सूरह अल-क़लम سورة القلم
मक्की 52 आयतें
नाम का मतलब
कलम (कसम खाई गई कलम और लिखने वालों के ज़िक्र से)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-कलम में नबी ﷺ के बुलंद अखलाक की तारीफ और एक बाग़ वाले शख्स की मिसाल का ज़िक्र है, जिसने गरीबों का हक मारने की कोशिश की।
फ़ज़ीलत / सार
इसी सूरह में अल्लाह ने खुद नबी ﷺ के अखलाक की तारीफ की है, यह नबी ﷺ के किरदार की सबसे बड़ी गवाही मानी जाती है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ نٓ ۚ وَٱلْقَلَمِ وَمَا يَسْطُرُونَ
نٓ ۚ
ن
وَٱلْقَلَمِ
क़सम है क़लम की
وَمَا
और उसकी जो
يَسْطُرُونَ
वो लिखते हैं
नून॰। गवाह है क़लम और वह चीज़ जो वे लिखते है,
तफ़्सीर:
{नून} सूरतुल-बक़रा के आरंभ में इस प्रकार के अक्षरों के बारे में बात गुज़र चुकी है। अल्लाह ने क़लम की क़सम खाई है तथा उस चीज़ की क़सम खाई है, जो लोग अपनी क़लमों से लिखते हैं।
आयत 2
مَآ أَنتَ بِنِعْمَةِ رَبِّكَ بِمَجْنُونٍۢ
مَآ
नहीं हैं
أَنتَ
आप
بِنِعْمَةِ
नेअमत से
رَبِّكَ
अपने रब की
بِمَجْنُونٍۢ
कोई मजनून
तुम अपने रब की अनुकम्पा से कोई दीवाने नहीं हो
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप, अल्लाह के इस अनुग्रह से कि उसने आपको नबी बनाया, दीवाने हरगिज़ नहीं हैं। बल्कि, आप उस पागलपन से बरी हैं, जिससे मुश्रिकों ने आपको आरोपित किया है।
आयत 3
وَإِنَّ لَكَ لَأَجْرًا غَيْرَ مَمْنُونٍۢ
وَإِنَّ
और बेशक
لَكَ
आपके लिए
لَأَجْرًا
यक़ीनन अजर है
غَيْرَ
ना
مَمْنُونٍۢ
ख़त्म होने वाला
निश्चय ही तुम्हारे लिए ऐसा प्रतिदान है जिसका क्रम कभी टूटनेवाला नहीं
तफ़्सीर:
निःसंदेह आप लोगों तक अल्लाह का संदेश पहुँचाने से जो कष्ट सहते हैं, उसपर आपके लिए निश्चय कभी बाधित न होने वाला बदला है, और इसमें किसी का आप पर कोई एहसान नहीं है।
आयत 4
وَإِنَّكَ لَعَلَىٰ خُلُقٍ عَظِيمٍۢ
وَإِنَّكَ
और बेशक आप
لَعَلَىٰ
surely (are)
خُلُقٍ
(of) a moral character
عَظِيمٍۢ
यक़ीनन बुलन्द अख़लाक़ पर हैं
निस्संदेह तुम एक महान नैतिकता के शिखर पर हो
तफ़्सीर:
और निःसंदेह आप निश्चित रूप से क़ुरआन के लाए हुए महान चरित्र पर विराजमान हैं। अतः जो कुछ क़ुरआन में है वह पूर्णता आपका स्वभाव बन गया है।
आयत 5
فَسَتُبْصِرُ وَيُبْصِرُونَ
فَسَتُبْصِرُ
पस अनक़रीब आप देखेंगे
وَيُبْصِرُونَ
और वो भी देखेंगे
अतः शीघ्र ही तुम भी देख लोगे और वे भी देख लेंगे
तफ़्सीर:
अतः बहुत जल्द आप देख लेंगे और ये झुठलाने वाले लोग भी देख लेंगे।
आयत 6
بِأَييِّكُمُ ٱلْمَفْتُونُ
بِأَييِّكُمُ
कौन तुम में से
ٱلْمَفْتُونُ
फ़ितने में डाला हुआ है
कि तुममें से कौन विभ्रमित है
तफ़्सीर:
जब सच्चाई सामने आ जाएगी, तो स्पष्ट हो जाएगा कि तुममें से कौन पागलपन से ग्रसित है।?!
आयत 7
إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِمَن ضَلَّ عَن سَبِيلِهِۦ وَهُوَ أَعْلَمُ بِٱلْمُهْتَدِينَ
إِنَّ
बेशक
رَبَّكَ
रब आपका
هُوَ
वो
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِمَن
उसे जो
ضَلَّ
भटक गया
عَن
from
سَبِيلِهِۦ
उसके रास्ते से
وَهُوَ
और वो
أَعْلَمُ
ज़्यादा जानता है
بِٱلْمُهْتَدِينَ
हिदायत पाने वालों को
निस्संदेह तुम्हारा रब उसे भली-भाँति जानता है जो उसके मार्ग से भटक गया है, और वही उन लोगों को भी जानता है जो सीधे मार्ग पर हैं
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) निश्चय आपका रब उसे बेहतर जानता है जो उसके रास्ते से भटक गया है और वही सीधे मार्ग पर चलने वालों को भी बेहतर जानने वाला है। चुनाँचे उसे पता है कि यही लोग हैं जो उससे भटके हुए हैं और आप ही हैं जो उसपर चल रहे हैं।
आयत 8
فَلَا تُطِعِ ٱلْمُكَذِّبِينَ
فَلَا
पस ना
تُطِعِ
आप इताअत कीजिए
ٱلْمُكَذِّبِينَ
झुठलाने वालों की
अतः तुम झुठलानेवालों को कहना न मानना
तफ़्सीर:
अतः (ऐ रसूल) आप उन लोगों की बात न मानें, जो आपके लाए हुए संदेश को झुठलाने वाले हैं।
आयत 9
وَدُّوا۟ لَوْ تُدْهِنُ فَيُدْهِنُونَ
وَدُّوا۟
वो चाहते हैं
لَوْ
काश
تُدْهِنُ
आप ढीले पड़ें
فَيُدْهِنُونَ
तो वो भी ढीले पड़जाऐं
वे चाहते है कि तुम ढीले पड़ो, इस कारण वे चिकनी-चुपड़ी बातें करते है
तफ़्सीर:
वे चाहते हैं कि आप दीन की क़ीमत पर उनके साथ नरमी करें, तो वे भी आपके साथ नरमी करने लगें।
आयत 10
وَلَا تُطِعْ كُلَّ حَلَّافٍۢ مَّهِينٍ
وَلَا
और ना
تُطِعْ
आप इताअत कीजिए
كُلَّ
हर
حَلَّافٍۢ
बहुत क़समें खाने वाले
مَّهِينٍ
निहायत हक़ीर की
तुम किसी भी ऐसे व्यक्ति की बात न मानना जो बहुत क़समें खानेवाला, हीन है,
तफ़्सीर:
और आप हर ऐसे व्यक्ति की बात न मानें, जो बहुत ज़्यादा झूठी क़समें खाने वाला और तुच्छ है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
नबी ﷺ के बुलंद अखलाक की तारीफ का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि अच्छा अखलाक इंसान की सबसे बड़ी पहचान है, इसे अपनाने की कोशिश करनी चाहिए।
आयत 11
هَمَّازٍۢ مَّشَّآءٍۭ بِنَمِيمٍۢ
هَمَّازٍۢ
बड़ा ही ऐब-जो
مَّشَّآءٍۭ
बहुत चलने वाला
بِنَمِيمٍۢ
साथ चुग़ल ख़ोरी के
कचोके लगाता, चुग़लियाँ खाता फिरता हैं,
तफ़्सीर:
लोगों की बहुत ज़्यादा ग़ीबत करने वाला और उनके बीच चुग़ली के साथ बहुत चलने-फिरने वाला है, ताकि उनके बीच फूट डाले।
आयत 12
مَّنَّاعٍۢ لِّلْخَيْرِ مُعْتَدٍ أَثِيمٍ
مَّنَّاعٍۢ
बहुत रोकने वाला
لِّلْخَيْرِ
भलाई का
مُعْتَدٍ
हद से बढ़ने वाला
أَثِيمٍ
सख़्त गुनाहगार
भलाई से रोकता है, सीमा का उल्लंघन करनेवाला, हक़ मारनेवाला है,
तफ़्सीर:
भलाई से बहुत ज़्यादा रोकने वाला, लोगों की धन-संपत्ति, सतीत्व और जान पर अतिक्रमण करने वाला तथा अत्यधिक गुनाह और पाप करने वाला है।
आयत 13
عُتُلٍّۭ بَعْدَ ذَٰلِكَ زَنِيمٍ
عُتُلٍّۭ
बदमिज़ाज
بَعْدَ
बाद
ذَٰلِكَ
इसके
زَنِيمٍ
बेनसब है
क्रूर है फिर अधम भी।
तफ़्सीर:
जो कठोर एवं दुष्ट स्वभाव, अपने पिता के अलावा किसी और की तरफ़ मनसूब (यानी नाजायज औलाद) है।
आयत 14
أَن كَانَ ذَا مَالٍۢ وَبَنِينَ
أَن
कि
كَانَ
है वो
ذَا
a possessor
مَالٍۢ
माल वाला
وَبَنِينَ
और बेटों वाला
इस कारण कि वह धन और बेटोंवाला है
तफ़्सीर:
क्योंकि वह पैसे और बच्चों वाला है, इसलिए अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाने से अहंकार करता है।
आयत 15
إِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِ ءَايَـٰتُنَا قَالَ أَسَـٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ
إِذَا
जब
تُتْلَىٰ
पढ़ी जाती हैं
عَلَيْهِ
उस पर
ءَايَـٰتُنَا
आयात हमारी
قَالَ
वो कहता है
أَسَـٰطِيرُ
कहानियाँ हैं
ٱلْأَوَّلِينَ
पहलों की
जब उसे हमारी आयतें सुनाई जाती है तो कहता है, "ये तो पहले लोगों की कहानियाँ हैं!"
तफ़्सीर:
जब उसके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं, तो कहता है : यह तो पहले लोगों की दंतकथाओं से लिखी गई बातें हैं।
आयत 16
سَنَسِمُهُۥ عَلَى ٱلْخُرْطُومِ
سَنَسِمُهُۥ
अनक़रीब हम दाग़ लगाऐंगे उसे
عَلَى
on
ٱلْخُرْطُومِ
सूँढ(नाक) पर
शीघ्र ही हम उसकी सूँड पर दाग़ लगाएँगे
तफ़्सीर:
हम शीघ्र ही उसकी नाक पर निशान लगा देंगे, जो उसके चेहरे को बिगाड़ देगी और कभी उससे अलग नहीं होगी।
आयत 17
إِنَّا بَلَوْنَـٰهُمْ كَمَا بَلَوْنَآ أَصْحَـٰبَ ٱلْجَنَّةِ إِذْ أَقْسَمُوا۟ لَيَصْرِمُنَّهَا مُصْبِحِينَ
إِنَّا
बेशक हम
بَلَوْنَـٰهُمْ
आज़माया हमने उन्हें
كَمَا
जैसा कि
بَلَوْنَآ
आज़माया हमने
أَصْحَـٰبَ
(the) companions
ٱلْجَنَّةِ
बाग़ वालों को
إِذْ
जब
أَقْسَمُوا۟
उन्होंने क़सम खाई
لَيَصْرِمُنَّهَا
अलबत्ता वो ज़रूर काट लेंगे उसे
مُصْبِحِينَ
सुबह सवेरे ही
हमने उन्हें परीक्षा में डाला है जैसे बाग़वालों को परीक्षा में डाला था, जबकि उन्होंने क़सम खाई कि वे प्रातःकाल अवश्य उस (बाग़) के फल तोड़ लेंगे
तफ़्सीर:
हमने इन मुश्रिकों का अकाल एवं भूख के साथ परीक्षण किया, जिस तरह हमने बाग़ वालों का परीक्षण किया, जब उन्होंने सुबह के समय उसके फलों को जल्दी से तोड़ लेने की क़सम खाई थी, ताकि किसी गरीब व्यक्ति को उनसे खाना न मिले।
आयत 18
وَلَا يَسْتَثْنُونَ
وَلَا
और नहीं
يَسْتَثْنُونَ
वो इस्तसना कर रहे थे
और वे इसमें छूट की कोई गुंजाइश नहीं रख रहे थे
तफ़्सीर:
और उन्होंने 'इन शा अल्लाह' (अगर अल्लाह ने चाहा) कहकर अपनी क़्सम में कोई अपवाद नहीं किया।
आयत 19
فَطَافَ عَلَيْهَا طَآئِفٌۭ مِّن رَّبِّكَ وَهُمْ نَآئِمُونَ
فَطَافَ
तो फिर गया
عَلَيْهَا
उस पर
طَآئِفٌۭ
एक फिरने वाला
مِّن
from
رَّبِّكَ
आपके रब की तरफ़ से
وَهُمْ
और वो
نَآئِمُونَ
सो रहे थे
अभी वे सो ही रहे थे कि तुम्हारे रब की ओर से गर्दिश का एक झोंका आया
तफ़्सीर:
तो अल्लाह ने उस (बाग़) की ओर एक आग भेज दी, जो उसे खा गई, जबकि बाग़ के मालिक सो रहे थे, वे उससे आग को रोकने में सक्षम नहीं थे।
आयत 20
فَأَصْبَحَتْ كَٱلصَّرِيمِ
فَأَصْبَحَتْ
तो वो (बाग़) हो गया
كَٱلصَّرِيمِ
जड़ कटी खेती के मानिन्द
और वह ऐसा हो गया जैसे कटी हुई फ़सल
तफ़्सीर:
तो वह बाग़ अंधेरी रात की तरह काला हो गया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
बाग़ वालों के वाकिये की शुरुआत है, जिन्होंने गरीबों का हक मारने की कोशिश की। यह सबक हमें सिखाता है कि गरीबों और ज़रूरतमंदों का हक मारने की कोशिश आखिरकार अपने ही नुकसान का सबब बनती है।
आयत 21
فَتَنَادَوْا۟ مُصْبِحِينَ
فَتَنَادَوْا۟
फिर वो एक दूसरे को पुकारने लगे
مُصْبِحِينَ
सुबह सवेरे ही
फिर प्रातःकाल होते ही उन्होंने एक-दूसरे को आवाज़ दी
तफ़्सीर:
फिर सुबह के समय उन्होंने एक-दूसरे को पुकारा।
आयत 22
أَنِ ٱغْدُوا۟ عَلَىٰ حَرْثِكُمْ إِن كُنتُمْ صَـٰرِمِينَ
أَنِ
कि
ٱغْدُوا۟
सुबह सवेरे चलो
عَلَىٰ
to
حَرْثِكُمْ
अपने खेत पर
إِن
अगर
كُنتُمْ
हो तुम
صَـٰرِمِينَ
(फल)तोड़ने वाले
कि "यदि तुम्हें फल तोड़ना है तो अपनी खेती पर सवेरे ही पहुँचो।"
तफ़्सीर:
कहने लगे : गरीबों के आगमन से पहले सुबह-सवेरे ही अपने खेत की ओर निकल चलो, यदि तुम उसके फलों को तोड़ना चाहते हो।
आयत 23
فَٱنطَلَقُوا۟ وَهُمْ يَتَخَـٰفَتُونَ
فَٱنطَلَقُوا۟
तो वो चल दिए
وَهُمْ
और वो
يَتَخَـٰفَتُونَ
वो चुपके-चुपके आपस में बातें कर रहे थे
अतएव वे चुपके-चुपके बातें करते हुए चल पड़े
तफ़्सीर:
चुनाँचे वे आपस में चुपके-चुपके बातें करते हुए तेज़ क़दमों से अपने खेत की ओर चल पड़े।
आयत 24
أَن لَّا يَدْخُلَنَّهَا ٱلْيَوْمَ عَلَيْكُم مِّسْكِينٌۭ
أَن
कि
لَّا
Not
يَدْخُلَنَّهَا
ना हरगिज़ दाख़िल हो उसमें
ٱلْيَوْمَ
आज
عَلَيْكُم
तुम पर
مِّسْكِينٌۭ
कोई मिसकीन
कि आज वहाँ कोई मुहताज तुम्हारे पास न पहुँचने पाए
तफ़्सीर:
वे आपस में कह रहे थे : आज बाग़ में तुम्हारे पास कोई ग़रीब हरगिज़ न पहुँचने पाए।
आयत 25
وَغَدَوْا۟ عَلَىٰ حَرْدٍۢ قَـٰدِرِينَ
وَغَدَوْا۟
और वो सुबह सवेरे निकले
عَلَىٰ
with
حَرْدٍۢ
रोकने पर
قَـٰدِرِينَ
क़ादिर बनते हुए
और वे आज तेज़ी के साथ चले मानो (मुहताजों को) रोक देने की उन्हें सामर्थ्य प्राप्त है
तफ़्सीर:
और वे सुबह-सवेरे इस हाल में चल पड़े कि वे अपने फलों को (गरीबों से) रोकने का पक्का इरादा किए हुए थे।
आयत 26
فَلَمَّا رَأَوْهَا قَالُوٓا۟ إِنَّا لَضَآلُّونَ
فَلَمَّا
तो जब
رَأَوْهَا
उन्होंने देखा उसे
قَالُوٓا۟
वो कहने लगे
إِنَّا
बेशक हम
لَضَآلُّونَ
अलबत्ता रास्ता भूल गए हैं
किन्तु जब उन्होंने उसको देखा, कहने लगे, "निश्चय ही हम भटक गए है।
तफ़्सीर:
जब उन्होंने उसे जला हुआ देखा, तो उन्होंने एक-दूसरे से कहा : निश्चय हम उस (बाग़) का रास्ता भूल गए हैं।
आयत 27
بَلْ نَحْنُ مَحْرُومُونَ
بَلْ
बल्कि
نَحْنُ
हम
مَحْرُومُونَ
महरूम कर दिए गए हैं
नहीं, बल्कि हम वंचित होकर रह गए।"
तफ़्सीर:
बल्कि हम बाग़ के फलों को तोड़ने से रोक दिए गए हैं, क्योंकि हमने गरीबों को इससे रोकने का दृढ़ संकल्प कर लिया था।
आयत 28
قَالَ أَوْسَطُهُمْ أَلَمْ أَقُل لَّكُمْ لَوْلَا تُسَبِّحُونَ
قَالَ
कहा
أَوْسَطُهُمْ
उनमें से बेहतर ने
أَلَمْ
क्या नहीं
أَقُل
मैं ने कहा था
لَّكُمْ
तुम्हें
لَوْلَا
क्यों नहीं
تُسَبِّحُونَ
तुम तस्बीह करते
उनमें जो सबसे अच्छा था कहने लगा, "क्या मैंने तुमसे कहा नहीं था? तुम तसबीह क्यों नहीं करते?"
तफ़्सीर:
उनमें से सर्वश्रेष्ठ ने कहा : क्या मैंने तुमसे उस समय नहीं कहा था, जब तुमने ग़रीबों को इससे वंचित करने का संकल्प किया था : तुम अल्लाह की पवित्रता क्यों नहीं बयान करते और उसके सामने तौबा क्यों नहीं करते?!
आयत 29
قَالُوا۟ سُبْحَـٰنَ رَبِّنَآ إِنَّا كُنَّا ظَـٰلِمِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
سُبْحَـٰنَ
पाक है
رَبِّنَآ
रब हमारा
إِنَّا
बेशक हम
كُنَّا
थे हम ही
ظَـٰلِمِينَ
ज़ालिम
वे पुकार उठे, "महान और उच्च है हमारा रब! निश्चय ही हम ज़ालिम थे।"
तफ़्सीर:
उन्होंने कहा : हमारा रब पवित्र है। निःसंदेह हम ही अपने ऊपर अत्याचार करने वाले थे जब हमने ग़रीबों को अपने बाग़ के फलों से रोकने का संकल्प किया था।
आयत 30
فَأَقْبَلَ بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍۢ يَتَلَـٰوَمُونَ
فَأَقْبَلَ
तो मुतावज्जा हुआ
بَعْضُهُمْ
बाज़ उनका
عَلَىٰ
to
بَعْضٍۢ
बाज़ पर
يَتَلَـٰوَمُونَ
आपस में मलामत करते हुए
फिर वे परस्पर एक-दूसरे की ओर रुख़ करके लगे एक-दूसरे को मलामत करने।
तफ़्सीर:
फिर वे एक-दूसरे के सम्मुख होकर परस्पर एक-दूसरे को दोषी ठहराने लगे।
आज की ज़िंदगी में सबक़
बाग़ की तबाही और उनके पछतावे का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि नेमत मिलने पर सदका न देने और लालच करने का अंजाम नेमत का छिन जाना हो सकता है।
आयत 31
قَالُوا۟ يَـٰوَيْلَنَآ إِنَّا كُنَّا طَـٰغِينَ
قَالُوا۟
उन्होंने कहा
يَـٰوَيْلَنَآ
हाय अफ़सोस हम पर
إِنَّا
बेशक हम
كُنَّا
थे हम ही
طَـٰغِينَ
सरकश
उन्होंने कहा, "अफ़सोस हम पर! निश्चय ही हम सरकश थे।
तफ़्सीर:
उन्होंने पछतावे से कहा : हाय हमारी क्षति! निश्चय हम ही ग़रीबों के हक़ को रोकने की योजना बनाकर हद से बढ़ गए थे।
आयत 32
عَسَىٰ رَبُّنَآ أَن يُبْدِلَنَا خَيْرًۭا مِّنْهَآ إِنَّآ إِلَىٰ رَبِّنَا رَٰغِبُونَ
عَسَىٰ
उम्मीद है
رَبُّنَآ
रब हमारा
أَن
कि
يُبْدِلَنَا
वो बदल कर दे हमें
خَيْرًۭا
बेहतर
مِّنْهَآ
इससे
إِنَّآ
बेशक हम
إِلَىٰ
to
رَبِّنَا
तरफ़ अपने रब के
رَٰغِبُونَ
रग़बत करने वाले हैं
"आशा है कि हमारा रब बदले में हमें इससे अच्छा प्रदान करे। हम अपने रब की ओर उन्मुख है।"
तफ़्सीर:
आशा है कि हमारा पालनहार हमें बाग़ से बेहतर बदला प्रदान करेगा। निश्चय हम अकेले अल्लाह ही की ओर इच्छा रखने वाले हैं। उसी से क्षमा की आशा रखते हैं और उसी से भलाई माँगते हैं।
आयत 33
كَذَٰلِكَ ٱلْعَذَابُ ۖ وَلَعَذَابُ ٱلْـَٔاخِرَةِ أَكْبَرُ ۚ لَوْ كَانُوا۟ يَعْلَمُونَ
كَذَٰلِكَ
इसी तरह होता है
ٱلْعَذَابُ ۖ
अज़ाब
وَلَعَذَابُ
और यक़ीनन अज़ाब
ٱلْـَٔاخِرَةِ
आख़िरत का
أَكْبَرُ ۚ
ज़्यादा बड़ा है
لَوْ
काश
كَانُوا۟
होते वो
يَعْلَمُونَ
वो जानते
यातना ऐसी ही होती है, और आख़िरत की यातना तो निश्चय ही इससे भी बड़ी है, काश वे जानते!
तफ़्सीर:
आजीविका से वंचित करके इस यातना की तरह हम उन लोगों को यातना देते हैं जो हमारी अवज्ञा करते हैं, और आख़िरत की यातना तो इससे भी बड़ी है। काश वे उसकी गंभीरता और निरंतरता को जानते!
आयत 34
إِنَّ لِلْمُتَّقِينَ عِندَ رَبِّهِمْ جَنَّـٰتِ ٱلنَّعِيمِ
إِنَّ
बेशक
لِلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के लिए
عِندَ
पास
رَبِّهِمْ
उनके रब के
جَنَّـٰتِ
बाग़ात हैं
ٱلنَّعِيمِ
नेअमतों वाले
निश्चय ही डर रखनेवालों के लिए उनके रब के यहाँ नेमत भरी जन्नतें है
तफ़्सीर:
निश्चय अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर, डरने वाले लोगों के लिए उनके पालनहार के पास नेमतों वाले बाग़ हैं। जिनमें वे नेमतों का आनंद लेंगे। उनकी नेमत कभी बाधित नहीं होगी।
आयत 35
أَفَنَجْعَلُ ٱلْمُسْلِمِينَ كَٱلْمُجْرِمِينَ
أَفَنَجْعَلُ
क्या भला हम कर देंगे
ٱلْمُسْلِمِينَ
फ़रमाबरदारों को
كَٱلْمُجْرِمِينَ
मुजरिमों की तरह
तो क्या हम मुस्लिमों (आज्ञाकारियों) को अपराधियों जैसा कर देंगे?
तफ़्सीर:
क्या हम मुसलमानों को प्रतिफल में काफ़िरों की तरह बना देंगे, जैसा कि मक्का के मुश्रिक लोग दावा करते हैं?!
आयत 36
مَا لَكُمْ كَيْفَ تَحْكُمُونَ
مَا
क्या है
لَكُمْ
तुम्हें
كَيْفَ
कैसे
تَحْكُمُونَ
तुम फ़ैसले करते हो
तुम्हें क्या हो गया है, कैसा फ़ैसला करते हो?
तफ़्सीर:
तुम्हें (ऐ मुश्रिको) क्या हो गया है कि तुम यह अनुचित और कुटिल निर्णय देते हो?!
आयत 37
أَمْ لَكُمْ كِتَـٰبٌۭ فِيهِ تَدْرُسُونَ
أَمْ
या
لَكُمْ
तुम्हारे पास
كِتَـٰبٌۭ
कोई किताब है
فِيهِ
जिसमें
تَدْرُسُونَ
तुम पढ़ते हो
क्या तुम्हारे पास कोई किताब है जिसमें तुम पढ़ते हो
तफ़्सीर:
क्या तुम्हारे पास कोई किताब है, जिसमें तुम पढ़ते हो कि आज्ञाकारी और अवज्ञाकारी के बीच समानता है?!
आयत 38
إِنَّ لَكُمْ فِيهِ لَمَا تَخَيَّرُونَ
إِنَّ
कि बेशक
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
فِيهِ
उसमें
لَمَا
अलबत्ता वो है जो
تَخَيَّرُونَ
तुम पसंद करते हो
कि उसमें तुम्हारे लिए वह कुछ है जो तुम पसन्द करो?
तफ़्सीर:
जिस पुस्तक में है कि तुम्हारे लिए आख़िरत में वही होगा, जो तुम अपने लिए पसंद करोगे।
आयत 39
أَمْ لَكُمْ أَيْمَـٰنٌ عَلَيْنَا بَـٰلِغَةٌ إِلَىٰ يَوْمِ ٱلْقِيَـٰمَةِ ۙ إِنَّ لَكُمْ لَمَا تَحْكُمُونَ
أَمْ
या
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
أَيْمَـٰنٌ
क़समें हैं
عَلَيْنَا
हम पर
بَـٰلِغَةٌ
पहुँचने वाली
إِلَىٰ
to
يَوْمِ
(the) Day
ٱلْقِيَـٰمَةِ ۙ
क़यामत के दिन तक
إِنَّ
कि बेशक
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
لَمَا
अलबत्ता वो है जो
تَحْكُمُونَ
तुम फ़ैसला करोगे
या तुमने हमसे क़समें ले रखी है जो क़ियामत के दिन तक बाक़ी रहनेवाली है कि तुम्हारे लिए वही कुछ है जो तुम फ़ैसला करो!
तफ़्सीर:
क्या तुम्हारे लिए हमारे ज़िम्मे क़समों द्वारा पुष्टि की गई प्रतिज्ञाएं हैं, जिनकी अपेक्षा के अनुसार तुम्हें वही कुछ मिलेगा, जिसका तुम अपने लिए निर्णय करोगे?
आयत 40
سَلْهُمْ أَيُّهُم بِذَٰلِكَ زَعِيمٌ
سَلْهُمْ
पूछिए उनसे
أَيُّهُم
कौन उनमें से
بِذَٰلِكَ
उसका
زَعِيمٌ
ज़ामिन है
उनसे पूछो, "उनमें से कौन इसकी ज़मानत लेता है!
तफ़्सीर:
(ऐ रसूल) आप इस बात के कहने वालों से पूछें : उनमें से कौन इसकी ज़मानत लेता है?!
आज की ज़िंदगी में सबक़
उनकी तौबा और कयामत के दिन मुजरिमों के हाल का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि गलती के एहसास के बाद तौबा करना और सुधरना अल्लाह को पसंद है।
आयत 41
أَمْ لَهُمْ شُرَكَآءُ فَلْيَأْتُوا۟ بِشُرَكَآئِهِمْ إِن كَانُوا۟ صَـٰدِقِينَ
أَمْ
या
لَهُمْ
उनके लिए
شُرَكَآءُ
कुछ शरीक हैं
فَلْيَأْتُوا۟
पस चाहिए कि वो ले आऐं
بِشُرَكَآئِهِمْ
अपने शरीकों को
إِن
अगर
كَانُوا۟
हैं वो
صَـٰدِقِينَ
सच्चे
या उनके ठहराए हुए कुछ साझीदार है? फिर तो यह चाहिए कि वे अपने साझीदारों को ले आएँ, यदि वे सच्चे है
तफ़्सीर:
क्या उनके अल्लाह के सिवा कोई साझी हैं, जो उन्हें प्रतिफल में मोमिनों के बराबर ठहराते हैं?! तो उन्हें चाहिए कि अपने उन साझियों को ले आएँ, यदि वे अपने इस दावे में सच्चे हैं कि उन्होंने इन लोगों को प्रतिफल में मोमिनों के बराबर ठहराया है।
आयत 42
يَوْمَ يُكْشَفُ عَن سَاقٍۢ وَيُدْعَوْنَ إِلَى ٱلسُّجُودِ فَلَا يَسْتَطِيعُونَ
يَوْمَ
जिस दिन
يُكْشَفُ
खोल दिया जाएगा
عَن
from
سَاقٍۢ
पिंडली से
وَيُدْعَوْنَ
और वो बुलाए जाऐंगे
إِلَى
to
ٱلسُّجُودِ
तरफ़ सजदों के
فَلَا
तो ना
يَسْتَطِيعُونَ
वो इस्तिताअत रखते होंगे
जिस दिन पिंडली खुल जाएगी और वे सजदे के लिए बुलाए जाएँगे, तो वे (सजदा) न कर सकेंगे
तफ़्सीर:
क़ियामत का दिन बहुत भयावह होगा और हमारा पालनहार अपनी पिंडली खोल देगा और लोगों को सजदा करने के लिए कहा जाएगा। तो ईमान वाले सजदे में चले जाएँगे और काफ़िर तथा मुनाफ़िक़ लोग सजदा करने में असमर्थ रहेंगे।
आयत 43
خَـٰشِعَةً أَبْصَـٰرُهُمْ تَرْهَقُهُمْ ذِلَّةٌۭ ۖ وَقَدْ كَانُوا۟ يُدْعَوْنَ إِلَى ٱلسُّجُودِ وَهُمْ سَـٰلِمُونَ
خَـٰشِعَةً
नीची होंगी
أَبْصَـٰرُهُمْ
निगाहें उनकी
تَرْهَقُهُمْ
छा रही होगी उन पर
ذِلَّةٌۭ ۖ
ज़िल्लत
وَقَدْ
और तहक़ीक़
كَانُوا۟
थे वो
يُدْعَوْنَ
वो बुलाए जाते
إِلَى
to
ٱلسُّجُودِ
तरफ़ सजदों के
وَهُمْ
जब कि वो
سَـٰلِمُونَ
सही सलामत थे
उनकी निगाहें झुकी हुई होंगी, ज़िल्लत (अपमान) उनपर छा रही होगी। उन्हें उस समय भी सजदा करने के लिए बुलाया जाता था जब वे भले-चंगे थे
तफ़्सीर:
उनकी निगाहें झुकी होंगी, उनपर अपमान और अफसोस छाया होगा। हालाँकि उन्हें दुनिया में अल्लाह के आगे सजदा करने के लिए कहा जाता था, जबकि वे, आज जिस स्थिति में हैं, उससे भले-चंगे थे।
आयत 44
فَذَرْنِى وَمَن يُكَذِّبُ بِهَـٰذَا ٱلْحَدِيثِ ۖ سَنَسْتَدْرِجُهُم مِّنْ حَيْثُ لَا يَعْلَمُونَ
فَذَرْنِى
पस छोड़ दो मुझे
وَمَن
और उसे जो
يُكَذِّبُ
झुठलाता है
بِهَـٰذَا
इस
ٱلْحَدِيثِ ۖ
बात को
سَنَسْتَدْرِجُهُم
अनक़रीब हम आहिसता-आहिसता ले जाऐंगे उन्हें
مِّنْ
from
حَيْثُ
जहाँ से
لَا
not
يَعْلَمُونَ
ना वो जानते होंगे
अतः तुम मुझे छोड़ दो और उसको जो इस वाणी को झुठलाता है। हम ऐसों को क्रमशः (विनाश की ओर) ले जाएँगे, ऐसे तरीक़े से कि वे नहीं जानते
तफ़्सीर:
तो (ऐ रसूल) आप मुझे तथा उसे छोड़ दें, जो आपपर उतरने वाले इस क़ुरआन को झुठलाता है। हम उन्हें धीरे-धीरे इस तरह यातना की ओर लेजाएँगे कि उन्हें पता नहीं चलेगा कि यह उनके साथ चाल चली जा रही है और उन्हें ढील दी जा रही है।
आयत 45
وَأُمْلِى لَهُمْ ۚ إِنَّ كَيْدِى مَتِينٌ
وَأُمْلِى
और मैं मोहलत दे रहा हूँ
لَهُمْ ۚ
उन्हें
إِنَّ
बेशक
كَيْدِى
तदबीर मेरी
مَتِينٌ
निहायत मज़बूत है
मैं उन्हें ढील दे रहा हूँ। निश्चय ही मेरी चाल बड़ी मज़बूत है
तफ़्सीर:
और मैं उन्हें कुछ सयम के लिए मोहलत दे दूँगा, ताकि वे अपने पाप में चरम पर पहुँच जाएँ। निश्चय इनकार करने और झुठलाने वालों के साथ मेरी चाल बहुत मज़बूत है। इसलिए वे मेरी पकड़ से छूट नहीं सकते और मेरी सज़ा से नहीं बच सकते।
आयत 46
أَمْ تَسْـَٔلُهُمْ أَجْرًۭا فَهُم مِّن مَّغْرَمٍۢ مُّثْقَلُونَ
أَمْ
या
تَسْـَٔلُهُمْ
आप सवाल करते हैं उनसे
أَجْرًۭا
किसी अजर का
فَهُم
तो वो
مِّن
from
مَّغْرَمٍۢ
तावान से
مُّثْقَلُونَ
दबे जा रहे हैं
(क्या वे यातना ही चाहते हैं) या तुम उनसे कोई बदला माँग रहे हो कि वे तावान के बोझ से दबे जाते हों?
तफ़्सीर:
क्या (ऐ रसूल!) आप उनसे, उन्हें सत्य की ओर बुलाने का कोई मुआवज़ा माँग रहे हैं, जिसके कारण वे एक भारी बोझ सहन करते हैं, तो यही कारण है कि वे आपसे दूर हो गए हैं?! हालाँकि सच्चाई इसके विपरीत है। क्योंकि आप उनसे कोई मुआवज़ा नहीं माँगते हैं। फिर उन्हें आपका अनुसरण करने से क्या रोकता है?!
आयत 47
أَمْ عِندَهُمُ ٱلْغَيْبُ فَهُمْ يَكْتُبُونَ
أَمْ
या
عِندَهُمُ
उनके पास
ٱلْغَيْبُ
कोई ग़ैब है
فَهُمْ
पस वो
يَكْتُبُونَ
वो लिख रहे हैं
या उनके पास परोक्ष का ज्ञान है तो वे लिख रहे हैं?
तफ़्सीर:
या उनके पास ग़ैब (परोक्ष) का ज्ञान है कि वे जो भी तर्क पसंद करते हैं, लिख लेते हैं, जिनके द्वारा वे आपसे बहस करते हैं?!
आयत 48
فَٱصْبِرْ لِحُكْمِ رَبِّكَ وَلَا تَكُن كَصَاحِبِ ٱلْحُوتِ إِذْ نَادَىٰ وَهُوَ مَكْظُومٌۭ
فَٱصْبِرْ
पस सब्र कीजिए
لِحُكْمِ
हुक्म के लिए
رَبِّكَ
अपने रब के
وَلَا
और ना
تَكُن
आप हों
كَصَاحِبِ
like (the) companion
ٱلْحُوتِ
मछली वाले की तरह
إِذْ
जब
نَادَىٰ
उसने पुकारा
وَهُوَ
इस हाल में कि वो
مَكْظُومٌۭ
ग़म से भरा हुआ था
तो अपने रब के आदेश हेतु धैर्य से काम लो और मछलीवाले (यूनुस अलै॰) की तरह न हो जाना, जबकि उसने पुकारा था इस दशा में कि वह ग़म में घुट रहा था।
तफ़्सीर:
अतः (ऐ रसूल) आपके पालनहार ने उन्हें मोहलत देकर ढील देने का जो निर्णय किया है, उसके लिए धैर्य से काम लें और अपने समुदाय से ऊबने में मछली वाले नबी यूनुस अलैहिस्सलाम की तरह न हो जाएँ; जब उन्होंने अपने पालनहार को इस दशा में पुकार कि वह समुद्र के अंधेरे और मछली के पेट के अंधेरे में व्यथित थे।
आयत 49
لَّوْلَآ أَن تَدَٰرَكَهُۥ نِعْمَةٌۭ مِّن رَّبِّهِۦ لَنُبِذَ بِٱلْعَرَآءِ وَهُوَ مَذْمُومٌۭ
لَّوْلَآ
अगर ना (होती ये बात)
أَن
कि
تَدَٰرَكَهُۥ
पा लिया उसे
نِعْمَةٌۭ
एक नेअमत ने
مِّن
from
رَّبِّهِۦ
उसके रब की तरफ़ से
لَنُبِذَ
अलबत्ता वो फ़ेंक दिया जाता
بِٱلْعَرَآءِ
चटियल मैदान में
وَهُوَ
और वो
مَذْمُومٌۭ
मज़म्मत ज़दा होता
यदि उसके रब की अनुकम्पा उसके साथ न हो जाती तो वह अवश्य ही चटियल मैदान में बुरे हाल में डाल दिया जाता।
तफ़्सीर:
अगर अल्लाह की दया उनके साथ न होती, तो मछली उन्हें एक निर्जन भूमि पर इस दशा में फेंक देती कि वह निंदित होते।
आयत 50
فَٱجْتَبَـٰهُ رَبُّهُۥ فَجَعَلَهُۥ مِنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ
فَٱجْتَبَـٰهُ
तो चुन लिया उसे
رَبُّهُۥ
उसके रब ने
فَجَعَلَهُۥ
तो उसने बना दिया उसे
مِنَ
of
ٱلصَّـٰلِحِينَ
सालेह लोगों में से
अन्ततः उसके रब ने उसे चुन लिया और उसे अच्छे लोगों में सम्मिलित कर दिया
तफ़्सीर:
फिर उनके पालनहार ने उन्हें चुन लिया और अपने सदाचारी बंदों में शामिल कर दिया।
आज की ज़िंदगी में सबक़
यूनुस अलैहिस्सलाम की मिसाल और सब्र की ताकीद का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि गुस्से या मायूसी में जल्दबाज़ी का फैसला लेने की बजाय सब्र से काम लेना चाहिए, जैसा यूनुस अलैहिस्सलाम को सिखाया गया।
आयत 51
وَإِن يَكَادُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لَيُزْلِقُونَكَ بِأَبْصَـٰرِهِمْ لَمَّا سَمِعُوا۟ ٱلذِّكْرَ وَيَقُولُونَ إِنَّهُۥ لَمَجْنُونٌۭ
وَإِن
और बेशक
يَكَادُ
क़रीब है कि
ٱلَّذِينَ
जिन्होंने
كَفَرُوا۟
कुफ़्र किया
لَيُزْلِقُونَكَ
अलबत्ता वो फुसला देंगे आपको
بِأَبْصَـٰرِهِمْ
अपनी निगाहों से
لَمَّا
जब
سَمِعُوا۟
वो सुनते हैं
ٱلذِّكْرَ
ज़िक्र को
وَيَقُولُونَ
और वो कहते हैं
إِنَّهُۥ
बेशक वो
لَمَجْنُونٌۭ
अलबत्ता मजनून हैं
जब वे लोग, जिन्होंने इनकार किया, ज़िक्र (क़ुरआन) सुनते है और कहते है, "वह तो दीवाना है!" तो ऐसा लगता है कि वे अपनी निगाहों के ज़ोर से तुम्हें फिसला देंगे
तफ़्सीर:
और अल्लाह का इनकार करने वाले तथा उसके रसूल को झुठलाने वाले, जब आपपर उतरने वाले इस क़ुरआन को सुनते हैं, तो आपको ऐसे घूरते हैं कि लगता है कि वे आपको अपनी आँखों से अवश्य ही पछाड़ देंगे। तथा वे (अपनी इच्छाओं का पालन करते हुए और सत्य से उपेक्षा करते हुए) कहते हैं : निश्चय इस क़ुरआन को लाने वाला रसूल अवश्य ही दीवाना है।
आयत 52
وَمَا هُوَ إِلَّا ذِكْرٌۭ لِّلْعَـٰلَمِينَ
وَمَا
और नहीं है
هُوَ
वो
إِلَّا
मगर
ذِكْرٌۭ
एक नसीहत
لِّلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहान वालों के लिए
हालाँकि वह सारे संसार के लिए एक अनुस्मृति है
तफ़्सीर:
हालाँकि आप पर उतरने वाला क़ुरआन मनुष्य और जिन्न के लिए मात्र एक उपदेश और अनुस्मारक है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन को पूरी दुनिया के लिए नसीहत बताए जाने के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि कुफ्फार की बुरी नज़रों से घबराने की बजाय अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए।
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