ना तुम दोस्त बनाओ
قَوْمًا
ऐसी क़ौम को
غَضِبَ
नाराज़ हुआ
ٱللَّهُ
अल्लाह
عَلَيْهِمْ
जिन पर
قَدْ
तहक़ीक़
يَئِسُوا۟
वो मायूस हो गए
مِنَ
of
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत से
كَمَا
जैसा कि
يَئِسَ
मायूस हुए
ٱلْكُفَّارُ
काफ़िर
مِنْ
of
أَصْحَـٰبِ
(the) companions
ٱلْقُبُورِ
क़ब्रों वालों से
ऐ ईमान लानेवालो! ऐसे लोगों से मित्रता न करो जिनपर अल्लाह का प्रकोप हुआ, वे आख़िरत से निराश हो चुके है, जिस प्रकार इनकार करनेवाले क़ब्रवालों से निराश हो चुके है
तफ़्सीर:
ऐ अल्लाह पर ईमान रखने वालो और उसकी शरीयत पर अमल करने वालो! ऐसे लोगों से मित्रता न रखो, जिनपर अल्लाह क्रोधित हुआ है, जो क़ियामत के दिन पर विश्वास नहीं रखते, बल्कि वे उससे उसी तरह निराश हैं, जैसे मरणोपरांत पुनर्जीवन के इनकार के कारण अपने मरे हुए लोगों के लौटने से निराश हैं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
ईमान वाली औरतों से बैअत लेने के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि ईमान लाने वाले हर शख्स का, चाहे वह मर्द हो या औरत, इस्तकबाल करना चाहिए।
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