नाम का मतलब
बादशाहत (अल्लाह की सारी कायनात पर बादशाहत के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-मुल्क में अल्लाह की बादशाहत, मौत-ज़िंदगी के मकसद और कायनात की तख्लीक की बेएब (बेकसूर) तर्तीब का ज़िक्र है।
फ़ज़ीलत / सार
नबी ﷺ ने फरमाया कि यह सूरह कब्र के अज़ाब से बचाती है और अपने पढ़ने वाले की सिफारिश करेगी, इसलिए इसे रोज़ाना रात में पढ़ने की आदत डालने की तरगीब दी गई है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ تَبَـٰرَكَ ٱلَّذِى بِيَدِهِ ٱلْمُلْكُ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ قَدِيرٌ
تَبَـٰرَكَ
बहुत बाबरकत है
ٱلَّذِى
वो जो
بِيَدِهِ
उसी के हाथ में है
ٱلْمُلْكُ
बादशाहत
وَهُوَ
और वो
عَلَىٰ
ऊपर
كُلِّ
हर
شَىْءٍۢ
चीज़ के
قَدِيرٌ
ख़ूब क़ुदरत रखने वाला है
बड़ा बरकतवाला है वह जिसके हाथ में सारी बादशाही है और वह हर चीज़ की सामर्थ्य रखता है। -
तफ़्सीर:
उस अल्लाह की भलाई बहुत अधिक और महान है, जिस अकेले के हाथ में सारा राज्य है और वह सब कुछ करने में सक्षम है, कोई चीज़ उसकी शक्ति से बाहर नहीं है।
आयत 2
ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلْمَوْتَ وَٱلْحَيَوٰةَ لِيَبْلُوَكُمْ أَيُّكُمْ أَحْسَنُ عَمَلًۭا ۚ وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْغَفُورُ
ٱلَّذِى
वो जिसने
خَلَقَ
पैदा किया
ٱلْمَوْتَ
मौत
وَٱلْحَيَوٰةَ
और ज़िन्दगी को
لِيَبْلُوَكُمْ
ताकि वो आज़माए तुम्हें
أَيُّكُمْ
कौन तुम में से
أَحْسَنُ
ज़्यादा अच्छा है
عَمَلًۭا ۚ
अमल में
وَهُوَ
और वो
ٱلْعَزِيزُ
बहुत ज़बरदस्त है
ٱلْغَفُورُ
बहुत बख़्शने वाला है
जिसने पैदा किया मृत्यु और जीवन को, ताकि तुम्हारी परीक्षा करे कि तुममें कर्म की दृष्टि से कौन सबसे अच्छा है। वह प्रभुत्वशाली, बड़ा क्षमाशील है। -
तफ़्सीर:
जिसने मौत और जीवन को पैदा किया, ताकि वह तुम्हें (ऐ लोगो) परखे कि तुममें से कौन सर्वश्रेष्ठ कार्य करने वाला है? और वह ऐसा प्रभुत्वशाली है, जिस पर किसी का ज़ोर नहीं चलता। वह अपने तौबा करने वाले बंदों के गुनाहों को माफ़ करने वाला है।
आयत 3
ٱلَّذِى خَلَقَ سَبْعَ سَمَـٰوَٰتٍۢ طِبَاقًۭا ۖ مَّا تَرَىٰ فِى خَلْقِ ٱلرَّحْمَـٰنِ مِن تَفَـٰوُتٍۢ ۖ فَٱرْجِعِ ٱلْبَصَرَ هَلْ تَرَىٰ مِن فُطُورٍۢ
ٱلَّذِى
वो जिसने
خَلَقَ
पैदा किए
سَبْعَ
सात
سَمَـٰوَٰتٍۢ
आसमान
طِبَاقًۭا ۖ
ऊपर तले
مَّا
नहीं
تَرَىٰ
तुम देखोगे
فِى
in
خَلْقِ
तख़लीक़ में
ٱلرَّحْمَـٰنِ
रहमान की
مِن
any
تَفَـٰوُتٍۢ ۖ
कोई ख़लल
فَٱرْجِعِ
फिर लौटाओ
ٱلْبَصَرَ
निगाह को
هَلْ
क्या
تَرَىٰ
तुम देखते हो
مِن
any
فُطُورٍۢ
कोई शिगाफ़
जिसने ऊपर-तले सात आकाश बनाए। तुम रहमान की रचना में कोई असंगति और विषमता न देखोगे। फिर नज़र डालो, "क्या तुम्हें कोई बिगाड़ दिखाई देता है?"
तफ़्सीर:
जिसने सात आकाश बनाए, प्रत्येक आकाश उसके पहले के ऊपर एक परत के रूप में इस तरह है कि एक आसमान और दूसरे आसमान के बीच कोई मिलन नहीं है। (ऐ देखने वाले) तुम अल्लाह की रचना में कोई असमानता या असंगति नहीं देखोगे। तुम फिर से नज़र दौड़ाओ क्या तुम्हें कोई दरार या फटन दिखाई देती है?! तुम्हें इस तरह की कोई चीज़ हरगिज़ नज़र नहीं आएगी, बल्कि तुम एक सुदृढ़ और मज़बूत रचना देखोगे।
आयत 4
ثُمَّ ٱرْجِعِ ٱلْبَصَرَ كَرَّتَيْنِ يَنقَلِبْ إِلَيْكَ ٱلْبَصَرُ خَاسِئًۭا وَهُوَ حَسِيرٌۭ
ثُمَّ
फिर
ٱرْجِعِ
लौटाओ
ٱلْبَصَرَ
निगाह को
كَرَّتَيْنِ
बार-बार
يَنقَلِبْ
लौट आएगी
إِلَيْكَ
तेरी तरफ़
ٱلْبَصَرُ
निगाह
خَاسِئًۭا
ज़लील हो कर
وَهُوَ
और वो
حَسِيرٌۭ
थकी हुई होगी
फिर दोबारा नज़र डालो। निगाह रद्द होकर और थक-हारकर तुम्हारी ओर पलट आएगी
तफ़्सीर:
फिर तुम बार-बार नज़र डालो, तुम्हारी नज़र आकाश की रचना में कोई दोष या खराबी देखे बिना अपमानित होकर तुम्हारी ओर लौट आएगी और वह थकी हुई होगी, उसे कुछ दिखाई न देगा।
आयत 5
وَلَقَدْ زَيَّنَّا ٱلسَّمَآءَ ٱلدُّنْيَا بِمَصَـٰبِيحَ وَجَعَلْنَـٰهَا رُجُومًۭا لِّلشَّيَـٰطِينِ ۖ وَأَعْتَدْنَا لَهُمْ عَذَابَ ٱلسَّعِيرِ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
زَيَّنَّا
मुज़य्यन किया हमने
ٱلسَّمَآءَ
आसमान को
ٱلدُّنْيَا
दुनिया के
بِمَصَـٰبِيحَ
साथ चिराग़ों के
وَجَعَلْنَـٰهَا
और बनाया हमने उन्हें
رُجُومًۭا
मारने की चीज़
لِّلشَّيَـٰطِينِ ۖ
शैतानों के लिए
وَأَعْتَدْنَا
और तैयार कर रखा है हमने
لَهُمْ
उनके लिए
عَذَابَ
अज़ाब
ٱلسَّعِيرِ
भड़कती आग का
हमने निकटवर्ती आकाश को दीपों से सजाया और उन्हें शैतानों के मार भगाने का साधन बनाया और उनके लिए हमने भड़कती आग की यातना तैयार कर रखी है
तफ़्सीर:
निश्चय हमने धरती से सबसे निकट के आकाश को चमकीले तारों के साथ सुशोभित किया है तथा हमने उन तारों को उल्का बना दिया है, जिनके द्वारा उन शैतानों को मारा जाता है, जो चोरी-छिपे सुनने का प्रयास करते हैं। तो ये तारे उन्हें जला देते हैं, और हमने उनके लिए आख़िरत में भड़कती आग तैयार कर रखी है।
आयत 6
وَلِلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِرَبِّهِمْ عَذَابُ جَهَنَّمَ ۖ وَبِئْسَ ٱلْمَصِيرُ
وَلِلَّذِينَ
और उनके लिए जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
بِرَبِّهِمْ
साथ अपने रब के
عَذَابُ
अज़ाब है
جَهَنَّمَ ۖ
जहन्नम का
وَبِئْسَ
और कितना बुरा है
ٱلْمَصِيرُ
ठिकाना
जिन लोगों ने अपने रब के साथ कुफ़्र किया उनके लिए जहन्नम की यातना है और वह बहुत ही बुरा ठिकाना है
तफ़्सीर:
और जिन लोगों ने अपने पालनहार का इनकार किया, उनके लिए क़ियामत के दिन भड़कती हुई आग की यातना है और वह लौटने का स्थान बहुत बुरा है, जहाँ उन्हें लौटना है।
आयत 7
إِذَآ أُلْقُوا۟ فِيهَا سَمِعُوا۟ لَهَا شَهِيقًۭا وَهِىَ تَفُورُ
إِذَآ
जब
أُلْقُوا۟
वो डाले जाऐंगे
فِيهَا
उसमें
سَمِعُوا۟
वो सुनेंगे
لَهَا
उसका
شَهِيقًۭا
चिल्लाना/ दहाड़ना
وَهِىَ
और वो
تَفُورُ
जोश खा रही होगी
जब वे उसमें डाले जाएँगे तो उसकी दहाड़ने की भयानक आवाज़ सुनेंगे और वह प्रकोप से बिफर रही होगी।
तफ़्सीर:
जब वे जहन्नम में फेंके जाएँगे, तो उसकी सख़्त भूंडी आवाज़ सुनेंगे और वह हाँडी के उबलने की तरह उबल रहा होगा।
आयत 8
تَكَادُ تَمَيَّزُ مِنَ ٱلْغَيْظِ ۖ كُلَّمَآ أُلْقِىَ فِيهَا فَوْجٌۭ سَأَلَهُمْ خَزَنَتُهَآ أَلَمْ يَأْتِكُمْ نَذِيرٌۭ
تَكَادُ
क़रीब है कि
تَمَيَّزُ
वो फट जाए
مِنَ
from
ٱلْغَيْظِ ۖ
ग़ज़ब से
كُلَّمَآ
जब भी
أُلْقِىَ
डाली जाएगी
فِيهَا
उसमें
فَوْجٌۭ
कोई जमाअत
سَأَلَهُمْ
पूछेंगे उनसे
خَزَنَتُهَآ
निगरान उनके
أَلَمْ
क्या नहीं
يَأْتِكُمْ
आया था तुम्हारे पास
نَذِيرٌۭ
कोई डराने वाला
ऐसा प्रतीत होगा कि प्रकोप के कारण अभी फट पड़ेगी। हर बार जब भी कोई समूह उसमें डाला जाएगा तो उसके कार्यकर्ता उनसे पूछेंगे, "क्या तुम्हारे पास कोई सावधान करनेवाला नहीं आया?"
तफ़्सीर:
क़रीब होगा कि जहन्नम, उसमें प्रवेश करने वालों के ख़िलाफ़ अपने क्रोध की तीव्रता से, एक दूसरे से अलग हो जाए और फट पड़े। जब भी उसमें, उसके अंदर प्रवेश करने वाले काफ़िरों का कोई समूह डाला जाएगा, तो वहाँ नियुक्त फ़रिश्ते उनसे फटकार के रूप में पूछेंगे : क्या दुनिया में तुम्हारे पास कोई रसूल नहीं आया था, जो तुम्हें अल्लाह की यातना से सावधान करता?!
आयत 9
قَالُوا۟ بَلَىٰ قَدْ جَآءَنَا نَذِيرٌۭ فَكَذَّبْنَا وَقُلْنَا مَا نَزَّلَ ٱللَّهُ مِن شَىْءٍ إِنْ أَنتُمْ إِلَّا فِى ضَلَـٰلٍۢ كَبِيرٍۢ
قَالُوا۟
वो कहेंगे
بَلَىٰ
क्यों नहीं
قَدْ
तहक़ीक़
جَآءَنَا
आया हमारे पास
نَذِيرٌۭ
डराने वाला
فَكَذَّبْنَا
तो झुठला दिया हमने
وَقُلْنَا
और कहा हमने
مَا
नहीं
نَزَّلَ
नाज़िल की
ٱللَّهُ
अल्लाह ने
مِن
any
شَىْءٍ
कोई चीज़
إِنْ
नहीं
أَنتُمْ
तुम
إِلَّا
मगर
فِى
in
ضَلَـٰلٍۢ
गुमराही में
كَبِيرٍۢ
बहुत बड़ी
वे कहेंगे, "क्यों नहीं, अवश्य हमारे पास आया था, किन्तु हमने झुठला दिया और कहा कि अल्लाह ने कुछ भी नहीं अवतरित किया। तुम तो बस एक बड़ी गुमराही में पड़े हुए हो।"
तफ़्सीर:
काफ़िर कहेंगे : क्यों नहीं?! हमारे पास रसूल आया था, जो हमें अल्लाह की यातना से डराता था, लेकिन हमने उसे झुठला दिया और उससे कहा : अल्लाह ने कोई वह़्य नहीं उतारी है। तुम तो (ऐ रसूलो!) सत्य से बहुत भटके हुए हो।
आयत 10
وَقَالُوا۟ لَوْ كُنَّا نَسْمَعُ أَوْ نَعْقِلُ مَا كُنَّا فِىٓ أَصْحَـٰبِ ٱلسَّعِيرِ
وَقَالُوا۟
और वो कहेंगे
لَوْ
अगर
كُنَّا
होते हम
نَسْمَعُ
हम सुनते
أَوْ
या
نَعْقِلُ
हम समझते
مَا
ना
كُنَّا
होते हम
فِىٓ
among
أَصْحَـٰبِ
साथियों में
ٱلسَّعِيرِ
भड़कती आग के
और वे कहेंगे, "यदि हम सुनते या बुद्धि से काम लेते तो हम दहकती आग में पड़नेवालों में सम्मिलित न होते।"
तफ़्सीर:
और काफ़िर कहेंगे : अगर हम उससे लाभान्वित होने के तौर पर सुनते होते, या ऐसे व्यक्ति के समझने की तरह समझते होते, जो सत्य एवं असत्य के बीच अंतर करता है, तो हम जहन्नम में दाख़िल होने वालों के बीच न होते। बल्कि, हम रसूलों पर ईमान रखते होते और उनके लाए हुए संदेश को सच मानते होते और जन्नत में प्रवेश करने वालों में से होते।
आज की ज़िंदगी में सबक़
अल्लाह की बादशाहत और मौत-ज़िंदगी के मकसद (कौन बेहतर अमल करता है) का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि ज़िंदगी सिर्फ जीने के लिए नहीं, बल्कि यह देखने के लिए दी गई है कि हम कैसा अमल करते हैं।
आयत 11
فَٱعْتَرَفُوا۟ بِذَنۢبِهِمْ فَسُحْقًۭا لِّأَصْحَـٰبِ ٱلسَّعِيرِ
فَٱعْتَرَفُوا۟
तो वो ऐतराफ़ करेंगे
بِذَنۢبِهِمْ
अपने गुनाह का
فَسُحْقًۭا
तो दूरी(लानत) है
لِّأَصْحَـٰبِ
साथियों को लिए
ٱلسَّعِيرِ
भड़कती आग के
इस प्रकार वे अपने गुनाहों को स्वीकार करेंगे, तो धिक्कार हो दहकती आगवालों पर!
तफ़्सीर:
इस तरह, वे अपने कुफ़्र और झुठलाने को स्वीकार करेंगे, इसलिए वे आग के पात्र हुए।तो दूरी है (जहन्नम की) आग वालों के लिए।
आयत 12
إِنَّ ٱلَّذِينَ يَخْشَوْنَ رَبَّهُم بِٱلْغَيْبِ لَهُم مَّغْفِرَةٌۭ وَأَجْرٌۭ كَبِيرٌۭ
إِنَّ
बेशक
ٱلَّذِينَ
वो जो
يَخْشَوْنَ
डरते हैं
رَبَّهُم
अपने रब से
بِٱلْغَيْبِ
ग़ायबाना
لَهُم
उनके लिए है
مَّغْفِرَةٌۭ
बख़्शिश
وَأَجْرٌۭ
और अजर
كَبِيرٌۭ
बहुत बड़ा
जो लोग परोक्ष में रहते हुए अपने रब से डरते है, उनके लिए क्षमा और बड़ा बदला है
तफ़्सीर:
निश्चय जो लोग अपने एकांत में अल्लाह से डरते हैं, उनके पापों के लिए क्षमा है और उनके लिए एक महान पुण्य है और वह जन्नत है।
आयत 13
وَأَسِرُّوا۟ قَوْلَكُمْ أَوِ ٱجْهَرُوا۟ بِهِۦٓ ۖ إِنَّهُۥ عَلِيمٌۢ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ
وَأَسِرُّوا۟
और छुपाओ
قَوْلَكُمْ
बात अपनी
أَوِ
या
ٱجْهَرُوا۟
ज़ाहिर करो
بِهِۦٓ ۖ
उसे
إِنَّهُۥ
बेशक वो
عَلِيمٌۢ
ख़ूब जानने वाला है
بِذَاتِ
of what (is in)
ٱلصُّدُورِ
सीनों वाले(भेद)
तुम अपनी बात छिपाओ या उसे व्यक्त करो, वह तो सीनों में छिपी बातों तक को जानता है
तफ़्सीर:
(ऐ लोगो) तुम अपनी बात छिपाओ या उसे प्रकट करो, अल्लाह उसे जानता है। निश्चय वह अपने बंदों के दिलों की बातों को भी जानता है, उसमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है।
आयत 14
أَلَا يَعْلَمُ مَنْ خَلَقَ وَهُوَ ٱللَّطِيفُ ٱلْخَبِيرُ
أَلَا
क्या नहीं
يَعْلَمُ
वो जानेगा
مَنْ
जिसने
خَلَقَ
पैदा किया
وَهُوَ
और वो ही है
ٱللَّطِيفُ
बहुत बारीक बीन
ٱلْخَبِيرُ
ख़ूब बाख़बर
क्या वह नहीं जानेगा जिसने पैदा किया? वह सूक्ष्मदर्शी, ख़बर रखनेवाला है
तफ़्सीर:
क्या वह जिसने सभी प्राणियों को पैदा किया, वह भेद और भेद से भी अधिक छिपी चीज़ को नहीं जानेगा?! जबकि वह अपने बंदों के रहस्यों से अवगत, उनके मामलों की पूरी ख़बर रखने वाला है। उनमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है।
आयत 15
هُوَ ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُمُ ٱلْأَرْضَ ذَلُولًۭا فَٱمْشُوا۟ فِى مَنَاكِبِهَا وَكُلُوا۟ مِن رِّزْقِهِۦ ۖ وَإِلَيْهِ ٱلنُّشُورُ
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
جَعَلَ
बनाया
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन को
ذَلُولًۭا
ताबेअ
فَٱمْشُوا۟
पस चलो
فِى
in
مَنَاكِبِهَا
उसके अतराफ़ में
وَكُلُوا۟
और खाओ
مِن
of
رِّزْقِهِۦ ۖ
उसके रिज़्क़ में से
وَإِلَيْهِ
और तरफ़ उसी के
ٱلنُّشُورُ
दोबारा उठना है
वही तो है जिसने तुम्हारे लिए धरती को वशीभूत किया। अतः तुम उसके (धरती के) कन्धों पर चलो और उसकी रोज़ी में से खाओ, उसी की ओर दोबारा उठकर (जीवित होकर) जाना है
तफ़्सीर:
वही है जिसने तुम्हारे लिए धरती को उसपर रहने के लिए नरम बनाया, तो तुम उसके विभिन्न क्षेत्रों में चलो-फिरो, और उसकी उस रोज़ी से खाओ, जो उसने उसमें तुम्हारे लिए तैयार की है, और अकेले उसी की ओर तुम्हें हिसाब और बदला के लिए जीवित होकर जाना है।
आयत 16
ءَأَمِنتُم مَّن فِى ٱلسَّمَآءِ أَن يَخْسِفَ بِكُمُ ٱلْأَرْضَ فَإِذَا هِىَ تَمُورُ
ءَأَمِنتُم
क्या बेख़ौफ़ हो गए तुम
مَّن
उससे जो
فِى
(is) in
ٱلسَّمَآءِ
आसमान में है
أَن
कि
يَخْسِفَ
वो धँसा दे
بِكُمُ
तुम्हें
ٱلْأَرْضَ
ज़मीन में
فَإِذَا
तो अचानक
هِىَ
वो
تَمُورُ
वो लरज़ने लगे
क्या तुम उससे निश्चिन्त हो जो आकाश में है कि तुम्हें धरती में धँसा दे, फिर क्या देखोगे कि वह डाँवाडोल हो रही है?
तफ़्सीर:
क्या तुम उस अल्लाह से निडर हो गए, जो आकाश में है कि वह इस धरती को तुम्हारे नीचे से फाड़ दे, जैसे कि क़ारून के नीचे से फाड़ दिया था, जबकि वह रहने के लिए नरम और अधीनस्थ थी, फिर वह अपनी स्थिरता के बाद अचानक तुम्हें लेकर काँपने लगे?!
आयत 17
أَمْ أَمِنتُم مَّن فِى ٱلسَّمَآءِ أَن يُرْسِلَ عَلَيْكُمْ حَاصِبًۭا ۖ فَسَتَعْلَمُونَ كَيْفَ نَذِيرِ
أَمْ
क्या
أَمِنتُم
बेख़ौफ़ हो गए तुम
مَّن
उससे जो
فِى
(is) in
ٱلسَّمَآءِ
आसमान में है
أَن
कि
يُرْسِلَ
वो भेजे
عَلَيْكُمْ
तुम पर
حَاصِبًۭا ۖ
पत्थरों की आँधी
فَسَتَعْلَمُونَ
पस अनक़रीब तुम जान लोगे
كَيْفَ
कैसा था
نَذِيرِ
डराना मेरा
या तुम उससे निश्चिन्त हो जो आकाश में है कि वह तुमपर पथराव करनेवाली वायु भेज दे? फिर तुम जान लोगे कि मेरी चेतावनी कैसी होती है
तफ़्सीर:
क्या तुम उस अल्लाह से, जो आकाश में है, निडर हो गए हो कि वह तुमपर आकाश से पत्थर बरसा दे, जैसे लूत अलैहिस्सलाम की जाति पर बरसाया था?! फिर जब तुम मेरी यातना को देखोगे, तो तुम्हें मेरी चेतावनी का पता चल जाएगा, लेकिन यातना देख लेने के बाद तुम्हें इससे कोई फायदा नहीं होगा।
आयत 18
وَلَقَدْ كَذَّبَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ فَكَيْفَ كَانَ نَكِيرِ
وَلَقَدْ
और अलबत्ता तहक़ीक़
كَذَّبَ
झुठलाया
ٱلَّذِينَ
उन लोगों ने जो
مِن
from
قَبْلِهِمْ
उनसे पहले थे
فَكَيْفَ
तो कैसा
كَانَ
था
نَكِيرِ
अज़ाब मेरा
उन लोगों ने भी झुठलाया जो उनसे पहले थे, फिर कैसा रहा मेरा इनकार!
तफ़्सीर:
निःसंदेह इन मुश्रिकों से पहले के समुदायों ने भी झुठलाया है। जब उन्होंने अपने कुफ़्र और झुठलाने पर हठ किया, तो उनपर अल्लाह की यातना उतरी। तो उनके खिलाफ़ मेरा इनकार कैसा था?! निश्चय वह बहुत सख़्त इनकार था।
आयत 19
أَوَلَمْ يَرَوْا۟ إِلَى ٱلطَّيْرِ فَوْقَهُمْ صَـٰٓفَّـٰتٍۢ وَيَقْبِضْنَ ۚ مَا يُمْسِكُهُنَّ إِلَّا ٱلرَّحْمَـٰنُ ۚ إِنَّهُۥ بِكُلِّ شَىْءٍۭ بَصِيرٌ
أَوَلَمْ
क्या भला नहीं
يَرَوْا۟
उन्होंने देखा
إِلَى
[to]
ٱلطَّيْرِ
तरफ़ परिन्दों के
فَوْقَهُمْ
अपने ऊपर
صَـٰٓفَّـٰتٍۢ
पर फैलाए हुए
وَيَقْبِضْنَ ۚ
और वो समेट लेते हैं
مَا
नहीं
يُمْسِكُهُنَّ
थामता उन्हें
إِلَّا
मगर
ٱلرَّحْمَـٰنُ ۚ
रहमान
إِنَّهُۥ
बेशक वो
بِكُلِّ
हर
شَىْءٍۭ
चीज़ को
بَصِيرٌ
ख़ूब देखने वाला है
क्या उन्होंने अपने ऊपर पक्षियों को पंक्तबन्द्ध पंख फैलाए और उन्हें समेटते नहीं देखा? उन्हें रहमान के सिवा कोई और नहीं थामें रहता। निश्चय ही वह हर चीज़ को देखता है
तफ़्सीर:
क्या इन झुठलाने वालों ने अपने ऊपर पक्षियों को उड़ते नहीं देखा, जो कभी हवा में अपने पंख फैलाते हैं और कभी उन्हें समेट लेते हैं। उन्हें ज़मीन पर गिरने से अल्लाह के अलावा कोई नहीं रोकता है। निश्चय वह हर चीज़ को देखने वाला है, उससे कोई भी चीज़ छिपी नहीं है।
आयत 20
أَمَّنْ هَـٰذَا ٱلَّذِى هُوَ جُندٌۭ لَّكُمْ يَنصُرُكُم مِّن دُونِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ۚ إِنِ ٱلْكَـٰفِرُونَ إِلَّا فِى غُرُورٍ
أَمَّنْ
या कौन है
هَـٰذَا
वो
ٱلَّذِى
जो
هُوَ
वो
جُندٌۭ
लश्कर हो
لَّكُمْ
तुम्हारा
يَنصُرُكُم
वो मदद करे तुम्हारी
مِّن
from
دُونِ
सिवाए
ٱلرَّحْمَـٰنِ ۚ
रहमान के
إِنِ
नहीं हैं
ٱلْكَـٰفِرُونَ
काफ़िर
إِلَّا
मगर
فِى
in
غُرُورٍ
धोखे में
या वह कौन है जो तुम्हारी सेना बनकर रहमान के मुक़ाबले में तुम्हारी सहायता करे। इनकार करनेवाले तो बस धोखे में पड़े हुए है
तफ़्सीर:
यदि (ऐ काफ़िरो) अल्लाह तुम्हें यातना देना चाहे, तो तुम्हारे लिए कोई सेना नहीं है, जो तुम्हें उसकी यातना से बचा सके। काफ़िर लोग तो मात्र धोखे में पड़े हुए हैं। शैतान ने उन्हें धोखा दिया, तो वे उसके धोखे में पड़ गए।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कायनात की बेएब तर्तीब और ज़मीन-आसमान की निशानियों का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि कायनात में कहीं कोई खराबी नहीं, बार-बार देखने पर भी नज़र थककर वापस आती है, यह अल्लाह की कारीगरी का सुबूत है।
आयत 21
أَمَّنْ هَـٰذَا ٱلَّذِى يَرْزُقُكُمْ إِنْ أَمْسَكَ رِزْقَهُۥ ۚ بَل لَّجُّوا۟ فِى عُتُوٍّۢ وَنُفُورٍ
أَمَّنْ
या कौन है
هَـٰذَا
वो
ٱلَّذِى
जो
يَرْزُقُكُمْ
रिज़्क़ देगा तुम्हें
إِنْ
अगर
أَمْسَكَ
वो रोक ले
رِزْقَهُۥ ۚ
रिज़्क़ अपना
بَل
बल्कि
لَّجُّوا۟
वो अड़े हुए हैं
فِى
in
عُتُوٍّۢ
सरकशी में
وَنُفُورٍ
और बिदकने में
या वह कौन है जो तुम्हें रोज़ी दे, यदि वह अपनी रोज़ी रोक ले? नहीं, बल्कि वे तो सरकशी और नफ़रत ही पर अड़े हुए है
तफ़्सीर:
यदि अल्लाह अपनी जीविका को तुम्हारे पास तक पहुँचने से रोक ले, तो तुम्हें कोई भी जीविका प्रदान नहीं कर सकता। बल्कि, निष्कर्ष यह है कि काफ़िर लोग अपने हठ और अहंकार, तथा सच्चाई से उपेक्षा में बहुत दूर चले गए हैं।
आयत 22
أَفَمَن يَمْشِى مُكِبًّا عَلَىٰ وَجْهِهِۦٓ أَهْدَىٰٓ أَمَّن يَمْشِى سَوِيًّا عَلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ
أَفَمَن
क्या फिर जो
يَمْشِى
चलता है
مُكِبًّا
औंधा
عَلَىٰ
on
وَجْهِهِۦٓ
उपने चेहरे पर
أَهْدَىٰٓ
ज़्यादा हिदायत याफ़्ता है
أَمَّن
या जो
يَمْشِى
चलता है
سَوِيًّا
सीधा
عَلَىٰ
on
صِرَٰطٍۢ
ऊपर रास्ते
مُّسْتَقِيمٍۢ
सीधे के
तो क्या वह व्यक्ति जो अपने मुँह के बल औंधा चलता हो वह अधिक सीधे मार्ग पर ह या वह जो सीधा होकर सीधे मार्ग पर चल रहा है?
तफ़्सीर:
क्या वह व्यक्ति जो अपने चेहरे के बल औंधा होकर चलता है - और वह बहुदेववादी है -, अधिक सीधी राह पर है या वह मोमिन, जो सीधे रास्ते पर सीधा होकर चलता है?!
आयत 23
قُلْ هُوَ ٱلَّذِىٓ أَنشَأَكُمْ وَجَعَلَ لَكُمُ ٱلسَّمْعَ وَٱلْأَبْصَـٰرَ وَٱلْأَفْـِٔدَةَ ۖ قَلِيلًۭا مَّا تَشْكُرُونَ
قُلْ
कह दीजिए
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِىٓ
जिसने
أَنشَأَكُمْ
पैदा किया तुम्हें
وَجَعَلَ
और उसने बनाए
لَكُمُ
तुम्हारे लिए
ٱلسَّمْعَ
कान
وَٱلْأَبْصَـٰرَ
और आँखें
وَٱلْأَفْـِٔدَةَ ۖ
और दिल
قَلِيلًۭا
Little
مَّا
कितना कम
تَشْكُرُونَ
तुम शुक्र अदा करते हो
कह दो, "वही है जिसने तुम्हें पैदा किया और तुम्हारे लिए कान और आँखे और दिल बनाए। तुम कृतज्ञता थोड़े ही दिखाते हो।"
तफ़्सीर:
आप (ऐ रसूल) इन झुठलाने वाले मुश्रिकों से कह दें : अल्लाह ही ने तुम्हें पैदा किया, और तुम्हारे लिए कान बनाए जिनसे तुम सुनते हो, और आँखें बनाईं जिनसे तुम देखते हो और दिल बनाए जिनसे तुम समझते हो। तुम अल्लाह का उसकी प्रदान की हुई नेमतों पर बहुत कम शुक्रिया अदा करते हो।
आयत 24
قُلْ هُوَ ٱلَّذِى ذَرَأَكُمْ فِى ٱلْأَرْضِ وَإِلَيْهِ تُحْشَرُونَ
قُلْ
कह दीजिए
هُوَ
वो ही है
ٱلَّذِى
जिसने
ذَرَأَكُمْ
फैलाया तुम्हें
فِى
in
ٱلْأَرْضِ
ज़मीन में
وَإِلَيْهِ
और तरफ़ उसी के
تُحْشَرُونَ
तुम इकट्ठे किए जाओगे
कह दो, "वही है जिसने तुम्हें धरती में फैलाया और उसी की ओर तुम एकत्र किए जा रहे हो।"
तफ़्सीर:
आप (ऐ रसूल) इन झुठलाने वाले मुश्रिकों से कह दें : अल्लाह ही है, जिसने तुम्हें धरती में फैलाया, न कि तुम्हारी मूर्तियाँ, जो कुछ भी पैदा नहीं कर सकतीं। तथा क़ियामत के दिन तुम अकेले उसी के पास हिसाब और बदले के लिए एकत्र किए जाओगे, न कि अपनी मूर्तियों के पास। अतः उसी से डरो और अकेले उसी की इबादत करो।
आयत 25
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَـٰذَا ٱلْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَـٰدِقِينَ
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
مَتَىٰ
कब होगा
هَـٰذَا
ये
ٱلْوَعْدُ
वादा
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
वे कहते है, "यदि तुम सच्चे हो तो यह वादा कब पूरा होगा?"
तफ़्सीर:
तथा मरने के बाद पुनर्जीवित कर उठाए जाने का इनकार करने वाले, पुनर्जीवन को असंभव समझते हुए कहते हैं : यह वादा कब पूरा होगा, जिसका (ऐ मुहम्मद) तुम और तुम्हारे साथी हमें वचन दे रहे हैं, यदि तुम अपने इस दावे में सच्चे हो कि वह आकर ही रहेगा?!
आयत 26
قُلْ إِنَّمَا ٱلْعِلْمُ عِندَ ٱللَّهِ وَإِنَّمَآ أَنَا۠ نَذِيرٌۭ مُّبِينٌۭ
قُلْ
कह दीजिए
إِنَّمَا
बेशक
ٱلْعِلْمُ
इल्म (उसका)
عِندَ
पास है
ٱللَّهِ
अल्लाह के
وَإِنَّمَآ
और बेशक
أَنَا۠
मैं
نَذِيرٌۭ
डराने वाल हूँ
مُّبِينٌۭ
खुल्लम-खुल्ला
कह दो, "इसका ज्ञान तो बस अल्लाह ही के पास है और मैं तो एक स्पष्ट॥ सचेत करनेवाला हूँ।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप कह दें : क़ियामत की जानकारी केवल अल्लाह के पास है। वह कब आएगी, उसके सिवा कोई नहीं जानता। और मैं तो केवल तुम्हें स्पष्ट तौर पर डराने वाला हूँ।
आयत 27
فَلَمَّا رَأَوْهُ زُلْفَةًۭ سِيٓـَٔتْ وُجُوهُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَقِيلَ هَـٰذَا ٱلَّذِى كُنتُم بِهِۦ تَدَّعُونَ
فَلَمَّا
फिर जब
رَأَوْهُ
वो देख लेंगे उसे
زُلْفَةًۭ
नज़दीक
سِيٓـَٔتْ
बिगड़ जाऐंगे
وُجُوهُ
चेहरे
ٱلَّذِينَ
उनके जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
وَقِيلَ
और कह दिया जाएगा
هَـٰذَا
ये है
ٱلَّذِى
वो जो
كُنتُم
थे तुम
بِهِۦ
जिसको
تَدَّعُونَ
तुम माँगा करते
फिर जब वे उसे निकट देखेंगे तो उन लोगों के चेहरे बिगड़ जाएँगे जिन्होंने इनकार की नीति अपनाई; और कहा जाएगा, "यही है वह चीज़ जिसकी तुम माँग कर रहे थे।"
तफ़्सीर:
फिर जब वह वादा उनके पास आ जाएगा और वे यातना को अपने निकट देखेंगे और यह क़ियामत के दिन होगा, तो अल्लाह का इनकार करने वालों के चेहरे बिगड़ जाएँगे और काले पड़ जाएँगे और उनसे कहा जाएगा : यह वही चीज़ है, जो तुम दुनिया में माँगा करते थे और उसकी जल्दी मचाया करते थे।
आयत 28
قُلْ أَرَءَيْتُمْ إِنْ أَهْلَكَنِىَ ٱللَّهُ وَمَن مَّعِىَ أَوْ رَحِمَنَا فَمَن يُجِيرُ ٱلْكَـٰفِرِينَ مِنْ عَذَابٍ أَلِيمٍۢ
قُلْ
कह दीजिए
أَرَءَيْتُمْ
क्या देखा तुमने
إِنْ
अगर
أَهْلَكَنِىَ
हलाक कर दे मुझे
ٱللَّهُ
अल्लाह
وَمَن
और उसे जो
مَّعِىَ
मेरे साथ है
أَوْ
या
رَحِمَنَا
वो रहम करे हम पर
فَمَن
तो कौन
يُجِيرُ
पनाह देगा
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों को
مِنْ
from
عَذَابٍ
अज़ाब से
أَلِيمٍۢ
दर्दनाक
कहो, "क्या तुमने यह भी सोचा कि यदि अल्लाह मुझे और उन्हें भी, जो मेरे साथ है, विनष्ट ही कर दे या वह हम पर दया करे, आख़िर इनकार करनेवालों को दुखद यातना से कौन पनाह देगा?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन झुठलाने वाले मुश्रिकों से उनका खंडन करते हुए कह दें : मुझे बताओ कि अगर अल्लाह मुझे मौत दे दे और मेरे साथ जो मोमिन हैं उन्हें भी मृत्यु दे दे, या हम पर दया करे और हमारी मृत्यु को विलंब कर दे, तो काफ़िरों को दर्दनाक यातना से कौन बचाएगा?! निश्चय उन्हें इससे कोई नहीं बचाएगा।
आयत 29
قُلْ هُوَ ٱلرَّحْمَـٰنُ ءَامَنَّا بِهِۦ وَعَلَيْهِ تَوَكَّلْنَا ۖ فَسَتَعْلَمُونَ مَنْ هُوَ فِى ضَلَـٰلٍۢ مُّبِينٍۢ
قُلْ
कह दीजिए
هُوَ
वो ही
ٱلرَّحْمَـٰنُ
रहमान है
ءَامَنَّا
ईमान लाए हम
بِهِۦ
उस पर
وَعَلَيْهِ
और उसी पर
تَوَكَّلْنَا ۖ
तवक्कुल किया हमने
فَسَتَعْلَمُونَ
पस अनक़रीब तुम जान लोगे
مَنْ
कौन है
هُوَ
जो
فِى
(that is) in
ضَلَـٰلٍۢ
गुमराही में है
مُّبِينٍۢ
खुली-खुली
कह दो, "वह रहमान है। उसी पर हम ईमान लाए है और उसी पर हमने भरोसा किया। तो शीघ्र ही तुम्हें मालूम हो जाएगा कि खुली गुमराही में कौन पड़ा हुआ है।"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल!) आप इन मुश्रिकों से कह दें : वही 'रहमान' है, जो तुम्हें अकेले अपनी इबादत के लिए आमंत्रित करता है। हम उसपर ईमान लाए, तथा अकेले उसी पर हमने अपने मामलों भरोसा किया है। चुनाँचे शीघ्र ही तुम्हें - अनिवार्य रूप से - पता चल जाएगा कि कौन स्पष्ट गुमराही में है और कौन सीधे रास्ते पर है।
आयत 30
قُلْ أَرَءَيْتُمْ إِنْ أَصْبَحَ مَآؤُكُمْ غَوْرًۭا فَمَن يَأْتِيكُم بِمَآءٍۢ مَّعِينٍۭ
قُلْ
कह दीजिए
أَرَءَيْتُمْ
क्या देखा तुमने
إِنْ
अगर
أَصْبَحَ
हो जाए
مَآؤُكُمْ
पानी तुम्हारा
غَوْرًۭا
गहरा
فَمَن
तो कौन है जो
يَأْتِيكُم
लाए तुम्हारे पास
بِمَآءٍۢ
पानी
مَّعِينٍۭ
बहता हुआ
कहो, "क्या तुमने यह भी सोचा कि यदि तुम्हारा पानी (धरती में) नीचे उतर जाए तो फिर कौन तुम्हें लाकर देगा निर्मल प्रवाहित जल?"
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप इन मुश्रिकों से कहें : मुझे बताओ कि क्या तुम्हारा वह पानी, जिसमें से तुम पीते हो, यदि धरती में नीचे चला जाए और तुम्हारी पहुँच से बाहर हो जाए, तो कौन है जो तुम्हारे पास बहता हुआ पानी लाए?! निश्चित रूप से अल्लाह के सिवा कोई नहीं।
आज की ज़िंदगी में सबक़
रिज़्क के अल्लाह की तरफ से होने और पानी की नेमत के ज़िक्र के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह हमें सिखाता है कि अगर पानी ज़मीन में उतर जाए तो कोई इसे वापस नहीं ला सकता, इसलिए इस नेमत की कद्र करनी चाहिए।
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