सूरह अल-हाक़्क़ा سورة الحاقة
मक्की 52 आयतें
नाम का मतलब
यकीनी होने वाली घटना (कयामत, जिसका सच होना यकीनी है)
पृष्ठभूमि
सूरह अल-हाक्क़ा में कयामत के दिन का मंज़र, पिछली कौमों (आद, समूद, फिरऔन) की तबाही और आमालनामा दाएं-बाएं हाथ में मिलने का ज़िक्र है।
फ़ज़ीलत / सार
इस सूरह में कुरआन की सच्चाई का ज़ोरदार ऐलान है कि यह किसी शायर या काहिन का कलाम नहीं, बल्कि अल्लाह की तरफ से नाज़िल की गई सच्ची किताब है।
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
आयत 1
بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ ٱلْحَآقَّةُ
ٱلْحَآقَّةُ
हक़ होने वाली
होकर रहनेवाली!
तफ़्सीर:
अल्लाह मरणोपरांत दोबारा जीवित होकर उठने की घड़ी का उल्लेख कर हा है, जो सभी लोगों पर घटित होगी।
आयत 2
مَا ٱلْحَآقَّةُ
مَا
क्या है
ٱلْحَآقَّةُ
हक़ होने वाली
क्या है वह होकर रहनेवाली?
तफ़्सीर:
फिर अल्लाह इस सवाल के द्वारा उसकी महानता और गंभीरता का वर्णन कर रहा है कि : वह होकर रहने वाली क्या चीज़ है?
आयत 3
وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا ٱلْحَآقَّةُ
وَمَآ
और क्या
أَدْرَىٰكَ
बताए आपको
مَا
क्या है
ٱلْحَآقَّةُ
हक़ होने वाली
और तुम क्या जानो कि क्या है वह होकर रहनेवाली?
तफ़्सीर:
और आपको किस चीज़ ने ज्ञात कराया कि यह होकर रहने वाली क्या है?
आयत 4
كَذَّبَتْ ثَمُودُ وَعَادٌۢ بِٱلْقَارِعَةِ
كَذَّبَتْ
झुठलाया
ثَمُودُ
समूद
وَعَادٌۢ
और आद ने
بِٱلْقَارِعَةِ
खटखटाने वाली को
समूद और आद ने उस खड़खड़ा देनेवाली (घटना) को झुठलाया,
तफ़्सीर:
सालेह अलैहिस्सलाम की जाति समूद और हूद अलैहिस्सलाम की जाति आद ने उस क़ियामत को झुठलाया, जो अपनी भयावहता की तीव्रता से लोगों (के दिलों) को खड़खड़ा (दहला) देगी।
आयत 5
فَأَمَّا ثَمُودُ فَأُهْلِكُوا۟ بِٱلطَّاغِيَةِ
فَأَمَّا
तो रहे
ثَمُودُ
समूद
فَأُهْلِكُوا۟
पस वो हलाक किए गए
بِٱلطَّاغِيَةِ
हद से गुज़रने वाली से
फिर समूद तो एक हद से बढ़ जानेवाली आपदा से विनष्ट किए गए
तफ़्सीर:
जहाँ तक समूद के लोगों की बात है, तो अल्लाह ने उन्हें ऐसी आवाज़ से नष्ट कर दिया, जो तीव्रता और भयावहता में अंत को पहुँच गई थी।
आयत 6
وَأَمَّا عَادٌۭ فَأُهْلِكُوا۟ بِرِيحٍۢ صَرْصَرٍ عَاتِيَةٍۢ
وَأَمَّا
और रहे
عَادٌۭ
आद
فَأُهْلِكُوا۟
पस वो हलाक किए गए
بِرِيحٍۢ
हवा से
صَرْصَرٍ
ठंडी यख़
عَاتِيَةٍۢ
सरकश
और रहे आद, तो वे एक अनियंत्रित प्रचंड वायु से विनष्ट कर दिए गए
तफ़्सीर:
और रही बात आद समुदाय की, तो अल्लाह ने उन्हें बड़ी ठंडी और प्रचंड आँधी से विनष्ट कर दिया।
आयत 7
سَخَّرَهَا عَلَيْهِمْ سَبْعَ لَيَالٍۢ وَثَمَـٰنِيَةَ أَيَّامٍ حُسُومًۭا فَتَرَى ٱلْقَوْمَ فِيهَا صَرْعَىٰ كَأَنَّهُمْ أَعْجَازُ نَخْلٍ خَاوِيَةٍۢ
سَخَّرَهَا
उसने मुसल्लत कर दिया उसे
عَلَيْهِمْ
उन पर
سَبْعَ
सात
لَيَالٍۢ
रातें
وَثَمَـٰنِيَةَ
और आठ
أَيَّامٍ
दिन
حُسُومًۭا
मुसलसल
فَتَرَى
तो आप देखते
ٱلْقَوْمَ
उन लोगों को
فِيهَا
उसमें
صَرْعَىٰ
पछाड़े हुए
كَأَنَّهُمْ
गोया कि वो
أَعْجَازُ
तने हैं
نَخْلٍ
खजूर के दरख़्त के
خَاوِيَةٍۢ
खोखले
अल्लाह ने उसको सात रात और आठ दिन तक उन्मूलन के उद्देश्य से उनपर लगाए रखा। तो लोगों को तुम देखते कि वे उसमें पछाड़े हुए ऐसे पड़े है मानो वे खजूर के जर्जर तने हों
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उसे उनपर सात रातों और आठ दिनों की अवधि के लिए भेज दिया, जो उन्हें जड़ से विनष्ट कर रही थी। चुनाँचे आप उन्हें उनके घरों में मृत ज़मीन पर पड़े हुए देखते, गोया कि वे विनष्ट किए जाने के बाद धरती पर गिरे हुए खजूरों के जर्जर तने हों।
आयत 8
فَهَلْ تَرَىٰ لَهُم مِّنۢ بَاقِيَةٍۢ
فَهَلْ
तो क्या
تَرَىٰ
आप देखते हैं
لَهُم
उनका
مِّنۢ
any
بَاقِيَةٍۢ
कोई बाक़ी बचा हुआ
अब क्या तुम्हें उनमें से कोई शेष दिखाई देता है?
तफ़्सीर:
तो क्या उनके इस यातना से पीड़ित होने के बाद आपको उनमें से कोई भी प्राणी बाक़ी दिखाई देता है?!
आयत 9
وَجَآءَ فِرْعَوْنُ وَمَن قَبْلَهُۥ وَٱلْمُؤْتَفِكَـٰتُ بِٱلْخَاطِئَةِ
وَجَآءَ
और आया
فِرْعَوْنُ
फ़िरऔन
وَمَن
और जो
قَبْلَهُۥ
उससे पहले थे
وَٱلْمُؤْتَفِكَـٰتُ
और उलट जानो वाली बस्तियाँ
بِٱلْخَاطِئَةِ
साथ गुनाह के
और फ़िरऔन ने और उससे पहले के लोगों ने और तलपट हो जानेवाली बस्तियों ने यह ख़ता की
तफ़्सीर:
फ़िरऔन और उससे पहले के समुदायों और ऊपर-नीचे उलटकर यातना दी जाने वाली बस्तियों अर्थात लूत अलैहिस्सलाम की जाति के लोगों ने शिर्क एवं अवज्ञा जैसे गलत कार्य किए।
आयत 10
فَعَصَوْا۟ رَسُولَ رَبِّهِمْ فَأَخَذَهُمْ أَخْذَةًۭ رَّابِيَةً
فَعَصَوْا۟
तो उन्होंने नाफ़रमानी की
رَسُولَ
रसूल की
رَبِّهِمْ
अपने रब के
فَأَخَذَهُمْ
तो उसने पकड़ लिया उन्हें
أَخْذَةًۭ
पकड़ना
رَّابِيَةً
सख़्त
उन्होंने अपने रब के रसूल की अवज्ञा की तो उसने उन्हें ऐसी पकड़ में ले लिया जो बड़ी कठोर थी
तफ़्सीर:
चुनाँचे उनमें से प्रत्येक ने अपने रसूल की अवज्ञा की और उसे झुठलाया, तो अल्लाह ने उनकी उससे कहीं अधिक पकड़ की, जो उनके विनाश के लिए काफ़ी थी।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कयामत के यकीनी होने और आद-समूद-फिरऔन की तबाही का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि सरकश कौमों का अंजाम हमेशा तबाही रहा है, यह हमें इबरत के लिए काफी है।
आयत 11
إِنَّا لَمَّا طَغَا ٱلْمَآءُ حَمَلْنَـٰكُمْ فِى ٱلْجَارِيَةِ
إِنَّا
बेशक हम
لَمَّا
जब
طَغَا
तुग़यानी की
ٱلْمَآءُ
पानी ने
حَمَلْنَـٰكُمْ
सवार किया हमने तुम्हें
فِى
in
ٱلْجَارِيَةِ
कश्ती में
जब पानी उमड़ आया तो हमने तुम्हें प्रवाहित नौका में सवार किया;
तफ़्सीर:
जब पानी ऊंचाई में अपनी सीमा से ऊपर बढ़ गया, तो हमने उन लोगों को, जिनकी पुश्त में तुम थे, उस बहती नाव में सवार किया, जिसे नूह अलैहिस्सलाम ने हमारे आदेश से बनाया था। तो इस तरह यह तुम्हें सवार करना था।
आयत 12
لِنَجْعَلَهَا لَكُمْ تَذْكِرَةًۭ وَتَعِيَهَآ أُذُنٌۭ وَٰعِيَةٌۭ
لِنَجْعَلَهَا
ताकि हम बना दें उसे
لَكُمْ
तुम्हारे लिए
تَذْكِرَةًۭ
याददिहानी
وَتَعِيَهَآ
और याद रखे उसे
أُذُنٌۭ
कान
وَٰعِيَةٌۭ
याद रखने वाला
ताकि उसे तुम्हारे लिए हम शिक्षाप्रद यादगार बनाएँ और याद रखनेवाले कान उसे सुरक्षित रखें
तफ़्सीर:
ताकि हम नाव और उसकी कहानी को एक उपदेश बना दें, जिससे काफ़िरों को नष्ट करने और ईमान वालों को मुक्ति प्रदान करने पर प्रमाण ग्रहण किया जाए और उसे ऐसे कान याद रखें जो सुनी हुई बातों को याद रखने वाले हैं।
आयत 13
فَإِذَا نُفِخَ فِى ٱلصُّورِ نَفْخَةٌۭ وَٰحِدَةٌۭ
فَإِذَا
फिर जब
نُفِخَ
फूँक दिया जाएगा
فِى
in
ٱلصُّورِ
सूर में
نَفْخَةٌۭ
फूँकना
وَٰحِدَةٌۭ
एक ही बार
तो याद रखो जब सूर (नरसिंघा) में एक फूँक मारी जाएगी,
तफ़्सीर:
फिर जब सूर में फूँक मारने पर नियुक्त फ़रिश्ता एक फूँक मारेगा, और यह दूसरी बार फूँक मारना है।
आयत 14
وَحُمِلَتِ ٱلْأَرْضُ وَٱلْجِبَالُ فَدُكَّتَا دَكَّةًۭ وَٰحِدَةًۭ
وَحُمِلَتِ
और उठाई जाएगी
ٱلْأَرْضُ
ज़मीन
وَٱلْجِبَالُ
और पहाड़
فَدُكَّتَا
तो दोनों रेज़ा-रेज़ा कर दिए जाऐंगे
دَكَّةًۭ
रेज़ा-रेज़ा किए जाना
وَٰحِدَةًۭ
एक ही बार
और धरती और पहाड़ों को उठाकर एक ही बार में चूर्ण-विचूर्ण कर दिया जाएगा
तफ़्सीर:
और धरती तथा पहाड़ों को उठाया जाएगा और दोनों को एक ही बार इस ज़ोर से टकराया जाएगा कि धरती के हिस्से तथा उसके पहाड़ों के हिस्से अलग-अलग हो जाएँगे।
आयत 15
فَيَوْمَئِذٍۢ وَقَعَتِ ٱلْوَاقِعَةُ
فَيَوْمَئِذٍۢ
तो उस दिन
وَقَعَتِ
वाक़ेअ हो जाएगी
ٱلْوَاقِعَةُ
वाक़ेअ होने वाली
तो उस दिन घटित होनेवाली घटना घटित हो जाएगी,
तफ़्सीर:
जिस दिन यह सब कुछ होगा, उस दिन क़ियामत आ जाएगी।
आयत 16
وَٱنشَقَّتِ ٱلسَّمَآءُ فَهِىَ يَوْمَئِذٍۢ وَاهِيَةٌۭ
وَٱنشَقَّتِ
और फट जाएगा
ٱلسَّمَآءُ
आसमान
فَهِىَ
तो वो
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
وَاهِيَةٌۭ
कमज़ोर होगा
और आकाश फट जाएगा और उस दिन उसका बन्धन ढीला पड़ जाएगा,
तफ़्सीर:
और उस दिन आसमान फट जाएगा, ताकि उससे फ़रिश्ते उतर सकें। तो उस दिन वह कमज़ोर होगा, जबकि वह पहले मज़बूत और सुसंगत था।
आयत 17
وَٱلْمَلَكُ عَلَىٰٓ أَرْجَآئِهَا ۚ وَيَحْمِلُ عَرْشَ رَبِّكَ فَوْقَهُمْ يَوْمَئِذٍۢ ثَمَـٰنِيَةٌۭ
وَٱلْمَلَكُ
और फ़रिश्ते
عَلَىٰٓ
(will be) on
أَرْجَآئِهَا ۚ
उसके किनारों पर होंगे
وَيَحْمِلُ
और उठाऐंगे
عَرْشَ
अर्श
رَبِّكَ
आपके रब का
فَوْقَهُمْ
अपने ऊपर
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
ثَمَـٰنِيَةٌۭ
आठ (फ़रिश्ते )
और फ़रिश्ते उसके किनारों पर होंगे और उस दिन तुम्हारे रब के सिंहासन को आठ अपने ऊपर उठाए हुए होंगे
तफ़्सीर:
और फ़रिश्ते उसके किनारों पर होंगे, तथा उस महान दिन में आठ निकटवर्ती फ़रिश्ते आपके पालनहार के अर्श को उठाए हुए होंगे।
आयत 18
يَوْمَئِذٍۢ تُعْرَضُونَ لَا تَخْفَىٰ مِنكُمْ خَافِيَةٌۭ
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
تُعْرَضُونَ
तुम पेश किए जाओगे
لَا
not
تَخْفَىٰ
ना छुप सकेगी
مِنكُمْ
तुम से
خَافِيَةٌۭ
कोई छुपने वाली
उस दिन तुम लोग पेश किए जाओगे, तुम्हारी कोई छिपी बात छिपी न रहेगी
तफ़्सीर:
उस दिन तुम (ऐ लोगो) अल्लाह के सामने पेश किए जाओगे। तुम्हारी कोई गुप्त बात अल्लाह से छिपी नहीं रहेगी। बल्कि अल्लाह उसके बारे में जानने वाला, उससे अवगत होगा।
आयत 19
فَأَمَّا مَنْ أُوتِىَ كِتَـٰبَهُۥ بِيَمِينِهِۦ فَيَقُولُ هَآؤُمُ ٱقْرَءُوا۟ كِتَـٰبِيَهْ
فَأَمَّا
तो रहा
مَنْ
वो जो
أُوتِىَ
दिया गया
كِتَـٰبَهُۥ
किताब अपनी
بِيَمِينِهِۦ
अपने दाऐं हाथ में
فَيَقُولُ
तो वो कहेगा
هَآؤُمُ
लो
ٱقْرَءُوا۟
पढ़ो
كِتَـٰبِيَهْ
किताब मेरी
फिर जिस किसी को उसका कर्म-पत्र उसके दाहिने हाथ में दिया गया, तो वह कहेगा, "लो पढ़ो, मेरा कर्म-पत्र!
तफ़्सीर:
फिर रहा वह व्यक्ति, जिसे उसके कर्मों की किताब उसके दाएँ हाथ में दी गई, तो वह खुशी और प्रसन्नता से कहेगा : लो, मेरे कर्मों की किताब पढ़ो।
आयत 20
إِنِّى ظَنَنتُ أَنِّى مُلَـٰقٍ حِسَابِيَهْ
إِنِّى
बेशक मैं
ظَنَنتُ
यक़ीन रखता था मैं
أَنِّى
कि बेशक मैं
مُلَـٰقٍ
मुलाक़ात करने वाला हूँ
حِسَابِيَهْ
अपने हिसाब से
"मैं तो समझता ही था कि मुझे अपना हिसाब मिलनेवाला है।"
तफ़्सीर:
मैं दुनिया में जानता था और मुझे यक़ीन था कि मैं मरने के बाद पुनर्जीवित कर उठाया जाने वाला हूँ और अपना प्रतिफल पाने वाला हूँ।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कश्ती-ए-नूह की नजात और आमालनामा दाएं हाथ में मिलने का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि नेक अमल करने वालों को खुशखबरी के साथ अपना आमालनामा मिलेगा, यह नेकी की तरगीब देता है।
आयत 21
فَهُوَ فِى عِيشَةٍۢ رَّاضِيَةٍۢ
فَهُوَ
तो वो
فِى
(will be) in
عِيشَةٍۢ
ज़िन्दगी में होगा
رَّاضِيَةٍۢ
दिल पसंद
अतः वह सुख और आनन्दमय जीवन में होगा;
तफ़्सीर:
अतः वह सुखमय और संतोषजनक जीवन में होगा, क्योंकि उसे स्थायी आनंद दिखाई देगा।
आयत 22
فِى جَنَّةٍ عَالِيَةٍۢ
فِى
In
جَنَّةٍ
a Garden
عَالِيَةٍۢ
बुलन्द जन्नत में
उच्च जन्नत में,
तफ़्सीर:
उच्च स्थान एवं प्रतिष्ठा वाली जन्नत में होगा।
आयत 23
قُطُوفُهَا دَانِيَةٌۭ
قُطُوفُهَا
फल जिसके
دَانِيَةٌۭ
क़रीब होंगे
जिसके फलों के गुच्छे झुके होंगे
तफ़्सीर:
जिसके फल, उन्हें खाने वाले से बिल्कुल क़रीब होंगे।
आयत 24
كُلُوا۟ وَٱشْرَبُوا۟ هَنِيٓـًٔۢا بِمَآ أَسْلَفْتُمْ فِى ٱلْأَيَّامِ ٱلْخَالِيَةِ
كُلُوا۟
खाओ
وَٱشْرَبُوا۟
और पियो
هَنِيٓـًٔۢا
मज़े से
بِمَآ
बवजह उसके जो
أَسْلَفْتُمْ
कर चुके तुम
فِى
in
ٱلْأَيَّامِ
दिनों में
ٱلْخَالِيَةِ
गुज़िशता
मज़े से खाओ और पियो उन कर्मों के बदले में जो तुमने बीते दिनों में किए है
तफ़्सीर:
उनके सम्मान में कहा जाएगा : तुमने दुनिया में बीते हुए दिनों में जो अच्छे कर्म करके आगे भेजे थे, उसके बदले में, बिना किसी नुक़सान के खाओ और पियो।
आयत 25
وَأَمَّا مَنْ أُوتِىَ كِتَـٰبَهُۥ بِشِمَالِهِۦ فَيَقُولُ يَـٰلَيْتَنِى لَمْ أُوتَ كِتَـٰبِيَهْ
وَأَمَّا
और रहा
مَنْ
वो जो
أُوتِىَ
दिया गया
كِتَـٰبَهُۥ
किताब अपनी
بِشِمَالِهِۦ
अपने दाऐं हाथ में
فَيَقُولُ
तो वो कहेगा
يَـٰلَيْتَنِى
ऐ काश कि मैं
لَمْ
ना
أُوتَ
मैं दिया जाता
كِتَـٰبِيَهْ
किताब अपनी
और रहा वह क्यक्ति जिसका कर्म-पत्र उसके बाएँ हाथ में दिया गया, वह कहेगा, "काश, मेरा कर्म-पत्र मुझे न दिया जाता
तफ़्सीर:
और रहा वह व्यक्ति, जिसे उसका कर्म-पत्र उसके बाएँ हाथ में दिया गया, तो वह पछतावे की तीव्रता से कहेगा : ऐ काश! मुझे मेरा कर्म-पत्र न दिया जाता, क्योंकि उसमें ऐसे बुरे कार्य हैं, जो मुझे यातना का पात्र बनाते हैं।
आयत 26
وَلَمْ أَدْرِ مَا حِسَابِيَهْ
وَلَمْ
और ना
أَدْرِ
मैं जानता
مَا
क्या है
حِسَابِيَهْ
हिसाब मेरा
और मैं न जानता कि मेरा हिसाब क्या है!
तफ़्सीर:
और काश मैं अपने हिसाब के बारे में कुछ न जानता।
आयत 27
يَـٰلَيْتَهَا كَانَتِ ٱلْقَاضِيَةَ
يَـٰلَيْتَهَا
ऐ काश कि वो
كَانَتِ
होती वो
ٱلْقَاضِيَةَ
फ़ैसलाकुन
"ऐ काश, वह (मृत्यु) समाप्त करनेवाली होती!
तफ़्सीर:
ऐ काश कि वह मौत जो मुझे आई थी, ऐसी मौत होती जिसके बाद मैं कभी उठाया न जाता।
आयत 28
مَآ أَغْنَىٰ عَنِّى مَالِيَهْ ۜ
مَآ
ना
أَغْنَىٰ
काम आया
عَنِّى
मुझे
مَالِيَهْ ۜ
माल मेरा
"मेरा माल मेरे कुछ काम न आया,
तफ़्सीर:
मेरा धन मुझसे अल्लाह की यातना को कुछ भी न टाल सका।
आयत 29
هَلَكَ عَنِّى سُلْطَـٰنِيَهْ
هَلَكَ
हलाक हो गई
عَنِّى
मुझसे
سُلْطَـٰنِيَهْ
सलतनत मेरी
"मेरा ज़ोर (सत्ता) मुझसे जाता रहा!"
तफ़्सीर:
मेरा तर्क और वह शक्ति एवं वैभव जिनपर मैं भरोसा किया करता था, सब कुछ मुझसे जाता रहा।
आयत 30
خُذُوهُ فَغُلُّوهُ
خُذُوهُ
पकड़ो उसे
فَغُلُّوهُ
फिर तौक़ पहनाओ उसे
"पकड़ो उसे और उसकी गरदन में तौक़ डाल दो,
तफ़्सीर:
और कहा जाएगा : (ऐ फ़रिश्तो) उसे पकड़ो और उसके हाथों को उसकी गरदन के साथ जकड़ दो।
आज की ज़िंदगी में सबक़
जन्नत की नेमतों और आमालनामा बाएं हाथ में मिलने का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि गुनाहगारों का आमालनामा बाएं हाथ में मिलना बड़ी शर्मिंदगी और अफसोस का सबब होगा।
आयत 31
ثُمَّ ٱلْجَحِيمَ صَلُّوهُ
ثُمَّ
फिर
ٱلْجَحِيمَ
जहन्नम में
صَلُّوهُ
झोंको उसे
"फिर उसे भड़कती हुई आग में झोंक दो,
तफ़्सीर:
फिर उसे आग में डाल दो, ताकि उसकी गर्मी झेलता रहे।
आयत 32
ثُمَّ فِى سِلْسِلَةٍۢ ذَرْعُهَا سَبْعُونَ ذِرَاعًۭا فَٱسْلُكُوهُ
ثُمَّ
फिर
فِى
into
سِلْسِلَةٍۢ
एक ज़ंजीर में
ذَرْعُهَا
पैमाइश जिसकी
سَبْعُونَ
सत्तर
ذِرَاعًۭا
गज़ है
فَٱسْلُكُوهُ
पस दाख़िल करो उसे
"फिर उसे एक ऐसी जंजीर में जकड़ दो जिसकी माप सत्तर हाथ है
तफ़्सीर:
फिर उसे एक ऐसी ज़ंजीर में दाख़िल कर दो, जिसकी लंबाई सत्तर गज़ है।
आयत 33
إِنَّهُۥ كَانَ لَا يُؤْمِنُ بِٱللَّهِ ٱلْعَظِيمِ
إِنَّهُۥ
बेशक वो
كَانَ
था वो
لَا
not
يُؤْمِنُ
ना वो ईमान रखता
بِٱللَّهِ
अल्लाह पर
ٱلْعَظِيمِ
जो अज़मत वाला है
"वह न तो महिमावान अल्लाह पर ईमान रखता था
तफ़्सीर:
निश्चय वह सबसे महान अल्लाह पर ईमान नहीं रखता था।
आयत 34
وَلَا يَحُضُّ عَلَىٰ طَعَامِ ٱلْمِسْكِينِ
وَلَا
और ना
يَحُضُّ
वो तरग़ीब देता था
عَلَىٰ
on
طَعَامِ
खाना (खिलाने)पर
ٱلْمِسْكِينِ
मिसकीन को
और न मुहताज को खाना खिलाने पर उभारता था
तफ़्सीर:
और दूसरों को ग़रीब को खाना खिलाने के लिए प्रोत्साहित नहीं करता था।
आयत 35
فَلَيْسَ لَهُ ٱلْيَوْمَ هَـٰهُنَا حَمِيمٌۭ
فَلَيْسَ
तो नहीं है
لَهُ
उसके लिए
ٱلْيَوْمَ
आज
هَـٰهُنَا
यहाँ
حَمِيمٌۭ
कोई गहरा दोस्त
"अतः आज उसका यहाँ कोई घनिष्ट मित्र नहीं,
तफ़्सीर:
अतः क़ियामत के दिन उसका कोई क़रीबी (रिश्तेदार) नहीं है, जो उससे यातना को टाल सके।
आयत 36
وَلَا طَعَامٌ إِلَّا مِنْ غِسْلِينٍۢ
وَلَا
और ना
طَعَامٌ
कोई खाना
إِلَّا
मगर
مِنْ
from
غِسْلِينٍۢ
ज़ख़्मों के धोवन का
और न ही धोवन के सिवा कोई भोजन है,
तफ़्सीर:
और उसके खाने के लिए जहन्नमियों के शरीर से निकले हुए पीप के सिवा कोई भोजन नहीं है।
आयत 37
لَّا يَأْكُلُهُۥٓ إِلَّا ٱلْخَـٰطِـُٔونَ
لَّا
Not
يَأْكُلُهُۥٓ
नहीं खाऐंगे उसे
إِلَّا
मगर
ٱلْخَـٰطِـُٔونَ
ख़ताकार
"उसे ख़ताकारों (अपराधियों) के अतिरिक्त कोई नहीं खाता।"
तफ़्सीर:
यह भोजन केवल वही लोग खाते हैं, जो गुनहगार और पापी हैं।
आयत 38
فَلَآ أُقْسِمُ بِمَا تُبْصِرُونَ
فَلَآ
पस नहीं
أُقْسِمُ
मैं क़सम खाता हूँ
بِمَا
उसकी जो
تُبْصِرُونَ
तुम देखते हो
अतः कुछ नहीं! मैं क़सम खाता हूँ उन चीज़ों की जो तुम देखते
तफ़्सीर:
अल्लाह ने उन चीज़ों की क़सम खाई है, जिन्हें तुम देखते हो।
आयत 39
وَمَا لَا تُبْصِرُونَ
وَمَا
और जो
لَا
not
تُبْصِرُونَ
नहीं तुम देखते
हो और उन चीज़ों को भी जो तुम नहीं देखते,
तफ़्सीर:
और उन चीज़ों की भी क़सम खाई है, जिन्हें तुम नहीं देखते हो।
आयत 40
إِنَّهُۥ لَقَوْلُ رَسُولٍۢ كَرِيمٍۢ
إِنَّهُۥ
बेशक ये
لَقَوْلُ
यक़ीनन क़ौल है
رَسُولٍۢ
एक पयामबर
كَرِيمٍۢ
मोअज़्ज़िज़ का
निश्चय ही वह एक प्रतिष्ठित रसूल की लाई हुई वाणी है
तफ़्सीर:
निःसंदेह क़ुरआन अल्लाह की वाणी है, जिसे लोगों के सामने उसका सम्मानित रसूल पढ़कर सुनाता है।
आज की ज़िंदगी में सबक़
दोज़ख़ के अज़ाब का ज़िक्र है। यह सबक हमें सिखाता है कि गरीबों को खाना खिलाने की तरगीब न देना भी एक बड़ा गुनाह गिना गया है, हमें ज़रूरतमंदों का ख्याल रखना चाहिए।
आयत 41
وَمَا هُوَ بِقَوْلِ شَاعِرٍۢ ۚ قَلِيلًۭا مَّا تُؤْمِنُونَ
وَمَا
और नहीं
هُوَ
ये
بِقَوْلِ
क़ौल
شَاعِرٍۢ ۚ
किसी शायर का
قَلِيلًۭا
little
مَّا
कितना कम
تُؤْمِنُونَ
तुम ईमान लाते हो
वह किसी कवि की वाणी नहीं। तुम ईमान थोड़े ही लाते हो
तफ़्सीर:
यह किसी कवि की वाणी नहीं है। क्योंकि यह कविता के रूप में नहीं है। तुम बहुत कम ईमान लाते हो।
आयत 42
وَلَا بِقَوْلِ كَاهِنٍۢ ۚ قَلِيلًۭا مَّا تَذَكَّرُونَ
وَلَا
और ना ही
بِقَوْلِ
क़ौल है
كَاهِنٍۢ ۚ
किसी काहिन का
قَلِيلًۭا
little
مَّا
कितना कम
تَذَكَّرُونَ
तुम नसीहत पकड़ते हो
और न वह किसी काहिन का वाणी है। तुम होश से थोड़े ही काम लेते हो
तफ़्सीर:
यह किसी काहिन की भी वाणी नहीं है। क्योंकि काहिनों की बात इस क़ुरआन से बिलकुल अलग होती है। तुम बहुत कम शिक्षा ग्रहण करते हो।
आयत 43
تَنزِيلٌۭ مِّن رَّبِّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
تَنزِيلٌۭ
नाज़िल करदा
مِّن
from
رَّبِّ
रब की तरफ़ से
ٱلْعَـٰلَمِينَ
तमाम जहानों के
अवतरण है सारे संसार के रब की ओर से,
तफ़्सीर:
बल्कि यह सभी प्राणियों के पालनहार की ओर से उतारा हुआ है।
आयत 44
وَلَوْ تَقَوَّلَ عَلَيْنَا بَعْضَ ٱلْأَقَاوِيلِ
وَلَوْ
और अगर
تَقَوَّلَ
वो गढ़ लेता
عَلَيْنَا
हम पर
بَعْضَ
बाज़
ٱلْأَقَاوِيلِ
बातें
यदि वह (नबी) हमपर थोपकर कुछ बातें घड़ता,
तफ़्सीर:
और यदि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हमपर कोई ऐसी बात गढ़कर लगा देते, जो हमने नहीं कही है।
आयत 45
لَأَخَذْنَا مِنْهُ بِٱلْيَمِينِ
لَأَخَذْنَا
अलबत्ता पकड़ लेते हम
مِنْهُ
उसे
بِٱلْيَمِينِ
दाऐं हाथ से
तो अवश्य हम उसका दाहिना हाथ पकड़ लेते,
तफ़्सीर:
तो निश्चय हम उससे बदला लेते और उसे शक्ति और क्षमता के साथ पकड़ लेते।
आयत 46
ثُمَّ لَقَطَعْنَا مِنْهُ ٱلْوَتِينَ
ثُمَّ
फिर
لَقَطَعْنَا
अलबत्ता काट देते हम
مِنْهُ
उसकी
ٱلْوَتِينَ
रगे जान
फिर उसकी गर्दन की रग काट देते,
तफ़्सीर:
फिर निश्चय हम उसकी दिल से मिली हुई नस काट देते।
आयत 47
فَمَا مِنكُم مِّنْ أَحَدٍ عَنْهُ حَـٰجِزِينَ
فَمَا
तो ना होता
مِنكُم
तुम में से
مِّنْ
any
أَحَدٍ
कोई एक
عَنْهُ
उससे
حَـٰجِزِينَ
रोकने वाला
और तुममें से कोई भी इससे रोकनेवाला न होता
तफ़्सीर:
फिर तुममें से कोई भी हमें उससे रोक नहीं सकता। इसलिए उसका तुम्हारी ख़ातिर हमपर कोई बात गढ़कर लगाना बहुत दूर की बात है।
आयत 48
وَإِنَّهُۥ لَتَذْكِرَةٌۭ لِّلْمُتَّقِينَ
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
لَتَذْكِرَةٌۭ
अलबत्ता एक नसीहत है
لِّلْمُتَّقِينَ
मुत्तक़ी लोगों के लिए
और निश्चय ही वह एक अनुस्मृति है डर रखनेवालों के लिए
तफ़्सीर:
निःसंदेह क़ुरआन उन लोगों के लिए निश्चय एक उपदेश है, जो अपने पालनहार से, उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई चीज़ों से बचकर, डरने वाले हैं।
आयत 49
وَإِنَّا لَنَعْلَمُ أَنَّ مِنكُم مُّكَذِّبِينَ
وَإِنَّا
और बेशक हम
لَنَعْلَمُ
अलबत्ता हम जानते हैं
أَنَّ
कि बेशक
مِنكُم
तुम में कुछ
مُّكَذِّبِينَ
झुठलाने वाले हैं
और निश्चय ही हम जानते है कि तुममें कितने ही ऐसे है जो झुठलाते है
तफ़्सीर:
और निःसंदेह हम भली-भाँति जानते हैं कि तुम्हारे अंदर कुछ लोग ऐसे हैं, जो इस क़ुरआन को झुठलाते हैं।
आयत 50
وَإِنَّهُۥ لَحَسْرَةٌ عَلَى ٱلْكَـٰفِرِينَ
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
لَحَسْرَةٌ
अलबत्ता हसरत है
عَلَى
upon
ٱلْكَـٰفِرِينَ
काफ़िरों पर
निश्चय ही वह इनकार करनेवालों के लिए सर्वथा पछतावा है,
तफ़्सीर:
और निःसंदेह क़ुरआन को झुठलाना निश्चित रूप से क़ियामत के दिन बड़े पछतावे का कारण होगा।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन की सच्चाई का ऐलान (शायर या काहिन का कलाम नहीं) का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि कुरआन अल्लाह की तरफ से नाज़िल की गई सच्ची किताब है, इस पर शक नहीं करना चाहिए।
आयत 51
وَإِنَّهُۥ لَحَقُّ ٱلْيَقِينِ
وَإِنَّهُۥ
और बेशक वो
لَحَقُّ
अलबत्ता हक़ है
ٱلْيَقِينِ
यक़ीनी
और वह बिल्कुल विश्वसनीय सत्य है।
तफ़्सीर:
और निःसंदेह क़ुरआन बिलकुल विश्वसनीय सत्य है, जिसके अल्लाह की ओर से होने में कोई शक एवं संदेह नहीं है।
आयत 52
فَسَبِّحْ بِٱسْمِ رَبِّكَ ٱلْعَظِيمِ
فَسَبِّحْ
पस तस्बीह कीजिए
بِٱسْمِ
नाम की
رَبِّكَ
अपने रब की
ٱلْعَظِيمِ
जो अज़मत वाला है
अतः तुम अपने महिमावान रब के नाम की तसबीह (गुणगान) करो
तफ़्सीर:
तो (ऐ रसूल) आप अपने पालनहार को उस चीज़ से पवित्र ठहराएँ, जो उसके योग्य नहीं है। और अपने महान पालनहार के नाम का जप करें।
आज की ज़िंदगी में सबक़
कुरआन को यकीनी हक बताए जाने के साथ सूरह का इख्तिताम होता है। यह सबक हमें सिखाता है कि अल्लाह की तस्बीह और तारीफ करते रहना हर हाल में ज़रूरी है।
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